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May 11, 2011

संविधान निर्माण ही प्राथमिक


समाजवादी प्रतिस्पर्धा  क्रांति के अंदर दूसरी क्रांति है-विचारधारा के स्तर पर बहुत बड़ी क्रांति है,मार्क्सवाद-लेनिनवाद-माओवाद का एक महत्वपूर्ण विकास है। इसको हम ऐसा मजबूत वैचारिक आधार मानते हैं जिसके कारण हमारी पार्टी भ्रष्टाचार और अधःपतन का शिकार नहीं हो पाएगी...

आनंद स्वरूप वर्मा

अंजनी कुमार की टिप्पणी ‘संसदीय दलदल में धंसती नेपाली क्रांति’की अधिकांश बातों से मेरी सहमति है और जिस खतरे की ओर उन्होंने इशारा किया है उन खतरों को समझते हुए ही मैंने अपनी पहली टिप्पणी की थी। उसमें जब मैंने कामरेड प्रचंड के लिए ‘क्रांतिकारी लफ्फाजी’ शब्द का इस्तेमाल किया था तो इसलिए नहीं कि वे विद्रोह की बात कर रहे हैं और मैं विद्रोह की अवधारणा से असहमत हूं,मेरी आपत्ति यह थी कि कामरेड किरण के विपरीत वे कोई स्टैंड नहीं ले रहे हैं- सार्वजनिक तौर पर शांति प्रक्रिया को पूरा करने और संविधान बनाने के काम को प्राथमिकता देने की बात कहते हैं और कार्यकर्ताओं की आंतरिक बैठकों में (जो सार्वजनिक होती रहीहैं)विद्रोह की बात करते हैं। उन्हें अपना स्टैंड स्पष्ट करना चाहिए- मेरा यही कहना था। कामरेड किरण का स्टैंड स्पष्ट है, जिसे मैंने मौजूदा स्थिति में ‘यूटोपिया’ कहा और जिसके लिए लोगों ने मेरी आलोचना की।

अपनी टिप्पणी में मैं वही लिखूंगा जो मैं सोचता हूं। मैं अभी भी मानता हूं कि पार्टी को संविधान निर्माण पर ही जोर देना चाहिए। संविधान निर्माण कोई क्रांतिकारी कार्यक्रम नहीं है यह जानते हुए भी मैं इस पर जोर देने की बात इसलिए कह रहा हूं कि 2006 में जो व्यापक शांति समझौता हुआ था उसमें यह प्रमुख कार्यों में से एक था। अब इसे पूरा करने में वही पार्टियां बाधा डाल रही हैं जिन्होंने शांति समझौते पर हस्ताक्षर किये थे इसलिए उनको ‘एक्सपोज’ करने के लिए जरूरी है कि पार्टी संविधान निर्माण पर जोर दे। जाहिर है कि उनके एक्सपोज किये जाने से जो वातावरण बनेगा वह विद्रोह के लिए जबर्दस्त जमीन तैयार करेगा। कामरेड किरण मानते हैं कि संविधान बनाने की कवायद से दूर होकर हम केवल विद्रोह की तैयारी करें। मैं अभी भी इससे सहमत नहीं हूं।

अंजनी कुमार की टिप्पणी के छठे पैराग्राफ में जो बातें लिखी गयी हैं उन पर मुझे कुछ कहना है। अंजनी जी, आपको ऐसा कैसे लगा कि मैंने ''1990 में स्वीकृत ‘संवैधानिक लोकतंत्र की प्रणाली’ को माओवादियों के ‘बहुदलीय प्रणाली’ तथा ‘प्रतियोगिता’ की अवधारणा से उलझा’ दिया है।'' मेरी पुस्तक के पृष्ठ तीन से आपने जो अंश उद्घृत किया है उसी में अगले पृष्ठ पर प्रचंड के हवाले से लिखा है 'हमने प्रस्तावित किया है कि जनतांत्रिक विधिक प्रणाली के अंतर्गत और सामंतवाद तथा साम्राज्यवाद विरोधी राजनीतिक शक्तियों के बीच प्रतिस्पर्द्धा को संस्थागत रूप दिया जाय। हमारी राय में इस तरह की बहुदलीय प्रतिस्पर्द्धा संसदीय प्रणाली के मुकाबले हजार गुना ज्यादा जनतांत्रिक  होगी।’ यह पुस्तक मार्च 2005 में प्रकाशित हुई थी और उन लोगों का जवाब थी जो माओवादियों को तानाशाह और एकदलीय प्रणाली के पोषक होने का आरोप लगाते थे।

