Feb 4, 2011

नहीं तो मारे जाते रामचंद्र गुहा !


आप विश्वास करेंगे कि ख्याति  प्राप्त इतिहासकार,लेखक और बुद्धिजीवी रामचंद्र गुहा को छत्तीसगढ़ के एक पुलिस थाने के भीतर नक्सली सिद्ध कर दिया गया और उनको मारने की तैयारी कर ली गयी थी...

हिमांशु  कुमार  

अभी देश में सरकारी भ्रष्टाचार के खिलाफ आवाज़ उठाने वालों को नक्सली,माओवादी और आतंकवादी कह कर डरा कर चुप कराने का जोरदार धंधा चल रहा है.और हमारे देश का मध्यवर्ग जो बिना मेहनत किये ऐश की ज़िंदगी जी रहा है वो सरकार के इस झूठे प्रचार पर विश्वास करना चाहता है ताकि कहीं ऐसी स्थिति ना आ जाए जिसमें ये हालत बदल जाए और मेहनत करना ज़रूरी हो जाए.

इसलिए बराबरी ओर गरीबों के लिए आवाज़ उठाने वाले मारा जा रहा है या झूठे मुकदमें बना कर जेलों में डाल दिया गया है.लेकिन क्या आप विश्वास करेंगे की अंतर्राष्ट्रीय ख्याती प्राप्त इतिहासकार,लेखक और बुद्धिजीवी रामचंद्र गुहा को एक पुलिस थाने के भीतर नक्सली सिद्ध कर दिया गया और उनको मारने की तैयारी कर ली गयी थी.


बाएं से इतिहासकार रामचंद्र गुहा, प्रोफ़ेसर नंदिनी सुन्दर और प्रभात खबर के संपादक हरिवंश : मारे जाने से बच गए

ये घटना सन २००७ के जून महीने की है.दंतेवाड़ा में सरकार ने सलवा जुडूम शुरू कर दिया था.सलवा जुडूम वाले और पुलिस मिल कर आदिवासियों के घरों को जला रहे थे.आदिवासी लड़कों को मार रहे थे और आदिवासी लड़कियों से बड़े पैमाने पर बलात्कार किये जा रहे थे.उसी दौरान रामचंद्र गुहा,दिल्ली विश्वविद्यालय की प्रोफ़ेसर डॉ.नंदिनी सुन्दर, इंदिरा गांधी के प्रेस सलाहकार रहे वरिष्ठ पत्रकार बीजी वर्गीस, केंद्रीय शासन में सचिव रहे ईएएस शर्मा,फरहा नक़वी,और झारखंड के प्रसिद्ध अखबार प्रभात खबर के सम्पादक हरिवंश जी आदि की एक टीम सलवा जुडूम और आदिवासियों के बारे में जानकारी लेने आयी थी.

इस दौरे के दौरान एक टीम दंतेवाडा के करीब साठ किलोमीटर दूर एक गाँव में आदिवासियों से मिलने गयी. पुलिस को पता चल गया.बस फिर क्या था?कानून को बचाने सरकार का हुकुम बजाने और संविधान की रक्षा करने सरकार दल-बल के साथ पहुँच गयी. टीम के सदस्य अपनी गाड़ी नदी के इस पार खड़ी कर नदी पार करके गावों में गए हुए थे.

सरकारी सुरक्षा बलों ने ड्राईवर के गले पर चाक़ू रख दिया और उसको धमका कर टीम की अगली पिछली गतिविधियों की जानकारी ली. कुछ देर के बाद जब जब ये टीम वापिस आयी तो इन लोगों से पूछताछ करके इन्हें सीधे वापिस जाने की इजाज़त दे दी गयी,लेकिन रास्ते में आगे पड़ने वाले भैरमगढ़ थाने को ज़रूरी निर्देश दे दिए गए.

जैसे ही रामचंद्र गुहा, नंदिनी सुन्दर आदि की टीम भैरमगढ़ थाने पहूंची शाम हो चुकी थी. थाने के सामने का नाका रोक कर इन लोगों को थाने चलने का आदेश दिया गया.थाने के भीतर एसपीओ लोगों का राज था.एक एसपीओ ने राम चन्द्र गुहा की तरफ इशारा करके कहा इसे तो हम जानते हैं, ये तो नक्सली है,छत्तीसगढ़ में गवाहों की क्या कमी? आनन फानन में तीन गवाह भी आ गए. उन्होंने कहा हाँ इसे तो हमने नक्सलियों की मीटिंगों में देखा है.बस फिर क्या था.किसी ने कहा चलो साले को गोली मार दो.

एसपीओ लोगों का एक झुण्ड राम चन्द्र गुहा को एक तरफ ले गया.इस बीच कुछ एसपीओ और सलवा जुडूम वालों ने नंदिनी सुन्दर का पर्स और कैमरा छीन लिया.तब मोबाइल से नंदिनी ने कलेक्टर को फोन लगाया.कलेक्टर ने कहा मैं एसपी को कहता हूँ.एस पी का फ़ोन आया लेकिन थानेदार ने एसपी का फोन सुनने से मना कर दिया.और पूरे थाने को एसपीओ और सलवा जुडूम के ऊपर छोड़ कर खुद को एक कमरे में बंद कर लिया.

मैं उस दिन रायपुर में था.नंदिनी ने मेरी पत्नी वीणा को कवलनार आश्रम में फोन किया.वीणा ने मुझे फोन किया और कहा की नंदिनी एवं साथी बहुत बड़ी मुसीबत में हैं.आप तुरंत कुछ कीजिये. मैंने भैरमगढ़ सलवा जुडूम के नेता अजय सिंह को फोन किया. हम तब खासी मज़बूत स्थिति  में थे.

आदिवासियों की एक बड़ी सँख्या हमारी संस्था और कोपा कुंजाम जैसे कार्यकर्ताओं के साथ थी.(इसी जनशक्ति के बल पर हम वहां इतने लम्बे समय तक टिक पाए) मैंने अजय सिंह से कहा की राम चन्द्र गुहा आदि लोगों को कुछ नहीं होना चाहिए .और इसके बाद ये टीम वहां से जान बचा कर निकल पाई.

नंदिनी ने बड़े आश्चर्य से मुझे बताया की आपका फोन आते ही उन्होंने हमें छोड़ दिया.रामचंद्र गुहा भी अगले दिन वनवासी चेतना आश्रम में बैठ कर सलवा जुडूम की बदमाशियों पर गुस्सा निकाल रहे थे . नंदिनी का कैमरा छ माह के बाद कलेक्टर ने वापिस किया था...



