Apr 18, 2017

सांप्रदायिकता से 'मोह' बढ़ातीं 'माया'

जातिवादी अस्मिता वाला दलित आंदोलन किसी सेक्यूलर और धर्मनिरपेक्ष समाज के लिए नहीं, बल्कि हिन्दुत्व के ढांचे में समाहित हो सम्मानजनक स्थान पाने के लिए लड़ता है। अपने विचार में वह पहले हिन्दू है फिर दलित है। इसीलिए मौका पाने पर 'हिन्दुत्व’ की गोद में जा बैठता है...

हरे राम मिश्र

यूपी चुनाव में अपनी शर्मनाक हार के बाद अंबेडकर जयंती के मौके पर मायावती ने अपने समर्थकों को राजधानी लखनऊ में संबोधित किया। मायावती का यह पूरा संबोधन स्पष्टीकरणों और कई स्तरों पर 'कन्फ्यूजन’ से भरा हुआ था। फिर भी, दो बातें बहुत महत्वपूर्ण थीं जो कि उनके भविष्य की राजनीतिक दिशा का इशारा कर रही थीं। पहला यह कि वह यूपी में सौ मुसलमानों को विधानसभा के टिकट बांटने पर बीजेपी के यूपी को पाकिस्तान बनाने के आरोप पर सफाई दे रही थीं और उपस्थित समर्थकों को यह बता रही थीं कि वह उत्तर प्रदेश को पाकिस्तान नहीं बनने देंगी। दूसरा, ट्रिपल तलाक के मामले में उनका रुख अब एकदम बदला हुआ दिख रहा था। 

गौरतलब है कि ट्रिपल तलाक पर अब तक के अपने रुख से पलटते हुए उन्होंने कहा कि मुस्लिम पर्सनल लाॅ बोर्ड तीन तलाक के मामले को हल करने में नाकामयाब रहा है। मायावती का तीन तलाक के मसले पर अपने पहले के रुख से इस तरह पलट जाना कई इशारे करता है। चुनाव के दौरान तीन तलाक के मामले पर मोदी सरकार की मुखालफत करते हुए वे इसे शरिया कानून और मुसलमानों के धार्मिक जीवन में सीधा हस्तक्षेप बताती थीं। 

अपने चुनावी भाषणों में इसमें किसी संशोधन के खिलाफ उन्होंने सड़क पर उतरने की बात भी कही थी। लेकिन अब, जबकि चुनाव हो चुके हैं- इस मामले में पर्सनल लाॅ बोर्ड पर ही सवाल उठाना यह संकेत करता है कि मायावती अपनी दिशा को बदल चुकी हैं और मुसलमानों के सवाल अब उनकी प्राथमिकता में नहीं हैं। ट्रिपल तलाक के मसले पर मायावती की इस पलटी ने यह साफ कर दिया है कि उन्होंने सौ मुसलमानों को टिकट देकर जो प्रयोग किया, वह एक राजनीतिक गलती थी। अब वे उस गलती को पहले दुरुस्त करेंगी। यूपी को पाकिस्तान बनाने के आरोपों पर उनकी सफाई भी इसी का स्पष्टीकरण था।

हालांकि, पिछले विधानसभा चुनाव में मायावती ने दलित-मुस्लिम समाज की एकता के आधार पर सूबे की सत्ता में भागीदारी का सपना देखा था। उन्हें यह लगता था कि अगर हम मुसलमानों को बहका लें तो बाइस फीसदी दलित वोट के बदौलत बसपा उत्तर प्रदेश में सत्ता में आ सकती है। लेकिन वे भ्रम में थीं कि दलितों का बेस वोट उनके साथ है। मुसलमान मतदाताओं को साधने के लिए मायावती ने बहुत प्रयास किया। उन्होंने चुनाव के दौरान कट्टरपंथी मुसलमानों को खुश करने के लिए ट्रिपल तलाक का मुद्दा उठाया। लेकिन इस प्रयास में उनका दलित वोटर उनसे दूर चला गया। उनके चुनावी भाषणों में मुसलमानों पर ज्यादा फोकस से उनके जमीनी नेता कई बार असहज भी दिखे। 

दरअसल सिर्फ वोट के लिए, दलित-मुस्लिम एकता के नाम पर सत्ता में वापसी का सपना देखने वाली मायावती ने अपने पिछले शासनकाल में इन दोनों समुदायों को सिवाय उत्पीड़न के कुछ नहीं दिया। मुजफ्फरनगर दंगों में बेघर मुसलमानों को मायावती कभी देखने तक नहीं गईं। उन्हें यह लगता था कि सपा के घर में मचे संग्राम से मुसलमान बसपा में खुद ही शिफ्ट हो जाएगा। उनके लिए यह गृहयुद्ध दलित-मुस्लिम एकता का प्रयोग काल बनकर निकला। लेकिन भाजपा के सहयोग के उनके पिछले चरित्र को देखते हुए मुसलमानों ने मायावती पर कोई यकीन नहीं किया और बीजेपी को हराने के लिए ’टैक्टिकल’ वोटिंग कर बैठे। 

वास्तव में दलित मुस्लिम एकता का विचार एकदम अव्यावहारिक है। यह मायावती भी जानती थीं। उनकी समझ में यह एक जुआ था, जिसमें बसपा हार गई। अब मायावती घोर सांप्रदायिक दलित समाज को फिर से जातिगत रूप से इकट्ठा करके अपनी खोई ताकत और जोश पाने का शर्तिया और पुराना 'हकीमी’ नुस्खा आजमाएंगी। यह नुस्खा खुद उनकी सांप्रदायिकता को भी बेनकाब करेगा। क्योंकि एक सेक्यूलर व्यक्ति किसी सांप्रदायिक समाज को संतुष्ट ही नही कर सकता। दलितों की सांप्रदायिकता का खात्मा मायावती के कुव्वत में नहीं है। चुनावी हार के बाद मुसलमानों से उनकी दूरी इस बात को साफ करती है कि अब वह अपने पुराने ढर्रे पर लौट गई हैं।

