Aug 3, 2011

आरक्षण’ के विरोध में उतरे आरक्षित

‘गंगाजल, शूल और राजनीति जैसी चर्चित फिल्में बनाने वाले प्रकाश झा ने   'आरक्षण' पर फिल्म बनाकर  मधुमक्खी के छत्ते में हाथ डाल दिया  है...

आशीष वशिष्ठ

प्रकाश  झा निर्देशित  फिल्म आरक्षण रिलीज होने से पहले ही विवादों में घिर गई है। केंद्रीय अनसूचित जाति आयोग और राजनीतिक दलों ने फिल्म का विरोध कर रहे हैं। सामाजिक संगठनों और राजनीतिक दलों को आशंका  है कि फिल्म में आरक्षण को लेकर जो कुछ भी कहा गया है, उससे  देश में अशांति और भेदभाव का माहौल बन सकता है।

आरक्षण फिल्म में दीपिका और अमिताभ बच्चन

केंद्रीय अनुसूचित जाति आयोग के अध्यक्ष पीएल पुनिया ने फिल्म निर्देशक प्रकाश  झा को फिल्म रिलिज करने से पूर्व आयोग के समक्ष फिल्म की स्पेशल स्क्रीनिंग के लिए कहा है।

प्रकाश झा तमाम आरोपों,आशंकाओं,आलोचनाओं और सवालों के बीच फिल्म के प्रचार-प्रसार और पब्लिसिटी में व्यस्त हैं। अमिताभ बच्चन की प्रमुख भूमिका वाली फिल्म‘आरक्षण’के जारी विरोध को डॉ.बाबासाहेब आंबेडकर के पोते एवं पूर्व सांसद प्रकाश आंबेडकर ने पब्लिसिटी स्टंट बताया है।

महाराष्ट्र के लोक निर्माण मंत्री छगन भुजबल ने झा को अपनी फिल्म प्रदर्शित करने से पहले कम से कम कुछ बड़े नेताओं को दिखाने की मांग की है। आगामी 12अगस्त को फिल्म देशभर के सिनेमाघरों में दस्तक देगी। गौरतलब है कि आरक्षण का मुद्दा आजादी के समय से ही देश  के लिए गंभीर और संवेदनशील मुद्दा रहा है।

आरक्षण को लेकर एक तरह से पूरा देश आरक्षण और गैर-आरक्षित वर्ग के बीच बंटा हुआ है। संविधान प्रदत्त व्यवस्था के तहत देश के बड़ा तबका सरकारी नौकरियों, प्रमोशन और शिक्षण  संस्थाओं में आरक्षण का लाभ पाता है। ऐसे में जिस वर्ग आरक्षण के दायरे से बाहर है वो अंदर ही अंदर आरक्षण का लाभ पा रही जातियों और वर्ग से मनभेद और मतभेद रखता है।

अभी हाल ही में गुर्जर और जाट संप्रदाय ने आरक्षण कोटा पाने के लिए पाने के लिए उग्र प्रदर्शन   किया,जिससे सरकार और आम आदमी को भारी असुविधा और परेशानी का सामना करना पड़ा था। 1991में तत्कालीन प्रधानमंत्री वीपी सिंह ने आरक्षण के लिए मंडल आयोग की सिफारिशों  का बंडल खोल कर जो नादानी की थी उसका हश्र सारे देश को याद है।

आरक्षण के विरोध में देश भर में आत्मदाह की बाढ़ आ गयी थी। वीपी सिंह की नालायकी ने देश को हिंसा,आगजनी और अनिष्चय की ओर धकेल दिया था। असल में देश के अंदरूनी सामाजिक ढांचे, व्यवस्था,परंपराओं और संविधान की रीति-नीतियों में जमीन आसमान का अंतर है।

संविधान निर्माण के समय देष के वंचितों,पिछड़ों और अनुसूचित जाति-जनजातियों के उत्थान के लिए एक निष्चित अवधि तक आरक्षण की सुविध और व्यवस्था का प्रावधान था। लेकिन आजादी के 64 सालों के बाद भी आरक्षण व्यवस्था बदस्तूर जारी है, और सरकारी नीतियों के चलते आंषिक परिवर्तन और विकास के अलावा कोई खास फर्क आरक्षण का लाभ उठा रहे वर्ग में दिखाई नहीं देता है।
प्रकाश झा सामयिक और सामाजिक  फिल्में बनाने के लिए जाने जाते हैं। गंगाजल,शूल,राजनीति जैसी चर्चित फिल्में बनाने वाले प्रकाश झा  अहम और बेहद नाजुक मसले 'आरक्षण' पर फिल्म बनाकर मानो मधुमक्खी के छत्ते में हाथ डाला है।हालांकि सेंसर बोर्ड की एक्सपर्ट कमेटी फिल्म को क्लियरेंस दे चुकी है.  

