Mar 6, 2011

छात्र योगेश के परिजनों को हत्या का संदेह, जांच की मांग



जनज्वार टीम. पंजाब के नवाशहर स्थित आइआइटीटी कॉलेज से बीटेक कर रहे छात्र योगेश रंजन की लाश आज सुबह उसके पैतृक घर बिहार के नवादा जिले के बहादुरपुर गाँव  पहुंची है। आत्महत्या के तीन बाद पहुंची लाश को देख परिजन गहरे शोक  में हैं और मान रहे हैं कि यह आत्महत्या का नहीं, हत्या का मामला है।

योगेश रंजन के चाचा राम किंकर पांडेय ने कहा कि,‘अगर योगेश ने पंखे से लटककर आत्महत्या की है तो उसकी गर्दन पर निशान क्यों नहीं है। इसलिए हमलोग हत्या की जांच की मांग करते हैं और इसके लिए हमने स्थानीय सांसद डॉक्टर भोला सिंह से संपर्क भी किया है कि वे संसद में योगेश मामले के जांच की मांग करें।’ परिजनों के मुताबिक चूंकि लाश सड़ रही थी इसलिए उसका दुबारा पोस्टमार्टम कराना संभव नहीं था। गौरतलब है कि 4मार्च को योगेश की आत्महत्या का मामला उस समय सामने आया था जब रात बजे उसके दोस्त उससे मिलने गये थे।

योगेश की लाश गांव पहुंचने के बाद यह विवाद गहराने लगा है कि उसने आत्महत्या की थी,या हत्या है। प्रथम वर्ष के प्रथम सेमेस्टर के छात्र योगेश ने आत्महत्या रिजल्ट आने के तीन घंटे बाद की थी। इसलिए स्वाभाविक तौर पर यही माना जा रहा है कि आत्महत्या के पीछे खराब परीक्षा परिणाम का सदमा ही रहा हागा। लेकिन योगेश के साथी एक दूसरा सवाल उठाते हैं कि यहां की परिस्थितियां भी ऐसी हैं कि छात्र या तो भाग जाये नहीं तो आत्महत्या कर लें।

बीटेक कर रहे एक दूसरे वर्ष के छात्र ने बताया कि ‘छात्रों को फेल कराना यहां एक चलन है। इससे निजी शिक्षा संस्थानों का मुनाफा बढ़ता है। अगर ऐसा नहीं है तो इन्हें कॉलेज बंद कर देना चाहिए क्योंकि बीटेक प्रथम वर्ष के प्रथम सेमेस्टर में पढ़ने वाले 150 छात्रों में 98 फीसदी छात्र किसी न किसी विषय में फेल हैं। ऐसे में जो छात्र सच में मेधावी होगा और परिवार वाले एक-एक पैसा जोड़ उसे पढ़ा रहे होंगे तो वह मरेगा नहीं तो क्या करेगा।’

योगेश के आत्महत्या के बाद भी प्रबंधन का रवैया किसी शिक्षा संस्थान का नहीं,दुकान का रहा। कॉलेज के प्रिंसिपल, निदेशक उसे देखने तक नहीं आये।

‘न बेटा बचा, न सपना’


बिहार के पटना शहर के रहने वाले छात्र योगेश की आत्महत्या से लेकर उसकी लाश परिजनों तक सौंपने के दौरान कॉलेज प्रशासन ने जो गैरजिम्मेदाराना रुख अख्तियार किया,उससे छात्र गुस्से में हैं...

जनज्वार टीम. इंजीनियर बनने का सपना सिर्फ योगेश रंजन पाण्डेय का ही नहीं था। सपने का साझीदार उसका पूरा परिवार था। परिवार के उसी साझे सपने को पूरा करने योगेश पंजाब के नवाशहर के आइआइटीटी कॉलेज पहुंचा था। जहां छह महीने की मेहनत के बाद आये रिजल्ट ने सपने को तो आगे नहीं बढ़ाया, अलबत्ता उसकी जिंदगी जरूर लील गया।

पंजाब के पोजेवाल कस्बे में पड़ने वाले आइआइटीटी कॉलेज के प्रथम वर्ष के छात्र योगेश रंजन के 4 मार्च को आत्महत्या करने के बाद कैंपस में तनाव का माहौल है। छात्र मान रहे हैं कि बीटेक कर रहे योगेश की आत्महत्या का मुख्य कारण पंजाब टैक्निकल यूनिवर्सिटी (पीटीयू) के रिजल्ट से उपजी निराशा है, जिसमें उसे पांच विषयों में से चार में फेल कर दिया गया था। गौरतलब है कि उसी दिन पंजाब के अमृतसर में भी एक छात्र की आत्महत्या का मामला सामने आया था।


नाम न छापने की शर्त पर योगेश के साथी कहते हैं कि,‘जो छात्र एमटीएस परीक्षाओं में पचहत्तर फीसदी तक अंक प्राप्त करता रहा हो, वह एकाएक प्रथम सेमेस्टर के रिजल्ट में चार विषयों में फेल करा दिया जाये तो उसे फ्रस्टेशन तो होगा ही।’ऐसे में कॉलेज प्रबंधन अपनी गलती मानने के बजाय अब गुस्साये छात्रों को चुप कराने की जुगत में लगा हुआ है। योगेश की लाश को उसके परिजनों तक सही तरीके से न पहुंचाये जाने से आहत छात्र जब शांतिपूर्वक कॉलेज गेट पर अपना प्रतिरोध व्यक्त कर रहे थे तो अकाउंटेंट जसविंदर सिंह सोदी ने पुलिस को बुला लिया।

बिहार के पटना शहर के रहने वाले छात्र योगेश की आत्महत्या से लेकर उसकी लाश परिजनों तक सौंपने के दौरान प्रशासन ने जो गैरजिम्मेदाराना रुख अख्तियार किया, उससे छात्र गुस्से में हैं। हालत यह है कि योगेश के आत्महत्या करने के दो दिन बाद 6तारीख की देर रात तक भी उसकी लाश उसके परिजनों तक नहीं पहुंच सकी है। योगेश के चाचा राम किंकर पांडेय कहते हैं,‘पहले तो कॉलेज प्रशासन ने योगेश को मारा और अब वे उसकी लाश सड़ा रहे हैं। पैसा बचाने के चक्कर में उन्होंने लाश को हवाई जहाज से भेजने की बजाय सड़क से भेजा है। हमारे साथ यह धूर्तता कॉलेज के एकाउंट आफिसर जसविंदर सिंह सोदी ने की है।’

बीटेक कर रहे योगेश के एक साथी का कहना है कि ‘जैसे ही हम लोगों को पता चला कि योगेश पंखे से लटक रहा है तो हमने उसे उतारने के साथ ही कॉलेज प्रबंधन को सूचित किया। मगर हालत यह है कि कॉलेज में फर्स्ट एड किट तक नहीं है। अगर कैंपस में फर्स्ट एड किट होता तो योगेश को बचाया जा सकता था।’

उल्लेखनीय है कि कॉलेज हॉस्टल में पंखे से फांसी पर लटके योगेश की अस्पताल ले जाते हुए रास्ते में मौत हो गयी थी। उसका प्राथमिक ईलाज हॉस्टल में इसलिए संभव नहीं हो सका कि सैकड़ों छात्रों के इस हॉस्टल में एक भी डॉक्टर की व्यवस्था प्रबंधन ने नहीं की है। ऐसे में सवाल उठता है कि लाखों रुपये फीस वसूलने वाले इन निजी शिक्षा संस्थानों में डॉक्टरों की व्यवस्था क्यों नहीं की गयी है?

