Aug 22, 2010

वह मनु स्मृति का गुणगान करती रही


कैसे कार्यकर्ताओं को पढ़ाई छोड़ने पर मज़बूर किया जाता रहा है और कात्यायिनी आपका पुत्र उच्च शिक्षा की डिग्रियां जुटाते हुए उसी संगठन का राष्ट्रीय संयोजक बन जाता है? कैसे यह ग्रुप आज तक देश भर में शशि-कात्यायनी ग्रुप के नाम से जाना जाता है?

अशोक पाण्डेय 

लुटेरे तो लुटेरे ही होते हैं -- विजय की स्थिति में उनका काम होता है सबसे अधिक जोश दिखाना और पराजय की दशा में वे अपने हताहत हुए साथियों की जेबें टटोलते हैं।''

यह पंक्ति कात्यायनी के जनज्वार पर हमारे द्वारा उठाये गये प्रश्नों के जवाब में लिखे गये लेखों के उत्तर वाले आलेख के आरंभ में ही है। इसका अर्थ हम जब उन्हें केन्द्र में रखकर लगाते हैं तो लगता है कि वह अब पराजय को स्वीकार करने लगी हैं। 

तभी तो राजनैतिक बहस का अलाप करते-करते वह हम सब के ख़ानदानों का आकलन करने पर लगी हैं कि कौन धनी किसान का बेटा है, कौन सूदखोर का बेटा है वगैरह-वगैरह्। यही नहीं हमारे रोज़गार का भी उन्होंने बड़ी तफ़्सील से ब्यौरा दिया है, उन कामों का जिनसे मिली तनख़्वाह से हमारी जेबों में अपना ख़र्च चलाने भर की रक़म आती है। वह न भी बतातीं तो भी यह सब जानते थे कि हमारे जीवनस्तर और हमारी आय का संबंध कोई रहस्य नहीं है…आयकर विभाग में हमारे आय-व्यय के खाते हैं…लेकिन अब जेब टटोलने की उनकी आदत ठहरी…वैसे क्या यही बात वह अपने संदर्भ में कह सकती हैं?

क्या वह बतायेंगी कि जिस उच्चमध्यवर्गीय जीवन स्तर में वह जीवन-यापन कर रही हैं उसका ख़र्च कहां से आता है? उनकी जेबें कौन भरता है? सत्यम की आय के स्रोत तो विश्व बैंक से यूनिसेफ़ और निजी कारपोरेट्स तक हैं, वह अनुवादों में अपना पसीना गिराते हैं…लेकिन आप की आय का स्रोत क्या है? आप कौन सी नौकरी करती हैं? क्या लिखने से मिली रायल्टी इतनी है जिससे यह जीवन स्तर निबाह किया जा सके?

अगर नहीं तो क्या जनता से, मज़दूर बस्ती से मिला चंदा इसके लिये उपयोग किया जाता है? क्या यह भी आपके क्रांति कार्यक्रम का अनिवार्य हिस्सा है? अब आपके और शशि के आनुवांशिक विश्लेषण और क्रांतिकारिता के अंतर्संबंध के बारे में हम नहीं पूछेंगे…हम यह नहीं मानते कि यह किसी व्यक्ति के आंकलन का प्रगतिशील तरीका है। कवितायें चूंकि आपके नाम से छपती हैं इसलिये मैं स्पष्ट रूप से मानता हूं कि वे आपकी हैं। मेरा प्रश्न उनके कंटेंट से है…ख़ैर उस पर बात कभी किसी और मंच से।

अभिनव सिन्हा : नेता का बेटा हुआ नेता  
 जो ऐसा करने के बजाय मसालेदार, चटपटी गालियों और व्यक्तिगत घिनौने आरोपों को ही मुख्य माध्यम बना रहे हैं, उनके चरित्र और चेहरे को पहचानना कठिन नहीं होना चाहिए। ‘ जो ऐसा करने के बजाय मसालेदार, चटपटी गालियों और व्यक्तिगत घिनौने आरोपों को ही मुख्य माध्यम बना रहे हैं, उनके चरित्र और चेहरे को पहचानना कठिन नहीं होना चाहिए। 

ये आपके ही आप्त वचन हैं…मैं पूछना चाहता हूं कि आपके ब्लाग पर शालिनी और मीनाक्षी के नाम से लगी पोस्टों में आलोचकों के लिये जिन सामंती और स्त्रीविरोधी गालियों का उपयोग किया गया है, उसे क्या समझा जाये? आपने ख़ुद व्यक्तिगत प्रहारों से कभी परहेज नहीं किया है। यह कैसी क्रांतिकारिता है जिसमें पत्नी से डरना जैसे फ्रेज़ का उपयोग गाली की तरह किया जाता है। क्या इसका सीधा अर्थ यह नहीं हुआ कि पत्नी को काबू में रखा जाना चाहिये? हम कैसे न मान लें कि आपका संगठन इन पितृसत्तात्मक मूल्यों का वाहक है…ख़ासकर तब जब यह मुहावरा आपकी पारिवारिक सदस्य तथा संगठन की अब वरिष्ठ हो चली सदस्य मीनाक्षी के पत्र में उपयोग किया गया है?

आपने हमसे हमारी राजनीति पूछी है…तो मैं बता दूं कि हम कहीं से उठकर आ गये लोग ज़रूर हैं क्योंकि हमारे पीछे आपकी तरह पहचान देने वाला मठ नहीं है लेकिन इस एक ख़ूबी को छोड़ दें तो उसी साहित्यिक-सांस्कृतिक जगत के निवासी हम भी हैं जहां की आप हैं। इस जगत के लोग हमें भी जानते हैं, भले आप से कम।

हमारा लिखा भी पब्लिक डोमेन में प्रिंट और नेट दोनों पर उपलब्ध है और वह हमारी राजनीति को जानना चाहने वाला कोई भी व्यक्ति जान सकता है। यह अलग बात है कि आप हमें सरकारी मुलाज़िम और ट्रेडयूनियन कर्मी से ज़्यादा कुछ मानने को तैयार न हों, मीनाक्षी हमें छोटा-मोटा बुद्धिजीवी मानें और इस बात पर सीना पीटें कि हाय वह संगठन में रहकर ज्ञान की पंजीरी ले गया… समय की क़ैद में रहने वाले आत्ममुग्ध कभी नहीं देख पाते की चौदह वर्षों में वक़्त की नदी में कितना पानी बह चुका होता है। 

हमें न छोटा-मोटा होने में कोई शर्म है, न मठ न बना पाने का अफसोस…हमने बड़ा बनने और मठ बनाने के सपने नहीं पाले थे…हम तो दुनिया बदलने और एक बेहतर दुनिया के सपने आंखों में लिये आपके जाल में फंस गये थे। आपने हम सबके घर बैठने का उपहास किया है। आप जिस आइलैण्ड में रहती हैं उसके बाहर भी बहुत बड़ी दुनिया है…और हम वहां अपने-अपने तरीके से सक्रिय हैं…उसके लिये हमें आपका सर्टिफिकेट नहीं चाहिये। विलासिता का जीवन जीने वाले होलटाइमर्स से मेहनत की कमाई खाने वाले हम सर्वहारा ख़ुद को बेहतर मानते हैं।

सच्चे कम्यूनिस्ट की ख़ूब कही आपने…वह सब मैने भी अपने जीवन में कभी नहीं अपनाया…हमारा सवाल आपके धार्मिक आचरण से है भी नहीं, विभाजन में कौन से भाई-भाई अलग हुए और क्यूं ये हम ख़ूब जानते हैं…पिता से राजनैतिक तौर पर लग हुआ पुत्र संपत्ति में हिस्सा मांगने कैसे पहुंच जाता है यह भी हम बहस में नहीं लाना चाहते। 

 कात्यायिनी : गालियों की परम्परा 
हमारा बस यह पूछना है कि कैसे नेतृत्वकारी निकाय पर एक ही परिवार का कब्ज़ा हो जाता है? कैसे इस लंबे दौर में परिवार के किसी सदस्य पर कोई सवाल नहीं उठता? कैसे एक कुनबा धीरे-धीरे विशिष्ट सुविधाभोगी वर्ग में तब्दील हो जाता है? कैसे आपकी , शशि प्रकाश की, सत्यम की और अभिनव की तो एक पब्लिक पह्चान दिखाई देती है लेकिन इसके अलावा इस लंबे दौर में किसी और के नाम से छपा कुछ नहीं दिखाई देता ( दिवंगत का अरविंद का नाम हम जानबूझकर नहीं ले रहे, जो जवाब देने के लिये उपस्थित नहीं उसे इस बहस में हम नहीं खींचना चाहते)। 

कैसे कार्यकर्ताओं को पढ़ाई छोड़ने पर मज़बूर किया जाता है और आपका पुत्र उच्च शिक्षा की डिग्रियां जुटाते हुए उसी संगठन का राष्ट्रीय संयोजक बन जाता है? कैसे यह ग्रुप आज तक देश भर में शशि-कात्यायनी ग्रुप के नाम से जाना जाता है? आपके क्रोध का प्रमुख कारण यह लगता है कि क्यों नहीं हिन्दी का बौद्धिक जगत आपके समर्थन में आंदोलन छेड़ देता। मैं आपसे पूछना चाहता हूं कि जिस आंदोलन को आपने विघटित और पतित घोषित कर दिया है उससे समर्थन की ऐसी उत्कंठा क्यूं? 

क्यूं अपने ऊपर संकट आने पर आप बार-बार भाग कर उसी साहित्यिक बिरादरी के पास जाती हैं जिसकी भर्त्सना आपके लेखन का अनिवार्य हिस्सा है? और कब इस समाज की किसी सामूहिक लड़ाई का आप हिस्सा बनीं? चलते-चलते आपने विभूति प्रकरण कहकर जिस ओर इशारा किया है उस मुद्दे पर विभूति नारायण राय और रवीन्द्र कालिया की बर्खास्तगी के लिये चली किस मुहिम का हिस्सा थीं आप? या कहां आपने अलग से उस पर कोई आपत्ति दर्ज़ करवायी? इसके पहले विश्वरंजन प्रकरण पर आपने कहां और क्या कहा? जब उदयप्रकाश आपके पुराने घर गोरखपुर में आदित्यनाथ से पुरस्कृत हो आये थे तो आप या आपके संगठन ने वहां के किस विरोध कार्यक्रम में हिस्सा लिया या फिर स्वतंत्र रूप से कौन सा विरोध किया? 

कब आप जनता के पक्ष में किसी संस्थान से टकराईं? कब आप किसी सामूहिक प्रतिरोध का हिस्सा बनीं? वैसे आलोक धन्वा को कुछ कहने का नैतिक अधिकार आपने तभी खो दिया था जब ग्वालियर में महिला दिवस पर आप वैश्य समाज के महिला मिलन समारोह का हिस्सा बनीं थीं। इस मासूम जवाब के बावज़ूद कि आप को भारतेंदु समाज के नाम से भ्रम हो गया था, या आने के पहले कार्ड नहीं देखा था…आप आने के बाद भी बहिष्कार कर सकती थीं…लेकिन वह कौन सा मोह था कि संचालिका मनु स्मृति का गुणगान करती रही और आप चुपचाप मंच पर बैठ एसी का आनन्द लेतीं रहीं?

और अंत में आपके ब्लाग विमर्श पर…अब जब आप ख़ुद ब्लाग पर आकर जवाब दे चुकी हैं तो इस माध्यम को गरियाने से कोई फायदा नहीं…मैं भी ब्लाग को कोई क्रांतिकारी माध्यम नहीं मानता…समयांतर के ताज़ा अंक में मैने यह साफ़ लिखा भी है, लेकिन संवाद के एक सहज माध्यम के रूप में इसका अपना महत्व है…और यह अकारण तो नहीं कि आपका संगठन और उससे जुड़े लोग तमाम ब्लाग चला रहे हैं। 

यह अलग बात है कि जहां हिन्दी के तमाम बुद्धिजीवियों में इस माध्यम से आत्मप्रचार से बचने का कल्चर रहा है वहीं आपके ब्लाग सिर्फ़ यही कर रहे हैं…जनज्वार ने आपके आरोप को भी छापने की हिम्मत दिखाई है अगर आप में वह नैतिक बल हो तो वे सवाल छापें जिनके जवाब में आप तलवारे भांज रही हैं। रही बात धमकियों की तो कात्यायनी वे दिन हवा हुए जब मियां साहब फ़ाख़्ते उड़ाया करते थे…आपके पास अकूत धनबल है, मुक़दमें लड़ने का लंबा अनुभव है तो हमारे पास सच का साहस!



चंदे के हमारे व्यक्तिगत स्रोत है




हमलोगों का यह पुराना और बार-बार दुहराया गया संकल्प है कि हम अपने प्रकाशन, अपने पत्र-पत्रिकाओं और संस्थाओं के लिए कोई भी सशर्त सांस्थानिक अनुदान (देशी पूँजीपतियों से, बहुराष्ट्रीय कम्पनियों से, उनके ट्रस्टों से, फण्डिंग एजेंसियों/एन.जी.ओ से, चुनावी पार्टियों से और सरकार से) नहीं लेते, केवल व्यक्तिगत सहयोग लेते हैं -- नियमित रूप से मज़दूर बस्तियों में कूपन काटते हैं, कालोनियों-बसों-ट्रेनों में पर्चा अभियान चलाते हैं, और नुक्कड़ नाटक-गायन आदि करते हैं।
रही हमारी बात, तो कुत्तों के भौंकने से हाथी की चाल पर कोई असर नहीं पड़ता। तमाम ''महामहिमों'' की भविष्यवाणियों को झुठलाकर हमने दो दशक की अपनी पथान्वेषी यात्रा पूरी की है, आगे भी हमारी यात्रा यूँ ही जारी रहेगी। जिन्हें पक्ष चुनना है, वे पक्ष चुनेंगे। जो ‘फे़न्स-सिटर’ हैं, वे किनारे बैठकर जग का मुजरा लेते रहेंगे.
वैसे यहाँ यह भी बता दें कि इन भगोड़ों के पाप का घड़ा अब भरने के क़रीब है। ब्लॉग पर नाम लेकर जिस तरह इन्होंने कीचड़ उछाला है, अब यदि हम मानहानि की क़ानूनी कार्रवाई करते हैं तो किसी साथी को यह शिकायत नहीं हो सकती कि राजनीतिक विवाद को हम बुर्जुआ अदालत में क्यों लेकर गये। 

कात्यायिनी 

''रणभूमि को अपने आँचल से ढँककर निशा जब योद्धाओं को एक-दूसरे से अलग कर देती है तो दिन भर के परिणाम निकालने की घड़ी आ जाती है। तब क्षति और सफलताओं का हिसाब लगाया जाता है। पराजित प्रतिद्वन्द्वी अँधेरे की आड़ में पीछे हटने को उत्सुक होता है और अन्धकार में उसका पीछा करने की जोखिम को टालकर विजेता अपनी जीत के उत्सव व आनन्द में मग्न हो जाते हैं। रणभूमि में केवल शव एवं घायल ही बचे रहते हैं, और तब इनके बीच उन लुटेरों की काली-काली आकृतियाँ दिखने लगती हैं जो सबकी जेबें टटोलते हैं, हाथों से अँगूठियाँ उतारते हैं या फिर छातियों से क्रॉस। लड़ाई के बाद की रात पर तो केवल लुटेरों का ही अधिकार होता है।

''कल तक वे लड़ाई के ख़तरों के डर से खाइयों और नालों में छिपे पड़े थे, अभी कल ही उनमें से बहुत सारे आज की हारी हुई सेना में भर्ती थे या यूँ कहिये कि उनके नाम भर दर्ज थे। पर रात के अँधेरे ने उन्हें इतना साहसी बना डाला है कि अब वे उन्हीं लोगों के ढाल-कवच व हीरे-जवाहरात नोचने की जल्दी में हैं जिनकी कल तक वे गला फाड़-फाड़कर जय-जयकार कर रहे थे। लुटेरे तो लुटेरे ही होते हैं -- विजय की स्थिति में उनका काम होता है सबसे अधिक जोश दिखाना और पराजय की दशा में वे अपने हताहत हुए साथियों की जेबें टटोलते हैं।''

