Apr 2, 2011

हत्या, बलात्कार और आगजनी की सरकारी पहल


जनज्वार. आदिवासियों की तबाही के सरकारी अभियान ‘सलवा जुडूम’ को फिर से एक बार नये क्षेत्र में आजमाने का मामला उजागर हुआ है। छत्तीसगढ़ के दंतेवाड़ा जिले के चिंतलनार क्षेत्र में 11 से 16 मार्च के बीच हत्या-बलात्कार, लूट- आगजनी का नेतृत्व अबकी कांग्रेसी नेता महेंद्र कर्मा ने नहीं, बल्कि दंतेवाड़ा के एसपी, एसआरपी कल्लूरी ने किया है।

दंतेवाड़ा के चिंतलनार में माओवादियों और सुरक्षा बलों के बीच हुई मुठभेड़ में 36  माओवादियों को मार देने की झूठी खबर से गदगद हो रही छत्तीसगढ़ की सरकार की पोल खुल गयी है। 25 और 26 मार्च को प्रभावित गांवों का दौरा कर लौटी 13 सदस्यीय फैक्ट फाइंडिंग टीम ने दिल्ली में 1 अप्रैल को प्रेस वार्ता कर खुलासा किया कि सरकारी अत्याचार के इस अभियान में  सिर्फ एक माओवादी भीमा उर्फ सुदर्शन  मारा गया है।

इस घटना को सीआरपीएफ और माओवादियों के बीच मुठभेड़ के रूप में प्रचारित किया गया था. पुलिस के मुताबिक इस मुठभेड़ में तीन एसपीओ और 36 माओवादी मारे गए थे. पुलिस ने मीडिया में इस घटना को माओवादियों के    वर्चस्व  वाले इलाके चिंतलनार में अपना प्रभुत्व स्थापित करने के रूप में पेश कर जश्न मनाया था. गौरतलब है कि यह वही इलाका है जहाँ पिछलेवर्ष ६ अप्रैल को माओवादियों ने 76 जवानों  को मार दिया था.

इस नए अभियान की 21 मार्च को जानकारी होने के बाद जब पत्रकारों और तथ्यान्वेषी दलों ने प्रभावित इलाकों में जाने की कोशिश की तो उन्हें हर तरीके से रोका गया. 25मार्च को करीब 300 घरों को जला दिए जाने के बाद तबाह हुए लोगों के लिए राहत सामग्री ले जा रहे सामाजिक कार्यकर्ता स्वामी अग्निवेश पर जानलेवा हमला किया गया. वहीं इस बहाने भी इलाके के अंदर जाने से रोका गया कि यह इलाका युद्धक्षेत्र है और राज्य तथा माओवादियों के बीच तथाकथित युद्ध अभी भी जारी है, ऐसे में किसी बाहरी व्यक्ति का इलाके के अंदर जाना खतरनाक हो सकता है.

बहरहाल तेरह सदस्यीय  तथ्यान्वेषी दल दूसरे रास्ते वहां पहुँचने में सफल रहा. इस दल में नागरिक और लोकतांत्रिक अधिकारों के लिए काम करने वालों के अलावा कई स्वतंत्र लोग भी शामिल थे. यह दल 26और 27  मार्च को इलाके के अंदर तक गया और घटना के पीड़ितों और अन्य ग्रामीणों से घटना के संबंध में विस्तार से बातचीत की.इस दौरान दल के सदस्य यह जानकर अवाक रह गए कि राज्य की ओर से प्रचारित किया गया पुलिस का बयान पूरी तरह से मनगढ़ंत और सच्चाई से कोसों दूर था.

दल में शामिल मानवाधिकार संगठन पीयूडीआर के सदस्य और पत्रकार आशीष गुप्ता ने कहा कि मार्च 11 को अर्धसैनिक बलों और सलवा जुडूम के करीब तीन सौ लोगों के एक समूह ने चिंतलनार इलाके के मोरपल्ली गांव पर हमला कर दिया. उनका कहना था कि उन्हें सूचना मिली है कि यहां आदिवासी एक बड़ी बैठक करने जा रहे हैं.

जाँच दल की मुख्य मांगे :
  • सीआरपीएफ और सलवा जुडूम के खिलाफ बलात्कार, हत्या, दमन और अपहरण का मामला दर्ज किया जाए.
  • इसके दोषियों को सख्त से सख्त सजा दी जाए.
  • घायलों को तत्काल चिकित्सा सहायता उपलब्ध कराई जाए और बलात्कार पीड़ितों का मेडिकल कराया जाए.
  • लोगों को उनके नुकसान के मुताबिक मुआवजा दिया जाए. प्रभावित इलाकों में और पत्रकारों व नागरिक अधिकारों के लिए संघर्ष करने वाले संगठनों को जाने की इजाजत दी जाए.
  • सुप्रीम कोर्ट के निर्देशानुसार सलवा जुडूम पर तत्काल प्रभाव से प्रतिबंध लगाया जाए और ‘कोया कमांडो’ के नाम पर सलवा जुडूम की गतिविधियों पर रोक लगाई जाए.
  • ऑपरेशन ग्रीनहंट को तत्काल प्रभाव से रोका जाए.

मोरपल्ली गांव में इन लोगों ने 33घरों को जला दिया और सुनीता और अनीता नाम की दो महिलाओं के साथ बलात्कार किया (बदला हुआ नाम). लाक्के और उनके पिता मारावी भीमा को बेरहमी से पीटा और मारवी सुला नामक एक वृद्ध आदिवासी को मार डाला. मोरुपल्ली गांव को बरबाद करने के बाद ये लोग 13 मार्च को तिम्मापुरम गांव की ओर बढ़ गए. अगले दिन रास्ते में माओवादियों ने उन्हें रोकने का प्रयास किया. यह सशस्त्र संघर्ष करीब दो घंटे तक चला. इसमें भीमा उर्फ सुदर्शन की मौत हो गई और दो अन्य लोग घायल हो गए.

जेएनयू  विश्विद्यालय  की छात्र बानोज्योत्सना लाहड़ी आगे बताती हैं कि इस संघर्ष में तीन एसपीओ की भी मौत हुई और नौ अन्य घायल हो गए,जिनमें से एक की बाद में मौत हो गई.मुठभेड़ के बाद सीआरपीएफ और सलवा जुडूम के एसपीओ पीछे हटने पर मजबूर हुए. उन्होंने तिम्मापुरम गांव लौटकर वहां शरण ली.

माओवादियों के संभावित हमले से बचने के लिए इन लोगों ने गांव में बंकर बनाए. गाँव छोड़ने से पहले इन लोगों ने 55 घरों में आग लगा दी. तिम्मापुरम गांव लौटते समय सुरक्षा बलों ने पुलामपड गाँव से बुर्सी भीमा को उठा लिया था. तिम्मापुरम गांव में आग लगाने के बाद इन लोगों ने भीमा को कुल्हाड़ी से काटकर मार डाला. उन्होंने शायद ऐसा इसलिए किया था क्योंकि वह इस पूरे नरसंहार का चश्मदीद गवाह था. तिम्मापुरम गाँव से यह दल ताड़मेटला गांव पहुंचा,  जो उनका नया लक्ष्य बन गया.

जांच दल की रिपोर्ट के मुताबिक ताड़मेटला गाँव में इन लोगों ने 207 घरों में आग लगाई. इससे वे राख में बदल गए. उन लोगों ने रीता (बदला हुआ नाम) से बलात्कार किया और उसे तबतक पीटा जबतक वह बेहोश नहीं हो गई.उसे जब होश आया तो पता चला कि उसके कुछ नगद रुपए और करीब 12हजार रुपए मूल्य के आभूषण गायब हैं.

ताड़मेटला गांव की बलात्कार पीड़ित आदिवासी महिला   
ताड़मेटला गाँव में 20-25अन्य लोगों को भी बेरहमी से पीटा गया था, इनमें 12 साल का एक बच्चा भी शामिल था. सुरक्षा बलों ने इस गाँव से मारावी अंडा और मारावी आइता को उठा लिया, जिनका अब तक कोई पता नहीं चला है. किसी पुलिस थाने में उनकी गिरफ्तारी भी नहीं दिखाई गई है.

