Apr 4, 2017

पंजाब सरकार जेठमलानी को एक पेशी पर 3 लाख 30 हजार देती है और दिल्ली सरकार 22 लाख

सवाल है कि 7 गुना ज्यादा फीस देने के पीछे असल मकसद क्या है? साधारण जन की सरकार होने का दावा करने वाले केजरीवाल अपने बचाव में इतने आलीशान क्यों हैं?

ईमानदार सरकार बनाने और राष्ट्र का पैसा भ्रष्टाचारियों से बचाने के नाम पर दिल्ली की सत्ता पर काबिज हुए अरविंद केजरीवाल इन दिनों दोनों हाथों से जनता का पैसा लुटा रहे हैं। अभी दिल्ली सरकार का 97 करोड़ रुपया आम आदमी पार्टी के प्रचार में खर्च कर देने का मामला शांत भी नहीं हुआ था कि सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठ वकील राम जेठमलानी हर पेशी पर 22 लाख रुपए देने का मामला सुर्खियों में है।

गौरतलब है कि केंद्रीय मंत्री अरुण जेटली ने दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल के​ खिलाफ मानहानी का मुकदमा किया हुआ है। मुख्यमंत्री की ओर से मुकदमा वरिष्ठ सुप्रीम कोर्ट वकील राम जेठमलानी लड़ रहे हैं। रामजेठमलानी देश के सबसे ​महंगे और ​काबिल वकीलों में माने जाते हैं। इसी के मद्देनजर दिल्ली सरकार ने उन्हें अपना वकील बनाया।

जेठमलानी ने पहले ही अपनी हर पेशी पर 22 लाख का रेट सरकार के सामने साफ कर दिया। दिल्ली राज्य के कानून मंत्री होने के नाते मनीष सिसौदिया ने वकील जेठमलानी की फीस देने पर लिखित स्वीकारोक्ति भी दे दी।

लेकिन बाद में जब सरकार पर तरह—तरह के शिकंजे कसने लगे तो केजरीवाल सरकार अतिरिक्त सावधान हो गयी। वैसे भी दिल्ली के राज्यपाल का वह आदेश जिसमें कहा गया है कि सरकार के नाम पर आम आदमी पार्टी ने जो अपना प्रचार किया है, उसमें लगे 97 करोड़ रुपए पार्टी 30 अप्रैल तक सरकार के खाते में जमा कराए, के बाद सरकार की सांसत बढ़ गयी है।  

ऐसे में जब दिल्ली सरकार ने अरविंद केजरीवाल पर हुए मानहानी का मुकदमा लड़े राम जेठमलानी की फीस बिल भेजने के बाद भी नहीं दिया तो वह पत्र सार्वजनिक हो गया। पत्र में साफ लिखा है कि जेठमलानी प्रति पेशी 22 लाख दिल्ली सरकार से वसुलेंगे।

पत्र के सार्वजनिक होने के बाद काननू मंत्री ​मनीष सिसौदिया ने मुख्यमंत्री का बचाव करते हुए कहा है कि मुकदमा सरकार पर है तो फीस भी सरकार ही वहन करेगी। पर भाजपा के वरिष्ठ नेता विजेंद्र गर्ग इसे जनता के पैसे की बर्बादी मानते हैं। वे कहते हैं मानहानी के मुकदमें सरकार के नहीं ​बल्कि व्यक्तिगत होते हैं।

गौरतलब है कि सोशल मीडिया पर राम जेठमलानी के निजी सचिव संजय कुमार द्वारा दिल्ली सरकार को भेजा एक बिल घूम रहा है जिसमें दिल्ली सरकार से जेठमलानी की एक सुनवाई का 22 लाख रुपए देने के लिए कहा गया है। हालांकि मामले पर हल्ला मचने पर जेठमलानी ने अपना रेट 1 करोड़ होना बताया है और साथ में यह भी कहा है कि अरुण जेटली के खिलाफ मुफ्त में भी मुकदमा लड़ सकते हैं। 


पर इस पूरे मामले में स्वराज अभियान के नेता और पंजाब—​हरियाणा हाईकोर्ट के वरिष्ठ वकील राजीव गोदारा कहते हैं, 'मुकदमा सरकार लड़े या व्यक्गित तौर पर अरविंद केजरीवाल पर असल सवाल यह है कि इतनी फीस क्यों दी जा रही है? यही जेठमलानी साहब पंजाब सरकार के पैनल में हैं और वह सिर्फ 3 लाख 30 हाजर प्रति पेशी लेते हैं।'  30 मार्च को पंजाब सरकार ने 76 वकीलों की एक सूची जारी की जिसमें रामजेठमलानी समेत कई दिग्गज पंजाब सरकार के पैनल पर हैं. 

ऐसे में मुख्य सवाल यह है कि जब पंजाब सरकार से जेठमलानी एक पेशी पर 3 लाख 30 हजार ले सकते हैं, फिर दिल्ली सरकार उससे 7 गुना फीस क्यों अदा कर रही है? क्या इसके पीछे भी कोई कहानी है या फिर 'ईमानदारी' के खोल में लिपटी दिल्ली सरकार इस भ्रष्टाचार को देख ही नहीं पा रही?

पुलिस और जांच एजेंसियों की ड्यूटी बनती जा रही भाजपा की वफादारी

न पीपी पांडे जैसे पुलिस अफसर आसमान से टपकते हैं और न अमित शाह जैसे उनके राजनीतिक पैरोकार| उत्तर प्रदेश चुनाव प्रचार के दौरान मोदी ने ठीक ही समाजवादी सरकार पर पुलिस थानों को पार्टी दफ्तरों के रूप में चलाने का आरोप लगाया था...

