Jan 1, 2011

नया साल मुबारक हो !



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शुभकामनाओं के साथ  
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Dec 31, 2010

दगा दे गयी माओवादी दाग छुड़ाने की तरकीब

बिनायक सेन की जेल से रिहाई के लिए चलाए गए आंदोलन में इसी बात पर जोर दिया गया कि वह माओवादी नहीं है,अहिंसावादी हैं। जज शायद इन तर्कों में छिपे फांफड़ को देख लिया था और बिना साक्ष्य के भी यह सिद्ध कर दिया कि बिनायक सेन माओवादी हैं...

अंजनी कुमार


विनायक  सेन  के समर्थन में चंडीगढ़ में प्रदर्शन
‘यह न्याय नहीं है बल्कि द्वेष से भरी एक अन्यायपूर्ण सजा है। यह सजा एक ऐसे अहिंसावादी मानवाधिकार कार्यकर्ता को दी गयी है जिसने जनता के अधिकारों के हनन को चुनौती दी....फैसला देश की लोकतांत्रिक बुनावट पर एक क्रूर हमला है।’ मेधा पाटकर के इस बयान से क्या यह निष्कर्ष निकाला जाय कि अहिंसावादी सरकार के लिए अपराधी नहीं होते हैं? क्या इससे यह निष्कर्ष निकाला जाय कि माओवादी अपराधी इसलिए हैं कि वे हिंसावादी हैं?

तब क्या अपराध का प्रश्न हिंसा-अहिंसा से जुड़ा हुआ है?तब यह इस बात को याद कर लेना जरूरी है कि ब्रिटिश हुकुमत वाले भारत में गांधी जी व शहीद भगत सिंह दोनों ही बहुत से मामलों में अपराधी ठहराए गए। आज हम दोनों को ही महात्मा व शहीद ए आजम के रूप में याद करते हैं। ठीक ऐसा 1857 के गदर को याद करते हुए करते हैं। तब क्या यह माना जाय कि अपराध का प्रश्न व्यवस्था से जुड़ा हुआ है? निजाम ए कोहना से जुड़ा हुआ है? न्याय की पीठ पर बैठे सैययादों से जुड़ा है?

अनुभव तों यही बता रहे हैं,विश्लेषण हमें वहीं पहुंचा रहे हैं,विमर्श का निष्कर्ष यहीं पहुंच रहा है। लेकिन कॉमन सेंस अभी भी कुछ और बना है। जिसके चलते बिनायक सेन को रायपुर की स्पेशल कोर्ट द्वारा दिये गए आजीवन कारावास की सजा के खिलाफत में इस तरह के हजारों बयान,लेख लगातार छपते ही जा रहे हैं।

बिनायक सेन के साथ नारायण सान्याल व पीयूष गुहा को भी आजीवन कारावास की सजा दी गई। बल्कि इस बात को यूं कहना ठीक होगा कि बिनायक सेन को सजा ही इस बात से हुई कि वह नारायण सान्याल व पीयूष गुहा के साथ उनके संबंध एक गवाह के बयान के आधार पर सिद्ध हुए और जज के अनुसार यह स्वयंभू साक्ष्य था कि वे दोनों सीपीआई-माओवादी पार्टी के सदस्य थे। इस कारण से स्वभावतः गुनहगार थे।

ऐसा लगता है कि इन दोनों की गुनहगारी को अपने देश की बुद्धिजीवियों की सोसायटी की बहुसंख्या पहले से ही स्वीकार कर चुकी थी। शायद यही कारण था जिसके चलते बिनायक सेन की जेल से रिहाई के लिए चलाए गए आंदोलन में इसी बात पर जोर दिया गया कि वह माओवादी नहीं है,अहिंसावादी हैं,आदि आदि। जज शायद इन तर्कों में छिपे फांफड़ को देख लिया था और बिना साक्ष्य के भी यह सिद्ध कर दिया कि बिनायक सेन माओवादी हैं। उसने दो ‘हार्डकोर नक्सलाइटों’शंकर सिंह व अमिता श्रीवास्तव का जिक्रकर बिना मुकदमा ही उनका अपराध घोषित कर दिया। जाहिर है एक संकरे रास्ते को जज ने हाइवे बना दिया जिस पर से देशद्रोही,अपराधियों को सरपट दौड़ाया जा सकता है।

प्रतिरोध के हर स्वर को आंतकवादी,नक्सलाइट, माओवादी घोषित कर लैंड ऑफ रूल पर अब लाखों लोगों का मार्च पास्ट करा देने के लिए शासक वर्ग के पास एक नायाब रास्ता हासिल हो चुका है। जबकि सिविल सोसायटी की बहुसंख्या अभी भी साक्ष्य की लकीर पीटने में मशगूल है। सच्चाई यह है कि न्यायपालिका में साक्ष्य के संवैधानिक व दंड संहिता के प्रावधान को अनगिनत बार धज्जी उड़ाते हुए बाहर फेंक दिया गया और जज ने ‘संप्रभु साक्ष्य’गढ़े और न्याय वही सुनाया जिसे प्रभुत्वशाली वर्ग सुनना चाहता था। मसलन, राम का जन्म व जन्म स्थान संप्रभु साक्ष्य है, सवर्ण दलित स्त्री को नहीं छू सकता यह संप्रभु साक्ष्य है, बारा हत्याकांड में रात के अंधेरे में 16 दलित लोगों को पुलिस कांस्टेबल द्वारा पहचान लेना स्वभाविक साक्ष्य है और व्यापारी अनिल कुमार सिंह द्वारा दिया गया बयान 1872 अधिनियम के तहत साक्ष्य है।

दरअसल न्याय ने अपने पाठ का अर्थ बदल दिया है। उसने शब्दों के निहितार्थ बदल दिए हैं। इसने अपने क्षेत्र को इतना विस्तारित किया है कि उसका चौखटा हमारे घरों के भीतर घुस आया है और उसका हथौड़ा सीधा हमारे सिर के उपर गिर रहा है ---सजा की तरह और धमकी की तरह भी। 1947 से आज तक देश की सुरक्षा के नाम केन्द्रिय स्तर पर 16 वैधानिक प्रावधान पारित हो चुके हैं। इसमें राज्य स्तरीय विधानों को जोड़ दिया जाय तो गिनती सैकड़ा पार कर जाएगी। मीसा,टाडा, पोटा, यूएपीए व राज्य स्तरीय छत्तीसगढ़ विशेष जन सुरक्षा अधिनियम, मोकोका जैसों से हम ज्यादा रूबरू हुए।

