May 12, 2011

उत्तर प्रदेश के जनसंगठनों का कल दिल्ली में धरना


सरकार की इस तानाशाही का प्रदेश की वाम-जनवादी ताकतें चौतरफा विरोध करेगी। इसके खिलाफ कल 13  मई को दिल्ली के जंतर-मंतर पर प्रदर्शन  होगा और आगामी 3जून को लखनऊ में विकल्प रैली व आमसभा की जायेगी...

मायावती सरकार प्रदेश में अघोषित आपातकाल की ओर बढ़ रही है। यूपी  में भ्रष्टाचार की प्रतीक बन चुकी मायावती की सरकार तानाशाही पर उतर आयी है। प्रदेश में धरना, प्रदर्शन  और आमसभाएं जैसी न्यूनतम लोकतांत्रिक गतिविधियों को भी प्रतिबंधित किया जा रहा है। ग्रेटर नोएड़ा में जबरन जमीन अधिग्रहण के खिलाफ आंदोलनरत किसानों पर बर्बर हमले किए गए, बुजुर्गो, महिलाओं तक को बुरी तरह मारा गया,किसानों के धरों को जला दिया गया। पहली बार प्रदेश में आंदोलन के नेताओं पर ईनाम घोषित किया जा रहा है।

सरकार की इस तानाशाही का प्रदेश की वाम-जनवादी ताकतें चौतरफा विरोध करेगी। इसके खिलाफ कल 13 मई को दिल्ली के जंतर-मंतर पर प्रदर्शन  होगा और आगामी 3 जून को लखनऊ में विकल्प रैली व आमसभा की जायेगी। इस आषय का निर्णय आज जन संघर्ष मोर्चा के प्रदेश अध्यक्ष व पूर्व सांसद इलियास आजमी की अध्यक्षता में हुई बैठक में लिया गया। बैठक में जन संघर्ष मोर्चा के घटक दलों के अलावा सीपीएम के प्रतिनिधि भी उपस्थित रहे। बैठक में  मायावती सरकार द्वारा किसान आंदोलन के नेताओं पर ईनाम घोषित करने के फैसले का विरोध करते हुए इसे तत्काल वापस लेने की मांग की गयी। बैठक में कहा गया कि प्रदेश में आंदोलन के लिए अनुमति प्राप्त करने का आदेष तानाशाही का फरमान है और जनांदोलन की ताकतें इसे खारिज करती है।

बैठक में जन संघर्ष मोर्चा के राष्ट्रीय संयोजक अखिलेन्द्र प्रताप सिंह ने कहा कि प्रदेष की हालत बेहद खराब है। भ्रष्टाचार में आकंठ डूबी मायावती सरकार से जनता में गहरा आक्रोश  है। प्रदेश की जनता कांग्रेस-भाजपा,सपा-बसपा से हटकर नया जनपक्षधर राजनीतिक विकल्प चाहती है। जन संघर्ष मोर्चा प्रदेश में जनवादी विकल्प के लिए काम करने वाली सभी तरह की ताकतों की गोलबंदी करेगा। बैठक में मौजूद सीपीएम के राज्य सचिव एसपी कश्यप  ने कहा कि प्रदेश में नए विकल्प के निर्माण के प्रयासों में उनकी पार्टी पूरे तौर पर साथ है।

बैठक में लिए राजनीतिक प्रस्ताव में कहा गया कि उ0 प्र0 में मुलायम ने ही जबरन भूमि अधिग्रहण के खिलाफ आंदोलनरत किसानों के दमन की शुरूवात की थी। आज भी जो किसानों पर दमन हो रहा है उसकी जबाबदेही कांग्रेस की है क्योकि आज तक उसने अंग्रेजों के बनाए 1894के भूमि अधिग्रहण कानून को रद्द करने का काम तक नहीं किया। बैठक में जब तक 1894के भूमि अधिग्रहण कानून को रद्द कर नया कानून न आ जाए तब तक किसानों से एक इंच भी जमीन न लेने, किसान पक्षधर भूमि अधिग्रहण कानून बनाने, नोएड़ा में किसानों पर गोली चलाने वाले दोषी पुलिस कर्मियों पर मुकदमा दर्ज कर दण्ड़ित करने और किसानों पर लादे मुकदमों और किसान नेताओं पर धोषित ईनाम को तत्काल वापस लेने की मांग पर दिल्ली में 13 मई को प्रदर्शन करने का निर्णय हुआ।

बैठक में सोनभद्र के अनपरा तापीय परियोजना में सार्वजनिक सम्पत्ति की लूट व भ्रष्टाचार के खिलाफ और अपने अधिकारों के लिए जारी ठेका मजदूरों की विगत 15 दिनों से जारी हड़ताल और गोरखपुर में मजदूरों के आंदोलन का समर्थन किया गया। बैठक में लिए राजनीतिक प्रस्ताव में कहा गया कि कि अनपरा तापीय परियोजना में बड़े पैमाने पर सार्वजनिक सम्पत्ति की लूट हो रही है। यहां अनुरक्षण के कामों में 40 लाख का टेड़र होता है और उसका 4 करोड़ रूपया भुगतान होता है, परियोजना में नट, बोल्ट, कोयला समेत करोड़ो के सामानों की चोरी हो रही है, मात्र कमीषनखोरी के लिए ठेकेदारी प्रथा चलायी जा रही है,मजदूरों को मिलने वाली मजदूरी तक में लूट हो रही है 30 दिन के मजदूरों द्वारा किए गए कामों को 20दिन की हाजरी दिखा कर मजदूरी को हड़पा जा रहा है, मजदूरों के ईपीएफ को भी लूट लिया गया है।

इस लूट व भ्रष्टाचार के खिलाफ आवाज उठाने पर मजदूरों का उत्पीड़न किया जाता है। भ्रष्टाचार और लूट को बनाएं रखने के लिए वहां प्रबंधन किसी नियम कानून को नहीं मानता है। बैठक में सरकार से मांग की गयी कि वह अनपरा में सार्वजनिक सम्पत्ति की लूट व भ्रष्टाचार के खिलाफ और अपने अधिकारों के लिए जारी ठेका मजदूरों की हड़ताल में शामिल मजदूर प्रतिनिधियों से तत्काल वार्ता कर उनकी समस्याओं का समाधान करें।

May 11, 2011

संविधान निर्माण ही प्राथमिक


समाजवादी प्रतिस्पर्धा  क्रांति के अंदर दूसरी क्रांति है-विचारधारा के स्तर पर बहुत बड़ी क्रांति है,मार्क्सवाद-लेनिनवाद-माओवाद का एक महत्वपूर्ण विकास है। इसको हम ऐसा मजबूत वैचारिक आधार मानते हैं जिसके कारण हमारी पार्टी भ्रष्टाचार और अधःपतन का शिकार नहीं हो पाएगी...

आनंद स्वरूप वर्मा

अंजनी कुमार की टिप्पणी ‘संसदीय दलदल में धंसती नेपाली क्रांति’की अधिकांश बातों से मेरी सहमति है और जिस खतरे की ओर उन्होंने इशारा किया है उन खतरों को समझते हुए ही मैंने अपनी पहली टिप्पणी की थी। उसमें जब मैंने कामरेड प्रचंड के लिए ‘क्रांतिकारी लफ्फाजी’ शब्द का इस्तेमाल किया था तो इसलिए नहीं कि वे विद्रोह की बात कर रहे हैं और मैं विद्रोह की अवधारणा से असहमत हूं,मेरी आपत्ति यह थी कि कामरेड किरण के विपरीत वे कोई स्टैंड नहीं ले रहे हैं- सार्वजनिक तौर पर शांति प्रक्रिया को पूरा करने और संविधान बनाने के काम को प्राथमिकता देने की बात कहते हैं और कार्यकर्ताओं की आंतरिक बैठकों में (जो सार्वजनिक होती रहीहैं)विद्रोह की बात करते हैं। उन्हें अपना स्टैंड स्पष्ट करना चाहिए- मेरा यही कहना था। कामरेड किरण का स्टैंड स्पष्ट है, जिसे मैंने मौजूदा स्थिति में ‘यूटोपिया’ कहा और जिसके लिए लोगों ने मेरी आलोचना की।

अपनी टिप्पणी में मैं वही लिखूंगा जो मैं सोचता हूं। मैं अभी भी मानता हूं कि पार्टी को संविधान निर्माण पर ही जोर देना चाहिए। संविधान निर्माण कोई क्रांतिकारी कार्यक्रम नहीं है यह जानते हुए भी मैं इस पर जोर देने की बात इसलिए कह रहा हूं कि 2006 में जो व्यापक शांति समझौता हुआ था उसमें यह प्रमुख कार्यों में से एक था। अब इसे पूरा करने में वही पार्टियां बाधा डाल रही हैं जिन्होंने शांति समझौते पर हस्ताक्षर किये थे इसलिए उनको ‘एक्सपोज’ करने के लिए जरूरी है कि पार्टी संविधान निर्माण पर जोर दे। जाहिर है कि उनके एक्सपोज किये जाने से जो वातावरण बनेगा वह विद्रोह के लिए जबर्दस्त जमीन तैयार करेगा। कामरेड किरण मानते हैं कि संविधान बनाने की कवायद से दूर होकर हम केवल विद्रोह की तैयारी करें। मैं अभी भी इससे सहमत नहीं हूं।