दरअसल, उत्तर प्रदेश में मायावती का फेल होना 'बुर्जुआ’ राजनीतिक सेटअप में दलित मुस्लिम एकता के विचार का 'गर्भपात’ होना है। यह 'असफलता’ एकदम स्वाभाविक है। दलित और मुस्लिम के बीच कोई स्वाभाविक एकता हो ही नहीं सकती। जातिवादी अस्मिता वाला दलित आंदोलन किसी सेक्यूलर और धर्मनिरपेक्ष समाज के लिए नहीं, बल्कि हिन्दुत्व के ढांचे में समाहित होने और सम्मानजनक स्थान पाने के लिए लड़ता है। अपने विचार में वह पहले हिन्दू है फिर दलित है। इसीलिए वह मौका पाने पर 'हिन्दुत्व’ की गोद में जा बैठता है। 

जहां तक मायावती में आए इस बदलाव का मामला है, वह यह साबित करता है कि मायावती की राजनीति केवल मुस्लिम वोट लेने और उन्हें इस्तेमाल करने के 'विचार’ पर टिकी थी। दलित—मुस्लिम एकता के अवसरवादी प्रयोग के आधार पर वह उत्तर प्रदेश में अपना राजनीतिक उत्थान देख रही थीं जो कि फेल हो गया। इस प्रयोग में वह अपने परंपरागत वोटर्स पर बनी पकड़ भी खो बैठीं। मायावती अब यह मान गयी हैं कि दलित सांप्रदायिकता एक वास्तविक विचार है और अब हमें इसी रूप में उसका इस्तेमाल करना है। यही वजह है कि अब उन्होंने अपने रुख से पलटी मारते हुए मुसलमानों से दूरी बनानी शुरू की है।

लेकिन क्या उनका यह प्रयास उन्हें राजनीति के केन्द्र में वापस ला पाएगा? इस बात की संभावना बहुत कम है। राजनीति एक फुलटाइम और डायनमिक प्रक्रिया है। मायावती ने अपने वोटर्स को दिमागी स्तर पर विकसित नहीं किया। अगर भाजपा फासीवाद के साथ जाति और अस्मिता के सवाल को 'एड्रेस’ करती रहेगी तो फिर दलित मायावती के पास किसलिए लौटेगा? जब तक मायावती के पास भाजपा के खिलाफ कोई ठोस योजना नहीं होगी, तब तक दलितों का भाजपा से मोहभंग नहीं होगा। मायावती में ऐसी क्षमता नहीं है और न ही अभी ऐसी कोई योजना ही है। इसीलिए मायावती का भविष्य संकटग्रस्त है। 
editorjanjwar@gmail.com 

Apr 17, 2017

'आॅपरेशन हलाला' के नाम पर फर्जी खबर दिखा रहा था इंडिया टीवी

'हलाला सर्विस सेंटर' की सनसनी में पत्रकारिता हुई  हलाल,  चैनल ने नहीं  मांगी  अबतक माफी
जनज्वार। किसी और मुल्क में यह संभव है कि नहीं लेकिन भारत में यह बहुत आसानी से हो जाता है कि किसी समुदाय के खिलाफ आप गलत खबर दिखाकर भी टीआरपी बटोर सकते हैं, मुनाफा कमा सकते हैं, वाहवाही लूट सकते हैं। 

मदरसे और मुस्लिम समाज की ओर से चैनल को जारी चेतावनी
यह टीआरपी बटोरने और ज्यादा से ज्यादा मुनाफा कमाने की ही मारामारी है कि 'हलाला सर्विस सेंटर' के नाम पर इंडिया टीवी द्वारा 15 और 16 मार्च दो दिन रात 8 बजे फर्जी खबर दिखाई जाती है, लोग चैनल में फोन कर ऐतराज करते हैं, लेकिन खबर तब हटती जब मौलाना और मुस्लिम समुदाय के नामचीन लोग कानूनी कार्यवाही की तरफ आगे बढ़ते हैं।

India TV  द्वारा 15 और 16 अप्रैल की रात 8 बजे प्रसारित कार्यक्रम 'आॅपरेशन हलाला' में दिल्ली की सीमापुरी के मदरसे और उसके मौलाना चौधरी शहजाद खोखर को दिखाया जाता है। मस्जिद का नाम 'हलाला सर्विस सेंटर' दिया जाता है और बताया जाता है कि मदरसे के मौलवी पैसा लेकर हलाला कराने का धंधा करते हैं।

दिल्ली के सीमापुरी मदरसे के अध्यक्ष चौधरी शहज़ाद खोखर जब इस कार्यक्रम को देखते हैं तो सन्न रह जाते हैं।

शहजाद बताते हैं, कार्यक्रम तलाक और हलाला से जुड़़े होने की वजह से मैं 15 अप्रैल को रात 8 बजे इंडिया टीवी देखने लगा। तभी देखता हूं कि मैं जिस मदरसे में हूं उसको इंडिया टीवी पर 'हलाला सर्विस सेंटर' कहा जा रहा है। साथ ही किसी तस्लमी नाम के मौलाना का जिक्र किया जा रहा है कि वह इस मदरसे से 'पैसा लेकर हलाला कराने का धंधा करता है, जबकि यह सरासर झूठ है।