फिर जुलाई 2006 में मैंने कामरेड प्रचंड का इंटरव्यू लिया जो विभिन्न पत्रिकाओं में प्रकाशित हुआ और उसमें भी एक सवाल के जवाब में इसी मुद्दे पर उन्होंने कहा कि  ''...हमने ‘21वीं शताब्दी में समाजवाद का विकास’ शीर्षक से एक प्रस्ताव पारित किया। उस प्रस्ताव को हम अपने विचारों के विकास की दिशा में महत्वपूर्ण मील का पत्थर मानते हैं। उसमें हमने विचार किया है कि सर्वहारा अधिनायकत्व के अंदर भी और जनता के जनवादी अधिनायकत्व के अंदर भी एक संवैधानिक ढांचे के अंतर्गत बहुदलीय स्पर्धा को संगठित किया जाना चाहिए। अगर यह स्पर्धा नहीं रहेगी तो समूचा समाज ज्यादा से ज्यादा यांत्रिक होता जाएगा, आधिभौतिक होता जाएगा। समाज का एक वस्तुपरक नियम है। जनता को हम अधिक समय तक जबरन दबाव डालकर किसी एक दिशा में नहीं ले जा सकते। इसकी परिणति एक शक्तिशाली विद्रोह में होती है। रूस में ऐसा ही हुआ। चीन में भी ऐसा ही हुआ। अगर हम उस से सबक लिए बिना उसी को दुहराते हैं तो इसका अर्थ यह हुआ कि मार्क्सवाद को हम विज्ञान के रूप में नहीं बल्कि एक जड़सूत्र (डॉग्मा) के रूप में लेते हैं। हम कठमुल्लावादी नहीं हैं। सच्चा मार्क्सवादी कभी भी कठमुल्लावादी नहीं हो सकता... चीन में क्रांति के बाद माओ के समय में आठ पार्टियों का अस्तित्व तो था जो सामंतवाद और साम्राज्यवाद का समर्थन नहीं करती थीं लेकिन माओ ने उन्हें बने रहने की जो अनुमति दी थी उसका मकसद कम्युनिस्ट पार्टी के साथ सहयोग करना था। हमने इस सहयोग को स्पर्द्धा का रूप दिया है। हमारा मानना है कि एक जीवंत समाज बनाये रखने के लिए, समाज में निरंतर जीवन का संचार होते रहने के लिए सर्वहारा पार्टी को भी स्पर्धा संगठित करने के काम को हाथ में लेना चाहिए। इसका यह मतलब नहीं कि हम पूंजीवादी जनतंत्र (बुर्जुआ डेमोक्रेसी) की दिशा में जा रहे हैं। नहीं, हमने उस दस्तावेज में साफ तौर पर लिखा है कि यह सर्वहारा अधिनायकत्व के अंतर्गत स्पर्द्धा संगठित करने की बात है। लोग इस भ्रम में पड़ सकते हैं कि यह भी संसदीय या बुर्जुआ जनतंत्र की दिशा में बढ़ना है पर ऐसा कतई नहीं है। हम सर्वहारा के नेतृत्व में स्पर्द्धा संगठित करने की बात कह रहे हैं। वे लोग तो बुर्जुआ के नेतृत्व में स्पर्द्धा संगठित करते हैं, इसलिए दोनों अलग-अलग बातें हैं। लेनिन ने अक्टूबर क्रांति के तुरंत बाद कहा था कि समाजवादी स्पर्द्धा को संगठित करो। उन्होंने आर्थिक नीति की बात की थी और विचारधारा के क्षेत्रमें भी समाजवादी स्पर्द्धा को संगठित करने की बात की थी। हमारा मानना है कि अगर लेनिन पांच साल और जिंदा रहते तो निश्चित तौर पर वह राजनीतिक स्पर्द्धा संगठित करने की दिशा की ओर और आगे जाते...हमें लगता है कि यह क्रांति के अंदर दूसरी क्रांति है-विचारधारा के स्तर पर बहुत बड़ी क्रांति है, मार्क्सवाद-लेनिनवाद-माओवाद का एक महत्वपूर्ण विकास है। इसको हम ऐसा मजबूत वैचारिक आधार मानते हैं जिसके कारण हमारी पार्टी भ्रष्टाचार और अधःपतन का शिकार नहीं हो पाएगी। आलोचना करने वाले को हम आगे रखेंगे। अपनी कमजोरी दिखाने वाले को आगे रखेंगे तो हम पतन से बचेंगे। अगर हम गलती करेंगे तो जनता की, सर्वहारा की दूसरी पार्टी हमें खत्म करने के लिए आ जाएगी...''