 इस वारदात का नेतृत्व करने वाले सलवा जुडूम के कई सदस्यों की तिम्मापुरम गांव के लोगों ने पहचान की है. इसमें मंतम भीमा उर्फ रमेश (जानागुडा गांव निवासी),तेलम अंडा (लीकपुर गांव नवासी), वांजन पेवा (चारपान गांव निवासी), दासरु (विल्लामपल्ली गांव निवासी), मारा (मोनीपल्ली गांव निवासी),रामलाल (बोदीकली गांव निवासी), केचा नंदा (कोरापद गांव निवासी), करताम दुला उर्फ सूर्या (मिसमान गांव निवासी)और तिम्मापुरम गांव का एक एसपीओ और एक महिला एसपीओ शामिल थी.इससे यह साफ है कि यहाँ सलवा जुडूम सक्रिय और पहले की ही तरह काम कर रहा है. सरकार उन्हें ‘कोया कमांडो’ बताती है, जो कि पूरी तरह फर्जी है.
सलवा जुडूम पर सुप्रीम कोर्ट की ओर से पूरी तरह प्रतिबंध लगा देने के निर्देश के बाद भी यह सक्रिय रूप से काम कर रहा है और उसे सरकार को पूरा सहयोग और समर्थन हासिल है.यह पूरी तरह से निहत्थे और निर्दोष आदिवासियों पर सुरक्षा बलों और सलवा जुडूम की ओर से किया गया एकतरफा हमला था.लेकिन मीडिया में इसे माओवादियों के साथ चल रही मुठभेड़ के रूप में प्रचारित किया गया.

वारदात के बाद माओवादियों का पर्चा
जाँच दल की रिपोर्ट में कहा गया कि ताड़मेटला गांव की बलात्कार पीड़ित रीता (बदला हुआ नाम) की ओर से अभी तक किसी के भी खिलाफ कोई मामला दर्ज नहीं कराया गया है और न ही चिकित्सा परीक्षण कराया गया है.ताड़मेटला गांव के मारावी अंडा और मारावी आइता अभी भी गायब है और उनका कोई पता नहीं चला है, ग्रामीणों का दावा है कि उन्हें सुरक्षा बल उठा ले गए, लेकिन अभी तक उन्हें कहीं पेश नहीं किया गया है.यह तांडव पूरी तरह सरकार के सहयोग और सक्रिय समर्थन से मचाया गया.

मोरपल्ली और तिम्मापुरम गांव के निवासी अभी भी बहुत बुरे हालात में रह रहे हैं. इन गांवों के लोगों को अभी तक सरकार की ओर से कोई सहायता नहीं मिली है.उन्होंने बताया कि माओवादियों की ओर से उन्हें कुछ अंतरिम राहत मिली है. इनमें से बहुत से लोग अभी भी पेड़ों के नीचे रह रहे हैं.

इलाके से लौटे तथ्यान्वेषी दल की राय में ग्रामीणों पर केवल इसलिए हमला किया जा रहा है कि इन लोगों ने तालाबों की खुदाई, भूमिहीनों में जमीन बांटने, सिंचाई की सुविधाओं का विकास करने जैसे वैकल्पिक विकास के काम किए हैं जिसे सरकार पिछले कई दशकों में कर पाने में नाकाम रही है. आदिवासियों को उनके जीवन की बुनियादी सुविधाओं और आजीविका के साधनों से बेदखल किया जा रहा है और अब उन्हें सुरक्षा बलों और सलवा जुडूम के अत्याचार का सामना करना पड़ रहा है.

तथ्यान्वेषी दल के सदस्य में सीएच चंद्रशेखर, वी चित्ति बाबू, आर राजानंदम, वी रघुनाथ, जी रवि, के विप्लव कुमार,के श्रीसा,आर मुरुगेसन,आशीष गुप्त, यू संभाशिवराव ,बानोज्योत्सना लाहड़ी और चंद्रिका शामिल थे.

सभी फोटो- चन्द्रिका

Apr 1, 2011

जैतापुर में जमीन दखल की राजनीति


जैतापुर परमाणु ऊर्जा संयत्र को लेकर कोंकण क्षेत्र में राजनीति तेज हो गई है। परमाणु ऊर्जा संयंत्र के पक्षकार इसे विकास से जोड़कर देख रहें हैं तो  स्थानीय लोग इसे  विनाश की कहानी की  अंतहीन शुरुआत मान रहे हैं...


आशीष कुमार 'अंशु'

अभी अधिक दिन नहीं हुए जब जैतापुर में रैली कर रहे कांग्रेस के बड़े-बड़े नेताओं के बीच एक कांग्रेसी कार्यकर्ता  मंच पर पहुँच गया और जैतापुर परियोजना के खिलाफ बोलने लगा। इस स्थिति को देख मंचासीन नेता और आयोजक सन्न थे, वहीं कार्यक्रम में शामिल हुई आम जनता की तरफ से उस कार्यकर्ता के लिए जिन्दाबाद, जिन्दाबाद के नारे लगने लगे. मंच पर चढ़े उस   कांग्रेसी कार्यकर्ता को किसी पुराने मामले में  आरोपित कर  जेल में डाल दिया गया है।

एनपीसीआईएल (न्यूक्लियर पावर कॉरपोरेशन ऑफ इंडिया लिमिटेड) और फ्रांस की कंपनी अरेवा के बीच हुए समझौते से भारत के प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह और फ्रांसिसी  राष्ट्रपति निकोलस सरकोजी के चेहरे पर जो खुशी आई, भारत के नागरिकों और भारतीय अर्थव्यवस्था जैतापुर के लोगों को उसकी कीमत चुकाने के लिए मजबूर किया जा है। डॉ. सिंह इस समय फ्रेंच न्यूक्लियर उद्योग को उबारने वाले तारणहार की भूमिका में हैं।

जैतापुर में प्रस्तावित 9900मेगावाट परमाणु ऊर्जा संयंत्र के लिए कुल 938हेक्टेयर जमीन ली जानी है,जिसमें 669 हेक्टेयर जमीन माड़वन की है। मुख्यमंत्री पृथ्वीराज च्वहाण कहते हैं कि स्थानीय लोग जमीन देने के लिए राजी हैं। लेकिन  जब वे मुम्बई में  इस मुद्दे पर बातचीत के लिए माड़वन के लोगों को बुलाते हैं तो गांव वाले जाने से साफ इंकार कर देते हैं।

अब इसका क्या अर्थ निकाल जाए? गांव वालों का पक्ष साफ है कि बातचीत तो उस समय की जाए जब हमें भी अपनी बात कहने का मौका मिले और उम्मीद हो कि हमने अपनी बात से मुख्यमंत्री को विश्वास में ले लिया तो परियोजना रुक जाएगी। ऐसी जगह बात करने का क्या फायदा, जिसमें माड़वन में परमाणु ऊर्जा संयत्र लगाने  का फैसला पहले से सुरक्षित है।

जैतापुर परमाणु ऊर्जा संयत्र  को लेकर कोंकण क्षेत्र में राजनीति तेज हो गई है। परमाणु ऊर्जा संयंत्र के पक्षकार जहां इसे विकास से जोड़कर देख रहें हैं। वहीं इस परियोजना के खिलाफ खड़े लोगों का स्पष्ट मानना है कि यह परियोजना कोंकण के विनाश की कहानी का पहला अध्याय होगी।

पर्यावरणविद और सामाजिक कार्यकर्ता विवेके भिड़े से जब बातचीत हुई तो उनका कहना था कि ‘कोंकण की जमीन पर्यावरण के लिहाज से अति संवेदनशील है। यहां दो सौ पचहत्तर किलोमीटर के क्षेत्रफल में जिस तरह 17 परियोजनाओं पर एक साथ काम हो रहा है, इससे यह बात साफ हो गई है कि कोंकण पर किसी की बुरी नजर लग गई। बेशक,माड़वन हम सभी के लिए गंभीर मुद्दा है।’भिडे़ आगे कहते हैं, 'प्रत्यक्ष तौर पर प्रभावित होने वालों की संख्या भले ही दस हजार के आसपास नजर आ रही हो, लेकिन इससे वास्तव में प्रभावित होने वालों की संख्या लाखों में होगी।' 

जैतापुर परमाणु ऊर्जा संयत्र  के काम को छह हिस्सों में फ्रांसिसी कंपनी अरेवा के हाथों पूरा होना है। योजना के अनुसार पहले चरण में प्रस्तावित छह ईकाइयों में 1650-1650 मेगावाट वाली दो इकाइयों का काम पूरा होगा। यह दोनों ईकाइयां रत्नागिरी जिले के माड़वन में होंगी। योजना के अनुसार इस परियोजना के पहले चरण को 2013-14 तक पूरा होना है और बची चार ईकाइयों का काम भी 2018 तक पूरा कर लिया जाना है।

वर्तमान में हमारे  कुल बिजली उत्पादन में परमाणु ऊर्जा की भागीदारी 2.90प्रतिशत की है। देश में इसे 2020 तक बढ़ाकर छह प्रतिशत तक ले जाने की योजना है और 2030 तक इसे तेरह प्रतिशत की भागीदारी में बदल दिया जाएगा। इसके लिए माड़वन (जैतापुर)  की तरह कई परियोजनाओं की देश को जरुरत होगी। बहरहाल बात माड़वन (जैतापुर) की करते हैं जिसमें पांच गांवों माड़वन, मीठागवाने, करेल, वारिलवाडा और नीवेली की 938 हेक्टेयर जमीन जानी है।

