Dec 29, 2010

हमीं तो देश हैं, बाकी जो हैं सब देशद्रोही हैं

मानवाधिकार कार्यकर्ता और बाल चिकित्सक डॉ. बिनायक सेन की रिहाई के लिए 27 दिसंबर 2010 को दिल्ली के जंतर-मंतर पर हुए धरने-प्रदर्शन से लौटकर...


मुकुल सरल

                                     फोटो- लोकसंघर्ष ब्लॉग से


हमारे राज में
फूलों में खुशबू!
कुफ़्र है ये तो!

हमारे राज में
शम्मां है रौशन!
कुफ़्र है ये तो!

हमारे राज में
कोयल भला ये
कैसे गाती है?
कोई जासूस लगती है
किसे ये भेद बताती है?

हमारे राज में
क्यों तारे चमके?
चांद क्यों निकला?
दिलों में रौशनी कैसी!
ये सूरज क्यों भला चमका?

हमारा राज है तो
बस अंधेरा ही रहे कायम
हरेक आंख में आंसू हो
लब पे चुप रहे हरदम

हमारे राज में
तारे बुझा दो
सूरज गुल कर दो
हवा के तेवर तीख़े हैं
हवा पे सांकले धर दो

हमारा लफ़्ज़े-आख़िर है
हमारी ही हुकूमत है
हमारे से जुदा हो सच कोई
ये तो बग़ावत है

हमारे राज में ये कौन साज़िश कर रहा देखो
हमारे राज में ये कौन जुंबिश कर रहा देखो

ये कौन लोग हैं जो आज भी मुस्कुराते हैं
ये कौन लोग हैं जो ज़िंदगी के गीत गाते हैं
ये कौन लोग हैं मरते नहीं जो मौत के भी बाद
ये कौन लोग हैं हक़ की सदा करते हैं ज़िंदाबाद

ज़रा तुम ढूंढ कर लाओ हमारे ऐ सिपाहियो
इन्हे जेलों में डालो और खूब यातनाएं दो
अगर फिर भी न माने तो इन्हे फांसी चढ़ा दो तुम
इन्हे ज़िंदा जला दो तुम, समंदर में बहा दो तुम

हमारा राज है आख़िर
किसी का सर उठा क्यों हो
ये इतनी फौज क्यों रखी है
ज़रा तो डर किसी को हो

हमारी लूट पर बोले कोई
ये किसकी जुर्रत है
हमें झूठा कहे कोई
सरासर ये हिमाक़त है

ये कौन जनता के वकील हैं
जनता के डाक्टर
ये कौन सच के कलमकार हैं
दीवाने मास्टर

हमारे से अलग सोचें जो वो सब राजद्रोही हैं
हमीं तो देश हैं, बाकी जो हैं सब देशद्रोही हैं

जज साहब के पौव्वे से चूता है न्याय


विनायक  सेन  को  हुई आजीवन कारावास की सजा के बाद बहुतेरे लोग आश्चर्यों में जी रहे हैं.ओह-आह करते हुए-सदमा तो है मुझे भी,का राग लिए जो लोग इस घटना को अनोखा मान रहे हैं,उनके लिए यह बेहद जरूरी लेख है.हो सकता है लेख छपने के बाद लेखक -प्रकाशक पर अदालत की मानहानि का कोई मामला बने.हो सकता है सदमें वालों में से ही कुछ कहें कि सच बयान यों तो नहीं किया जाता लोकतंत्र में. लेकिन अगर यह लेख नहीं प्रकाशित किया गया तो जनता की मानहानि होगी और कल को वो पूछेगी लल्ला, तुने  किसकी रोटी खायी - मोडरेटर


हिमांशु कुमार

हमारे देश में कोई व्यक्ति किसी जज के फैसले या आचरण के खिलाफ यदि अपनी जुबान खोलता है तो है तो उसको न्यायालय की अवमानना के जुर्म में सज़ा हो सकती है.किसी भी समाज में तभी तक शांति रह सकती है, जब तक सब यह महसूस करते हैं कि उनके साथ अन्याय नहीं हो रहा है.यदि अन्याय होगा तो न्याय के लिए आवाज़ उठाने पर उसकी सुनवाई होगी, लेकिन जब समाज में ये व्यवस्था टूटने लगती है तो समाज भी टूटने लगता है, क्योंकि उसके बाद न्याय के लिए लोग फिर अपने तरीकों से लड़ने लगते हैं.

आज़ादी के बाद हमारा विश्वास राजनेताओं पर से समाप्त हो गया.नौकरशाही विकास के काम करने में न सिर्फ नकारा साबित हुयी, बल्कि विकास में बाधक भी साबित हो गयी. धर्म का खोखलापन पहले ही उजागर हो गया था. ऐसे में इस देश के सामने आज़ादी के बाद आम आदमी के लिए तय किये गए रोटी,बराबरी और इज्ज़त के लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए कोई भी सहारा नहीं बचा.

हमारे देश में अभी तक किसी भी तकलीफ के निवारण के लिए अदालतों पर आखिरी भरोसा बचा है, गाँव के गरीब आदमी से लेकर बड़े सामाजिक कार्यकर्ता तक किसी समस्या के समाधान के लिए नेता या अधिकारी के पास न जाकर अदालत में गुहार लगाते हैं. लेकिन चिंता का विषय यह है कि अब अदालतें भी बाकी लोकतान्त्रिक संस्थाओं की तरह अपनी विश्वसनीयता खो रही हैं. अदालतों की इस हालत से चिंतित होकर जब कोई व्यक्ति या संस्था समाज का ध्यान इस ओर खींचना चाहता है तो उसे इन अदालतों में बैठे हुए समस्त मानवीय कमजोरियों से भरे हुए लोग न्यायालय की अवमानना की सज़ा का खौफ दिखाकर खामोश कर देते हैं.

मेरा कई वर्षों तक अदालतों से नज़दीकी सम्बन्ध रहा है,पाँच वर्ष तक उपभोक्ता फोरम का सदस्य रहा,तीन वर्ष लोक अदालत की सीनियर बेंच का मेम्बर रहा और चार वर्ष विधिक सेवा प्राधिकरण का सदस्य रहा.इस दौरान जजों के मानसिक स्तर, सोच और चारित्रिक स्तर के बारे में अच्छे से जानने का मौक़ा मिला.

सारी बातें तो खोलकर नहीं बताऊंगा, क्योंकि अश्लील लेखन से बचना चाहता हूँ. लेकिन मैं देखता था कि जज लोग छोटी छोटी बातों जैसे घर जाते समय बस में बिना किराया दिए मुफ्त में सफ़र करने के लिए थानेदार को फोन करते थे.थानेदार जज साहब को सपरिवार बस में मुफ्त ले जाने के लिए बस के कंडेक्टर को धमकाने के लिए सिपाही भेजता था. ऐसे में उसी थानेदार के खिलाफ उसी जज की अदालत में कोई कैसे न्याय पाने की उम्मीद कर सकता है.