यही वे कानून हैं जिसके तहत कम्युनिस्टों,मुसलमानों,दलित-आदिवासीयों,कश्मीर व उत्तर-पूर्व की राष्ट्रीयताओं और यहां तक कि समय समय पर अपने राज्य व भाषा की पहचान की मांग करने वालो के खिलाफ राज्य की सुरक्षा की बंदूक से बच रहे लोगों के खिलाफ न्याय के विशेष अभियान के तहत प्रयोग किया गया।पत्रकारों,मानवाधिकार-सामाजिक कार्यकर्ताओं,असहमत राजनीतिक व बौद्धिक लोगों के खिलाफ इन्हीं के तहत बूट की नकेल का प्रयोग किया गया। आज बहुत से सयाने बन गए लोग इन्हीं क्रूरताओं से होकर-भोगकर निकले हैं। इसी के तहत ही अंतराष्ट्रीय स्तर की वामपंथी पत्रिका ‘ए वर्ल्ड टू विन’के हिन्दी संस्करण के संपादक असित सेन गुप्ता को गुनहगार ठहराकर आठ साल की सजा सुनाई गई। उन्हें भी बिनायक सेन की तरह के साक्ष्यों के आधार पर जज ने सजा मुकर्रर कर दी।

जिन साक्ष्यों के आधार पर असिल सेन गुप्ता को सजा दी गई उससे इस देश की हजारों पत्रकार, लेखक, बुद्धिजीवी, अकादमिशियन आदि सैकड़ों बार जेल की हवा खाने और जजों के न्याय के हथौड़े की मार सहने के लिए तैयार रहना होगा। यही वे कानून हैं जिनके अस्तित्व में आने के साथ ही इस देश की संघीय समाजवादी लोतांत्रिक जनवादी संवैधानिक व कानून आधारित न्यायपूर्ण जीवन के पाठ का अर्थ बदल गया। राजनीति में ‘जन’ एक ऐसी वैधानिक शब्दावली में बदल गया जिसका वास्तविक अर्थ ‘अभिजन’ ही निकलता है। ‘देश’ पाश के शब्दों में जांघिए का नाड़े का पर्यायवाची में बदल गया जिसके प्रयोग प्रतिरोध व अभिव्यक्ति का गला घोंट देने किया जाने लगा। और ‘भारत’ फासिस्ट हिन्दुत्ववादियों के लिए ढाल व तलवार और आग में बदल गया। ‘धर्म निरपेक्षता’से चिरायंध गंध आने लगी और कानून-व्यवस्था का अर्थ लोमड़ों का आशियाना बन गया जहां से गैरबिरादरों को साबूत नहीं लौटना है।

मेधा  पाटेकर बिनायक सेन के पक्ष में सोलहो आने ठीक दलील देती हैं कि बिनायक सेन अहिंसावादी हैं। लेकिन बिनायक सेन हिंसक हैं यह कहकर उन्हें सजा नहीं दी गई। उन्हें तो इस देश की वर्तमान व्यवस्था को पलट देने व इसके खिलाफ षडयंत्र करने के लिए सजा ए आजीवन कारावास दिया गया। इसी के तहत पीयूष गुहा,असित सेनगुप्ता व नारायण सान्याल को सजा दी गई। अब तक हजारों लोग इसी के तहत सजा भुगतते जा रहे हैं। तब क्या यहां मसला हिंसक-अहिंसक होने का है? क्या हिंसक हो जाने से ही अपराध तय हो जाता है और अहिंसक अपराधी ही नहीं होते?अपने देश में राजनीतिक हिंसा में मरने वालों की संख्या प्रतिवर्ष सैकड़ा के उपर है और इसके लिए संसदीय राजनीतिक पार्टियां जिम्मेदार होती हैं। तब क्या इसके लिए इन पार्टियों के नेतृत्व प्रकाश करात,बुद्धदेव भट्टाचार्य, ममता बनर्जी, जय ललिता, सोनिया गांधी, लालकृष्ण आडवाडी, मुलायम सिंह, चंद्रबाबू नायडू, आदि आदि जिम्मेदार ठहराए जाते हैं? यह दिगर बात है कि बुद्धिजीवी  सोसायटी का एक बड़ा हिस्सा मोदी को छोड़ किसी को भी इस दायरे में घसीटने से बचता हैं।

इसी तरह किसी भी संसदीय पार्टी का कार्यक्रम वर्तमान व्यवस्था के संविधान व कानून के अनुरूप नहीं है। इनके बीच एका सिर्फ इस विदेशी पूंजी व देश के पूंजीपतियों, जमींदारों, बड़ी जमीन के मालिकों, व्यापारियों आदि के पक्ष में खड़ा होने को लेकर है। कई इससे भी सहमत नहीं हैं। एक बार फिर यह सवाल बनता है कि चल रही व्यवस्था की खिलाफत भी अपराध नहीं है तब अपराध क्या है!अपने देश में बहुत पहले से ही सीविल सोसायटी ने न्याय व्यवस्था को अस्वीकार करते हुए सामांनांतर जन सुनवाई व न्याय की प्रक्रिया को अपना लिया था और अब तो यह एक रोजमर्रा की बात है। यह भी माओवादियों की इजाद व्यवस्था नहीं। ठेठ दिल्ली में कांस्टीट्यूशनल क्लब के भवन में न्याय की जन व्यवस्था यानी जनसुनवाई की जाती है।

यदि सामानांतर व्यवस्था की बात करना ही नहीं बल्कि व्यवहार में एक हद तक उसे उतारना भी अपराध नहीं है तब प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के आंतरिक सुरक्षा के राग का वास्तविक अर्थ क्या है?भगवा फासिस्टों की देश की अखंडता का निहितार्थ क्या है? और सीपीएम के हिंसक अराजकतावादियों के खिलाफ अभियान के पीछे की सोच क्या है? क्या इसलिए कि ‘आतंकवादियों’ व नक्सलाइटों के पास सेना या गुरिल्ला है?यह बात भी सच् नहीं लगती क्योंकि यह सब कुछ तो संसदीय राजनीतिक पार्टियों के पास है और और तो और इन धर्म के पुजारियों, निरंकारियों के पास भी यह सब कुछ खुलेआम है। रही बात इस व्यवस्था से असहमत होने व इसे बदल देने की तो यह मांग आम हो चुकी है और संसद के भीतर व बाहर,अकादमी से भीतर व बाहर, हर जगह चल रही है।ऐसे में बुद्धिजीवी सोसायटी की बहुसंख्या जब बिनायक सेन माओवादी नहीं है, के आधार पर संघर्ष शुरू करती है तो इससे स्वभावतः यह साबित हो जाता है कि जेलों में बंद माओवादी-नक्सलवादी अपराधी ही हैं।

