Mar 18, 2010

यहाँ भूखों को भक्त कहा जाता है


 मनगढ के कृपालुजी महाराज के आश्रम में मची भगदड़ के बाद  63 जाने गयीं. मरने वालों में ज्यादातर दलित और पिछड़ी जाति के लोग हैं और गरीब घरों से ताल्लुक रखते हैं.वैसे में न्याय कितना हो पायेगा यह लोग अनुभवों से जानते हैं.रही सही कसर प्रसाशन ने कृपालुजी महाराज को इस पुरे मामले में दोषियों की सूची से बाहर  कर पूरी कर दी है. हालांकि पहले से कुछ आपराधिक मामलों में बाबा नामज़द रहे हैं,लेकिन इससे उनकी शान में कभी कोई कमी नहीं आयी, जो इस बार भी नहीं आनी है.

हम यहाँ कुछ तस्वीरों को चिपका रहे हैं. उम्मीद है कि ये तस्वीरें हम सबको एहसास कराती रहेंगी कि भक्ति में भीख और भूख का प्रतिशत कितना जबरदस्त है.

सभी फोटो - अजय प्रकाश


 कुंडा क्षेत्र  का काजीपुर गाँव: दो तौलिया के बदले तीन जान


पिसती है नमक मिर्च  तो चलती है नाड़ी :  सावित्री के दो बच्चे और सास इससे बेहतर कि तलाश में भगदड़ में मारे  गए



देखें तो चप्पल, समझें तो लाश: इसका भी कोई म्यूजियम  बनेगा. भक्तिधाम आश्रम के कार्यकर्ताओं द्वारा पानी का बौछार करने से ४ मार्च को भगदड़ मची थी जिसमें ६३ लोगों कि मौत हो हुई.



रामकृपाल तिवारी उर्फ़ कृपालुजी महाराज की पत्नी पद्मा देवी : सांसारिक राग से कितनी दूर.
इन्ही की याद में भंडारा हुआ था जिसमें भगदड़ मची.




मियां का पुरवा गाँव : इसके पास अब मां  नहीं है.
 सुबह काम पर जाते वक्त मैंने मां से कहा था  मनगढ आश्रम मत जाना, लेकिन नहीं मानी. शाम को आया तो वह रोज की तरह दरवाजे पर इंतज़ार नहीं कर रही थी, कफ़न से ढंकी थी.





मौज में बाबा : कल भी और आज भी
आखिर पीड़ित कहाँ जाएँ, किससे कहें कि गुनहगार मौज में है और हमारा जीवन दोजख में.





गुनहगार भी और सुरक्षा के हकदार भी: लोकतंत्र में यह रिवाज़ बड़ी आम है .
भगदड़ की अगली सुबह के  पहले से ही PAC पुलिस बल के चार ट्रक बाबा के आश्रम की सुरक्षा में तैनात हैं.


Mar 11, 2010

आजमगढ़ का नायक

अजय प्रकाश 

खुदी को कर बुलंद इतना कि हर तकदीर से पहले/खुदा बंदे से खुद पूछे, बता तेरी रजा क्या है।' अल्लामा इकबाल के इस शेर का इस्तेमाल अमूमन खास लोगों की हौसला-आफजाई के लिए होता है। यही शेर लाहीडिहां बाजार भटवां की मस्जिद में भी एक पान की दुकान पर सुनने को मिला। तभी सुनने वालों में से ही किसी ने पूछ लिया- इसका कद्रदां कौन है? सुनाने वाले ने भी देरी नहीं की और एक सामान्य कद-काठी के दाढ़ी वाले बंदे को पकड़ लाया और बोला-ये हैं शेर के असली कद्रदां-तोआं गांव के शकील भाई।

तोआं आजमगढ़ जिले के सरायमीर थाने का एक गांव है। सरायमीर का जिक्र पिछले कुछ वर्षों  में राष्ट्रीय  स्तर पर इस रूप में होता रहा है कि यहां बम धमाकों के सबसे ज्यादा आरोपी पकड़े गये हैं। भटवां की मस्जिद पर मिले लोग कहते भी हैं कि 'आजमगढ़ में आतंक की तो चर्चा सब जगह है, लेकिन इसी जिले में शकील भाई ने अकेले दम पर एक पुल का निर्माण, दूसरे  के आधे से अधिक का काम पूरा कर और तीसरे की बनाने की योजना तैयार कर जो साहस दिखाया है उसकी चर्चा न तो मीडिया कर रही है और न ही सरकार प्रोत्साहित करने में दिलचस्पी दिखा रही है।'

बगैर किसी सरकारी सहायता के सिर्फ चंदा मांगकर पिछले दस वर्षों के अकथ प्रयास से शकील भाई ने जो कर दिखाया है, उसे सुनकर एक दफा आश्चर्य  लगता है। चंदा मांग कर धार्मिक स्थल और स्कूल बनाने की परंपरा तो रही है लेकिन पुल भी चंदा मांग कर बन सकता है, ऐसा सोचना मुश्किल  लगता है। इसमें दो राय नहीं कि प्रदेश  के सांप्रदायिक सौहार्द वाले जिलों में हमेशा  अव्वल रहे आजमगढ़ में फिर एक बार गंगा-जमुनी संस्कृति को हंगामा मचाये बिना ही शकील भाई ने समृध्द किया है।