बीटेक द्वितीय वर्ष के एक छात्र ने नाम न छापने की शर्त पर बताया कि पीटीयू और प्रबंधन दोनों उसे मारने में बराबर के दोषी हैं। छात्र के मुताबिक ‘पांच में से चार विषयों में फेल कर योगेश को जहां पीटीयू ने आत्महत्या के लिए उकसाया,वहीं कैंपस में शुरुआती इलाज के अभाव ने उसको मारने में कैटेलिस्ट का काम किया।’ छात्रों का आरोप है कि कॉलेज प्रबंधन और इसके कामकाज को देखने वाली नियामक संस्था पीटीयू दोनों की मिलीभगत से इतनी बड़ी संख्या में हर वर्ष छात्रों को बैक पेपर कराया जाता है।

सिर्फ बीटेक की बात की जाये तो पहले सेमेस्टर में आइआइटीटी के प्रथम वर्ष में प्रवेश पाये 150 में से दो को छोड़ सभी छात्र किसी न किसी विषय में फेल हैं। पीटीयू की व्यवस्था के मुताबिक यह छात्र फेल नहीं कराये जाते, बल्कि बैक पेपर देकर उन्हें पास होने की मोहलत दी जाती है। ऊपर से देखने में यह व्यवस्था छात्रों के हित में लगती है,मगर अंततः यह कुकुरमुत्तों की तरह उग आये कॉलेजों के प्रबंधन सेवा के लिए है।

एक सीनियर छात्र से हुई बातचीत में पता चला कि छात्रों का प्रथम पारी में फेल होना और फिर बैक पेपर देकर पास होना पीटीयू के कॉलेजों में एक परंपरा सी बन गयी है। दरअसल,बैक पेपर भरने पर एक छात्र को सात सौ रुपये भरने पड़ते हैं। इस तरह से ये कॉलेज हर वर्ष फेल विद्यार्थियों को पास होने का चांस देने के नाम पर लाखों रुपये पीटीयू के जरिये कमाते हैं।

छात्रों का कहना है यहां पढ़ने वाले ज्यादातर छात्र चूंकि दूसरे राज्यों से आते हैं इसलिए फेल होने से छात्र मकान मालिकों से लेकर दुकानदारों तक की कमाई का जरिया बने रहते हैं। यही जरिया बनना योगेश को स्वीकार नहीं था। शायद इसलिए कि बाकियों की तरह उसके पिता के पास आमदनी का कोई ठोस जरिया नहीं था। योगेश के चाचा राम किंकर पांडेय बताते हैं,‘योगेश के पिता गांव में यजमानी करके घर की रोटी चलाते हैं। उन्होंने जीवनभर की कमाई योगेश के सपने को पूरा करने में लगा दी थी। अब तो न बेटा बचा, न सपना।’

बहरहाल छात्रों और उनके परिजनों के इन गंभीर आरोपों को देखकर कतई इनकार नहीं किया जा सकता, क्योंकि यह बात वे अपने अनुभवों के आधार पर कह रहे हैं।





Mar 5, 2011

जामिया मिल्लिया में कुलीन मुसलमानों की साजिश


उर्दू, फारसी, अरबी, इस्लामी अध्ययन में तो यहां मुसलमान शिक्षार्थियों का अनुपात 99 प्रतिशत से भी ज्यादा रहता है, लेकिन विज्ञान,इंजीनियरिंग आदि में मुसलमान कहां से लाए जाएंगे? जाहिर  है  उनको भरने के लिए अल्पसंख्यकों के मुसलमान ठेकेदार मेरिट में रियायत दिलाना चाहेंगे...

शम्सुल इस्लाम

राष्ट्रीय अल्पसंख्यक शिक्षा संस्थान आयोग की तीन सदस्यीय पीठ ने न्यायमूर्ति एमएस सिद्दिकी की अध्यक्षता में 22 फरवरी को एक विवादास्पद निर्णय द्वारा जामिया इस्लामिया को अल्पसंख्यक विश्वविद्यालय का दर्जा दे दिया है। समर्थकों का कहना है कि इस फैसले में कुछ भी असामान्य बात नहीं है, क्योंकि व्यवहार में जामिया (1920) अपने जन्म से ही एक मुस्लिम संगठन था।

कॉरपोरेट जगत की बड़ी हस्ती रह चुके जामिया के मौजूदा उपकुलपति नजीब जंग का कहना है कि इससे जमीनी हालात में कुछ भी फर्क नहीं पड़ेगा, क्योंकि यहां पहले से ही मुसलमान शिक्षार्थियों की संख्या 52 प्रतिशत है। उन्होंने यह भी दावा किया कि आयोग की इस घोषणा से जामिया के सेकुलर स्वरूप पर कोई प्रतिकूल असर नहीं पड़ेगा।


इस मामले पर कोई भी पुख्ता राय बनाने से पहले इन दावों की पड़ताल जरूरी है। जो लोग जामिया को पैदाइशी मुसलमान अर्थात अल्पसंख्यक संस्थान मानते हैं और इस बात पर जोर देते हैं कि यह तो बुनियादी तौर पर अल्पसंख्यक संस्थान ही रहा है,तो उन्हें इस बात का जवाब देना होगा कि अगर जामिया पहले से ही मुसलिम संस्थान था,तो उसे एक बार फिर अल्पसंख्यक संस्थान घोषित करने की क्या जरूरत है।

एक और महत्वपूर्ण सवाल है, जिसका जवाब चाहिए। अगर हमारे देश के तमाम मुसलमानों के हित और उद्देश्य एक ही जैसे थे, तो गांधीजी के मशवरे पर मौलाना मोहम्मद अली जौहर, हकीम अजमल खान, जाकिर हुसैन, एमए अंसारी सरीखे मुस्लिम नेताओं ने एक और ‘मुस्लिम संस्थान’ अलीगढ़ कॉलेज (अब अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय) से संबंध विच्छेद करके, दक्षिणी दिल्ली के कीकर के जंगल में जामिया को स्थापित करने का फैसला क्यों किया था?

सच यह है कि अलीगढ़ कॉलेज मुसलमानों के बीच में शिक्षा का प्रसार करने से ज्यादा उन्हें कूप का मेंढक बनाने का काम कर रहा था। यह संस्थान मुसलमानों के बीच पनप रहे सामंती मूल्यों का गढ़ बन गया था। जो लोग और समूह मुसलमानों के बीच प्रगतिशील,जनवादी और न्याय पर आधारित शिक्षा का प्रसार चाहते थे,उन्होंने जामिया की बुनियाद रखी थी और उसको परवान चढ़ाया।

जामिया का अल्पसंख्यकीकरण दरअसल इस ऐतिहासिक विश्वविद्यालय को उसके असली उद्देश्य से भटकाकर शिक्षार्थियों को कूप का मेंढक बनाने का ही काम करेगा। इस सच्चाई को दरकिनार करना मुश्किल है कि उर्दू, फारसी, अरबी, इस्लामी अध्ययन में तो यहां मुसलमान शिक्षार्थियों का अनुपात 99 प्रतिशत से भी ज्यादा रहता है, लेकिन विज्ञान, इंजीनियरिंग आदि में मुसलमान कहां से लाए जाएंगे?उनको भरने के लिए अल्पसंख्यकों के मुसलमान ठेकेदार मेरिट में रियायत दिलाना चाहेंगे, जिसके नतीजे में कम पढ़े-लिखों का ही लश्कर तैयार होगा।

जो तत्व जामिया के अल्पसंख्यकीकरण का झंडा बुलंद किए हुए हैं,उन्हें जामिया की स्थापना के कारणों और उद्देश्यों को समझना होगा। यह याद रखना जरूरी है कि मुसलमानों के बीच भी पुरातनपंथी और प्रगतिशील विचारों के दरम्यान संघर्ष होता रहा है। न ही सब मुसलमान एक तरह सोचते हैं और न ही उनके समान हित हैं। अलीगढ़ कॉलेज मुसलमानों के कुलीन वर्ग की, जो अपने आपको अशरफ कहते हैं,जागीर था। दबे-कुचले मुसलमानों को शिक्षित करने के लिए जामिया की स्थापना हुई थी।
मुसलमान उच्चजातीय तत्वों को जामिया को अल्पसंख्यक संस्थान बनाने की बात उस समय याद आई,जब सरकार ने शिक्षा संस्थानों में ओबीसी के लिए 27प्रतिशत आरक्षण की घोषणा की। इसीलिए 2006में जामिया को अल्पसंख्यक संस्थान घोषित करने की अपील दाखिल की गई। यह याद रखना जरूरी है कि ओबीसी को मिलने वाले आरक्षण का बड़े पैमाने पर फायदा मुसलमानों के दबे-कुचले समूहों को ही मिलना था। यह ओबीसी आरक्षण ही था,जिससे मुसलमानों की अनेक बिरादरियां आरक्षण हासिल कर पाई थीं।

