Jan 11, 2017
Jan 6, 2017
मनीष सिसौदिया ने केजरीवाल को क्यों भेजा इस्तीफा !
संजय सिंह और आशुतोष की मध्यस्थता से बची लाज, पर मुख्यमंत्री—उपमुख्यमंत्री के रिश्ते अब नहीं रहे सामान्य
साप्ताहिक अखबार 'संडे पोस्ट' के संपादक अपूर्व जोशी ने अपने संपादकीय में किया दावा कि तत्कालीन राज्यपाल नजीब जंगी की सलाह से मनीष सिसौदिया को केजरीवाल ने बनाया था मुख्यमंत्री। अखबार का दावा कि कुमार विश्वास ठेले गए हाशिए पर, मनीष सिसौदिया की जगह केजरीवाल सत्येंद्र जैन को दे रहे तरजीह
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| दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल और उपमुख्यमंत्री मनीष सिसोदिया : कभी आसनाई थी अब जम्हाई है |
पढ़िए
इस पटकथा के पीछे की कहानी, संडे पोस्ट के संपादक अपूर्व जोशी के शब्दों
में। संपादक की बयान की गई यह राजनीतिक किस्सागोई अपने तथ्यों के साथ बहुत
साफ है और पढ़ते हुए स्पष्ट हो जाता है कि आम आदमी पार्टी में वर्चस्व और
नेतृत्व को लेकर टकराहटों का दूसरा फेज शुरू हो गया है।
अपूर्व जोशी
संपादक संडे पोस्ट
'इंडिया अगेंस्ट करप्शन' की त्रिमूर्ति के आपसी संबंध राजनीतिक महत्वाकांक्षाओं की भेंट चढ़ने की खबर है। कवि कुमार विश्वास तो पहले से ही हाशिए पर डाल दिए गए थे। अब मुख्यमंत्री केजरीवाल और उपमुख्यमंत्री सिसोदिया के संबंध भी बिगड़ने लगे हैं। कुछ समय पूर्व सिसोदिया ने अपना त्यागपत्र तक सीएम को भेज दिया था। पार्टी सूत्र कहते हैं कि सिसोदिया की बढ़ती लोकप्रियता से खुद को असुरक्षित महसूस कर रहे केजरीवाल इन दिनों सत्येंद्र जैन पर ज्यादा भरोसा करने लगे हैं।
भारतीय राजनीति के परिदृश्य में आम आदमी पार्टी का जन्म एक ऐसे समय में हुआ जब स्थापित राजनेताओं और राजनीतिक दलों पर से आमजन का भरोसा उठ चुका था। समाजसेवी अन्ना हजारे के नेतृत्व में शुरू हुआ आंदोलन तत्कालीन यूपीए सरकार के भ्रष्टाचार पर चुनिंदा युवाओं का ऐसा प्रहार था जिसकी गूंज पूरे देश में सुनी गई। यकीनन् इस आंदोलन का चेहरा महाराष्ट्र के वयोवृद्ध आंदोलनकारी नेता अन्ना का था लेकिन दिमाग इन्हीं चुनिंदा युवाओं का था।
'इंडिया अगेंस्ट करप्शन' के नारे से शुरू हुए इस आंदोलन की एक सूत्रीय मांग एक जनलोकपाल कानून की थी] जिसके माध्यम से भ्रष्टाचार पर अंकुश लगाया जा सके। टीम अन्ना के नाम से चर्चा में आए इन युवाओं में मुख्य रूप से आरटीआई कार्यकर्ता अरविंद केजरीवाल] मनीष सिसोदिया और कुमार विश्वास थे। आंदोलन के विस्तार ने योगेंद्र यादव और प्रशांत भूषण को इससे जोड़ा। बाद में मेधा पाटकर, संतोष हेगड़े , संजय सिंह, आशुतोष आदि इनसे जुड़ते गए। आंदोलन की अप्रत्याशित सफलता के दौरान ही टीम अन्ना के मध्य आपसी विवाद की खबरें सामने आने लगी थीं।
अन्ना हजारे इस आंदोलन को भ्रष्टाचार के खिलाफ एक मुहिम के रूप में जारी रखना चाहते थे जबकि उनकी कोर टीम की राजनीतिक महत्वाकांक्षा जागने लगी थी। नतीजा उन्नीस सितंबर २०१२ के दिन अन्ना और उनके चेलों के बीच चल रहा शीतयुद्ध अलगाव का कारण बन गया। दोनों ने स्वीकारा कि राजनीतिक दल बनाने के मुद्दे पर उनके मतभेद हैं। अरविंद केजरीवाल ने दो अक्टूबर २०१२ को राजनीतिक दल बनाने की शुरुआत की। संतोष हेगड़े और किरण बेदी ने उनके निर्णय का विरोध किया जबकि सिसोदिया और विश्वास अरविंद के साथ रहे।
