Feb 3, 2011

और एक आदिवासी राज्य की मांग !


मध्यप्रदेश में नौ लाख सदस्य संख्या का दावा करने वाली  पार्टी ने प्रस्तावित राज्य का एक नक्शा बना लिया है। नक्शे में राज्य के कुल चैबीस जिले 108 विधानसभा क्षेत्र और 13 लोकसभा क्षेत्र शामिल किये गये हैं...

चैतन्य भट्ट

मध्यप्रदेश को छत्तीगढ में विभाजित हुये ज्यादा वक्त नहीं बीता है लेकिन एक बार फिर मध्यप्रदेश से अलग पृथक गौंडवाना राज्य की मांग उठने लगी है...

आज से उन्नीस साल पहले गठित गौडवाना गणतंत्र पार्टी ने प्रदेश की राजनीति मे अपना एक अलग मुकाम बनाकर दूसरे प्रमुख दलों में घबराहट पैदा कर दी थी पर बीच में पार्टी में आई दरार और गौडवाना गणतंत्र पार्टी के ही एक बडे नेता द्वारा गौडवाना गणतंत्र सेना बनाने के बाद इसकी धार कुंद हो गई थी। पर बाद में इनके विलय ने एक बार फिर गौंडवाना की मांग को फुलफार्म में ला दिया है।


मध्यप्रदेश में नौ लाख सदस्य संख्या का दावा करने वाली यह पार्टी इसके लिये जनजागरण अभियान  शुरू कर दी है और अपने प्रस्तावित राज्य का एक नक्शा भी बना लिया है। नक्शे के अनुसार राज्य में कुल चैबीस जिले 108 विधानसभा क्षेत्र और 13 लोकसभा क्षेत्र शामिल किये गये हैं।

गौरतलब है कि आदिवासी बाहुल्य मध्यप्रदेश में आदिवासियों के उत्थान के लिए सन् 1991में हीरासिंह मरकाम ने गौंडवाना गणतंत्र पार्टी का गठन किया था। आदिवासियों के विकास का नारा बुलंद किया था इसलिये इसे उन इलाकों में अच्छी लोकप्रियता मिली जो आदवासी बाहुल्य जिले कहे जाते थे धीरे-धीरे ‘गौडवाना गणतंत्र पार्टी’ ने आदिवासियों के बीच अपनी ताकत बढानी शुरू की और इतनी ताकत पैदा कर ली कि उसके संस्थापक हीरासिंह मरकाम कोरबा के तानापार जो अब मध्यप्रदेश के विभाजन के बाद छत्तीसगढ में है से मध्यावधि चुनाव जीत कर विधायक बन गये।

इस जीत से पार्टी को नया उत्साह मिला और 2003 के आम चुनाव में पार्टी के तीन विधायक प्रदेश की विधानसभा में पहुंचे  गये। पार्टी की ताकत बढने लगी तो उसके नेताओं के बीच महात्वाकांक्षायें भी उतनी ही तेजी  से पनपीं और पार्टी के राष्ट्रीय  उपाध्यक्ष गुलजार सिंह मरकाम ने अलग होकर गौंडवाना गणतंत्र सेना का गठन कर लिया। इसके कारण पिछले 2008 के विधानसभा चुनावों में पार्टी अपने अंदरूनी विवादों में इस कदर उलझ रही कि उसने चुनाव लड़ने का साहस ही नहीं कर सकी।
इसी साहस को जुटाने की कवायद में करीब डेढ साल पहले गौंडवाना गणतंत्र सेना का गौंडवाना गणतंत्र पार्टी में विलय हो गया। विलय के बाद फिर एक बार पार्टी ने पृथक गौंडवाना राज्य की मांग को पार्टी की केंद्रीय मांग के तौर पर स्थापित करना शुरू  कर दिया है।

पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष केएस कुमरे का तर्क है कि ‘जब देश आजाद हुआ था तब विभिन्न राज्यों के पुर्नगठन के वक्त देश में बसने वाले लोगों की विभिन्न भाषा,बोलियों और उनकी संस्कृति को ध्यान में रखते हुये राज्यों का गठन किया गया। पंजाब, गोवा, बंगाल, गुजराती, महाराष्ट्र, हरियाणा, छत्तीसगढ़ से लेकर पूर्वोत्तर तक का गठन इसी आधार पर हुआ है।’कुमरे उदाहरण देते हैं कि ‘क्षेत्रफल की दृष्टि से केरल,छत्तीसगढ के बस्तर संभाग के बराबर है। फिर भी मलयाली भाषा और संस्कृति के मददेनजर इसे राज्य का दर्जा दिया गया.’

पृथक गौंडवाना राज्य के मद्देनजर प्रस्तावित राज्य का जो नक्शा तैयार किया है उसमें टीकमगढ, छतरपुर, सतना, रीवा, सीधी, पन्ना, सिंगरौली, सागर, दमोह, कटनी, उमरिया, शहडोल, जबलपुर रायसेन, नरसिंहपुर, अनूपपुर, डिंडोरी, मंडला, होशंगाबाद, छिंदवाडा, सिवनी, बालाघाट, बैतूल, और हरदा जिले शामिल किये हैं। अब देखना यह है गौंडवाना राज्य की मांग करने वाली यह पार्टी जनता को लामबंद कर पाती है या फिर बस चुनावी हथियार के तौर पर ही राज्य के मांग का उठाती रहती है।


राज एक्सप्रेस और पीपुल्स समाचार में संपादक रह चुके चैतन्य भट्ट फिलहाल स्वतंत्र पत्रकार के रूप में काम कर रहे हैं। वे तीस बरसों से पत्रकारिता में सक्रिय हैं।

बोगियों से टपकते खून के बीच बेरोजगार


देश के 2.50 लाख युवा  मात्र  416 पदों के मांगे गए आवेदन जमा करने 11 राज्यों से उत्तर प्रदेश के आइटीबीपी भर्ती केंद्र पहुंचे थे,जहाँ से लौटने के दौरान बीस छात्रों  की मौत हो गयी.छात्रों की इस मौत के लिए क्या कोई जिम्मेदार नहीं ....  

प्रतिभा कटियार

शाहजहांपुर के पास हिमगिरी एक्सप्रेस धधक रही थी.वही हिमगिरी एक्सप्रेस जिसकी छत से गिरकर खबरों की मानें तो अब तक 19छात्रों की मौत हुई है.खौफ, खतरे की आशंका, आधी-अधूरी जानकारियों के साथ घटनास्थल से बस जरा सी दूरी पर बिताये वो पांच घंटे कभी नहीं भूलूंगी.