मुसलमानों का दम भरने वाले नेता जातिवादी हिंदू तत्वों से किसी भी मायने में अलग नहीं हैं। वे भी जातिगत कारणों से आरक्षण के विरोधी हैं। ये तत्व समस्त मुसलमानों के लिए आरक्षण की मांग तो करते रहते हैं, लेकिन जहां पर इनका दबदबा होता है, वहां एसी/एसटी की बात तो दूर रही, मुसलमानों की पिछड़ी जातियों को भी उनके संवैधानिक हक देने को तैयार नहीं हैं।

दुख की बात यह है कि ऐसा करने के लिए वे संविधान की आड़ लेते हें। मुसलमानों के कुलीन वर्ग का यह रवैया कोई नई बात नहीं है। डॉ.अंबेडकर ने इसी रवैये पर कहा था कि मुसलमानों में हैसियत रखने वाले तत्व उतने ही जातिवादी हैं,जितने हिंदुओं में होते हैं। जामिया के अल्पसंख्यकीकरण पर जो जश्न मना रहे हैं, वे इस सच्चाई को ही एक बार फिर जी रहे हैं।

(हिंदुस्तान  से  साभार ) 



Mar 4, 2011

उत्तराखंड के जननायक पड़े हाशिये पर



गढ़वाल विश्वविद्यालय, जिसे लोगों ने बड़े संघर्षों के बाद बनाया, वह आज अपने अस्तित्व के लिए जूझ रहा है। राजनीतिज्ञों की नासमझी से पहले एक प्रतिष्ठित विश्वविद्यालय को अब अपनी मान्यता के लिए दर-दर भटकना पड़ रहा है...


चारु तिवारी

 
करीब  दस वर्ष पहले जब देश में तीन राज्य अस्तित्व में आये तो उनकी अपनी-अपनी प्राथमिकतायें थीं। भाजपा के नेतृत्व में उस समय केंद्र में राजग की सरकार थी। संसद में जब भाजपा ने वनांचल और उत्तरांचल पर बहस करायी तो झारखण्ड के लोगों ने कहा कि झारखण्ड हमारी अस्मिता का सवाल है। उन्होंने वनांचल को एक सिरे से खारिज किया। उन्होंने कहा कि वनांचल से बेहतर है कि हमें राज्य ही न मिले। इसके उलट उत्तराखण्ड नाम को उत्तर प्रदेश से लेकर केंद्र तक संशोधन करने की सिफारिश की गयी। जिस तरह के तर्क इसके समर्थन में दिये गये उससे कोई सहमत नहीं हो सकता।

खैर, राज्य बन गया। देहरादून की सड़कों पर ‘अटल बिहारी वाजपेयी जिन्दाबाद’ के नारे गूंजने लगे। इस बदलाव में इतिहास भी बदल गया। पहाड़ के गांधी कहे जाने वाले इन्द्रमणि बडोनी को याद करने को किसी को फुर्सत नहीं हुयी। कामरेड पीसी जोशी, ऋषिवल्लभ सुन्दरियाल, त्रेपन सिंह नेगी, कामरेड नारायण दत्त सुन्दरियाल, डॉ. डीडी पंत, आंदोलन में शहीद हुए 42 आंदोलनकारी और राज्य आंदोलन में मर-खप गयी एक पीढ़ी को भुला दिया गया। नित्यानंद स्वामी को मुख्यमंत्री और सुरजीत सिंह बरनाला को राज्यपाल बनाया गया। यह उत्तराखण्ड नहीं उत्तरांचल का नया अवतार था। यह तीस वर्ष के राज्य संघर्ष को हाइजैक करने की बड़ी राजनीतिक घटना थी।

यह सिलसिला अभी जारी है। अब उत्तराखण्ड को नये इतिहास पुरुषों से परिचित कराया जा रहा है। उसी तरह जैसे उसके पौराणिक नाम उत्तराखण्ड को उत्तरांचल कर। क्षेत्रीय भाषाओं को हतोत्साहित कर संस्कृत भाषा को दूसरी राजभाषा का दर्जा देकर। गंगा प्रहरियों को विस्मृत कर हेमामालिनी को ब्रांड एम्बेसडर बनाकर।

राज्य में कई संस्थानों और योजनाओं को महापुरुषों के नाम पर रखा गया है। कई जगह इस तरह के नाम रखे जा रहे हैं या उन्हीं नामों से नये संस्थान खोले जा रहे हैं। दुर्भाग्य से किसी भी संस्थान या योजना का नाम रखते समय हमारे नीति-नियंताओं को न तो उसकी प्रासंगिकता का पता है और न प्रभाव का। वे इस बात पर ज्यादा दिमाग नहीं लगाना चाहते कि किस क्षेत्र में किन लोगों ने क्या योगदान किया है।

ताजा उदाहरण अटल खाद्यान्न योजना का है। यह ठीक है कि अटलजी भाजपा के शिखर पुरुष हैं, उनकी वंदना से राजनीति आसान हो जाती है। जिस जनता के वोट से सरकारें बनती है। उनके भी इतिहास पुरुष होते हैं, यह सत्ता में बैठे लोगों को समझना चाहिए। असल में इस योजना का नाम उत्तराखण्ड के दो ऐसे इतिहास पुरुषों के नाम पर रखा जा सकता था जिन्होंने आम लोगों तक अनाज पहुंचाने के लिए बड़ा योगदान दिया।

इनमें से एक हैं रुद्रपुर के रहने वाले इन्द्रासन सिंह। वे स्वतंत्रता संग्राम सेनानी रहे। मूल रूप से लखीमपुर के रहने वाले इन्द्रासन को स्वतंत्रता संग्राम सेनानी कोटे से नैनीताल की तराई (उधमसिंहनगर) में जमीन मिली। उन्होंने यहां ऐसे धान का आविष्कार किया जो बासमती जैसा था। इसकी कीमत बहुत कम थी। उन्होंने इसे इस उद्देश्य से विकसित किया था कि आम लोगों को पौष्टिक और सस्ता चावल प्राप्त हो सके। बाद में इसे इन्द्रासन चावल के नाम से जाना गया। इसे गरीबों की बासमती भी कहा जाता है।

दूसरे हैं माधो सिंह भण्डारी। भण्डारी उत्तराखण्ड के उन महान सपूतों में हैं जिन्होंने मलेथा की गूल से इतिहास ही नहीं रचा,बल्कि पहाड़ों में खेती और अनाज उगाने के लिए नई प्रेरणा दी। वे इस विचार के प्रेरणा पुरुष भी थे कि पहाड़ों में स्थानीय संसाधनों को विकसित कर उन्नत खेती की जा सकती है। उन्होंने मलेथा नहर को लाने के लिए अपने बेटे की बलि दे दी। सरकार अगर जरा सा भी आम लोगों के सरोकारों को समझती तो यह दो नाम इस योजना की सार्थकता और सरकार की मंशा के साथ न्याय कर पाते।

गढ़वाल विश्वविद्यालय, जिसे लोगों ने बड़े संघर्षों के बाद बनाया, वह आज अपने अस्तित्व के लिए जूझ रहा है। राजनीतिज्ञों की नासमझी से पहले एक प्रतिष्ठित विश्वविद्यालय को अब अपनी मान्यता के लिए दर-दर भटकना पड़ रहा है। टिहरी परिसर को अब दीनदयाल उपाध्याय के नाम से जाना जायेगा। वैसे भी पार्कों से लेकर संस्थानों और योजनाओं के इतने नाम दीनदयाल के नाम पर रखे गये हैं कि राज्य में औरों के लिए एक इंच जगह नहीं है।