असल में राजनीतिक दलों को इस बात का भी खतरा है कि फिल्म देखकर अगर देष की जनता को आरक्षण का सच और पर्दे के पीछे की राजनीति का पता चल गया तो उनके विरूद्व जनमत तैयार हो सकता है। असल में आरक्षण ने देष की दिशा और दशा बदलने में बड़ी भूमिका निभायी है, लेकिन पिछले कई दशकों से राजनीतिक दल आरक्षण के बल पर वोट बैंक की गंदी और ओछी राजनीति कर रहे हैं वो देश को दो धड़ों में बांट रहा है।

ज्वंलत और सामाजिक मुद्दों पर फिल्म बनाना जितना आसान लगता है, यह काम उतना ही कठिन होता है। सच यह है कि बॉलीवुड में ऐसे गिने चुने ही फिल्मकार हैं,जो सामयिक मुद्दों को सेल्युलाइड पर उतारने की सामर्थ्य रखते हैं। प्रकाश झा ने आरक्षण जैसे मुद्दे पर फिल्म बनाकर बड़ी हिम्मत का काम किया है। सिनेमाघरों में प्रदर्शित होने से पहले ही विवादों में घिर गई झा निर्देशित फिल्म में अमिताभ बच्चन, सैफ अली खान, दीपिका पादुकोण और मनोज वाजपेयी ने निभायी हैं।



लिंग परिवर्तन का पितृसत्तात्मक बाज़ार


आगरा में पांच लड़कियां सेक्स परिवर्तन कराके लड़का बनी हैं। दिल्ली में दो लड़कियों ने ऐसा किया है. यह महज इत्तफाक नहीं है कि भारत में लिंग परिवर्तन कराने वालों में लड़कियों की संख्या ज्यादा है...

गायत्री आर्य

जून 2010 में भुवनेश्वर की एक महिला वकील ने लिंग परिवर्तन कराया। उम्र के तीसरे दशक में जी रही इस महिला वकील का कहना है कि उस पर परिवार का शादी के लिए बहुत दबाव था और वह समाज द्वारा लड़कियों पर थोपी जाने वाली पारिवारिक जिंदगी नहीं जीना चाहती। लड़का बन कर वह खुश है क्योंकि अब कोई उसे शादी के लिए तंग नहीं करेगा।

उसका मानना है कि औरत के रुप में तकलीफें झेलते जाने से ज्यादा बेहतर है पुरूष बनकर जीना। विज्ञान और आधुनिकता मिलकर भी स्त्रियों के लिए जीने लायक माहौल नहीं बना पाए। अब स्त्रियों ने स्वयं ही विज्ञान को सीढ़ी बनाकर मनचाही जिंदगी का विकल्प ढूंढ़   लिया है,लेकिन काश वह  लड़की बने रहकर ही मनचाहा जीवन जी सकती!


हाल ही में इंदौर की इंडियन अकेडमी ऑफ पीडियट्रिक्स ने खुलासा किया है कि इंदौर में प्रतिवर्ष सैकड़ों ऐसे आपरेशन किये जाते हैं जिनमें एक से पांच साल तक की बच्चियों के जननांगों को पुरुष जननांगों मं बदला जाता है। निश्चित तौर पर वैज्ञानिकों ने कभी कल्पना भी नहीं की होगी कि लिंग परिवर्तन विश्व के किसी कोने में लिंगभेदी तत्वों द्वारा अपने गलत इरादों की पूर्ति का जरिया बन के रह जाएगा।

पहली बार १९३० में जर्मन डॉक्टर ने लिंग परिवर्तन का आपरेशन किया था एक पुरुष को स्त्री में बदलकर,लेकिन वह सफल नहीं हुआ था। लिंग परिवर्तन का पहला सफल ऑपरेशन 1950 में डैनिश डॉक्टर द्वारा किया गया। इसमें भी पुरुष को एक स्त्री में बदला गया। आजकल थाइलैंड और यू.एस. में इस तरह के लिंग परिवर्तन के ऑपरेशन काफी संख्या में हो रहे हैं। लिंग परिवर्तन की पहली शर्त व्यक्ति की स्वेच्छा है, दूसरी शर्त व्यक्ति का युवा होना है। कम से कम 18 वर्ष का होना जिसमें कि सामाजिक स्थितियों को समझने का समार्थ्य हो।

भारत व विदेशों में होने वाले लिंग परिवर्तन में मूलतः फर्क यह है कि वहां व्यक्ति स्वेच्छा से यह निर्णय लेता है,जबकि भारत में लिंग परिवर्तन के पीछे समाज में लड़के की चाहत का वर्चस्व और स्त्री जीवन की भयानक चुनौतियां हैं। भारत में यह खोज पितृसत्तात्मक मूल्यों की पोषक बनती नजर आ रही है। लड़कियां स्वयं ही स्त्री जीवन से तौबा करके पुरूष बनकर बिंदास जीवन जीने का विकल्प चुन रही हैं। वहीँ  मां-बाप बेटे की अंतहीन चाहत के चलते अपनी बच्चियों के लड़का बनवाने के ऑपरेशन करा रहे हैं।

हाल ही में आगरा में पांच लड़कियां सेक्स परिवर्तन कराके लड़का बनी हैं। दिल्ली में दो लड़कियों द्वारा लिंग परिवर्तन के द्वारा लड़का बनने की खबर है। यह महज इत्तफाक नहीं है कि भारत में लिंग परिवर्तन कराने वालों में लड़कियों की संख्या ज्यादा है । निःसंदेह लड़कियों के प्रति बढ़ रही हिंसा, हमले, अमानवीयता, असंवेदनशीलता, अश्लीलता और सिर्फ भोग्या के रुप में देखने वाली मानसिकता और लिंगभेदी संस्कार, परंपरा व मान्यताएं भी कहीं न कहीं लिंग परिवर्तन में अपनी अहम भूमिका निभाती हैं। भुवनेशवर की महिला वकील द्वारा पुरूष बनने के कारणों की सहज-सच्ची स्वीकारोक्ति इस तथ्य पर प्रकाश डालती है।

