May 8, 2017

दो राष्ट्र हैं हिंदू और दलित

दलितों में इतना परिवर्तन नहीं आया है कि वे सवर्णों की तरह खूंखार हो गए हों और वे होंगे भी नहीं क्योंकि उनके पुरखे—कबीर, रविदास और डा. आंबेडकर ने उन्हें भेड़िया बनने की शिक्षा नहीं दी है...



सहारनपुर के शब्बीरपुर घटना पर कँवल भारती की टिप्पणी 

इस विषय पर मैं काफी लिख चुका हूँ. मैं अपने मत की पुष्टि में अभी की सहारनपुर की घटना लेता हूँ, जहाँ शब्बीरपुर गाँव में ठाकुरों ने 15 दलितों पर लोहे की राड और धारदार हथियारों से जानलेवा हमला किया है, उन्होंने 22 घरों पर पेट्रोल डालकर आग लगा दी, जिससे उनके पशु, टीवी, मोटरसाइकिलें, बर्तन, बिस्तर, फर्नीचर सब जल कर राख हो गये. 

उन्होंने पूरी जाटव बस्ती में दहशत मचाई, जाति-सूचक गलियां दीं, रविदास मंदिर में तोड़फोड़ व लूटमार की, और गांव में स्थापित रविदास  की प्रतिमा को क्षतिग्रस्त कर दिया. कहा जाता है कि गांव में ठाकुर राणाप्रताप की झांकी निकाल रहे थे, दलितों ने लाउडस्पीकर बंद करने को कहा, और बंद न करने पर उन्होंने जुलुस पर पथराव कर दिया. 

इससे भगदड़ मच गयी, एक ठाकुर की दम घुटने से मौत हो गयी, जिसका बदला लेने के लिए फोन करके आसपास के ठाकुरों को बुलाया गया. और सबने खूंखार तरीके से दलित बस्ती को घेर लिया. इस घटना ने देवली, साधुपुर, कफलटा, कुम्हेर, बाथे और खैरलांजी नरसंहार की याद ताजा कर दी है, जिनमें खूंखार सवर्णों ने दलितों के खून से होली खेली थी. 

इन सभी घटनाओं की तरह इस कांड की भी एकपक्षीय जाँच होगी, और सभी अभियुक्त दोषमुक्त हो जायेंगे. पर कुछ बेगुनाह दलित जेल जरूर चले जायेंगे. प्रदेश में हिन्दूवादी ठाकुरों की सरकार है. 

दलित कवि मलखान सिंह की एक कविता के अनुसार, ठाकुरों का राजा हाथी पर सवार होकर गाँव में आएगा, और दलितों को कुछ रियायतें बाँटकर चला जायेगा. यह भी हो सकता है कि राजा इसकी जरूरत भी न समझे. खैर, इस घटना को अंजाम देने में किसी भी दलित की कोई भूमिका नहीं है. इस सारे खूनी नाटक की पटकथा ठाकुरों के द्वारा ही लिखी गयी थी. 

पिछले कुछ सालों में  दलितों में इतना परिवर्तन तो आया है, कि वे अब जातीय अपमान का शाब्दिक जवाब देने लगे हैं, और कुछ पढ़लिख गए हैं. किन्तु, उनमें इतना परिवर्तन अभी नहीं आया है कि वे सवर्णों की तरह खूंखार हो गए हैं. लोगों के घरों में आग लगाने लगे हैं, घरों में घुसकर लोगों को गोलियों से भूनने लगे हैं, या गर्भवती महिला का पेट चीरकर शिशु को हवा में उछालकर गोली से उड़ाने लगे हैं. 

जिस दिन दलित इतने खूंखार हो जायेंगे, तब शायद देश एक भीषण जातिसंघर्ष में बदल जाएगा, और शायद सवर्णों के छक्के भी छूट जाएँ. लेकिन दलित इतने खूंखार बनेंगे नहीं, क्योंकि उनके पुरखे—कबीर, रविदास, और डा. आंबेडकर ने उन्हें भेड़िया बनने की शिक्षा नहीं दी है. वे लोकतंत्र में विश्वास करने वाले लोग हैं, और भूखे-नंगे रहकर और फुटपाथों पर सोकर भी उन्होंने कभी हथियार नहीं उठाये. इसलिए इस आरोप पर कभी विश्वास नहीं किया जा सकता कि उन्होंने ठाकुरों से लाउडस्पीकर बंद कराने की हिम्मत की होगी, और उनके जुलुस पर पत्थर फेंके होंगे. 

इसका सबसे बड़ा कारण यह है कि उस गांव के जाटव अपनी जीविका के लिए उन ठाकुरों पर ही आश्रित हैं. वे उनके खेतों में काम करते हैं. वे उन पर पत्थर कैसे फेंक सकते थे? जरूर, इसके पीछे ठाकुरों और दलितों के बीच कोई अन्य आर्थिक कारण होगा. हो सकता है कि खैरलांजी की तरह यहाँ भी कुछ दलित आर्थिक रहन—सहन में ठाकुरों की बराबरी करने लगे हों, और उन्हें जमीन पर लाने के लिए ही उनके घरों को जलाकर राख करके उन्हें सबक सिखाया गया हो.

'शूद्रों—अतिशूद्रों की फूट का फायदा हमेशा ब्राह्मणवादियों ने उठाया है'

शूद्र अतिशूद्र एकदूसरे के खिलाफ लड़ रहे हैं और अपने साझा दुश्मन ब्राह्मणवाद से नहीं लड़ रहे हैं. इन जातियों को आपस में लड़ाने के लिए ही जातीय अस्मिता और जातीय पहचान का इस्तेमाल किया गया है....

अशोक भारती नेशनल कन्फेडरेशन ऑफ़ दलित एंड आदिवासी राइट्स (NACDOR) के संस्थापक हैं और इस संस्था के माध्यम से भारत के 23 राज्यों में दलित आदिवासी अधिकार की लड़ाई लड़ते रहे हैं. आइईएस अधिकारी रह चुके भारती ने लंबे समय तक जमीनी काम करते हुए स्वयंसेवी संस्थाओं का एक देशव्यापी गठजोड़ निर्मित किया है. देशभर में दलित आदिवासी आंदोलनों से ये जुड़े रहे हैं और दलित आदिवासी अधिकार और विकास के मुद्दों पर राईट बेस्ड अप्रोच के साथ काम करते आये हैं. वर्तमान में दलित बहुजन राजनीति के लिए एक नया विकल्प बनाने की दिशा में काम कर रहे हैं और हाल ही में इन्होने जन सम्मान पार्टी की स्थापना की है. 

अशोक भारती से संजय जोठे की बातचीत

इधर उत्तर प्रदेश में दलित राजनीति की हार पर आपने अभी तक विस्तार से बात नहीं रखी, आपकी नजर में इस हार का क्या कारण है?
देखिये राजनीतिक हार या जीत के गहरे मायने होते हैं और कम से कम आज की दलित राजनीति की हार और उत्तर प्रदेश में बसपा के सफाए के बहुत गहरे मायने हैं. ये केवल एक चुनावी हार नहीं है, बल्कि ये एक विचारधारा की और एक रणनीति की हार है. बाबा साहेब अंबेडकर के नाम पर खुद अम्बेडकरी मूल्यों के खिलाफ एक तरह की राजनीति बनाई गयी है, वो कुछ समय के लिए तो चल गयी लेकिन उसका फेल होना तय था. वही हुआ है.

