Oct 20, 2010

कश्मीर की घाटी, दक्खन का पठार



हाल ही में जनज्वार पर प्रकाशित वरवर राव की कविता 'अपना नाम कल वियतनाम आज कश्मीर' के बाद अब   तेलगू से अनुदित उनकी कश्मीर पर  दूसरी कविता पढ़ें...


वरवर राव



घायल दिल ही देख पाता है जिसे

ऎसे गहरे दिलों की घाटी

सिर उठाए संघर्ष कर सकते हैं जो

उन जैसी दिलेर घाटी



स्वर्ग और नरक ने शायद झाँककर देखा भी हो

पर सूरज और चँदा के

अँधेरे उजालों की आँख मिचौली

आकाश कुसुम ही है वहाँ



देवदार वृक्षों की देह दृढ़ता

गुलमोहर फूलों की कोमलता

बर्फ-सा पिघलने वाला मन

नदियाँ-सी बहने वाली जीने की चाह



कश्मीर नींद से वंचित लोगों का है दिवास्वप्न

जागती संघर्षरत शक्तियों का है

अधूरा सपना



सिर से पैर तक आज़ादी की चाह लिए

पार कर लोहे के कंटीले बाड़

करके कर्फ्यू का सामना

सैनिकों के घेरे में बदन को ही हथियार-सा घुसाकर



गोली खाकर धराशाही होने वाले

चिड़ियों का झुँड बन जाते हैं

आँसुओं का बर्फ पिघलकर

बहता है लहू बनकर

भारत का मन मोहने वाला शासन

कर लेता है जब परमाणु अणुबंध अमेरिका से

आइनस्टीन का डर सच हो जाता है

वहाँ के लोगों के हाथ तो

पत्थर ही आए अपनी सुरक्षा के लिए



दूधमुँहें बच्चे, नौजवान, औरतें

बन गए आज़ादी की जीती जागती ज्वालाएँ

कश्मीर आज बना केसर के फूलों का गुलशन

सुलगने से रोम-रोम में आज़ादी

छितरने लगे हैं ख़ून के छींटे



सहानुभूति मत दिखाइए

उनमें से एक बन जुड़ जाइए उनके साथ



भारत में ही अलग होने की बात सुन

देशद्रोही कहने वाले फासिस्ट

भारत के कब्जे में फँसी जनता का

क्या हाल कर सकते हैं कल्पना कीजिए



पुलिस कर्रवाई के नाम पर

सेना से आक्रमण कराने वाला यूनियन

सात आदमी के लिए एक सैनिक के हिसाब से

दमन काण्ड कर रहा है कितने सालों से सोचिए



कश्मीर की घाटी और दक्खन के पठार का

दुश्मन तो है एक



वह दिल्ली में बैठा

अमेरिका के हाथों की कठपुतली

श्रीनगर गोल्फ में

और हैदराबाद के सचिवालय में

दलाल नियुक्त है उसके



मनुकोटा में हमसे फेंका गया पत्थर

कश्मीर में उनसे फेंका गया पत्थर

उसी दुश्मन को निशाना बनाए हुए हैं

उस पर आइए मिलकर हमला करें


अनुवादः आर. शान्ता सुन्दरी



(क्रांतिकारी कवि वरवर राव विप्लव रचयिता संघम के संस्थापक सदस्य  हैं .हथियारबंद जनसंघर्षों के पक्षधर होने की वजह से उन्हें अबतक छह वर्ष कारावास में गुजारने पड़े हैं. कारावास के अनुभव पर उनकी लिखी 'जेल डायरी' प्रकाशित हुई है.)


Oct 18, 2010

इस देश का असली मर्ज क्या है?


उद्योगों और विशाल कारोबारी घरानों के विकास के लिए जहां सरकार की एक दीर्घकालिक रणनीति है,वैसी ही रणनीति लोगों के विकास के लिए वह नहीं अपनाती। लोगों का विकास करने के क्रम में वह अल्पकालिक तरीके अपनाती है-गरीबी दूर करने के उपाय,जैसे कि यह अग्निशमन जैसा कोई काम हो।


कोबाड गांधी

एक देश किससे बनता है?मूलत: अपनी जमीन और अपने लोगों से मिल कर। जाहिर है, देश के विकास का अर्थ इन दो चीजों का विकास होना चाहिए। इन दो तत्वों का विकास नहीं होने या धीमा होने से देश पीछे चला जाता है। इन दो तत्वों में दूसरा,यानी लोग प्राथमिक हैं  लेकिन उनका विकास पर्यावरण की कीमत पर नहीं किया जा सकता। दोनों को समानांतर तरीके से,करीबी अंतरसंबंध कायम रखते हुए विकसित होना चाहिए, और ऐसा संभव है।

जब मैं लोगों की बात करता हूं,तो मेरा आशय देश के विशाल मानव संसाधन से होता है। हम कुछ लोगों के विकास की नहीं,बल्कि विशाल बहुसंख्य आबादी की कामना करते हैं क्योंकि यही वह तबका है जिससे मिल कर हमारा देश वास्तव में बनता है। उन्हीं का विकास भारत का विकास है।

जब मैं जमीन की बात करता हूं,तो सामान्य तौर पर देश के कुल प्राकृतिक संसाधनों से मेरा आशय होता है- जमीन, उसकी उर्वरता, जंगल, जल, जमीन के नीचे दबी संपदा, हवा, इत्यादि। इस तरह हम देखते हैं कि मानव संसाधन और प्राकृतिक संसाधन दोनों मिल कर हमारे देश का निर्माण करते हैं। हमारी यह समझ बहुत पुराने समय से रही है। यहां तक कि वेदों में भी यही बात कही गई थी (अथर्ववेद 12.1.6)। विकास के पर्याय के रूप में जीडीपी दर, उच्च प्रौद्योगिकीय ‘विकास’ इत्यादि को तो अब प्रचारित किया जाने लगा है।

जब मैं विकास की बात करता हूं,तो उसे महज आर्थिक संदर्भ में नहीं,बल्कि उसके आध्यात्मिक और सांस्कृतिक संदर्भों में भी देखता हूं। इसमें कोई दो राय नहीं कि मनुष्य को जीवन की बुनियादी सुविधाएं मिलनी ही चाहिए- भोजन,पानी, कपड़ा, आश्रय और शिक्षा- लेकिन ये चीजें एक संपूर्ण मनुष्य के रूप में उसके विकास की दिशा में सिर्फ प्रस्थान बिंदु हैं।