लगभग 1500 शब्दों के लेख में यह उम्मीद करना बेमानी है कि मैं पार्टी की दुरावस्था का विस्तार से विश्लेषण करूंगा। मेरे लेख का शीर्षक ‘क्या माओवादी क्रांति की उल्टी गिनती शुरू हो गयी है?’अपने आप में सारी बातें कह देता है कि पार्टी अधःपतन की ओर बढ़ रही है। अब इसके लिए कौन जिम्मेदार है यह विस्तृत विश्लेषण का विषय है। आप और नीलकंठ केसी या अन्य बहुत सारे लोग कुछ भी कहें, मैं अभी भी एनेकपा (माओवादी) को क्रांतिकारी पार्टी मानता हूं और इसके शीर्ष नेतृत्व यानी का. प्रचंड, का. किरण और का. बाबूराम को क्रांतिकारी मानता हूं। इनके बीच विचारों का टकराव जारी है लेकिन इस टकराव से ही कोई रास्ता भी निकलेगा। इसलिए मैं अभी भी नेपाली क्रांति के प्रति आशावान हूं। उपरोक्त लेख के माध्यम से मैंने महज अपनी चिंता जाहिर की थी, इसे खारिज नहीं किया था जैसा करने में आप सभी लोग जुट गये हैं।

एक बात और कहनी है। मैं यह मानकर चलता हूं कि इन टिप्पणियों को जो लोग पढ़ रहे हैं और इस पर जो अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त कर रहे हैं वे कम्युनिस्ट विचारों के हैं। इसीलिए पेरिस कम्यून के प्रसंग पर जब आपने यह सवाल उछाला कि ‘क्या पेरिस कम्यून इतिहास का नकारात्मक पक्ष है?’ तो मुझे हैरानी हुई। आपको पेरिस कम्यून का मेरे द्वारा उल्लेख किया जाना बहुत ‘नायाब’ लगा। आपकी जानकारी के लिए मैं यह बता दूं कि पेरिस कम्यून के उल्लेख का अर्थ यह हुआ कि कोई क्रांति संपन्न तो हुई, लेकिन उसे टिका पाना संभव नहीं हुआ। अगर इस रूप में आप इसे देख सकते तो ‘पेरिस कम्यून’ के मेरे उल्लेख को ‘दुर्भाग्यपूर्ण’ नहीं मानते।

आपकी यह  चिंता स्वाभाविक है कि नेपाल की क्रांति संसदवाद के दलदल में फंस कर खत्म न हो जाय। आपकी इस चिंता को मैं भी उतनी ही शिद्दत से महसूस करता हूं।




जनपक्षधर पत्रकारिता के महत्वपूर्ण स्तंभ और मासिक पत्रिका 'समकालीन तीसरी दुनिया' के संपादक.