अन्ना हजारे इस आंदोलन को भ्रष्टाचार के खिलाफ एक मुहिम के रूप में जारी रखना चाहते थे जबकि उनकी कोर टीम की राजनीतिक महत्वाकांक्षा जागने लगी थी। नतीजा उन्नीस सितंबर २०१२ के दिन अन्ना और उनके चेलों के बीच चल रहा शीतयुद्ध अलगाव का कारण बन गया। दोनों ने स्वीकारा कि राजनीतिक दल बनाने के मुद्दे पर उनके मतभेद हैं। अरविंद केजरीवाल ने दो अक्टूबर २०१२ को राजनीतिक दल बनाने की शुरुआत की। संतोष हेगड़े और किरण बेदी ने उनके निर्णय का विरोध किया जबकि सिसोदिया और विश्वास अरविंद के साथ रहे।
मनीष सिसोदिया केजरीवाल संग २००५ के अंत से ही जुड़ गए थे। 'कबीर' नाम के एनजीओ के संस्थापक मनीष पत्रकारिता से भी जुड़े रहे। २००६ में सूचना के अधिकार कानून का मसौदा तैयार करने वालों में वे शामिल रहे। २००६ में केजरीवाल और सिसोदिया ने पब्लिक कॉज रिसर्च फाउंडेशन बनाया। सिसोदिया के पुराने मित्र रहे कुमार विश्वास को अन्ना आंदोलन से जोड़ने में मुख्य भूमिका सिसोदिया की ही रही। कुमार विश्वास पेशे से अध्यापक और हिंदी कविता का जाना-पहचाना नाम हैं।
अन्ना आंदोलन के दौरान इन तीनों की जुगलबंदी देखते बनती थी। जब कभी अन्ना हजारे संग अरविंद का विवाद होता तो विश्वास मध्यस्थ की भूमिका में नजर आया करते थे। योगेंद्र यादव और प्रशांत भूषण संग केजरीवाल के संबंध खराब होने के दौरान कुमार विश्वास ही आपसी सुलह का प्रयास करते देखे गए थे। इस त्रिमूर्ति में आपसी टकराहट के संकेत बहुत अर्से से सामने आने लगे थे। केजरीवाल और विश्वास के बीच खटपट दिल्ली में आम आदमी पार्टी की पहली सरकार के दौरान ही देखने को मिली थी। केजरीवाल के कई पुराने साथियों ने पार्टी में बढ़ते अधिनायकवाद और केजरीवाल के इर्द-गिर्द एक चौकड़ी के विरोध में अपना इस्तीफा दे दिया। इस पूरे दौर में विश्वास के भी हाशिए में चले जाने और पार्टी छोड़ने की अफवाहें फिजा में तैरती रही हैं। लेकिन मनीष सिसोदिया केजरीवाल के विश्वस्त सहयोगी बने रहे।
जानकारों की मानें तो उपराज्यपाल नजीब जंग की सलाह पर अरविंद केजरीवाल ने मनीष सिसोदिया को उपमुख्यमंत्री बनाने का निर्णय लिया था। मनीष सिसोदिया के पास वित्त] नियोजन] राजस्व शिक्षा समेत कई महत्वपूर्ण विभाग भी होना उनके और मुख्यमंत्री के बीच विश्वास को दर्शाता है। लेकिन अब खबर है कि दोनों के मध्य भी खटपट होने लगी है। 'दि संडे पोस्ट' को विश्वस्त सूत्रों के हवाले से जानकारी मिली है कि दोनों के रिश्ते कुछ समय पूर्व इतने तनावपूर्ण हो चले थे कि केजरीवाल को मध्यस्थों का सहारा लेना पड़ रहा है। जानकारी के अनुसार दिल्ली में अतिथि शिक्षकों के वेतन मुद्दों से उठा सवाल पिछले दिनों एक बड़े संकट का कारण बन गया। सरकारी फाइल पर मुख्यमंत्री की कठोर टिप्पणी से आहत हो सिसोदिया ने अपना त्यागपत्र मुख्यमंत्री के पास भेज दिया।
जानकारों की मानें तो उपराज्यपाल नजीब जंग की सलाह पर अरविंद केजरीवाल ने मनीष सिसोदिया को उपमुख्यमंत्री बनाने का निर्णय लिया था। मनीष सिसोदिया के पास वित्त] नियोजन] राजस्व शिक्षा समेत कई महत्वपूर्ण विभाग भी होना उनके और मुख्यमंत्री के बीच विश्वास को दर्शाता है। लेकिन अब खबर है कि दोनों के मध्य भी खटपट होने लगी है। 'दि संडे पोस्ट' को विश्वस्त सूत्रों के हवाले से जानकारी मिली है कि दोनों के रिश्ते कुछ समय पूर्व इतने तनावपूर्ण हो चले थे कि केजरीवाल को मध्यस्थों का सहारा लेना पड़ रहा है। जानकारी के अनुसार दिल्ली में अतिथि शिक्षकों के वेतन मुद्दों से उठा सवाल पिछले दिनों एक बड़े संकट का कारण बन गया। सरकारी फाइल पर मुख्यमंत्री की कठोर टिप्पणी से आहत हो सिसोदिया ने अपना त्यागपत्र मुख्यमंत्री के पास भेज दिया।
