May 10, 2011

प्रपंच पर टिका सत्य साईं का आध्यात्म

 
अब तक राजनीति,नौकरशाही और माफियाओं के बीच एकाधिकार रखने वाले साईं के दायरे में दूसरे बाबाओं ने सेंध लगाने शुरू कर दी थी और बाबा के मुखमंडल से राजसत्ता की चमक धूमिल होने लगी थी...

सनल एडमर्क

साईं बाबा जब बड़े भगवान नहीं थे,तब से मैं उन्हें जानता हूं। उस समय केरला में इंडियन रेशनलिस्ट आंदोलन का संयोजक रहते हुए मैंने साईं बाबा को एक चिट्ठी लिखी थी। चिट्ठी में हम लोगों ने उनके द्वारा भक्तों को मिठाई,सोने की चेन और भभूत देने की बात को फर्जी बताया और कहा कि वे वैज्ञानिक तौर पर इसे साबित करके दिखायें। शर्त बस इतनी रखी कि साईं बाबा के पांच फिट के दायरे में कोई नहीं आयेगा और उनकी बांह ढकी नहीं रहेगी।

साईं बाबा की ओर से हमारी चुनौती का कोई जवाब नहीं आया। उसके बाद हमारी मुलाकात श्रीलंका के प्रोफेसर अब्राहम कोवूर से हुई। भारतीय मूल के कोवूर दुनिया के बड़े रेशनलिस्टों में गिने जाते थे और भारत आने पर साईं बाबा के फर्जीवाड़े पर सार्वजनिक भाषण दिया करते। कोवूर ने पहले तो श्रीलंका में ही बाबा की बखिया उधेड़ी, क्योंकि इनके भक्त उस समय तक भारत से ज्यादा श्रीलंका में थे। देखते-देखते कोवूर के भाषणों से साईं भक्तों में प्रश्न उठने लगे। इससे तंग हो साईं ने वर्ष 1972 में एक पत्र के जरिये बयान जारी किया कि जो लोग दूर रहकर मेरा विरोध कर रहे हैं,वे मेरे आश्रम में आयें फिर उन्हें साईं के सही-गलत का पता चलेगा।

कोवूर ने साईं की चुनौती को स्वीकार करते हुए एक टीम बनायी। पच्चीस लोगों की इस टीम में पत्रकार, रेशनलिस्ट आंदोलन से जुडे़ छात्र और जाने-माने रेशनलिस्ट शामिल थे। इस टीम में मैं भी शामिल था। साईं की बताई  तारीख और समय पर हमारी टीम पुट्टापर्थी पहुंच गयी, लेकिन साईं नहीं मिले। हमें पुट्टापर्थी में गेट पर ही रोक लिया गया और बताया गया कि बाबा बंगलुरू के वाइट फिल्ड आश्रम गये हैं। साईं के सचिव ने हमें वाइट फिल्ड आने को कहा।

कोवूर के नेतृत्व में टीम वाइट फिल्ड पहुंच गयी। बाबा वहां भी नहीं मिले तो कोवूर ने आश्रम के बाहर एक प्रेस वार्ता आयोजित की और लोगों को दिखाया कि बाबा हाथ में पहले से रखी स्टार्च की गोलियों को रगड़कर हाथ से भभूत कैसे गिराते रहते हैं। उसके बाद दूसरी बार साईं बाबा की करामातों पर से दुनियाभर में तब पर्दा उठा,जब चैनल फोर ने उनकी हाथ की सफाई के फरेब को सार्वजनिक किया। इसमें पलीता लगाने का काम 'गुरू बस्टर्स' नाम की फिल्म ने किया।

हालांकि उससे पहले वर्ष 1994में ही हैदराबाद दूरदर्शन के एक कैमरामैन ने बाबा के फरेब को तब कैद कर लिया था, जब साईं अपने 79वें जन्मदिन पर कल्याण मंडप बनाने वाले को उपहार में सोने की चेन दे रहे थे। लेकिन उस वीडियो को दूरदर्शन नहीं दिखा सका। पहली बार बाबा के फरेब की तस्वीरों को डेक्कर क्रॉनिकल और इलस्ट्रेटेड वीकली ने छापा था।

उस वीडियो में साईं बाबा को नीचे से सोने की चैन सरकाते हुए साफ दिखाया गया था। बाद में उसी वीडियो और कुछ अन्य वीडियो को मिलाकर 'गुरू बस्टर्स' नाम की फिल्म भी बनी। मगर भारत में साईं की ठगी के खिलाफ किसी संगठन या पार्टी की बोलने की हिम्मत खत्म होती चली गयी। कारण कि साईं की देश चलाने वाले राजनेताओं से लेकर पूंजीपतियों तक में अच्छी पैठ थी। एक समय तो देश के सर्वोच्च पदों पर बैठे सभी लोग बाबा के  भक्त थे। इनमें पूर्व राष्ट्रपति शंकर दयाल शर्मा, न्यायाधीश केएन भगवती और प्रधानमंत्री नरसिंहा राव जैसे बड़े नाम शामिल थे।

'गुरू बस्टर्स' फिल्म ने दुनियाभर में साईं भक्तों और दानदाताओं के बीच फैले उनके तिलिस्म पर एक जोरदार हमला किया। इस हमले के बाद साईं ने कुछ कल्याणकारी काम किये,जिन्हें आज उनकी समाज के लिए उपलब्धियों के तौर पर गिनाया जाता है। अन्यथा सवाल उठता हैं कि जिस साईं बाबा ने खुद को 14साल की उम्र में भगवान घोषित कर दिया था, उसने पहली बार जनता की सेवा का काम 79की उम्र यानी 1995 में क्यों शुरू किया?सिर्फ इसलिए कि साईं बाबा के एकाधिकार के मुकाबले दूसरे संत भी मैदान में आने लगे थे।

अब तक राजनीति, नौकरशाही और माफियाओं के बीच एकाधिकार रखने वाले साईं के दायरे में दूसरे बाबाओं ने सेंध लगाने शुरू कर दी थी और बाबा के मुखमंडल से राजसत्ता की चमक धूमिल होने लगी थी। परिणामस्वरूप  बाबा की अकूत संपत्ति पर प्रश्न उठने लगे थे। अब बाबा के पास जनता के बीच अपनी आस्था बचाये रखने के लिए जनकल्याणकारी कामों के सिवाय कोई रास्ता नहीं बचा था। भारत में बढ़ते बाबाओं के बाजार में दबाव और बढ़ा तो वर्ष 2001 से स्कूल, अस्पताल और कॉलेज जैसी योजनाओं में तमाम बाबा कूदे, जिसमें एक नाम साईं का भी है। मगर बाबाओं के इन कामों को कोई जनकल्याणकारी उपक्रम कहता है तो फिर उसे दस्युओं,माफियाओं और दंगाइयों का भी समर्थन करना चाहिए, क्योंकि एक स्तर पर वह भी कुछ भलाई का काम करते हैं।

देश की आजादी से पहले जन्मे साईं बाबा ने खुद को भगवान और जनता को भाग्य पर जीने का सूत्र उस समय दिया,जब जनता को वैज्ञानिक और तर्कशील ज्ञान की सबसे अधिक जरूरत थी। मेरी जानकारी में साईं पहले ऐसे संत हैं,जिन्होंने खुद को भगवान घोषित किया। यही नहीं देश की बड़ी आबादी को उन्होंने सिलसिलेवार ढंग से ढोंगी, बलात्कारी, हत्यारे, माफिया बाबाओं के चंगुल में फंसते जाने की अंधेरी गली में मोड़ दिया।



जाने माने तर्कशास्त्री और इंडियन रेसनलिस्ट सोसाइटी के प्रमुख . सत्य साईं पर इनका वृहद् शोध है.वे साईं के जादुई और अध्यात्मिक कारनामों को हाथ की सफाई और प्रपंच मानते हैं.

May 9, 2011

संसदीय दलदल में धंसती नेपाली क्रांति


प्रचंड के अनुसार  एमाले का बहुदलीय जनवाद बुर्जुआ संसदवाद में वर्ग समन्वय और सुधारवादी लाइन को अभिव्यक्त करता है,  तो क्या प्रचंड इतने नादां हैं जो अपनी उसी अधोगति  नहीं समझ पा  रहे हैं...

अंजनी कुमार

आनंद स्वरूप वर्मा नेपाल पर चल रही बहस के अपने ‘संक्षिप्त’ जवाब में कहते हैं, ‘नेपाली क्रांति का नेतृत्व समूह और एक-एक कार्यकर्ता भी यही कहता है कि क्रांति जारी छ।'नेपाली राजनीतिक परिदृश्य में माओवादियों की भूमिका को लेकर आनंद जी का यह निष्कर्ष उनके बाद के तर्कों में भी लगातार पुष्ट होते हुए चलता है। इसके लिए वह इतिहास का हवाला भी देते हैं और वर्तमान के हालात की जरूरतों के अनुरूप संभलकर चलने की हिदायतें भी,लेकिन क्या यह उपरोक्त निष्कर्ष वस्तुगत स्थितियों को बयान करता है?
क्या नेपाल का सारा नेतृत्व समूह और एक-एक कार्यकर्ता इस बात का कायल है कि क्रांति जारी छ?' यदि ऐसा होता तो खुद आनंद स्वरूप वर्मा के ही आंकड़ों के अनुसार, ‘2006 और 2011 में आपके पीएलए,वाईसीएल और सामान्य कार्यकर्ता की जो आत्मगत तैयारी थी वह आज 60प्रतिशत से ज्यादा कम’न हो चुकी होती। नेतृत्व समूह में इतना घमासान न मचा रहता। और खुलेआम यह बात न उठती कि एनेकपा-माओवादी धीरे धीरे संशोधनवाद,दक्षिणपंथ आदि के गर्त में गिरती जा रही है। सच्चाई तो यही है कि वहां कार्यकर्ताओं के बड़े हिस्से और नेतृत्व के दूसरी श्रेणी के बहुमत को लगने लगा है कि शांति ठहर गई है... कि संक्रमण के इस दौर की सड़ांध में क्रांति का दम घुट रहा है।

फिर भी जब आप यह दावा करते हैं कि क्रांति जारी है तो निश्चय ही इस बात के पीछे एक विचार प्रणाली हैं। आपके विभिन्न लेखन और प्रसिद्ध पुस्तक ‘रोल्पा से डोल्पा’तथा ‘नेपाल से जुड़े कुछ सवाल’में यह ध्वनित होता रहा है कि संसदीय पार्टियों ने जनवाद का एजेंडा लागू नहीं किया इसलिए माओवादियों को जनता का समर्थन मिला। आपका ही यह कथन है :‘पिछले दस वर्षों के दौरान विभिन्न राजनीतिक दलों ने जिस तरह के जोड़-तोड़ किए और जनता के हितों को तिलांजली दी, उसका ही यह नतीजा है कि आज माओवादियों को देश के अंदर व्यापक समर्थन प्राप्त है।’

