Apr 16, 2017

देखिए वीडियो, क्यों बढ़ रहे हैं कश्मीर में भारत के दुश्मन

जनज्वार ने 15 अप्रैल को छपी सुनील कुमार की रिपोर्ट के जरिए सवाल उठाया था कि 'कश्मीरियों की जान ले सकती हैं बंदूकें पर उनका दिल नहीं जीत सकतीं' और यह वीडियो उसी चिंता की गवाही दे रहा है... 

रिपोर्ट में सेना की जीप के बोनट पर बंधे एक कश्मीरी युवक को ​भी चस्पां किया गया था और सरकार से सवाल किया गया था कि सरकार खुद अपने खिलाफ बगावत के सुर क्यों तेज करवा रही है? क्यों ऐसा हो रहा है कि सेना कार्यवाही, पत्थरबाजी और हिंसा लगातार बढ़ती जा रही है और आम कश्मीरियों की लोकतंत्र और चुनाव पर से भरोसा खत्म होता जा रहा है। 

हमारी चिंता यह रही है कि 2013 आते—आते जो कश्मीर लगातार शांति की ओर बढ़ रहा था, आतंकवाद हाशिए पर था, पर्यटन तेजी से बढ़ रहा था, स्कूलों में बच्चे दाखिले लेने लगे थे, वहां पिछले तीन वर्षों में ऐसा क्या हुआ कि 13 से 18 वर्ष के नौेजवान भारत के​ खिलाफ बगावती होते जा रहे हैं? 

पर आज जनज्वार तक जो वीडियो पहुंचा है, उससे साफ हो रहा है कि सेना किस तरह ​कश्मीरी युवाओंं में देशप्रेम पैदा करने की कोशिश कर कर रही है? 

सवाल यह भी है कि क्या ऐसे मारपीट, हत्या और हिंसा कर देशप्रेम पैदा किया जा सकता है या फिर सेना व सरकार को बातचीत और भरोसे का माहौल बनाकर कश्मीर में स्थिति सामान्य करने की कोशिश करनी चाहिए।

देखें वीडियो 


यहां भाजपा कार्यालय के सामने बिक रहा गौ मांस लेकिन पार्टी को नहीं कोई ऐतराज

भाजपा कार्यालय के सामने  होटल  (नीचे फोटो में देखें कार्यालय )                                       फोटो — श्रवण 
जनज्वार। गौ मांस सेवन को प्रतिबंधित करने पर आमादा भाजपा का इसे दोहरा रवैया ही कहा जाएगा कि वह कुछ राज्यों में गौ मांस के नाम पर दंगों—फसादों को न्यायोचिक ठहरा देती है, वहीं कुछ राज्यों में वह इस मामले में चूं भी नहीं करती। 

भले ही भाजपा कार्यालय के सामने ही गाय के मीट का बना स्वादिष्ट व्यंजन  क्यों न परोसा जा रहा हो !

कुछ ऐसा ही वाकया अरुणाचल प्रदेश के एक जिले में सामने आया है। पार्टी कार्यालय के ठीक सामने, एक ही चौराहे पर गाय का मीट बेचा जा रहा है लेकिन न तो कोई बजरंगी, न संघी और न भाजपाई गाय को मां—मां कह कर वहां बवाल काट रहा है, प्रदर्शन कर रहा है। जबकि वहां भाजपा के समर्थन से सरकार चल रही है।  

फेसबुक पर सामाजिक मसलों को लेकर सक्रिय तौर पर लिखने वाले श्रवण इन दिनों अरुणाचल प्रदेश में हैं। वह वहां से जीवन, सौंदर्य, राजनीति और प्रकृति से जुड़ी तस्वीरों और पोस्ट के माध्यम से लगातार लिख रहे हैं। 

उन्हीं में से एक में श्रवण ने फोटो पोस्ट करते हुए लिखा है, 'देश के पूर्वी राज्य अरुणाचल प्रदेश के पासीघाट जिले के मुख्य चौराहे पर भाजपा कार्यालय है। इसी चौराहे पर बीफ का होटल है।'

पासीघाट चौराहे पर भाजपा कार्यालय 
वह इस पोस्ट में आगे लिखते हैं, 'बीफ मतलब यहाँ गाय का माँस ही है, भैंस का नहीं। चौराहे पर ही माँस काट कर बेचा जा रहा था और एक स्टॉल पर गाय का कटा सिर रखा था। फोटो मैंने जान-बूझकर नहीं ली और न लगायी।' 

अपनी पोस्ट की अगली पंक्ति में वे बताते हैं, 'यहीं पर यूपी, बिहार से आए लोगों की दुकानें भी हैं। लेकिन किसी की भावना आहत नहीं हो रही है। और न ही कोई दंगा भड़का है। इसके उलट यूपी, राजस्थान, गुजरात की घटनाएँ देखिए जहाँ गाय के नाम पर गुंडागर्दी जारी है और गुंडागर्दी को भाजपा सरकार राज्य और केंद्र दोनों की समर्थन प्राप्त है।' 

एक खबर का हवाला देते हुए श्रवण ने ​लिखा है, 'कुछ दिन पहले असम ट्रिब्यून में संघ के हवाले से खबर आई थी कि वे पूर्वोत्तर वासियों को गौमाँस छोड़ने का आग्रह करेंगे।' 

संघ के आग्रह से भी जाहिर है कि पूर्वोत्तर में हिंदू और आदिवासी गौ मांस का सेवन करते हैं। ऐसे में सवाल यह है कि यूपी, बिहार, राजस्थान, हरियाणा, मध्यप्रदेश में गौ का मांस का 'मां का मांस' कैसे हो जाता है और पूर्वोत्तर में वही मांस जब भाजपाइयों के दर पर बिकता है तो वह मीट का होटल मात्र क्यों मान लिया जाता है? 