बताया जाता है कि दिल्ली के उपमुख्यमंत्री इतने नाराज थे कि उन्होंने अपना त्यागपत्र भेजने के साथ ही अपने कार्यालय को छोड़ दिया। वे अपनी निजी कार में बैठ घर चले गए। सिसोदिया का त्यागपत्र केजरीवाल के लिए एक बड़ा झटका था। दोनों के बीच संबंधों में आई खटास का दूसरा संकेत तब मिला जब स्वयं बात न करके केजरीवाल ने पार्टी के वरिष्ठ नेता संजय सिंह और आशुतोष को मनीष के घर सुलह-सफाई के लिए भेजा। हालांकि मामला आपसी समझ से हल हो गया लेकिन जैसा रहीम दास कह गए 'रहिमन धागा प्रेम का मत तोड़ो चटकाय। टूटे से फिर न जुड़े, जुड़े गांठ परि जाए।'
दोनों के बीच अब रिश्ते पहले से मजबूत नहीं रह गए, बताए जा रहे हैं। पार्टी सूत्रों की मानें तो इसके पीछे एक बड़ी वजह केजरीवाल के भीतर जमी असुरक्षा की वह भावना है जो अपने समक्ष किसी भी बड़े नेता को नहीं सह पाती। दिल्ली सरकार का कामकाज पूरी तरह देख रहे सिसोदिया ने जनता के समक्ष एक काम करने वाले नेता की छवि बनाने में सफलता पाई है। शिक्षा के क्षेत्र मे दिल्ली सरकार ने बेहतरीन काम किया है। इतना ही नहीं दिल्ली के राज्यपाल नजीब जंग से भी सिसोदिया के संबंध ठीक रहे। जैसे-जैसे केजरीवाल की महत्वाकांक्षा उन्हें दिल्ली से दूर लेती गई मनीष सिसोदिया का प्रशासन पर प्रभाव बड़ा।
दिल्ली की जनता को भी यह लगने लगा है कि केजरीवाल अब दिल्ली के शासन पर ध्यान न के बराबर देते हैं। मनीष की इसी बढ़ती लोकप्रियता से केजरीवाल असुरक्षित हो चले हैं। जानकारों की मानें तो इसकी काट के तौर पर उन्होंने सत्येंद्र जैन को आगे बढ़ाना शुरू कर दिया है। जब गोपाल राय से परिवहन मंत्रालय हटाया गया तो जैन को उसका प्रभार सौंपा जाना इसी तरफ इशारा करता है।
इसी प्रकार यकायक ही जुलाई २०१६ में सिसोदिया से शहरी विकास मंत्रालय हटाकर सत्येंद्र जैन को सौंप दिया गया। पहले से ही जैन के पास स्वास्थ्य] गृह] परिवहन एवं उद्योग जैसे भारी-भरकम मंत्रालय हैं। जाहिर है केजरीवाल मनीष सिसोदिया को अपने विकल्प के तौर पर उभरता देख कहीं न कहीं बेचैन हैं। पार्टी के एक वरिष्ठ नेता कहते हैं यदि पंजाब में पार्टी को अपेक्षित सफलता नहीं मिली तो केजरीवाल का ध्यान फिर से दिल्ली में केंद्रित हो जाएगा। ऐसे में पार्टी के इन दो शीर्ष नेताओं के बीच टकराव होना निश्चित होगा।
दूसरी तरफ पार्टी के एमएलए अरविंद केजरीवाल की कार्यशैली से खासे नाखुश बताए जा रहे हैं। ऐसी खबरें भी आ रही हैं कि पार्टी के असंतुष्ट एमएलए केजरीवाल की बजाय सिसोदिया संग काम करने में ज्यादा सहज रहते हैं। जाहिर है इन सबके चलते केजरीवाल और सिसोदिया के बीच सत्ता के लिए संद्घर्ष हो सकता है। यदि ऐसा हुआ तो अन्ना आंदोलन के विश्वास की संपदा सहारे खड़ी हुई पार्टी की यह अधोगति निश्चित ही कष्टकारी होगी।
हाशिए में कुमार विश्वास
अन्ना हजारे के भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन का अग्रणी चेहरा बन उभरे लोकप्रिय कवि डॉ कुमार विश्वास इन दिनों आम आदमी पार्टी में हाशिए का दंश झेलने को विवश हैं। कभी अरविंद केजरीवाल और मनीष सिसोदिया के संग इंडिया अगेंस्ट करप्शन की महत्वपूर्ण तिकड़ी का हिस्सा रहे विश्वास की पार्टी प्रमुख केजरीवाल संग खास बनती नहीं। यही कारण है इन दिनों वे पार्टी मंच पर बहुत सक्रिय नजर नहीं आते। हालांकि पार्टी की सबसे महत्वपूर्ण राजनीतिक कार्य समिति के वे सदस्य हैं लेकिन उन्हें न तो पंजाब में स्टार प्रचारक के तौर पर बुलाया गया है] न ही गोवा में उनकी छवि को उपयोग में लाया जा रहा है। जानकारों की मानें तो केजरीवाल विश्वास को विश्वसनीय नहीं मानते। दूसरी तरफ विश्वास