आप इन पार्टियों की कथनी में जनवाद देखते हैं,पर करनी में इनकी कमजोरी देखते हैं। क्या जनवाद का प्रश्न इच्छा-अनिच्छा से जुड़ा हुआ है?राजनीति में इसे वर्ग चरित्र के माध्यम से ही समझा जाता है। नेपाल में संघर्ष का मुख्य पहलू राजतंत्र विरोधी आंदोलन ही रहा है। यह संघर्ष भी तभी मजबूत होकर उभरा,जब यह आमूल बदलाव के नारे और कार्यक्रम के साथ जुड़ा। वहां कम्युनिस्ट आंदोलन तब=तब पतित हुआ जब आमूल बदलाव के सवाल को गौण बना दिया गया।

नेपाल में जनतंत्र का सवाल सिर्फ राजतंत्र विरोधी आंदोलन पर ही नहीं टिका था। यह समाज के अर्द्धसामंती-अर्द्धऔपनिवेशिक संरचना के निषेध और नवजनवादी क्रांति कार्यक्रम पर ही मजबूती से खड़ा हो पा रहा था। यह अकारण नहीं था कि एनेकपा-माओवादी अपने शुरूआती दिनों में इन्हीं संसदीय पार्टियों के खिलाफ संघर्ष करते हुए ही उभरकर आई। यह संसदीय पार्टियों की कमी से छूट गई जमीन नहीं, बल्कि वर्गीय पूर्वाग्रहों का परिणाम था जहां से एनेकपा-माओवादी ने व्यापक जनता को गोलबंद करते हुए संघर्ष को आगे बढ़ाया।

आप इनसे जनवाद की उम्मीद ही नहीं कर रहे हैं,साथ ही इनके द्वारा वर्ष 1990में स्वीकृत ‘संवैधानिक बहुदलीय लोकतंत्र की प्रणाली’ को माओवादियों के ‘बहुदलीय प्रणाली’ तथा ‘प्रतियोगिता’ की अवधारणा से उलझाते भी हैं। आपने अपनी पुस्तक ‘नेपाल से जुड़े सवाल’में एक सवाल के जवाब में लिखा है, ‘माओवादियों का कहना है कि उन्होंने बीसवीं सदी की क्रांतियों से सबक लेते हुए जो निष्कर्ष निकाले हैं उसमें बहुदलीय प्रणाली का बने रहना समाज के स्वाथ्य के लिए जरूरी है’ (पृश्ठ ३) आपने यह बात ज्ञानेन्द्र को सत्ता से बेदखल करने एवं एक नई संविधान सभा बनाने के संदर्भ में संसदीय पार्टियों के साथ मोर्चा गठन और एकदलीय तानाशाह शासन की आशंका के संदर्भ में कही है।

माओवादियों की इक्कीसवीं सदी की क्रांति और समाजवाद की अवधारणा में बहुदलीय व्यवस्था ‘संवैधानिक बहुदलीय लोकतंत्र’ की अवधारणा से पूरी तरह भिन्न है। प्रचंड के शब्दों में, ‘एमाले का बहुदलीय जनवाद बुर्जुआ संसदवाद में वर्ग समन्वय और सुधारवादी लाइन को अभिव्यक्त करता है’ तथा ‘एमाले के जनवाद और हमारे जनतांत्रिक गणराज्य के सार में ही बहुत बड़ा अंतर है’(13 फरवरी 2006 को द वर्कर में छपा साक्षात्कार पृष्ठ 20, अनुवाद : आनंद स्वरूप वर्मा।)
चुन्वांग सम्मेलन में लिए गए निर्णय एक तात्कालिक कार्यभार को पूरा करने के लिए था। यह निर्णय इस बहुदलीय व्यवस्था में लोटपोट होने के लिए नहीं था। प्रचंड के ही शब्दों में,‘आज के विश्व में संसद को इस्तेमाल करने की कार्यनीति की उपयोगिता अब लगभग समाप्त हो चुकी है लेकिन देश की और जनता की परिस्थिति को समझे बिना किसी व्यवस्था का निरंतर बहिष्कार मार्क्सवाद नहीं है.’(उपरोक्त, पृष्ठ 22।)निश्चय ही यह कार्यनीति व्यवस्थागत बदलाव के लिए संक्रमणकारी भूमिका निभा सकने में सक्षम नहीं है। किसी पार्टी का संसद में जाना ही संशोधनवाद नहीं होता, लेकिन जब यह कार्यनीति पार्टी के रणनीति की शक्ल अख्तियार करने लगती है,तब समझना चाहिए कि वहां खतरा पैदा हो चुका है।

अब तक का अनुभव यही बताता है कि नेपाल में जनता का जनवादी गणराज्य तो दूर,बुर्जुआ जनवादी गणराज्य की भी स्थिति बनती हुई नहीं दिख रही है। आज संसद का प्रयोग रणनीतिक स्तर के व्यवस्थागत बदलाव के लिए करना असंभव हो चुका है। यदि हम 2006से भी शांतिकाल मानें और इसमें संसदीय समयावधि जोड़ दें,तब इतनी लंबी समयावधि में इसके व्यवस्थागत बदलाव के प्रयोग की गुजांइश ही नहीं बनती। बल्कि अर्द्धसामंती और अर्द्धऔपनिवेशिक समाज व्यवस्था की नेतृत्कारी पार्टियाँ इस समयावधि में अपने को मजबूत करने में ही मशगूल रहीं। रिकार्ड स्तर पर नए प्रधानमंत्री का चुनाव टलता रहा। माओवादी पार्टी को सत्ता से बाहर रखा। अंतरराष्ट्रीय  नेटवर्क को मजबूत किया। उन गांव तक पुलिस-सेना की घुसपैठ को बढ़ाया जहां उसकी आज तक पहुंच नहीं थी। जबकि माओवादी पार्टी इस शांतिपूर्ण काल में अनेक स्तरों पर विभिन्न तरह की कमजोरी की शिकार हुई। सात साल बाद वह शांतिपूर्ण तरीके से ‘पेरूवीयन परिस्थिति’में जाकर फंस गई। आनन्द स्वरूप वर्मा का लेखन इस फंसान की परिस्थिति के कारणों की पड़ताल नहीं करता। जो इन कारणों पर रोशनी डाल रहे हैं, इससे निकलने की जद्दोजहद करने का आग्रह कर रहे हैं उन्हें आप ‘यूटोपिया’ कहकर नकार रहे हैंऔर विपरीत तथा गलत निष्कर्ष तक ले जा रहे हैं।

संविधान सभा और संसद में संविधान तथा सरकार बनाने को लेकर जो जोड़तोड़ चलती रही है, उससे ‘बुर्जुआ संसदीय’ पार्टियों का वर्ग चरित्र खुलकर सामने आया है। एमाले जैसी संशोधनवादी पार्टियों का भी वर्ग चरित्र जनवाद की जरूरतों से मेल नहीं खाता और इनका व्यवहार जनता के दबाव में भी नहीं बदलता। तब हम कांग्रेस जैसी पार्टियों से क्या उम्मीद कर सकते हैं?इन पार्टियों की भारत परस्ती और सामंतवाद के साथ गठजोड़ घिनौने रूप में बार-बार सामने आया है। इनका सारा जोर इस बहुदलीय प्रणाली में ‘संविधान’ एवं ‘प्रतियोगिता’की नैतिकता माओवादियों के खिलाफ प्रयोग कर उन्हें सत्ता से बाहर रखने और संविधान को न बनने देने और कुत्सा प्रचार करने का ही रहा।

यह प्रणाली नेपाल के पूरे समाज के बदलाव की आकांक्षा को संसद के दड़बे में बंद कर देने की आसान सी जुगत में बदल गयी। इसने एनेकपा-माओवादी और नेपाल की जनता की क्रांतिकारी गति को बारह सूत्रीय समझौते और चुन्वांग सम्मेलन के निर्णय का मोहताज बना दिया है। आज वहां एक ऐसा राजनीतिक माहौल बन गया है जिसका खामियाजा आम जनता का उठाना पड़ रहा है। जबकि चतुर खिलाड़ी नैतिकता का लबादा ओढ़े क्रांति को ‘फिलहाल’टाल देने के लिए अड़े हुए हैं। यह सबकुछ मार्क्सवाद के लबादे में किया जा रहा है और नेपाल की ‘विशिष्ट स्थिति’का राग लगातार अलापा जा रहा है।

वर्मा जी,आप इस वर्तमान प्रणाली के चरित्र,सीमा को चिन्हित करने के बजाय माओवादियों को लताड़ते हैं कि ‘आप अपनी हर खामियों के लिए कब तक भारत को दोषी ठहराते रहेंगे’ और ‘पार्टी की आंतरिक कमजोरी के कारण भारत एक हद तक सफल हो सका’है। आप सलाह देते हैं कि ‘आज विद्रोह की स्थितियां नहीं हैं और पार्टी को हर हाल में शांति प्रक्रिया को आगे बढ़ाने का प्रयास करना चाहिए’ और ‘किसी भी तरह संविधान निर्माण का काम पूरा किया जाय।' आप इस बहुदलीय प्रणाली में लोटपोट हो रही संसदीय पार्टियों के बारे में बात करने के बजाय एनेकपा-माओवादी के बारे में लिखते हैं कि ‘आज स्थिति यह है कि हर मोर्चे पर पार्टी की विफलता उजागर हो रही है। संविधान बनाने का इसका लक्ष्य कोसों दूर चला गया है।’

क्या सचमुच माओवादी पार्टी संविधान बनाना नहीं चाहती?आप किरण की प्रस्तावित राजनीतिक कार्यदिश ‘जनांदोलन श्रृंखला’, ‘सड़क से संसद की ओर’ एवं ‘जनविद्रोह’ से सहमति नहीं रखते, क्योंकि यह 'यूटोपिया' है, और प्रचंड की कथनी-करनी का फर्क ‘क्रांतिकारी लफ्फाजी’ है, तब तो एक ही रास्ता बचता है कि वर्ष 1990के समय से अस्तित्व में आई संवैधानिक बहुदलीय प्रणाली के तहत संसदीय राजनीति में गोते लगाते हुए माओवादी पार्टी जनतंत्र का खेल खेले.शांतिपूर्ण प्रतियोगिता और शांतिपूर्ण संक्रमण के माध्यम से ‘नवजनवादी’ और ‘हो सके तो ‘समाजवादी क्रांति’ करे।

दरअसल,आप संवैधानिक बहुदलीय प्रणाली के तहत ही एनेकपा-माओवादी पार्टी को‘व्यवहारिक राजनीति’ करने की सलाह दे रहे हैं। यह व्यावहारिक राजनीति और कुछ नहीं, बल्कि संसदवाद व सत्ता का वह दलदल है जिसमें चंद महीनों के ‘राज करने’का परिणाम खतरनाक रूप से सामने दिखाई दे रहा है़।

आप जब यह कहते हैं कि ‘किसने रोका था एक और पेरिस कम्यून बनने से?’तो इसके बहुत से निहितार्थ निकलते हैं। संदर्भ अप्रैल 2006 में जनांदोलन-2 के दौरान ज्ञानेंद्र को सत्ता से खदेड़ देने का है। पहली बात यह है कि क्या पेरिस कम्यून इतिहास का नकारात्मक पक्ष है? दूसरा, क्या नेपाल के राजनीतिक हालात फ्रांस जैसे ही थे कि वहा सत्ता दखल का अंतिम परिणाम क्रांति की हार में ही बदल जाए? क्या भारत कैजर की भूमिका निभाता? और, क्या संसदीय पार्टियां गृहयुद्ध में निर्णायक भूमिका में आतीं? यह मुद्दा क्रांतिकारी पार्टियों व बुद्धिजीवियों के बीच जेरे बहस रहा है।