लिंग परिवर्तन द्वारा लड़का बना व्यक्ति पिता नहीं बन सकता। उसी प्रकार लिंग परिवर्तन द्वारा लड़के से बनी लड़की भी मां नहीं बन सकती क्योंकि उसमें गर्भाशय नहीं बनाया जा सकता। इस तथ्य को जानने के बाद भी मां-बाप द्वारा अपने पांच साल की उम्र तक की बच्चियों को लड़का बनाने का बेहद अमानवीय काम जारी है। कहा तो जा रहा है कि जिन लड़कियों का लिंग परिवर्तन किया जा रहा है वे मूलतः इंटरसेक्स हैं।

समझदार मां-बाप लिंग परिवर्तन की बुनियादी शर्त ‘व्यक्ति की स्वेच्छा‘ का खुला उल्लंघन कर रहे हैं। बेटे की अंधी चाह में वे इस तथ्य को भी नकार रहे हैं कि सर्जरी के बाद उनका जीवन बदतर भी हो सकता है। ऐसे लोग जानबूझकर समाज की ‘बेटा ही सबकुछ‘जैसी लिंगभेदी और घटिया मानसिकता को  बढावा देने के दोषी हैं।

बच्चियों को बचपन में ही लड़का बनाकर उनके मां-बाप खुश हैं। बच्चियां तो खैर अभी बहुत छोटी हैं ये समझने के लिए कि उनके साथ क्या हो रहा है। पितृसत्ता खुश है कि सभी क्षेत्रों में लड़कियों द्वारा अपनी सशक्त मौजूदगी दर्ज करते जाने के बाद भी माता-पिताओं की रुह सिर्फ लड़कों के लिए ही प्यासी है । पितृसत्ता खुश है कि तमाम पढ़ाई-लिखाई, शोध, विज्ञान, तकनीक और आधुनिकता मिलकर भी पुरूष लिंग के वर्चस्व को चुनौती नहीं दे पा रहे। समानता-समानता चिल्लाने वाले अल्पसंख्यकों को सोचना होगा,कि विज्ञान और तकनीक की मदद से सुपर पावर बनती जा रही पितृसत्ता को कैसे काबू में किया जाए?

विज्ञान और आधुनिकता के चरम दौर में भी दुनिया का कोई भी विकिसत या विकासशील देश अपने समाज के लिंगभेद से मुक्त होने का दावा नहीं कर सकता! ये कैसी आधुनिकता है जो औरत-आदमी को बराबरी का दर्जा दिलाने में हांफ रही है?पितृसत्ता ने कितने सहज तरीके से विज्ञान को अपने हित में इस्तेमाल करना शुरू कर दिया है। लड़कियों द्वारा स्त्री जीवन से तंग आकर लिंग परिवर्तन कराना और मां-बाप द्वारा पुत्र मोह की चाहत में लिंग परिवर्तन कराना ये दोनों ही उदाहरण हमारी नैतिकता,मानवीयता और लोकतंत्र के लिए खुली चुनौती है। देखना यह है कि हम कब तक इन चुनौतियों से मुंह   चुरा के रहते हैं?


 
स्वतंत्र पत्रकार व जेएनयू में शोधार्थी

 



अधूरी उम्र का पूरा जीवन

फिल्मी दुनिया को चमक देने वाले कुछ कलाकार ऐसे भी हैं जिनको पुरस्कार तो बहुत सारे मिले, लेकिन वह पुरस्कार इनकी 'उम्र' न बढ़ा सके...

विभा सचदेवा

संता -बंता का अदाकारों को मिलने वाले पुरस्कार को लेकर एक चुटकला काफी सुना गया था। उस चुटकुले में संता-बंता से कहता है कि आखिर यह फिल्मी सितारे अवॉर्ड लेकर इतना खुश क्यों होते हैं, तो उस पर बंता कहता है कि इन अवॉर्ड से इन सितारों की 'उम' बढ़ जाती है।
लेकिन अगर हम ग्लैमरस वर्ल्ड के कुछ सितारों के जीवन पर नजर डाले तो यह चुटकुला कतई सच नहीं लगता। फिल्मी दुनिया को चमक देने वाले कुछ कलाकार ऐसे भी हैं जिनको पुरस्कार तो बहुत सारे मिले, लेकिन वह पुरस्कार इनकी 'उम्र' न बढ़ा सके।

इसी का एक उदाहरण है हाल ही में ब्रिटिश गायिका एैमी वाइनहाउस की मौत। उनका सिर्फ 27 वर्ष का आयु में दुनिया छोड़ देना हतप्रभ कर देने वाली खबर थी, जिस पर सहसा यकीन नहीं होता।


ऐमी वाइनहाउस ब्रिटिश की जानी-मानी गायिका थी। वे फिल्मी दुनिया के प्रतिष्ठित कई ग्रैमी अवॉर्ड भी जीत चुकी थी। उनकी मौत ऐसे समय में हुई है, जब वह सफलता की ऊंचाइयों को छू रही थी। इसी तरह बालीवुड में भी कई सितारे हैं जो छोटी आयु में ही चल बसे, लेकिन आज भी वह अपने किरदार और प्रतिभा के लिए याद किये जाते हैं।
दिव्या भारती : ऐसी ही एक कलाकार हैं दिव्या भारती। वे 25 फरवरी, 1974 को मुंबई में पैदा हुईं थीं। इस कलाकार की मौत उस समय हुई जब वह शौहरत की बुलंदियों को छू रही थी और इनके चाहने वालों की संख्या बहुत ज्यादा थी। दिव्या भारती ने बॉलीवुड में अपने कैरियर की शुरुआत 'विश्वात्मा' फिल्म से की। इस फिल्म में अपने किरदार के लिए उन्हें बहुत सराहना मिली।