नेपाल के राजनीतिक हालात और नेपाली माओवादी पार्टी की भूमिका को लेकर आयोजित इस बहस में अबतक आपने पढ़ा -



Apr 28, 2011

क्रांतिकारी लफ्फाजी या अवसरवादी राजनीति


आनंद स्वरूप वर्मा अपने पूर्ववर्ती  लेखों में उन नीतियों के समर्थक रहे हैं और पार्टी के कुशल नेतृत्व के प्रशंसक   भी। आज जब वे  इसे किरण का ‘यूटोपिया’ घोषित  कर रहे हैं तो यह बात संदर्भ से कटती हुई दिख रही है...

अंजनी कुमार

समकालीन तीसरी दुनिया के अप्रैल 2011 के अंक में इस पत्रिका के संपादक आनंद स्वरूप वर्मा का लेख ‘क्या माओवादी क्रांति  की उल्टी गिनती शुरू हो गयी है?'नेपाल के हालात के मद्देनजर काफी महत्वपूर्ण है। यह लेख ऐसे समय में आया है जब नेपाल की एकीकृत कम्युनिस्ट पार्टी -माओवादी के केन्द्रीय कमेटी की मैराथन बैठकें  चल रही है। इसमें पार्टी की कार्यदिशा तय होनी है।

नेपाल की राजनीति में एक अजब संकट की स्थिति बनने की प्रक्रिया चल रही है। 28 मई 2011 को संविधान सभा का कार्यकाल समाप्त हो जाएगा। नेपाल की राजनीति की गाड़ी 28  मई को किस हालात में खड़ी होगी,यह चिंता सभी को सता रही है। जिस तरह की राजनीति पिछले तीन वर्षों में वहां उभरकर आई है उससे तो यही लगता है कि रास्ता निकल ही आएगा। रास्ता कैसा होगा,यह जरूर चिंता का विषय है।

राजशाही के अंत के बाद बार-बार आए संकट के बीच से रास्ता निकाल ले जाने में एसीपीएन-माओवादी का नेतृत्व खासकर कामरेड प्रचंड और बाबूराम भट्टाराई खासा पारंगत हो चुके हैं। साथ ही भारत और दूतावास रास्ता निकाल ले आने के लिए काफी सक्रिय  हैं। भारतीय राजनयिक के बयान को मानें तो ‘संकट के हल की उम्मीद है।' प्रचंड की मानें तो ‘संविधान हफ्ते भर में बन जाएगा।' आनंद स्वरूप वर्मा का लेख इन हालातों से निपटने के लिए उचित कार्यदिशा तथा कार्यनीति अपनाने की सलाह के रूप में आया है। साथ ही यह गलत पक्ष लेने वालों की आलोचना कर हालात के अनुरूप चलने का आह्वान भी है।

उनकी चिंता है कि यदि एसीपीएन-माओवादी के बीच कलह बना रहेगा तो हालात का फायदा दूसरी ताकतें उठाएंगी। उनकी दृष्टि  में बाबूराम भट्टाराई के नेतृत्व वाली योजना यानी जनयुद्ध से हासिल उपलब्धियों को ठोस बनाते हुए संविधान निर्माण को आगे बढ़ाने का कार्यक्रम ही बेहतर रास्ता है। हालांकि वे बाबूराम के नेतृत्व की महत्वाकांक्षा और प्रचंड की क्रांतिकारी  लफ्फाजी’ से चिंतित हैं। वह साहस कर यह कहने का हौसला भी बढ़ाते हैं कि ‘किरण जी, आप एक यूटोपिया में जी रहे हैं और यथार्थ से बहुत दूर हैं।'