 इन पांच गांवों में से चर्चा में माड़वन (जैतापुर) गांव का नाम ही बार-बार आ रहा है। इसकी पहली वजह यह है कि छह ईकाइयों में पूरे हो रहे इस परियोजना की पहली दो ईकाइयों का काम माड़वन में ही पूरा होना है। दूसरी वजह जनहित सेवा समिति के प्रवीण परशुराम गवाणकर बताते हैं,‘परियोजना में जाने वाली कुल 938 हेक्टेयर जमीन में से 669 हेक्टेयर जमीन माड़वन की है।

यह वही   माड़वन है जो रत्नागिरी जिले में स्वतंत्रता सेनानियों के गांव के रूप रुप में जाना जाता है। इस गांव में आधे दर्जन से अधिक स्वतंत्रता सेनानियों के परिवार रहते हैं। अंग्रेजों से लड़ने वालों के परिवारों को अब अपनी सरकार से लड़ना पड़ रहा है। वैसे उनके लिए अपनी सरकार अंग्रेज से भी अधिक क्रूर साबित हो रही है, क्योंकि अंग्रेजों ने इन्हें अपने घर से तो बेदखल नहीं किया था।

परमाणु ऊर्जा  के लिए चुनी गई यह जमीन पर्यावरण के लिहाज  से अति संवेदनशील है। समुद्र  का किनारा, 150 किस्म के पक्षी, 300 किस्म की वनस्पतियां। खास बात यह है कि इनमें कई वनस्पतियों और पक्षियों की किस्म दुर्लभ है। समुद्र के इस मनोरम तटीय  क्षेत्र में एक दर्जन से अधिक परमाणु ऊर्जा संबंधित प्रकल्प प्रस्तावित हैं। जबकि रत्नागिरी को राज्य सरकार ने ओद्यानिकी (हॉर्टिकल्चर)जिला घोषित किया है और इसका पड़ोसी जिला सिंधदुर्ग गोवा से भी लगा हुआ होने के कारण पर्यटकों की खास पसंद रहा है।

बड़ी संख्या में गोवा देखने के लिए आने वाले पर्यटक सिंधदुर्ग का रुख करते हैं। पर्यावरणविद इस बात से अचंभित हैं कि जिस रत्नागिरी को दुनियाभर मे जैव विविधता के हॉट स्पॉट के तौर पर देखा जाता है,उस जिले के लिए परमाणु ऊर्जा संबंधित परियोजना के करार पर उस साल हस्ताक्षर होता है,जब पूरी दुनिया ‘अंतरराष्ट्रीय जैव विविधता वर्ष’ का उत्सव मना रही है।

साखरी नाटे मछुआरों की बस्ती है। वहां मिले मच्छीमार कृति समिति के उपाध्यक्ष, अमजद बोरकर। वे और उनके साथी समुद्र  को लेकर अपने रागात्मक रिश्तों की बात करते-करते भावुक हो गए। बकौल बोरकर ‘समुद्र  के साथ हमारा रिश्ता पीढ़ियों का है। हमारे पूर्वजों के समय से यह समुद्र  हमें रोटी दे रहा है। सरकार परमाणु ऊर्जा प्रकल्प को कोंकण और महाराष्ट्र का विकास कहकर प्रचारित कर रही है, लेकिन यह विकास का नहीं कोंकण की बर्बादी का समझौता है।’ बोरकर के अनुसार महाराष्ट्र की सरकार प्रकल्प के नाम पर गंदी राजनीति कर रही है।

टाटा इन्स्टीट्यूट ऑफ सोशल साईंस (टिस) की एक रिपोर्ट के अनुसार परमाणु ऊर्जा प्रकल्प के लिए सरकार ने जो स्थान तय किया है वह बिल्कुल उपयुक्त नहीं है। टिस की यह रिपोर्ट महेश कांबले ने इस इलाके के 120 गांवों में जाकर लोगों से मिलकर तैयार की है।

कांबले के अनुसार इस परियोजना का स्थानीय और पर्यावरणीय परिवेश पर बहुत बुरा प्रभाव पड़ेगा। रिपोर्ट यह भी कहती है कि सरकार तथ्य को तोड़-मरोड़ रही है और माड़वन के उपजाऊ जमीन को बंजर बनाकर कर पेश कर रही है। जैतापुर के जिस 626.52 हेक्टेयर जमीन अनुपजाऊ  दिखाया जा रहा है वहां के किसान उस जमीन पर धान, फल, सब्जी लगा रहे हैं।

वर्ष 2007में बाढ़ में सरकार ने राजापुर के किसानों को आम की फसल खराब होने पर एक करोड़ सैंतीस लाख सात हजार रुपए का मुआवजा दिया था। अर्थक्वेक हजार्ड जोनिंग ऑफ इंडिया के अनुसार जैतापुर जोन तीन में आता है। जो भूकम्प के लिहाज से रिस्क जोन माना जाएगा। ऐसे इलाके में परमाणु से जुड़े किसी प्रकल्प को शुरु करना कम खतरे की बात नहीं है।

स्थानीय लोगों के लिए रेडिएशन का मामला भी एक बड़ा मुद्दा है। परमाणु ऊर्जा प्रकल्प के आसपास जो लोग होंगे, उनके स्वास्थ पर इसका दुष्प्रभाव एक बड़ी चिन्ता बना हुआ है। गांववाले पूछते हैं,यदि यह प्रकल्प इतना सुरक्षित है तो यहां काम करने वाले अधिकारियों के लिए आवास की व्यवस्था प्रकल्प से पांच-सात किलोमीटर दूर क्यों प्रस्तावित है? उनके रहने के लिए आवास परमाणु ऊर्जा प्रकल्प के परिसर में क्यों नहीं किया जा रहा?

माड़वन (जैतापुर)के लोग कहते हैं,यदि फ्रांसिसी कंपनी अरेवा उनके गांव आ रही तो यहां वह कोई समाजसेवा करने तो नहीं आ रही है। वह एक निजी कंपनी है, जो यहां कमाई के इरादे से आएगी और कोंकण की जमीन पर पहली बार वह अपने ईपीआर (यूरोपियन प्रेसराइज्ड रिएक्टर)तकनीक की जांच भी कर पाएगी। जिसे पहले कहीं जांचा-परखा नहीं गया है। क्या अरेवा भारत को परमाणु ऊर्जा प्रकल्प के नाम पर अपनी प्रयोगशाला के तौर पर इस्तेमाल करना चाहती है?





Mar 30, 2011

मुस्लिम देशों में तानाशाही के बीच साम्राज्यवादी दखल


अमेरिका की पहचान दुनिया में एक साम्राज्यवादी देश के रूप में स्थापित हो चुकी है, मगर सवाल तो यह है कि  युद्ध छिडऩे या किसी संघर्षपूर्ण स्थिति के उत्पन्न होने से पहले  मुस्लिम देश के तानाशाहों को इस्लाम व दुनिया के मुसलमानों की याद क्यों नहीं आती...

तनवीर जाफरी

कल तक अपनी सैन्य शक्ति तथा समर्थकों के बल पर मज़बूत स्थिति में दिखाई देने वाले गद्दाफी अब किसी भी क्षण सत्ता से बेदखल किए जा सकते हैं। पश्चिमी देशों द्वारा अमेरिका के नेतृत्व में लीबिया के तानाशाह कर्नल मोअमार गद्दाफी को सत्ता से बेदखल किए जाने की स्क्रिप्ट लिखी जा चुकी है। नाटो भी लीबिया में लागू उड़ान निषिध क्षेत्र की कमान संभालने को तैयार हो गया है। गठबंधन सेनाओं द्वारा लीबिया की वायुसेना तथा थलसेना की कमर तोड़ी जा चुकी है।

गद्दाफी के एक पुत्र के मारे जाने का समाचार है। स्वयं गद्दाफी के भविष्य को लेकर अटकलें लगाई जा रही हैं। गद्दाफी के ही कथन को माना जाए तो वे स्वयं लीबिया में ही शहीद होने को प्राथमिकता देंगे। अब देखना यह होगा कि सत्ता के अंतिम क्षणों में गद्दाफी का अंत किस प्रकार होता है? क्या वे लीबिया छोड़कर अन्यत्र पनाह लेने के इच्छुक होंगे? यदि हां तो क्या नाटो सेनाएं तथा विद्रोही उन्हें वर्तमान स्थिति में देश छोड़कर जाने की अनुमति देंगे? या फिर वे भी अपने पुत्र की तरह विदेशी सेनाओं का निशाना बन जाएंगे? या उनका हश्र सद्दाम हुसैन जैसा होगा? या फिर वे आत्महत्या करने जैसा अंतिम रास्ता अख्तियार   करेंगे?