न्याय के विमर्श में यह एक अद्भुत परिघटना है जो कोर्ट के भीतर ही नहीं हमारे बीच भी तय किया जा रहा है कि माओवादी अपराधी हैं और यही बात तो अदालत भी कह रही है। विनायक की सजा का आधार भी यही है। यह बहस कि एक नागरिक समाज में यूएपीए जैसा कानून वैध है या नहीं,राजनीतिक सामाजिक परिघटनाओं का कोई ऐतिहासिक, तात्कालिक कारण व उसकी प्रासंगिकता है या नहीं, आदि आदि सवालों से टकराए बिना ही कॉमन सेंस के आधार पर बुद्धिजीवी सोसायटी के विमर्श का नतीजा एक खतरनाक निष्कर्ष तक जा रहा है कि दरअसल, विनायक सेन माओवादी नहीं है।

हिंसा सामानांतर व्यवस्था की बात करना, सामानांतर कोर्ट खड़ा करना,सेना बना लेना, अपराध नहीं है तब इस व्यवस्था में अपराध क्या है?या यूं कहें कि बिनायक सेन व माओवादियों का और यहां तक कि गांधीवादियों का अपराध क्या है?बिनायक सेन एक ऐसी अस्पताल व्यवस्था से जुड़े जो आदिवासियों व मजदूरों के लिए बनाई गई थी। जिसकी स्थापना मजदूर नेता शंकर गुहा नियोगी ने की थी। एक डाक्टर के पेशे के तहत वे आदिवासियों की रिहाइशों की तरफ बढ़े और उनके जीवन के भौतिक उत्पादन व रहन सहन की बदहालियों को समझते हुए रोग व जीवन को दुरूस्त करने के प्रयास में लग गए।

विनायक सेन ने आदिवासियों की संपदा की लूटपाट और उन्हें उजाड़ने के षडयंत्रों को समाज के सामने रखना शुरू किया। खनिज, जमीन, बीज, जल और उनके श्रम की लूट की खिलाफत का अर्थ बहुराष्ट्रीय-राष्ट्रीय पूंजीपतियों की लूट को रोकना था। बिनायक सेन मानवीय जीवन के मौलिक अधिकारों के सवालों को एक संदर्भ देकर उसे न केवल हमारे बीच, सरकारी-गैरसरकारी संस्थानों के बीच बल्कि आदिवासियों के बीच एक बहस को केन्द्र में ला रहे थे कि इस कथित विकास की नीति में मनुष्य कहां है।

इसलिए यहां सवाल बिनायक सेन या वनवासी चेतना आश्रम के प्रमुख हिमांशु के हिंसक होने या न होने का नहीं है बल्कि उस प्रक्रिया का है जिसकी वजह से छत्तीसगढ़ में केंद्र और राज्य सरकार की जनविरोधी नीतियों का विश्वस्तर पर पर्दाफाश हो रहा है। इस प्रक्रिया में हजारों बुद्धिजीवी शामिल थे जिनके प्रभाव से सूदूरवर्ती क्षेत्रों के साथ-साथ शहरों में भी प्रतिरोध की चेतना तेजी से एक रूप ले रही थी। गांव व आदिवासी जीवन,शहरों में मजदूरों के प्रति युवा वर्ग का बढ़ता आकर्षण ही वह पक्ष था जिसके चलते चिदम्बरम को घबड़हाहट है।

अदालत में सरकारी वकील ने बिनायक सेन को और पीयूसीएल को सीपीआई-माओवादी का घटक सिद्ध करने की इस आधार पर कोशिश की गयी कि दोनों ही छत्तीसगढ़ के माओवाद वाले क्षेत्रों से सीआरपीएफ के वापसी की मांग करते हैं।

कुछ साल पहले राजस्थान के किसानों के हिंसक आंदोलन,गुर्जरों के आरक्षण की मांग में उठा हिंसक संघर्ष, हाल ही में अलीगढ़ के किसानों के आंदोलन में माओवादियों के हाथ होने की शंका जाहिर की गई। किसी भी जगह जनता द्वारा रेडिकल बात करने का अर्थ माओवादी होना हो गया। हजारों लोगों को इसी आरोप के तहत यूएपीए,विशेष सुरक्षा अधिनियमों के तहत जेलों में बंद करने की प्रक्रिया अभी भी जारी है। इसलिए यहां मूल सवाल एक ऐसी परिघटना से है जिससे वर्तमान साम्राज्यवादी-पूंजीवादी व्यवस्था वैधानिकता खोने लगती है,साम्राज्यवादी-पूंजीवादी व्यवस्था के चल रहे सामाजिक ढ़ांचे को अंदर से तोड़ने लगती है।

ऐसे में यह बात उठाना बहुत जरूरी है कि क्या साम्राज्यवादी-पूंजीवादी व्यवस्था की वैधानिकता पर सवाल ही अपराध है? क्या साम्राज्यवादी-पूंजीवादी विकास की नीति व कारपोरेट प्रबंधन की राजनीति के सामने समर्पण ही एक मात्र विकल्प है?क्या यह देश चंद दस करोड़ लोगों का है जिसमें शामिल होने के लिए भेड़ियाधसान किया जाय? जाहिरा तौर पर देश का संविधान भी यह बात नहीं कहता है। न्याय की व्याख्या भी इसकी अनुमति नहीं देती। इसलिए जरूरी है कि न्याय की तराजू में तय किए गए अपराध के पाठ का पुनर्पाठ किया जाय,उसके विमर्शों को बदला जाय और सवाल उठाया जाय कि नक्सलाइट, माओवादी का पर्याय अपराध कैसे है?