लिट्टे की राजनीतिक परंपरा से प्रभावित हैं माओवादी, नक्सलबाड़ी से नहीं

भाकपा (माओवादी) खुद को नक्सलबाड़ी का उत्तराधिकारी बताती है लेकिन वो नहीं है। उके जैविक संबंध लिट्टे जैसे आतंकी संगठनों से हैं जो जातीय पहचान की राजनीति करते हैं...


आउटलुक अंग्रेजी के नए अंक की कवर स्टोरी 'नक्सलबाड़ी के 50 साल' पर है, जिसका संपादकीय राजेश रामचंद्रन ने लिखा है। राजेश रामचंद्रन आउटलुक के संपादक हैं और माओवादी राजनीति को जानने और लिखने वाले प्रमुख पत्रकारों में से एक हैं। वामपंथी आदर्शवाद, नक्सलबाड़ी और माओवाद पर केंद्रित उनका यह संपादकीय माओवादी राजनीति पर कई सवाल खड़े करता है। हिंदी पाठकों की सुविधा के लिए जनज्वार यहां संपादकीय का अनुवाद प्रस्तुत कर रहा है।  

हमेशा जवान और मरा हुआ
राजेश रामचंद्रन, संपादक, आउटलुक

आदर्शवाद जानलेवा है। यह चेतावनी, जो शहीदी इश्तिहार में हमेशा बड़े अक्षरों में लिखी होनी चाहिए, 1967 के बसंत में धुंधली पड़ गई। तब नए गणतंत्र की स्थापना के बाद आजादी को दो दशक बस हुए थे। 

अभी इकबाल जिंदा था। चापलूसों और पुराने सामंतों का सिंडीकेट मजबूती के साथ सत्ता पर जमा तो हुआ था लेकिन  हिंदूस्तान एक नई ताकत था और इन युवाओं को लगा कि वे इसे और अधिक मानवीय, न्यायपूर्ण और समतामूलक बना सकते हैं। 

तब क्या था, उन लोगों ने मशाल जलाई और फिर उस लौ को बचाने के लिए स्वयं को भष्म कर लिया। इनमें से अधिकांश युवा, गुस्सेल और सुंदर लोग थे जो अधेड़ या व्यावहारिक होने तक नहीं रूके रहे। 

उनके जीवन और मृत्यू ने राजनीति, सिनेमा, साहित्य और बहुत कुछ प्रभावित किया। और आज नक्सलबाड़ी के पचास साल बाद हमें यह मौका मिला है जहां हम यह जानने की कोशिश कर सकते हैं कि क्या उनकी मौत बेकार गई?

ऐसा संभव ही नहीं है कि हम इन लोगों की प्रशंसा न करें जिन लोगों ने अपना सब कुछ कुर्बान कर दिया और बदले में बिना कुछ लिए। उनको लगता था कि वे दुनिया बदल देगें। उनसे पहले की पीढ़ी ने, जो गांधीवादी स्वतंत्रता सेनानी थे और जिन्होंने कम्युनिष्ट पार्टी का गठन किया था, उन्होंने सच का बदलाव किया था। 

लेकिन ये लोग जल्दबाजी में थे। वो भूल गए या शायद नहीं देख पाए कि हिंसा से हिंसा पैदा होती है, हिंसा और अधिक हिंसा को न्यायोचित ठहराती है और कमजोर लोग ही हिंसक दौर में सबसे अधिक जुल्म सहते हैं। 

पश्चिम बंगाल और केरल में हुए भूमि सुधार बहुत हद तक नक्सलबाड़ी उभार के लिए जिम्मेदार हैं। शायद तेलंगाना और आंध्र प्रदेश में सामंतवाद और सामंती उत्पीड़न को कहीं और से चुनौती नहीं मिल सकती थी। बिहार में दलितों की ओर से रणवीर सेना के गुण्डों से और कौन मुकाबला कर सकता था? 

नक्सलबाडी अब पश्चिम बंगाल के सिलिगुढ़ी जिले की किसी बाड़ी या गांव का नाम नहीं रह गया था बल्कि यह उत्पीड़ितों के अधिकार की हिंसक कोशिश हो गया था, जिसमें बाहर से आए आदर्शवादी भी शामिल थे।  



लेकिन आदर्शवाद एक ऐसी चीज़ है जो आग की ओर जाते पतंगों को धक्का देने का काम तो कर सकता है, पर ढांचा खड़ा करने, संगठन बनाने और जनता को शांतिपूर्ण तरीकों से ताकतवर बनाने के लिए वह काफी नहीं होता। शायद इसी कारण नक्सलबाड़ी ने साहित्य और सिनेमा को चुनावी राजनीति से अधिक प्रभावित किया।

भारतीय आदर्शवादी उस समय सकते में आ गए जब बंगलादेश की जनता पर पाकिस्तान द्वारा थोपे गए उत्पीड़न के पक्ष में चीन खड़ा हो गया। उसके बाद जल्द ही चीन विशाल अर्थव्यवस्था में बदल कर विश्व पूंजीवाद की चालक शक्ति बन गया। ऐसे में धीरे—धीरे पुराने नक्सलवादियों को एहसास हुआ कि चीन का अध्यक्ष चीन का ही हो सकता है किसी और का नहीं। दुनिया बदली और जो लोग नहीं बदल पाए उनके अंदर संत्रास और संशय ने आकार लिया। और अब उस तरह के नक्सलवादी नहीं बचे हैं।

