Aug 17, 2010

कात्यायिनी ने भिजवाया जवाब, विरोधियों को कहा 'हिज़डा'


पाठक जानते हैं कि पिछले दिनों हिंदी की कवयित्री कात्यायिनी अपने पति शाशिप्रकाश और बेटे अभिनव सिन्हा के संग मिलकर जिस रेवोलुशनरी कम्युनिस्ट लीग (भारत )नाम की क्रांतिकारी पार्टी चलातीहैं,उसपरइस  पार्टी सेजुड़े  रहे कार्यकर्ताओं  ने सवाल  उठाये  थे.उनके सवाल इसी वेब  की पिछली पोस्टों पर जाकर पढ़े जा सकते हैं.

 कार्यकर्ताओं ने साफ कहा था कि यह पार्टी एक पारिवारिक कुनबा है,जिसकाबुनियादी काम हर कीमत पर चंदा इकठ्ठा करना और किताबें छापना है.कार्यकर्ताओं ने अपने अनुभवों को साझा करते हुए बताया कि क्रांति और सामाजिक बदलाव के नाम पर कैसे यह संस्थाएं,निजी संपत्ति और पारिवारिक कुनबा खड़े कर रहे हैं.बातें बहुत तीखे अंदाज़ में कहीं गयीं थीं क्योंकि इनमें से ज्यादातर ने अपनी जवानी के महत्वपूर्ण साल शशिप्रकाश के चंगुल में बर्बाद किये थे.जाहिरा तौर पर एक के बाद एक लेखों के छपने से क्रांति की दुकान में खलबली मचनी ही थी,सो मची.इसके बाद हमें और शशिप्रकाश के कुनबे को  जानने वालों ने इनसे और हमसे पूछा कि यह कैसी गंध है.हमने जानने वालों से कहा" आपको इतने पर मिचली आती है,और हम हैं कि आदर्शवाद के नाम पर यह सच छुपाये हुए थे."कुछ ने मुखामुखी यह भी कहा कि इससे वामपंथ का नुकसान होगा, पर वह सामने नहीं आये.हालाँकि जिन्होंने शुरू में यह आशंका जाहिर कि थी कि इससे वामपंथ का नुकसान होगा,वह लेखों को देख हमारे साथ आये, कई वामपंथी संगठनों ने शुक्रिया कहा कि चलो दुकान की गन्दगी सामने तो आयी.

अपने पहले जवाबी लेख में कात्यायिनी के कुनबे के मुखिया शशिप्रकाश ने पहले जवाब में कवि नीलाभ को जिस तरह निशाना बनाया है,उसका मकसद सिर्फ साहित्यकारों को धमकाना है कि सामने आये तो 'प्रगतिशील' बना देंगे.

अब रहा हमारा सवाल तो उन्होंने हिजड़ा और बीबियों से डरने वाला कहा है.हमें उम्मीद है कि अगले जवाबों तक वह दो कदम आगे बढकर नैतिक चारित्रिक तौर पर पतित कहें क्योंकि इसके आलावा इनके पास कोई जवाब नहीं है.हम इन आरोपों से नहीं डिगने वाले हैं क्योंकि साहस  हमें समाज से मिल रहा है,जहाँ से हमारे काम और चरित्र दोनों पर कोई सवाल नहीं है. बहरहाल यह शशिप्रकाश की चौधराहट की  खीझ  से निकले  आरोप हैं. हमें याद है कि जब संगठन में हमलोग किसी कि संगठन छोड़ने पर पूछते  तो आरोप नैतिक ही लगाया जाता.जैसे फलां लाइन मारता  था, उसके पीछे पड़ा था, लड़कियों की सेवाटहल  ज्यादा करता था, लड़कीबाज था, किसी एक लड़की पर ठहरा ही नहीं और जब यह कहना नहीं बनता था तो शशिप्रकाश हंस कर कहतेकि 'उसकी ना पूछिए उसके  चारित्रिक पतन को यहाँ सह पाना अशंभव था...आदि.'

हमारी राय तो शशिप्रकाश को यह है कि वह आरोप नाम लेकर लगायें जिससे उनकी कलम को और ताकत मिलेगी.साथ ही उन्हें लड्किबाजों, गांडबाजों,पेटीकोट के भीतर घुसे रहने वालों कि गिनती में आसानी होगी और इसके लिए किसी को रातभर उनके साथ रूकना नहीं होगा.

पाठक माफ़ करेंगे.शशिप्रकाश ज्यादातर बार इसी तरह की पदवियों से नवाजते रहते हैं....प्रमाण की जरूरत होगी तो उसे भी हम प्रकाशित करेंगे.जनज्वार की कोशिश रहेगी कि यह बहस व्यापक परिप्रेक्ष्य में हो.

हालाँकि हमें कम उम्मीद है कि शशिप्रकाश,उनकी पत्नी कात्यायिनी,बेटा अभिनव,अभिनव के मौसा सत्यम वर्मा, मौसी रूबी, दूसरी मौसी मीनाक्षी (अरविन्द सिंह की पत्नी), तीसरी मौसी कविता और एक मौसी जिनका नाम याद  नहीं आ रहा है,यह लोग जवाब में यौन सुचिता के आरोप से आगे जायेंगे सम्भावना काम है.दरअसल रेवोलुशनरी कम्युनिस्ट लीग का (भारत ) में पार्टी विरोधियों से निपटने की  यही परंपरा है.


कात्यायिनी की ओर से जवाब

 जनज्‍वार पर पिछले दिनों एक कुत्सित बहस चलाई गई थी,उसमें 'प्रगतिशील' कवि नीलाभ ने भी अपने विचार प्रकट किए थे। उनकी बातों से मेरे मन में कुछ सवाल उठे,इसलिए  जनज्‍वार के संचालक को यह पोस्‍ट भेजी जा रही है ताकि वे अन्‍य प्रायोजित पोस्‍ट्स के साथ इस अप्रायोजित पोस्‍ट को भी स्‍थान दें।



कवयित्री कात्यायिनी
प्रिय नीलाभ जी,


जनज्‍वार के माध्‍यम से पता चला कि आप राजनीतिक दलों के न्‍यास आदि बनाने को सही नहीं मानते। आपने अपनी टिप्‍पणी में अपने इस विचार के पीछे कोई तर्क नहीं पेश किया है। यह जानने की बहुत इच्‍छा हो रही है कि राजनीतिक दलों को न्‍यास आदि क्‍यों नहीं बनाना चाहिए। क्‍या न्‍यास में ऐसे कीटाणु बसते हैं जो राजनीतिक दलों को भ्रष्‍ट कर देते हैं। क्‍या इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि न्‍यास का उद्देश्‍य क्‍या है उसको कैसे संचालित किया जाता है और उसमें कौन लोग काम करते हैं। बस न्‍यास बना नहीं कि आप किसी राजनीतिक दल को विपथगामी घोषित कर देंगे। आपकी बात इतनी मजेदार है कि मेरी यह जानने की उत्‍सुकता बढ़ती ही जा रही है कि आप और किन-किन कामों को राजनीतिक दलों के करने योग्‍य नहीं समझते।

जहां तक मेरा राजनीतिक ज्ञान है मैं समझता हूं कि एक समूह उन सभी (या अधिकतर) कामों को ज़्यादा बेहतर ढंग से संचालित कर सकता है जिन्‍हें कोई व्‍यक्ति अकेला करता है। इन कामों में राजनीतिक काम भी आ सकते हैं और कला-संस्‍कृति के क्षेत्र के काम भी आ सकते हैं और अकादमिक काम भी।आज दिल्‍ली के अधिकतर प्रगतिशील कवि, लेखक, संस्‍कृतिकर्मी, बुद्धिजीवी मध्‍य वर्ग या उच्‍च मध्‍यवर्ग की जीवनशैली जी रहे हैं। आज कितने लेखक, कवि,बुद्धिजीवी हैं जो बाल्‍जाक की तरह काली काफी पीकर पेरिस के अभिजात समाज को अपनी कलम से नंगा कर देने की चुनौती देने का माद्दा रखते हैं।

आज के प्रगतिशील लेखकों में से किसको आप भारत का टामस पेन और लू शुन कहेंगे। मां उपन्‍यास लिखने के बाद गोर्की ने जब लेनिन से मुलाकात की तो लेनिन ने कहा कि यह मजदूरों के लिए एक जरूरी किताब है और इसे बड़ी मात्रा में छपवाकर मजदूरों के बीच वितरित करवाओ। क्‍या आपको लगता है कि अगर 'मां' जैसी कोई किताब आज लिखी जाती है तो आज के बुर्जुआ प्रकाशक उसे बड़ी मात्रा में छपवाकर मजदूरों के बीच वितरित करवाएंगे। निश्‍चय ही नहीं करवाएंगे। बुर्जुआ प्रकाशक तो क्‍या खुद को प्रगतिशील कहने वाले कवि, लेखक और बुद्धिजीवी भी यह काम नहीं करेंगे। सही बात तो यह है कि प्रतिष्‍ठा, पुरस्‍कार, रॉयल्‍टी अगर मिलती रहे तो हमारे लेखकों को इससे कोई मतलब नहीं कि उनकी किताबें वास्‍तव में पढ़ी भी जा रही हैं या नहीं। आज कितने ऐसे लेखक हैं जो 20 रुपये से कम पर जीने वाले भारत के 77 प्रतिशत लोगों की जिंदगी से करीबी से जुड़े हों या करीबी जुड़ाव महसूस करते हों। आज प्रगतिशील लेखकों/बुद्धिजीवियों और सर्वहारा जनता के बीच की खाई गणेशशंकर विद्यार्थी और प्रेमचंद के जमाने से कई गुना चौड़ी हो गई है।