दंतेवाडा स्थित वनवासी चेतना आश्रम के प्रमुख और सामाजिक कार्यकर्त्ता हिमांशु कुमार का संघर्ष,बदलाव और सुधार की गुंजाईश चाहने वालों के लिए एक मिसाल है. उनसे vcadantewada@gmail.com पर संपर्क किया जा सकता है.




नेहरु परिवार ने कराया धर्मान्तरण


गाँधी और नेहरु के बहुत  विरोध  के बावजूद  भी जब यह निकाह संपन्न हो गया तब समस्या 'खान'  उपनाम को लेकर आ खड़ी हुई, जिसका हल  सोलिसिटर जनरल  श्री सप्रू के द्वारा निकाला गया...


गाँधी परिवार का परिचय जब भी किसी कांग्रेसी अथवा मीडिया द्वारा देशवासियों को दिया  जाता है तब वह फिरोज गाँधी तक जाकर यकायक रुक  जाता है. फिर बड़ी सफाई के साथ अचानक उस परिचय का हैंडिल एक विपरीत रास्ते की और घुमाकर नेहरु वंश की और मोड़ दिया जाता है।

फिरोज गाँधी भी अंततः किसी के पुत्र तो होंगे ही। उनके पिता कौन थे ? यह बतलाना आवश्यक नहीं समझा जाता। फिरोज गाँधी का परिचय पितृ पक्ष से काट कर क्यों ननिहाल के परिवार से बार-बार जोड़ा जाता रहा है.  यह एक ऐसा रहस्य है जिसे नेहरु परिवार के आभा-मंडल से ढक  कर एक गहरे गड्ढे  में मानो सदैव के लिए ही दफ़न कर दिया गया है।

फिरोज 'खान' और इंदिरा : राजनीति के लिए धर्मान्तरण

यह कैसा आश्चर्य है की पंथ निरपेक्षता(मुस्लिम प्रेम) की अलअम्बरदार कांग्रेस के द्वारा भी आखिर यह गर्वपूर्वक क्यों नहीं बतलाया जाता की फिरोज गाँधी एक पारसी युवक नहीं, एक मुस्लिम पिता के बेटे  थे। दरअसल  फिरोज गाँधी का मूल नाम फिरोज गाँधी नहीं फिरोज खान था,जिसको एक सोची समझी कूटनीति के अर्न्तगत फिरोज गाँधी करा दिया गया था। फिरोज गाँधी मुसलमान थे और जीवन पर्यन्त मुसलमान ही बने रहे।

उनके पिता का नाम नवाब खान था जो इलाहबाद में मोती महल (इशरत महल)के निकट ही एक किराने की दूकान चलाते थे । इसी सिलसिले में (रसोई की सामग्री पहुंचाने के सिलसिले में)उनका मोती महल में आना जाना लगातार रहता था। फिरोज खान भी अपने पिता के साथ ही प्रायः मोती महल में जाते रहते थे। वहीँ पर अपनी समवयस्क इंदिरा  से उनका परिचय हुआ और धीरे-धीरे जब यह परिचय गूढ़ प्रेम में परिणत हुआ तब फिरोज खान ने लन्दन की एक मस्जिद में इंदिरा को मैमूदा बेगम बनाकर उनके साथ निकाह पढ़ लिया।

गाँधी और नेहरु के बहुत  विरोध किये जाने के बावजूद  भी जब यह निकाह संपन्न हो ही गया तब समस्या 'खान' उपनाम को लेकर आ खड़ी हुई। अंततः इस समस्या का हल नेहरु के जनरल सोलिसिटर श्री सप्रू के द्वारा निकाला गया। मिस्टर सप्रू ने एक याचिका और एक शपथ पत्र न्यायालय में प्रस्तुत करा कर 'खान' उपनाम को 'गाँधी' उपनाम में परिवर्तित करा दिया।इस सत्य को केवल पंडित नेहरु ने ही नहीं अपितु सत्य के उस महान उपासक तथाकथित माहत्मा कहे जाने वाले मोहन दास करम चंद  गाँधी ने भी इसे राष्ट्र से छिपा कर सत्य के साथ ही एक बड़ा विश्वासघात कर डाला ।

गांधी उपनाम ही क्यों -वास्तव में फिरोज खान के पिता नवाब खान की पत्नी जन्म से एक पारसी महिला थी जिन्हें इस्लाम में लाकर उनके पिता ने भी उनसे निकाह पढ़ लिया था। बस फिरोज खान की माँ के इसी जन्मजात पारसी शब्द का पल्ला पकड़ लिया गया। पारसी मत में एक उपनाम गैंदी भी है जो रोमन लिपि में पढ़े जाने पर गाँधी जैसा ही लगता है।

और फिर इसी गैंदी उपनाम के आधार पर फिरोज के साथ गाँधी उपनाम को जोड़ कर कांग्रेसियों ने उस मुस्लिम युवक फिरोज खान का परिचय एक पारसी युवक के रूप में बढे ही ढोल-नगाढे के साथ प्रचारित कर दिया। और जो आज भी लगातार बड़ी बेशर्मी के साथ यूँ ही प्रचारित किया जा रहा है।


( प्रस्तुत लेख बोधिसत्व कस्तूरिया के जरिये प्राप्त हुआ है, जिसे गौरव त्रिपाठी ने 'मेरे पिता श्री देवेन्द्र सिंह त्यागी द्वारा लिखित' के तौर पर मेल कर प्रस्तुत किया है. )
 
 

Feb 3, 2011

और एक आदिवासी राज्य की मांग !


मध्यप्रदेश में नौ लाख सदस्य संख्या का दावा करने वाली  पार्टी ने प्रस्तावित राज्य का एक नक्शा बना लिया है। नक्शे में राज्य के कुल चैबीस जिले 108 विधानसभा क्षेत्र और 13 लोकसभा क्षेत्र शामिल किये गये हैं...

चैतन्य भट्ट

मध्यप्रदेश को छत्तीगढ में विभाजित हुये ज्यादा वक्त नहीं बीता है लेकिन एक बार फिर मध्यप्रदेश से अलग पृथक गौंडवाना राज्य की मांग उठने लगी है...

