Apr 19, 2017

मौत से पहले ही हिटलर को ठहरा दिया गया था युद्ध अपराधों का दोषी

ब्रिटिश लेखक का खुलासा

अमेरिकी और ब्रिटिश सरकार को हिटलर द्वारा किए जा रहे नरसंहार के बारे में पता था लेकिन उन्होंने जानबूझकर रोकने के लिए नहीं उठाया था कोई कदम.....

पुरानी मान्यताओं के विपरीत यह पता चला है कि द्वितीय विश्वयुद्ध के दौरान नाज़ी सरकार द्वारा की गई कार्रवाई के लिए जर्मनी के पूर्व तानाशाह अडोल्फ हिटलर को युद्ध अपराधों का दोषी ठहराया गया था। 

ब्रिटिश शिक्षाविद् डैन प्लैश की नई किताब "हयूमैन राइट्स आफ्टर हिटलर" के अनुसार, दिसंबर 1944 में युद्ध अपराधों के लिए हिटलर को संयुक्त राष्ट्र युद्ध अपराध आयोग की पहली सूची में रखा गया था। साथ ही आयोग ने एक महीने पहले माना था कि नाज़ियों द्वारा की गई कार्रवाई के लिए हिटलर को आपराधिक रूप से ज़िम्मेदार ठहराया जा सकता है। इसके बाद मार्च 1945 के आखिर में और हिटलर की मौत से एक महीने पहले आयोग ने उस पर युद्ध अपराधों के लिए 7 अलग-अलग अभियोग लगाए थे। 

ब्रिटिश वेबसाइट इंडिपेंडेट के मुताबिक 15 दिसंबर 1944 को चेकोस्लोवाकिया द्वारा आयोग को जमा कराए गए दस्तावेज़ो में हिटलर और उसकी सरकार के 5 सदस्यों को आरोपी ठहराया गया था। इसमें हिटलर के जूनियर रुडोल्फ हेस और हेनरिक हिमलर भी थे, जिनको यहूदियों के नरसंहार के लिए सबसे ज़िम्मेदार बताया जाता है। इसके अलावा प्लैश की किताब में यह भी बताया गया है कि द्वितीय विश्वयुद्ध के मित्र राष्ट्र जर्मनी द्वारा यहूदियों के नरसंहार के स्तर के बारे में ढाई साल पहले ही पता चल चुका था।

साथ ही प्लैश बताते हैं कि अमेरिका और ब्रिटिश सरकारों को हिटलर की नाज़ी सरकार द्वारा यहूदियों के बड़े पैमाने पर किए जा रहे नरसंहार के बारे में पता था, लेकिन उन्होंने जान—बूझकर उसे रोकने के लिए कोई कदम नहीं उठाया। वहीं, नवंबर 1940 में सबसे पहले नाज़ी सरकार के अत्याचार की निंदा चेक और पोलिश सरकार ने संयुक्त वक्तव्य में की थी। इसके बाद 1942 में अमेरिकी, ब्रिटिश और रूसी सरकार ने अपने मित्र राष्ट्रों के साथ एक सार्वजनिक घोषणा कर हिटलर द्वारा यूरोप के यहूदियों पर किए जा रहे अत्याचार की स्पष्ट निंदा की थी।

मनीष सिसौदिया की डिमांड पर भक्त पत्रकार यहां पढ़ें 'राग दरबारी'

मनीष सिसौदिया ने कहा मोदी की आरतियां-चालीसाएं लिखने वाले पत्रकारों को एक बार ज़रूर पढ़ लेना चाहिए राग दरबारी , तो लीजिये पेश है राग दरबारी का सर्फ़री हिस्सा

जनज्वार। भारतीय बैंकों का 9400 करोड़ रुपये डकार कर लंदन भाग जाने वाले किंगफिशर के प्रमुख विजय माल्या के मामले में भक्त पत्रकार 'कमलीय रतौंधी' के शिकार हो गए। उन्हें माल्या की लंदन के कोर्ट में पेशी गिरफ्तारी नजर आई और मुकदमा शुरू होने की प्रकिया की कागजी कार्यवाही को भक्त पत्रकारों ने प्रत्यर्पण की तैयारी कह डाला। 

हालांकि इस बात में कुछ खास नहीं था। देश भक्त पत्रकारों की रतौंधी पिछले दो—तीन वर्षों से रोज—रोज झेल रहा है। सरकार अभी मूंह से बोलती है और उधर चैनल वाले उसे स्टूडियों में लागू करा देते हैं।

पर दिल्ली के उपमुख्यमंत्री और आप नेता मनीष सिसौदिया को पत्रकारों की माल्या में मामले में भक्ति नागवार गुजरी और उन्होंने पत्रकारों को ट्वीट कर यह संदेश दिया, 'सुनवाई के लिए कोर्ट गए आदमी को गिरफ्तार बताकर, मोदी आरतियां-चालीसाएं लिखने वाले पत्रकारों को एक बार रागदरबारी ज़रूर पढ़ लेना चाहिए.'  वैसे भी शीघ्रपतन की तरह ही हुई माल्या की गिरफ्तारी ।

गौरतलब है कि श्रीलाल शुक्ल का लिखा रागदरबारी एक राजनीतिक उपन्यास है। यह उपन्यास आजादी के बाद विकसित होते भारतीय समाज पर है। उपन्यास में आजादी के बाद बदलती राजनीति, आम आदमी की बढ़ती सामाजिक भागीदारी, उभरते नेता, विकास के नारे, राजनीति का अपराधिकरण, निखरती दलाली, पूंजीपतियों के इशारे पर बनती —बिगड़ती सरकारों का व्यंग्यात्मक विवरण है और हर तरह के ढोंग, पाखंड और आदर्श की कलई खोली गई है।

यहां कबाड़खाना ब्लॉग से साभार 'राग दरबारी का सर्फरी हिस्सा' दिया जा रहा है, जो उपन्यास का ही एक भाग है। आप भी पढ़िए और देखिए इसमें ऐसी क्या अद्भभुत बात है जो दिल्ली के उपमुख्यमंत्री मनीष सिसौदिया ने चाटुकार पत्रकारों को इसे पढ़ने की राय दे डाली...                        
राग दरबारी से एक 'सर्फरी हिस्सा'
शिवपालगंज गॉंव था, पर वह शहर से नजदीक और सड़क के किनारे था. इसलिए बड़े बड़े नेताओं और अफसरों को वहॉं तक आने में सैद्धान्तिक एतराज नहीं हो सकता था. कुओं के अलावा वहॉं कुछ हैण्डपम्प भी लगे थे, इसलिए बाहर से आने वाले बड़े लोग प्यास लगने पर, अपनी जान को खतरे में डाले बिना, वहॉं का पानी पी सकते थे. खाने का भी सुभीता था. वहॉं के छोटे मोटे अफसरों में कोई न कोई ऐसा निकल ही आता था जिसके ठाठ बाट देख कर वहॉं वाले उसे परले सिरे का बेईमान समझते, पर जिसे देख कर ये बाहरी लोग आपस में कहते, कितना तमीजदार है. बहुत बड़े खानदान का लड़का है. देखो न, इसे चीको साहब की लड़की ब्याही है. इसलिए भूख लगने पर अपनी ईमानदारी को खतरे में डाले बिना वे लोग वहॉं खाना भी खा सकते थे. कारण जो भी रहा हो, उस मौसम में शिवपालगंज में जन नायकों और जन सेवकों का आना जाना बड़े जोर से शुरू हुआ था. उन सबको शिवपालगंज के विकास की चिन्ता थी और नतीजा यह होता था कि वे लेक्चर देते थे.



वे लेक्चर गँजहों के लिए विशेष रूप से दिलचस्प थे, क्योंकि इनमें प्रायः शुरू से ही वक्ता श्रोता को और श्रोता वक्ता को बेवकूफ मानकर चलता था जो कि बातचीत के उद्देश्य से गँजंहों के लिए आदर्श परिस्थिति है. फिर भी लेक्चर इतने ज्यादा होते थे कि दिलचस्पी के बावजूद, लोगों को अपच हो सकता था. लेक्चर का मजा तो तब है जब सुनने वाले भी समझें कि यह बकवास कर रहा है और बोलने वाला भी समझे कि मैं बकवास कर रहा हूं. पर कुछ लेक्चर देने वाले इतनी गम्भीरता से चलते कि सुनने वाले को कभी-कभी लगता था यह आदमी अपने कथन के प्रति सचमुच ईमानदार है. ऐसा सन्देह होते ही लेक्चर गाढ़ा और फीका बन जाता था और उसका श्रोताओं के हाजमे के बहुत खिलाफ पड़ता है. यह सब देख कर गँजंहों ने अपनी-अपनी तन्दुरुस्ती के अनुसार लेक्चर ग्रहण करने का समय चुन लिया था, कोई सवेरे खाना खाने के पहले लेक्चर लेता था, कोई दोपहर को खाना खाने के बाद. ज्यादातर लोग लेक्चर की सबसे बड़ी मात्रा दिन के तीसरे पहर ऊँघने और शाम को जागने के बीच में लेते थे.