दरअसल हलाला एक ऐसी मुस्लिम प्रथा है, जिसमें पत्नी को पति द्वारा तलाक देने के बाद अगर पति फिर से उस महिला से शादी करना चाहे तो उस महिला को पहले किसी दूसरे मर्द से शादी करनी होगी और उसे दूसरे पति के साथ वैसे ही संबंध बनाने होंगे, जैसे एक पति-पत्नी के बीच होते हैं। इसके बाद अगले दिन दूसरा मर्द उस महिला को तलाक देगा और फिर वह महिला अपने पहले पति से शादी कर सकती है। हलाला पर मुस्लिम उलेमाओं का कहना है कि यह प्रथा इसलिए बनाई गई, ताकि तलाक को पुरुषों द्वारा मज़ाक या इसे कोई मामूली चीज़ ना समझा जाए।

 विरोध के बाद हटाया वीडियो : अब माफ़ी मांगने की बारी

मदरसे के मौलाना शहजाद खोखर के मुताबिक, 'India TV द्वारा प्रसारित 'आॅपरेशन हलाला' में दिखाया गया सीमापुरी मदरसा का स्कैंडल सरासर झूठ का पुलिंदा है।'

उन्होंने कहा कि हमारे मदरसे में तस्लीम नाम का कोई मद्दररिस न तो पहले था और न ही अभी कोई है.

मदरसे के मौलाना ने India TV  से मांग कि है वह इस प्रोग्राम  की सिरे से जाँच कराये। साथ ही चौधरी शहज़ाद खोखर ने दावा किया कि टीवी पर सीमापुरी मदरसा की ईमारत दिखाई गयी है, लेकिन रिकॉर्डिंग कहीं और की गयी है.

उन्होंने जनज्वार को वीडियो जारी कर अपना पक्ष रखा है। वीडियो में उन्होंने साफ बताया है कि इंडिया टीवी ने उनके और मदरसे के खिलाफ खबर दिखाकर पूरे समाज को बदनाम किया है। 

हालांकि दबाव बनने के बाद इंडिया टीवी ने यूट्यूब से वीडियो हटा लिया है। साथ ही चैनल ने मामला सेट करने के लिए सुरेंद्र और राशिद नाम के दो कर्मचारियों को लगा रखा है, जिनके फोन मौलाना को बार—बार आ रहे हैं।

मदरसे से जुड़े लोगों ने जनज्वार से बातचीत में कहा कि बार—बार माफी मांगने के फोन पहले सुरेंद्र के आ रहे थे। लेकिन जब लोगों ने कहा कि चैनल औपचारिक तौर पर माफी मांगेगा तभी मामला पुलिस और अदालत में नहीं जाएगा। फिर चैनल ने राशिद नाम के किसी मुस्लिम कर्मचारी को लगाया कि वह मुस्लिम होने के नाते इस मसले को निपटाए।

पर 'आॅपरेशन हलाला' के फर्जीवाड़े से स्थानीय लोगो में बेहद आक्रोश है। मदरसे के पूर्व और वर्तमान महासचिव युसुफ सोरान व शफ़ीक़ कुरैशी का कहना है यदि चैनल ने माफ़ी नहीं मांगी तो चैनल के विरुद्ध क़ानूनी कार्यवाही भी करेंगे।

वहीं स्थानीय लोगों ने उक्त फेक न्यूज़ को लेकर India TV  के विरुद्ध FIR दर्ज करने कि मांग को लेकर उत्तरी जिला डीसीपी से मिलने का मिलने का निर्णय लिया है। 

मौलाना शहजाद खोखर बता रहे इंडिया टीवी के फर्जीवाड़े की कहानी 


Apr 16, 2017

देखिए वीडियो, क्यों बढ़ रहे हैं कश्मीर में भारत के दुश्मन

जनज्वार ने 15 अप्रैल को छपी सुनील कुमार की रिपोर्ट के जरिए सवाल उठाया था कि 'कश्मीरियों की जान ले सकती हैं बंदूकें पर उनका दिल नहीं जीत सकतीं' और यह वीडियो उसी चिंता की गवाही दे रहा है... 

रिपोर्ट में सेना की जीप के बोनट पर बंधे एक कश्मीरी युवक को ​भी चस्पां किया गया था और सरकार से सवाल किया गया था कि सरकार खुद अपने खिलाफ बगावत के सुर क्यों तेज करवा रही है? क्यों ऐसा हो रहा है कि सेना कार्यवाही, पत्थरबाजी और हिंसा लगातार बढ़ती जा रही है और आम कश्मीरियों की लोकतंत्र और चुनाव पर से भरोसा खत्म होता जा रहा है। 

हमारी चिंता यह रही है कि 2013 आते—आते जो कश्मीर लगातार शांति की ओर बढ़ रहा था, आतंकवाद हाशिए पर था, पर्यटन तेजी से बढ़ रहा था, स्कूलों में बच्चे दाखिले लेने लगे थे, वहां पिछले तीन वर्षों में ऐसा क्या हुआ कि 13 से 18 वर्ष के नौेजवान भारत के​ खिलाफ बगावती होते जा रहे हैं? 

पर आज जनज्वार तक जो वीडियो पहुंचा है, उससे साफ हो रहा है कि सेना किस तरह ​कश्मीरी युवाओंं में देशप्रेम पैदा करने की कोशिश कर कर रही है? 