भोजन और पानी तो पशुओं को भी मिलतेहैं। लेकिन सभी मनुष्यों की  वैयक्तिकता  के उनके आध्यात्मिक, सांस्कृति और सामाजिक-राजनीतिक विकास के माध्यम से फलने-फूलने से ही हम देश के मानव संसाधनों कावास्तविक  विकास हासिल कर सकते हैं। आध्यात्मिकता से मेरा आशय धर्म नहीं है (हालांकि यह उसमें शामिल हो सकता है,यह निजी प्राथमिकताओं  पर निर्भर है) बल्कि उन मूल्यों का समुच्चय है जो परस्पर सम्मान और समझ के आधार पर लोगों के बीच सर्वश्रेष्ठ सहकारितापूर्ण संवाद की स्थिति बनने दे।

उद्योगों और विशाल कारोबारी घरानों के विकास के लिए जहां सरकार की एक दीर्घकालिक रणनीति है,वैसी ही रणनीति लोगों के विकास के लिए वह नहीं अपनाती। लोगों का विकास करने के क्रम में वह अल्पकालिक तरीके अपनाती है-गरीबी दूर करने के उपाय,जैसे कि यह अग्निशमन जैसा कोई काम हो। नीति में यह बदलाव चौथी योजना के बाद आया है और ग्रामीण विकास जैसे मदों के लिए आवंटित की जाने वाली राशि तेजी से घटती गई है।


हालांकि सरकार गरीबी खत्म करने के  उपायों पर भारी राशि खर्च करती है,लेकिन इससे कुछ भी टिकाऊ या ठोस पैदा नहीं होता। हजारों करोड़ इस ब्लैकहोल में चले जाते हैं और मामूली हिस्सा ही लोगों तक पहुंच पाता है। यहां मैं भ्रष्टाचार की तो बात ही नहीं कर रहा-वह दूसरा मसला है। मैं लोगों के कल्याण को लेकर अपनाए जाने वाले नजरिए की बात कर रहा हूं। क्या हमें लोगों को साल भर छिटपुट लाभ ही देते रहना चाहिए या फिर उनके लिए एक आधार भी तैयार करना चाहिए जिस पर खड़े होकर वे अपनी आजीविका कमा सकें और देश के लिए कुछ ठोस निर्मित कर सकें? असल मसला यही है।

दूसरा मसला भ्रष्टाचार का है,जो इन पोली योजनाओं को संक्रमित कर देता है। उदाहरण के लिए बहुप्रचारित नरेगा को ही लें जिसके लिए मौजूदा वर्ष के बजट में 40,000करोड़ दिए गए हैं। मणिशंकर अय्यर के मुताबिक त्रिपुरा में नरेगा के तहत कुल योग्य परिवारों में सिर्फ 36.6फीसदी परिवार ही जोड़े गए।

उत्तर प्रदेश और मध्यप्रदेश में यह आंकड़ा 14फीसदी है। छत्तीसगढ़,झारखंड और बिहार में यह सिर्फ आठ फीसदी है जबकि उड़ीसा और उत्तराखंड में छह फीसदी से भी कम परिवार इसके दायरे में लाए गए। तो फिर सारा पैसा गया  कहां? विडंबना है कि योजना आयोग ने 2004 में खुद यह स्वीकार किया था कि सब्सिडीयुक्त 58 फीसदी खाद्यान्न बीपीएल परिवारों तक नहीं पहुंच पाया और 36 फीसदी की कालाबाजारी हुई।

दूसरी ओर हमारी विकास नीतियों ने ऐसे अमीरों को जन्म दिया है जिनमें शीर्ष सौ की संपत्ति 300अरब या भारत के जीडीपी का 25फीसदी है। भारत में अरबपतियों के बढऩे की दर दुनिया में सबसे ज्यादा रही है। 2009 में 3134 एक्जीक्यूटिव थे जो 50लाख सालाना से ज्यादा कमाते थे और हजार ऐसे थे जो सालाना एक करोड़ से ज्यादा वेतन पाते थे। इसमें काली कमाई शामिल नहीं है,जो जीडीपी के 40 से 50 फीसदी के बीच है। यह 25लाख करोड़ की भारी-भरकम राशि बड़े कारोबारी घरानों,नेताओं और अफसरों में बंट जाती है। इसके कुछ टुकड़े उन लाखों लोगों तक रिस कर नीचे पहुंचते हैं जो हमारे समाज के  समूचे नैतिक ताने-बाने को भ्रष्ट बना रहे हैं।

कहने का अर्थ यह है कि इस देश में जो थोड़ा-बहुत भी विकास हो रहा है,समाज के एक सूक्ष्म से हिस्से का ही ग्रास बन जा रहा है और इससे देश के निर्माण में कोई खास योगदान नहीं हो पा रहा है। असल समस्या इस देश की यही है, जिसका उपचार किए जाने की जरूरत है।

दैनिक भास्कर से साभार.


(नई दिल्ली में १८-१९ अक्टूबर को  आयोजित विकास विषयक दो दिवसीय सम्मलेन में पाठ के लिए तिहाड़ जेल से लेखक द्वारा भेजे गए पर्चे का संपादित अंश. लेखक प्रतिबंधित पार्टी सीपीआइ (माओवादी) के पोलित ब्यूरो सदस्य हैं. उन्हें दिल्ली पुलिस ने गिरफ्तार कर आतंकवाद निरोधक गतिविधि निवारक कानून (यूएपीए) के तहत आरोपित किया है.)


Justice for मां


यशवंत सिंह

गाजीपुर के एसएसपी को चिट्ठी

गाजीपुर के वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक एल. रवि कुमार (फाइल फोटो)



Date: 2010/10/18, Subject: तीन महिलाओं को 12 घंटे तक थाने में बंधक बनाए रखने के मामले में दोषी पुलिस अधिकारियों के खिलाफ मुकदमा दर्ज कराने हेतु, To: spgzr@up.nic.in , Cc: dgp@up.nic.in  dgpolice@sify.com  adglo@up.nic.in , श्रीमान एल. रवि कुमार जी, वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक, गाजीपुर, उत्तर प्रदेश,मैं यशवंत सिंह आपसे मुखातिब हूं.दिल्ली में एक वेब मीडिया कंपनी में कार्यरत हूं.इस कंपनी के पोर्टल का नाम http://www.bhadas4media.com/  है.