उसके बाद शोला और शबनम, रंग, दीवानगी, दिल का क्या कसूर,दिल ही तो है आदि फिल्मों ने इस अदाकारा को बालीवुड में एक अलग पहचान दिलवायी और यह लाखों-करोड़ों दर्शकों के दिलों की धड़कन बन गयी। लेकिन 5 अप्रैल 1993 को अपने अपार्टमैंट से गिरने के कारण हुई इनकी मौत ने इन करोड़ों प्रशंसकों को सकते में डाल दिया। और उनकी आने वाली फिल्म का इंतजार कर रहे इन प्रशंसकों का इंतजार यहीं खत्म हो गया।

गुरु दत्त : आज भी जब वक्त ने किया क्या हसी सितम, तुम रहे न तुम हम रहे न हमसुनते हैं तो एक संजीदा अदाकार गुरुदत्त का चेहरा सामने आता है। गुरुदत्त ने फिल्म 'प्यासा' और 'कागज के फूल' में जिस तरह का किरदार निभाया था उससे उनकी जिंदगी की परेशानी साफ दिखती थी। इन फिल्मों को इनकी जिंदगी पर आधारित फिल्मों के रूप में भी देखा जाता था।

गुरुदत्त की रहस्यमय मौत से यह बात साबित भी हो गयी थी। 39 साल की छोटी उम्र में शराब में नींद की गोलिया मिलाकर खाने के कारण हुई इनकी मौत के पीछे का कारण आज तक किसी को पता नहीं चल पाया है। लेकिन इनकी मौत का एक कारण इनकी नाखुश शादीशुदा जिन्दगी और शादी के बाद भी वहीदा रहमान के साथ प्यार को माना जाता है। इस कलाकार की बतौर निर्देशक और अभिनेता बनायी गयी फिल्में बालीवुड के इतिहास में सर्वश्रेष्ठ फिल्मों के रूप में आज भी दर्ज है। इनकी कुछ यादगार फिल्मों में 'कागज के फूल', 'चौदहवीं का चांद', 'साहिब बीवी और गुलाम' आदि शामिल हैं।

स्मिता पाटिल : दो नैशनल अवॉर्ड, फिल्मफेयर अवॉर्ड और पदमश्री भी इस कलाकार की उम्र नहीं बढ़ा पाए। 17 अक्तूबर 1955 को पैदा हुई इस कलाकार का जीवन केवल 31 साल में ही खत्म हो गया। बॉलीवुड में अपने अभिनय का लोहा मनवा चुकी समिता पाटिल पैरलर सिनेमा का जाना-माना नाम थी। जहां एक तरफ अपने अभिनय की वजह से इन्हें काफी सराहना मिली, वहीं दूसरी तरफ राज बब्बर के साथ अपने रिशते के लिए इन्हें काफी आलोचना का सामना भी करना पड़ा।
इसी रिश्ते की वजह से राज बब्बर ने अपनी पहली बीवी को छोड़कर इनसे शादी की। इनकी अच्छी फिल्मों में भूमिका, चक्कर, बाजार, मंडी, अर्थ और आज की आवाज शामिल हैँ। सराहनाओं और आलोचनाओं के उस दौर में 13 दिसंबर, 1986 को समिता पाटिल की प्रतीक बब्बर को जन्म देने के दो हफ्ते बाद ही मौत हो गयी। लेकिन आज भी जब पैरलर सिनेमा की बात होती है, समिता पाटील का नाम जरूर लिया जाता है।

मीना कुमारी : 1 अगस्त, 1932 को मुंबई में मध्यवर्ग परिवार में पैदा हुई एक लड़की ने कभीी सोचा भीी न होगा कि एक दिन वह बॉलीवुड की 'ट्रैजडी क्वीन' के नाम से जानी जायेगी। बालीवुड की 'ट्रैजडी क्वीन' मीना कुमारी एक अच्छी अदाकारा के साथ-साथ बेहतरीन कवियत्री भी थी। वह हर गम और खुशी को वह अपनी कविता के माध्यम से बयाँ करती थी।
अपने तलाक के समय भी उन्होंने अपने गम को बयाँ करने के लिए एक कविता लिखी थी - तलाक तो दे रहे हो नजर-ए-कहर के साथ, जवानी भी मेरी लौटा दो मेहर के साथ।एक अच्छी कवियत्री के साथ-साथ अभिनय के मामले में भी उस समय की प्रतिष्ठित अभिनेत्रियों में से मीना कुमारी एक थी। चाहे 'छोटी बहू' फिल्म में उनके निभाए गए किरदार की बात करें या फिर 'परीणिता'की, हर किरदार को इन्होंने बखूबी निभाया था।