उपरोक्त पंक्तियाँ रूस के सुविख्यात कम्युनिस्ट राजनीतिक कर्मी और साहित्यालोचक वात्स्लाव वोरोव्स्की (1871-1923) के लेख ‘लड़ाई के बाद की रात’ (साहित्य और सौन्दर्यशास्त्र: बीसवीं शताब्दी का साहित्य, खण्ड-1, पृ. 68, साहित्य अकादमी और रादुगा प्रकाशन, 1989) से ली गयी हैं। सन्दर्भ है 1905-07 की रूसी क्रान्ति की पराजय के बाद का राजनीतिक-सांस्कृतिक परिदृश्य। वोरोव्स्की के अनुसार, क्रान्ति की पराजय के बाद रूसी बुद्धिजीवी वर्ग का एक बड़ा हिस्सा रात के अँधेरे में युद्धक्षेत्र में लूटमार करने वाले लुटेरों की भूमिका निभा रहा था।
1905-07 की क्रान्ति की पराजय के बाद की स्थिति के बारे में क्रुप्सकाया ने भी एक जगह लिखा है कि बहुतेरे पराजित मानस कम्युनिस्ट उस समय सन्देहवाह-सर्वनिषेधवाद-अराजकतावाद के शिकार हो गये थे और कुछ ऐसे भी थे जो ‘डिप्रेशन’, ‘अल्कोहलिज़्म', ‘व्यक्तिगत पतन’ और ‘रथलेस सेक्सुअलिज़्म’ की चपेट में आ गये थे।

आज कम्युनिस्ट आन्दोलन विश्‍वस्तर पर जिस विपर्यय और गतिरोध का सामना कर रहा है, वह अभूतपूर्व है। ऐसे में अकुण्ठ जड़सूत्रवाद और निर्द्वन्द्व ''मुक्त चिन्तन'' के साथ-साथ हमें यदि सीमाहीन और निर्लज्ज किस्म की राजनीतिक-सांस्कृतिक पतनशीलता के विकट उदाहरण देखने को मिल रहे हैं और कुत्सा-प्रचार के लम्बे अभियानों का साक्षी होना पड़ रहा है तो यह कोई आश्चर्य की बात नहीं है।
विगत लगभग चार-पाँच वर्षों से लगातार हमलोगों को, विशेष तौर पर व्यक्तिगत स्तर पर, घिनौने कुत्सा-प्रचारों, तोहमतों और गालियों का शिकार बनाया जाता रहा है। यूँ तो, गतिरोध तोड़कर नयी राह निकालने के प्रयासों-प्रयोगों के क्रम में, विगत तीन दशकों से हमलोगों पर तरह-तरह के लेबल लगाये जाते रहे हैं और फ़तवेबाज़ियाँ की जाती रही हैं। कभी ‘प्रच्छन्न त्रात्स्कीपंथी’ कहा गया, कभी ‘कुर्सीतोड़ बुद्धिजीवी’, कभी कहा गया कि ‘वर्ग संघर्ष की आँच से बचकर साहित्य-संस्कृति में रमने वाले लोग हैं’, तो कभी यह भविष्यवाणी की गयी कि ‘साहित्य व मीडिया में कैरियर बनाने के बाद जल्दी ही घर बैठ जायेंगे।’ फिर कुत्सा अभियान का अलग चरण शुरू हुआ जब यह बात ज़ोर-शोर से फैलायी गयी कि यह एक परिवार-विशेष और निकटवर्तियों की मण्डली है, जिसका काम बस किताबें छापकर मार्क्‍सवाद का व्यापार करना और सम्पत्ति एकत्र करना है। इसी दौरान मुँहामुँही बुद्धिजीवी और राजनीतिक मण्डलियों में यह बात फैलायी गयी कि कात्यायनी का सारा लेखन तो वस्तुतः उनके पति करते हैं। इसकी शुरुआत पहले राजनीतिक हलकों में एक ''महान नेता'' की शह पर हुई जो एक दशक तक (साथ काम करते हुए) मेरे असुविधाजनक प्रश्‍नों-आपत्तियों से आजिज आ चुके थे और जिन्हें मैंने पुरुषवादी मानसिकता से ग्रस्त बताकर खुद ही आफ़त मोल ले ली थी। बहरहाल, यह अफ़वाह जब साहित्यिक मण्डलियों तक पहुँची (या पहुँचायी गयी) तो फिर क्या था! जंगल की आग की तरह फैली। विडम्बना तो यह थी कि कुछ ही वर्षों बाद मेरे तलाक़ की अफ़वाह भी फैला दी गयी!

विगत करीब पाँच वर्षों से जो कुत्सा-प्रचार किया जा रहा है, वह तीसरा चरण है जो घृणित और घनघोर निजी है। तमाम पोथों-पुलिन्दों का सारतत्व यह है कि (1) हम कोई राजनीतिक समूह नहीं बल्कि अपराधी गिरोह हैं जो सम्पत्तियाँ हड़पते हैं, किताबों का व्यापार करते हैं, (2) राजनीतिक ग्रुप के नाम पर महज़ एक परिवार है (और कुछ चेले-चपाटे हैं) और नेतृत्व के नाम पर बस एक व्यक्ति है जो तानाशाह और अति सुविधाजीवी है, (3) कात्यायनी की सभी रचनाएँ वास्तव में उसके पति की हैं। और उसके बेटे को भी ‘प्रोमोट’ किया जाता है। इसी आशय के बहुतेरे आरोप हैं, पर केन्द्रीय बिन्दु यही हैं।

कहने की ज़रूरत नहीं कि इस तरह की बातों का जवाब नहीं दिया जा सकता। यह मार्क्‍सवाद की राजनीतिक संस्कृति भी नहीं है। लेनिन व्यक्तिगत कुत्सा-प्रचारों का जवाब देने के क़तई हामी नहीं थे और बार-बार इस बात पर बल देते थे कि कुत्सा-प्रचार की अपनी एक राजनीति होती है। उनका कहना था कि बात राजनीतिक लाइन और उसके अमल पर की जा सकती है। मार्क्‍सवादी नज़रिया बिल्कुल साफ़ है। यदि कोई या कुछ लोग व्यक्तिगत तौर पर ग़लत हैं तो उनकी राजनीति भी ग़लत होगी या तार्किक परिणति के तौर पर कालान्तर में ग़लत हो जायेगी। इसका विपरीत भी सही है। यदि कुछ कर्तव्यनिष्ठ-सत्यनिष्ठ व्यक्ति भी लगातार ग़लत राजनीति को मानें और लागू करें तो कालान्तर में उनका व्यक्तिगत जीवन भी आदर्शच्युति और पतन का शिकार हो जायेगा। अतः विचार और विवाद का मसला किसी राजनीति लाइन का सैद्धान्तिक-व्यावहारिक पक्ष ही हो सकता है। यदि कतिपय व्यक्तियों के व्यक्तिगत चरित्र और आचरण को लेकर लेख-पत्र-दस्तावेज़ लिखे जायें तो सच्चाई की जाँच कैसे होगी? क्या सभी वाम क्रान्तिकारी ग्रुपों के प्रतिनिधियों को लेकर कोई जाँच कमेटी ('क्रान्तिकारी सी.बी.आई.') बनायी जायेगी? और यह काम यदि कुछ लोग करते हैं और वे संगठन-विशेष से निकाले गये कुछ पतित और भगोड़े हों जो अपना निजी हिसाब चुका रहे हों, या फिर यदि वे कुछ ऐसे पतित लोग हों जो ‘स्टेट एजेण्ट’ या घुसपैठिये की भूमिका निभाते हुए वाम की पाँतों में शंका-सन्देह फैलाने का काम कर रहे हों, तो इस सच्चाई का पता कैसे लगाया जा सकेगा? इसीलिए लेनिनवादी पद्धति इस बात पर बल देती है कि राजनीतिक लाइन और उसके अमल को ही आलोचना और वाद-विवाद का विषय बनाया जा सकता है। जो ऐसा करने के बजाय मसालेदार, चटपटी गालियों और व्यक्तिगत घिनौने आरोपों को ही मुख्य माध्यम बना रहे हैं, उनके चरित्र और चेहरे को पहचानना कठिन नहीं होना चाहिए। यदि उनकी बातों पर वाम दायरे का कोई व्यक्ति ग़ौर करता है और उन्हें सन्देह और सवालों के कटघरे में नहीं खड़ा करता तो यह सचमुच दुर्भाग्यपूर्ण है।

यहाँ यह सवाल उठाया जा सकता है कि क्या सिर्फ़ किसी राजनीतिक संगठन की राजनीतिक लाइन और उसके व्यवहार पर ही बात की जा सकती है, उसके नेताओं-कार्यकर्ताओं के व्यक्तिगत जीवन और आचरण पर नहीं? तो हमारा उत्तर होगा कि अवश्य की जा सकती है और अनिवार्यतः की जाती है। हर राजनीतिक समूह का एक-एक घटक व्यक्ति अपने आचरण-व्यवहार के लिए अपने समूह के साथियों के समक्ष जवाबदेह होता है और लेनिनवादी सांगठनिक सिद्धान्त इसके लिए सामूहिक चौकसी, जवाबदेही व आलोचना की एक समूची प्रणाली तजवीज करता है। समूह के भीतर के अतिरिक्त, समूह/संगठन का हर व्यक्ति जनता के जिस हिस्से के बीच काम करता है, वहाँ भी अपने निजी आचरण-व्यवहार के लिए जवाबदेह होता है। लेकिन कहीं से उठकर कोई भी व्यक्ति, कोई निष्कासित व्यक्ति या कोई अन्य संगठन यदि किसी संगठन या उसके किसी व्यक्ति पर कोई निजी तोहमत लगा दे तो सच का निर्णय आख़िर किस प्रकार होगा? इसीलिए लेनिनवादी पद्धति एकमात्र राजनीतिक लाइन और उसके अमल के आधार पर ही चीज़ों को तय करने की बात करती है। हाँ, कोई दो संगठन जब पूर्ण राजनीतिक एकता हासिल कर लेते हैं तो सांगठनिक एकता से पहले वे एक-दूसरे की कार्यकर्ता नीति, वित्तीय नीति, सांगठनिक ढाँचे और आन्तरिक जीवन के हर पहलू की सूक्ष्म जाँच-पड़ताल अवश्य करते हैं।

स्तालिन ने एक जगह बहुत मार्के की बात कही है। उनका कहना है कि सामरिक युद्ध में हम दुश्मन के सबसे कमज़ोर पक्ष पर वार करते हैं, लेकिन राजनीतिक युद्ध में हम उसके सबसे मज़बूत पक्ष पर हमला करते हैं। यही कम्युनिस्ट नीति है। कुत्सा-प्रचारक हमारे बारे में जो बातें करते हैं, यदि वे सही भी होतीं तो एक सच्चा कम्युनिस्ट उन्हें नहीं बल्कि हमारी राजनीति को निशाना बनाता। देश के जो भी संजीदा कम्युनिस्ट ग्रुप रहे हैं, उन्होंने हमारे साथ तमाम तीखे मतभेदों के बावजूद हमारे ख़िलाफ़ जारी व्यक्तिगत गाली-गलौज और आरोपों पर कान नहीं दिया। जिन कुछ लोगों के दिमाग में शंका पैदा हुई, उन्हें सफ़ाई देना हम इंक़लाबी शान के ख़िलाफ़ समझते हैं। उनसे तो हम बस यही कहेंगे कि मार्क्‍सवाद की राजनीतिक संस्कृति और तौर-तरीक़े का अध्ययन करें। चन्द लोगों के (उनकी पृष्ठभूमि और राजनीति जाने बगैर) कुत्सा-प्रचार से प्रभावित होकर शंकालु हो जाने वाले राजनीतिक ग्रुपों को सफ़ाई देना तो दूर उनसे बातचीत करना भी हम अपनी तौहीन समझते हैं।

तब हमसे आप पूछ सकते हैं कि ब्लॉग पर इतनी चर्चा करना क्या अपने आप में सफ़ाई देना नहीं है? वाजिब सवाल है। कुत्सा-प्रचार मुहिम यदि राजनीतिक हलकों तक ही रहती तो हम इस पर कोई सफ़ाई नहीं देते। ज़्यादा से ज़्यादा, हमारे समय में कुत्सा-प्रचार की राजनीति और संस्कृति पर कभी एक निबन्ध लिख देते। पर जिन कुछ भगोड़ों ने हमारे विरुद्ध कुत्सा-प्रचार को अपना जीवन-लक्ष्य बना रखा है, उन्होंने देश भर के (हिन्दी के अतिरिक्त बंगला, तेलुगू, मराठी, पंजाबी आदि भाषाओं के भी) लेखकों को हमारे ख़िलाफ़ बाक़ायदा पुस्तिकाएँ छपाकर भेजीं, पत्र और ई-मेल और अब ब्लॉग (‘जनज्वार’ ब्लॉग) पर भी कचरा उड़ेलना शुरू कर दिया है। तब से हमें बहुत से बुद्धिजीवियों के फोन आ चुके हैं कि हमलोगों को ख़ामोशी तोड़कर कुछ बोलना चाहिए (ज़ाहिर है कि इनमें से भी कुछ आदतन मज़े लेने वाले ग़ैरपक्षधर क़िस्म के लोग हैं और कुछ हमारे या क्रान्तिकारी वाम आन्दोलन के जेनुइन शुभचिन्तक हैं)। राजनीतिक दायरे के भीतर जो तौर-तरीक़े लागू होते है, वे हूबहू बुद्धिजीवी हलकों में लागू नहीं होते। जब आम बुद्धिजीवियों के बीच सारे मसले उठा दिये गये और कम्युनिस्टों की खिल्ली उड़ाने वालों और नफ़रत करने वालों के बीच भी उन्हें आम चर्चा का विषय बना दिया गया है, तब हमने चुप्पी तोड़ने का फै़सला किया है। फिर भी हम सारे मसलों पर सफ़ाई देने के बजाय (जो हमारे स्वाभिमान के विरुद्ध है) मुख्यतः सोचने और फै़सले लेने के ‘अप्रोच’ और पद्धति पर कुछ सवाल उठायेंगे और महज़ कुछ बुनियादी, अकाट्य तथ्यों का उल्लेख करेंगे, जिनसे कुत्सा-प्रचार की सारी अट्टालिका एकबारगी भरभराकर गिर जायेगी। (वैसे यहाँ यह भी बता दें कि इन भगोड़ों के पाप का घड़ा अब भरने के क़रीब है। ब्लॉग पर नाम लेकर जिस तरह इन्होंने कीचड़ उछाला है, अब यदि हम मानहानि की क़ानूनी कार्रवाई करते हैं तो किसी साथी को यह शिकायत नहीं हो सकती कि राजनीतिक विवाद को हम बुर्जुआ अदालत में क्यों लेकर गये। अब यह मसला नागरिक सम्मान का है और जैसा हमारे कई लेखक मित्रों ने पहले ही सुझाया था, हम यथा समय क़ानूनी कार्रवाई भी करेंगे।)