आपने एक शब्द इस्तेमाल किया “अम्बेडकरी मूल्यों के खिलाफ राजनीति” क्या आप इसकी विस्तार से व्याख्या करना चाहेंगे?
हाँ, हाँ, क्यों नहीं... इस बात को अब दलितों और बहुजनों के घर घर तक पहुँचाना होगा. मैं जरूर इसे विस्तार से रखना चाहूँगा. देखिये, बात दरअसल ये है कि अगर दलितों में आपस में जातियों की अलग अलग पहचान को उभारा जाएगा और उन्हें अपनी अपनी जातियों पर गर्व करते हुए दूसरी जातियों से श्रेष्ठ साबित करने का प्रयास किया जाएगा तो ये सभी जातियां अपने अपने में मगन होने लगेंगी और जातियों के बीच में आपस में कोई पुल नहीं बन सकेगा. यही सबसे बड़ी भूल है. कांशीराम जी के बताये अनुसार हमने एक बार नहीं बल्कि कई बार जातियों को अपने अपने छोटे दायरों में महान बनने का पाठ पढाया, उसका फायदा ये हुआ कि हमारे समय में जातियों के भीतर ही अपनी जाति से जुड़ा हुआ अपमान और हिकारत का भाव खत्म हुआ. न सिर्फ दलित और अनुसूचित जातियों ने अपनी जातीय पहचान में गर्व लेना शुरू किया बल्कि उन्हें दूसरों से भी कुछ सम्मान मिलने लगा. ये कांशीरामजी की बड़ी सफलता रही है. इसी ने जातियों को एक राजनीतिक मोबिलाइजेशन के लिए उपलब्ध बनाया और इसी का परिणाम हम बसपा की राजनीतिक सफलताओं में देखते हैं. 

लेकिन ये सफलता अम्बेडकरी मूल्यों के खिलाफ कैसे है? आप इस पर क्या दृष्टिकोण रखते हैं?
देखिये, मेरा दृष्टिकोण एकदम साफ़ है जो मैं कई बार जाहिर भी कर चुका हूँ. बाबा साहेब आंबेडकर के लिए जाति विनाश न केवल लक्ष्य है, बल्कि वही उनकी राजनीति का मार्ग भी है. इसे थोड़ा समझना होगा हमें. अंबेडकर जाति के खात्मे के लिए राजनीति में जा रहे हैं और इसके लिए जो रणनीति बनाते हैं उसमे जातियों को एक दूसरे से दूर ले जाना उनके लिए रास्ता नहीं है बल्कि वे जातियों को एक दूसरे के निकट लाना चाहते हैं. न केवल डिप्रेस्ड क्लासेस या अनुसूचित जातियों को बल्कि वे पिछड़ों, किसानों मजदूरों को भी एकसाथ लाना चाहते थे. लेकिन दिक्कत बीच में ये हुई कि उनके समय में दलितों अनुसूचित जातियों और अन्य पिछड़ों की राजनीतिक चेतना अभी ठीक से विकसित नहीं हुई थी इसीलिये उनमें एक जाति के रूप में अपने ही अंदर एक आत्मसम्मान का भाव जगाने के लिए कुछ समय की जरूरत थी. 

ये समय अंबेडकर के बाद उन्हें कांशीराम जी ने दिया. इस समय का ठीक इस्तेमाल करते हुए कांशीराम जी ने इन जातियों में एक ख़ास किस्म का आत्मसम्मान भरना शुरू किया और इसी के नतीजे में जातीय अस्मिता की राजनीति परवान चढी और उसने बड़ी सफलता भी हासिल की. लेकिन मैं फिर जोर देना चाहूँगा कि ये रणनीति दूरगामी अर्थो में अम्बेडकरी मूल्यों के खिलाफ ही थी. इसका कारण ये है कि इसने जातियों के बंद दायरों के भीतर जातीय अस्मिता तो जगा दी लेकिन जातीय अस्मिता के जगते ही इसने उन सारी अलग अलग जातियों के बीच में श्रेष्ठ अश्रेष्ठ की पुरानी बहस को नए कलेवर में दुबारा खड़ा कर दिया. जो चर्मकार मित्र हैं वे चर्मकार होने में गर्व अनुभव करने लगे जाट या वाल्मीकि मित्र हैं वे अपने जाट और वाल्मीकि होने में गर्व अनुभव करने लगे. यहाँ तक तो ठीक है, लेकिन इससे आगे बढ़ते हुए इनमे आपस में कोई मधुर संबंध नहीं बन सके और इसका फायदा ब्राह्मणवादी विचारधारा ने उठाया. इन उभरती अस्मिताओं को आपस में लड़ाया गया. आरक्षण के मुद्दे पर, मंदिर मस्जिद या हिन्दू मुसलमान के मुद्दे पर या लडका लड़की की छेड़छाड़ जैसे मामूली मुद्दों पर भी इन दलितों और ओबीसी को आपस में लड़ाया गया. ये लड़ाई कांशीराम की रणनीति की असफलता है. 

अगर शूद्रों और दलित जातियों में आत्मसम्मान आता है तो क्या उनका आपस में लड़ना अनिवार्य है? जैसा कि पिछले कुछ दशकों में हुआ? क्या इसे रोका नहीं जा सकता?
रोका जा सकता है बंधु, वही तो हमें समझना है अब. अब तक की राजनीतिक जय पराजय से जो सन्देश निकल रहा है उसे इमानदारी से देखने की जरूरत है. 

स जातीय अस्मिता के टकराव को कैसे रोका जा सकता है? 
ये सिद्धांत में बहुत आसान है, हालाँकि अमल में ये कठिन है, फिर भी मैं आपको बताना चाहूंगा कि जातीय अस्मिता ने जिस तरह का आत्मसम्मान एक जाति के भीतर पैदा किया है वह स्वागत योग्य तो है लेकिन उसका वहीं तक ठहरे रहना खतरनाक है. वाल्मीकि या जाटव या जाट या यादव अपनी जातीय अस्मिता में सम्मान का अनुभव अवश्य करे, लेकिन वहीं न रुक जाए. इस जातीय अस्मिता को अन्य जातियों की अस्मिता और सम्मान से जोड़कर भी देखे. सीधे सीधे कहें तो बात ये है कि चूँकि यादव, जाटव, जाट, कोरी आदि भारतीय वर्णाश्रम व्यवस्था में शूद्र और अतिशूद्र माने गए हैं इनका काम मेहनत का और किसानी या शिल्प का काम रहा है. जब ये अपने अपने जातियों के दायरे में अपने श्रम और अपने काम में गर्व का अनुभव कर सकते हैं तो अपने दूसरे भाइयों के काम का भी सम्मान कर ही सकते हैं. इसमें परेशानी कहाँ है? 

एक यादव या जाट जब पशु पालता है या खेती करता है तो उसी खेती के लिए लोहार, कारपेंटर से या चर्मकार से भी औजार खरीदता है ये सब एक साझे मिशन के साथी हैं. यादव या जाट अपनी खेती के लिए की गयी मेहनत में अपने लोहार, चर्मकार या कारपेंटर भाई का भी सम्मान क्यों नहीं कर सकता? मेरी नजर में बिलकुल कर सकता है. हम इन सब जातियों को एक दूसरे का सम्मान करना सिखा सकते हैं. इस तरह जातीय दायरों में सम्मान की बात को जातीय दायरों से बाहर निकालकर एक दूसरे के सम्मान से जोड़ दिया जाए तो अंबेडकर के सपनों की राजनीति शुरू हो जायेगी और एक प्रबुद्ध और समृद्ध भारत का सपना साकार होने लगेगा.

आप बार बार जातीय अस्मिता और सम्मान पर जोर दे रहे हैं क्या आप पेरियार से प्रभावित हैं?
हाँ भी और नहीं भी. हाँ इस अर्थ में कि वे बाबा साहेब की तरह ही हमारे लिए आदरणीय हैं, उनकी रणनीतियों से जो शिक्षा मिली है हम उन्हें आगे बढाना चाहते हैं. नहीं इस अर्थ में कि उनके आत्मसम्मान आन्दोलन में और मेरी सम्मान की प्रस्तावना में एक बुनियादी अंतर है. पेरियार एक व्यक्ति के आत्मसम्मान की वकालत कर रहे हैं जो उस समय बहुत जरुरी था. उस समय की हालत ऐसी थी कि हमारे शूद्र अतिशूद्र अर्थात ओबीसी, दलित, आदिवासी भाई एकदम गरीबी और गुलामी में बंधे थे, ऐसे में एक व्यक्ति के आत्मसम्मान का प्रश्न ही संभव था. उस समय पेरियार अगर जातीय अस्मिताओं को भुलाकर अंतरजातीय सम्मान आन्दोलन चलाते तो इस बात को कोई नहीं समझता.