मीना कुमारी की यादगार फिल्मों में साहिब बीवी और गुलाम, शारदा, दिल अपना प्रीत परायी, शरारत और कोहिनूर समेत कई फ़िल्में शामिल हैं। इस अभिनेत्री ने अपने प्रशंसकों का साथ तब छोड़ा, जब वह पांच महीने बाद आने वाले इनके जन्मदिन की तैयरियों में लगे थे। इनकी मौत उस समय हुई, जब उनकी फिल्म 'पाकीजा' सिनेमा हॉल में दर्शकों की अपार सराहना बटोर रही थी।

मधुबाला : हिंदी सिनेमा की सबसे प्रतिभावान अभिनेत्री मधुबाला के जीवन का अंत केवल 36 साल की उम्र में ही हो गया था। 9 साल की उम्र में बाल कालाकार के रूप में इनकी पहली फिल्म 'बसंत' बहुत बड़ी बॉक्स आफिस हिट रही । उसके बाद 14 साल की उम्र में इस अभिनेत्री को 'नील कमल' फिल्म के लिए राजकपूर के अपोजिट कास्ट किया गया।

नीलकमल के बाद तो इस अभिनेत्री की फिल्मों की कतार लग गयी। इनकी फिल्मों में ज्वाला, शराबी, हॉफ टिकट, ब्वायफ्रेंड , महल, जाली नोट, बरसात की रात आदि शामिल हैं। इनके सर्वश्रेष्ठ अभिनय के लिए याद की जाने वाली फिल्म 'मुगल-ए-आजम' ने इस अभिनेत्री को बॉलीवुड में अनारकली के रूप में एक अलग पहचान दिलवायी।

'मुगल-ए-आजम' से जहां एक तरफ बॉलीवुड को अनारकली मिली, वहीं दूसरी तरफ इस फिल्म के समय ही यह बात सामने आई कि मधुबाला अब और काम करने की स्थिति में नहीं हैं। उसके बाद काफी जगह पर इनका इलाज हुआ और लगातार 9 साल तक जिंदगी से संघर्ष करने बाद 1969 में मधुबाला ने आखिरी सांस भरी।

फिल्मी दुनिया के यह कलाकार तो सालों पहले चले गए, लेकिन आज भी इनको बेहतरीन अभिनय के लिए याद किया जाता है। इसलिए ही कहा जाता है कि इंसान मर जाते है, लेकिन उनकी प्रतिभा की नहीं मरती।


Aug 2, 2011

पंजाब में आन्दोलनकारी किसान की मौत

 हिमांशु कुमार

पंजाब सरकार के बर्बर हमले से कल यानी 2 अगस्त को एक किसान सुरजीत सिंह शहीद हो गए. पुलिस ने उन्हें लाठियों से पीटकर मार डाला. पंजाब के मानसा जिले के ग्राम गोविन्दपुरा गाँव में राज्य सरकार द्वारा एक कंपनी के लिए किये जाने वाले अवैध भूमि अधिग्रहण का विरोध करने के लिए 2 अगस्त को किसानो ने रैली करने का प्रयास किया था.

सरकार ने किसानो के इस अहिंसक आन्दोलन को कुचलने के लिए भयंकर लाठीचार्ज किया, जिसमें लगभग पचास किसान बुरी तरह घायल हुए और एक किसान कार्यकर्ता सुरजीत सिंह की मौत हो गयी.  

गौरतलब है कि पंजाब के गोविन्दपुरा गाँव में थर्मल पावर प्लांट लगाने के नाम पर किसानो की 880 एकड़ सिंचित भूमि को पंजाब सरकार अवैध तरीकों से बलपूर्वक लेने की कोशिश कर रही है. पोना नामक कंपनी के लिए किसानो की इन ज़मीनों को लेने से पहले प्रशासन ने किसानो को कोई नोटिस नहीं दिया. किसानो का आरोप है कि सत्ता दल के नेताओं ने पोना नामक कंपनी के साथ मिलीभगत कर के उनकी ज़मीन को कंपनी के नाम कर दिया है.

इस वर्ष 21 जून को कंपनी के लोग पंजाब के 6 जिलों से जमा किये गए बड़े पुलिस बल के साथ जब इस ज़मीन पर कांटेदार तार लगाने पहुंचे तो उन्हें महिलाओं और किसानो के बड़े विरोध का सामना करना पड़ा था. 24 जुलाई को पुलिस ने इस गाँव पर हमला किया और घरों में सोये हुए 450 किसानो को ले जाकर जेल में डाल दिया. ये किसान अभी भी जेल में ही बन्द हैं.

पंजाब के 17 मजदूर किसान संगठनो ने इस अवैध भूमि अधिग्रहण और सरकारी दमन के विरोध में 2 अगस्त को ' गोविन्दपुरा चलो ' रैली की घोषणा की थी. किसानो की इस शांतिपूर्ण रैली को रोकने के लिए पंजाब सरकार ने सुबह से ही किसान नेताओं को घरों में सोते समय ही पकड़ लिया था.

प्रधानमंत्री के नाम खुला पत्र

रोजी-रोटी अधिकार अभियान आगाह करता है कि देश में संगठित रिटेल के प्रवेश का रास्ता तैयार करने के लिए जानबूझकर पीडीएस व्यवस्था खत्म की जा रही है...