खबरें मिल रही थीं. बरेली सुलग रहा था. इस शहर से जब-तब धुआं उठता रहता है इसलिए मानो सबको आदत सी थी. इस बार धुआं इतना गाढ़ा होगा किसी को अंदाजा नहीं था

रोजगार का सपना आंखों में लेकर आये छात्रों में से कइयों को नौकरी के बदले मौत मिली.ट्रेन की छत पर से लाशें बरस रही थीं. पूरी बोगी खून से लाल थी. मदद करने वाला कोई नहीं. अपने साथियों को यूं मरते देख बाकियों का खून खौल उठा.एसी बोगी से यात्रियों को उतारकर आग लगा दी गई. मातम, गुस्सा, निराशा, हताशा का वो खौफनाक मंजर. उफ!

भर्ती के लिए गए छात्रों के लौटने की  व्यवस्था

क्या कुसूर था उनका,जो मारे गये.क्या कुसूर था उनका,जिन्हें रोजगार के लिए बुलाकर लाठियों से पीटा गया. ये सब अभ्यर्थी भारत तिब्बत सीमा पुलिस (आईटीबीपी)की भर्ती के लिए आये थे.क्या कुसूर था उनका कि उन्हें नौकरी के बदले मौत मिली.

प्रशासन कहता है कि उसे अंदाजा नहीं था कि इतने लोग आ जायेंगे.यानी वाकई प्रशासन को अंदाजा नहीं था कि इस देश में बेरोजगारों की कितनी बड़ी तादाद है. 416 पदों के लिए 11 राज्यों से ढाई लाख अभ्यर्थी. उन्हें वाकई अंदाजा नहीं था कि इस देश में कितने सारे युवाओं के लिए नौकरी एक ख्वाब है, जिसके लिए वे कुछ भी कर सकते हैं. प्रशासन सचमुच कितना मासूम है.

लोगों का क्या है, वे तो मरते रहते हैं. इस देश की इतनी बड़ी आबादी में से कुछ लोग न सही. हमें ऐसे हादसों की आदत है.हम हादसों से जल्दी से उबर जाने का हुनर सीख चुके हैं.देखिये ना सब सामान्य हो रहा है.हादसे के बाद की सुबह यानी आज शाहजहांपुर रेलवे स्टेशन इतना सामान्य था कि मानो कुछ हुआ ही न हो. 

इस हादसे के बाद रेल मंत्रालय, गृह मंत्रालय और यूपी सरकार  के बयानों के बाद  सोचती हूं दोष उन युवाओं का ही था शायद जिन्होंने अपनी आंखों में एक अदद नौकरी का ख्वाब बुना.जो ख्वाब जिसने जिंदगी ही छीन ली.ऐसा हादसा पहली बार नहीं हुआ है. जाहिर है आखिरी बार भी नहीं. हम अपनी गलतियों से कभी सबक नहीं लेते. हादसों को बहुत जल्दी भूल जाते हैं.

....ओह मानव कौल का इलहाम तो छूट ही गया, जिसे देखने के लिए मैं जा रही थी. सॉरी मानव, आपके इलहाम पर अव्यवस्था का यह नाटक भारी पड़ा इस बार.


लेखिका और पत्रकार प्रतिभा  कटियार ने यह प्रतिक्रिया घटनास्थल से लौटकरअपने  ब्लॉग  प्रतिभा  की  दुनिया  पर  लिखा है. 





Feb 2, 2011

भाजपा को दलाल चाहिए और ससुर को स्टाम्प


राजनीति का अनुभव नहीं होने से जिला पंचायत अध्यक्ष रहीं रंजना देवी के ससुर चंदन राम और भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष को लगा कि वे दलित  महिला को रबर स्टाम्प बनाने में सफल रहेंगे. लेकिन रंजना ने उनके दबाव में काम करने से मना कर दिया तो  तिकड़ी  बिगड़ गयी...

नरेन्द्र देव सिंह

उत्तराखण्ड में दलितों की बढ़ते राजनीतिक प्रतिनिधित्व को वहां की राजनीति के सनातनी कब्जेदार रहे राजपूत और ब्राह्मण  पचा नहीं पा रहे हैं। अपनी राजनीतिक अपच मिटाने के लिए उन्हें जब दलित वर्ग से आये जन प्रतिनिधियों को हटाने का काई उपाय नहीं सूझ रहा तो सवर्णी एकता का मुकम्मिल सहारा ले रहे हैं,जिसमें सत्ताधारी भाजपा और विपक्षी कांग्रेस दोनों में लंगोटिया यारी निभ रही है। उसी यारी को बरकरार रखते हुए कांग्रेस और भापजा ने पिथौरागढ़ जिला पंचायत अध्यक्ष रंजना कुमारी को 19जनवरी को अविश्वास प्रस्ताव के जरिये हटाया है,जिसकी साजिश रंजना के ससुर ने रची है.

रंजना देवी :    नहीं बनी मोहरा

पूर्व जिला पंचायत अध्यक्ष रंजना देवी राजनीति में आने से पहले ग्रामीण परिवेश की घरेलू महिला थीं। उनको राजनीति का कोई अनुभव नहीं था। रंजना देवी के ससुर चन्दन राम भाजपा के कार्यकर्ता हैं व उनके पूर्व पंचायती राज्य मंत्री और भाजपा नेता बिशन सिंह चुफाल से अच्छे सम्बन्ध हैं। बिशन सिंह चुफाल वर्तमान में भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष है। चंदन राम ने अक्टूबर 2008में बिशन सिंह चुफाल के कहने पर रंजना देवी को जिला पंचायत अध्यक्ष बनने के लिए राजी कर लिया। इससे पहले रंजना देवी को आरक्षित सीट से जिला पंचायत सदस्य बनवा दिया था।

काफी ना-नुकर के बाद रंजना देवी जिला पंचायत अध्यक्ष बन गयी। आरम्भ में उन्हें न तो राजनीति का अनुभव था और ना ही सरकारी कामों का। चंदन राम रंजना देवी को रबर स्टाम्प बनाना चाहते थे। इसमें चंदन राम को भाजपा के वरिष्ठ नेताओं का भी आशीर्वाद था। शुरू में तो रंजना देवी ने अपने ससुर व भाजपा नेताओं के दबाव में काम किया। परन्तु धीरे-धीरे जब उन्हें अनुभव होने लगा तो उन्होंने उनके दबाव में काम करने से मना कर दिया। बस यहीं से कहानी बिगड़ गयी.