इस मीडिया पोर्टल में मीडिया के अंदर के स्याह-सफेद को उदघाटित किया जाता है.मैं इस पोर्टल में सीईओ & एडिटर के पद पर कार्यरत हूं.इससे पहले मैं दैनिक जागरण और अमर उजाला में करीब छह छह वर्षों तक वाराणसी, आगरा, मेरठ, कानपुर, लखनऊ आदि शहरों में छोटे-बड़े पदों पर कार्यरत रहा. जागरण ग्रुप के सेकेंड ब्रांड आई-नेक्स्ट का लांचिंग एडिटोरियल इंचार्ज रहा. मैं एक शिकायत दर्ज कराना चाहता हूं जो मेरे लिहाज से बहुत गंभीर प्रकरण है, मेरे मन-मस्तिष्क को झिंझोड़ देने वाला घटनाक्रम है.

पिछले दिनों मुझे गाजीपुर जिले के नंदगंज थाने के अलीपुर बनगांवा गांव से सूचना मिली की आपके व पुलिस के अन्य उच्चाधिकारियों के निर्देश पर स्थानीय थाने की पुलिस ने मेरी मां यमुना सिंह,मेरी चाची रीता सिंह और मेरे चचेरे भाई की पत्नी सीमा सिंह को घर से जबरन उठा लिया.रात भर पुरुष थाने में बंधक बनाए रखा.दोपहर बाद तभी घर जाने दिया गया जब एक केस में नामजद मेरे चचेरे भाई ने थाने आकर सरेंडर कर दिया.

महिलाओं के सम्मान की बात माननीय मुख्यमंत्री मायावती जी भी करती हैं.इन दिनों एक महिला ही देश की राष्ट्रपति हैं.सुपर पावर सोनिया गांधी के इशारे पर केंद्र सरकार चल रही .और,मेरे खयाल से आप भी महिलाओं से संबंधित कानून को अच्छी तरह जानते हैं. बावजूद इसके, इन तीन महिलाओं को थाने में शाम से लेकर अगले दिन दोपहर तक बिठाये रखना न केवल शर्मनाक है बल्कि यूपी पुलिस की कार्यप्रणाली पर धब्बा है.

मां व अन्य महिलाओं को थाने में बिठाए जाने की सूचना मिलते ही मैंने स्थानीय मीडियाकर्मियों से अनुरोध कर थाने में बैठी महिलाओं की तस्वीरें खिंचवाईं व वीडियो बनवाई. यह सब बंधक बनाए जाने के घटनाक्रम के सुबूत हैं. कुछ तस्वीरों व वीडियो को प्रमाण के रूप में यहां सलग्न कर रहा हूं.इस प्रकरण से संबंधित सूचनाएं,आलेख व खबरें http://www.bhadas4media.com/  पर प्रकाशित की गई हैं. आपसे अनुरोध है कि इन खबरों, प्रमाणों, तस्वीरों, वीडियो आदि के आधार पर मामले की जांच कराकर उन दोषी पुलिस अधिकारियों का पता लगवाएं जिनके निर्देश पर मेरी मां समेत चार महिलाओं को बंधक बनाकर थाने में रखा गया.



यही नहीं, अगले दिन स्पेशल आपरेशन ग्रुप (एसओजी) के लोगों ने बिना किसी नोटिस, चेतावनी और आग्रह के सादी वर्दी में सीधे मेरे गांव के पैतृक घर में घुसकर छोटे भाई के बेडरूम तक में चले गए और वहां से छोटे भाई की पत्नी से छीनाझपटी कर मोबाइल व अन्य सामान छीनने की कोशिश की. छोटे भाई व अन्य कई निर्दोष युवकों को थाने में देर रात तक रखा गया.इस मामले का सिर्फ इसलिए यहां उल्लेख कर रहा हूं कि मेरे परिवार के सभी सदस्यों को पुलिस से जानमाल का खतरा उत्पन्न हो गया है और जिस तरह की हरकत स्थानीय अधिकारी व पुलिस के लोग कर रहे हैं,उससे लग रहा है कि उनका लोकतंत्र व मानवीय मूल्यों में कोई भरोसा नहीं है.वे एक अराजक माफिया गिरोह की तरह संचालित हो रहे हैं और इसी अंदाज में आम जन से संबोधित-मुखातिब हो रहे हैं.

मैं इस शिकायती पत्र की प्रतिलिपित यूपी के डीजीपी समेत पुलिस के कई उच्चाधिकारियों को इसलिए प्रेषित कर रहा हूं,साथ ही मानवाधिकार आयोग और महिला आयोग को भेज रहा हूं ताकि मेरे व मेरे परिवार के किसी भी सदस्य पर किसी किस्म का कोई प्रहार,हमला या गिरफ्तारी या गुमशुदगी हुई तो इसके लिए एकमात्र जिम्मेदार यूपी पुलिस होगी.

मुझे यह पत्र आपको, अर्थात गाजीपुर के पुलिस अधीक्षक रवि कुमार लोकू को लिखते हुए भी यह भय है कि कहीं मैं उसी से फरियाद तो नहीं कर रहा जिस पर पूरे साजिश का सूत्रधार होने का शक है. हालांकि आपके उर्फ रवि कुमार लोकू के बारे में मैंने जो जानकारियां इकट्ठी की हैं,उससे पता चलता है कि आप ईमानदार अफसरों में से माने जाते हैं और समाज व आम जन के प्रति काफी संवेदनशील हैं लेकिन जिस तरह की हरकत आपने व आपकी पुलिस ने की है, उससे मेरा आपके उपर अब दूर दूर तक भरोसा नहीं है.

लेकिन आप से मैं फरियाद इसलिए कर रहा हूं कि आप गाजीपुर जिले की जनता की जान-माल की हिफाजत के लिए जिम्मेदार पुलिस अधीक्षक की कुर्सी पर बिठाए गए हैं,सो मुंशी प्रेमचंद की 'पंच परमेश्वर'वाली कहानी पर भरोसा करते हुए ये शिकायती पत्र जांच कराने हेतु व दोषियों के खिलाफ मुकदमा लिखाने हेतु आपको प्रेषित कर रहा हूं.थाने के अंदर बंधक बनाई गई महिलाओं की तस्वीरें इस मेल के साथ अटैच हैं.वीडियो यूट्यूब पर अपलोड है जिसे देखने के लिए निम्न लिंक पर क्लिक कर सकते हैं. या फिर लिंक के ठीक नीचे दिए गए वीडियो को प्ले कर देख सुन सकते हैं.