आज से उन्नीस साल पहले गठित गौडवाना गणतंत्र पार्टी ने प्रदेश की राजनीति मे अपना एक अलग मुकाम बनाकर दूसरे प्रमुख दलों में घबराहट पैदा कर दी थी पर बीच में पार्टी में आई दरार और गौडवाना गणतंत्र पार्टी के ही एक बडे नेता द्वारा गौडवाना गणतंत्र सेना बनाने के बाद इसकी धार कुंद हो गई थी। पर बाद में इनके विलय ने एक बार फिर गौंडवाना की मांग को फुलफार्म में ला दिया है।


मध्यप्रदेश में नौ लाख सदस्य संख्या का दावा करने वाली यह पार्टी इसके लिये जनजागरण अभियान  शुरू कर दी है और अपने प्रस्तावित राज्य का एक नक्शा भी बना लिया है। नक्शे के अनुसार राज्य में कुल चैबीस जिले 108 विधानसभा क्षेत्र और 13 लोकसभा क्षेत्र शामिल किये गये हैं।

गौरतलब है कि आदिवासी बाहुल्य मध्यप्रदेश में आदिवासियों के उत्थान के लिए सन् 1991में हीरासिंह मरकाम ने गौंडवाना गणतंत्र पार्टी का गठन किया था। आदिवासियों के विकास का नारा बुलंद किया था इसलिये इसे उन इलाकों में अच्छी लोकप्रियता मिली जो आदवासी बाहुल्य जिले कहे जाते थे धीरे-धीरे ‘गौडवाना गणतंत्र पार्टी’ ने आदिवासियों के बीच अपनी ताकत बढानी शुरू की और इतनी ताकत पैदा कर ली कि उसके संस्थापक हीरासिंह मरकाम कोरबा के तानापार जो अब मध्यप्रदेश के विभाजन के बाद छत्तीसगढ में है से मध्यावधि चुनाव जीत कर विधायक बन गये।

इस जीत से पार्टी को नया उत्साह मिला और 2003 के आम चुनाव में पार्टी के तीन विधायक प्रदेश की विधानसभा में पहुंचे  गये। पार्टी की ताकत बढने लगी तो उसके नेताओं के बीच महात्वाकांक्षायें भी उतनी ही तेजी  से पनपीं और पार्टी के राष्ट्रीय  उपाध्यक्ष गुलजार सिंह मरकाम ने अलग होकर गौंडवाना गणतंत्र सेना का गठन कर लिया। इसके कारण पिछले 2008 के विधानसभा चुनावों में पार्टी अपने अंदरूनी विवादों में इस कदर उलझ रही कि उसने चुनाव लड़ने का साहस ही नहीं कर सकी।
इसी साहस को जुटाने की कवायद में करीब डेढ साल पहले गौंडवाना गणतंत्र सेना का गौंडवाना गणतंत्र पार्टी में विलय हो गया। विलय के बाद फिर एक बार पार्टी ने पृथक गौंडवाना राज्य की मांग को पार्टी की केंद्रीय मांग के तौर पर स्थापित करना शुरू  कर दिया है।

पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष केएस कुमरे का तर्क है कि ‘जब देश आजाद हुआ था तब विभिन्न राज्यों के पुर्नगठन के वक्त देश में बसने वाले लोगों की विभिन्न भाषा,बोलियों और उनकी संस्कृति को ध्यान में रखते हुये राज्यों का गठन किया गया। पंजाब, गोवा, बंगाल, गुजराती, महाराष्ट्र, हरियाणा, छत्तीसगढ़ से लेकर पूर्वोत्तर तक का गठन इसी आधार पर हुआ है।’कुमरे उदाहरण देते हैं कि ‘क्षेत्रफल की दृष्टि से केरल,छत्तीसगढ के बस्तर संभाग के बराबर है। फिर भी मलयाली भाषा और संस्कृति के मददेनजर इसे राज्य का दर्जा दिया गया.’

पृथक गौंडवाना राज्य के मद्देनजर प्रस्तावित राज्य का जो नक्शा तैयार किया है उसमें टीकमगढ, छतरपुर, सतना, रीवा, सीधी, पन्ना, सिंगरौली, सागर, दमोह, कटनी, उमरिया, शहडोल, जबलपुर रायसेन, नरसिंहपुर, अनूपपुर, डिंडोरी, मंडला, होशंगाबाद, छिंदवाडा, सिवनी, बालाघाट, बैतूल, और हरदा जिले शामिल किये हैं। अब देखना यह है गौंडवाना राज्य की मांग करने वाली यह पार्टी जनता को लामबंद कर पाती है या फिर बस चुनावी हथियार के तौर पर ही राज्य के मांग का उठाती रहती है।


राज एक्सप्रेस और पीपुल्स समाचार में संपादक रह चुके चैतन्य भट्ट फिलहाल स्वतंत्र पत्रकार के रूप में काम कर रहे हैं। वे तीस बरसों से पत्रकारिता में सक्रिय हैं।

बोगियों से टपकते खून के बीच बेरोजगार


देश के 2.50 लाख युवा  मात्र  416 पदों के मांगे गए आवेदन जमा करने 11 राज्यों से उत्तर प्रदेश के आइटीबीपी भर्ती केंद्र पहुंचे थे,जहाँ से लौटने के दौरान बीस छात्रों  की मौत हो गयी.छात्रों की इस मौत के लिए क्या कोई जिम्मेदार नहीं ....  

प्रतिभा कटियार

शाहजहांपुर के पास हिमगिरी एक्सप्रेस धधक रही थी.वही हिमगिरी एक्सप्रेस जिसकी छत से गिरकर खबरों की मानें तो अब तक 19छात्रों की मौत हुई है.खौफ, खतरे की आशंका, आधी-अधूरी जानकारियों के साथ घटनास्थल से बस जरा सी दूरी पर बिताये वो पांच घंटे कभी नहीं भूलूंगी.

खबरें मिल रही थीं. बरेली सुलग रहा था. इस शहर से जब-तब धुआं उठता रहता है इसलिए मानो सबको आदत सी थी. इस बार धुआं इतना गाढ़ा होगा किसी को अंदाजा नहीं था

रोजगार का सपना आंखों में लेकर आये छात्रों में से कइयों को नौकरी के बदले मौत मिली.ट्रेन की छत पर से लाशें बरस रही थीं. पूरी बोगी खून से लाल थी. मदद करने वाला कोई नहीं. अपने साथियों को यूं मरते देख बाकियों का खून खौल उठा.एसी बोगी से यात्रियों को उतारकर आग लगा दी गई. मातम, गुस्सा, निराशा, हताशा का वो खौफनाक मंजर. उफ!

भर्ती के लिए गए छात्रों के लौटने की  व्यवस्था

क्या कुसूर था उनका,जो मारे गये.क्या कुसूर था उनका,जिन्हें रोजगार के लिए बुलाकर लाठियों से पीटा गया. ये सब अभ्यर्थी भारत तिब्बत सीमा पुलिस (आईटीबीपी)की भर्ती के लिए आये थे.क्या कुसूर था उनका कि उन्हें नौकरी के बदले मौत मिली.

