Oct 15, 2010

नहीं देंगे दलितों को आरक्षण

 
एनजीओ सामाजिक जिम्मेदारियों का कितना निर्वहन कर रहे हैं यह जगजाहिर है। ऐसे में इन औद्योगिक समूहों का लचर तर्क,टालू रवैया और खैरात बांटने का प्रस्ताव उनके मुनाफे की हवस एवं सामाजिक जिम्मेदारियों के प्रति घोर संवेदनहीनता को ही उजागर करता है।

अंजनी कुमार

कई बार महत्वपूर्ण मुद्दे शोर में गुम हो जाते हैं। यह संयोग है या फिर जान-बूझकर, मगर एक बार फिर सामाजिक न्याय के मसले को राष्ट्रमंडल खेलों के शोरशराबे के बीच से चुपचाप गुजार दिया गया। देश के कारपोरेट जगत के तीन बड़े संगठनों फिक्की,एसोचेम और सीआईआई ने निजी क्षेत्र में अनुसूचित जाति-जनजाति के लिए उद्यम के चंद क्षेत्रों में महज 5प्रतिशत आरक्षण लागू करने से मना कर दिया।

दो सप्ताह पहले आयी इस खबर को ज्यादातर अखबारों ने या तो बहुत कम स्थान दिया या फिर तवज्जो ही नहीं दी। लेकिन इससे मुद्दे की प्रासंगिकता पर फर्क नहीं पडे़गा कि यह धार्मिक आस्था,पहचान से अधिक जीविका,जीवन और सामाजिक भागीदारी से जुड़ा बुनियादी प्रश्न है। लगभग सालभर पहले प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने औद्योगिक समूहों के समक्ष भाषण में सामाजिक जिम्मेदारी निभाने,वेतनमान की स्थिति को दुरुस्त करने के साथ-साथ अनुसूचित जाति-जनजाति के लिए न्यूनतम स्तर पर आरक्षण लागू करने का आग्रह किया था। उस समय इन सारे मसलों को लेकर कारपोरेट जगत ने काफी हो-हल्ला मचाया था। प्रधानमंत्री ने यह प्रस्ताव सामाजिक न्याय मंत्री मुकुल वासनिक की मई महीने में दी गयी एक रिपोर्ट और सलाह पर पेश किया था।

प्रधानमंत्री ऑफिस के सचिव ने भारतीय औद्योगिक नीति एवं प्रोत्साहन विभाग ने आरक्षण के इस प्रस्ताव को आगे बढ़ाया। उपरोक्त विभाग उद्योग और व्यापार मंत्रालय के तहत काम करता है। उद्योग मंत्री आनंद शर्मा ने 2 अगस्त को इसके लिए औपचारिक पत्र कारपोरेट जगत को भेजा कि वे इस मुद्दे पर अपनी राय शीघ्र भेजें। इस केन्द्रीय स्तर के प्रयास में इन औद्योगिक समूहों से आग्रह किया गया कि यदि वे सरकारी प्रोत्साहन से लाभान्वित हो रहे हैं तो वे सरकार की सामाजिक जिम्मदारियों का भी निर्वहन करें।

इसके जबाब में उसी समय नाम न छापने की शर्त पर कारपोरेट जगत के तीन संगठनों के अधिकारियों ने यह कहा कि वे इस तरह के कदम नहीं उठा सकते और दावा किया कि कारपोरेट जगत के ये धुरधंर देश के एक दो जिलों में विकास कार्य में हिस्सेदारी कर रहे हैं। इसलिए वे मेधा के स्तर को नीचे नहीं गिराना चाहते और आरक्षण देकर किसी भी तरह का खामियाजा भुगतना नहीं चाहते।

औद्योगिक समूहों ने आरक्षण देने की जगह समाज के दमित तबकों को ‘योग्य’बनाने के लिए आर्थिक और शैक्षणिक सहयोग करने का प्रस्ताव दिया। टाटा,रिलायंस,अजीम प्रेमजी जैसे कई ग्रुप सामाजिक भागीदारी के नाम पर एनजीओ के सहयोग से इस दिशा में काम कर रहे हैं। रिपोर्ट के मुताबिक उनके इस कार्यक्रम से लक्षित समूह को फायदा हो या न हो इन कंपनियों को सस्ता श्रम तथा बाजार जरूर उपलब्ध हो जाता है। सामाजिक भागीदारी में इनकी व्यय राशि से इन्हें एक तरफ सामाजिक समर्थन हासिल हो जाता है,वहीं इस राशि का एक बड़ा हिस्सा एनजीओकर्मी और संचालक डकार जाते हैं।

कुकुरमुत्तों की तरह उगे एनजीओ इन सामाजिक जिम्मेदारियों का कितना निर्वहन कर रहे हैं और खुद कितना डकार जाते हैं, यह अब जगजाहिर हो चुका है। ऐसे में इन औद्योगिक समूहों का लचर तर्क, टालू रवैया और खैरात बांटने का प्रस्ताव उनके मुनाफे की हवस एवं सामाजिक जिम्मेदारियों के प्रति घोर संवेदनहीनता को ही उजागर करता है। आरक्षण के मुद्दे पर खुद सरकार की ही नीति साफ नहीं होने के चलते न तो लक्षित समूह इससे ठीक से लाभान्वित हो पाया और न ही इसका प्रभावी प्रयोग हो पाने की स्थिति दिख रही है।


रद्द करें कारपोरेट जगत का आरक्षण
  • कारपोरेट जगत को न केवल सरकारी आरक्षण,बल्कि भरपूर सरकारी सहयोग की जरूरत पड़ रही है।
  • कारपोरेट जगतविभिन्न तरह की छूट हासिल कर वर्तमान योजना के तहत 5लाख करोड़ की देनदारी से मुक्त हुआ है।
  • मुनाफा एवं निवेश टैक्स में छूट से इन्हें प्रतिवर्ष 80000 करोड़ रूपए का फायदा होता है।


शैक्षिक नीति को जिस तरह ढाला जा रहा है उससे दमित तबका तो दूर,एक आम परिवार से ‘योग्यता’ हासिल युवा शायद ही कुछ बन पाये। नरेगा जैसी योजनाओं में इस तरह के आरक्षण का अभाव यह बताता है कि सरकार किस तरह इस मुद्दे पर सोच रही है।

दिल्ली विश्वविद्यालय गवाह है कि वहां आज तक कोई भी दलित शिक्षक विभागाध्यक्ष नहीं बन सका। प्रोफेसर का तमगा भी उन्हें हासिल नहीं हो सका। दिल्ली विश्वविद्यालय में कुल 10000 शिक्षक कार्यरत हैं। आरक्षण के तहत कुल 2250 शिक्षक एससी एसटी के होने चाहिए, लेकिन यह संख्या 650 है। पिछडा़ वर्ग के 2700 पदों पर कुल 100 भर्ती हो पाये। आज सरकारी कार्यालयों में 74008 बैकलॉग रिक्तियां हैं, जबकि रोजगार कार्यालय में 2004 तक 40457.7 एससी एसटी समुदाय से आने वाले लोग रोजगार की लाइन में खड़े भी थे। तीस अगस्त को पी.चिदम्बरम ने पिछली सरकार (यूपीए-1) के दौरान के 5400 बैकलाग को तुरंत भरने के लिए कड़े कदम उठाने की घोषणा की।