मामले की  विस्तृत जानकारी के लिए www.bhadhas4media.com  के इस लिंक को   http://bhadas4media.com/dukh-dard/6986-justice-for-mother-part1.html    देखें.  

Oct 15, 2010

नहीं देंगे दलितों को आरक्षण

 
एनजीओ सामाजिक जिम्मेदारियों का कितना निर्वहन कर रहे हैं यह जगजाहिर है। ऐसे में इन औद्योगिक समूहों का लचर तर्क,टालू रवैया और खैरात बांटने का प्रस्ताव उनके मुनाफे की हवस एवं सामाजिक जिम्मेदारियों के प्रति घोर संवेदनहीनता को ही उजागर करता है।

अंजनी कुमार

कई बार महत्वपूर्ण मुद्दे शोर में गुम हो जाते हैं। यह संयोग है या फिर जान-बूझकर, मगर एक बार फिर सामाजिक न्याय के मसले को राष्ट्रमंडल खेलों के शोरशराबे के बीच से चुपचाप गुजार दिया गया। देश के कारपोरेट जगत के तीन बड़े संगठनों फिक्की,एसोचेम और सीआईआई ने निजी क्षेत्र में अनुसूचित जाति-जनजाति के लिए उद्यम के चंद क्षेत्रों में महज 5प्रतिशत आरक्षण लागू करने से मना कर दिया।

दो सप्ताह पहले आयी इस खबर को ज्यादातर अखबारों ने या तो बहुत कम स्थान दिया या फिर तवज्जो ही नहीं दी। लेकिन इससे मुद्दे की प्रासंगिकता पर फर्क नहीं पडे़गा कि यह धार्मिक आस्था,पहचान से अधिक जीविका,जीवन और सामाजिक भागीदारी से जुड़ा बुनियादी प्रश्न है। लगभग सालभर पहले प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने औद्योगिक समूहों के समक्ष भाषण में सामाजिक जिम्मेदारी निभाने,वेतनमान की स्थिति को दुरुस्त करने के साथ-साथ अनुसूचित जाति-जनजाति के लिए न्यूनतम स्तर पर आरक्षण लागू करने का आग्रह किया था। उस समय इन सारे मसलों को लेकर कारपोरेट जगत ने काफी हो-हल्ला मचाया था। प्रधानमंत्री ने यह प्रस्ताव सामाजिक न्याय मंत्री मुकुल वासनिक की मई महीने में दी गयी एक रिपोर्ट और सलाह पर पेश किया था।

प्रधानमंत्री ऑफिस के सचिव ने भारतीय औद्योगिक नीति एवं प्रोत्साहन विभाग ने आरक्षण के इस प्रस्ताव को आगे बढ़ाया। उपरोक्त विभाग उद्योग और व्यापार मंत्रालय के तहत काम करता है। उद्योग मंत्री आनंद शर्मा ने 2 अगस्त को इसके लिए औपचारिक पत्र कारपोरेट जगत को भेजा कि वे इस मुद्दे पर अपनी राय शीघ्र भेजें। इस केन्द्रीय स्तर के प्रयास में इन औद्योगिक समूहों से आग्रह किया गया कि यदि वे सरकारी प्रोत्साहन से लाभान्वित हो रहे हैं तो वे सरकार की सामाजिक जिम्मदारियों का भी निर्वहन करें।

इसके जबाब में उसी समय नाम न छापने की शर्त पर कारपोरेट जगत के तीन संगठनों के अधिकारियों ने यह कहा कि वे इस तरह के कदम नहीं उठा सकते और दावा किया कि कारपोरेट जगत के ये धुरधंर देश के एक दो जिलों में विकास कार्य में हिस्सेदारी कर रहे हैं। इसलिए वे मेधा के स्तर को नीचे नहीं गिराना चाहते और आरक्षण देकर किसी भी तरह का खामियाजा भुगतना नहीं चाहते।

औद्योगिक समूहों ने आरक्षण देने की जगह समाज के दमित तबकों को ‘योग्य’बनाने के लिए आर्थिक और शैक्षणिक सहयोग करने का प्रस्ताव दिया। टाटा,रिलायंस,अजीम प्रेमजी जैसे कई ग्रुप सामाजिक भागीदारी के नाम पर एनजीओ के सहयोग से इस दिशा में काम कर रहे हैं। रिपोर्ट के मुताबिक उनके इस कार्यक्रम से लक्षित समूह को फायदा हो या न हो इन कंपनियों को सस्ता श्रम तथा बाजार जरूर उपलब्ध हो जाता है। सामाजिक भागीदारी में इनकी व्यय राशि से इन्हें एक तरफ सामाजिक समर्थन हासिल हो जाता है,वहीं इस राशि का एक बड़ा हिस्सा एनजीओकर्मी और संचालक डकार जाते हैं।

कुकुरमुत्तों की तरह उगे एनजीओ इन सामाजिक जिम्मेदारियों का कितना निर्वहन कर रहे हैं और खुद कितना डकार जाते हैं, यह अब जगजाहिर हो चुका है। ऐसे में इन औद्योगिक समूहों का लचर तर्क, टालू रवैया और खैरात बांटने का प्रस्ताव उनके मुनाफे की हवस एवं सामाजिक जिम्मेदारियों के प्रति घोर संवेदनहीनता को ही उजागर करता है। आरक्षण के मुद्दे पर खुद सरकार की ही नीति साफ नहीं होने के चलते न तो लक्षित समूह इससे ठीक से लाभान्वित हो पाया और न ही इसका प्रभावी प्रयोग हो पाने की स्थिति दिख रही है।


रद्द करें कारपोरेट जगत का आरक्षण
  • कारपोरेट जगत को न केवल सरकारी आरक्षण,बल्कि भरपूर सरकारी सहयोग की जरूरत पड़ रही है।
  • कारपोरेट जगतविभिन्न तरह की छूट हासिल कर वर्तमान योजना के तहत 5लाख करोड़ की देनदारी से मुक्त हुआ है।
  • मुनाफा एवं निवेश टैक्स में छूट से इन्हें प्रतिवर्ष 80000 करोड़ रूपए का फायदा होता है।