प्रशासन कहता है कि उसे अंदाजा नहीं था कि इतने लोग आ जायेंगे.यानी वाकई प्रशासन को अंदाजा नहीं था कि इस देश में बेरोजगारों की कितनी बड़ी तादाद है. 416 पदों के लिए 11 राज्यों से ढाई लाख अभ्यर्थी. उन्हें वाकई अंदाजा नहीं था कि इस देश में कितने सारे युवाओं के लिए नौकरी एक ख्वाब है, जिसके लिए वे कुछ भी कर सकते हैं. प्रशासन सचमुच कितना मासूम है.

लोगों का क्या है, वे तो मरते रहते हैं. इस देश की इतनी बड़ी आबादी में से कुछ लोग न सही. हमें ऐसे हादसों की आदत है.हम हादसों से जल्दी से उबर जाने का हुनर सीख चुके हैं.देखिये ना सब सामान्य हो रहा है.हादसे के बाद की सुबह यानी आज शाहजहांपुर रेलवे स्टेशन इतना सामान्य था कि मानो कुछ हुआ ही न हो. 

इस हादसे के बाद रेल मंत्रालय, गृह मंत्रालय और यूपी सरकार  के बयानों के बाद  सोचती हूं दोष उन युवाओं का ही था शायद जिन्होंने अपनी आंखों में एक अदद नौकरी का ख्वाब बुना.जो ख्वाब जिसने जिंदगी ही छीन ली.ऐसा हादसा पहली बार नहीं हुआ है. जाहिर है आखिरी बार भी नहीं. हम अपनी गलतियों से कभी सबक नहीं लेते. हादसों को बहुत जल्दी भूल जाते हैं.

....ओह मानव कौल का इलहाम तो छूट ही गया, जिसे देखने के लिए मैं जा रही थी. सॉरी मानव, आपके इलहाम पर अव्यवस्था का यह नाटक भारी पड़ा इस बार.


लेखिका और पत्रकार प्रतिभा  कटियार ने यह प्रतिक्रिया घटनास्थल से लौटकरअपने  ब्लॉग  प्रतिभा  की  दुनिया  पर  लिखा है. 





Feb 2, 2011

भाजपा को दलाल चाहिए और ससुर को स्टाम्प


राजनीति का अनुभव नहीं होने से जिला पंचायत अध्यक्ष रहीं रंजना देवी के ससुर चंदन राम और भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष को लगा कि वे दलित  महिला को रबर स्टाम्प बनाने में सफल रहेंगे. लेकिन रंजना ने उनके दबाव में काम करने से मना कर दिया तो  तिकड़ी  बिगड़ गयी...

नरेन्द्र देव सिंह

उत्तराखण्ड में दलितों की बढ़ते राजनीतिक प्रतिनिधित्व को वहां की राजनीति के सनातनी कब्जेदार रहे राजपूत और ब्राह्मण  पचा नहीं पा रहे हैं। अपनी राजनीतिक अपच मिटाने के लिए उन्हें जब दलित वर्ग से आये जन प्रतिनिधियों को हटाने का काई उपाय नहीं सूझ रहा तो सवर्णी एकता का मुकम्मिल सहारा ले रहे हैं,जिसमें सत्ताधारी भाजपा और विपक्षी कांग्रेस दोनों में लंगोटिया यारी निभ रही है। उसी यारी को बरकरार रखते हुए कांग्रेस और भापजा ने पिथौरागढ़ जिला पंचायत अध्यक्ष रंजना कुमारी को 19जनवरी को अविश्वास प्रस्ताव के जरिये हटाया है,जिसकी साजिश रंजना के ससुर ने रची है.

रंजना देवी :    नहीं बनी मोहरा

पूर्व जिला पंचायत अध्यक्ष रंजना देवी राजनीति में आने से पहले ग्रामीण परिवेश की घरेलू महिला थीं। उनको राजनीति का कोई अनुभव नहीं था। रंजना देवी के ससुर चन्दन राम भाजपा के कार्यकर्ता हैं व उनके पूर्व पंचायती राज्य मंत्री और भाजपा नेता बिशन सिंह चुफाल से अच्छे सम्बन्ध हैं। बिशन सिंह चुफाल वर्तमान में भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष है। चंदन राम ने अक्टूबर 2008में बिशन सिंह चुफाल के कहने पर रंजना देवी को जिला पंचायत अध्यक्ष बनने के लिए राजी कर लिया। इससे पहले रंजना देवी को आरक्षित सीट से जिला पंचायत सदस्य बनवा दिया था।

काफी ना-नुकर के बाद रंजना देवी जिला पंचायत अध्यक्ष बन गयी। आरम्भ में उन्हें न तो राजनीति का अनुभव था और ना ही सरकारी कामों का। चंदन राम रंजना देवी को रबर स्टाम्प बनाना चाहते थे। इसमें चंदन राम को भाजपा के वरिष्ठ नेताओं का भी आशीर्वाद था। शुरू में तो रंजना देवी ने अपने ससुर व भाजपा नेताओं के दबाव में काम किया। परन्तु धीरे-धीरे जब उन्हें अनुभव होने लगा तो उन्होंने उनके दबाव में काम करने से मना कर दिया। बस यहीं से कहानी बिगड़ गयी.

नियम के मुताबिक किसी जिला पंचायत अध्यक्ष के खिलाफ दो साल से पहले अविश्वास प्रस्ताव नहीं लाया जा सकता है। इसलिए जैसे ही दो साल बीते रंजना देवी के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव पारित कर दिया गया। असल में, चन्दन राम,किशन सिंह भंडारी (पूर्व जिला पंचायत अध्यक्ष) व बिशन सिंह चुफाल मिलकर जिला पंचायत को आवंटित पैसों की बंदरबांट करना चाहते थे। और इसके लिए रंजना देवी को मोहरा बनाना चाहते थे।

रंजना देवी ने बताया कि एक बार जब उनके ससुर से उनका झगड़ा हुआ तो उन्होंने यह बात बिशन सिंह चुफाल तक पहुंचायी। इस पर बिशन सिंह चुफाल ने उनसे कहा कि तुम अपने ससुर को प्रत्येक माह दस हजार रुपये दिया करो। तब रंजना देवी ने कहा कि मैं प्रत्येक माह दस हजार रुपया कहां से लाऊं जब कि मुझे साढ़े चार हजार माहवार ही मानदेय मिलता है। इस पर बिशन सिंह चुफाल ने कहा ‘यह तुम्हारा काम है‘  रंजना देवी पर उनके ससुर, किशन सिंह भंडारी आदि लोगों का दबाव बढ़ता जा रहा था। आरम्भ में अकुशल राजनीतिज्ञ होने के कारण तो सब ठीक था परन्तु जब वह काम सीख गयी तो उन्हें प्रताड़ित किया जाने लगा।