(1) पहला सवाल हमारा यह है कि जो कुत्सा-प्रचारकों का गिरोह है, उसकी अपनी राजनीति क्या है? ये कौन लोग हैं? ऐसा कत्तई नहीं था कि ये लोग एक साथ (या अलग-अलग) इन सवालों को उठाते हुए कभी हमारा साथ छोड़कर चले गये हों। ये लोग पन्‍द्रह वर्षों के दौरान अलग-अलग समयों पर अलग हुए लोग हैं। कुछ बार-बार अनुशासनहीनता या नैतिक कदाचार के कारण निकाले गये, कुछ निलम्बित किये गये और फिर वापस नहीं आये, कुछ भय, डिप्रेशन या अराजनीतिक पारिवारिक जीवन की चाहत के कारण या अन्य किसी निजी कमज़ोरी के कारण पीछे हटे या क्रमशः निष्क्रिय होते गये और फिर अचानक वर्तमान कुत्सा-प्रचार मुहिम के दौरान आश्चर्यजनक रूप से सक्रिय होकर सामने आये। इन सभी के बीच कभी कोई साझा बिन्दु नहीं था और अब जो एकमात्र ‘कॉमन मिनिमम प्रोग्राम’ है, वह है हमारे ऊपर तरह-तरह की तोहमतों की झड़ी लगाना। हम चुनौतीपूर्वक कहना चाहते हैं कि अजय, प्रदीप, घनश्याम आदि किस कारण से निलम्बित किये गये, अरुण यादव को किस आरोप में निष्कासित किया गया, आदेश किस कारण से घर गया, यदि रत्ती भर भी साहस और नैतिकता है तो ब्लॉग पर इन सच्चाइयों का भी उल्लेख किया जाना चाहिए! यह जानना भी ज़रूरी है कि ये सभी लोग वर्तमान समय में करते क्या हैं? इनमें से ज़्यादातर टुटपुँजिया बुर्जुआ अखबारों में कलमघसीटी करते हैं, कुछ एन.जी.ओ. के मुलाज़िम हैं, एक ठेका-पट्टी का काम करता है, एक ख़ानदानी सूदख़ोरी की जमापूँजी पर जीने वाला निठल्ला है, एक सरकारी मुलाज़िम व खाँटी ट्रेडयूनियनिस्ट है, एक टुटपुँजिया दलाल वक़ील है और एक है जो तराई के मज़दूरों में अर्थवादी राजनीति करता है। तराई में अर्थवादी राजनीति करने वाले के ख़िलाफ़ राजनीतिक संघर्ष पहले से था। उसने अचानक अलग होने की घोषणा की पर अलग होने के बाद उसने व्यक्तिगत तोहमतों के साथ ही हमारे ऊपर कई राजनीतिक सवाल भी उठाये। लेकिन अन्य जितने भी हैं वे सभी व्यक्तिगत कारणों से निष्कासित, निलम्बित या रिटायर होकर अपने धंधों में लग जाने वाले लोग हैं जिनके सिर पर निम्न बुर्जुआ प्रतिशोध का भूत सवार है। क्या वे नहीं समझते कि ब्लॉग जैसे माध्यमों का इस्तेमाल करके और गैर-वामपंथी बुद्धिजीवियों तक को पोथे-पुलिन्दे भेजकर वे किसी एक व्यक्ति या संगठन या समूह को नहीं बल्कि कम्युनिज़्म और पूरे वाम आन्दोलन को लांछित कर रहे हैं?

(2) फलां संगठन में फलां व्यक्ति को ''भाई साहब'' या ''चचा'' या ''दादा'' या ''मोल्हूप्रसाद'' कहते हैं, फलां व्यक्ति फलां व्यक्ति का यह या वह लगता है, फलां संगठन ने अपना सम्मेलन या प्लेनम सरकारी गेस्ट हाउस-रेस्ट हाउस-हॉस्टल में किया, फलां प्रतिष्ठान फलां राजनीतिक संगठन से जुड़ा है... ब्लॉग व वेबसाइट पर इस क़िस्म की बातें करने वाले को क्या ग़द्दार और सरकारी एजेण्ट नहीं माना जाना चाहिए? क्या ये राजनीतिक सवाल हैं या यह ऐसे सांगठनिक-तकनीकी मसले हैं, जिनपर अपने घनघोर राजनीतिक विरोधी के सन्दर्भ में भी चर्चा नहीं की जानी चाहिए? हम ऐसी बातों के सही-ग़लत होने के सवाल पर जाते ही नहीं। हमारा सवाल यह है कि ऐसी बातों की राजनीतिक प्रासंगिकता क्या है? ऐसे ''तथ्य'' किस उद्देश्य से प्रस्तुत किये जा रहे हैं? फिर भी यदि कोई ऐसे लोगों का ''चाल-चेहरा-चरित्र'' नहीं पहचान पाता तो उसकी आँखों का इलाज हक़ीम लुक़मान भी नहीं कर सकते।

(3) क्या कारण है कि भगोड़ों का यह गिरोह हमलोगों के पुस्तक प्रतिष्ठानों, प्रकाशन-संस्थाओं, ट्रस्टों आदि (वैसे राजनीति के नये मुल्ला, जनाब नीलाभ जी ने फ़तवा जारी कर ही दिया है कि ट्रस्ट आदि बनाना राजनीतिक संगठनों का काम नहीं होता और हम अपना इतना भी अवमूल्यन नहीं कर सकते कि ऐसे राजनीतिक मसलों पर उनसे बहस करें और तर्क एवं तथ्य से उन्हें ग़लत सिद्ध करने में अपना समय ज़ाया करें) की चर्चा तो करता है लेकिन मज़दूर वर्ग के बीच हमारे कामों की - गोरखपुर में छह माह लम्बे चले मज़दूर आन्दोलन की, दिल्ली के 25 हज़ार बादाम मज़दूरों की हड़ताल की, मेट्रो के असंगठित मज़दूरों के बीच हमारे काम और उनके शानदार संघर्ष की या लुधियाना के फैक्ट्री मज़दूरों के बीच हमारे काम की चर्चा तक नहीं करता? क्या कारण है कि गोरखपुर में युवाओं के जुझारू सामाजिक आन्दोलन तथा दिल्ली और पंजाब में छात्रों-युवाओं के बीच हमारे काम की ये लोग चर्चा तक नहीं करते? क्या कारण है कि गोरखपुर में और अन्य जगहों पर हिन्दुत्ववादी फ़ासिस्टों के विरुद्ध हमारी निर्भीक मुहिम का (तीन बार तो जनचेतना की प्रदर्शनी वैन भगवा गिरोह के गुण्डे तोड़ चुके हैं) ये लोग नाम तक नहीं लेते? इसलिए कि इनका मकसद यह बताना है कि हम लोग सिर्फ़ किताबें छापते-बेचते और सम्पत्ति जोड़ते हैं? क्यों इनसे वाम हलके का कोई भी बुद्धिजीवी उठकर यह सवाल नहीं पूछता कि ‘पार्टनर, तुम्हारी पॉलिटिक्स क्या है?’ ये लोग किन ताक़तों के साथ खड़े हैं, क्या यह बात एकदम साफ़ नहीं है?

(4) क्या सैकड़ों कार्यकर्ता, ऐक्टिविस्ट और हमदर्द इस क़दर ग़ुलाम और विवेकहीन हो सकते हैं कि व्यक्ति-विशेष और परिवार-विशेष के बँधुआ हो जायें? हम सबसे अधिक दुहराये जाने वाले, परिवार के प्रश्‍न पर पहली बार अपनी अवस्थिति स्पष्ट करना चाहते हैं। हम समझते हैं कि सच्चा कम्युनिस्ट वही है जो दूसरों के बच्चों से भगतसिंह की राह पर चलने का आह्वान करने से पहले अपने बच्चे को उस राह पर डाले, जो अपने जीवनसाथी, माँ-बाप, भाई-बहन सबको क्रान्ति की राह पर लाने को प्रेरित करे (यह बात अलग है कि वे आयें या न आयें)। सच्चा कम्युनिस्ट वह है जो यदि पूरावक़्ती कार्यकर्ता हो तो सम्पत्ति-सम्बन्धों से निर्णायक विच्छेद करे। सच्चा कम्युनिस्ट वह है जो निजी जीवन में शादी-ब्याह से लेकर अन्तिम संस्कार तक धार्मिक रीति-रिवाज़ों को नहीं माने और जात-पाँत को नहीं माने। भगोड़े जानते हैं कि हम सभी ने शुरू से इन उसूलों को जीवन में उतारा है और साथियों के परिवार के परिवार आन्दोलन में आये हैं। यह हमारे लिए गर्व की बात है। आखिरकार, भगोड़े इस बात की चर्चा क्यों नहीं करते कि राजनीति में यदि पूरे के पूरे परिवार आये हैं तो उसूली मतभेद होने पर भाई-भाई, भाई-बहन और बाप-बेटा तक अलग राजनीतिक राह के राही बने हैं। यह भी हमारे लिए गर्व की बात है। यह भी हमलोगों का घोषित आदर्श और व्यवहार है कि सीधे सैद्धान्तिक कार्य और नेतृत्वकारी ज़िम्मेदारी किसी को भी नहीं दी जाती। हर व्यक्ति शुरुआत छात्रों-युवाओं और बुनियादी स्तर पर मेहनतकश वर्गों को संगठित करने से ही करता है। हर व्यक्ति को सामान ढोने, स्टॉल लगाने, झाड़ू-पोछा, खाना-बनाने और मेहनत-मजूरी का काम सीखना-करना होता है, मज़दूरों के बीच रहना होता है, चाहे वह कई भाषाओं का ज्ञाता और पीएच.डी. ही क्यों न हो! हम सभी इसी प्रक्रिया से आये हैं। यदि कोई नेतृत्व के किसी व्यक्ति का बेटा/बेटी हो तो उसे और सख़्ती से स्वयं इस प्रक्रिया से गुज़रना होता है और स्वयं पैरों के नीचे अपनी ज़मीन बनानी होती है। इसका अबतक कोई अपवाद नहीं हुआ है, क्योंकि हमारा मानना है कि, गैर-जनवादी एशियाई समाज में पार्टियों के भीतर भाई-भतीजावाद और विशेषाधिकार की प्रवृत्तियाँ अनुकूल वस्तुगत आधार के कारण तेज़ी से फल-फूल सकती हैं। परिवारों को क्रान्ति की आग में झोंका जाना चाहिए पर इससे जुड़ी हुई ज़िम्मेदारियों का भी निर्वाह किया जाना चाहिए -- यह हम भली-भाँति समझते हैं। पर हम यह भी समझते हैं कि यह भारत है और यहाँ महज़ परिवारों के होने से ही परिवारवाद का आरोप लगाया जा सकता है और उसपर सहज विश्‍वास भी किया जा सकता है। हमारे बीच बहुतेरे स्‍त्री-पुरुष साथी ऐसे हैं जो साथ-साथ राजनीतिक-सांस्कृतिक काम करते हुए एक-दूसरे के जीवन सहचर बने। अब यदि रिश्तेदारी जोड़ते हुए कोई उन्हें परिवार घोषित कर दे, तो यह कितनी ओछी घटिया बात है -- इस पर भी सोचा जाना चाहिए। जहाँ तक किसी को भी ‘प्रोमोट’ किये जाने का सवाल है, हमारे यहाँ सभी संगठनकर्ता स्वतंत्र जिम्मेदारियाँ उठाते हैं, रोज़-रोज़ बौद्धिक-व्यावहारिक गतिविधियाँ करते हुए वे लोगों के बीच हैं। वहाँ चीज़ें एकदम साफ़ हैं। हमने तो कई बुद्धिजीवी मित्रों से कहा भी (और हमारा यह खुला प्रस्ताव है) कि आप ऐसे आरोपों पर सवाल पूछकर हमें अपमानित करने के बजाय छुट्टी लेकर आइये, हमारे पुस्तक प्रतिष्ठान व प्रकाशनों के कार्यालयों पर कुछ दिन बिताइये और कुछ दिन दिल्ली, पंजाब, उत्तर प्रदेश के हर कार्यक्षेत्र में कार्यकर्ताओं के बीच बिताइये। इसतरह आप स्वयं सच्चाई से परिचित हो जायेंगे।

(5) यहीं पर सम्पत्ति खड़ा करने के सवाल पर कुछ बातें। पहली बात, तकनीकी-क़ानूनी कारणों के कुछ अपवादों को छोड़कर, हमारे बीच जो भी पूरावक़्ती कार्यकर्ता हैं उनकी कोई निजी सम्पत्ति नहीं है और हर स्तर पर हर व्यक्ति की सुविधाओं और खर्चे आदि की पाई-पाई की पूर्ण पारदर्शी जवाबदेही होती है। तकनीकी-क़ानूनी कारणों से (जैसे किसी पहले से चल रहे मुक़दमे के कारण या ट्रस्ट/सोसाइटी को हस्तांतरण में किसी क़ानूनी पेंच के चलते विलम्ब होने के कारण) यदि कोई भवन/भूखण्ड किसी व्यक्ति के नाम से है भी तो हमारे बीच के हर व्यक्ति की जानकारी में और इस समझदारी के आधार पर है कि वह व्यक्तिगत सम्पत्ति कत्तई नहीं है। यदि कोई व्यक्ति क़ानूनी स्थिति का लाभ उठाकर कल को अपना दावा ठोंक भी दे तो उसे सभी साथी एक सेकण्ड की देर किये बिना संगठन से बाहर का रास्ता दिखा देंगे। दूसरी बात, प्रकाशन और पुस्तक-प्रतिष्ठान सामूहिक स्तर पर कमेटियाँ चलाती हैं। व्यक्तिगत लाभ की गुंजाइश ही नहीं है। इनमें पूरा समय लगाने वालों को भरण-पोषण भत्ता मिलता है। पाई-पाई का पारदर्शी हिसाब होता है। वैसे भी हमारे प्रकाशन घाटे में ही चलते हैं। जनता से विविध माध्यमों से नियमित सहयोग (कूपन काटना, पर्चा अभियान चलाना, नुक्कड़ नाटक, पोस्टर व कार्ड आदि कला-सामग्री बनाकर बेचना) जुटाकर ही हम इन्हें चलाते हैं और नयी किताबें छापते हैं। ''सम्पत्ति खड़ा करने'' जैसी बातें करने वाले लोग वे लोग हैं जो ऐसे हर सामूहिक उद्यम के प्रति सन्देह पैदा करके उन्हें ‘डैमेज’ करना चाहते हैं, और परिवर्तनकामी राजनीति को लांछित-कलंकित करना चाहते हैं।

(6) कुछ कवि मित्रों ने फोन करके पुरज़ोर आग्रह किया है कि चुप रहने के बजाय मुझे इस अपमानजनक आरोप पर भी बोलना चाहिए कि मेरा लेखन मेरा है ही नहीं। मुझे समझ नहीं आता कि इसपर क्या कहा जा सकता है। साहित्य की औसत समझ वाला व्यक्ति भी यह नहीं कह सकता, एक ईडियट या गधा ही कह सकता है। मेरी और शशिप्रकाश की विचारधारा एक है, जीवन का रास्ता एक है, जीने के तरीके में भी काफ़ी कुछ एकता है (जो अर्जित एकता है) लेकिन हम लोग शैली व रूप की दृष्टि से और काफ़ी हद तक विषयवस्तु के दायरे की दृष्टि से, दो स्कूलों के कवि हैं। शशिप्रकाश की कविता मूलतः ‘सब्जेक्टिव पोयट्री’ और ‘पोलिटिकल पोयट्री’ है। मेरी कविताओं का मिज़ाज अलग है। मुझे बीस वर्षों से बिरादर कवि-लेखक जानते है, गोष्ठियों-सेमिनारों में संवाद होते रहे हैं, फिर भी ऐसी ओछी बातें होती हैं तो इसका कारण एक है कि एक स्वतंत्र स्‍त्री को अपमानित करने की सबसे कारगर कोशिश यह होती है कि उसे व्यक्तित्वहीन घोषित कर दिया जाये।