सवाल यह भी है कि क्या ऐसे मारपीट, हत्या और हिंसा कर देशप्रेम पैदा किया जा सकता है या फिर सेना व सरकार को बातचीत और भरोसे का माहौल बनाकर कश्मीर में स्थिति सामान्य करने की कोशिश करनी चाहिए।

देखें वीडियो 


यहां भाजपा कार्यालय के सामने बिक रहा गौ मांस लेकिन पार्टी को नहीं कोई ऐतराज

भाजपा कार्यालय के सामने  होटल  (नीचे फोटो में देखें कार्यालय )                                       फोटो — श्रवण 
जनज्वार। गौ मांस सेवन को प्रतिबंधित करने पर आमादा भाजपा का इसे दोहरा रवैया ही कहा जाएगा कि वह कुछ राज्यों में गौ मांस के नाम पर दंगों—फसादों को न्यायोचिक ठहरा देती है, वहीं कुछ राज्यों में वह इस मामले में चूं भी नहीं करती। 

भले ही भाजपा कार्यालय के सामने ही गाय के मीट का बना स्वादिष्ट व्यंजन  क्यों न परोसा जा रहा हो !

कुछ ऐसा ही वाकया अरुणाचल प्रदेश के एक जिले में सामने आया है। पार्टी कार्यालय के ठीक सामने, एक ही चौराहे पर गाय का मीट बेचा जा रहा है लेकिन न तो कोई बजरंगी, न संघी और न भाजपाई गाय को मां—मां कह कर वहां बवाल काट रहा है, प्रदर्शन कर रहा है। जबकि वहां भाजपा के समर्थन से सरकार चल रही है।  

फेसबुक पर सामाजिक मसलों को लेकर सक्रिय तौर पर लिखने वाले श्रवण इन दिनों अरुणाचल प्रदेश में हैं। वह वहां से जीवन, सौंदर्य, राजनीति और प्रकृति से जुड़ी तस्वीरों और पोस्ट के माध्यम से लगातार लिख रहे हैं। 

उन्हीं में से एक में श्रवण ने फोटो पोस्ट करते हुए लिखा है, 'देश के पूर्वी राज्य अरुणाचल प्रदेश के पासीघाट जिले के मुख्य चौराहे पर भाजपा कार्यालय है। इसी चौराहे पर बीफ का होटल है।'

पासीघाट चौराहे पर भाजपा कार्यालय 
वह इस पोस्ट में आगे लिखते हैं, 'बीफ मतलब यहाँ गाय का माँस ही है, भैंस का नहीं। चौराहे पर ही माँस काट कर बेचा जा रहा था और एक स्टॉल पर गाय का कटा सिर रखा था। फोटो मैंने जान-बूझकर नहीं ली और न लगायी।' 

अपनी पोस्ट की अगली पंक्ति में वे बताते हैं, 'यहीं पर यूपी, बिहार से आए लोगों की दुकानें भी हैं। लेकिन किसी की भावना आहत नहीं हो रही है। और न ही कोई दंगा भड़का है। इसके उलट यूपी, राजस्थान, गुजरात की घटनाएँ देखिए जहाँ गाय के नाम पर गुंडागर्दी जारी है और गुंडागर्दी को भाजपा सरकार राज्य और केंद्र दोनों की समर्थन प्राप्त है।' 

एक खबर का हवाला देते हुए श्रवण ने ​लिखा है, 'कुछ दिन पहले असम ट्रिब्यून में संघ के हवाले से खबर आई थी कि वे पूर्वोत्तर वासियों को गौमाँस छोड़ने का आग्रह करेंगे।' 

संघ के आग्रह से भी जाहिर है कि पूर्वोत्तर में हिंदू और आदिवासी गौ मांस का सेवन करते हैं। ऐसे में सवाल यह है कि यूपी, बिहार, राजस्थान, हरियाणा, मध्यप्रदेश में गौ का मांस का 'मां का मांस' कैसे हो जाता है और पूर्वोत्तर में वही मांस जब भाजपाइयों के दर पर बिकता है तो वह मीट का होटल मात्र क्यों मान लिया जाता है? 

लिट्टे की राजनीतिक परंपरा से प्रभावित हैं माओवादी, नक्सलबाड़ी से नहीं

भाकपा (माओवादी) खुद को नक्सलबाड़ी का उत्तराधिकारी बताती है लेकिन वो नहीं है। उके जैविक संबंध लिट्टे जैसे आतंकी संगठनों से हैं जो जातीय पहचान की राजनीति करते हैं...


आउटलुक अंग्रेजी के नए अंक की कवर स्टोरी 'नक्सलबाड़ी के 50 साल' पर है, जिसका संपादकीय राजेश रामचंद्रन ने लिखा है। राजेश रामचंद्रन आउटलुक के संपादक हैं और माओवादी राजनीति को जानने और लिखने वाले प्रमुख पत्रकारों में से एक हैं। वामपंथी आदर्शवाद, नक्सलबाड़ी और माओवाद पर केंद्रित उनका यह संपादकीय माओवादी राजनीति पर कई सवाल खड़े करता है। हिंदी पाठकों की सुविधा के लिए जनज्वार यहां संपादकीय का अनुवाद प्रस्तुत कर रहा है।  

हमेशा जवान और मरा हुआ
राजेश रामचंद्रन, संपादक, आउटलुक

आदर्शवाद जानलेवा है। यह चेतावनी, जो शहीदी इश्तिहार में हमेशा बड़े अक्षरों में लिखी होनी चाहिए, 1967 के बसंत में धुंधली पड़ गई। तब नए गणतंत्र की स्थापना के बाद आजादी को दो दशक बस हुए थे। 

अभी इकबाल जिंदा था। चापलूसों और पुराने सामंतों का सिंडीकेट मजबूती के साथ सत्ता पर जमा तो हुआ था लेकिन  हिंदूस्तान एक नई ताकत था और इन युवाओं को लगा कि वे इसे और अधिक मानवीय, न्यायपूर्ण और समतामूलक बना सकते हैं। 

तब क्या था, उन लोगों ने मशाल जलाई और फिर उस लौ को बचाने के लिए स्वयं को भष्म कर लिया। इनमें से अधिकांश युवा, गुस्सेल और सुंदर लोग थे जो अधेड़ या व्यावहारिक होने तक नहीं रूके रहे। 

उनके जीवन और मृत्यू ने राजनीति, सिनेमा, साहित्य और बहुत कुछ प्रभावित किया। और आज नक्सलबाड़ी के पचास साल बाद हमें यह मौका मिला है जहां हम यह जानने की कोशिश कर सकते हैं कि क्या उनकी मौत बेकार गई?

