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Feb 17, 2016

‘व्यभिचारी का बिस्तर’ बनने से बाज़ आये दिल्ली पुलिस

मुरली मनोहर प्रसाद सिंह जनवादी लेखक संघ

जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय और प्रेस क्लब ऑफ़ इंडिया, इन दोनों से जुड़े मामलों में आरएसएस-भाजपा और उसके इशारे पर काम करती दिल्ली पुलिस का रवैया बेहद चिंताजनक है. हिन्दुत्ववादी ताक़तें संविधान को ताक़ पर रखकर राज्य की मशीनरी का इस्तेमाल करते हुए हर तरह की असहमति को कुचल देने पर आमादा हैं. 

दिल्ली पुलिस के लिए गोया क़ानून की किताब का कोई मतलब नहीं रह गया है और वह सीधे-सीधे अपने राजनीतिक आक़ाओं से दिशा-निर्देश ले रही है. जेएनयू से जिस तरह छात्र-संघ अध्यक्ष कन्हैया कुमार को गिरफ़्तार किया गया, जिस तरह पटियाला हाउस कोर्ट में वकील की वर्दी पहने आरएसएस के गुंडों ने पत्रकारों और विद्यार्थियों के साथ मारपीट करके उन्हें बुरी तरह घायल किया और पुलिस मूक दर्शक बनी देखती रही, जिस तरह पुलिस कमिश्नर ने उस भयावह घटना को ‘मामूली झड़प’ बताकर किनारे करने की कोशिश की, एफ़आइआर दर्ज करने में ना-नुकर की गयी और अंततः सभी चेहरों की पहचान होने के बावजूद ‘अज्ञात व्यक्तियों’ के ख़िलाफ़ एफ़आइआर दर्ज की गयी—ये सब इस बात का शर्मनाक सबूत हैं कि कानून के रक्षक ही उसके भक्षक की भूमिका में उतर आये हैं. 

पटियाला हाउस कोर्ट की घटना को मामूली झड़प साबित करने के लिए केन्द्रीय गृह-राज्यमंत्री किरण रिजिजू का यह कहना कि ‘वहाँ कोई मर्डर तो नहीं हुआ था ना’, बहुत ही दुर्भाग्यपूर्ण है. उधर प्रेस क्लब ऑफ़ इंडिया में अफज़ल गुरु की याद में हुए आयोजन में जो नारे लगे, उसके आरोप में आयोजन से जुड़े होने के नाम पर दिल्ली विश्वविद्यालय और प्रेस क्लब ऑफ़ इंडिया से सम्बद्ध कई बुद्धिजीवियों-पत्रकारों को पुलिस लगातार परेशान करती रही. 

उन्हें संसद भवन थाने में बुलाकर पूछताछ के नाम पर आधी-आधी रात तक बिठाए रखने का सिलसिला कई दिनों तक चलता रहा और अभी भी जारी है. इनमें प्रो. अली जावेद, प्रो. निर्मलान्शु मुखर्जी और सेवानिवृत्त प्रो. विजय सिंह के अलावा श्री राहुल जलाली और नसीम अहमद क़ाज़मी भी शामिल हैं.

एक ओर बहुत कमज़ोर आधारों पर विद्यार्थियों तथा बुद्धिजीवियों के ख़िलाफ़ दिल्ली पुलिस की सख्त कार्रवाई और दूसरी ओर हिन्दुत्ववादी ताक़तों की साजिशों तथा उनके द्वारा कानून के खुल्लमखुल्ला उल्लंघन-अनादर के प्रति दिल्ली पुलिस का बेहद नरम रवैया—यह दिखाता है कि जिन पर कानून-व्यवस्था बनाए रखने का दारोमदार है, वे ही उसकी धज्जियां उड़ाने का साधन बन रहे हैं. मुक्तिबोध की पंक्तियाँ याद करें तो यह किसी व्यभिचारी का बिस्तर बन जाने जैसा है. 

आरएसएस-भाजपा और उससे जुड़े अनगिनत छोटे-बड़े संगठन हास्यास्पद तरीक़े से, झूठ और फ़रेब का सहारा लेकर देशद्रोह का आरोप मढ़ते हैं और पुलिस उस दिशा में सक्रिय हो जाती है जिधर उनकी उंगली उठी होती है. यह पूरा पैटर्न इतना ख़तरनाक है कि किसी भी और चीज़ को देशद्रोह की श्रेणी में रखने से पहले इसे ही देशद्रोह कहना उचित लगता है. यह देश की जनता के ख़िलाफ़ है, देश के संविधान और कानून के ख़िलाफ़ है, विवेक और अभिव्यक्ति की आज़ादी के ख़िलाफ़ है, बहुलता और विविधता में एकता के उन मूल्यों के ख़िलाफ़ है जिन पर भारतीय गणतंत्र की नींव रखी गयी है.

केंद्र सरकार, दिल्ली पुलिस और इन दोनों को अपने फौलादी नियंत्रण में चलाती आरएसएस-भाजपा की कारगुजारियों की हम कठोर शब्दों में निंदा करते हैं. जनवादी लेखक संघ यह मांग करता है कि विद्यार्थियों, पत्रकारों पर हमला करनेवाले—जिनमें भाजपा विधायक ओ पी शर्मा भी शामिल हैं—अविलम्ब गिरफ्तार किये जाएँ, कन्हैया कुमार को रिहा किया जाए, जनेवि में पुलिस की अवांछित दखल पर रोक लगे, और प्रेस क्लब ऑफ़ इंडिया के आयोजन के नाम पर महत्वपूर्ण बुद्धिजीवियों और पत्रकारों का पुलिसिया उत्पीड़न बंद किया जाए.