जहाँ तक वैचारिक लेखन का सवाल है, उसके बारे में लगे हाथों कुछ बातें स्पष्ट कर दूँ। मेरा जो भी वैचारिक लेखन है (स्‍फुट टिप्पणियों, डायरियों व छिटफुट लेखों को छोड़कर) उसका अधिकांश हिस्सा सामूहिक विचार-विमर्शों (लिखने के पहले और लिखने के बाद) सुझावों, आलोचनाओं से इस क़दर प्रभावित होता है कि काफ़ी हद तक सामूहिक उत्पाद होता है -- यह बात मैं अकुण्ठ भाव से स्वीकार करती हूँ। जब किसी मंच से अपने समूह का प्रतिनिधित्व करते हुए मैं कोई पर्चा या आलेख पढ़ती हूँ तो वह पूरी तरह से हमारे पूरे समूह का विचार होता है। जिस बुद्धिजीवी ने भी किसी जन संगठन में काम किया है, वह इस बात को भली-भाँति जानता समझता है।

(7) कुत्सा-प्रचारकों के चरित्र को स्पष्ट करने के लिए एक और तथ्य पर दृष्टि डालें। इनके बीच का एक पतित तत्व जो सूदख़ोरी के ख़ानदानी धन पर जीने वाला एक अकर्मण्य सामाजिक परजीवी है, वह अपने गाली पुराण में स्वयं को परिकल्पना प्रकाशन का तथा जनचेतना प्रदर्शनी वाहन का ''मालिक'' बताता है तथा लिखता है कि हमलोग कार्यकर्ताओं से ''बेगारी'' करवाते हैं और ''भीख'' मँगवाते हैं। यह कहकर इस व्यक्ति ने स्वयं को ही नंगा कर लिया है। परिकल्पना प्रकाशन का ''मालिक'' वह या कोई भी व्यक्ति कभी नहीं था। एक कमेटी थी जिसमें वह भी था और उसने शुरू करते समय आर्थिक सहयोग किया था। इसी तरह प्रदर्शनी वाहन में भी उसने बड़ा हिस्सा सहयोग दिया था और वाहन उसी के नाम पर लिया गया था। अब बाहर जाने के बाद भी वह अपने को प्रकाशन व वैन का ''मालिक'' बता रहा है। यदि उसमें रत्ती भर भी कम्युनिस्ट संस्कार होते तो (यदि पूरा सहयोग उसी का होता तो भी) वह अपने को ''मालिक'' कदापि नहीं कहता और जहाँ तक कार्यकर्ताओं को भिखमंगा कहना है तो यह तो उसकी हिमाक़त के साथ ही इन लोगों की वर्गदृष्टि का ही एक जीता-जागता प्रमाण है। हमलोगों का यह पुराना और बार-बार दुहराया गया संकल्प है कि हम अपने प्रकाशन, अपने पत्र-पत्रिकाओं और संस्थाओं के लिए कोई भी सशर्त सांस्थानिक अनुदान (देशी पूँजीपतियों से, बहुराष्ट्रीय कम्पनियों से, उनके ट्रस्टों से, फण्डिंग एजेंसियों/एन.जी.ओ से, चुनावी पार्टियों से और सरकार से) नहीं लेते, केवल व्यक्तिगत सहयोग लेते हैं -- नियमित रूप से मज़दूर बस्तियों में कूपन काटते हैं, कालोनियों-बसों-ट्रेनों में पर्चा अभियान चलाते हैं, और नुक्कड़ नाटक-गायन आदि करते हैं। एक पूरी तरह से अनुत्पादक निठल्ला यदि इन कार्रवाइयों के ज़रिए जनता के बूते राजनीतिक-सांस्कृतिक काम खड़ा करने के गौरवपूर्ण सामूहिक उपक्रम को ''भीख माँगना'' और ''बेगारी करना'' कहता है तो वह हर सामाजिक कार्यकर्ता के ऊपर आसमान में सिर उठाकर थूकने की कोशिश कर रहा है। इस बारे में हमें और कुछ नहीं कहना है।

(8) एक और तथ्य ग़ौरतलब है। ये सभी पतित तत्व का. अरविन्द के निधन के बाद से लेकर अबतक लगातार यह प्रचार करते रहे हैं कि नेतृत्व ने का. अरविन्द की कोई सुध नहीं ली और उन्हें मरने के लिए अकेला छोड़ दिया, कि वे गोरखपुर निर्वासन के तौर पर भेजे गये थे... आदि-आदि। हद तो यह थी कि का. अरविन्द के माता-पिता तक को यह कहकर पूर्वाग्रहित करने की घृणित कोशिश की गयी। का. अरविन्द का निधन कितना आकस्मिक (मल्टिपल ऑर्गन फे़ल्योर के कारण) था, इसके डाक्टरी प्रमाण तो हैं ही, उनकी अंतिम साँस तक जुझारू-समर्पित कार्यकर्ताओं की टीम उनके पास खड़ी थी। देर रात नर्सिंग होम में भरती कराये जाने के अगले दिन रोग की गम्भीरता का पता चला तब पी.जी.आई. लखनऊ में भरती की तैयारी हो चुकी थी। दिल्ली, लखनऊ, पंजाब से साथी रवाना हो चुके थे। पर का. अरविन्द को लखनऊ या दिल्ली ला पाने की स्थिति ही नहीं थी, डॉक्टर यह परामर्श देने को क़तई तैयार नहीं थे। यह एकमात्र ऐसी बात है जिसकी चर्चा करते हुए हमें अपार क्षोभ और दुःख होता है। क्या कोई इस हद तक भी कमीनगी पर आमादा हो सकता है कि ऐसे मसले को भी दुष्प्रचार का विषय बनाये?

दिलचस्प बात यह है कि का. अरविन्द के जीवन काल में ये सभी तत्व उन्हें घृणिततम हमलों का निशाना बनाते रहे और अब वे उनके प्रति सहानुभूतिपूर्ण शब्दों की बारिश कर रहे हैं। दिलचस्प यह भी है कि इनमें से चन्द एक अपवादों को छोड़कर सभी को का. अरविन्द ने ही अलग-अलग समयों पर निष्कासित या निलम्बित किया था। पिछले दिनों किसी के पूछने पर एक भगोड़े ने कहा कि का. अरविन्द शरीफ़ दब्बू थे और उनसे यह सब करवाया जाता था। इस देश का क्रान्तिकारी वाम आन्दोलन का. अरविन्द के व्यक्तित्व से दो दशकों से परिचित था। हिन्दी प्रदेश के अधिकांश लेखक-पत्रकार भी उन्हें जानते थे। अब यह उनके तय करने की बात है कि क्या का. अरविन्द ऐसे दब्बू व्यक्ति थे कि जो चाहे उनसे जो करा ले? दूसरी बात यह कि वे स्वयं नेतृत्व के अग्रणी व्यक्ति थे। यह भला कौन नहीं जानता?

विगत पाँच वर्षों से दर्जन भर पतित तत्वों के एक गिरोह ने राजनीति से लेकर संस्कृति की दुनिया तक, देशव्यापी पुस्तिका-वितरण से लेकर ब्लॉग तक घनघोर कुत्सा-प्रचार का जो उत्पात मचा रखा है, वह हमारे लिए ज़रा भी आश्चर्य की बात नहीं है। पाश से शब्द उधार लेकर कह सकते हैं कि यह भी हमारे वक़्तों में ही होना था। हम ऐतिहासिक विपर्यय से पैदा हुए वैचारिक स्खलनों, नैतिक पतनों और निजी प्रतिबद्धताओं के विघटन के दौर में जी रहे हैं। ऐसे में हम चाहे जितना अलग रहने की कोशिश करें, टुच्ची घटिया चर्चाओं के कीचड़ में पैर फँसने का जोखिम बना ही रहता है। आज क्रान्तिकारी वाम राजनीति के एक दौर का विघटन हो रहा है और नया दौर अभी गति नहीं पकड़ सका है। डी.जी.पी. विश्‍वरंजन के आयोजन में ‘गोली दागो पोस्टर’ के कवि आलोकधन्वा जैसे लोगों की शिरकत तथा विभूति नारायण राय प्रकरण जैसी घटनाओं से वाम सांस्कृतिक आन्दोलन का निकृष्ट-पतित अवसरवादी परिदृश्य भी सामने है। छोटे-छोटे बौने ब्लॉगों की दुकान खोलकर चपड़-चर्चा कर रहे हैं और मठाधीश होने का मुग़ालता पाले बैठे हैं। ऐसे में यदि बुर्जुआ मीडिया और एन.जी.ओ. के कुछ पतित तत्व एक तरफ़ लाल कलगी लगाकर क्रान्तिकारी स्वाँग रचायें और दूसरी ओर बुद्धिजीवी समुदाय को कुत्सा-प्रचार की मसालेदार सामग्री परोसकर किसी ‘जेनुइन’ साहसिक सामाजिक प्रयोग को कलंकित-लांछित करने की कोशिश करें तो इसमें भला आश्चर्य की क्या बात?

रही हमारी बात। तो कुत्तों के भौंकने से हाथी की चाल पर कोई असर नहीं पड़ता। तमाम ''महामहिमों'' की भविष्यवाणियों को झुठलाकर हमने दो दशक की अपनी पथान्वेषी यात्रा पूरी की है, आगे भी हमारी यात्रा यूँ ही जारी रहेगी। जिन्हें पक्ष चुनना है, वे पक्ष चुनेंगे। जो ‘फे़न्स-सिटर’ हैं, वे किनारे बैठकर जग का मुजरा लेते 
रहेंगे। यही जीवन की गति है.



Aug 21, 2010

क्रांतिकारी चादर में साम्राज्यवादी 'ट्रोजन हॉर्स'


कात्यायिनी और उनकी पार्टी से जुड़े लोगों ने आलोचना करने वालों को अन्य गालियों के साथ एनजीओ में काम करने की वजह से भी तमाम गालियां दी हैं और कोसा है। क्या यह बकवास का चरम नहीं है जब ये अपने यहां एनजीओ का भस्मासुर पालते हैं और दूसरों को लपेटते रहते हैं। सत्यम वर्मा- Working with major national and international agencies and direct clients including The World Bank, unisef  ...

प्रवीण कुमार

कात्यायिनी जिस राहुल फाउंडेशन नाम के प्रकाशन की अध्यक्ष हैं,उसी प्रकाशन से छपी पुस्तक ‘डब्ल्यू.एस.एफ साम्राज्यवाद का नया ‘ट्रोजन हॉर्स’ को सत्यम वर्मा और अरविंद सिंह ने संपादित किया था। करीब दो सौ पेज की यह किताब 2004 में 50 रूपये कीमत के साथ छपी थी और उसमें एक लेख दायित्वबोध की ओर से भी डाला गया था जो आज भी पाठकों के पास मौजूद है। चूंकि कात्यायिनी और शशिप्रकाश के ही संगठन ने किताब छापी थी इसलिए जाहिरा तौर पर पहला लेख उन्होंने पार्टी के स्टैंड के तौर पर दायित्वबोध का ही रखा।

इसी तरह 25रूपये में सौ पेज की एक दूसरी किताब राहुल फाउंडेशन ने 2002 में छापी थी ‘एनजीओ एक खतरनाक साम्राज्यवादी कुचक्र’। उसके तो नाम से जाहिर है कि पूरी किताब स्वयंसेवी संगठनों के कुचक्रों पर ही केंद्रित होगी। बेशक इन दोनों पुस्तकों को पाठकों ने पसंद भी किया,खासकर ‘एनजीओ एक साम्राज्यवादी कुच्रक्र’ को।

सत्यम वर्मा
मैं इन दोनों पुस्तकों को शब्दशः पढ़ा हूं और मानता हूं कि 25रूपये वाली किताब ने हमारी समझदारी बनाने में मदद की। मगर जैसे ही मैंने सत्यम वर्मा का बायोडाटा पढ़ा और देखा कि वह मोबाइल कंपनी से लेकर विश्व बैंक,यूनीसेफ और ऐसे सैकडों संगठनों का अनुवाद करते हैं तो,सच बताउं मैं तो भन्ना उठा। मेरे लिए असह्य था क्योंकि जो न जानने या किसी मजबूरी में कोई किसी एनजीओ से जुड़ जाये तो यह लोग खाल खींचने की अदा में होते हैं और यहां है कि इसी घालमेल में पार्टी के केंद्रीय समिति सदस्य सत्यम वर्मा आकंठ डूबे हुए हैं।

मैं तो यहां देख रहा हूं कि कात्यायिनी और उनकी पार्टी से जुड़े लोगों ने आलोचना करने वालों को अन्य गालियों के साथ एनजीओ में काम करने की वजह से भी तमाम गालियां दी हैं और कोसा है। क्या यह बकवास का चरम नहीं है जब ये अपने यहां एनजीओ का भस्मासुर पालते हैं और दूसरों को लपेटते रहते हैं।

जो लोग सत्यम और उनके संगठन से जरा भी परिचित हैं वह जानते हैं कि दायित्वबोध को हमेशा ही रिवाल्यूशनरी कम्युनिष्ट लीग (भारत)का मुखपत्र माना गया है। कात्यायिनी और उनके संगठन से जुडे लोग कहते भी रहे हैं कि बिगुल और दायित्वबोध के विचार ही पार्टी के हैं। इसी तर्क को सिद्ध करते हुए उन्होंने कई दफा बिगुल और दायित्वबोध में तमाम वामपंथी संगठनों के साथ बहस भी चलायी है।

कात्यायिनी : ट्रोजन हॉर्स कौन
ऐसे में समझने के लिए यही ठीक होगा कि क्यों न उनके बारे में कोई विचार बनाने के लिए उनके ही तय मानकों के बरक्श उनकी शक्ल को परखा जाये। इसके चंद उदाहरण और तथ्य आप सभी पाठकों के सामने पेश है,जिससे की कात्यायिनी को इमोशनल अत्याचार का सहारा न लेना पड़े कि यह सब वामपंथ को बदनाम कर रहे हैं। ये सभी अंश इनके पार्टी स्टैंड की कॉपी है.

शामिल कौन है और पैसा कौन दे रहा है

विश्व सामाजिक मंच के आधे से अधिक संगठन साम्राज्यवादी पैसे से संचालित गैर-सरकारी संगठन (एनजीओ) हैं और इसके वित्तपोषकों में सबसे बड़ा और महत्वपूर्ण दाता कुख्यात फोर्ड फाउंडेशन है। इसके बाद आक्सफेम और हाइनरिख बोल फाउंडेशन और ऐक्शन एड जैसी सबसे बड़ी फण्डिंग एजेंसियों का नंबर आता है। विभिन्न चैनलों से विश्वबैंक, फ्रंास, ब्राजील और अन्य देशों की सरकारों का पैसा और दर्जनों अन्य फंण्डिंग एजेंसियों का पैसा भी मंच का मिल रहा है। गैर-सरकारी संगठनों के अतिरिक्त मंच में शामिल दूसरी श्रेणी दुनियाभर की किसिम-किसिम की सामाजिक जनवादी पार्टियों और संसदीय वामपंथियों/सशोधनवादी पार्टियों और संबद्ध ट्रेड यूनियनों,जनसंगठनों की है।

‘डब्ल्यूएसएफ साम्राज्यवाद का नया ट्रोजन हॉर्स’ के पेज 13 के तीसरे पाराग्राफ से

विश्व सामाजिक मंच को विश्व पूंजीवादी तंत्र की बुनियाद पर चोट करने वाले खतरों को रोकने के लिए एक आंतरिक अवरोधन प्रणाली, एक प्रतिसंतुलनकारी शक्ति और एक ‘सेफ्टी वाल्व’ के रूप में संगठित किया गया है। मूलतः इसका काम विश्व व्यापार संगठन, विश्व बैंक और अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष जैसी अंतरराष्ट्रीय वित्तीय एजेंसियों के एक पूरक की भूमिका निभाना है। आश्चर्य नहीं कि इसके पहले आयोजन से ही साम्राज्यवादी धन से सुधारवादी कार्रवाइयों में लिप्त गैर-सरकारी संगठन ही इसके आधे से अधिक घटक है और नीति-निर्धारक निकायों की कमान पूरी तरह से उनके हाथों में हैं।

‘डब्ल्यूएसएफ साम्राज्यवाद का नया ट्रोजन हॉर्स’ के पेज 17 के दूसरे पाराग्राफ से


अब तक बातें थीं, अब सत्यम वर्मा के काम पर गौर करें.