दलित आदिवासी समुदाय के खिलाफ अपराध की घटनाओं में तेजी से वृद्धि हो रही है,जबकि सामाजिक क्षेत्र में हिस्सेदारी लगातार गिर रही है। चिदम्बरम की चिंता दलित और आदिवासी समुदाय के प्रति कितनी है,यह उनकी नीतियों में तो साफ नजर आता ही है,साथ ही कारपोरेट जगत के प्रति उनकी चुप्पी में भी साफ-साफ दिखायी देता है। कारपोरेट जगत के इस अगुआ से सामाजिक न्याय की उम्मीद करना कुछ वैसा ही होगा,जैसा पूंजीपति से मुनाफा छोड़ देने और मजदूरों का पक्षपात करने की आशा पालना।

आज जिन क्षेत्रों में लागू हो पाया वे ऐसे क्षेत्र सदियों से उनके पारंपरिक कार्य व्यवहार से जुड़े हुए हैं। सीवेज और चमड़ाकर्म,खेत मजदूरी इत्यादि इसी श्रेणी में आते हैं। इसमें सरकारी नीति प्रभावी रही है या पारंपरिक कार्यव्यापार,इसकी समीक्षा जरूर करनी चाहिए। दरअसल,उपरोक्त कर्म भारतीय समाज की सामंती व्यवस्था का ही विस्तार रहा है। अन्यथा यह कैसे संभव है कि प्रशासनिक, शैक्षिक, न्यायिक क्षेत्र में दलित समाज की भागीदारी न्यूनतम है या फिर नहीं है और इसकी शुचिता बचाये रखने के नाम पर समय-समय पर साफ सफाई चलती रहती है,योग्यता के नाम पर निष्कासन चलता रहता है।
 

औद्योगिक समूह जिस समय सामाजिक जिम्मेदारियों से मुकर जाने के लिए ‘योग्यता’और ‘उत्पादकता’का तर्क पेश कर रहे होते हैं,ठीक उसी समय यही अयोग्य और कम उत्पादक असंगठित मजदूर उनके मुनाफे का अधिकांश उत्पादित कर रहे होते हैं। आज देश में असंगठित मजदूरों का प्रतिशत 98 प्रतिशत पहुंच चुका है। उदाहरण के तौर पर यदि कॉमनवेल्थ खेल को ही लें, तो वहां सरकार ने निजी कंपनियों की मार्फत आये लगभग चार लाख मजदूूरों के बदौलत काम पूरा किया। ये सारे मजदूर दिहाड़ी पर काम कर रहे थे और अधिकांश दलित थे। करीब 80 हजार करोड़ के इस प्रोजेक्ट में लूट, भ्रष्टाचार पर ऊपरी तबके का संगठित आरक्षण था।

आज पूरा रियल स्टेट,कपड़ा और चमड़ा उद्योग, हीरे तथा आभूषण का उद्योग इत्यादि इन्हीं असंगठित मजदूरों पर टिका हुआ है। अकूत मुनाफा कमाने वाले ये व्यापारी और उद्योगपति एक बार भी इन मजदूरों का शोषण करते हुए उनकी योग्यता पर सवाल खड़ा नहीं करते, बल्कि उनकी पीठ पर और मजबूती से बैठ जाते हैं। उनके सस्ते श्रम की बदौलत ही अंतरराष्ट्रीय बाजार में वे निर्यात की कूबत पैदा कर रहे होते हैं। यही वह समुदाय है जिसके जल, जंगल, जमीन को औने-पौने दामों पर हड़पकर कच्चा माल बेचने और विदेशी निवेश आकर्षित कर पाने में उद्योगपति-व्यापारी सफल हो रहे हैं।
 
 हम एक बार यह मान भी लें कि दलित समुदाय अयोग्य है, तब उनके मुनाफे की व्याख्या कैसे हो पाएगी? और तब क्या यह सवाल नहीं बनता है कि विश्व बाजार में इन्हें टिके रहने के लिए सरकारी सहयोग की जरूरत क्यों पड़ रही है?हर साल डेढ़ लाख करोड़ के सरकारी सहयोग और विभिन्न तरह की संरक्षण हासिल करने बावजूद इनकी गाड़ी हमेशा खतरे के रास्ते की ओर ही जा रही है और इससे देश को व्यापक घाटा हो रहा है। तब सवाल यह उठता है कि इनके वित्त और अन्य संरक्षण को छीन लेना चाहिए और इन योग्य लोगों को बाजार की खुली प्रतियोगिता में वैसे ही छोड़ देना चाहिए जैसा वे दूसरों के संदर्भ में तर्क दे रहे हैं।

पूंजी,बाजार,मुनाफा और रोजगार तथा मानवीय जीवन एक सामाजिक प्रक्रिया और राजनीतिक-सांस्कृतिक निर्णय होता है। उसी तरह सामाजिक अंर्तक्रियाएं भी इसका अभिन्न हिस्सा होती हैं। यदि औद्योगिक समूह सस्ते श्रम और मुनाफे के लिए आमजन,मजदूर-किसान एवं आदिवासी पर निर्भर हैं, तो यह निर्भरता एकतरफा होने के तर्क पर नहीं टिक सकती कि यह सामाजिक न्याय के मौलिक नियमों के खिलाफ है।



लेखक राजनितिक कार्यकर्त्ता और स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं. उनसे anjani.dost@yahoo.co.in पर संपर्क किया जा सकता है.

हर मस्जिद की खिडकी जब मंदिर में खुलती


कांधला में जामा मस्जिद और लक्ष्मी नारायण मंदिर जमीन के एक ही टुकड़े पर खड़े होकर 'धर्म के कारोबारियों' को आईना दिखा रहे हैं। मौलाना महमूद बख्श कंधेलवी ने जमीन का एक टुकडा हिंदुओं को सौंप दिया था ,जहाँ आज मंदिर में आरती होती है और मस्जिद से आजान की आवाज बुलंद होती है...

 
सत्यजीत चौधरी

बाबरी मस्जिद का विवादित ढांचा जब 6 दिसंबर 1992 को ढहाया गया, तब मैं जवान हो रहा था। बारहवीं में था। पिताजी उन दिनों बुलंदशहर में बतौर अध्यापक तैनात थे। हम सब उनके साथ ही रह रहे थे। दंगे भडक चुके थे। हमने छत पर चढïकर दूर मकानों से उठती लपटों की आंच महसूस की थी। मौत के खौफ से बिलबिलाते लोगों की चीखें सुनी थीं। हैवानियत का नंगा नाच देखा था।

'जयश्री राम' और 'अल्लाह ओ अकबर' के नारों में भले ही ईश्वर और अल्लाह का नाम हो, लेकिन तब उन्हें सुनकर रीढ़  में बर्फ-सी जम जाती थी। पूरा देश जल रहा था। अखबार और रेडियो पर देशभर से आ रही खबरें बेचैन किए रहतीं। हमारे हलक से निवाले नहीं उतरते थे। तभी से 'छह दिसंबर' मेरे दिमाग के किसी गोशे में नाग की तरह कुंडली मारकर बैठ गया था। कमबख्त तबसे शायद हाईबरनेशन में पड़ गया  था।

कांधला में अमन की मिसाल: मंदिर-मस्जिद एक साथ
इतने वर्षों  बाद जब राम जन्मभूमि-बाबरी मस्जिद विवाद पर इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ खंडपीठ का फैसला सुनाने का ऐलान हुआ तो नाग कुलबुलाकर जाग गया। पिछले एक महीने से नाग और राज्य सरकार की तैयारियों ने बेचैन किए रखा। अयोध्या फैसले को लेकर उत्तर प्रदेश के एडीजी (लॉ एंड आर्डर) बृजलाल के प्रदेशभर में हुए तूफानी दौरों ने और संशय में डाल दिया।