नियम के मुताबिक किसी जिला पंचायत अध्यक्ष के खिलाफ दो साल से पहले अविश्वास प्रस्ताव नहीं लाया जा सकता है। इसलिए जैसे ही दो साल बीते रंजना देवी के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव पारित कर दिया गया। असल में, चन्दन राम,किशन सिंह भंडारी (पूर्व जिला पंचायत अध्यक्ष) व बिशन सिंह चुफाल मिलकर जिला पंचायत को आवंटित पैसों की बंदरबांट करना चाहते थे। और इसके लिए रंजना देवी को मोहरा बनाना चाहते थे।

रंजना देवी ने बताया कि एक बार जब उनके ससुर से उनका झगड़ा हुआ तो उन्होंने यह बात बिशन सिंह चुफाल तक पहुंचायी। इस पर बिशन सिंह चुफाल ने उनसे कहा कि तुम अपने ससुर को प्रत्येक माह दस हजार रुपये दिया करो। तब रंजना देवी ने कहा कि मैं प्रत्येक माह दस हजार रुपया कहां से लाऊं जब कि मुझे साढ़े चार हजार माहवार ही मानदेय मिलता है। इस पर बिशन सिंह चुफाल ने कहा ‘यह तुम्हारा काम है‘  रंजना देवी पर उनके ससुर, किशन सिंह भंडारी आदि लोगों का दबाव बढ़ता जा रहा था। आरम्भ में अकुशल राजनीतिज्ञ होने के कारण तो सब ठीक था परन्तु जब वह काम सीख गयी तो उन्हें प्रताड़ित किया जाने लगा।

चुफाल की चाल: हो गयी कामयाब

पिथौरागढ़ जिला पंचायत अध्यक्ष रहीं रंजना कुमारी दलित हैं और उत्तराखंड में 2008 में संपन्न हुए जिला पंचायत चुनाव में भाजपा समर्थित प्रत्याशी के तौर पर पहली बार चुनाव लड़ीं और जीतीं.उत्तराखंड के इतिहास में ऐसा पहली बार है कि किसी जिला पंचायत अध्यक्ष को अविश्वास प्रस्ताव के जरिये हटाया गया है। इससे पहले पिछले महीने रामनगर जिला के क्यारी ग्राम पंचायत में एक दलित ग्राम प्रधान को अविश्वास प्रस्ताव के जरिये हटाने के साजिश रची गयी थी,पर वह असफल रही। दलित ग्राम प्रधान को अविश्वास प्रस्ताव के जरिये हटाने की कोशिश भी उत्तराखंड में पहली बार हुई थी। इस खबर को जनज्वार के लिए सलीम मल्लिक ने लिखा था,जिसे सवर्णों को मंजूर नहीं एक दलित शीर्षक से प्रकाशित  किया गया था। 

पूर्व जिला पंचायत अध्यक्ष किशन सिंह भंडारी ने एक बार रंजना देवी को जातिसूचक शब्दों के साथ उल्टा-सीधा कहा। रंजना देवी ने इसकी शिकायत भी बिशन सिंह चुफाल से की तब उन्होंने कहा कि ‘‘इसका सबूत लाओ।‘‘ रंजना देवी कहती हैं कि ‘‘प्रदेश में किसी महिला का शोषण होगा और यह लोग बस सबूत मांगेंगे।‘‘ रंजना देवी के ससुर ने एक बार उन्हें अपनी लाइसेंसी बंदूक का डर दिखाते हुए जान से मारने तक की धमकी दे दी थी। इस पर भी चुफाल ने सबूत मांगा।

रंजना के ससुर स्वयं सरकारी पैसों के गबन में लिप्त रहे। चंदन राम ठेकेदारी का काम करते हैं और उन्हें भाजपा नेताओं से पैसा मिलता है। रंजना देवी ने बताया ‘‘एक बार मेरे ससुर को मंदिर बनवाने के लिए नेताओं से पैसा मिला तो उसका गबन करके उन्होंने अपना मकान बना लिया।‘‘जब चंदन राम ने देखा कि बहू कठपुतली बनने से इंकार कर रही है तो उन्होंने रंजना देवी पर आरोप-प्रत्यारोप लगाने शुरू कर दिए। यह आरोप इतने गिरे हुए थे जिन्हें लिखा भी नहीं जा सकता।

इस पूरी कहानी में भाजपा नेता बिशन सिंह चुफाल व पूर्व जिला पंचायत अध्यक्ष किशन सिंह भंडारी ने जब देखा कि उनके स्वार्थ रंजना देवी के सहारे पूरे नहीं हो रहे हैं तो रंजना देवी को निशाना बनाना शुरू कर दिया। इस काम में किशन सिंह भंडारी ने बिशन सिंह चुफाल की मंशा को पूरा करने का जिम्मा लिया। किशन सिंह भंडारी ने रंजना देवी के ससुर के साथ मिलकर जिला पंचायत सदस्यों को अपने साथ मिलाना शुरू किया।

इसके बाद रंजना देवी पर तमाम आरोप लगाये। जैसे कि रंजना देवी सरकारी गाड़ी का दुरुपयोग करती हैं,जिला पंचायत की आवश्यक बैठकों को नहीं करतीं,धनराशि का दुरुपयोग करती हैं व जिला पंचायत अध्यक्ष भाई-भतीजावाद को बढ़ावा दे रही है। रंजना देवी सोचती रही कि बिशन सिंह चुफाल बड़े नेता हैं और उनके साथ इंसाफ करेंगे लेकिन बिशन सिंह चुफाल ने अविश्वास प्रस्ताव से कुछ दिनों पूर्व रंजना देवी को झूठा आश्वासन दिया कि वह पद पर बने रहेंगी। 16 जनवरी को संदेश भिजवा दिया कि इस्तीफा दे दो। रंजना देवी प्रदेश अध्यक्ष के इस रवैये से सकते में आ गयी।

आज रंजना देवी के साथ भाजपा का कोई भी नेता नहीं है। उनका साथ देने कोई भी जिला पंचायत सदस्य नहीं आया। सबको सत्ता का डर सता रहा है। रंजना देवी के दो बच्चे हैं। आज उनके पति व अन्य ससुराल वालों ने उनका साथ छोड़ दिया है। ऐसे में रंजना देवी अपने अकेले दम पर इन सब लोगों से मोर्चा ले रही हैं  और अपने साथ हो रहे अन्याय के खिलाफ लड़ रही हैं.


  लेखक पत्रकार हैं, उनसे  narendravagish@gmail.com  पर संपर्क किया जा सकता है.





Feb 1, 2011

जापान के सोका गक्कई की जाँच क्यों नहीं ?


करमापा के पास से बरामद चीनी मुद्रा को चीन की उस साजिश का हिस्सा माना जा रहा है,जिसके तहत चीन लद्दाख से अरुणाचल तक के सारे मठों पर करमापा के जरिये नियंत्रण करना चाहता था. कहीं  जापान भी सोका गक्कई के जरिये लोगो को बरगला कर वर्चस्व की कोई साजिश तो नहीं रच रहा ...