मेरा ये मानना है कि आज के दौर में उत्तर और दक्षिण दोनों की दलित राजनीति की सफलता ने और इस बीच हुए आर्थिक उदारीकरण और औद्योगिक, शैक्षणिक विकास ने दलितों, शूद्रों, आदिवासियों में व्यक्ति और जाति के स्तर पर काफी आत्मसम्मान भर दिया है. अब इस बिंदु के बाद दो ही दिशाएँ बाकी रह जाती हैं, या तो ये आत्मसम्मान से भरी जातियों और व्यक्ति आपस में लड़कर ख़त्म हो जाएँ या फिर अपने अपने आत्मसम्मान को साथ लिए हुए ये परस्पर सम्मान का भाव सीखकर एकदूसरे को ऊपर उठने में मदद करें. अब मेरा जोर दुसरे बिंदु पर है. इसीलिये मैं आत्मसम्मान की बजाय परस्पर सम्मान या सम्मान की राजनीति के पक्ष में हूँ. आप गौर से देखेंगे तो इसमें अंबेडकर और पेरियार की शिक्षाओं का सार मौजूद है.


इस तरह की सम्मान की राजनीति शूद्रों, अतिशूद्रों आदिवासियों को आपस में कैसे जोड़ सकती है?
यही तो मुद्दा है भाई. इसे ही समझना है, बाकी सब फिर अपने आप हो जाएगा. इसे इस तरह समझिये. अभी तक जाट, यादव, जाटव, कोरी आदि के नाम पर शूद्रों, अतिशूद्रों को आपस में लड़ाया गया है. इसमें फायदा सिर्फ ब्राह्मणवादी ताकतों को हुआ है जो जीत के बाद न शूद्रों अर्थात ओबीसी के किसी काम आती है न अतिशूद्रों अर्थात दलितों के किसी काम आती है. अब मजेदार बात ये है कि इन शूद्रों और अतिशूद्रों की हालत लगभग एक जैसी है. इनकी शिक्षा, रोजगार, चिकित्सा इत्यादि के मानकों पर जो हालत है उसमे बहुत ज्यादा अंतर नहीं है. सच्चर कमिटी की रिपोर्ट देखिये तो आपको पता चलेगा कि ओबीसी की हालत मुसलमानों और दलितों से कोई बहुत बेहतर नहीं है. लेकिन इसके बावजूद शूद्र अतिशूद्र एकदूसरे के खिलाफ लड़ रहे हैं और अपने साझा दुश्मन ब्राह्मणवाद से नहीं लड़ रहे हैं. इन जातियों को आपस में लड़ाने के लिए ही जातीय अस्मिता और जातीय पहचान का इस्तेमाल किया गया है. अगर एक जाट को अपने जाट होने में गर्व है और एक वाल्मीकि को वाल्मीकि होने में गर्व है तो एक ढंग से ये बात अच्छी है लेकिन इसका नतीजा ये भी होगा कि इन्हें आपस में लड़ाया जा सकता है. और वही हम देख रहे हैं. अगर जाट और वाल्मीकि एकदूसरे का सम्मान करते हुए भाइयों की तरह एकदूसरे की मदद कर सकें तो दोनों का सम्मान कम नहीं होगा बल्कि बढेगा. आपस में मुहब्बत और दोस्ती से एकदूसरे का सम्मान बढ़ता है, कम नहीं होता. इससे समाज में एक तरह की सुरक्षा और सुकून का माहौल बनता है. इस सुरक्षा और सुकून की हमारे शूद्र और अतिशूद्र भाइयों बहनों को बड़ी जरूरत है. और ये सुरक्षा तभी बनेगी जबकि ये जातियां जातीय अस्मिता से ऊपर उठकर अंतरजातीय सम्मान और सहकार करना सीखें.

तो जैसे पेरियार ने आत्मसम्मान आन्दोलन चलाया था वैसे ही आप जन सम्मान आन्दोलन चलाएंगे?
बिलकुल चलाएंगे, अब यही रास्ता है, इसीलिये हमने “जनसम्मान पार्टी” का गठन किया है और आम भारतीय नागरिक को सम्मान दिलवाने की राजनीति करना चाहते हैं. 

आज के हालात में जहां बेरोजगारी, गरीबी, कुपोषण, हिंसा, भ्रष्टाचार आदि बड़े मुद्दे हैं वहां आप जन सम्मान को बड़ा मुद्दा कैसे बना रहे हैं?
देखिये ये बात सच है कि गरीबी बेरोजगारी भ्रष्टाचार आदि बड़े मुद्दे हैं. लेकिन ये मत भूलिए कि इन सबके बावजूद हमारा आम आदमी अब उतना लाचार, भूखा, कमजोर और दिशाहीन नहीं रह गया है जितना वह पचास या सौ साल पहले था. आज गरीबी है लेकिन भुखमरी नहीं है, आज बेरोजगारी है लेकिन बंधुआ मजदूरी नहीं है. कुछ हद तक हालात बदले हैं. ऐसे में एक आम भारतीय शुद्र मतलब ओबीसी और अतिशूद्र मतलब दलित के लिए रोजी रोटी और सुरक्षा के साथ साथ सम्मान भी बड़ा मुद्दा है. सम्मान के साथ शिक्षा, चिकित्सा, रोजगार, सामाजिक समरसता और सामान अवसर अपने आप शामिल हो जाते हैं. एक एक अक्र्के अगर हम इन छोटे छोटे मुद्दों की बात करेंगे को कोई हम न निकलेगा लेकिन सम्मान की बात आते ही ये सारे मुद्दे अपने आप इसमें शामिल हो जाते हैं. इसीलिये मैं जनसम्मान पार्टी की तरफ से जन के सम्मान की राजनीति करने के लिए भारत में निकला हूँ.

यहाँ आप जब दलितों शूद्रों और पिछड़ों को गरीब की तरह देखते हैं और उनके सम्मान के प्रश्न को एक साझा प्रश्न बनाते हैं तब क्या आप वर्ग चेतना के आईने में भी सम्मान को एक बड़े मुद्दे की तरह देख पाते हैं?
बिलकुल ही देख पाते हैं. इसे भी समझिये, असल में बाबा साहेब ने जो लक्ष्य हमारे लिए रखा है वह है जातिविहीन वर्ण विहीन और वर्ग विहीन समाज की स्थापना. इस नजरिये से चलें तो जिस तरह हमने जाति के विभाजन में सम्मान के प्रश्न को देखा उसी तरह हमें वर्ग के विभाजन में भी सम्मान के प्रश्न को देखना होगा. अब मूल मुद्दा ये है कि जाति या वर्ग दोनों से परे आम गरीब मजदूर या किसान को सम्मान कैसे दिलवाया जाए? यहाँ बाबा साहेब की बात पर गौर करना जरुरी होगा. उन्होंने कहा है कि रोटी तो कोई भी कमा लेता है, संपत्ति भी पैदा कर सकता है. लेकिन असल मुद्दा उसके सामाजिक सम्मान का है, समाज की मुख्यधारा की प्रक्रियाओं में उसकी स्वीकार्यता का है. 

आज अगर कोई दलित या अछूत उद्योगपति या बड़ा अधिकारी भी बन जाता है तो भी उसे अछूत या दलित ही कहा जाएगा. वहीं एक ब्राह्मण कितना भी गरीब या भिखारी क्यों न हो जाए समाज में उसका सम्मान एक ख़ास सीमा से नीचे नहीं गिरेगा. इसका मतलब ये हुआ कि जहां तक सम्मान का प्रश्न है व्यक्ति को वर्ग या वर्ण का सदस्य मानें या जाति का सदस्य मानें – तीनों जगहों पर उसके सम्मान का प्रश्न कमोबेश एक सा है. और यह एक गहरी बात है कि व्यक्ति के सामाजिक ही नहीं बल्कि पारिवारिक जीवन का सुख संतोष भी सम्मान पर ही निर्भर करता है. अगर हमारा आम भारतीय किसान मजदूर और गरीब अगर अपनी किसी भी पहचान के दायरे में अगर सम्मानित है तो उसकी गरीबी और जहालत से निकलने की कोशिश आज नहीं तो कल सफल हो ही जायेगी. लेकिन अगर उसके सामाजिक सम्मान को कम कर दिया गया या मिटा दिया गया तो वो अपनी स्थिति सुधारने के लिए न तो अपनी मेहनत से कुछ ख़ास कर पायेगा और न ही उसे समाज या समुदाय का सहयोग मिल सकेगा. सामाजिक सम्मान न होने का असर बहुत गहरा होता है. सम्मान से वंचित व्यक्ति और समुदाय ऐतिहासिक रूप से पिछड़ जाते हैं और संगठित प्रयास करने के लायक नही रह जाते. जाति व्यवस्था ने जो मनोवैज्ञानिक जड़ता थोपी है उसको सम्मान के इस दृष्टिकोण से भी देखना चाहिए.