(लेखक  स्वतंत्र पत्रकार और सामाजिक-राजनितिक कार्यकर्त्ता हैं. उनसे anjani.dost@yahoo.co.in   पर संपर्क किया जा सकता है.)

Dec 30, 2010

पीयूसीएल अध्यक्ष कन्नाबिरन नहीं रहे


जनज्वार टीम. मानवाधिकार संगठन पीयूसीएल के राष्ट्रीय अध्यक्ष और प्रसिद्ध मानवाधिकार कार्यकता केजी कन्नाबिरन की कल शाम  साढे़ छह बजे हैदराबाद स्थित उनके आवास पर निधन हो गया। पेशे से वकील रहे 81 वर्षीय कन्नाबिरन के परिवार में उनकी पत्नी बसंता, दो बेटियां कल्पना, चित्रा और बेटा अरविंद हैं।

मानवाधिकार के राष्ट्रीय दूत कहे जाने वाले कन्नाबिरन पिछले पांच दशकों से नागरिक अधिकारों के लिए संघर्षरत थे। हमारे बीच से कन्नाविरन का चले जाना एक ऐसे दीपक का बुझना है जो हमेशा लोगों के हक के लिए जलता रहा। हमने एक महान युगद्रष्टा,शिक्षक और सलाहकार को खो दिया है। वे आंध्र प्रदेश सिविल लिबर्टिज कमिटी (एपसीएलसी)के पंद्रह वर्ष और पीयूसीएल के दस वर्ष तक अध्यक्ष रहे।

दलितों, मुसलमानों, आदिवासियों और नक्सवादियों के खिलाफ राज्य प्रायोजित अत्याचार और हिंसा के खिलाफ वह आजीवन संघर्षरत रहे। आंध्र प्रदेश में उन्हें मानवाधिकारों का पर्याय माना जाता रहा है। आंध्र प्रदेश में माओवादियों के नाम पर की जाने वाली फर्जी मुठभेड़ों को उन्होंने हमेशा ही तीखे ढंग से उठाया और कई मामलों में उन्होंने मानवाधिकारों की एक नयी परंपरा बहाल की।




Sex, Lies, Iran, Israel and WikiLeaks

Dec 29, 2010

हमीं तो देश हैं, बाकी जो हैं सब देशद्रोही हैं

मानवाधिकार कार्यकर्ता और बाल चिकित्सक डॉ. बिनायक सेन की रिहाई के लिए 27 दिसंबर 2010 को दिल्ली के जंतर-मंतर पर हुए धरने-प्रदर्शन से लौटकर...


मुकुल सरल

                                     फोटो- लोकसंघर्ष ब्लॉग से


हमारे राज में
फूलों में खुशबू!
कुफ़्र है ये तो!

हमारे राज में
शम्मां है रौशन!
कुफ़्र है ये तो!

हमारे राज में
कोयल भला ये
कैसे गाती है?
कोई जासूस लगती है
किसे ये भेद बताती है?

हमारे राज में
क्यों तारे चमके?
चांद क्यों निकला?
दिलों में रौशनी कैसी!
ये सूरज क्यों भला चमका?

हमारा राज है तो
बस अंधेरा ही रहे कायम
हरेक आंख में आंसू हो
लब पे चुप रहे हरदम

हमारे राज में
तारे बुझा दो
सूरज गुल कर दो
हवा के तेवर तीख़े हैं
हवा पे सांकले धर दो

हमारा लफ़्ज़े-आख़िर है
हमारी ही हुकूमत है
हमारे से जुदा हो सच कोई
ये तो बग़ावत है

हमारे राज में ये कौन साज़िश कर रहा देखो
हमारे राज में ये कौन जुंबिश कर रहा देखो

ये कौन लोग हैं जो आज भी मुस्कुराते हैं
ये कौन लोग हैं जो ज़िंदगी के गीत गाते हैं
ये कौन लोग हैं मरते नहीं जो मौत के भी बाद
ये कौन लोग हैं हक़ की सदा करते हैं ज़िंदाबाद

ज़रा तुम ढूंढ कर लाओ हमारे ऐ सिपाहियो
इन्हे जेलों में डालो और खूब यातनाएं दो
अगर फिर भी न माने तो इन्हे फांसी चढ़ा दो तुम
इन्हे ज़िंदा जला दो तुम, समंदर में बहा दो तुम

हमारा राज है आख़िर
किसी का सर उठा क्यों हो
ये इतनी फौज क्यों रखी है
ज़रा तो डर किसी को हो

हमारी लूट पर बोले कोई
ये किसकी जुर्रत है
हमें झूठा कहे कोई
सरासर ये हिमाक़त है

ये कौन जनता के वकील हैं
जनता के डाक्टर
ये कौन सच के कलमकार हैं
दीवाने मास्टर

हमारे से अलग सोचें जो वो सब राजद्रोही हैं
हमीं तो देश हैं, बाकी जो हैं सब देशद्रोही हैं

जज साहब के पौव्वे से चूता है न्याय


विनायक  सेन  को  हुई आजीवन कारावास की सजा के बाद बहुतेरे लोग आश्चर्यों में जी रहे हैं.ओह-आह करते हुए-सदमा तो है मुझे भी,का राग लिए जो लोग इस घटना को अनोखा मान रहे हैं,उनके लिए यह बेहद जरूरी लेख है.हो सकता है लेख छपने के बाद लेखक -प्रकाशक पर अदालत की मानहानि का कोई मामला बने.हो सकता है सदमें वालों में से ही कुछ कहें कि सच बयान यों तो नहीं किया जाता लोकतंत्र में. लेकिन अगर यह लेख नहीं प्रकाशित किया गया तो जनता की मानहानि होगी और कल को वो पूछेगी लल्ला, तुने  किसकी रोटी खायी - मोडरेटर


हिमांशु कुमार

हमारे देश में कोई व्यक्ति किसी जज के फैसले या आचरण के खिलाफ यदि अपनी जुबान खोलता है तो है तो उसको न्यायालय की अवमानना के जुर्म में सज़ा हो सकती है.किसी भी समाज में तभी तक शांति रह सकती है, जब तक सब यह महसूस करते हैं कि उनके साथ अन्याय नहीं हो रहा है.यदि अन्याय होगा तो न्याय के लिए आवाज़ उठाने पर उसकी सुनवाई होगी, लेकिन जब समाज में ये व्यवस्था टूटने लगती है तो समाज भी टूटने लगता है, क्योंकि उसके बाद न्याय के लिए लोग फिर अपने तरीकों से लड़ने लगते हैं.