निशांत मिश्रा

विवादों में घिरे बौद्ध धर्म गुरु करमापा उग्येन त्रिनेल दोरजे के पास भारी मात्रा  में मिली विदेशी मुद्रा और उनके संदिग्ध आचरण ने अनेक सवाल खड़े कर दिए हैं.  इन सवालों में यह भी है कि कहीं धर्म की आड़ में देश की धार्मिक अस्मिता को छिन्न-भिन्न करने की साजिश तो नहीं।

बौद्ध धर्मगुरु करमापा और उनके मठ से बरामद 25देशों के सात करोड़ रुपए की विदेशी और भारतीय मुद्रा के मामले की तह में जाने के बाद ही हकीकत का खुलासा होगा,लेकिन फ़िलहाल उनके पास से बरामद 70लाख रुपए की चीनी मुद्रा 'युआन'ने उनके तार चीन से जोड़ दिए हैं। कयास लगाया जा रहा है कि करमापा कहीं चीनी जासूस तो नहीं। यहाँ इस बात की ओर ध्यान देना जरुरी है कि बौद्ध मठों में होने वाली गतिविधियों को कभी सरकारी या प्रशासनिक स्तर पर जांचने और जानने की कोशिश नहीं की गई। इसी का परिणाम है कि बौद्ध मठों या बौद्ध धर्म के नाम पर होने वाली गतिविधियों से देश के लोग अनभिज्ञ है।


 बौद्ध धर्म की आड़ में बौद्ध मठों की सक्रियता के अलावा एक और संगठन है जो देश में "बुद्धिज्म" के नाम पर विभिन्न धर्मावलम्बियों के बीच धीरे-धीरे अपनी गहरी पैठ बनाता जा रहा है। इस संगठन का सम्बन्ध जापान से है और इसका निशाना है देश का मध्यम व गरीब तबका। यहाँ इस संगठन के कार्यकलाप और गतिविधियों का खुलासा करना जरुरी है।

महात्मा बुद्ध और उनके सिद्धांतों का  पालन करते हुए उनके कुछ अत्यंत निकट रहे लोगों ने कुछ अवधारणायें स्थापित की,जिनका अनुसरण आज देश-विदेश मैं लाखों लोग कर रहे हैं। इन्ही में से एक हैं जापानी संन्यासी (भिक्षु) निचिरेन दैशोनिन. इन्होने  तेरहवीं शताब्दी में लोटस सूत्र (कमल के फूल) की अवधारणा स्थापित की थी । इस अवधारणा को विश्व में प्रचारित व प्रसारित करने का काम जापानी संगठन सोका गक्कई इंटरनेशनल (एसजीआई)कर रहा है । भारत में इसकी शाखा को भारत सोका गक्कई के नाम से जाना जाता है। जिस तरह तिब्बतियों के तीसरे सर्वोच्च धर्म गुरु करमापा के नाम को लेकर विवाद रहा है,ठीक उसी तरह जापानी भिक्षु निचिरेन दैशोनिन द्वारा स्थापित अवधारणा भी सदैव विवादित रही।

महात्मा बुद्ध के सिद्धांतों में लोटस सूत्र की अवधारणा का तात्पर्य यह है कि जिस तरह गंदगी में होने के बावजूद कमल का फूल उससे ऊपर निकल कर खिलता है,ठीक उसी प्रकार मनुष्य को इसमें सिखाया जाता है कि किस तरह समाज में व्याप्त गंदगी और बुराइयों से बचकर ऊपर निकला जा सकता है. मगर सोका गक्कई  अलग-अलग ढंग से प्रचारित करता  है और लोगों को अधूरा ज्ञान परोस कर दिग्भ्रमित किया जा रहा है. 

कमल के फूल को आठ शुभ प्रतीक में से एक माना गया है। इस अवधारणा से जुड़े लोग महात्मा बुद्ध के कमल पर बैठे या हाथ में कमल लिए हुए रूप कि कल्पना करते हैं। इस फूल को दिल की तरह माना गया है और इसमें रंगों को भी महत्व दिया गया है। जैसे सफेद: मानसिक और आध्यात्मिक पवित्रता, लाल: हृदय करुणा और प्रेम, नीला (ब्लू): बुद्धि और इंद्रियों पर नियंत्रण, गुलाबी: ऐतिहासिक बुद्ध और बैंगनी: रहस्यवाद।

लोटस सूत्र को लेकर चीन,जापान और कोरिया जहाँ सर्वाधिक बौद्ध धर्म अनुयायी हैं,भी एकमत नहीं हैं। इतिहासकारों का मानना है कि लोटस सूत्र के मूल पाठ खो गए, लेकिन भिक्षु कमारजिवा द्वारा चीनी में 406 सीई में किये गए एक अनुवाद को सही माना जा सकता है। मूल रूप से लोटस सूत्र संस्कृत सूत्र है या सद्धर्मा-पुंडारिका सूत्र। बौद्ध धर्म के कुछ स्कूलों में यह विश्वास कायम है कि यह ऐतिहासिक सूत्र बुद्ध के शब्द हैं। हालांकि,अधिकांश इतिहासकारों का मानना यह सूत्र पहली या दूसरी शताब्दी सीई में लिखा गया था। सोका गक्कई संगठन इन सबसे अलग यह मानता है कि लोटस सूत्र जापानी भिक्षु निचिरेन दैशोनिन द्वारा स्थापित अवधारणा है। संगठन द्वारा इस अवधारणा को "Human Revolution" का नाम देकर प्रचारित किया जा रहा है।

यहाँ पहले यह साफ कर देना जरुरी है कि "सोका गक्कई" क्या है? निचिरेन बुद्धिज्म पर आधारित बुद्ध महायान की एक शाखा "सोका गक्कई" वस्तुत: एक ऐसा सिद्धांत या धार्मिक आन्दोलन है जिसके जरिये एक ऐसे समुदाय का निर्माण करना है जिसकी बौद्ध धर्म में विशेष आस्था हो। विश्व के 192 देशों और राज्यों में सोका गक्कई इंटरनेशनल के करीब 12लाख सदस्य हैं। ऐसा इस संगठन का दावा है। विलुप्त हो चुके निचिरेन बुद्धिज्म पर आधारित "सोका गक्कई" को 1930 में जापानी शिक्षक त्सुनेसबुरो माकीगुची ने संस्थापित किया।

द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान सरकार समर्थित राज्य शिन्तो के विरोध के कारण इस संगठन को दबा दिया गया और "आपराधिक सोच"के आरोपों में माकीगुची को जोसी तोडा व अन्य सोका गक्कई नेताओं सहित 1943 में गिरफ्तार कर लिया। नवम्बर 1944 में जेल में ही कुपोषण के कारण माकीगुची का 73साल की उम्र में देहांत हो गया। जापान में हुए पहले परमाणु हमले से कुछ सप्ताह पहले जुलाई 1945में तोडा को रिहा किया गया। आने वाले वर्षों में तोडा संगठन के पुनर्निर्माण में जुट गए। 1958 में अपने निधन से पहले करीब 7,50000 लोगों को उन्होंने इसका सदस्य बना लिया था।