ये एकदम नया दृष्टिकोण है, आशा है जाति और वर्ग दोनों के प्रश्न को हम सम्मान और जाना सम्मान के नए उपकरण से हल कर सकेंगे?
हाँ, मुझे पूरी उम्मीद है कि जाति और वर्ग दोनों की संरचनाओं में दलितों अछूतों बहुजनों आदिवासियों और ओबीसी के जो प्रश्न हैं वे सम्मान के बिंदु पर आकर एक सूत्र में बांधे जा सकते हैं. और असल में वे बंधे हुए भी हैं. जरूरत है उन्हें उजागर करके उनके सामाजिक राजनीतिक निहितार्थों को ओपेरेशनलाइज करने की. इसी उद्देश्य से हमने जन सम्मान पार्टी का गठन किया है और हम इसी मुद्दे को बहुजन एकीकरण का आधार बनाने के लिए निकले हैं.

सिर्फ 'एक काबिलियत' ने बनाया कपिल को केजरीवाल का प्रिय मंत्री

देश की जनता को ईमानदारी और नए लोकतंत्र का झुनझुना थमाकर अरविंद केजरीवाल बनने तो सिकंदर चले थे, पर औकात इतनी हो पाई कि वह अपने ही पाले हुए संपोलों को बस में रख सकें। उन्हीं संपोलों में से एक हैं कपिल मिश्रा, जिनको अरविंद ने अपना दूध पिलाकर किंग कोबरा बनाया था। किंग कोबरा अब फुंफकार रहा है और अरविंद हैं कि उनको जादू—मंतर का कोई सम्मोहनी मंत्र सूझ नहीं रहा! 

दिल्ली से भूपेंदर चौधरी की रिपोर्ट 


सम्मोहनी मंत्र के अभाव में पिछले तीन दिनों से अरविंद केजरीवाल सदमे में हैं। 

हालांकि उनको सदमे में होना नहीं चाहिए, क्योंकि केजरीवाल और आरोपों—प्रत्यारोपों का रिश्ता कोई नया नहीं है। बल्कि उनकी छवि है कि वह रोज सुबह उठते ही दो—चार आरोप किसी न किसी नेता—पार्टी, व्यवसायी, पुलिस पर लगा दिया करते हैं, फिर फ्रेश होने जाते हैं। उनके नजदीकी लोग कहते हैं, फ्रेश होने में आरोप उनके लिए वही काम करता है जैसे आम जनों के लिए सिगरेट, चाय, बीड़ी, खैनी या पानी। 

पर सच यही है कि अरविंद केजरीवाल सदमे में हैं। उन पर तानाशाह, झूठा, मक्कार, कुंडलीमार, राजनीतिक काइयांपन का रणनीतिकार और यूज एंड थ्रो वाली पॉलिटिकल स्टाइल का महारथी जैसे आरोप तो लगे थे, लेकिन अभी तक अरविंद केजरीवाल की 'एमएसपी' पर ऐसी चोट किसी ने नहीं की थी कि केजरीवाल कहीं मुंह दिखाने लायक न रह जाएं। 

वह पिछले तीन दिनों से सिर्फ जवाब खोज रहे हैं कि वह अपने ही सरकार में मंत्री रहे 'कपिल भाई' के आरोपों का मीडिया के सामने जवाब देंगे? कैसे बताएंगे कि मेरा सबसे प्रिय मंत्री कपिल  मुझ पर 2 करोड़ रुपए लेने का आरोप लगा रहा है, वह सच नहीं है। वह भी कपिल के आंखों देखी को कैसे झुठलाएंगे, वह भी दूसरे प्रिय मंत्री सत्येंद्र जैन के सामने की बात कह रहा है और सबसे बड़ी बात रिश्तेदार की जमीन डील के मामले में 2 करोड़ कमीशन लिए जाने का आरोप? 

जानकार बता रहे हैं कि केजरीवाल अभी भी कोशिश में हैं कि किसी तरह मामला शांत हो और मीडिया में हीरो बने कपिल मिश्रा को हाशिए पर डाला जा सके। इसीलिए दिल्ली सरकार के मंत्री मनीष सिसोदिया 25 सेकेंड में प्रेस कांफ्रेंस करके कट लेते हैं? कपिल मिश्रा से केजरीवाल नहीं उलझना चाहते क्योंकि वह उनके गहरे राज के साथी हैं? कई गुनाहों में केजरीवाल ने कपिल का इस्तेमाल किया है? बहुत कुछ अनौपचारिक और औपचारिक कपिल केजरीवाल बारे में जानते हैं जो एक पाला हुआ संपोला ही जान सकता है।  

ये वही कपिल मिश्रा हैं जो अरविंद केजरीवाल के इशारे पर आम आदमी पार्टी के सबसे बुजुर्ग संस्थापक शांति भूषण और वरिष्ठ वकील प्रशांत भूषण को भरी सभा में मारने के लिए दौड़ा लिए थे।  

समय का चक्र भी कितना बलवान होता है। कब किस तरफ घूम जाए किसी को नहीं पता चलता। शायद कभी कपिल मिश्रा ने भी ये नहीं सोचा होगा कि जो खाई उन्होंने प्रशांत भूषण और शांति भूषण जैसे वरिष्ठों के लिए खोदी थी एक दिन वो खुद उसमें गिरेंगे।

यह बात साल 2015 की है। आम आदमी पार्टी दिल्ली में 67 एमएलए के साथ प्रचंड बहुमत के दिल्ली की सत्ता पर काबिज हुई थी। स्वराज इंडिया के अध्यक्ष योगेंद्र यादव और वकील प्रशांत भूषण की अरविंद केजरीवाल को सलाह थी कि वे संयोजक पद छोड़कर बतौर मुख्यमंत्री दिल्ली पर फोकस करें। 

मगर अरविंद केजरीवाल को उनकी यह बात खटकने लगी थी। कुछ दिन बाद करनाल बाई पास के पास बने आप के एमएलए के रिसोर्ट में पार्टी की नेशनल कौंसिल की मीटिंग रखी गई। योगेंद्र यादव और प्रशांत को निकालने की साज़िश रची जा चुकी थी। जैसे ही मीटिंग शुरू हुई तो प्रशांत ओर शांति भूषण ने कुछ बोलने की कोशिश की। 

तभी केजरीवाल की तय स्क्रीप्ट के अनुसार कपिल मिश्रा भूषण बाप—बेटे को चुप रहने और बाहर निकल जाने को लेकर शोर मचाने लगे। शोर कई लोग मचा रहे थे पर कपिल सबसे आगे थे।  इस पर नेशनल कौंसिल के कुछ मेंबर ने प्रशांत से सहमति जताते हुए उनके समर्थन में बोलने की कोशिश की तो कपिल मिश्रा और एक अन्य एमएलए दोनों बाप और बेटे को मीटिंग हॉल से बाहर करने के लिए उनके पीछे मारने के लिए दौड़ पड़े। 

हालांकि लोगों ने उन्हें शांति बनाए रखने की अपील की, जिसमें मनीष सबसे प्रमुख थे। लेकिन एक बात साफ थी कि वो बस दिखावा था। पीछे से कपिल को केजरीवाल का पूरा समर्थन था। 88 साल के बुजुर्ग शांति भूषण बहुत ही लाचार दिख रहे थे। उनकी आंखों में जैसे लाचारी साफ देखी जा सकती थी। 

नेशनल कौंसिल के कुछ सदस्य इस घटना से इतने आहत थे कि उन्हें खुद अपनी बेबसी पर रोना आ रहा था। इतने बुजुर्ग आदमी को धक्के मार के बाहर निकला जा रहा था और उसकी अगुआई कपिल मिश्रा कर रहे थे। 

कपिल मिश्रा ने कभी सोचा भी नहीं होगा कि एक दिन उन्हें भी इस पार्टी से ऐसे ही धक्के मार के मंत्री पद से निकाल दिया जायेगा।