बहरहाल, कल तक जिस कर्नल गद्दाफी की लीबिया की सत्ता से बिदाई आसान प्रतीत नहीं हो रही थी, आज वही तानाशाह न केवल अपनी सत्ता के लिए बल्कि अपनी व अपने परिवार की जान व माल की सुरक्षा के विषय में भी अनिश्चित नज़र आ रहा है । इन परिस्थितियों में गद्दाफी ने भी एक बार फिर उसी 'धर्मास्त्र' का प्रयोग किया है, जिसका प्रयोग ओसामा बिन लादेन,  मुल्ला उमर तथा  एमन-अल जवाहिरी जैसे आतंकी से लेकर सद्दाम हुसैन तक  करते रहे हैं.


ऐसे में सवाल यह उठता है कि  युद्ध छिड़ने या किसी संघर्षपूर्ण स्थिति के उत्पन्न होने से पहले  आखिर  इन तानाशाहों को इस्लाम और दुनिया के मुसलमानों की याद क्यों नहीं आती? इसमें कोई दोराय नहीं कि अमेरिका की पहचान दुनिया में एक साम्राज्यवादी देश के रूप में स्थापित हो चुकी है। अमेरिका दुनिया में अपना वर्चस्व कायम रखने की लड़ाई लड़ रहा है। दुनिया में चौधराहट बनाए रखना अमेरिकी विदेश नीति का एक प्रमुख हिस्सा है। विश्व का सबसे बड़ा तेल उपभोक्ता होने के नाते निश्चित रूप से उसे तेल की भी सबसे अधिक ज़रूरत है। यही वजह है कि तेल उत्पादन करने वाले देशों में अमेरिकी दखलअंदाज़ी को प्राय: इसी नज़रिए से देखा भी जाता है।

दुनिया समझती है कि यह लड़ाई किसी तानाशाह को सत्ता से बेदखल करने या विद्रोही जनता का समर्थन करने की नहीं, बल्कि अमुक देश की तेल संपदा पर अमेरिकी नियंत्रण करने की है। परंतु दुनिया के लाख शोर-शराबा करने या वावैला करने के बावजूद अमेरिकी नीतियों में न तो कोई परिवर्तन आता है, न ही अमेरिका की ओर से इन आरोपों के जवाब में कोई ठोस खंडन किया जाता है। गोया अमेरिका ऐसे आरोपों की अनसुनी कर अपनी नीतियों पर आगे बढ़ते रहने में ही भलाई समझता है। ऐसे में उन चंद मुस्लिम नेताओं की इस्लाम पर 'अमेरिकी खतरे' जैसी ललकार स्वयं ही निरर्थक साबित हो जाती है।

ताज़ा उदाहरण लीबिया का ही देखा जाए तो यहां भी उड़ान निषिध क्षेत्र बनाने की हिमायत अरब लीग के सदस्य देशों द्वारा सर्वसम्मति से की गई। विदेशी सेनाओं द्वारा लीबिया पर बमबारी किए जाने का मार्ग अरब लीग के देशों ने ही प्रशस्त किया। और अब संयुक्त अरब अमीरात जैसा अरब देश गठबंधन सेनाओं के साथ मिलकर लीबिया पर बम बरसा रहा है। ऐसे में इस्लाम और ईसाईयत  की बात क्या बेमानी नहीं हो जाती? और इन सबके अलावा सबसे बड़ी बात यह है कि गद्दाफी व सद्दाम हुसैन जैसे तानाशाह उस समय इस्लामपरस्ती को कतई भूल जाते हैं, जब यह लोग सत्ता के नशे में चूर होकर अपने-अपने देशों में मनमानी करने की सभी हदों को पार कर जाते हैं।

जब ये तानाशाह अपनी बेगुनाह और निहत्थे अवाम पर ज़ुल्म ढा रहे होते हैं, उस वक्त उन्हें यह नहीं सूझता कि हम जिन पर ज़ुल्म ढा रहे हैं, वे भी मुसलमान हैं तथा हमारे यह कारनामे इस्लाम विरोधी हैं। यह क्रूर तानाशाह उस समय तो इस्लामी इतिहास के राक्षस प्रवृति के सबसे बदनाम शासक यज़ीद की नुमाईंदगी करते नज़र आते हैं। परंतु जब इन्हें मौत के रूप में अमेरिका, संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद्, संयुक्त राष्ट्र संघ तथा नाटो जैसे संगठनों के फैसलों का सामना करना होता है तब इन्हें इस्लाम याद आता है। मुस्लिम इत्तेहाद भी, जेहाद भी और  संघर्ष भी।

प्रश्र यह है कि मुस्लिम राष्ट्रों को इन परिस्थितियों से उबरने के लिए आखिर  क्या करना चाहिए? सर्वप्रथम तो तमाम मुस्लिम राष्ट्रों में इस समय मची खलबली का ही पूरी पारदर्शिता तथा वास्तविकता के साथ अध्ययन कर अवाम द्वारा विद्रोह के रूप में लिखी जा रही इबारत को पूरी ईमानदारी से पढऩे की कोशिश की जानी चाहिए। अफगानिस्तान, इराक और लीबिया जैसे देश मुल्ला उमर, सद्दाम और गद्दाफी जैसे सिरफिरे शासकों की गलत व विध्वंसकारी नीतियों के चलते बरबाद हुए हैं। इस वास्तविकता को सभी देशों विशेषकर मुस्लिम जगत को समझना चाहिए। गोया किसी देश में विदेशी सेनाओं अथवा पश्चिमी सेनाओं के नाजायज़ हस्तक्षेप का कारण वहां की अवाम नहीं, बल्कि वहां का सिरफिरा शासक ही देखा गया है।

अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा ने संघर्ष की अफवाहों पर पूर्ण विराम लगाने की गरज़ से ही शर्म-अल-शेख में मुस्लिम राष्ट्रों के प्रमुखों को अस्लाम-अलैकुम कहा था तथा मुस्लिम देशों को साथ लेकर चलने का आह्वान किया था। परंतु तब से लेकर अब तक मुस्लिम राष्ट्रों में सुधारवाद की कोई बयार चलती तो हरगिज़ नहीं दिखाई दी। हां विद्रोह, क्रांति तथा बगा़वत के बिगुल कई देशों में बजते ज़रूर दिखाई दे रहे हैं।

कारण कि सत्ताधीश मुस्लिम तानाशाह कहीं ज़ालिम हैं तो कहीं निष्क्रिय। कहीं अकर्मण्यता का प्रतीक हैं तो किसी के राज में भुखमरी, बेरोज़गारी और गरीबी ने अपने पांव पसार लिए हैं। कोई अपने व्यक्तिगत धन या संपत्ति के संग्रह में जुटा है तो किसी को अपनी खाऩदानी विरासत के रूप में अपनी सत्ता को सुरक्षित रखने या हस्तांतरित करने की फिक्र है। कोई शासक जनता की आवाज़ को चुप कराने के लिए ज़ुल्म व अत्याचार के किसी भी उपाय को अपनाने से नहीं कतराता तो कई ऐसे हैं जिन्हें अपने देश के विकास, प्रगति या अर्थव्यवस्था में कोई दिलचस्पी नहीं।

ऐसे में जनविद्रोह का उठना भी स्वाभाविक है तथा विदेशी सेनाओं द्वारा उस जनविद्रोह का लाभ उठाना भी स्वाभाविक है।




लेखक हरियाणा साहित्य अकादमी के भूतपूर्व सदस्य और राष्ट्रीय-अंतर्राष्ट्रीय मसलों के प्रखर टिप्पणीकार हैं.उनसे tanveerjafari1@gmail.कॉम पर संपर्क किया जा सकता है.





 

ठगों का स्वर्ग बनता इंटरनेट


शादी का प्रस्ताव  देते हुए एक महिला लिखती है,'मेरा करोड़ों डॉलर बैंक में है,मैं यह धनराशि आपके खाते में स्थानान्तरित करना चाहती हूं। अत:आप मुझे अपना नाम,पता,खाता व अपने बैंक का स्विफ्ट  कोड भेजिए...

