May 27, 2016

आपने किसानों को बचाने वाली पोस्ट शेयर होते देखी है...

मैं अक्सर देखता हूं किसी सैनिक के मारे जाने पर पोस्ट घूमने लगती है। पोस्ट शेयर करने वाले लोग अपील करते हैं इसे ज्यादा से ज्यादा लाइक करें, यह देश का सपूत है, इसने देश की रक्षा में अपनी जान गंवाई है। इस पोस्ट को देखते हुए मुझे किसानों की अक्सर याद आती है। 

सोचता हूं आत्महत्या करने वाले किसानों की संख्या अब तीन लाख से उपर हो चुकी है पर इनकी सुरक्षा, समृद्धि और सबलता को बनाए रखने की कोई अपील करती पोस्ट क्यों नहीं दिखती ? जो किसान सैनिकों के पेट पालते हैं, सीमा पर उन्हें खड़े होने लायक बनाते हैं, वह क्या इतने भी महान और कद्र के काबिल नहीं कि उनके जीवन बचाने की गारंटी की भी राष्ट्रीय अपील हो, स्वत:स्फूर्त ढंग से लोग हजारों की संख्या में शेयर करें और सरकार से गारंटी लें कि अगर अगला किसान मरा तो अच्छा नहीं होगा। सरकार को चेताएं कि आत्महत्या रूकी नहीं तो हम सोशल मीडिया से सड़कों पर उतर आएंगे। 

आप खुद देखिए कि सीमा पर तैनात सैनिक के मरने पर 30 लाख से 1 करोड़ तक मिलते हैं पर जो किसान देश को खड़ा होने लायक बनाता है, जिसका अन्न खाकर देश डकार लेता है, उसकी आत्महत्या के बाद कैसी छिछालेदर मचती है। उसने कर्ज और खेती में नुकसान के कारण आत्महत्या की है, यही साबित करने के लिए उसे अधिकारियों को घूस देना पड़ता है। किसान के मरने के बाद उसके बचे परिवार को मुआवजे के लिए बीडीओ, लेखपाल, एसडीएम, क्लर्क, चपरासी समेत नेताओं की इस कदर जी हजूूरी करनी पड़ती है कि भिखमंगे भी शर्मिंदा हो जाएं। 

क्या हम अपने देश के लोगों के त्याग को बांटकर देखेंगे। एक ही घर, गांव और परिवार से निकले सैनिकों और किसानों की संयुक्त भूमिका देश की सीमा से लेकर देश के शरीर को सबल बनाने में एक सी नहीं है। अगर है तो नजरिया बदलिए, एकजुट होइए और किसानों को बचाने के लिए आगे आइए। ​क्योंकि आप भी जानते हेैं और ह भी, सीमा तभी बचेगी जब सैनिक बचेगा,  और सैनिक तभी बचेगा जब किसान बचेगा। किसान नहीं बचा तो न सीमा बचेगी, न सैनिक बचेंगे और न ही देश। 

May 20, 2016

छत्तीसगढ़ में कलेक्टर ऐसे देता है पत्रकार को धमकी

जरा इस आॅडियो का सुनिए.
 https://soundcloud.com/janjwar/aud-20160520-wa00021
जगदलपुर कलेक्टर अमित कटारिया पत्रकार कमल शुक्ला को कैसे गालियां दे रहे हैं और मसल देने की धमकी दे रहे हैं। उन्हें मक्खी और दो—कौड़ी का बोल रहे हैं। जगदलपुर के वरिष्ठ पत्रकार कमल शुक्ला कलेक्टर से बातचीत में उसी कार्यक्रम का हवाला दे रहे हैं जिसमें वह और उनके करीब दर्जन भर पत्रकार साथी हफ्ते पहले दिल्ली आए थे। इन पत्रकार साथियों का दिल्ली आने और जंतर—मंतर पर प्रदर्शन् करने का मकसद छत्तीसगढ़ सरकार और पुलिस द्वारा पत्रकारों पर की जा रही ज्यादती थी।