अंजनी कुमार की टिप्पणी के छठे पैराग्राफ में जो बातें लिखी गयी हैं उन पर मुझे कुछ कहना है। अंजनी जी, आपको ऐसा कैसे लगा कि मैंने ''1990 में स्वीकृत ‘संवैधानिक लोकतंत्र की प्रणाली’ को माओवादियों के ‘बहुदलीय प्रणाली’ तथा ‘प्रतियोगिता’ की अवधारणा से उलझा’ दिया है।'' मेरी पुस्तक के पृष्ठ तीन से आपने जो अंश उद्घृत किया है उसी में अगले पृष्ठ पर प्रचंड के हवाले से लिखा है 'हमने प्रस्तावित किया है कि जनतांत्रिक विधिक प्रणाली के अंतर्गत और सामंतवाद तथा साम्राज्यवाद विरोधी राजनीतिक शक्तियों के बीच प्रतिस्पर्द्धा को संस्थागत रूप दिया जाय। हमारी राय में इस तरह की बहुदलीय प्रतिस्पर्द्धा संसदीय प्रणाली के मुकाबले हजार गुना ज्यादा जनतांत्रिक  होगी।’ यह पुस्तक मार्च 2005 में प्रकाशित हुई थी और उन लोगों का जवाब थी जो माओवादियों को तानाशाह और एकदलीय प्रणाली के पोषक होने का आरोप लगाते थे।

फिर जुलाई 2006 में मैंने कामरेड प्रचंड का इंटरव्यू लिया जो विभिन्न पत्रिकाओं में प्रकाशित हुआ और उसमें भी एक सवाल के जवाब में इसी मुद्दे पर उन्होंने कहा कि  ''...हमने ‘21वीं शताब्दी में समाजवाद का विकास’ शीर्षक से एक प्रस्ताव पारित किया। उस प्रस्ताव को हम अपने विचारों के विकास की दिशा में महत्वपूर्ण मील का पत्थर मानते हैं। उसमें हमने विचार किया है कि सर्वहारा अधिनायकत्व के अंदर भी और जनता के जनवादी अधिनायकत्व के अंदर भी एक संवैधानिक ढांचे के अंतर्गत बहुदलीय स्पर्धा को संगठित किया जाना चाहिए। अगर यह स्पर्धा नहीं रहेगी तो समूचा समाज ज्यादा से ज्यादा यांत्रिक होता जाएगा, आधिभौतिक होता जाएगा। समाज का एक वस्तुपरक नियम है। जनता को हम अधिक समय तक जबरन दबाव डालकर किसी एक दिशा में नहीं ले जा सकते। इसकी परिणति एक शक्तिशाली विद्रोह में होती है। रूस में ऐसा ही हुआ। चीन में भी ऐसा ही हुआ। अगर हम उस से सबक लिए बिना उसी को दुहराते हैं तो इसका अर्थ यह हुआ कि मार्क्सवाद को हम विज्ञान के रूप में नहीं बल्कि एक जड़सूत्र (डॉग्मा) के रूप में लेते हैं। हम कठमुल्लावादी नहीं हैं। सच्चा मार्क्सवादी कभी भी कठमुल्लावादी नहीं हो सकता... चीन में क्रांति के बाद माओ के समय में आठ पार्टियों का अस्तित्व तो था जो सामंतवाद और साम्राज्यवाद का समर्थन नहीं करती थीं लेकिन माओ ने उन्हें बने रहने की जो अनुमति दी थी उसका मकसद कम्युनिस्ट पार्टी के साथ सहयोग करना था। हमने इस सहयोग को स्पर्द्धा का रूप दिया है। हमारा मानना है कि एक जीवंत समाज बनाये रखने के लिए, समाज में निरंतर जीवन का संचार होते रहने के लिए सर्वहारा पार्टी को भी स्पर्धा संगठित करने के काम को हाथ में लेना चाहिए। इसका यह मतलब नहीं कि हम पूंजीवादी जनतंत्र (बुर्जुआ डेमोक्रेसी) की दिशा में जा रहे हैं। नहीं, हमने उस दस्तावेज में साफ तौर पर लिखा है कि यह सर्वहारा अधिनायकत्व के अंतर्गत स्पर्द्धा संगठित करने की बात है। लोग इस भ्रम में पड़ सकते हैं कि यह भी संसदीय या बुर्जुआ जनतंत्र की दिशा में बढ़ना है पर ऐसा कतई नहीं है। हम सर्वहारा के नेतृत्व में स्पर्द्धा संगठित करने की बात कह रहे हैं। वे लोग तो बुर्जुआ के नेतृत्व में स्पर्द्धा संगठित करते हैं, इसलिए दोनों अलग-अलग बातें हैं। लेनिन ने अक्टूबर क्रांति के तुरंत बाद कहा था कि समाजवादी स्पर्द्धा को संगठित करो। उन्होंने आर्थिक नीति की बात की थी और विचारधारा के क्षेत्रमें भी समाजवादी स्पर्द्धा को संगठित करने की बात की थी। हमारा मानना है कि अगर लेनिन पांच साल और जिंदा रहते तो निश्चित तौर पर वह राजनीतिक स्पर्द्धा संगठित करने की दिशा की ओर और आगे जाते...हमें लगता है कि यह क्रांति के अंदर दूसरी क्रांति है-विचारधारा के स्तर पर बहुत बड़ी क्रांति है, मार्क्सवाद-लेनिनवाद-माओवाद का एक महत्वपूर्ण विकास है। इसको हम ऐसा मजबूत वैचारिक आधार मानते हैं जिसके कारण हमारी पार्टी भ्रष्टाचार और अधःपतन का शिकार नहीं हो पाएगी। आलोचना करने वाले को हम आगे रखेंगे। अपनी कमजोरी दिखाने वाले को आगे रखेंगे तो हम पतन से बचेंगे। अगर हम गलती करेंगे तो जनता की, सर्वहारा की दूसरी पार्टी हमें खत्म करने के लिए आ जाएगी...''

लगभग 1500 शब्दों के लेख में यह उम्मीद करना बेमानी है कि मैं पार्टी की दुरावस्था का विस्तार से विश्लेषण करूंगा। मेरे लेख का शीर्षक ‘क्या माओवादी क्रांति की उल्टी गिनती शुरू हो गयी है?’अपने आप में सारी बातें कह देता है कि पार्टी अधःपतन की ओर बढ़ रही है। अब इसके लिए कौन जिम्मेदार है यह विस्तृत विश्लेषण का विषय है। आप और नीलकंठ केसी या अन्य बहुत सारे लोग कुछ भी कहें, मैं अभी भी एनेकपा (माओवादी) को क्रांतिकारी पार्टी मानता हूं और इसके शीर्ष नेतृत्व यानी का. प्रचंड, का. किरण और का. बाबूराम को क्रांतिकारी मानता हूं। इनके बीच विचारों का टकराव जारी है लेकिन इस टकराव से ही कोई रास्ता भी निकलेगा। इसलिए मैं अभी भी नेपाली क्रांति के प्रति आशावान हूं। उपरोक्त लेख के माध्यम से मैंने महज अपनी चिंता जाहिर की थी, इसे खारिज नहीं किया था जैसा करने में आप सभी लोग जुट गये हैं।

एक बात और कहनी है। मैं यह मानकर चलता हूं कि इन टिप्पणियों को जो लोग पढ़ रहे हैं और इस पर जो अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त कर रहे हैं वे कम्युनिस्ट विचारों के हैं। इसीलिए पेरिस कम्यून के प्रसंग पर जब आपने यह सवाल उछाला कि ‘क्या पेरिस कम्यून इतिहास का नकारात्मक पक्ष है?’ तो मुझे हैरानी हुई। आपको पेरिस कम्यून का मेरे द्वारा उल्लेख किया जाना बहुत ‘नायाब’ लगा। आपकी जानकारी के लिए मैं यह बता दूं कि पेरिस कम्यून के उल्लेख का अर्थ यह हुआ कि कोई क्रांति संपन्न तो हुई, लेकिन उसे टिका पाना संभव नहीं हुआ। अगर इस रूप में आप इसे देख सकते तो ‘पेरिस कम्यून’ के मेरे उल्लेख को ‘दुर्भाग्यपूर्ण’ नहीं मानते।

आपकी यह  चिंता स्वाभाविक है कि नेपाल की क्रांति संसदवाद के दलदल में फंस कर खत्म न हो जाय। आपकी इस चिंता को मैं भी उतनी ही शिद्दत से महसूस करता हूं।




जनपक्षधर पत्रकारिता के महत्वपूर्ण स्तंभ और मासिक पत्रिका 'समकालीन तीसरी दुनिया' के संपादक.