 इसके बाद शुरू हुआ 'संयम की सीख का हमला। प्रदेश सरकारों से लेकर केंद्र सरकार,और संघ-भाजपा से लेकर मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड,दारुल उलूम तक फैसले का सम्मान करने की घुट्टी पिलाते मिले। फिर मामला सुप्रीम कोर्ट में चला गया तो कुछ सुकून मिला, लेकिन चार दिन बाद ही जब सर्वोच्च अदालत ने मामला फिर हाईकोर्ट को लौटा दिया तो वही बेचैनी हावी हो गई।

मुजफ्फरनगर गर्भनाल की तरह मुझसे जुड़ा है। मम्मी-पापा और बच्चे वहीं रहते हैं। 'फैसले की घड़ी'जैसे-जैसे नजदीक आती गई, जान सूखती चली गई। मैं दिल्ली में, बच्चे और मां-पिताजी वहां। मुजफ्फरनगर के कुछ मुस्लिम दोस्तों की टोह ली। वे भी हलकान मिले। हिंदुओं को टटोला, वहां भी बेचैनी का आलम। बस एक सवाल सबको मथे जा रहा था कि 'तीस सितंबर'को क्या होगा। कुछ और लोगों से बात हुई तो पता चला कि पुलिस वाले गांव-गांव जाकर उन लोगों के बारे में जानकारियां इकट्ठा कर रहे हैं, जिनकी छह दिसंबर, 1992 के घटनाक्रम के बाद भड़के दंगों में भूमिका थी या जो इस बार भी शरारत कर सकते थे। इस दौरान एक-दो बार मुजफ्फरनगर के चक्कर भी लगा आया। लोग बेहद डरे-सहमे मिले। उन्हें लग रहा था कि तीस तारीख को फैसला आते ही न जाने क्या हो जाएगा।

सबको एक ही फिक्र खाए जा रही थी कि 'छह दिसंबर'न दोहरा दिया जाए। लोगों को लग रहा था कि शैतान का कुनबा फिर सड़कों पर निकल आएगा। पथराव होगा,आगजनी अंजाम दी जाएगी, अस्मत लुटेगी,खून बहेगा। खैर 'तीस सितंबर' भी आ गया । उस दिन मैं गाजियाबाद स्थित 'एक कदम आगे'के कार्यालय में बैठा था। देश के लाखों लोगों की तरह मैं भी टीवी से चिपका था। खंडपीठ के निर्णय सुनाने के कुछ ही देर बाद हिंदू संगठनों के वकील और उनके कथित प्रतिनिधि न्यूज चैनलों पर नमूदार हो गए। 

जजों ने  फैसले की व्याख्या जिस अंदाज में शुरू की, उसने सभी को डराकर रख दिया। कई चैनल ऐसे भी थे,जिन्होंने समझदारी से काम लिया और फैसले की प्रमुख बातों को समझने के बाद ही मुंह खोला।। बहरकैफ,इस दौरान मैं लगातार मुजफ्फरनगर के लोगों के संपर्क में रहा। इस बीच, खबर आई की मुजफ्फरनगर जिले की हवाई निगरानी भी हो रही है। सुरक्षा प्रबंधों से साफ हो गया था कि शासन ने मुजफ्फरनगर जनपद को संवेदनशील जिलों में शायद सबसे ऊपर रखा था। राज्य सरकार कोई रिस्क नहीं लेना चाह रही थी।

ढहाए जाने से पहले बाबरी मस्जिद
 मैं घबराकर इंटरनेट की तरफ लपका। मेरी हैरत की इंतहा नहीं रही,जब मैंने  पाया कि ट्वीटर,फेसबुक और जीटॉक के अलावा ब्लाग्स पर 'जेनरेशन नेक्स्ट' अपना वर्डिक्ट दे रही थी, अमन, एकजुटता और भाईचारे का 'फैसला'। एक भी ऐसा मैसेज नहीं मिला जो नफरत की बात कर रहा हो। पहले तो यकीन नहीं हुआ,फिर इस एहसास से सीना फूल गया कि देश का भविष्य उन हाथों में है, जो हिंदू या मुसलमान नहीं, बल्कि इंसान हैं। कह सकते हैं कि भविष्य का भारत महफूज हाथों में हैं। कई युवाओं ने फैसले पर ट्वीट किया था-'न कोई जीता,न कोई हारा। आपने नफरत फैलाई नहीं कि आप बाहर।'

कहीं पढ़ा था कि पुणे में घोरपड़ी गांव है,जहां मस्जिद की खिड़की हिंदू मंदिर में खुलती है। अहले-सुन्नत जमात मस्जिद और काशी विशेश्वर मंदिर को अगर जुदा करती है,तो बस ईंट-गारे की बनी एक दीवार। एक और रोचक तथ्य इस दोनों पूजास्थलों के बारे में यह है कि जब बाबरी विध्वंस के बाद पूरे देश में दंगे भड़क रहे थे,पुणे में दोनों समुदाय के लोगों ने मिलकर मंदिर का निर्माण कर रहे थे। निर्माण के लिए पानी मस्जिद से लिया जाता था। याद आया कि ऐसी ही शानदार नजीर हम मुजफ्फरनगर वाले काफी पहले पेश कर चुके हैं।

कांधला में जामा मस्जिद और लक्ष्मी नारायण मंदिर जमीन के एक ही टुकड़े पर खड़े होकर 'धर्म के कारोबारियों' को आईना दिखा रहे हैं। माना जाता है कि मस्जिद 1391 में बनी थी। ब्रिटिश शासनकाल में मस्जिद के बगल में खाली पड़ी जमीन को लेकर विवाद हो गया। हिंदुओं का कहना था कि उस स्थान पर मंदिर था। मामला किसी अदालत में नहीं गया। दोनों फिरकों के लोगों ने बैठकर विवाद का निपटारा कर दिया।

तब मस्जिद के इंचार्ज मौलाना महमूद बख्श कंधेलवी ने जमीन का वह टुकडा हिंदुओं को सौंप दिया। वहां आज लक्ष्मी नारारण मंदिर शान से खड़ा है। मंदिर में आरती होती है और मस्जिद से आजान की आवाज बुलंद होती है। सह-अस्तित्व की इससे बेहतर मिसाल और क्या होगी। यह है हिंदुस्तान और हिंदुस्तानियत की मिसाल।


लेखक  पश्चिमी उत्तर प्रदेश से निकलने वाले हिंदी पाक्षिक  अखबार 'एक कदम आगे'के संपादक हैं और सामाजिक मसलों पर लिखते हैं.  उनसे satyajeetchaudhary@gmail.com पर संपर्क किया जा सकता है.



Oct 14, 2010

दिल्ली में तितलियाँ



घरों के आसपास, राह चलते, लोगों से मिलते या काम पर जाते कहीं नहीं दिखती हैं तितलियां। कोई कहता है हमने बपचन में देखी थीं, किसी को हनीमून यात्रा में मिली थीं, ट्रेन से गुजरते वक्त कैमरे में कैद हुई थीं और जो बची हैं वह महानगरों की इंसानी भीड़ में कहीं गुम हो गयी हैं.  महानगरीय प्राकृतिक छटा को बचाने में हर वर्ष करोड़ों खरच रही सरकार अगले कुछ वर्षों में तितलियों को भी बचा पाने में असमर्थ हो, उससे पहले देखें दिल्ली में तितलियां।

मन मोहने वाली इस खूबसूरती को अपने कैमरे में कैद किया है फोटोग्राफर आरबी यादव ने...