चुफाल की चाल: हो गयी कामयाब

पिथौरागढ़ जिला पंचायत अध्यक्ष रहीं रंजना कुमारी दलित हैं और उत्तराखंड में 2008 में संपन्न हुए जिला पंचायत चुनाव में भाजपा समर्थित प्रत्याशी के तौर पर पहली बार चुनाव लड़ीं और जीतीं.उत्तराखंड के इतिहास में ऐसा पहली बार है कि किसी जिला पंचायत अध्यक्ष को अविश्वास प्रस्ताव के जरिये हटाया गया है। इससे पहले पिछले महीने रामनगर जिला के क्यारी ग्राम पंचायत में एक दलित ग्राम प्रधान को अविश्वास प्रस्ताव के जरिये हटाने के साजिश रची गयी थी,पर वह असफल रही। दलित ग्राम प्रधान को अविश्वास प्रस्ताव के जरिये हटाने की कोशिश भी उत्तराखंड में पहली बार हुई थी। इस खबर को जनज्वार के लिए सलीम मल्लिक ने लिखा था,जिसे सवर्णों को मंजूर नहीं एक दलित शीर्षक से प्रकाशित  किया गया था। 

पूर्व जिला पंचायत अध्यक्ष किशन सिंह भंडारी ने एक बार रंजना देवी को जातिसूचक शब्दों के साथ उल्टा-सीधा कहा। रंजना देवी ने इसकी शिकायत भी बिशन सिंह चुफाल से की तब उन्होंने कहा कि ‘‘इसका सबूत लाओ।‘‘ रंजना देवी कहती हैं कि ‘‘प्रदेश में किसी महिला का शोषण होगा और यह लोग बस सबूत मांगेंगे।‘‘ रंजना देवी के ससुर ने एक बार उन्हें अपनी लाइसेंसी बंदूक का डर दिखाते हुए जान से मारने तक की धमकी दे दी थी। इस पर भी चुफाल ने सबूत मांगा।

रंजना के ससुर स्वयं सरकारी पैसों के गबन में लिप्त रहे। चंदन राम ठेकेदारी का काम करते हैं और उन्हें भाजपा नेताओं से पैसा मिलता है। रंजना देवी ने बताया ‘‘एक बार मेरे ससुर को मंदिर बनवाने के लिए नेताओं से पैसा मिला तो उसका गबन करके उन्होंने अपना मकान बना लिया।‘‘जब चंदन राम ने देखा कि बहू कठपुतली बनने से इंकार कर रही है तो उन्होंने रंजना देवी पर आरोप-प्रत्यारोप लगाने शुरू कर दिए। यह आरोप इतने गिरे हुए थे जिन्हें लिखा भी नहीं जा सकता।

इस पूरी कहानी में भाजपा नेता बिशन सिंह चुफाल व पूर्व जिला पंचायत अध्यक्ष किशन सिंह भंडारी ने जब देखा कि उनके स्वार्थ रंजना देवी के सहारे पूरे नहीं हो रहे हैं तो रंजना देवी को निशाना बनाना शुरू कर दिया। इस काम में किशन सिंह भंडारी ने बिशन सिंह चुफाल की मंशा को पूरा करने का जिम्मा लिया। किशन सिंह भंडारी ने रंजना देवी के ससुर के साथ मिलकर जिला पंचायत सदस्यों को अपने साथ मिलाना शुरू किया।

इसके बाद रंजना देवी पर तमाम आरोप लगाये। जैसे कि रंजना देवी सरकारी गाड़ी का दुरुपयोग करती हैं,जिला पंचायत की आवश्यक बैठकों को नहीं करतीं,धनराशि का दुरुपयोग करती हैं व जिला पंचायत अध्यक्ष भाई-भतीजावाद को बढ़ावा दे रही है। रंजना देवी सोचती रही कि बिशन सिंह चुफाल बड़े नेता हैं और उनके साथ इंसाफ करेंगे लेकिन बिशन सिंह चुफाल ने अविश्वास प्रस्ताव से कुछ दिनों पूर्व रंजना देवी को झूठा आश्वासन दिया कि वह पद पर बने रहेंगी। 16 जनवरी को संदेश भिजवा दिया कि इस्तीफा दे दो। रंजना देवी प्रदेश अध्यक्ष के इस रवैये से सकते में आ गयी।

आज रंजना देवी के साथ भाजपा का कोई भी नेता नहीं है। उनका साथ देने कोई भी जिला पंचायत सदस्य नहीं आया। सबको सत्ता का डर सता रहा है। रंजना देवी के दो बच्चे हैं। आज उनके पति व अन्य ससुराल वालों ने उनका साथ छोड़ दिया है। ऐसे में रंजना देवी अपने अकेले दम पर इन सब लोगों से मोर्चा ले रही हैं  और अपने साथ हो रहे अन्याय के खिलाफ लड़ रही हैं.


  लेखक पत्रकार हैं, उनसे  narendravagish@gmail.com  पर संपर्क किया जा सकता है.





Feb 1, 2011

जापान के सोका गक्कई की जाँच क्यों नहीं ?


करमापा के पास से बरामद चीनी मुद्रा को चीन की उस साजिश का हिस्सा माना जा रहा है,जिसके तहत चीन लद्दाख से अरुणाचल तक के सारे मठों पर करमापा के जरिये नियंत्रण करना चाहता था. कहीं  जापान भी सोका गक्कई के जरिये लोगो को बरगला कर वर्चस्व की कोई साजिश तो नहीं रच रहा ...

निशांत मिश्रा

विवादों में घिरे बौद्ध धर्म गुरु करमापा उग्येन त्रिनेल दोरजे के पास भारी मात्रा  में मिली विदेशी मुद्रा और उनके संदिग्ध आचरण ने अनेक सवाल खड़े कर दिए हैं.  इन सवालों में यह भी है कि कहीं धर्म की आड़ में देश की धार्मिक अस्मिता को छिन्न-भिन्न करने की साजिश तो नहीं।

बौद्ध धर्मगुरु करमापा और उनके मठ से बरामद 25देशों के सात करोड़ रुपए की विदेशी और भारतीय मुद्रा के मामले की तह में जाने के बाद ही हकीकत का खुलासा होगा,लेकिन फ़िलहाल उनके पास से बरामद 70लाख रुपए की चीनी मुद्रा 'युआन'ने उनके तार चीन से जोड़ दिए हैं। कयास लगाया जा रहा है कि करमापा कहीं चीनी जासूस तो नहीं। यहाँ इस बात की ओर ध्यान देना जरुरी है कि बौद्ध मठों में होने वाली गतिविधियों को कभी सरकारी या प्रशासनिक स्तर पर जांचने और जानने की कोशिश नहीं की गई। इसी का परिणाम है कि बौद्ध मठों या बौद्ध धर्म के नाम पर होने वाली गतिविधियों से देश के लोग अनभिज्ञ है।