टिहरी परिसर का नाम रखने से पहले सरकार सरकार कुछ इन नामों पर भी विचार कर लेती तो उसका कुछ नहीं बिगड़ता। हो सकता है उन्हें उपाध्याय के सामने श्रीदेव सुमन, नागेंद्र सकलानी जैसे नाम बहुत छोटे लगते हों। जयानंद भारती, गढ़केसरी अनुसूया प्रसाद बहुगुणा, मौलाराम तोमर, त्रेपन सिंह नेगी, चंद्रकुंवर बर्थवाल, ऋषिवल्लभ सुन्दरियाल, भक्तदर्शन आदि कई हस्तियां इसी जमीन और इन्हीं सरोकारों के लिए संघर्ष करती रहीं, उनके बारे में सरकारों के उपेक्षापूर्ण रवैये के बारे में सबको सोचना पड़ेगा।

पिछले दिनों से देहरादून के तकनीकी विश्वविद्यालय का नाम संघ के सरचालक रहे रज्जू भैया के नाम पर रखने पर विचार किया जा रहा है। प्रचारित किया जा रहा है कि वे भौतिक शास्त्र के प्रोफेसर थे। पहाड़ में उनके जैसे कई प्रोफेसर पहले भी थे और आज भी हैं। डॉ.डीडी पंत जैसे भौतिकशास्त्री उत्तराखण्ड में हुए हैं जिन्होंने पंत रेज के नाम से दुनिया में बड़ी खोज की। द्वितीय विश्वयुद्ध के कचरे से एशिया की सबसे अच्छी भौतिक प्रयोगशाला बनाने वाले पंत का शिक्षा के अलावा राज्य आंदोलन में भी योगदान रहा।

डॉ.पंत के नाम की संस्तुति अगर इस तकनीकी विश्वविद्यालय के लिए होती तो पहाड़ को गर्व होता। एक थे चंद्रशेखर लोहनी। हाईस्कूल पास शिक्षक। राष्ट्रपति पुरस्कार से सम्मानित। पंतनगर विश्वविद्यालय ने उन्हें इसलिए सम्मानित किया कि उन्होंने लेंनटाना (कुरी)घास को फैलने   से रोकने की खोज की, जो वनस्पति शास्त्र में मशहूर हुई।

यह एक बहुत संक्षिप्त सा आकलन है नामों को लेकर। कालूसिंह महर पहले पहाड़ी थे जिन्हें अंग्रेजों ने फांसी दी थी। डॉ. खजान पांडे का चिकित्सा शोध में महत्वपूर्ण काम है। एक थी जसूली दत्याल, जिन्होंने कुमाऊं कमिश्नर रामजे को अपनी सारी संपत्ति मानसरोवर यात्रा मार्ग पर धर्मशालायें बनाने को दे दी। कैप्टन राम सिंह ने राष्ट्रगान की धुन बनायी। इसके अलावा एक बड़ी सूची है ऐसे नायकों की,जिनके सामने आज के इन राजनीतिक इतिहास पुरुषों का काम कहीं नहीं ठहरता। सरकार जब भी संस्थानों का नाम रखे, उसमें पहाड़ के गौरव रहे मनीषियों की उपेक्षा न करे।



 पत्रकारिता में जनपक्षधर रुझान के प्रबल समर्थक और  जनसंघर्षों से गहरा लगाव रखने वाले चारु  तिवारी उत्तराखंड के राजनितिक-सामाजिक मामलों के अच्छे जानकार हैं. फिलहाल जनपक्ष आजकल पत्रिका के संपादक. उनसे tiwari11964@gmail.com पर संपर्क किया जा सकता है.



Mar 3, 2011

सेहत के सरगनाओं पर अंकुश नहीं

राजस्थान के जोधपुर में तेरह लोगों की एक साथ मौत और वह भी अस्पताल के डाक्टरों - कर्मचारियों की लापरवाही के परिणामस्वरूप होना,निश्चित रूप से जानबूझ कर सामूहिक हत्याकांड  किए जाने जैसा घिनौना अपराध है...


निर्मल रानी

अस्पताल कर्मियों,डाक्टरों और स्वास्थ्य विभाग से जुड़े लोगों की लापरवाही व अनदेखी के कारण   मरीज़ों के मरने की खबरें कोई नई बात नहीं है। देश के किसी न किसी कोने से ऐसी खबरें सुनने को मिलती रहती हैं कि किसी डॉक्टर की लापरवाही से या समय पर इलाज न मिल पाने से किसी मरीज़ की मौत हो गई हो।

मरीज़ों के परिजनों द्वारा ऐसी दु:खद घटनाओं की प्रतिक्रिया स्वरूप रोष व्यक्त किए जाने यहां तक कि निजी नर्सिंग होम या सरकारी अस्पताल में तोडफ़ोड़ किए जाने की खबरें भी आती ही रहती हैं। नक़ली व प्रयोग करने की तिथि पूरी कर चुकी दवाईयों के प्रयोग से मरीज़ों की मृत्यु हो जाने या उनकी तबीयत और अधिक बिगड़ जाने की भी खबरें आती रहती हैं।

ऐसा कहा जाता है कि जिस राष्ट्र के लोग शारीरिक रूप से स्वस्थ होते हैं वही राष्ट्र वैचारिक रूप से भी जागरुक,स्वस्थ तथा चेतन होता है। बेशक एक स्वस्थ राष्ट्र ही तेज़ी से विकास की मंजि़लें तय कर सकता है। परंतु लगता है कि हमारे देश में अन्य सरकारी विभागों की ही तरह स्वास्थय विभाग से जुड़े नेटवर्क को शायद इस बात का ज्ञान ही नहीं है या फिर भ्रष्टाचार,लापरवाही,स्वार्थ व रिश्वत खोरी जैसी बुराईयों ने इन लोगों को इस कद्र जकड़ रखा है कि इन्हें न तो किसी दूसरे व्यक्ति के सेहत    की चिंता होती है न ही उसके अर्थिक हालात या पारिवारिक परिस्थितयों के बारे में कुछ सोचने का समय।

विभाग के कर्मचारियों व अधिकारियों की ऐसी ही एक ज़बरदस्त लापरवाही का प्रमाण गत दिनों राजस्थान के जोधपुर जि़ले के सरकारी अस्पताल में देखने को मिला। यहां 13प्रसूताओं की एक ही समय में तब मौत हो गई जब उन्हें संक्रमित ग्लूकोज़ चढ़ा दिए गए। अस्पताल  अधिकारियों  की लापरवाही से इतनी अधिक प्रसूताओं की एक साथ मौत होने की यह अब तक की सबसे बड़ी घटना मानी जा रही है।

यह भी खबर है कि अभी और भी कई मरीज़ ऐसे हैं जिन्हें इसी बैच का संक्रमित ग्लूकोज़ चढ़ाया गया था उनमें से कई मरीज़ों की हालत गंभीर बनी हुई है। राजस्थान सरकार ने मृतकों के परिजनों को 5-5लाख रूपये का मुआवज़ा देने की घोषणा कर अपने फर्ज  की इतिश्री कर ली है। जनाक्रोश को नियंत्रित रखने के मद्देनज़र स्वास्थ्य विभाग के दो अधिकारी जिनमें एक ड्रग इंस्पेक्टर तथा एक स्टोर कीपर शामिल है, को निलंबित कर दिया गया है।

परंतु परिवार के एक जिम्मेदार सदस्य वह भी एक प्रसूता मां का मरना एक परिवार के लिए कितनी बड़ी कमी छोड़ जाएगा,उस नुकसान की भरपाई न ही दौलत से की जा सकेगी न ही किसी के निलंबन या बहाली से। राजस्थान सरकार ने इस संबंध में एक और सकारात्मक कदम यह भी उठाया है कि राज्य सरकार के स्वास्थय विभाग को ग्लूकोज़ की आपूर्ति करने वाली उस कंपनी को काली सूची में डाल दिया गया है तथा संक्रमण का संदेह होने वाले बैच के इस्तेमाल पर पाबंदी लगाई गई है।