Oct 13, 2010

अरुण पूरी का इंस्पिरेशन कहिये, चोरी नहीं !


देश के बड़े मीडिया घरानों में से एक टीवी टुडे  ग्रुप(आजतक,तेज़,हेडलाइंस टुडे,मेल टुडेऔर सभी भाषाओं में निकलने वाले इण्डिया टुडे) आदि के समूह अध्यक्ष अरुण पूरी ने इण्डिया टुडे के दक्षिण भारत संस्करण के लिए फिल्म स्टार रजनीकांत पर केन्द्रित चोरी का सम्पादकीय लिखा है.फ़िल्मी दुनिया के चोर क्षमताशीलों से शब्द उधार ले कहें तो उन्हें यह 'इंस्पिरेशन'स्लेट नाम की अंग्रेजी वेबसाइट में छपी 'ग्रैडी हैंड्रिक्स'की खबर से मिला है,जिसके दो पाराग्राफ़ में तो एक हर्फ़ भी इण्डिया टुडे (दक्षिण भारत संस्करण,१८ अक्तूबर २०१०) में बदला नहीं है.


अरुण पूरी : अब जवाब दीजिये
यह सूचना हम सब युवा पत्रकारों-लेखकों के लिए आश्चर्यजनक है और आदर्शों के गहरे गिरते जाने का नया नमूना भी.अबतक ख़बरों को चुराए जाने की ख़बरें तो पत्रकारों के बीच रहा करती थीं मगर सम्पादकीय भी चुरानी पड़ती है, नयी ब्रे-अकिंग न्यूज़ है. साथ ही सवाल यह भी है कि काम के पत्रकारों को घोडा बनाने वाले इन मालिक सरीखे संपादकों की ऐसी क्या मजबूरी आ  जाती  है  जो उधारी भी नहीं, चोरी की विद्वत्ता झाड़ते हैं. 

 इण्डिया टुडे के सम्पादकीय का वह हिस्सा जिसे  स्लेट मैगज़ीन से कट-पेस्ट किया गया है...

जैकी चैन एशिया में सबसे अधिक पारिश्रमिक पाने वाले अभिनेता हैं,यह बात समझ में भी आती है। वे 1980से अपनी फिल्में बना रहे हैं,निर्देशन और अभिनय कर रहे हैं। उन्होंने हालीवुड की ‘’रश ऑवर’’ और ‘’दी कराटे किड’’ जैसी सुपर-डुपर हिट फिल्मों से लाखों कमाए हैं। लेकिन दूसरे स्थान पर एक ऐसे इंसान है जिसके लिए इसका कोई मतलब नहीं है। एशिया में सबसे अधिक पारिश्रमिक पाने वाला अभिनेता गंजा है, प्रौढ़ है और उसकी तोंद निकली हुई है, वह तमिलनाडु राज्य से आता है, वह मूंछे रखता है जो कि 1986 से ही फैशन से गायब हो चुकी है। यह है रजनीकांत और वे केवल अभिनेता भर नहीं हैं। वे प्राकृतिक शक्ति हैं, अगर एक बाघ तूफान के साथ संभोग करे और उसका बाघ-तूफान बच्चा भूकंप से शादी कर ले तो उनसे होने वाला बच्चा रजनीकांत होगा। जैसे कि समझौते के मुताबिक उनकी फिल्मों का श्रेय उन्ही को मिलता है। अगर आपने अबतक सुपरस्टार रजनीकांत के बारे में नहीं सुना है तो, आप एक अक्तूबर को सुन लेंगे, जब उनकी फिल्म ‘ एंदिरन’ (दी रोबोट) दुनिया भर में रीलीज होगी। यह भारत की अबतक की सबसे महंगी फिल्म है। अबतक की किसी भी भारतीय फिल्म की तुलाना में इसे सबसे बड़ी ओपनिंग मिलेगी, सिनेमाघरों में इसके 2000 हजार प्रिंट एक साथ दिखाए जाएँगे। ‘’ दी मैट्रिक्स ’’के यूओन वो पिंग ने इसके लिए एक्शन किए हैं,’’जुरासिक पार्क’’वाले स्टैन विंसटन स्टूडियो ने इसके डिजाइन तैयार किए हैं,जार्ज लुकास का लाइट इफेक्ट और जादू है और ‘’स्लमडॉग मिलिनियेएर ’’के लिए ऑस्कर पुरस्कार जितने वाले संगीतकार एआर रहमान ने इसकी धुनें तैयार की हैं। इसमें बहुत बड़े पैमाने पर निवेश किया गया है। लेकिन इसके निर्माताओं को उम्मीद है कि उसकी वापसी हो जाएगी क्योंकि यह कोई फिल्म नहीं है बल्कि रजनीकांत की फिल्म हैं.
संक्षिप्त मगर महत्वपूर्ण तथ्यों को यहाँ देखें,क्योंकि असलियत जानने के लिए इण्डिया टुडे दक्षिण भारत संस्करण का वेब पर   उपलब्ध नहीं है. एक दूसरी अंग्रेजी वेबसाइट काउंटर मीडिया पर भी इसे पढ़ा जा सकता है.




Oct 11, 2010

मन्दिर वहीं बना

 नीलाभ


(राग अयोध्या, ताल भाजपा)

जजपा जजपा जजपा
ज ज ज ज ज ज ज ज
पा पा पा पा पा पा पा पा
भा भा भा भा भा भा भा भा
भाजपा भाजपा भाजपा पा पा पा
मन्दिर वहीं बना बना बना बन

पा पा पा पा पा पा पा पा पा पा पा पा
भा भा भा भा ज ज ज ज पा पा पा पा
जपा जपा जपा भाजपा भाजपा भाजपा
मुसलमान को मार भगा तू
मस्जिद तोड़ गिरा गिरा गिरा गिरा तू
मन्दिर वहीं बना बना बना बना
अब मन्दिर वहीं बना

भाभाजजपापा पाभाज पाजपा भाभाभा पाजभा जपाभा
पाभाज पाजपा भाभाभा पाजभा जपाभा
अटल प्रेम जतला ला ला ला ला
राम लला को बेच-बेच तू अडवानी गुन गा गा गा गा गा

आ आ आ आ पाभापा पाजपा भाभाभा पाजभा जपाभा
भाभाजजपापा भाजपा भाजपा भाजपा
मन्दिर वहीं बना

मरें भूख से भारतवासी
मरें किसान लगा कर फांसी
सीता माता रहे उदासी
रामशिला को ला ला तू राजनीति चमका, चमका, चमका तू
मन्दिर वहीं बना

भाभाभा जजज पापापा भाजपा भाजपा भाजपा भाजपा

सन्त-महन्त मुटाते जायें, राम नाम को बेचें-खायें
इनकी हाट सजा सजा सजा सजा तू
मन्दिर वहीं बना
भाजपा
भाजपा भाजपा भाजपा

हिन्दू वोट बटोर, खोल कर ताला
रामलला बैठा, बैठा बैठा, बैठा तू
मस्जिद को गिरवा गिरवा गिरवा गिरवा तू
मन्दिर वहीं बना
पा पा पा पा पा पा पा पा पा पा पा पा
भा भा भा भा ज ज ज ज पा पा पा पा
जपा जपा जपा जजपा

मोदी तेरा हनूमान है नितिन गडकरी अंगद
बालठाकरे बना जटायु सुषमा है त्रिजटा
त्रिजटा त्रिजटा त्रिजटा
तू मन्दिर वहीं बना
पा पा पा पा पा पा पा पा पा पा पा पा
भा भा भा भा ज ज ज ज पा पा पा पा
जपा जपा जपा जजपा