आज़ादी के बाद हमारा विश्वास राजनेताओं पर से समाप्त हो गया.नौकरशाही विकास के काम करने में न सिर्फ नकारा साबित हुयी, बल्कि विकास में बाधक भी साबित हो गयी. धर्म का खोखलापन पहले ही उजागर हो गया था. ऐसे में इस देश के सामने आज़ादी के बाद आम आदमी के लिए तय किये गए रोटी,बराबरी और इज्ज़त के लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए कोई भी सहारा नहीं बचा.

हमारे देश में अभी तक किसी भी तकलीफ के निवारण के लिए अदालतों पर आखिरी भरोसा बचा है, गाँव के गरीब आदमी से लेकर बड़े सामाजिक कार्यकर्ता तक किसी समस्या के समाधान के लिए नेता या अधिकारी के पास न जाकर अदालत में गुहार लगाते हैं. लेकिन चिंता का विषय यह है कि अब अदालतें भी बाकी लोकतान्त्रिक संस्थाओं की तरह अपनी विश्वसनीयता खो रही हैं. अदालतों की इस हालत से चिंतित होकर जब कोई व्यक्ति या संस्था समाज का ध्यान इस ओर खींचना चाहता है तो उसे इन अदालतों में बैठे हुए समस्त मानवीय कमजोरियों से भरे हुए लोग न्यायालय की अवमानना की सज़ा का खौफ दिखाकर खामोश कर देते हैं.

मेरा कई वर्षों तक अदालतों से नज़दीकी सम्बन्ध रहा है,पाँच वर्ष तक उपभोक्ता फोरम का सदस्य रहा,तीन वर्ष लोक अदालत की सीनियर बेंच का मेम्बर रहा और चार वर्ष विधिक सेवा प्राधिकरण का सदस्य रहा.इस दौरान जजों के मानसिक स्तर, सोच और चारित्रिक स्तर के बारे में अच्छे से जानने का मौक़ा मिला.

सारी बातें तो खोलकर नहीं बताऊंगा, क्योंकि अश्लील लेखन से बचना चाहता हूँ. लेकिन मैं देखता था कि जज लोग छोटी छोटी बातों जैसे घर जाते समय बस में बिना किराया दिए मुफ्त में सफ़र करने के लिए थानेदार को फोन करते थे.थानेदार जज साहब को सपरिवार बस में मुफ्त ले जाने के लिए बस के कंडेक्टर को धमकाने के लिए सिपाही भेजता था. ऐसे में उसी थानेदार के खिलाफ उसी जज की अदालत में कोई कैसे न्याय पाने की उम्मीद कर सकता है.

जब हमारी संस्था की मदद से 'सलवा जुडूम' से उजाड़े गए लिंगागिरी और बासागुडा गाँव को दुबारा बसाया जा रहा था, और आदिवासी आंध्र प्रदेश और जंगलों में अपने छिपे हुए स्थानों से बाहर आकर अपने उजड़े हुए गावों में जला दिए गये घरों को दुबारा बना रहे थे तो उनके पास खाने के लिए कुछ भी नहीं था.हमारा आदिवासी साथी कोपा और उसकी टीम संस्था की बस में दाल, चावल, तेल, मसाले, आलू, प्याज आदि भरकर उन भूखे ग्रामीणों के लिए दंतेवाडा से बासागुडा जा रहे थे (हालाँकि उन गाँव वालों को राहत पहुंचाना सरकार का काम था जिसके लिए सुप्रीम कोर्ट का आदेश मिला हुआ था) तो 'सलवा जुडूम' और उनकी माई-बाप पुलिस ने इस दाल-चावल से भरी गाडी को रोक लिया और कहा कि इस राशन का बिल दिखाओ तब गाडी को आगे जाने देंगे.

कोपा ने कहा कि 'हम ये सामग्री मुफ्त में बांटने के लिए ले जा रहे हैं,हम गाँववालों को इसका बिल थोड़े ही देंगे. बिल हमारी संस्था के आफिस में है, आप ठहरिये मैं बिल भी लाकर दिखा देता हूँ.' लेकिन पुलिस तो गाँव के दुबारा बसने को ही रोकना चाहती थी, इसलिए फटाफट पूरे राशन को गाडी समेत ज़ब्त कर थाने में ले गए.उधर गाँव में बच्चे, औरतें, बूढ़े भूखे थे. मैं बिल लेकर थाने पहुँचा. थानेदार ने कहा अब राशन और गाडी अदालत से छूटेगी.

हम अदालत गए. जज साहब शराब पीकर अपने न्याय के आसन पर विराजमान थे. थानेदार साहब हमारे ही सामने बिना हिचक के डायस पर पहुँच गए और जज के कान में फुसफुसाने लगे तो जज ने चिल्लाकर थानेदार से कहा, 'हाँ, हाँ में इन लोगों को अच्छी तरह जानता हूँ. ये सब नक्सलवादी हैं. तुम चिंता मत करो.'

इसके बाद हम अपना वकील तलाश करने बार रूम में आ गए. हमारे साथ पूना से आयी हुयी एक महिला पत्रकार भी थी. जज साहब हमारे पीछे-पीछे अपने आसन से उठकर बार रूम में आ गए. सारे वकील जज साहब को देखकर खड़े हो गए. जज साहब एक कुर्सी पर बैठ गए और उस महिला पत्रकार को अपने साथ बैठने के लिए कहा. महिला पत्रकार पास में एक कुर्सी पर बैठ गयी.

जज साहब ने अपनी जींस (जी हाँ जींस) में से पव्वा निकाला, दो घूँट मारे और इजहारे मुहब्बत करने लगे कि 'मेरी बीबी एकदम गंवार है. मैं यहाँ अकेला रहता हूँ. तुम मेरे घर चलो.' महिला पत्रकार भी बहुत होशियार थी उसने कहा, 'सर, मैंने आप जैसा इंसान नहीं देखा. ये राशन की गाडी छोड़ दीजिये.' जज साहब ने तुरंत गाडी छोड़ने के कागजों पर हस्ताक्षर कर दिए और वो महिला पत्रकार फिर मिलने का वादा करके राशन लेकर कोपा के साथ तुरंत गाँववालों के पास पहुँच गयी.