इन सभी उपायों के बावजूद उन तेरह परिवारों में एक ही समय में पसरे मातम व शोकाकुल वातावरण को  खुशियों के माहौल में कतई नहीं बदला जा सकता। यहां एक बात यह भी काबिले ग़ौर है कि सभी मृतक प्रसूता या तो गरीब परिवार की थीं या मध्यम गरीब परिवार की। सेहत संबंधी मामलों को लेकर जहां तक भारत की अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर बनने वाली साख का प्रश्र है तो इसमें भी भारत का रिकॉर्ड अत्यंत अफसोसनाक है। आंकड़ों के अनुसार दुनिया में सबसे अधिक नवजात शिशुओं की मौत भारतवर्ष में ही होती है।

विज्ञान जगत की प्रतिष्ठित पत्रिका द् लॉनसेट के अनुसार 2005 में भारत में बीस लाख पैंतीस हज़ार बच्चे मौत के मुंह में समा गए। इनमें जहां मां की $खराब सेहत, गरीबी, समय पर इलाज न मिल पाना,कुपोषण जैसी विसंगतियां शामिल थीं वहीं स्वास्थय विभाग की लापरवाही,$गलत दवाओं का प्रयोग तथा संक्रमित दवाईयों का इस्तेमाल भी इनकी मौत के कारणों में एक प्रमुख कारण था। स्वास्थ्य विभाग की लापरवाही के परिणामस्वरूप गत् वर्ष उत्तर प्रदेश में 475बच्चों की मौत हो गई जबकि इससे कहीं अधिक सं या में बच्चे मानसिक व शारीरिक रूप से विकलांग हो गए।

परंतु सरकार है कि इन ज़मीनी हकीकतों से शायद बेखबर रहकर अपनी तथाकथित हवाई उपलब्धियों के पोस्टर,बैनर तथा होर्डिंग्स आदि लगवाकर आम जनता,आला अधिकारियों,नेताओं तथा विश्व स्वास्थय संगठन को यह दिखलाना चाहती है कि पूरे देश में सब कुछ ठीकठाक है। और जब इस प्रकार की दुर्भाग्यपूर्ण सामूहिक मौतों की खबर सुनाई देती है तब जहां मुआवज़े व निलंबन की राजनीति शुरु होती है वहीं अधिकारियों द्वारा एक दूसरे पर दोषारोपण करने का अभियान भी छिड़ जाता है।

स्वास्थय विभाग की लापरवाही व इसमें व्याप्त भ्रष्टाचार का नेटवर्क इतना अधिक फैल चुका है तथा इसकी जड़ें इतनी गहरी हो गई हैं कि आज देश में जगह-जगह मेडिकल स्टोर्स पर नकली दवाईयां,प्रयोग तिथि पूरी कर चुकी अर्थात् एक्सपायर तिथि की दवाईयां आदि धड़ल्ले से बेची जाती हैं। तमाम प्रतिबंधित ड्रग्स भी यहां उपलब्ध हो जाते हैं।

याद कीजिए 2वर्ष पूर्व दिल्ली के अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान की वह घटना जबकि एक समारोह के दौरान मंच पर विराजमान वरिष्ठ डॉक्टरों ने संक्रमित जल ग्रहण कर लिया था। देश की नामी कंपनी का प्लास्टिक के गिलास में सील मिनरल वॉटर डॉक्टर्स के समक्ष रखा गया था। यह जल न केवल संक्रमित था बल्कि   इसकी तह में फफूंद  भी लगा हुआ साफ नज़र आ रहा था। इस पानी को पीने वाले कई डॉक्टरों की जान पर बन आई। इनमें से कई डॉक्टर केवल अस्वस्थ ही नहीं बल्कि गंभीर अवस्था में भी पहुंच गए थे। संयोग से वे सभी एम्स  के डॉक्टर थे इसलिए उन्हें बचा लिया गया अन्यथा यदि यही 'आम आदमी' होते तो संभवत:अपनी जान से भी हाथ धो बैठते।

अभी कुछ समय पूर्व देश में एक ऐसे भ्रष्टाचारी नेटवर्क का उस समय भंडाफोड़ हुआ था जबकि वह कैंसर की बीमारी में प्रयुक्त होने वाले बेशकीमती इंजेक्शन को निकाल कर उसकी जगह पानी भरकर मरीज़ों को दे दिया करता था। नतीजा आप खुद समझ सकते हैं। सवाल यह है कि अन्य विभागों व क्षेत्र में फैले भ्रष्टाचार की ही तरह क्या स्वास्थय विभाग के अधिकारियों व कर्मचारियों को भी इस बात की छूट दी जा सकती है कि वे अपनी सरकारी सेवा के दौरान केवल अपने आर्थिक लाभ के चलते दूसरों की जान से खिलवाड़ करें?

 यदि नहीं तो इनके अपराध को जानबूझ कर किया जाने वाला योजनाबद्ध अपराध समझा जाना चाहिए और न्याय की दृष्टि से इन्हें वही सज़ा दी जानी चाहिए जोकि एक सुनियोजित षड्यंत्र के साथ किए गए अपराध के लिए किसी अपराधी को दी जाती है। राजस्थान के जोधपुर में तेरह लोगों की एक साथ मौत और वह भी स्वास्थय विभाग के कर्मचारियों की लापरवाही के परिणामस्वरूप होना,निश्चित रूप से यह जानबूझ कर सामूहिक हत्याकांड  किए जाने का घिनौना अपराध है। इसमें कोई शक नहीं कि इसमें दोषी पाए जाने वाले सभी लोग कड़ी  सज़ा पाने के हकदार हैं।





लेखिका  सामाजिक-राजनीतिक विषयों पर लिखती हैं,उनसे nirmalrani@gmail.com पर संपर्क किया जा सकता है.




 
 
 
 

Mar 2, 2011

बलात्कार के पांच वर्ष


राबिया शादी के लिए राजी न थी.तब साहिल खत्री ने अपने सिर पर कांच का गिलास मारा और खुद को चोट पहुंचाकर वकीलों और सब इंस्पेक्टर प्रहलाद सिंह ने जान से मारने का हमला करने के झूठे केस में राबिया को बंद कराने की धमकी दी...


जागृति महिला समिति.   उत्तर प्रदेश के मुजफ्फरनगर जिले के निम्न मध्यवर्गीय परिवार की राबिया.जीवन में कुछ बनने और अपने परिवार को आर्थिक स्तर पर मजबूत बनाने के सपने लिए वह दिल्ली आई. 2002में अपने शहर से बारहवीं कक्षा पास करने के बाद उसने   कम्प्यूटर ट्रैनिंग, सिलाई-कढ़ाई, ब्यूटी पार्लर आदि की ट्रैनिंग लेती रही कि वह कुछ बेहतर कर सके. 
   
कुछ बेहतर बनने का सपना उसे   जनवरी 2005 में दिल्ली के आया. राबिया फैशन डिजाइनिंग का कोर्स करना चाहती थी. लेकिन फैशन डिजाइनिंग का सेशन जून/जुलाई से शुरू होना था। इसी बीच राबिया की नजर एक हिंदी अखबार के टेली कालर के जॉब के विज्ञापन पर पड़ी। इस जॉब के सिलसिले में उसे प्रीतमपुरा के टूईन टॉवर में साजन इंटर प्राइजेज में मिलना था। राबिया ने 21फरवरी को इंटरव्यू दिया और इंटरव्यू में पास होने के बाद काम करने लगी।

उसे प्रोपराइटर सुरेंद्र बिज उर्फ साहिल खत्री ने कोई भी नियुक्ति पत्र या करारनामा नहीं दिया। राबिया 4500रुपये पर नौकरी करने लगी। दो माह काम करने पर प्रोपराइटर उर्फ मालिक ने उसे मात्र तीन हजार रुपये वेतन दिया। तब राबिया ने अपना पूरा वेतन मांगा और दफ्तर तक आने-जाने का खर्च का ब्यौरा दिया और कहा कि इतने कम पर काम नहीं कर पायेगी.  