May 6, 2017

रविदास की मूर्ति तोड़कर महाराणा प्रताप की मूर्ति लगाना था मकसद, दलित नहीं झुके तो फूंक दी उनकी पूरी बस्ती

फिजा में था कि जब विधायक राजपूत, मुख्यमंत्री राजपूत फिर देखते हैं कौन बचाता है चमारों के इस देवता को। हाथ में तलवार और बल्लम लिए राजपूत युवा नारा लगा  रहे थे, महाराणा प्रताप की मूर्ति वहीं लगेगी जहां से उखड़ेगा रविदास। और यह सबकुछ हो रहा था स्थानीय भाजपा विधायक बृजेश सिंह की उपस्थिति में। 

शब्बीरपुर गांव में फूंका गया ​दलित का घर

शब्बीरपुर गांव से तसलीम कुरैशी की रिपोर्ट

जी हां। यही हकीकत है कल की घटना का पर इसे कहने और बोलने से प्रशासन और स्थानीय विधायक बच रहे हैं। स्थानीय विधायक बृजेश सिंह घटना के मौके पर मौजूद थे पर अब वे इससे इनकार कर रहे हैं और बता रहे हैं कि वे इस आगजनी और हिंसा की घटना के वक्त गाजियाबाद के नेहरुनगर भाजपा कार्यालय में दीनदयाल उपाध्याय की जयंती मना रहे थे।

पर गाजियाबाद के नेहरु नगर कार्यालय पर हुई बातचीत में आॅफिस कर्मचारी ने कहा कि कल यहां दीनदयाल उपाध्याय पर कोई कार्यक्रम नहीं हुआ है। भाजपा के नेहरु नगर कार्यालय प्रभारी के प्रभारी मेहश शर्मा ने भी देवबंद विधायक की दी गयी जानकारी को गलत साबित किया।

महेश शर्मा ने बताया, 'दीनदयाल उपाध्याया जयंती के मौके पर 5 मई को कोई कार्यक्रम नहीं हुआ है, बल्कि कल 7 मई को गाजियाबाद के कृ​ष्णा इंजीनियरिंग कॉलेज में दीन दयाल उपाध्याय पर कार्यक्रम है। पूरे जिले में कई जगहों पर कार्यक्रम रखे गए हैं।'

गांव में वाल्मिकी मंदिर, नीचे के फोटो में रविदास की उखाड़ दी गयी मूर्ति। नीचे वीडियो  देखें


इतनी बड़ी घटना के बाद हर तरफ चुप्पी का माहौल है। कल दोपहर के बाद से गांव में मीडिया को नहीं जाने दिया जा रहा है, जबकि वीडियो को देख आपको साफ समझ में आ जाएगा कि गांव श्मशान में तब्दील हो चुका है और दलित गांव छोड़कर भाग चुके हैं।

लेकिन 'कैलाश पर संजीवनी बूटी' खोजने वाली मीडिया को यह सब नहीं पता चल पा रहा है। पर हम आपको एक—एक कर बताएंगे कि असल में सहारनपुर के शब्बीरपुर गांव में महाराणा प्रताप की ​जयंती मनाने के पीछे असल मकसद क्या था, क्यों तोड़ी गयी रविदास की मूर्ति और कैसे एक राजपूत जाति से ताल्लुक रखने वाले युवक की हुई मौत।

सबसे पहले महाराणा प्रताप की शोभायात्रा
सहारनपुर के बड़गांव थानाक्षेत्र के शब्बीरपुर गांव में 5 मई की दोपहर महाराणा प्रताप जयंती के अवसर पर शोभायात्रा निकली। यह शोभायात्रा कुछ दूसरे गांवों से होकर शब्बीरपुर पहुंची थी। शोभायात्रा में रसूलपुर टांक, रनखंडी, जडौदा जट, बहैला, गलौली, सिमलाना, महेशपुर समेत कई गांवों के राजपूत जाति के लोग शामिल थे। शोभायात्रा बैंडबाजा और डीजे के साथ चली शब्बीरपुर गांव में बढ़ी चली आ रही थी जिसमें तलवार लिए दो दर्जन से ऊपर नौजवान और घोड़ों पर सवार लोग थे। शोभायात्रा में शामिल ज्यादातर लोगों ने साफा बांध रखा था जिनकी उम्र 15 से 25 वर्ष के बीच थी।



शब्बीरपुर गांव में ही क्यों हुआ विवाद
आसपास के सभी गांवों में राजपूतों की मजबूत पकड़ है पर शब्बीरपुर गांव में मात्र 15—20 राजपूत परिवार होने के चलते वो वहां जातीय रसूख का वैसा इस्तेमाल नहीं कर पाते, जैसा दूसरे गांवों में करने की उनको परंपरागत आदत है। शब्बीरपुर में वाल्मिकियों और चमार जाति के परिवारों की संख्या 100 से ऊपर है। संख्याबल इसी ताकत के कारण ग्रामीणों ने मायावती के शासन में गांव के पश्चिम में रविदास की एक मूर्ति लगाई। उस समय भी राजपूतों ने रविदास की मूर्ति लगाए जाने का विरोध किया था। पर कुछ कर नहीं पाए थे​ जिसकी कसक तभी से चली आ रही थी। लेकिन भाजपा के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की जाति राजपूत होने के कारण उन्हें बल मिला। दूसरा स्थानीय देवबंद विधायक बृजेश सिंह भी राजपूत हैं। ऐसे में इस बार आसपास के गांवों के राजपूतों ने इसे नाक का सवाल बनाकर मोर्चा लिया।



पत्थरबाजी से बढ़ा तनाव
अभी सहारनपुर के सड़क दूधली प्रकरण की आग शांत भी नही हुई थी कि एक और गाँव को उपद्रवियों ने आग के हवाले कर दिया। शब्बीरपुर गांव में तलवार से सजी शोभायात्रा जब पहुंची तो दलितों ने आवाज कम करने को कहा और शांतिपूर्ण ढंग से जाने को ताकीद किया। पर दलितों के इस सुझाव पर पहले से ही मोर्चा लेने की तैयारी से आए राजपूत जाति के युवा भड़क गए। हवा में तलवार लहराते हुए उन्होंने दलितों को चुनौती दी। दलितों की ओर पत्थरबाजी शुरू हुई। पत्थरबाजी में राजपूत जाति का 26 वर्षीय युवक घायल हो गया जिसकी नानौता पीएचसी अस्तपाल में मौत हो गयी।



फिर गांव श्मशान में बदल गया
पत्थरबाजी के बाद रसूलपुर टांक, रनखंडी, जडौदा जट, बहैला, गलौली,सिमलाना, महेशपुर से बदला लेने के लिए राजपूतों का रेला चल पड़ा। उन्होंने पूरे शब्बीरपुर गांव को चारों ओर से घेर लिया और एक तरफ से दलितों के घरों को फूंकना शुरू कर दिया। आप वीडियो में भी देख सकते हैं आग कितनी भयावह है। देवबंद कोतवाल चमन सिंह चावड़ा समेत दर्जनभर लोग दोनों ओर से घायल हुए। भीड़ ने एडीएम को कब्जे में लिया।

क्या है ​दलितों का हाल
आगजनी और हिंसा के बाद मीडिया की पाबंदी के बाद गांव में दलितों का क्या हाल है, यह बात बाहर नहीं आ पा रही है। लेकिन आग और हिंसा को देख दलितों के साथ क्या गुजरा होगा इसकी भयावहता समझी जा सकती है।

May 5, 2017

'माओवादियों ने राजनीति के लिए सबसे निरीह लोगों को चुना'

वरिष्ठ पत्रकार शुभ्रांशु चौधरी ने माओवादी प्रवक्ता को लिखा खुला खत, कहा आपने बस्तर के आदिवासी को लड़ना सिखाया, इसके लिए इतिहास आपको साधुवाद देगा पर अब आदिवासियों के कंधों पर बंदूक लादना बंद करो...पढ़िए पूरा पत्र



 प्रिय वासु 

पिछले हफ्ते बहुत दिन बाद आपकी आवाज़ सुनकर अछा लगा. आपने माओवादी प्रवक्ता की तरह किसी अज्ञात स्थान से एक ऑडियो विकल्प के नाम से भेजा. पहले तो लग रहा था वह ​किसी और की आवाज़ है पर धीरे धीरे स्पष्ट होता गया कि वह आपकी ही आवाज़ है. हो सकता है वह आपकी आवाज़ न हो. न विकल्प आपका सही नाम है और न वासु, पर आपके आंदोलन के 50वीं वर्षगाँठ पर कुछ बात आपसे करना ज़रूरी हैं।

पिछले दिनों 26 जवानों को एक हमले में मारकर आपका आंदोलन एक बार फिर देश में चर्चा में है. आपने अपने ऑडियो संदेश में कहा है कि सुरक्षा बल के जवानों के द्वारा पिछले दिनों आम आदिवासी पर किये गए “पाशविक अत्याचार” का बदला लेने के लिए आपकी पार्टी ने यह हमला किया. 50 की उम्र सिर्फ इस तरह के हमले और प्रतिहमले के लिए ही होती है?