भाकपा (माओवादी) खुद को नक्सलबाड़ी का उत्तराधिकारी बताती है लेकिन वो नहीं है। उनके जैविक संबंध लिट्टे जैसे आतंकी संगठनों से हैं जो जातीय पहचान की राजनीति करते हैं। 

दिल्ली में रहने वाला एक माओवादी विचारक कुछ समय तक लिट्टे का प्रवक्ता था जो प्रभाकरण के यूरोप भाग जाने की कहानियां सुनाया करता था जबकि प्रभाकरण नंदीकडल में मारा गया। यह माओवादी दिल्ली के हाईफाई स्कूल में अपने बच्चे के दाखिले के एवज में पार्टी के महासचिव गणपति का साक्षात्कार दिलाने को तैयार था। 

हम सब जानते हैं कि वो एक झूठा साक्षात्कार होता। ऐसे झूठ कई बार मुझे इनकी राजनीति पर सोचने को मजबूर करती है। जंगल में ये लोग केन्द्रीय पुलिस बल के जवानों की हत्या करते हैं जो गरीब होते हैं और आजीविका के लिए पुलिस में भर्ती हुए हैं। ये लोग विश्वविद्यालयों में कश्मीर के इस्लामी अलगाववादियों को समर्थन देते हैं। ये अबेडकरवादी होने का दावा करते हैं लेकिन संविधान से इन्हें नफरत है। 

सच तो यह है कि ये रूमानियत भी नहीं है।

Apr 15, 2017

वो कौन लोग हैं जो अंबेडकर का नापतोल कर रहे हैं

असली काम तो संविधान सभा के अध्यक्ष  डॉ राजेंद्र प्रसाद का था। संविधान की रचना में अम्बेडकर के योगदान का नापतोल किया जा रहा है। गोया डॉ अम्बेडकर महज एक सदस्य भर थे.... 

नारायण बारेठ, राजनीतिक विश्लेषक


क्या वे संविधान  के मुख्य शिल्पी थे? उन्हें श्रेय क्यों दें? डॉ भीमराव अम्बेडकर की 126वीं जयंती पर यह सवाल रह रह कर उठाया गया है।

किसी ने पूछा 'फिर और लोग क्या कर रहे थे /किसी की दलील है असली काम तो संविधान सभा के अध्यक्ष  डॉ राजेंद्र प्रसाद का था। इसमें संविधान की रचना में अम्बेडकर के योगदान का नापतोल किया जा रहा है। गोया डॉ अम्बेडकर महज एक सदस्य भर थे।

काश हम इतिहास के पन्नों से रहगुजर होते तो ऐसा नहीं सोचते। क्योंकि उन पन्नों में उस दौर की हकीकत और हालात दर्ज है। संविधान सभा के सदस्य स्वाधीनता संग्राम के मूल्यों से ओतप्रोत थे। वे हमारी तरह बंटे हुए नहीं थे। उनकी आँखों में हमारे लिए आज़ाद भारत के सुनहरे ख्वाब थे। 

खुद डॉ राजेंद्र प्रसाद ने संविधान पर मुहर लगने के बाद अपने भाषण में अम्बेडकर को माननीय कहकर सम्बोधित किया और सविंधान निर्माण  में उनके अहम किरदार को रेखांकित किया। डॉ राजेंद्र प्रसाद ने कहा डॉ अम्बेडकर ने प्रारूप समीति के अध्यक्ष के रूप में उल्लेखनीय काम किया है। 'डॉ अम्बेडकर ने अपने स्वास्थ्य की परवाह नहीं की, उनके प्रारूप कमेटी के अध्यक्ष बनने से उस समीति की आभा बढ़ी.' डॉ  राजेंद्र प्रसाद।

डॉ अम्बेडकर संविधान सभा के लिए कितने महत्वपूर्ण और उपयोगी थे, इसका पता तब चला जब बंगाल विभाजित हो गया और डॉ अम्बेडकर संविधान सभा के सदस्य नहीं रहे। क्योंकि वे बंगाल के उस भाग से चुने गए थे जो उधर चला गया। उस वक्त मुंबई के एम आर जयकार ने संविधान सभा में सीट खाली की / डॉ राजेंद्र प्रसाद ने तुरंत मुंबई प्रान्त  के मुख्यमंत्री बी जी खेर को चिठ्ठी लिखी और डॉ अम्बेडकर को मुंबई से सविंधान सभा प्रतिनिधि बनाने को कहा। चिट्ठी में लिखा—

'और बातों को छोड़िये। डॉ अम्बेडकर ने सविंधान सभा और उसकी बहुत सी कमेटियों में जोरदार काम किया है। हमें उनके इस योगदान की जरूरत है। आपको पता है वे बंगाल से चुने गए थे। बंगाल के बंटवारे से वे संविधान सभा के मेंबर नहीं रहे। लिहाजा उन्हें तुरंत मुंबई से चुना जाये. '

Apart from any other consideration we have found Dr. Ambedkar’s work both in Constituent Assembly and the various committees to which he was appointed to be of such an order as to require that we should not be deprived of his services. As you know, he was elected from Bengal and after the division of the province he was ceased to be a member of the Constituent Assembly commencing from the 14th July 1947 and it is therefore necessary that he should be elected immediately.”