आॅडिया की पूरी बातचीत यहां पढ़ सकते हैं 

कलेकटर अमित कटारिया :-  हेलो
पत्रकार कमल शुक्ला:- हा सर नमस्कार में कमल शुक्ला बोल रहा हु ..
कलेकटर अमित कटारिया :- हा हा नमस्कार
पत्रकार कमल शुक्ला:- आपका पोस्ट देखा सर में कल वाला
कलेकटर अमित कटारिया :- हा हा ...
पत्रकार कमल शुक्ला:-उस समय भी आप एकदम से निर्णय ले लिये थे कि हमारा आंदोलन नक्सली प्रेरित है कर के ..और कल वाला पोस्ट देखा .. तो मेरे को समझ आ गया की सर क्या गंदा मानसिकता है आपका ..एकदम से आप ऐसा सोच लिये है की नक्सली लोग उनको बुला लेंगे..दिल्ली से ..JNU से की आप धमकाओ लोगो को ...
कलेकटर अमित कटारिया :-  क्या बोला तू ..क्या बोला तू
पत्रकार कमल शुक्ला:- तू तड़ाक क्यों बोल रहे है सर.
कलेकटर अमित कटारिया :- क्या बोला तू गन्दी मानसिकता ..तेरी इतनी हिम्मत दो कौड़ी का आदमी..साला तू किससे बात कर रहा है जानता है?इतनी हिम्मत हो गई साल तुझे मसल दूंगा..
पत्रकार कमल शुक्ला :- मसल दोगे न सर मसलने के लिए पैदा हुए है..
कलेकटर अमित कटारिया :-  चूजे,मच्छर, मक्खी है तू..
पत्रकार कमल शुक्ला :- हम तो मच्छर मक्खी पैदा होते है सर ..

May 12, 2016

शादियों में सबके अपने कोने होते हैं

शादियों में सबके अपने कोने होते हैं और हर कोई अपने परिचितों—दोस्तों के साथ किसी न किसी टॉपिक पर लगा रहता है। मुझे भी एक कोने में जगह मिली और कुछ लोग वहां एक हॉट सामाजिक सवाल पर लगे हुए थे। सवाल बिल्कुल समय से था और वास्ता उसका सबसे था।
टॉपिक था मोबाइल में पासवर्ड डालना सही है या गलत, नैतिक है या अनैतिक। और क्या जो लोग अपनी मोबाइल में पासवर्ड डालते हैं उन्हें संदेहास्पद माना जाए, अनैतिक कहा जाए। क्या मोबाइल पासवर्ड को डिजिटल चरित्र प्रमाण पत्र के तौर पर लिया जाए!
देर तक इस मसले पर बहस होती रही। सबने अपने अनुभव और समझदारी की बातें कीं। बहस कर रहे लोगों ने एक स्वर में माना भी कि जो पासवर्ड डालते हैं, वह संदेहास्पद होते हैं।
बहस कर रहे ये लोग ईमानदार किस्म के थे कि इन्होंने उदाहरण के तौर पर खुद को भी शामिल करने से गुरेज नहीं किया। माना कि वे सभी खुद भी पासवर्ड डालते हैं और सबको भाई, बाप, दोस्त , पति , पत्नी, प्रेमी, प्रेमिका से कुछ न कुछ छुपाना होता है। एक ने तो यह भी कहा कि वह इसलिए पासवर्ड डालता है क्योंकि उसका बॉस इधर—उधर टहलते हुए किसी का फोन उठाकर देखने लगता है।
हमारी सरकार और पार्टियां भले ही जनता को किसी और सामाजिक मसले की ओर खींचकर ले जाएं लेकिन आप भी मानेंगे कि आजकल मोबाइल में पासवर्ड का सवाल एक राष्ट्रीय सांस्कृतिक विमर्श का विषय बना हुआ है। कोई ऐसी सार्वजनिक जगह नहीं जहां युवा आपको ऐसी बातें करते न दिख जाएं।
लेकिन आप इस सवाल पर सोचें और कुछ राय दें उससे पहले बात यह कि पासवर्ड डालना ही क्यों है? यह समस्या बनी ही क्यों? किसी और कि मोबाइल, कोई और छूता ही क्यों है, किस नैतिक साहस के साथ देखता है, उसे चेक करता है। थोड़ी भी शर्म नहीं आती ऐसे लोगों को। फिर वह क्यों रहते हैं एक साथ, एक छत के नीचे या क्यों खाते हैं कसमें एक—दूसरे के संग होने की, जीने की। इतना न्यूनतम विश्वास एक दूसरे के लिए हमारे में नहीं बचा है फिर हम बराबरी और भरोेसे का समाज बना कैसे सकते हैं।
पर इन सबके बीच सबसे घातक तो यह है कि जिसकी मोबाइल चेक हो रही है वह भी और जो चेक कर रहा है वह भी, इस घटिया हरकत को महान भारतीय परंपरा की मान रहा है। वह प्राइवेसी जैसे किसी मानवाधिकार या अधिकार को समझता ही नहीं है। वह इस खेल में खुद को भागीदार बना रहा है पर इस वाहियात हरकत पर नफरत या विरोध में दो शब्द नहीं दर्ज करा पा रहा। हालत यह है कि जब जिसको मौका मिलता है, वह चेक कर लेता है। इस मामले में सभी आरोपी हैं और सभी पीड़ित। कभी जो आरोपी है वह पीड़ित बन जाता है और कभी पीड़ित, आरोपी।
हमारे भीतर इतनी जनतांत्रिक चेतना और भरोसा का बोध नहीं है कि हम बुलंद हो बोल सकें कि प्राइवेसी भी कोई चीज होती है भाई।
मैं डिजिटल होते समाज का इसे एक बड़ा सवाल मानता हूं क्योंकि इससे समाज तकनीकी से तो आधुनिक हो रहा है पर चेतना के स्तर पर हमारी समझ पुरानी, दकियानूस और डिक्टेट करने वाली बनी हुई है। इस समझदारी के रहते चाहे हम इंसान ही डिजिटल क्यों न बना लें पर हम अपने देश और समाज को बराबरी, सहजता और सम्मान वाला कभी न बना पाएंगे। ‪#‎hamtobolenge‬