प्रिय डॉ सिंह,

रोजी रोटी अधिकार अभियान. जैसा कि आप जानते हैं हाल ही में मंत्रियों के सशक्त समूह-ईजीओएम ने खाद्य एवं उपभोक्ता मामलों के विभाग द्वारा तैयार राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा विधेयक-एनएफएसबी के मसौदे को मंजूरी दी है। सरकार का दावा है इसे अब कैबिनेट के सामने रखा जाएगा। विधेयक का यह ड्राफ्ट सभी को खाद्य सुरक्षा देने के विचार का पूरा मखौल उड़ाता है और सुप्रीम कोर्ट के आदेशों से मिली वर्तमान हकदारियों को भी छीनता है।

गरीबी रेखा की असफलता के तमाम प्रमाणों के बावजूद इस ड्राफ्ट में भी गरीबी रेखा से ऊपर और नीचे रखने वालों के बीच स्पष्ट विभाजन जारी है। यह गरीबी रेखा इतनी कम है कि देश में भूख के विस्तार को प्रदर्शित नहीं करती है। इस मामले में लोगों की पहचान और उनके वंचित रह जाने से जुड़ी समस्याएं जगजाहिर हैं।

रोजी-रोटी अधिकार अभियान पीडीएस को खत्म करने और इसके स्थान पर कैश ट्रांसफर का कड़ा विरोध करता है...
बन्दा  जिले का एक गाँव : अन्न मांगता   भारत

किसानों और खाद्य सुरक्षा पर कैश ट्रांसफर का असर-हमारा मानना है कि राशन के स्थान पर पैसा बांटने से न केवल परिवारों की खाद्य सुरक्षा प्रभावित होगी बल्कि खाद्यान्न के उत्पादन,खरीद और संग्रह की व्यवस्था पर भी इसका बुरा असर पड़ेगा। चूंकि राशन की दुकानें नहीं चलानी पड़ेगी इसलिए सरकार अनाज की बड़े पैमाने पर खरीद नहीं करेगी। इससे किसान सबसे ज्यादा प्रभावित होंगे। उन्हें न्यूनतम समर्थन मूल्य नहीं मिल पाएगा जो फिलहाल अनाज पैदा करने के पीछे सबसे बड़ा प्रोत्साहन है। अपने अनाज की बिक्री के लिए किसान बाजार के हवाले कर दिए जाएंगे जहां उन्हें बहुत कम भाव पर भी उपज बेचनी पड़ सकती है। ऐसे में एफसीआई को भी अब जितने गोदामों की जरूरत नहीं होगी और धीरे-धीरे यह भी एक महत्वहीन व्यवस्था बनकर रह जाएगी। यह राष्ट्र की खाद्य सुरक्षा के अंत की ओर जाने वाला रास्ता है।

रोजी-रोटी अधिकार अभियान आगाह करता है कि देश में संगठित रिटेल के प्रवेश का रास्ता तैयार करने के लिए जानबूझकर पीडीएस व्यवस्था खत्म की जा रही है। खाद्यन्न की उपलब्धता सुनिष्चित किए बगैर जनता को बाजार के हवाले कर देना खाद्य असुरक्षा को बढाने वाला कदम साबित होगा। खाद्यान्न के बदले कैश देने को हम रिटेल कारोबार में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश-एफडीआई की सीमा बढ़ाने के आपकी सरकार के फैसले से जोडकर देखते हैं। कोई षक नहीं है कि पूरी तरह बाजार पर आधारित वितरण प्रणाली ज्यादा खतरनाक साबित होगी।

बच्चों,महिलाओं और वंचित समूहों से संबंधित अन्य सभी प्रावधानों के मामले में भी प्रस्तावित विधेयक अत्यंत निराशाजनक है। छह महीने तक 1,000रुपये महीना मातृत्व अनुग्रह के तौर पर देना, एनएसी का एक जरूरी सुझाव था, जिसे छोड़ दिया गया है। कुपोषित बच्चों, स्कूल से वंचित बच्चों, प्रवासी मजदूरों, भुखमरी से होने वाली मौतों, बेसहारा लोगों का पेट भरने और सामुदायिक रसोई से जुड़े महत्वपूर्ण प्रावधानों को हटा दिया गया है या फिर कमजोर कर दिया गया है। ऐसा लगाता है कि यह ड्राफ्ट पके हुए भोजन की जगह पहले से बने खाने की शुरुआत का अवसर दे रहा है तभी तो पके हुए भोजन को पके हुए पोषक और तुरंत खाने योग्य भोजन के तौर पर परिभाषित किया गया है। इस प्रकार ठेकेदारों और कंपनियों के लिए रास्ता तैयार हो रहा है।

वास्तव में,यह पूरा विधेयक व्यय सीमित करने, जिम्मेदारी को नकारने और मौजूदा वितरण प्रणाली को तबाह करने के असली सरकारी उद्ेश्यों का खुलासा करता है। धन की कमी एक बहाना बनाकर सरकार एक व्यापक कानून लाने में आनाकानी नहीं कर सकती खासकर जबकि सरकार हर साल 5 लाख करोड रूपये का टैक्स विभिन्न प्रकार कर कर छूट के जरिए उद्योग जगत और व्यक्तिगत करदाताओं पर छोड रही है। हैरानी की बात है कि इस राषि का पंचावा हिस्सा भी सरकार देष की खाद्य सुरक्षा सुनिष्चित करने के लिए खर्च करने को तैयार नहीं है।
सरकार की ओर से कृषि की उपेक्षा ने कृषि संकट को जन्म दिया है और लाखों लाचार किसान आत्महत्या कर रहे हैं। आज 650 लाख टन से ज्यादा अनाज देष भर के एफसीआई गोदामों में रखा है या फिर गोदामों की कमी के चलते खुले में सड रहा रहा है। ऐसी स्थिति में सरकार सभी को सस्ता राषन नहीं देने के लिए अनाज की कमी का तर्क नहीं दे सकती है।