जब हमारी संस्था की मदद से 'सलवा जुडूम' से उजाड़े गए लिंगागिरी और बासागुडा गाँव को दुबारा बसाया जा रहा था, और आदिवासी आंध्र प्रदेश और जंगलों में अपने छिपे हुए स्थानों से बाहर आकर अपने उजड़े हुए गावों में जला दिए गये घरों को दुबारा बना रहे थे तो उनके पास खाने के लिए कुछ भी नहीं था.हमारा आदिवासी साथी कोपा और उसकी टीम संस्था की बस में दाल, चावल, तेल, मसाले, आलू, प्याज आदि भरकर उन भूखे ग्रामीणों के लिए दंतेवाडा से बासागुडा जा रहे थे (हालाँकि उन गाँव वालों को राहत पहुंचाना सरकार का काम था जिसके लिए सुप्रीम कोर्ट का आदेश मिला हुआ था) तो 'सलवा जुडूम' और उनकी माई-बाप पुलिस ने इस दाल-चावल से भरी गाडी को रोक लिया और कहा कि इस राशन का बिल दिखाओ तब गाडी को आगे जाने देंगे.

कोपा ने कहा कि 'हम ये सामग्री मुफ्त में बांटने के लिए ले जा रहे हैं,हम गाँववालों को इसका बिल थोड़े ही देंगे. बिल हमारी संस्था के आफिस में है, आप ठहरिये मैं बिल भी लाकर दिखा देता हूँ.' लेकिन पुलिस तो गाँव के दुबारा बसने को ही रोकना चाहती थी, इसलिए फटाफट पूरे राशन को गाडी समेत ज़ब्त कर थाने में ले गए.उधर गाँव में बच्चे, औरतें, बूढ़े भूखे थे. मैं बिल लेकर थाने पहुँचा. थानेदार ने कहा अब राशन और गाडी अदालत से छूटेगी.

हम अदालत गए. जज साहब शराब पीकर अपने न्याय के आसन पर विराजमान थे. थानेदार साहब हमारे ही सामने बिना हिचक के डायस पर पहुँच गए और जज के कान में फुसफुसाने लगे तो जज ने चिल्लाकर थानेदार से कहा, 'हाँ, हाँ में इन लोगों को अच्छी तरह जानता हूँ. ये सब नक्सलवादी हैं. तुम चिंता मत करो.'

इसके बाद हम अपना वकील तलाश करने बार रूम में आ गए. हमारे साथ पूना से आयी हुयी एक महिला पत्रकार भी थी. जज साहब हमारे पीछे-पीछे अपने आसन से उठकर बार रूम में आ गए. सारे वकील जज साहब को देखकर खड़े हो गए. जज साहब एक कुर्सी पर बैठ गए और उस महिला पत्रकार को अपने साथ बैठने के लिए कहा. महिला पत्रकार पास में एक कुर्सी पर बैठ गयी.

जज साहब ने अपनी जींस (जी हाँ जींस) में से पव्वा निकाला, दो घूँट मारे और इजहारे मुहब्बत करने लगे कि 'मेरी बीबी एकदम गंवार है. मैं यहाँ अकेला रहता हूँ. तुम मेरे घर चलो.' महिला पत्रकार भी बहुत होशियार थी उसने कहा, 'सर, मैंने आप जैसा इंसान नहीं देखा. ये राशन की गाडी छोड़ दीजिये.' जज साहब ने तुरंत गाडी छोड़ने के कागजों पर हस्ताक्षर कर दिए और वो महिला पत्रकार फिर मिलने का वादा करके राशन लेकर कोपा के साथ तुरंत गाँववालों के पास पहुँच गयी.

कुछ और वाकये छत्तीसगढ़ में आजकल की न्यायिक व्यवस्था की स्थिति पर हैं.हालाँकि हम सब ये जानते हैं कि जजों के माईनिंग कम्पनियों में शेयर के किस्से बहुत आम हैं. माईनिंग कंपनियों के मालिक जजों को अनेक तरीकों से प्रभावित या दुष्प्रभावित कर सकते हैं. दंतेवाड़ा में आदिवासियों का कत्लेआम माईनिंग कंपनियों के लिए ही किया जा रहा है इसलिए जजों का रवैया आदिवासियों के खिलाफ ही रहा है.

कुछ और उदाहरण देना चाहूंगा. दंतेवाड़ा जिले में एक गाँव नेन्द्रा है, इस गाँव को पुलिस और सलवा जुडूम ने तीन बार जलाया था.इसके बाद सुप्रीम कोर्ट के निर्देश पर जब राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग की टीम आदिवासियों की शिकायतें सुनने दंतेवाडा गयी तो नेन्द्रा गाँव के लोग भी अपनी आपबीती सुनाने आये. उन्हें आज तक न्याय तो नहीं मिला, अलबत्ता 10 जून 2008 को ग्रामीणों ने अपना बयान दर्ज कराया और 16 जून 2008 यानी छः दिन बाद ही उनका गाँव पुलिस ने चौथी बार फिर जला दिया.

इसके बाद हमारी संस्था इस गाँव में डट गयी. एक मानव कवच का निर्माण किया गया, जिसमें 22 आदिवासी युवक-युवतियां शामिल थे. डेढ़ साल तक सब लोग वहां रहे. उस इलाके के गाँववालों को बाज़ार नहीं जाने दिया जाता था. लोग भूख से मर रहे थे. औरतों के पास कपडे नहीं बचे थी और वो चीथड़ों से अपना तन ढकने के लिए मजबूर थीं. इसलिए ये मानव कवच के सदस्य गाँववालों को लेकर बाज़ार जाते थे.

तीन साल से ग्रामीण खेती नहीं कर पा रहे थे,क्योंकि पुलिस आकर फसल जला देती थी.संस्था के मानव कवच वालों ने गाँववालों के साथ-साथ खेती फिर से शुरू की. उस गाँव से पिछले आठ महीने से चार लड़कियां गायब थीं, जिसमें से 'सलवा जुडूम'कैंप के नेताओं के घर पर बंधक बनाकर रखी गयी दो लड़कियों को तो हमारे कार्यकर्ता छुपकर मुक्त करा लाये और उनके परिजनों को सौंप दिया (मेरे पास दोनों के फोटो मौजूद हैं.मैं किस्से नहीं सुना रहा हूँ ), लेकिन जिन दो लडकियों को पुलिसवाले ले गए थे उनका कुछ पता नहीं चल रहा था. उनमें से एक लडकी के पिता को भी उसके साथ ले जाकर पुलिस ने पिता की ह्त्या कर दी थी.