मर्दो का बहुमत औरतों के बारे में जनमत कैसे बनाता है...

मर्दो का बहुमत औरतों के बारे में जनमत कैसे बनाता है, उसका एक मजमून देखिए।

दिल्ली के राजीव चौक मेट्रो स्टेशन पर यात्रियों के चढ़ने के साथ चटाक की आवाज आई। साफ था कि किसी के गाल पर जोर का तमाचा लगा है। देखा तो पता चला कि तमाचा एक लड़की ने एक लड़के के गाल पर मारा है। तमाचा मारने वाली लड़की, लड़के को डांट रही थी। बदतमीज और बेशर्म बोल रही थी। लड़का भौचक था जबकि भीड़ तत्पर निगाहों से दोनों को देख रही थी।

लड़का अकबकाते हुए बोला, 'मैंने क्या किया, मैंने क्या किया। इतनी भीड़ में धक्का लग गया तो मैं क्या करूं।'
लड़की, 'धक्का लगा है। बताउं मैं तुम्हें। एक और जोर की लगाउंगी तो सब याद आ जाएगा।'

भीड़ और भी तत्परता से कभी लड़के की तरफ तो कभी लड़की ओर ताके जा रही थी। लड़का वहीं गेट पर खड़ा रहा और गुस्से में तमतमाई लड़की दूसरे बोगी की ओर बढ़ गयी। थोड़ी देर में लड़का भी दूसरी ओर खिसक लिया।

तबतक ट्रेन मंडी हाउस से आगे बढ़ चुकी थी और मौन भीड़ विमर्श की मुद्रा में आ चुकी थी। विमर्श की शुरुआत करते हुए एक दक्षिण भारतीय हिंदी बोलने वाले सज्जन ने कहा, 'मैंने देखा नहीं कि लड़के ने क्या किया, लेकिन जब इतनी परेशानी रहती तो इन लोगों को लेडिज बोगी में जाना चाहिए। बताइए, मारने का क्या? पलट कर वह भी मार दे फिर हम ही लोग कहेंगे कि लेडिज पर हाथ उठाता है।'