आनंद स्वरूप वर्मा की चिंता और हालात को जनता के पक्ष में मोड़ देने की अपील उनकी पक्षधरता को ही दिखाता है। नेपाली शांति  के पक्ष में उनकी भूमिका से भारत और नेपाल के कम से कम राजनीतिक समूह अच्छी तरह परिचित हैं, लेकिन यह लेख जितनी चिंता से लिखा गया है उतना ही चिंतित भी करता है। प्रचंड और बाबूराम के बीच की दो लाइनों के संघर्ष  की चर्चा जनयुद्ध के शुरूआती दिनों से रही है। यह संकट कठिन रास्तों से गुजरा और हिसला यामी के शब्दों में जनता के पक्ष में हमने ‘पार्टी एकता को बनाए रखने’ के पक्ष में निर्णय लिया। इन दो लाइनों के संघर्ष की मूल बात पार्टी के अंदरूनी दस्तावेजों में बंद रही, लेकिन सात पार्टियों के बीच एकता समझौता और शांतिवार्ता के साथ यह चर्चा आम रही है कि मूलतः बाबूराम की लाइन ही लागू हो रही  है।

उस समय मुख्य मसला   संसदीय पार्टियों के चरित्र और सेना के एकीकरण का था, जिससे लोग बहस व निष्कर्ष निकाल रहे थे। यह मसला एसीपीएन-माओवादी पार्टी के कार्यकर्ताओं के बीच भी बना। इसे हल करने और स्पष्ट कार्यक्रम घोषित करने के उद्देश्य  से अगस्त 2007  में पार्टी का बालाजू प्लेनम हुआ। इसमें एकीकृत दस्तावेज पारित हुआ। इसके बाद और दो पार्टी प्लेनम और दो केंद्रीय कमेटी सम्मेलन संपन्न हुए। बाबूराम भट्टाराई ने लगभग महीनेभर चली  पार्टी की छठवें विस्तारित ऊपरी कमेटी सदस्यों की पालुमतार बैठक  में ही पहली बार अपने कार्यक्रम का दस्तावेज पेश  किया। इस बैठक  में किरण, प्रचंड और बाबूराम तीनों ने ही अपने-अपने दस्तावेज पेश  किये थे।

इसके पहले के खारी पार्टी प्लेनम में किरण और प्रचंड ने दो अलग-अलग दस्तावेज पेश  किए थे। वर्ष 2009 की केन्द्रीय कमेटी बैठक  में किरण के दस्तावेज को मान्यता दी गई और जनविद्रोह की लाइन को स्वीकृत किया गया। वर्ष 2007से लेकर दिसंबर 2010  के बीच हुए प्लेनम व विस्तारित बैठकों  में जनविद्रोह की लाइन ही आम स्वीकृत थी। संविधान निर्माण विद्रोह का विकल्प नहीं था और सेना का एकीकरण भी शांति  का विकल्प नहीं था।

कह सकते हैं कि पार्टी में दिसंबर 2010 तक संविधान  निर्माण,सेना का एकीकरण और जनविद्रोह नेपाल की शांति कार्यक्रम के अभिन्न अंग के रूप में स्वीकृत थे। पार्टी बैठकों  और कार्यकर्ता सम्मेलनों में प्रचंड इसी लाइन को बोलते थे, लेकिन बाहर के घेरे में उनकी भाषा और विचार एकदम भिन्न होते थे। जिसके बारे में यह कहकर छूट दी जाती थी कि ‘राजनय’में एक भिन्न भाषा  और व्यवहार की मांग होती है। बाबूराम का व्यवहार और भाषा  प्रचंड से भी बढ़कर थी। किरण ‘राजनय’ से बाहर थे और पार्टी के एकमत व एकीकृत दस्तावेज के अनुरूप ही बोलते थे।