सरदार पटेल भी इसी तर्ज पर सक्रिय हुए और बी जी खेर और जी पी मावलंकर पर अपना प्रभाव इस्तेमाल किया/ताकि अम्बेडकर मुंबई से सविंधान सभा के प्रतिनिधि के रूप में चुन कर आ सके। क्योंकि जयकार की जगह इन दोनों की दावेदारी मानी जा रही थी।

अमेरिका के स्व. प्रोफेसर ग्रैनविल ऑस्टिन को भारतीय संविधान का विद्वान माना जाता है। उन्होंने संविधान  पर किताबें लिखी है। भारत ने भी उनके इस योगदान को सलाम किया और पदम्श्री से सम्मानित किया। प्रोफेसर ऑस्टिन ने संविधान  में अम्बेडकर के योगदान की सराहना की और कहा, 'अम्बेडकर द्वारा प्रारूपित भारतीय संविधान सबसे अहम और सबसे पहले एक सामाजिक दस्तावेज  है  (first and foermost a social document) जिसके बहुतेरे प्रावधान सामाजिक क्रांति की मंजिल तक पहुंचने का मकसद रखते हैं।

क्या अब भी हम उस हस्ती को श्रेय देने में संकोच करेंगे?

वैसे वही संविधान आपको भी अधिकार देता है चाहे तो अम्बेडकर को उनके अहम योगदान पर श्रेय दो या ख़ारिज कर दो।
editorjanjwar@gmail.com 

दलितों को बेइज्जत कर 'इज्जत' देने की परंपरा कब बंद होगी

जनज्वार। अक्सर ऐसा होता है कि जब कोई सवर्ण नेता किसी दलित के घर में या साथ में खाना खाता है तो खबर बनती है। अखबार और टीवी वाले उस न्यूज को प्राथमिकता से फ्लैश करते हैं? साथ में बैठे खाना खाने वाले दलित की फोटो को वह तरह—तरह से हाईलाइट करते हैं। बकायदा जोर देकर बताते हैं कि यह ऐतिहासिक है कि फलां बड़े नेता ने आज दलित के साथ बैठकर खाना खाया। 



गोया दलित इंसान नहीं जानवर हों! इक्कीसवीं सदी में भी दलित के साथ खाना एक प्रचार, एक आश्चर्य और सबसे बढ़कर जातिगत अहसान की तरह है। 

हद तो तब हो गयी जब 14 अप्रैल को आंबेडकर जयंती के मौके पर भी जब यही अहसान मीडिया और भाजपा ने गाया—गुनगुनाया।

कल 14 अप्रैल को डॉ आंबेडकर का 126वां जन्मदिन था। देश के सभी इलाकों में आंबेडकर के अनुयायियों और समर्थकों द्वारा उनका जन्मदिन मनाया गया। अनुयायियों ने आंबेडकर का जन्मदिन इस संकल्प के साथ मनाया कि वे उनके बताए राजनीतिक सिद्धांतों और मुल्यों को जीवन में अपनाएंगें और दूसरों को प्रेरित करेंगे। 

आंबेडकर की जन्मस्थली मध्यप्रदेश में महू में भी एक कार्यक्रम का आयोजन किया गया। कार्यक्रम में हुए भोज के दौरान प्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान, राज्य सरकार के कुछ मंत्री और मुंबई की सांसद व भारतीय जनता युवा मोर्चा की अध्यक्ष पूनम महाजन भी शामिल हुईं।

कार्यक्रम के भोज की एक तस्वीर छपी जिसको भाजपा ने अपने आधिकारिक ट्वीटर हैं​डल पर शेयर किया।

इस तस्वीर में दलितों के यहां खाने का नाटक एक कदम और आगे बढ़ा है। अबकी भाजपा सांसद पूनम महाजन ने दलित के हाथ से खाना खाया और अखबार में कैप्शन छपा है, 'द​लित के हाथों सांसद ने खाना खाया, मुख्यमंत्री—मंत्री भी थे साथ में।'

गौर करने वाली बात यह है कि पिछड़ी जाति से ताल्लुक रखने वाले मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान को दलित ने खाना नहीं खिलाया बल्कि ब्राम्हण पूनम महाजन को खिलाया। 

बुंदेलखंड दलित अधिकार मंच संयोजक कुलदीप बौद्ध कहते हैं, 'अखबार में छपा कैप्शन जहां पत्रकारिता में पसरी जातीय भावना को साफ करता है, वहीं भाजपा द्वारा उस तस्वीर को ट्वीटर के जरिए प्रसारित करना बताता है कि भाजपा दलितों की बराबरी की बात चाहे जितनी कर ले उसकी मानसिकता गैर—बराबरी वाली ही है।'

बसपा प्रवक्ता रितु सिंह की राय में, 'इस तरह की खबरें दलितों को बेइज्जत कर न सिर्फ इज्जत देने का दिखावा करती हैं, बल्कि यह दलित अस्मिता पर हमला भी है। ऐसी खबरों का ढोल—नगाड़ों के साथ छपना बंद होना चाहिए। मोदी जी को सबसे पहले मन की बात अपने कार्यकर्ताओं के लिए करना चाहिए कि वह जातिगत मानसिकता से उबरें, सिर्फ फोटो न खिचाएं।'

गौरतलब है कि कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी ने 2013 में महात्मा गांधी के जन्मदिन 2 अक्टूबर के दिन कांग्रेसी नेताओं के साथ तीन सौ दलित परिवारों के घर रात बिताई और सहभोज का लुत्फ उठाया था तो पिछले वर्ष भाजपा अध्यक्ष अमित शाह ने दलित के यहां भोजन कर सुर्खियां बटोरी थीं।  

भाजपा अध्यक्ष अमित शाह और कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी : दलित के घर दावत

कश्मीरियों की जान ले सकती हैं बंदूकें पर उनका दिल नहीं जीत सकतीं

श्रीनगर के हालातों पर सुनील कुमार की रिपोर्ट

जिस तरह एक कश्मीरी नौजवान को सुरक्षाबल गाड़ी के बोनट पर बांध कर घुमा रहे हैं उससे साफ है कि सरकार श्रीनगर के 7 फीसदी वोट से अभी चेती नहीं। ऐसे में सवाल यह है कि वहां के किशारों में भारत के प्रति नफरत भरने का काम सरकार खुद क्यों कर रही है? 