शैक्षिक नीति को जिस तरह ढाला जा रहा है उससे दमित तबका तो दूर,एक आम परिवार से ‘योग्यता’ हासिल युवा शायद ही कुछ बन पाये। नरेगा जैसी योजनाओं में इस तरह के आरक्षण का अभाव यह बताता है कि सरकार किस तरह इस मुद्दे पर सोच रही है।

दिल्ली विश्वविद्यालय गवाह है कि वहां आज तक कोई भी दलित शिक्षक विभागाध्यक्ष नहीं बन सका। प्रोफेसर का तमगा भी उन्हें हासिल नहीं हो सका। दिल्ली विश्वविद्यालय में कुल 10000 शिक्षक कार्यरत हैं। आरक्षण के तहत कुल 2250 शिक्षक एससी एसटी के होने चाहिए, लेकिन यह संख्या 650 है। पिछडा़ वर्ग के 2700 पदों पर कुल 100 भर्ती हो पाये। आज सरकारी कार्यालयों में 74008 बैकलॉग रिक्तियां हैं, जबकि रोजगार कार्यालय में 2004 तक 40457.7 एससी एसटी समुदाय से आने वाले लोग रोजगार की लाइन में खड़े भी थे। तीस अगस्त को पी.चिदम्बरम ने पिछली सरकार (यूपीए-1) के दौरान के 5400 बैकलाग को तुरंत भरने के लिए कड़े कदम उठाने की घोषणा की।



दलित आदिवासी समुदाय के खिलाफ अपराध की घटनाओं में तेजी से वृद्धि हो रही है,जबकि सामाजिक क्षेत्र में हिस्सेदारी लगातार गिर रही है। चिदम्बरम की चिंता दलित और आदिवासी समुदाय के प्रति कितनी है,यह उनकी नीतियों में तो साफ नजर आता ही है,साथ ही कारपोरेट जगत के प्रति उनकी चुप्पी में भी साफ-साफ दिखायी देता है। कारपोरेट जगत के इस अगुआ से सामाजिक न्याय की उम्मीद करना कुछ वैसा ही होगा,जैसा पूंजीपति से मुनाफा छोड़ देने और मजदूरों का पक्षपात करने की आशा पालना।

आज जिन क्षेत्रों में लागू हो पाया वे ऐसे क्षेत्र सदियों से उनके पारंपरिक कार्य व्यवहार से जुड़े हुए हैं। सीवेज और चमड़ाकर्म,खेत मजदूरी इत्यादि इसी श्रेणी में आते हैं। इसमें सरकारी नीति प्रभावी रही है या पारंपरिक कार्यव्यापार,इसकी समीक्षा जरूर करनी चाहिए। दरअसल,उपरोक्त कर्म भारतीय समाज की सामंती व्यवस्था का ही विस्तार रहा है। अन्यथा यह कैसे संभव है कि प्रशासनिक, शैक्षिक, न्यायिक क्षेत्र में दलित समाज की भागीदारी न्यूनतम है या फिर नहीं है और इसकी शुचिता बचाये रखने के नाम पर समय-समय पर साफ सफाई चलती रहती है,योग्यता के नाम पर निष्कासन चलता रहता है।
 

औद्योगिक समूह जिस समय सामाजिक जिम्मेदारियों से मुकर जाने के लिए ‘योग्यता’और ‘उत्पादकता’का तर्क पेश कर रहे होते हैं,ठीक उसी समय यही अयोग्य और कम उत्पादक असंगठित मजदूर उनके मुनाफे का अधिकांश उत्पादित कर रहे होते हैं। आज देश में असंगठित मजदूरों का प्रतिशत 98 प्रतिशत पहुंच चुका है। उदाहरण के तौर पर यदि कॉमनवेल्थ खेल को ही लें, तो वहां सरकार ने निजी कंपनियों की मार्फत आये लगभग चार लाख मजदूूरों के बदौलत काम पूरा किया। ये सारे मजदूर दिहाड़ी पर काम कर रहे थे और अधिकांश दलित थे। करीब 80 हजार करोड़ के इस प्रोजेक्ट में लूट, भ्रष्टाचार पर ऊपरी तबके का संगठित आरक्षण था।

आज पूरा रियल स्टेट,कपड़ा और चमड़ा उद्योग, हीरे तथा आभूषण का उद्योग इत्यादि इन्हीं असंगठित मजदूरों पर टिका हुआ है। अकूत मुनाफा कमाने वाले ये व्यापारी और उद्योगपति एक बार भी इन मजदूरों का शोषण करते हुए उनकी योग्यता पर सवाल खड़ा नहीं करते, बल्कि उनकी पीठ पर और मजबूती से बैठ जाते हैं। उनके सस्ते श्रम की बदौलत ही अंतरराष्ट्रीय बाजार में वे निर्यात की कूबत पैदा कर रहे होते हैं। यही वह समुदाय है जिसके जल, जंगल, जमीन को औने-पौने दामों पर हड़पकर कच्चा माल बेचने और विदेशी निवेश आकर्षित कर पाने में उद्योगपति-व्यापारी सफल हो रहे हैं।
 
 हम एक बार यह मान भी लें कि दलित समुदाय अयोग्य है, तब उनके मुनाफे की व्याख्या कैसे हो पाएगी? और तब क्या यह सवाल नहीं बनता है कि विश्व बाजार में इन्हें टिके रहने के लिए सरकारी सहयोग की जरूरत क्यों पड़ रही है?हर साल डेढ़ लाख करोड़ के सरकारी सहयोग और विभिन्न तरह की संरक्षण हासिल करने बावजूद इनकी गाड़ी हमेशा खतरे के रास्ते की ओर ही जा रही है और इससे देश को व्यापक घाटा हो रहा है। तब सवाल यह उठता है कि इनके वित्त और अन्य संरक्षण को छीन लेना चाहिए और इन योग्य लोगों को बाजार की खुली प्रतियोगिता में वैसे ही छोड़ देना चाहिए जैसा वे दूसरों के संदर्भ में तर्क दे रहे हैं।

पूंजी,बाजार,मुनाफा और रोजगार तथा मानवीय जीवन एक सामाजिक प्रक्रिया और राजनीतिक-सांस्कृतिक निर्णय होता है। उसी तरह सामाजिक अंर्तक्रियाएं भी इसका अभिन्न हिस्सा होती हैं। यदि औद्योगिक समूह सस्ते श्रम और मुनाफे के लिए आमजन,मजदूर-किसान एवं आदिवासी पर निर्भर हैं, तो यह निर्भरता एकतरफा होने के तर्क पर नहीं टिक सकती कि यह सामाजिक न्याय के मौलिक नियमों के खिलाफ है।



लेखक राजनितिक कार्यकर्त्ता और स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं. उनसे anjani.dost@yahoo.co.in पर संपर्क किया जा सकता है.