जिला मुख्यालय से मात्र 40 किलोमीटर की दूरी पर मगही नदी पर बने इस पुल को शकील सामाजिक सहयोग की देन मानते हैं। लगभग 50 गांवों को आपस में जोड़ने वाले इस पुल ने दर्जन भर गांवों की जिला मुख्यालय और थाने से दूरियों को कम किया है। पुल ही बनाने की योजना शकील ने क्यों हाथ में ली ? इसके पीछे एक दिल को छू देने वाली घटना है। लेकिन इससे पहले शकील मीडिया को लेकर शिकायत  करते हैं कि 'जिला-जवार के दलालों की खबरों को तो पत्रकार बंधु तवज्जो देते हैं मगर अच्छे कामों पर एक बूंद स्याही खर्च करने में कोताही क्यों बरतते हैं। खुफिया और सरकारी बयानों को सच की तरह पेश  करने वाली मीडिया ने बाहर वालों के लिए कुछ ऐसी बना दी है कि लोग मानने लगें कि यहां के मुसलमानों में ही कुछ नुक्स है।'

जिस तरह पुल अपने ऊपर  से गुजरने वालों की जाति-धर्म से मतलब नहीं रखता, वैसे ही शकील भाई भी सिर्फ इंसानी पहचान के ही पैरोकार हैं। टौंस नदी पर बन रहे पुल का काम कराने में व्यस्त शकील भाई से हुई मुलाकात में पूछने पर कि आपने पुल बनाने की शुरूआत कैसे की? वे कहते हैं, 'वैसे तो यह किस्सा हर कोई बता सकता है लेकिन मेरे साथ बस इतना हुआ कि मैं उस किस्से का होकर रह गया. मैंने उससे मोहब्बत कर ली।'

बरसात का मौसम था और मगही नदी उफान पर थी। सरायमीर जाने का एकमात्र आसान रास्ता नदी पार करना ही था। साल के बाकी नौ महीनों में तो बच्चे चाह (बांस का पुल) पार कर स्कूल जाया करते थे लेकिन बरसात में पार करने का जरिया नांव ही हुआ करती थी। उस दिन भी बच्चे इस्लहा पर पढ़ने जा रहे थे। नांव में बारह बच्चे सवार थे और नांव नदी के बीचो-बीच उलट गयी। सुबह का समय होने की वजह से उसपार जाने वालों की तादाद थी इसलिए बारह में से ग्यारह बच्चे बचा लिए गये, लेकिन शकील के गांव के सैफुल्लाह को नहीं बचाया जा सका। उस समय षकील सउदी अरब में नौकरी कर रहे थे। शकील उन दिनों को याद कर बताते हैं, 'जब मैंने यह खबर सुनी तो मुझे बेचैनी छा गयी। मुझे लगता था कि कोई मुझसे हर रोज कहता है कि गांव जाते क्यों नहीं।'

बकौल शकील, 'उसके छह महीने बाद जब मैं घर आया तो मानो किसी ने कहा हो कि क्यों नहीं एक पुल ही बनवा देते, लेकिन मेरी मासिक आमदनी कुछ हजार रूपये थी और पुल बनाने के लाखों रूपये वाले काम को हाथ में लेना संभव नहीं लगा। लोगों से बात करने, सुझाव लेने और आत्मविश्वास  हासिल करने में दो साल और लग गये। फिर मैंने हिम्मत जुटाकर अकेले ही चंदा मांगना शुरू किया। बहुतों ने कहा कि कमाने-खाने का धंधा है। चीटर तक कहा, लेकिन मैंने न किसी का जवाब दिया और न ही आरोपों से आहत हुआ। मुझे अपनी नियत पर भरोसा था। अल्लाह को गवाह मानकर पुल बनाने की योजना पर आगे बढ़ गया। यहां आसपास के गांवों से सहयोग लेने के बाद मुंबई, दिल्ली, गुजरात ही नहीं दुबई जाकर भी मैंने चंदा जुटाया।'

चंदा के अनुभवों को साझा करते हुए शकील से पता चला कि कुछ ने दिया तो कुछ ने दुत्कार दिया। मददगारों में सबसे अधिक मदद गुजरात के वापी शहर के रहने वाले 85 वर्षीय  हाजी इसरानुलहक ने की और कर रहे हैं। शकील के शब्दों में कहें तो 'हाजी साहब को तहेदिल से शुक्रिया करता हूं जिन्होंने भावनात्मक और आर्थिक दोनों ही स्तरों पर भरपूर मदद की। साथ ही मैं इंजीनियर संजय श्रीवास्तव की चर्चा करूंगा जो कि मेरे दोस्त भी हैं, जिन्होंने एक पाई लिये बगैर हमेशा सहयोग दिया।'
शकील यह बताना नहीं भूलते कि हाजी साबह ने कभी इसको रत्तीभर भी भुनाने की कोशिश  नहीं की। आग्रह करके हम गांव वालों ने उन्हीं से बन चुके पुल का शिलान्यास  भी कराया और अब इरादा है कि उस पुल का नाम सैफुल्ला के नाम पर रखें, जिसकी नदी में डूबने से मौत हो गयी थी। राजापुर गांव के मतीउद्दीन बताते हैं कि 'सैफुल्ला रिश्ते  में सलीम का कुछ नहीं लगता था फिर भी उसने जो संकल्प लेकर किया उससे हजारों सैफुल्लाओं के परिजन हमेशा शकील को सलाम करेंगे, दुआएं देंगे।'