समर्थकों का मानना है चूंकि विश्वास केजरीवाल के यसमैन नहीं हो सकते इसलिए उन्हें जानबूझकर किनारे लगाने का काम चल रहा है। २०१८ में दिल्ली से राज्यसभा की तीन सीटें खाली होने जा रही हैं। विधानसभा में प्रचंड बहुमत के कारण तीनों पर भी आप नेताओं का चुना जाना तय है। पहले इन तीनों सीटों के लिए प्रशांत भूषण] योगेंद्र यादव और कुमार विश्वास का नाम लिया जाता था। अब प्रशांत भूषण और योगेंद्र यादव के पार्टी से निष्कासित होने के चलते संजय सिंह और आशुतोष का नाम सामने आने लगा है। तीसरा नाम कुमार विश्वास के बजाय किसी अन्य का हो सकता है। ऐसे में देखना होगा कि कुमार विश्वास क्या कदम उठाते हैं।
मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल का किसी के साथ लंबा रिश्ता नहीं चला
हाशिए में कुमार विश्वास
अन्ना हजारे के भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन का अग्रणी चेहरा बन उभरे लोकप्रिय कवि डॉ कुमार विश्वास इन दिनों आम आदमी पार्टी में हाशिए का दंश झेलने को विवश हैं। कभी अरविंद केजरीवाल और मनीष सिसोदिया के संग इंडिया अगेंस्ट करप्शन की महत्वपूर्ण तिकड़ी का हिस्सा रहे विश्वास की पार्टी प्रमुख केजरीवाल संग खास बनती नहीं। यही कारण है इन दिनों वे पार्टी मंच पर बहुत सक्रिय नजर नहीं आते। हालांकि पार्टी की सबसे महत्वपूर्ण राजनीतिक कार्य समिति के वे सदस्य हैं लेकिन उन्हें न तो पंजाब में स्टार प्रचारक के तौर पर बुलाया गया है] न ही गोवा में उनकी छवि को उपयोग में लाया जा रहा है। जानकारों की मानें तो केजरीवाल विश्वास को विश्वसनीय नहीं मानते। दूसरी तरफ विश्वास समर्थकों का मानना है चूंकि विश्वास केजरीवाल के यसमैन नहीं हो सकते इसलिए उन्हें जानबूझकर किनारे लगाने का काम चल रहा है। २०१८ में दिल्ली से राज्यसभा की तीन सीटें खाली होने जा रही हैं। विधानसभा में प्रचंड बहुमत के कारण तीनों पर भी आप नेताओं का चुना जाना तय है। पहले इन तीनों सीटों के लिए प्रशांत भूषण] योगेंद्र यादव और कुमार विश्वास का नाम लिया जाता था। अब प्रशांत भूषण और योगेंद्र यादव के पार्टी से निष्कासित होने के चलते संजय सिंह और आशुतोष का नाम सामने आने लगा है। तीसरा नाम कुमार विश्वास के बजाय किसी अन्य का हो सकता है। ऐसे में देखना होगा कि कुमार विश्वास क्या कदम उठाते हैं।
मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल का किसी के साथ लंबा रिश्ता नहीं चला
पहला टकराव 'परिवर्तन' संस्था के अपने सहयोगी अरुणा राय से हुआ। अन्ना हजारे से जुड़ते ही अरुणा से इनका अलगाव हो गया।
राजनीतिक दल बनाने के बाद अन्ना के साथ-साथ किरण बेदी से भी टकराव और अलगाव।
दिल्ली में सरकार गठन के साथ ही अरविंद ने प्रशांत भूषण] आनंद कुमार और योगेंद्र यादव को भी छोड़ दिया जो उनकी पार्टी के संस्थापक सदस्य थे।
Jan 4, 2017
अलविदा पापा!
पापा की दोनों आँखें सफेद गोली जैसी लग
रही थीं. महिला डाक्टर ने पापा के
शरीर से आंखें निकाल कर अपने साथ लाये डिब्बे में रख दीं. डाक्टर
बोली कल तक आपके पापा की आँखें दो लोगों को लगा दी जायेंगी…
पिता प्रकाश भाई की मौत पर उन्हें कुछ यूं याद किया सामाजिक कार्यकर्त्ता हिमांशु कुमार ने
पापा का पूरा शरीर मेडिकल कालेज को दान
दे दिया गया.
कोई पंडित नहीं. कोई आडंबर नहीं. मां
और बहनें पापा के देहदान के फैसले से सहमत थीं. मंझली बहन का
परिवार उत्तर प्रदेश का कर्मकांडी परिवार है. उन्होंने हल्के
फुल्के ढंग से बोला कि आत्मा की शान्ति नहीं होगी. मैंने उन्हें
समझाया कि आत्मा-रूह वगैरह वहम हैं.