ऐसा संभव ही नहीं है कि हम इन लोगों की प्रशंसा न करें जिन लोगों ने अपना सब कुछ कुर्बान कर दिया और बदले में बिना कुछ लिए। उनको लगता था कि वे दुनिया बदल देगें। उनसे पहले की पीढ़ी ने, जो गांधीवादी स्वतंत्रता सेनानी थे और जिन्होंने कम्युनिष्ट पार्टी का गठन किया था, उन्होंने सच का बदलाव किया था। 

लेकिन ये लोग जल्दबाजी में थे। वो भूल गए या शायद नहीं देख पाए कि हिंसा से हिंसा पैदा होती है, हिंसा और अधिक हिंसा को न्यायोचित ठहराती है और कमजोर लोग ही हिंसक दौर में सबसे अधिक जुल्म सहते हैं। 

पश्चिम बंगाल और केरल में हुए भूमि सुधार बहुत हद तक नक्सलबाड़ी उभार के लिए जिम्मेदार हैं। शायद तेलंगाना और आंध्र प्रदेश में सामंतवाद और सामंती उत्पीड़न को कहीं और से चुनौती नहीं मिल सकती थी। बिहार में दलितों की ओर से रणवीर सेना के गुण्डों से और कौन मुकाबला कर सकता था? 

नक्सलबाडी अब पश्चिम बंगाल के सिलिगुढ़ी जिले की किसी बाड़ी या गांव का नाम नहीं रह गया था बल्कि यह उत्पीड़ितों के अधिकार की हिंसक कोशिश हो गया था, जिसमें बाहर से आए आदर्शवादी भी शामिल थे।  



लेकिन आदर्शवाद एक ऐसी चीज़ है जो आग की ओर जाते पतंगों को धक्का देने का काम तो कर सकता है, पर ढांचा खड़ा करने, संगठन बनाने और जनता को शांतिपूर्ण तरीकों से ताकतवर बनाने के लिए वह काफी नहीं होता। शायद इसी कारण नक्सलबाड़ी ने साहित्य और सिनेमा को चुनावी राजनीति से अधिक प्रभावित किया।

भारतीय आदर्शवादी उस समय सकते में आ गए जब बंगलादेश की जनता पर पाकिस्तान द्वारा थोपे गए उत्पीड़न के पक्ष में चीन खड़ा हो गया। उसके बाद जल्द ही चीन विशाल अर्थव्यवस्था में बदल कर विश्व पूंजीवाद की चालक शक्ति बन गया। ऐसे में धीरे—धीरे पुराने नक्सलवादियों को एहसास हुआ कि चीन का अध्यक्ष चीन का ही हो सकता है किसी और का नहीं। दुनिया बदली और जो लोग नहीं बदल पाए उनके अंदर संत्रास और संशय ने आकार लिया। और अब उस तरह के नक्सलवादी नहीं बचे हैं।

भाकपा (माओवादी) खुद को नक्सलबाड़ी का उत्तराधिकारी बताती है लेकिन वो नहीं है। उनके जैविक संबंध लिट्टे जैसे आतंकी संगठनों से हैं जो जातीय पहचान की राजनीति करते हैं। 

दिल्ली में रहने वाला एक माओवादी विचारक कुछ समय तक लिट्टे का प्रवक्ता था जो प्रभाकरण के यूरोप भाग जाने की कहानियां सुनाया करता था जबकि प्रभाकरण नंदीकडल में मारा गया। यह माओवादी दिल्ली के हाईफाई स्कूल में अपने बच्चे के दाखिले के एवज में पार्टी के महासचिव गणपति का साक्षात्कार दिलाने को तैयार था। 

हम सब जानते हैं कि वो एक झूठा साक्षात्कार होता। ऐसे झूठ कई बार मुझे इनकी राजनीति पर सोचने को मजबूर करती है। जंगल में ये लोग केन्द्रीय पुलिस बल के जवानों की हत्या करते हैं जो गरीब होते हैं और आजीविका के लिए पुलिस में भर्ती हुए हैं। ये लोग विश्वविद्यालयों में कश्मीर के इस्लामी अलगाववादियों को समर्थन देते हैं। ये अबेडकरवादी होने का दावा करते हैं लेकिन संविधान से इन्हें नफरत है। 

सच तो यह है कि ये रूमानियत भी नहीं है।

Apr 15, 2017

वो कौन लोग हैं जो अंबेडकर का नापतोल कर रहे हैं

असली काम तो संविधान सभा के अध्यक्ष  डॉ राजेंद्र प्रसाद का था। संविधान की रचना में अम्बेडकर के योगदान का नापतोल किया जा रहा है। गोया डॉ अम्बेडकर महज एक सदस्य भर थे.... 