हर मस्जिद की खिडकी जब मंदिर में खुलती


कांधला में जामा मस्जिद और लक्ष्मी नारायण मंदिर जमीन के एक ही टुकड़े पर खड़े होकर 'धर्म के कारोबारियों' को आईना दिखा रहे हैं। मौलाना महमूद बख्श कंधेलवी ने जमीन का एक टुकडा हिंदुओं को सौंप दिया था ,जहाँ आज मंदिर में आरती होती है और मस्जिद से आजान की आवाज बुलंद होती है...

 
सत्यजीत चौधरी

बाबरी मस्जिद का विवादित ढांचा जब 6 दिसंबर 1992 को ढहाया गया, तब मैं जवान हो रहा था। बारहवीं में था। पिताजी उन दिनों बुलंदशहर में बतौर अध्यापक तैनात थे। हम सब उनके साथ ही रह रहे थे। दंगे भडक चुके थे। हमने छत पर चढïकर दूर मकानों से उठती लपटों की आंच महसूस की थी। मौत के खौफ से बिलबिलाते लोगों की चीखें सुनी थीं। हैवानियत का नंगा नाच देखा था।

'जयश्री राम' और 'अल्लाह ओ अकबर' के नारों में भले ही ईश्वर और अल्लाह का नाम हो, लेकिन तब उन्हें सुनकर रीढ़  में बर्फ-सी जम जाती थी। पूरा देश जल रहा था। अखबार और रेडियो पर देशभर से आ रही खबरें बेचैन किए रहतीं। हमारे हलक से निवाले नहीं उतरते थे। तभी से 'छह दिसंबर' मेरे दिमाग के किसी गोशे में नाग की तरह कुंडली मारकर बैठ गया था। कमबख्त तबसे शायद हाईबरनेशन में पड़ गया  था।

कांधला में अमन की मिसाल: मंदिर-मस्जिद एक साथ
इतने वर्षों  बाद जब राम जन्मभूमि-बाबरी मस्जिद विवाद पर इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ खंडपीठ का फैसला सुनाने का ऐलान हुआ तो नाग कुलबुलाकर जाग गया। पिछले एक महीने से नाग और राज्य सरकार की तैयारियों ने बेचैन किए रखा। अयोध्या फैसले को लेकर उत्तर प्रदेश के एडीजी (लॉ एंड आर्डर) बृजलाल के प्रदेशभर में हुए तूफानी दौरों ने और संशय में डाल दिया।

 इसके बाद शुरू हुआ 'संयम की सीख का हमला। प्रदेश सरकारों से लेकर केंद्र सरकार,और संघ-भाजपा से लेकर मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड,दारुल उलूम तक फैसले का सम्मान करने की घुट्टी पिलाते मिले। फिर मामला सुप्रीम कोर्ट में चला गया तो कुछ सुकून मिला, लेकिन चार दिन बाद ही जब सर्वोच्च अदालत ने मामला फिर हाईकोर्ट को लौटा दिया तो वही बेचैनी हावी हो गई।

मुजफ्फरनगर गर्भनाल की तरह मुझसे जुड़ा है। मम्मी-पापा और बच्चे वहीं रहते हैं। 'फैसले की घड़ी'जैसे-जैसे नजदीक आती गई, जान सूखती चली गई। मैं दिल्ली में, बच्चे और मां-पिताजी वहां। मुजफ्फरनगर के कुछ मुस्लिम दोस्तों की टोह ली। वे भी हलकान मिले। हिंदुओं को टटोला, वहां भी बेचैनी का आलम। बस एक सवाल सबको मथे जा रहा था कि 'तीस सितंबर'को क्या होगा। कुछ और लोगों से बात हुई तो पता चला कि पुलिस वाले गांव-गांव जाकर उन लोगों के बारे में जानकारियां इकट्ठा कर रहे हैं, जिनकी छह दिसंबर, 1992 के घटनाक्रम के बाद भड़के दंगों में भूमिका थी या जो इस बार भी शरारत कर सकते थे। इस दौरान एक-दो बार मुजफ्फरनगर के चक्कर भी लगा आया। लोग बेहद डरे-सहमे मिले। उन्हें लग रहा था कि तीस तारीख को फैसला आते ही न जाने क्या हो जाएगा।

सबको एक ही फिक्र खाए जा रही थी कि 'छह दिसंबर'न दोहरा दिया जाए। लोगों को लग रहा था कि शैतान का कुनबा फिर सड़कों पर निकल आएगा। पथराव होगा,आगजनी अंजाम दी जाएगी, अस्मत लुटेगी,खून बहेगा। खैर 'तीस सितंबर' भी आ गया । उस दिन मैं गाजियाबाद स्थित 'एक कदम आगे'के कार्यालय में बैठा था। देश के लाखों लोगों की तरह मैं भी टीवी से चिपका था। खंडपीठ के निर्णय सुनाने के कुछ ही देर बाद हिंदू संगठनों के वकील और उनके कथित प्रतिनिधि न्यूज चैनलों पर नमूदार हो गए। 

जजों ने  फैसले की व्याख्या जिस अंदाज में शुरू की, उसने सभी को डराकर रख दिया। कई चैनल ऐसे भी थे,जिन्होंने समझदारी से काम लिया और फैसले की प्रमुख बातों को समझने के बाद ही मुंह खोला।। बहरकैफ,इस दौरान मैं लगातार मुजफ्फरनगर के लोगों के संपर्क में रहा। इस बीच, खबर आई की मुजफ्फरनगर जिले की हवाई निगरानी भी हो रही है। सुरक्षा प्रबंधों से साफ हो गया था कि शासन ने मुजफ्फरनगर जनपद को संवेदनशील जिलों में शायद सबसे ऊपर रखा था। राज्य सरकार कोई रिस्क नहीं लेना चाह रही थी।