1942 में भारत छोड़ो
आंदोलन में जब गांधी जी ने 'करो या मरो' का नारा दिया, पापा ने मुजफ्फरनगर रेलवे स्टेशन को
आग लगा दी. पुलिस ने घर पर छापा मारा.पापा
फरार होकर आगरा. इलाहाबाद और बनारस में भूमिगत रहे. गांधी जी को पत्र लिखा. गांधी जी ने पापा को
सेवाग्राम आश्रम में अपने पास बुला लिया. गांधी जी ने पापा
को नई तालीम के काम में लगाया. गांधी कहते थे जैसे आज़ाद
भारत में अंग्रेजों का झन्डा नहीं चल सकता, वैसे ही आज़ाद
भारत में अंग्रेजी शिक्षा भी नहीं चल सकती.
गांधी जी की हत्या के बाद पिताजी
रचनात्मक कामों में लग गये.
पापा ने नाम के आगे से जाति नाम उड़ा दिया. विनोबा भावे के
भूदान और सर्वोदय आन्दोलन में पहली पंक्ति के कार्यकर्ता बने. प्रभावी लेखक, ओजस्वी वक्ता, विचारक, प्रखर कार्यकर्ता. सारे देश में कोई इलाका होगा जहाँ पिताजी लोगों को ना
जानते हों. वे चलता फिरता ज्ञानकोष थे.
कोई भी प्रश्न हो उत्तर हाज़िर. सुघड़ इतने कि आंख बन्द कर के भी अपना
सामान उठा सकते थे. घर की सारी महिलायें रफू का काम पापा से
करवाती थीं. उस ज़माने में वो जोरू का गुलाम कहलाते थे क्योंकि
मेरी मां के कपड़े धो देते थे. और थक जाने पर पत्नी के पांव
भी दबा देते थे.
उत्तर प्रदेश में मंत्री पद मिला. ज़मीन बांटने का महकमा मिला. खुद भूमिहीन ही बने रहे. जीवन में अपना मकान नहीं
बनाया. ना बैंक में कोई पैसा. एक चर्खा.
कुछ अपना काता सूत. कुछ किताबें छोड़ कर आज
पापा जिन्हें सब प्रकाश भाई के नाम से जानते थे, चले गये. मरने से पहले पापा बोल गये थे मरने के बाद मेडिकल कालेज में शरीर दे देना.
अलविदा पापा!
Jan 2, 2017
अखिलेश यादव के समर्थन में 'ध्वनि' बैंड ने जारी किया गाना
उत्तर प्रदेश के जारी राजनीतिक घटनाक्रम के बीच दिल्ली के एक बैंड 'ध्वनि' ने अखिलेश यादव के समर्थन में 'बुलंदियां' नाम से एक गीत जारी किया है। गीत के बोल अखिलेश के वर्तमान हालात और संघर्ष पर एकदम सटीक बैठते हैं। गीत के लेखक तैश पोठवारी और गायक आशीष नारायण पाठक ने कहा कि 'हम इस गीत को युवाओं में आत्मविश्वास और प्रेरणा जागृत करने के लिए बना रहे थे। हमें एक ऐसे चेहरे की तलाश थी जो लीक से हटकर अपने आत्मविश्वास और हिम्मत के बल पर कुछ कर गुजरना चाहता हो। पिछले दिनों अखिलेश यादव ने जिस तरह राजनीति को अपराध और भ्रष्टाचार से दूर रखने की पहलकदमी की है उससे प्रभावित होकर हमने इसे अखिलेश यादव के समर्थन में जारी करने का निर्णय लिया है।
अखिलेश ने पिता मुलायम को धमकाया, कहा स्टेज से नीचे उतरो
तख्तापलट की गोटी बहुत पहले ही अखिलेश यादव फिट कर चुके थे बस सही मौका हाथ नहीं आ रहा था। देखिए इसकी शुरुआत का एक साक्ष्य।
समाजवादी कुनबे की तकरार का एक
वीडियो वायरल हो गया है। जिसमें मुख्यमंत्री अखिलेश यादव अपने पिता मुलायम
सिंह पर तीखे तेवरों के साथ भड़क रहे हैं। उन्हें स्टेज से नीचे उतरने के
लिए बोल रहे हैं।
यह वीडियो 24 अक्तूबर को हुई बैठक का है। जिसमें अखिलेश
यादव, मुलायम सिंह यादव और शिवपाल यादव ने अपना-अपना पक्ष कार्यकर्ताओं और
पदाधिकारियों के सामने रखा था। देखिए वीडियो
साभार - ट्राई सिटी टुडे
Dec 4, 2016
न नौ न छह सिर्फ तीन महीने
भारतीय डॉक्टर ने टीबी रोगियों के लिए ढूंढ़ा नया इलाज
यक्ष्मा, तपेदिक, क्षयरोग, एमटीबी या टीबी एक संक्रामक बीमारी है, जो माइक्रोबैक्टीरिया से होती है। दुनिया की आबादी का एक तिहाई तपेदिक से संक्रमित है। नये संक्रमण प्रति सेकंड एक व्यक्ति की दर से बढ़ रहे हैं...