निर्मल रानी

ठगों द्वारा अत्याधुनिक वैज्ञानिक तकनीक  इंटरनेट का सहारा लिया जा रहा है. ठगी का शिकार भी उन्हीं को बनाया जा रहा है जो कंप्यूटर और इंटरनेट का प्रयोग करते हैं। अपने शिकार को ठगने के लिए वे मात्र प्रलोभन को ही अपने धंधे का मुख्य  आधार बनाते हैं। जाहिर है कि  लालच का शिकार होना या किसी प्रलोभन में आना केवल गरीबों का ही काम नहीं,किसी पैसे वाले व्यक्ति को शायद धन की कुछ ज्य़ादा ही आवश्यकता होती है। इसी सूत्र पर अमल करते हुए अंतर्राष्ट्रीय स्तर के ठगों का  यह विशाल नेटवर्क लगभग पूरी दुनिया में छा चुका है।


दान लीजिये : ठगी के अनेक रूप

पहले  यह  काला  धंधा  मुख्य रूप से दक्षिण  अफ़्रीकी  देशों से संचालित हो  रहा था,परंतु अब इन्होंने  दुनिया के लगभग सभी देशों में अपने जाल फैला दिए हैं। यह इंटरनेट ठग गूगल अथवा याहू या किन्ही  अन्य सर्च साइट्स के माध्यम से या फिर किसी अन्य तरीके  से विश्व के तमाम लोगों के ई-मेल पते इकट्ठा करते हैं।

वे बाकायदा अपने पूरे नाम,टेलीफोन नंबर व पते के साथ-साथ किसी भी ई-मेल पर अपना भारी भरकम परिचय देते हुए प्रलोभन वाले मेल भेजते हैं। उदाहरण के तौर पर आपको  उनका  यह संदेश आ सकता है, 'बधाई हो, आप जैकपॉट का पुरस्कार जीते हैं। यह लॉटरी इन्टरनेट प्रयोग करने वाले ई-मेल खाताधारको के मध्य आयोजित की गई थी। इसमें आपको 14लाख डॉलर  पुरस्कार  निकला है। कृपया इसे ग्रहण करने के लिए अमुक ई-मेल पर संपर्क करें.'

जाहिर है इस मेल को प्राप्त करने वाला व्यक्ति बड़ी खामोशी के साथ एक  कदम आग बढ़ाते हुए ठगों द्वारा भेजे गए उनके ई-मेल पते पर संपर्क साधता है। मात्र 24घंटों के भीतर ही आपको उस ठग का उत्तर भी मिल जाएगा। उसका उत्तर होता है, 'हां मैं बैरिस्टर अमुक हूं तथा आप वास्तव में लॉटरी के विजेता हैं। आपको बधाई।'

उसके बाद वह तथाकथित बैरिस्टर आपसे आपका नाम, पूरा पता, व्यवसाय, टेलीफोन नम्बर, बैंक अकाऊंट नम्बर तथा आपके  बैंक  स्विफट कोड नं आदि जानकारी मांगता है।  इसके बाद यदि आपने उनके द्वारा मांगी गई सभी सूचनाएं उपलब्ध करवा दीं, फिर न तो वे दोबारा आपसे संपर्क साधेंगे, न ही आपके  किसी अगले ई-मेल का जवाब देंगे। यह ठग इलेक्ट्रोनिक उपायों का प्रयोग कर किसी भी प्रकार से आपके खाते से पैसे निकालने का  भरसक  प्रयास करने में जुट जाते हैं। और किसी न किसी शिकार  व्यक्ति के  बैंक  खाते से पैसे निकालने में कामयाब हो जाते हैं।

लॉटरी निकलने की  सूचना देने के अतिरिक्त और भी तरीके से ई-मेल ठगों का यह नेटवर्क पूरी दुनिया में ई-मेल धारकों को भेजता रहता है। जैसे किसी ठग द्वारा यह सूचित किया जाता है कि  अमुक परिवार विमान हादसे में मारा गया है। उस परिवार का क्योंकि कोई वारिस नहीं है तथा यदि आप उसके वारिस बन जाएं तो उसकी  जमा धनराशि यथाशीघ्र आप पा सकते हैं।

कोई महिला शादी का प्रलोभन देते हुए लिखती है,'मेरा करोड़ों डॉलर बैंक में है,मैं यह धनराशि आपके खाते में स्थानान्तरित करना चाहती हूं। अत:आप मुझे अपना नाम,पता,खाता व अपने बैंक का स्विफट कोड आदि भेजिए।' कई ठग तो सीधे तौर पर यही लिख देते हैं,  मैं अमुक बैंक में गुप्त दस्तावेज डील करने वाले विभाग में अधिकारी हूं। मेरे एक जानकार व्यक्ति की  मृत्यु हो गई है। उनका करोड़ों डॉलर मेरे ही बैंक में जमा है। यदि आप इस धनराशि को लेने में रुचि रखते हैं तो अपना और अपने बैंक अकाऊंट का विस्तृत ब्यौरा यथाशीघ्र भेजें ताकि  मैं यह धनराशि आपके  खाते में स्थानान्तरित कर सकूँ.'

तैब्लो : हैकिंग  का उस्ताद   
अपने आपको चीन का बताने वाले एक ठग ने भावनात्मक रूप से ब्लैकमेल करने की  तो हद ही कर दी। उसने स्वयं को कैंसर  का मरीज बताते हुए यह लिखा, वह चीन का एक नामी-गिरामी उद्योगपति है। चूंकि वह अपने जीवन की  अन्तिम सांसें ले रहा है अत: वह चाहता है की  उसकी  नकद धनराशि  का एक बड़ा हिस्सा गरीब व बेसहारा लोगों में बांट दिया जाए। फिर उस तथाकथित उद्योगपति ने इस काम के लिए सहयोग मांगते हुए अपने तथाकथित बैरिस्टर का ई-मेल पता दे दिया। उधर उस तथाकथित बैरिस्टर ने अन्य ठगों की भांति विस्तृत पता तथा बैंक खाते का विस्तार मांगना शुरु कर दिया।

एक अफ़्रीकी ठग ने तो किसी झूठ-सच में पडऩे तथा निरर्थक कहानी सुनाने से बचते हुए अपनी बात कहने का एक अनूठा तरीका अपनाया। उसने ई-मेल द्वारा सीधे यह सूचित किया आपके नाम का फंड जो  बारह करोड़ रुपए है,मेरे बैंक में जमा है। कृपया अपना बैंक अकाऊंट नंबर तथा बैंक स्विफट कोड भेजें ताकि आपकी यह धनराशि आपके खाते में अविलम्ब स्थानान्तरित कर दी जाए।

कुछ ठग तो धार्मिक  व जातिगत भावनाओं को भी जगाने का प्रयास अपने इस ठग व्यवसाय में करते हैं। परन्तु भारतीय संस्कृति की स पूर्ण जानकारी न होने की वजह से उन्हें बारीकी से परखा जा सकता है। उदाहरण के तौर पर यदि आपका नाम संजय चौधरी है तो जाहिर है आपने अपना ई-मेल भी लगभग संजय चौधरी के नाम से या इससे मिलता जुलता ही बनाया होगा। यह अंतर्राष्ट्रीय ठग चौधरी शब्द को तो यह समझ कर चुन लेते हैं कि हो न हो, यह किसी व्यक्ति का सरनेम ही होगा।

ठगानन्द जी आपके ई-मेल पर जो संदेश भेजते हैं उसमें लगभग यह लिखा होता है कि 'कार एक्सीडेंट में अथवा विमान हादसे में अथवा किसी समुद्री जहाज के डूबने में फलां देश का एक परिवार मारा गया। उसका मुखिया राबर्ट चौधरी था। चूंकि आप संजय चौधरी हैं अत:आप राबर्ट चौधरी के भाई के रूप में स्वयं को प्रस्तुत करते हुए उसके खाते में जमा 22 करोड़ डॉलर की नक़द धनराशि प्राप्त कर सकते हैं।'

यहां यह ठग चौधरी शब्द का तो बड़ी आसानी से महज इसलिए प्रयोग कर लेता है क्योंकि वह उसे सरनेम ही समझता है, परन्तु संजय के स्थान पर दूसरे भारतीय शब्द का अभाव होने के चलते उसे राबर्ट नाम का सहारा लेना पड़ता है। इन ठगों द्वारा दिए जाने वाले इन सभी प्रलोभन में जो कहानी तथा अनुबन्ध उल्लिखित किया जाता है उसमें बाकायदा 30 अथवा 40 या 50 प्रतिशत का उनका अपना हिस्सा भी बताया जाता है ताकि कोई भी व्यक्ति अचानक यह न समझ बैठे कि अमुक व्यक्ति को मेरे ही साथ इतनी हमदर्दी आखिर क्योंकर है?