पीडीएस वितरण को छत्तीसगढ़, तमिलनाडु, हिमाचल प्रदेश, उड़ीसा आदि राज्यों के सफल प्रयोग के आधार पर पूरे देष में मजबूत किया जाना चाहिए।

रोजी-रोटी अधिकार अभियान सरकार के ड्राफ्ट खाद्य सुरक्षा विधेयक को अस्वीकार करने के लिए देषव्यापी आंदोलन का आवाहन करता है एवं मांग करता है कि एक व्यापक खाद्य सुरक्षा कानून बने जिसमे उत्पादन से लेकर वितरण तक जनहित के पहलुओं को ध्यान में रखा जाए।

नई दिल्ली, 2 अगस्त




कायर सत्याग्रही और दमनकारी सरकार

अन्ना हजारे द्वारा  भ्रष्टाचारियों के मांस को गिद्धों -कुत्तों को खिलाने के आह्नान से लेकर बाबा रामदेव के ऊलजलूल बयानों और राजघाट पर भाजपाइयों के नाच तक,सत्याग्रह के विचार और तरीके के अवमूल्यन की पराकाष्ठा देखने को मिलती है...

प्रेम सिंह

पक्ष चाहे सरकार का हो या सिविल सोसायटी एक्टिविस्टों का, भ्रष्टाचार-विरोध को लेकर दिल्ली में पिछले कुछ महीनों से जो दृश्य जारी है उसमें संगति कम और बेतुकापन ज्यादा दिखाई देता है। उससे भ्रष्टाचार मिटने वाला नहीं है। बात-बात पर और पहले ही दिन से आमरण अनशन पर बैठ जाने और सरकार या सिविल सोसायटी एक्टिविस्टों द्वारा प्रस्तावित लोकपाल विधेयक के कानून बन जाने से भ्रष्टाचार पर लगाम भी नहीं कसी जा सकेगी। इस हकीकत के कई उदाहरण भ्रष्टाचार विरोधी अभियान के दौरान ही देखने को मिलते हैं।

उनमें एक उदाहरण राष्ट्रमंडल खेलों में हुए भ्रष्टाचार का है। राष्ट्रमंडल खेलों का आयोजन पूरी तरह से भ्रष्टाचार का खेल बन जाने पर भी देश के प्रधानमन्त्री  से लेकर दिल्ली की मुख्यमंत्री तक चुप्पी मारे रहे। जब घड़ा खेल होने से पहले ही पफूट गया तो प्रधनमंत्री ने डेमेज कंट्रोल के लिए आनन-फानन में जांच के लिए शुंगलु समिति नियुक्त की। शुंगलु समिति की रपट में दिल्ली की मुख्यमंत्री और राज्यपाल की भूमिका पर सीधे सवाल उठाए गए हैं। वैसे भी इतना बड़ा और खुला घोटाला मुख्यमंत्री और राज्यपाल की आंख बचा कर हो ही नहीं सकता था।

लेकिन दिल्ली मुख्यमंत्री ने शुंगलु समिति की रपट की ही जांच करा डाली है। होना तो यह चाहिए था कि शुंगलु समिति का गठन करने वाले प्रधनमंत्री को रपट आने के तुरंत बाद मुख्यमंत्राी और राज्यपाल की भूमिका पर जांच बिठानी चाहिए थी। आप गौर कर लें, भ्रष्टाचार का यह खेल  इंडिया अंगेस्ट करप्शन की नाक नीचे हुआ है, लेकिन इंडिया अंगेस्ट करप्शन के बांकुरे विरोध् के किसी भी मंच अथवा स्थल पर नहीं पहुंचे। न ही अपने मंच से कोई विरोध् किया। क्या वे बता सकते हैं उनका लोकपाल इस मामले में क्या करेगा?

स्पैक्ट्रम 2घोटाले में फंसे डी राजा ने अदालत में बयान दिया है कि जो हुआ पीएम,एफएम, केबिनेट और टेलकॉम मंत्रालय के आला अधिकारीयों  की जानकारी और सहमति से हुआ। टीम हजारे का लोकपाल किस-किस को फांसी पर चढ़ाएगा?कांग्रेस राजा के बयान को आरोपी का बयान कह कर खारिज कर सकती है,लेकिन कौन नहीं जानता मामला अगर एफडीआई का हो तो सहमति होगी, भले ही उसमें संवैधानिक प्रावधनों का कितना भी उल्लंघन और कितना भी भ्रष्टाचार होता हो। जैसे अमेरिकी राष्ट्रपति के आने पर भारत की सुरक्षा व्यवस्था निरर्थक हो जाती है,उसी तरह एफडीआई के आने पर भारतीय संविधन निरर्थक हो जाता है। एफडीआई और भ्रष्टाचार नाभि-नाल जुड़े हैं।