प्रदीप श्रीवास्तव
भारत से पढ़ाई करने वाली डॉक्टर अस्वीन मारको अमेरिका में टीबी के मरीजों के लिए काम कर रही हैं। उन्होंने जीआईएस तकनीकी का विकास किया है, जो अमेरिका में बेघर लोगों में टीबी की बीमारी को ट्रैस करता है। साथ ही इस तकनीक से वे मरीजों का पूरा रिकार्ड रखती हैं, जिससे टीबी के मरीजों को दवा व इलाज मुहैया कराया जा सके। उनके काम को न सिर्फ अमेरिकी सरकार सराह रही है, बल्कि भारत में भी उनके काम की तारीफ हो रही है।
अस्वीन ने हिमाचल प्रदेश से बीडीएस की डिग्री लेने के बाद कुछ समय तक दिल्ली में काम किया। बाद में अमेरिका के बोस्टन यूनिवसर्सिटी से पब्लिक हेल्थ का कोर्स किया। इसके बाद उन्होंने अमेरिका के बेघर लोगों की भलाई के लिए स्वास्थ्य सेवाओं पर काम करना शुरू किया। इस दौरान उन्हें बेघर लोगों के बीच व्याप्त टीबी की बीमारी का पता चला। इस बीमारी से हर साल हजारों लोगों की मौत हो जाती है। यह तेजी से फैलने के कारण अमेरिका में भी टीबी के मरीजों की संख्या में इजाफा हो रहा है। ऐसे में उन्होंने टीबी को जड़ से समाप्त करने के लिए कुछ नए प्रयोग किए हैं, जो काफी कारगर है।
टीबी रोकने के नए प्रयोग
डॉ. अस्वीन ने टीबी रोगियों के लिए कुछ अनोखे प्रयोग किए हैं। उन्होंने टीबी के दवा-इलाज समय को कम कर दिया है। अभी तक पूरी दुनिया में टीबी के सबसे कारगर इलाज को डाट्स प्रणाली माना जाता है। इसके तहत छह से नौ माह तक मरीज को दवा दी जाती है। इस प्रणाली में एक सबसे बड़ी खामी यह है कि अगर मरीज बीच में इलाज छोड़ देता है तो उसे टीबी की सबसे जटिलतम बीमारी से जूझना पड़ता है। उसे एमडीआर टीबी हो जाती है, जिसका इलाज न सिर्फ बहुत महंगा है, बल्कि उसे दो साल से ज्यादा समय तक अस्पताल में भर्ती रहना पड़ सकता है। ऐसे में डॉ. अस्वीन ने नौ माह के कोर्स को छोटा करके तीन माह का कर दिया। इससे बेघर मरीजों का इलाज जल्दी होने लगा है।
इसके अलावा डॉ. अस्वीन ने जीनएक्सपर्ट टेक्नोलाॅजी का प्रयोग भी शुरू किया है, जो क्षय रोग का पता लगाने की कारगर प्रणाली है। डॉ. अस्वीन ने सबसे महत्वपूर्ण कार्य जियोग्राॅफिकल इंफारमेशन सिस्टम को तैयार कर किया है। इसके तहत बेघर मरीजों का पूरा ब्यौरा कंप्यूटर में रियल टाइम में एकत्रित किया जाता है, जिससे वह अमेरिका में कहीं भी हो तो उसे ट्रैस किया जा सके। पूर्व में अमेरिका में यह व्यवस्था नहीं होने के कारण इन बेघरों की पहचान बहुत मुश्किल होती थी, जिस कारण से अगर इलाज बीच में छूट जाता था तो वह उन्हें पुनः इलाज की सुविधा नहीं मिल पाता थी। और इन्हें एमडीआर टीबी का इलाज कराना पड़ता था।
अमेरिका में टीबी रोग की स्थिति
अमेरिका में करीब 5 लाख टीबी के मरीज हैं। इनमें भी अधिकतर मरीज बेघर हैं, जो पूरे देश में घूमते रहते हैं। इलाज नहीं मिलने की दशा में बीस प्रतिशत से ज्यादा प्रतिवर्ष अकाल मौत के शिकार हो जाते हैं। यक्ष्मा, तपेदिक, क्षयरोग, एमटीबी या टीबी एक संक्रामक बीमारी है, जो माइक्रोबैक्टीरिया से होती है। क्षय रोग आम तौर पर फेफड़ों पर हमला करता है, लेकिन यह शरीर के अन्य भागों को भी प्रभावित कर सकता हैं। यह हवा के माध्यम से फैलता है। दुनिया की आबादी का एक तिहाई तपेदिक से संक्रमित है। नये संक्रमण प्रति सेकंड एक व्यक्ति की दर से बढ़ रहे हैं।
Nov 24, 2016
Nov 22, 2016
ये है वो अर्थशास्त्री जिसने मोदी को दिया था नोटबंदी का आइडिया
मोदी को नोटबंदी का मंत्र देने वाले खफा, कहा- सरकार ने पसंद के सुझाव माने, बाकी छोड़ दिए
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| प्रधानमंत्री मोदी और अनिल बोकिल |
नोजिया सैयद, मुंबई