यहां हमें यह बात जरूर याद रखना चाहिए कि नेपाल में उस समय एनेकपा-माओवादी पार्टी का एकीकृत नेतृत्व था जिसके पास एक मजबूत जनसेना, जनमिलिशिया, जनसंगठन और आधार क्षेत्र में राजसत्ता चलाने का अनुभव था। नेपाल में किसी भी बाहरी हस्तक्षेप के खिलाफ जनता की मजबूत एकजुटता बनती रही है। वहां की भौगोलिक स्थिति और दक्षिण एशिया में माओवादी आंदोलन की उपस्थिति उसके पक्ष को मजबूत करता था। बहरहाल,मुद्दा बहस का है और प्रचंड तथा बाबूराम भट्टाराई अब तक सत्ता दखल के सवाल से कतराते रहे हैं। इस बहस का ‘पेरिस कम्यून’ के रूप में सूत्रीकरण दुर्भाग्यपूर्ण है। पेरिस कम्यून पर मार्क्स से लेकर माओ तक सभी ने लिखा है और शायद ही कोई कम्युनिस्ट पार्टी हो जिसने इस पर अपने विचार व्यक्त न किए हों।

आनंद स्वरूप वर्मा ने जिस तरह से पेरिस कम्यून का उल्लेख किया है,वह नायाब है। शायद यह सर्वहारा की तानाशाही की अवधारणा पर बहुदलीय संवैधानिक प्रणाली के जोर का ही नतीजा है। बहरहाल, एनेकपा-माओवादी वर्तमान में जिस बहुदलीय संवैधानिक प्रणाली के तहत जो प्रयोग कर रही है वह न तो उनके ही सैद्धांतिक अवधारणा से मेल खाते हैं और न ही 12  सूत्रीय समझौता ही लागू हो पा रहा है। आज इन दोनों पर जोर का अर्थ संसदीय दलदल में फंसकर खत्म होना है।

निश्चय ही नेपाल की जनता में इस दलदल से निकलने की छटपटाहट है। यह विभिन्न रूपों में उभरकर सामने आ रही है। इतिहास का सबक समय के पहिए को आगे तो बढ़ाकर ले ही जाएगा, यह आने वाले दिनों में और भी निखरकर सामने आएगा।



स्वतंत्र पत्रकार व राजनीतिक-सामाजिक कार्यकर्ता.फिलहाल मजदूर आन्दोलन पर कुछ जरुरी लेखन में व्यस्त.






  • नेपाल के राजनीतिक हालात और नेपाली माओवादी पार्टी की भूमिका को लेकर आयोजित इस बहस में अबतक आपने पढ़ा -
1-क्या माओवादी क्रांति की उल्टी गिनती शुरू हो गयी है?  2-क्रांतिकारी लफ्फाजी या अवसरवादी राजनीति, 3- दो नावों पर सवार हैं प्रचंड  4- 'प्रचंड' आत्मसमर्पणवाद के बीच उभरती एक धुंधली 'किरण' 5- प्रचंड मुग्धता नहीं, शीर्ष को बचाने की कोशिश 6- संक्रमण काल की जलेबी अब सड़ने लगी है कामरेड  7 - संशोधनवादियों को जनयुद्ध का ब्याज मत खाने दो !


May 8, 2011

कहता है अमेरिका

रंजीत वर्मा की चार कवितायेँ

1.

ओबामा और ओसामा
भले ही इन नामों में समानता हो
भले ही इनकी कार्रवाइयां भी एक जैसी हों
हत्या और धमाकों से लबरेज
फिर भी क्यों लगता है ऐसा कि
इनमें से एक है सभ्य
और दूसरा है बर्बर

कहीं यह उनके पहनावे की वजह से तो नहीं
एक का पहनावा है ऐसा
जैसा कि आतंकियों को पहने
वे दिखाते हैं हमें टीवी में बार-बार
जबकि दूसरे का पहनावा है ऐसा
जिसे दफ्तर या दावतों में जाते वक्त
पहनने का रिवाज बताते हैं वे

या कहीं यह उनकी भाषा में जो अंतर है
उसकी वजह से तो नहीं
एक हमला करने से पहले चीखता है
लेकिन क्या कहता है समझ में नहीं आता
और दूसरा कार्रवाई समाप्त होने के बाद भी
चेहरे पर बिना कोई भाव लाए
शांति और दृढ़ता से कहता है
- जस्टिस हैज बिन डन।

क्या सिर्फ इसलिए
कहा जा सकता है कि
इनमें से एक है अच्छा
और दूसरा है बुरा

क्या इसलिए सिर्फ इसलिए
कहा जा सकता है
एक को अच्छा और दूसरे को बुरा
कि एक कानून तोड़ते
जरा भी नहीं हिचकता
और दूसरा
जो कुछ करता है
कानूनन जायज ठहराने में
है उसे महारत हासिल।

2.
ओसामा अमेरिका का ही गढ़ा हुआ था
आज अमेरिका ने ही उसे तोड़ डाला
और फिर उसने घोषणा की
कि उसने दुनिया को आतंकवाद से
मुक्त कर दिया
लेकिन सवाल है कि
दुनिया पर उसने आतंकवाद थोपा क्यों था?

3.
ओसामा अमेरिका के खिलाफ
जंग का ऐलान किये बैठा था
उसने उसके युद्धपोत मार गिराये थे
उसकी सत्ता के अहम् प्रतीक होते थे जो
विश्व व्यापार केंद्र की गगनचुम्बी इमारतें
उन्हें एक पल में ध्वस्त कर दिया था उसने
नौ ग्यारह के नाम से
मशहूर हुई तारीख के दिन
ये वही इमारतें थीं
जहां से अमेरिका ने दुनियाभर में
शोषण का जाल फैला रखा था

वे तमाम देश
जो गरीब हैं मेरे देश की तरह
आज इसी शोषण की चपेट में है

अमेरिका ही क्या
हमारे देश के शरीफ लोग भी
भला ऐसा क्यों चाहते हैं कि
भूख पैदा करने वाली ताकत को नहीं
हम सिर्फ ओसामा को मानें आतंकी

4.

अमेरिका कहता है
खूंखार हत्यारा था वह
अपनी आतंकी कार्रवाइयों से उसने
तीन हजार मासूम लोगों की जानें ली थी
उसे छुट्टा कैसे छोड़ा जा सकता था
भले ही उसके गुर्दे खराब हो गए हों
और वह अपनी स्वाभाविक मौत मर भी चुका हो
फिर भी उसे मारना
और मारने की घोषणा करना
एक जरूरी रस्म था
अमेरिका की सेहत के लिए

अमेरिका कहता है
उस सारे नुकसान की भरपाई करनी थी
उसकी मौत की खबर से
जो उसने विश्व व्यापार केंद्र को उड़ाकर
अमेरिका को पहुंचायी थी

अमेरिका कहता है
एक बड़े मकसद से जुड़ा अभियान था यह
यहां बेमतलब का आंकड़ा न रखें
कि तीन हजार से सात गुणा ज्यादा लोगों की हत्या
एंडरसन ने भोपाल में की थी
जहरीली गैस छोड़ कर
जिसे उसने पनाह दे रखी है

अमेरिका कहता है
वह एक चूक थी योजना नहीं
कोई इरादा नहीं था वहां
कोई युद्ध नहीं था वह
जैसा कि ओसामा कर रहा था

दुश्मन वह है
जो हमें शत्रु समझता है
न कि वह है दुश्मन
जो हमारी शरण में आता है

अमेरिका कहता है
भूल जाओ लाखों तमिलों की हत्या को
जो लंका में की गयी मेरी शह पर
और आंच नहीं आने दी मैंने राजपक्षे पर
इस तरह का भी कोई आरोप
हम पर मत लगाओ

अमेरिका कहता है
भूल जाओ विदर्भ में
आत्महत्या कर रहे किसानों की
ढाई लाख की संख्या
जो पार हुआ चाहती है पिछले पंद्रह सालों में
मत कहो कि इसके पीछे
हमारी विकास नीति काम कर रही है
तुम्हारे पास भी यही मॉडल है विकास का
अब यह मत कहना कि
यह जबरन थोपा गया है तुम पर

अमेरिका कहता है
पंद्रह लाख इराकियों को मैंने
गोलियों से जरूर उड़ाया
और ग्वेंतानामो भी है मेरे पास
और भी है बहुत कुछ मेरे पास
असांजे जो कुछ बोलता है उससे भी ज्यादा
काले कानून और कारनामों की इतनी परतें हैं कि
ओसामा भी जानता तो उसके होश
उड़ गए होते

यह याद रखो हमेशा कि
अगुवा हैं हम इस दुनिया के
जहां के तुम एक अदना से बासिंदे हो
अगर तुम हमारे साथ नहीं हो तो
दुश्मन हो हमारे
यह घोषणा पहले ही की जा चुकी है
मत कहना कि चेताया नहीं गया था तुम्हें

कोई विकल्प नहीं है तुम्हारे पास
सिवा हमारा साथ देने के
किसी सरहद के पीछे
छिप नहीं पाओगे फिर तुम
ओसामा की दरिंदगी भरी मौत तुम्हारे सामने है
और डॉलर की ताकत से भी तुम अनजान नहीं हो।



विधि मामलों के टिप्पणीकार और लेखक.कविता को जनता के बीच ले जाने के प्रबल  समर्थक और दिल्ली में शुरू हुई कविता यात्रा के संयोजक. उन्होंने ये कवितायेँ 2 .5 .2011 से 6 .5 .2011   के बीच लिखी हैं.

May 7, 2011

एक बार फिर मारा गया ओसामा बिन लादेन !

बुश और ओबामा के जंगी कार्यकालों ने अमेरिका का दिवाला निकाल दिया है. उसे भारी घाटे और डॉलर की पतली होती हालत का सामना करना पड़ रहा है. और फिर चुनाव भी धीरे-धीरे नजदीक आ रहे हैं...

ओसामा बिन लादेन की हत्या की खबरें अनेक सवालों पर फिर से ध्यान खींचती हैं. इनमें सबसे बड़ा सवाल तोयह है कि क्या किसी भी देश को दूसरे देश में अवैध-अनैतिक-अमानवीय फौजी कार्रवाइयों का अधिकार है. ऐस हमले के पीछे तर्क दिया जा रहा है कि लादेन, कथित तौर पर, उन हमलों के लिए जिम्मेदार था, जिनमें 3 हजार से अधिक लोगों की मौतें हुईं. इन हमलों और हमलावरों की वास्तविकताओं पर किये जानेवाले मजबूत संदेहों को छोड़ भी दें तब भी अगर बेगुनाह लोगों की हत्याओं का जिम्मेदार होना ही ऐसे हमलों के लिए वाजिब कारण है तब तो सारे हत्यारे बुशों और ओबामाओं को सैकड़ों बार गोलियों से मारना पड़ेगा.