 बौद्ध धर्म की आड़ में बौद्ध मठों की सक्रियता के अलावा एक और संगठन है जो देश में "बुद्धिज्म" के नाम पर विभिन्न धर्मावलम्बियों के बीच धीरे-धीरे अपनी गहरी पैठ बनाता जा रहा है। इस संगठन का सम्बन्ध जापान से है और इसका निशाना है देश का मध्यम व गरीब तबका। यहाँ इस संगठन के कार्यकलाप और गतिविधियों का खुलासा करना जरुरी है।

महात्मा बुद्ध और उनके सिद्धांतों का  पालन करते हुए उनके कुछ अत्यंत निकट रहे लोगों ने कुछ अवधारणायें स्थापित की,जिनका अनुसरण आज देश-विदेश मैं लाखों लोग कर रहे हैं। इन्ही में से एक हैं जापानी संन्यासी (भिक्षु) निचिरेन दैशोनिन. इन्होने  तेरहवीं शताब्दी में लोटस सूत्र (कमल के फूल) की अवधारणा स्थापित की थी । इस अवधारणा को विश्व में प्रचारित व प्रसारित करने का काम जापानी संगठन सोका गक्कई इंटरनेशनल (एसजीआई)कर रहा है । भारत में इसकी शाखा को भारत सोका गक्कई के नाम से जाना जाता है। जिस तरह तिब्बतियों के तीसरे सर्वोच्च धर्म गुरु करमापा के नाम को लेकर विवाद रहा है,ठीक उसी तरह जापानी भिक्षु निचिरेन दैशोनिन द्वारा स्थापित अवधारणा भी सदैव विवादित रही।

महात्मा बुद्ध के सिद्धांतों में लोटस सूत्र की अवधारणा का तात्पर्य यह है कि जिस तरह गंदगी में होने के बावजूद कमल का फूल उससे ऊपर निकल कर खिलता है,ठीक उसी प्रकार मनुष्य को इसमें सिखाया जाता है कि किस तरह समाज में व्याप्त गंदगी और बुराइयों से बचकर ऊपर निकला जा सकता है. मगर सोका गक्कई  अलग-अलग ढंग से प्रचारित करता  है और लोगों को अधूरा ज्ञान परोस कर दिग्भ्रमित किया जा रहा है. 

कमल के फूल को आठ शुभ प्रतीक में से एक माना गया है। इस अवधारणा से जुड़े लोग महात्मा बुद्ध के कमल पर बैठे या हाथ में कमल लिए हुए रूप कि कल्पना करते हैं। इस फूल को दिल की तरह माना गया है और इसमें रंगों को भी महत्व दिया गया है। जैसे सफेद: मानसिक और आध्यात्मिक पवित्रता, लाल: हृदय करुणा और प्रेम, नीला (ब्लू): बुद्धि और इंद्रियों पर नियंत्रण, गुलाबी: ऐतिहासिक बुद्ध और बैंगनी: रहस्यवाद।

लोटस सूत्र को लेकर चीन,जापान और कोरिया जहाँ सर्वाधिक बौद्ध धर्म अनुयायी हैं,भी एकमत नहीं हैं। इतिहासकारों का मानना है कि लोटस सूत्र के मूल पाठ खो गए, लेकिन भिक्षु कमारजिवा द्वारा चीनी में 406 सीई में किये गए एक अनुवाद को सही माना जा सकता है। मूल रूप से लोटस सूत्र संस्कृत सूत्र है या सद्धर्मा-पुंडारिका सूत्र। बौद्ध धर्म के कुछ स्कूलों में यह विश्वास कायम है कि यह ऐतिहासिक सूत्र बुद्ध के शब्द हैं। हालांकि,अधिकांश इतिहासकारों का मानना यह सूत्र पहली या दूसरी शताब्दी सीई में लिखा गया था। सोका गक्कई संगठन इन सबसे अलग यह मानता है कि लोटस सूत्र जापानी भिक्षु निचिरेन दैशोनिन द्वारा स्थापित अवधारणा है। संगठन द्वारा इस अवधारणा को "Human Revolution" का नाम देकर प्रचारित किया जा रहा है।

यहाँ पहले यह साफ कर देना जरुरी है कि "सोका गक्कई" क्या है? निचिरेन बुद्धिज्म पर आधारित बुद्ध महायान की एक शाखा "सोका गक्कई" वस्तुत: एक ऐसा सिद्धांत या धार्मिक आन्दोलन है जिसके जरिये एक ऐसे समुदाय का निर्माण करना है जिसकी बौद्ध धर्म में विशेष आस्था हो। विश्व के 192 देशों और राज्यों में सोका गक्कई इंटरनेशनल के करीब 12लाख सदस्य हैं। ऐसा इस संगठन का दावा है। विलुप्त हो चुके निचिरेन बुद्धिज्म पर आधारित "सोका गक्कई" को 1930 में जापानी शिक्षक त्सुनेसबुरो माकीगुची ने संस्थापित किया।

द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान सरकार समर्थित राज्य शिन्तो के विरोध के कारण इस संगठन को दबा दिया गया और "आपराधिक सोच"के आरोपों में माकीगुची को जोसी तोडा व अन्य सोका गक्कई नेताओं सहित 1943 में गिरफ्तार कर लिया। नवम्बर 1944 में जेल में ही कुपोषण के कारण माकीगुची का 73साल की उम्र में देहांत हो गया। जापान में हुए पहले परमाणु हमले से कुछ सप्ताह पहले जुलाई 1945में तोडा को रिहा किया गया। आने वाले वर्षों में तोडा संगठन के पुनर्निर्माण में जुट गए। 1958 में अपने निधन से पहले करीब 7,50000 लोगों को उन्होंने इसका सदस्य बना लिया था।