ऐसे में राबिया ने नौकरी छोड़ने को कहा. तो प्रोपराइटर ने राबिया को रहने के लिए जगह आफर की और कहा जबतक सैलरी  नहीं बढती इसी में रहो. राबिया  20 अप्रैल 2005 को प्रोपराइटर द्वारा दिये गये फ्लोर सी-27, ओम अपार्टमेंट 33 /77, पंजाबी बाग में अपने सामान के साथ शिफ्ट कर लिया, जहाँ उसे एक लड़की के साथ फ्लैट शेयर करना था. 


वहीं से 18-19साल की राबिया के जीवन की बर्बादी शुरू  हुई.  राबिया के वहां रहने के दूसरे ही दिन साहिल खत्री उर्फ सुरेंद्र विज, उसके लड़के अक्षय खत्री, भांजे कपिल ढल, साहिल खत्री के दोस्त रोमी ने राबिया के साथ वहां रह रही लड़की की मदद से बलात्कार किया। राबिया को आफिस जाने से रोककर उसी फ्लोर पर कैद कर लिया गया। यहां तक की टॉयलेट भी चाकू दिखाकर ले जाया जाता था। वहां रह रही लड़की से राबिया को पता चला कि वह भी उसकी शिकार थी और  किस्मत से समझौता कर चुकी थी।

राबिया को पता चला कि यह घर प्रोपराइटर के वकील दोस्त एमके अरोड़ा का है और इसे इसी काम के लिए इस्तेमाल किया जाता है। उसके बाद हर रोज नये आदमी आते रहे और राबिया के साथ बलात्कार करते रहे. आनेवालों में कई पुलिस वाले और वकील भी आते, जो  प्रोपराइटर के दोस्त थे और उसके काले धंधे में शामिल थे। प्रोपराइटर के कई काले धंधे हैं । वह कहीं मैजिक गु्रप चलाता था,कहीं प्रोपर्टी पर कब्जा करता था,कहीं लाखों का माल लेकर  चेक देता था, जिसमें पैसा ही नहीं होता था। सारे चेक बाउंस होते थे। उसके ऊपर पुलिस अफसर और वकील साथी काले धंधे को संरक्षण देकर भारी रकम कमाते थे।

राबिया को सख्त पहरे में रखा जाता था। राबिया उनके चंगुल से भागना चाहती थी,लेकिन इतने बड़े आपराधिक गैंग से निकल पाना संभव नहीं था। हालाँकि गैंग समझ चुका था कि राबिया किसी तरह भाग जाना चाहती थी. इसलिए उससे कई ब्लैंक पेपर साइन कराये गये। वकील एमके अरोड़ा, वकील नवीन सिंघला और सब इंस्पेक्टर प्रहलाद सिंह ने  साहिल खत्री के साथ साजिश रची कि इस लड़की के साथ साहिल खत्री शादी कर ले।

राबिया शादी के लिए राजी न थी.तब साहिल खत्री ने अपने सिर पर कांच का गिलास मारा और खुद को चोट पहुंचाकर वकीलों और सब इंस्पेक्टर प्रहलाद सिंह ने जान से मारने का हमला करने के झूठे केस में राबिया को बंद कराने की धमकी देकर शादी करने को मजबूर किया। कहीं भी शोर-शराबा करने पर जान से खत्म करने की धमकी देकर आर्य समाज मंदिर यमुना बाजार ले जाया गया। वहां राबिया का धर्म परिवर्तन कराकर उसके साथ तीन बच्चों के पिता लगभग 45वर्षीय साहिल खत्री ने पहली पत्नी को तलाक दिये बगैर विवाह किया।

मंदिर में दिये गये शपथपत्र में उसने खुद को अविवाहित लिखा और अपने अपने निवास स्थान और पते का कोई सबूत नहीं दिया। लिहाजा मंदिर ने कोई छानबीन किये बगैर यह गैरकानूनी विवाह करा दिया। चाकू की नोक पर वकील एमके अरोड़ा के मकान पर विवाह के बाद कैद करके हर रोज उसके बलात्कार का सिलसिला जारी रहा। राबिया के माता-पिता और भाई उसको ढूंढ़ते-ढूंढ़ते थक गये, फिर मरा जानकर खामोश हो गये। अपराधी साहिल खत्री ने तब तक रहने के कई स्थान बदल डाले थे।

अठारह जुलाई 2007को गैंग से मुक्त होने के लिए छटपटा रही राबिया ने मौका मिलते ही अपने भाई को बताया कि वह यहां कैद है, उसे मुक्त करा लें। भाई बहन के बताये पते पर मोतीनगर उसे मुक्त कराने गया, तो साहिल खत्री ने 100 नंबर पर पुलिस को फोन करके 14 लाख रुपये एवं गहनों की चोरी का आरोप लगाया और कहा कि राबिया के किसी सगे-संबंधी ने चोरी की है।

यह सब मोतीनगर के थानाध्यक्ष एवं सब इंस्पेक्टर प्रहलाद सिंह और वकील एमके अरोड़ा की मिलीभगत से किया गया। राबिया और उसके भाई को थाना मोतीनगर में थानाध्यक्ष एवं एमके अरोड़ा और सब इंस्पेक्टर प्रहलाद सिंह ने बुरी तरह पीटा। राबिया के भाई से यह कहलवा लिया गया कि वह फिर कभी राबिया को लेने दोबारा नहीं आयेगा। इसके बाद 14 लाख रुपये और गहनों की चोरी की कोई एफआईआर दर्ज नहीं करायी गयी।

राबिया बार-बार अपना पीछा छुड़ाने के जितने प्रयास करती,उतना ही अपराधी गैंग उसे फंसा रहा था। उसके वोटर आईडी, बैंक खाते, पैन कार्ड आदि बनवाये गये। आपराधिक मुकदमों में जमानत के लिए राबिया के आईडी प्रूफ का इस्तेमाल उसे डरा-धमकाकर कर लिया जाता था। राबिया ने अपने लिये कभी कोई आईडी इस्तेमाल नहीं की।

इतना ही नहीं राबिया ने आज तक न तो अपना ड्राइविंग लाइसेंस बनाया और न ही उसे बाइक चलानी आती है। फिर भी साहिल खत्री ने DL4SBM0947 नंबर की करिज्मा मोटर साइकिल राबिया के नाम से 26 अगस्त 2008 को खरीदी। इसकी पेमेंट बलात्कारी कपिल ढल से साहिल खत्री ने उसके एटीएम कार्ड से करायी। मोटर साइकिल राबिया के नाम से इसलिये खरीदी गयी कि वह साहिल खत्री के आपराधिक मुकदमे राबिया से जमानत करा सके। दूसरा राबिया भाग न सके। जबकि राबिया के नाम से खरीदी गयी मोटर साइकिल अक्षय खत्री इस्तेमाल करता था।

राबिया ने एक बार फिर साहिल खत्री द्वारा जबरन यौन शोषण करने-कराने की शिकायत अपने भाई के माध्यम से 5 जनवरी 2009 को थाना मोतीनगर में दर्ज करायी, मगर फिर से साहिल खत्री एवं उसके पुलिस अफसर दोस्तों ने मोटर साइकिल चोरी के दूसरे केस में उसे फंसाने की कोशिश की। उसके बाद डरा-धमकाकर कहलवा लिया कि राबिया साहिल खत्री को छोड़कर कहीं नहीं जायेगी। लेकिन इस बार राबिया एक लड़की की मदद से भागने में कामयाब हो गयी।

वह अपने घर इसलिए नहीं गयी कि घरवालों को पुलिस वाले और साहिल खत्री तंग न करे। राबिया नाम बदलकर पहले उस लड़की की मदद से मुंबई गयी,फिर उदयपुर में नारायण सेवा संस्थान गयी। साहिल खत्री ने पुलिस,वकीलों और बदमाश दोस्तों के साथ साजिश रचकर मोतीनगर थाने में दिनांक 06-01-2009 को चोरी का मुकदमा दर्ज करा दिया। कंपलेंट के आधार पर सब इंस्पेक्टर प्रहलाद सिंह ने झूठी छानबीन की रिपोर्ट तैयार करके दिनांक 18-05-2009 को एफआईआर नंबर 199 /09 राबिया एवं उसके भाइयों के खिलाफ दर्ज करा दी। उसके भाइयों को मुजफ्फरनगर जाकर गिरफ्तार कर लिया गया।