 यह कहने में कोई अतिश्‍योक्ति नहीं होगी कि आज के हमारे प्रगतिशील लेखक,कवि और बुद्धिजीवी भारत की गरीब जनता के साथ ऐतिहासिक विश्‍वासघात कर चुके हैं। वास्‍तव में समाजवाद से उनका कुछ लेना-देना ही नहीं रह गया है,उनका समाजवाद तो कब का आ चुका है।और इसीलिए जो काम प्रगतिशील लेखकों, बुद्धिजीवियों, संस्‍कृतिकर्मियों को करना चाहिए था, यानी कि समाज में गंभीर राजनीतिक और गैर राजनीतिक साहित्‍य का एक सचेत पाठकवर्ग तैयार करने और ऐसे साहित्‍य के फलने-फूलने का माहौल तैयार करने का काम,उसे मजबूरी में क्रान्तिकारी दल (दलों) को करना पड़ रहा है। आप शायद समझ नहीं पा रहे हैं कि यह राजनीतिक दलों की इच्‍छा नहीं बल्कि उनकी मजबूरी है। हालांकि अगर वे अपनी चाहत से भी ऐसा करते हैं तो इसमें गलत क्‍या है यह मैं नहीं समझ पा रहा हूं। शायद आप समझने में मेरी मदद करेंगे।आपने सीधे तौर पर तो नहीं लेकिन घुमा फिराकर कुछ प्रकाशनों पर आरोप लगाया है कि उन्‍होंने साधन को साध्‍य बना लिया है। तो उपरोक्‍त बातों के मद्देनजर सबसे पहले तो यह आरोप प्रगतिशील लेखकों पर लगाया जाना चाहिए जिनमें आप स्‍वयं भी शामिल हैं। अपनी किताबें छपवाने में बहुतेरे लोग आगे रहते हैं लेकिन लू शुन की तरह किसी ने यह क्‍यों नहीं सोचा कि अपने देश के लोगों का परिचय विश्‍व की तमाम मूल्‍यवान साहित्यिक धरोहरों से कराया जाए। आज मार्क्‍सवाद की कितनी किताबें हैं जो सही और सटीक अनुवाद के साथ हिन्‍दी में उपलब्‍ध हैं। और यदि नहीं है तो यह काम कौन करेगा। क्‍या यह काम राजकमल और वाणी जैसे बुर्जुआ प्रकाशनों के भरोसे छोड़ दिया जाए या भारत सरकार के प्रकाशन विभाग के भरोसे या नीलाभ प्रकाशन के भरोसे। मार्क्‍सवाद की जिन किताबों के हिंदी अनुवाद हैं भी उन्‍हें संतोषप्रद नहीं कहा जा सकता है। और रामविलास शर्मा जी ने यूं तो किताबें लिखकर रैक भर दिये हैं लेकिन उनके माध्‍यम से मार्क्‍सवाद समझने वालों का खुदा ही मालिक हो सकता है।


ऐसे में अगर कोई राजनीतिक संगठन प्रकाशन तंत्र और न्‍यास संगठित करके हिंदी भाषी लोगों को अपनी भाषा में विश्‍वस्‍तरीय साहित्‍य और मार्क्‍सवाद की पुस्‍तकें उपलब्‍ध कराने के इन बेहद ज़रूरी कामों को करता है तो इसके लिए उसे साधुवाद दिया जाना चाहिए या गालियां?हालांकि आज भी बहुत बड़ी संख्‍या ऐसे लोगों की है जिनके लिए दुनिया माओ के बाद से आगे ही नहीं बढ़ी है और निश्चित ही उन्‍हें किताबों की और बहस-मुबाहिसे की उतनी जरूरत भी नहीं है। वैसे मजेदार बात तो यह भी है कि हथियार खरीदने के लिए चंदा मांगने को बुद्धिजीवी लोग जायज समझते हैं लेकिन पुस्‍तकें छापने के लिए चंदा मांगने को वे गलत समझते हैं और कोई तर्क पेश किए बिना साधन और साध्‍य जैसे बौधिक जुमलों के द्वारा अपना काम चला लेते हैं। वैसे 21वीं सदी की प्रौद्योगिकी और नव जनवादी क्रांति (एनडीआर) की लाइन ने भी तमाम बौद्धिकों की पौ बारह कर दी है। आज कोई भी व्‍यक्ति ब्‍लॉग पर गरमागरम बातें लिखकर और पैसिव रैडिकलिज्‍म की लीद फैलाकर क्रान्तिकारी बुद्धिजीवी होने का तमगा हासिल कर सकता है। इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि उसे कम्‍युनिज्‍म की समझदारी है भी या नहीं या कम्‍युनिज्‍म के प्रति उसका समर्पण है भी या नहीं। मध्‍यवर्गीय रूमानी फिलिस्‍टाइन को इससे कोई मतलब भी नहीं है। वह स्‍वयं को एक नायक की तरह देखना पसंद करता है और निजी जीवन में क्रान्ति से भले ही उसका कभी साबका न पड़ा हो और सामाजिक कामों के लिए चंदा देते समय भी बीवी से डरता हो लेकिन बौद्धिक जगत में हल्‍ला मचाने का साधन उसकी पहुंच में आ गया है और वह शहीदाना अंदाज में पोस्‍ट पर पोस्‍ट लिखे जाता है। हो सकता है कि उसने वह चौराहा भी देख रहा हो जहां ''मुक्‍त क्षेत्र'' बनने के बाद उसकी मूर्ति लगाई जाएगी। स्‍तालिन ने यों ही नहीं कहा था कि एशियाई देशों की क्रान्तियां झूठ-फरेब,मक्‍कारी,चुगली और षडयंत्रों से भरी होंगी।

जनज्‍वार पर आकर आपने और आपके सहयोगियों ने न सिर्फ स्‍तालिन की बात को पुष्‍ट कर दिया बल्कि अपने ही कृत्‍यों से न्‍यास और प्रकाशन संगठित करने की जरूरत को बल प्रदान कर दिया है। आपने भी बस यही साबित किया है कि आज के पके पकाये बुद्धिजीवियों से रैडिकल चिंतन और व्‍यवहार की उम्‍मीद करना वैसा ही है जैसे जरसी गाय से युद्धाश्‍व के कारनामों की उम्‍मीद पालना। इसीलिए नये साहसी, रैडिकल, युवा, कर्मठ बौद्धिक तत्‍वों की तैयारी का काम और भी ज़रूरी है। जनज्‍वार के अपने जिन साथियों की बातों का आपने समर्थन किया है (हालांकि यह समर्थन आपने नसीहतों की आड़ में किया है) उनके साथ मैं पिछले 10-12 सालों से जमीनी स्‍तर पर काम कर चुका हूं। अपने राजनीतिक और निजी जीवन में इन लोगों की पतनशीलता का मुझे प्रत्‍यक्ष अनुभव है और ये सारे के सारे जमीनी कार्यों में एकदम फिसड्डी साबित हो चुके हैं। जो इस बात से भी साबित होता है कि संगठन से निकाले जाने के बाद इनमें से किसी भी शख्‍स की जमीनी कार्रवाइयों में किसी प्रकार की कोई भागीदारी नहीं रही है। अपनी हर असफलता को दूसरों के मत्‍थे मढ़ने की इनकी आदत और नीयत जनज्‍वार पर लिखे इनके ही पोस्‍टों से जाहिर हो जाती है। आज आपको इन हिजड़ों की संगत पसंद आ रही है तो आपको सोचना चाहिए कि आप कहां पहुंच गये हैं। जनज्‍वार ने अपनी नंगई के द्वारा साबित कर दिया है कि भारत के कम्‍युनिस्‍ट आन्‍दोलन की पश्‍चगति अभी अपने मुकाम तक नहीं पहुंची है और इसमें तमाम तथाकथित प्रगतिशील बुद्धिजीवी और (आश्‍चर्य नहीं होना चाहिए)विरोधी लाइन वाले कतिपय संगठनों के कुछ लोग अपनी तरफ से पूरा सहयोग दे रहे हैं। चलिये देखते हैं कि यह पश्‍चगति कहां जाकर थमती है।

आपने साधन के साध्‍य बन जाने की बात अपनी पोस्‍ट में उठाई है। मेरे ख्‍याल से साधन के साध्‍य बना जाने की बात तब लागू होती है अगर किसी के सिद्धांत और व्‍यवहार में अंतर हो। जहां तक परिकल्‍पना और राहुल फाउण्‍डेशन की बात है,तो अगर आप कविताएं लिखने से फुरसत लेकर इनके प्रकाशनों को पढ़ेंगे तो आपको स्‍पष्‍ट पता चल जाएगा कि ये किन अर्थों में नये सर्वहारा नवजागरण और प्रबोधन की बात करते हैं और इनका व्‍यवहार इनके सिद्धांत की पूर्णत: संगति में है। यदि इन्‍होंने अपने वास्‍तविक विचारों को स्‍पष्‍ट रूप से जाहिर किए बिना लोगों से सहयोग लिया हो और केवल यही करते रहे हों तो आप यह कह सकते हैं कि साधन ही हमारा साध्‍य बन गया है। अगर साधन ही हमारा साध्‍य है तो करावलनगर, गोरखपुर और लुधियाना के मजदूरों के आन्‍दोलनों में हमारी भूमिका के बारे में आपके क्‍या विचार हैं।