बात को आगे बढ़ाते हुए एक दूसरे अधेड़ ने कहा, 'मैंने भी नहीं देखा कि लड़के ने क्या किया पर इन लड़कियों के साथ अपराध इसीलिए हो रहे हैं कि मर्दों का यह कोर्इ् वैल्यू ही नहीं समझतीं। जब कोई लड़की ऐसे सरेआम मर्द को बेइज्जत करेगी तो क्या होगा। अगर वह लड़का अपने पर आ जाए और कुछ कर दे तो। वैसे भी तेजाब फेंकने की कितनी घटना होने लगी हैं आजकल।'

तीसरी राय एक नौजवान की ओर से आई, 'ऐसी लड़कियों के ही बलात्कार होते हैं। कैसे ठुमक के चली गयी। अरे क्या किया होगा लड़के ने। भीड़ में धक्का ही लगा होगा न। क्यों चलती है मेट्रो से। इतने ही नखरे हैं तो गाड़ी से चला करे, बोल दे बाप को।'

चौथी राय उस आदमी की ओर से आई जिसके गले में मिनिस्ट्री आॅफ होम अफेयर्स का आईकार्ड गले में लटका था। उनके विचार में, 'पता नहीं लड़के ने लड़की के साथ किया क्या पर इसमें मैं लड़की से ज्यादा मां—बाप को दोषी मानता हूं। वह बेटियों को पारिवारिक मूल्य सिखा नहीं रहे। मेरी भी बेटियां हैं, हमलोग भी परिवार वाले हैं, कभी कोई संस्कारी लड़की ऐसा करेगी नहीं। वह सह लेगी चुपचाप। आखिर क्या मिला उस लड़की को। जो बात छुपी हुई थी वह सबके बीच आ गई, क्या इज्जत रह गयी।'

ऐसी घटनाओं के एकाध किस्से आपके पास भी होंगे। पर इस घटना में आपने गौर किया होगा कि राय बनाने वालों में से किसी को पता नहीं कि लड़के ने लड़की के साथ क्या किया, किस रूप में छेड़खानी की, क्योें लड़की ने चाटा मारा। पर राय बना ली, अगल—बगल वालों को प्रभावित किया। इतना ही नहीं राय बनाने वाले ये लोग जहां काम करते होंगे, पढ़ते होंगे या रहते होंगे, वहां भी कल को औरतों—लड़कियों की बात आने पर आंखों देखी इस साक्ष्य को कुर्सी पर मुक्का मारकर दावे के साथ पेश करेंगे।

पर आप सब जोकि इस घटना के प्रत्यक्षदर्शी नहीं है, सिर्फ इस वाकये के एक पाठक भर हैं, क्या प्रत्यक्षदर्शियों के जनमत बनाने की इस प्रक्रिया के साथ आप खड़े होना जायज मानते हैं। नहीं न। फिर इसे रोकिए, चुप मत बैठिए क्योंकि बहुमत द्वारा जनमत बनाने का यह तरीका बहुत ही खतरनाक है। सिर्फ औरतों के लिए नहीं बल्कि पूरे समाज के लिए, एक सक्षम मुल्क के लिए।' ‪#‎metrodairy‬

Apr 14, 2016

6 लाख गावों के देश में क्या एक गांव हैं जहां दलितों के साथ छुआछूत नहीं होती

देश के आखिरी आदमी के नेता आंबेडकर की इतनी ऊँची बोली पहली बार लगी है। जिसे देखो वही आंबेडकर को अपनी ओर घसीट रहा है। समझ में नहीं आ रहा कि राजनीतिक पार्टियों का यह ह्रदय परिवर्तन उनको बाजार में नीलाम करने लिए है या फिर मंशा कुछ और है। 