सगुण विरोध् की जगह केवल निर्गुण विरोध् निरी हवाबाजी है,और हवाबाजी से भ्रष्टाचार नहीं मिट सकता। लाख बचाने की कोशिशों के बावजूद किसी डी राजा या किसी कलमाडी के फंस जाने पर जिन भले लोगों को भ्रष्टाचार से मुक्ति मिलती नजर आने लगती है, उन्हें गंभीरतापूर्वक विचार करना होगा कि अगर भ्रष्टाचार मिटाना है तो उसके लिए वास्तव में क्या करना होगा। वह कर्तव्य नवउदारवादी लूट पर कायम शाइनिंग इंडिया के ‘आदर्श’ पर तय नहीं किया जा सकता। उसके बाहर छूटे भारत के यथार्थ से वह तय होगा। मुक्तिबोध् ने पूछा था, ‘कामरेड आपकी पॉलिटिक्स क्या है?’ तय तो होना चाहिए आप किस जमीन पर खड़े होकर बहस कर रहे हैं।

गाँधी ने हिंसा,विग्रह और शोषण से ग्रस्त अधिनिक  औद्योगिक व्यवस्था में दमन और अत्याचार का प्रतिकार करने और अंततः उसे बदलने के उद्देश्य से दक्षिण अप्रफीका में सत्याग्रह के तरीके का संधन किया था। देश की आजादी के संघर्ष में उन्होंने सत्याग्रह और सिविल नापफरमानी के तरीके का उपयोग कियाऋ गोकि आजादी के संघर्ष में सशस्त्रा और भूमिगत क्रांतिकारी तरीके भी उपयोग में लाए गए थे और बलिदान की कसौटी पर उनकी सार्थकता कम नहीं थी। खुद गाँधी ने 1942में ‘करो या मरो’ का नारा दिया था जिसमें देश के हर नागरिक से उपनिवेशवादी सत्ता के जुझारू प्रतिरोध् का आह्नान था। आजाद भारत में डॉ. राममनोहर लोहिया ने गांध्ी की अन्याय के प्रतिकार की सत्याग्रह और सिविल नापफरमानी की कार्यप्रणाली को दुनिया की अभी तक की सबसे बड़ी क्रांति बताया।

अन्ना हजारे के भ्रष्टाचारियों के मांस को गिद्धों -कुत्तों को खिलाने के आह्नान से लेकर बाबा रामदेव के ऊलजलूल बयानों और राजघाट पर भाजपाइयों के नाच तक,सत्याग्रह के विचार और तरीके के अवमूल्यन की पराकाष्ठा देखने को मिलती है। जिस तरह से अस्सी और नब्बे के दशकों में र्ध्मनिरपेक्षता के पद ने चौतरपफा ठोकरें खाईं और अपना अर्थ गंवा दिया, वही हालत इध्र सत्याग्रह पद की बन गई है।

अगर आजादी के संघर्ष के नेताओं की अपनी और उनके बारे में उपनिवेशवादी सत्ता की लिखतें हमारे सामने नहीं होतीं तो नई पीढ़ियों को यही लगता कि भारत में शुरू से ही बकवादियों का बोलबाला रहा है। लोग यही मानते कि गांध्ी और उनका सत्याग्रह भी वैसा ही तमाशा थे जैसा जंतर-मंतर,रामलीला मैदान और राजघाट पर देखने को मिलता है। जिसमें कोई हिंसक ललकार दे रहा है,कोई जनाना कपड़ों में रात के अंध्ेरे में छिप कर भाग रहा है,कोई सत्ता की सूंघ से मतवाला होकर नाच रहा है।

हम यह नहीं कहते कि पूर्व प्रचलित पदों-अवधरणाओं और तरीकों का मौजूदा संदर्भों में नवोन्मेषकारी अर्थ व प्रयोग नहीं हो सकताऋ बल्कि वह होना चाहिए। लेकिन अपने स्वार्थवश या अपनी कमजोरियों पर परदा डालने के लिए उनका रूप बिगाड़ देना उनके आविष्कर्ताओं को लांछित करने के साथ संघर्ष की परंपरा और संवैधानिक मूल्यों के प्रति द्रोह है। नवउदारवाद के हमाम में जो हालत र्ध्मनिरपेक्षता की हो चुकी है,वही गांध्ी और सत्याग्रह की होने जा रही है।

दिल्ली से खदेड़े जाने के अगले दिन जब रामदेव का टीवी पर हरिद्वार से प्रसारण आया तो मेरे 14 साल के बेटे ने कहा कि बाबा तो बुरी तरह डर गया है। दुनिया को स्वास्थ्य और शक्ति के नुस्खे बांटने वाले रामदेव चार दिन के अनशन में बेहाल हो गए। नुस्खे वे आध्यात्मिकता और राष्ट्रीय स्वाभिमान के भी बांटते हैं। लेकिन भोगियों के इस योगी में न आध्यात्मिक शक्ति का लेश निकला न शारीरिक शक्ति का। वह दरअसल उनमें कभी थी ही नहीं। आपको याद होगा,कुछ साल पहले उनके कारखाने में बनने वाली वस्तुओं की गुणवत्ता और काम करने वाले मजदूरों के शोषण पर सवाल उठे थे। बाबा हल्की पेंदी के तवे की तरह गरम हो गया था और अनर्गल प्रलाप करने लगा था। नवउदारवाद की प्रयोगशाला में ऐसे ही योगी ढलते हैं।


दिल्ली विश्वविद्यालय में शिक्षक और राजनितिक -सामाजिक मसलों के लेखक.
 
 
 
 
 
 
नोट : प्रकाशित लेख 'नवउदारवाद की प्रयोगशाला में भ्रष्टाचार' का एक हिस्सा है. पुरे लेख को पढने के लिए दाहिनी तरफ ऊपर देखें.