सामाजिक दायरे के अलावा क्या किसी और ने मदद की? इस पर शकील हंसते हुए कहते है,'सरकारी विभागों से हमने कई दफा मदद की दरख्वास्त की। सांसदों-विधायकों के यहां गुहार लगाने गये। प्रदेश के मुख्यमंत्री रहे रामनरेश यादव के यहां भी गांववाले लेकर गये, पर बात नहीं बनी। इतना ही नहीं, मेरी आर्थिक और पारिवारिक औकात जानने के बाद तो मौके पर जगहंसाई भी करते थे। समाज के संभ्रात लोगों का यह रवैया देखकर मन भारी और थका हुआ महसूस करता था। कई दफा लगा कि पीछे हट जायें। लेकिन हताशा  का विचार आते ही बचपन से जवानी तक सुने साहस के किस्से-कहानियों से मुझे बल मिलता था। अपने बुजुर्गों से सुने उन साहसिक कहानियों की यादों के साथ, वह पल भी याद कर मन ख़ुशी  से भर उठता था जब कहानियों के नायक या नायिका लाख मुश्किलों के बावजूद संघर्ष  के मुकाम तक पहुंचते थे।'

शकील के इस उम्दा प्रयास में गौर करने लायक बात यह है कि जिस समाज ने एक समय में इन्हें दुत्कारा, उसी समाज के कुछ लोगों ने शकील भाई की मदद भी की और आगे चलकर हाथों-हाथ लिया। इसलिए शकील कहते भी हैं कि 'पुल निर्माण सामाजिक सहयोग के बदौलत ही संभव हो पाया।' लगभग 60 लाख से ऊपर धनराशी खर्च हो चुकी है। यह पूंजी एक ऐसे आदमी ने जुटायी,  जिसका न कोई सामाजिक रूतबा था और न ही कोई पारिवारिक रसूख। उसके पास ढंग का रोजगार तक नहीं था।

द पब्लिक एजेंडा से साभार

 विडियो देखने के लिए यहाँ क्लिक करें
http://www.youtube.com/watch?v=jkyrmNzQcxc

Feb 20, 2010

फिर सहमा आजमगढ़

पिछले कुछ महीनों से शांत  चल रहे आजमगढ़ की आबोहवा में फिर सरगर्मी  है।  खालिसपुर के शहजाद की इनामी आतंकवादी बताकर  गिरफ्तारी, फिर पुणे धमाके में उसकी संलिप्तता   का संदेह जैसे  समाचार सुनकर आजमगढ़ की  खौफज़दा और खिसियाई जनता पूछने लगी है,  मुल्क में मुसलमानों का भी पक्ष जानने वाला कोई है या नहीं। अजय प्रकाश  की रिपोर्ट
आधे हिंदुओं और आधे मुसलमानों को मिलाकर एक पूरा गांव है खालिसपुर। पहले भी क्षेत्र में इस गांव की चर्चा हुआ करती थी लेकिन अब उसने नई जमीन तलाश  ली है। पहले लोग कहा करते थे कि इस गांव का नियाज अहमद एक नेक और ईमानदार आदमी था जो पंद्रह साल ग्राम प्रधान और पंद्रह साल निर्विरोध ब्लाक प्रमुख चुना गया। मगर अब पूछने पर 82 वर्षीय नियाज के घर का पता बताने से पहले चौराहे पर खड़े ग्रामीण, आतंकवादी होने के आरोप में खालिसपुर से पकड़े गये शहजाद का नाम जोड़ते हैं और कहते हैं 'अगवां जा पूछ लिहा केकरे इहां के लइकवा पकड़ाई रहे'।

पुलिस डायरी में १८ वर्षीय शहजाद ईनामी आतंकवादी था, जिसपर दिल्ली पुलिस ने पांच लाख ईनाम रखा था। मगर आश्चर्यजनक है कि घोषित ईनाम की जानकारी गिरफ्तारी के बाद हुई। दूसरी महत्वपूर्ण बात यह है कि शहजाद पिछले आठ महीनों से अपने घर खालिसपुर में रह रहा था। फिर पुलिस ने यह गिरफ्तारी दिग्विजय सिंह की यात्रा के ठीक पहले क्यों की. शहजाद अहमद नियाज अहमद का पोता है और सितंबर 2008में हुए बाटला हाउस इनकाउंटर से पहले दिल्ली के श्रृंखलाबद्ध धमाकों के आरोपियों में प्रमुख है.