ढहाए जाने से पहले बाबरी मस्जिद
 मैं घबराकर इंटरनेट की तरफ लपका। मेरी हैरत की इंतहा नहीं रही,जब मैंने  पाया कि ट्वीटर,फेसबुक और जीटॉक के अलावा ब्लाग्स पर 'जेनरेशन नेक्स्ट' अपना वर्डिक्ट दे रही थी, अमन, एकजुटता और भाईचारे का 'फैसला'। एक भी ऐसा मैसेज नहीं मिला जो नफरत की बात कर रहा हो। पहले तो यकीन नहीं हुआ,फिर इस एहसास से सीना फूल गया कि देश का भविष्य उन हाथों में है, जो हिंदू या मुसलमान नहीं, बल्कि इंसान हैं। कह सकते हैं कि भविष्य का भारत महफूज हाथों में हैं। कई युवाओं ने फैसले पर ट्वीट किया था-'न कोई जीता,न कोई हारा। आपने नफरत फैलाई नहीं कि आप बाहर।'

कहीं पढ़ा था कि पुणे में घोरपड़ी गांव है,जहां मस्जिद की खिड़की हिंदू मंदिर में खुलती है। अहले-सुन्नत जमात मस्जिद और काशी विशेश्वर मंदिर को अगर जुदा करती है,तो बस ईंट-गारे की बनी एक दीवार। एक और रोचक तथ्य इस दोनों पूजास्थलों के बारे में यह है कि जब बाबरी विध्वंस के बाद पूरे देश में दंगे भड़क रहे थे,पुणे में दोनों समुदाय के लोगों ने मिलकर मंदिर का निर्माण कर रहे थे। निर्माण के लिए पानी मस्जिद से लिया जाता था। याद आया कि ऐसी ही शानदार नजीर हम मुजफ्फरनगर वाले काफी पहले पेश कर चुके हैं।

कांधला में जामा मस्जिद और लक्ष्मी नारायण मंदिर जमीन के एक ही टुकड़े पर खड़े होकर 'धर्म के कारोबारियों' को आईना दिखा रहे हैं। माना जाता है कि मस्जिद 1391 में बनी थी। ब्रिटिश शासनकाल में मस्जिद के बगल में खाली पड़ी जमीन को लेकर विवाद हो गया। हिंदुओं का कहना था कि उस स्थान पर मंदिर था। मामला किसी अदालत में नहीं गया। दोनों फिरकों के लोगों ने बैठकर विवाद का निपटारा कर दिया।

तब मस्जिद के इंचार्ज मौलाना महमूद बख्श कंधेलवी ने जमीन का वह टुकडा हिंदुओं को सौंप दिया। वहां आज लक्ष्मी नारारण मंदिर शान से खड़ा है। मंदिर में आरती होती है और मस्जिद से आजान की आवाज बुलंद होती है। सह-अस्तित्व की इससे बेहतर मिसाल और क्या होगी। यह है हिंदुस्तान और हिंदुस्तानियत की मिसाल।


लेखक  पश्चिमी उत्तर प्रदेश से निकलने वाले हिंदी पाक्षिक  अखबार 'एक कदम आगे'के संपादक हैं और सामाजिक मसलों पर लिखते हैं.  उनसे satyajeetchaudhary@gmail.com पर संपर्क किया जा सकता है.



Oct 14, 2010

दिल्ली में तितलियाँ



घरों के आसपास, राह चलते, लोगों से मिलते या काम पर जाते कहीं नहीं दिखती हैं तितलियां। कोई कहता है हमने बपचन में देखी थीं, किसी को हनीमून यात्रा में मिली थीं, ट्रेन से गुजरते वक्त कैमरे में कैद हुई थीं और जो बची हैं वह महानगरों की इंसानी भीड़ में कहीं गुम हो गयी हैं.  महानगरीय प्राकृतिक छटा को बचाने में हर वर्ष करोड़ों खरच रही सरकार अगले कुछ वर्षों में तितलियों को भी बचा पाने में असमर्थ हो, उससे पहले देखें दिल्ली में तितलियां।

मन मोहने वाली इस खूबसूरती को अपने कैमरे में कैद किया है फोटोग्राफर आरबी यादव ने...






Oct 13, 2010

अरुण पूरी का इंस्पिरेशन कहिये, चोरी नहीं !


देश के बड़े मीडिया घरानों में से एक टीवी टुडे  ग्रुप(आजतक,तेज़,हेडलाइंस टुडे,मेल टुडेऔर सभी भाषाओं में निकलने वाले इण्डिया टुडे) आदि के समूह अध्यक्ष अरुण पूरी ने इण्डिया टुडे के दक्षिण भारत संस्करण के लिए फिल्म स्टार रजनीकांत पर केन्द्रित चोरी का सम्पादकीय लिखा है.फ़िल्मी दुनिया के चोर क्षमताशीलों से शब्द उधार ले कहें तो उन्हें यह 'इंस्पिरेशन'स्लेट नाम की अंग्रेजी वेबसाइट में छपी 'ग्रैडी हैंड्रिक्स'की खबर से मिला है,जिसके दो पाराग्राफ़ में तो एक हर्फ़ भी इण्डिया टुडे (दक्षिण भारत संस्करण,१८ अक्तूबर २०१०) में बदला नहीं है.


अरुण पूरी : अब जवाब दीजिये
यह सूचना हम सब युवा पत्रकारों-लेखकों के लिए आश्चर्यजनक है और आदर्शों के गहरे गिरते जाने का नया नमूना भी.अबतक ख़बरों को चुराए जाने की ख़बरें तो पत्रकारों के बीच रहा करती थीं मगर सम्पादकीय भी चुरानी पड़ती है, नयी ब्रे-अकिंग न्यूज़ है. साथ ही सवाल यह भी है कि काम के पत्रकारों को घोडा बनाने वाले इन मालिक सरीखे संपादकों की ऐसी क्या मजबूरी आ  जाती  है  जो उधारी भी नहीं, चोरी की विद्वत्ता झाड़ते हैं. 

 इण्डिया टुडे के सम्पादकीय का वह हिस्सा जिसे  स्लेट मैगज़ीन से कट-पेस्ट किया गया है...