ऐसे में मैं इस आशंका से उबरने के लिए एक जानकारी चाहता हूँ कि क्या आप 6 लाख गावों के इस देश में छह गांव भी ऐसा सवर्णों का जानते हैं जहाँ दलितों के साथ भेदभाव और छुआछूत नहीं होती। छह छोड़िये एक ही बता दीजिये। अगर नहीं तो आंबेडकर को अपने-अपने पाले में घसीटना छोड़कर पहले एक ऐसा गांव बनाइये और भरोसा रखिये वहां आंबेडकर खुद चलकर आ जायेंगे, आपको ईंट पर खड़ा होकर खुद को आंबेडकरवादी होने की बांग नहीं देनी पड़ेगी। 

तीन दिन पहले दिल्ली के कॉफी हाउस में मिले एक मित्र आंबेडकर जयंती से जुड़ा एक किस्सा सुनाने लगे। बताया कि तीन—चार साल पहले इलाहाबाद में आंबेडकर जयंती पर एक कार्यक्रम था। कार्यक्रम खत्म हो गया तो हमलोग कार्यक्रम के आयोजक के घर चाय—पानी और समीक्षा बैठक के लिए पहुंचे। हमलोग कमरे में अंदर बैठे थे और आयोजक का ड्राईवर बाहर ओसारे में था। 

पर उसे हम कमरे से साफ देख सकते थे। हमने देखा कि आयोजक का नौकर जैसे ही चाय लेकर ड्राईवर के पास आया, ड्राईवर तत्काल खड़ा हुआ, ड्राईवर ने दिवार के बीच बने झरोखों में हाथ डाला, एक कप निकाली, नौकर को रूकने को बोला, दौड़कर नल पर पहुंचा, कप धोई, चाय लिया, चाय पी और फिर कप धोकर वापस झरोखों में रख दिया।

किस्सा सुनाने वाले मित्र थोड़ा रूककर बोले, 'यह कमरे के बाहर का सीन था और अंदर आयोजक लगातार हमलोगों को आंबेडकर दृष्टि अपनाने पर जोर दे रहे थे।'