पुलिस के मुताबिक यह आरोपी भी बाकियों की तरह इंडियन मुजाहिद्दीन से जुडा हुआ था। खुफिया एजेंसियों और पुलिस दावा है कि धमाकों की साजिश में शहजाद की प्रमुख भूमिका रही है और उसने बाटला हाउस इनकाउंटर में मारे गये दिल्ली पुलिस के इंस्पेक्टर मोहन चंद्र शर्मा को गोली मारी थी। बाटला हाउस मुठभेड़ के बाद शहजाद और आरिज फरार चल रहे थे जिनमें से आरिज का कुछ पता नहीं है। जबकि दो आरोपी आतिफ और साजिद मौके पर मारे गये थे और सैफ को दिल्ली में एक टीवी चैनल के दफ्तर के बाहर पुलिस ने गिरफ्तार किया गया था। बाटला हाउस इनकाउंटर के कुछ दिनों के भीतर ही सैफ की गिरफ्तारी हो गयी थी।
आजमगढ़ के मुसलमानों को झकझोर देने वाली इस घटना में गिरफ्तारियों की अगली कड़ी दो फरवरी को तब जुड़ी जब शहजाद की खालिसपुर गांव से गिरफ्तारी हुई। उत्तर प्रदेश के डीजी बृजलाल के अनुसार  'शहजाद आस्ट्रेलिया जाकर पॉयलट ट्रेनिंग कि लेने के बाद अमेरिका में हुए आतंकवादी हमले  9/11 जैसा धमाका भारत पर करना चाहता था।' लेकिन पुलिस की इस कहानी पर खलिशपुर के ग्रामीण लड्डन का सवाल है 'हाईस्कूल पास शहजाद को पायलट की ट्रेनिंग कैसे मिल सकती थी,जबकि इसके लिए न्यूनतम योग्यता तो १०+२ की होनी चाहिए जो उसके पास थी ही नहीं.'
इस बारे में भारतीय वायुसेना के पूर्व अधिकारी विंग कमांडर प्रफुल्ल बख्शी से  हुई बातचीत में पता चला कि 'पायलेट ट्रेनिंग कोर्स में प्रवेश के लिए १०+२ पास होना अनिवार्य है.' गिरफ़्तारी के अगले ही दिन उत्तर प्रदेश एसटीएफ  ने शहजाद को दिल्ली पुलिस की विशेष  जांच शाखा को सौंप दिया है और उसे तीसहजारी अदालत ने दुबारा रिमांड पर भेज दिया है।
खालिसपुर के लोग मानते हैं कि आठ महीने से गांव में रह रहा शहजाद अगर कोर्ट में पेश हो गया तो हमें राजनीतिक दलों के दोमुहेंपन का शिकार इस बार नहीं होना पड़ता। लेकिन ऐसा क्यों नहीं हुआ के जवाब में, प्रदेश के प्रसिद्दध सिबली कॉलेज के प्रिंसिपल इफ्तिखार आलम कहते हैं 'पुलिस ने हमेशा 18 बाटला हाउस में शहजाद उर्फ पप्पू को भगोड़ा बताया। शायद शहजाद को ये लगता रहा होगा कि मेरा नाम जब पप्पू है ही नहीं तो मैं क्यों हाजिर होउं।' शहजाद और उसके परिवारजनों के इसी आत्मविश्वास में एक बार फिर आजमगढ़ को चर्चित कर दिया है। इतना तो साफ है कि शहजाद के गांव में होने की जानकारी एटीएफ को पहले से थी, लेकिन कार्यवाही राजनीतिक जरूरत के हिसाब से हुई। सितंबर 2008 में हुए 18 बाटला हाउस मुठभेड़ के दौरान शहजाद का पासपोर्ट बरामद हुआ था जिसे पुलिस सबूत के तौर पर पेश करती रही है।

बहरहाल यह सब दिल्ली में हो रहा है लेकिन इस मसले पर सरगर्मियां आजमगढ़ में कहीं ज्यादा तेज हैं। कारण कि आजमगढ़ के  अब तक 29 मुस्लिम नौजवानों को खुफिया और पुलिस एजेंसियों ने आतंकवादी घोषित कर रखा है. जिसमें से नौ भगे हुए हैं, 18 गिरफ्तार व 2 मारे गये हैं। लेकिन जिस तरह से बाटला हाउस इनकाउंटर ने ढेर सारे लूप होल छोड़े थे, जिसकी वजह से आज भी वह मुठभेड़ सवालों का सामना कर रहा है, उसी तरह शहजाद की गिरफ्तारी के आसपास जो घटनाक्रम हुए उससे जाहिर हो गया कि शहजाद की गिरफ्तारी राजनीतिक वर्चस्व में शह-मात देने के लिए की गयी है।