यूनियन कार्बाइड के मुखिया और भोपाल गैस जनसंहार में मारे गये बीसियों हजार लोगों और दो दशकों में इसकी पीड़ा अब भी भुगत रहे लाखों लोगों के अपराधी वारेन एंडरसन को किसने पनाह दी है ? उसे कौन बचा रहा है? 2009 से लेकर अब तक श्रीलंका में लाखों तमिल निवासियों के कत्लेआम के दोषी राजपक्षे की मदद किसने की और अब भी उसकी पीठ पर किसका हाथ है? विदर्भ में पिछले 15 वर्षों में 2.5 लाख से अधिक किसानों की (आत्म)हत्याओं के लिए जो (निजीकरण-उदारीकरण-वैश्वीकरण की) नीतियां जिम्मेदार हैं, उन्हें किसने बनाया और उन्हें कौन लागू कर रहा है? इराक में पिछले दो दशकों में प्रतिबंधों और युद्ध में जो 14 लाख 55 हजार से अधिक लोग मारे गये हैं, उनके लिए कौन जिम्मेदार है?

पूरी दुनिया में लगातार युद्ध, प्रतिबंधों और सरकारी नीतियों के जरिए लोगों की जिंदगियों में संस्थागत हिंसा घोल रही साम्राज्यवादी नीतियां आखिर कौन लोग बनाते और थोपते हैं. अमेरिकी साम्राज्यवादी और उसके सहयोगी देश. इनके द्वारा की गयी हत्याएं 11 सितंबर को मारे गए लोगों की संख्या से सैकड़ों गुना अधिक हैं. इन्हें क्यों नहीं सजा मिलती? कब मिलेगी इन्हें सजा? फिर इन्हें क्या अधिकार है दूसरों को आतंकवादी कहने और मारने का?



इन सब सवालों के जवाब दुनिया की जनता खोज भी रही है और दे भी रही है. साम्राज्यवाद का ध्वस्त होना लाजिमी है. अपने इन हताशा में उठाये कदमों के जरिए ही वह अपने अंत के करीब भी आ रहा है. उसकी जीत का एक-एक जश्न, उसकी कामयाबी का एक-एक ऐलान उसकी कमजोरी और भावी अंत की ओर भी संकेत कर रहा है. ओसामा बिन लादेन की हत्या की खबर को भी इसी संदर्भ में देखना चाहिए. अमेरिकी अर्थशास्त्री, वाल स्ट्रीट जर्नल और बिजनेस वीक के पूर्व संपादक-स्तंभकार, अमेरिका की ट्रेजरी फॉर इकोनॉमिक पॉलिसी के सहायक सचिव पॉल क्रेग रॉबर्ट्स बता रहे हैं कि कैसे हत्या की इस खबर का सीधा संबंध विदेशी मुद्रा और व्यापार बाजार में डॉलर की पतली होती हालत और अमेरिकी अर्थव्यवस्था की डांवाडोल होती जा रही स्थिति से है. इन्फॉर्मेशन क्लियरिंग हाउस  की पोस्ट को आप खुद देखें ...रियाजुल हक़
अगर आज 2 मई के बजाय 1 अप्रैल होता तो हम ओसामा बिन लादेन के पाकिस्तान में मारे जाने और तत्काल समुद्र में बहा दिये जाने को अप्रैल फूल के दिन के मजाक के रूप में खारिज कर सकते थे. लेकिन इस घटना के निहितार्थों को समझते हुए हमे इसे इस बात के सबूत के रूप में लेना चाहिए कि अमेरिकी सरकार को अमेरिकियों की लापरवाही पर बेहद भरोसा है.

जरा सोचिए. एक आदमी जो कथित रूप से गुरदे की बीमारी से पीड़ित हो और जिसे साथ में डायबिटीज और लो ब्लड प्रेशर भी हो, और उसे डायलिसिस की जरूरत हो, उसकी एक दशक तक खुफिया पहाड़ी इलाकों में छुपे रह सकने की कितनी गुंजाईश है? अगर बिन लादेन अपने लिए जरूरी डायलिसिस के उपकरण और डाक्टरी देख-रेख जुटा लेने में कामयाब भी हो गया था तो क्या इन उपकरणों को जुटाने की कोशिशें इस बात का भंडाफोड़ नहीं कर देतीं कि वह वहां छुपा हुआ है? फिर उसे खोजने में दस साल कैसे लग गए?

बिन लादेन की मौत का जश्न मना रहे अमेरिकी मीडिया के दूसरे दावों के बारे में भी सोचें. उनका दावा है कि बिन लादेन ने अपने दसियों लाख रुपए खर्च करके सूडान, फिलीपीन्स, अफगानिस्तान में आतंकवादी प्रशिक्षण शिविर खड़े किए, ‘पवित्र लड़ाकुओं’ को उत्तरी अफ्रीका, चेचेन्या, ताजिकिस्तान और बोस्निया में कट्टरपंथी मुसलिम बलों के खिलाफ लड़ने और क्रांति भड़काने के लिए भेजा. इतने सारे कारनामे करने के लिए यह रकम तो ऊंट के मुंह में जीरे की तरह है (शायद अमेरिका को उसे पेंटागन का प्रभार सौंप देना चाहिए था), लेकिन असली सवाल है कि बिन लादेन अपनी रकम भेजने में सक्षम कैसे हुआ? कौन-सी बैंकिंग व्यवस्था उनकी मदद कर रही थी? अमेरिकी सरकार तो व्यक्तियों और पूरे के पूरे देशों की संपत्तियां जब्त करती रही है. लीबिया इसका सबसे हालिया उदाहरण है. तब बिन लादेन की संपत्ति क्यों जब्त नहीं की गयी? तो क्या वह 100 मिलियन डॉलर की अपनी रकम सोने के सिक्कों के रूप में लेकर चलता था और अपने अभियानों को पूरा करने के लिए दूतों के जरिए रकम भेजता था?

मुझे इस सुबह की सुर्खियों में एक नाटक की गंध आ रही है. यह गंध जीत के जश्न में डूबी अतिशयोक्तियों से भरी खबरों में से रिस रही है, जिनमें जश्न करते लोग झंडे लहरा रहे हैं और ‘अमेरिका-अमेरिका’ का मंत्र पढ़ रहे हैं. क्या ऐसी कोई घटना सचमुच हो रही है?

इसमें कोई संदेह नहीं है कि ओबामा को जीत की बेतहाशा जरूरत है. उन्होंने अफगानिस्तान में युद्ध को फिर से शुरू करके मूर्खतापूर्ण गलती की और अब एक दशक लंबी लड़ाई के बाद अमेरिका अगर हार नहीं रहा तो अपने आप को गतिरोध में फंसा हुआ जरूर पा रहा है. बुश और ओबामा के जंगी कार्यकालों ने अमेरिका का दिवाला निकाल दिया है. उसे भारी घाटे और डॉलर की पतली होती हालत का सामना करना पड़ रहा है. और फिर चुनाव भी धीरे-धीरे नजदीक आ रहे हैं.

पिछली अनेक सरकारों द्वारा ‘व्यापक संहार के हथियारों’ जैसे तरह-तरह के झूठों और हथकंडों का नतीजा अमेरिका और दुनिया के लिए बहुत भयानक रहा है. लेकिन सभी हथकंडे एक तरह के नहीं थे. याद रखें, अफगानिस्तान पर हमले की अकेली वजह बतायी गयी थी- बिन लादेन को पकड़ना. अब ओबामा ने ऐलान किया है कि बिन लादेन अमेरिकी विशेष बलों द्वारा एक आजाद देश में की गयी एक कार्रवाई में मारा गया है और उसे समुद्र में दफना दिया गया है, तो अब युद्ध को जारी रखने की कोई वजह नहीं रह गयी है.

शायद दुनिया के विदेश विनिमय बाजार में अमेरिकी डॉलर में भारी गिरावट ने कुछ वास्तविक बजट कटौतियों के लिए मजबूर किया है. यह सिर्फ तभी मुमकिन है जब अंतहीन युद्धों को रोका जाए. ऐसे में जानकारों की राय में बहुत पहले मर चुके ओसामा बिन लादेन को डॉलर के पूरी तरह धूल में लोट जाने से पहले एक उपयोगी हौवे के रूप में अमेरिकी फौजी और सुरक्षा गठजोड़ के मुनाफे के लिए इस्तेमाल किया गया.
(हाशिया ब्लॉग से साभार)



 

गाँव में थाना ना बनाओ !

देश के बाकि हिस्सों में जहाँ सुरक्षा के लिए पुलिस की कमी की  बात होती है, वहीँ एक ऐसा गाँव भी है जहाँ लोग थाना स्थापित होने से अपनी जमीन और इज्जत खोने की आशंका जता रहे हैं...

हिमांशु कुमार

मैं  कुछ दिनों पहले आदिवासी ग्रामीण महिलाओं से मिला था.  उन्होंने मुझे बताया कि  वह छत्तीसगढ़ के जशपुर जिले के एक आदिवासी गाँव से हैं . वे मुझे बता रही थीं  कि उनके गाँव में सरकार बिना गाँववालों से चर्चा किये जबरन एक पुलिस थाना खोल रही है. वे कह रही थीं कि हम आदिवासी लोग गाँव के झगड़े  गाँव में ही सुलझा लेते हैं. यही आदिवासियों की परम्परागत सामाजिक न्याय पद्धति है.

वे महिलाएं डरी हुई थीं कि पुलिस गाँव में रहेगी और उनके  परिवारों के मर्द पर्व-त्यौहार में पीकर आपस में लडाई-झगड़ा  कर लेंगे तो तुरंत पुलिस उन्हें पकड़कर ले जायेगी और उनको छोड़ने के लिए उनके परिवार से पैसा मांगेगी. इन महिलाओं को ये भी डर था कि ये पुलिस वाले गाँव की महिलाओं की इज्ज़त पर हमला करेंगे और इसका विरोध करने वाले गाँव के नौजवानों को नक्सली कहकर जेलों में डाल देंगे.

महिलाएं बता रहीं थी कि गाँव वालों ने छत्तीसगढ़ सरकार के ग्राम स्वराज्य अभियान के दौरान उनके गाँव में आये  सरकारी दल को ग्रामसभा की इन आपत्तियों के बारे में बताया और एक लिखित प्रार्थनापत्र भी मुख्यमंत्री के नाम पर इन सरकारी अफसरों को सौंपा था. वे महिलाएं मुझसे सीजी नेट स्वर का फोन नंबर पूछ रही थीं. बाद में मैंने उनका सन्देश सीजी नेट स्वर पर सुना भी था.