इंटरनेट के माध्यम से तरह-तरह की योजनाएं बताकर ठगी करना, गन्दे व अशलील ई-मेल भेजना, किसी का ई-मेल हैक करना,वायरस भेजना दूसरों को डराना-धमकाना तथा आतंकवाद संबंधी गतिविधियों की सूचनाओं का गैर कानूनी आदान-प्रदान व अवैध रूप से गुप्त दस्तावेजों का हस्तान्तरण करना भी इसी कंप्यूटर माध्यम से हो रहा है।

जहां हमें कंप्यूटर के  तमाम सकारात्मक व लाभप्रद पहलुओं को स्वीकार करना तथा उन्हें अपने प्रयोग में लाना है वहीं इससे होने वाले नुकसान व दुष्परिणामों से भी पूरी तरह चौकस व सचेत रहने की जरूरत है। इंटरनेट के माध्यम से प्राप्त होने वाले किसी भी अंजान व्यक्ति के किसी भी लालचपूर्ण प्रस्ताव को पढऩे में समय गंवाने के बजाए ऐसे मेल को डिलीट कर देना ही ठगी से बचने का सबसे सुरक्षित उपाय है।



लेखिका उपभोक्ता मामलों की विशेषज्ञ हैं और सामाजिक-राजनीतिक विषयों पर भी  लिखती हैं. इनसे nirmalrani@gmail.com  पर संपर्क किया जा सकता है.




Mar 29, 2011

देह दलाली का मेडिकल कॉलेज


प्रोफेसर, वार्डेन, परीक्षा नियंत्रक और सीनियर मिलकर यहाँ मेडिकल छात्राओं को नंबर दिलाने के बदले मोटी कीमत वसूलते हैं और  हमबिस्तरी के लिए मजबूर करते हैं.उच्च शिक्षा का सपना लिए आयीं इन छात्राओं को कैरियर के लिए क्या कुछ नहीं झेलना पड़ता  है...

चैतन्य भट्ट

मध्य प्रदेश। नेताजी सुभाष चंद्र बोस मेडिकल  कालेज में पास कराने के नाम पर चल रहे एक सेक्स रेकैट कांड के पर्दाफाश ने जबलपुर के शिक्षा जगत के माथे पर कलंक का एक ऐसा टीका लगा दिया है जिसको मिटाना अब नामुमकिन सा हो चला है। रैकेट में शामिल लोगों और परतों को उधरते देख ऐसा लग रहा है कि यहां डॉक्टर नहीं देह के दलाल रहते हैं।

बाएं  से गिरफ्तार राजू खान,  राणा और ककोडिया                        फोटो- सनत सिंह
अपनी जूनियर छात्रा को परीक्षा में पास कराने के नाम पर एक दलाल के साथ हम बिस्तर होने के लिये पे्ररित करने वाली उसकी सीनियर छात्रा ही इस रेकैट की मुख्य पात्र थी। हालांकि उसकी अबतक गिरफ्तारी नहीं हो सकी है। वहीं इस सेक्स रेकेट के पर्दाफाश होने के बाद कांड के मुख्य आरोपी राजू खान,रानी दुर्गावती विश्वविद्यालय के परीक्षा नियंत्रक एसएस राणा और सहायक कुलसचिव रवीन्द्र काकोड़िया सलाखों के पीछे पहुंच गये है।

इस मामले में संदिग्ध भूमिका निभाने वाली मेडीकल कालेज की वार्डन नेत्र रोग विभाग अध्यक्ष डा0 मीता श्रीवास्तव और उनके पति एनाटामी विभाग के अध्यक्ष डा० एसएस श्रीवास्तव को निलम्बन का आदेश थमा दिया गया है और मामले में उनकी संलिप्तता को देखते हुये उन्हें भी गिरफतार करने के मामले में पुलिस विचार कर रही है। एजुकेशन हब के रूप में मशहूर जबलपुर में हुई इस घटना की अगर ईमानदारी से खोजबीन की जाये तो कई प्रोफेसर, राजनेताओ, अधिकरियों के चेहरो पर पड़ा नकाब उठते देर नहीं लगेगी।

नेताजी सुभाष चंद्र मेडीकल कालेज के कुछ प्राध्यापकों,रानी दुर्गावती विश्वविद्यालय के कुछ वरिष्ठ अधिकारियों और इनके बीच दलाल के रूप में  काम कर रहे एक पूर्व छात्र नेता की इस कारगुजारी का भंडा अब भी नहीं फूट पाता,यदि एमबीबीएस प्रथम बर्ष की छात्रा संधू आर्य इसके खिलाफ आवाज न उठाती। छात्रावास में रह रही संधू आर्य ने वार्डन डॉ मीता श्रीवास्तव को बताया कि उसकी सीनियर छात्रा प्रेरणा ओटवाल अक्सर उससे झगड़ा करती है और उसके साथ मारपीट भी करती है।

संधू आर्य ने यह भी बताया कि प्रेरणा ओटवाल उससे गंदा काम करने के लिये भी कहती है और धमकी देती है कि यदि उसने उसकी बात नही मानी तो वह परीक्षा में कभी पास नहीं हो पायेगी। छात्रा की इस शिकायत पर डा0 मीता श्रीवास्तव कोई कार्यवाही करतीं, उल्टे उन्होंने संधू को डांटडपट कर चुप करवा दिया। धीरे-धीरे जब संधू आर्य को प्रेरणा अटवाल ने ज्यादा परेशान करना शुरू किया,तब संधू आर्य ने मेडीकल कालेज के डीन डा0केडी बघेल को एक लिखित शिकायत सौंपी जिसमें उसने एक अत्यंन्त सनसनीखेज आरोप लगाया।

संधू आर्य ने अपनी इस शिकायत में कहा कि उसकी सीनियर पे्ररणा ओटवाल उससे किसी राजू खान नामक व्यक्ति के साथ हमबिस्तर होने के लिये दबाव डाल रही हैं। संधू आर्य ने आगे लिखा कि ओटवाल बताती हैं कि अगर मैं राजू खान के साथ हमबिस्तर हुई तो उसे कोई फेल नहीं करा सकता। संधू ने अपनी शिकायत में यह भी कहा कि इसकी शिकायत उसने वार्डन डा0मीता श्रीवास्तव से भी की थी परतु उन्होंने उल्टा उसे ही चुप रहने की हिदायत दे दी.

कार्रवाई की मांग करते अवाभिप के छात्र
 मामला गंभीर होने के कारण कॉलेज प्रशासन ने इसे पूरी तरह गोपनीय बनाकर रखा। लेकिन अचानक मीडिया में लीक हो जाने से जबलपुर के शिक्षा जगत में भूचाल आ गया.एक छात्रा को परीक्षा में पास कराने के लिये अपना शरीर देने के इस आरोप ने मेडीकल के जूनियर डाक्टरों को उद्धेलित कर दिया। इधर अखिल विद्यार्थी परिषद भी इस मामले में कूद गया तो पता लगा कि जिस राजू खान का संधू आर्य ने अपनी शिकायत में उल्लेख किया था,वह रानी दुर्गावती विश्वविद्यालय का पूर्व छात्र नेता रह चुका है और वर्तमान में मेडीकल कालेज और रानी दुर्गावती विश्वविद्यालय में ठेकेदारी करता है।

मामला अब बेहद गरमा गया था। महिला और छात्र संगठनों के दबाव में डीन डॉ बघेल ने एक जांच समीति बना दी जिसमें उन्होंने डा0 मीता श्रीवास्तव को भी शामिल का दिया,जिसका जम कर विरोध हुआ। तब संभागीय आयुक्त प्रभात पाराशर ने एडीशनल कलेक्टर मनीषा सेतिया की अध्यक्षता में एक दूसरी जांच समीति बनाई जिसमें स्त्री रोग विभाग की अध्यक्ष डॉ शशि खरे, कैन्सर विभाग की अध्यक्ष डॉ पुष्पा किरार और अस्पतमाल की अधीक्षिका डॉ सविता वर्मा को शामिल किया गया। जिसका असर हुआ कि राजू खान ने पुलिस के समक्ष आत्मसमर्पण कर दिया, मगर प्रेरणा अटवाल फारार ही रही.