उत्तर प्रदेश  कांग्रेस प्रभारी दिग्विजय सिंह के संजरपुर और आतंकवादी होने के आरोप में गिरफ्तारों के घर जाने के कार्यक्रम की घोषणा 30 जनवरी तक सार्वजनिक हो चुकी थी कि वह तीन तारीख को आजमगढ़ पहुंचेंगे। सवाल है कि क्या दिग्विजय सिंह के संजरपुर पहुंचने से पहले कांग्रेस के दवाब में शहजाद की गिरफ्तारी हुई या फिर वजह कहीं और है। संजरपुर मसले को उठाने में खासे सक्रिय रहे तारिक कहते हैं,' दिग्विजय सिंह के आने से एक दिन पहले शहजाद की गिरफ्तारी, फिर उनका संजरपुर जाना, लेकिन किसी पीड़ित के घर जाने या सभा को संबोधित करने की बजाय सिर्फ मीडिया से मुखातिब होना और आजमगढ़ में आयोजित प्रेस कांफ्रेंस में सरेआम एक पार्टी कार्यकर्ता को थप्पड़ मारना जैसी कई घटनाएं एक-दूसरे से ऐसे जुड़ती हैं जो जाहिर कर देती हैं कि कांग्रेस हमें न्याय दिलाने नहीं, बल्कि मुसलमानों को भरमाने के बहाने तलाशने आयी थी। इस मसले पर सिमी  के पूर्व अध्यक्ष शाहिद बदर फलाही राय रखते हैं कि 'मुसलमानों को कांग्रेस मुर्गियों से अधिक की औकात में नहीं रखती। अब उसे फिर अहसास होने लगा है कि उत्तर प्रदेश  की सत्ता पर अगर काबिज होना है तो दड़बे से बाहर हो चुकीं मुर्गियों को घेरकर फिर कांग्रेसी दड़बे में घुसाओ'। कांग्रेस की मुसलमानों को लेकर ऐतिहासिक रणनीति देखें तो शाहिद बदर की बात जंचती है।
दूसरी तरफ प्रदेश सरकार के अंतर्गत काम करने वाली एटीएफ द्वारा शहजाद की गिरफ्तारी से इतना तो हुआ कि लोकसभा चुनावों में प्रदेश के मुसलमानों का कांग्रेस की ओर बढ़ा रूझान को एक झटका जरूर लगा है। ऐसा होने से मुसलमान वोटों में कम ही हकदार बसपा सुप्रीमो मायावती को जरूर राहत मिली है और उन्होंने कांग्रेसी 'खेल' बिगाड़ दिया है। कांग्रेस नेतृत्व पूर्नजन्म का यह खेल प्रदेश कांग्रेस प्रभारी दिग्विजय के कंधे पर रख खेल रही है और पार्टी महासचिव राहुल गांधी के एजेंडे को दिग्गी राजा आगे बढ़ा रहे हैं,यह मुसलमान बाटला हाउस मुठभेड़ के बाद अच्छी तरह समझ चुके हैं, लेकिन दिग्गी राजा का संभवत:अपनी समझदारी पर अधिक भरोसा हो गया था इसलिए उन्होंने संजरपुर गांव से यह बयान दे दिया कि 'बाटला हाउस मुठभेड़ में मारे गये इंस्पेक्टर मोहन चंद्र शर्मा के सिर पर लगी गोली किसी इनकाउंटर में संभव नहीं है।' दिग्गी के इस बयान के मद्देनजर सरकार कोई कार्यवाही करती और आतंकवादी होने के आरोप में फंसे युवकों और परिजनों को कोई भरोसा बनता इससे पहले ही दिग्गी राजा कांग्रेस आलाकमान सोनिया गांधी से मिलने के बाद ही संजरपुर में दिये बयान से मुकर गये।

शहजाद के बाबा नियाज अहमद से पूछने पर कि 'क्या किसी पार्टी के नेता आपके पोते की गिरफ्तारी के बाद दरवाजे पर आये थे', उनका जवाब था- 'नहीं।' वह पुराने दिनों को याद कर बताते हैं कि 'एक दौर था जब हमारे दरवाजे पर इंदिरा गांधी, मोहसिना किदवई, प्रदेश  के पूर्व मुख्यमंत्री रामनरेश  यादव, चौधरी चरण सिंह जैसे तमाम लोग आया करते थे। लेकिन फिलहाल तो सिवाय नातेदारों-रिश्तेदारों के झूठे मुंह भी कोई नहीं आया।' जबकि आतंकवादी होने के शक में मारे और पकड़े गये नौजवानों के गांव संजरपुर में 2008 सितंबर के बाद आनेवालों को तांता लगा रहा। एक के बाद वहां पहुंचे तोपची नेताओं की आगलगाऊ बयानबाजियों और समस्या को छू से दूर कर देने वाले आश्श्वसनो की बाढ़ आ गयी थी। जिसमें सबसे आगे थे 'बाटला हाउस' कांड के बाद पैदा हुए संगठन उलेमा काउंसिल के नेता आमिर रशादी।
आमिर रशादी के बारे में यह ख्यात है कि वह देश के इकलौते मौलवी हैं जो मंचों से विरोधियों को सरेआम गाली देते हैं। बाटला हाउस कांड के बाद अपने को निरीह मान चुकी  आजमगढ़ी जनता को आमिर रशादी  का यह अंदाज उत्साहित किया और मात्र छ: महीने में यह संगठन इतना व्यापक असर वाला हो गया कि लोकसभा की पांच सीटों पर उलेमा काउंसिल के प्रतिनिधि खड़े हुए। प्रतिनिधियों में से एक भी संसद तक नहीं पहुंच सका लेकिन उसने बसपा और सपा के गढ़ रहे इस क्षेत्र में ऐसी सेंध लगायी की लालगंज से उलेमा काउंसिल की वजह से लालगंज से भाजपा जीत गयी। यह संसदीय चुनाव के इतिहास में पहली बार हुआ।