विकास नारायण राय, पूर्व आइपीएस 

सर्वोच्च न्यायालय में जूलियस रिबेरो की याचिका पर गुजरात के विवादास्पद डीजीपी पीपी पांडे को पद छोड़ना पड़ा और डीजीपी के पद पर सरकार को आनन-फानन में गीता जोहरी को बैठाना पड़ा. ऐसे में सवाल पूछा जा सकता है कि एक बदनाम हत्यारोपी पुलिस अफसर को, योग्यता और वरिष्ठता के मानदंडों को दरकिनार कर, राज्य पुलिस का मुखिया बनाने के पीछे क्या राजनीतिक सन्देश छिपा हुआ था | 

पांडे, अमित शाह के मोदी शासन में गुजरात के गृह राज्य मंत्री दौर में काफी समय तक राजनीतिक पुलिस मुठभेड़ों के लिए कुख्यात पुलिस अफसर वंजारा के वरिष्ठ रहे | बाद में इशरत जहान जैसे फर्जी मुठभेड़ कांडों में वे वंजारा के साथ गिरफ्तार किये गये और लम्बी जद्दोजहद के बाद जमानत मिलने पर कार्यवाहक डीजीपी बना दिए गये | जग जाहिर है कि आज तक भी गुजरात में शीर्ष पदों पर नियुक्तियां अमित शाह की मार्फत होती हैं | यानी प्रधानमंत्री मोदी की सुविधा को ध्यान में रखते हुए | पांडे को भी इस समीकरण के तहत ही डीजीपी बनाकर पुरस्कृत किया गया | 



मोदी-शाह की जोड़ी चाहती तो पांडे की हिंदुत्व के एजेंडे पर जेल जाने की भरपाई और तरह से भी कर सकती थी| पांडे के जमानत पर छूटने तक मोदी देश के प्रधानमंत्री बन चुके थे और शाह काबिज थे भाजपा के शक्तिमान अध्यक्ष के पद पर| उन्होंने यदि पांडे को तब भी राज्य पुलिस का मुखिया ही बनाना तय किया तो इस तरह वे अपने वफादारों के लिए दो संदेश दे रहे थे| पहला यह कि वे अपने वफादारों की सेवाओं को पुरस्कृत करना कभी नहीं भूलते, हालाँकि यह संदेश पांडे को सूचना आयुक्त या निगरानी आयुक्त या लोक सेवा आयोग में पदस्थापित कर भी दिया जा सकता था| लिहाजा,इस सन्दर्भ में मोदी-शाह का दूसरा सन्देश ज्यादा महत्वपूर्ण था| अंधवफादारी के आगे वरिष्ठता, योग्यता या नेकनामी का कोई महत्व नहीं है।

केंद्र में सत्ता मिलने के बाद से मोदी-शाह को कहीं बड़े गेम खेलने पड़े हैं| गुजरात प्रकरणों में कांग्रेस ने भी सीबीआई की मार्फत शाह को जेल में रखा था और मोदी के पसीने छुड़ा दिए थे| दरअसल, यूपीए दो के दौर में मनमोहन सरकार को सत्ता में रखने में सीबीआई की बड़ी भूमिका रही- मायावती और मुलायम को जब-तब जेल का डर दिखाकर और अपने शासन के तरह-तरह के स्कैम में सर्वोच्च न्यायालय के आदेश वाली जांचों को मन मुताबिक निर्देशित कर|

इस दौर में कांग्रेस सरकार ने सीबीआई को एपी सिंह और रंजीत सिन्हा के रूप में सीबीआई इतिहास के दो सर्वाधिक ‘लचीले’ डायरेक्टर दिए। फिलहाल,सर्वोच्च न्यायालय के आदेश से इन दोनों के भ्रष्ट आचरण की जांच स्वयं सीबीआई को ही करनी पड़ रही है| इसी क्रम में मोदी-शाह ने भी गुजरात के ही एक जूनियर पुलिस अफसर राकेश अस्थाना को सीबीआई का कार्यवाहक डायरेक्टर बनाकर रखा| 

जाहिर है, पांडे जैसे ही इस ‘वफादार’ की मार्फत वे कांग्रेस से भी बढ़कर अपना उल्लू सीधा करना चाहते रहे हों| सोचिये दांव पर कितना कुछ है कि यह सीनाजोरी तब की गयी जब भारत का मुख्य न्यायाधीश स्वयं सीबीआई का डायरेक्टर चुनने की समिति का हिस्सा होता है| अंततः उनका छद्म बहुत दिनों तक चला नहीं और सर्वोच्च न्यायालय के दखल के बाद वरिष्ठता के आधार पर एक नया डायरेक्टर लगाना पड़ा|

‘वफादारी’ का यह खेल उन्हें बेशक कांग्रेस ने सिखाया हो पर मोदी-शाह के तौर-तरीके कहीं अधिक निरंकुश हैं| उन्होंने सीबीआई के अलावा एकमात्र अन्य केन्द्रीय जांच एजेंसी एनआइए को भी पूरी तरह अपनी जकड़ में ले लिया है| कांग्रेस राज में एनआइएनेमालेगांव,समझौता एक्सप्रेस, मक्का मस्जिद,अजमेर शरीफ जैसे आतंकी मामलों में भगवा आतंक का हाथ सिद्ध किया था और तदनुसार संघ के असीमानंद और साध्वी प्रज्ञा समेत कई सदस्यों का अदालतों में चालान भी हुआ| 

केंद्र में मोदी सरकार बनते ही इन मुकदमों में अभियोजन के गवाहों को तोड़ने, संघी अभियुक्तों को जमानत दिलाने और उन्हें डिस्चार्ज कराने व बरी कराने का जिम्मा एनआइए के डायरेक्टर शरद कुमार ने उठा लिया| तब से असीमानंद अजमेर शरीफ मामले में बरी हो चुका है और प्रज्ञा को जमानत पर छोड़ने की अभूतपूर्व गुहार,जो स्वयं अभियोजक एजेंसी एनआइए कर चुकी है, अदालत ने ख़ारिज कर दी है| पुरस्कार स्वरूप शरद कुमार का सेवा काल दो वर्ष से लगातार बढ़ाया जा रहा है| 