लेकिन इसका परिणाम क्या हुआ? आज शाम को मेरे पास उन्हीं महिलाओं का फोन आया कि गाँव में पुलिस आयी हुई है और थाना खुलने का विरोध करने वालों के नाम-पते पूछ रही है.वे इस मामले में मुझसे मदद चाहती थीं.  तभी से बैचैन हूँ, क्योंकि  मैं जानता हूँ  कि इनकी कोई मदद नहीं कर पाऊंगा. मुझे पता है कि अपने संवैधानिक अधिकार की मांग करने की जुर्रत करने की सज़ा के तौर पर इस गाँव के कुछ लोगों को फर्जी केस बनाकर जेल में डाल दिया जायेगा . बाकी गाँव वाले डर कर विरोध करना बन्द कर देंगे  और वहां एक नया थाना गाँव की छाती पर खुल जाएगा.

लेकिन सवाल है कि  सरकार ये सब कर क्यों रही है? असल में उस इलाके में बड़े पैमाने पर सरकार आदिवासियों से ज़मीन छीनकर जिंदल साहब (जिंदल स्टील ग्रुप) को देना चाहती है, ताकि वो वहां अपना कारखाना लगा लें. आदिवासी इस ज़मीन की लूट का विरोध कर रहे हैं. इस विरोध को कुचलने के लिए सरकार उस इलाके में ज्यादा से ज्यादा पुलिस भेज रही है . तो मेरा आप सबसे सवाल है कि  क्या हम इन आदिवासियों को बचा सकते हैं?
 
 
 
दंतेवाडा स्थित वनवासी चेतना आश्रम के प्रमुख और सामाजिक कार्यकर्त्ता हिमांशु कुमार का संघर्ष बदलाव और सुधार की गुंजाइश चाहने वालों के लिए एक मिसाल है.


May 6, 2011

मायावती ने अबकी हाथी पर टांगा कानून

अब माया राज में हकों के लिए होने वाले संघर्षों के दौरान जो क्षति होगी उसकी भरपाई राजनीतिक दलों के जिला, प्रदेश व राष्ट्रीय अध्यक्षों से होगी और सामाजिक संगठनों के पदाधिकारी करेंगे...

डॉ. आशीष वशिष्ठ

उत्तर प्रदेश की मालकिन (मुख्यमंत्री) मायावती ने विरोध के स्वर को दबाने के लिए कानून के बहाने तुरूप का पत्ता चल दिया है। 'सर्वजन हिताय' की माला जपने वाली मायावती ने अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के रास्ते में एक बड़ा रोड़ा इस आदेश के साथ अटका दिया है कि धरना-प्रदर्शन, रैली, जुलूस या सभा करने के लिए प्रशासन से विस्तृत अनुमति लेनी होगी।

प्रदेश में धरना-प्रदर्शन के लिये बने इस नये कानून से पहले तक एक साधारण अर्जी पर प्रशासन अनुमति दे दिया करता था। ज्यादातर मामलों में डीएम ऐसे कार्यक्रमों की अनुमति अपने स्तर से देते थे। कोई बड़ा कार्यक्रम होने की सूरत में डीएम स्थानीय अभिसूचना इकाई (एलआईयू) से रिपोर्ट लेकर फैसला करते थे, लेकिन नये नियमों के तहत धरना-प्रदर्शन या आंदोलन के लंबा-चौड़ा फार्म भरने से लेकर कई विभागों से एनओसी प्राप्त करने का प्रावधान है।

नये कानून के अनुसार उत्तर प्रदेश में धरना-प्रदर्शन, जुलूस, रैली आदि के आयोजन के लिए आयोजकों को अब कम से कम सात दिन पहले प्रशासनिक अधिकारियों को लिखित आवेदन देकर इसकी अनुमति हासिल करनी होगी। जिला प्रशासन ऐसे आयोजनों की वीडियोग्राफी भी करायेगा। ऐसे आयोजनों के दौरान सार्वजनिक अथवा निजी संपत्ति की क्षति होने पर आयोजक से क्षतिपूर्ति की वसूली करने के साथ उसके खिलाफ कानूनी कार्यवाही भी की जाएगी। राजनीतिक दलों के आयोजनों में निजी संपत्ति की क्षति होने पर उसकी वसूली दल के जिला, प्रदेश और राष्ट्रीय अध्यक्ष से होगी।

सामाजिक,धार्मिक तथा अन्य आयोजनों की जिम्मेदारी संस्था के मुख्य पदाधिकारी की होगी। भुगतान न करने की दशा में क्षतिपूर्ति की राशि भू-राजस्व के बकाये की भांति की जायेगी। सरकार का पक्ष है कि धरना-प्रदर्शन, रैली, जुलूस आदि को लेकर कई बार अराजक स्थिति उत्पन्न हो जाती है। इस संबंध में सुप्रीम कोर्ट ने सार्वजनिक एवं निजी संपत्तियों को क्षति बनाम आंध्र प्रदेश सरकार एवं अन्य रिट याचिका की सुनवाई करते हुए 16 अप्रैल 2009 को पारित अपने आदेश में व्यापक दिशा-निर्देश दिये थे। सुप्रीम कोर्ट द्वारा पारित आदेश में व्यक्त की गईं अवधारणाओं के क्रम में राज्य सरकार ने 27अप्रैल 2011को दिशा-निर्देश जारी करते हुए इनका कड़ाई से अनुपालन सुनिश्चित कराने का निर्देश दिया है। अनुपालन न कराने पर अफसरों के खिलाफ कठोर कार्यवाही होगी।

शासनादेश के मुताबिक ऐसे आयोजनों में सभी प्रकार के अस्त्र-शस्त्र प्रतिबंधित रहेंगे। जिला मजिस्ट्रेट जिले में ऐसे धरना-प्रदर्शन स्थलों को निर्धारित करके उनका व्यापक प्रचार-प्रसार करायेंगे, ताकि जनता को इसकी जानकारी हो सके। तहसील स्तरीय धरना-प्रदर्शन की अनुमति उप जिला मजिस्ट्रेट और अपर जिला मजिस्ट्रेट देंगे। जिला मुख्यालय स्तरीय धरना-प्रदर्शनों की अनुमति जिला मजिस्ट्रेट, अपर जिला मजिस्ट्रेट, सिटी मजिस्ट्रेट, उप जिला मजिस्ट्रेट द्वारा जारी की जाएगी। इन आयोजनों के बारे में संबंधित थाने, स्थानीय अभिसूचना इकाई और अन्य विभागों से रिपोर्ट हासिल कर निर्धारित प्रारूप पर अनुमति दी जाएगी।

इसके अलावा धरना-प्रदर्शन, हड़ताल या जुलूस का आयोजन करने वाले पुलिस और प्रशासन से विचार-विमर्श करने के बाद ऐसे आयोजन का स्थल, मार्ग, समय, पार्किंग और अन्य शर्तें तय करेंगे। सड़क या रेलमार्ग से आने वाली जनता के आवागमन के लिए संबंधित विभाग द्वारा समय से संपर्क कर सुचारु व्यवस्था सुनिश्चित करायी जाएगी। आयोजक यह भी अंडरटेकिंग देंगे कि उनकी हड़ताल या धरना-प्रदर्शन शांतिपूर्ण होंगे।

माया सरकार के इस तुगलकी फरमान ने इमरजेंसी के दिनों की याद ताजा कर दी है। वहीं सरकार का यह कदम देश के आम आदमी को संविधान प्रदत्त स्वतंत्रता के अधिकार का भी हनन करता है। विरोधी दलों ने सरकार के नादिरशाही फरमान की घोर निंदा की है, लेकिन हमेशा की तरह माया की कान पर जूं तक नहीं रेंगी। असल में मायावती भलीभांति ये जानती है कि उनके मंत्रियों और चमचों की कुकृत्यों के कारण उनकी सरकार की छवि को गहरी धक्का लगा है। सरकार डैमेज कंट्रोल की कार्रवाई तो कर रही है,लेकिन जो बदनामी होनी थी वो तो हो चुकी। ऐसे में आगामी निकाय चुनावों से लेकर विधानसभा चुनावों में भ्रष्टाचार विपक्षी दलों के लिए माया के विरूद्व सबसे बड़ा हथियार होगा। ऐसे में विपक्षी दल मायावती सरकार की काली तस्वीर प्रदेश की जनता के सामने रखेंगे तो चुनावों में तस्वीर बदल भी सकती है।

बसपा सरकार के विधायकों और मंत्रियों के कारनामे प्रदेश के आम आदमी से छिपे नहीं हैं। ऐसे में विरोधी दलों के लगातार तीखे तेवरों, धरने-प्रदर्शनों और आंदोलनों से घबराई माया सरकार ने चिर-परिचित अंदाज में अपने विरोधियों और आम आदमी के स्वर को दबाने के लिए कानून की आड़ ली है। सरकार और उसका  पालतू सरकारी अमला इस कानून को लागू करने के पीछे सर्वोच्च और उच्च न्यायालय के आदेशों की दुहाई दे, लेकिन मायावती सरकार और उनके चमचे न्यायालयों की आदेशों के पालन में कितने गंभीर हैं, ये बताने की जरूरत नहीं है।


कानपुर : प्रदेश पुलिस  प्रदर्शनकारियों से ऐसे निपटती है
 पिछले चार वर्षों में कई मौकों पर माया सरकार ने न्यायालय के आदेशों  की अवेहलना और अवमानना की है। जाट आरक्षण आंदोलन के तहत न्यायालय के आदेश के उपरांत भी प्रदर्शनकारियों को रेलवे  ट्रैक से न हटाने की जो हिमाकत माया सरकार ने की थी, वो सरकार की नीति और नीयत को भली-भांति दर्शाता है।

सत्ता के मद में चूर मायावती के लिए आम आदमी के दुःख-दर्द और समस्याएं शायद कोई मायने नहीं रखती हैं। अंदर ही अंदर माया सरकार के प्रति जनता के मन में गुस्सा भर चुका है और स्वयं माया भी इस बात से अंजान नहीं है। मार्च महीने में प्रदेश के समस्त जिलों के दौरे पर निकली सीएम मायावती को कई स्थानों पर जनता के गुस्से का शिकार होना पड़ा था, उस वक्त भी सरकार ने सुरक्षा का बहाना बनाकर मुख्यमंत्री के दौरे के दौरान नागरिकों को घरों में बंधक बनाकर जनता के गुस्से से बचने की कोशिश की थी। पिछले कुछ समय में माया सरकार के विरूद्व राजनीतिक, सामाजिक, व्यापारिक, शिक्षकों या फिर वकीलों का स्वर उभरा, तो उसे दबाने के लिए सरकारी मशीनरी ने मानवाधिकार के हनन में से भी कोई परहेज नहीं किया।

दरअसल,  2007में बहुमत मिलने के बाद से ही मायावती ने आम आदमी से दूरी बनाई हुई है। अगर बसपा सरकार के कामों का पिछले चार सालों का रिर्काड खंगाला  जाए तो पार्टी की दो-चार बड़ी रैलियों और जनसभाओं के अलावा सूबे के आमजन से संपर्क करने की कोई कोशिश मायावती ने नहीं की है। सत्ता के नशे में चूर मायावती को लगता है कि उनका सिंहासन हिलाने की ताकत किसी में नहीं है। शुरू से अपनी दबंग छवि और कारनामों के लिए मशहूर रही मायावती को कानून तोड़ने और उसे मनमाफिक बनाने में मजा आता है। धरना-प्रदर्शन  का कानून बनाने से पहले माया सरकार राज्य अतिथि नियमावली में भी फेरबदल कर चुकी है, ताकि केन्द्रीय मंत्रियों को उनकी औकात बताई जा सके।

किसी जमाने में प्रदेश में मुख्यमंत्री जनता दरबार के माध्यम से प्रदेश की जनता से रू-ब-रू होते थे, लेकिन माया सरकार में जनता दरबार की ये व्यवस्था लागू नहीं है। सरकार के अदने से अधिकारी से मिलने के लिए आपको सैंकड़ों पापड़ बेलने पड़ते हैं ऐसे में सीएम से मिलना तो बडे़-बड़ों की औकात से बाहर है। चुनावी बेला सिर पर है और ऐसे में माया हर कदम फूंक-फूंककर रख रही हैं, क्योंकि वो जानती हैंकि उनका एक भी गलत कदम उन्हें सत्ता से दूर कर सकता है और विपक्षी भी उनकी सरकार को पटकनी देने के लिए किसी भी स्तर तक जा सकते हैं।

माया को भलीभांति मालूम है कि  उनके खाते में स्मारक, पार्क, मूर्तियां लगाने के अलावा कोई और बड़ी उपलब्धि शामिल नहीं है। ऐसे में माया सरकार प्रदेश के आम आदमी की आवाज दबाने की जो गलती कर रही है उसका खामियाजा उन्हें  भुगतना ही होगा।



स्वतंत्र पत्रकार और उत्तर प्रदेश के राजनीतिक- सामाजिक मसलों के लेखक .