गायब लड़कियों के परिजन उनकी तलाश करने की प्रार्थना कर रहे थे.हमने उनके भाइयों की प्रार्थना पत्र एसपी को भेजे, मगर एसपी ने नौ माह तक कोई कार्यवाही नहीं की.अंत में हाईकोर्ट में हेबियस कार्पस दायर की गयी. नियमतः हेबियस कार्पस पर उसी दिन सुनवाई करके पुलिस को नोटिस दिया जाना चाहिए था, लेकिन छह महीने बाद जज ने लडकी के भाई के वकील को फटकारा कि इसने अपनी बहन के गुम होने की शिकायत इतनी देर से क्यों की? वकील ने जज को बताया कि 'इसकी बहन का पुलिस ने ही अपहरण किया है और ये तो अपनी जान बचाकर जंगल में छुपा हुआ था.अपहरणकर्ता लोग तो थाने के मालिक बनकर बैठे हुए है,ये डरा हुआ लड़का थाने कैसे जाता? अगर इस संस्था ने इसकी मदद न की होती तो ये मामला तो कभी भी कोर्ट तक भी नहीं पहुँचता. असली क़ानून तो एसपी ने तोडा है, जिसने शिकायत मिलने के बाद भी नौ महीने तक कोई कार्यवाही नहीं की.'

इतना सब सुनने के बाद जज साहब ने उस एसपी के खिलाफ कोई टिप्पणी तक नहीं की.जज ने कहा ऐसा कैसे हो सकता है कि कोई आदमी थाने में जाने से डरे.लडकी के भाई के वकील ने बताया 'साहब दंतेवाड़ा में तो वकीलों को थाने में जाने पर थानेदार पीट देते हैं.उदाहरण के लिए ये देखिये अलबन टोप्पो वकील साहब आपके सामने खड़े हैं.इनको कोपा कुंजाम के साथ थाने जाने के अपने कानूनी अधिकार का इस्तेमाल करने पर एसपी के निर्देश पर रात भर थानेदार ने थाने में बंद करके पीटा है. आप करेंगे कार्यवाही?

इस पर जज साहब चुप रहे.एक सप्ताह बाद पुलिस लडकी के भाई को उठाकर लाई.जान से मारने की धमकी के बाद उसे उसी जज के सामने पेश किया. गायब लड़की के भाई के वकील ने जज को बताया कि इसे पुलिस उठाकर लाई है.आप इसे कम से कम 48घंटे के लिए पुलिस से अलग कर दें .और फिर बयान दर्ज करें.लेकिन जज ने तुरंत बयान दर्ज करने का आदेश दिया.लड़की के भाई ने पुलिस के दबाव में बयान दिया कि 'मेरी बहन का अपहरण हुआ ये सच है. मेरे बाप की ह्त्या हुई ये भी सच है, लेकिन वो पुलिस ने नहीं की. किसने की मैं नहीं जानता. ' और जज ने तुरंत मामला खारिज कर दिया.

उसके भाई का फोन मेरे पास आया तो मैंने उससे पूछा कि ऐसा बयान क्यों दिया? उसने बताया, 'एक बहन बची है, बूढ़ी मां है. मुझे भी मार देते तो उन्हें कौन पालता? इसलिए उन्होंने जो सिखाया मैंने बोल दिया.'



दंतेवाडा स्थित वनवासी चेतना आश्रम के प्रमुख और सामाजिक कार्यकर्त्ता हिमांशु कुमार का संघर्ष,बदलाव और सुधार की गुंजाईश चाहने वालों के लिए एक मिसाल है.उनसे vcadantewada@gmail.com पर संपर्क किया जा सकता है.
 
 

Dec 28, 2010

जल्लादों का उल्लास-मंच नहीं है मेरा देश

मैं छत्तीसगढ़ नहीं गया,अरुंधति की तरह पहले नहीं बोला,मेधा पाटकर के साथ नर्मदा पर नहीं लड़ा.दूर रहा,सुरक्षित लेखन किया,उड़ीसा और कर्नाटक और गुजरात मेरा जाना नहीं हुआ.मैंने खुद को किसी जोखिम में नहीं डाला. फिर भी मैं डरा हुआ क्यों हूं...


शिव प्रसाद जोशी

21वीं सदी के पहले दस साल पूरे हो गए हैं और एक अभूतपूर्व विकास दर की कुलांचे भरते देश में दुश्चिंता का न जाने ये साया क्यों नहीं जाता कि क्या हम सब वलनरेबल हैं.यानी हम सब आम नागरिक.

मुझे बार बार आशंका होती है कि मुझे कभी भी गिरफ़्तार तो नहीं कर लिया जाएगा.हालांकि अगले ही पल मैं सोचता हूं कि मैने तो कोई अपराध किया नहीं.पत्रकार हूं ख़बरें की हैं,कविताएं-निबंध लिखता हूं, ईमानदारी से लेखन करता हूं. बस. और तो मेरा कोई आपराधिक रिकॉर्ड नहीं है. पर फिर भी मुझे क्यों लगता है कि कोई मुझे देख रहा है, घूर रहा है, मेरा पीछा कर रहा है.मुझे कभी भी दबोचा जा सकता है.मैं कार ड्राइव कर दफ्तर जाता हूं, मुझे कोई किसी आधार पर फंसा सकता है.

क्या मैं सरकार या सत्ता के किसी नुमायंदे के लिए असहनीय होने की स्थिति में आ चुका हूं. क्या मैं शांति भंग कर सकता हूं. क्या मैं सत्ता राजनीति या दबंग समाज की आंख में खटका हूं. क्या मेरी शिनाख्त दुर्योग से एक व्यवस्था विरोधी शख़्स के रूप में हो चुकी है. क्या किसी को भनक लग गई है कि दमनकारी रवैये का मैं विरोधी हूं. क्या मुझे देशद्रोही माना जाएगा.



दिल्ली में में प्रदर्शन
 
मैं अरुंधति रॉय का समर्थक हूं.मैं वरवर राव को हमारे समय का एक बड़ा कवि क्रांतिकारी मानता हूं.मुझे सांप्रदायिकता से नफ़रतहै. मुझे अमेरिकापरस्ती  नापसंद है.मैं इस्राएल की दमनकारी नीतियों का विरोधी हूं.मुझे हुसैन एक बड़े आर्टिस्ट लगते हैं.मुझे सचिन तेंदुलकर के व्यक्तित्व के कुछ पहलुओं पर एतराज़ है.मुझे टीवी समाचार में फैले हुए अघाएपन और अपठनीयता और एक घमंडी किस्म की नालायकी से नफ़रत है.

मुझे हिंदी में ज्ञानरंजन, चंद्रकांत देवताले, विष्णु खरे, मंगलेश डबराल,विनोद कुमार शुक्ल,असद ज़ैदी, वीरेन डंगवाल,देवीप्रसाद मिश्र और योगेंद्र आहुजा की रचनाएं सबसे ज़्यादा पसंद हैं.मुक्तिबोध के बाद रघुबीर सहाय की कविता आने वाले वक़्तों की भयावहता को सबसे पहले दर्ज करती हैं,ये मैं भी आगे बढ़कर मानता हूं.