उन दिनों गांव में लेक्चर का मुख्य विषय खेती था. इसका यह अर्थ कदापि नहीं कि पहले कुछ और था. वास्तव में पिछले कुछ कई सालों से गांववालों को फुसलाकर बताया जा रहा था कि भारतवर्ष एक खेतिहर देश है. गांववाले इस बात का विरोध नहीं करते थे, पर प्रत्येक वक्ता शुरू से ही यह मान कर चलता था कि गांववाले इस बात का विरोध करेंगे. इसीलिए वे एक के बाद दूसरा तर्क ढूंढकर लाते थे और यह साबित करने में लगे रहते थे कि भारतवर्ष एक खेतिहर देश है. इसके बाद वे यह बताते थे कि खेती की उन्नति ही देश की उन्नति है. फिर आगे की बात बताने के पहले ही प्रायः दोपहर के खाने का वक्त हो जाता और वह तमीज़दार लड़का, जो बड़े सम्पन्न घराने की औलाद हुआ करता था और जिसको चीको साहब की लड़की ब्याही रहा करती थी, वक्ता की पीठ का कपड़ा खींच-खींचकर इशारे से बताने लगता कि चाचाजी, खाना तैयार है. कभी कभी कुछ वक्तागण आगे की बात भी बता ले जाते थे और तब मालूम होता कि उनकी आगे की और पीछे की बात में कोई फर्क नहीं था, क्योंकि घूम-फिरकर बात यही रहती थी कि भारत एक खेतिहर देश है, तुम खेतिहर हो, तुमको अच्छी खेती करनी चहिए, अधिक अन्न उपजाना चाहिए. प्रत्येक वक्ता इसी सन्देह में गिरफ्तार रहता था कि काश्तकार अधिक अन्न नहीं पैदा करना चाहते.

लेक्चरों की कमी विज्ञापनों से पूरी की जाती थी और एक तरह से शिवपालगंज में दीवारों पर चिपके या लिखे हुए विज्ञापन वहाँ की समस्याओं और उनके समाधानों का सच्चा परिचय देते थे. मिसाल के लिए, समस्या थी कि भारतवर्ष एक खेतिहर देश है और किसान बदमाशी के कारण अधिक अन्न नहीं उपजाते. इसका समाधान यह था कि किसानों के आगे लेक्चर दिया जाये और उन्हे अच्छी अच्छी तस्वीरें दिखायी जायें. उनके द्वारा उन्हे बताया जाये कि तुम अगर अपने लिये अन्न नहीं पैदा करना चाहते तो देश के लिये करो. इसी से जगह जगह पोस्टर चिपके हुए थे जो काश्तकारों से देश के लिये अधिक अन्न पैदा कराना चाहते थे. लेक्चरों और तस्वीरों का मिला जुला असर काश्तकारों पर बड़े जोर से पड़ता था और भोले-से-भोला काश्तकार भी मानने लगता कि हो न हो, इसके पीछे भी कोई चाल है.

शिवपालगंज में उन दिनों एक ऐसा विज्ञापन खासतौर से मशहूर हो रहा था जिसमें एक तन्दुरुस्त काश्तकार सिर पर अँगोछा बाँधे, कानों में बालियाँ लटकाये और बदन पर मिर्जई पहने गेहूँ की ऊँची फसल को हँसिये से काट रहा था. एक औरत उसके पीछे खड़ी हुई, अपने-आपसे बहुत खुश, कृषी विभाग के अफसरों वाली हँसी हंस रही थी. नीचे और ऊपर अंग्रेजी और हिन्दी अक्षरों में लिखा थ, "अधिक अन्न उपजाओ." मिर्जई और बालीवाले काश्तकारों में जो अंग्रेजी के विद्वान थे, उन्हे अंग्रेजी इबारत से और जो हिन्दी के विद्वान थे, उन्हे हिन्दी से परास्त करने की बात सोची गयी थी; और जो दोनों में से एक भी भाषा नहीं जानते थे, वे भी कम-से-कम आदमी और औरत को तो पहचानते ही थे. उनसे आशा की जाती थी कि आदमी के पीछे हँसती हुई औरत की तस्वीर देखते ही उसकी और पीठ फेर कर दीवानों की तरह अधिक अन्न उपजाना शुरू कर देंगे. यह तस्वीर आजकल कई जगह चर्चा का विषय बनी थी, क्योंकि यहाँ वालों कि निगाह में तस्वीर वाले आदमी की शक्ल कुछ-कुछ बद्री पहलवान से मिलती थी. औरत की शक्ल के बारे में गहरा मतभेद था. वह गाँव की देहाती लड़कियों में से किसकी थी, यह अभी तय नहीं हो पाया था.

वैसे सबसे ज़्यादा जोर-शोर वाले विज्ञापन खेती के लिए नहीं, मलेरिया के बारे में थे. जगह-जगह मकानों की दीवारों पर गेरू से लिखा गया था कि "मलेरिया को खत्म करने में हमरी मदद करो, मच्छरों को समाप्त हो जाने दो." यहाँ भी यह मान कर चल गया था कि किसान गाय-भैंस की तरह मच्छर भी पालने को उत्सुक हैं और उन्हें मारने के पहले किसानों का हृदय-परिवर्तन करना पड़ेगा. हृदय-परिवर्तन के लिए रोब की जरूरत है, रोब के लिए अंग्रेजी की जरूरत है - इस भारतीय तर्क पद्धति के हिसाब से मच्छर मारने और मलेरिया उन्मूलन में सहायता करने की सभी अपीलें प्रायः अंग्रेजी में लिखी गयी थीं. इसीलिए प्रायः सभी लोगों ने इनको कविता के रूप में नहीं, चित्रकला के रूप में स्वीकार किया था और गेरू से दीवार रंगने वालों को मनमानी अंग्रेजी लिखने की छूट दे दी थी. दीवारें रंगती जाती थीं, मच्छर मरते जाते थे. कुत्ते भूँका करते थे, लोग अपनी राह चलते रहते थे.

एक विज्ञापन भोले-भाले ढंग से बताता था कि हमें पैसा बचाना चहिए. पैसा बचाने की बात गांववालों को उनके पूर्वज मरने के पहले ही बता गये थे और लगभग प्रत्येक आदमी को अच्छी तरह मालूम थी. इसमें सिर्फ़ इतनी नवीनता थी कि यहाँ भी देश का जिक्र था, कहीं-कहीं इशारा किया गया था कि अगर तुम अपने लिए पैसा नहीं बचा सकते तो देश के लिए बचाओ. बात बहुत ठीक थी, क्योंकि सेठ-साहूकार, बड़े-बड़े ओहदेदार, वकील डाक्टर - ये सब तो अपने लिए पैसा बचा ही रहे थे, इसलिए छोटे-छोटे किसानों को देश के लिए पैसा बचाने में क्या ऐतराज हो सकता था ! सभी इस बात से सिद्धान्तरूप में सहमत थे कि पैसा बचाना चाहिए. पैसा बचाकर किस तरह कहाँ जमा किया जायेगा, ये बातें भी विज्ञापनों और लेक्चरों में साफतौर से बतायी गयी थीं और लोगों को उनसे भी कोई आपत्ति न थी. सिर्फ़ लोगों को यही नहीं बताया गया था कि कुछ बचाने के पहले तुम्हारी मेहनत के एवज़ में तुम्हे कितना पैसा मिलना चाहिए. पैसे की बचत का सवाल आमदनी और खर्च से जुड़ा हुआ है, इस छोटी सी बात को छोड़कर बाकी सभी बातों पर इन विज्ञापनों में विचार कर लिया गया था और लोगों ने इनको इस भाव से स्वीकार कर लिया था कि ये बिचारे दीवार पर चुपचाप चिपके हुए हैं, न दाना माँगते हैं, न चारा, न कुछ लेते हैं न देते हैं. चलो इन तस्वीरों को छेड़ो नहीं.

पर रंगनाथ को जिन विज्ञापनों ने अपनी ओर खींचा, वे पब्लिक सेक्टर के विज्ञापन न थे, प्राइवेट सेक्टर की देन थे. उनसे प्रकट होने वली बातें कुछ इस प्रकार थी: "उस क्षेत्र में सबसे ज्यादा व्यापक रोग दाद है, एक ऐसी दवा है जिसको दाद पर लगाया जाये तो उसे जड़ से आराम पहुँचता है, मुँह से खाया जाये तो खाँसी-जुकाम दूर होता है, बताशे में डालकर पानी से निगल लिया जाये तो हैजे में लाभ पहुँचता है. ऐसी दवा दुनिया में कहीं नहीं पायी जाती. उसके अविष्कारक अभी तक जिंदा हैं, यह विलायत वालों की शरारत है कि उन्हे आज तक नोबल पुरस्कार नहीं मिला है".