कवि महोदय आप शायद जानते होंगे कि न्‍यास बनाना और किताबें छापना ऐसे काम हैं जो शुरू से ही नजर आते हैं। वहीं लोगों को संगठित करना एक ऐसा काम है जिसका आउटपुट तत्‍काल नजर नहीं आता। वर्तमान परिस्थितियों का हमारा मूल्‍यांकन और इसलिए हमारे काम का तरीका भी थोड़ा अलग है जो महानगरों के बुद्धिजीवियों को समझ में नहीं आता है। चूंकि हम समय-समय पर ''ऐक्‍शन'' नहीं करते रहते और थोड़ा काम करके बहुत गाते नहीं, इसलिए जमीन से कटे बुद्धिजीवियों को लगता है कि हम बस किताबें ही छाप रहे हैं। वैसे क्‍या ये सरासर बेईमानी और बदनीयती नहीं है कि जानबूझकर किसी संगठन के कामों के एक हिस्से को अपने झूठे आरोपों का निशाना बनाया जाए और उसके कामों के बड़े और मुख्‍य पहलू की चर्चा ही न की जाए! तो कविवर ऐसी स्थिति में अत्‍यावश्‍यक है कि आंखें फाड़कर घूरती सच्‍चाईयों को समझने और उनके अनुरूप अपने सिद्धान्‍त और व्‍यवहार में परिवर्तन करने के लिए कम्‍युनिस्‍टों को प्रेरित करने हेतु ज़रूरी कामों के लिए मार्क्‍सवादी अध्‍ययन संस्‍थान और प्रकाशन जैसी संस्‍थाएं स्‍थापित की जाएं। आज जबकि ''भूतपूर्व'' और स्‍वनामधन्‍य कम्‍युनिस्‍टों की जमात बढ़ती जा रही है जिसने कम्‍युनिज्‍म के बुनियादी उसूलों, मर्यादाओं और गुणों का परित्‍याग कर दिया है तो ऐसी संस्‍थाएं बेहद ज़रूरी हैं जो कम्‍युनिज्‍म के आदर्शों को बचाए रखने और नई पीढ़ियों को इस विरासत से शिक्षित-दीक्षित करने का काम करें। बेशक जिन्‍हें लगता है कि परिस्थितियां बदली ही नहीं हैं और जो कुछ लिखना पढ़ना था सब लिखा पढ़ा और कहा जा चुका है और बस आंख मूंदकर लकीर पर लाठी पीटते रहना है उन्‍हें न्‍यास और प्रकाशन की जरूरत न तो है और न समझ में आयेगी।

नीलाभ जी आप भोलेपन की मिसाल कायम करते हुए लिखते हैं कि कात्‍यायनी,सत्‍यम और शशिप्रकाश के खिलाफ उनके ही कुछ पुराने साथियों ने आरोप लगाए हैं। इससे आप हतप्रभ भी हैं और उदास भी। जाहिर है आप हतप्रभ और उदास इसलिए हैं क्‍योंकि आप इन आरोपों को जायज और ईमानदारी की जमीन से उठाया गया समझते हैं। पर आप ऐसा क्यों समझते हैं। क्‍या आपने जानना चाहा कि इन लोगों के खिलाफ दूसरे पक्ष के क्‍या आरोप हैं। क्‍या आपने कभी जानना चाहा कि ये लोग जिन कार्यकर्ताओं के साथ काम करते थे उनके इनके बारे में क्‍या विचार हैं। आपने तो भोलेपन की इंतहा ही कर दी और आपने मान लिया कि जनज्‍वार के टिप्‍पणीकार ही सही हैं और दूसरा पक्ष गलत है। इस एकांगीपन की वजह क्‍या है नीलाभ जी। क्‍यों आपको लगता है कि संगठन/समूह ही हमेशा गलत होता है और आरोप लगाने वाला कार्यकर्ता हमेशा सही होता है। और क्‍या आपको लगता है कि इन सब बातों का फैसला करने का सबसे उपयुक्‍त मंच ब्‍लॉग ही है। क्‍या ब्‍लॉग जैसे सशक्‍त टूल ने नीलाभ को गैरजिम्‍मेदार बना दिया है या यह पुरानी खुन्‍नस निकालने का एक जरिया है। --

एक नौजवान राजनीतिक कार्यकर्ता, दिल्‍ली




बाघों के लिए इंसानों का शिकार


आदिवासिओं के लिए आधुनिकता छुछुन्दर हो गयी है और जनजातीय पंरपराओं का ताना-बाना छिन्न-भिन्न हो रहा है.

मेलघाट से लौटकर शिरीष खरे

मेलघाट सतपुड़ा पर्वतमाला की पश्चिमी पहाड़ी है जो महाराष्ट्र के जिला अमरावती की दो तहसील से जुड़कर बनी है. दो लाख 19 हजार हेक्टेयर यानी मुंबई से 4 गुना बड़ी जगह पर यहाँ कुल 319 गांव मिलते हैं. यहां करीब 3 लाख आबादी में से 80फीसदी कोरकू जनजाति है.

समुद्र तल से 1118मीटर की ऊंचाई पर बसा यह हरा-भरा भाग `मेलघाट टाइगर रिजर्व´ कहलाता है. वर्ष  1974 में `एम टी आर´ के नाम से शुरू हुए  इस प्रोजेक्ट से तब 62 गांव प्रभावित हुए थे, दुबारा  27 गांव के करीब 16 हजार लोगों को फिर विस्थापित किया जा रहा है, फिर उनकी सभ्यताएं नष्ट की जा रही हैं. 1947 से पूरे देश में विभिन्न परियोजनाओं से अब तक 2करोड़ से अधिक आदिवासियों को विस्थापित किया जा चुका है.

सरकार के मुताबिक बाघों को बचाने के लिए यहां विस्थापन जरूरी है लेकिन `राष्ट्रीय बाघ संरक्षण प्राधिकरण´की रिपोर्ट स्वीकार करती है कि सत्तर के दशक में शुरू हुआ `प्रोजेक्ट टाइगर´अपने लक्ष्य से काफी दूर रहा. देश में बाघों की संख्या अब तक के सबसे निचले स्तर तक पहुंच चुकी है. 2002 को देश में जहां 3642 बाघ थे वहीं अब 1411 बाघ बचे हैं.

कोकरू जनजाति के लिए उजड़ना नियति बन चुका है.
राज्यसभा के सांसद ज्ञानप्रकाश पिलानियामानते कहते हैं कि -``बाघों की संख्या को बढ़ाने के लिए बने रिजर्व एरिया अब उन्हें मारने की मुनासिब जगह बन गए हैं.इसके लिए अवैध शिकार  करके उनके अंगों की तश्करी करने वाले व्यापारी जिम्मेदार हैं.बाहरी ताकतों की मिलीभगत से ही इतने बड़े गिरोह पनप सकते हैं.

´दूसरी तरफ विकास की तेज आंधी ने जंगलों का भविष्य खत्म कर दिया है. `भारतीय वन सर्वेक्षण´ की रिपोर्ट बताती है कि 2003 से 2005 के बीच 728 किलोमीटर जंगल कम हुआ. फिलहाल सघन जंगल का हिस्सा महज 1.6 फीसदी ही बचा है. इसी प्रकार 11 रिजर्व एरिया में जंगल घटा है. जाहिर है कि जनजाति को लगातार विस्थापित किए जाने के बावजूद न तो बाघ बच पाए हैं और न जंगल.

मेलघाट में कोरकू जनजाति का अतीत देखा जाए तो 1860-1900के बीच प्लेग और हैजा से पहाड़ियां खाली हो गई थी. तब ये लोग मध्यप्रदेश के मोवारगढ़, बेतूल, शाहपुरा भवरा और चिंचोली में जाकर बस गए. उसके एक दशक बाद अंग्रेजों की नजर यहां के जंगल पर पड़ी. उन्हें फर्नीचर की खातिर पेड़ काटवाना और उसके लिए पहुंच मार्ग बनवाना था. इसलिए कोरकू जनजाति को वापिस बुलाया गया. आजादी के 25 सालों तक उनका जीवन जंगल से जुड़ा रहा. उन्होंने जंगल से जीवन जीना सीखा था. लेकिन जैसे-जैसे जंगल से जीवन को अलग-थलग किया जाने लगा वैसे-वैसे उनका जीना दूभर होता चला गया.