कुछ और वाकये छत्तीसगढ़ में आजकल की न्यायिक व्यवस्था की स्थिति पर हैं.हालाँकि हम सब ये जानते हैं कि जजों के माईनिंग कम्पनियों में शेयर के किस्से बहुत आम हैं. माईनिंग कंपनियों के मालिक जजों को अनेक तरीकों से प्रभावित या दुष्प्रभावित कर सकते हैं. दंतेवाड़ा में आदिवासियों का कत्लेआम माईनिंग कंपनियों के लिए ही किया जा रहा है इसलिए जजों का रवैया आदिवासियों के खिलाफ ही रहा है.

कुछ और उदाहरण देना चाहूंगा. दंतेवाड़ा जिले में एक गाँव नेन्द्रा है, इस गाँव को पुलिस और सलवा जुडूम ने तीन बार जलाया था.इसके बाद सुप्रीम कोर्ट के निर्देश पर जब राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग की टीम आदिवासियों की शिकायतें सुनने दंतेवाडा गयी तो नेन्द्रा गाँव के लोग भी अपनी आपबीती सुनाने आये. उन्हें आज तक न्याय तो नहीं मिला, अलबत्ता 10 जून 2008 को ग्रामीणों ने अपना बयान दर्ज कराया और 16 जून 2008 यानी छः दिन बाद ही उनका गाँव पुलिस ने चौथी बार फिर जला दिया.

इसके बाद हमारी संस्था इस गाँव में डट गयी. एक मानव कवच का निर्माण किया गया, जिसमें 22 आदिवासी युवक-युवतियां शामिल थे. डेढ़ साल तक सब लोग वहां रहे. उस इलाके के गाँववालों को बाज़ार नहीं जाने दिया जाता था. लोग भूख से मर रहे थे. औरतों के पास कपडे नहीं बचे थी और वो चीथड़ों से अपना तन ढकने के लिए मजबूर थीं. इसलिए ये मानव कवच के सदस्य गाँववालों को लेकर बाज़ार जाते थे.

तीन साल से ग्रामीण खेती नहीं कर पा रहे थे,क्योंकि पुलिस आकर फसल जला देती थी.संस्था के मानव कवच वालों ने गाँववालों के साथ-साथ खेती फिर से शुरू की. उस गाँव से पिछले आठ महीने से चार लड़कियां गायब थीं, जिसमें से 'सलवा जुडूम'कैंप के नेताओं के घर पर बंधक बनाकर रखी गयी दो लड़कियों को तो हमारे कार्यकर्ता छुपकर मुक्त करा लाये और उनके परिजनों को सौंप दिया (मेरे पास दोनों के फोटो मौजूद हैं.मैं किस्से नहीं सुना रहा हूँ ), लेकिन जिन दो लडकियों को पुलिसवाले ले गए थे उनका कुछ पता नहीं चल रहा था. उनमें से एक लडकी के पिता को भी उसके साथ ले जाकर पुलिस ने पिता की ह्त्या कर दी थी.

गायब लड़कियों के परिजन उनकी तलाश करने की प्रार्थना कर रहे थे.हमने उनके भाइयों की प्रार्थना पत्र एसपी को भेजे, मगर एसपी ने नौ माह तक कोई कार्यवाही नहीं की.अंत में हाईकोर्ट में हेबियस कार्पस दायर की गयी. नियमतः हेबियस कार्पस पर उसी दिन सुनवाई करके पुलिस को नोटिस दिया जाना चाहिए था, लेकिन छह महीने बाद जज ने लडकी के भाई के वकील को फटकारा कि इसने अपनी बहन के गुम होने की शिकायत इतनी देर से क्यों की? वकील ने जज को बताया कि 'इसकी बहन का पुलिस ने ही अपहरण किया है और ये तो अपनी जान बचाकर जंगल में छुपा हुआ था.अपहरणकर्ता लोग तो थाने के मालिक बनकर बैठे हुए है,ये डरा हुआ लड़का थाने कैसे जाता? अगर इस संस्था ने इसकी मदद न की होती तो ये मामला तो कभी भी कोर्ट तक भी नहीं पहुँचता. असली क़ानून तो एसपी ने तोडा है, जिसने शिकायत मिलने के बाद भी नौ महीने तक कोई कार्यवाही नहीं की.'

इतना सब सुनने के बाद जज साहब ने उस एसपी के खिलाफ कोई टिप्पणी तक नहीं की.जज ने कहा ऐसा कैसे हो सकता है कि कोई आदमी थाने में जाने से डरे.लडकी के भाई के वकील ने बताया 'साहब दंतेवाड़ा में तो वकीलों को थाने में जाने पर थानेदार पीट देते हैं.उदाहरण के लिए ये देखिये अलबन टोप्पो वकील साहब आपके सामने खड़े हैं.इनको कोपा कुंजाम के साथ थाने जाने के अपने कानूनी अधिकार का इस्तेमाल करने पर एसपी के निर्देश पर रात भर थानेदार ने थाने में बंद करके पीटा है. आप करेंगे कार्यवाही?

इस पर जज साहब चुप रहे.एक सप्ताह बाद पुलिस लडकी के भाई को उठाकर लाई.जान से मारने की धमकी के बाद उसे उसी जज के सामने पेश किया. गायब लड़की के भाई के वकील ने जज को बताया कि इसे पुलिस उठाकर लाई है.आप इसे कम से कम 48घंटे के लिए पुलिस से अलग कर दें .और फिर बयान दर्ज करें.लेकिन जज ने तुरंत बयान दर्ज करने का आदेश दिया.लड़की के भाई ने पुलिस के दबाव में बयान दिया कि 'मेरी बहन का अपहरण हुआ ये सच है. मेरे बाप की ह्त्या हुई ये भी सच है, लेकिन वो पुलिस ने नहीं की. किसने की मैं नहीं जानता. ' और जज ने तुरंत मामला खारिज कर दिया.

उसके भाई का फोन मेरे पास आया तो मैंने उससे पूछा कि ऐसा बयान क्यों दिया? उसने बताया, 'एक बहन बची है, बूढ़ी मां है. मुझे भी मार देते तो उन्हें कौन पालता? इसलिए उन्होंने जो सिखाया मैंने बोल दिया.'