नारायण बारेठ, राजनीतिक विश्लेषक


क्या वे संविधान  के मुख्य शिल्पी थे? उन्हें श्रेय क्यों दें? डॉ भीमराव अम्बेडकर की 126वीं जयंती पर यह सवाल रह रह कर उठाया गया है।

किसी ने पूछा 'फिर और लोग क्या कर रहे थे /किसी की दलील है असली काम तो संविधान सभा के अध्यक्ष  डॉ राजेंद्र प्रसाद का था। इसमें संविधान की रचना में अम्बेडकर के योगदान का नापतोल किया जा रहा है। गोया डॉ अम्बेडकर महज एक सदस्य भर थे।

काश हम इतिहास के पन्नों से रहगुजर होते तो ऐसा नहीं सोचते। क्योंकि उन पन्नों में उस दौर की हकीकत और हालात दर्ज है। संविधान सभा के सदस्य स्वाधीनता संग्राम के मूल्यों से ओतप्रोत थे। वे हमारी तरह बंटे हुए नहीं थे। उनकी आँखों में हमारे लिए आज़ाद भारत के सुनहरे ख्वाब थे। 

खुद डॉ राजेंद्र प्रसाद ने संविधान पर मुहर लगने के बाद अपने भाषण में अम्बेडकर को माननीय कहकर सम्बोधित किया और सविंधान निर्माण  में उनके अहम किरदार को रेखांकित किया। डॉ राजेंद्र प्रसाद ने कहा डॉ अम्बेडकर ने प्रारूप समीति के अध्यक्ष के रूप में उल्लेखनीय काम किया है। 'डॉ अम्बेडकर ने अपने स्वास्थ्य की परवाह नहीं की, उनके प्रारूप कमेटी के अध्यक्ष बनने से उस समीति की आभा बढ़ी.' डॉ  राजेंद्र प्रसाद।

डॉ अम्बेडकर संविधान सभा के लिए कितने महत्वपूर्ण और उपयोगी थे, इसका पता तब चला जब बंगाल विभाजित हो गया और डॉ अम्बेडकर संविधान सभा के सदस्य नहीं रहे। क्योंकि वे बंगाल के उस भाग से चुने गए थे जो उधर चला गया। उस वक्त मुंबई के एम आर जयकार ने संविधान सभा में सीट खाली की / डॉ राजेंद्र प्रसाद ने तुरंत मुंबई प्रान्त  के मुख्यमंत्री बी जी खेर को चिठ्ठी लिखी और डॉ अम्बेडकर को मुंबई से सविंधान सभा प्रतिनिधि बनाने को कहा। चिट्ठी में लिखा—

'और बातों को छोड़िये। डॉ अम्बेडकर ने सविंधान सभा और उसकी बहुत सी कमेटियों में जोरदार काम किया है। हमें उनके इस योगदान की जरूरत है। आपको पता है वे बंगाल से चुने गए थे। बंगाल के बंटवारे से वे संविधान सभा के मेंबर नहीं रहे। लिहाजा उन्हें तुरंत मुंबई से चुना जाये. '

Apart from any other consideration we have found Dr. Ambedkar’s work both in Constituent Assembly and the various committees to which he was appointed to be of such an order as to require that we should not be deprived of his services. As you know, he was elected from Bengal and after the division of the province he was ceased to be a member of the Constituent Assembly commencing from the 14th July 1947 and it is therefore necessary that he should be elected immediately.”

सरदार पटेल भी इसी तर्ज पर सक्रिय हुए और बी जी खेर और जी पी मावलंकर पर अपना प्रभाव इस्तेमाल किया/ताकि अम्बेडकर मुंबई से सविंधान सभा के प्रतिनिधि के रूप में चुन कर आ सके। क्योंकि जयकार की जगह इन दोनों की दावेदारी मानी जा रही थी।

अमेरिका के स्व. प्रोफेसर ग्रैनविल ऑस्टिन को भारतीय संविधान का विद्वान माना जाता है। उन्होंने संविधान  पर किताबें लिखी है। भारत ने भी उनके इस योगदान को सलाम किया और पदम्श्री से सम्मानित किया। प्रोफेसर ऑस्टिन ने संविधान  में अम्बेडकर के योगदान की सराहना की और कहा, 'अम्बेडकर द्वारा प्रारूपित भारतीय संविधान सबसे अहम और सबसे पहले एक सामाजिक दस्तावेज  है  (first and foermost a social document) जिसके बहुतेरे प्रावधान सामाजिक क्रांति की मंजिल तक पहुंचने का मकसद रखते हैं।

क्या अब भी हम उस हस्ती को श्रेय देने में संकोच करेंगे?

वैसे वही संविधान आपको भी अधिकार देता है चाहे तो अम्बेडकर को उनके अहम योगदान पर श्रेय दो या ख़ारिज कर दो।
editorjanjwar@gmail.com 

दलितों को बेइज्जत कर 'इज्जत' देने की परंपरा कब बंद होगी

जनज्वार। अक्सर ऐसा होता है कि जब कोई सवर्ण नेता किसी दलित के घर में या साथ में खाना खाता है तो खबर बनती है। अखबार और टीवी वाले उस न्यूज को प्राथमिकता से फ्लैश करते हैं? साथ में बैठे खाना खाने वाले दलित की फोटो को वह तरह—तरह से हाईलाइट करते हैं। बकायदा जोर देकर बताते हैं कि यह ऐतिहासिक है कि फलां बड़े नेता ने आज दलित के साथ बैठकर खाना खाया। 



गोया दलित इंसान नहीं जानवर हों! इक्कीसवीं सदी में भी दलित के साथ खाना एक प्रचार, एक आश्चर्य और सबसे बढ़कर जातिगत अहसान की तरह है। 

हद तो तब हो गयी जब 14 अप्रैल को आंबेडकर जयंती के मौके पर भी जब यही अहसान मीडिया और भाजपा ने गाया—गुनगुनाया।

कल 14 अप्रैल को डॉ आंबेडकर का 126वां जन्मदिन था। देश के सभी इलाकों में आंबेडकर के अनुयायियों और समर्थकों द्वारा उनका जन्मदिन मनाया गया। अनुयायियों ने आंबेडकर का जन्मदिन इस संकल्प के साथ मनाया कि वे उनके बताए राजनीतिक सिद्धांतों और मुल्यों को जीवन में अपनाएंगें और दूसरों को प्रेरित करेंगे। 