Apr 13, 2016

अधिक पैसा मिला तो आधा किलो दाल ​खरीदूंगा

अजय प्रकाश

उत्तर प्रदेश के रामपुर से बरेली जाने के रास्ते में शीशगढ़ बाजार में हमारी मुलाकात राजेश लोध से एक किराने के दुकान पर हुई। वह बाजार के बगल के एक भट्टे पर काम करते हैं। परिचय के बाद उन्होंने अपने परिवार की हालत कही और बताया कि रोज वह सौ—सवा सौ रुपए कमा लेते हैं। पर ईंट लादने—उतारने में कई बार चोट लग जाती है या किसी दिन बहुत हरारत होती है तो काम पर नहीं जा पाते। 
राजेश लोध के मुताबिक, 'मैं आठ बरस की उम्र से काम कर रहा हूं। पहले भट्टे पर मिट्टी देने का काम करता था, फिर पाथने का काम किया और अब ईंट लादने का करता हूं। लेकिन कभी ऐसा नहीं हुआ कि हम इस किराने की दूकान के कर्जदार नहीं रहे हों।'
दूकानदार, 'अरे तुम हमें क्यों बदनाम कर रहे हो!'
राजेश, 'बदनाम नहीं कर रहा अपनी हालत बता रहा हूं। मेरी इतनी कभी कमाई नहीं हुई कि पेट से आगे बढ़ पाएं।'
मैं, 'मगर सरकार की मनरेगा स्कीम आप जैसे गरीबों के लिए ही है। वहां क्यों नहीं कर लेते काम।'
राजेश लोध, 'मतलब नरेगा। अब बंद है। मैंने बहुत दिनों से नाम नहीं सुना उसका। पर वहां भी काम किया और पेमेंट के लिए तरस गया। नरेगा के खाते में पैसा हफ्ते भर में भी नहीं आता। पता नहीं कितने महीने लग जाते हैं पैसा आने में। तबतक कैसे जिएं। इसका भी उपाय बताना चाहिए। हमलोग रोज पेमेंट वाले हैं। नहीं मिलेगा तो स्वर्ग सिधार जाएंगे। अकेले होता फिर कोई बात नहीं थी पर तीन बच्चों और बीवी के साथ ऐसा करना पाप ही होगा। आखिर उनका आसरा मैं ही हूं न।'
मैं, 'अच्छा मान लीजिए आपकी कमाई अभी से अच्छी होने लगे फिर आप जीवन का कौन सा पहला बकाया काम पूरा करेंगे। कौन सी इच्छा पूरी करेंगे।'
राजेश लोध, 'इस सेठ के यहां से आधा किलो सफेद उड़द की दाल खरीदेंगे। बीबी से बोलेंगे अच्छे से तड़का लगाकर बनाओ और उस दिन भरपेट दाल खाएंगे। उसी भी खिलाएंगें, बच्चे तो खाएंगे ही।'
मैं, 'क्या आप अभी दाल नहीं खरीदते।'
राजेश लोध, 'ऐसा भी नहीं है। खरीद लेते हैं महीने में एकाध—बार। पर सौ—डेढ़ सौ ग्राम। आधा किलो की बात ही कुछ और होगी। वैसे तो पांच आदमी के परिवार में पाव भर दाल भी बहुत है पर आधा किलो में छक कर खाएंगे और तान कर सोएंगें।'
मैं, 'आपने कबसे दाल नहीं खाई है।'
राजेश लोध, 'पिछले साल जेठ में मेरे भाई के साले की शादी थी। बरेली—मीरगंज पड़ता है न, वहीं पे। उसी के यहां दो—तीन दिन तक रोज खाया था। अपने घर में लाते हैं मगर इतना लाते नहीं कि सबका हो सके। आप मेरे घर चलिए और देखिए बच्चे दाल को कैसे साफ करते हैं। जबतक खतम नहीं होती तबतक क्या मजाल तीनों में से कोई मुंड उठा ले।'
इतना कहने के बाद राजेश पैर को मिट्टी पर रगड़ने लगते हैं और मेरी ओर इशारा कर कहते हैं, 'इस प्सासी मिट्टी को देखिए। इस पर आसमान के चार बूंद पानी गिरा देने से इसकी तपिश कम होगी क्या, अलबत्ता भभका ही छोड़ेगी। साहब... कभी—कभार मेरी मेहरी बच्चों के खाने के बाद बर्तन में लगी दाल को आगे बढ़ा देती है। उससे यह तो है कि मुझे दाल का स्वाद याद है पर पता नहीं मेरी मेहरी को याद है भी या नहीं। साले की शादी के बाद उसने कभी बर्तन भी नहीं पोछा रोटी से।'
मैं, 'उसी में से मेहरी को भी कह देते पोछने के लिए। मिलजुल के पोछ लेते।'
राजेश लोध, 'हा...हा। उसमें कुछ होता भी है जो उसको पोछने के लिए दूंगा। मैं उसकी खुशी के लिए पोंछ लेता हूं। मेरे इतना कर देने भर से उसको बड़ा संतोष मिलता है। नहीं तो रोटी मुझे लार से ही गटकनी पड़ती है।'

Feb 24, 2016

जेएनयू छात्रों के बलात्कार का आह्वान करने वाला नहीं है दैनिक जागरण का पत्रकार

समाज में विचाारधाराओं का आपसी पूर्वग्रह इतना बड़ा होता जा रहा है कि हम किसी खबर के सच और झूठ का फैसला तथ्यों के आइने में नहीं बल्कि विचारधाराओं की अंध​भक्ति में कर रहे हैं। इस मामले में संघी या वामपंथी कई बार एक जैसे नजर आते हैं। वे तथ्यों को जांचे बिना अपने वैचारिक मान्यताओं को सच बनाकर पेश करने लगते हैं।

आज सुबह से कई वेबसाइट्स पर दैनिक जागरण से जुड़े किसी डिप्टी न्यूज एडिटर डॉक्टर अनिल दीक्षित का पोस्ट यह कहते हुए शेयर हो रहा है कि उसने जेएनयू से गिरफ्तार उमर खालिद और अनिर्बान भट्टाचार्य के साथ जेल में बलात्कार के लिए कैदियों को उकसाने वाला पोस्ट लिखा है। तमाम ​वामपंथी पक्षधर, मुस्लिम इस खबर को चटर—पटर बनाकर तरह—तरह से पेश कर रहे हैं। शेयर करने वालों में कई साइट्स, पत्रकार और बुद्धिजीवी शामिल हैं।