अनिल जेम्स कहते हैं कि-`बीते 34 सालों से `मेलघाट टाइगर रिजर्व´ में जनजातियों का शिकार जारी है.जैसे जैसे टाईगर रिजर्व सुरक्षित हो रहा है यहां रोटी का संकट गहराता जा रहा है.जनजातीय पंरपराओं का ताना-बाना छिन्न-भिन्न हो चुका है.यहां सामाजिक ऊथल-पुथल अपने विकराल रुप में हाजिर है.राहत के तौर पर तैयार सरकारी योजनाओं का असर,बेअसर ही रहा.हर योजना ने लोगों को कागजों में उलझाए रखा और अब लोग भी उलझकर जंगल की मांग ही भूल गए हैं.

परम्पराओं पर बाज़ार का रोगन चढ़ रहा है.
बांगलिंगा गांव में 85साल के झोलेमुक्का धाण्डेकर ने जंगल की बातों के बारे में बताया कि-`पहले हम समूह में रहने के आदी थे.अपनी बस्ती को पंचायत मानते और हर परेशानी को यही सुलझाते. `भवई´ त्यौहार पर साल भर का कामकाज और कायदा बनाते. इन मामलों में औरत भी साथ होती. वह अपना हर फैसला खुद ही लेती.चाहे जिसे दूल्हा चुने और पति से अनबन या उसके मरने पर दूसरी शादी करे.शादी में लेन-देन और बच्ची को मारने जैसी बातें नहीं सुनी थी. संख्या के हिसाब से भी मर्द और औरत बराबर ही बैठते.

हमारी बस्ती सागौन, हलदू, साजड़, बेहड़ा, तेंदू, कोसिम, सबय, मोहिम, धावड़ा, तीवस और कोहा के पेड़ों से घिरी थी. जंगल में आग लगती तो हम अपनी बस्तियां बचाने के लिए उसे बुझा देते.तभी तो हमें अंग्रेजों ने जंगलों में ही रहने दिया.वहां से सालगिटी, गालंगा और आरा की भाजियां मिलती.बेचंदी को चावल की तरह उबालकर खाते.कच्चा खाने की चीजों में काला गदालू, बैलकंद, गोगदू और बबरा मिल जाते.ज्वस नाम की बूटी को उबलती सब्जी में मिला दो तो वह तेल का काम करती.

 इसके अलावा तेंदू, आंवला, महुआ, हिरडा, बेहड़ा, लाख और गोद भी खूब थी. फल, छाल और बीजों की कई किस्मों से दवा-दारू बनाते. खेती के लिए कोदो, कुटकी, जगनी, भल्ली, राठी, बडा़ आमतरी,गड़मल और सुकड़ी के बीज थे.ऐसे बीज बंजर जमीन में भी लहलहाते और साल में दो बार फसल देते. इसलिए अनाज का एक हिस्सा खाने और एक हिस्सा खेती के लिए बचा पाते थे.

यह  सरल, खुली और समृद्ध जीवनशैली की झलक भर है. बीते 3 दशकों से भांति-भांति की दखलअंदाजियों ने यहां की दुनिया को बुरी तरह प्रभावित किया. 1974 में सबसे पहले वन-विभाग ने बाघ के पंजों के निशान खोजने और उनकी लंबाई-चौड़ाई तलाशने के लिए सर्वे किया.फिर जमीनों को हदों में बांटा जाने लगा.इस तरह जंगल की जमीन राजस्व की जमीन में बदलने लगी और लोग यहां से बेदखल हुए. 1980 के बाद सरकार ने इन्हें पानी की मछली, जमीन के कंदमूल और पेड़ की पित्तयों के इस्तेमाल से रोका.

मगर पूरा जंगल बाजार के लिए खोल दिया गया. जंगल के उत्पाद जब बाजार में बिकने लगे तो यहां की जनजाति भी जंगल की बजाय बाजारों पर निर्भर हो गई.इससे चीजों का लेन-देन बढ़ा और उन्हें रूपए-पैसों में तौला जाने लगा.अनाज के बदले नकद की महिमा बढ़ी.नकदी फसल के रुप में सोयाबीन और कपास पैदा किया जाने लगा. बाजार से खरीदे संकर बीज अधिक से अधिक पानी और रसायन मांगने लगे. समय के साथ खेती मंहगी होती गई. इस बीच नई जरूरतों में इजाफा हुआ और उनके खाने-पीने, रहने और पहनने में अंतर आया. आज कोरकू लोग कई जडियां और उनके उपयोग नहीं जानते.´´

यह तब की सरल, खुली और समृद्ध जीवनशैली की झलक भर है. बीते 3 दशकों से भांति-भांति की दखलअंदाजियों ने यहां की दुनिया को बुरी तरह प्रभावित किया.1974 में सबसे पहले वन-विभाग ने बाघ के पंजों के निशान खोजने और उनकी लंबाई-चौड़ाई तलाशने के लिए सर्वे किया.फिर जमीनों को हदों में बांटा जाने लगा. इस तरह जंगल की जमीन राजस्व की जमीन में बदलने लगी और लोग यहां से बेदखल हुए.

इन्हें तो बचा नहीं सके, अब इंसानों की बारी
 वर्ष 1980के बाद सरकार ने इन्हें पानी की मछली,जमीन के कंदमूल और पेड़ की पित्तयों के इस्तेमाल से रोका मगर पूरा जंगल बाजार के लिए खोल दिया गया.जंगल के उत्पाद जब बाजार में बिकने लगे तो यहां की जनजाति भी जंगल की बजाय बाजारों पर निर्भर हो गई.इससे चीजों का लेन-देन बढ़ा और उन्हें रूपए-पैसों में तौला जाने लगा.अनाज के बदले नकद की महिमा बढ़ी. नकदी फसल के रुप में सोयाबीन और कपास पैदा किया जाने लगा.

बाजार से खरीदे संकर बीज अधिक से अधिक पानी और रसायन मांगने लगे. समय के साथ खेती मंहगी होती गई. इस बीच नई जरूरतों में इजाफा हुआ और उनके खाने-पीने, रहने और पहनने में अंतर आया.आज कोरकू लोग कई जडियां और उनके उपयोग नहीं जानते.´´

पसतलई गांव के एक युवक ने नाम छिपाने की शर्त पर बताया कि-`जंगली जानवरों का शिकार करने वाली कई टोलियां यहां घूम रही हैं.कमला पारधन नाम की औरत इसी धंधे में लिप्त थी.बाद में पुलिस ने उसे धारणी में गिरफ्तार कर लिया.´ यहां जानवरों के हमलों की घटनाएं भी बढ़ रही हैं.

कुंड गांव की बूढ़ी औरत मानु डाण्डेकर ने जानवरों से बचने के लिए तब की झोपड़ी को याद किया-`वह लकड़ियों और पत्तों की बनी होती,ऊंचाई हमसे 2-3हाथ ज्यादा रहती.छत आधी गोल होती जो पूरी झोपड़ी को ढ़क लेती.उसमें घुसने के लिए दरवाजा उठाकर जाते.दरवाजे की हद इतनी छोटी रखते कि रेंगकर घुसा जाए. झोपड़ी के चारों तरफ 2-3 फीट लंबी पत्थरों की दीवार बनाते. रात को झोपड़ी के बाहर आग सुलगाते.

पूरी बस्ती प्यार, तकरार, शादी, शिकार, जुदाई और पूजन से जुड़े किस्सों पर गाती-थिरकती रकती. जैसे प्यार के गीत में लड़की से मिलने के लिए रास्ता पूछने,शादी के गीत में दूल्हा-दुल्हन बनकर आपस में बतियाने और जुदाई के गीत में शिकार पर गए पति के न लौटने की चर्चा होती.´´

यह बस्तियां अपनी पंरपरा और आधुनिक मापदण्डों के बीच फसी हैं.घरों की दीवारों पर रोमन केलेण्डर और रात में जलती लालटन लटकती हैं. बाहरियों के आने से इनके भीतर हीनता बस गई.यह खुद को बदलने में जुटे हैं. यहां के मोहल्लों ने कस्बों की नकल करके अपनी शक्लों को बिगाड़ रखा है.अब कोरकू बोली की जगह विदर्भ की हिन्दी का असर बढ़ रहा है. जबकि कार्यालय की भाषा मराठी है. इसलिए कोरकू जुबान फिसलती रहती है. खासकर स्कूल में पढ़ने वाले बच्चों को जानने और बोलने में मुश्किल आती है.

कोरकू लोग कहते हैं कि सबकुछ खोने के बाद हमें कुछ नहीं मिला.स्कूल के टीचर और अस्पताल के डॉक्टर मैदानी इलाकों में बने हुए हैं. लेकिन हमारे हिस्से में न मैदान आया, न पहाड़. हम कहां जाए?


Aug 16, 2010

सांसदों ने कहा, नहीं चलता परिवार


देश कि कुल आबादी में छह साल से कम   के करीब ५० प्रतिशत बच्चे कुपोषित  हैं,४० करोड़ आबादी  गरीबी रेखा के नीचे है और  और सांसद हैं कि जनता की मेहनत  की कमाई डकारने के बाद भी दरिद्रता का रोना रो रहे हैं.  

जयप्रताप


चौंकिये नहीं,यह सच्चाई है। आज हमारे देश के सांसद कितने गरीब हैं इसका अनुमान आप इस बात से लगा सकते हैं कि दिन रात जनता के दुख दर्द में शामिल होने के बावजूद इनकी सेलरी मात्र 16,000रुपये ही है। यह अलग बात है कि वह जनता के बीच जाते हैं या नहीं?