राजू खान की गिरफ्तारी पुलिस के लिये महत्वपूर्ण थी। पुलिस अधीक्षक संतोष सिंह ने राजू खान से पूछताछ की तो पता लगा कि यह पुराना रैकेट है, जिसमें वह कई वर्षों से काम कर रहा था। राजू खान ने बताया कि,‘पहले मेडीकल कालेज की छात्राओं को फेल कर दिया जाता था। फिर प्रेरणा ओटवाल के माध्यम से उन फेल छात्राओं को राजू खान से मिलवाया जाता था और ये लोग उसे पास कराने के नाम पर पचास हजार से लेकर एक लाख रूपये वसूल लेते थे। बाद में पुनर्मूल्यांकन का आवदेन लगा कर उन्हें पास कर दिया जाता था। इसमें कई छात्राओं की अस्मत का सौदा भी किया जाता था। यह सारा कुछ मेडिकल छात्राओं के भविष्य से जुड़ा होता था,इसलिये इसकी कभी कोई शिकायत नहीं होती थी।

दूसरी तरफ एमबीबीएस की कांपियां रानी दुर्गावती विश्वविद्याल के के मार्फत ही जंचने के लिये जाती थी, इसलिये परीक्षा और गोपनीय विभाग का संदेह के घेरे में आना लाजमी था। पुलिस ने राजू खान के बयानों के आधार पर रानी दुर्गावती विश्वविद्यालस के परीक्षा और गोपनीय विभाग में एक साथ छापा मारा और परीक्षा नियंत्रक एसएस राणा और सहायक कुलसचिव रवीन्द्र काकोड़िया को गिरफतार कर लिया। जबलपुर के शिक्षा जगत के इतिहास में यह पहला मौका था जब परीक्षा नियंत्रक और सहायक कुलसचिव स्तर के अधिकरियों को ऐसे मामले में गिरफतार किया गया हो।

इधर बढ़ते दबाव को देखते हुए स्वास्थ मंत्री महेन्द्र हार्डिया ने सेक्स रैकेट में शामिल डॉ मीता श्रीवास्तव और उनके पति डॉ एसएस श्रीवास्तव दोनों को ही निलंबित कर दिया। डॉ एसएस श्रीवास्तव पर आरोप था कि वे छात्राओं की रात में कक्षाएं  लगाया करते थे, जिसमें कुछ छात्राओं को सारी सुविधायें मुहैया करवाते थे और कुछ छात्राओं को कोई मदद नहीं दी जाती थी। बहरहाल इस मामले की कई और परतें अभी खुलनी बाकी हैं।



राज एक्सप्रेस और पीपुल्स समाचार में संपादक रह चुके चैतन्य भट्ट फिलहाल स्वतंत्र पत्रकार के रूप में काम कर रहे हैं। वे तीस बरसों से पत्रकारिता में सक्रिय हैं।







रमन सिंह की जानकारी में हुआ हमला - अग्निवेश


जनज्वार.छत्तीसगढ़ के दंतेवाडा  इलाके में सलवा जुडूम कार्यकर्ताओं और सुरक्षा बलों द्वारा 11 से 14 मार्च के बीच आदिवासियों के गांवों को फूंक दिये जाने के बाद राहत सामग्री ले जा रहे लोगों पर जानलेवा हमले हुए हैं। राहत सामग्री ले जाने वालों में सामाजिक कार्यकर्ता स्वामी अग्निवेश भी थे,जिन पर स्थानीय पुलिस के इशारे पर जानलेवा हमला किया गया।

आदिवासियों के जलाये गए घर : अभी सबूत चाहिए
 वहां से बाल-बाल बचकर आये स्वामी अग्निवेश ने दिल्ली में 26मार्च को आयोजित एक प्रेस वार्ता में कहा कि,‘मैं किसी तरह जान बचाकर भागा हूं,नहीं तो बलवाईयों की कोशिश हमें गाड़ी में ही जिंदा फूंकने की थी।’ हालांकि जाने से पहले अग्निवेश   ने छत्तीसगढ़ के डीजीपी विश्वरंजन से इस बावत बात की तो उन्होंने इसे माओवादी पत्रकारों का हौवा बताया था और कहा कि पत्रकारिता   में माओवादियों के एजेंट भरे हैं।

गौरतलब है कि छत्तीसगढ़ के  ताड़मेटला इलाके में 14मार्च को सलवा जुडूम के बलवाईयों ने आदिवासियों के 300सौ घरों को जलाकर खाक कर दिया था। यह वही इलाका है जहां पिछले वर्ष 6 अप्रैल को सुरक्षा बलों के 76 जवानों को माओवादियों ने एक हमले में मार डाला था। ऐसे में माना जा रहा है कि हमले के दोषी माओवादियों को पकड़ पाने में असमर्थ पुलिस ने सलवा-जुडूम कार्यकर्ताओं के साथ मिलकर उन गांवों को बदले की कार्यवाही में जला डाला है जिन गांवों की सीमा से माओवादियों ने कार्यवाई की थी।

बहरहाल, 14 मार्च के इस हमले का जिन आदिवासियों ने विरोध किया उन आदिवासियों को जान से मार दिया गया और 3महिलाओं से सामूहिक बलात्कार किया गया। घटना के तकरीबन 7 दिन बाद यह सूचना पहली बार अखबारों में तब आयी जब वनवासी चेतना आश्रम के हिमांशु कमार ने दिल्ली के पत्रकारों को मोबाइल के जरिये सूचित किया। इसी सूचना को पढ़कर 25 मार्च को राहत सामग्री लेकर पहुंची स्वामी अग्निवेश की टीम ताड़मेटला के उन जलाये गये गावों में पहुंच पाती उससे पहले सलवा जुडूम के लोगों ने वहां के एससएसपी कल्लूरी के इशारे पर हमला जानलेवा हमला किया और राहत सामग्री पहुंचाये बगैर वहां से स्वामी अग्निवेश का जान बचाकर भागना पड़ा।

सरकार कहती है : कुछ नहीं हुआ  
स्वामी अग्निवेश के मुताबिक वे अपने साथियों के साथ राहत सामग्री लेकर मोरपल्ली जाना चाहते थे। ये उन गांवों का इलाका था जहां 14 मार्च को आदिवासियों के घर जलाये गये थे, हत्याएं हुईं थीं और महिलाओं के साथ बलात्कार हुआ था। यह कृकत्य सरकारी सुरक्षा बल कोबरा फोर्स और कोया कमांडों ने किया था। अग्निवेश आगे कहते हैं कि,‘उस इलाके में हमें न सिर्फ जाने से रोका गया बल्कि सुनियोजित योजना के तहत मुझपर और साथ गये लोगों पर जानलेवा हमला किया गया।

 इन सबके पीछे दंतेवाड़ा के एसएसपी एसआरपी कल्लूरी का हाथ था। गाड़ियों के शीशे  तोड़े,अंडे और पत्थर फेंककर प्राणघातक हमले किये। वह तो ईश्वर की कृपा है कि दिल्ली वापस आ गया हूं अन्यथा वहां हमें मार दिया जाता या फिर हमें गाड़ी समेत जिंदा जला दिया जाता।’  यह पूछने पर कि, क्या यह हमला मुख्यमंत्री रमन  सिंह की  जानकारी  के बगैर हुआ होगा, तो अग्निवेश ने कहा कि, 'ऐसा नहीं है. इन सभी वारदातों से मुख्यमंत्री पूरी तरह परिचित होंगे और उनकी जानकारी में हुआ होगा.'
इस जघन्य वारदात को अंजाम देने वाले कल्लुरी को सिर्फ दंतेवाड़ा से सरगुजा जिले में तबादला कर मुख्यमंत्री रमन सिंह अपने कर्तव्य की इती श्री कर ली है। जबकि कल्लूरी पर पहले से कई आपराधिक मामले हैं। इसी के मद्देजनर 7 जंतर-मंतर रोड दिल्ली में आयोजित प्रेस वार्ता में अग्निवेश ने कहा कि, ‘कल्लूरी जैसे अपराधी को तत्काल निलंबित किया जाना चाहिए और एफआइआर दर्ज होनी चाहिए। लेकिन कल्लूरी को पिछले कई वर्षों से आखिर किन मजबूरियों में रमन सिंह की सरकार सह दे रही है। दूसरा जिसके खिलाफ एफआइआर दर्ज कर जेल में डाला जाना चाहिए उसे सरकार सरगुजा का डीआइजी बनाकर भेज दी है।’

जाहिर यह सब करके कल्लूरी अपने काले कारनामों का ही छुपाने की कोशिश कर रहे थे,जिसमें वह अबतक सफल भी हैं। क्योंकि जलाये गये आदिवासियों के गांवों से जो सूचनाएं आ रही हैं वह सच कितना प्रतिशत हैं कहना मुश्किल है। एक जानकारी के मुताबिक वहां 14 मार्च के बाद पांच से अधिक लोग भूख से मर चूके हैं और दो आदिवासी किसानों ने आत्महत्या कर ली है।


डीजीपी कहते हैं, माओवादी पत्रकारों का हौवा  है

दूसरा जिला प्रशासन की कल्लूरी के आगे क्या औकात है उसका अंदाजा यहां तक कि पत्रकारों को रोक रहे थे। हमारे साथ गये पत्रकारों को पीटा और उनके कैमरे तोड़ दिये। इससे जाहिर है कि रमन सिंह कल्लूरी के प्रति नरमदिल हैं और उनको बचाये रखने की लगातार जुगत में है।