आप और हम एक दूसरे को अब लगभग 30 साल से जानते हैं। एक पत्रकार की तरह आप माओवादी आंदोलन में मेरे पहले संपर्क सूत्र थे. एक राजनीतिज्ञ की तरह आपके जज्बे और समर्पण को मैं अब भी सलाम करता हूँ, आप सभी बहुत मेहनती हैं, पर आपकी यह मेहनत आपको, आपकी राजनीति को और आपका साथ देने वाले आदिवासियों को कहाँ लेकर जा रही है? 

आपके बड़े नेता मुझे कहते हैं कि अगले 50 साल में पूंजीवाद अपने ही बोझ तले ध्वस्त हो जाएगा तब आपकी राजनीति एक विकल्प की तरह सामने होगी। यह एक बेहद विवादास्पद सोच है. उस समय तक आप और मैं दोनों नहीं होंगे, पर जिन आदिवासियों के कंधे पर बंदूक रखकर आप यह प्रयोग कर रहे हैं वे कहाँ होगे? क्या वे आपकी जनताना सरकार के कब्ज़े में पूंजीवादी व्यवस्था से बेहतर स्थिति में होंगे? 

आप एक नव लोकतांत्रिक क्रांति के लिए लड़ रहे हैं. आप कहते हैं उसके बाद समाजवाद आएगा और उसके भी बाद कम्यूनिज्म और यह सब आप आम जनता की भलाई के लिए कर रहे हैं। दुनिया में बेहतर लोकतंत्र के लिए तरह-तरह के प्रयोग हो रहे हैं. वे प्रयोग भी अधिक सफल नहीं हैं, पर मुझे लगता है तकनीक की मदद से किए जा रहे कुछ प्रयोग आपके प्रयोग से तो अधिक आशा जगाते हैं।
 
आपके बड़े नेता आज भी फ्रांस की क्रांति के युग में ही जी रहे हैं और उसके ही सपने बेच रहे हैं. फ्रांस में इस समय कई चरण में चुनाव हो रहे हैं और बेहद असमंजस की स्थिति है, वहां जनता को नवफासीवाद और नवउदारवाद के बीच ही चुनाव करना है. पर वहां इस पर खासी बहस हो रही है और आशा है इन सब जददोजहद के बीच पूरी मानव जाति के लिए धीरे धीरे बेहतर रास्ते निकलेंगे कि हमारी राजनीति कैसी होनी चाहिए।
 
आपने अपनी राजनीति के लिए जंगल की खामोशी, लुका-छुपी और दुनिया के सबसे निरीह लोग को चुना है जहां बहस की गुंजाइश लगभग शून्य है। आज 50 साल बाद भी आदिवासी और महिला आपकी सर्वोच्च समितियों में नहीं हैं। जब हम जैसे उच्च वर्ग के लोग आपकी पार्टी में आने लगभग बंद हो गए हैं और जब आपके सभी उम्रदराज़ नेता थोड़े साल में एक के बाद एक मर जाएंगे तब पार्टी का दिशा निर्धारण कौन करेगा? या आप आदिवासियों को गंभीरता से सुनना शुरू करेंगे?

हमने सुना है सुकमा हमले के बाद 100 से अधिक स्थानीय आदिवासियों पर मुकदमा दर्ज हुआ है। आशंका है कि जैसे ही मेहमान पत्रकारों का दल वहां से हटेगा, उन पर फिर से अकथ्य अत्याचार शुरू होंगे और फलस्वरूप आपकी ताकत और बढ़ेगी और आप फिर से एक और बड़ा हमला करेंगे। हमारी तरफ तो कल्पनाशीलता को जैसे कैंसर हो गया है, पर आप सोचने—समझने वाले तथाकथित क्रांतिकारियों की सोच को लकवा मारा हुआ है?

सरकार की गलत नीतियों के कारण बस्तर के आदिवासी आपके वहां आने के 10 साल बाद आप से जुड़ना शुरू हुए थे और जहां तक मेरी जानकारी है, अब वे आपका साथ छोड़ने का मन बना रहे हैं. माओ देवता के पोंगापंथी पुजारी और आपके अधिकतर दाम्भिक और भ्रष्ट बड़े नेताओं से तो मुझे कोई आशा नहीं है, पर आप जैसे मध्यम दर्जे के नक्सली नेता इस बारे में क्या सोचते हैं? क्या आप आदिवासियों को अपना रास्ता चुनने का मौक़ा देंगे?

आपने बस्तर के आदिवासी को लड़ना सिखाया, इसके लिए इतिहास आपको साधुवाद देगा, पर जब आज आपका आंदोलन कहीं आगे बढ़ता नज़र नहीं आता तो इस 50 साल की जददोजहद के बाद जिन लोगों ने आपका सबसे अधिक साथ दिया या उनके लिए कुछ हासिल करना एक बेहतर राजनीतिक उद्देश्य नहीं लगता? लिट्टे का उदाहरण सामने है. 72 की तरह ही, शहर को घेरने के बजाय आप एक बार फिर से घिरते नज़र आ रहे हैं।

आपका 99 फीसदी आदिवासी कैडर अपने जल, जंगल, जमीन और स्वाभिमान की लड़ाई लड़ रहा है जो अधिकार इस देश के संंविधान के तहत उनको दिए हुए हैं। क्या आप अपनी ताकत में समझ जोड़कर कुछ ऐसा नहीं कर सकते कि इसी सड़ी-गली व्यवस्था में जनतांत्रिक तकनीक की मदद से भारत के अच्छे लोगों को जोड़कर एक ऐसी संख्या बनाई जाए कि भारत का लोकतंत्र उसके बहुसंख्य गरीबो की बेहतरी के लिए काम करे? यह बंदूक लेकर लड़ने से अधिक कठिन काम है।

मेरे एक संगीतज्ञ मित्र थे जब उनको किसी साथी कलाकार की बुराई करनी होती थी तो वे कहते थे “वह बहुत मेहनती है”| जाहिर है सिर्फ मेहनत से अच्छा संगीत नहीं तैयार होता। इतनी विषम परिस्थितियों भी आप बड़े—बड़े हमले करने की क्षमता रखते हैं, इससे घोर असहम​ति के बावजूद आपकी मेहनत काबिल-ए-तारीफ है, पर कुछ कालजयी करने के लिए मेहनत के साथ सोच जरूरी होती है। ये ठीक है कि कॉमरेड कभी नहीं थकता, पर थोड़ा आराम करो वासु और अपने आदिवासी कॉमरेड के साथ थोड़ी और बात करो, बेहतर रास्ता वे ही सुझाएंगे...