मेरे कुछ पत्रकार ब्लॉगर कवि लेखक साथी हैं,वे मुझे पसंद करते हैं,मैं उनसे निकटता महसूस करता हूं.मुझे नॉम चॉमस्की पसंद हैं,एडवर्ड सईद पसंद हैं,रोमिला थापर और पी साईनाथ पसंद हैं.हमारे कुटुंब के एक बड़े बुज़ुर्ग मार्क्सवादी हैं.हमारे आसपास लोकतंत्रवादी विचारधारा के बहुत से कवि लेखक संस्कृतिकर्मी और एक्टिविस्ट हैं.

क्या ये सब वजहें हैं जिनके चलते मुझे डरा रहना चाहिए.एक निहायत ही दुबकेपन में रहना चाहिए.घिरा घिरा सा अपने ही डर दुविधा और सवालों में. अपने बच्चों और परिवार की फ़िक्र करता हुआ. नौकरी करता हुआ. कोई कड़वी बात न कह दूं इसके लिए सजग रहता हुआ,हर महीने तनख्वाह घर लाता हुआ.रोटी मक्खन चैन से खाता हुआ और ईश्वर को प्रणाम कर एक बेफ़िक्र नींद में जाता हुआ.

मैं छत्तीसगढ़ नहीं गया,अरुंधति की तरह पहले नहीं बोला,मेधा पाटकर के साथ नर्मदा पर नहीं लड़ा.दूर रहा, सुरक्षित लेखन किया, उड़ीसा और कर्नाटक और गुजरात मेरा जाना नहीं हुआ. मैंने खुद को किसी जोखिम में नहीं डाला.फिर भी मैं डराहुआ क्यों हूं. जब से डॉक्टर बिनायक सेन को उम्रक़ैद देने की ख़बर आई है,मेरा डर और बढ़ गया है.वो तीस साल से छत्तीसगढ़ में अपनी डॉक्टरी को आम आदिवासियों के बीच अमल में ला रहे थे.

उनको मदद पहुंचा रहे थे.वो शंकर गुहा नियोगी के अघोषित शागिर्द थे.उन्होंने अपनी डॉक्टरी के नए आयाम खोलते हुए इतना भर किया था कि इलाक़े में नक्सलवाद पर काबू पाए जाने के नाम पर की जा रही बर्बरताओं का खुला और पुरज़ोर विरोध किया था. उन्होंने लोगों को मिटाए जाने की उस रौद्र षडयंत्र भरी रणनीति को अन्याय कहा था. बस.

अदालतें इंसाफ़ का एक ठिकाना होती हैं.पर उन्होंने मेरा डर बढ़ा दिया है.हम सबका डर बढ़ा दिया है. मेरे पिता का, मेरी मां का, मेरी पत्नी का, मेरे बच्चे डरेंगे. हम सब डरे हुए हैं. हमारा परिवार, हमारा समाज, हमारे लोग. क्यों?

दशमलव के नीचे की या उससे थोड़ा ऊपर की आबादी दिल्ली मुंबई कोलकाता बंगलौर,हैदराबाद, चेन्नई, पटना, सूरत, बड़ौदा, अहमदाबाद, देहरादून, लखनऊ, जयपुर आदि में अविश्वसनीय किस्म की विलासिता भोग रही है. वह हमारे समय के समस्त सुख भोग रही है.हमारे महादेश की बाकी आबादी न जाने क्यों भुगतते रहने पर विवश है.नीरा राडिया की कंपनी बहुत कम समय में करोड़ों अरबों की कंपनी बन जाती है.उसके लिहाज़ से ये ऊंचा और ऊंचा उठती विकास दर तो ठीक है.

लेकिन छत्तीसगढ़ से लेकर उत्तराखंड और कर्नाटक,उड़ीसा केरल तक एक आम मज़दूर और एक खेतिहर के लिए,किसी भी वक़्त नौकरी न रहने की आशंका में झुलसते एक बड़े निम्न मध्यवर्ग के लिए विकास दर आखिर कहां सोई रहती है. क्या वो इन सोए हुए,डरे हुए, भुगतते हुए और खपते हुए पसीने और धूल से सने हुए लोगों की आकांक्षाओं और सपनों के किनारों से किसी शातिर शैतान बिल्ली की तरह दबे पांव निकल जाती है.

बिनायक सेन की सज़ा क्या हम सबको मिली हुई सज़ा नहीं है.क्या इस चिंता से पीछा छु़डाने का य़े वक़्त नहीं है कि हमें कोई क्या दबोचेगा, हम पहले से सज़ायाफ़्ता हैं, हम इस क़ैद में हैं और मुक्ति के लिए संघर्ष हमारा जारी है. 2010 की अभूतपूर्व आर्थिक तरक्की अगले दस साल यानी 2020 में एक नया मकाम हासिल कर लेगी. वो अकल्पनीय विकास का पड़ाव होगा. लेकिन वह कुछ जद्दोजहद कुछ बेचैनियों कुछ लड़ाइयों का भी एक पड़ाव होगा.

उन पड़ावों तक आते आते बहुत सी जेलों में बहुत से बिनायक सेन आ चुके होंगे.पोस्को और वेदांत एक नया सामाजिक चोला पहन लेंगे.वे कानूनों के पास एक चमकीला रिसॉर्ट बना देंगे.सरकारें उनसे अंततः अभिभूत होती जाएगीं.पर अरुंधति रॉय जैसे और स्वर भी तो आएंगें. नवारुण भट्टाचार्य ये याद दिला चुके हैं कि 'यह मृत्यु उपत्यका नहीं है मेरा देश,यह जल्लादों का उल्लास-मंच नहीं है मेरा देश.'


  • पत्रकार,युवा कवि और अनुवादक.सहारा चैनल में उत्तराखंड ब्यूरो प्रमुख रहने के बाद जर्मन रेडिओ डोयेचे वेले में चार साल तक कार्यरत. स्टीफन हॉकिन्स के अनुवादों के लिए चर्चित.