नोटबंदी की घोषणा हुई और लोग इसे प्रधानमंत्री नरेंद्री मोदी का काले धन पर 'सर्जिकल स्ट्राइक' बता रहे हैं। हालांकि, पीएम के इस बड़े कदम के पीछे आइडिया पुणे निवासी अनिल बोकिल और उनके थिंक टैंक अर्थक्रांति प्रतिष्ठान का है। जुलाई महीने में बोकिल को मोदी से मिलने के लिए महज नौ मिनट का वक्त मिला था। लेकिन जब मोदी ने बोकिल को सुना तो दोनों के बीच बातचीत दो घंटों तक खिंच गई। इस बातचीत का परिणाम नोटबंदी के रूप में सामने आया।
अब जब देशवासी बैंकों और एटीएमों के सामने लाइन लगा कर खड़े हैं, बोकिल इसका दोष सरकार पर मढ़ रहे हैं। उनका आरोप है कि सरकार ने उनके सुझाव को पूरा-पूरा मानने के बजाय अपनी पसंद को तवज्जो दी। उन्होंने मुंबई मिरर से कहा कि मंगलवार को वह प्रधानमंत्री से मिलने दिल्ली जा रहे थे। हालांकि, मुलाकात को लेकर प्रधानमंत्री कार्यालय (पीएमओ) से कोई कन्फर्मेशन नहीं आया था।
बकौल बोकिल उन्होंने सरकार से कहा-
1. केंद्र या राज्य सरकारों के साथ-साथ स्थानीय निकायों द्वारा वसूले जाने वाले प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष, सभी करों का पूर्ण खात्मा।
2. ये टैक्सेज बैंक ट्रांजैक्शन टैक्स (बीटीटी) में तब्दील किए जाने थे जिसके अंतर्गत बैंक के अंदर सभी प्रकार के लेनदेन पर लेवी (2 प्रतिशत के करीब) लागू होती। यह प्रक्रिया सोर्स पर सिंगल पॉइंट टैक्स लगाने की होती। इससे जो पैसे मिलते उसे सरकार के खाते में विभिन्न स्तर (केंद्र, राज्य, स्थानीय निकाय आदि के लिए क्रमशः 0.7%, 0.6%, 0.35% के हिसाब से) पर बांट दिया जाता। इसमें संबंधित बैंक को भी 0.35% हिस्सा मिलता। हालांकि, बीटीटी रेट तय करने का हक वित्त मंत्रालय और रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया के पास होता।
3. कैश ट्रांजैक्शन (निकासियों) पर कोई टैक्स नहीं लिया जाए।
4. सभी तरह की ऊंचे मूल्य की करंसी (50 रुपये से ज्यादा की मुद्रा) वापस लिए जाएं।
5. सरकार निकासी की सीमा 2,000 रुपये तक किए जाने के लिए कानूनी प्रावधान बनाए।
अगर ये सभी सुझाव एकसाथ मान लिए गए होते, तो इससे ना केवल आम आदमी को फायदा होता बल्कि पूरी व्यवस्था ही बदल गई होती। हम सबकुछ खत्म होता नहीं मान रहे। हम सब देख रहे हैं। लेकिन, सरकार ने बेहोशी की दवा दिए बिना ऑपरेशन कर दिया। इसलिए मरीजों को जान गंवानी पड़ी। हम इस प्रस्ताव पर 16 सालों से काम कर रहे हैं जब अर्थक्रांति साल 2000 में स्थापित हुई।
काले धन पर 'सर्जिकल स्ट्राइक' में क्या गड़बड़ी हुई, इस बारे में अनिल बोकिल का कहना है कि उन्होंने प्रधानमंत्री के सामने एक व्यापक प्रस्ताव रखा था जिसके पांच आयाम थे। हालांकि, सरकार ने इनमें सिर्फ दो को ही चुना। यह अचानक उठाया गया कदम था, ना कि बहुत सोचा-समझा। इस कदम का ना ही स्वागत किया जा सकता है और ना ही इसे खारिज कर सकते हैं। हम इसे स्वीकार करने के लिए बाध्य हैं। हमने सरकार को जो रोडमैप दिए थे, उससे ऐसी परेशानियां नहीं होतीं।
बोकिल ने बताया कि 16 सदस्यों की एक तकनीकी समिति ने यह प्रस्ताव दिया जिसने गारंटी दी कि इससे एक भी व्यक्ति प्रभावित नहीं होगा। इस कदम का सिर्फ और सिर्फ ब्लैक मनी, आतंकवाद और फिरौती से जुड़े अपराधों पर प्रहार होता। इससे प्रॉपर्टी की कीमतें कम होतीं और जीडीपी का विस्तार होता। सरकार ने 2,000 रुपये के नोट ला दिए जिसे हम वापस लेने का प्रस्ताव रख रहे हैं। यह तो सिर्फ शुरुआत है। मुख्य अभियान का आगाज तो अभी होना है।
नवभारत टाइम्स डॉट कॉम से साभार
मूल खबर के लिए देखें — http://mumbaimirror.indiatimes.com/mumbai/cover-story/The-man-who-gave-Modi-the-idea-of-demonetisation-slams-implementation/articleshow/55551131.cms