मोदी-शाह को इसी स्तर की वफादारी चाहिए और इसलिए अपनी राजनीतिक साख की कीमत पर भी वे पीपी पांडे को गुजरात का एंटी करप्शन ब्यूरो के निदेशक बनाने से नहीं रुके| सोचिये, इस तरह उन्होंने शरद कुमार और राकेश अस्थाना जैसे कितने ही भावी ‘वफादारों’ को आश्वस्त किया होगा|

न पांडे जैसे पुलिस अफसर आसमान से टपकते हैं और न अमित शाह जैसे उनके राजनीतिक पैरोकार| उत्तर प्रदेश चुनाव प्रचार के दौरान मोदी ने ठीक ही समाजवादी सरकार पर पुलिस थानों को पार्टी दफ्तरों के रूप में चलाने का आरोप लगाया था| हालाँकि वे भूल गए कि गुजरात में स्वयं उनकी पार्टी भी पुलिस का व्यापक दुरुपयोग करती रही है| आज स्वयं केंद्र में सीबीआई और एनआइए अमित शाह के इशारे पर चलने वाली जांच एजेंसियां बनी हुयी हैं| गुजरात पुलिस का तो कहना ही क्या!

वो दिन जिसके बाद केजरीवाल ने मोदी के खिलाफ एक भी ट्वीट नहीं किया


जनज्वार। यह खबर कई लोगों को चौंका सकती है। लग सकता है कि मोदी विरोध के सबसे मजबूत पिलर केजरीवाल अाखिर प्रधानमंत्री मोदी के खिलाफ क्यों नहीं लिखेंगे? क्यों चुप्पी साध जाएंगे? पर सच यही है। और अगर सच यही है तो सोचने वाली बात यह है कि इसके निहितार्थ क्या हैं, क्योंकर केजरीवाल को मोदी के खिलाफ अगिया बैताल बने रहने की अपनी रणनीति से सरेंडर करना पड़ा। 

हर रोज मोदी के खिलाफ 5 से 10 ट्वीट और रि—ट्वीट कर उनकी नीतियों, तरीकों और बयानबाजियों पर आग उगलने वाले, मखौल उड़ाने और आलोचना करने वाले केजरीवाल उस तारीख के बाद आज तक कभी मोदी के खिलाफ एक ट्वीट नहीं कर सके हैं। अलबत्ता ये कहना ज्यादा बेहतर होगा कि दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल को उस तारीख के बाद कोई एक तारीख नहीं मिली जब वे मोदी के खिलाफ एक शब्द भी ट्वीटर पर लिख पाने का साहस कर पाएं हों। 

आप खुद भी 11 मार्च और उसके बाद के उनके ट्वीट 'https://twitter.com/ArvindKejriwal' चेक कर सकते हैं। 
11 मार्च को 5 राज्यों उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड, पंजाब, गोवा और मणिपुर के चुनाव परिणाम आए। पांच में से 2 राज्यों पंजाब और गोवा में आप ने चुनाव लड़ा। गोवा को छोड़ दें तो पंजाब के बारे में अरविंद केजरीवाल और उनके पार्टी के सभी कद्दावर नेता आश्वस्त थे कि वो सरकार बनाएंगे। अतिउत्साह की कोई सीमा नहीं थी। गोवा में भी कि मुख्य विपक्षी दल बनने को लेकर अरविंद केजरीवाल आश्वस्त थे। 

पर चुनाव परिणामों में आप पंजाब में मुख्य विपक्षी पार्टी बन पाई और गोवा में खाता ही नहीं खुला। एक राज्य में विपक्षी बनने और दूसरे में खाता नहीं खुल पाने से आहत अरविंद केजरीवाल ने 11 मार्च को एक भी ट्ववीट नहीं किया। 

जनज्वार ने मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल के 4 फरवरी से लेकर अबतक के सभी ट्वीट चेक किए। 4 फरवरी तक का इसलिए कि उसके बाद का ट्वीट दिख नहीं रहा है। केजरीवाल प्रतिदिन 14 से 35 ट्वीट और रि—ट्वीट करते हैं। 4 फरवरी से लेकर 9 मार्च तक उन्होंने हर रोज 5 से 10 ट्वीट मोदी के खिलाफ किए हैं। मजाक उड़ाया है, हंसी की है या फिर मोदी को ओछी राजनीति करने से बाज आने की हिदायत दी है ।

10 मार्च को केजरीवाल ने खुद के द्वारा दिल्ली एक विधानसभा में रैली संबोधित करने वाला ट्वीट किया। 

पांच राज्यों के चुनाव परिणामों के दिन 11 मार्च को केजरीवाल का ट्वीट चुप रहा। उस दिन एक भी ट्वीट अरविंद केजरीवाल ने नहीं किया। 

वह सीधे 12 मार्च को ट्वीटर पर एक वैशाखी के साथ अवतरित हुए। वह भी अपने एक दुश्मन के रि—ट्वीट की वैशाखी के साथ, जिनको कि अरविंद केजरीवाल ने पार्टी में रहते हुए बेइज्जत कर अपने गुर्गों से बाहर करा दिया था। 

जी हां, आप के पूर्व वरिष्ठ नेता और स्वराज अभियान के अध्यक्ष प्रशांत भूषण का एक ट्वीट इनके लिए तिनके का सहारा बना, जिसमें प्रशांत भूषन ने ईवीएम पर सवाल उठाए थे और भाजपा को वे दिन याद दिलाए जब भाजपा ने भी 2009 में लोकसभा चुनाव हारने के बाद ईवीएम पर सवाल उठाए थे।  

Arvind Kejriwal Retweeted
Prashant Bhushan‏Verified account @pbhushan1 Mar 12

Those who screamed "Democracy at risk due to EVMs" while in opposition, are now celebrating "Democracy by EVMs", once in power!