यहाँ सवाल किसी अवधारणा या सिद्धांत के विरोध का नहीं है,बल्कि यह है कि जब यह बौद्ध धर्म को प्रचारित और संस्थापित करने का आन्दोलन है तो फिर इसे मात्र एक सिद्धांत या अवधारणा क्यों कहा जाता है? क्यों इसके जरिये लोगों को काल्पनिक उदाहरण   देकर उनका माइंड वाश किया जा रहा है?क्यों नहीं इससे जुडने वाले लोगों को स्पष्ट किया जाता कि शांति, शिक्षा और सांस्कृतिक आदान-प्रदान के नाम पर यह सब विश्व व्यापी बौद्धधर्मी आन्दोलन का एक हिस्सा है? "Human Revolution" का नाम देकर जिस तरह इसको प्रचारित किया जा रहा है वह मानवीय क्रांति वास्तव में एक ऐसे समुदाय के निर्माण करने की प्रक्रिया है जिसमें बौद्ध धर्म के प्रति विशेष आस्था हो। अगर यह मात्र एक सिद्धांत या अवधारणा ही है तो क्यों जापान में जहाँ इसके सबसे ज्यादा अनुयायी हैं, वहां "सोका गक्कई"लीडर्स को जेल में डाल दिया गया और उन पर आपराधिक सोच या विचारों का आरोप लगा?
देश के अनेक हिस्सों में लोगों को दिग्भ्रमित कर कभी इस धर्म द्वारा तो  कभी उस धर्म द्वारा धर्म परिवर्तन  के मामले पहले भी उजागर हुए है। इसलिए एक सवाल यह भी उठता है कि कहीं यह कोई सोची समझी साजिश तो नहीं धर्म परिवर्तन की। क्योंकि इस अवधारणा से जुड़े लोगो को अपने घर में इस अवधारणा से सम्बंधित मंदिर जैसा स्थान बनाने के प्रेरित किया जाता है. साथ ही उनको कहा जाता है कि यह एक अवधारणा मात्र है कोई धर्म नहीं। धर्म को अवधारणा के नाम का चोला ओढाया जा रहा है? इसकी जाँच आवश्यक है।

आज हर धर्म व समाज मीडिया से नजदीकियां चाहता है तो फिर "सोका गक्कई "से जुड़े लोग क्यों मीडिया या आम लोगों से बात करने में कतराते हैं। सबसे बड़ी बात यह कि इस अवधारणा में अधिकतर ऐसे लोगो को जोड़ा जाता है जो आर्थिक,मानसिक या शारीरिक रूप से से कमजोर हों। उन्हें बताया जाता है कि इस अवधारणा से जुड़ने के बाद उनकी ये सब परेशानी दूर हो जाएगी,लेकिन हकीकत कुछ और ही होती है।

करमापा के पास से बरामद चीनी मुद्रा युआन को चीन की उस साजिश का हिस्सा माना जा रहा है,जिसके तहत चीन भारत के लद्दाख से अरुणाचल तक के सारे मठों पर करमापा के जरिये नियंत्रण करना चाहता है,ठीक उसी तरह जापान भी हमारे देश में सोका गक्कई के जरिये लोगो को बरगला कर अपना वर्चस्व स्थापित करने की कोई साजिश रच रहा है? देश में सोका गक्कई की गतिविधियों के संचालन के लिए पैसा कहाँ से और किन लोगों के पास आ रहा है,यह भी जाँच का विषय है।



पत्रकार निशांत मिश्रा पिंकसिटी प्रेस क्लब जयपुर के पूर्व  उपाध्यक्ष हैं, उनसे  journalistnishant26@gmail.com संपर्क  किया  जा  सकता  है.






झूठी ख़बरों का नया खबरची


स्वाभिमान टाइम्स की इस प्रवृत्ति को परखने के लिए उसके विज्ञप्ति को देखा जा सकता है जिसमें लिखा है, '...बड़ी-बड़ी हस्तियों से संपर्क रखने वाले संपादकीय सहयोगियों की  जरूरत है...
 


दिल्ली से निकलने वाले अखबार स्वाभिमान टाइम्स ने 27 जनवरी  को पहले पन्ने पर वामपंथियों को अपराधी और लुटेरे बताते हुए खबर छापी। खबर में कांग्रेस के वरिष्ठ नेता और केंद्रिय मत्री प्रणव मुखर्जी के कथित बयान के हवाले से कि वामपंथी अपराधी और लुटेरे होते हैं,एक पूरी बहस करने की कोशिश की गई है। अखबार के रिपोर्टर राम प्रकाश त्रिपाठी ने कई लोगों के बयानों के साथ वामपंथियों को अपराधी और लुटेरे पुष्ट करने की कोशिश की है।

इस खबर पर आपत्ती करने और गंभीरता से इसलिए सोचने की जरुरत है कि अव्वल तो प्रणव मुखर्जी का ऐसा कोई बयान देश भर के किसी भी जनसंचार माध्यम में देखने को नहीं मिला सिवाय स्वाभिमान टाइम्स के, जो कि एक नया अखबार है और जिसका सर्कुलेशन दिल्ली और एनसीआर के बाहर कहीं नहीं है। ऐसे में सवाल उठता है कि आखिर इस खबर को तथ्यों की पुष्टि न कर पाने का रिस्क उठाते हुए भी इस अखबार ने खबर को अपने पहले पन्ने पर क्यों छाप दिया।


दरअसल अब मीडिया की स्वाभाविक परिणति हो गयी है कि  वो अपने  माध्यम से सरकार और उसकी नीतियों से नत्थी करके अपने आगे के हितों  को और सुरक्षित करे। जिससे सरकारी अमले से कम रिश्वत में अपना काम निकलवा सके। यह काम बड़े  अखबार रोज-ब-रोज खूब करते हैं पर बहुत ही शातिर परिपक्वता के साथ। क्योंकि उनके रिपोर्टर इस विधा के पुराने खिलाड़ी होते हैं और अपनी इसी विधा की मेरिट पर आज वे देश के कई राष्ट्रीय  अखबारों में संपादक भी हो गए हैं।

रामप्रकाश त्रिपाठी भी इसी विधा के प्रशिक्षु लगते हैं। जिन्होंने इक्सक्लूसिव खबर बनाने के लिए एक पूरे झूठे बयान की ही कहानी ही गढ़ दी जिसे न तो किसी ने कहा था न किसी ने सुना था। दरअसल इस तरह की मानसिकता जल्दी से ज्यादा कमाई के चूहा दौड़ में शामिल पत्रकारों में तेजी से बढ़ती जा रही है. जिसमें सबसे ज्यादा नुकसान पत्रकारिता ओर खबरों को हो रही है. 

स्वाभिमान टाइम्स की इस प्रवृत्ति को परखने के लिए उसके संपादक निर्मलेन्दु साहा की एक पोर्टल पर विज्ञप्ति को देखा जा सकता है जिसमें उन्होंने लिखा -‘‘नया रूप, नई सज्जा, नए तेवर और कलेवर के साथ राजधानी दिल्ली से प्रकाशित होने वाले राष्ट्रीय दैनिक समाचार-पत्र ‘स्वाभिमान टाइम्स’ को योग्य, कुशल, अनुभवी और बड़ी-बड़ी हस्तियों से संपर्क रखने वाले संपादकीय सहयोगियों (उप-संपादकों,वरिष्ठ उप-संपादकों,मुख्य उप-संपादकों)  के अलावा, संवाददाताओं और फोटो पत्रकारों की जरूरत है।’

इन पंक्तियों से इस रिपोर्ट की सचाई को समझा जा सकता है कि किस तरह ऊंचे संपर्क वाले रिपोर्टर ने ऊंचे संपर्क वाले संपादक के लिए खबर लिखी होगी.