पोस्टकार्डों से बद्धिजीवी करेंगे प्रतिरोध

मानवाधिकार नेता विनायक सेन को उम्र कैद की सजा के विरोध मे वाराणसी के बुद्धिजीवियों, सामाजिक और छात्र-युवा संगठनो ने जिला मुख्यालय पर बैठक कर विरोध जताया। वक्ताओं ने न्यायपालिका कि विश्वसनियता पर सवाल उठाते हुए कहा कि आम नागरिको की  आवाज को उठाने वाले मानवाधिकार नेताओं और सामाजिक कार्यकर्ताओ के खिलाफ राज्य के दबाव में  न्यायपालिका द्वारा लगातार इस तरह के निर्णय दिये जा रहे हैं।
बैठक को संबोधित करते हुए PUCL के प्रदेश अध्यक्ष चितरंजन सिंह ने कहा कि न्यायालय ने फैसले के माध्यम से तमाम जनतांत्रिक आवाजों को यह चेतावनी दी है कि अगर राज्य के लूट तंत्र के खिलाफ वह आवाज उठाएंगे तो उनका हश्र भी यही होगा। इस प्रतिरोध में फादर आनंद, सुनील सहस्त्रबुद्धे, बल्भाचार्य, लेनिन रघुवंशी, चित्रा सहसत्रबुद्धे, सिद्धार्थजी, बल्लभाचार्य पाण्डे, जवाहर लाल कौल, मुलचन्द सोनकर, राजेश, दिलीप कुमार, मो. मूसा, लक्ष्मण प्रसाद समेत अनेक शहर के बुद्धिजीवियों ने शिरकत की।

बैठक में निर्णय लिया गया कि राष्ट्रपति,मुख्य न्यायाधीश एवं छत्तीसगढ के मुख्यमंत्री को लाखों  की संख्या मे पोस्ट कार्ड भेज कर हम इस निर्णय पर विरोध दर्ज कराएंगे, ताकि भविष्य मे इस तरह के जनविरोधी निर्णय न हो सके।

जिलामुख्यालय पर हुई इस बैठक में CPI(ML), साझा संस्कृति मंच, पहल, प्रगतिशील जनसगंठन, भारतीय किसान यूनियन, सूचना अधिकार अभियान, आसरा, लोक विद्या आश्रम, AISA, मानवाधिकार जन निगरानी समिति, प्रगतिशील लेखक मंच, आशा, आइसा, एशियन ब्रिज इण्डिया, प्रेरणा कला मंच, डिबेट सोसाइटी समेत शहर के बुद्धिजीवियों ने शिरकत की।

द्वारा जारी- गुंजन सिंह, डिबेट सोसाइटी

तितलियों का खू़न


अंशु मालवीय

वे हमें सबक सिखाना चाहते हैं साथी !
उन्हें पता नहीं
कि वो तुलबा हैं हम
जो मक़तब में आये हैं
सबक सीखकर,
फ़र्क़ बस ये है
कि अलिफ़ के बजाय बे से शुरू  किया था हमने
और सबसे पहले लिखा था बग़ावत।

जब हथियार उठाते हैं हम
उन्हें हमसे डर लगता है
जब हथियार नहीं उठाते हम
उन्हें और डर लगता है हमसे
ख़ालिस आदमी उन्हें नंगे खड़े साल के दरख़्त की तरह डराता है
वे फौरन काटना चाहता है उसे।

हमने मान लिया है कि
असीरे इन्सां बहरसूरत
ज़मी पर बहने के लिये है
उन्हें ख़ौफ़ इससे है..... कि हम
जंगलों में बिखरी सूखी पत्तियों पर पड़े
तितलियों के खून का हिसाब मांगने आये हैं।


अंशु मालवीय ने यह कविता विनायक सेन की अन्यायपूर्ण सजा के खिलाफ 27दिसंबर 2010को इलाहाबाद के सिविल लाइन्स,सुभाष चौराहे पर तमाम सामाजिक संगठनों द्वारा आयोजित ‘असहमति दिवस’ पर सुनाई।

Dec 27, 2010

काल्पनिक सबूतों पर सजायाफ्ता


मैं बिनायक सेन के राजनीतिक विचारों से सहमत नहीं हूं,लेकिन यह केवल एक तानाशाह तंत्र में ही संभव है कि असहमत होने वालों को जेल में ठूंस दिया जाए.भारत दोहरे मापदंडों वाले लोकतंत्र के रूप में विकसित हो रहा है...

एम जे अकबर


भारत एक अजीब लोकतंत्र बनकर रह गया है,जहां बिनायक सेन को आजीवन कारावास की सजा सुनाई जाती है और डकैत खुलेआम ऐशो-आराम की जिंदगी बिताते हैं.सरकारी खजाने पर डाका डालने वालों के विरुद्ध कार्रवाई करने के लिए भी सरकार को खासी तैयारी करनी पड़ती है.जब आखिरकार उन पर ‘धावा’बोला जाता है,तब तक उन्हें पर्याप्त समय मिल चुका होता है कि वे तमाम सबूतों को मिटा दें.

आखिर वह व्यक्ति कोई मूर्ख ही होगा,जो तीन साल पहले हुए टेलीकॉम घोटाले के सबूतों को इतनी अवधि तक अपने घर में सहेजकर रखेगा.तीन साल क्या,सबूतों को मिटाने के लिए तो छह महीने भी काफी हैं.क्योंकि इस अवधि में पैसा या तो खर्च किया जा सकता है,या उसे किसी संपत्ति में परिवर्तित किया जा सकता है या विदेशी बैंकों की आरामगाह में भेज दिया जा सकता है.राजनेताओं-उद्योगपतियों का गठजोड़ कानून से भी ऊपर है.अगर भारत का सत्ता तंत्र बिनायक सेन को कारावास में भेजने के बजाय उन्हें फांसी पर लटका देना चाहे,तो वह यह भी कर सकता है.


बच्चों के डॉक्टर विनायक सेन
 बिनायक ने एक बुनियादी नैतिक गलती की है और वह यह कि वे गरीबों के पक्षधर हैं.हमारे आधिपत्यवादी लोकतंत्र में इस गलती के लिए कोई माफी नहीं है.सोनिया गांधी,मनमोहनसिंह,पी चिदंबरम और यकीनन रमन सिंह के लिए इस बार का क्रिसमस वास्तव में ‘मेरी क्रिसमस’होगा. कांग्रेस और भाजपा दो ऐसे राजनीतिक दल हैं,जो फूटी आंख एक-दूसरे को नहीं सुहाते.वे तकरीबन हर मुद्दे पर एक-दूसरे से असहमत हैं.लेकिन नक्सल नीति पर वे एकमत हैं.नक्सल समस्या का हल करने का एकमात्र रास्ता यही है कि नक्सलियों के संदेशवाहकों को रास्ते से हटा दो.

मीडिया इस गठजोड़ का वफादार पहरेदार है,जो उसके हितों की रक्षा इतनी मुस्तैदी से करता है कि खुद गठजोड़ के आकाओं को भी हैरानी हो. गिरफ्तारी की खबर रातोरात सुर्खियों में आ गई. प्रेस ने तथ्यों की पूरी तरह अनदेखी कर दी. हमें नहीं बताया गया कि बिनायक सेन के विरुद्ध लगभग कोई ठोस प्रमाण नहीं पाया गया था.