इस देश में और भी बड़े बड़े डॉक्टर हैं जिनको नोबल पुरस्कार नहीं मिला है. एक कस्बा जहानाबाद में रहते हैं और चूँकि वहाँ बिजली आ चुकी है, इसलिए वे नामर्दी का इलाज बिजली से करते हैं. अब नामर्दों को परेशान होने की जरूरत नहीं है. एक दूसरे डॉक्टर, जो कम-से-कम भारतवर्ष-भर में तो मशहूर हैं ही, बिना ऑपरेशन के अण्ड-वृद्धि का इलाज करते हैं. और यह बात शिवपालगंज में किसी भी दीवार पर तारकोल के हरूफ़ में लिखी हुई पायी जा सकती है. वैसे बहुत से विज्ञापन बच्चों में सूखा रोग, आँखों की बीमारी और पेचिश आदि से भी सम्बद्ध हैं, पर असली रोग संख्या में कुल तीन ही हैं- दाद, अण्डवृद्धि और नामर्दी; और इनके इलाज की तरकीब शिवपालगंज के लड़के अक्षर-ज्ञान पा लेने के बाद ही दीवारों पर अंकित लेखों के सहारे जानना शुरू कर देते हैं.

विज्ञापनों की इस भीड़ में वैद्यजी का विज्ञापन 'नवयुवकों के लिए आशा का सन्देश' अपना अलग व्यक्तित्व रखता था. वह दीवारों पर लिखे 'नामर्दी के बिजली से इलाज' जैसे अश्लील लेखों के मुकाबले में नहीं आता था. वह छोटे छोटे नुक्कड़ों, दुकानों और सरकारी इमारतों पर - जिनके पास पेशाब करना और जिन पर विज्ञापन चिपकाना मना था - टीन की खूबसूरत तख्तियों पर लाल-हरे अक्षरों में प्रकट होता था और सिर्फ इतना कहता था, 'नवयुवकों के लिए आशा का सन्देश' नीचे वैद्यजी का नाम था और उनसे मिलने की सलाह थी.

एक दिन रंगनाथ ने देखा, रोगों की चिकित्सा में एक नया आयाम जुड़ रहा है. सवेरे से ही कुछ लोग दीवार पर बड़े-बड़े अक्षरों में लिख रहे हैं : बवसीर ! शिवपालगंज की उन्नति का लक्षण था. बवासीर के चार आदमकद अक्षर चिल्लाकर कह रहे थे कि यहाँ पेचिश का युग समाप्त हो गया है, मुलायम तबीयत, दफ़्तर की कुर्सी, शिष्टतापूर्ण रहन-सहन, चौबीस घण्टे चलनेवाले खान-पान और हल्के परिश्रम का युग धीरे-धीरे संक्रमण कर रहा है और आधुनिकता के प्रतीक-जैसे बवासीर सर्वव्यापी नामर्दी का मुकाबला करने के लिये मैदान में आ रही है. शाम तक वह दैत्याकार विज्ञापन एक दीवार पर रंग-बिरंगी छाप छोड़ चुका था और दूर दूर तक ऐलान करने लगा था : बवासीर का शर्तिया इलाज !

देखते-देखते चार-छः दिन मे ही सारा जमाना बवासीर और उसके शर्तिया इलाज के नीचे दब गया. हर जगह वही विज्ञापन चमकने लगा. रंगनाथ को सबसे बड़ा अचम्भा तब हुआ जब उसने देखा, वही विज्ञापन एक दैनिक समाचार-पत्र में आ गया है. यह समाचारपत्र रोज़ दस बजे दिन तक शहर से शिवपालगंज आता था और लोगों को बताने में सहायक होता था कि स्कूटर और ट्रक कहाँ भिड़ा, अब्बासी नामक कथित गुण्डे ने इरशाद नामक कथित सब्जी-फरोश पर कथित छुरी से कहाँ कथित रूप से वार किया. रंगनाथ ने देखा कि उस दिन अखबार के पहले पृष्ठ का एक बहुत बड़ा हिस्सा काले रंग में रंगा हुआ है और उस पर बड़े-बड़े सफेद अक्षरों में चमक रहा है : बवासीर ! अक्षरों की बनावट वही है जो यहाँ दीवारों पर लिखे विज्ञापन में है. उन अक्षरों ने बवासीर को एक नया रूप दे दिया था, जिसके कारण आसपास की सभी चीजें बवासीर की मातहती में आ गयी थीं. काली पृष्ठभूमि में अखबार के पन्ने पर चमकता हुआ 'बवासीर' दूर से ही आदमी को अपने में समेट लेता था. यहां तक कि सनीचर, जिसे बड़े-बड़े अक्षर पढ़ने में भी आंतरिक कष्ट होता था, अखबार के पास खिंच आया और उस पर निगाह गड़ाकर बैठ गया. बहुत देर तक गौर करने के बाद वह रंगनाथ से बोला, "वही चीज है."

इसमें अभिमान की खनक थी. मतलब यह था कि शिवपालगंज की दीवारों पर चमकने वले विज्ञापन कोई मामूली चीज़ नहीं हैं. ये बाहर अख़बारों में छपते हैं, और इस तरह जो शिवपालगंज में है, वही बाहर अख़बारों में है.

रंगनाथ तख्त पर बैठा रहा. उसके सामने अख़बार का पन्ना तिरछा होकर पड़ा था. अमरीका ने एक नया उपग्रह छोड़ा था, पाकिस्तान-भारत सीमा पर गोलियां चल रही थीं, गेहूँ की कमी के कारण राज्यों का कोटा कम किया जाने वाला था, सुरक्षा-समिति में दक्षिण अफ्रीका के कुछ मसलों पर बहस हो रही थी, इन सब अबाबीलों को अपने पंजे में किसी दैत्याकार बाज़ की तरह दबाकर वह काला-सफेद विज्ञापन अपने तिरछे हरूफ में चीख रहा था: बवासीर ! बवासीर ! इस विज्ञापन के अखबार में छपते ही बवासीर शिवपालगंज और अन्तर्र्राष्ट्रीय जगत के बीच सम्पर्क का एक सफल माध्यम बन चुकी थी.

डाकुओं का आदेश था कि एक विशेष तिथि को विशेष स्थान पर जाकर रामाधीन की तरफ से रुपये की थैली एकान्त में रख दी जाये. डाका डालने की यह पद्धति आज भी देश के कुछ हिस्सों में काफी लोकप्रिय है. पर वास्तव में है यह मध्यकालीन ही, क्योंकि इसके लिये चांदी या गिलट के रुपये और थैली का होना आवश्यक है, जबकि आजकल रुपया नोटों की शक्ल में दिया जा सकता है और पांच हजार रुपये प्रेम-पत्र की तरह किसी लिफाफे में भी आ सकते हैं. ज़रूरत पड़ने पर चेक से भी रुपयों का भुगतान किया जा सकता है. इन कारणों से परसों रात अमुक टीले पर पांच हजार रुपये की थैली रखकर चुपचाप चले जाओ, यह आदेश मानने में व्यावहारिक कठिनाइयां हो सकती हैं. टीले पर छोड़ा हुआ नोटों का लिफाफा हवा में उड़ सकता है, चेक जाली हो सकता है. संक्षेप में, जैसे कला, साहित्य, प्रशासन, शिक्षा आदि के क्षेत्रों में, वैसे ही डकैती के क्षेत्र में भी मध्यकलीन पद्धतियों को आधुनिक युग में लागू करने से व्यावहारिक कठिनाइयां पैदा हो सकती हैं.
थे.

जो भी हो, डकैतों ने इन बातों पर विचार नहीं किया था क्योंकि रामाधीन के यहां डाके की चिट्ठी भेजने वाले असली डकैत न थे. उन दिनों गांव-सभा और कॉलेज की राजनीति को लेकर रामाधीन भीखमखेड़वी और वैद्यजी में कुछ तनातनी हो गयी थी. अगर शहर होता और राजनीति ऊँचे दरजे की होती तो ऐसे मौके पर रामाधीन के खिलाफ किसी महिला की तरफ से पुलिस में यह रिपोर्ट आ गयी होती उन्होंने उसका शीलभंग करने की सक्रिय चेष्टा की, पर महिला के सक्रिय विरोध के कारण वे कुछ नहीं कर पाये और वह अपना शील समूचा-का-समूचा लिये हुए सीधे थाने तक आ गयी. पर यह देहात था जहां अभी महिलाओं के शीलभंग को राजनीतिक युद्ध में हैण्डग्रेनेड की मान्यता नहीं मिली थी, इसीलिए वहां कुछ पुरानी तरकीबों का ही प्रयोग किया गया था और बाबू रामाधीन के ऊपर डाकुओं का संकट पैदा करके उन्हें कुछ दिन तिलमिलाने के लिये छोड़ दिया गया था.