मैं मांग करता हूं कि मुख्यमंत्री इस पूरे घटनाक्रम की नैतिक जिम्मेदारी लें और उच्चतम न्यायालय के सेवानिवृत न्यायधीश से जांच करायें। उससे पहले वह अपने हेलीकाप्टरों से जलाये और तबाह किये गये गांवों में राहत सामग्री पहुंचाये जाने की गारंटी भी करें। खबर आ रही है कि उन गांवों में 5लोग भूख से मर चुके हैं और दो और लोगों ने आत्महत्या कर ली है। यह सब कुछ ठीक से हो इसके लिए जरूरी है कि कल्लूरी जैसे अपराधी अधिकारी को तत्काल निलंबित कर मुख्यमंत्री दंडित करें।

फोटो- यशवंत रामटेके

बाग बगीचा दिखे हरियर



वरिष्ठ पत्रकार और रविवार डॉट कॉम के संपादक अलोक पुतुल के जरिये एक प्रसिद्ध छत्तीसगढ़ी गीत हमें सुनने को मिला. अब इसके  ऑडियो को आप भी सुनें...आलोक जी ने हिंदी पाठकों की सुविधा के लिए छत्तीसगढ़ी से अनुवाद कर हमतक कुछ इस तरह से प्रेषित किया था... 



एक थे केदार यादव. छत्तीसगढ़ी में अपनी तरह की आवाज़ वाले केदार यादव ने सैकड़ों गीत गाये. 70 के दशक में गांव-गांव में उनकी धमक थी. आज बहुत दिनों के बाद उनका एक गीत मिला. शायद आप सबको  भी अच्छा लगे.


गीत के बोल हैं-

बाग बगीचा दिखे ल हरियर

दुरूग वाला नई दिखे बदे हव नरियर

मोर झूल तरी

मोर झूल तरी गेंदा इंजन गाड़ी सेमर फूलगे

सेमर फूलगे अगास मन चिटुको घड़ी नरवा मा

नरवा मा अगोर लेबे नयानी


बाग और बगीचे हरे-भरे दिख रहे हैं। पर दुर्ग (छत्तीसगढ़ का एक शहर) वाला नहीं दिख रहा है। मैंने उसके लिए मन्नत मांगी है, नारियल चढ़ाया है। मेरे सर पर कलँगी है, गले में गेंदे का फुल है। हृदय रेल के इंजन की तरह धड़क रहा है। जिस तरह सेमल के ऊँचे ऊँचे पेड़ों में फुल आ गए हैं उसी तरह मेरे होठों पर सेमल फुल सी लाली है। मेरे प्रिय थोड़ी देर के लिए नाले पर मेरी प्रतीक्षा कर लेना।

आगे आप खुद ही सुनें...




Mar 28, 2011

नक्सली कहने की 'महाछूट'


मानवाधिकार आयोग की जांच कहती है कि गांव के दो नौजवान अपने पशुओं को खोजने घर से बाहर निकले थे, जबकि  पुलिस दल ने उन पर अंधाधुंध फ़ायरिंग की...

अनिल मिश्र

पश्चिम बंगाल के लालगढ़  इलाके के नेताई गांव में 7 जनवरी को  सत्ताधारी राजनीतिक दल के सशस्त्र कैडरों ने बारह ग्रामीणों की गोली मारकर हत्या कर दी थी. उच्चतम न्यायालय की एक खंडपीठ ने इस मामले की याचिका पर 16 मार्च को सुनवाई करते हुये जो टिप्पणी की, वह बहुत महत्त्वपूर्ण है.

पश्चिम  बंगाल सरकार के पब्लिक प्रॉस्क्यूटर ने कहा कि मारे गए सभी लोग ’नक्सली’ थे. उच्चतम न्यायालय ने इस पर पश्चिम बंगाल सरकार को कड़ी फटकार लगाते हुए कहा  ’हम इस तथ्य से वाक़िफ़ हैं कि सुविधा संपन्न लोग सुविधाविहीन लोगों की मांगों को अवैधानिक ठहराने के लिए ’नक्सली’ ब्रांड का इस्तेमाल करते हैं.’ अदालत  ने आगे कहा कि ’देश के आधे से अधिक हिस्सों में क़ानून विहीनता (लॉ लेसनेस) है. ’नक्सली’ शब्द का ऐसे इस्तेमाल कर  हत्याओं को उचित नहीं ठहराया जा सकता.’

उच्चतम न्यायालय की यह टिप्पणी और भी अहमियत इसलिए रखती है क्योंकि सरकारें लगातार कॉर्पोरेट तंत्र के दबाव में झुकती चली जा रही हैं और एक से बढ़कर एक जनविरोधी क़दम उठा रही हैं. मौलिक अधिकारों की जो गारंटी संविधान में प्रदान की गई है उसकी रक्षा कर पाने में सरकारें पूरी तरह विफल साबित हो रही हैं. उदारीकरण के वर्तमान, तीसरे चरण में ’विकास’ के नाम पर सत्ताधारी वर्ग की असहिष्णुता अब एक सनक की शक्ल अख़्तियार कर चुकी है.

इसके पहले,  उच्चतम न्यायालय ने ’विकास’ के बारे में जो टिप्पणी की थी उसका भी आशय कुछ इस तरह का था कि 'ग़रीबों की आजीविका, मकान और पर्यावरण को तहस नहस करने वाला कोई विकास अपेक्षित नहीं है. निश्चित ही, विदेशी पूंजी के खेल के आगे नतमस्तक हमारे राजनीतिक नेतृत्व के लिए यह टिप्पणी किरकिरी जैसी रही होगी. हाल ही में ओडिशा के मानवाधिकार आयोग ने अपनी एक स्वतंत्र जांच रिपोर्ट में कहा है कि 2008 में कोरापुट जिले में पुलिस ने जिन दो लोगों को ’नक्सली’ कहकर मारा था वे ग्रामीण थे, जो अपने पशुओं को घर से बाहर बाड़े में बांधने निकले थे.

मानवाधिकार आयोग ने मृतकों के परिजनों को मुआवज़ा देने की भी सिफ़ारिश की है. मानवाधिकार आयोग की जांच के मुताबिक़ जिला पुलिस के नेतृत्व में सीआरपीएफ़ के गश्ती दल ने इस फ़ायरिंग की जो कहानी गढ़ी थी वह परस्पर अंतर्विरोधी और बेबुनियाद दिखती है.पुलिस दल के प्रभारी थानाध्यक्ष के मुताबिक़ उन्हें ’विश्वस्त’ सूचना मिली थी कि इलाक़े में कुछ ’माओवादी नक्सली’ तत्व आए हैं. गश्त के दौरान रात के अंधेरे में जब उन्होंने ’नाइट विज़न’ यंत्र से देखा कि कुछ लोगों का समूह उनकी ओर बढ़ा चला आ रहा है और गोलियां चला रहा है तो पुलिस ने जवाबी कारवाई में दो ’नक्सलियों’ को मार गिराया.

मानवाधिकार आयोग की जांच कहती है कि गांव के दो नौजवान अपने पशुओं को खोजने के लिए घर से बाहर निकले थे, क्योंकि उनके बैल रस्सी तुड़ाकर भाग गए थे. पुलिस दल ने उन पर अंधाधुंध फ़ायरिंग की, जिसमें दो युवकों की मौत हो गई और कई बैलों ने घटनास्थल पर ही दम तोड़ दिया. एक ग्रामीण इस हमले मे बुरी तरह घायल हुआ था, जिसने किसी तरह परिवार वालों को घटना की ख़बर दी.

जाहिर है, देश के आधे से भी अधिक हिस्सों में क़ानून नहीं है. आगे का सच यह है कि देश के अधिकांश हिस्सों में या तो कोई क़ायदे-क़ानून नहीं हैं या फिर ऐसे नियम-क़ानून हैं जिनके आधार पर सुप्रीम कोर्ट की इस टिप्पणी को भी अगर कभी ’देशद्रोही’ क़रार दिया जाए तो कोई ख़ास हैरानी नहीं होनी चाहिए. 'छत्तीसगढ़ विशेष जन सुरक्षा अधिनियम' एक ऐसा ही अंधा क़ानून है जिसमें (नक्सली जैसे) शब्दों के झोलदार इस्तेमाल द्वारा किसी भी तरह के अपराध करने की आधिकारिक छूट हासिल की गई है.



महात्मा गाँधी हिंदी विश्वविद्यालय वर्धा से मीडिया में शोध और स्वतंत्र लेखन. इनसे   anamil.anu@gmail.com   पर संपर्क किया जा सकता है.