जर्नलिस्ट यूनियन फॉर सिविल सोसाइटी के  मानिटरिंग सेल द्वारा जारी।


Jan 31, 2011

बंधुवर परेशान हैं !


बंधुवर वकीलों को गणेश शंकर विद्यार्थी  से लेकर इमरजेन्सी आंदोलन में पत्रकारों का इतिहास- भूगोल बता डाले, लेकिन ये वकील भी...

निखिल आनंद

अबतक सियासी किस्सागोई और बहस का कारण बंधुवर बनते रहे हैं, लेकिन नवलेश की गिरफ्तारी के बाद इन दिनों बंधुवर ही खासे चर्चा में हैं। बंधुवर करना तो बहुत कुछ चाहते हैं, लेकिन डरते हैं कि ज्यादा बोले तो अगला नंबर उनका न हो। अब बंधुवर नौकरी बचाएं कि आंदोलन बचाएं, दुविधा में पड़े हैं। हालत ये है की अब तो राह चलते लोग मजाक उड़ाने लगे हैं कि जैसे पत्रकार न हुए कोई अपराध हो गया।

अब कुछ दिनों पहले की ही बात है, बंधुवर हाईकोर्ट गये प्रतिक्रिया लेने कुछ वकीलों की। मामला था सुप्रीम कोर्ट ने बिहार की निचली अदालतों की कार्यप्रणाली सुधारने के बारे में टिप्पणी की थी। वे प्रतिक्रिया लेते, उससे पहले ही वकीलों ने बंधुवर से पूछ लिया कि भाईजी का क्या हाल है? बंधुवर पहले तो समझे ही नहीं, तो वकील साहब ने कहा-'अरे वही आपके नवलेश भाई। देखिये,खबर आपलोग बहुत छापते हैं। जरा संभल के रहियेगा की अगला नंबर आप ही का न हो।'

 दूसरे वकील साहब ने कहा, 'बंधुवर! मणिपुर की खबर पता है न, 30 दिसम्बर 2010 को एक संपादक की गिरफ्तारी हुई तो मणिपुर में अखबार ही नहीं छपा।'बंधुवर को खबर का पता ही नहीं था, तो भौचक रह गए। वकील साहब ने कहा की 'गूगल' पर जाकर खोजिये मिल जायेगा। बंधुवर फजीहत होते देख कहते हैं- ऐसा नहीं है जनाब, हमारे साथियों ने पूर्णिया और फतुहा में विरोध-प्रदर्शन किया है।

वकील साहब ने कटाक्ष किया-'भाई बिहार की पत्रकारिता की धुरी पटना से हैंडल होती है। ये तो गजब हो गया है कि पटना में नवलेश के मसले पर विरोध और सड़क पर उतरना तो दूर, कोई लिखने को भी तैयार नहीं है। लगता है कि आपलोग भी भोंपू बनते जा रहे हैं। बंधुवर ने वकीलों को गणेश शंकर विद्यार्थी, हजारी प्रसाद द्विवेदी से लेकर इमरजेन्सी आंदोलन में पत्रकारों का इतिहास- भूगोल बता डाला। लेकिन ये वकील भी पता नहीं किस जनम का बैर मिटा रहे थे।

वकीलों ने  बंधुवर को फिर धर-लपेटा, ' भाई! हमारे वकालत में छेद देखने आये हैं। अपने दुकान में देखिये, ये आप ही लोग हैं जनाब जो छोटी कुर्सियों को सत्ता का केन्द्र बनाते हैं। सत्ता से गठजोड़ कर सदन पहुँचने की कला आप ही लोग बेहतर जानते हैं।'

जान बचते न देख बंधुवर थोड़ा  आदर्शवादी होकर कहते हैं- 'अब पहले वाली बात नहीं है, लोकतंत्र के सभी खम्बे नैतिकता के मसले पर सवालों के घेरे में हैं।' वकील साहब गुस्साए-'अब अपना छेद छुपाने के लिए सबको मत लपेटिये। मुखौटे के पीछे क्या है, सब पता है । सत्ता की चाटुकारिता और चापलूसी से गांवों में ठेकेदारी कराने के किस्से भी मशहूर हैं। नीरा राडिया के बहाने तो दलाली में शामिल आपके मीडिया के मठाधीशों  के चेहरे पहले ही बेनकाब हो चुके है।'

बाप-रे-बाप! जिंदगी में इतनी फजीहत किसी लंगोटिया दोस्त और खानदानी दुश्मन ने भी बंधुवर की नहीं की थी। वकीलों के व्यंग्य-बाण से घायल बंधुवर सोचने लगे, नवलेश के मसले पर वाकई सब चुप हैं। एक दिन बंधुवर ने जोश में आकर अपने सहयोगियों को फोन किया कि 'भाई ये तो गजब हो गया है। अब तो पत्रकारों की भी शामत आ गई है। हमें कुछ करना चाहिये, सो कल 2 बजे बैठक में आइयेगा। नवलेश के मसले पर आंदोलन खड़ा करना है।' बंधुवर पहुँचे तो बैठक स्थल पर अकेले पहले आदमी थे। दो घंटे बैठे तो कुल जमा चार  लोग पहुँचे। अब बंधुवर ने थककर कहा कि 'चलिये अपने बड़े श्रमजीवी बंधुओं से मुलाकात कर एक प्रेस रिलीज निकालते हैं।'

तब तक सीबीआई इन्क्वारी की खबर आई तो बड़े बंधु ने फोन किया  'बंधुवर अब खुशी मनाईये, आपकी बात मान ली गई है।' बंधुवर ने पूछा कौन सी भईया।'तो महोदय ने खुशी से उछलते हुए कहा 'बंधुवर नीतीशजी ने सीबीआई इन्क्वारी की घोषणा कर दी है। अब तो आप खुश हैं न... अब तो प्रेस रिलीज निकालने की भी जरूरत नहीं पड़ेगी।'

फोन कट चुका था और बंधुवर हाथ में रिसीवर पकड़कर उसे झुनझुने की तरह हिला रहे थे।


(लेखक निखिल आनंद टीवी पत्रकार हैं. फिलहाल 'इंडिया न्‍यूज बिहार' के राजनीतिक संपादक  हैं. उनसे nikhil.anand20@gmail.com   पर संपर्क किया जा सकता है .) 



आंदोलन के 'प्याज' और जनयुद्ध की शुरूआत


तो जी आप जे कह रहे हो कि विनायक सेन आंदोलनों के प्याज हो गये हैं। जैसे महंगायी के नाम पर मीडिया और सरकार ऐसे बात करते हैं मानों प्याज को छोड़ बाकी पर तो कोई महंगायी ही न हो...