सत्यम वर्मा का बायोडाटा
Satyam Varma

Freelance Translator, English-Hindi

Native language: Hindi

I am working as a professional translator since 1991. I have translated more than 10 million words in areas as diverse as Literature, IT, Medical, Legal Documents, Patents, Business and Journalism.

Working with major national and international agencies and direct clients including The World Bank, Unicef, Mapi Research Institute, Indian Institute of Technology, Lionbridge, Transperfect, Crimson Languages, The Big Word, Sajan, Aquent, Acclaro, Aset International Services, Comms_multilingual, CompuMark, Lexxicorp, International Language Bank, Edge Translations, Ultra Translate, ATT, Lyric Labs, Crystal Hues, Cosmic Global and several others.

Creatively translated and edited numerous posters, brochures, booklets, advertisements and other publicity materials for several organizations and ad-agencies.
Co-Editor of Translation Project of World Classics brought out by premier Hindi publisher Rajkamal Prakashan Pvt. Ltd., New Delhi.

Translated books:
Some Completed Projects
Medical
1. Patient interviews, consent documents, vignettes for trial of a schizophrenia drug. (145,000 words.)
2. Rating scales, instructions and worksheets for Department of Psychiatry & Behavioral Sciences, University of Washington. (6,700 words.)
3. Patient information sheet and informed consent form for clinical trial of a lung cancer drug. (7,200 words.)
4. Operations manual for a Kala-Azar treatment access study. (12,000 words.)
5. Linguistic validation (2 forward translations + 1 back-translation + cognitive debriefing) of questionnaires and instructions regarding epilepsy for a French research institute. (3,400 words.)

Finance and Marketing

1. Annual Report of the World Bank, 2005-06. (26,500 words.)
2. Financial Reports of Oil and Natural Gas Corporation, India, 2004-06. (55,000 words.)
3. Marketing manual for sales agents of an insurance company. (17,500 words.)
4. Publicity materials of a direct sales company. (18,000 words.)
5. Textbook on political economy. (2,10,000 words.)


Training Manuals
1. Manual for employees of a property management company. (20,000 words.)
2. Manual for Incidence and Injury Free Orientation of Contractors. (6400 words.)
3. Diamond Best Practice Principles Assurance Programme Manual & Workbook 26,400 words.)
4. Manual for driving training institute, USA. (19,000 words.)
5. Manual for fork lift operators, Dubai. (8,000 words.)

Legal

1. Notice of a Canadian Class Action Lawsuit (10,000 words.)
2. License terms for MICROSOFT iCAFE E-LEARNING PROGRAM (3500 words.)
3. Software License Agreement for PeerMeSetup Installation Suite (3000 words.)
4. Terms and conditions document for Corum eCommerce Pty Ltd (2 000 words)
5. 'Dalits and the Law,' a book published by Human Rights Law Network (415 pages)

I.T.

1. Mobile phone - PC studio user's guide. (17,500 words.)
2. Mobile phone user's manual. (4,600 words.)
3. Part of Google Adwords software localization. (8,800 words)
4. Part of Gmail software localization. (9,400 words)
5. Linux localization. (180,000 words.)

Medical Dictionaries:

Black's Medical Dictionary
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(Satyam Varma)


 इस गुनाह  में शामिल होने पर - ‘दायित्वबोध’ संपादक मंडल  की राय देखें:   

"एनजीओ एक खतरनाक साम्राज्यवादी कुचक्र" किताब के पेज 3 से  


हम एनजीओ के प्रश्न पर सभी सामाजिक कार्यकर्ताओं और ईमानदार बुद्धिजीवियों को आगाह करना चाहते हैं। इस प्रश्न कर अनदेखी करने वालों को कल जनता कठघरे में खड़ा करेगी। ‘टैक्टिक्स’के नाम पर समझौता करने वाले ‘समझदारों का कोरस’ बहुत दिनों नहीं चलेगा। चुप लगाने वाले चुप्पी से अपने कुकर्मों को नहीं ढंक सकते।

हम एकतरफा ढंग से अपनी बात नहीं कहना चाहते। हम बहस की चुनौती देते हैं-एक-एक नुक्ते पर। क्रांतिकारी आंदोलन के पुलर्निर्माण के इस बीहड़ दौर में हम इस मुद्दे पर सफाई जरूरी समझते हैं, इसलिए इसे एजेंडे पर लाने के लिए हम सचेष्ट रहे हैं और आगे रहेंगे।

हमें पाठकों की प्रतिक्रिया की व्यग्र प्रतीक्षा है।
                                                                                 - ‘दायित्वबोध’ संपादक मंडल

अब देखना यह है कि दूसरों के लिए फरमान सुनाने  वाली  कात्यायिनी की पार्टी अपने  सदस्य सत्यम वर्मा के खिलाफ क्या सजा मुक़र्रर करती है.

ट्रोजन हॉर्स-  मित्र के वेश में छुपे हुए शत्रु.

Aug 20, 2010

वे अनन्य हैं, पुरुषोत्तम हैं और आलोचनाओं से परे हैं


'सहारा' अख़बार ने कात्यायनी के लिए जब मादा शब्द का इस्तेमाल किया था तब आपने इतना बड़ा आन्दोलन चला दिया कि जेल हुई,लाठियां चली,खून बहा लेकिन नोयडा में एक महिला साथी  का प्रयोग  आपने जिस तरह किया उससे क्या आपका परिवारवाद और स्त्री विरोधी चरित्र का पता नहीं चलता.

अरुण  यादव 

मेरे बेबाक -बेलौस साथियों,
आपने बड़ी सफाई से अपने को क्रन्तिकारी साबित करने का प्रयास किया है.साथ ही मेरे हिजड़े वाले साहस से मेरी नैतिक घटियाई के बारे में जानने की जुगुप्सा भी आप लोगों में काफी बलवती हो उठी है.ऐसे मसाले से राजनीति को कमान में रखने की शशिप्रकाश की पुरानी लाइन है,इसका सबसे बड़ा उदाहरण सम्मेलन था.जिसमें शशि प्रकाश ने अपनी एक महिला साथी से अपने ही राजनीतिक गुरु की नैतिकता पर आरोप लगवा दिया था.

ये चरित्र-चित्रण आपको मुबारक और इसके बिना यदि गैस बाहर न निकल पा रही हो तो राजेन्द्र यादव की तरह अपनी पत्रिकाओं में नैतिक पतन पर एक कालम चला दें.उसमें हम अपना जवाब जरुर भेज देंगे.संगठन से बाहर होने वाले सभी पर चूँकि आपका ये आरोप है तो 'हिजड़ों'और 'मऊगों'के नैतिक पतन पर आपको काफी सामग्री मिल जाएगी.शशिप्रकाश कात्यायनी के साथ आप लोग अपने नैतिक पतन पर लिखेंगे तो मर्दानों और गैर मऊगों के नैतिक पतन के बारे में भी लोग समझ पाएंगे.

आइये! थोड़ी उस इतिहास की भी चर्चा कर ली जाय, जिसे आपने छोड़ दिया है :-

गोरखपुर,करावल नगर और लुधियाना के आन्दोलन के व्यापक प्रचार-प्रसार में अपने ही बीस सालों के आन्दोलन की नाकामी को आप लोग जिस सफाई से छुपा ले गये हैं उस भोली अदा पे मर जाने को जी चाहता है.थोड़ी बानगी देखते हैं -बिगुल जून 2005 में इस्टर खटीमा आन्दोलन पर आपने लिखा है -इस आन्दोलन में दोनों सहयोगी संगठनों की अलग अलग लाइनों की टकराहट खुल कर सामने आई.

एक थी क्रन्तिकारी सर्वहारा लाइन जिसकी नुमाइंदगी  बिगुल मजदूर दस्ता कर रहा था और दूसरी थी आपके  अनुसार  निम्न बुर्जुआ (मध्यवर्गीय )क्रांतिकारिता की लाइन जिसकी नुमाइंदगी क्रन्तिकारी लोकाधिकार संगठन कर रहा था .कदम कदम पर दोनों लाइने टकरा रही थी .........समूचे आन्दोलन के दौरान क्रालोस ने जो अपनी लाइन चलाई ...अर्थवाद और अराजकतावादी संघधिपत्यवादी की लाइन है.

यह वही आन्दोलन है जिसमें मुकुल शशि प्रकाश के साथ थे और इस आन्दोलन की अगुआई कर रहे थे,लेकिन जब मुकुल इनके संगठन से बाहर निकल गये तब इसी आन्दोलन पर शशि प्रकाश के सदविचार सुन लीजिये जिसे उन्होंने बिगुल के अगस्त-सितम्बर 2008में लिखा था -''2005में जब खटीमा में इस्टर कारखाने के मजदूरों का आन्दोलन चल रहा था तो गतिरोध तोड़कर नई दिशा देने के लिए का.अरविन्द वहां गये ....मुकुल की लम्बे समय से जारी घिसी-पिटी अर्थवादी वादी ट्रेड यूनियनवादी लाइन के विरुद्ध संघर्ष को तीखा बनाकर निर्णायक मुकाम पर पहुंचा दिया.'' इस  आन्दोलन में  140 महिला पुरुष साथियों में एक महिला सहित चार साथी बिगुल के थे. जेल में आठ दिनों तक अनशन चला था लेकिन इस दौरान अगर क्रालोस के साथी जेल में चीजे नहीं पहुचाते तो बिगुल के साथी गमछा और साबुन भी नहीं पाते क्योकि शशि प्रकाश केवल धुल धुसरती आलोचना कर सकते थे मदद नहीं ..

'सहारा' अख़बार ने कात्यायनी के लिए जब मादा शब्द का इस्तेमाल किया था तब आपने इतना बड़ा आन्दोलन चला दिया कि जेल हुई,लाठियां चली,खून बहा लेकिन नोयडा में समीक्षा का प्रयोग अपने बचाव में आपने जिस तरह किया उससे क्या आपका परिवारवाद और स्त्री विरोधी चरित्र का पता नहीं चलता.का.अरविन्द की शादी के बाद लगभग पन्द्रह साल तक संगठन में प्रेम हत्यायों का शानदार इतिहास भी आपके नाम दर्ज है.हरियाणा के एक साथी की शादी हुई भी तो आपने उनका बच्चा नहीं आने दिया इस बीच अपना पोता आप जरुर खिलाने लगे. महाशय दोहरे राजनीतिक और सांस्कृतिक आचरण के ऐसे कई उदाहरण हैं जिनसे आपकी नीयत और चरित्र दोनों को समझा जा सकता है.

अब आइये,थोडा और पीछे चलते हैं.इंडियन रेलवे टेक्नीकल एंड आर्टीजन इम्प्लाइज एशोसिएसन और 'बगावत रंग लाएगी' नाम और नारा आप भूले नहीं होंगे. इसी समय आपने लम्बी-चौड़ी घोषणाएं की थी और 7 दिसम्बर को लखनऊ में रेल मजदूर अधिकार मोर्चा का गठन भी कर दिया गया था.इसकी असफलता का ठीकरा भी संगठनकर्ताओं के सर पर डालकर शशि प्रकाश साफ बचकर निकल गये.जनता को आपका क्या जवाब है जरुर बताइयेगा.

अब नोएडा आन्दोलन की भी बात कर ली जाये जहाँ झुग्गी से फैक्ट्री घेरने की पूरी तैयारी के साथ प्रकाश उतरे थे.वहाँ के कामों के मुख्य जिम्मेदार का.अरविन्द सिंह थे,लेकिन याद कीजिये सम्मलेन जिसमें शशि प्रकाश ने अपने ही मुखार बिन्दुओं में कहा था कि अरविन्द ने नोएडा के काम को दलदल में फंसा दिया था.

अरविन्द सिंह: मारे गए
इसी सम्मलेन में सुखविंदर ने अरविन्द की आलोचना करते हुए कहा था कि अरविन्द सिंह पुनर्जागरण प्रबोधन पर चार लाइन से ज्यादा नहीं बोल सकते और उनके कार्यक्षेत्र में जाते हैं तो सोते रहते हैं.इस आलोचना के बाद उन्हें उत्तरांचल के आन्दोलन में भेज दिया गया.जिसके बारे में आप ऊपर जान चुके हैं और फिर सीधे उन्हें गोरखपुर भेज दिया गया.वे अपने कपडे तक दिल्ली से नहीं ले सके थे. गोरखपुर में भी वे काफी परेशानी से गुजर रहे थे.ये बात मै खुद जानता हूँ,क्योंकि मैं खुद उनके साथ वहाँ था और इस बात की पुष्टि बेबाक बेलौस के साथियों ने मेरे निकलने के बाद मुझसे और मुकुल से खुद की थी.

उसी समय शशि प्रकाश,कात्यायनी और मीनाक्षी को जिन जिन गालियों से इन लोगों ने नवाजा था वह भी जान लीजियेगा,आपके साथ ही हैं.इस हालातों को जानने के बाद जय सिंह के 'मऊगा'वाली परिभाषा पर पाठक खुद विचार कर लें.मुझे कुछ नहीं कहना.हाँ विवेक उसी समय गोरखपुर में अरविन्द से मिले थे और उसी आधार पर उन्होंने अरविन्द की परेशानियों को शेयर किया था.ये फिर भी पुनर्जागरण प्रबोधन वाली लाइन के प्रैक्टिस का सवाल था,लेकिन असली सवाल इससे आगे नोएडा के काम पर है.अरविन्द को वहाँ से हटाने के वाद वहाँ के कामों की जिम्मेदारी खुद शशि प्रकाश ने अपने एक कुशल चंदाजुटाऊ भक्त के साथ ली थी.क्या हुआ उस काम का ?उसकी जिम्मेदारी कौन लेगा?ये न तो सवाल बनेगा और न ही इसकी जिम्मेदारी शशि प्रकाश लेंगे.न किसी कार्यकर्ता की हिम्मत है कि उनसे पूछ सकता है. वे अनन्य हैं, पुरुषोत्तम हैं, आलोचनाओं  से परे है.

अनुराग ट्रस्ट के नाम पर गोरखपुर में मोहल्ला में आधार बनाने और नई पीढ़ी को क्रन्तिकारी बनाने की थीसिस का क्या हुआ?अपने साथियों के बच्चों को भी आप नहीं रोक पाए और वे उस घुटन से अपने अपने घर चले गये. उन पर आप किस नैतिक पतन का आरोप तय करेंगे,ये आप खुद सोच लीजियेगा.मोहल्लाकरण के नाम पर कात्यायनी की पैतृक दाई ही आपको जानती है जिसके साथ आप उस टीन वाले एक कमरे का मुकदमा लड़ रहें है. शेष मुहल्ले के लिए संस्कृति कुटीर रहस्य ही है.

अब आइये 'हरी अनंत हरी कथा अनंता'वाले अभियान लोक स्वराज्य पर.इस अभियान का मुख्य मकसद लोक स्वराज्य पंचायतों का गठन और उनके माध्यम से क्रांतिकारी काम को आगे बढ़ाना था, लेकिन पिछले लगभग पंद्रह सालों में एक भी लोक स्वराज्य पंचायत नहीं बनी. मगर यह अभियान लगातार जारी है. पैसे आने लगातार जारी हैं. कहाँ जाते हैं, किसी को नहीं मालूम ...ठीक यही हाल पिछले तीन साल चले स्मृति संकल्प यात्रा का भी है .प्रचार-प्रसार के साथ मूल रूप में यह पैसे जुटाने और नए चंदा जुटाने वाले भक्तों की तलाश का ही अभियान था ...