अभियोजन ने गैर जमानती कारावास के दौरान बिनायक के दो जेलरों को पक्षविरोधी घोषित कर दिया था. सरकारी वकीलों की तरह जेलर भी सरकार की तनख्वाह पाने वाले नुमाइंदे होते हैं.लेकिन दो पुलिसवालों ने भी मुकदमे को समर्थन देने से मना कर दिया.एक ऐसा पत्र,जिस पर दस्तखत भी नहीं हुए थे और जो जाहिर तौर पर कंप्यूटर प्रिंट आउट था,न्यायिक प्रणाली के संरक्षकों के लिए इस नतीजे पर पहुंचने के लिए पर्याप्त साबित हुआ कि बिनायक सेन उस सजा के हकदार हैं,जो केवल खूंखार कातिलों को ही दी जाती है.

यदि काल्पनिक सबूतों के आधार पर बिनायक सेन जैसों को दोषी ठहराया जाने लगे तो हिंदुस्तान में जेलें कम पड़ जाएंगी.
बिनायक सेन स्कूल में मेरे सीनियर थे.वे तब भी एक विनम्र व्यक्ति थे और हमेशा बने रहे,लेकिन वे अपनी राजनीतिक धारणाओं के प्रति भी हमेशा प्रतिबद्ध रहे.मैं उनके राजनीतिक विचारों से सहमत नहीं हूं,लेकिन यह केवल एक तानाशाह तंत्र में ही संभव है कि असहमत होने वालों को जेल में ठूंस दिया जाए.भारत धीरे-धीरे दोहरे मापदंडों वाले एक लोकतंत्र के रूप में विकसित हो रहा है.जहां विशेषाधिकार प्राप्त लोगों के लिए हमारा कानून उदार है,वहीं वंचित तबके के लोगों के लिए यही कानून पत्थर की लकीर बन जाता है.

यह विडंबनापूर्ण है कि बिनायक सेन को सुनाई गई सजा की खबर क्रिसमस की सुबह अखबारों में पहले पन्ने पर थी. हम सभी जानते हैं कि ईसा मसीह का जन्म 25 दिसंबर को नहीं हुआ था. चौथी सदी में पोप लाइबेरियस द्वारा ईसा मसीह की जन्म तिथि 25 दिसंबर घोषित की गई, क्योंकि उनके जन्म की वास्तविक तिथि स्मृतियों के दायरे से बाहर रहस्यों और चमत्कारों की धुंध में कहीं गुम गई थी.क्रिसमस एक अंतरराष्ट्रीय त्यौहार इसलिए बन गया, क्योंकि वह जीवन को अर्थवत्ता देने वाले और सामाजिक ताने-बाने को समरसतापूर्ण बनाने वाले कुछ महत्वपूर्ण मूल्यों का प्रतिनिधित्व करता है. ये मूल्य हैं शांति और सर्वकल्याण की भावना, जिसके बिना शांति का कोई अस्तित्व नहीं हो सकता.

सर्वकल्याण की भावना किसी धर्म-मत-संप्रदाय से बंधी हुई नहीं है.क्रिसमस की सच्ची भावना का सबसे अच्छा प्रदर्शन पहले विश्व युद्ध के दौरान कुछ ब्रिटिश और जर्मन सैनिकों ने किया था, जिन्होंने जंग के मैदान में युद्धविराम की घोषणा कर दी थी और एक साथ फुटबॉल खेलकर और शराब पीकर अपने इंसान होने का सबूत दिया था.अलबत्ता उनकी हुकूमतों ने उन्हें जंग पर लौटने का हुक्म देकर उन्हें फिर से उस बर्बरता की ओर धकेल दिया,जिसने यूरोप की सरजमीं को रक्तरंजित कर दिया था.

यदि काल्पनिक सबूतों के आधार पर बिनायक सेन जैसों को दोषी ठहराया जाने लगे तो हिंदुस्तान में जेलें कम पड़ जाएंगी.ब्रिटिश राज में गांधीवादी आंदोलन के दौरान ऐसा ही एक नारा दिया गया था.यह संदर्भ सांयोगिक नहीं है,क्योंकि हमारी सरकार भी नक्सलवाद के प्रति साम्राज्यवादी और औपनिवेशिक रवैया अख्तियार करने लगी है.


 लेखक ‘द संडे गार्जियन’ के संपादक और इंडिया टुडे के एडिटोरियल डायरेक्टर हैं. बाईलाइन के नाम से लिखे जाने वाले इस कॉलम को रविवार डोट कॉम से साभार लिया जा रहा है.



Dec 26, 2010

न्यायपालिका ध्वस्त कर रही है ढांचा


पीपुल्स यूनियन फॉर सिविल लिबर्टीज (PUCL)के राष्ट्रीय  उपाध्यक्ष विनायक सेन पर राजद्रोह का आरोप लगाकर न्यायपालिका ने अपने गैरलोकतांत्रिक और फासीवादी चेहरे को एक बार फिर उजागर किया है। जर्नलिस्ट यूनियन फॉर सिविल सोसाइटी शर्मनाक  मानती है. विनायक सेन प्रकरण के इस फैसले ने अन्ततः लोकतांत्रिक ढ़ांचे को ध्वस्त करने का काम किया है। यह न्यायपालिक की सांस्थानिक जनविरोधी तानशाही है, जिसका हम विरोध करते हैं।

जो काम सत्ता के सहारे पूंजीवादी ताकतें कार्यपालिका और व्यवस्थापिका से कराती थीं उसे अब न्यायपालिका कर रही है। पिछले दिनों विकिलिक्स ने हमारी पूरी व्यवस्था की पोल खोल दी की वह किस तरह देश की महत्वपूर्ण जानकारियों को अमेरिका जैसे देशों से चोरी-छिपे बताती है, और उसके दबाव में जनविरोधी नीतियों को लागू करती है।नक्सलवाद उन्मूलन के नाम पर चलाया जा रहा  आपरेशन ग्रीन हंट भी इसी का हिस्सा है.

विनायक सेन को आजीवन कारावास देकर न्यायालय ने वंचित तबके के प्रतिरोध को खामोश रहने की चेतावनी दी है,जो अब तक न्याय के अंतिम विकल्प के रुप में न्यायपालिका में उम्मीद लगाया था। हिंदुस्तान में न्यायालयों द्वारा पिछले दिनों जिस तरह से संविधान प्रदत्त धर्मनिरपेक्षता और लोकतांत्रिक मूल्य जिनके तहत आदमी और आदमी के बीच धर्म,जाति और लिंग के आधार पर किसी तरह का भेदभाव न करने का आश्वासन दिया गया था को खंडित किया जा रहा है.