 ( लेखक ने छत्तीसगढ़ के माओवादियों पर “उसका नाम वासु नहीं” नाम से एक किताब लिखी है जो माओवादी कार्यकर्ता वासु के जीवन पर आधारित है ) 

May 4, 2017

कश्मीर में उलटी पड़ी असलियत, 7 सालों में सबसे ज्यादा मोदी सरकार में मारे गए सैनिक

प्रधानमंत्री अपने भाषणों में दोहराते रहे हैं कि वह कश्मीर से आतंकवाद का सफाया कर देंगे, पर असलियत कुछ और ही सामने आ रही है। हर रोज सेना और नागरिकों में टकराहट बढ़ रही है, आतंकवादी हमले बढ़ रहे हैं और पत्थरबाजों की बढ़ती संख्या से राज्य में अमन चाहने वाले लोग हलकान में हैं। 

जनज्वार। साउथ एशिया टेरेरिज्म पोर्टल 'एसएटीपी' की रिपोर्ट के अनुसार जम्मू—कश्मीर में 2009 के बाद से सबसे ज्यादा सेना और सुरक्षा बलों के 88 जवान 2016 में मारे गए। वहीं इस वर्ष 2017 में 30 अप्रैल तक 15 जवान मारे जा चुके हैं। 


2016 में पिछले 7 सालों में सबसे ज्यादा सैनिकों का मारा जाना इसलिए भी आश्चर्यजनक है क्योंकि 2016 ही वह साल है जब प्रधानमंत्री मोदी ने तमाम मंचों से कहा कि वह कश्मीर में आतंकवाद का सफाया कर देंगे। नोटबंदी की शुरुआत 8 नवंबर और नोटबंदी का समय खत्म होने के दिन 31 मार्च को प्रधानमंत्री ने कहा कि आतंकवाद खत्म होगा। वैसे में उसी साल का आंकड़ा सबसे ज्यादा होना बताता है कि सरकार और जनता, भाषण और असलियत में फर्क लंबा है। 

इन आंकड़ों से साफ है कि मोदी सरकार जैसे वादे कर रही है वैसे परिणाम देखने को नहीं मिल रहे, अलबत्ता सेना के जवानों की कुर्बानी बढ़ती जा रही है और साथ ही कश्मीर में तनाव भी बढ़ता जा रहा है। 

एसएटीपी के आंकड़ों के अनुसार 1990 से लेकर 2007 के बीच औसत 800 नागरिक हर साल मारे जाते रहे, जो अब कम हो गया है। 2016 में सिर्फ 14 आम ना​गरिक सेना और आतंकियों के हमलों और मुठभेड़ों में मारे गए। 

य​​ह आंकड़़ा इसलिए भी महत्वपूर्ण है कि बीएसएफ की 200वीं बटालियन के हेड कांस्टेबल प्रेम सागर और सेना के 22वें सिख रेजिमेंट के नायब सूबेदार परमजीत सिंह की पाकिस्तानी सैनिकों द्वारा भारतीय सीमा में घुसकर हत्या कर दिए जाने के बाद सरकार तरह—तरह के वादों से आम जनता को उद्वेलित कर भ्रम में डाल रही है। 

भ्रम की इन स्थितियों के कारण कश्मीर के बाहर की जनता जहां कश्मीरियों को देश को दुश्मन और आतंकियों का दोस्त समझने लगी है तो कश्मीर के व्यापक आवाम में फिर से यह भाव बढ़ता जा रहा है कि भारत हमारा देश नहीं हो सकता। 

यही वजह है कि कश्मीर और घाटी के दूसरे जिलों में राष्ट्रविरोधी नारा लगाने वालों की संख्या दिन—प्रतिदिन बढ़ती जा रही है। पहले जहां प्रदर्श​नकारियों और पत्थर फेंकने वालों में समाज के ज्यादातर अराजक तत्व या अलगाववादी विचारों शामिल हुआ करते थे, अब 2 महीनों से हो रहे प्रदर्शनों में स्कूली छात्रों और बच्चों व किशारों की संख्या बहुतायत में है।  

वर्ष 1990 से लेकर 2007 के बीच औसत 800 नागरिक हर साल मारे जाते रहे। हालांकि एसएटीपी के आंकड़ों के अनुसार पिछले 7 वर्षों में सबसे कम 14 ना​गरिक भी 2016 में ही मारे गए। इस वर्ष 30 अप्रैल तक आतंकवादी हमलों और मुठभेड़ों में सेना और सुरक्षा बलों के 15 जवान मारे जा चुके हैं। 

पिछले तीन दशकों में 1990 से लेकर 2010 तक कश्मीर में सर्वाधिक हिंसा हुई, पर 2011 इन वर्षों के मुकाबले अधिक शांतिपूर्ण रहा। 

7 वर्षों में  मारे गए सैनिकों  का आंकड़ा

वर्ष              मारे गए सैनिकों की संख्या
2009           78
2010           69 
2011           30 
2012           17
2013           61  
2014           51  
2015           41 
2016           88 
    

May 3, 2017

किशन पटनायक को टाइम्स आॅफ इंडिया ने बताया माओवादी, लिखा एनजीओ करेंगे प्रदर्शन

जिन्हें लगता है हिंदी पत्रकारिता में ही हैं केवल बकलोल, सांप्रदायिक और लालबुझक्कड़, मन से बात बनाने, बाइट चिपकाने वाले, तो वे पढ़ लें इन अंग्रेजी सूरमाओं की रिपोर्ट, पता चल जाएगा कितने पानी में है अंग्रेजी मीडिया, कैसे बनाता है झूठ का पुलिंदा




जनज्वार। दो पत्रकारों अभिषेक चौधरी और सौमित्र बोस के संयुक्त प्रयास से छपी इस रिपोर्ट को पढ़कर आप हंसी नहीं रोक पाएंगे। साथ ही आप मानने को मजबूर होंगे कि हिट्स, मुनाफे और सबसे पहले आने की जल्दबाजी में बड़े मीडिया संस्थान कैसे गैरजिम्मेदार पत्रकारिता पर उतर आए हैं और उसे बढ़ावा दे रहे हैं। उन्हें पाठकों की कोई परवाह ही नहीं है।

गैर जिम्मेदारी के पहले पायदान पर रहा टाइम्स आॅफ इंडिया और दूसरे पर रहा नई दुनिया। नई दुनिया में छपी राजेश शुक्ला की रिपोर्ट में तो बकायदा एक्सक्लूसिव भी लिखा हुआ है और हेडिंग लगी है 'डेढ़ करोड़ के इनामी रहे नक्सली लीडर किशनजी सीबीएसई के पाठ्यक्रम में।'

अंग्रेजी अखबार टाइम्स आॅफ इंडिया में महाराष्ट्र के नागपुर से 3 मई को ‘NCERT textbook has chapter on Naxalite leader Kishenji'  के नाम से एक रिपोर्ट छपी। अभिषेक चौधरी और सौमित्र बोस की ओर से लिखी गयी इस रिपोर्ट में अफसोस जाहिर करते हुए बताया गया है कि 10वीं कक्षा के छात्रों को एनसीआरईटी एक माओवादी किशनजी को पढ़ा रही है, जो कि नवंबर 2011 में कोबरा बटालियन द्वारा जंगलों में मारा गया। वह भी सामाजिक विज्ञान की पुस्तक राजनीतिक दल के सबसेक्शन ‘राजनीति की नैतिकता’ के अंतर्गत। 

10वीं के लिए एनसीआरटी द्वारा प्रकाशित पुस्तक सामाजिक विज्ञान — 2 की मूल कॉपी

एनसीआरटी को दोषी करार देते हुए पत्रकार लिखते हैं, ‘किताब में बकायदा किशनजी को महिमामंडित किया जा रहा है।’  रिपोर्ट में पत्रकार जिक्र करते हैं कि इस बात की जानकारी टीओआई को नागरिकों के एक समूह ने दी है। समूह का कहना है कि किताब आप आॅनलाइन डाउनलोड कर सकते हैं। 

फिर पत्रकार विस्तार से बताते हैं कि बताइए भला किताब में हमारे देश के कर्णधारों को उस किशनजी को पढ़ाया जा रहा है जो माओवादी नेता थे और कोबरा पोस्ट ने उन्हें झारखंड-बंगाल के बाॅर्डर पर 24 नवंबर 2011 को मार डाला था। पत्रकार यहीं नहीं रुकते, किशनजी पर किताब छपने के गुनाह का इतिहास भी बताते हैं। वे बताते हैं कि 2007 से यह किताब बच्चों को पढ़ाई जाती है।  

रिपोर्ट में 2007 लिखते हुए भी पत्रकारों की भक्तांधता नहीं डिगती कि कैसे एक जीवित आदमी जो कि भारत सरकार की निगाह में आतंकवादी था, उसकी जीवनी पढ़ाई जाएगी। 