आनंद स्वरूप वर्मा गोरखा....पालुंतार  प्लेनम दिसंबर 2010में पार्टी के भीतर उभरकर आए तीन ‘गुट’ और तीन धारा के संघर्ष  से एक निष्कर्ष की ओर बढ़ते हैं और किरण की ‘यूटोपिया’ की आलोचना करते हुए लिखते हैं, ‘किरण जी को न जाने कैसे अभी भी ऐसा महसूस होता है कि इतने सारे विचलनों के बावजूद पार्टी कार्यकर्ता और आम जनता उनके आह्वान पर विद्रोह के लिए उठ खड़ी होगी।' यदि हम पार्टी में बहस व निर्णय लेने के लिए पार्टी प्लेनम व केंद्रीय समिति की बैठकों की शुरूआत 2006 या 2007 से करें तो पूरी पार्टी इसी ‘यूटोपिया’ में थी। उनके बीच मुख्य मुद्दा मात्र ‘एकता’ बनाए रखने की घोषणा  भर नहीं था, बल्कि यह ‘यूटोपिया’ पूरी पार्टी की समझदारी थी।

इस  समझदारी के तहत ही जनमिलिशिया  और लड़ाकू दस्तों को जनसंगठनों का हिस्सा बनाया गया। यही नहीं जनमुद्दों के रोजमर्रा के संघर्षों और साथ ही विकास के लिए संगठित प्रयास को आगे बढ़ाने के निर्णयों के साथ पार्टी ने खुला काम करने का निर्णय भी  लिया। वर्ष 2005में सैन्य कार्रवाई व 2006में जनविद्रोह की कार्रवाई में सत्ता दखल न करने का निर्णय पार्टी का एकमत निर्णय था। उस समय किरण के किसी अलग दस्तावेज का उल्लेख नहीं मिलता है।वर्ष 2005 व 2006 में पार्टी ने सत्ता दखल की तात्कालिक कार्रवाई को छोड़ने के पीछे के कारणों में कभी भी यह नहीं बताया कि सत्ता दखल ‘पेरिस कम्यून’ यानी चंद दिनों बाद हार में बदल जाता। जैसा कि वह किरण को चुनौती देते हुए वह लिखते हैं, ‘किसने रोका था एक और पेरिस कम्यून बनने से?’

इस मुद्दे पर बाबूराम, प्रचंड व किरण कई साक्षात्कारों में अपनी राय व्यक्त कर चुके हैं। तीनों ही या यूं कहे कि पार्टी इस बात से सहमत थी , ‘सत्ता का बल व छल पूरी तरह हमारे पक्ष में है', इसलिए ‘सत्ता दखल राजनीतिक संघर्ष के जनवादी पक्ष को मजबूत करते हुए किया जाय’ क्योंकि ‘ विश्व  परिस्थिति में सैन्य कार्यनीति पर जोर नेपाल को अंतहीन युद्धक्षेत्र में बदल देगा’ आदि आदि। यही वह बिंदु  थे,  जहां लेनिन के नेतृत्व में हुई अक्टूबर क्रांति और चीन की नवजनवादी क्रांति  का संश्लेषण  करने का भी दावा किया गया। इस संक्रमण के दौर में कुछ ऐसी कार्यनीतियां तय हुईं,  जिनका महत्व प्रचंड के शब्दों में ‘रणनीतिक’ था। मसलन, शांतिवार्ता, सीजफायर, संसदीय छल-बल आदि।

वर्मा जी अपने पूर्ववर्ती  लेखों में इन नीतियों के समर्थक रहे हैं और पार्टी के कुशल नेतृत्व के प्रशंसक  भी। आज जब वे  इसे किरण का ‘यूटोपिया’ घोषित  कर रहे हैं तो यह बात संदर्भ से कटती हुई दिख रही है। एसीपीएन-माओवादी पार्टी में तीन धाराएं नवंबर-दिसंबर 2010  में ही अपने-अपने दस्तावेजों के साथ खुलकर सामने आई हैं। ये तीन धाराएं इतनी जल्दी कैसे गुट में बदल गईं, इस पर चिंतन करना चाहिए। बाबूराम उपरोक्त बैठक  में अपना दस्तावेज प्रस्तुत करते हैं और उतनी ही जल्दी सारतत्व में प्रचंड का दिल जीत लेते हैं, यह भी सोचनीय विषय है।