पुलिस, रामाधीन भीखमखेड़वी और वैद्यजी का पूरा गिरोह- ये सभी जानते थे कि चिट्ठी फर्जी है. ऐसी चिट्ठियां कई बार कई लोगों के पास आ चुकी थीं. इसलिए रामाधीन पर यह मजबूरी नहीं थी कि वह नीयत तिथि और समय पर रुपये के साथ टीले पर पहुंच जाये. चिट्ठी फर्जी न होती, तब भी रामाधीन शायद चुपचाप रुपया दे देने के मुकाबले घर पर डाका डलवा लेना ज्यादा अच्छा समझते. पर चूंकि रिपोर्ट थाने में दर्ज हो गयी थी, इसलिए पुलिस अपनी ओर से कुछ करने को मजबूर थी.

उस दिन टीले से लेकर गांव तक का स्टेज पुलिस के लिये समर्पित कर दिया गया और उसमें वे डाकू-डाकू का खेल खेलते रहे. टीले पर तो एक थाना-का-थाना ही खुल गया. उन्होंने आसपास के ऊसर, जंगल, खेत-खलिहान सभी कुछ छान डाले, पर डाकुओं का कहीं निशान नहीं मिला. टीले के पास उन्होने पेड़ों की टहनियां हिला कर, लोमड़ियों के बिलों में संगीनें घुसेड़कर और सपाट जगहों को अपनी आंखों से हिप्नोटाइज़ करके इत्मिनान कर लिया कि वहां जो है, वे डाकू नहीं हैं; क्रमशः चिड़ियां, लोमड़ियां और कीड़े मकोड़े हैं. रात को जब बड़े जोर से कुछ प्राणी चिल्लाये तो पता चला कि वे भी डाकू नहीं, सियार हैं और पड़ोस के बाग टीले में जब दूसरे प्राणी बोले तो कुछ देर बाद समझ आ गया कि वे कुछ नहीं, सिर्फ चमगादड़ हैं. उस रात डाकुओं और रामाधीन भीखमखेड़वी के बीच की कुश्ती बराबर पर छूटी, क्योंकि टीले पर न डाकू रुपया लेने के लिये आये और न रामाधीन देने के लिये गये.

थाने के छोटे दरोगा को नौकरी पर आये अभी थोड़े ही दिन हुए थे. टीले पर डाकुओं को पकड़ने का काम उन्हें ही सौंपा गया था, पर सब कुछ करने पर भी वे अपनी माँ को भेजे जाने वाली चिट्ठियों की अगली किश्त में यह लिखने लायक नहीं हुए थे कि माँ, डाकुओं ने मशीनगन तक का इस्तेमाल किया, पर इस भयंकर गोलीकाण्ड में भी तेरे आशीर्वाद से तेरे बेटे का बाल तक बाँका नहीं हुआ. वे रात को लगभग एक बजे टीले से उतरकर मैदान में आये; और चूंकि सर्दी होने लगी थी और अंधेरा था और उन्हे अपनी नगरवासिनी प्रिया की याद आने लगी थी और चूंकि उन्होंने बी. ए. में हिन्दी-साहित्य भी पढ़ा था; इन सब मिले-जुले कारणों से उन्होंने धीरे धीरे कुछ गुनगुनाना शुरू कर दिया और आखिर में गाने लगे, "हाय मेरा दिल ! हाय मेरा दिल !

'तीतर के दो आगे तीतर, तीतर के दो पीछे तीतर' वाली कहावत को चरितार्थ करते उनके आगे भी दो सिपाही थे और पीछे भी. दरोगाजी गाते रहे और सिपही सोचते रहे कि कोई बात नहीं, कुछ दिनों में ठीक हो जायेंगे. मैदान पार करते करते दरोगा जी का गाना कुछ बुलन्दी पर चढ़ गया और साबित करने लगा कि जो बात इतनी बेवकूफी की है कि कही नहीं जा सकती, वह बड़े मजे से गायी जा सकती है.

सड़क पास आ गयी थी. वहीं एक गड्ढे से अचानक आवाज आयी, "कर्फ़ोन है सर्फाला?" दरोगाजी का हाथ अपने रिवाल्वर पर चला गया. सिपहियों ने ठिठक कर राईफलें संभाली; तब तक गड्ढे ने दोबारा आवाज दी "कर्फ़ोन है सर्फाला?"

एक सिपाही ने दरोगाजी के कान में कहा, "गोली चल सकती है. पेड़ के पीछे हो लिया जाये हुजूर!"

पेड़ उनके पास से लगभग पांच गज की दूरी पर था. दरोगाजी ने सिपाही से फुसफुसा कर कहा, "तुम लोग पेड़ के पीछे हो जाओ. मैं देखता हूं."

इतना कहकर उन्होंने कहा, "गड्ढे में कौन है? जो कोई भी हो बाहर आ जाओ." फिर एक सिनेमा में देखे दृश्य को याद करके उन्होंने बात जोड़ी, "तुम लोग घिर गये हो. तुम आघे मिनट में बाहर न आये तो गोली चला दी जायेगी."

गड्ढे में थोड़ी देर खामोशी रही, फिर आवाज आयी, "मर्फ़र गर्फ़ये सर्फ़ाले, गर्फ़ोली चर्फ़लानेवाले."

प्रत्येक भारतीय, जो अपना घर छोड़कर बाहर निकलता है, भाषा के मामले में पत्थर हो जाता है. इतनी तरह की बोलियां उसके कानों में पड़ती हैं कि बाद में हारकर वह सोचना ही छोड़ देता है कि यह नेपाली है या गुजराती. पर इस भाषा ने दरोगाजॊ को चौकन्ना बना दिया और वे सोचने लगे कि क्या मामला है ! इतना तो समझ में आता है कि इसमें कोई गाली है, पर यह क्यों नही समझ में आता कि यह कौन सी बोली है ! इसके बाद ही जहां बात समझ से बाहर होती है वहीं गोली चलती है - इस अन्तर्राष्ट्रिय सिद्धान्त का शिवपालगंज में प्रयोग करते हुए दरोगाजी ने रिवाल्वर तान लिया और कड़ककर बोले, "गड्ढे से बाहर आ जाओ, नहीं तो मैं गोली चलाता हूं."

पर गोली चलाने की जरूरत नहीं पड़ी. एक सिपाही ने पेड़ के पीछे से निकल कर कहा, "गोली मत चलाइए हजूर, यह जोगनथवा है. पीकर गद्ढे में पड़ा है."

सिपाही लोग उत्साह से गद्ढे को घेर कर खड़े हो गए. दरोगाजी ने कहा, " कौन जोगनथवा ?"

एक पुराने सिपाही ने तजुर्बे के साथ कहना शुरू किया, "यह श्री रामनाथ का पुत्र जोगनाथ है. अकेला आदमी है. दारू ज्यादा पीता है."

लोगों ने जोगनाथ को उठाकर उसके पैरों पर खड़ा किया, पर जो खुद अपने पैरों पर खड़ा नहीं होना चाहता उसे दूसरे कहां तक खड़ा करते रहेंगे ! इसलिए वह लड़खड़ा कर एक बार फिर गिरने को हुआ, बीच में रोका गया और अंत में गड्ढे के ऊपर आकर परमहंसों की तरह बैठ गया. बैठकर जब उसने आंखें मिला-मिला कर, हाथ हिलाकर चमगादड़ों और सियारों की कुछ आवाजें गले से निकालकर अपने को मानवीय स्तर पर बात करने लायक बनाया, तो उसके मुंह से फिर वही शब्द निकले, "कर्फ़ोन है सर्फाला?"

दरोगाजी ने पूछा, "यह बोली कौन सी है?"

एक सिपाही ने कहा, "बोली ही से तो हमने पहचाना कि जोगनाथ है. यह सर्फ़री बोली बोलता है. इस वक्त होश में नही है, इसलिए गालॊ बक रहा है."

दरोगाजी शायद गाली देने के प्रति जोगनाथ की इस निष्ठा से बहुत प्रभावित हुए कि वह बेहोशी की हालत में भी कम से कम इतना तो कर ही रहा है. उन्होने उसकी गरदन जोर से हिलायी और पकड़ कर बोले, "होश में आ!"

पर जोगनाथ ने होश में आने से इन्कार कर दिया. सिर्फ इतना कहा, "सर्फ़ाले!"