रामराज्य का नारा लगाने वाले हिंदुवादी संगठनों की तरह 'नारे तकबीर-अल्लाह हो अकबर'लगाने वाली उलेमा काउंसिल ने चुनाव के वक्त भाजपा के बारे में वही सांप्रदायिक बयान दिये जो शिववसेना या बजरंगदलियों की भाषा  होती है। जाहिर है फायदा फायदा भाजपा को मिला। मानवाधिकार कार्यकर्मा मसुद्दीन कहते हैं कि 'जब उलेमा काउंसिल बनी तो हमलोगों को पता चला
कि इसको पुलिस प्रशासन का संरक्षण प्राप्त है। लेकिन राजनीतिक निराशा की शिकार जनता किसी भी तरह के सेकुलर बातों पर गौर करने के लिए तैयार नहीं थी। हां आज साफ हो गया है कि किस तरह आमिर रशादी के कट्टरपंथी बयानों ने हमें व्यापक समाज से काट दिया और सांप्रदायिकता और आतंकवाद के खिलाफ व्यापक लड़ाई में समुदाय कमजोर पड़ा।' प्रसिध्द हड्डी रोग विषेशज्ञ और उलेमा काउंसिल के आजमगढ़ से संसद उम्मीदवार रह चुके डाक्टर जावेद कहते हैं कि 'पहले लोग मुझसे कहते थे लेकिन अब मैंने मान लिया है कि उलेमा काउंसिल और उसके नेताओं का तौर-तरीका एक लोकतांत्रिक देश  में काम करने जैसा नहीं है। कहने के लिए मुझे काउंसिल से निकाल दिया गया है, लेकिन सच है कि  छह महीने पहले ही मैं निष्क्रिय  हो गया था।' उल्लेखनीय है कि डाक्टर जावेद का बेटा भी बम विस्फोट में आरोपी है और भगोड़ा घोषित है।

शहजाद की गिरफ्तारी के बाद कार्यवाही चाहे जो हो स्थानीय लोग इसे एक राजनीतिक खेल मानते हैं। साथ ही उलेमा काउंसिल की चुप्पी और बिखराव ने साफ कर दिया है कि बाटला हाउस के बाद एकाएक पैदा हुए इस मंच ने  मुसलमानों की व्यापक लड़ाई को कमजोर ही किया है.

'द पब्लिक एजेंडा'  से साभार

Feb 7, 2010

मानवाधिकार कार्यकर्ता समेत पुलिस ने तीन लोगों को उठाया

 इलाहाबाद की पत्रकार, मानवाधिकार कार्यकर्ता व पीपुल्स यूनियन फॉर  सिविल लिबर्टिज (पीयूसीएल) की राज्य कार्यकारिणी सदस्य व संगठन मंत्री सीमा आजाद, उनके पति पूर्व छात्रनेता विश्वविजय व साथी आशा को शनिवार को पुलिस ने इलाहाबाद जंकशन रेलवे स्टेशन से बिना कोई कारण बताए उठा लिया है। ये दोनों मानवाधिकार कार्यकर्ता नई दिल्ली से विश्व पुस्तक मेले में भाग लेकर रीवांचल एक्सप्रेस से इलाहाबाद लौट रहे थे। पुलिस का कहना है की ये लोग नक्सली हैं.

 पिछले दिनों इलाहाबाद व कौशाम्बी के कछारी इलाकों में बालू खनन मजदूरों पर पुलिस-बाहुबलियों के दमन के खिलाफ पीयूसीएल ने लगातार आवाज उठाई। इलाहाबाद के डीआईजी ने बाहुबलियों व राजनेताओं के दबाव में मजदूर आंदोलन के नेताओं पर कई फर्जी मुकदमें लादे हैं। डीआईजी ने यहां मजदूरों के ‘लाल सलाम’ सम्बोधन को राष्ट्रविरोधी मानते हुए,  ‘लाल सलाम’ को प्रतिबंधित करार दिया था। पीयूसीएल ने लाल सलाम को कम्युनिस्ट पार्टियों का स्वाभाविक सम्बोधन बताते हुए इसे प्रतिबंधित करने की मांग की निंदा की थी। पीयूसीएल का मानना है कि 'लाल सलाम' पूरी दुनिया में मजदूरों का एक आम नारा है और ऐसे सम्बोधन पर किसी तरह का प्रतिबंध अनुचित है। इलाहाबाद-कौशाम्बी के कछारी क्षेत्र में अवैध वसूली व बालू खनन के खिलाफ संघर्षरत मजदूरों के दमन पर सवाल उठाते हुए, पिछले दिनों पीयूसीएल की संगठन मंत्री सीमा आजाद व केके राय ने कौशाम्बी के नंदा का  पुरा गांव में वहां मानवाधिकार हनन पर एक रिपोर्ट जारी की थी. 
नंदा के पूरा गांव में पिछले एक माह में दो बार पुलिस व पीएसी के जवानों ने ग्रामीणों पर बर्बर लाठीचार्ज किया। इसमें सैकड़ों मजदूर घायल हुए। पुलिस ने नंदा का पूरा गांव में भाकपा माले न्यू डेमोक्रेसी के स्थानीय कार्यालय को आग लगा दी. उनके नेताओं को फर्जी मुकदमों में गिरफ्तार कर कई दिनों तक जेल में रखा। इस सब के खिलाफ आवाज उठाना इलाहाबाद के डीआईजी व पुलिस को नागवार गुजर रहा था। पुलिस कत्तई नहीं चाहती की उसके क्रियाकलापों पर कोई संगठन आवाज उठाए। सीमा आजाद, उनके पति विश्वविजय व एक अन्य साथी आशा की गिरफ्तारी पुलिस ने बदले की कार्रवाई के रूप में किया है।