इससे भी सोचनीय विषय वर्मा जी का इस शर्त पर समर्थन है कि ‘मान्यवर, आपको भी पता है कि आज विद्रोह की परिस्थितियां नहीं हैं और पार्टी को  हर हाल में शांति प्रक्रिया को आगे बढ़ाने का प्रयास करना चाहिए।' मैं आपकी  इस बात से यह निष्कर्ष  नहीं निकाल रहा हूं कि आप घुटना टेकने की बात कह रहे हैं, आप हालात को समझने और राजनीति को सही दिशा  देकर जनता के पक्ष में बने रहने की ही बात कह रहे हैं। आप यह समर्थन देने की अपील इस कारण करते हैं कि पार्टी व उसके जनसंगठनों की सदस्यता में कमी आई है, उसमें हो रही गुटबंदियों से संरचनाएं कमजोर हुई हैं। आप लिखते हैं ‘ऐसे में जब आप विद्रोह की बात करते हैं तो क्या यह महज एक लोक-लुभावन नारा, पापुलिस्ट स्लोगन नहीं हो जाता?’

लेकिन वर्मा जी आप यह बताना भूल जाते हैं कि नेपाल में आज भी एसीपीएन-माओवादी पार्टी संख्या के आधार पर सबसे बड़ी पार्टी है। जुझारूपन और जनसमर्थन में आज भी वही अगुआ है। संसद में भी वही सबसे बड़ी पार्टी है। पालुंतार-गोरखा सम्मेलन से  आठ महीने पहले अप्रैल-मई 2010में ‘संघर्ष से विद्रोह तक’के नारे को अंजाम देने के लिए पूरे नेपाल में और राजधानी काठमांडू में लाखों लोग सड़क पर उतर आए थे। उस समय पुलिस व सेना के ‘राज्य अनुशासन'  का खुला उल्लंघन शुरू हो गया था। अब  सिर्फ एक साल में हालात क्या सचमुच इतने  बदल गये हैं  है कि किरण जी ‘यूटोपिया में जी रहे हैं और यथार्थ से बहुत दूर हैं।'

पालुन्तार  सम्मेलन का यथार्थ यह है कि बाबूराम संविधान को ही विकल्प, विद्रोह को आत्मघाती मानते हैं। भारतीय विस्तारवाद को नेपाली शांति का मुख्य दुश्मन  नहीं, बल्कि दलाल बुर्जुआ के साथ शांतिपूर्ण राजनीतिक प्रतियोगिता की रणनीति अपनाने की लाइन देते हैं। बाबूराम ने किन्हीं मजबूरियों में नहीं, बल्कि पूरी विचार प्रणाली के तहत अपना प्रस्ताव प्रस्तुत किया है,जिस पर कभी-कभी कथनी और लंबे समय से करनी में प्रचंड इसी रास्ते पर चल रहे हैं,जैसा कि आपने इसे चिन्हित किया है और उन्हें इस एवज में ‘क्रांतिकारी  लफ्फाजी’छोड़ देने के लिए अपील भी की है।