सिपाही हंसने लगे. जिसने उसे पहले पहचाना था, उसने जोगनाथ के कान में चिल्ला कर कहा, "जर्फ़ोगनाथ, हर्फ़ोश में अर्फ़ाओ."

इसकी भी जोगनाथ पर कोई प्रतिक्रिया नहीं हुई; पर दरोगाजी ने एकदम से सर्फ़री बोली सीख ली. उन्होंने मुस्कुराकर कहा, "यह साला हम लोगों को साला कह रहा है."
उन्होने उसे मारने के लिये अपना हाथ उठाया, पर सिपाही ने रोक लिया. कहा, "जाने भी दें हजूर."

दरोगाजी को सिपाहियों का मानवतावादी दृष्टिकोण कुछ पसन्द नहीं आ रहा था. उन्होंने अपना हाथ तो रोक लिया, पर आदेश देने के ढंग से कहा, "इसे अपने साथ ले जाओ और हवालात में बंद कर दो. दफा 109 जाब्ता फौजदारी लगा देना."

एक सिपाही ने कहा, "यह नहीं हो पायेगा हुजूर ! यह यहीं का रहने वाला है. दीवरों पर इश्तिहार रंगा करता है और बात बात पर सर्फ़री बोली बोलता है. वैसे बदमाश है, पर दिखाने के लिये कुछ काम तो करता ही है."

वे लोग जोगनाथ को उठा कर अपने पैरों पर चलने के लिये मजबूर करते हुए सड़क की और बढ़ने लगे. दरोगाजी ने कहा, " शायद पी कर गाली बक रहा है. किसी न किसी जुर्म की दफा निकल आयेगी. अभी चलकर इसे बन्द कर दो. कल चालान कर दिया जायेगा."

उस सिपाही ने कहा, "हुजूर! बेमतलब झंझट में पड़ने से क्या फायदा? अभी गांव चलकर इसे इसके घर में ढकेल आयेंगे. इसे हवालात कैसे भेजा जा सकता है? वैद्यजी का आदमी है."

दरोगाजी नौकरी में नये थे, पर सिपाहियों का मानवतावादी दृष्टिकोण अब वे एकदम समझ गये. वे कुछ नहीं बोले . सिपहियों से थोड़ा पीछे हटकर वे फिर अंधेरे, हल्की ठण्डक, नगरवासिनी प्रिया और 'हाय मेरा दिल' से सन्तोष खींचने की कोशिश करने लगे.

Apr 18, 2017

सांप्रदायिकता से 'मोह' बढ़ातीं 'माया'

जातिवादी अस्मिता वाला दलित आंदोलन किसी सेक्यूलर और धर्मनिरपेक्ष समाज के लिए नहीं, बल्कि हिन्दुत्व के ढांचे में समाहित हो सम्मानजनक स्थान पाने के लिए लड़ता है। अपने विचार में वह पहले हिन्दू है फिर दलित है। इसीलिए मौका पाने पर 'हिन्दुत्व’ की गोद में जा बैठता है...

हरे राम मिश्र

यूपी चुनाव में अपनी शर्मनाक हार के बाद अंबेडकर जयंती के मौके पर मायावती ने अपने समर्थकों को राजधानी लखनऊ में संबोधित किया। मायावती का यह पूरा संबोधन स्पष्टीकरणों और कई स्तरों पर 'कन्फ्यूजन’ से भरा हुआ था। फिर भी, दो बातें बहुत महत्वपूर्ण थीं जो कि उनके भविष्य की राजनीतिक दिशा का इशारा कर रही थीं। पहला यह कि वह यूपी में सौ मुसलमानों को विधानसभा के टिकट बांटने पर बीजेपी के यूपी को पाकिस्तान बनाने के आरोप पर सफाई दे रही थीं और उपस्थित समर्थकों को यह बता रही थीं कि वह उत्तर प्रदेश को पाकिस्तान नहीं बनने देंगी। दूसरा, ट्रिपल तलाक के मामले में उनका रुख अब एकदम बदला हुआ दिख रहा था। 

गौरतलब है कि ट्रिपल तलाक पर अब तक के अपने रुख से पलटते हुए उन्होंने कहा कि मुस्लिम पर्सनल लाॅ बोर्ड तीन तलाक के मामले को हल करने में नाकामयाब रहा है। मायावती का तीन तलाक के मसले पर अपने पहले के रुख से इस तरह पलट जाना कई इशारे करता है। चुनाव के दौरान तीन तलाक के मामले पर मोदी सरकार की मुखालफत करते हुए वे इसे शरिया कानून और मुसलमानों के धार्मिक जीवन में सीधा हस्तक्षेप बताती थीं। 

अपने चुनावी भाषणों में इसमें किसी संशोधन के खिलाफ उन्होंने सड़क पर उतरने की बात भी कही थी। लेकिन अब, जबकि चुनाव हो चुके हैं- इस मामले में पर्सनल लाॅ बोर्ड पर ही सवाल उठाना यह संकेत करता है कि मायावती अपनी दिशा को बदल चुकी हैं और मुसलमानों के सवाल अब उनकी प्राथमिकता में नहीं हैं। ट्रिपल तलाक के मसले पर मायावती की इस पलटी ने यह साफ कर दिया है कि उन्होंने सौ मुसलमानों को टिकट देकर जो प्रयोग किया, वह एक राजनीतिक गलती थी। अब वे उस गलती को पहले दुरुस्त करेंगी। यूपी को पाकिस्तान बनाने के आरोपों पर उनकी सफाई भी इसी का स्पष्टीकरण था।

हालांकि, पिछले विधानसभा चुनाव में मायावती ने दलित-मुस्लिम समाज की एकता के आधार पर सूबे की सत्ता में भागीदारी का सपना देखा था। उन्हें यह लगता था कि अगर हम मुसलमानों को बहका लें तो बाइस फीसदी दलित वोट के बदौलत बसपा उत्तर प्रदेश में सत्ता में आ सकती है। लेकिन वे भ्रम में थीं कि दलितों का बेस वोट उनके साथ है। मुसलमान मतदाताओं को साधने के लिए मायावती ने बहुत प्रयास किया। उन्होंने चुनाव के दौरान कट्टरपंथी मुसलमानों को खुश करने के लिए ट्रिपल तलाक का मुद्दा उठाया। लेकिन इस प्रयास में उनका दलित वोटर उनसे दूर चला गया। उनके चुनावी भाषणों में मुसलमानों पर ज्यादा फोकस से उनके जमीनी नेता कई बार असहज भी दिखे। 

दरअसल सिर्फ वोट के लिए, दलित-मुस्लिम एकता के नाम पर सत्ता में वापसी का सपना देखने वाली मायावती ने अपने पिछले शासनकाल में इन दोनों समुदायों को सिवाय उत्पीड़न के कुछ नहीं दिया। मुजफ्फरनगर दंगों में बेघर मुसलमानों को मायावती कभी देखने तक नहीं गईं। उन्हें यह लगता था कि सपा के घर में मचे संग्राम से मुसलमान बसपा में खुद ही शिफ्ट हो जाएगा। उनके लिए यह गृहयुद्ध दलित-मुस्लिम एकता का प्रयोग काल बनकर निकला। लेकिन भाजपा के सहयोग के उनके पिछले चरित्र को देखते हुए मुसलमानों ने मायावती पर कोई यकीन नहीं किया और बीजेपी को हराने के लिए ’टैक्टिकल’ वोटिंग कर बैठे। 

वास्तव में दलित मुस्लिम एकता का विचार एकदम अव्यावहारिक है। यह मायावती भी जानती थीं। उनकी समझ में यह एक जुआ था, जिसमें बसपा हार गई। अब मायावती घोर सांप्रदायिक दलित समाज को फिर से जातिगत रूप से इकट्ठा करके अपनी खोई ताकत और जोश पाने का शर्तिया और पुराना 'हकीमी’ नुस्खा आजमाएंगी। यह नुस्खा खुद उनकी सांप्रदायिकता को भी बेनकाब करेगा। क्योंकि एक सेक्यूलर व्यक्ति किसी सांप्रदायिक समाज को संतुष्ट ही नही कर सकता। दलितों की सांप्रदायिकता का खात्मा मायावती के कुव्वत में नहीं है। चुनावी हार के बाद मुसलमानों से उनकी दूरी इस बात को साफ करती है कि अब वह अपने पुराने ढर्रे पर लौट गई हैं।