नेपाल के राजनीतिक हालात और नेपाली माओवादी पार्टी की भूमिका को लेकर आयोजित इस बहस में अबतक आपने पढ़ा -



दहेज़ की ‘प्रोवोक एडवरटाइजिंग’


दहेज लोलुप बनाने वाले ‘प्रोवोक डवरटाइजिंग’ की ओर  किसी सामाजिक संगठन का ध्यान ही नहीं जाता, जबकि उपभोक्तावादी संस्कृति के इस चालाक कारनामें से समाज में बुरा असर हो रहा है...

डॉ आशीष वशिष्ठ

दिलदार दूल्हे की दमदार गाड़ी। शुभ विवाह आफॅर। विवाह के शुभ अवसर पर अपनों को दें एक अनमोल उपहार। हम तुम आफॅर। लगन सीजन सेल। गुण ऐसे जो हर कुंडली से मेल खाएं..........शुघड़ियों को यादगार बनाएं और जीवन का एक नया नया सफ़र शुरू करें.............शुभ लगन आफॅर - जैसे विज्ञापन हम सभी रोज बाजारों-मॉलों से गुजरते हुए देखते हैं और प्रभावित होते हैं। मगर क्या आप जानते हैं, यह क्या है? यह है ‘प्रोवोक मार्केटिंग’ का तरीका है, जिसके चंगुल में उपभोक्ता को उकसा, भड़का और लालच देकर बाजार में खरीदारी के लिए मानसिक तौर पर फंसाया जाता है।
‘प्रोवोक एडवरटाइजिंग’ का जो नया ट्रेंड हमारे देश  में चल रहा है वो पूरे समाज पर नकारात्मक प्रभाव डाल रहा है। एक तरफ तो सरकार ने दहेज विरोधी अधिनियम बनाए हैं, वहीं दूसरी ओर इस तरह के विज्ञापन बिना किसी रोक-टोक के प्रसारित व प्रकाशित  हो रहे हैं। देखा जाए तो ये उत्पादक खुले आम सीना खोलकर कानून की धज्जियां उड़ा रहे हैं व पूरी सोसायटी में एक मैसेज जा रहा है कि फलां गाड़ी के बिना लड़की विदा कैसे होगी। फलां कंपनी की घड़ी या कपड़ा पहने बिना भला कोई दूल्हा दुल्हन कैसे बन पाएगा। फलां टीवी, फ्रीज या फलां उत्पाद देकर ही बेटी के हाथ पीले करो वरना शादी ब्याह अधूरा है और जीवन रंगहीन व रसहीन है।

आज साधारण से साधारण शादी पर दो से पांच लाख का खर्च आता है। समाज की देखा-देखी व झूठी शान रखने के लिए माता-पिता व अभिभावक कर्ज लेकर अपनी बेटी के हाथ पीले करते हैं। लंबी-चौड़ी लिस्टें बजट बढ़ाती है। वहीं ससुराल पक्ष का मुंह सुरसा के समान बढ़ता ही चला जाता है। जाहिर तौर पर जीवन के भौतिक सुख सुविधाएं जुटाने के लिए दहेज एक माध्यम बन गया है। बढ़ते दहेज के कारण लड़कियों का विवाह एक समस्या बन गई है। शादी के दौरान तथा बाद में भी लड़कियों तथा उनके माता-पिता को अपमान सहना पड़ता है। इससे लड़कियों के मन में यह बात घर कर जाती है कि वे परिवार के लिए बोझ हैं तथा माता-पिता के लिए समस्या बन गई है। इसकी चरम परिणति कभी-कभी लड़कियों द्वारा आत्महत्याओं में होती है।

बाजार की नये उत्पादों से परिचित कराने का माध्यम विज्ञापन ही होता है, लेकिन मौजूदा समय में विज्ञापन अपने उद्देष्य से भटकते जा रहे हैं। ऐसे विज्ञापन प्रकाषित व प्रसारित किये जा रहे हैं जिनका समाज पर बुरा असर हो रहा है। विज्ञापन एजेंसिया मानव मनोविज्ञान को भली भाति जानती हैं व उसकी दुखती नस को दबाकर अपना माल बेचती हैं। उन्हें इसकी तनिक भी परवाह नहीं है कि किसी गरीब लड़की की षादी हो या न हो। चाहे दो-चार नयी-नवेली दुलहनें आग लगाकर मर जाएं या मार दी जाएं। उन्हें तो बस माल बेचना है वो चाहे कैसे भी बिके। उत्पादक को तो अपने माल की बिक्री बढ़ानी है इसके लिये वो रोज नये हथकंडे खोजते व ढूंढते रहते हैं।

पिछले दिनों सर्वोच्च न्यायालय ने सरकारी कर्मचारियों के लिए दहेज के संबंध में दिशा-निर्देष जारी किये हैं और उधर ये विज्ञापन सर्वोच्च न्यायालय के दिषा निर्देषों को मुंह चिढ़ा रहे हैं। राष्ट्रªीय महिला आयोग एवं नेषनल क्राइम रिकार्ड ब्यूरो के आंकड़ों अनुसार प्रतिवर्ष महिलाओं के प्रति होने वाले अपराधों की संख्या में इजाफा हो रहा है जिसमें सबसे अधिक मामले दहेज से जुड़े होते हैं। नेषनल क्राइम रिकार्ड ब्यूरो के आंकड़ों के अनुसार दहेज विवाद के कारण वर्ष 2006 में 2276 सुहागिनों ने आत्महत्या की हैं। अर्थात प्रतिदिन 6 लड़किया ससुराल वालों के तानों व प्रताडना से तंग आकर आत्महत्या करती है। नेशनल कमीशन फार वूमेन द्वारा जारी दहेज हत्या के आंकड़े भी भयावह तस्वीर पेष करते हैं। वर्ष 2004 से 2006 तक दहेज हत्या के 7026, 6787, 7618 मामले दर्ज किये गये हैं। आंकड़ों के अनुसार वर्ष 2007 में 8093, वर्ष 2008 में 8172 और वर्ष 2009 में कुल 8383 दहेज हत्या के मामले रिकार्ड हुए हैं।

दहेज निरोधक कानून के प्रभावशाली क्रियान्वयन के अभाव में दहेज की समस्या ज्यों की त्यों बनी हुई है। 1961 में दहेज प्रथा उन्मूलन के लिए कानून बनाया गया, 1975  व 1976 में संषोधन कर इसे और कठोर बनाया गया। 1985 में ‘द डयोरी प्रोबिशन’ (मैन्टनेंस ऑफ लिस्ट प्रेसन्ट्स टू ब्राइड एंड ब्राइडग्रूम रूल्स) भी बनाया गया। लेकिन इसके बावजूद दहेज का दानव यहां-वहां स्वच्छंद घूम रहा है बदलती परिस्थितियों के अनुसार दहेज की परिभाषा को भी पुर्नभाषित करने की आवष्यकता है। तमाम अधिनियमों के बाद भी 27 मिनट में एक दहेज हत्या का प्रयास होता है और हर चार घंटे में एक दहेज हत्या हो जाती है।

आश्चर्य  की बात तो यह है कि अभी तक किसी भी सामाजिक संगठन का ध्यान उपभोक्तावादी संस्कृति के इस चालाक कारनामें की तरफ ध्यान नहीं गया है सरकारी तंत्र का तो कहना ही क्या। इस संबंध में सामाजिक संगठनों व कार्यकर्ताओं केा अलख जगानी पड़ेगी व उपभोक्तावादी संस्कृति के इस कुत्सित व घृणित प्रयास को विज्ञापित होने से पूर्व ही कुचलना होगा। वहीं सरकार को भी इस संबंध में कड़े दिशा-निर्देष जारी करने चाहिए ताकि कोई भी उत्पादनकर्ता अपना माल बेचने के लिए इस तरह के ‘प्रोवोकिंग विज्ञापन’ जारी न कर पाएं, क्योंकि यहां सवाल केवल माल बेचने का नहीं बल्कि लाखों-करोड़ों जिंदगियों से जुड़ा है। सरकार व विभिन्न एंजेसियों को इस संबंध में तत्पर प्रभावी कार्रवाई करके भारत की बेटियों को दहेज के दावानल से बचाना चाहिए।
                                                                  
                         

     स्वतंत्र पत्रकार और उत्तर प्रदेश के राजनीतिक- सामाजिक मसलों के लेखक .



May 10, 2011

प्रपंच पर टिका सत्य साईं का आध्यात्म

 
अब तक राजनीति,नौकरशाही और माफियाओं के बीच एकाधिकार रखने वाले साईं के दायरे में दूसरे बाबाओं ने सेंध लगाने शुरू कर दी थी और बाबा के मुखमंडल से राजसत्ता की चमक धूमिल होने लगी थी...