बेबाक बेलौस के साथियों का पेट फूल रहा होगा कि उनके आरोपों का जवाब मैंने अभी तक नहीं दिया.आइये! आपके राजनीतिक आरोपों को थोडा समझने का प्रयास कर लिया जाये. आप लिखते हैं :- अपने को 'दिशा' का पूर्व संयोजक बताने वाले अरुण कुमार यादव को कुछ समय के लिए वि. वि. इकाई का संयोजक बनाया गया था जिसमें मैं महीनो छुट्टी पर था.

पर माफ़ कीजियेगा मुझे याद नहीं कि मुझे ये पद कब दिया था और किसने दिया था.इस पर हमें सिर्फ ये कहना है कि शशि प्रकाश के बेटे अभिनव सिन्हा को 'दिशा'का राष्ट्रीय संयोजक किसने बनाया,किस चुनावी प्रक्रिया से उन्होंने ये पद धारण किया और छोटे में कहें तो आपके सभी जन संगठनो का चुनाव कैसे होता है, कहाँ होता है, कौन कर्ता हैं, जरुर बता दे ....

दूसरा आरोप कि मुझे किन नैतिक आरोपों के तहत निकाला गया था, तो मेरे 'हिजड़े' साहस से ये भी जान लें.

1 . आठ साल के राजनीतिक जीवन में मैंने कुछ नहीं किया.
2 . मैंने संगठन विरोधी बयान दिया था.
3 . मेरा सांस्कृतिक स्तर नीचा है

यही तीन आरोप लगाकर मुझे 6 महीने के लिए निकाला गया था. शर्त थी अगर इस दौरान मै पतितों, भगोड़ों और गद्दारों से नहीं मिला और स्वदेश की दुकान पर नहीं गया तो लिखित आत्मालोचना के साथ मेरी वापसी हो सकती है ये आरोप क्यों लगे थे, आप लोगों सहित पाठक भी समझदार हैं ./..

बदलाव के औजार बनने थे,   धंधे बन गए.
अपने आठ सालों में मैंने चंदा माँगा था.ट्रेन में डेली चलने वाले यात्रियों की गालियां सुनी थी. आप लोगों को जोड़ने के काम में भूमिका निभाई थी और सारा पैसा शशि प्रकाश के ब्लैकहोल में जमा कर दिया था . जहाँ तक विरोधी बयान की बात है उसका एकमात्र उदाहरण ये था कि उत्तराखंड, हरियाणा की पूरी इकाई और ढेरों साथियों के बाहर होने के कारण मैंने कहा था कि एक एक विकेट गिर रहें है.इन्कलाब कैसे होगा और तीसरा सवाल जिसके साथ आपकी जुगुप्सा जुड़ी है उसका मैंने उचित मंच आपको बता दिया है. शुरू करें जबाब मिल जायेगा. वैसे आपके नेता की लाइन है जो भी बाहर जाये उस पर चरित्र हनन और गबन का आरोप जरुर लगा देना चाहिए और इसका पालन अनवरत जारी है.इसके नया उदाहरण हैं गोरखपुर इकाई से उदयभान और दिल्ली से राकेश.राकेश चूँकि शशि के सोने का अंडा देने वाली मुर्गी हैं इसलिए उन्हें हलाल करने के बजाय आजकल अज्ञातवास में रखा गया है.
पूरे देश में चलने वाले राजनीतिक संघर्षो में आप कहा खड़े हैं. इसकी बानगी तो आपको डॉ. विवेक ने अपने लेख में दे दी है. लेकिन आप लोग छाती पीट रहें है कि हम राजनितिक बहस नहीं कर रहे बल्कि कुत्सा प्रचार कर रहे हैं. वैसे आप लोगों को याद होगा कि आपके यहाँ किसी साथी की गैस भी निकल जाये उस पर मीटिंग और बात शुरू हो जाती है.वह भी शशि प्रकाश राजनीतिक ही मानते हैं.मीनाक्षी जी हमारे और आपकी पोस्टों से जनता को फैसला करने दें, क्या राजनीतिक है क्या गाली है. याद आ गया. एक उदाहरण भी सुन लीजिये आपको गोरखपुर में वकीलों के बीच काम करने के लिए भेजा गया था. आप वहां से यह कहते हुए भाग आई थी कि वकील बदबूदार गैस छोड़ते हैं...आप जिन साथियों को इतनी गालिया दे रही हैं उन्होंने आपका जितना सम्मान किया,वह अपने आपमें एक मिसाल है यह सिर्फ एक स्त्री होने के नाते आपको मिला था. आप उनकी राजनीतिक गुरु नहीं थी.
आप आर्थिक सहयोग सिर्फ पॉँच स्रोतों से जुटाने पर इतना घमंड दिखा रही हैं. उसके अंदर की बानगी भी लोगों को बता दीजिये.आप अपने पार्टी लेबी और नाटक नौटंकी द्वारा प्रचार के जरिये निकाल लिए गये रुपयों का अनुपात निकाल लें. आपकी राजनीतिक लाइन का असली रूप निकल जायेगा. आपके यहाँ जनता की जेब से रूपया निकालने की कला सिखाई जाती है. इसकी सबसे मजेदार मशक्कत ट्रेनों में कोई भी देख सकता है .
अब आप लोगों को साफ हो जाना चाहिए कि आपके हजारों रहस्यों को ठीक से जान लेने के बाद हम इस निष्कर्ष पर पहुँच चुके हैं कि आप लोग क़ानूनी धंधा फ़ैलाने वाले जनता और आन्दोलन के अपराधी लोग हैं.इसलिए सांगठनिक बहस की सीमा लगाने का भी कोई कारण नहीं है.तात्कालिक प्रदर्शनों पर इतराकर अतीत पर गोली मत दागिए. बीस सालों के इतिहास में एक कार्यकता सम्मलेन है, वो भी आनन फानन में इसलिए कर लिया गया था कि विरोधी आप पर सवाल खड़ा करने लगे थे.इस बहस का एक ही दुखद परिणाम है कि जवाब कार्यकर्ताओ से दिलाकर आप उनसे कुछ ज्यादा समय तक चंदा जुटवा सकेंगे भरोसा रखिये,अभी तमाम रहस्य खुलने बाकी हैं. जरुरत पड़ने पर वो भी खोले जायेंगे.डरिए मत,हम इंसानी गरिमा की सीमा हिजड़े वाले साहस के साथ बनाये रखेंगे.


मतभेदों को गालियों से पाटने की परम्परा


सत्यव्रत महोदय ने छि:थू धिक्कार के शीर्षक से कवि लीलाधर जगूडी को खरी-खोटी सुनाते हुए मुझ पर भी सरे-राहे दो-चार छींटे उछाल दिये थे.इसलिये यह सोच कर चुप रहा कि यह तो आप लोगों का,वाम तरीका है.लेकिन जब मीनाक्षी जी का पत्र पढ़ा तो लगा कि कुछ बातें कहनी ज़रूरी हो गयी हैं.

संदेशा शशिप्रकाश का वे कम्युनिस्ट नहीं "मउगा"हैं, कात्यायिनी ने भिजवाया जवाब, विरोधियों को कहा 'हिज़डा'और छिछोरों की मुंशीगीरी में साहित्यकार लगे हैं के जवाब में साहित्यकार  नीलाभ की एक संक्षिप्त टिप्पणी


प्रिय जय सिंह जी,

कई दिन पहले मेरे ई मेल पर आपका पत्र आया था जिसमें आपने मेरी निन्दा और लानत-मलामत करने के साथ-साथ अन्य बहुत से लोगों को काफ़ी जली-कटी सुनायी थी.मैं ने जवाब न देने की सोची थी.इसलिये नहीं कि मैं लाजवाब हो गया, बल्कि इसलिये कि मैं नहीं आप के कुछ पुराने साथी जवाब के तलबगार थे.

दूसरी बात यह कि पहले भी किन्हीं सत्यव्रत महोदय ने छि:थू धिक्कार के शीर्षक से लीलाधर जगूडी को खरी-खोटी सुनाते हुए मुझ पर भी सरे-राहे दो-चार छींटे उछाल दिये थे.इसलिये यह सोच कर चुप रहा कि यह तो आप लोगों का,वाम तरीका है.लेकिन जब मीनाक्षी  जी का पत्र पढ़ा तो लगा कि कुछ बातें कहनी ज़रूरी हो गयी हैं.

आपने मेरे नाम अपने पत्र में उन लोगों को "हिजड़ा" और "मऊगा" कहा है जिनका साथ मैं दे रहा हूं. मीनाक्षी जी ने कुछ साथियों पर समलैंगिकता क आरोप लगाया है.

हमारे यहां मऊगा उस मर्द को कहतें हैं जो स्त्रियों जैसा व्यवहार करे.यह शब्द बड़ी हिकारत से इस्तेमाल होता है और एक सामन्ती दिमाग़ का परिचायक है जो मर्दानगी को पुरुष-प्रधान नज़रिये से देखता है और हार्मोन सम्बन्धी गड़्बड़ियों से नावाकिफ़ है.

रही बात हिजड़ों की तो इसे गाली की तरह इस्तेमाल करके आपने अपनी विकृत मानसिकता का ही परिचय दिया है.क्या आपके "वैज्ञानिक"संगठन ने आपमें यही समझ पैदा की है ?क्या कम्यूनिज़्म आने पर आपका संगठन हिजड़ों पर पाबन्दी लगा देगा या वे पैदा ही नहीं होंगे ?

रही बात  समलैंगिकता की तो अब उसके पीछे भी वैज्ञानिकों  ने प्राकृतिक कारणों की शिनाख्त की है.इसलिए यौन व्यवहार को दकियानूसी ढंग से नहीं बल्कि वैज्ञानिक नज़रिये से देखने की ज़रूरत है.वरना आप हर मतभेद को गालियों से ही नवाज़ते रहेंगे और अपने आलोचकों के सवालों को गालियां दे कर या प्रत्यारोप लगा कर उनसे कतराते रहेंगे.

मुझे लगता है कि आपके संगठन में एक सामन्ती अवशेष अब भी बचा हुआ है जो आपकी गालियों से भी उजागर  होता है और आपके और मीनाक्षी जी के यौन सम्बन्धी नज़रिये से भी.यौन शुचिता का यह यह नज़रिया वैज्ञानिक  होने की बजाय सनातन धर्मियों जैसा है और आर एस एस जैसे संगठनों को ही फबता है.

मेरा मानना है कि यौन सम्बन्ध दो व्यकियों की रज़ामन्दी का मामला है.जहां रज़ामन्दी न हो वहां यौन सम्बन्ध बलात्कार की कोटि में आता है.यही नहीं बल्कि अगर कहीं विकृति नज़र आये तो उस पर हिकारत से थू-थू करने की बजाय उसे समझदारी से हल करने की ज़रूरत है.हम वैसे ही एक रुग्ण और  हिंसक समाज में रह रहे हैं उसे और रुग्ण और हिंसक मत बनाइये और साथियों के सवालों का जवाब दीजिये.


 
आपका
नीलाभ


Aug 19, 2010

परिवार से बाहर का बुद्धिजीवी गिनाएं

पार्टी के प्रवक्ता जय सिंह ने एक जगह कहा है कि जवाब वह  लिख रहे हैं,तो फिर जनज्वार में कात्यायिनी,शशिप्रकाश का नाम क्यों छापा जा रहा है.जयपुष्प बताएँगे कि संगठन में किसी कार्यकर्त्ता को धरना प्रदर्शन में शामिल होने भर कि भी इजाजत है?सांस्कृतिक प्रबोधन पर पारिवारिक एकाधिकार की खुन्नस तो देखिये ! के   बाद  पवन मेराज की  टिप्पणी

पवन मेराज, भोपाल से

जनचेतना के जय सिंह जी,सबसे पहले आपको बता दूँ....जनज्वार के पत्र कम्युनिज्म को बदनाम करने के लिए नहीं हैं बल्कि उस बदबदाती गन्दगी को साफ करने के लिए हैं  जिससे कि आज भी वहां परेशां होंगे.रही बात आप कार्यकर्ताओं द्वारा भेजे गए जवाब की तो,गुरु भरोसा करो हमलोग भी ऐसे ड्रामा में कई बार फंस चुके हैं जब संगठन कि इज्ज़त के नाम पर बहुत कुछ कराया जाता था जो हम नहीं करना चाहते थे.

कोई ग़लतफ़हमी मत पालिए की आप लोग कम्युनिस्ट हैं....न ही आपको ये मुगालता होना चाहिए कि पूरे क्रन्तिकारी खेमे में लोग ऐसा समझते है.हालाँकि जबतक सवाल उठाने वाले आपके वहां  थे तो उन्हें भी लगता था कि 'हमसे बड़ा कोई क्रांतिकारी काम नहीं कर रहा है',लेकिन बाहर आते ही लगता था कि हम जहाँ थे वह तो एक सुखा कुआँ था जिसकी नियति या फिर भटने की  थी,नहीं तो हमारे मरने की.  

आप लोग बस कम्युनिस्ट विचारधारा के प्रसार के नाम पर एक प्रकाशन चलाते हैं.आप प्रकाशकों में क्रन्तिकारी हो सकते हैं,लेकिन क्रांतिकारियों में आप प्रकाशक ही हैं.व्यक्तिगत स्तर पर मुझे ऐसे प्रकाशनों से गुरेज नहीं है,ऐसे प्रकाशन होने चाहिए.

पर दिक्कत ये है कि आप लोग तो पूंजीपतियों से भी गये-गुजरे हैं.पूंजीपति सरप्लस का एक बड़ा हिस्सा चट कर जाता है,लेकिन फिर भी श्रमिकों को कुछ तनख्वाह तो देता ही है. लेकिन आप के संगठन के पुरोधाओं ने तो श्रमिकों कि वो तनख्वाह भी मार ली. उनको भ्रम में रखा कि ये सब क्रांति के लिए हो रहा है इसलिए बलिदान-बलिदान.......और युवा भी कैसा मतवाला होता है चल पड़ता है आप के पीछे परिवर्तन के नाम पर.

आप लोगों ने युवा दिल की खुद को दूसरों में बिखेर देने की हसरत का फायदा उठाया है बस.इसीलिए आपके संगठन को ठग कहा जाता है. कितना अच्छा होता आप लोग सिर्फ प्रकाशक कि भूमिका में खुले तौर पर आ जाते, यकीन जानिए तब क्रन्तिकारी खेमा भी एक प्रकाशक के बतौर आपकी भूमिका को स्वीकार करता.लेकिन नहीं, शशिप्रकाश एंड कंपनी के पास पूँजी कहाँ थी... वो जुटाई गई कार्यकर्ताओं के खून और पसीने से. इसलिए आप लोग अपराधी हैं.

ठगी का एक वैकल्पिक मॉडल: अब यह भी उजागर हो गया है.

जरा सोचिये तो जो युवा वाकई बलिदान देते रहे वो कहाँ हैं...और जो उनसे बलिदान मांग रहा था वो कहाँ है. कार्यकर्ताओं से साथ जो हुआ उसका वर्णन बहुत से साथी कर चुके हैं,थोड़ा श्रम लगेगा,लेकिन उन पत्रों को दुबारा पढ़ लें.
जनचेतना का शुमार उभरते हुए हिंदी के बड़े प्रकाशनों में किया जाता है.कात्यायनी को कम से कम मैंने दो समारोहों में इसी परिचय के साथ शिरकत करते हुए पाया.ग्वालियर वाले समारोह में तो उनसे मुलाकात भी हुई थी. मजे की बात यह कि आयोजन किसी जैन सभा ने करवाया था.खैर ये सच है कात्यायनी ने बाद में दूसरे साथियों से खेद भी व्यक्त किया था कि उनको नहीं पता था की आयोजक कौन लोग हैं.