इतना ही नहीं पुलिसवाले राबिया के घर से बहुमूल्य सामान उठा लाये। सामान कहीं दर्ज नहीं किया गया, उसे पुलिसवाले हजम कर गये। राबिया से कहा गया कि ‘तेरा भाई जेल में बंद है, तू वापस आयेगी तभी छुड़वाया जायेगा।’ राबिया वापस आयी। उसने झूठे मुकदमे का विरोध किया तो उसे भी पकड़ लिया गया।

बाद में मजबूर होकर राबिया ने फिर से साहिल खत्री के साथ रहने का समझौता कर लिया। राबिया की जमानत बलात्कारी साहिल खत्री ने करा दी और कोर्ट में बाइक का पैसा जमा कराने को कहकर राबिया को साथ ले गया। फिर घर बदल लिया। दूसरे इलाके में राबिया ने साहिल खत्री द्वारा की जा रही ज्यादतियों का विरोध फिर शुरू कर दिया तो कोर्ट में मोटर साइकिल की रकम की किस्त जमा कराना बंद कर दिया गया।

राबिया को तारीख पर पेश नहीं होने दिया गया। अदालत से वारंट जारी करा दिया और साहिल खत्री उसे अपनी कैद में रखता रहा। उसे धमकी देता रहा कि जिस दिन तूने भागने की कोशिश की, तुझे गिरफ्तार करा दूंगा। कोर्ट के गैर जमानती वारंटों पर पुलिस राबिया को गिरफ्तार नहीं कर रही थी। यह जानते हुए भी कि साहिल खत्री के साथ रह रही है। साहिल खत्री राबिया को अपने हर अपराध में इस्तेमाल करता था।

राबिया को अक्टूबर 2010 में जागृति महिला समिति के बारे में पता चला। उसने 07-10-2010 को अपनी शिकायत अर्जी थाना विकासपुरी में दी। डीजीपी वेस्ट से लेकर दिल्ली पुलिस आयुक्त एवं संयुक्त आयुक्त विजिलेंस तक उसने शिकायत की,लेकिन उसकी शिकायतों पर कोई तहकीकात नहीं की गयी। राबिया ने उस पर अत्याचार और यौन शोषण कराने वाले सभी पुलिस अफसरों,वकीलों और आपराधिक तत्वों के खिलाफ शिकायत की जिसमें उसने साहिल खत्री के बेटे अक्षय खत्री, भांजे कपिल ढल, भतीजे एवं दोस्तों के दाम दिये।

पुलिस के सभी वरिष्ठ अफसरों तक ने राबिया की शिकायतों को अनदेखा कर दिया। ताज्जुब की बात है कि औरतों की सुरक्षा का दावा करने वाली दिल्ली पुलिस के क्षेत्रीय एसीपी एवं डीसीपी ने मोटर साइकिल के झूठे केस पर अपनी मोहर लगाकर कोर्ट में दाखिल कराने की मंजूरी दे दी। यही नहीं अभियोजन विभाग के वकील ने भी मिलीभगत से चालान पास कर दिया और राबिया को जेल भेजने की ठान ली।

जागृति महिला समिति के जरिये 21-10-2010को राबिया की जमानत बड़ी मुश्किल से करायी, पर वह आपराधिक गैंग के खिलाफ वह पुलिस के आला अफसरों को लगातार अर्जियां भेज रही थी इसलिए दिनांक 03-11-2010 को राबिया का सामान आपराधिक गैंग ने चोरी कर लिया। मात्र पहने हुए कपड़ों में राबिया जागृति महिला समिति की शरण में पहुंची।

राबिया फिर से काम की तलाश में थी और  अपनी किसी सहेली के घर पर रह रही थी। दूसरी ओर समिति की मदद से अन्याय और अपराध के खिलाफ लड़ रही थी,जिसकी भनक पुलिसवालों को थी। राबिया और उसके भाई को फिर से झूठे मुकदमे में फंसाने की साजिश साहिल खत्री,अक्षय खत्री, प्रतीक खत्री, निति खत्री, साहिल खत्री के साथ पुलिस के अफसर और वकीलों जोरों से कर रहे थे।

 दिनांक 09-01-2011को गहरी साजिश के तहत साहिल खत्री ने खुद पर गोली चलाकर कातिलाना हमले के मुकदमे में राबिया और उसके भाई को फंसाने की नीयत से पुलिस एवं वकीलों की मिलीभगत से अपनी बाजू पर गोली मार ली। लेकिन गोली उसके हृदय पर लग गयी,साहिल खत्री मर गया। राबिया के निर्दोष भाई और राबिया को पुलिस ने पकड़ लिया। 10-01-2011को पुलिस ने राबिया और उसके भाई को गैरकानूनी तरीके से थर्ड डिग्री की मार लगायी। गैर कानूनी ढंग से इन्हें दिनांक 19-01-2011 को रात तक थाने में रखा।

समिति ने क्षेत्रीय डीसीपी नॉर्थवेस्ट को 14पेज का पत्र लिखा। तब कहीं साहिल खत्री के गैंग के कुछ व्यक्तियों, उसके बेटों और दोस्तों को पुलिस ने पकड़ा। इन लोगों ने अपना अपराध कबूल कर लिया। पूरी प्लानिंग के तहत साजिश रची गयी थी-राबिया और उसके भाई को झूठे केस में फंसाने की। लेकिन अपराधियों ने अपना जुर्म कबूल कर लिया तो पुलिस ने उन्हें भी छोड़ दिया।

राबिया की शिकायत पर आज तक कोई कार्रवाई तो दूर,सुनवाई तक नहीं की गयी। यह है हमारी पुलिस, पुलिस प्रशासन, प्रोसिक्यूशन और अदालतें। 18-23 वर्ष तक की उम्र में पांच सालों तक राबिया के जीवन की और उसके परिवार को बर्बाद  करने वाले अपराधी आजाद घूम रहे हैं और फाइलें  अदालतों में धूल चाट रही हैं।



जरूरी हैं क्षेत्रीय दल

भारत में दो प्रमुख पार्टियां हैं-कांग्रेस और  भाजपा। दोनों निजीकरण और उदारीकरण के प्रति प्रतिबद्ध हैं,और देश की मिट्टी, हवा और पानी तक बेच देने से गुरे़ज नहीं करती हैं...  

मदन कश्यप

आंध्र प्रदेश में फिल्म अभिनेता चिरंजीवी की पार्टी प्रजा देशम् के कांग्रेस में विलय से कांग्रेस पार्टी भले ही मजबूत हुई हो,हमारा संसदीय लोकतंत्र तो कम़जोर ही हुआ है। एक ब़डे राज्य में तीसरे दल की संभावना खत्म हो गयी है।

लोकतंत्र की म़जबूती के लिए राज्यों में तीसरे दलों का और केंद्रीय स्तर पर तीसरे मोर्चे का म़जबूत होना और रहना जरूरी है। दो दलीय प्रणाली हमेशा ही लोकतंत्र को सीमित करती है और वैसी परिस्थिति में जनतंत्र सत्ता  के दलालों के हाथों में पूरी तरह चला जाता है। अमेरिका और ब्रिटेन सहित यूरोप के कई प्रमुख देशो में ऐसा हो भी चुका है।

दो दलीय प्रणाली में सत्ता परिवर्तन का कोई मायने-मतलब नहीं रह गया है। अमेरिका में राष्ट्रपति चाहे डेमोक्रेट हो अथवा रिपब्लिकन हालात में कोई खास बदलाव नहीं आता है। वही हालत ब्रिटेन में कंजरवेटिव और लेबर पार्टी की है। ऐसी स्थिति में दोनों पार्टियां एक ही वर्ग के हित में काम करती हैं और अदल-बदल कर सत्ता में आती रहती हैं। इनमें कोई गुणात्मक अंतर नहीं होता और उनके आर्थिक हित भी समान होते हैं।