सनल एडमर्क

साईं बाबा जब बड़े भगवान नहीं थे,तब से मैं उन्हें जानता हूं। उस समय केरला में इंडियन रेशनलिस्ट आंदोलन का संयोजक रहते हुए मैंने साईं बाबा को एक चिट्ठी लिखी थी। चिट्ठी में हम लोगों ने उनके द्वारा भक्तों को मिठाई,सोने की चेन और भभूत देने की बात को फर्जी बताया और कहा कि वे वैज्ञानिक तौर पर इसे साबित करके दिखायें। शर्त बस इतनी रखी कि साईं बाबा के पांच फिट के दायरे में कोई नहीं आयेगा और उनकी बांह ढकी नहीं रहेगी।

साईं बाबा की ओर से हमारी चुनौती का कोई जवाब नहीं आया। उसके बाद हमारी मुलाकात श्रीलंका के प्रोफेसर अब्राहम कोवूर से हुई। भारतीय मूल के कोवूर दुनिया के बड़े रेशनलिस्टों में गिने जाते थे और भारत आने पर साईं बाबा के फर्जीवाड़े पर सार्वजनिक भाषण दिया करते। कोवूर ने पहले तो श्रीलंका में ही बाबा की बखिया उधेड़ी, क्योंकि इनके भक्त उस समय तक भारत से ज्यादा श्रीलंका में थे। देखते-देखते कोवूर के भाषणों से साईं भक्तों में प्रश्न उठने लगे। इससे तंग हो साईं ने वर्ष 1972 में एक पत्र के जरिये बयान जारी किया कि जो लोग दूर रहकर मेरा विरोध कर रहे हैं,वे मेरे आश्रम में आयें फिर उन्हें साईं के सही-गलत का पता चलेगा।

कोवूर ने साईं की चुनौती को स्वीकार करते हुए एक टीम बनायी। पच्चीस लोगों की इस टीम में पत्रकार, रेशनलिस्ट आंदोलन से जुडे़ छात्र और जाने-माने रेशनलिस्ट शामिल थे। इस टीम में मैं भी शामिल था। साईं की बताई  तारीख और समय पर हमारी टीम पुट्टापर्थी पहुंच गयी, लेकिन साईं नहीं मिले। हमें पुट्टापर्थी में गेट पर ही रोक लिया गया और बताया गया कि बाबा बंगलुरू के वाइट फिल्ड आश्रम गये हैं। साईं के सचिव ने हमें वाइट फिल्ड आने को कहा।

कोवूर के नेतृत्व में टीम वाइट फिल्ड पहुंच गयी। बाबा वहां भी नहीं मिले तो कोवूर ने आश्रम के बाहर एक प्रेस वार्ता आयोजित की और लोगों को दिखाया कि बाबा हाथ में पहले से रखी स्टार्च की गोलियों को रगड़कर हाथ से भभूत कैसे गिराते रहते हैं। उसके बाद दूसरी बार साईं बाबा की करामातों पर से दुनियाभर में तब पर्दा उठा,जब चैनल फोर ने उनकी हाथ की सफाई के फरेब को सार्वजनिक किया। इसमें पलीता लगाने का काम 'गुरू बस्टर्स' नाम की फिल्म ने किया।

हालांकि उससे पहले वर्ष 1994में ही हैदराबाद दूरदर्शन के एक कैमरामैन ने बाबा के फरेब को तब कैद कर लिया था, जब साईं अपने 79वें जन्मदिन पर कल्याण मंडप बनाने वाले को उपहार में सोने की चेन दे रहे थे। लेकिन उस वीडियो को दूरदर्शन नहीं दिखा सका। पहली बार बाबा के फरेब की तस्वीरों को डेक्कर क्रॉनिकल और इलस्ट्रेटेड वीकली ने छापा था।

उस वीडियो में साईं बाबा को नीचे से सोने की चैन सरकाते हुए साफ दिखाया गया था। बाद में उसी वीडियो और कुछ अन्य वीडियो को मिलाकर 'गुरू बस्टर्स' नाम की फिल्म भी बनी। मगर भारत में साईं की ठगी के खिलाफ किसी संगठन या पार्टी की बोलने की हिम्मत खत्म होती चली गयी। कारण कि साईं की देश चलाने वाले राजनेताओं से लेकर पूंजीपतियों तक में अच्छी पैठ थी। एक समय तो देश के सर्वोच्च पदों पर बैठे सभी लोग बाबा के  भक्त थे। इनमें पूर्व राष्ट्रपति शंकर दयाल शर्मा, न्यायाधीश केएन भगवती और प्रधानमंत्री नरसिंहा राव जैसे बड़े नाम शामिल थे।

'गुरू बस्टर्स' फिल्म ने दुनियाभर में साईं भक्तों और दानदाताओं के बीच फैले उनके तिलिस्म पर एक जोरदार हमला किया। इस हमले के बाद साईं ने कुछ कल्याणकारी काम किये,जिन्हें आज उनकी समाज के लिए उपलब्धियों के तौर पर गिनाया जाता है। अन्यथा सवाल उठता हैं कि जिस साईं बाबा ने खुद को 14साल की उम्र में भगवान घोषित कर दिया था, उसने पहली बार जनता की सेवा का काम 79की उम्र यानी 1995 में क्यों शुरू किया?सिर्फ इसलिए कि साईं बाबा के एकाधिकार के मुकाबले दूसरे संत भी मैदान में आने लगे थे।

अब तक राजनीति, नौकरशाही और माफियाओं के बीच एकाधिकार रखने वाले साईं के दायरे में दूसरे बाबाओं ने सेंध लगाने शुरू कर दी थी और बाबा के मुखमंडल से राजसत्ता की चमक धूमिल होने लगी थी। परिणामस्वरूप  बाबा की अकूत संपत्ति पर प्रश्न उठने लगे थे। अब बाबा के पास जनता के बीच अपनी आस्था बचाये रखने के लिए जनकल्याणकारी कामों के सिवाय कोई रास्ता नहीं बचा था। भारत में बढ़ते बाबाओं के बाजार में दबाव और बढ़ा तो वर्ष 2001 से स्कूल, अस्पताल और कॉलेज जैसी योजनाओं में तमाम बाबा कूदे, जिसमें एक नाम साईं का भी है। मगर बाबाओं के इन कामों को कोई जनकल्याणकारी उपक्रम कहता है तो फिर उसे दस्युओं,माफियाओं और दंगाइयों का भी समर्थन करना चाहिए, क्योंकि एक स्तर पर वह भी कुछ भलाई का काम करते हैं।

देश की आजादी से पहले जन्मे साईं बाबा ने खुद को भगवान और जनता को भाग्य पर जीने का सूत्र उस समय दिया,जब जनता को वैज्ञानिक और तर्कशील ज्ञान की सबसे अधिक जरूरत थी। मेरी जानकारी में साईं पहले ऐसे संत हैं,जिन्होंने खुद को भगवान घोषित किया। यही नहीं देश की बड़ी आबादी को उन्होंने सिलसिलेवार ढंग से ढोंगी, बलात्कारी, हत्यारे, माफिया बाबाओं के चंगुल में फंसते जाने की अंधेरी गली में मोड़ दिया।



जाने माने तर्कशास्त्री और इंडियन रेसनलिस्ट सोसाइटी के प्रमुख . सत्य साईं पर इनका वृहद् शोध है.वे साईं के जादुई और अध्यात्मिक कारनामों को हाथ की सफाई और प्रपंच मानते हैं.

May 9, 2011

संसदीय दलदल में धंसती नेपाली क्रांति


प्रचंड के अनुसार  एमाले का बहुदलीय जनवाद बुर्जुआ संसदवाद में वर्ग समन्वय और सुधारवादी लाइन को अभिव्यक्त करता है,  तो क्या प्रचंड इतने नादां हैं जो अपनी उसी अधोगति  नहीं समझ पा  रहे हैं...

अंजनी कुमार

आनंद स्वरूप वर्मा नेपाल पर चल रही बहस के अपने ‘संक्षिप्त’ जवाब में कहते हैं, ‘नेपाली क्रांति का नेतृत्व समूह और एक-एक कार्यकर्ता भी यही कहता है कि क्रांति जारी छ।'नेपाली राजनीतिक परिदृश्य में माओवादियों की भूमिका को लेकर आनंद जी का यह निष्कर्ष उनके बाद के तर्कों में भी लगातार पुष्ट होते हुए चलता है। इसके लिए वह इतिहास का हवाला भी देते हैं और वर्तमान के हालात की जरूरतों के अनुरूप संभलकर चलने की हिदायतें भी,लेकिन क्या यह उपरोक्त निष्कर्ष वस्तुगत स्थितियों को बयान करता है?
क्या नेपाल का सारा नेतृत्व समूह और एक-एक कार्यकर्ता इस बात का कायल है कि क्रांति जारी छ?' यदि ऐसा होता तो खुद आनंद स्वरूप वर्मा के ही आंकड़ों के अनुसार, ‘2006 और 2011 में आपके पीएलए,वाईसीएल और सामान्य कार्यकर्ता की जो आत्मगत तैयारी थी वह आज 60प्रतिशत से ज्यादा कम’न हो चुकी होती। नेतृत्व समूह में इतना घमासान न मचा रहता। और खुलेआम यह बात न उठती कि एनेकपा-माओवादी धीरे धीरे संशोधनवाद,दक्षिणपंथ आदि के गर्त में गिरती जा रही है। सच्चाई तो यही है कि वहां कार्यकर्ताओं के बड़े हिस्से और नेतृत्व के दूसरी श्रेणी के बहुमत को लगने लगा है कि शांति ठहर गई है... कि संक्रमण के इस दौर की सड़ांध में क्रांति का दम घुट रहा है।