छत्तीसगढ़ लोक सुरक्षा कानून जिसके तहत विनायक सेन को देशद्रोही कहा गया वह खुद ही एक जनविरोधी कानून है। जो सिर्फ और सिर्फ प्रतिरोध की आवाजों को खामोश करने वाला कानून है। विनायक सेन लगातार सलवा जुडुम से लेकर तमाम जनविरोधी प्रशासनिक हस्तक्षेप के खिलाफ आवाज ही नहीं उठाते थे बल्कि वहां की आम जनता के स्वास्थ्य शिक्षा से जुड़े सवालों पर भी लड़ते थे। हम यहां इस बात को भी कहना चाहेंगे कि जिस तरह न्यायालय ने डा0 सेन को आजीवन करावास दिया, ठीक इसी तरह भारतीय न्यायालय की इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनउ बेंच ने तीस सितंबर 2010को कानून और संविधान को ताक पर रखकर आस्था और मिथकों के आधार पर अयोध्या फैसला दिया।


न्यायपालिका के चरित्र को इस बात से भी समझना चाहिए कि देश की राजधानी दिल्ली में हुए ‘बाटला हाउस फर्जी मुठभेड़ कांड’पर न्यायालय ने पुलिस का मनोबल गिरने की दुहाई देते हुए इस फर्जी मुठभेड़ कांड की जांच की मांग को खारिज कर दिया था। भंवरी देवी से लेकर ऐसे तमाम फैसले बताते हैं कि हमारी न्यायपालिका का रुख दलित, आदिवासी, अल्पसंख्यक और महिला विरोधी रहा है।

ऐसे में हम इस बात को कहना चाहेंगे कि जो न्यायालय जनता के लोकतांत्रिक अधिकारों की अवमानना कर रहे हैं और अब अदालतों की अवमानना करने का पूरा अधिकार  जनता को है। क्योंकि विनायक सेन जनता के लिए,जनता द्वारा स्थापित लोकतंत्र के सच्चे सिपाही हैं। हम मांग करते हैं कि केंद्र और राज्य सरकार विनायक सेन के खिलाफ लगाए गए जनविरोधी राजनीति से प्रेरित आरोंपों व जनविरोधी छत्तीसगढ़ लोक सुरक्षा कानून को तत्काल रद्द करे और विनायक सेन को रिहा करे।



अदालतें कर रही हैं न्याय का शिकार

न्याय के इस खेल में साक्ष्य एक फुटबाल की तरह है जिससे गोल भी हो सकता है और फाउल भी। न्याय के नए खेल में अब तो साक्ष्य की जरूरत ही खत्म होती दिख रही है...

अंजनी कुमार  

यह संयोग था कि मैं उस दिन पीयूडीआर की शनिवार बैठक में उपस्थित था। हरीश रायपुर में विनायक सेन पर चल रहे मुकदमे के बारे में बता रहे थे। सरकारी वकील विनायक सेन को माओवादी और  उनका समर्थक सिद्ध करने के लिए यह तर्क पेश कर रहा था कि उनके घर से मार्क्स की प्रसिद्ध पुस्तक ‘कैपीटल’ तथा माओ की किताबें मिलीं हैं। इन पुस्तकों में पूंजीवाद को ध्वस्त करने की खतरनाक बातें लिखी गई हैं।

सरकारी वकील ने इस केस के कुछ और भी ब्यौरे  दिए। उस समय मेरे मन में यह उधेड़बुन चलती रही कि जज ने सरकारी वकील के इतने लचर तर्कों को तरजीह देकर क्यों सुना होगा। मन में ये सवाल यह जानते हुए भी उठा कि न्याय की उम्मीद करना एक जुए के खेल जैसा है, जिसमें विनायक सेन के मामले में हम हार गए। दरअसल, न्याय के इस खेल में हम थे भी कहां! न्याय तो जज को करना था।

कुछ-कुछ ऐसा ही हर जगह चल रहा है। हम अपने पक्ष में साक्ष्य और गुनहगार न होने की दावेदारी पेश कर रहे हैं, जबकि जज की चाहत ही कुछ और बन रही है। मसलन, इसी से कुछ मिलता-जुलता एक और मुकदमा उत्तराखंड में चल रहा है। वहां जब सरकारी वकील ने देहरादून जेल में बंद प्रशान्त राही के खिलाफ यह दलील दी कि उनके पास से लैपटाप मिला है,तब जज ने पूछा कि उसमें क्या-क्या बातें हैं,इसका लिखित ब्यौरा दो। जब वकील ने लैपटाप की बातों को मौखिक और लिखित रूप से पेश कर पाने में अक्षमता दिखाई तब जज ने कोर्ट में ही सरकारी वकील पर विरोधियों से मिल जाने, पैसा खाकर साक्ष्यों को खत्म करने जैसे तमाम आरोप जड़ दिए।

प्रशांत राही मामले में जज के रवैए के कारण मुझे अभी से न्याय की कोई उम्मीद नहीं दिख रही है। ऐसे हजारों मामले हो सकते हैं,जहां पहले से ही न्याय की उम्मीद नहीं रहती और देश में ऐसे सैकड़ों मामले हैं जहां आमजन भी पहले से जानता है कि न्याय क्या होने वाला है। न्याय के इस खेल में साक्ष्य एक फुटबाल की तरह है जिससे गोल भी हो सकता है और फाउल भी। न्याय के नए खेल में अब तो साक्ष्य की जरूरत ही खत्म होती दिख रही है। मसलन,बाबरी मस्जिद का मामला। जहां न्याय में लिखा जाता है कि राम के पैदा होने का साक्ष्य पेश करना जरूरी नहीं है क्योंकि वह है...।

बाबरी मस्जिद मामले में केस जमीन पर मालिकाना दावेदारी का है,जबकि न्याय जमीन के विभाजन के रूप में मिलता है। अफजल गुरू मामले में तो सारा मामला ही ‘लोगों की इच्छा’ पर तय कर दिया गया। वह भी आजीवन सजा नहीं, बल्कि सजाए मौत। साक्ष्य की पेशी जज की चेतना में ब्रिटिशकाल के 1870, 1872 या 1876 इत्यादि से कोई रूपाकार ग्रहण करेगी या फिर आधुनिक काल की आस्था और इच्छा से इसे तय करना सचमुच कठिन होने लगा है। यह बात लिखते हुए मुझे बरबस राजस्थान में एक दलित महिला के बलात्कार तथा तमिलनाडु में एक दलित बस्ती को जलाने व लोगों को मार डालने से संबधित केस और न्याय की बातें ध्यान में आ रही हैं।

दोनों ही मामलों में जज इस बात पर जोर देता है कि सवर्ण कैसे दलित स्त्री को छू सकता है, जबकि वह अछूत है। एक अछूत की बस्ती में सवर्ण कदम क्यों रखेगा?महाराष्ट्र के खैरलांजी की घटना को जज ने दलित उत्पीड़न की घटना मानने से ही इन्कार कर दिया और मुंबई हाईकोर्ट ने तो मजदूरों के हड़ताल और बोनस के मसले पर अपने न्याय में संवैधानिक देय अधिकारों को भी समय के साथ संशोधित करने पर जोर देते हुए उनकी मांग को ही खारिज कर दिया।