सीमा आजाद 'दस्तक' नाम की मासिक पत्रिका की संपादक भी हैं। उन्होंने पूर्वी उत्तर प्रदेश में मानवाधिकारों की स्थिति, मजदूर आंदोलन, सेज, मुसहर जाति की स्थिति व इन्सेफेलाइटिस बीमारी जैसे कई मसलों पर गंभीर रिपोर्टें बनाई है. सीमा आजाद के पति विश्वविजय व उनकी साथी आशा भी पिछले लम्बे समय तक इलाहाबाद केन्द्रीय विश्वविद्यालय में छात्रनेता के रूप में सक्रिय रहे हैं। इन्होंने 'इंकलाबी छात्र मोर्चा' के बैनर  तले छात्र-छात्राओं की आम समस्याओं को प्रमुखता से उठाया है। पुलिस जिन्हें नक्सली बता रही है, वो पिछले काफी समय से छात्र और मजदूरों के बीच काम कर रहे है।

 उत्तर प्रदेश पुलिस पहले भी पीयूसीएल के नेताओं को मानवाधिकारों की आवाज उठाने पर धमकी दे चुकी है। 9 नवम्बर को चंदौली में कमलेश चौधरी की पुलिस मुठभेड़ में हत्या के बाद पीयूसीएल ने इस पर सवाल उठाए थे। जिसके बाद 11 नवम्बर, 09 को खुद डीजीपी बृजलाल ने एक प्रेस कांफ्रेंस  में कहा था कि "पीयूसीएल के नेताओं पर भी कार्रवाई की जाएगी" (देखें 12 नवम्बर, 09 का दैनिक हिंदुस्तान ). इलाहाबाद से सीमा आजाद की गिरफ्तारी पुलिस की उसी बदले की कार्रवाई की एक कड़ी है।

पीयूसीएल मांग कर रही है कि मामले पर त्वरित कार्रवाई करते हुए पुलिसिया उत्पीड़न पर रोक लगायी जाये और सीमा आजाद तथा  उनके साथिओं को तुरंत मुक्त किया जाए.

Jan 29, 2010

अब अगले साल छाएगा कोहरा

 जनज्वार में तस्वीरों को इतने बड़े फ्रेम में छापने का कोई अनुभव नहीं रहा है...........मगर तस्वीरें बोलती हैं, कुछ कहती हैं और अपनी यादों में हमें दूर तक खींच ले जाती हैं, इसे हम दिल से मानते हैं.

इस उम्मीद के साथ फोटोग्राफर आरबी यादव की हाल ही में दिल्ली के कोहरे के बीच खिंची गयी कुछ तस्वीरें हम आप सब के साथ साझा कर रहे हैं. अच्छा लगे तो अपनी टिप्पणियों के जरिये बताइये.........
 
 

Jan 25, 2010

प्रेस क्लब में नक्सली समर्थक बुद्धिजीवियों की नो एंट्री

अजय प्रकाश 

राजनीतिक व्यवस्था में सर्वाधिक लोकतांत्रिक  मूल्यों की पैरोकार मीडिया में यह पहली घटना है जब रायपुर प्रेस क्लब ने नक्सली समर्थक बुद्धिजीवियों को क्लब में कार्यक्रम न करने देने का सर्वसम्मति से फैसला किया है। क्लब ने यह प्रतिबंध समान रूप से वैसे वकीलों पर भी लागू किया है जो क्लब समिति की निगाह में नक्सली समर्थक हैं।
नक्सलियों के खिलाफ सलवा जुडूम अभियान शुरू करने वाली छत्तीसगढ़ सरकार के पास ऐसे कई रिकार्ड हैं जो अलोकतांत्रिक कानूनों को लागू करने में उसे पहला स्थान देते हैं। लेकिन यह पहली बार है जब राज्य में प्रेस प्रतिनिधियों की एक संस्था जो कि गैर सरकारी है, वह सरकारी भाषा का वैसा ही इस्तेमाल कर रही है जैसा की सरकार पिछले कई वर्षों  में लगातार करती रही है।
दंतेवाड़ा में वनवासी चेतना आश्रम में पांच जनवरी को हैदराबाद और मुंबई से आये चार लोगों और स्थानीय पत्रकारों के बीच हुई मारपीट के बाद प्रेस क्लब का यह फरमान आया। बाहर से आये चार लोगों में फिल्म निर्माता निशता जैन, लेखक-पत्रकार सत्येन बर्दलोइ, कानून के छात्र सुरेश कुमार और पत्रकार प्रियंका बोरपुजारी शामिल हैं,  के खिलाफ स्थानीय पत्रकारों ने मारपीट और कैमरा छीन लिये जाने का मुकदमा स्थानीय थाने में  दर्ज कराया है।