फिर भी जब आप यह दावा करते हैं कि क्रांति जारी है तो निश्चय ही इस बात के पीछे एक विचार प्रणाली हैं। आपके विभिन्न लेखन और प्रसिद्ध पुस्तक ‘रोल्पा से डोल्पा’तथा ‘नेपाल से जुड़े कुछ सवाल’में यह ध्वनित होता रहा है कि संसदीय पार्टियों ने जनवाद का एजेंडा लागू नहीं किया इसलिए माओवादियों को जनता का समर्थन मिला। आपका ही यह कथन है :‘पिछले दस वर्षों के दौरान विभिन्न राजनीतिक दलों ने जिस तरह के जोड़-तोड़ किए और जनता के हितों को तिलांजली दी, उसका ही यह नतीजा है कि आज माओवादियों को देश के अंदर व्यापक समर्थन प्राप्त है।’

आप इन पार्टियों की कथनी में जनवाद देखते हैं,पर करनी में इनकी कमजोरी देखते हैं। क्या जनवाद का प्रश्न इच्छा-अनिच्छा से जुड़ा हुआ है?राजनीति में इसे वर्ग चरित्र के माध्यम से ही समझा जाता है। नेपाल में संघर्ष का मुख्य पहलू राजतंत्र विरोधी आंदोलन ही रहा है। यह संघर्ष भी तभी मजबूत होकर उभरा,जब यह आमूल बदलाव के नारे और कार्यक्रम के साथ जुड़ा। वहां कम्युनिस्ट आंदोलन तब=तब पतित हुआ जब आमूल बदलाव के सवाल को गौण बना दिया गया।

नेपाल में जनतंत्र का सवाल सिर्फ राजतंत्र विरोधी आंदोलन पर ही नहीं टिका था। यह समाज के अर्द्धसामंती-अर्द्धऔपनिवेशिक संरचना के निषेध और नवजनवादी क्रांति कार्यक्रम पर ही मजबूती से खड़ा हो पा रहा था। यह अकारण नहीं था कि एनेकपा-माओवादी अपने शुरूआती दिनों में इन्हीं संसदीय पार्टियों के खिलाफ संघर्ष करते हुए ही उभरकर आई। यह संसदीय पार्टियों की कमी से छूट गई जमीन नहीं, बल्कि वर्गीय पूर्वाग्रहों का परिणाम था जहां से एनेकपा-माओवादी ने व्यापक जनता को गोलबंद करते हुए संघर्ष को आगे बढ़ाया।

आप इनसे जनवाद की उम्मीद ही नहीं कर रहे हैं,साथ ही इनके द्वारा वर्ष 1990में स्वीकृत ‘संवैधानिक बहुदलीय लोकतंत्र की प्रणाली’ को माओवादियों के ‘बहुदलीय प्रणाली’ तथा ‘प्रतियोगिता’ की अवधारणा से उलझाते भी हैं। आपने अपनी पुस्तक ‘नेपाल से जुड़े सवाल’में एक सवाल के जवाब में लिखा है, ‘माओवादियों का कहना है कि उन्होंने बीसवीं सदी की क्रांतियों से सबक लेते हुए जो निष्कर्ष निकाले हैं उसमें बहुदलीय प्रणाली का बने रहना समाज के स्वाथ्य के लिए जरूरी है’ (पृश्ठ ३) आपने यह बात ज्ञानेन्द्र को सत्ता से बेदखल करने एवं एक नई संविधान सभा बनाने के संदर्भ में संसदीय पार्टियों के साथ मोर्चा गठन और एकदलीय तानाशाह शासन की आशंका के संदर्भ में कही है।

माओवादियों की इक्कीसवीं सदी की क्रांति और समाजवाद की अवधारणा में बहुदलीय व्यवस्था ‘संवैधानिक बहुदलीय लोकतंत्र’ की अवधारणा से पूरी तरह भिन्न है। प्रचंड के शब्दों में, ‘एमाले का बहुदलीय जनवाद बुर्जुआ संसदवाद में वर्ग समन्वय और सुधारवादी लाइन को अभिव्यक्त करता है’ तथा ‘एमाले के जनवाद और हमारे जनतांत्रिक गणराज्य के सार में ही बहुत बड़ा अंतर है’(13 फरवरी 2006 को द वर्कर में छपा साक्षात्कार पृष्ठ 20, अनुवाद : आनंद स्वरूप वर्मा।)
चुन्वांग सम्मेलन में लिए गए निर्णय एक तात्कालिक कार्यभार को पूरा करने के लिए था। यह निर्णय इस बहुदलीय व्यवस्था में लोटपोट होने के लिए नहीं था। प्रचंड के ही शब्दों में,‘आज के विश्व में संसद को इस्तेमाल करने की कार्यनीति की उपयोगिता अब लगभग समाप्त हो चुकी है लेकिन देश की और जनता की परिस्थिति को समझे बिना किसी व्यवस्था का निरंतर बहिष्कार मार्क्सवाद नहीं है.’(उपरोक्त, पृष्ठ 22।)निश्चय ही यह कार्यनीति व्यवस्थागत बदलाव के लिए संक्रमणकारी भूमिका निभा सकने में सक्षम नहीं है। किसी पार्टी का संसद में जाना ही संशोधनवाद नहीं होता, लेकिन जब यह कार्यनीति पार्टी के रणनीति की शक्ल अख्तियार करने लगती है,तब समझना चाहिए कि वहां खतरा पैदा हो चुका है।

अब तक का अनुभव यही बताता है कि नेपाल में जनता का जनवादी गणराज्य तो दूर,बुर्जुआ जनवादी गणराज्य की भी स्थिति बनती हुई नहीं दिख रही है। आज संसद का प्रयोग रणनीतिक स्तर के व्यवस्थागत बदलाव के लिए करना असंभव हो चुका है। यदि हम 2006से भी शांतिकाल मानें और इसमें संसदीय समयावधि जोड़ दें,तब इतनी लंबी समयावधि में इसके व्यवस्थागत बदलाव के प्रयोग की गुजांइश ही नहीं बनती। बल्कि अर्द्धसामंती और अर्द्धऔपनिवेशिक समाज व्यवस्था की नेतृत्कारी पार्टियाँ इस समयावधि में अपने को मजबूत करने में ही मशगूल रहीं। रिकार्ड स्तर पर नए प्रधानमंत्री का चुनाव टलता रहा। माओवादी पार्टी को सत्ता से बाहर रखा। अंतरराष्ट्रीय  नेटवर्क को मजबूत किया। उन गांव तक पुलिस-सेना की घुसपैठ को बढ़ाया जहां उसकी आज तक पहुंच नहीं थी। जबकि माओवादी पार्टी इस शांतिपूर्ण काल में अनेक स्तरों पर विभिन्न तरह की कमजोरी की शिकार हुई। सात साल बाद वह शांतिपूर्ण तरीके से ‘पेरूवीयन परिस्थिति’में जाकर फंस गई। आनन्द स्वरूप वर्मा का लेखन इस फंसान की परिस्थिति के कारणों की पड़ताल नहीं करता। जो इन कारणों पर रोशनी डाल रहे हैं, इससे निकलने की जद्दोजहद करने का आग्रह कर रहे हैं उन्हें आप ‘यूटोपिया’ कहकर नकार रहे हैंऔर विपरीत तथा गलत निष्कर्ष तक ले जा रहे हैं।

संविधान सभा और संसद में संविधान तथा सरकार बनाने को लेकर जो जोड़तोड़ चलती रही है, उससे ‘बुर्जुआ संसदीय’ पार्टियों का वर्ग चरित्र खुलकर सामने आया है। एमाले जैसी संशोधनवादी पार्टियों का भी वर्ग चरित्र जनवाद की जरूरतों से मेल नहीं खाता और इनका व्यवहार जनता के दबाव में भी नहीं बदलता। तब हम कांग्रेस जैसी पार्टियों से क्या उम्मीद कर सकते हैं?इन पार्टियों की भारत परस्ती और सामंतवाद के साथ गठजोड़ घिनौने रूप में बार-बार सामने आया है। इनका सारा जोर इस बहुदलीय प्रणाली में ‘संविधान’ एवं ‘प्रतियोगिता’की नैतिकता माओवादियों के खिलाफ प्रयोग कर उन्हें सत्ता से बाहर रखने और संविधान को न बनने देने और कुत्सा प्रचार करने का ही रहा।