लेकिन इस मामले में सबसे पहले क्या होना चाहिए था। क्या दैनिक जागरण से एक बार नहीं पूछा जाना चाहिए था कि क्या उनका यह पत्रकार है और उस पर संस्थान ने क्या कार्रवाई किया। या अगर सीधे नहीं पूछ सकते थे तो एक बार किसी पत्रकार से ही जान लेते। पर हममें से किसी ने यह नहीं किया। बस मान्यता के आधार पर समझ बना ली कि जागरण का पत्रकार होगा तो संघी ही होगा और ऐसा ही लिख सकता हैै।

जागरण से मिली जानकारी के मुताबिक इस नाम का कोई डिप्टी न्यूज एडिटर उनके संस्थान में नहीं है। और ​अनिल दीक्षित ने भी प्रोफाइल में 'फॉर्मर डिप्टी न्यूज एडिटर' लिखा है। प्रोफाइल के मुताबिक अनिल दीक्षित पेशे से वकील होने का दावा करते हैं।

ऐसे में सबसे बड़ा सवाल यही कि यह गलती वामपंथियों के बड़े धड़े से कैसी हुई। क्या वह धीरे—धीरे ​दक्षिणपंथी मुर्खतवाद के शिकार होते जा रहे हैं और उन्हें भी लगता है कि विचारधारा की मजबूती के लिए फर्जी जानकारियों और पूर्वग्रहग्रस्त तथ्यों का सहारा लिया जाना चाहिए।

या फिर वह एक एनडीटीवी को अपना मानकर बाकी मीडिया को अपना दुश्मन समझ बैठे हैं। 

यहां इस जवाब का कोई मतलब नहीं है कि पहले उसकी प्रोफाइल में दैनिक जागरण ही लिखा था। कल को कोर्इ् अपनी प्रोफाइल पर कुछ भी लिख दे तो आप उसके लिए किसी संस्थान को जिम्मेदार कैसे मान लेंगे और बिना जांचे - परखे  गुट बनाके उसको बदनाम करने में जुट  जाएंगे।

Feb 17, 2016

‘व्यभिचारी का बिस्तर’ बनने से बाज़ आये दिल्ली पुलिस

मुरली मनोहर प्रसाद सिंह जनवादी लेखक संघ

जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय और प्रेस क्लब ऑफ़ इंडिया, इन दोनों से जुड़े मामलों में आरएसएस-भाजपा और उसके इशारे पर काम करती दिल्ली पुलिस का रवैया बेहद चिंताजनक है. हिन्दुत्ववादी ताक़तें संविधान को ताक़ पर रखकर राज्य की मशीनरी का इस्तेमाल करते हुए हर तरह की असहमति को कुचल देने पर आमादा हैं. 

दिल्ली पुलिस के लिए गोया क़ानून की किताब का कोई मतलब नहीं रह गया है और वह सीधे-सीधे अपने राजनीतिक आक़ाओं से दिशा-निर्देश ले रही है. जेएनयू से जिस तरह छात्र-संघ अध्यक्ष कन्हैया कुमार को गिरफ़्तार किया गया, जिस तरह पटियाला हाउस कोर्ट में वकील की वर्दी पहने आरएसएस के गुंडों ने पत्रकारों और विद्यार्थियों के साथ मारपीट करके उन्हें बुरी तरह घायल किया और पुलिस मूक दर्शक बनी देखती रही, जिस तरह पुलिस कमिश्नर ने उस भयावह घटना को ‘मामूली झड़प’ बताकर किनारे करने की कोशिश की, एफ़आइआर दर्ज करने में ना-नुकर की गयी और अंततः सभी चेहरों की पहचान होने के बावजूद ‘अज्ञात व्यक्तियों’ के ख़िलाफ़ एफ़आइआर दर्ज की गयी—ये सब इस बात का शर्मनाक सबूत हैं कि कानून के रक्षक ही उसके भक्षक की भूमिका में उतर आये हैं. 