देस लूट कर घर को भर ले, पूंजी को मुट्ठी में कर ले
बैठ गोद में अमरीका की, मनमोहन कहला
कहला कहला कहला तू चिदम्बरम को ला ला ला तू
मन्दिर वहीं बना
जपा जपा जपा जजपा
पा पा पा पा पा पा पा पा पा पा पा पा
भा भा भा भा ज ज ज ज पा पा पा पा

चाहे तू भगवा लहराये, या पंजे पर मुहर लगाये
रामराज में सब चलता है रामराज को ला, ला ला ला तू
मन्दिर वहीं बना बना बना बना
जजपा जजपा जजपा
ज ज ज ज ज ज ज ज
पा पा पा पा पा पा पा पा
भा भा भा भा भा भा भा भा
भाजपा भाजपा भाजपा पा पा पा

मन्दिर वहीं बना बना बना बना

 (नीलाभ का मोर्चा से साभार)

Oct 9, 2010

आन्दोलन की राह पर हिण्डालको


उत्तर प्रदेश के सोनभद्र में बिड़ला समूह की एल्युमिनियम उत्पादक कंपनी  'हिण्डालको'ठेका मजदूरों का कईवर्षों  से शोषण  कर  रही है,जिसके  खिलाफ संगठित हो   आवाज  उठाने  वालों  को कम्पनी  प्रबंधन दबंगई के बूते 
खामोश करानाचाहता है.आन्दोलन, मांगो और हो रहे उत्पीडन पर  सोनभद्र से  दिनकर कपूर की रिपोर्ट.


बिडला समूह की अल्युमिनियम उत्पादक कंपनी 'हिण्डालको'में ठेकेदारी के तहत काम करने वाले मजदूरों ने जिलाधिकारी के कहने  पर ६ अक्टूबर को आन्दोलन  स्थगित कर दिया था। जिलाधिकारी ने  आन्दोलनरत मजदूरों के प्रतिनिधियों को आश्वासन दिया था कि दो दिन के अन्दर उपश्रमायुक्त पिपरी के यहाँ वार्ता कर लंबित समस्याओं का समाधान कराया जायेगा और किसी भी मजदूर का उत्पीड़न और छंटनी नहीं की जायेगी। साथ ही मजदूरों पर लादे गये मुकदमों सहित 4अक्टूबर को हुयी घटना की जांच पुलिस से करायी जायेगी। जांच के बाद ही कोई कार्यवाही होगी।
 
उन्होंने यह भी कहा कि वर्तमान समय में जारी पंचायत चुनाव को देखते हुए प्रशासनिक व्यवस्था, कानून व्यवस्था के कारण तात्कालिक रूप से हम लोग आन्दोलन को स्थगित करें। चुनाव के बाद इस पूरे औद्योगिक क्षेत्र के संविदा श्रमिकों की समस्याओं के निस्तारण के लिए वह स्वयं विभिन्न औद्योगिक इकाइयों के प्रबन्ध तंत्र और संविदा मजदूरों के प्रतिनिधियों के बीच वार्ता की पहल करेंगे। जिलाधिकारी के इस आश्वासन के बाद राष्ट्रहित, प्रदेशहित और उद्योगहित को देखते हुए हमने अपने आन्दोलन को स्थगित किया।

मगर बड़े दुःख के साथ कहना पड़ रहा है कि आन्दोलन समाप्ति के बाद प्रबंध तंत्र ने संविदा मजदूरों का जबर्दस्त उत्पीड़न शुरु कर दिया है। लगभग 200से भी ज्यादा मजदूरों को काम से निकाल दिया गया है। संचार क्रांति के इस युग में संविदा मजदूरों के मोबाइल को फैक्टरी के अन्दर ले जाने पर रोक लगा दी गयी है। मजदूरों से हिण्डालको सुरक्षाकर्मियों द्वारा जबरन गेट पास छीना जा रहा है। मजदूर नेताओं और उनके प्रतिनिधियों की घेराबंदी शुरु कर दी गयी है।

चार अक्टूबर की हुई दुर्भाग्यपूर्ण घटना यानी पत्रकारों के साथ कथित दुव्यर्वहार की बात पर मजदूर नेताओं के खेद प्रकट करने के बाद भी हिण्डालको के इशारे पर पत्रकारों की तरफ से प्रशासन और पुलिस ने नेताओं पर मुकदमा कायम कराया। हमने इस स्थिति से बार-बार प्रशासन और प्रबन्ध तंत्र को अवगत कराया,लेकिन मजदूरों के उत्पीड़न को रोकने की दिशा में कोई कार्यवाही नहीं हुई। दरअसल,प्रशासन का यह रुख बेहद गैरजवाबदेह और लापरवाहीपूर्ण है। इससे मजदूरों में गहरा आक्रोश है। रेणुकूट में यह एक बहुत ही बड़े तनाव को जन्म दे रहा है। है। यह बातें रेनूकूट में आयोजित पत्रकार वार्ता में मजदूर नेताओं ने पे्रस से कही।

पत्रकार वार्ता में जन संघर्ष मोर्चा के प्रतिनिधि,श्रम संविदा संघर्ष समिति के अध्यक्ष और नगर पंचायत अध्यक्ष अनिल सिंह, प्रगतिशील मजदूर सभा के अध्यक्ष द्वारिका सिंह, मजदूर मोर्चा के संयोजक राजेश सचान, कांग्रेस पीसीसी सदस्य बिन्दू गिरि और ठेका मजदूर यूनियन के अध्यक्ष सुरेन्द्र पाल ने सम्बोधित किया।

मजदूर नेताओं ने कहा कि हिण्डालकों से लेकर अनपरा, ओबरा, रेनूसागर, लैकों, सीमेन्ट, कोयला और बिजली की औद्योगिक इकाइयों में हजारों की संख्या में काम कर रहे संविदा श्रमिक निर्मम शोषण के शिकार हैं। एक ही कार्यस्थल पर बीस-पचीस वर्षों से कार्यरत होने के बावजूद उन्हे नियमित नहीं  किया जा रहा है. उन्हें न्यूनतम मजदूरी तक नहीं दी जाती। कानूनी प्रावधान होने के बाद भी हाजरी कार्ड, वेतन पर्ची, रोजगार कार्ड, बोनस, डबल ओवरटाइम और सार्वजनिक अवकाश नहीं दिया जाता है। यहां तक कि इपीएफ की कटौती के बावजूद उसकी कोई रसीद नहीं  दी जाती है।

इतना ही नही यदि कोई मजदूर जायज मांग के लिए आवाज उठाता है तो उसे बिना किसी नियम-कानून की परवाह किए काम से ही निकाल दिया जाता है।  जिन मांगों के बारे में हिण्डालको प्रबंधन कहता रहता है कि हम इन्हें दे रहे हैं, उन्हें  मांगने पर भी मजदूरों के ऊपर बर्बर लाठीचार्ज किया गया, कई मजदूरों के लाठियों और राड   से मारकर हाथ-पैर तोड़े गए। इन समस्याओं और इन्हें उठाने वाले लोकतांत्रिक आंदोलनों के प्रति शासन-प्रशासन एवं प्रबंध तंत्रों का रूख बेहद गैरजबाबदेह और लापरवाह बना रहता है। मजदूरों को हड़ताल जैसी कार्यवाहियों के लिए मजबूर किया जाता है। स्थिति इतनी बुरी है कि हड़तालों के बाद हुए समझौतों का पालन होता। इसीलिए जिला प्रशासन की वादाखिलाफी और गैरजवाबदेही के विरुद्ध अपनी समस्याओं के समाधान के लिए मजदूरों ने कभी भी हड़ताल पर जाने का नोटिस कल जिलाधिकारी और उप श्रमायुक्त को सौंपा है। आन्दोलन को  पत्रकार मेहंदी हसन,अजीम खाँ, चन्दन, नसीम, प्रदीप, मारी (सभासदगण), नौशाद, राजेश कुमार राय, राम अभिलाख, सुमन झा, रामजी वर्मा, धर्मेन्द्र, महेन्द्र सिंह आदि ने समर्थन किया है.