दंतेवाडा स्थित वनवासी चेतना आश्रम के प्रमुख और सामाजिक कार्यकर्त्ता हिमांशु कुमार का संघर्ष,बदलाव और सुधार की गुंजाईश चाहने वालों के लिए एक मिसाल है.उनसे vcadantewada@gmail.com पर संपर्क किया जा सकता है.
 
 

Dec 28, 2010

जल्लादों का उल्लास-मंच नहीं है मेरा देश

मैं छत्तीसगढ़ नहीं गया,अरुंधति की तरह पहले नहीं बोला,मेधा पाटकर के साथ नर्मदा पर नहीं लड़ा.दूर रहा,सुरक्षित लेखन किया,उड़ीसा और कर्नाटक और गुजरात मेरा जाना नहीं हुआ.मैंने खुद को किसी जोखिम में नहीं डाला. फिर भी मैं डरा हुआ क्यों हूं...


शिव प्रसाद जोशी

21वीं सदी के पहले दस साल पूरे हो गए हैं और एक अभूतपूर्व विकास दर की कुलांचे भरते देश में दुश्चिंता का न जाने ये साया क्यों नहीं जाता कि क्या हम सब वलनरेबल हैं.यानी हम सब आम नागरिक.

मुझे बार बार आशंका होती है कि मुझे कभी भी गिरफ़्तार तो नहीं कर लिया जाएगा.हालांकि अगले ही पल मैं सोचता हूं कि मैने तो कोई अपराध किया नहीं.पत्रकार हूं ख़बरें की हैं,कविताएं-निबंध लिखता हूं, ईमानदारी से लेखन करता हूं. बस. और तो मेरा कोई आपराधिक रिकॉर्ड नहीं है. पर फिर भी मुझे क्यों लगता है कि कोई मुझे देख रहा है, घूर रहा है, मेरा पीछा कर रहा है.मुझे कभी भी दबोचा जा सकता है.मैं कार ड्राइव कर दफ्तर जाता हूं, मुझे कोई किसी आधार पर फंसा सकता है.

क्या मैं सरकार या सत्ता के किसी नुमायंदे के लिए असहनीय होने की स्थिति में आ चुका हूं. क्या मैं शांति भंग कर सकता हूं. क्या मैं सत्ता राजनीति या दबंग समाज की आंख में खटका हूं. क्या मेरी शिनाख्त दुर्योग से एक व्यवस्था विरोधी शख़्स के रूप में हो चुकी है. क्या किसी को भनक लग गई है कि दमनकारी रवैये का मैं विरोधी हूं. क्या मुझे देशद्रोही माना जाएगा.



दिल्ली में में प्रदर्शन
 
मैं अरुंधति रॉय का समर्थक हूं.मैं वरवर राव को हमारे समय का एक बड़ा कवि क्रांतिकारी मानता हूं.मुझे सांप्रदायिकता से नफ़रतहै. मुझे अमेरिकापरस्ती  नापसंद है.मैं इस्राएल की दमनकारी नीतियों का विरोधी हूं.मुझे हुसैन एक बड़े आर्टिस्ट लगते हैं.मुझे सचिन तेंदुलकर के व्यक्तित्व के कुछ पहलुओं पर एतराज़ है.मुझे टीवी समाचार में फैले हुए अघाएपन और अपठनीयता और एक घमंडी किस्म की नालायकी से नफ़रत है.

मुझे हिंदी में ज्ञानरंजन, चंद्रकांत देवताले, विष्णु खरे, मंगलेश डबराल,विनोद कुमार शुक्ल,असद ज़ैदी, वीरेन डंगवाल,देवीप्रसाद मिश्र और योगेंद्र आहुजा की रचनाएं सबसे ज़्यादा पसंद हैं.मुक्तिबोध के बाद रघुबीर सहाय की कविता आने वाले वक़्तों की भयावहता को सबसे पहले दर्ज करती हैं,ये मैं भी आगे बढ़कर मानता हूं.

मेरे कुछ पत्रकार ब्लॉगर कवि लेखक साथी हैं,वे मुझे पसंद करते हैं,मैं उनसे निकटता महसूस करता हूं.मुझे नॉम चॉमस्की पसंद हैं,एडवर्ड सईद पसंद हैं,रोमिला थापर और पी साईनाथ पसंद हैं.हमारे कुटुंब के एक बड़े बुज़ुर्ग मार्क्सवादी हैं.हमारे आसपास लोकतंत्रवादी विचारधारा के बहुत से कवि लेखक संस्कृतिकर्मी और एक्टिविस्ट हैं.

क्या ये सब वजहें हैं जिनके चलते मुझे डरा रहना चाहिए.एक निहायत ही दुबकेपन में रहना चाहिए.घिरा घिरा सा अपने ही डर दुविधा और सवालों में. अपने बच्चों और परिवार की फ़िक्र करता हुआ. नौकरी करता हुआ. कोई कड़वी बात न कह दूं इसके लिए सजग रहता हुआ,हर महीने तनख्वाह घर लाता हुआ.रोटी मक्खन चैन से खाता हुआ और ईश्वर को प्रणाम कर एक बेफ़िक्र नींद में जाता हुआ.

मैं छत्तीसगढ़ नहीं गया,अरुंधति की तरह पहले नहीं बोला,मेधा पाटकर के साथ नर्मदा पर नहीं लड़ा.दूर रहा, सुरक्षित लेखन किया, उड़ीसा और कर्नाटक और गुजरात मेरा जाना नहीं हुआ. मैंने खुद को किसी जोखिम में नहीं डाला.फिर भी मैं डराहुआ क्यों हूं. जब से डॉक्टर बिनायक सेन को उम्रक़ैद देने की ख़बर आई है,मेरा डर और बढ़ गया है.वो तीस साल से छत्तीसगढ़ में अपनी डॉक्टरी को आम आदिवासियों के बीच अमल में ला रहे थे.

उनको मदद पहुंचा रहे थे.वो शंकर गुहा नियोगी के अघोषित शागिर्द थे.उन्होंने अपनी डॉक्टरी के नए आयाम खोलते हुए इतना भर किया था कि इलाक़े में नक्सलवाद पर काबू पाए जाने के नाम पर की जा रही बर्बरताओं का खुला और पुरज़ोर विरोध किया था. उन्होंने लोगों को मिटाए जाने की उस रौद्र षडयंत्र भरी रणनीति को अन्याय कहा था. बस.