नोटबंदी की घोषणा हुई और लोग इसे प्रधानमंत्री नरेंद्री मोदी का काले धन पर 'सर्जिकल स्ट्राइक' बता रहे हैं। हालांकि, पीएम के इस बड़े कदम के पीछे आइडिया पुणे निवासी अनिल बोकिल और उनके थिंक टैंक अर्थक्रांति प्रतिष्ठान का है। जुलाई महीने में बोकिल को मोदी से मिलने के लिए महज नौ मिनट का वक्त मिला था। लेकिन जब मोदी ने बोकिल को सुना तो दोनों के बीच बातचीत दो घंटों तक खिंच गई। इस बातचीत का परिणाम नोटबंदी के रूप में सामने आया।
अब जब देशवासी बैंकों और एटीएमों के सामने लाइन लगा कर खड़े हैं, बोकिल इसका दोष सरकार पर मढ़ रहे हैं। उनका आरोप है कि सरकार ने उनके सुझाव को पूरा-पूरा मानने के बजाय अपनी पसंद को तवज्जो दी। उन्होंने मुंबई मिरर से कहा कि मंगलवार को वह प्रधानमंत्री से मिलने दिल्ली जा रहे थे। हालांकि, मुलाकात को लेकर प्रधानमंत्री कार्यालय (पीएमओ) से कोई कन्फर्मेशन नहीं आया था।
बकौल बोकिल उन्होंने सरकार से कहा-
1. केंद्र या राज्य सरकारों के साथ-साथ स्थानीय निकायों द्वारा वसूले जाने वाले प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष, सभी करों का पूर्ण खात्मा।
2. ये टैक्सेज बैंक ट्रांजैक्शन टैक्स (बीटीटी) में तब्दील किए जाने थे जिसके अंतर्गत बैंक के अंदर सभी प्रकार के लेनदेन पर लेवी (2 प्रतिशत के करीब) लागू होती। यह प्रक्रिया सोर्स पर सिंगल पॉइंट टैक्स लगाने की होती। इससे जो पैसे मिलते उसे सरकार के खाते में विभिन्न स्तर (केंद्र, राज्य, स्थानीय निकाय आदि के लिए क्रमशः 0.7%, 0.6%, 0.35% के हिसाब से) पर बांट दिया जाता। इसमें संबंधित बैंक को भी 0.35% हिस्सा मिलता। हालांकि, बीटीटी रेट तय करने का हक वित्त मंत्रालय और रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया के पास होता।
3. कैश ट्रांजैक्शन (निकासियों) पर कोई टैक्स नहीं लिया जाए।
4. सभी तरह की ऊंचे मूल्य की करंसी (50 रुपये से ज्यादा की मुद्रा) वापस लिए जाएं।
5. सरकार निकासी की सीमा 2,000 रुपये तक किए जाने के लिए कानूनी प्रावधान बनाए।
अगर ये सभी सुझाव एकसाथ मान लिए गए होते, तो इससे ना केवल आम आदमी को फायदा होता बल्कि पूरी व्यवस्था ही बदल गई होती। हम सबकुछ खत्म होता नहीं मान रहे। हम सब देख रहे हैं। लेकिन, सरकार ने बेहोशी की दवा दिए बिना ऑपरेशन कर दिया। इसलिए मरीजों को जान गंवानी पड़ी। हम इस प्रस्ताव पर 16 सालों से काम कर रहे हैं जब अर्थक्रांति साल 2000 में स्थापित हुई।
काले धन पर 'सर्जिकल स्ट्राइक' में क्या गड़बड़ी हुई, इस बारे में अनिल बोकिल का कहना है कि उन्होंने प्रधानमंत्री के सामने एक व्यापक प्रस्ताव रखा था जिसके पांच आयाम थे। हालांकि, सरकार ने इनमें सिर्फ दो को ही चुना। यह अचानक उठाया गया कदम था, ना कि बहुत सोचा-समझा। इस कदम का ना ही स्वागत किया जा सकता है और ना ही इसे खारिज कर सकते हैं। हम इसे स्वीकार करने के लिए बाध्य हैं। हमने सरकार को जो रोडमैप दिए थे, उससे ऐसी परेशानियां नहीं होतीं।
बोकिल ने बताया कि 16 सदस्यों की एक तकनीकी समिति ने यह प्रस्ताव दिया जिसने गारंटी दी कि इससे एक भी व्यक्ति प्रभावित नहीं होगा। इस कदम का सिर्फ और सिर्फ ब्लैक मनी, आतंकवाद और फिरौती से जुड़े अपराधों पर प्रहार होता। इससे प्रॉपर्टी की कीमतें कम होतीं और जीडीपी का विस्तार होता। सरकार ने 2,000 रुपये के नोट ला दिए जिसे हम वापस लेने का प्रस्ताव रख रहे हैं। यह तो सिर्फ शुरुआत है। मुख्य अभियान का आगाज तो अभी होना है।
नवभारत टाइम्स डॉट कॉम से साभार
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