आंबेडकर की जन्मस्थली मध्यप्रदेश में महू में भी एक कार्यक्रम का आयोजन किया गया। कार्यक्रम में हुए भोज के दौरान प्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान, राज्य सरकार के कुछ मंत्री और मुंबई की सांसद व भारतीय जनता युवा मोर्चा की अध्यक्ष पूनम महाजन भी शामिल हुईं।

कार्यक्रम के भोज की एक तस्वीर छपी जिसको भाजपा ने अपने आधिकारिक ट्वीटर हैं​डल पर शेयर किया।

इस तस्वीर में दलितों के यहां खाने का नाटक एक कदम और आगे बढ़ा है। अबकी भाजपा सांसद पूनम महाजन ने दलित के हाथ से खाना खाया और अखबार में कैप्शन छपा है, 'द​लित के हाथों सांसद ने खाना खाया, मुख्यमंत्री—मंत्री भी थे साथ में।'

गौर करने वाली बात यह है कि पिछड़ी जाति से ताल्लुक रखने वाले मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान को दलित ने खाना नहीं खिलाया बल्कि ब्राम्हण पूनम महाजन को खिलाया। 

बुंदेलखंड दलित अधिकार मंच संयोजक कुलदीप बौद्ध कहते हैं, 'अखबार में छपा कैप्शन जहां पत्रकारिता में पसरी जातीय भावना को साफ करता है, वहीं भाजपा द्वारा उस तस्वीर को ट्वीटर के जरिए प्रसारित करना बताता है कि भाजपा दलितों की बराबरी की बात चाहे जितनी कर ले उसकी मानसिकता गैर—बराबरी वाली ही है।'

बसपा प्रवक्ता रितु सिंह की राय में, 'इस तरह की खबरें दलितों को बेइज्जत कर न सिर्फ इज्जत देने का दिखावा करती हैं, बल्कि यह दलित अस्मिता पर हमला भी है। ऐसी खबरों का ढोल—नगाड़ों के साथ छपना बंद होना चाहिए। मोदी जी को सबसे पहले मन की बात अपने कार्यकर्ताओं के लिए करना चाहिए कि वह जातिगत मानसिकता से उबरें, सिर्फ फोटो न खिचाएं।'

गौरतलब है कि कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी ने 2013 में महात्मा गांधी के जन्मदिन 2 अक्टूबर के दिन कांग्रेसी नेताओं के साथ तीन सौ दलित परिवारों के घर रात बिताई और सहभोज का लुत्फ उठाया था तो पिछले वर्ष भाजपा अध्यक्ष अमित शाह ने दलित के यहां भोजन कर सुर्खियां बटोरी थीं।  

भाजपा अध्यक्ष अमित शाह और कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी : दलित के घर दावत

कश्मीरियों की जान ले सकती हैं बंदूकें पर उनका दिल नहीं जीत सकतीं

श्रीनगर के हालातों पर सुनील कुमार की रिपोर्ट

जिस तरह एक कश्मीरी नौजवान को सुरक्षाबल गाड़ी के बोनट पर बांध कर घुमा रहे हैं उससे साफ है कि सरकार श्रीनगर के 7 फीसदी वोट से अभी चेती नहीं। ऐसे में सवाल यह है कि वहां के किशारों में भारत के प्रति नफरत भरने का काम सरकार खुद क्यों कर रही है? 



यह सवाल श्रीनगर में हुए उपचुनाव के बाद और महत्वपूर्ण हो गया है, क्योंकि इतना कम वोट तो उस समय भी नहीं पड़ा था जब वहां आतंकवादी गतिविधियां चरम पर थीं और अतिवादियों का जमीनी स्तर पर जनता के बीच व्यापक असर था।

कश्मीर घाटी में दो लोकसभा सीटों श्रीनगर और अनंतनाग पर उपचुनाव होना था। एक सीट महबूबा मुफ्ती के अनंतनाग सीट पर इस्तीफा देने से खाली हुई थी और दूसरी श्रीनगर बड़गाम लोकसभा की थी। श्रीनगर की सीट इसलिए खाली हुई कि सांसद तारिक हामिद कारा ने अपनी पार्टी पीपुल्स डेमोक्रेटिक पार्टी (पीडीपी) और संसद सदस्यता दोनों से इस्तीफा दे दिया था। उन्होंने इस्तीफा पार्टी के जनविरोधी नीतियों से तंग आकर दिया था। 

श्रीनगर लोकसभा सीट पर 9 अप्रैल को चुनाव हुआ तथा अनंतनाग सीट पर 12 अप्रैल को चुनाव होना था। यह चुनाव इसलिए महत्वूपर्ण था कि राज्य में संयुक्त मोर्चे की सरकार को ढाई साल हो चुके हैं और कश्मीर घाटी में होने वाले प्रदर्शनों के बाद पहला चुनाव था।

एक तरह से कश्मीरी जनता और सरकार दोनों के लिये यह परीक्षा की घड़ी थी। कश्मीर में हो रहे प्रदर्शन को भारत सरकार कहती थी अलगाववादियों द्वारा राज्य में पैसे बांट कर प्रदर्शन कराये जा रहे हैं। यहां तक की नोटबंदी के दौरान उस समय के रक्षा मंत्री रहे मनोहर पार्निकर ने कह दिया कि नोटबंदी से कश्मीर में पत्थरबाजी बंद हो गई है।