दरअसल, उत्तर प्रदेश में मायावती का फेल होना 'बुर्जुआ’ राजनीतिक सेटअप में दलित मुस्लिम एकता के विचार का 'गर्भपात’ होना है। यह 'असफलता’ एकदम स्वाभाविक है। दलित और मुस्लिम के बीच कोई स्वाभाविक एकता हो ही नहीं सकती। जातिवादी अस्मिता वाला दलित आंदोलन किसी सेक्यूलर और धर्मनिरपेक्ष समाज के लिए नहीं, बल्कि हिन्दुत्व के ढांचे में समाहित होने और सम्मानजनक स्थान पाने के लिए लड़ता है। अपने विचार में वह पहले हिन्दू है फिर दलित है। इसीलिए वह मौका पाने पर 'हिन्दुत्व’ की गोद में जा बैठता है। 

जहां तक मायावती में आए इस बदलाव का मामला है, वह यह साबित करता है कि मायावती की राजनीति केवल मुस्लिम वोट लेने और उन्हें इस्तेमाल करने के 'विचार’ पर टिकी थी। दलित—मुस्लिम एकता के अवसरवादी प्रयोग के आधार पर वह उत्तर प्रदेश में अपना राजनीतिक उत्थान देख रही थीं जो कि फेल हो गया। इस प्रयोग में वह अपने परंपरागत वोटर्स पर बनी पकड़ भी खो बैठीं। मायावती अब यह मान गयी हैं कि दलित सांप्रदायिकता एक वास्तविक विचार है और अब हमें इसी रूप में उसका इस्तेमाल करना है। यही वजह है कि अब उन्होंने अपने रुख से पलटी मारते हुए मुसलमानों से दूरी बनानी शुरू की है।

लेकिन क्या उनका यह प्रयास उन्हें राजनीति के केन्द्र में वापस ला पाएगा? इस बात की संभावना बहुत कम है। राजनीति एक फुलटाइम और डायनमिक प्रक्रिया है। मायावती ने अपने वोटर्स को दिमागी स्तर पर विकसित नहीं किया। अगर भाजपा फासीवाद के साथ जाति और अस्मिता के सवाल को 'एड्रेस’ करती रहेगी तो फिर दलित मायावती के पास किसलिए लौटेगा? जब तक मायावती के पास भाजपा के खिलाफ कोई ठोस योजना नहीं होगी, तब तक दलितों का भाजपा से मोहभंग नहीं होगा। मायावती में ऐसी क्षमता नहीं है और न ही अभी ऐसी कोई योजना ही है। इसीलिए मायावती का भविष्य संकटग्रस्त है। 
editorjanjwar@gmail.com 

Apr 17, 2017

'आॅपरेशन हलाला' के नाम पर फर्जी खबर दिखा रहा था इंडिया टीवी

'हलाला सर्विस सेंटर' की सनसनी में पत्रकारिता हुई  हलाल,  चैनल ने नहीं  मांगी  अबतक माफी
जनज्वार। किसी और मुल्क में यह संभव है कि नहीं लेकिन भारत में यह बहुत आसानी से हो जाता है कि किसी समुदाय के खिलाफ आप गलत खबर दिखाकर भी टीआरपी बटोर सकते हैं, मुनाफा कमा सकते हैं, वाहवाही लूट सकते हैं। 

मदरसे और मुस्लिम समाज की ओर से चैनल को जारी चेतावनी
यह टीआरपी बटोरने और ज्यादा से ज्यादा मुनाफा कमाने की ही मारामारी है कि 'हलाला सर्विस सेंटर' के नाम पर इंडिया टीवी द्वारा 15 और 16 मार्च दो दिन रात 8 बजे फर्जी खबर दिखाई जाती है, लोग चैनल में फोन कर ऐतराज करते हैं, लेकिन खबर तब हटती जब मौलाना और मुस्लिम समुदाय के नामचीन लोग कानूनी कार्यवाही की तरफ आगे बढ़ते हैं।

India TV  द्वारा 15 और 16 अप्रैल की रात 8 बजे प्रसारित कार्यक्रम 'आॅपरेशन हलाला' में दिल्ली की सीमापुरी के मदरसे और उसके मौलाना चौधरी शहजाद खोखर को दिखाया जाता है। मस्जिद का नाम 'हलाला सर्विस सेंटर' दिया जाता है और बताया जाता है कि मदरसे के मौलवी पैसा लेकर हलाला कराने का धंधा करते हैं।

दिल्ली के सीमापुरी मदरसे के अध्यक्ष चौधरी शहज़ाद खोखर जब इस कार्यक्रम को देखते हैं तो सन्न रह जाते हैं।

शहजाद बताते हैं, कार्यक्रम तलाक और हलाला से जुड़़े होने की वजह से मैं 15 अप्रैल को रात 8 बजे इंडिया टीवी देखने लगा। तभी देखता हूं कि मैं जिस मदरसे में हूं उसको इंडिया टीवी पर 'हलाला सर्विस सेंटर' कहा जा रहा है। साथ ही किसी तस्लमी नाम के मौलाना का जिक्र किया जा रहा है कि वह इस मदरसे से 'पैसा लेकर हलाला कराने का धंधा करता है, जबकि यह सरासर झूठ है।

दरअसल हलाला एक ऐसी मुस्लिम प्रथा है, जिसमें पत्नी को पति द्वारा तलाक देने के बाद अगर पति फिर से उस महिला से शादी करना चाहे तो उस महिला को पहले किसी दूसरे मर्द से शादी करनी होगी और उसे दूसरे पति के साथ वैसे ही संबंध बनाने होंगे, जैसे एक पति-पत्नी के बीच होते हैं। इसके बाद अगले दिन दूसरा मर्द उस महिला को तलाक देगा और फिर वह महिला अपने पहले पति से शादी कर सकती है। हलाला पर मुस्लिम उलेमाओं का कहना है कि यह प्रथा इसलिए बनाई गई, ताकि तलाक को पुरुषों द्वारा मज़ाक या इसे कोई मामूली चीज़ ना समझा जाए।

 विरोध के बाद हटाया वीडियो : अब माफ़ी मांगने की बारी

मदरसे के मौलाना शहजाद खोखर के मुताबिक, 'India TV द्वारा प्रसारित 'आॅपरेशन हलाला' में दिखाया गया सीमापुरी मदरसा का स्कैंडल सरासर झूठ का पुलिंदा है।'

उन्होंने कहा कि हमारे मदरसे में तस्लीम नाम का कोई मद्दररिस न तो पहले था और न ही अभी कोई है.

मदरसे के मौलाना ने India TV  से मांग कि है वह इस प्रोग्राम  की सिरे से जाँच कराये। साथ ही चौधरी शहज़ाद खोखर ने दावा किया कि टीवी पर सीमापुरी मदरसा की ईमारत दिखाई गयी है, लेकिन रिकॉर्डिंग कहीं और की गयी है.

उन्होंने जनज्वार को वीडियो जारी कर अपना पक्ष रखा है। वीडियो में उन्होंने साफ बताया है कि इंडिया टीवी ने उनके और मदरसे के खिलाफ खबर दिखाकर पूरे समाज को बदनाम किया है। 

हालांकि दबाव बनने के बाद इंडिया टीवी ने यूट्यूब से वीडियो हटा लिया है। साथ ही चैनल ने मामला सेट करने के लिए सुरेंद्र और राशिद नाम के दो कर्मचारियों को लगा रखा है, जिनके फोन मौलाना को बार—बार आ रहे हैं।

मदरसे से जुड़े लोगों ने जनज्वार से बातचीत में कहा कि बार—बार माफी मांगने के फोन पहले सुरेंद्र के आ रहे थे। लेकिन जब लोगों ने कहा कि चैनल औपचारिक तौर पर माफी मांगेगा तभी मामला पुलिस और अदालत में नहीं जाएगा। फिर चैनल ने राशिद नाम के किसी मुस्लिम कर्मचारी को लगाया कि वह मुस्लिम होने के नाते इस मसले को निपटाए।

पर 'आॅपरेशन हलाला' के फर्जीवाड़े से स्थानीय लोगो में बेहद आक्रोश है। मदरसे के पूर्व और वर्तमान महासचिव युसुफ सोरान व शफ़ीक़ कुरैशी का कहना है यदि चैनल ने माफ़ी नहीं मांगी तो चैनल के विरुद्ध क़ानूनी कार्यवाही भी करेंगे।

वहीं स्थानीय लोगों ने उक्त फेक न्यूज़ को लेकर India TV  के विरुद्ध FIR दर्ज करने कि मांग को लेकर उत्तरी जिला डीसीपी से मिलने का मिलने का निर्णय लिया है। 

मौलाना शहजाद खोखर बता रहे इंडिया टीवी के फर्जीवाड़े की कहानी 


Apr 16, 2017

देखिए वीडियो, क्यों बढ़ रहे हैं कश्मीर में भारत के दुश्मन

जनज्वार ने 15 अप्रैल को छपी सुनील कुमार की रिपोर्ट के जरिए सवाल उठाया था कि 'कश्मीरियों की जान ले सकती हैं बंदूकें पर उनका दिल नहीं जीत सकतीं' और यह वीडियो उसी चिंता की गवाही दे रहा है... 