यह सवाल श्रीनगर में हुए उपचुनाव के बाद और महत्वपूर्ण हो गया है, क्योंकि इतना कम वोट तो उस समय भी नहीं पड़ा था जब वहां आतंकवादी गतिविधियां चरम पर थीं और अतिवादियों का जमीनी स्तर पर जनता के बीच व्यापक असर था।

कश्मीर घाटी में दो लोकसभा सीटों श्रीनगर और अनंतनाग पर उपचुनाव होना था। एक सीट महबूबा मुफ्ती के अनंतनाग सीट पर इस्तीफा देने से खाली हुई थी और दूसरी श्रीनगर बड़गाम लोकसभा की थी। श्रीनगर की सीट इसलिए खाली हुई कि सांसद तारिक हामिद कारा ने अपनी पार्टी पीपुल्स डेमोक्रेटिक पार्टी (पीडीपी) और संसद सदस्यता दोनों से इस्तीफा दे दिया था। उन्होंने इस्तीफा पार्टी के जनविरोधी नीतियों से तंग आकर दिया था। 

श्रीनगर लोकसभा सीट पर 9 अप्रैल को चुनाव हुआ तथा अनंतनाग सीट पर 12 अप्रैल को चुनाव होना था। यह चुनाव इसलिए महत्वूपर्ण था कि राज्य में संयुक्त मोर्चे की सरकार को ढाई साल हो चुके हैं और कश्मीर घाटी में होने वाले प्रदर्शनों के बाद पहला चुनाव था।

एक तरह से कश्मीरी जनता और सरकार दोनों के लिये यह परीक्षा की घड़ी थी। कश्मीर में हो रहे प्रदर्शन को भारत सरकार कहती थी अलगाववादियों द्वारा राज्य में पैसे बांट कर प्रदर्शन कराये जा रहे हैं। यहां तक की नोटबंदी के दौरान उस समय के रक्षा मंत्री रहे मनोहर पार्निकर ने कह दिया कि नोटबंदी से कश्मीर में पत्थरबाजी बंद हो गई है।

लेकिन श्रीनगर लोकसभा उपचुनाव में ​​करीब 7 फीसदी ​के वाटिंग सरकार के मुंह पर करारा तमाचा है जो जनता की भावनाओं को समझ नहीं पाई। ऐसा नहीं है कि यह पहली बार हो रहा है।

श्रीनगर लोकसभा चुनाव के आंकड़े पर नजर डालें तो 1998 में 30.1 प्रतिशत, 1999 में 11.9 प्रतिशत, 2004 में 18.6 प्रतिशत, 2009 में 25.6 प्रतिशत, 2014 में 25.9 प्रतिशत ही मतदान हुये हैं यानी बहुसंख्यक जनता ने भारत के ‘लोकतंत्र’ में आस्था नहीं दिखाई है।

इस बार के उपचुनाव में भारतीय ‘लोकतंत्र’ में आस्था रखने वाले लोगों में और कमी आई है और मतदान का प्रतिशत 6.5 प्रतिशत तक सिमट कर रह गया।

इसके उलटे वहां के विधानसभा चुनाव में लोगों ने मतदान किया है 1996 के विधानसभा चुनाव में 53.9 प्रतिशत, 2002 में 45.0 प्रतिशत, 2008 में 60.6 प्रतिशत तथा 2014 के चुनाव में 65.23 प्रतिशत लोगों ने मतदान किया। इन आंकड़ों से यह पता चलता है कि दिल्ली की संसद में लोगों की उतनी दिलचस्पी नहीं है जितना उनकी अपनी विधानसभा में।

यह चुनाव राजनीतिक दलों, भारत सरकार और राज्य सरकार के लिये भी महत्वपूर्ण है जहां सरकार की तीन साल की कार्यशैली के लिये जनादेश माना जा सकता है वहीं विपक्षी पार्टी कांग्रेस और नेशनल कॉन्फ्रेंस के लिये भी महत्वपूर्ण था कि इन दोनों पार्टी के साझा उम्मीदवार भूतपूर्व मुख्यमंत्री फारूख अब्दुल्ला स्वयं थे; यानी जो भी भारत की संसदीय पार्टी है इस चुनाव में अपनी आस्था प्रकट किया था फिर भी करीब 12 लाख 60 हजार मतदाताओं में से करीब 80 हजार मतदाताओं ने ही वोट डाले। लोगों ने साफ संदेश देने की कोशिश की है कि बुलेट और बैलेट साथ साथ नहीं चल सकता है।

गृह मंत्रालय अभी भी समस्याओं से मुंह छिपाते हुये इस स्थिति के लिए चुनाव आयोग जिम्मेदार मान रहा है। उन गालियों, हत्याओं और सरकार के खिलाफ बनते झुकाव को नहीं।

मंत्रालय के अनुसार उपचुनाव पंचायत चुनाव के बाद किया जाना चाहिये लेकिन चुनाव आयोग ने उसके सुझाव को अनदेखी करते हुये श्रीनगर और अनंतनाग का उपचुनाव 9 और 12 अप्रैल की घोषणा कर दी। गृहमंत्रालय ने 9 अप्रैल का चुनाव सम्पन्न कराने के लिये तीस हजार, अतिरिक्त अर्धसैनिक बल दिये थे फिर भी इतने बड़े पैमाने पर हिंसा हुई जिसमें 8 लोगों की जानें गई और 150 से ज्यादा लोग घायल हुये।