संशोधनवादियों को जनयुद्ध का ब्याज मत खाने दो !

संक्रमणकाल के नाम पर भ्रष्टाचार, कालाबाजारी, तस्करी, कमीशन तंत्र और हत्या-हिंसा का साम्राज्य पहले से कई गुना बढ़ा है.पिछले तीन वर्षों की अवधि में संविधान सभा लुटेरों और विदेशी दलालों की क्रीडास्थली बन चुकी है.संविधान सभा में क्रांतिकारियों की उपस्थिति के अभाव में जन संविधान बनाने की जगह संशोधनवादी,यथास्थितिवादी और प्रतिक्रियावादी संविधान बनाने का खेल जारी है... 



मात्रिका यादव, पूर्व केन्द्रीय मंत्री 

नेपाली  राजतंत्र हटाने के नाम पर एमाओवादी पार्टी की जनयुद्ध ख़त्म करने की रणनीति और  देशी-विदेशी प्रतिक्रियावादियों के समक्ष आत्मसमर्पण की संशोधनवादी यात्रा शुरू करने का जो परिणाम होना था, वह अब हो चूका  है. अब  क्रांतिकारी कार्यकर्ताओं और परिवर्तन चाहने वाली जनता को इस क्रांतिविरोधी अभियान में साथ लेकर संसदीय यात्रा करना ही नेतृत्व मंडली का प्रमुख उद्देश्य हो  गया है, इसीलिए अमूर्त विद्रोह का बहाना लिए सभी को कन्फ्यूज करते हुए धोखा देने का काम जारी है.

दरअसल एमाओवादी के नेतृत्व ने चुनबांग बैठक से ही संसदीय रास्ते को प्रमुख रास्ता बना लिया और अपने भीतर के क्रांतिकारियों को दिग्भ्रमित करते हुए सभी प्रकार के संघर्ष के रूपों को स्वीकार करने के नाम पर सर्वग्राह्य्वादी  नारा दिया. संघर्ष के सभी रूप कभी भी एक समान नहीं हो सकते. संघर्ष के प्रधान और सहायक पहलू को निश्चित करना बहुत जरुरी होता है.लेकिन एमाओवादी के अध्यक्ष प्रचंड - सरकार, सदन और सड़क के संघर्ष की बात करके सभी को दिग्भ्रमित करते रहे हैं.सरकार के लिए संघर्ष करना ही उनका रणनीतिक उद्देश्य है.वो शांति और संविधान के नारों द्वारा बाबूराम को और विद्रोह के नारे द्वारा कामरेड किरण को दिग्भ्रमित करते रहे हैं. सिर्फ इसलिए कि उनके पास आवश्यकतानुसार इन नारों का  प्रयोग करने की कलात्मक क्षमता की भरमार है.

उदाहरण के तौर पर प्रचंड एक तरफ  भारतीय विस्तारवादी शासक वर्ग का खूब बिरोध करते हैं और दूसरी तरफ  आत्मसमर्पण करने को लालायित दिख रहे हैं.एक तरफ विरोध के लिए वो कामरेड किरण को और दूसरी तरफ आत्मसमर्पण के लिए बाबूरामजी का उपयोग करते आये हैं, जिसे दोनों नेताओं ने बखूबी समझा है. दोनों अपनी-अपनी चारित्रिक विशेषता के अनुसार प्रयोग होते आये हैं.ऐसे में साफ़ है कि एमाओवादी के अन्दर अंतरसंघर्ष होने के बावजूद उसकी दिशा क्रांतिविहीन है.  पुष्पकमलजी (प्रचंड) की एकमात्र दिशा है बुर्जुआ गणतांत्रिक संसदीय दिशा,जिस दिशा में पार्टी निरंतर आगे बढ़ रही है.उसके भीतर पुष्पकमलजी और बाबूरामजी की लाइन एक होने के बावजूद भी उनके बीच व्यक्तित्व की टक्कर है. ये दोनों नेता अति महत्वाकांक्षी व्यक्तिवादी प्रकृति के हैं. वहीं   कामरेड किरण का विश्लेषण क्रांतिकारी तो है,लेकिन खतरा मोल न लेने की अरुचि के कारण वे गोलचक्करवादी हैं.

अवसरवादी पार्टियों के साथ एकता करना, लड़ाकू पार्टी को मास पार्टी में तब्दील कर देना,पार्टी को भ्रष्ट बनाना और उसका अपराधीकरण और व्यापारीकरण कर देना अर्थात पूरी पार्टी को चुनावी पार्टी में तब्दील कर देना ही पुष्पकमल दहल उर्फ़ प्रचंड  और बाबूराम का एकमात्र उद्देश्य है.जबकि कामरेड किरण गोलचक्करवादी प्रवृति के कारण पार्टी को वर्तमान अवस्था में लाने के लिए सहयोगी की भूमिका के साथ जिम्मेदार हैं या दूसरे शब्दों में कहें तो अनुशासन लागू करने के नाम पर निरीह बन गए हैं. 'देखो और प्रतीक्षा करो' के नाम पर क्रांति का रथ बर्बाद होते जाने की स्थिति पर भी मूकदर्शक बने रहना क्रांतिकारिता नहीं है.क्रांतिकारियों के लिए सभी चीज़ें क्रांति होती हैं. रिश्तेदारी और सामाजिक सम्बन्ध भी क्रांति के लिए होते हैं और आवश्यकता पड़ने पर क्रांति के हित के लिए सम्बन्ध-विच्छेद भी किये जाते हैं.भ्रम की अवस्था क्रांति के लिए कभी हितकर नहीं होती. क्रांतिकारियों द्वारा परिस्थितियों का क्रांतिकारी विश्लेषण किया जाना ही पर्याप्त नहीं होता, वरन उसका संश्लेषण भी क्रांतिकारी होना चाहिए.

कभी-कभार शक्ति संचय करने के उद्देश्य से शांतिपूर्ण संक्रमण की बात करना उचित होता है, लेकिन अनावश्यक शांतिपूर्ण संक्रमण के नाम पर जनसंघर्ष से प्राप्त शक्ति को नष्ट कर देना अनुचित है. एक बार जनता द्वारा हथियार उठा लेने के बाद उसे किसी बहाने हथियारविहीन कर देना ही तो संशोधनवाद है. इसलिए यह क्रांति की नहीं, वरन प्रतिक्रांति की सेवा करता है. शक्ति संचय के लिए किसी ख़ास अवस्था में संसदीय संघर्ष का प्रयोग किया जा सकता है और वह भी एक सूरत में, जबकि संघर्ष से प्राप्त उपलब्धि की रक्षा और विकास हो पाना संभव हो पाए. संघर्ष से प्राप्त उपलब्धि का बलिदान कर संसदीय पार्टी का निर्माण करने को क्रांति की संज्ञा देना ही तो संसदवाद है.

क्रांति का मुख्य प्रश्न सत्ता का ही होता है.पुरानी प्रतिक्रियावादी राज्यसत्ता को पूर्णरूप से ध्वस्त करके नयी राज्यसत्ता अर्थात उत्पीडित वर्ग और समुदाय की सत्ता स्थापित करना ही क्रांति का एकमात्र उद्देश्य होता है. एमाओवादी का नेतृत्व कब का प्रतिक्रियावादी राज्यसत्ता को ध्वस्त कर नयी जनवादी राज्यसत्ता स्थापित करने की लाइन को ही तिलांजलि दे चुका है और संसदीय गणतंत्र को स्थापित करने के चक्कर में लगा हुआ है. क्रांति अब उनके लिए मुख्य प्रश्न नहीं रहा, बल्कि नए रंगरोगन के साथ प्रतिक्रियावादी व्यवस्था को संविधान सभा द्वारा वैधानिकता प्रदान करते हुए देशी-विदेशी प्रतिक्रियावादी की सेवा करना ही उनका अभीष्ट बन गया है.

यह तथ्य समझने के बावजूद भी एमाओवादी में मौजूद क्रांतिकारी हिस्सा दिग्भ्रमित होकर वहीँ बैठा है. इसलिए इन भ्रमों के कारणों का भंडाफोड़ करना जरूरी हो गया है. इस सम्बन्ध में पहला कारण यह है कि एमाओवादी नेतृत्व आज भी कथनी में वर्ग संघर्ष,बल प्रयोग के सिद्धांत और सर्वहारा अधिनायकत्व के सिद्धांत को स्वीकार करता है, मगर व्यवहार में वर्ग समन्वय, शांतिपूर्ण संक्रमण तथा बुर्जुआ वर्ग के अधिनायकत्व को आत्मसात कर चुका है. दूसरा कारण यह है कि एमाओवादी नेतृत्व मात्र भाषणबाजी या लेखन के आधार पर स्थापित नेतृत्व नहीं है, बल्कि विगत में सभी तरह के अवसरवादियों के साथ संघर्ष के फलस्वरूप निर्णायक सम्बन्ध-विच्छेद करने के कारण क्रांतिकारियों में भ्रम बने रहना स्वाभाविक है.तीसरा कारण यह है कि चुनाव में भाग लेते हुए जनयुद्ध के तैयारी करते हुए और दो-दो बार शांति वार्ता में जाने के बावजूद भी पार्टी का फिर से जनयुद्ध की दिशा में फिर लौट आने की संभावना रखना भी एक बड़ी वजह है. चौथा कारण पार्टी के वरिष्ट नेताओं द्वारा आवश्यकता पड़ने पर भी साहस और क्षमता न होने के कारण पुष्पकमलजी पार्टी के निर्विकल्प नेतृत्व के रूप में स्थापित हैं. पाचंवा कारण, पुष्पकमलजी के अवसरवादी हो जाने पर भी उनके गुरु के रूप में स्थापित किरण या अन्य किसी और नेता में पुष्पकमल जी का विकल्प बनने का साहस करते हुए पार्टी से विद्रोह करके बाहर निकल न पाना भी है.और अभी तक ऐमाओवादी के भीतर मौजूद क्रांतिकारियों और हमारी पार्टी नेकपा (माओवादी)  द्वारा जिस किस्म का वैचारिक संघर्ष चलाया जाना चाहिए, वह न चलाये जाने के कारण प्रचंड  के बारे में भ्रम बने रहना स्वाभाविक रहा है.