वे आम जनता के प्रतिनिधि हैं. इनके करोड़ों के फ्लैट और दो चार महंगी गाडिय़ां, ड्राइवर का वेतन, नौकर-चाकर आदि का खर्चा,क्या 16हजार रुपये में पूरा हो सकता है। यह तो रहा सामान्य खर्चा,बाकी फाइवस्टार होटलों का खर्चा आखिर कहां से आयेगा?कमीशन और अन्य बैक फुट से हुई कमाई करोड़ों अरबों में होती है। लेकिन फिर भी वेतन तो वेतन होता है।हमारे सांसदों का दर्द है   है कि एक सेक्रेटरी का वेतन 80हजार रुपये है और सांसद का मात्र सोलह।

आखिर सेक्रेटरी का काम ही क्या होता है। वह दिन रात किताबें ही तो पढ़ कर आया है। और बैठे-बैठे लेखा-जोखा करता है। कुल मिला कर थोड़ा बहुत देश के हित में काम कर जाता है। जबकि हमारे सांसद तो करोड़ों रुपये खर्च करके चुनाव जीतते हैं और जनता के प्रतिनिधि  माने जाते हैं।  आखिर इस पाप के प्रायश्चित के लिए  पैसों की भी जरूरत तो होती है। इसलिए अब इनकी तनख्वाह पचास हजार रुपये  होने का प्रस्ताव है,लेकिन उतने में भी इन बेचारों का पेट भरने वाला नहीं है। अब इन्हें पांच गुना और चाहिए।

सेलरी के अलावा सांसदों को संसद सत्र के दौरान या हाऊस की कमेटियों की मीटिंग के दौरान हर रोज के हिसाब से 1000रुपये भत्ता मिलता है जिसे दोगुना किया जाने कि मांग है. इसके अलावा संसदीय क्षेत्र का मासिक भत्ता भी 20 हजार से बढ़ाकर 40 हजार करने की मांग कर रहे हैं। ऑफिस भत्ता  के तौर पर भी सांसदों को 20 हजार रुपये मिल रहे हैं लेकिन  इसे भी बढ़ाने का प्रस्ताव है।

अन्य सुविधाओं के तहत सांसद अपनी पत्नी या किसी दूसरे रिश्तेदार के साथ साल में 34 हवाई यात्रा कर सकते हैं। उन्हें किसी भी ट्रेन में किसी भी समय एसी फस्र्ट क्लास में पत्नी समेत यात्रा करने का पास भी मिलता है। इसके अलावा उन्हें अपने कार्यकाल के दौरान मुफ्त में आवास सुविधा भी मिलती है।

रहा सवाल उनका जिनके ये नेताहैं तो, उन मेहनतकशों का तो  फर्ज ही है कि वे अपने और अपने बीबी बच्चों के पेट पर पट्टी बांध कर देश को आगे बढ़ाने में मदद करें। उन्हें वेतन मजदूरी बढ़ाने की चिंता करने की जरूरत ही क्या हैलेकिन यह सब बातें हमारे सांसदों पर लागू नहीं होतीं। क्योंकि वे बेचारे तो हमारे प्रतिनिधि हैं और हमारा यह फर्ज बनता है कि हम अपना खून पसीना बहाकर उनका ख्याल रखें। इसके लिए अगर हमें भूखे भी रहना पड़े तो गलत नहीं। एक बार हमारे एक भूतपूर्व प्रधानमंत्री ने कहा था कि देश को आगे बढ़ाने के लिए यदि जनता को अपनी पेट पर पट्टी भी बांधनी पड़े तो उसमें जनता को पीछे नहीं हटना चाहिए। लेकिन यह बात सिर्फ गरीब जनता पर लागू होती है, जनप्रतिनिधि पर नहीं।
वाह मेरे प्यारे गरीब सांसदों,हम आपके दुख दर्द को समझते हैं. आप हमारे भले के लिए  अमेरिका, रूस, चीन, जापान आदि पूरे विश्व में कुछ घंटों में भ्रमण कर आते हैं और लोग हैं कि गांव से 20 किलोमीटर की दूरी पर बसे शहर में जाने के लिए हजार बार सोचते हैं।  उनके पास  किराये के लिए 20 रुपये बस का किराया नहीं होता, इस बारे में सोचते हैं सांसद साहब. 

आपके पर्यावरणविद हो सकता है कहें कि किराया नहीं है,साइकिल तो है। लेकिन साइकिल चलाने के लिए भी तो शरीर में ताकत होनी चाहिए। ताकत आयेगी कहां से?तो आपके डॉक्टर कहेंगे कि हरी सब्जी खाओ,दूध पियो और ताकतवर फल खाओ।

जनाब जरा सोचिए! इस महंगाई में फल खाना तो दूर देश की 70 प्रतिशत जनता नमक और मिर्च के साथ भी रोटी नहीं खा सकती। मिर्च भी अब 50 से 60 रुपये किलो है। रहा सवाल आटे का तो वह भी पांच किलो का पैकेट का दाम अब 105रुपये हो गया है। उसके शरीर में ताकत कहां से आयेगी। वह साइकिल कैसे चला सकता है। 

बेचारे सांसद अपनी सेलरी तो बढ़वाना चाहते हैं, लेकिन फैक्ट्री कारखानों में 14 से 18 सौ रुपये में दिन रात खटने वाले मेहनतकशों के बारे में सोचने का इनके पास फुर्सत नहीं है। और सोचें भी क्यों? इन्हें जनता से क्या लेना देना है। वे तो इनकी नजर में बस नाली के कीड़े हैं। जिसे जब चाहो कीटनाशक दवाओं की तरह कानूनी डंडे का छिड़काव करके बाहर कर दें। कहे कि जनता तो हर पांच साल पर याद आती है।


Aug 15, 2010

जेपी की हुईं मायावती, किसानों पर दागी गोलियां


अलीगढ़ में जारी किसानों के आंदोलन को लेकर जनज्वार ने करीब दो सप्ताह पहले ‘सरकार ही अत्याचार करै,तो कौन रखावै’रिपोर्ट प्रकाशित  की थी। रिपोर्ट के साथ जनपक्षधर पत्रकारों और मीडिया समूहों से अपील भी की गयी थी कि वह इस खबर को तवज्जो दें मगर ऐसा देखने को नहीं मिला। हमारा मानना है कि अगर समय रहते हस्तक्षेप हुआ होता तो किसान पहले सरकार को,फिर अदालत को और अंत में मीडिया को   बिका हुआ नहीं मानते और न ही किसानों और सुरक्षाबलों के घरों में मातमी माहौल होता जो आज है। अलीगढ़ के टप्पल थाना क्षेत्र से उचित मुआवजे की मांग के साथ शुरू हुआ किसानों का शांतिपूर्ण  धरना अब उग्र आंदोलन में तब्दील हो चुका है और धीरे-धीरे पूरे पश्चिमी  उत्तर प्रदेश में फैल रहा है।


उत्तर प्रदेश के अलीगढ़ में जमीन अधिग्रहण के बदले उचित मुआवजे के लिए संघर्षरत  किसानों पर कल शाम पुलिस ने गोलियां दागीं और आंसू गैस के गोल छोड़े। पुलिस की इस गोलीबारी में दो आंदोलनकारी किसानों और एक पीएसी के सब इंस्पेक्टर की मौत हो गयी। मरने वालों में जीरकपुर गांव के चंद्रपाल  का 12 वर्षीय  बेटा भोला और श्यारोल गांव का 24वर्षीय  युवक धर्मेंद्र मारा गया। खबर लिखे जाने तक ग्रामीणों  से पता चला कि आज भी पुलिस और सुरक्षा बलों के बीच जगह-जगह खूनी झड़प हुई है, जिसमें तीन  किसान   और सुरक्षा बल का एक जवान  मारा गया है. आन्दोलनरत  किसानों की मांग है कि उनके जमीनों का अधिग्रहण कर रही  सरकार वही दर दे जो ग्रेटर नोएडा में अधिग्रहण के दौरान किसानों को दिया जा रहा है.
जमीन अधिग्रहण की सरकारी चालबाजी और जेपी ग्रुप की ज्यादती के खिलाफ पिछले 15दिनों से धरने पर बैठे टप्पल थाना क्षेत्र के छह गांवों के किसान 14 अगस्त को उस समय उग्र हो गये, जब स्थानीय थानाध्यक्ष मल्लिक ने आंदोलन के प्रमुख नेता बाबूराम कठेरिया को शाम  करीब पांच बजे गाली-गलौज कर गिरफ्तार कर लिया। टप्पल, उदयपुर,जहानगढ़, कृपालपुर, जीरकपुर और कंसेरा गांव से शुरू  हुआ यह आंदोलन सरकारी असंवेदनषीलता की वजह से तीन जिलों मथुरा,अलीगढ़ और आगरा के पूरे क्षेत्र में फैल गया है। हर जगह किसान घेराबंदी,पथराव और आगजनी कर रहे हैं।