जैकी चैन एशिया में सबसे अधिक पारिश्रमिक पाने वाले अभिनेता हैं,यह बात समझ में भी आती है। वे 1980से अपनी फिल्में बना रहे हैं,निर्देशन और अभिनय कर रहे हैं। उन्होंने हालीवुड की ‘’रश ऑवर’’ और ‘’दी कराटे किड’’ जैसी सुपर-डुपर हिट फिल्मों से लाखों कमाए हैं। लेकिन दूसरे स्थान पर एक ऐसे इंसान है जिसके लिए इसका कोई मतलब नहीं है। एशिया में सबसे अधिक पारिश्रमिक पाने वाला अभिनेता गंजा है, प्रौढ़ है और उसकी तोंद निकली हुई है, वह तमिलनाडु राज्य से आता है, वह मूंछे रखता है जो कि 1986 से ही फैशन से गायब हो चुकी है। यह है रजनीकांत और वे केवल अभिनेता भर नहीं हैं। वे प्राकृतिक शक्ति हैं, अगर एक बाघ तूफान के साथ संभोग करे और उसका बाघ-तूफान बच्चा भूकंप से शादी कर ले तो उनसे होने वाला बच्चा रजनीकांत होगा। जैसे कि समझौते के मुताबिक उनकी फिल्मों का श्रेय उन्ही को मिलता है। अगर आपने अबतक सुपरस्टार रजनीकांत के बारे में नहीं सुना है तो, आप एक अक्तूबर को सुन लेंगे, जब उनकी फिल्म ‘ एंदिरन’ (दी रोबोट) दुनिया भर में रीलीज होगी। यह भारत की अबतक की सबसे महंगी फिल्म है। अबतक की किसी भी भारतीय फिल्म की तुलाना में इसे सबसे बड़ी ओपनिंग मिलेगी, सिनेमाघरों में इसके 2000 हजार प्रिंट एक साथ दिखाए जाएँगे। ‘’ दी मैट्रिक्स ’’के यूओन वो पिंग ने इसके लिए एक्शन किए हैं,’’जुरासिक पार्क’’वाले स्टैन विंसटन स्टूडियो ने इसके डिजाइन तैयार किए हैं,जार्ज लुकास का लाइट इफेक्ट और जादू है और ‘’स्लमडॉग मिलिनियेएर ’’के लिए ऑस्कर पुरस्कार जितने वाले संगीतकार एआर रहमान ने इसकी धुनें तैयार की हैं। इसमें बहुत बड़े पैमाने पर निवेश किया गया है। लेकिन इसके निर्माताओं को उम्मीद है कि उसकी वापसी हो जाएगी क्योंकि यह कोई फिल्म नहीं है बल्कि रजनीकांत की फिल्म हैं.
संक्षिप्त मगर महत्वपूर्ण तथ्यों को यहाँ देखें,क्योंकि असलियत जानने के लिए इण्डिया टुडे दक्षिण भारत संस्करण का वेब पर   उपलब्ध नहीं है. एक दूसरी अंग्रेजी वेबसाइट काउंटर मीडिया पर भी इसे पढ़ा जा सकता है.




Oct 11, 2010

मन्दिर वहीं बना

 नीलाभ


(राग अयोध्या, ताल भाजपा)

जजपा जजपा जजपा
ज ज ज ज ज ज ज ज
पा पा पा पा पा पा पा पा
भा भा भा भा भा भा भा भा
भाजपा भाजपा भाजपा पा पा पा
मन्दिर वहीं बना बना बना बन

पा पा पा पा पा पा पा पा पा पा पा पा
भा भा भा भा ज ज ज ज पा पा पा पा
जपा जपा जपा भाजपा भाजपा भाजपा
मुसलमान को मार भगा तू
मस्जिद तोड़ गिरा गिरा गिरा गिरा तू
मन्दिर वहीं बना बना बना बना
अब मन्दिर वहीं बना

भाभाजजपापा पाभाज पाजपा भाभाभा पाजभा जपाभा
पाभाज पाजपा भाभाभा पाजभा जपाभा
अटल प्रेम जतला ला ला ला ला
राम लला को बेच-बेच तू अडवानी गुन गा गा गा गा गा

आ आ आ आ पाभापा पाजपा भाभाभा पाजभा जपाभा
भाभाजजपापा भाजपा भाजपा भाजपा
मन्दिर वहीं बना

मरें भूख से भारतवासी
मरें किसान लगा कर फांसी
सीता माता रहे उदासी
रामशिला को ला ला तू राजनीति चमका, चमका, चमका तू
मन्दिर वहीं बना

भाभाभा जजज पापापा भाजपा भाजपा भाजपा भाजपा

सन्त-महन्त मुटाते जायें, राम नाम को बेचें-खायें
इनकी हाट सजा सजा सजा सजा तू
मन्दिर वहीं बना
भाजपा
भाजपा भाजपा भाजपा

हिन्दू वोट बटोर, खोल कर ताला
रामलला बैठा, बैठा बैठा, बैठा तू
मस्जिद को गिरवा गिरवा गिरवा गिरवा तू
मन्दिर वहीं बना
पा पा पा पा पा पा पा पा पा पा पा पा
भा भा भा भा ज ज ज ज पा पा पा पा
जपा जपा जपा जजपा

मोदी तेरा हनूमान है नितिन गडकरी अंगद
बालठाकरे बना जटायु सुषमा है त्रिजटा
त्रिजटा त्रिजटा त्रिजटा
तू मन्दिर वहीं बना
पा पा पा पा पा पा पा पा पा पा पा पा
भा भा भा भा ज ज ज ज पा पा पा पा
जपा जपा जपा जजपा

देस लूट कर घर को भर ले, पूंजी को मुट्ठी में कर ले
बैठ गोद में अमरीका की, मनमोहन कहला
कहला कहला कहला तू चिदम्बरम को ला ला ला तू
मन्दिर वहीं बना
जपा जपा जपा जजपा
पा पा पा पा पा पा पा पा पा पा पा पा
भा भा भा भा ज ज ज ज पा पा पा पा

चाहे तू भगवा लहराये, या पंजे पर मुहर लगाये
रामराज में सब चलता है रामराज को ला, ला ला ला तू
मन्दिर वहीं बना बना बना बना
जजपा जजपा जजपा
ज ज ज ज ज ज ज ज
पा पा पा पा पा पा पा पा
भा भा भा भा भा भा भा भा
भाजपा भाजपा भाजपा पा पा पा

मन्दिर वहीं बना बना बना बना

 (नीलाभ का मोर्चा से साभार)