यहाँ सवाल किसी अवधारणा या सिद्धांत के विरोध का नहीं है,बल्कि यह है कि जब यह बौद्ध धर्म को प्रचारित और संस्थापित करने का आन्दोलन है तो फिर इसे मात्र एक सिद्धांत या अवधारणा क्यों कहा जाता है? क्यों इसके जरिये लोगों को काल्पनिक उदाहरण   देकर उनका माइंड वाश किया जा रहा है?क्यों नहीं इससे जुडने वाले लोगों को स्पष्ट किया जाता कि शांति, शिक्षा और सांस्कृतिक आदान-प्रदान के नाम पर यह सब विश्व व्यापी बौद्धधर्मी आन्दोलन का एक हिस्सा है? "Human Revolution" का नाम देकर जिस तरह इसको प्रचारित किया जा रहा है वह मानवीय क्रांति वास्तव में एक ऐसे समुदाय के निर्माण करने की प्रक्रिया है जिसमें बौद्ध धर्म के प्रति विशेष आस्था हो। अगर यह मात्र एक सिद्धांत या अवधारणा ही है तो क्यों जापान में जहाँ इसके सबसे ज्यादा अनुयायी हैं, वहां "सोका गक्कई"लीडर्स को जेल में डाल दिया गया और उन पर आपराधिक सोच या विचारों का आरोप लगा?
देश के अनेक हिस्सों में लोगों को दिग्भ्रमित कर कभी इस धर्म द्वारा तो  कभी उस धर्म द्वारा धर्म परिवर्तन  के मामले पहले भी उजागर हुए है। इसलिए एक सवाल यह भी उठता है कि कहीं यह कोई सोची समझी साजिश तो नहीं धर्म परिवर्तन की। क्योंकि इस अवधारणा से जुड़े लोगो को अपने घर में इस अवधारणा से सम्बंधित मंदिर जैसा स्थान बनाने के प्रेरित किया जाता है. साथ ही उनको कहा जाता है कि यह एक अवधारणा मात्र है कोई धर्म नहीं। धर्म को अवधारणा के नाम का चोला ओढाया जा रहा है? इसकी जाँच आवश्यक है।

आज हर धर्म व समाज मीडिया से नजदीकियां चाहता है तो फिर "सोका गक्कई "से जुड़े लोग क्यों मीडिया या आम लोगों से बात करने में कतराते हैं। सबसे बड़ी बात यह कि इस अवधारणा में अधिकतर ऐसे लोगो को जोड़ा जाता है जो आर्थिक,मानसिक या शारीरिक रूप से से कमजोर हों। उन्हें बताया जाता है कि इस अवधारणा से जुड़ने के बाद उनकी ये सब परेशानी दूर हो जाएगी,लेकिन हकीकत कुछ और ही होती है।

करमापा के पास से बरामद चीनी मुद्रा युआन को चीन की उस साजिश का हिस्सा माना जा रहा है,जिसके तहत चीन भारत के लद्दाख से अरुणाचल तक के सारे मठों पर करमापा के जरिये नियंत्रण करना चाहता है,ठीक उसी तरह जापान भी हमारे देश में सोका गक्कई के जरिये लोगो को बरगला कर अपना वर्चस्व स्थापित करने की कोई साजिश रच रहा है? देश में सोका गक्कई की गतिविधियों के संचालन के लिए पैसा कहाँ से और किन लोगों के पास आ रहा है,यह भी जाँच का विषय है।



पत्रकार निशांत मिश्रा पिंकसिटी प्रेस क्लब जयपुर के पूर्व  उपाध्यक्ष हैं, उनसे  journalistnishant26@gmail.com संपर्क  किया  जा  सकता  है.






झूठी ख़बरों का नया खबरची


स्वाभिमान टाइम्स की इस प्रवृत्ति को परखने के लिए उसके विज्ञप्ति को देखा जा सकता है जिसमें लिखा है, '...बड़ी-बड़ी हस्तियों से संपर्क रखने वाले संपादकीय सहयोगियों की  जरूरत है...
 


दिल्ली से निकलने वाले अखबार स्वाभिमान टाइम्स ने 27 जनवरी  को पहले पन्ने पर वामपंथियों को अपराधी और लुटेरे बताते हुए खबर छापी। खबर में कांग्रेस के वरिष्ठ नेता और केंद्रिय मत्री प्रणव मुखर्जी के कथित बयान के हवाले से कि वामपंथी अपराधी और लुटेरे होते हैं,एक पूरी बहस करने की कोशिश की गई है। अखबार के रिपोर्टर राम प्रकाश त्रिपाठी ने कई लोगों के बयानों के साथ वामपंथियों को अपराधी और लुटेरे पुष्ट करने की कोशिश की है।

इस खबर पर आपत्ती करने और गंभीरता से इसलिए सोचने की जरुरत है कि अव्वल तो प्रणव मुखर्जी का ऐसा कोई बयान देश भर के किसी भी जनसंचार माध्यम में देखने को नहीं मिला सिवाय स्वाभिमान टाइम्स के, जो कि एक नया अखबार है और जिसका सर्कुलेशन दिल्ली और एनसीआर के बाहर कहीं नहीं है। ऐसे में सवाल उठता है कि आखिर इस खबर को तथ्यों की पुष्टि न कर पाने का रिस्क उठाते हुए भी इस अखबार ने खबर को अपने पहले पन्ने पर क्यों छाप दिया।


दरअसल अब मीडिया की स्वाभाविक परिणति हो गयी है कि  वो अपने  माध्यम से सरकार और उसकी नीतियों से नत्थी करके अपने आगे के हितों  को और सुरक्षित करे। जिससे सरकारी अमले से कम रिश्वत में अपना काम निकलवा सके। यह काम बड़े  अखबार रोज-ब-रोज खूब करते हैं पर बहुत ही शातिर परिपक्वता के साथ। क्योंकि उनके रिपोर्टर इस विधा के पुराने खिलाड़ी होते हैं और अपनी इसी विधा की मेरिट पर आज वे देश के कई राष्ट्रीय  अखबारों में संपादक भी हो गए हैं।

रामप्रकाश त्रिपाठी भी इसी विधा के प्रशिक्षु लगते हैं। जिन्होंने इक्सक्लूसिव खबर बनाने के लिए एक पूरे झूठे बयान की ही कहानी ही गढ़ दी जिसे न तो किसी ने कहा था न किसी ने सुना था। दरअसल इस तरह की मानसिकता जल्दी से ज्यादा कमाई के चूहा दौड़ में शामिल पत्रकारों में तेजी से बढ़ती जा रही है. जिसमें सबसे ज्यादा नुकसान पत्रकारिता ओर खबरों को हो रही है. 

स्वाभिमान टाइम्स की इस प्रवृत्ति को परखने के लिए उसके संपादक निर्मलेन्दु साहा की एक पोर्टल पर विज्ञप्ति को देखा जा सकता है जिसमें उन्होंने लिखा -‘‘नया रूप, नई सज्जा, नए तेवर और कलेवर के साथ राजधानी दिल्ली से प्रकाशित होने वाले राष्ट्रीय दैनिक समाचार-पत्र ‘स्वाभिमान टाइम्स’ को योग्य, कुशल, अनुभवी और बड़ी-बड़ी हस्तियों से संपर्क रखने वाले संपादकीय सहयोगियों (उप-संपादकों,वरिष्ठ उप-संपादकों,मुख्य उप-संपादकों)  के अलावा, संवाददाताओं और फोटो पत्रकारों की जरूरत है।’

इन पंक्तियों से इस रिपोर्ट की सचाई को समझा जा सकता है कि किस तरह ऊंचे संपर्क वाले रिपोर्टर ने ऊंचे संपर्क वाले संपादक के लिए खबर लिखी होगी.