किसानों का आक्रोश : कैसे समझेगी सरकार
                                                                                                                                  

ग्रामीणों ने बताया कि थानाध्यक्ष मल्लिक ने धरने पर बैठे लोगों के साथ जबर्दस्ती की और लोगों ने जब नेता बाबूराम गठेरिया की गिरफ्तारी का विरोध किया तो थानाध्यक्ष ने गोलियां चला दीं जिसमें जीरकपुर गांव के दो लोग घायल हो गये। इसके बाद किसानों और पुलिस बल के बीच हुई झड़प में जीरकपुर गांव के चंद्रपाल का 12 वर्षीय बेटा भोला और ष्यारोल गांव का 24 वर्षीय  युवक धर्मेंद्र मारा गया। पुलिस की तरफ से धड़ाधड़ चली गोलियों से एक पीएसी सब इंस्पेक्टर भी मारा गया। इस गोलीबारी में कई आंदोलनकारियों को गोलियां लगी हैं जिनका अलीगढ़,मुथरा और फरीदाबाद के अस्पतालों में इलाज चल रहा है। ग्रामीणों के अनुसार 14अगस्त को हुई झड़प में पचीस किसान गंभीर रूप से घायल हैं।

पुलिस की इस ज्यादती की जानकारी गांवों में फैलने में घंटे भर भी नहीं लगी। मात्र चालीस-पचास की संख्या में धरना दे रहे किसानों की संख्या बढ़ते ही आक्रोशित  भीड़े ने दो पुलिस पोस्ट समेत कई गाड़ियां और जेपी ग्रुम का निर्माण को स्वाहा कर डाला। मौके पर मौजूद पूर्व मंत्री ठाकुर दलबीर सिंह की भी गाड़ी को आंदोलनकारियों ने आग के हवाले कर दिया। संयोग से उस वक्त क्षेत्र के विधायक सतपाल चौधरी और पूर्व मंत्री ठाकुर दलबीर सिंह भी मौजूद थे।

संयोग इतना ही नहीं था,बल्कि संयोग यह भी था कि आजादी के तिरसठ साल पूरे होने की पूर्व संध्या पर जब प्रधानमंत्री एक विकसित राष्ट्र  के गुनगुनाते सपनों के साथ सोये होंगे तो राजधानी से मात्र 90किलोमीटर दूर अलीगढ़ जिला में में मारे गये किसानों के परिजन शमसान घाट पर जिंदगी की सबसे कड़वी हकीकत से रू-ब-रू हो रहे होंगे। मशहूर शायर फैज अहमद फैज के ‘दाग-दाग उजाला’की हकीकत से पीछा छुड़ाते हुए प्रधानमंत्री जब लाल किला की प्राचीर से किताब में झांककर देष की हकीकत ढुंढ रहे होंगे तो यकीनन पुलिस के हाथों मारे गये किसानों के लाश की गंध लिये धुआं उन तक जरूर पहुंचा होगा। कारण कि कश्मीर  हो या, अलीगढ़, या फिर हो लालगढ़ हर जगह सरकार अमन और शांति की चाहत में धुआं उठाने में ही सफलता देख रही है और विरोध में उठी आवाजों का लाश बनाने में विकास।

बताया जाता है कि ग्रामीणों के उग्र होने का कारण रैपिड एक्शन  फोर्स,पीएसी और स्थानीय पुलिस का जीरकपुर गांव के पास संघर्श के चिन्ह के तौर पर लगाये गये झंडे का पुल से उखाड़ना रहा। आंदोलनकारी राजू शर्मा ने बताया कि जीरकपुर गांव के नीचे बन रहे पुल पर ग्रामीणों ने हरे रंग का झंडा लगा रहा था जिसे सुरक्षा बलों ने उखाड़ दिया। सुरक्षा बलों के नेता बाबूराम कठेरिया की गिरफ्तारी के बाद सुरक्षा बलों का झंडा उखाड़ना आक्रोशित  ग्रामीणों के लिए आग में घी का काम किया।

किसानों के जारी आंदोलन और पुलिस की दग रही गोलियों के बीच अब देखना यह है कि किसानों की मांग के आगे सरकार झुकती है या मायावती सरकार अपने  प्रिय रियल स्टेट समूह जेपी ग्रुप की जय बोलती है।



सरकार अत्याचार करै, तो रखावै कौन


जिस जमीन पर फसलें उगाते हुए किसानों की पीढ़ियां गुजर चुकी हों,जिन खेतों में उगी फसलों का नाता इन परिवारों की समृद्धि से रहा हो, उन खेतों का मालिकाना हक, कागज की एक चिट्ठी छीन ले तो किसान क्या करें?

अजय प्रकाश की रिपोर्ट

उत्तर प्रदेश  के अलीगढ़ जिले के टप्पल थाना क्षेत्र के छह गांवों में जेपी ग्रुप के मॉल और मकान बनाने के लिए सरकार ने जो जमीन निर्धारित की है,वह किसानों की खेती योग्य जमीन है। मगर उत्तर प्रदेश सरकार जेपी ग्रुप  के मकान-दूकान बनाने को देश  का विकास ठहराने पर आमादा है और हर कीमत पर जमीन कब्जाने की प्रक्रिया शुरू कर चुकी है। 510 हेक्टेयर क्षेत्र में फैले इन सभी गांवों में पुलिस,प्रशासन और जेपी ग्रुप के लठैत भूमि अधिग्रहण की प्रक्रिया शुरू कर चुके हैं,जिसके खिलाफ किसान  भूख हड़ताल पर बैठ गए हैं और हर रोज जोरदार प्रदर्शन  कर रहे हैं.
पश्चिमी  उत्तर प्रदेश में सरकार और जनता के बीच पिछले कई वर्षों  से सबसे बड़ी टकराहट मुआवजे और कब्जे को लेकर ही है। सरकार के पास बहाना विकास का है और किसान ज्यादा से ज्यादा मुआवजा पाने के संघर्ष  पर उतारू है। ग्रामीण हुकुम सिंह कहते हैं,हम पर जुल्म होता है तो न्याय की उम्मीद में प्रशासन,प्रतिनिधि या अदालत में जाते हैं। मगर हम लोगों के सामने यही संकट है कि सरकार ही अत्याचार करै, तो रखावै कौन।’

सरकारी-निजी मिलीभगत  सेइन छह गांवों में खेती के जमीनों पर कब्जेदारी की कानूनी प्रक्रिया जेपी ग्रुप ने 2001 में ताज एक्सप्रेस-वे के बनने के दौरान ही पूरी कर ली थी। मगर यह जानकारी किसानों के बीच सरकार की ओर से पिछले वर्ष सार्वजनिक की गयी। गौरतलब है कि उस समय सरकार बसपा की ही थी और मौजूदा मुख्यमंत्री मायावती ही सत्ता पर काबिज थीं। सन् 2001 में किसानों ने बड़ी आसानी से ताज एक्सप्रेस वे के लिए जमीन दे दी कि इससे राज्य का विकास होगा। उस समय किसानों ने जमीन सवा तीन लाख रूपये बीघे के हिसाब से दी थी। लेकिन पिछले वर्श जब विकास प्राधिकरण ने किसानों को नोटिस भेजा कि अलीगढ़ जिले के छह गांवों टप्पल, उदयपुर, जहानगढ़, कृपालपुर, जीकरपुर और कंसेरा गांव के जमीन मालिक कोई नया निर्माण न करें, तो किसान हतप्रभ रह गये।

इसकी शुरुआअत उस समय हो गयी थी जब कॉमनवेल्थ खेलों के लिए दिल्ली से आगरा के बीच चौड़ी,सुंदर और चकमदार सड़क बनाने की योजना की मंजूरी ताज एक्सप्रेस-वे हाइवे प्राधिकरण को सरकार ने दी थी। जिसका नाम बाद में यमुना एक्सप्रेस-वे विकास प्राधिकरण हो गया। इसके लिए नोएडा,अलीगढ़ और आगरा के किसानों की जमीन का अधिग्रहण किया गया और ठेका देने के लिए कई कंपनियां आमंत्रित की गयीं।

जेपी ग्रुप ने सरकार से कहा कि वह नोएडा से आगरा तक अपने खर्चे से सड़क बना देगा। शर्त  बस इतनी है कि सरकार कंपनी को अच्छे बाजार की संभावना वाली जगहों पर प्रदेश  में पांच जगह करीब 50 हजार हेक्टेयर जमीन उसे दे, जिसका भुगतान कंपनी कर देगी। मगर कंपनी ने दूसरी शर्त  यह रखी कि सड़कों के बनने के बाद, तीस वर्षों तक टोल टैक्स जेपी ग्रुप वसूल करेगा। जनता की सरकार मायावती ने इसे जनहित में मानते हुए जेपी ग्रुप  की सारी शर्तें स्वीकार कर लीं।

गौरतलब है कि यह सारी जानकारी किसानों से छिपायी गयी। जहानगढ़ गाँव के हुकुम सिंह इसे एक साजिश मानते हैं। हुकुम सिंह ने बताया कि ‘जिलाधिकारी ने सरकारी कर्मचारियों पर दबाव डालकर,तबादले की धमकी देकर कुछ ग्रामीणों से जमीन कब्जा वाले कागजों पर तो दस्तखत करा लिया है, मगर ज्यादातर लोगों को सरकार की यह षर्त मंजूर नहीं है।’यानी प्रशासन घोषित  कब्जेदारी के तरीकों के मुकाबले अभी तक अघोषित  ढंग ही बात मनवाने में सफल रहा है। ऐसा सरकार इसलिए कर रही है कि 2001में नोएडा एक्सप्रेस वे के लिए जिस कीमत (सवा तीन लाख रूपया बीघा) पर अधिग्रहण हुआ था, नौ साल बाद भी किसान उसी दर को स्वीकार कर लें।