पर ये भी सच है की एसी कम्पार्टमेंट से सफ़र करते हुए वो दिल्ली से ग्वालियर ख़ुशी ख़ुशी आईं भी थीं.  मैं अदना सा व्यक्ति उनके बारे में क्या कहूँ, वो बड़ी लेखिका हैं.लेकिन कात्यायिनी ये बताएं कि क्या ये सच नहीं है कि आपके संगठन में जब भी किसी को कविता-कहानी लिखते हुए पाया जाता तो उसे यही समझाया जाता ये सब व्यक्तिगत महत्वाकांक्षा की तुच्छतायें हैं...इसलिए ये सब छोडो,क्रांति के काम में जुट जाओ ...मतलब किताबें बेचो,प्रकाशन के लिए चंदा जुटाओ.

लेकिन आप,आपका बेटा अभिनव और पति शशिप्रकाश जो कि सत्यव्रत  के भी नाम से लिखते हैं यह अधिकार किसने दिया.इतने वर्ष बीत गए अभिनव,सत्यम,मीनाक्षी,कात्यायिनी,  शशि प्रकाश (सत्यव्रत)आदि पारिवारिक सदस्यों के अलावा  भी कोई लेखक बना क्या,उसकी गिनती कितनी है और वह कौन है.

यानी बुद्धि का केंद्रीय कार्यभार आप ही लोगों के पास पिछले २० वर्षों से अटका हुआ है,आखिर क्यों ?बाकि कार्यकर्ता भगत सिंह जैसा जीवन जीने और क़ुरबानी से लबरेज जज्बे के साथ चाय-बिस्किट खाकर ट्रेनों, बसों,ऑफिसों,नुक्कड़ों चंदा मांग क्रांति के भ्रम में जीते रहते हैं.आपके पार्टी के प्रवक्ता जय सिंह ने एक जगह कहा है कि वह जवाब लिख रहे हैं,तो फिर जनज्वार में कात्यायिनी,शशिप्रकाश का नाम क्यों छापा जा रहा है.जयपुष्प   बताएँगे कि जो संगठन किसी कार्यकर्त्ता को धरना प्रदर्शन में जाने की इजाजत नहीं देता वह उन्हें लेख लिखने देगा इसका हमें कोई मुगालता नहीं.

पर खैर अब तो प्रकाशन भी चल निकला है और बड़े नेता लोग दिल्ली में प्रगट तौर पर अंडरग्राउंड होकर रह रहे हैं.दिल्ली विश्विद्यालय में बेटे, पत्नी, बहु, नाती के साथ कई बार टहलते हुए देखे गए शशिप्रकाश कभी दिल्ली के किसी कार्यक्रम में दिखें हों तो कोई बताये.मतलब गुड खाएं गुलगुले से परहेज.प्रगट दुनिया के लिए और अंडरग्राउंड कार्यकर्ताओं के लिए.

फायदा?इससे क्रांति का भ्रम बनाये रखने में मदद मिलती है और कार्यकर्ताओं के मानस में एक रहस्यमय दुनिया बनती है जिसके तिलिस्म से वो लम्बे समय तक निकल ही नहीं पाते.जब तक निकलते हैं तब तक नए लोग भरती हो जाते हैं ... उफ़ ये युवा भी.

क्रांति के लिए बलिदान मांगने वाले बच्चों ने ख़ूब बढ़िया बढ़िया जगहों से शिक्षा पाई.उदाहंरण के लिए अभिनव. (क्या ये सच नहीं है की आपके संगठन में जब भी कोई पढाई-लिखाई में एकाग्र होने कि कोशिश करता है तो उससे कहा जाता है कि ये सब व्यक्तिगत महत्वाकांक्षा की तुच्छतायें हैं...इसलिए ये सब छोडो क्रांति के काम में जुट जाओ ...मतलब किताबें बेचो,प्रकाशन के लिए चंदा जुटाओ. क्या यह सच नहीं सारी आधुनिक सुविधाएँ बेटा अभिनव के लिए जुताई जाति हैं और बाकी कार्यकर्ताओं को बलिदान का पाठ पढाया जाता है.ताज़ा उदाहरण बिगुल के संपादक की बेटी  समीक्षा और जनार्दन का है जो
ऐसे न जाने कितने उदाहरण हैं जो बताते हैं कितना अंतर है बलिदान मांगने वालों और बलिदान देने वालों में. क्या इस फर्क को इस वाक्य के साथ जोड़कर देखा जा सकता है -अमीरों की चमक-दमक गरीबों के खून पसीने से आती है.जब श्रमिक आपना हिस्सा मांगता है तो उन पर लाठियां भांजी जाती हैं. पर आप तो उनसे भी गए गुजरे हैं आप लोगों ने तो सब हड़प कर लिया और जब इन खून-पसीने से सीचने वालों या उनके जानने वालों ने आप से कुछ तर्कतः जवाब मांगे तो वो 'मउगा' और 'हिजड़े' हो गए. इन शब्दों को गालियों के रूप में इस्तेमाल करने से एक बात और स्पष्ट हो गई कि विभिन्न समूहों  के बारे में आपके विचार कितने घटिया और पिछड़े हुए हैं.

 जरा पढ़िए, लिखिए, देखिये, दुनिया के पैमाने पर लेफ्ट खेमे में इन पहचानों को लेकर क्या बहस चल रही है. इंसान नहीं बन सकते,कम से कम कोशिश तो कर सकते हैं.खैर ये बहस आपके आदमियत कि तरफ बढ़ने के बाद....फिलहाल तो  आपने उनको जवाब देने कि बजाए 'छि पतित थू विघटित' कहना शुरू कर दिया. अब क्या करें आप लाठी तो चला नहीं सकते. या आपमें इतनी हिम्मत है. ......?




सांस्कृतिक प्रबोधन पर पारिवारिक एकाधिकार की खुन्नस तो देखिये !

 
कात्यायिनी के संगठन की कार्यप्रणाली और तरीके पर रिवोलुशनरी कम्युनिस्ट लीग (भारत) से जुड़े रहे पार्टी कार्यकर्ताओं ने सवाल उठाये थे और कहा था कि वामधारा की यह पार्टी पारिवारिक कुनबा बन गयी है. प्रमाण के तौर पर कहा भी गया था कि सात सदस्यीय  केंद्रीय समिति में एक ही परिवार से पांच लोग हैं जिनका असली मकसद पैसा इकठ्ठा कर पारिवारिक पूंजी खड़ा करना है.

सवाल उठाने वाले कार्यकर्ताओं और पार्टी सदस्यों को उन्होंने जवाब भिजवाना शुरू किया है. तीन चिट्ठियों  के पहले क्रम में कात्यायिनी ने भिजवाया जवाब,विरोधियों को कहा 'हिज़डा' लेख में जनचेतना  के संचालक और रिवोलुशनरी कम्युनिस्ट लीग (भारत) के सचिव शशिप्रकाश ने पार्टी  प्रवक्ता और अरविन्द सिंह न्यास के सदस्य जय सिंह उर्फ़ जयपुष्प  के माध्यम से, अपनी पार्टी का स्टैंड भिजवा दिया है,जिससे पाठक परिचित हैं. इस पार्टी के प्रवक्ता जयपुष्प उर्फ़ जय सिंह ने इस बहस को शुरू करने वाले विवेक कुमार के लेख 'वे छुपते हैं कि चिलमन से झरता रहे उनका नूर' पर प्रतिक्रिया में 'मऊगा' कहा है और जोर कम होता देख उन्होंने खुद के नाम से एक कमेन्ट भी किया है.


विवेक कुमार

आपके पत्र में एक रवानगी है। कई बार पढ़ा। कतई बोरियत नहीं हुई। कई सारे पेंच खुलते हुए नजर आये। खड़खड़ाती कार के भीतर के मंजर को तो हमने जनज्वार पर आयी पिछली पोस्टों में देखा था,  अब आपके माध्यम से बाहरी शक्ल की हकीकत का कुछ खुलासा होता दिख रहा है।

जयपुष्प उर्फ़ जयसिंह आप जिसके हिस्सेदार व तरफदार हैं उससे आपकी वाकिफियत कम दिखती है। बहरहाल, मेरा लिखना उस संगठन से आपको वाकिफ कराना नहीं है। मैं उस दरार को दिखाना चाहता हूँ जहाँ  आप खड़े हैं और खतरनाक निष्कर्ष व आकलन निकालने में कतई कोताही नहीं बरत रहे हैं। आपकी रौ में जो मर्दानगी है (जो कात्यायिनी और शशिप्रकाश की कविताओं में है), आपके निष्कर्षों व आकलन के साथ मिलकर जो शक्ल निर्मित करती है वह काफी डरावनी है।

आप 'हिजड़ा' नहीं हैं, आप 'मऊगा' नहीं हैं इसलिए आप नीलाभ को इनकी  संगत से बच निकलने की सलाह देते हैं। आप स्त्री नहीं हैं, पुरूष हैं।  एक ऐसा पुरूष जो स्त्री पर दंड भेद इत्यादि का तरफदार है। शायद इसीलिए बीबी से डरने वालों के प्रति आपमें सख्त धिक्कार है। प्रबुद्ध सांस्कृतिक मर्दवादी साथी- समय बदल गया है। इस पोपली जमीन पर खड़े होने से शंकराचार्य भी बचने लगे हैं। मगर आप और आपके भाई साहब (शशिप्रकाश) इस जमीन पर जिस तरह खड़े हैं उससे यह मसला कुछ खतरनाक दिशा संकेत करता है। ठीक वैसे ही जिस तरह आप और आपके भाईसाहब के निष्कर्ष व आकलन। आइए, इनके भीतर की दरारों के बारे में बात करें:


दूसरे प्रकाशकों से मूल और अनुवाद के चोरी आरोप
आपने जनज्वार पर लिखने वालों को 'हिजड़ा' और बहस ले आने की कार्यवाई को 'नंगई' की संज्ञा दी है। साथ ही पूछा है कि क्या 'फैसला करने का सबसे उपयुक्त मंच ब्लाग ही है।' आप निष्कर्ष निकालते हैं कि 'कोई भी व्यक्ति ब्लॉग पर गरमागरम बातें लिखकर और पैसिव रैडिकलिज्म की लीद फैलाकर बुद्धिजीवी होने का तमगा हासिल कर सकता है।' आप जमीनी आदमी हैं। ठोस बात करने का आपका दावा है।

कृपया ऐसे बुद्धिजीवी का नाम बतायें जिन्होंने लीद फैलाकर तमगा हासिल किया हो। आपको क्यों लगता है कि आप इस टूल का प्रयोग क्रांति के लिए कर रहे हैं और दूसरे लीद फैलाने के लिए कर रहे हैं? अजय प्रकाश  जनज्वार के माध्यम से बस्तर,बुंदेलखंड,आजमगढ़, हरियाणा के आम हालात तथा राजेन्द्र यादव, विश्वरंजन और  वीएन राय की साहित्यिक हकीकत को जिस तरह सामने लाये  उसकी हमारे समाज में क्या कोई उपयोगिता नहीं है?

यानी आपके साथ जो नहीं है उसका लेखन लीद है। आपके ब्लॉग पर पसंदीदा  किताबों की लिस्ट में सिवाय कात्यायिनी और शशिप्रकाश के दूसरा कोई भारतीय लेखक शामिल नहीं है,यह कैसा साहित्यिक दायरा है.  यह मर्दवादी अमेरिकी तर्क ही है जिसके तले आप 'विरोधी लाइन वाले संगठनों' को चिन्हित करते हैं और षडयंत्र का फरेब रचते हैं। आपके संगठन ने इंटरनेट टूल का प्रयोग किस क्रांतिकारी काम में किया है? आपकी सारी किताबें व पत्रिकाएं ठीक उसी तरह इंटरनेट पर क्यों नहीं उपलब्ध हैं जिस तरह हजारों संगठनों और लोगों ने ऑनलाइन  कर रखा है?

पार्टी सचिव शशिप्रकाश का ब्लॉग 'बात दूर तलक जायेगी' चुप है और सत्यम वर्मा अपने ब्लॉग से अनुवाद के फलक पर दूर तक फैले हुए हैं। सत्यम वर्मा टाइप  लिंकलिडेन  जॉब प्रोफाइल वेबसाइट देखिये तो पता चलेगा की असल एनजीओ कहा है और फिर 'एनजीओ एक खतनाक साम्राज्यवादी' के कुचक्र का असली दर्शन कामरेड की कोठरी में ही होगा.  तब जाकर आपको पता चलेगा कि  छटे -छमासे किसी कार्यक्रम में दिखने वाले सत्यम कार्यक्रम ख़त्म होने से पहले ही  टिकट कटाकर  कितना तेज कम्प्यूटरी आन्दोलन चलाते हैं। अन्य प्रयोगों  में आपके प्रेस रिलीज़ और चंदा उगाहने वाले अभियान से हर कोई वाकिफ है।

आपने ब्लॉग को बहस के लिए मंच के प्रयोग पर सवाल उठाया है। इससे महत्वपूर्ण बात है कि आप इसके लिए किस तरह के मंच का प्रयोग करते हैं। आपने सरकारी संस्थान से रजिस्टर्ड पत्रिका व प्रकाशन से लगातार न केवल चारू मजूमदार व अन्य नेतृत्व के खिलाफ बल्कि नक्सलबाडी से निकली धाराओं के खिलाफ भी लगातार मुहिम छेड़ रखी है। सीपीआई माओवादी के खिलाफ 'आतंकवाद विभ्रम व यथार्थ' पुस्तिका लिखकर आपने बंटवा दी, वह भी तब, जबकि बुर्जुआ सरकार ने भी पार्टी को आतंकवादी नहीं कहा था, आखिर आपके सचिव को  चिलमन में छुपने की  इतनी बेसब्री क्यों थी। फिर क्या यह बहस के लिए उपयुक्त तरीका व मंच था ?

फोटो कट पेस्ट : संगठन में भी काम का यही तरीका
दरअसल, जनज्वार पर आपके संगठन की आलोचना सामने आई। इस तरह की सार्वजनिक आलोचना व आत्मालोचना कोई नई बात नहीं है। माध्यम बदलते गये हैं। आज इस संदर्भ में ब्लॉग व इंटरनेट का प्रयोग खूब हुआ है और हो रहा है। कुछ उदाहरण पेश हैं। इपीडब्ल्यू में सीपीआई माओवादी पार्टी पर बहस व आजाद का रीज्वाइंडर। संहति में लालगढ़ पर विभिन्न संगठनों की बहस। सीजीनेट,ए वर्ल्ड टू वीन इत्यादि ढेरों उदाहरण हैं। तब आपकी आपत्ति क्या है, जनज्वार, अजय प्रकाश या हिन्दी?

आपने नीलाभ को समझाया है कि संगठन से निकले लोग फिसड्डी साबित हो चुके हैं। साथ ही आपने अपने गुप्तकाम के प्रकट रूप के तीन उदाहरण दिये हैं- लुधियाना, करावल नगर और गोरखपुर। क्या आप यह स्वीकार कर रहे हैं कि जब ये फिसड्डी आपके संगठन में थे उनके सारे काम इतिहास से बेदखल कर देने हैं? मैंने अपने पिछली पोस्ट में इसी बात की शंका जाहिर करते हुए लिखा था कि कामरेड अरविन्द को न्यास व मार्क्सवादी अध्ययन संस्थान के तले उनके जन आंदोलनकर्ता के रूप को भुला दिया जायेगा।

उत्तराखंड में हीरो होंडा का मजदूर आंदोलन, नोइड़ा में झुग्गी बस्ती बचाने का आंदोलन, मर्यादपुर के मल्लाह समुदाय का आंदोलन इत्यादि को आप किस श्रेणी में रखते हैं? डॉ.  विश्वनाथ व डॉ. दूधनाथ से लेकर जनार्दन तक को फिसड्डी साबित करते हुए, इतिहास पर पोछा मारते हुए आप दरअसल आप अपने भाईसाहब की कारस्तानियों के इतिहास को ही दुहरा रहे हैं। उन्होंने भी नेतृत्व व सहयोगी साथियों को फिसड्डी घोषित कर इतिहास पर पोछा मारने के काम को अभियान के तौर पर लिया था। यह अनुभव देवब्रत,रामनाथ और गैरी से जान लीजियेगा और न समझ में आये तो कुछ और का नाम पूछ लीजियेगा.