इस सन्दर्भ में पहली बात यह है कि पुष्पकमलजी ने पार्टी में नए प्रकार की संशोधनवादी लाइन की स्थापना कर दी है. वो मालेमावाद के प्रति जुबानी भक्ति तो दिखाते रहे हैं, मगर व्यवहार में संसदीय बुर्जुआ व्यवस्था को आत्मसात कर लिया है इसलिए मालेमावाद के आधार पर इस तथ्य का व्यापक स्तर पर भंडाफोड़ करना जरूरी है.दूसरी बात यह है कि क्रांतिकारी कौन है और कौन नहीं? इसके लिए व्यवहार ही एकमात्र कसौटी हो सकता है.इतिहास का ब्याज किसी को भी खाने देना उचित नहीं हो सकता.इतिहास में एक समय के महान क्रांतिकारियों के बाद में प्रतिक्रांतिकारी में परिणत हो जाने के तथ्य भी हैं, इसलिए पुष्पकमलजी का भंडाफोड़ करना जरूरी हो जाता है. तीसरी बात यह है कि माओवादी संसद में भाग लेते हुए भी जनयुद्ध की तैयारी कर रहे थे एवं जनयुद्ध की अवधि में एक तरफ शांतिवार्ता करते हुए भी शक्ति विस्तार कर शक्ति संचयित करते थे,लेकिन आज की स्थितियों में तो जनयुद्ध की उपलब्धियों को ही ध्वस्त कर दिया गया है.चौथी बात यह है कि मालेमावाद के अनुसार नेता का अर्थ सर्वहारा वर्ग के अन्दर उपस्थित उच्च चेतना से लैस एक सचेत व्यक्ति होता है और नेतृत्व का मतलब समान कमेटियों अर्थात समान समझदारी से लैस व्यक्तियों का समूह होता है.

दुनिया में किसी भी नेता का विकल्प होता है और होना भी चाहिए.अन्यथा क्रांति को निरंतरता नहीं दी जा सकती. नेता के गलत रास्ते में चले जाने पर उसका विकल्प खोजा जाना चाहिए और नेता के अच्छा होने पर भी.लेकिन भौतिक रूप से अक्षम होने पर उसके उत्तराधिकारी को आगे बढ़ाना अनिवार्य है.बिगत में हमने नेता को नेतृत्व के रूप में समझा है.यह समझदारी हमें कम्युनिस्ट आन्दोलन में विरासत के रूप में मिली है. गलत नेता का विकल्प तो होना ही चाहिए, सही नेता के उत्तराधिकारी को भी आगे आना चाहिए. नेता और नेतृत्व के सवाल पर हम अधिभूतवादी थे. ''एक'' का ''दो''में विभाजन के क्रांतिकारी द्वंदवाद के सिद्धांत को हमने लागू नहीं किया था,अतः पुष्पकमलजी के संशोधनवादी रास्ते में चले जाने पर उनका विकल्प आन्दोलन में ही खोजना अनिवार्य हो गया है. निश्चित रूप से आज नेता स्थापित न होने पर भी उसे आन्दोलन ही स्थापित करेगा.

रही बात स्थापित करने की तो एक ही बार में कोई भी स्थापित नहीं हो सकता.बिगत में पुष्पकमलजी भी स्थापित नहीं थे. उन्हें आन्दोलन ने ही स्थापित किया है. पाचंवी बात यह है कि यदि कामरेड किरण पुष्पकमलजी के गुरु हो सकते हैं तो वो क्रांति का नेतृत्व करने वाले साहसी नेता क्यों नहीं हो सकते. फिर एक नेता मात्र ही तो क्रांति संपन्न नहीं करता. पुष्पकमलजी ने बहुत सारे काम करने के बावजूद भी फ़िल्मी हीरो की तरह से सभी काम तो संपन्न नहीं किये हैं.क्रांति जनसमुदाय की सक्रिय सहभागिता में ही मात्र संभव होती है. कोई भी क्रांति सैकड़ों नेताओं, हजारों कार्यकर्ताओं और लाखों आम लोगों की सहभागिता के बगैर बिलकुल सफल नहीं हो सकती.इसी कारण से सभी का विकल्प होता है.इतिहास में व्यक्ति विशेष की भूमिका महत्वपूर्ण तो होती है, लेकिन उसमें भी समूह की भूमिका सबसे ज्यादा महत्वपूर्ण होती है.इसलिए सभी क्रांतिकारियों के पास अवसरवादी नेतृत्व के साथ निर्णायक सम्बन्ध-विच्छेद कर एकताबद्ध होते हुए मैदान में उतरने के अलावा कोई विकल्प ही नहीं है.

अंत में,बाहरी आई चर्चा के अनुसार ऐमाओवादी नेतृत्व का भारतीय शासक वर्ग के साथ मौजूदा मतभेद किसी न किसी रूप में समाप्त होने की दिशा में आगे बढ़ रहे हैं,इसीलिए तो इस बार की पोलित ब्यूरो बैठक से ही पुष्पकमलजी कामरेड किरण को संकीर्णतावादी और बाबूराम को विलक्षण प्रतिभा वाले यथार्थवादी होने की संज्ञा देने लगे हैं. वो कथित विद्रोह का शब्द स्पष्ट रूप में छोड़कर कथित शांति और संविधान की बात मूलमंत्र के रूप में जपने लगे हैं. ऐमाओवादी की इस बैठक का प्रमुख उद्देश्य राष्ट्रीयता,जनतंत्र,जन्जिविका अर्थात शहीदों के सपने,जनभावना और जनयुद्ध की प्रतिबद्धता के खिलाफ धोखा करते हुए एक बड़ी छलांग लगानी है. बाबूराम की फौज करतल द्व्हानी के साथ इसका समर्थन करेगी और कामरेड किरण के समर्थक निराश हो 'नोट ऑफ़ डीसेंट' लिखेंगे. देश के गद्दार, लुटेरे और जनजीविका विरोधी ताकतें ऐमाओवादी नेतृत्व की क्रांति विरोधी लाइन का यह कहकर स्वागत करेंगे कि अब ऐमाओवादी सही रास्ते पर आये हैं/ सही रास्ते पर हैं. ऐमाओवादी नेतृत्व में मौजूद गद्दार,लुटेरे और विदेशी दलालों का सयुंक्त मोर्चा सार्वभौम नेपाली जनता का उपहास करते हुए संविधान सभा की अवधि बढ़ाना चाहता है.

संक्रमणकाल के नाम पर भ्रष्टाचार, कालाबाजारी, तस्करी, कमीशन तंत्र और हत्या-हिंसा का साम्राज्य पहले से कई गुना बढ़ा है. इन तीन सालों की अवधि में संविधान सभा लुटेरों और विदेशी दलालों की क्रीडास्थली बन चुकी है. संविधान सभा में क्रांतिकारियों की उपस्थिति के अभाव में जन संविधान बनाने की जगह संशोधनवादी, यथास्थितिवादी और प्रतिक्रियावादी संविधान बनाने का खेल जारी है. जिसे सशक्त आन्दोलन द्वारा प्रतिक्रियावादी सत्ता को ध्वस्त कर एक सयुंक्त क्रांतिकारी सरकार के नेतृत्व में एक जनसंविधान बन सकता है. इसीलिए ऐमाओवादी के सच्चे क्रांतिकारियों को एक बैठक से दूसरी बैठकों के गोल चक्करवादी घेरे को तोड़कर अवसरवादियों से पूर्णरूप का सम्बन्ध विच्छेद कर विद्रोह का झंडा बुलंद कर आन्दोलन की दिशा में आगे बढ़ने का कोई विकल्प नहीं है.

(नेपाल के वरिष्ठ  माओवादी नेता और पूर्व केन्द्रीय मंत्री का  यह लेख एनेकपा माओवादी की 23 अप्रैल 2011की बहुचर्चित पोलित ब्यूरो बैठक के दो दिन पहले नेपाल के 'नया पत्रिका' में छपा था. मात्रिका  यादव पहले इसी पार्टी में थे पर अब वे नेकपा (माओवादी) के संयोजक हैं.नेपाली से इस लेख का  हिंदी अनुवाद पवन पटेल ने किया है.)


  • नेपाल के राजनीतिक हालात और नेपाली माओवादी पार्टी की भूमिका को लेकर आयोजित इस बहस में अबतक आपने पढ़ा -


May 5, 2011

बोये पेड़ बबूल का तो आम कहां से होए

बिन लादेन  का मारा जाना जहां वैश्विक आतंकवाद के खातमे की दिशा में एक मील का पत्थर साबित हुआ है, वहीं उसकी  पाकिस्तान में बरामदगी ने और  इसके बाद अमेरिकी सेना का पाकिस्तान को विश्वास में लिए बिना उसे मार गिराने की घटना ने कई पेचीदा सवाल खड़े कर दिए हैं...

तनवीर जाफरी

अमेरिकी सैनिकों द्वारा चलाए गए ‘आप्रेशन जेरोनियो’ नामक एक कमांडो आप्रेशन में गत् 2 मई की रात को दुनिया का सबसे बड़ा खूंखार आतंकवादी तथा अलक़ायदा संस्थापक एवं प्रमुख ओसामा बिन लाडेन पाकिस्तान की राजधानी इस्लामाबाद से सटे हुए कस्बे एबटाबाद में मारा गया। हो सकता है कि अमेरिका के विरूद्ध लाडेन द्वारा स्वघोषित जेहाद के अंतर्गत हुई इस अति आधुनिक कमांडो कार्रवाई ने लाडेन को उसकी मनचाही मंजि़ल अर्थात् ‘जन्नत ‘तक संभवत: पहुंचा ही दिया हो। हालांकि लाडेन की तलाश गत् एक दशक से अफग़ानिस्तान तथा पाक-अफगान सीमावर्ती क्षेत्रों में की जा रही थी ।
ओसामा बिन लादेन की हवेली को देखते पाकिस्तानी बच्चे