Oct 8, 2010

आखिरी यजमान

 कहानी

यजमान अक्सर उदाहरण दिया करते कि पंडितजी को देखो, अच्छा हो या बुरा, ऊँच मिले या नीच, कृष्ण हो या सुदामा हमेशा उं नमो शिवाय ही कहते हैं। लेकिन पंडितजी के अपने गांव में इस प्रताप की कभी कोई चर्चा नहीं होती। गांव में पंडितजी निकलते तो छुप-छुपाकर लड़के बस इतना ज्ञान चाहते कि ‘ए बाबा नेवलवा के केतना बड़ होला हो।’

अजय प्रकाश

छह हजार आबादी और ढाई हजार वोटों वाले हंड़िया गांव में पंडित श्याम सुंदर तिवारी की यजमानी चौचक चल रही थी। भविष्य में भी इस रोजगार में मंदी आने के आसार नहीं थे। पंडितजी के मरने से पहले कोई प्रतिद्वंदी मैदान में कूदने वाला नहीं था। अगर कोई चाहे तो कूद भी नहीं सकता था। कारण कि यजमानी रजवाडों जैसी चलती है, एकदम खानदानी। पट्टीदारी का भी घालमेल नहीं चलता। गर किसी ने इसकी कोशिश की तो पंडितजी ने उसको घर तक दौड़ाकर फजीहत किया।

एक दफा पंडितजी का पैर घोड़ा गाड़ी (टमटम) से गिरकर टूट गया। चलने-फिरने में असमर्थ हो गये। इधर यजमानों के यहां कथा-पूजा, शादी-ब्याह का दौर-दौरा पहले की तरह चलता रहा। पर पंडितजी नदारद। सर्दी-बुखार का तो पंडितजी ने कभी ख्याल ही नहीं किया। यजमानों के लिए पंडितजी हमेशा हाजिर होते थे। इसी लक्षण से प्रभावित हो स्कूल जाते बच्चे पंडित जी को देखते ही बोल पड़ते- ‘पंडित जात अन्हरिया रात, एक मुटठी चूड़ा पर दौड़लजात।' मगर अब टूटे पांव लेकर यजमानी में बेचारे कैसे जाते।

भगंदर की वजह से पंडितजी की पीड़ा  

इसी दुर्दिन का चांस लेकर एक दिन दूसरे ब्राह्मण ने यजमानी में दखल देने की हिमाकत की थी। पंडितजी को पंडिताइन ने जब यह संदेशा सुनाया तो वो गरजते हुए चौकी से एकदम कूद पड़े थे। उन्हें याद ही नहीं रहा कि पांव दवाओं के भरोसे है, उनके नहीं। दर्द के मारे बिलबिलाकर चौकी पर पसर गये। उस पंडित के दरवाजे न पहुंचपाने की भरपाई वह चौकी पर लेटे-लेटे ही उसकी मां-बहन के अंग विशेष में हाथी का, घोड़े का अंगविशेष डालकर कर रहे थे। पंडितजी ने इस दौरान जिस सबसे छोटे जानवर के अंगविशेष की चर्चा की वह नेवला था। पंडितजी को लगा कि आवाज उसके दरवाजे तक नहीं पहुंच पा रही है तो वे और जोर से दहाड़ने लगे। चिल्ला कर गाली बकने से खांसी उठती तो पंडितजी बीच-बीच में उं नमो शिवाय कर लेते।
‘भेज द अपनी माई के, नापवा उनहीं के दे देब’-पंडितजी सुनते ही यह जवाब ऐसे फेंकते जैसे उन्हें सवाल का हमेशा  इंतजार रहता हो। पंडितजी जी लड़कों के सवाल पर पर कुछ महीने पहले तक मां-बहन दोनों को नाप देने के लिए बुलाया करते थे, लेकिन एक दिन गांव में बहन के नाम पर बलवा  होने से बचा। तब बिचौलियों में सहमति बनी कि इस काम के लिए सिर्फ मां को बुलाया जाये। इसमें वादी कौन था, दोषी कौन इसका फैसला गांववाले करें, मगर बहनों को बुलाने पर ऐतराज करने वालों के बीच यह आम सहमति थी कि बहनों को लपेटना ठीक नहीं, वह दूसरे की घर की अमानत होती हैं। मगर गांव में उठने वाले इन झमेलों से पंडितजी के कैरियर पर कभी कोई संकट नहीं आया।

यजमानों के गांव ‘हड़ियां’ में पंडितजी के सामने से बच्चा गुजरे या बूढ़ा, पांय लागीं कहे बिना नहीं आगे बढ़ता। यह दीगर बात थी कि उम्र ढलने के साथ पंडितजी का शरीर हंड़िया गावं की चौहद्दी को समेट नहीं पा रहा था। हर बार कोई न कोई यजमान शाम हो जाने, थकान लगने या पेट खराब होने से छूट जाता। पंडितजी की यह हालत देख एकाध बार पट्टीदारों के बेटों ने कहा भी कि ‘दो चार यजमानी हमारे बीच साझा कर दो चाचा।’ मगर पंडित श्याम सुंदर तिवारी इस बात पर बुढ़ौती में भी जवानी के दिनों जैसे तरना उठते थे और कहते, ‘जैसे जमीन, जैसे जोरू वैसे यजमानी।’ मतलब साफ था पंडितजी जबतक जीयेंगे, यजमानी का रस पियेंगे। उनका फलसफा था खाने का मजा खिचड़ी (मकर संक्राति) में और कमाने का दशहरा में।

यजमान बच्चे जैसे उज्जवल होगा पंडितजी का बचपन
हर साल की तरह इस बार भी पंडितजी खिचड़ी की  दान-दक्षिणा पूरब और उत्तर टोले से बटोरते हुए जब दक्षिण टोला पहुंचे तो तीन बज चुके थे। जाडे़ का दिन था,सो सांझ घिरते चली आ रही थी, लेकिन पंडितजी को राहत महसूस हुई कि वहां दही-चूड़ा नहीं खाना पडे़गा और न ही बासी खिचड़ी कंपकपी लायेगी। वहां तो गर्मागर्म पूरी और खीर मिलेगी। सोचकर पंडितजी के मुंह में पानी आ गया। मुंह में पानी आते ही पंडितजी के भीतर तत्क्षण आत्मआलोचना जागी और उन्हें लगा कि यह तो छूद्रता है। पंडितजी को ऐसा कोई एहसास कभी होता नहीं था। संयोग ही था जो पंडितजी को ऐसा लगा था। नहीं तो पंडितजी कहा करते थे,‘जो ब्राह्मण खाने से भगे उसके असल ब्राह्मण होने पर संदेह है।’ उन्हें जैसे ही यह बात याद आयी, पंडितजी के कदम तेज हो गये और सोचने लगे वह भी क्या उम्र थी जब अपना निपटाकर दूसरे की यजमानी में कूद जाते थे और आज अपना ही आखिरी यानी चौदहवां यजमान नहीं समेटा पा रहा है।