रिपोर्ट में सेना की जीप के बोनट पर बंधे एक कश्मीरी युवक को ​भी चस्पां किया गया था और सरकार से सवाल किया गया था कि सरकार खुद अपने खिलाफ बगावत के सुर क्यों तेज करवा रही है? क्यों ऐसा हो रहा है कि सेना कार्यवाही, पत्थरबाजी और हिंसा लगातार बढ़ती जा रही है और आम कश्मीरियों की लोकतंत्र और चुनाव पर से भरोसा खत्म होता जा रहा है। 

हमारी चिंता यह रही है कि 2013 आते—आते जो कश्मीर लगातार शांति की ओर बढ़ रहा था, आतंकवाद हाशिए पर था, पर्यटन तेजी से बढ़ रहा था, स्कूलों में बच्चे दाखिले लेने लगे थे, वहां पिछले तीन वर्षों में ऐसा क्या हुआ कि 13 से 18 वर्ष के नौेजवान भारत के​ खिलाफ बगावती होते जा रहे हैं? 

पर आज जनज्वार तक जो वीडियो पहुंचा है, उससे साफ हो रहा है कि सेना किस तरह ​कश्मीरी युवाओंं में देशप्रेम पैदा करने की कोशिश कर कर रही है? 

सवाल यह भी है कि क्या ऐसे मारपीट, हत्या और हिंसा कर देशप्रेम पैदा किया जा सकता है या फिर सेना व सरकार को बातचीत और भरोसे का माहौल बनाकर कश्मीर में स्थिति सामान्य करने की कोशिश करनी चाहिए।

देखें वीडियो 


यहां भाजपा कार्यालय के सामने बिक रहा गौ मांस लेकिन पार्टी को नहीं कोई ऐतराज

भाजपा कार्यालय के सामने  होटल  (नीचे फोटो में देखें कार्यालय )                                       फोटो — श्रवण 
जनज्वार। गौ मांस सेवन को प्रतिबंधित करने पर आमादा भाजपा का इसे दोहरा रवैया ही कहा जाएगा कि वह कुछ राज्यों में गौ मांस के नाम पर दंगों—फसादों को न्यायोचिक ठहरा देती है, वहीं कुछ राज्यों में वह इस मामले में चूं भी नहीं करती। 

भले ही भाजपा कार्यालय के सामने ही गाय के मीट का बना स्वादिष्ट व्यंजन  क्यों न परोसा जा रहा हो !

कुछ ऐसा ही वाकया अरुणाचल प्रदेश के एक जिले में सामने आया है। पार्टी कार्यालय के ठीक सामने, एक ही चौराहे पर गाय का मीट बेचा जा रहा है लेकिन न तो कोई बजरंगी, न संघी और न भाजपाई गाय को मां—मां कह कर वहां बवाल काट रहा है, प्रदर्शन कर रहा है। जबकि वहां भाजपा के समर्थन से सरकार चल रही है।  

फेसबुक पर सामाजिक मसलों को लेकर सक्रिय तौर पर लिखने वाले श्रवण इन दिनों अरुणाचल प्रदेश में हैं। वह वहां से जीवन, सौंदर्य, राजनीति और प्रकृति से जुड़ी तस्वीरों और पोस्ट के माध्यम से लगातार लिख रहे हैं। 

उन्हीं में से एक में श्रवण ने फोटो पोस्ट करते हुए लिखा है, 'देश के पूर्वी राज्य अरुणाचल प्रदेश के पासीघाट जिले के मुख्य चौराहे पर भाजपा कार्यालय है। इसी चौराहे पर बीफ का होटल है।'

पासीघाट चौराहे पर भाजपा कार्यालय 
वह इस पोस्ट में आगे लिखते हैं, 'बीफ मतलब यहाँ गाय का माँस ही है, भैंस का नहीं। चौराहे पर ही माँस काट कर बेचा जा रहा था और एक स्टॉल पर गाय का कटा सिर रखा था। फोटो मैंने जान-बूझकर नहीं ली और न लगायी।' 

अपनी पोस्ट की अगली पंक्ति में वे बताते हैं, 'यहीं पर यूपी, बिहार से आए लोगों की दुकानें भी हैं। लेकिन किसी की भावना आहत नहीं हो रही है। और न ही कोई दंगा भड़का है। इसके उलट यूपी, राजस्थान, गुजरात की घटनाएँ देखिए जहाँ गाय के नाम पर गुंडागर्दी जारी है और गुंडागर्दी को भाजपा सरकार राज्य और केंद्र दोनों की समर्थन प्राप्त है।' 

एक खबर का हवाला देते हुए श्रवण ने ​लिखा है, 'कुछ दिन पहले असम ट्रिब्यून में संघ के हवाले से खबर आई थी कि वे पूर्वोत्तर वासियों को गौमाँस छोड़ने का आग्रह करेंगे।' 

संघ के आग्रह से भी जाहिर है कि पूर्वोत्तर में हिंदू और आदिवासी गौ मांस का सेवन करते हैं। ऐसे में सवाल यह है कि यूपी, बिहार, राजस्थान, हरियाणा, मध्यप्रदेश में गौ का मांस का 'मां का मांस' कैसे हो जाता है और पूर्वोत्तर में वही मांस जब भाजपाइयों के दर पर बिकता है तो वह मीट का होटल मात्र क्यों मान लिया जाता है? 

लिट्टे की राजनीतिक परंपरा से प्रभावित हैं माओवादी, नक्सलबाड़ी से नहीं

भाकपा (माओवादी) खुद को नक्सलबाड़ी का उत्तराधिकारी बताती है लेकिन वो नहीं है। उके जैविक संबंध लिट्टे जैसे आतंकी संगठनों से हैं जो जातीय पहचान की राजनीति करते हैं...


आउटलुक अंग्रेजी के नए अंक की कवर स्टोरी 'नक्सलबाड़ी के 50 साल' पर है, जिसका संपादकीय राजेश रामचंद्रन ने लिखा है। राजेश रामचंद्रन आउटलुक के संपादक हैं और माओवादी राजनीति को जानने और लिखने वाले प्रमुख पत्रकारों में से एक हैं। वामपंथी आदर्शवाद, नक्सलबाड़ी और माओवाद पर केंद्रित उनका यह संपादकीय माओवादी राजनीति पर कई सवाल खड़े करता है। हिंदी पाठकों की सुविधा के लिए जनज्वार यहां संपादकीय का अनुवाद प्रस्तुत कर रहा है।  

हमेशा जवान और मरा हुआ
राजेश रामचंद्रन, संपादक, आउटलुक

आदर्शवाद जानलेवा है। यह चेतावनी, जो शहीदी इश्तिहार में हमेशा बड़े अक्षरों में लिखी होनी चाहिए, 1967 के बसंत में धुंधली पड़ गई। तब नए गणतंत्र की स्थापना के बाद आजादी को दो दशक बस हुए थे। 

अभी इकबाल जिंदा था। चापलूसों और पुराने सामंतों का सिंडीकेट मजबूती के साथ सत्ता पर जमा तो हुआ था लेकिन  हिंदूस्तान एक नई ताकत था और इन युवाओं को लगा कि वे इसे और अधिक मानवीय, न्यायपूर्ण और समतामूलक बना सकते हैं। 

तब क्या था, उन लोगों ने मशाल जलाई और फिर उस लौ को बचाने के लिए स्वयं को भष्म कर लिया। इनमें से अधिकांश युवा, गुस्सेल और सुंदर लोग थे जो अधेड़ या व्यावहारिक होने तक नहीं रूके रहे। 

उनके जीवन और मृत्यू ने राजनीति, सिनेमा, साहित्य और बहुत कुछ प्रभावित किया। और आज नक्सलबाड़ी के पचास साल बाद हमें यह मौका मिला है जहां हम यह जानने की कोशिश कर सकते हैं कि क्या उनकी मौत बेकार गई?

ऐसा संभव ही नहीं है कि हम इन लोगों की प्रशंसा न करें जिन लोगों ने अपना सब कुछ कुर्बान कर दिया और बदले में बिना कुछ लिए। उनको लगता था कि वे दुनिया बदल देगें। उनसे पहले की पीढ़ी ने, जो गांधीवादी स्वतंत्रता सेनानी थे और जिन्होंने कम्युनिष्ट पार्टी का गठन किया था, उन्होंने सच का बदलाव किया था। 

लेकिन ये लोग जल्दबाजी में थे। वो भूल गए या शायद नहीं देख पाए कि हिंसा से हिंसा पैदा होती है, हिंसा और अधिक हिंसा को न्यायोचित ठहराती है और कमजोर लोग ही हिंसक दौर में सबसे अधिक जुल्म सहते हैं। 

पश्चिम बंगाल और केरल में हुए भूमि सुधार बहुत हद तक नक्सलबाड़ी उभार के लिए जिम्मेदार हैं। शायद तेलंगाना और आंध्र प्रदेश में सामंतवाद और सामंती उत्पीड़न को कहीं और से चुनौती नहीं मिल सकती थी। बिहार में दलितों की ओर से रणवीर सेना के गुण्डों से और कौन मुकाबला कर सकता था? 