किसानों के आंदोलन में शामिल राजू शर्मा  बताते हैं कि ‘सरकार की शर्त हमें मंजूर नहीं थी। इसलिए इलाहाबाद उच्च न्यायालय का दरवाजा खटखटाया। किसानों ने अदालत के समक्ष अपनी मांगों को रखा। जैसे,किसानों की जमीन को सरकार साढे़ सैंतालीस सौ वर्गमीटर के हिसाब से बेच रही है तो उन्हें इन जमीनों का भुगतानबेची जारही कीमत से बीस प्रतिशत  कम करके अदा करे। दूसरी मांग यह है कि कुल जमीन का दस प्रतिषत हिस्सा विकसित कर सरकार किसानों को दे जिससे कि वे देश  के विकास में अपनी भागीदारी कर सकें। मिले हुए मुआवजे से गर किसान प्रदेश में कहीं जमीन खरीदता है तो उसे स्टांप शुल्क न देना पड़े और हर प्रभावित परिवार के सदस्य को रोजगार मिले।

इलाहाबाद उच्च न्यायालय में इन सभी मामलों के पक्ष-विपक्ष पर साल भर सुनवाई चली। किसानों को उम्मीद थी कि अदालत उनके पक्ष में फैसला देगी। मगर अदालत ने 2जुलाई को जो फैसला दिया, उससे बीस हजार आबादी वाले इन छह गांवों के लोग सकते में आ गये। राजू शर्मा बताते हैं कि ‘सरकार और जेपीग्रुप  की तरफ से पेश हो रहे वकीलों ने उच्च न्यायालय में जो बातें रखीं वे सभी हवाई साबित हुईं। जैसे किसानों की खेती योग्य जमीनों को जेपी के वकील ने बंजर बताया तो किसान उसे उपजाउ साबित करने में सफल हुए। इतना ही नहीं किसानों अदालत में धारा -5ए का हवाला देते हुए सरकार को कठघरे में खड़ा कर दिया कि ग्रामीणों की सहमति की सरकार ने कोई जरूरत ही नहीं समझी।

सारी सुनवाइयों के बाद उच्च न्यायालय के न्यायाधीश  सुनील अंबानी और धीरेंद्र सिंह ने तीन जिलों आगरा, नोएडा और अलीगढ़ में किसानों के विरोध के औसत के आधार पर टप्पल क्षेत्र के प्रभावितों का मुकदमा खारिज कर दिया। किसानों के वकील आषीश पांडेय ने बताया कि ‘एक ही प्रोजेक्ट के उपयोग के लिए कब्जाई गयी जमीन को आधार बनाकर अदालत ने कहा कि जब अस्सी फीसदी किसानों को कोई ऐतराज नहीं है तो बीस प्रतिशत  का क्या मतलब?’दरअसल जजों ने इन तीनों जिलों में जमीन अधिग्रहण के खिलाफ हो रहे विरोध और जमीन का औसत निकाला तो पाया कि टप्पल के किसानों की भागीदारी 20 प्रतिशत  है। इसी आधार पर दोनों जजों ने संयुक्त रूप से सुनवाई के दौरान मुकदमे को खारिज कर जेपी ग्रुप के पक्ष में फैसला दे दिया।


सरकार,प्रशासन औरअंत में अदालती आदेश से हताश ग्रामीणों ने जीरकपुर गांव में किसान सभा के बैनर भूख हड़ताल शुरू कर दी है। मगर पुलिस लोकतान्त्रिक  विरोध के इस तरीके को लगातार असफल करने में लगी हुई है। कब्जेदारी से प्रभावित होने वाले सभी गांवों में धारा 144लगा दी गयी है जिससे कि किसान इकट्ठे होकर आंदोलन को मजबूत न बना सकें। किसान सभा के धरने में सक्रिय भूमिका निभा रहे किशन  बघेल ने बताया कि ‘इन सभी गांवों के सर्वाधिक सक्रिय और जुझारू लोगों का पुलिस ने पहले से ही मुचलका कर रखा है ताकि संगठित आवाज उठाने वालों पर कानूनी कार्रवाई कर,कानून-व्यवस्था बनाये रखने के बहाने जेलों में डाला जा सके।’किसान सभा नेता कल्लू बघेल को पुलिस ने 29 जुलाई को देर रात में घर से उठाकर जेल में डाल दिया था।

सरकार और जेपी के मिलीभगत में फंसे ग्रामीणों ने फिर एक बार अदालत का दरवाजा खटखटाया है। सर्वोच्च न्यायालय के वकील रामनिवास ने किसानों की ओर से उच्च न्यायालय के फैसले के खिलाफ अर्जी डाली है। मगर अब प्रष्न यह है कि देष की आर्थिकी में बड़ी भूमिका निभाने वाले किसानों के खिलाफ सरकार मुकदमा लड़ रही है,पूंजी बटोरने में लगी कंपनियों के लिए सुविधा मुहैया कराना ही जिम्मेदारी मान चुकी है।


(द पब्लिक एजेंडा में छपी रिपोर्ट का संपादित अंश)

टिप्पणी- ग्रेटर नोएडा  से छह किलोमीटर दूर  अलीगढ  जिला  के खैर रेलवे स्टेशन की ओर पड़ने वाले इन गांवों  में  तीखा आन्दोलन चल रहा है. ग्रामीणों का कहना है कि मीडिया को पुलिस ओर जेपी कंपनी  के लोग जाने नहीं दे रहे हैं. जनपक्षधर पत्रकार और मीडिया संस्थान इस मसले को जानने के लिए इन नंबरों पर संपर्क कर सकते हैं.


सिनामाई पर्दे पर नया मुहावरा है 'पीपली लाइव'


फिल्म में मीडिया की भूमिका झपट्टा मारने पर उतारू बाज़ जैसी है जो 'आत्महत्या'की जाल में फंसने जा रहे किसान नत्था के पेशाब और टट्टी करने तक को सनसनीख़ेज़ 'ख़बर'बनाता है।

वर्धा से अनिल मिश्र

पीपली लाइव लोकजीवन के मार्मिक चरित्रों की विडंबना को व्यंग्य की सुतली डोर से बांधती है। यह वोट लूटने की ज़हरीली राजनीति,जानलेवा 'विकास'और सौदागर मीडिया के भ्रष्ट लेकिन मज़बूत गठजोड़ की सिनेमाई दास्तान है। नत्था, बुधिया, होरी और अम्मानुमा पात्र, अपने देश भारत (इंडिया नहीं)की फटी तक़दीर पर चस्पा ऐतिहासिक नज़ीर हैं कि कैसे एक देश की कई पीढ़ियां निराशा,अवसाद और अपने ही लोगों की गु़लामी के जूतों तले दबकर धीमी मौत की सांस गिन रही हैं। हमारे 'इंडिया' को इसका भान बस यूं है कि वह इन पात्रों की ज़िंदगियों को हरेक क्षण किसी मस्त बौराये हाथी की तरह पल-प्रतिपल कुचलता चला जा रहा है।


लोक की सहज जीवन-शैली के धागों से बुनी फ़िल्म छिछोरी राजनीति की गंदी हरकतों को उजागर करती है। इसमें मीडिया की भूमिका झपट्टा मारने पर उतारू बाज़ जैसी है जो 'आत्महत्या'की जाल में फंसने जा रहे किसान नत्था के पेशाब और टट्टी करने तक को सनसनीख़ेज़ 'ख़बर'बनाता है। फ़िल्म में,युगीन उपलब्धियों को जीने वाले नाट्यकर्मी हबीब तनवीर के अभिनय स्कूल का भरपूर असर दिखता है जो सिनेमाई पर्दे पर अभिनय का एक नया मुहावरा गढ़ता है। मसलन, फ़िल्म के खल पात्र जब कर्कश गालियां देते हैं तो वह तंज और नफ़रत का एक तल्ख़ इज़हार होता है लेकिन अम्मा द्वारा अपनी बहू या लड़के को दी जाने वाली गालियां दर्शकों को गुदगुदा जाती हैं।

नगीन तनवीर के गीत 'चोला माटी का....' गीत सुनहरी लोकधुन की उत्कृष्ट गायकी है। नगीन तनवीर की खनकती आवाज़ इसके जादुई असर को और महीन करती है। विभिन्न भाषाओं के लोकगीतों और धुनों पर नगीन की ग़ज़ब की, आल्हादित कर देने वाली पकड़ है। फ़िल्म में ताज़ादम ताज़गी के साथ ये गीत सूफ़ी संगीत की सी सादगी से तरंगित है। अन्य गीत 'देस मेरा रंगरेज़....'और 'मंहगाई डायन.....'आज के अंतर्द्वंद की नब्ज़ टटोलने में बेतरह कामयाब हुए हैं।