बहरहाल, जोश आगे बढ़ता है। और दो पत्रकारों की मेहनत से तैयार यह रिपार्ट उस परिणति तक पहुंचती जब सीबीएसई की 10वीं कि किताब में किशनजी यानी चर्चित समाजवादी नेता किशन पटनायक के राजनीति रणनीति, उसकी तैयारी और गलतियों पर चर्चा होती है।

नई दुनिया का कमाल : लिखने से पहले थोड़ा दीमाग भी लगा लिया होता
किशन पटनायक की चर्चा होने पर चैप्टर में बकायदा चार महिलाओं का जिक्र होता है कि किशनजी ने अपनी सर्वसमाहार वाली राजनीतिक परंपरा को कैसे आगे बढ़ाया। चारों महिलाएं अपना पक्ष रखती हैं और किशन पटनायक की उस चिंता को भी साझा करती हैं जब वह कहते हैं कि हमने पंचायतों में हमने प्रतिनिधि उतार कर चुनाव में भागीदारी का प्रयोग किया पर लोगों ने हमें वोट नहीं दिया। 

पर किताब में आई इन तमाम जिरहों से भी पत्रकारों को समझ में नहीं आता कि माओवादी किशनजी क्योंकर चुनाव लड़ने की बात करते, उनकी पार्टी कहां पंचायत चुनाव लड़ी है या फिर माओवादियों ने कहां कहा है कि सामाजिक कार्यकर्ताओं को चुनाव में सीधे उतरना चाहिए। माओवादी तो मानते ही नहीं चुनावी राजनीति इस देश की तकदीर बदल सकती है, शोषणमुक्त समाज बना सकती है। वह क्रांतिकारी आंदोलनों के पक्षधर और गरीबों की सत्ता कायम करने को अपना ध्येय मानते हैं। 

और तो और रिपोर्टर किसी नक्सल अधिकारी का बयान भी फर्जी ढंग से गढ़के स्टोरी में चिपका देते हैं। वे किसी 'एएनओ' नाम के संगठन का जिक्र करते हैं जिसने महाराष्ट्र के माओवाद प्रभावित जिले गढ़चिरौली में 2 लाख छात्रों को नक्सलवादी विचारधारा से दूरी बनाने की बाबत कसम खिलवाई है। इस मौके पर पत्रकार यह बताना नहीं भूलते कि जल्दी ही कुछ एनजीओ सीबीएसई के खिलाफ तगड़ा विरोध दर्ज कराने वाले हैं। 

योगेंद्र यादव ने की टाइम्स आॅफ इंडिया से माफी की मांग


महिला नक्सली है या नहीं इसकी जांंच उसके स्तनों से दूध निचोड़ करती पुलिस

रायपुर जेल की डिप्टी जेलर वर्षा डोंगरे का फेसबुक स्टेटस, जिसकी वजह से भाजपा सरकार ने उन्हें नौकरी से किया निलंबित

वो नक्सलवाद का अंत तो चाहते हैं लेकिन जिस तरह से देश के रक्षक ही उनकी बहू-बेटियों की इज्जत उतार रहे हैं, उनके घर जला रहे हैं, उन्हे फर्जी केसों में चारदिवारी में सड़ने भेजा जा रहा है। तो आखिर वो न्याय प्राप्ति के लिए कहां जाएं... 

पूंजीवादी व्यवस्था के शिकार जवान शहीदों को सत सत नमन्


मुझे लगता है कि एक बार हम सभी को अपना गिरेबान झांकना चाहिए, सच्चाई खुद-ब-खुद सामने आ जायेगी... घटना में दोनों तरफ मरने वाले अपने देशवासी हैं...भारतीय हैं। इसलिए कोई भी मरे तकलीफ हम सबको होती है। लेकिन पूँजीवादी व्यवस्था को आदिवासी क्षेत्रों में जबरदस्ती लागू करवाना... उनके जल जंगल जमीन से बेदखल करने के लिए गांव का गांव जलवा देना, आदिवासी महिलाओं के साथ बलात्कार, आदिवासी महिलाएं नक्सली हैं या नहीं इसका प्रमाण देने के लिए उनका स्तन निचोड़कर दूध निकालकर देखा जाता है। टाईगर प्रोजेक्ट के नाम पर आदिवासियों  को जल, जंगल, जमीन से बेदखल करने की रणनीति बनती है जबकि संविधान अनुसार 5वीं अनुसूची में शामिल होने के कारण सैनिक सरकार को कोई हक नहीं बनता आदिवासियों के जल जंगल और जमीन को हड़पने का.... 

आखिर ये सबकुछ क्यों हो रहा है। नक्सलवाद खत्म करने के लिए... लगता नहीं। सच तो यह है कि सारे प्राकृतिक खनिज संसाधन इन्ही जंगलों में है जिसे उद्योगपतियों और पूंजीपतियों को बेचने के लिए खाली करवाना है। आदिवासी जल जंगल जमीन खाली नहीं करेंगे क्योंकि यह उनकी मातृभूमि है। वो नक्सलवाद का अंत तो चाहते हैं लेकिन जिस तरह से देश के रक्षक ही उनकी बहू बेटियों की इज्जत उतार रहे हैं, उनके घर जला रहे हैं, उन्हे फर्जी केसों में चारदिवारी में सड़ने भेजा जा रहा है। तो आखिर वो न्याय प्राप्ति के लिए कहां जाएं... 

ये सब मैं नहीं कह रही CBI रिपोर्ट कहती है, सुप्रीम कोर्ट कहता है, जमीनी हकीकत  कहती है। जो भी आदिवासियों की समस्या समाधान का प्रयत्न करने की कोशिश करते हैं, चाहे वह मानव अधिकार कार्यकर्ता हो चाहे पत्रकार... उन्हे फर्जी नक्सली केसों में जेल में ठूस दिया जाता है। अगर आदिवासी क्षेत्रों में सबकुछ ठीक हो रहा है तो सरकार इतना डरती क्यों है। ऐसा क्या कारण है कि वहां किसी को भी सच्चाई जानने के लिए जाने नहीं दिया जाता।

मैनें स्वयं बस्तर में 14 से 16 वर्ष की मुड़िया माड़िया आदिवासी बच्चियों को देखा था जिनको थाने में महिला पुलिस को बाहर कर पूरा नग्न कर प्रताड़ित किया गया था। उनके दोनों हाथों की कलाईयों और स्तनों पर करेंट लगाया गया था जिसके निशान मैंने स्वयं देखे। मैं भीतर तक सिहर उठी थी...कि इन छोटी-छोटी आदिवासी बच्चियों पर थर्ड डिग्री टार्चर किस लिए...मैंने डॉक्टर से उचित उपचार व आवश्यक कार्यवाही के लिए कहा।

हमारे देश का संविधान और कानून यह कतई हक नहीं देता कि किसी के साथ अत्याचार करें...

इसलिए सभी को जागना होगा... राज्य में 5वी अनुसूची लागू होनी चाहिए। आदिवासियों का विकास आदिवासियों के हिसाब से होना चाहिए। उन पर जबरदस्ती विकास ना थोपा जावे। आदिवासी प्रकृति के संरक्षक हैं। हमें भी प्रकृति का संरक्षक बनना चाहिए ना कि संहारक... पूँजीपतियों के दलालों की दोगली नीति को समझे ...किसान जवान सब भाई भाई हैं हैं. अतः एक दुसरे को मारकर न ही शांति स्थापित होगी और ना ही विकास होगा...। संविधान में न्याय सबके लिए है... इसलिए न्याय सबके साथ हो... 

हम भी इसी सिस्टम के शिकार हुए... लेकिन अन्याय के खिलाफ जंग लड़े, षडयंत्र रचकर तोड़ने की कोशिश की गई प्रलोभन रिश्वत का आफर भी दिया गया वह भी माननीय मुख्य न्यायाधीश बिलासपुर छ.ग. के समक्ष निर्णय दिनांक 26.08.2016 का para no. 69 स्वयं देख सकते हैं। लेकिन हमने इनके सारे इरादे नाकाम कर दिए और सत्य की विजय हुई... आगे भी होगी।

अब भी समय है...सच्चाई को समझे नहीं तो शतरंज की मोहरों की भांति इस्तेमाल कर पूंजीपतियों के दलाल इस देश से इन्सानियत ही खत्म कर देंगे।

ना हम अन्याय करेंगे और ना सहेंगे....
जय संविधान जय भारत