प्रशांत भूषण से मिले तिनके के सहारे की बदौलत आज भी अ​रविंद केजरीवाल ईवीएम पर सवाल दागे फिर रहे हैं। पर आम आदमी पार्टी का संस्कार देखिए कि केजरीवाल के ही मंत्री कपिल मिश्रा, प्रशांत भूषण के कृष्ण और रोमियो वाले बयान को आपराधिक कृत्य बताते हुए उन्हें जेल भेजने के लिए प्रशासन से अपील कर रहे हैं। 

आइए आपको 11 मार्च से पहले के कुछ ट्ववीट पढ़वाते हैं कि हार के बाद प्रधानमंत्री मोदी को लेकर मुख्यमंत्री केजरीवाल का रुख अब कैसे बिल्कुल बदल गया है। उनको एक हार ने रणनीतिक यू टर्न लेने पर कैसे मजबूर कर दिया है...


मार्च 9 
 Arvind Kejriwal Retweeted
Kapil Mishra‏Verified account @KapilMishraAAP Mar 9

मोदी जी के दबाव में रोका गया रामकिशन जी परिवार को सहायता का प्रस्ताव । परदे के पीछे से राजनीति न करें। चुनी हुई सरकार का सम्मान करना सीखें।

मार्च 9
Arvind Kejriwal tweeted
आप सैनिकों को ढंग का खाना तक नहीं देते, हमें क्यों रोक रहे हैं : 


मार्च 7 
 Arvind Kejriwal Retweeted
Jignesh Mevani‏ @jigneshmevani80 Mar 7

#womensday2017 Modi Ji will be giving 'upadesh' to hundreds of Mahila sarpanch of Gujarat but will not utter a word about naliya sex scam


मार्च 5
 Arvind Kejriwal Retweeted
ASHUTOSH MISHRA‏ @ashu3page Mar 5

ASHUTOSH MISHRA Retweeted ASHUTOSH MISHRA

अरविंद केजरीवाल के बाद अखिलेश यादव दूसरे ऐसे मुख्यमंत्री हैं जिन्हे किसी भी हाल मे हराने के लिए पीएम मोदी ने अपना सब कुछ दांव पर लगा दिया है

मार्च 4 
Arvind Kejriwal Retweeted
Aarti‏ @aartic02 Mar 4
Replying to @ArvindKejriwal

.@ArvindKejriwal Media Channels are showing Modi's Rally on Polling Day, VC campaigning for Modi ~ Shame 🤔🤔
85 replies 591 retweets 628 likes
/status/837951102444257280 …

फरवरी 27
Arvind Kejriwal Retweeted
Shabnam hashmi‏ @ShabnamHashmi Feb 27

साल का बेस्ट स्टेटमेंट - 

मोदी को अगर लगता है कि गोरखपुर में बिजली नहीं आती तो कोई तार पकड़कर चेक कर लें' 
-अखिलेश

फरवरी 25 
Arvind Kejriwal Retweeted
Bhagwant Mann‏Verified account @BhagwantMann Feb 25

( Breaking News):पूरे देश के गधों ने की बगावत..कहा मोदी अपनी हद में रहें हम मेहनत की रोटी खाते हैं ...राममंदिर का चंदा नही..
गदेश बदल रहा है

फरवरी 22 
Arvind Kejriwal‏Verified account @ArvindKejriwal Feb 22
जो प्रधानमंत्री नोट ठीक से नहीं छाप सकता वो देश क्या चलाएगा। पूरे देश का मज़ाक़ बना के रख दिया।

फरवरी 20
Arvind Kejriwal Retweeted
Bhagwant Mann‏Verified account @BhagwantMann Feb 20
विकास के मुद्दे से भटक गए साहेब..सीटों के लालच में लटक गए साहेब..बातें अब श्मशान की होने लगी है..अपने ही वादे गटक गए साहेब..
देश बदल रहा है.

फरवरी 19
Arvind Kejriwal‏Verified account @ArvindKejriwal Feb 19
मोदी जी का ये बयान दिखाता है की भाजपा UP में बुरी तरह हार रही है और मोदी जी बहुत नर्वस हैं

फरवरी 16
Arvind Kejriwal‏Verified account @ArvindKejriwal Feb 16
मोदी जी ने ISI से पठानकोट की जाँच कराई, नवाज़ शरीफ़ के जन्मदिन पर उनके घर गए और अब भाजपा के लोग ISI के लिए जासूसी करते पकड़े गए?

फरवरी 15 
Arvind Kejriwal Retweeted Feb 15
मोदी के तमाम अडंगों के बावजूद भी गरीबो के लिए काम करती रही केजरीवाल सरकार ।

फरवरी 12 
Arvind Kejriwal Retweeted
Modi's note ban was the biggest scam of 2016, says P Chidambaram

फरवरी 10 
Arvind Kejriwal‏Verified account @ArvindKejriwal
आप कांग्रेसियों पर ऐक्शन नहीं लेते, उनसे डरते क्यों हो? चुनाव के पहले उन्हें खोखली धमकियाँ देते हो। लगता है आपकी जन्मपत्री उनके पास पड़ी है

फरवरी 6 
Arvind Kejriwal‏Verified account @ArvindKejriwal Feb 6
मोदी जी, आपकी तमाम अड़चनों के बावजूद हमने दिल्ली के ग़रीबों को पक्के मकान देने शुरू कर दिए। आप अपना धर्म कीजिए, हम अपना करेंगे।

फरवरी 5 
Sanjay Singh AAP‏Verified account @SanjayAzadSln Feb 5 
अमित शाह की रैली फ़्लॉप BJP की UP में 50 से कम सीटें आयेंगी https://www.facebook.com/azadsanjaysingh/posts/358458334540184 …

फरवरी 4  
Arvind Kejriwal Retweeted
History of India‏ @RealHistoryPic Feb 4

Young Narendra Modi selling "Chai" to Young Vijay Malaya at Sabarmati River Front, Gujarat.(1980)

Apr 3, 2017

पहले अपनी सरकार को रोमियो मुक्त करो योगी जी

आरएसएस के मंच से जैन स्वामी तरुण सागर ने जब यह कृष्ण का यह चरित्र चित्रण किया था तब संघ वाले कहां थे
अखिलेन्द्र प्रताप सिंह
स्वराज अभियान, सदस्य राष्ट्रीय कार्यकारिणी 

छेड़खानी से लेकर औरतों पर गंभीर अपराध के कई मुकदमें योगी के मंत्रियों और विधायकों पर दर्ज हैं, क्या एक्शन में रहने वाले योगी उनके खिलाफ भी कोई कार्यवाही करेंगे...