पीपली लाइव,कुलीनों द्वारा देश के हृदयस्थल पर एक के बाद एक की जा रही चोटों का हालिया हिसाबनामा है। यह नव-धनाढ्य चेतना को बेधती हुई,अर्थपूर्ण मनोरंजन की ज़रूरत से पगी फ़िल्म है। यह दर्शकों को एक ज्वलंत सवाल पर समझदार सोच के साथ सिनेमाहॉल से विदा करती फ़िल्म है।




Aug 14, 2010

पंद्रह हजार विधवा जलाएंगी 'पीपली लाइव' का पोस्टर

विदर्भ की पंद्रह हजार महिलाएं 15 अगस्त को नागपुर से 150 किलोमीटर दूर यवतमाल जिले में पीपली लाइव के पोस्टर जलाकर अपना विरोध प्रदर्शन करेंगी।



किसानों की आत्महत्या के लिए चर्चित  महाराष्ट्र के विदर्भ  क्षेत्र में  आमिर खान की पीपली लाइव के रिलीज होने के साथ ही पुरे  महाराष्ट्र में प्रतिबंध लगाने की मांग होने लगी है.विदर्भ जनांदोलन समिति ने  इस संबंध में महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री और आमिर खान को भी एक पत्र लिखा है। समिति का कहना है कि फिल्म में आत्महत्या का कारण   मुआवजे के लालच को बताया गया है,जबकि यह गलत है।

इस फिल्म के कारण क्षेत्र के अस्सी लाख किसान इससे काफी दुखी हैं। कोई भी किसान पैसों को लिए मौत का रास्ता नहीं चुनता है। किसाना सरकार की गलत नीतियों के कारण आत्महत्या कर रहा है लेकिन इस पूरी फिल्म में किसानों का मजाक बना दिया है। समिति ने कहा है कि सरकार अगर इस फिल्म पर प्रतिबंध नहीं लगाती है तो  किसानों का संगठन फिल्म के खिलाफ सेंसर बोर्ड और हाईकोर्ट जायेगा.

विदर्भ जनांदोलन समिति के अध्यक्ष किशोर तिवारी ने बातचीत में कहा कि इस फिल्म की वजह से आंदोलन देश-विदेश में बदनाम हो रहा है। महाराष्ट्र के विदर्भ क्षेत्र में पिछले एक दशक में दो लाख किसानों ने आत्महत्या की है। लेकिन 1.60लाख विधवाओं को आज तक अपने पति के मौत का मुआवजा नहीं मिला है।

संगठन की विज्ञप्ति विस्तार में-


Vidarbha Janandolan Samiti (VJAS) , farmers advocacy group in vidarbha ,the epicenter of Indian ‘Agrarian crisis’ which has claimed 2,00,000 farmers suicides in last decade and Maharashtra western region which is termed as dying field of cotton farmers where more than 40,000 farmers committed suicides has objected the basic theme and script of film Peepli Live produced by a mainstream filmmaker Aamir Khan and Directed by Anusha Rizvi that the ‘farmer is committing suicide for compensation’ , released yesterday and urged Maharashtra Govt. to ban it’s screening immediately as it is hurting sentiments of 8 millions of distressed and debt trapped farmers of Maharashtra who are being forced to commit suicide due to wrong policies of Indian Government .


Vidarbha Janandolan Samiti (VJAS) president Kishor Tiwari has written letter to Maharashtra Chief Minister Ashok Chavan urging him to ban the screening of movie and appoint agrarian experts to look in to objections of the farm activist as the massage of the film is taking farm suicide in to very damaging turn and diverting from the basic issues and reasons of agrarian crisis and further filming of the movie will create law and order problem in state ,tiwari added in the letter.

‘Initially TV serial ‘Bairi Piya’ has shown that debt trapped vidrabha farmers are selling daughters for clearing the debt now Peepli Live movie has shown Natha, a poor farmer from Peepli village in the heart of rural India is about to lose his plot of land due to an unpaid government loan has got a quick fix to the problem is the very same government’s program that aids the families of indebted farmers who have committed suicide and as a means of survival Farmer Natha can choose to die and futher shown that His brother is happy to push him towards this unique ‘honour’ of suicide but Natha is reluctant ,this is totally untrue too much twisted from the ground reality and insult of poor millions of dying farmers of vidarbha who are the victims of globalization and wrong policies of the state hence we are disturbed .

VJAS respect social commitment of Amir Khan and other part of movie exposing the reality behind media houses, politicians, bureaucrats and their apathetic approach towards problems and shocking truth that India promotes itself as one of the fastest growing economies in the world, but the film shows the miserable condition of farmers who continue to end their lives after living in extreme poverty but he should have consulted rural crisis expert before finalizing script that our objection ’Tiwari said

‘Peepli Live has made big question mark to 1,60,000 farm widows who are demanding compensation after their bread earner farmer committee suicide due to debt and crop failure as this movie shows that vidarbha cotton farmers are committing suicides for getting aid where as Govt. of Maharashtra has rejected more than 90% cases of farm suicides rejecting claim of dying family member of debt trapped farmer more Peepli Live will give strong support to politicians, bureaucrats and their apathetic approach towards problems that farmers are not forced to kill themselves where as they themselves killing for compensation hence we demand the ban of the film and cancellation censorship certificate to the film’ Tiwari urged.
 
 

Aug 13, 2010

एंडे चेची अफ्रीका


जी. एस. रोशन
                                                                                                                     
एंडे चेची अफ्रीका
तुम वो बच्ची हो जिसे उन्होंने
एक खेल का मैदान बनाने के लिए
मस्ती में चीखते-चिल्लाते और ठोकरों से उछाल-उछालकर
जिंदा दफ़ना दिया।


काफी हद तक वैसा ही सब चलता है यहां भी
यहां वे थूकते हैं हमारी जमीनों और संतानों पर
और चले जाते हैं आहिस्ता-आहिस्ता दूर, बेधड़क
और जब फसल पककर तैयार होती है
पौधों के पतले तने पुष्ट और मजबूत होते हैं
जब दानों में उतरता है दूध और मेहनतकश  आंखों में रोटी के सपने
वे आते हैं और ले जाते हैं अनाज
बेच देते हैं किसी बड़ी सी बेकरी के मालिक को
बिस्किट बनाने के लिए...

और हमारा क्या, मेरी बहन अफ्रीका,
बची-खुची झूरन-झारन के इंतजार में
हम दोनों के मुंह खुले ही रह जाते हैं।

एक मोटे ब्रश  से हमें एक ही झूठे रंग से पोत दिया जाता है
जैसे कि पूरा अफ्रीका एक जैसा हो, या पूरा भारत
जबकि हम दोनों के बीच एक जैसा सिर्फ खालीपन है
जो हमारे पेट से लेकर हमारे हाथों तक फैला है,
और हमारे खाली हाथों के आसपास खाली-खाली बजते वो पुराने गीत हैं
जो सबकुछ भरपूर होने के बारे में थे।

इसलिए मेरी बहन, अफ्रीका,
हम दोनों एक दूसरे के लिए गाते हैं शोकगीत
इस उम्मीद में कि हम मौत से भी जगायेंगे एक दिन, एक-दूसरे को।
हमारे खाली पेटों को बजाकर निकाली गयी सलामी की धुन
जो सुनायी दी पृथ्वी के किनारों तक तेज बजते नगाड़ों सी
उससे भी तेज धड़कते हुए हम चलेंगे
अपने जिंदा लोगों की जीने की अदम्य इच्छा के साथ।

तुम दाल लेकर आना एंडे चेची अफ्रीका
मैं भात लेकर आऊंगा
हम सूरज की रोशनी से दूर भगायेंगे अंधेरे को
हम मेडागास्कर में खोलेंगे अपने टिफिन तोड़ेंगे अपने खाने के निवाले
तुम फिर से सिखाना मुझे अपने पैरों पर ठीक से चलना
और मैं तुम्हें सुनाऊंगा कहानियां अपने सफर के बारे में
हम करेंगे छपछप समंदरों के पानी में... बिना डरे।

उनकी मत सुनना एंडे चेची अफ्रीका
जो हमारा नाम लेकर, हमारे भाई बनकर तुम्हारे पास पहुंचे हैं
जो अपने मुनाफाखोर वादों को जिस धागे में पिरोकर लाते हैं
उसे वो तुम्हें ही बेच देते हैं अपने बालों का जूड़ा बांधने के लिए।

अगर तुम मां से पूछोगी तो वो तुम्हें बतायेंगी चेची
कि तुम्हारी जमीन पर दौड़ रहे इनके पीतल के रथ के पहिये
उन इंसानों की जिंदगी से सने हैं
जो यहां हिंदुस्तान के बीचोंबीच से लेकर हर कोने तक
खेतों, जंगलों, खदानों और कारखानों में फैले हैं
और जिनका नाम कभी उड़ीसा है, कभी दंतेवाड़ा, या
    अफ्रीका, अफ्रीका, अफ्रीका...


  • मलयालम में एंडे चेची का अर्थ होता है-मेरी बहन


अंग्रेजी से अनुवाद-विनीत तिवारी

(रोशन मलयालम और अंग्रेजी में कविता लिखते हैं. अफ्रीका सहित कई महाद्वीपों में रह चुके हैं. इन दिनों इंदौर में रिसर्चर हैं. )
दैनिक भास्कर से साभार