जर्नलिस्ट यूनियन फॉर सिविल सोसाइटी के  मानिटरिंग सेल द्वारा जारी।


Jan 31, 2011

बंधुवर परेशान हैं !


बंधुवर वकीलों को गणेश शंकर विद्यार्थी  से लेकर इमरजेन्सी आंदोलन में पत्रकारों का इतिहास- भूगोल बता डाले, लेकिन ये वकील भी...

निखिल आनंद

अबतक सियासी किस्सागोई और बहस का कारण बंधुवर बनते रहे हैं, लेकिन नवलेश की गिरफ्तारी के बाद इन दिनों बंधुवर ही खासे चर्चा में हैं। बंधुवर करना तो बहुत कुछ चाहते हैं, लेकिन डरते हैं कि ज्यादा बोले तो अगला नंबर उनका न हो। अब बंधुवर नौकरी बचाएं कि आंदोलन बचाएं, दुविधा में पड़े हैं। हालत ये है की अब तो राह चलते लोग मजाक उड़ाने लगे हैं कि जैसे पत्रकार न हुए कोई अपराध हो गया।

अब कुछ दिनों पहले की ही बात है, बंधुवर हाईकोर्ट गये प्रतिक्रिया लेने कुछ वकीलों की। मामला था सुप्रीम कोर्ट ने बिहार की निचली अदालतों की कार्यप्रणाली सुधारने के बारे में टिप्पणी की थी। वे प्रतिक्रिया लेते, उससे पहले ही वकीलों ने बंधुवर से पूछ लिया कि भाईजी का क्या हाल है? बंधुवर पहले तो समझे ही नहीं, तो वकील साहब ने कहा-'अरे वही आपके नवलेश भाई। देखिये,खबर आपलोग बहुत छापते हैं। जरा संभल के रहियेगा की अगला नंबर आप ही का न हो।'

 दूसरे वकील साहब ने कहा, 'बंधुवर! मणिपुर की खबर पता है न, 30 दिसम्बर 2010 को एक संपादक की गिरफ्तारी हुई तो मणिपुर में अखबार ही नहीं छपा।'बंधुवर को खबर का पता ही नहीं था, तो भौचक रह गए। वकील साहब ने कहा की 'गूगल' पर जाकर खोजिये मिल जायेगा। बंधुवर फजीहत होते देख कहते हैं- ऐसा नहीं है जनाब, हमारे साथियों ने पूर्णिया और फतुहा में विरोध-प्रदर्शन किया है।

वकील साहब ने कटाक्ष किया-'भाई बिहार की पत्रकारिता की धुरी पटना से हैंडल होती है। ये तो गजब हो गया है कि पटना में नवलेश के मसले पर विरोध और सड़क पर उतरना तो दूर, कोई लिखने को भी तैयार नहीं है। लगता है कि आपलोग भी भोंपू बनते जा रहे हैं। बंधुवर ने वकीलों को गणेश शंकर विद्यार्थी, हजारी प्रसाद द्विवेदी से लेकर इमरजेन्सी आंदोलन में पत्रकारों का इतिहास- भूगोल बता डाला। लेकिन ये वकील भी पता नहीं किस जनम का बैर मिटा रहे थे।

वकीलों ने  बंधुवर को फिर धर-लपेटा, ' भाई! हमारे वकालत में छेद देखने आये हैं। अपने दुकान में देखिये, ये आप ही लोग हैं जनाब जो छोटी कुर्सियों को सत्ता का केन्द्र बनाते हैं। सत्ता से गठजोड़ कर सदन पहुँचने की कला आप ही लोग बेहतर जानते हैं।'

जान बचते न देख बंधुवर थोड़ा  आदर्शवादी होकर कहते हैं- 'अब पहले वाली बात नहीं है, लोकतंत्र के सभी खम्बे नैतिकता के मसले पर सवालों के घेरे में हैं।' वकील साहब गुस्साए-'अब अपना छेद छुपाने के लिए सबको मत लपेटिये। मुखौटे के पीछे क्या है, सब पता है । सत्ता की चाटुकारिता और चापलूसी से गांवों में ठेकेदारी कराने के किस्से भी मशहूर हैं। नीरा राडिया के बहाने तो दलाली में शामिल आपके मीडिया के मठाधीशों  के चेहरे पहले ही बेनकाब हो चुके है।'

बाप-रे-बाप! जिंदगी में इतनी फजीहत किसी लंगोटिया दोस्त और खानदानी दुश्मन ने भी बंधुवर की नहीं की थी। वकीलों के व्यंग्य-बाण से घायल बंधुवर सोचने लगे, नवलेश के मसले पर वाकई सब चुप हैं। एक दिन बंधुवर ने जोश में आकर अपने सहयोगियों को फोन किया कि 'भाई ये तो गजब हो गया है। अब तो पत्रकारों की भी शामत आ गई है। हमें कुछ करना चाहिये, सो कल 2 बजे बैठक में आइयेगा। नवलेश के मसले पर आंदोलन खड़ा करना है।' बंधुवर पहुँचे तो बैठक स्थल पर अकेले पहले आदमी थे। दो घंटे बैठे तो कुल जमा चार  लोग पहुँचे। अब बंधुवर ने थककर कहा कि 'चलिये अपने बड़े श्रमजीवी बंधुओं से मुलाकात कर एक प्रेस रिलीज निकालते हैं।'

तब तक सीबीआई इन्क्वारी की खबर आई तो बड़े बंधु ने फोन किया  'बंधुवर अब खुशी मनाईये, आपकी बात मान ली गई है।' बंधुवर ने पूछा कौन सी भईया।'तो महोदय ने खुशी से उछलते हुए कहा 'बंधुवर नीतीशजी ने सीबीआई इन्क्वारी की घोषणा कर दी है। अब तो आप खुश हैं न... अब तो प्रेस रिलीज निकालने की भी जरूरत नहीं पड़ेगी।'

फोन कट चुका था और बंधुवर हाथ में रिसीवर पकड़कर उसे झुनझुने की तरह हिला रहे थे।


(लेखक निखिल आनंद टीवी पत्रकार हैं. फिलहाल 'इंडिया न्‍यूज बिहार' के राजनीतिक संपादक  हैं. उनसे nikhil.anand20@gmail.com   पर संपर्क किया जा सकता है .)