रोमियों स्क्वायड पर दिए गए प्रशांत भूषण के बयान पर तूफान खड़ा करना और उनके खिलाफ ढ़ेर सारे एफआईआर दर्ज कराना चितांजनक है। प्रशांत भूषण सरकार और कारपोरेट के भ्रष्टाचार के खिलाफ मुखर रहे है और उन्होंने राफेल हेलीकाफ्टर सौदा, सहारा-बिरला डायरी, अरूणाचल प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री कालिखों पुल की आत्महत्या की जांच की बात बराबर उठाते रहे हैं।

ऐसे में उनके खिलाफ चलाए जा रहे अभियान की राजनीति को समझना बेहद जरूरी है।

एंटी रोमियों स्क्वांड कार्यवाही उप्र में और सूबे के बाहर भी चर्चा में है। भाजपा के लोग बढ़-चढ़ कर बोल रहे हैं कि प्रदेश की कानून व्यवस्था पटरी पर आ गयी है। महिलाएं सुरक्षित महसूस कर रही हैं, चौतरफा अमन-चैन है। योगी की सरकार बने पन्द्रह दिन हो रहे हैं और इन पंद्रह दिनों में कुछ ताजातरीन घटनाएं भी अखबारों के माध्यम से लोगों के सामने आयी है।

2 अप्रैल के अमर उजाला और जनसत्ता में छपी खबर के अनुसार पश्चिमी उत्तर प्रदेश के भाजपा विधायक ने अपनी भांजी के साथ दुष्कर्म की कोशिश की। प्रदेश में एक पुलिस इंस्पेक्टर ने लड़की के साथ अश्लील हरकतें की। 24 मार्च के अखबारों में छपी खबर के अनुसार इलाहाबाद से लखनऊ आने वाली भीड़-भाड़ भरी गंगा गोमती एक्सप्रेस में 23 मार्च को सुबह गैंगरेप व एसिड अटैक पीड़िता को जबरन तेजाब पिलाने की घटना हुई और देर रात तक पीड़िता पर हमला करने वालों पर मुकदमा दर्ज नहीं हुआ। अमर उजाला में छपी खबर के अनुसार 26 मार्च को आजमगढ़ में बीए की छात्रा का सिगरेट से चेहरा जला दिया गया।

तब जरूर सोचना होगा कि एंटी रोमियों स्क्वांड का गठन महिलाओं में कितनी सुरक्षा का भाव पैदा कर पा रहा है। दरअसल आम आदमी और महिलाओं की सुरक्षा का सवाल महज पुलिस की कार्यवाही चाहे वह एंटी रोमियों स्क्वायड के नाम से ही क्यों न हो, हल नहीं किया जा सकता। सुरक्षा के सवाल का हल और गहराई से जांच पड़ताल की मांग करता है।

उत्तर प्रदेश में जो लोग शासन कर रहे है उनके सामाजिक और राजनीतिक जीवन को भी समझने की जरूरत है। चुनावों में दिए शपथ पत्र के आधार पर तैयार एसोसिएशन फार डेमोक्रेटिक रिफार्म की रिपोर्ट कहती है कि भाजपा के जीते 312 विधायकों में 114 का आपराधिक इतिहास है जिसमें से 83 विधायक गम्भीर अपराधों में लिप्त हैं, जिसमें महिलाओं पर अत्याचार व छेड़खानी के भी मुकदमें है।

योगी सरकार के 20 मंत्रियों पर आपराधिक मुकदमें दर्ज है जिसमें मुख्यमंत्री और उपमुख्यमंत्री भी आते है। यदि इन्हें राजनीतिक विद्वेषवश लगाए मुकदमें कहकर भाजपा पिण्ड़ छुड़ाना चाहे तो गायत्री प्रजापति से उसका मामला भिन्न कैसे हो जाता है। सामंती, लम्पट, माफिया तत्व जिन्होंने चुनाव जीतने की कूबत हासिल कर ली है। उन्हें चुनाव जीतने की काबिलियत के आधार पर भाजपा ने टिकट अन्य दलों की तरह दिया है तो वह सूबे को अपराधमुक्त कैसे कर सकती है।

ऐसे लोंगो का चरित्र ही अय्याशी, गुडंई और अन्य लोंगो पर दमन का होता है। इन लोगों के बल पर कानून का राज कायम करना महज एक छलावा है। समाज और राजनीति का जनतंत्रीकरण ही समाज में अमन चैन और कानून के राज की स्थापना कर सकता है।

जाहिर है प्रशांत भूषण से खौफ खाने वाले कृष्ण प्रकरण के बहाने उन्हें बदनाम कर रहे हैं। उन्हें खुशफहमी है कि प्रशांत भूषण को पसंद करने वाले और उनके साहस व सच के साथ खड़े होने वाले इस षडयंत्र से भ्रम में पड़ जाएंगे। पर ध्यान रखना चाहिए कि कई सरकारें इस मुगालते में निपट गयीं।

टाटा मोटर्स ने 6000 कर्मचारियों को नौकरी से निकाला


जनज्वार। देश का पर्यावरण दुरुस्त हो और लोगों को साफ हवा मिले इसकी भरपाई उन हजारों मजदूरों अपना पेट काटकर करनी पड़ रही है जिनकी कंपनियां सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद बंद हो गयी हैं।