यदि यह लफ्फाजी होती  तो भी इतनी घातक नहीं होती। दरअसल यह अवसरवाद है,जिसका परिणाम पार्टी में वैचारिक ऊहापोह, विभ्रम, भटकाव के रूप में सामने  आता है और परिणति आमतौर पर दक्षिणपंथी भटकाव में दिखती  है। यह सामान्य सा सूत्रीकरण माओ का है जिसे प्रचंड पर लागू कर उन्हें और उसके पार्टी पर पड़े प्रभावों में देखा जा सकता है। आप प्रचंड को उनके बन रहे पक्ष की ओर जोर लगाकर ठेल रहे हैं। वर्ष 2005 से 2011 के बीच पार्टी की एकीकृत समझदारी, उसके कार्यक्रम, कार्यनीति व रणनीति को किरण के खाते में डालकर उसे ‘यूटोपिया’में बदल दे रहे हैं। जबकि वह एसीपीएन-माओवादी पार्टी के नेपाल के नवजनवादी क्रांति  का मसौदा है और इसी के तहत उसने वहां की राजशाही को खत्म किया। नेपाल की जनता को दुनिया की अग्रणी कतार में ले आया और दक्षिण एशिया  में शांति  के एजेंडे को सर्वोपरि बना दिया।

नेपाल की शांति  संकट में है। पार्टी के भीतर गलत प्रवृत्तियों का जोर काफी बढ़ा है। नेतृत्व में आपसी मतभेद बढ़ा है। पार्टी और जनसंगठनों की सदस्यता में कमी व गुटबंदियां बढ़ी हैं। इसे ठीक करने की प्रक्रिया  पार्टी के भीतर वैचारिक बहस-विमर्श, गलत और भ्रष्ट  लोगों की छंटाई के माध्यम से ही हो सकता है। यह आम सी लगने वाली बात न तो नेतृत्व स्तर पर लागू की गयी है  और न ही निचले स्तर पर हो पाई है। जो पार्टी माओ त्से तुंग के अनुभवों से आगे जाने की बात करने लगी थी वही आज उसके सांस्कृतिक क्रांति  के न्यूनतम सार संकलनों को भी लागू नहीं कर पा रही है।

इसी तरह सम्मेलनों में दो धारा संघर्ष में अल्पमत में रहने वाले नेतृत्व से लंबे समय तक बहुमत की धारा को लागू कराने के पार्टी उसूल अपनाने के चलते सभी स्तरों पर कन्फ्यूजन, विभ्रम व सांगठनिक गड़बड़ियां पैदा हुई हैं। गुरिल्ला युद्ध, विद्रोह व संघर्ष  को विभिन्न फेज में बांटने, प्रयोग करने की रणनीति के चलते जनमीलिशिया  व गुरिल्ला आर्मी से जुड़े लोगों में अफरातफरी की स्थिति बनी। इसी से जुड़ा हुआ बेस एरिया व क्रांतिकारी  सरकार की संकल्पना के बनने तथा नए फेज में इसे भंग करने के चलते आमजन में अफरातफरी और विभ्रम की स्थिति बनी है। एक फेज से दूसरे फेज में जाने की तैयारी,पार्टी का पुनर्गठन और नए नेतृत्व के आने की पूरी प्रक्रिया में संरचनागत समर्थन का पूरी तरह अभाव दिखता है। जिसके चलते खुली पार्टी होने के साथ ही इससे होने वाले  खामियाजे में पार्टी गले तक डूबी दिख रही है।

आज जरूरत है कि पार्टी खुद को पुनर्गठित करे, संविधान निर्माण में हुई देरी के लिए मुख्य रूप से उन पार्टियों के खिलाफ अभियान चलाये, जो देरी के लिए जिम्मेदार हैं। निरकुंशता या तानाशाही की किसी भी संभावना के खिलाफ संघर्ष की तैयारी करे और पार्टी के बहुमत को बहुमत का नेतृत्व ही पार्टी कार्यक्रम के साथ आगे बढ़ाए। संशोधनवाद व अवसरवाद के खिलाफ निर्णायक संघर्ष चलाकर पार्टी को शांति के  अगुवा की भूमिका में ले आए।







स्वतंत्र पत्रकार व राजनीतिक- सामाजिक कार्यकर्ता. फिलहाल मजदूर आन्दोलन पर कुछ जरुरी लेखन में व्यस्त.