अदालतें इंसाफ़ का एक ठिकाना होती हैं.पर उन्होंने मेरा डर बढ़ा दिया है.हम सबका डर बढ़ा दिया है. मेरे पिता का, मेरी मां का, मेरी पत्नी का, मेरे बच्चे डरेंगे. हम सब डरे हुए हैं. हमारा परिवार, हमारा समाज, हमारे लोग. क्यों?

दशमलव के नीचे की या उससे थोड़ा ऊपर की आबादी दिल्ली मुंबई कोलकाता बंगलौर,हैदराबाद, चेन्नई, पटना, सूरत, बड़ौदा, अहमदाबाद, देहरादून, लखनऊ, जयपुर आदि में अविश्वसनीय किस्म की विलासिता भोग रही है. वह हमारे समय के समस्त सुख भोग रही है.हमारे महादेश की बाकी आबादी न जाने क्यों भुगतते रहने पर विवश है.नीरा राडिया की कंपनी बहुत कम समय में करोड़ों अरबों की कंपनी बन जाती है.उसके लिहाज़ से ये ऊंचा और ऊंचा उठती विकास दर तो ठीक है.

लेकिन छत्तीसगढ़ से लेकर उत्तराखंड और कर्नाटक,उड़ीसा केरल तक एक आम मज़दूर और एक खेतिहर के लिए,किसी भी वक़्त नौकरी न रहने की आशंका में झुलसते एक बड़े निम्न मध्यवर्ग के लिए विकास दर आखिर कहां सोई रहती है. क्या वो इन सोए हुए,डरे हुए, भुगतते हुए और खपते हुए पसीने और धूल से सने हुए लोगों की आकांक्षाओं और सपनों के किनारों से किसी शातिर शैतान बिल्ली की तरह दबे पांव निकल जाती है.

बिनायक सेन की सज़ा क्या हम सबको मिली हुई सज़ा नहीं है.क्या इस चिंता से पीछा छु़डाने का य़े वक़्त नहीं है कि हमें कोई क्या दबोचेगा, हम पहले से सज़ायाफ़्ता हैं, हम इस क़ैद में हैं और मुक्ति के लिए संघर्ष हमारा जारी है. 2010 की अभूतपूर्व आर्थिक तरक्की अगले दस साल यानी 2020 में एक नया मकाम हासिल कर लेगी. वो अकल्पनीय विकास का पड़ाव होगा. लेकिन वह कुछ जद्दोजहद कुछ बेचैनियों कुछ लड़ाइयों का भी एक पड़ाव होगा.

उन पड़ावों तक आते आते बहुत सी जेलों में बहुत से बिनायक सेन आ चुके होंगे.पोस्को और वेदांत एक नया सामाजिक चोला पहन लेंगे.वे कानूनों के पास एक चमकीला रिसॉर्ट बना देंगे.सरकारें उनसे अंततः अभिभूत होती जाएगीं.पर अरुंधति रॉय जैसे और स्वर भी तो आएंगें. नवारुण भट्टाचार्य ये याद दिला चुके हैं कि 'यह मृत्यु उपत्यका नहीं है मेरा देश,यह जल्लादों का उल्लास-मंच नहीं है मेरा देश.'


  • पत्रकार,युवा कवि और अनुवादक.सहारा चैनल में उत्तराखंड ब्यूरो प्रमुख रहने के बाद जर्मन रेडिओ डोयेचे वेले में चार साल तक कार्यरत. स्टीफन हॉकिन्स के अनुवादों के लिए चर्चित.



पोस्टकार्डों से बद्धिजीवी करेंगे प्रतिरोध

मानवाधिकार नेता विनायक सेन को उम्र कैद की सजा के विरोध मे वाराणसी के बुद्धिजीवियों, सामाजिक और छात्र-युवा संगठनो ने जिला मुख्यालय पर बैठक कर विरोध जताया। वक्ताओं ने न्यायपालिका कि विश्वसनियता पर सवाल उठाते हुए कहा कि आम नागरिको की  आवाज को उठाने वाले मानवाधिकार नेताओं और सामाजिक कार्यकर्ताओ के खिलाफ राज्य के दबाव में  न्यायपालिका द्वारा लगातार इस तरह के निर्णय दिये जा रहे हैं।
बैठक को संबोधित करते हुए PUCL के प्रदेश अध्यक्ष चितरंजन सिंह ने कहा कि न्यायालय ने फैसले के माध्यम से तमाम जनतांत्रिक आवाजों को यह चेतावनी दी है कि अगर राज्य के लूट तंत्र के खिलाफ वह आवाज उठाएंगे तो उनका हश्र भी यही होगा। इस प्रतिरोध में फादर आनंद, सुनील सहस्त्रबुद्धे, बल्भाचार्य, लेनिन रघुवंशी, चित्रा सहसत्रबुद्धे, सिद्धार्थजी, बल्लभाचार्य पाण्डे, जवाहर लाल कौल, मुलचन्द सोनकर, राजेश, दिलीप कुमार, मो. मूसा, लक्ष्मण प्रसाद समेत अनेक शहर के बुद्धिजीवियों ने शिरकत की।

बैठक में निर्णय लिया गया कि राष्ट्रपति,मुख्य न्यायाधीश एवं छत्तीसगढ के मुख्यमंत्री को लाखों  की संख्या मे पोस्ट कार्ड भेज कर हम इस निर्णय पर विरोध दर्ज कराएंगे, ताकि भविष्य मे इस तरह के जनविरोधी निर्णय न हो सके।

जिलामुख्यालय पर हुई इस बैठक में CPI(ML), साझा संस्कृति मंच, पहल, प्रगतिशील जनसगंठन, भारतीय किसान यूनियन, सूचना अधिकार अभियान, आसरा, लोक विद्या आश्रम, AISA, मानवाधिकार जन निगरानी समिति, प्रगतिशील लेखक मंच, आशा, आइसा, एशियन ब्रिज इण्डिया, प्रेरणा कला मंच, डिबेट सोसाइटी समेत शहर के बुद्धिजीवियों ने शिरकत की।

द्वारा जारी- गुंजन सिंह, डिबेट सोसाइटी