परंतु इस बात का भरपूर संदेह भी जताया जा रहा था कि अपने बिगड़ते स्वास्थय के चलते, हो न हो ओसामा बिन लाडेन किसी न किसी सुरक्षित स्थान पर छुपा हुआ है जहां उसे झाडिय़ों, गुफाओं व पहाडिय़ों की तकलीफ से दूर रखकर उसके इलाज व सुख-सुविधाओं का भी प्रबंध किया गया है। और लाडेन की मौजूदगी को लेकर चलने वाली दुनिया के संदेह की सुई बार-बार सिर्फ पकिस्तान पर ही जा टिकती थी। कुछ समय पूर्व यह खबर भी आई थी कि लाडेन का क्वेटा के सैन्य अस्पताल में इलाज कराया गया है। यह खबर तो बार-बार आ ही रही थी कि वह अस्वस्थ है उसका गुर्दा खराब है तथा वह डायलिसिस पर रखे जाने के दौर से गुज़र रहा है। ज़ाहिर है ऐसे मरीज़ के लिए अंधेरी गुफाओं में जा कर रहना, छुपना तथा वहां बैठकर अपने अंतर्राष्ट्रीय आतंकवादी मिशन को संचालित करना कतई संभव नहीं था।
और आखिरकार अमेरिकी ख़ुफ़िया  एजेंसी सीआईए को लाडेन के ठिकाने का पुख्ता पता चल ही गया। नतीजतन अमेरिका के विशेष नेवी सील कमांडो दस्ते ने पाक राजधानी इस्लामाबाद से मात्र 60 किलोमीटर दूरी पर स्थित एबटाबाद कस्बे के एक आलीशान तथा अति सुरक्षित मकान से उसे ढूंढ निकाला। लाडेन की पनाहगाह बनी यह कोठी पकिस्तान सैन्य अकादमी से मात्र एक किलोमीटर की दूरी पर स्थित है। इतने संवेदनशील तथा अति सुरक्षित क्षेत्र में लाडेन की मौजूदगी के बाद पाकिस्तान  सरकार, पाक सेना तथा पाकिस्तानी खुिफया एजेंसी आई एस.आई सभी संदेह के घेरे में आ गए हैं।

पाकिस्तान के पास अब अपने बचाव के लिए बग़लें झांकने के सिवा कोई चारा शेष नहीं रह गया है। अपनी झेंप मिटाने के लिए पाकिस्तान  के प्रधानमंत्री युसुफ रज़ा गिलानी अपने युरोपीय देशों के दौरे के दौरान यह कहते फिरे कि लाडेन की पकिस्तान में मौजूदगी का पता न चल पाना केवल पाकिस्तान ही नहीं बल्कि अमेरिका सहित पूरी दुनिया की ख़ुफ़िया  ऐजेंसियों की नाकामी है। ज़रा सोचिए पाक प्रधानमंत्री का यह बयान कितना तर्कपूर्ण है? उधर आई एस आई के एक अधिकारी ने अपनी खिसियाहट मिटाते हुए यह तर्क दिया कि ‘5 वर्ष पूर्व जब इस भवन का निर्माण हुआ था उस समय इस बात का संदेह हुआ था कि इसमें अबु फराज़-अल-लीबी नाम का एक अलकायदा नेता वहां रह रहा है। इस सूचना के आधार पर पाक सुरक्षा एजेंसियों ने इस भवन में छापेमारी भी की थी। परंतु वह सूचना निराधार निकली और उसी समय से यह भवन आईएसआई के रडार से हट गया। और इसी बड़ी चूक की शर्मिंदगी पाकिस्तान को चुकानी पड़ रही है।’

बहरहाल बिन लाडेन का मारा जाना जहां वैश्विक आतंकवाद के खातमे की दिशा में एक मील का पत्थर साबित हुआ है, वहीं लाडेन की पाकिस्तान में बरामदगी ने तथा इसके पश्चात अमेरिकी सेना द्वारा पाकिस्तान को विश्वास में लिए बिना उसे मार गिराने की घटना ने कई पेचीदा सवाल खड़े कर दिए हैं। कहना गलत नहीं होगा कि लाडेन के मारे जाने से जितना बड़ा झटका अलकायदा व उसके शेष नेताओं को लगा होगा उससे भी बड़ा झटका पाकिस्तान को सिर्फ इस बात की जवाबदेही के लिए लग रहा है कि लाडेन गत् पांच वर्षों से भी अधिक समय से  पाकिस्तान में कैसे संरक्षण पा रहा था?

 जब-जब पाकिस्तान में लादेन की मौजूदगी की बात की जाती उसी समय पूरी मुस्तैदी के साथ कभी पाक प्रधानमंत्री तो कभी गृहमंत्री,कभी आईएसआई तो कभी सैन्य अधिकारी यह कहकर अपना पल्ला झाडऩे की कोशिश करते कि लाडेन पाकिस्तान में नहीं है। और पाकिस्तान द्वारा बोले जाने वाले इसी झूठ की आड़ में बिन लाडेन पाकिस्तान में राजधानी इस्लामाबाद के समीप पाक सैन्य अकादमी की नाक के नीचे बैठकर पूरी दुनिया में आतंकवादी घटनाओं को अंजाम देता रहा तथा दुनिया के हज़ारों बेगुनाहों को आतंकी हमलों का निशाना बनाकर मानवता तथा मानवाधिकारों की सरेआम धज्जियां उड़ाता रहा।

परंतु मानवता के इस सबसे बड़े दुश्मन का हश्र तो  एक दिन यही होना था,जो हुआ। अमेरिका द्वारा आतंकवाद के विरुद्ध युद्ध की घोषणा में अपने ‘खास सहयोगी’ देश पाकिस्तान को विश्वास में लिए बिना तथा पाकिस्तानी सुरक्षा एजेंसियों,सेना तथा सैन्य रडारों को भनक लगे बिना चार विशेष सैन्य हैलीकॉप्टरों ने अफगानिस्तान के एक यू एस मिलट्री बेस से उड़ान भरी तथा एबटाबाद पहुंच कर 40 मिनट के कमांडो आप्रेशन में लाडेन को मार गिराया तथा उसे अपने साथ अफगानिस्तान ले आए। यहां उसका डीएनए टेस्ट कर तथा यह सुनिश्चित कर कि यह लाश लाडेन की ही है, उसे समुद्र में किसी अज्ञात स्थान पर ले जाया गया जहां उसे कथित रूप से इस्लामी रीति-रिवाजों के साथ जल समाधि दे दी गई।

पाकिस्तान को अमेरिका द्वारा इस प्रकार राजधानी इस्लामाबाद के करीब आकर इतना बड़ा आप्रेशन अकेले करना तथा उसे इसकी सूचना तक न देना बहुत नागवार गुज़रा। अब पाक सरकार यह कह रही है कि भविष्य में अमेरिका सहित किसी भी देश को इस प्रकार पाकिस्तान की सीमाओं का उल्लंघन करने की अनुमति नहीं दी जाएगी। यहां यह भी काबिलेगौर है कि अमेरिका ने बेशक इस्लामाबाद के निकट तक जाने का साहस पहली बार क्यों न दिखाया हो परंतु इसके पूर्व भी अमेरिका दर्जनों बार पाक-अफगान सीमावर्ती क्षेत्रों में पाकिस्तानी धरती पर अपना सैन्य आपे्रशन कर चुका है। खासतौर पर अमेरिकी चालक रहित विमान ड्रोन तो कई बार पाक सीमा के भीतर बमबारी कर चुके हैं।

उधर आप्रेशन जेरोनियो को लेकर अमेरिकी एटॉर्नी जनरल एरिक होल्डर का यही कहना है कि ओसामा बिन लाडेन पर निशाना साधना पूरी तरह वैध था क्योंकि यह आप्रेशन राष्ट्र की आत्मरक्षा के लिए किया गया था। उनके अनुसार लाडेन शीघ्र ही वहां से भी भागने की तैयारी में था। पाकिस्तान को विश्वास में न लेने के विषय पर अमेरिकी सूत्रों का कहना है कि इस कमांडो कार्रवाई की जानकारी पाकिस्तान से सांझा करने से लाडेन हाथ से निकल सकता था इसलिए सर्वोच्च स्तर पर गोपनीयता बरती गई। अमेरिका लादेन  को जि़दा या मुर्दा पकडऩे के लिए इस हद तक गंभीर व आमादा था कि उसने कमांडो कार्रवाई के दौरान संभावित पाकिस्तानी सैन्य हस्तक्षेप से निपटने के भी पूरे उपाय कर लिए थे।

इधर एबटाबाद में अमेरिकन नेवी सील कमांडों लादेन को खत्म करने के खेल में लगे थे तो दूसरी ओर वाशिंगटन स्थित व्हाईट हाऊस में राष्ट्रपति बराक ओबामा विदेशमंत्री हिलेरी क्लिंटन, सीआई ए प्रमुख तथा अन्य उच्चाधिकारियों के साथ इस आप्रेशन जेरेनियो का सीधा प्रसारण देख रहे थे। राष्ट्रपति भवन से इस आप्रेशन का संचालन भी किया जा रहा था। इसी कमांडों कार्रवाई की एक अहम कड़ी यह भी थी कि अमेरिका ने अपने कई लड़ाकू जेट विमान अफगानिस्तान के अपने सैन्य अड्डे पर तैयार खड़े रखे थे। उनकी तैयारी इस बात को लेकर थी कि यदि पाकिस्तानी सेना ने लादेन के विरुद्ध चलाए जाने वाले यू एस कमांडो आप्रेशन में दखलअंदाज़ी करने की कोशिश की तो अमेरिकी लड़ाकू विमान पाकिस्तान पर बमबारी करने के लिए भी तैयार हैं। परंतु पाकिस्तान ने उस स्थिति को न्यौता नहीं दिया।

बहरहाल पाकिस्तान गत् एक दशक से इसी आतंकवाद को पालने-पोसने,इसे संरक्षण देने तथा आतंकी विचारधाराओं को परवान चढ़ाने को लेकर पूरी दुनिया में बार-बार शर्मिंदा व बदनाम होता जा रहा है। पाकिस्तान से लाडेन की बरामदगी ने तो अब पाकिस्तान को कहीं का भी नहीं छोड़ा है। अब पाकिस्तान का वह तर्क दुनिया के गले से नहीं उतर पा रहा है कि ‘पाकिस्तान स्वयं दुनिया में आतंकवाद का सबसे बड़ा शिकार है’। अब तो यह तर्क पाकिस्तान के लिए रक्षात्मक नहीं बल्कि नकारात्मक सोच पैदा करता है।

चूंकि प्रधानमंत्री युसुफ रज़ा गिलानी लाडेन की हत्या के बाद एक बार फिर पेरिस में बड़ी बेबसी के साथ यह दोहरा चुके हैं कि पाकिस्तान में फैले आतंकवाद से निपटना अकेले पाकिस्तान के बस की बात नहीं है। उन्होंने इस के खातमे के लिए पूरी दुनिया से सहयोग की अपील भी की है। लिहाज़ा उनके अपने ही इसी वक्तव्य के परिपेक्ष्य में अब तो पाकिस्तान को अपनी सरहद और संप्रभुता की बात भी कम से कम तब तक किनारे रख देनी चाहिए जब तक कि भारत व अमेरिका जैसे देशों के सहयोग से वह अपनी सीमाओं के भीतर लगभग पूरे देश में फैले आतंकी ठिकानों,प्रशिक्षण शिविरों तथा इनकी पनाहगाहों को समाप्त न कर ले।


लेखक हरियाणा साहित्य अकादमी के भूतपूर्व सदस्य और राष्ट्रीय-अंतर्राष्ट्रीय मसलों के प्रखर टिप्पणीकार हैं.उनसे tanveerjafari1@gmail.कॉम पर संपर्क किया जा सकता है.