अजय प्रकाश

महात्मा गांधी के पुण्यतिथि  30जनवरी को देश के तमाम हिस्सों में भ्रष्टाचार विरोधी रैली का आयोजन किया गया। इसी अवसर पर दिल्ली के लालकिला से शहीद भगत सिंह पार्क तक माओवादियों के सहयोगी होने के आरोप में बंद डॉक्टर विनायक सेन के रिहाई के समर्थन में एक संक्षिप्त रैली भी निकाली गयी। भ्रष्टाचार के विरोधियों की रैली में भ्रष्टाचार के खिलाफ जनयुद्ध के शुरूआत की घोषणा हुई,तो वहीं विनायक समर्थकों ने सरकारी हिंसा के मुकाबले अहिंसा की ताकत के पक्ष में क्रांतिकारी गीतों और भाषणों का आयोजन किया।

संक्षिप्त और वृहत रैली की संयुक्त सफलता के बाद विश्लेषकों ने दोनों रैलियों को मिलाकर ‘हॉलीडे रैली’की संज्ञा दी है। रैली को हॉलीडे कहने वालों का तर्क था कि 30 जनवरी को रविवार होने की वजह से वे ऐसा कह रहे थे, जबकि तरफदारों ने गांधी जी के जन्मदिन की मजबूरी कहा। बहरहाल भगत सिंह पार्क के पास नौकरी बजा रहे दिल्ली पुलिस के सिपाही यशवीर को इस बात से राहत रही कि जो लोग सरकार की हिलाने-उखाड़ने की बात कर रहे हैं, बेसिकली यह उनकी ड्यूटी है। आंदोलनकारियों को संभालने की ड्यूटी में लगे सिपाही यशवीर की राय में ऐसा करके वे लोग अपने चुन्नु-मुन्नु का पेट भरते हैं।

सिपाही की बात सुन रहे एक बुद्धिजीवी जो कि सभा के भागीदार थे,ने कहा ‘ऐसा नहीं है। पार्क में जमा हुए और नारा लगा रहे लोग विनायक सेन की नाजायज गिरफ्तारी के खिलाफ लड़ रहे हैं। ये लोग चाहते हैं कि सरकार बिना शर्त विनायक सेन को छोड़े। इसमें किसी का कोई स्वार्थ नहीं है, जैसा कि आप सोच रहे हैं। सिर्फ ड्यूटी ही न बजाइये, थोड़ा पढ़ा लिखा कीजिए।’

बुद्धिजीवी का तेवर देख सिपाही उभरने वाली झंझट को ताड़ गया। अपनी बात से पीछे हटते हुए बोला ‘साहब जी हमको कहां पढ़ने की फुरसत, आप ही बता दीजिए।’

बुद्धिजीवी- ‘क्या बतायें आपको, आप लोगों को तो सिर्फ निरीह जनता पर गोली चलानी है।’

सिपाही-‘ना जी ना। मैंने तो कभी किसी को एक थप्पड़ भी नहीं मारा, गोली की कौन कहे।’

बुद्धिजीवी-‘अरे आपने नहीं चलायी होगी,बाकी तो चलाते हैं न।’


सिपाही-‘बाबूजी मैं भी तो आपको यही बात समझाना चाह रहा हूं  कि आपकी रोटी आंदोलन से भले न चले लेकिन बाकियों की तो चलती है।’

बुद्धिजीवी-‘सो तो है। पर जब देश ही भ्रष्टाचार और अपराध की गिरफ्त में हो तो क्या किया जा सकता।’

सिपाही- ‘हां जी-हां जी, कुछ नहीं हो सकता।’

‘ये लीजिये हमलोगों ने एक पर्चा निकाला है। अकेले सिर्फ विनायक सेन की ही रिहाई बात क्यों  की जा रही है? जरूरी है कि काले कानूनों के खिलाफ और उन हजारों लोगों के पक्ष में भी संघर्ष हो जो देशद्रोह और अन्य जन संघर्षों  के मामलों में जेलों में बंद हैं।’ -इतना कह एक  एक ने पर्चा बुद्धिजीवी की ओर बढ़ाया तो सिपाही भी उचक कर देखने लगा। तभी बुद्धिजीवी बोले, ‘कॉमरेड इन्हें भी दीजिए यह लोग भी पढ़े-लिखें।’

उसके बाद पर्चा बांट रहे सज्जन ने सिपाही की ओर पर्चा बढ़ा बोलना शुरू किया ‘बेशक विनायक सेन के खिलाफ सरकार ने जो मुकदमा दर्ज किया है वह गलत है। मगर सिर्फ विनायक की बात कर बाकियों को भूल जाना पैर में कुल्हाड़ी मारना है। हो सकता है कल को सरकार विनायक को छोड़ दे,फिर क्या जुल्मतों पर बात बंद हो जायेगी।’-इतना बोल सज्जन ने सिपाही को पर्चा थमा दिया।

सिपाही-‘तो जी आप जे कह रहे हो कि विनायक सेन आंदोलनों के प्याज हो गये हैं। जैसे महंगायी के नाम पर मीडिया और सरकार ऐसे बात करते हैं मानों प्याज को छोड़ बाकी पर तो कोई महंगायी ही न हो।’

पर्चा वाले सज्जन, ‘बिल्कुल सही समझा आपने। हमलोग भी यही कह रहे हैं कि जिस तरह प्याज-प्याज चिल्लाकर सरकार बाकी चीजों की महंगायी चुपके से बढ़ाती जा रही है और हम हैं कि महंगायी के खिलाफ लड़ने के नाम पर सिर्फ प्याज के लिए आंसू बहाये जा रहे हैं। उसी तरह ज्यादातर बुद्धिजीवी और समर्थक विनायक माला का यों जाप कर रहे हैं,मानों बाकी सब छटुआ हों। परिणाम के तौर पर देखिये जबसे प्याज की कीमत थोड़ी कम हो गयी है तबसे मीडिया वाले महंगायी गायन में डायन शब्द का इस्तेमाल भूल रहे हैं,जबकि इसी महीने फिर से कई चीजों में महंगायी बढ़ी है। तो सोचिये विनायक मामले में भी तो यही होगा।’

बहस में नया मोड़ आते देख बुद्धिजीवी पर्चा बांटने वाले सज्जन की ओर मुखातिब हुए। पर सज्जन थे कि ‘विनायक सेन हुए प्याज’ कथा पर धारा प्रवाह बोले जा रहे थे। सिपाही यशवीर की निगाह बुद्धिजीवी से मिली तो उसने कहा, ‘ये देखिये आपके सरजी कुछ कह रहे हैं...’

बुद्धिजीवी- ‘हमलोगों में कोई सर या नौकर नहीं होता। हम सभी लोग कार्यकर्ता होते हैं।’

सिपाही- ‘ओह जी सॉरी। देख कर लगा था कि आप साहब हैं और ये आपके....’