विनायक सेन मामले में जज के न्याय का आधार है गवाह अनिल सिंह,जो कि पीयूष गुहा से जब्त किए गये पत्रों के समय के हालात से जुड़े साक्ष्य का प्रत्यक्षदर्शी है। अनिल सिंह कपड़े का व्यापारी है,जिसने बताया कि पीयूष गुहा को 6 मई 2007 को पुलिस ने स्टेशन रोड से पकड़ा और उसके पास के बैग से तीन पत्र मिले। यह व्यक्ति ही एकमात्र स्वतंत्र गवाह है जिसके बयान पर न्याय की तकरीर निर्णय में बदल गई।

गौरतलब है कि सुप्रीम कोर्ट में जांच अधिकारी बीबीएस राजपूत ने अपने एफीडेविट में बताया है कि पीयूष गुहा होटल महिन्द्रा से पकड़े गए। सरकारी वकील ने होटल के मैनेजर और रिसेप्शनिस्ट को इस साक्ष्य के रूप में जज के सामने पेश किया कि विनायक सेन ने तीनों पत्र पीयूष गुहा को उसी होटल में दिए थे। हालांकि कोर्ट में दोनों ने इस बात को अस्वीकार किया। यहां इस बात पर भी गौर करना चाहिए कि ये पत्र दो साल पुराने हैं,जबकि उसकी लिखावट ताजा थी और पत्र कहीं से भी फोल्ड नहीं थे।

आरोप है कि है यह पत्र माओवादी नेता नारायण सान्याल ने जेल से लिखा और इसे विनायक सेन ने पीयूष गुहा तक पहुंचाया। नारायण सान्याल और विनायक सेन की जेल में मुलाकात के दौरान हमेशा जेल अधिकारी मौजूद रहे। प्रत्येक पत्र को कड़ी जांच के बाद ही जारी किया गया। कोर्ट में भी आधे दर्जन जेल अधिकारी पेश हुए और उनके बयानों का निहितार्थ षडयंत्र रचने और पत्र पार कराने के आरोप का अस्वीकार किया जाना था।

नारायण सान्याल व विनायक सेन के बीच गहरा संबंध साबित करने के लिए नारायण सान्याल के मकानमालिक को पेश किया गया। मकानमालिक ने अदालत को बताया कि विनायक सेन के कहने पर ही उसने सान्याल को मकान दिया और जनवरी 2006तक सबकुछ ठीक-ठाक चलता रहा। इस मुकदमे में नारायण सान्याल को माओवादी सिद्ध करने के लिए सरकारी वकील ने कुछ दलीलें पेश की हैं। पहला,नारायण सान्याल ने अपने पत्र में संबोधन के तौर पर ‘कामरेड विनायक सेन’ लिखा है। सरकारी वकील के अनुसार ‘कामरेड उसी को कहते हैं जो माओवादी है।’


दूसरा,माओवादियों  ने एक पुलिस अधिकारी को बंधक बनाकर यह मांग रखी कि माओवादी क्षेत्र से सीआरपीएफ को हटाया जाये। यही मांग पीयूसीएल भी कर रहा है। इससे यह दिखता है कि पीयूसीएल माओवादियों का हितैषी संगटन या सहयोगी मोर्चा है।’ तीसरा,विनायक सेन के घर से पीपूल्स मार्च व माओ की संग्रहित रचनाएं मिलीं। चौथा, कोर्ट में सरकारी वकील ने बहुत से पत्र व्यवहार को प्रस्तुत करते हुए बताया कि इनके आईएसआई से खतरनाक संबंध हैं। इस आईएसआई का खुलासा यह है : इंडियन सोशल इंस्टीट्यूट। यह संस्था दलित, आदिवासी, स्त्री, बच्चों, अल्पसंख्यकों के विभिन्न पहलुओं पर शोध व उनके विकास के लिए विभिन्न तरह से सक्रिय रहती है।

इन सारी दलीलों पर जज की दलील काफी भारी साबित हुई और जो अपनी संरचना की वजह से निर्णायक भी साबित हुई और विनायक सेन अपराधी करार दिये गये। विनायक सेन को इस केस में घसीटने के पीछे मूल कारण उनका 'सलवा जूडूम' के खिलाफ राष्ट्रीय स्तर पर विरोध का माहौल बनाने व छत्तीसगढ़ में निर्णायक प्रतिरोध के लिए लोगों को खड़ा करना था।

सलवा जूडूम के तहत 700गांवों को उजाड़ दिया गया। लगभग एक लाख लोगों को शरणार्थी बना दिया गया। हजारों लोगों को जेल में ठूंसा गया। अकेले जगदलपुर जेल में ही लगभग ढ़ाई हजार लोग नक्सली होने के आरोप में जेल में बंद हैं। हत्या, बलात्कार, आगजनी  का नंगा नाच जिस तरह सलवा जूडूम के नाम पर शुरू हुआ, उससे तो आज खुद सरकार ही मुकर जाने के लिए बेताब दिख रही है और अब आपरेशन ग्रीन हंट को आगे बढ़ाया जा रहा है।

ऑपरेशन ग्रीन हंट छत्तीसगढ़ के साथ छह राज्यों में और फैला दिया गया है। इसका अर्थशास्त्र है कॉर्पोरेटाइजेशन। कारपोरेट की खुली लूट। टाटा व एस्सार ने सलवा जूडूम को चलाने में खुलकर हिस्सेदारी की। अब पूरा कारपोरेट सेक्टर व उसका संगठन,उसकी सरकार व न्यायपालिका खुलकर भागीदारी में उतर रही हैं। यह बिडम्बना नहीं बल्कि क्रूर सच्चाई है कि कारपोरेट सेक्टर की आपसी लड़ाई में वेदांता का एक पंख कतरकर राहुल गांधी को नियामगिरी व आदिवासियों का ‘सिपाही’ घोषित कर दिया जाता है, आदिवासी महिलाओं के साथ मार्च पास्ट कराया जाता है। वहीं आदिवासी समुदाय के मूलभूत जीवन के अधिकार के पक्ष में मांग उठाने वाले एक डाक्टर को,जो उनके बीच जीवन गुजारते हुए गरीबों और बीमारों की सेवा करता है उसे ‘देशद्रोही’ घोषित कर दिया जाता है।

ऐसा लगता है अब समय आ चुका है कि न्याय के नए पाठ के साथ शब्द का अर्थ-विमर्श भी बदल दिया जाय। यहीं से यह स्वीकार किया जाय कि इस कारपोरेट राज में देश की 90करोड़ आबादी देशद्रोही है...न्याय के चौखट पर जाकर मुहर लगवाने का इंतजार क्यों करना है ....जिस गति से देशद्रोह के मुकदमे बढ़ रहे हैं उससे कल हम या आप कोई भी हो सकता है देशद्रोह का अभियुक्त ...सजा ए आजीवन ... या सजा ए मौत ...