दक्षिण टोले में केवल एक ही घर में यजमानी थी, फौजी के घर में। फौजी कश्मीर में तैनात था और पत्नी घर में। वह पति के दीर्घायु के लिए पर्व, त्योहार, दान-दक्षिणा किया करती थी। ऐसा करने से पत्नी को इलहाम होता था कि इसका असर सीधे पति पर होगा और दुश्मन की तरफ से दागी गयी गोली उसके शौहर को लगने के बजाय किसी और को लग जायेगी।

पत्नी की मान्यता भी थी कि चार सालों से मोर्चे पर तैनात पति के सुरक्षित बचे रहने में पंडित श्याम सुंदर तिवारी का विशेष प्रताप है। हालांकि आज जब पंडित उसके दरवाजे पहुंचे तो वह बेशब्री में बोल पड़ी ‘पंडितजी कहां लिपटा जाते हैं। पहर बीत गया, बच्चे भूख से तड़प रहे हैं और आप हैं कि सरक-सरक के आ रहे हैं।’

पंडित जी इस पर कुछ बोले नहीं सिर्फ उं नमो शिवाय बुदबुदाये, लेकिन फौजी की पत्नी जवाब की चाह में पंडितजी को घूरे जा रही थी। इसको भांप वे बोले ‘चिंता न करो स्वामिनी, काज यथाशीघ्र किये देता हूं।’ पंडितजी के सूत्र वाक्य का गृहिणी पर असर हुआ। उसे लगा कि पंडितजी की निगाह में उसकी इतनी इज्जत तो है ही, जितनी इज्जत दूरदर्शन  के सीरियल में नौकर मालकिन की करता है।

इस संतोष के साथ वह ठंडा हो चुके भोजन को गर्म करने लगी। मां को ऐसा करते देख बच्चे रसोई के दरवाजे पर टेक लेकर 'खाना दो, खाना दो' का टेर देने लगे। टेर तो दोपहर के पहले से ही वे दे रहे थे। तब फौजी की पत्नी ने सिक्कों से बच्चों का मुंह बंद किया था जिसे लेकर वह बनिये की दुकान की तरफ लुढक गये थे। मगर अबकी उनकी भूख की भरपाई में उठने वाली आवाजें तीक्ष्ण थीं। छोटे वाले को मां ने सिक्का पकड़ा फुसलाने की कोशिश की तो उसने बिना कुछ बोले सिक्के को जुठन वाली बाल्टी में डाल दिया।

पंडित जी फिर कुछ बुदबुदाने जैसा करने लगे, लेकिन बच्चे काहे को मानें। फौजी की पत्नी ने बच्चों का राम-लक्ष्मण कहा, जय-वीरू बोला। यहां तक कि सिपाही और साधुओं का डर कराया। बाजार से कुछ खरीदने का बहाना पकड़ाने की कोशिश की, पर बच्चे खाने के सिवाय कुछ और सुनने का तैयार ही नहीं थे।

माना जाता है श्याम सुन्दर इसी में से एक हैं
फौजी की पत्नी से जब नहीं रहा गया तो वह पंडितजी के सुनने जितनी आवाज में बड़बड़ाने लगी -‘पैसे तो मैं बाभनों, बनियों से ज्यादा देती हूं लेकिन ये मेरे दरवाजे सबसे बाद में आते हैं। कहते हैं अगर एक शूद्र के घर पहले आ गया तो दूसरे उससे पूजा नहीं करवायेंगे। किसी से कम हूं मैं? केवल एक जाति ही तो छोटी है कि बच्चों को भोजन के भंडार में रहते हुए अबतक खाये बिना बिलबिलाना पड़ रहा है।’ पूरी के लिए कड़ाही में हाथ डालते छोटे बेटे को रोककर गिड़गिड़ाती हुई फौजी की पत्नी बोली ‘बस पांच मिनट रूक जा बाबू, फिर जितना मन करे उतना खाना।’यह कहते हुए उसके चेहरे से ऐसा लग रहा था मानो वह गुजारिश कर रही हो कि इस पाप की भागीदार मैं नहीं हूं, मुझे माफ करना भगवान।

पंडित श्याम  सुंदर तिवारी लाई और चिउड़ा झटपट बटोरकर खाने के लिए पीढ़ा पर विराजमान हो गये। संतों की तरह पांव पर पांव चढ़ाकर बैठे पंडितजी ने बच्चों की तरफ देखकर कहा- ‘सब्र करो बालकों, भूख से मुक्ति का समय आ गया।’पर बच्चों की पंडित की बात में कोई दिलचस्पी नहीं दिख रही थी, वे बार-बार पूड़ी बेलते हाथ को और कढ़ाही से बाहर आ रही फूली- फूली पूड़ियों  को देख रहे थे। वैसे ही जैसे कुत्ते निहारते है खाना खाते आदमी को। यह देखकर पंडितजी ने फौजी की पत्नी को आदेश के अंदाज में कहा कि ‘ब्राह्मण के अन्न ग्रहण करने से पहले बच्चों के मुंह में अन्न का दाना नहीं जाने देना, नहीं तो तुम्हारे द्वारा किये जा रहे ये सारे सत्कर्म, दुश्कर्म में बदल जायेंगे।’

‘नहीं- नहीं पंडित जी, सुबह से एक दाना भी इनके मुंह  में नहीं गया है। ये देखिये।' छोटे वाले का मुंह चियारकर फौजी की पत्नी ने पंडितजी को दिखा दिया। मुंह चियराई बच्चे के लिए एक हादसे जैसा रहा जिसके बाद वह रोते हुए मां के पीछे की ओर सरक गया। बड़ा बेटा पूड़ी पर निगाह लगाये दीवार से लगकर उहक रहा था और पीछे पहुंचा छोटा बेटा कभी सब्जी में तो कभी खीर में हाथ डालने की कोशिश में लगा हुआ था। इसका आभास पंडित जी को हो गया, तो पूछ पड़े कि ‘ अरे छोटा वाला कहां है?'
'यहीं है पंडित जी।' फौजी की बीवी बोली.

पंडितजी- ‘अन्न आदि के पास बच्चों को नहीं रखते। खासकर जब भोजन बन गया हो और ब्राह्मण देवता को खिलाना हो तो कत्तई नहीं। ऐसा करो उसे आंगन में रख जाओ। कम-से-कम आंगन तुम्हारा इतना ऊंचा है कि जब तक कोई उठाकर उसे रखेगा नहीं, वहीं पड़ा रहेगा।
पंडितजी का सुझाव मान तुरंत फौजी की पत्नी ने बच्चे को आंगन में गिराने के अंदाज में रख दिया, लेकिन बच्चा आंगन की चौखट पर चढ़ आया। यह बात बच्चे की मां को भी मालूम थी कि छोटा वाला बड़ा हो गया है और वह आंगन की ऊँचाई लांघ आता है, लेकिन पंडितजी के संतोष के लिए रख गयी थी.