भारत स्टेज (बीएस 3)  मानकों वाले दो और चार पहिया वाहनों को सुप्रीम कोर्ट द्वारा बंद किए जाने के दिए गए आदेश के बाद टाटा मोटर्स की सिर्फ जमशेदपुर युनिट ने करीब अस्थायी 6 हजार मजदूरों को नौकरी से निकाल दिया है। कंपनी का कहना है कि कोर्ट के आदेश के बाद से वाहन उत्पादन का काम बंद हो चुका है। हर साल यहां 80 हजार गाड़ियां तैयार होती हैं।

29 मार्च को सुप्रीम कोर्ट ने एक आदेश में कहा कि 1 अप्रैल से बीएस 3 वाहनों का उत्पादन और बिक्री बंद हो कर दी जाये। पर्यावरणविदों और प्रदुषण नियंत्रक संस्थाओं ने कोर्ट को बताया था कि प्रदुषण का एक बड़ा कारन बीएस ३ वाहनों से निकलने वाला वायु प्रदुषण है. कोर्ट ने आदेश देते हुए टिप्पणी की थी कि कंपनियों के आर्थिक फायदे से ज्यादा जरूरी है लोगों का स्वास्थ्य। गौरतलब है कि बीएस 3 मानकों वाली बाइक और चार पहिया वाहनों में अधिक प्रदुषण निकलता है।

कोर्ट के इस फैसले के बाद बीए 3 मानकों वाली बाइक और चार पहिया बनाने वाली कंपनियों में अफरा—तफरी मच गयी। शो रूम मालिकों के यहां सस्ती गाड़ियां खरीदने वालों की भरमार हो गयी क्योंकि  31 मार्च के बाद बीएस 3 मानकों वाले गाड़ियों को बेचना संभव नहीं था।

इस अफरा—तफरी में शो रूम मालिकों ने रातों—रात करोड़ों का धंधा कर लिया जो वे एक साल में भी नहीं कर पाते। पर इस फैसले की सबसे बड़ी मार मजदूरों पर पड़ी जिसकी कहीं कोई चर्चा नहीं है।

अकेले टाटा मोटर्स की जमशेदपुर युनिट ने अपने यहां काम करने वाले 6 हजार कैजुअल और ठेका मजदूरों को एक झटके में निकाल दिया।

इसके अलावा टाटा का यह निर्णय आदित्यपुर औद्योगिक क्षेत्र विकास प्राधिकरण (एआईएडीए) में करीब 800 सहायक इकाइयों के भाग्य पर बहुत खराब असल डालेगा और वहां भी छंटनी होगी। ये इकाइयां बड़े पैमाने पर टाटा मोटर्स पर निर्भर हैं।

इतनी बड़ी छंटनी के खिलाफ मजदूर एकजुट न हो जाएं इसको ध्यान में रखते हुए टाटा माटर्स ने परमानेंट कर्मचारियों को 30 मार्च से 3 अप्रैल तक 4 दिन की छुट्टी पर भेज दिया। प्रबंधन ने नोटिस जारी कर कहा कि स्थायी कर्मचारी 4 अप्रैल को ड्यूटी पर आएं।

Apr 2, 2017

देश का पहला छात्रसंघ जो प्रवेश परीक्षा की कराता है तैयारी

विभिन्न शैक्षणिक पाठ्यक्रमों के लिए कराई जाने वाली तैयारियों की कक्षाएं 5 अप्रैल से शुरू होकर मई के पहले सप्ताह तक चलेंगी...


देश के प्रतिष्ठित विश्वविद्यालय जेएनयू में पहला ऐसा छात्रसंघ है, जो वहां पढ़ने के इच्छुक छात्रों की प्रवेश परीक्षा को आसान बनाने के लिए निशुल्क तै​यारियांं करवाता है। 

छात्र कार्यकर्ताओं के मुताबिक वे ऐसा वंचित पृष्ठभूमि से संबंध रखने वाले ऐसे छात्रों के मद्देनजर करते हैं, जो प्रवेश परीक्षाओं के लिए मोटी—मोटी फीस वसूलने वाले कोचिंग्स सेंटर में तैयारियां नहीं कर पाते हैं। हालांकि छात्रसंघ सिर्फ गरीब छात्रों को ही तैयारी नहीं करवाता, बल्कि इन कक्षाओं में कोई भी छात्र नि:शुल्क तैयारी कर सकता है।

विभिन्न शैक्षणिक पाठ्यक्रमों के लिए कराई जाने वाली तैयारियों की कक्षाएं 5 अप्रैल से शुरू होकर मई के पहले सप्ताह तक चलेंगी। इच्छुक छात्रों को कोर्स का नाम और संबंधित जानकारी जेएनयू छात्रसंघ आफिस में पहले ही दर्ज करनी होती है।  

जेएनयू छात्रसंघ से जुड़े सीनियर छात्रों ने एक पर्चा निकालकर अपील की है कि जो छात्र तैयारी के इच्छुक हैं और छात्र कार्यकर्ताओं से प्रवेश परीक्षाओं के लिए मदद लेना चाहते हैं, वो जल्द से जल्द संबंधित जानकारी दे दें। साथ ही उन्होंने प्रवेश परीक्षा करवाने वाले छात्रों के फोन नंबर भी पर्चे में दर्ज किये हैं, ताकि इच्छुक छात्रों को उनसे संपर्क करने में कोई कठिनाई न हो। 

गौरतलब है कि लंबे समय से लगातार विवादों में रहे जेएनयू में पिछले दिनों एमफिल/पीएचडी की भारी संख्या में सीटें कम कर दी गई हैं, ऐसे में स्नातकोत्तर पाठ्यक्रमों के लिए जेएनयू में पढ़ने के ​इच्छुक छात्रों के लिए छात्रसंघ की इस पहल को सकारात्मक कहा जा सकता है, खासतौर पर वंचित पृष्ठभूमि से आने वाले छात्रोंं के लिए। 

हालात यही रहे तो इंदौर जेल के कैदी होते जाएंगे टीबी मरीज

चूने से साफ करने पड़ते हैं दांत, नहीं मिलता भरपेट खाना, सभी कैदियों का गिर रहा लगातार वजन  

इंदौर जेल से लौटकर दीपक असीम की रिपोर्ट 

इंदौर के पत्रकार दीपक असीम वही शख्स हैं जिनको ओशो का लिखा अपने अखबार में छापने पर हिंदूवादियों ने जेल पहुंचवा दिया था। उन्हें 4 से 12 मार्च तक जेल में रहना पड़ा। जेल में रहने के दौरान हुए अनुभवों को उन्होंने जनज्वार से साझा किया है। उन अनुभवों को हम इसलिए भी प्रकाशित कर रहे हैं कि जेल की स्थितियों को लेकर जो काम एक खोजी पत्रकार को करना चाहिए था, उसे बहुत ही शानदार तरीके से एक कैदी रहते हुए दीपम असीम ने किया है। रिपोर्ट तीन किस्तों में प्रकाशित होगी, पेश है पहली किस्त... 