गृहमंत्रालय के अुनसार 1500 मतदान केन्द्र बनाए गये थे जिसमें से 120 पोलिंग बूथ में तोड़-फोड़ हुई और 24 ईवीएम मशीन लूटी गई, 190 जगह पत्थर फेंकने की हिंसक वादरात हुई। हिंसा की वजह से 38 पोलिंग बूथ पर दुबारा 13 अप्रैल को चुनाव कराया गया जिसमें 35169 मतदाता में से 709 मतदाताओं यानी दो प्रतिशत लोगों ने ही वोट डाला।

इसका मतलब है कि 10 फीसदी से भी कम जगहों मतदाता हिंसक हुए लेकिन ज्यादातर जगहों पर लोगों ने शांतिपूर्वक तरीके से इस उपचुनाव को नकार दिया।

मिलिटेंसी के दौर में भी कश्मीर में मत प्रतिशत इतना कम नहीं रहा है। चुनाव के बाद 10 अप्रैल को भी घाटी में बाजार, स्कूल व सरकारी दफ्तरें बंद रहें। वहां तैनात एक अफसर के अनुसार पिछले पन्द्रह सालों में इतनी हिंसा की वारदात एक दिन में नहीं हुई है। पूर्व मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला का कहना है कि बीस साल की राजनीतिक जीवन में चुनाव की इससे बदतर हालत उन्हांने देखा है इसके साथ ही वह केन्द्र व राज्य सरकार के साथ-साथ चुनाव आयोग को फेल बताया।

श्रीनगर के उपचुनाव के हालात को देखते हुये चुनाव आयोग अनंतनाग उपचुनाव को 12 अप्रैल से टालकर 25 मई कर दिया है। यह सीट महबूबा मुफ्ती के लिये भी नाक का सवाल है, इस सीट से महबूबा के भाई तसादुक हुसैन मुफ्ती चुनाव लड़ रहे हैं और इसी के सहारे दिल्ली के पार्लियामेंट तक पहुंचना चाहते हैं।

अब देखना होगा कि सरकार, चुनाव आयोग की क्या रणनीति होती है। इस चुनाव का फैसला चाहे जो भी आये लेकिन कश्मीरी जनता ने यह साफ संदेश देने की कोशिश की है कि बातचीत की जगह अगर बंदूक से उनकी आवाज को दबाया जायेगा तो वह इसका जवाब अपने तरीके से देने के लिये तैयार हैं।
editorjanjwar@gmail.com

Apr 14, 2017

गाल बजाने की बजाय केजरीवाल करें आत्मावलोकन

लोगों का आप से मोहभंग शुरू हो गया है और लोग फिर से उन्हीं पार्टियों की तरफ़ लौटने लगे हैं जिनकी अकर्ण्यमनता और भ्रष्टाचार से तंग आकर उन्होंने केजरीवाल को विकल्प के रूप अपनाया था।        
                                                                                                     
पीयूष पंत, वरिष्ठ पत्रकार

दिल्ली की राजौरी गार्डन विधान सभा सीट के लिए हुए उपचुनाव में आम आदमी पार्टी की हुयी करारी हार से  दिल्ली में पार्टी के भविष्य को लेकर सुगबुगाहट शुरू हो गयी है।  जो पार्टी दो साल पहले ही विधान सभा की 70 में से 67 सीटें जीत कर सत्ता में आई थी उसके प्रत्याशी द्वारा अपनी ज़मानत राशि गवां बैठना कोई छोटी-मोटी बात नहीं कही जा सकती।

आखिरकार 2015 में जिस पार्टी को इसी चुनाव क्षेत्र में 46.55 फीसदी वोट मिले थे उपचुनाव में उसे केवल 13.12  फीसद वोट से ही संतुष्ट होना पड़ा है। निसंदेह आप की लोकप्रियता में ये भारी गिरावट है कुछ उसी तरह की जैसी शेयर बाज़ार में गिरावट आती है जब निवेशक का विश्वास डोलने लगता है। तो क्या दिल्ली की जनता का आम आदमी पार्टी से मोहभंग होने लगा है ?

अगर गोवा के चुनाव में पार्टी का खराब प्रदर्शन और पंजाब के चुनाव में तमाम दावों के बावजूद मात्र 22 सीटों में जीत हासिल करने को भी पार्टी के भविष्य का आकलन करने के लिए शुमार किया जाय तो क्या यह कहा जा सकता है कि आम आदमी पार्टी का शिराज अब बिखर रहा है ?
जहां तक राजौरी गार्डन उप-चुनाव में पार्टी को मिली शिकस्त का सवाल है तो वोट प्रतिशत में आयी भारी गिरावट तो यही संकेत दे रही है कि धीरे-धीरे अब दिल्ली के लोगों का आप से मोहभंग शुरू हो गया है और लोग फिर से उन्हीं पार्टियों की तरफ़ लौटने लगे हैं जिनकी अकर्ण्यमनता और भ्रष्टाचार से तंग आकर उन्होंने आम आदमी पार्टी का विकल्प अपनाया था।

ग़ौर किया जाए तो कांग्रेस का जो वोट बैंक 2015 में पूरी तरह कांग्रेस का साथ छोड़ कर उम्मीदों भरी पार्टी आप के साथ चला गया था उसके एक बड़े हिस्से ने घर वापसी कर ली है।  यही कारण है कि कांग्रेस का मत प्रतिशत 2015 के 12 फीसद से लम्बी छलांग लगाते हुए 33.23 फीसद पर जा पहुंचा।  इसी तरह भारतीय जनता पार्टी का मत प्रतिशत 38.04 से बढ़ कर 51.99 पर जा पहुंचा।