यह प्रणाली नेपाल के पूरे समाज के बदलाव की आकांक्षा को संसद के दड़बे में बंद कर देने की आसान सी जुगत में बदल गयी। इसने एनेकपा-माओवादी और नेपाल की जनता की क्रांतिकारी गति को बारह सूत्रीय समझौते और चुन्वांग सम्मेलन के निर्णय का मोहताज बना दिया है। आज वहां एक ऐसा राजनीतिक माहौल बन गया है जिसका खामियाजा आम जनता का उठाना पड़ रहा है। जबकि चतुर खिलाड़ी नैतिकता का लबादा ओढ़े क्रांति को ‘फिलहाल’टाल देने के लिए अड़े हुए हैं। यह सबकुछ मार्क्सवाद के लबादे में किया जा रहा है और नेपाल की ‘विशिष्ट स्थिति’का राग लगातार अलापा जा रहा है।

वर्मा जी,आप इस वर्तमान प्रणाली के चरित्र,सीमा को चिन्हित करने के बजाय माओवादियों को लताड़ते हैं कि ‘आप अपनी हर खामियों के लिए कब तक भारत को दोषी ठहराते रहेंगे’ और ‘पार्टी की आंतरिक कमजोरी के कारण भारत एक हद तक सफल हो सका’है। आप सलाह देते हैं कि ‘आज विद्रोह की स्थितियां नहीं हैं और पार्टी को हर हाल में शांति प्रक्रिया को आगे बढ़ाने का प्रयास करना चाहिए’ और ‘किसी भी तरह संविधान निर्माण का काम पूरा किया जाय।' आप इस बहुदलीय प्रणाली में लोटपोट हो रही संसदीय पार्टियों के बारे में बात करने के बजाय एनेकपा-माओवादी के बारे में लिखते हैं कि ‘आज स्थिति यह है कि हर मोर्चे पर पार्टी की विफलता उजागर हो रही है। संविधान बनाने का इसका लक्ष्य कोसों दूर चला गया है।’

क्या सचमुच माओवादी पार्टी संविधान बनाना नहीं चाहती?आप किरण की प्रस्तावित राजनीतिक कार्यदिश ‘जनांदोलन श्रृंखला’, ‘सड़क से संसद की ओर’ एवं ‘जनविद्रोह’ से सहमति नहीं रखते, क्योंकि यह 'यूटोपिया' है, और प्रचंड की कथनी-करनी का फर्क ‘क्रांतिकारी लफ्फाजी’ है, तब तो एक ही रास्ता बचता है कि वर्ष 1990के समय से अस्तित्व में आई संवैधानिक बहुदलीय प्रणाली के तहत संसदीय राजनीति में गोते लगाते हुए माओवादी पार्टी जनतंत्र का खेल खेले.शांतिपूर्ण प्रतियोगिता और शांतिपूर्ण संक्रमण के माध्यम से ‘नवजनवादी’ और ‘हो सके तो ‘समाजवादी क्रांति’ करे।

दरअसल,आप संवैधानिक बहुदलीय प्रणाली के तहत ही एनेकपा-माओवादी पार्टी को‘व्यवहारिक राजनीति’ करने की सलाह दे रहे हैं। यह व्यावहारिक राजनीति और कुछ नहीं, बल्कि संसदवाद व सत्ता का वह दलदल है जिसमें चंद महीनों के ‘राज करने’का परिणाम खतरनाक रूप से सामने दिखाई दे रहा है़।

आप जब यह कहते हैं कि ‘किसने रोका था एक और पेरिस कम्यून बनने से?’तो इसके बहुत से निहितार्थ निकलते हैं। संदर्भ अप्रैल 2006 में जनांदोलन-2 के दौरान ज्ञानेंद्र को सत्ता से खदेड़ देने का है। पहली बात यह है कि क्या पेरिस कम्यून इतिहास का नकारात्मक पक्ष है? दूसरा, क्या नेपाल के राजनीतिक हालात फ्रांस जैसे ही थे कि वहा सत्ता दखल का अंतिम परिणाम क्रांति की हार में ही बदल जाए? क्या भारत कैजर की भूमिका निभाता? और, क्या संसदीय पार्टियां गृहयुद्ध में निर्णायक भूमिका में आतीं? यह मुद्दा क्रांतिकारी पार्टियों व बुद्धिजीवियों के बीच जेरे बहस रहा है।

यहां हमें यह बात जरूर याद रखना चाहिए कि नेपाल में उस समय एनेकपा-माओवादी पार्टी का एकीकृत नेतृत्व था जिसके पास एक मजबूत जनसेना, जनमिलिशिया, जनसंगठन और आधार क्षेत्र में राजसत्ता चलाने का अनुभव था। नेपाल में किसी भी बाहरी हस्तक्षेप के खिलाफ जनता की मजबूत एकजुटता बनती रही है। वहां की भौगोलिक स्थिति और दक्षिण एशिया में माओवादी आंदोलन की उपस्थिति उसके पक्ष को मजबूत करता था। बहरहाल,मुद्दा बहस का है और प्रचंड तथा बाबूराम भट्टाराई अब तक सत्ता दखल के सवाल से कतराते रहे हैं। इस बहस का ‘पेरिस कम्यून’ के रूप में सूत्रीकरण दुर्भाग्यपूर्ण है। पेरिस कम्यून पर मार्क्स से लेकर माओ तक सभी ने लिखा है और शायद ही कोई कम्युनिस्ट पार्टी हो जिसने इस पर अपने विचार व्यक्त न किए हों।

आनंद स्वरूप वर्मा ने जिस तरह से पेरिस कम्यून का उल्लेख किया है,वह नायाब है। शायद यह सर्वहारा की तानाशाही की अवधारणा पर बहुदलीय संवैधानिक प्रणाली के जोर का ही नतीजा है। बहरहाल, एनेकपा-माओवादी वर्तमान में जिस बहुदलीय संवैधानिक प्रणाली के तहत जो प्रयोग कर रही है वह न तो उनके ही सैद्धांतिक अवधारणा से मेल खाते हैं और न ही 12  सूत्रीय समझौता ही लागू हो पा रहा है। आज इन दोनों पर जोर का अर्थ संसदीय दलदल में फंसकर खत्म होना है।

निश्चय ही नेपाल की जनता में इस दलदल से निकलने की छटपटाहट है। यह विभिन्न रूपों में उभरकर सामने आ रही है। इतिहास का सबक समय के पहिए को आगे तो बढ़ाकर ले ही जाएगा, यह आने वाले दिनों में और भी निखरकर सामने आएगा।



स्वतंत्र पत्रकार व राजनीतिक-सामाजिक कार्यकर्ता.फिलहाल मजदूर आन्दोलन पर कुछ जरुरी लेखन में व्यस्त.






  • नेपाल के राजनीतिक हालात और नेपाली माओवादी पार्टी की भूमिका को लेकर आयोजित इस बहस में अबतक आपने पढ़ा -
1-क्या माओवादी क्रांति की उल्टी गिनती शुरू हो गयी है?  2-क्रांतिकारी लफ्फाजी या अवसरवादी राजनीति, 3- दो नावों पर सवार हैं प्रचंड  4- 'प्रचंड' आत्मसमर्पणवाद के बीच उभरती एक धुंधली 'किरण' 5- प्रचंड मुग्धता नहीं, शीर्ष को बचाने की कोशिश 6- संक्रमण काल की जलेबी अब सड़ने लगी है कामरेड  7 - संशोधनवादियों को जनयुद्ध का ब्याज मत खाने दो !


May 8, 2011

कहता है अमेरिका

रंजीत वर्मा की चार कवितायेँ

1.

ओबामा और ओसामा
भले ही इन नामों में समानता हो
भले ही इनकी कार्रवाइयां भी एक जैसी हों
हत्या और धमाकों से लबरेज
फिर भी क्यों लगता है ऐसा कि
इनमें से एक है सभ्य
और दूसरा है बर्बर

कहीं यह उनके पहनावे की वजह से तो नहीं
एक का पहनावा है ऐसा
जैसा कि आतंकियों को पहने
वे दिखाते हैं हमें टीवी में बार-बार
जबकि दूसरे का पहनावा है ऐसा
जिसे दफ्तर या दावतों में जाते वक्त
पहनने का रिवाज बताते हैं वे

या कहीं यह उनकी भाषा में जो अंतर है
उसकी वजह से तो नहीं
एक हमला करने से पहले चीखता है
लेकिन क्या कहता है समझ में नहीं आता
और दूसरा कार्रवाई समाप्त होने के बाद भी
चेहरे पर बिना कोई भाव लाए
शांति और दृढ़ता से कहता है
- जस्टिस हैज बिन डन।

क्या सिर्फ इसलिए
कहा जा सकता है कि
इनमें से एक है अच्छा
और दूसरा है बुरा

क्या इसलिए सिर्फ इसलिए
कहा जा सकता है
एक को अच्छा और दूसरे को बुरा
कि एक कानून तोड़ते
जरा भी नहीं हिचकता
और दूसरा
जो कुछ करता है
कानूनन जायज ठहराने में
है उसे महारत हासिल।

2.
ओसामा अमेरिका का ही गढ़ा हुआ था
आज अमेरिका ने ही उसे तोड़ डाला
और फिर उसने घोषणा की
कि उसने दुनिया को आतंकवाद से
मुक्त कर दिया
लेकिन सवाल है कि
दुनिया पर उसने आतंकवाद थोपा क्यों था?