इस बार जब जेल गया तो डरा हुआ था। जो आदमी देवी-देवताओंं के अपमान के (झूठे ही सही) आरोप में जेल गया हो, उसे अंदर उन कैदियों से खतरा हो सकता है, जो रोज़ शाम को ज़मानत और रिहाई की आस में आवाज़े बाबुलंद में आरती करते हों और चोटी भी रखते हों।  जब ऐसे कैदी पूछते थे कि धारा २९५ ए का क्या मतलब होता है और मतलब सुनकर भड़कने लगते थे, तो अपनेराम यही पूछते थे कि आप खुद बताइये, क्या पुलिस जो आरोप लगाती है, वो सच्चे होते हैं? इतना सुनकर ही वे हलवा हो जाते थे। फिर उनका सवाल यह होता था - आखिर आपको पुलिस ने फंसाया क्यों? फिर वे खुद बताने लगते थे कि उन्हें क्यों फंसाया गया है। 

तो एक तो यह पुलिस वाली तरकीब काम कर गई। दूसरी राहत यह रही कि सेंट्रल जेल में इस समय कोई बड़ा दादा-पहलवान नहीं है। किसी की नक्शेबाजी अब इस जेल में नहीं चलती। जो सीओ (पुराने कैदी) पहले 'नई आमद' को मारते-कूटते थे, वो सब भी अब एकदम बंद...। पहले कैदी की हैसियत देख कर उसके घर से पैसा मंगाने का रैकेट चलता था। वो रैकेट भी अब बिल्कुल खत्म हो चुका है। 

अपन वहां 12  दिन रहे। बारह दिनों में यही देखा कि अव्वल तो शेर बचे ही नहीं हैं और जो शेर हैं, वो बकरी की खाल ओढ़ कर रह रहे हैं। जिन रोटियों को पहले जलाकर अपना खाना अलग बनाया जाता था, उन रोटियों की कीमत हो गई है। उन रोटियों को अब बचा कर रखा जाता है और कैदी नाश्ते बतौर जब भूख लग जाए खा लेते हैं। 

अव्वल तो पांच रोटियां कैदियों को कम पड़ती हैं, क्योंकि बाहर के खाने पर पूरी तरह पाबंदी लगा दी गई है। पाबंदी इतनी सख्त है कि नमक तक के लिए लोग तरसते हैं। भोपाल में जब से सिमी के कैदियों का एनकाउंटर हुआ, तब से जेल के नियम बहुत सख्त हो गए हैं। चूंकि भोपाल में यह कहा गया था कि कैदियों ने टूथ ब्रश से चाबी बना ली सो यहां के सभी कैदियों से टूथब्रश धऱवा लिये गए। कहा गया था कि तौलियों से रस्सी बना ली, सो सारे तौलिये जब्त। 

हालांकि जो काम तौलिये जोड़ कर हो सकता है, वो चादर जोड़ कर भी हो सकता है। पेस्ट भी नहीं मिलता। कैदी ऐसे पाउडर से दांत साफ करते हैं, जो मुंह पर लग कर होंठ  फाड़ देता है (शायद चूना है)। सो कैदियों के मुंह बास रहे हैं। नहाएं तो बदन कैसे पोछें? तेल कंघा साबुन छीन लिया गया है और जेल में खोपरे का जो तेल मिलता है, उसमें पाम आइल मिला होता है। इसे चेहरे पर लगाओ तो चेहरा काला पड़ जाता है और चमड़ी फटने लगती है। 

कैदियों से उनका सारा सामान छीन लिया गया है। जिस थाली में खाना खाते हैं, चाय तक कैदी उसी से पी रहे हैं। शौचालय में इस्तेमाल होने वाली पानी की बोतलें तक कम पड़ने लगी हैं। मगर जेल नियमों के खिलाफ कोई चूं तक नहीं कर सकता। 

जेल नियमों के हिसाब से कैदी की खुराक पर एक दिन में लगभग 140 रुपये खर्च करने का प्रावधान है, जो वाकई अगर ईमानदारी सो हो, तो कैदी आराम से रह सकते हैं, मगर मात्र बीस-पच्चीस रुपये ही कैदी की खुराक पर खर्च हो रहे हैं। पांच रोटियां (जो गेंहू में न जाने कौन से आटे की मिलावट से बनाई जाती हैं), एक डंका पतली पानी जैसी दाल और एक पतली पानी जैसी ही सब्जी। 

एक कैदी की खुराक में दिन भर में तीस ग्राम खाने का तेल होना चाहिए, मगर तीन ग्राम भी नहीं होता। तीन मिलीग्राम शायद होता हो। अगर कोई पुराना कैदी सब्जी की तरी निकाल ले, तो उसकी पिटाई हो जाती है। कैदियों का वजन तेजी से कम हो रहा है। दस्तावेज के हिसाब से अपन जब 4 मार्च को जेल गए थे, तब वजन था सौ किलो और 14 मार्च की दोपहर को जब जेल में वजन हुआ तो वजन बैठा 92  किलो। 