इसका मतलब है कि राजौरी गार्डन चुनाव क्षेत्र के उच्च, मध्यम वर्ग के और अल्पसंख्यक समुदाय के उन लोगों का, जो आम आदमी पार्टी की साफ़-सुथरी और ईमानदार वैकल्पिक राजनीति की परिकल्पना से आकर्षित हो कर आम आदमी पार्टी की अप्रत्याशित जीत का कारण बने थे, पार्टी से मोहभंग हो चुका है। लेकिन आप प्रत्याशी हरजीत सिंह संभवतः उस निचले तबके का दस हज़ार वोट हासिल करने में सफल रहे जो आम आदमी का कोर सपोर्टर है और जिसे आम आदमी की सरकार द्वारा बिजली और पानी में दी गयी सब्सिडी का सबसे अधिक फ़ायदा पहुंचा है।

हालांकि मुख्यमंत्री केजरीवाल ने उप चुनाव से पहले ही नगर पालिका चुनावों के सन्दर्भ में यह बात कह कर अमीरों को रिझाने की कोशिश की थी कि वे दिल्ली में प्रॉपर्टी टैक्स ख़त्म कर देंगे लेकिन उसका भी असर राजौरी गार्डन के अमीरों पर पड़ता नहीं दिखाई दिया जबकि इस चुनाव क्षेत्र में अमीर पंजाबी और सिक्ख बनियों की भरमार है।

संभवतः आप की हार का सबसे बड़ा कारण रहा पूर्व विधायक जर्नेल सिंह का दिल्ली छोड़ कर पंजाब के चुनाव में कूद पड़ना। पहले से ही विधायक के कार्यों से पूरी तरह संतुष्ट न रहने वाले मतदाताओं ने इसे अपना अपमान माना। कभी जिस तरह अरविन्द केजरीवाल को दिल्ली के लोग भगोड़ा कहने लगे थे उसी तरह राजौरी गार्डन के लोग जर्नैल सिंह को भी भगोड़ा मानने लगे।

दूसरा बड़ा कारण रहा आप प्रत्याशी हरजीत सिंह का कद के स्तर  पर भाजपा प्रत्याशी मजिंदर सिंह सिरसा के सामने नहीं टिक पाना। सिरसा दिल्ली के चुनावी परिदृश्य में पुराने खिलाड़ी हैं। वो मूलतः शिरोमणी अकाली दल के सदस्य हैं। वो 2008 में जंगपुरा से विधान सभा का चुनाव लड़ कर हार चुके हैं। 2013 में उन्होंने राजौरी गार्डन से विधान सभा का चुनाव लड़ा और जीता लेकिन 2015 के विधान सभा चुनाव में वो आप के जर्नैल  सिंह से हार गए थे।

वैसे भी दिल्ली की गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी में शिरोमडी अकाली दल का दबदबा है जिसका अनुभव खुद केजरीवाल गुरूद्वारे के चुनाव लड़कर कर चुके हैं। दिल्ली के सिक्खों में गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी का खासा प्रभाव है। चूँकि सिरसा इस बार भाजपा प्रत्याशी के रूप में चुनाव लड़े थे इसलिए भाजपा वोट बैंक और अकाली दल वोट बैंक की मिली-जुली ताक़त ने उन्हें भारी जीत दिला दी।


तो क्या यह मान लिया जाय कि उप चुनाव में हुई आम आदमी पार्टी की हार दिल्ली के नगर निगम चुनाव में भी उसकी हार का सबब बनेंगे ? ज़रूरी नहीं है कि ऐसा हो। विधान सभा उप-चुनाव में मुद्दे दूसरे थे और नगर पालिका चुनाव में मुद्दे कुछ दूसरे हैं।

विधान सभा उप-चुनाव में आप के लिए नकारात्मक वोट पड़ा लेकिन नगर पालिका चुनावों में भारतीय जनता पार्टी नकारात्मक वोट का शिकार हो सकती है क्योंकि पिछले दस सालों से वहां इसकी सत्ता रही है जिसका अनुभव लोगों के लिए बहुत सुखद नहीं रहा है।

आप के लिए तो यह पहला चुनाव होगा। कुछ समय पहले नगर पालिका के लिए हुए उप-चुनावों में आम आदमी पार्टी ने खासी जीत हासिल की थी। वैसे भी नगर पालिकाओं के कई वार्डों में आम आदमी पार्टी के कोर वोटरों की बहुतायत है जिन्हें बिजली, पानी की सब्सिडी और सरकारी स्कूलों में की गयी बेहतरी का खासा फायदा पहुंचा है।

ऊपर से अरविन्द केजरीवाल ने दूर की कौड़ी ला कर दिल्ली में रहने वाले किरायदारों को अलग बिजली मीटर की व्यवस्था कर बिजली और पानी की सब्सिडी का पूरा फायदा पहुंचाने का वायदा किया है।  ग़ौरतलब है कि दिल्ली में बिहार और उत्तर प्रदेश से आये ऐसे हज़ारों विद्यार्थी और कामगार किराए के मकानों में रहते हैं जिनसे मकान मालिक बिजली और पानी का अनाप-शनाप दाम वसूलते हैं।
(editorjanjwar@gmail.com)

आंबेडकर ने लिखा है गो मांस खाते थे हिंदू



पिछले वर्ष आज के ही दिन 14 अप्रैल को आंबेडकर जयंती के अवसर पर बीबीसी हिंदी में यह लेख छपा था जिसमें मोदी जी के आदर्श बाबा साहब आंबेडकर ने गोमांस सेवन के बारे मेें बताया है...  

भारतीय संविधान के प्रमुख निर्माताओं में से एक डॉक्टर बीआर अंबेडकर अच्छे शोधकर्ता भी थे. उन्होंने गोमांस खाने के संबंध में एक निबंध लिखा था, 'क्या हिंदुओं ने कभी गोमांस नहीं खाया?'