‘कोई नहीं’- सिपाही से बुद्धिजीवी इतना बोल पर्चा वाले सज्जन की ओर मुखातिब हुए, ‘अरे आप माक्र्सवादी हैं या नहीं। प्रधान अंतरविरोध, मुख्य अंतरविरोध आदि का नाम सुना है या नहीं जो एक सिपाही से आंदोलन की रणनीति समझ रहे हैं। अगर माक्र्सवाद नहीं समझते तो भी इतना जान लीजिए कि कभी पूरी मछली का शिकार नहीं किया जाता है, टारगेट आंख पर किया जाता है।’

अभी बुद्धिजीवी इतना बोले ही थे कि मंच संबोधित करने के लिए उनकी बुलाहट हो गयी और वे वहां से मछली की आंख पर टारगेट करने लगे। उधर रामलीला मैदान से दोपहर में भ्रष्टाचार के खिलाफ चला जनयुद्ध जंतर मंतर तक पहुंच चुका था और वहां एक बुद्धिजीवी कह रहे थे कि ‘भ्रष्टाचार के खिलाफ जनयुद्ध की शुरूआत हो चुकी है।’

बेचारे ड्यूटी पर तैनात सिपाही यहां भी हंस रहे थे कि भ्रष्टाचार के विरोध वाले भी खूब उल्लू बना रहे हैं और लोग हैं कि जंगलों में चलाये जा रहे माओवादियों के जनयुद्ध को यहां चलाने की बात पर तालियां बजा रहे हैं।  उन्हीं सिपाहियों में एक ने कहा,‘फिर तो यह भी एक भ्रष्टाचार हुआ,भरमाने का भ्रष्टाचार।’


एक गाँव, एक महीना और पंद्रह मौतें


दुद्धी तहसील के  गांवों में हैण्डपम्प जबाब दे रहे है और कुएं सूख रहे है। पानी के अभाव किसानों की फसल पिछले चार वर्षो से बरबाद हो रही है और इससे पैदा हुई आर्थिक तंगी की वजह आदिवासी गेठी, कंदा खाने को मजबूर हैं... 

दिनकर कपूर

उत्तर प्रदेश के सोनभद्र जनपद में जहरीले पानी को पीने से लगातार मौतें हो रही है। विगत एक माह में म्योरपुर ब्लाक के बेलहत्थी ग्रामसभा के रजनी टोला में रिहन्द बांध के जहरीले पानी को पीने से पन्द्रह बच्चों की मौत हो गयी है। इसके पूर्व भी इसी ब्लाक के कमरीड़ाड,लभरी और गाढ़ा में दो दर्जन से ज्यादा बच्चे रिहन्द बांध का पानी पीने से मर चुके है।

इस सम्बंध में जन संघर्ष मोर्चा के पत्र को संज्ञान में लेकर राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग ने लेकर जिलाधिकारी सोनभद्र को निर्देषित भी किया था और उनसे रिर्पोट भी तलब की थी बावजूद इसके जिला प्रषासन का रवैया संवेदनहीन ही बना रहा है। यहां तक कि आंदोलन के दबाब में प्रदूषण बोर्ड और मुख्य चिकित्सा अधिकारी द्वारा करायी गयी जांच से यह प्रमाणित होने के बाद भी कि रिहन्द बांध का पानी जहरीता है, यूपी  सरकार और जिला प्रषासन द्वारा इसे जहरीला बनाने वाली औद्योगिक इकाईयों के विरूद्ध कोई कार्यवाही नही की गयी और न ही रिहंद बांध के आस पास बसे गांवों में शुद्ध पेयजल की व्यवस्था की गयी।

अगर समय रहते जिला अधिकारी सोनभद्र ने कार्यवाही की होती तो बेलहत्थी में बच्चों को मरने से बचाया जा सकता था। जनपद में विकास के लिए आ रहे धन की चौतरफा लूट हो रही है विकास के सारे दावे कोरी लफ्फाजी है। शुद्ध पेयजल देने में सरकार नाकाम रही है। आज भी लोग बरसाती नालों और बंधों का पानी पीने को मजबूर है और इससे विभिन्न बीमारियों का षिकार होकर बेमौत मर रहे है। अभी से ही इस पूरे क्षेत्र में पेयजल का संकट दिख रहा है।

१.रामधारी पुत्र बलजोर उम्र 1 वर्ष
2. रामकिशुन पुत्र वंश बहादुर उम्र 1 वर्ष
3. सुनीता कुमारी पुत्री छबिलाल उम्र 6 वर्ष
4. बबलू पुत्र शिवचरण  उम्र 1 वर्ष
5. मानकुवंर पुत्री ब्रजमोहन उम्र 8 वर्ष
6. सन्तोष कुमार पुत्र शंकर उम्र 1 वर्ष
7. सविता कुमारी पुत्री जीत सिंह खरवार उम्र 3 वर्ष
8. बबलू सिंह पुत्र जवाहिर सिह खरवार उम्र 2 वर्ष
9. चादंनी कुमारी पुत्री राजेन्द्र उम्र 3 वर्ष
10. मुनिया कुमारी पुत्री रामचरन उम्र 3 वर्ष
11. कुन्ती कुमारी पुत्री हिरालाल उम्र 2 वर्ष
12. लल्ला पुत्र देवनारायण उम्र 6 वर्ष
13. मुन्ना कुमार पुत्र सुभाष उम्र 2 वर्ष
14. जितराम पुत्र अशोक उम्र 2 वर्ष
15. बबिता कुमारी पुत्री रमाशंकर  उम्र 5 वर्ष

दुद्धी तहसील के तो गांवों में हैण्डपम्प जबाब दे रहे है और कुएं सूख रहे है। स्थिति इतनी बुरी है कि पानी के अभाव किसानों की फसल पिछले चार वर्षो से बरबाद हो रही है और इससे पैदा हुई आर्थिक तंगी की वजह से यहां के आदिवासी गेठी कंदा खाने को मजबूर है,जो की जहरीला है। यही नहीं इन बुरे हालतों में भी मनरेगा में काम कराकर मजदूरों की करोड़ो रूपया मजदूरी भुगतान नही किया गया। लम्बे संघर्षो से हासिल वनाधिकार कानून को जनपद में विफल कर दिया गया है।

आदिवासियों तक के उन अधिकारों को जिसे गांव की वनाधिकार समिति ने स्वीकृत कर दिया था उसे भी उपजिलाधिकारी ने खारिज कर दिया गया है। दूसरी तरफ जनपद में प्राकृतिक सम्पदा और राष्ट्रीय सम्पदा की चौतरफा लूट हो रही है। सोन नदी को बंधक बना लिया गया है और सेंचुरी  एरिया और वाइल्ड जोन में जहां तेज आवाज निकालना भी मना है वहां खुलेआम ब्लास्टिंग करायी जा रही है।

यहां की पहाडियों को लूटकर मायावती सरकार लखनऊ में पार्क और बादलपुर में महल बनाने में लगी हुई है। इस लूट के खिलाफ और आम नागरिकों की जिदंगी की रक्षा के के लिए जन संघर्ष मार्चा का आंदोलन जारी है।