नक्सलबाडी अब पश्चिम बंगाल के सिलिगुढ़ी जिले की किसी बाड़ी या गांव का नाम नहीं रह गया था बल्कि यह उत्पीड़ितों के अधिकार की हिंसक कोशिश हो गया था, जिसमें बाहर से आए आदर्शवादी भी शामिल थे।  



लेकिन आदर्शवाद एक ऐसी चीज़ है जो आग की ओर जाते पतंगों को धक्का देने का काम तो कर सकता है, पर ढांचा खड़ा करने, संगठन बनाने और जनता को शांतिपूर्ण तरीकों से ताकतवर बनाने के लिए वह काफी नहीं होता। शायद इसी कारण नक्सलबाड़ी ने साहित्य और सिनेमा को चुनावी राजनीति से अधिक प्रभावित किया।

भारतीय आदर्शवादी उस समय सकते में आ गए जब बंगलादेश की जनता पर पाकिस्तान द्वारा थोपे गए उत्पीड़न के पक्ष में चीन खड़ा हो गया। उसके बाद जल्द ही चीन विशाल अर्थव्यवस्था में बदल कर विश्व पूंजीवाद की चालक शक्ति बन गया। ऐसे में धीरे—धीरे पुराने नक्सलवादियों को एहसास हुआ कि चीन का अध्यक्ष चीन का ही हो सकता है किसी और का नहीं। दुनिया बदली और जो लोग नहीं बदल पाए उनके अंदर संत्रास और संशय ने आकार लिया। और अब उस तरह के नक्सलवादी नहीं बचे हैं।

भाकपा (माओवादी) खुद को नक्सलबाड़ी का उत्तराधिकारी बताती है लेकिन वो नहीं है। उनके जैविक संबंध लिट्टे जैसे आतंकी संगठनों से हैं जो जातीय पहचान की राजनीति करते हैं। 

दिल्ली में रहने वाला एक माओवादी विचारक कुछ समय तक लिट्टे का प्रवक्ता था जो प्रभाकरण के यूरोप भाग जाने की कहानियां सुनाया करता था जबकि प्रभाकरण नंदीकडल में मारा गया। यह माओवादी दिल्ली के हाईफाई स्कूल में अपने बच्चे के दाखिले के एवज में पार्टी के महासचिव गणपति का साक्षात्कार दिलाने को तैयार था। 

हम सब जानते हैं कि वो एक झूठा साक्षात्कार होता। ऐसे झूठ कई बार मुझे इनकी राजनीति पर सोचने को मजबूर करती है। जंगल में ये लोग केन्द्रीय पुलिस बल के जवानों की हत्या करते हैं जो गरीब होते हैं और आजीविका के लिए पुलिस में भर्ती हुए हैं। ये लोग विश्वविद्यालयों में कश्मीर के इस्लामी अलगाववादियों को समर्थन देते हैं। ये अबेडकरवादी होने का दावा करते हैं लेकिन संविधान से इन्हें नफरत है। 

सच तो यह है कि ये रूमानियत भी नहीं है।

Apr 15, 2017

वो कौन लोग हैं जो अंबेडकर का नापतोल कर रहे हैं

असली काम तो संविधान सभा के अध्यक्ष  डॉ राजेंद्र प्रसाद का था। संविधान की रचना में अम्बेडकर के योगदान का नापतोल किया जा रहा है। गोया डॉ अम्बेडकर महज एक सदस्य भर थे.... 

नारायण बारेठ, राजनीतिक विश्लेषक


क्या वे संविधान  के मुख्य शिल्पी थे? उन्हें श्रेय क्यों दें? डॉ भीमराव अम्बेडकर की 126वीं जयंती पर यह सवाल रह रह कर उठाया गया है।

किसी ने पूछा 'फिर और लोग क्या कर रहे थे /किसी की दलील है असली काम तो संविधान सभा के अध्यक्ष  डॉ राजेंद्र प्रसाद का था। इसमें संविधान की रचना में अम्बेडकर के योगदान का नापतोल किया जा रहा है। गोया डॉ अम्बेडकर महज एक सदस्य भर थे।

काश हम इतिहास के पन्नों से रहगुजर होते तो ऐसा नहीं सोचते। क्योंकि उन पन्नों में उस दौर की हकीकत और हालात दर्ज है। संविधान सभा के सदस्य स्वाधीनता संग्राम के मूल्यों से ओतप्रोत थे। वे हमारी तरह बंटे हुए नहीं थे। उनकी आँखों में हमारे लिए आज़ाद भारत के सुनहरे ख्वाब थे। 

खुद डॉ राजेंद्र प्रसाद ने संविधान पर मुहर लगने के बाद अपने भाषण में अम्बेडकर को माननीय कहकर सम्बोधित किया और सविंधान निर्माण  में उनके अहम किरदार को रेखांकित किया। डॉ राजेंद्र प्रसाद ने कहा डॉ अम्बेडकर ने प्रारूप समीति के अध्यक्ष के रूप में उल्लेखनीय काम किया है। 'डॉ अम्बेडकर ने अपने स्वास्थ्य की परवाह नहीं की, उनके प्रारूप कमेटी के अध्यक्ष बनने से उस समीति की आभा बढ़ी.' डॉ  राजेंद्र प्रसाद।

डॉ अम्बेडकर संविधान सभा के लिए कितने महत्वपूर्ण और उपयोगी थे, इसका पता तब चला जब बंगाल विभाजित हो गया और डॉ अम्बेडकर संविधान सभा के सदस्य नहीं रहे। क्योंकि वे बंगाल के उस भाग से चुने गए थे जो उधर चला गया। उस वक्त मुंबई के एम आर जयकार ने संविधान सभा में सीट खाली की / डॉ राजेंद्र प्रसाद ने तुरंत मुंबई प्रान्त  के मुख्यमंत्री बी जी खेर को चिठ्ठी लिखी और डॉ अम्बेडकर को मुंबई से सविंधान सभा प्रतिनिधि बनाने को कहा। चिट्ठी में लिखा—

'और बातों को छोड़िये। डॉ अम्बेडकर ने सविंधान सभा और उसकी बहुत सी कमेटियों में जोरदार काम किया है। हमें उनके इस योगदान की जरूरत है। आपको पता है वे बंगाल से चुने गए थे। बंगाल के बंटवारे से वे संविधान सभा के मेंबर नहीं रहे। लिहाजा उन्हें तुरंत मुंबई से चुना जाये. '

Apart from any other consideration we have found Dr. Ambedkar’s work both in Constituent Assembly and the various committees to which he was appointed to be of such an order as to require that we should not be deprived of his services. As you know, he was elected from Bengal and after the division of the province he was ceased to be a member of the Constituent Assembly commencing from the 14th July 1947 and it is therefore necessary that he should be elected immediately.”

सरदार पटेल भी इसी तर्ज पर सक्रिय हुए और बी जी खेर और जी पी मावलंकर पर अपना प्रभाव इस्तेमाल किया/ताकि अम्बेडकर मुंबई से सविंधान सभा के प्रतिनिधि के रूप में चुन कर आ सके। क्योंकि जयकार की जगह इन दोनों की दावेदारी मानी जा रही थी।

अमेरिका के स्व. प्रोफेसर ग्रैनविल ऑस्टिन को भारतीय संविधान का विद्वान माना जाता है। उन्होंने संविधान  पर किताबें लिखी है। भारत ने भी उनके इस योगदान को सलाम किया और पदम्श्री से सम्मानित किया। प्रोफेसर ऑस्टिन ने संविधान  में अम्बेडकर के योगदान की सराहना की और कहा, 'अम्बेडकर द्वारा प्रारूपित भारतीय संविधान सबसे अहम और सबसे पहले एक सामाजिक दस्तावेज  है  (first and foermost a social document) जिसके बहुतेरे प्रावधान सामाजिक क्रांति की मंजिल तक पहुंचने का मकसद रखते हैं।

क्या अब भी हम उस हस्ती को श्रेय देने में संकोच करेंगे?

वैसे वही संविधान आपको भी अधिकार देता है चाहे तो अम्बेडकर को उनके अहम योगदान पर श्रेय दो या ख़ारिज कर दो।
editorjanjwar@gmail.com