3.
ओसामा अमेरिका के खिलाफ
जंग का ऐलान किये बैठा था
उसने उसके युद्धपोत मार गिराये थे
उसकी सत्ता के अहम् प्रतीक होते थे जो
विश्व व्यापार केंद्र की गगनचुम्बी इमारतें
उन्हें एक पल में ध्वस्त कर दिया था उसने
नौ ग्यारह के नाम से
मशहूर हुई तारीख के दिन
ये वही इमारतें थीं
जहां से अमेरिका ने दुनियाभर में
शोषण का जाल फैला रखा था

वे तमाम देश
जो गरीब हैं मेरे देश की तरह
आज इसी शोषण की चपेट में है

अमेरिका ही क्या
हमारे देश के शरीफ लोग भी
भला ऐसा क्यों चाहते हैं कि
भूख पैदा करने वाली ताकत को नहीं
हम सिर्फ ओसामा को मानें आतंकी

4.

अमेरिका कहता है
खूंखार हत्यारा था वह
अपनी आतंकी कार्रवाइयों से उसने
तीन हजार मासूम लोगों की जानें ली थी
उसे छुट्टा कैसे छोड़ा जा सकता था
भले ही उसके गुर्दे खराब हो गए हों
और वह अपनी स्वाभाविक मौत मर भी चुका हो
फिर भी उसे मारना
और मारने की घोषणा करना
एक जरूरी रस्म था
अमेरिका की सेहत के लिए

अमेरिका कहता है
उस सारे नुकसान की भरपाई करनी थी
उसकी मौत की खबर से
जो उसने विश्व व्यापार केंद्र को उड़ाकर
अमेरिका को पहुंचायी थी

अमेरिका कहता है
एक बड़े मकसद से जुड़ा अभियान था यह
यहां बेमतलब का आंकड़ा न रखें
कि तीन हजार से सात गुणा ज्यादा लोगों की हत्या
एंडरसन ने भोपाल में की थी
जहरीली गैस छोड़ कर
जिसे उसने पनाह दे रखी है

अमेरिका कहता है
वह एक चूक थी योजना नहीं
कोई इरादा नहीं था वहां
कोई युद्ध नहीं था वह
जैसा कि ओसामा कर रहा था

दुश्मन वह है
जो हमें शत्रु समझता है
न कि वह है दुश्मन
जो हमारी शरण में आता है

अमेरिका कहता है
भूल जाओ लाखों तमिलों की हत्या को
जो लंका में की गयी मेरी शह पर
और आंच नहीं आने दी मैंने राजपक्षे पर
इस तरह का भी कोई आरोप
हम पर मत लगाओ

अमेरिका कहता है
भूल जाओ विदर्भ में
आत्महत्या कर रहे किसानों की
ढाई लाख की संख्या
जो पार हुआ चाहती है पिछले पंद्रह सालों में
मत कहो कि इसके पीछे
हमारी विकास नीति काम कर रही है
तुम्हारे पास भी यही मॉडल है विकास का
अब यह मत कहना कि
यह जबरन थोपा गया है तुम पर

अमेरिका कहता है
पंद्रह लाख इराकियों को मैंने
गोलियों से जरूर उड़ाया
और ग्वेंतानामो भी है मेरे पास
और भी है बहुत कुछ मेरे पास
असांजे जो कुछ बोलता है उससे भी ज्यादा
काले कानून और कारनामों की इतनी परतें हैं कि
ओसामा भी जानता तो उसके होश
उड़ गए होते

यह याद रखो हमेशा कि
अगुवा हैं हम इस दुनिया के
जहां के तुम एक अदना से बासिंदे हो
अगर तुम हमारे साथ नहीं हो तो
दुश्मन हो हमारे
यह घोषणा पहले ही की जा चुकी है
मत कहना कि चेताया नहीं गया था तुम्हें

कोई विकल्प नहीं है तुम्हारे पास
सिवा हमारा साथ देने के
किसी सरहद के पीछे
छिप नहीं पाओगे फिर तुम
ओसामा की दरिंदगी भरी मौत तुम्हारे सामने है
और डॉलर की ताकत से भी तुम अनजान नहीं हो।



विधि मामलों के टिप्पणीकार और लेखक.कविता को जनता के बीच ले जाने के प्रबल  समर्थक और दिल्ली में शुरू हुई कविता यात्रा के संयोजक. उन्होंने ये कवितायेँ 2 .5 .2011 से 6 .5 .2011   के बीच लिखी हैं.

May 7, 2011

एक बार फिर मारा गया ओसामा बिन लादेन !

बुश और ओबामा के जंगी कार्यकालों ने अमेरिका का दिवाला निकाल दिया है. उसे भारी घाटे और डॉलर की पतली होती हालत का सामना करना पड़ रहा है. और फिर चुनाव भी धीरे-धीरे नजदीक आ रहे हैं...

ओसामा बिन लादेन की हत्या की खबरें अनेक सवालों पर फिर से ध्यान खींचती हैं. इनमें सबसे बड़ा सवाल तोयह है कि क्या किसी भी देश को दूसरे देश में अवैध-अनैतिक-अमानवीय फौजी कार्रवाइयों का अधिकार है. ऐस हमले के पीछे तर्क दिया जा रहा है कि लादेन, कथित तौर पर, उन हमलों के लिए जिम्मेदार था, जिनमें 3 हजार से अधिक लोगों की मौतें हुईं. इन हमलों और हमलावरों की वास्तविकताओं पर किये जानेवाले मजबूत संदेहों को छोड़ भी दें तब भी अगर बेगुनाह लोगों की हत्याओं का जिम्मेदार होना ही ऐसे हमलों के लिए वाजिब कारण है तब तो सारे हत्यारे बुशों और ओबामाओं को सैकड़ों बार गोलियों से मारना पड़ेगा.

यूनियन कार्बाइड के मुखिया और भोपाल गैस जनसंहार में मारे गये बीसियों हजार लोगों और दो दशकों में इसकी पीड़ा अब भी भुगत रहे लाखों लोगों के अपराधी वारेन एंडरसन को किसने पनाह दी है ? उसे कौन बचा रहा है? 2009 से लेकर अब तक श्रीलंका में लाखों तमिल निवासियों के कत्लेआम के दोषी राजपक्षे की मदद किसने की और अब भी उसकी पीठ पर किसका हाथ है? विदर्भ में पिछले 15 वर्षों में 2.5 लाख से अधिक किसानों की (आत्म)हत्याओं के लिए जो (निजीकरण-उदारीकरण-वैश्वीकरण की) नीतियां जिम्मेदार हैं, उन्हें किसने बनाया और उन्हें कौन लागू कर रहा है? इराक में पिछले दो दशकों में प्रतिबंधों और युद्ध में जो 14 लाख 55 हजार से अधिक लोग मारे गये हैं, उनके लिए कौन जिम्मेदार है?

पूरी दुनिया में लगातार युद्ध, प्रतिबंधों और सरकारी नीतियों के जरिए लोगों की जिंदगियों में संस्थागत हिंसा घोल रही साम्राज्यवादी नीतियां आखिर कौन लोग बनाते और थोपते हैं. अमेरिकी साम्राज्यवादी और उसके सहयोगी देश. इनके द्वारा की गयी हत्याएं 11 सितंबर को मारे गए लोगों की संख्या से सैकड़ों गुना अधिक हैं. इन्हें क्यों नहीं सजा मिलती? कब मिलेगी इन्हें सजा? फिर इन्हें क्या अधिकार है दूसरों को आतंकवादी कहने और मारने का?



इन सब सवालों के जवाब दुनिया की जनता खोज भी रही है और दे भी रही है. साम्राज्यवाद का ध्वस्त होना लाजिमी है. अपने इन हताशा में उठाये कदमों के जरिए ही वह अपने अंत के करीब भी आ रहा है. उसकी जीत का एक-एक जश्न, उसकी कामयाबी का एक-एक ऐलान उसकी कमजोरी और भावी अंत की ओर भी संकेत कर रहा है. ओसामा बिन लादेन की हत्या की खबर को भी इसी संदर्भ में देखना चाहिए. अमेरिकी अर्थशास्त्री, वाल स्ट्रीट जर्नल और बिजनेस वीक के पूर्व संपादक-स्तंभकार, अमेरिका की ट्रेजरी फॉर इकोनॉमिक पॉलिसी के सहायक सचिव पॉल क्रेग रॉबर्ट्स बता रहे हैं कि कैसे हत्या की इस खबर का सीधा संबंध विदेशी मुद्रा और व्यापार बाजार में डॉलर की पतली होती हालत और अमेरिकी अर्थव्यवस्था की डांवाडोल होती जा रही स्थिति से है. इन्फॉर्मेशन क्लियरिंग हाउस  की पोस्ट को आप खुद देखें ...रियाजुल हक़
अगर आज 2 मई के बजाय 1 अप्रैल होता तो हम ओसामा बिन लादेन के पाकिस्तान में मारे जाने और तत्काल समुद्र में बहा दिये जाने को अप्रैल फूल के दिन के मजाक के रूप में खारिज कर सकते थे. लेकिन इस घटना के निहितार्थों को समझते हुए हमे इसे इस बात के सबूत के रूप में लेना चाहिए कि अमेरिकी सरकार को अमेरिकियों की लापरवाही पर बेहद भरोसा है.