मोटे आदमी के लिए यह कमाई है कि दस दिनों में वजन आठ किलो कम हो जाए। मगर जो बेचारे पहले ही दुबले हैं, उनके लिए तो यह डेढ़ आषाढ से भी बदतर है। बहुत से कैदियों ने बताया कि जब हम जेल आए थे तो हमारा वजन ज्यादा था, जो भोपाल वाली घटना के बाद तेजी से कम हुआ है और लगातार हो रहा है। 

पर जेल प्रशासन पर सख्ती की सनक सी सवार है। वो कुछ सुनने को तैयार नहीं है। कुछ पुराने कैदी कहते हैं कि अगर यही हाल रहा तो कुछ महीने में कैदी टीबी से मरने लगेंगे। बहरहाल कुछ कैदियों ने पहचान लिया कि ये साहब तो पहले भी आ चुके हैं और गुल खिला चुके हैं। मगर ये वाला किस्सा कल के लिए...। 

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कोर्ट का सवाल, सांप्रदायिक दंगों में योगी के​​ खिलाफ क्यों नहीं शुरू हुई जांच

लखनऊ 1 अप्रैल 2017।  इलाहाबाद हाईकोर्ट ने योगी आदित्यनाथ के खिलाफ साम्प्रदायिक हिंसा फैलाने के आरोपों की जांच के लिए 153 (ए) के तहत सरकार द्वारा अनुमति देने पर सवाल किया है। इस मामले में 31 मार्च को एक याचिका की सुनवाई करते हुए उच्च अदालत ने सरकार से तीन हफ्ते के भीतर जवाब मांगा कि  प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के खिलाफ सीबीसीआईडी जांच क्यों नहीं हुई ? 

सांप्रदायिक हिंसा के खिलाफ सक्रिय संगठन रिहाई मंच ने इलाहाबाद हाईकोर्ट इस फैसले का स्वागत किया है। सामाजिक कार्यकर्ता परवेज परवाज और असद हयात ने 2007 में गोरखपुर में हुए साम्प्रदायिक हिंसा को लेकर अदालत में याचिका दायर कर मांग की थी कि इस मामले में आदित्यनाथ के खिलाफ मुकदमा दर्ज कर जांच की जाए। 


याचिका की सुनवाई के दौरान कोर्ट ने सरकार से जानना चाहा कि योगी और अन्य आरोपियों के खिलाफ सीबीसीआईडी जांच के लिए 153 (ए) के तहत सरकार ने अबतक अनुमति क्यों नहीं दी। 153 (ए) आईपीसी के तहत साम्प्रदायिक भड़काऊ भाषण के आरोप में न्यूनतम तीन साल की सजा का प्रावधान है। लेकिन इस मामले में कोर्ट तभी संज्ञान लेती है जब राज्य या केंद्र सरकार मुकदमें की मंजूरी देती हो।

मुकदमे की पृष्ठभूमि बताते हुए रिहाई मंच के महासचिव राजीव यादव कहते हैं कि 27 जनवरी 2007 की रात गोरखपुर रेलवे स्टेशन पर योगी आदित्यनाथ ने गोरखपुर विधायक राधामोहन दास अग्रवाल और गोरखपुर की मेयर अंजू चौधरी की मौजूदगी में हिंसा फैलाने वाला भाषण दिया। भाषण के दौरान मुख्यमंत्री योगी ने हिंदुओं को उकसाते हुए कहा कि वो मुहर्रम में ताजिया नहीं उठने देंगे और खून की होली खेलेंगे। इस भाषण के बाद भीड़ ‘कटुए काटे जाएंगे, राम राम चिल्लाएंगे’ के नारों के साथ मुसलमानों की दुकानें फूंकी गयीं।  

याचिका में कहा गया है कि इसके साथ ही गोरखपुर के दूसरे क्षेत्रों, देवरिया, पडरौना, महाराजगंज, बस्ती, संत कबीरनगर और सिद्धार्थनगर में योगी के कहे अनुसार ही मुस्लिम विरोधी हिंसा हुई। मुसलमानों की करोड़ों की सम्पत्ति का नुकसान हुआ लेकिन एफआईआर तक दर्ज नहीं हुआ। 

ऐसे में सामाजिक कार्यकर्ता परवेज परवाज और असद हयात द्वारा इलाहाबाद हाईकोर्ट में रिट पेटिशन दायर कर प्राथमिकी दर्ज करने की मांग की गई। लेकिन अदालत ने उसे खारिज करते हुए सेक्शन 156 (3) के तहत कार्रवाई का निर्देश दिया। जिसके बाद सीजेएम गोरखपुर की कोर्ट में एफआईआर दर्ज कराने के लिए गुहार लगाई गई। जिस पर कुल 10 महीने तक सुनवाई चली और अंततः मांग को खारिज कर दिया गया। 

मामला खारिज कर दिए जाने के बाद याचिकाकर्ताओं द्वारा हाईकोर्ट में रिवीजन दाखिल हुआ। तब जाकर इस मामले में एफआईआर दर्ज हो पायी। एफआईआर के बाद योगी के साथ सहअभियुक्त अंजू चौधरी ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर कर एफआईआर और जांच पर स्टे ले लिया। पर 13 दिसम्बर 2012 को सुप्रीम कोर्ट ने अंजू चौधरी की एसएलपी को खारिज कर दिया और जांच के आदेश दे दिए। लेकिन सीबीसीआईडी की इस जांच के लिए अखिलेश  यादव सरकार ने अपने जांच अधिकारी को अनुमति ही नहीं दी और मामला वहीं का वहीं पड़ा रहा।

सरकार द्वारा सीबीसीआइडी जांच की अनुमति नहीं देने पर सरकार को हाईकोर्ट ने तीन हफ्ते में जवाब देने को कहा है। अगर जांच सही पाई जाती है तो इस मामले में प्रदेश के मुख्यमंत्री को तीन साल की सजा हो सकती है। 

पर सब जानते हैं कि जब अखिलेश सरकार ने जांच के आदेश नहीं दिए फिर योगी जी अपने खिलाफ ही जांच के आदेश क्यों देंगे?