यह निबंध उनकी किताब, 'अछूतः कौन थे और वे अछूत क्यों बने?' में है.

दिल्ली विश्वविद्यालय में राजनीति विज्ञान के प्रोफ़ेसर शम्सुल इस्लाम ने इस निबंध को संपादित कर इसके कुछ हिस्से बीबीसी हिंदी के पाठकों के लिए उपलब्ध करवाए हैं.

'पवित्र है इसलिए खाओ'

अपने इस लेख में अंबेडकर हिंदुओं के इस दावे को चुनौती देते हैं कि हिंदुओं ने कभी गोमांस नहीं खाया और गाय को हमेशा पवित्र माना है और उसे अघन्य (जिसे मारा नहीं जा सकता) की श्रेणी में रखा है.

अंबेडकर ने प्राचीन काल में हिंदुओं के गोमांस खाने की बात को साबित करने के लिए हिन्दू और बौद्ध धर्मग्रंथों का सहारा लिया.

उनके मुताबिक, "गाय को पवित्र माने जाने से पहले गाय को मारा जाता था. उन्होंने हिन्दू धर्मशास्त्रों के विख्यात विद्वान पीवी काणे का हवाला दिया. काणे ने लिखा है, ऐसा नहीं है कि वैदिक काल में गाय पवित्र नहीं थी, लेकिन उसकी पवित्रता के कारण ही बाजसनेई संहिता में कहा गया कि गोमांस को खाया जाना चाहिए." (मराठी में धर्म शास्त्र विचार, पृष्ठ-180).

अंबेडकर ने लिखा है, "ऋगवेद काल के आर्य खाने के लिए गाय को मारा करते थे, जो खुद ऋगवेद से ही स्पष्ट है."

ऋगवेद में (10. 86.14) में इंद्र कहते हैं, "उन्होंने एक बार 5 से ज़्यादा बैल पकाए'. ऋगवेद (10. 91.14) कहता है कि अग्नि के लिए घोड़े, बैल, सांड, बांझ गायों और भेड़ों की बलि दी गई. ऋगवेद (10. 72.6) से ऐसा लगता है कि गाय को तलवार या कुल्हाड़ी से मारा जाता था."

'अतिथि यानि गाय का हत्यारा'

अंबेडकर ने वैदिक ऋचाओं का हवाला दिया है जिनमें बलि देने के लिए गाय और सांड में से चुनने को कहा गया है.

अंबेडकर ने लिखा "तैत्रीय ब्राह्मण में बताई गई कामयेष्टियों में न सिर्फ़ बैल और गाय की बलि का उल्लेख है बल्कि यह भी बताया गया है कि किस देवता को किस तरह के बैल या गाय की बलि दी जानी चाहिए."

वो लिखते हैं, "विष्णु को बलि चढ़ाने के लिए बौना बैल, वृत्रासुर के संहारक के रूप में इंद्र को लटकते सींग वाले और माथे पर चमक वाले सांड, पुशन के लिए काली गाय, रुद्र के लिए लाल गाय आदि."

"तैत्रीय ब्राह्मण में एक और बलि का उल्लेख है जिसे पंचस्रदीय-सेवा बताया गया है. इसका सबसे महत्वपूर्ण तत्व है, पांच साल के बगैर कूबड़ वाले 17 बौने बैलों का बलिदान और जितनी चाहें उतनी तीन साल की बौनी बछियों का बलिदान."

अंबेडकर ने जिन वैदिक ग्रंथों का उल्लेख किया है उनके अनुसार मधुपर्क नाम का एक व्यंजन इन लोगों को अवश्य दिया जाना चाहिए- (1) ऋत्विज या बलि देने वाले ब्राह्मण (2) आचार्य-शिक्षक (3) दूल्हे (4) राजा (5) स्नातक और (6) मेज़बान को प्रिय कोई भी व्यक्ति.

कुछ लोग इस सूची में अतिथि को भी जोड़ते हैं.

मधुपर्क में "मांस, और वह भी गाय के मांस होता था. मेहमानों के लिए गाय को मारा जाना इस हद तक बढ़ गया था कि मेहमानों को 'गोघ्न' कहा जाने लगा था, जिसका अर्थ है गाय का हत्यारा."
'सब खाते थे गोमांस'

इस शोध के आधार पर अंबेडकर ने लिखा कि एक समय हिंदू गायों को मारा करते थे और गोमांस खाया करते थे जो बौद्ध सूत्रों में दिए गए यज्ञ के ब्यौरों से साफ़ है.

अंबेडकर ने लिखा है, "कुतादंत सुत्त से एक रेखाचित्र तैयार किया जा सकता है जिसमें गौतम बुद्ध एक ब्राह्मण कुतादंत से जानवरों की बलि न देने की प्रार्थना करते हैं."

अंबेडकर ने बौद्ध ग्रंथ संयुक्त निकाय(111. .1-9) के उस अंश का हवाला भी दिया है जिसमें कौशल के राजा पसेंडी के यज्ञ का ब्यौरा मिलता है.

संयुक्त निकाय में लिखा है, "पांच सौ सांड, पांच सौ बछड़े और कई बछियों, बकरियों और भेड़ों को बलि के लिए खंभे की ओर ले जाया गया."

अंत में अंबेडकर लिखते हैं, "इस सुबूत के साथ कोई संदेह नहीं कर सकता कि एक समय ऐसा था जब हिंदू, जिनमें ब्राह्मण और गैर-ब्राह्मण दोनों थे, न सिर्फ़ मांस बल्कि गोमांस भी खाते थे."