आपने जिन तीन आंदोलनों का जिक्र किया है उसके अंत के बारे में भी आपको जरूर बताना चाहिए। मसलन, गोरखपुर में मजदूर आंदोलन फैक्टरी बंद होने के ठप पड़ गया। उसके आगे की योजना जाहिरा तौर पर फैक्टरी को मजदूर अपने हाथ में लेकर चलाने की होनी चाहिए। यह काम हीरो होंडा, उत्तराखंड में एक हद तक हुआ। क्या यह गोरखपुर में हुआ? नहीं। करावल नगर में सिर्फ आप नहीं थे। एटक की भूमिका भी महत्वपूर्ण रही, जिसके खिलाफ आप लोगों ने प्रचार अभियान चलाया।

बादाम मजदूरों की मजदूरी बढ़ाने में आपकी सराहनीय भूमिका है। आपके पर्चों, लेखों के हिसाब से यह अर्थवाद की मंजिल है। इन मजदूरों को संबोधित पर्चें में आवास कब्जेदारी से लेकर फैक्टरी प्रबंधन की कब्जेदारी के नारे क्यों गुम हैं?आपके पर्चें दिल्ली जनवादी अधिकार मंच के पर्चों से किस तरह भिन्न हैं? लुधियाना के हाल मैं नहीं जानता। इतना जानता हूँ कि सारा मामला राष्ट्रीयता के तनाव के बीच सुलझाया गया, जिसमें नेता व फैक्टरी मालिक ही निर्णायक बने। यह चुनौतीपूर्ण व दुखद घटना है। बहरहाल, मुझे यह बताना था कि आप संगठन के इतिहास में कहां खड़े हैं।

आप जिस आधार पर संगठन से निकले साथियों को फिसड्डी घोषित कर रहे हैं उस आधार पर आपके यहां फिसड्डियों की भरमार है। मसलन, कात्यायनी ने आज तक कितने लेखकों व साहित्यकारों को तैयार किया। सत्यम वर्मा ने कितने साहित्यकार पत्रकार बनाये। शशिप्रकाश ने अपने बेटे अभिनव  को छोड़ कितने लोगों को 'क्रांतिकारी मार्क्सवादी' बनाया। बहरहाल,बात इससे इतर है। संगठन से निकलने के बाद इन साथियों ने अभी तक कोई और संगठन ज्वाइन नहीं किया। इनकी मार्क्सवाद में आस्था है। ये नक्सलबाडी की धारा को  मानते हैं। यह वह आधार है जहॉ से आलोचना आत्मालोचना करते हुए एक नई शुरूआत हो सकती है।

लेकिन यहाँ  तो गति ही भिन्न है। इन्हें झूठा, फरेबी, मक्कार, चुगलखोर, षडयंत्रकारी और आपके पार्टी सचिव के लिखित शब्दों में 'पेटीकोटजीवी' घोषित कर आप अपने को इस कदर विद्रूप बना रहे हैं कि लम्पटों के सरदार भी आपसे मुआफी मांग लें। क्या यह कुछ वैसा ही नहीं है जैसा एक सरमाएदार मजदूर के प्रति रवैया अपनाता है। यह तर्कशैली आपने कहां से उधार ले रखी है?उम्मीद है आप इस पर जरूर सोचेगें। नई शुरूआत परम्परा तोड़ने से होती है। फिसड्डियों की हकीकत से रू-ब-रू होइए।

आपने लिखा है, 'आज के हमारे प्रगतिशील लेखक, कवि और बुद्धिजीवी भारत की गरीब जनता के साथ ऐतिहासिक विश्वासघात कर चुके हैं।' आइए, कात्यायनी की कविता पर थोड़ी चर्चा करें। इनके चार संग्रह का समय 80 के दशक के अंत से आज तक का है। इस दौर में मजदूर, किसान, दलित, स्त्री, मुसलमान व अन्य अल्पसंख्यक, राष्ट्रीयताएं, आदिवासी व युवा समुदाय के खिलाफ सरकार ने एक के बाद एक अपराधों को अंजाम दिया।

इस पूरे दौर में साम्प्रादायिकता पर कुल चार कवितायेँ हैं। वर्ष 1992 में एक और 2002 में तीन। सबसे अधिक प्रेम पर, उसके बाद कवियों पर और फिर स्त्रियों पर। शेष समुदाय कविता से निर्वासित है। मजदूर कविता से नदारद है। उनके प्रेम के सार्वजनिक पक्ष के पार्श्व में कार्यकर्ता हैं, बेनाम। यह ऐतिहासिक विश्वासघात की श्रेणी में आता है या नहीं?

किसकी कवयित्री कात्यायिनी
आपकी यह क्रांतिकारी कवियत्री लिखती हैं: 'बदला जमाना,पर बदले नहीं रामधनी, गुजरा समय उनका, वे भी गुजर गये।' उत्तर प्रदेश में कहार, धोबी, बुनकर, मुसहर जैसी सैकड़ों जातियां मौत व भूखमरी की तरफ ठेल दी गयीं। सांप्रदायिकता व जातिवाद की राजनीति में यह प्रदेश उबलता रहा। इस हालात के प्रति इस कवियत्री की काव्यात्मक संवेदना निष्ठुर उदासीनता में अभिव्यक्त होती है।

ठीक इसी तरह की रचनाएं आपकी पुस्तिकाओं, पत्रिकाओं में आयीं। जिसका निष्कर्ष था कि धनी किसान मर रहा है तो यह उसकी नीयति है, आदिवासी उजड़ रहा है तो यह उसकी नीयति है। यह सचमुच कोहेकॉफ में सिम्फनी जैसा है, मौत-उजाड़ के प्रति निष्ठुर उदासीनता पर अहमन्यता की लंबी तान। यदि आप इस लंबी तान से उबरेगें तो पाएंगे कि इन विश्वासघातों से बाहर जन के कवि, लेखक और बुद्धिजीवी  हैं। जिनके गीत गाये जाते हैं। जिन्होंने जन के लिए मौत का वरण किया।

बंगाल, बिहार, आंध्र प्रदेश, महाराष्ट्र, कर्नाटक आदि राज्यों के सांस्कृतिक आंदोलन को गौर से देखिये। यहां नाम गिनाना जरूरी नहीं लगता, लेकिन यह बताना जरूरी लगता है कि यूपी में हाल में हुई गिरफतारियों के खिलाफ बुद्धिजीवियों  ने ही धरना-प्रदर्शन और अन्य सहयोग किया। बुद्धिजीवी ही थे जो हेम पांडे और आजाद की हत्या के खिलाफ खड़े हुए। यही लोग थे जिन्होंने सलवा जुडुम के खिलाफ अभियान चलाया। यही हैं जिन्होंने पोस्को नर्मदा से लेकर डाभोल परियोजना के खिलाफ खड़े होकर संघर्ष चलाया।

यही वह बुद्धिजीवी  समुदाय है जिसके खिलाफ सरकार षड़यंत्र  कर उन्हें सलाखों के पीछे डाल देना चाहती है या मार डालना चाहती है। इसी ने एक पीढ़ी भी तैयार की है जो विभूतीनारायण, आलोक मेहता या विश्वरंजन को बर्दाश्त करने को तैयार नहीं है। राजनीतिक कार्यकर्ता महोदय! एक बार आप अपने संगठन के गिरेबान में झांककर देखिये कि वहां लेखक, कवि और बुद्धिजीवियों के प्रति रवैया क्या था?

आपके लिए रामकृष्ण पांडेय जी ने अनुवाद किया। बदले में आपने उन्हें क्या दिया? उनकी कविताएं पढ़ी जाती हैं, लेकिन आपने नहीं छापा। उनका संग्रह कहीं और से छपा। उन्होंने न्गुगी व थ्यांगो की पुस्तक पेन प्वाइंट गन प्वाइंट का अनुवाद किया। आप उसे दबाकर बैठ गये क्योंकि यह आपके लिए उपयुक्त नहीं है। उनके अनुवादित किताबों की कितनी रायल्टी उनके घर पहुँचायी  गयी? जबकि उनके परिवार में कोई कमाने वाला नहीं रहा।

ऐसी कई कहानियां हैं। मूल मसला यह देखना है कि विश्वासघात किधर से हुआ है, गोरख पांडे की ओर से या दूसरी ओर से, रामकृष्ण पांडे की ओर से या आपकी ओर से, रामधनी की ओर से या कवियत्री कात्यायनी की ओर से। आप किन लेखकों, बुद्धिजीवियों, कवियों, संस्कृतिकर्मियों के बीच रहते हैं जो उच्च मध्यवर्ग जीवनशैली जी रहे हैं। यदि आप ऐसों के बीच हैं तो मुझे कुछ नहीं कहना। हां,यह जरूर कहना है कि आज भी इसी दिल्ली में आलू और सोयाबीन पर, मठठी और चाय पर जिदंगी गुजारते हुए सांस्कृतिक कर्म करने वालों की जमात काफी है और जिनके सृजन से एक उम्मीद बनती है।

अनुवाद ही आन्दोलन  
इस संदर्भ में आप यह जरूर बताएं कि आपका संगठन अस्तित्व में आने के साथ ही लेखकों, कवियों, बुद्धिजीवियों के पीछे गालियों के भंडार के साथ क्यों पिल पड़ा? सत्ता प्रतिष्ठान में बैठे बुद्धिजीवियों ने आपकी लाइन का मार्ग प्रशस्त किया है, उन्हें हिलफर्डिंग का तमगा आपने पकड़ाया है,फिर भी आप छाती पीटे जा रहे हैं। यह तो अदभुत उलटबासी  है। यदि बात साफ नहीं है तो साम्राज्यवाद पर दायित्वबोध क लेख और अपने प्रकाशन की पुस्तिका जरूर देखें।

आपने जिन नखादा बुर्जुआ प्रकाशकों से नाउम्मीदी जाहिर की है उसी में से एक राजकमल ने आपकी संपादित पुस्तकों को छापा है। आकार प्रकाशन बड़े पैमाने पर  मार्क्सवाद की मौजूं किताबें छाप रहा है। दानिश भी लगा हुआ है। गार्गी, अंतर्राष्ट्रीय प्रकाशन, रेडिकल पब्लिकेशन जैसे ढेरों प्रकाशक इस काम में लगे हुए हैं। कृपया बताये कि 'मां' जैसी कौन सी किताब है जिसे कोई छापने के लिए कोई तैयार नहीं है और वितरण के लिए तैयार नहीं है। यदि यह कल्पना में है तो उसे जल्द से जल्द हकीकत में उतारिये।

अपने देश में हर साल हजारों किताबें बिना रजिस्टर्ड प्रकाशन के छपती और बिकती हैं। आपकी 'मां' जैसी किताब भी जरूर छपेगी और वितरित होगी। लेकिन अभी तो आप वही छाप रहे हैं जो दूसरे प्रकाशनों ने छाप रखी है। मसलन, तरुणाई  का तराना -यांग मो उपन्यास एआईआरएसएफ नाम के छात्र संगठन ने छापी थी और इसकी पच्चीस हजार प्रतियां उस समय अत्यंत कम दाम पर वितरित हुईं। इसे आप युवा के गीत के नाम से छापकर बेच रहे हैं। आपके प्रकाशन का 90 प्रतिशत हिस्सा दूसरे प्रकाशन का पुनर्मुद्रण ही है।

 चंद हेरफेर से आप मूल अनुवादक बन जाते हैं। आप पूर्ववर्ती प्रकाशकों, अनुवादकों को धन्यवाद भी ज्ञापित करने से बच निकलते हैं। आपसे यह बताने की गुजारिश है कि डाइसन कार्टर की पुस्तक पाप और विज्ञान का अनुवाद अन्य प्रकाशनों से किस तरह भिन्न है और गार्गी व पीपीएच के द्वारा इसके प्रकाशन के बावजूद आपने इसे क्यों छापा? आप यह बताएं कि आप और गार्गी प्रकाशन से छपी टर्निंग प्वाइंट इन चाइना के बीच अनुवाद में गुणात्मक फर्क क्या है और छपे होने के बावजूद आपने इसे क्यों छापा? इसी तरह पीपीएच व आपके प्रकाशन से छपे अन्ना करेनिना के अनुवाद के फर्क के बारे में जरूर बताएं। और यह भी बताएं कि इससे भारत की क्रांति में कौन सी अड़ंगेबाजी आ रही थी। वह कौन से शब्द व व्याकरण की गलतियां हैं जिसके होने से भारतीय क्रांति के कार्यक्रम में फर्क आ जाता?

आप भाषा और व्याकरण को जिस सांस्कृतिक प्रबोधन की जमीन को  रच रहे हैं वह मूलतः यूरोपीय और लातिनी है। इसकी हिन्दी बनावटी व आत्मा से हीन है। जब राजेन्द्र यादव ने आपकी इस हिन्दी के अनुवाद का आग्रह किया तो निश्चय ही वे गलत नहीं थे। आपकी यह हिन्दी जनपदीय भाषा के विस्तार व पहुँच  का निषेध करती है। आपकी भाषा वर्चस्व के मूल्य से प्रस्थान करती है। यह मर्दवादी तर्कशैली से काम करती है। फुसफुसाहट व व्याख्या के सहारे संवाद कायम करती है। एक संकुचित घेरे को निर्मित करती है।

दरअसल,समस्या यहां नहीं है जहां आप उलझते हुए नीलाभ को समझा रहे हैं। समस्या न्यास, प्रकाशन और संगठन के ऐसे गठनजोड़ की है जिसके केन्द्र में सांस्कृतिक प्रबोधन की राजनीति और उसके शीर्ष पर एक परिवार की कब्जेदारी है। यह कब्जेदारी राजनीतिक, सांगठनिक और सांस्कृतिक स्तर पर है। जो छपी पुस्तकों का पुनर्मुद्रण कर रहा है। इस बारे में काफी कुछ पिछले पोस्ट में लिखा जा चुका है। दुहराना ठीक नहीं लग रहा।

इतना लिखना जरूरी लग रहा है कि आपके संगठन ने प्रकाशन व न्यास वगैरह का काम मजबूरी में नहीं, बल्कि संगठन की मूल योजना के तहत लिया हुआ है। सांस्कृतिक प्रबोधन के दस्तावेज को आप जरूर पढ़ें, ताकि कम से कम आप प्रकाशन के काम में 'मजबूर' न रहें। आप हथियार खरीदने और किताब खरीदने के बीच लेखकों  को खड़ा कर एक ऐसी कल्पना में मशगूल हैं जिसमें सिर्फ तरंगें हैं, जमीन नदारद है। बहरहाल,आपको एक ठोस जमीन मयस्सर हो।

मैं आपके संगठन की दलित, स्त्री, मुसलमान, आदिवासी मुददों पर पोजीशन जानने का इच्छुक हूँ। आपका संगठन हिजड़ों व समलैंगिकता पर क्या विचार रखता है, यह जरूर बतायें। हिजड़ा शारीरिक श्रम कर सकता है और करता है। मसला अवसर का है। शारीरिक आधार पर भेदभाव करना, उसे गाली में बदल देना ठीक वैसे ही है जैसे स्त्रियों के मामले में किया गया। आप यह जरूर मानते होंगे कि स्त्री पुरूष बराबर हैं। ऐसे में आपके द्वारा पति से पत्नी पर दबंगई की मांग उपरोक्त का निषेध नहीं है। यह मसला सिर्फ आपका नहीं है। आपका नेतृत्व इससे भी गंदी भाषा का प्रयोग करता है। सांस्कृतिक प्रबोधन का अभियान चलाने वाले संगठन की यह भाषा, व्यवहार उसके भीतर की हकीकत को ही दिखाता है।  उम्मीद है कि कुछ सार्थक हस्तक्षेप करने वाले हाथ जरूर आगे आयेंगे।