फ़र्क सि़र्फ समाज के कुछ तबकों, कुछ इलाकों और भाषाई समूहों को अपेक्षाकृत कम या ़ज्यादा तवज्जो देने का होता है और इसके अंतर के चलते ऊपरी तौर पर कुछ राजनीतिक गतिशीलता दिखलाई देती है, मगर ब़डे पूंजीपतियों, बहुराष्ट्रीय कंपनियों, निगमों और औद्योगिक  घरानों को कोई ़फ़र्क नहीं प़डता। ब़डे औद्योगिक देशों में तो स्थिति पहले से ही ऐसी थी,मगर सोवियत संघ के विघटन और भूमंडलीकरण की नयी अर्थनीति के लागू होने के बाद तो अमेरिका के इशारे पर पूरी दुनिया में प्रतिपक्ष की भूमिका समाप्त करने की कोशिश की जा रही है।


ढिंढोरा भले ही पीटा गया कि पश्चिमी शैली का उदारवादी लोकतंत्र अब दुनिया की अंतिम शासन व्यवस्था है और इतिहास का अंत हो चुका है, मगर सच तो यह है कि पूरी दुनिया में तानाशाही को ब़ढावा दिया गया और राष्ट्रवाद के आधार को कम़जोर किया गया। यह अलग से विचारणीय विषय है। फिलहाल तो सि़र्फ इस तथ्य पर ध्यान देने की जरूरत है कि उस भूमंडलीकरण के बाद ही सांप्रदायिकता का उभार हुआ और शासकवर्ग की दूसरी पार्टी के रूप में भाजपा का उदय हुआ। कांग्रेस की वास्तविक प्रतिपक्षी पार्टियां कमजोर होती हुई कुछ राज्यों तक सिमट गयीं।
अब भारत में दो प्रमुख पार्टियां हैं-कांग्रेस और  भाजपा। दोनों अमेरिकापरस्त हैं। दोनों निजीकरण और उदारीकरण के प्रति प्रतिबद्ध हैं, और देश की मिट्टी, हवा और पानी तक बेच देने से गुरे़ज नहीं करती हैं। फिर उन्हें एक-दूसरे का प्रतिपक्ष कैसे कहा जा सकता है?दरअसल यह दूसरा पक्ष है, विपक्ष नहीं सत्ता बदलने से परिवर्तन होता है,प्रगति नहीं। यही है उत्तर  आधुनिकता। कांग्रेस और भाजपा में जो अंतर दिखाई देता है,वह महज भुलावा है। भाजपा का राष्ट्रवाद और कांग्रेस की धर्मनिरपेक्षता एक जैसा ही छद्म है। खूबी यह है कि दोनों एक-दूसरे पर छद्म का आरोप लगाते हैं।

भारत जैसे बहुभाषी, बहुधर्मी और बहुसांस्कृतिक देश में दो दलीय पद्धति लागू करना संभव नहीं है, क्योंकि औपनिवेशिक दासता से मुक्ति के लिए चले संघर्षों के दौरान जो राष्ट्रवाद पनप रहा था और जिसका शुरुआती लाभ कांग्रेस को मिला था,उसकी हवा अब निकल चुकी है। ऐसी स्थिति में इलाकाई और तबकाई आकांक्षाओं को पहचान देने वाली छोटी-छोटी पार्टियों के व़जूद को मिटाया नहीं जा सकता।
तब अमेरिकापरस्त ता़कतों ने एक नया रास्ता निकाला। उन्होंने भाजपा और कांग्रेस के नेतृत्व में दो गठबंधन यानी दो गिरोह बनवा दिये-एनडीए और यूपीए। अर्थात अमेरिकी साम्राज्यवाद और बहुराष्ट्रीय कंपनियों के विरुद्ध बनी छोटी पार्टियों के तीसरे मोर्चे के हथियार का ही अपने पक्ष में इस्तेमाल कर लिया। इन दोनों गिरोहों में अभूतपूर्व आंतरिक एकता है और ये नकली प्रतिपक्ष बनकर जनता को गुमराह करने में सक्षम हैं। धु्रवीकरण इतना म़जबूत है कि प्रांतीय स्तर पर तो किसी तीसरे विकल्प की स्थिति ही नहीं बनती है।

केवल उŸार प्रदेश में बसपा और सत्ता के अलावा कांग्रेस और भाजपा भी तीसरा-चौथा कोण बनाने में कुछ हद तक सक्षम है,बाकी सभी राज्यों में केवल दो ही पार्टियां या गठबंधन हैं। यानी मूल्यों की ल़डाई खत्म हो चुकी है,केवल जीत और हार का मसला सामने है। फिर भी अधिकांश राज्यों में पहले अथवा दूसरे नंबर पर कोई न कोई क्षेत्रीय अथवा वामपंथी पार्टी है। उत्तर  प्रदेश में तो सत्ता और मुख्य प्रतिपक्ष- दोनों की जगहों पर बसपा और सपा जैसी पार्टियां हैं।

वैसे तो ये क्षेत्रीय पार्टियां भी कभी न कभी सत्ता के किसी न किसी गठबंधन में शामिल हो चुकी हैं,लेकिन इन्होंने हमेशा ही तीसरे मोर्चे के विकल्प को खुला रखा है। आज भी वामदल,बसपा, तेलगुदेशम, अन्नाद्रमुक, बीजद आदि जैसी पार्टियां सत्ता के दोनों गिरोहों से बाहर हैं, जबकि जद यू, अकाली दल, नेका, अगप, राजद, आदि जैसी पार्टियां कभी भी गठबंधन तो़डकर तीसरे मोर्चे में आ सकती हैं। भाजपा का स्वाभाविक  मित्र तो केवल शिवसेना और कांग्रेस का राकांपा है।

ऐसे में हमारा लोकतंत्र तभी मुकम्मिल होगा जब राजग जैसा नकली प्रतिपक्ष समाप्त होगा और उसकी जगह अमेरिका और बहुराष्ट्रीय कंपनियों की लूट के दृढ विरोधी के रूप में मजबूत तीसरा मोर्चा उभरकर आएगा। दो गिरोहीय ध्रुवीकरण के इस कठिन राजनीतिक समय में चिरंजीव ने आंध्र विधानसभा में म़जबूती दिखलायी थी और किसी वैचारिक प्रतिबद्धता के न होने के बाव़जूद उनकी उपस्थिति मात्र से तीसरे विकल्प के सिद्धात को बल मिल रहा था।

अब उनके अवसरवाद ने लोकतंत्र के विस्तार और वास्तविक प्रतिपक्ष के निर्माण की प्रक्रिया को कुछ तो चोट पहुंचायी है। अगर हम लोकतंत्र को बचाना चाहते हैं तो कांग्रेस और भाजपा की नूराकुश्ती से ध्यान हटाकर तीसरे विकल्प को म़जबूत करना जरूरी है।


हिंदी के वरिष्ठ कवि. कविताओं में  जनपक्षीय झुकाव के लिए चर्चित. फिलहाल हिंदी पत्रिका  'द पब्लिक एजेंडा' के साहित्य संपादक.







Mar 1, 2011

कुछ और शादियों की इच्छा


भारत  के मिजोरम राज्य की राजधानी एजल में  दुनिया का सबसे बड़ा परिवार बसता है.  परिवार के मुखिया जियोना चाना हैं.  बाक्तवांग  गाँव  में बसे इस परिवार में  चाना  अपनी 39 बीबियों, 94  बच्चों, १४ बहुओं और 33 नाती- पोतों के साथ रहते  है. सौ कमरों के घर में ६७ वर्षीय चाना को घर के सदस्यों की संख्या ज्यादा नहीं लगती. वह कुछ और शादियाँ करने की इच्छा रखते हैं.