जरा सोचिए. एक आदमी जो कथित रूप से गुरदे की बीमारी से पीड़ित हो और जिसे साथ में डायबिटीज और लो ब्लड प्रेशर भी हो, और उसे डायलिसिस की जरूरत हो, उसकी एक दशक तक खुफिया पहाड़ी इलाकों में छुपे रह सकने की कितनी गुंजाईश है? अगर बिन लादेन अपने लिए जरूरी डायलिसिस के उपकरण और डाक्टरी देख-रेख जुटा लेने में कामयाब भी हो गया था तो क्या इन उपकरणों को जुटाने की कोशिशें इस बात का भंडाफोड़ नहीं कर देतीं कि वह वहां छुपा हुआ है? फिर उसे खोजने में दस साल कैसे लग गए?

बिन लादेन की मौत का जश्न मना रहे अमेरिकी मीडिया के दूसरे दावों के बारे में भी सोचें. उनका दावा है कि बिन लादेन ने अपने दसियों लाख रुपए खर्च करके सूडान, फिलीपीन्स, अफगानिस्तान में आतंकवादी प्रशिक्षण शिविर खड़े किए, ‘पवित्र लड़ाकुओं’ को उत्तरी अफ्रीका, चेचेन्या, ताजिकिस्तान और बोस्निया में कट्टरपंथी मुसलिम बलों के खिलाफ लड़ने और क्रांति भड़काने के लिए भेजा. इतने सारे कारनामे करने के लिए यह रकम तो ऊंट के मुंह में जीरे की तरह है (शायद अमेरिका को उसे पेंटागन का प्रभार सौंप देना चाहिए था), लेकिन असली सवाल है कि बिन लादेन अपनी रकम भेजने में सक्षम कैसे हुआ? कौन-सी बैंकिंग व्यवस्था उनकी मदद कर रही थी? अमेरिकी सरकार तो व्यक्तियों और पूरे के पूरे देशों की संपत्तियां जब्त करती रही है. लीबिया इसका सबसे हालिया उदाहरण है. तब बिन लादेन की संपत्ति क्यों जब्त नहीं की गयी? तो क्या वह 100 मिलियन डॉलर की अपनी रकम सोने के सिक्कों के रूप में लेकर चलता था और अपने अभियानों को पूरा करने के लिए दूतों के जरिए रकम भेजता था?

मुझे इस सुबह की सुर्खियों में एक नाटक की गंध आ रही है. यह गंध जीत के जश्न में डूबी अतिशयोक्तियों से भरी खबरों में से रिस रही है, जिनमें जश्न करते लोग झंडे लहरा रहे हैं और ‘अमेरिका-अमेरिका’ का मंत्र पढ़ रहे हैं. क्या ऐसी कोई घटना सचमुच हो रही है?

इसमें कोई संदेह नहीं है कि ओबामा को जीत की बेतहाशा जरूरत है. उन्होंने अफगानिस्तान में युद्ध को फिर से शुरू करके मूर्खतापूर्ण गलती की और अब एक दशक लंबी लड़ाई के बाद अमेरिका अगर हार नहीं रहा तो अपने आप को गतिरोध में फंसा हुआ जरूर पा रहा है. बुश और ओबामा के जंगी कार्यकालों ने अमेरिका का दिवाला निकाल दिया है. उसे भारी घाटे और डॉलर की पतली होती हालत का सामना करना पड़ रहा है. और फिर चुनाव भी धीरे-धीरे नजदीक आ रहे हैं.

पिछली अनेक सरकारों द्वारा ‘व्यापक संहार के हथियारों’ जैसे तरह-तरह के झूठों और हथकंडों का नतीजा अमेरिका और दुनिया के लिए बहुत भयानक रहा है. लेकिन सभी हथकंडे एक तरह के नहीं थे. याद रखें, अफगानिस्तान पर हमले की अकेली वजह बतायी गयी थी- बिन लादेन को पकड़ना. अब ओबामा ने ऐलान किया है कि बिन लादेन अमेरिकी विशेष बलों द्वारा एक आजाद देश में की गयी एक कार्रवाई में मारा गया है और उसे समुद्र में दफना दिया गया है, तो अब युद्ध को जारी रखने की कोई वजह नहीं रह गयी है.

शायद दुनिया के विदेश विनिमय बाजार में अमेरिकी डॉलर में भारी गिरावट ने कुछ वास्तविक बजट कटौतियों के लिए मजबूर किया है. यह सिर्फ तभी मुमकिन है जब अंतहीन युद्धों को रोका जाए. ऐसे में जानकारों की राय में बहुत पहले मर चुके ओसामा बिन लादेन को डॉलर के पूरी तरह धूल में लोट जाने से पहले एक उपयोगी हौवे के रूप में अमेरिकी फौजी और सुरक्षा गठजोड़ के मुनाफे के लिए इस्तेमाल किया गया.
(हाशिया ब्लॉग से साभार)



 

गाँव में थाना ना बनाओ !

देश के बाकि हिस्सों में जहाँ सुरक्षा के लिए पुलिस की कमी की  बात होती है, वहीँ एक ऐसा गाँव भी है जहाँ लोग थाना स्थापित होने से अपनी जमीन और इज्जत खोने की आशंका जता रहे हैं...

हिमांशु कुमार

मैं  कुछ दिनों पहले आदिवासी ग्रामीण महिलाओं से मिला था.  उन्होंने मुझे बताया कि  वह छत्तीसगढ़ के जशपुर जिले के एक आदिवासी गाँव से हैं . वे मुझे बता रही थीं  कि उनके गाँव में सरकार बिना गाँववालों से चर्चा किये जबरन एक पुलिस थाना खोल रही है. वे कह रही थीं कि हम आदिवासी लोग गाँव के झगड़े  गाँव में ही सुलझा लेते हैं. यही आदिवासियों की परम्परागत सामाजिक न्याय पद्धति है.

वे महिलाएं डरी हुई थीं कि पुलिस गाँव में रहेगी और उनके  परिवारों के मर्द पर्व-त्यौहार में पीकर आपस में लडाई-झगड़ा  कर लेंगे तो तुरंत पुलिस उन्हें पकड़कर ले जायेगी और उनको छोड़ने के लिए उनके परिवार से पैसा मांगेगी. इन महिलाओं को ये भी डर था कि ये पुलिस वाले गाँव की महिलाओं की इज्ज़त पर हमला करेंगे और इसका विरोध करने वाले गाँव के नौजवानों को नक्सली कहकर जेलों में डाल देंगे.

महिलाएं बता रहीं थी कि गाँव वालों ने छत्तीसगढ़ सरकार के ग्राम स्वराज्य अभियान के दौरान उनके गाँव में आये  सरकारी दल को ग्रामसभा की इन आपत्तियों के बारे में बताया और एक लिखित प्रार्थनापत्र भी मुख्यमंत्री के नाम पर इन सरकारी अफसरों को सौंपा था. वे महिलाएं मुझसे सीजी नेट स्वर का फोन नंबर पूछ रही थीं. बाद में मैंने उनका सन्देश सीजी नेट स्वर पर सुना भी था.

लेकिन इसका परिणाम क्या हुआ? आज शाम को मेरे पास उन्हीं महिलाओं का फोन आया कि गाँव में पुलिस आयी हुई है और थाना खुलने का विरोध करने वालों के नाम-पते पूछ रही है.वे इस मामले में मुझसे मदद चाहती थीं.  तभी से बैचैन हूँ, क्योंकि  मैं जानता हूँ  कि इनकी कोई मदद नहीं कर पाऊंगा. मुझे पता है कि अपने संवैधानिक अधिकार की मांग करने की जुर्रत करने की सज़ा के तौर पर इस गाँव के कुछ लोगों को फर्जी केस बनाकर जेल में डाल दिया जायेगा . बाकी गाँव वाले डर कर विरोध करना बन्द कर देंगे  और वहां एक नया थाना गाँव की छाती पर खुल जाएगा.

लेकिन सवाल है कि  सरकार ये सब कर क्यों रही है? असल में उस इलाके में बड़े पैमाने पर सरकार आदिवासियों से ज़मीन छीनकर जिंदल साहब (जिंदल स्टील ग्रुप) को देना चाहती है, ताकि वो वहां अपना कारखाना लगा लें. आदिवासी इस ज़मीन की लूट का विरोध कर रहे हैं. इस विरोध को कुचलने के लिए सरकार उस इलाके में ज्यादा से ज्यादा पुलिस भेज रही है . तो मेरा आप सबसे सवाल है कि  क्या हम इन आदिवासियों को बचा सकते हैं?
 
 
 
दंतेवाडा स्थित वनवासी चेतना आश्रम के प्रमुख और सामाजिक कार्यकर्त्ता हिमांशु कुमार का संघर्ष बदलाव और सुधार की गुंजाइश चाहने वालों के लिए एक मिसाल है.