तभी अपनी तरफ बढ़ता देख पंडितजी चिल्लाये- ‘रोको, नहीं तो विनाश हो जायेगा। तुम समझ नहीं रही हो, अगर इसने मेरे भोजन को छूकर अपवित्र कर दिया तो इसका सीधा प्रभाव गृहस्वामी पर पडे़गा। तुम्हें पता है, मेरे अलावा पंडित गांव का कोई और ब्राह्मण किसी शूद्र के यहां पूजा-पाठ नहीं कराता, अन्न ग्रहण करना तो दूर। तुम क्या जानो एक बार तुम्हारे यहां आने के बाद मुझे इक्कीस दिन पीपल के पेड़ के नीचे तप करना पड़ता है, तब जाकर मैं सही-सलामत रह पाता हूं। वह तो तुम्हारे आदमी ने बहुत हाथ-पैर जोड़े थे तो मैं आ जाता हूं।’

वह सकपकाई सी अभी कुछ और बोल पाती इससे पहले ही पंडित फिर कह पड़े, ‘चलो छोड़ो, ये सब बात किसी से कहने-सुनने की नहीं है। अच्छा यह बताओ कि मैंने बेटे की भर्ती की जो बात तुम्हारे आदमी से की थी, उसके बारे में कभी मोबाइल पर उसने कुछ बताया क्या... अब तो तेरा मर्द सूबेदार हो गया है, भर्ती भले न करता हो, लेकिन करने वालों के बीच तो उसका रोज का उठना-बैठना है, है कि नहीं।’

फौजी की पत्नी पंडित की पहली और दूसरी बात को जोड़कर समझने की कोशिश  कर रही थी। उसके दिमाग में गृहस्वामी... पाप.......असर... जूठा... .नाश... टेलिफोन... सूबेदार... यह सारे शब्द आपस में गड्ड-मड्ड हो रहे थे। उसके चेहरे पर इत्मीनान का भाव लौटता देख लगा कि उसने उलझ रहे शब्दों को सजा लिया है, लेकिन तभी देखती क्या है कि- छोटा बेटा पंडितजी के बगल में सरककर आ गया है और उनकी थाली से एक पूरी  हाथ में ले ली। अब फौजी की पत्नी को काटो तो खून नहीं... जरा सी भी पंडितजी ने हरकत की तो छोटे का हाथ पंडित के हाथ से टकरायेगा और फिर...

फौजी की बीवी ने सब्र से काम लिया। पंडित जी देखते इससे पहले ही लड़के की आंख मां से मिली और वह बेटे को एकटक घूरने लगी। उसे घूरता देख पंडितजी कन्फ्यूजन मोड में चले गये गये और उनके गाल का रंग ललिया गया। पंडितजी शर्माते हुए पूछे, ‘कइसा लग रहा हूं, बड़े गौर से देख रही हो रे।’ मगर वह बच्चे को लगातार घूरती रही और पता नहीं किस अंदाज में इशारा किया कि बच्चा पूड़ी थाली में छोड़ पीछे लौट गया। पंडितजी बच्चे की छुई पुड़ी को जब मुंह में डाले तो बोल पड़े- ‘आजकल चक्की वाले पता नहीं क्या मिलाकर गेहूं पीस देते हैं।’
पंडित की बात सुनते ही दीवार से लगकर उहकरहा फौजी का बड़ा बेटा खिलखिलाकर हंस पड़ा। पूड़ी बेल रही फौजी की बीबी भी घुटनों के बीच मुंह टिकाकर हूं-हूँ .....हंसती रही।

शायद अब ऐसे हों
पीछे लौटा बच्चा चेहरे पर खिलंद्दड़ी मुस्कान लिए थाली की तरफ एक बार फिर लौटने लगा। अभी थाली से दो-चार इंच दूर रहा होगा कि फौजी की पत्नी झपट पड़ी। झटके से गोद में लेकर चांटा लगाते हुए चिल्लाई- ‘पंडितजी छिया खात हैं, छीः! ओआ... नहीं... पील्लू... गूह...धीरज रख, खीर-पूरी दूँगी... ये छीया है।’ यह कहते हुए चूल्हे के पास बैठ गयी

पंडितजी निवाला मुंह में डालने को थे, लेकिन फौजी की बीवी की बात सुन वह उस मुद्रा में आ गये जैसे बच्चे स्टेचू  का खेल खेलते वक्त हो जाते हैं। पंडितजी को एकबारगी लगा जो निगला है सब बाहर आ जायेगा। हाथ न ऊपर  हो रहा था न नीचे। हाथ में ली हुई तस्मयी (खीर) और पूडी जिसको उन्होंने अमृत समझकर खाया था, उसे बनाने वाली ने ही छीया कह दिया। क्या करें! पूड़ियां अब उन्हें बिष्टा में सनी हुई जान पड़ीं। उनके माथे पर गहरा बल पड़ने लगा और हाथ ने धीरे-धीरे जमीन की ओर झुकना शुरू कर दिया।

बोलने के बाद फौजी की पत्नी काठ हो गयी थी। करे तो अब क्या करे,क्या सफाई दे? सोच रही थी, ‘पंडितजी अगर मेरी विधर्मी जुबान को चरणों में मांगे तो मैं अभी दराती उठाकर सौंप दूं। हे भगवान! कुछ भी करो, लेकिन पंडितजी भोजन की थाल से न उठने दो। सारा धर्म नष्ट हो जायेगा भगवान।’

फौजी के पत्नी के मुंह से निकला भगवान शब्द पंडितजी तक पहुंचा तो उन्होंने ऊंह  किया। मानो कुछ पूछ रहे हों। तभी फौजी की पत्नी ने जो देखा वैसा आश्चर्य इससे पहले नहीं देखा था। उसने देखा कि पंडितजी का हाथ जो थोड़ा नीचे झुककर स्थिर हो गया था वह हिला और निवाला मुंह में डालते हुए पंडितजी ने कहा- ‘अरे बच्चे तो भगवान का रूप होते हैं, उनके लिए कुछ भी कहना जायज है। तस्मई अच्छी बनी है थोड़ा और ले आओ।’

फौजी की पत्नी कटोरे में खीर डालने लगी तो पंडितजी ने पूछा ‘क्या कह रहा था तेरा मर्द, मेरे बेटे की भर्ती के बारे में। बेटे की नौकरी लग जाये तो हमें भी चैन आये।’ पंडितजी भोजन में दुबारा जुट गये और फौजी की बीवी मर्द को फोन मिलाकर पंडितजी के बेटे की नौकरी की पैरवी करने में लग गयी।

( इस वर्ष के दलित साहित्य वार्षिकी से साभार कहानी)

Oct 6, 2010

तीस सितंबर

बाबरी मस्जिद मामले में मालिकाने को लेकर आये फैसले पर  एक नज़्म...



मुकुल सरल



दिल तो टूटा है बारहा लेकिन

एक भरोसा था वो भी टूट गया

किससे शिकवा करें, शिकायत हम

जबकि मुंसिफ ही हमको लूट गया



ज़लज़ला याद दिसंबर का हमें

गिर पड़े थे जम्हूरियत के सुतून

इंतज़ामिया, एसेंबली सबकुछ

फिर भी बाक़ी था अदलिया का सुकून




छै दिसंबर का ग़िला है लेकिन

ये सितंबर तो चारागर था मगर

ऐसा सैलाब लेके आया उफ!

डूबा सच और यकीं, न्याय का घर




उस दिसंबर में चीख़ निकली थी

आह! ने आज तक सोने न दिया

ये सितंबर तो सितमगर निकला

इस सितंबर ने तो रोने न दिया


(इंतज़ामिया- कार्यपालिका, एसेंबली- विधायिका, अदलिया- न्यायपालिका, चारागर- इलाज करने वाला,चिकित्सक)


(सामाजिक सरोकारों से जुड़े पत्रकार और कवि मुकुल सरल से mukulsaral@gmail.comपर संपर्क किया जा सकता है.)