लेकिन श्रीनगर लोकसभा उपचुनाव में ​​करीब 7 फीसदी ​के वाटिंग सरकार के मुंह पर करारा तमाचा है जो जनता की भावनाओं को समझ नहीं पाई। ऐसा नहीं है कि यह पहली बार हो रहा है।

श्रीनगर लोकसभा चुनाव के आंकड़े पर नजर डालें तो 1998 में 30.1 प्रतिशत, 1999 में 11.9 प्रतिशत, 2004 में 18.6 प्रतिशत, 2009 में 25.6 प्रतिशत, 2014 में 25.9 प्रतिशत ही मतदान हुये हैं यानी बहुसंख्यक जनता ने भारत के ‘लोकतंत्र’ में आस्था नहीं दिखाई है।

इस बार के उपचुनाव में भारतीय ‘लोकतंत्र’ में आस्था रखने वाले लोगों में और कमी आई है और मतदान का प्रतिशत 6.5 प्रतिशत तक सिमट कर रह गया।

इसके उलटे वहां के विधानसभा चुनाव में लोगों ने मतदान किया है 1996 के विधानसभा चुनाव में 53.9 प्रतिशत, 2002 में 45.0 प्रतिशत, 2008 में 60.6 प्रतिशत तथा 2014 के चुनाव में 65.23 प्रतिशत लोगों ने मतदान किया। इन आंकड़ों से यह पता चलता है कि दिल्ली की संसद में लोगों की उतनी दिलचस्पी नहीं है जितना उनकी अपनी विधानसभा में।

यह चुनाव राजनीतिक दलों, भारत सरकार और राज्य सरकार के लिये भी महत्वपूर्ण है जहां सरकार की तीन साल की कार्यशैली के लिये जनादेश माना जा सकता है वहीं विपक्षी पार्टी कांग्रेस और नेशनल कॉन्फ्रेंस के लिये भी महत्वपूर्ण था कि इन दोनों पार्टी के साझा उम्मीदवार भूतपूर्व मुख्यमंत्री फारूख अब्दुल्ला स्वयं थे; यानी जो भी भारत की संसदीय पार्टी है इस चुनाव में अपनी आस्था प्रकट किया था फिर भी करीब 12 लाख 60 हजार मतदाताओं में से करीब 80 हजार मतदाताओं ने ही वोट डाले। लोगों ने साफ संदेश देने की कोशिश की है कि बुलेट और बैलेट साथ साथ नहीं चल सकता है।

गृह मंत्रालय अभी भी समस्याओं से मुंह छिपाते हुये इस स्थिति के लिए चुनाव आयोग जिम्मेदार मान रहा है। उन गालियों, हत्याओं और सरकार के खिलाफ बनते झुकाव को नहीं।

मंत्रालय के अनुसार उपचुनाव पंचायत चुनाव के बाद किया जाना चाहिये लेकिन चुनाव आयोग ने उसके सुझाव को अनदेखी करते हुये श्रीनगर और अनंतनाग का उपचुनाव 9 और 12 अप्रैल की घोषणा कर दी। गृहमंत्रालय ने 9 अप्रैल का चुनाव सम्पन्न कराने के लिये तीस हजार, अतिरिक्त अर्धसैनिक बल दिये थे फिर भी इतने बड़े पैमाने पर हिंसा हुई जिसमें 8 लोगों की जानें गई और 150 से ज्यादा लोग घायल हुये।

गृहमंत्रालय के अुनसार 1500 मतदान केन्द्र बनाए गये थे जिसमें से 120 पोलिंग बूथ में तोड़-फोड़ हुई और 24 ईवीएम मशीन लूटी गई, 190 जगह पत्थर फेंकने की हिंसक वादरात हुई। हिंसा की वजह से 38 पोलिंग बूथ पर दुबारा 13 अप्रैल को चुनाव कराया गया जिसमें 35169 मतदाता में से 709 मतदाताओं यानी दो प्रतिशत लोगों ने ही वोट डाला।

इसका मतलब है कि 10 फीसदी से भी कम जगहों मतदाता हिंसक हुए लेकिन ज्यादातर जगहों पर लोगों ने शांतिपूर्वक तरीके से इस उपचुनाव को नकार दिया।

मिलिटेंसी के दौर में भी कश्मीर में मत प्रतिशत इतना कम नहीं रहा है। चुनाव के बाद 10 अप्रैल को भी घाटी में बाजार, स्कूल व सरकारी दफ्तरें बंद रहें। वहां तैनात एक अफसर के अनुसार पिछले पन्द्रह सालों में इतनी हिंसा की वारदात एक दिन में नहीं हुई है। पूर्व मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला का कहना है कि बीस साल की राजनीतिक जीवन में चुनाव की इससे बदतर हालत उन्हांने देखा है इसके साथ ही वह केन्द्र व राज्य सरकार के साथ-साथ चुनाव आयोग को फेल बताया।

श्रीनगर के उपचुनाव के हालात को देखते हुये चुनाव आयोग अनंतनाग उपचुनाव को 12 अप्रैल से टालकर 25 मई कर दिया है। यह सीट महबूबा मुफ्ती के लिये भी नाक का सवाल है, इस सीट से महबूबा के भाई तसादुक हुसैन मुफ्ती चुनाव लड़ रहे हैं और इसी के सहारे दिल्ली के पार्लियामेंट तक पहुंचना चाहते हैं।

अब देखना होगा कि सरकार, चुनाव आयोग की क्या रणनीति होती है। इस चुनाव का फैसला चाहे जो भी आये लेकिन कश्मीरी जनता ने यह साफ संदेश देने की कोशिश की है कि बातचीत की जगह अगर बंदूक से उनकी आवाज को दबाया जायेगा तो वह इसका जवाब अपने तरीके से देने के लिये तैयार हैं।
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