पटियाला हाउस कोर्ट की घटना को मामूली झड़प साबित करने के लिए केन्द्रीय गृह-राज्यमंत्री किरण रिजिजू का यह कहना कि ‘वहाँ कोई मर्डर तो नहीं हुआ था ना’, बहुत ही दुर्भाग्यपूर्ण है. उधर प्रेस क्लब ऑफ़ इंडिया में अफज़ल गुरु की याद में हुए आयोजन में जो नारे लगे, उसके आरोप में आयोजन से जुड़े होने के नाम पर दिल्ली विश्वविद्यालय और प्रेस क्लब ऑफ़ इंडिया से सम्बद्ध कई बुद्धिजीवियों-पत्रकारों को पुलिस लगातार परेशान करती रही. 

उन्हें संसद भवन थाने में बुलाकर पूछताछ के नाम पर आधी-आधी रात तक बिठाए रखने का सिलसिला कई दिनों तक चलता रहा और अभी भी जारी है. इनमें प्रो. अली जावेद, प्रो. निर्मलान्शु मुखर्जी और सेवानिवृत्त प्रो. विजय सिंह के अलावा श्री राहुल जलाली और नसीम अहमद क़ाज़मी भी शामिल हैं.

एक ओर बहुत कमज़ोर आधारों पर विद्यार्थियों तथा बुद्धिजीवियों के ख़िलाफ़ दिल्ली पुलिस की सख्त कार्रवाई और दूसरी ओर हिन्दुत्ववादी ताक़तों की साजिशों तथा उनके द्वारा कानून के खुल्लमखुल्ला उल्लंघन-अनादर के प्रति दिल्ली पुलिस का बेहद नरम रवैया—यह दिखाता है कि जिन पर कानून-व्यवस्था बनाए रखने का दारोमदार है, वे ही उसकी धज्जियां उड़ाने का साधन बन रहे हैं. मुक्तिबोध की पंक्तियाँ याद करें तो यह किसी व्यभिचारी का बिस्तर बन जाने जैसा है. 

आरएसएस-भाजपा और उससे जुड़े अनगिनत छोटे-बड़े संगठन हास्यास्पद तरीक़े से, झूठ और फ़रेब का सहारा लेकर देशद्रोह का आरोप मढ़ते हैं और पुलिस उस दिशा में सक्रिय हो जाती है जिधर उनकी उंगली उठी होती है. यह पूरा पैटर्न इतना ख़तरनाक है कि किसी भी और चीज़ को देशद्रोह की श्रेणी में रखने से पहले इसे ही देशद्रोह कहना उचित लगता है. यह देश की जनता के ख़िलाफ़ है, देश के संविधान और कानून के ख़िलाफ़ है, विवेक और अभिव्यक्ति की आज़ादी के ख़िलाफ़ है, बहुलता और विविधता में एकता के उन मूल्यों के ख़िलाफ़ है जिन पर भारतीय गणतंत्र की नींव रखी गयी है.

केंद्र सरकार, दिल्ली पुलिस और इन दोनों को अपने फौलादी नियंत्रण में चलाती आरएसएस-भाजपा की कारगुजारियों की हम कठोर शब्दों में निंदा करते हैं. जनवादी लेखक संघ यह मांग करता है कि विद्यार्थियों, पत्रकारों पर हमला करनेवाले—जिनमें भाजपा विधायक ओ पी शर्मा भी शामिल हैं—अविलम्ब गिरफ्तार किये जाएँ, कन्हैया कुमार को रिहा किया जाए, जनेवि में पुलिस की अवांछित दखल पर रोक लगे, और प्रेस क्लब ऑफ़ इंडिया के आयोजन के नाम पर महत्वपूर्ण बुद्धिजीवियों और पत्रकारों का पुलिसिया उत्पीड़न बंद किया जाए.