इस मामले में प्रियंका बोरपुजारी से बात हुई तो उन्होंने कहा कि ‘चूंकि हिमांशु कुमार आश्रम में नहीं थे और स्थितियां बहुत संदेहास्पद थीं, वैसे में आश्रम में आयीं चार आदिवासी महिलाओं को हम लोग अकेले छोड़कर नहीं जाना चाहते थे। लेकिन पुलिस-एसपीओ के तीस जवान जो कई घंटों से आश्रम को घेरे हुए थे, उन्हें ले जाना चाहते थे। इसको लेकर हम लोगों और उनमें कई बार तु-तु, मैं-मैं भी हुई। शाम ढलने से पहले कुछ लोग हम लोगों का फोटो खींचने लगे, वीडियो बनाने लगे। हमने विरोध किया, उनसे उनकी पहचान पूछी। फिर क्या था, वह हम लोगों से भीड़ गये और लाख जूझने के बावजूद आखिरकार मेरे हाथ से वीडियो कैमरा छीन लिया और सत्येन बर्दलोइ और सुरेश कुमार को पीटा। लेकिन हम लोग जब इस मामले में थाने गये तो पुलिस ने मुकदमा दर्ज करने से इनकार कर दिया। जाहिर तौर पर मीडियाकर्मियों ने जो हमारे साथ सुलूक किया और स्थानीय मीडिया को लेकर हमारे जो अनुभव रहे उस आधार पर हमने उन्हें बिकाऊ कहा।’
इसके बाद प्रेस क्लब के अध्यक्ष अनिल पुसदकर ने 17 जनवरी को क्लब प्रतिनिधियों की आपात बैठक में कहा कि ‘दंतेवाड़ा में स्थानीय मीडिया को बिकाऊ कहने वाले कथित बुद्धिजीवियों के खिलाफ प्रशासनिक कार्यवाही हो, नहीं तो हमारे विरोध का तरीका बदल जायेगा। साथ ही ऐसे लोगों और एनजीओ को प्रेस क्लब में किसी भी तरह के कार्यक्रम करने की अनुमति न दी जाये। इसी तरह नक्सलवाद को जाने-समझे बिना मीडिया पर आपत्तिजनक टिप्पणी करने वाले अधिवक्ता के खिलाफ कानूनी कार्यवाही की जायेगी।’ बाद में इस प्रस्ताव का प्रेस क्लब के सदस्यों ने समर्थन दिया। छत्तीसगढ़ वर्किंग जर्नलिस्ट यूनियन के प्रदेश अध्यक्ष नारायण शर्मा, धनवेंद्र जायसवाल, कौशल स्वर्णबेर ने भी इस मामले में ऐसे बुद्धिजीवियों के बयान की निंदा की और छत्तीसगढ़ आगमन पर कड़े विरोध की चेतावनी दी।
चेतावनी से आगे प्रेस क्लब अध्यक्ष ने इस बाबत और क्या कहा, जानने के लिए रायपुर से प्रकाशित हिंदी दैनिक ''हरिभूमि'' की कटिंग को यहां लगाया जा रहा है जिसे आप देख सकते हैं।

इस बारे में जन वेबसाइट सीजीनेट के माडरेटर और पत्रकार शुभ्रांशु  चौधरी  से बातचीत हुई तो उनका कहना था, ‘प्रेस क्लब के पास ऐसा कौन सा पैमाना है जिससे किसी के नक्सल समर्थक होने को तौला जाना है। आदिवासियों पर होने वाले अत्याचारों के खिलाफ बोलने वाला हर आदमी सरकार की निगाह में माओवादी है और चुप रहने वाला देशभक्त।’ कुछ इसी तरह की बात सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठ वकील प्रशांत भूषण भी कहते हैं, जिनके खिलाफ प्रेस क्लब ने टिप्पणी की है  कि 'ऐसे वकीलों पर भी कानूनी कार्यवाही की जायेगी।'
पिछले दिनों रायपुर यात्रा के दौरान प्रशांत भूषण ने एक अनौपचारिक बातचीत में कहा था कि ‘प्रदेश के डीजीपी विश्वरंजन राज्य में बढ़ती हिंसा और मानवाधिकारों के हनन के लिए व्यक्तिगत तौर पर जिम्मेदार हैं। अगर हालात यूं ही बदतर रहे तो कभी वह आदिवासियों के रिश्तेदारों या माओवादियों द्वारा मार दिये जायेंगे, नहीं तो जेल जायेंगे।’ रायपुर प्रेस क्लब  के यह कहने पर कि वह  प्रशांत भूषण जैसे वकीलों के खिलाफ कानूनी कार्यवाही करेगा और मंच मुहैया नहीं करायेगा, के जवाब में प्रशांत भूषण ने कहा ‘यह गैर संवैधानिक और मूल अधिकारों का हनन है। प्रेस क्लब से पूछा जाना चाहिए कि क्या सरकार माओवादी समर्थकों को गिनने में सक्षम नहीं है, जो प्रेस क्लब यह काम अपने हाथों में ले रहा है।’ इस बारे में प्रेस क्लब के अध्यक्ष अनिल पुसदकर कहते हैं- ‘प्रेस ने गलतबयानी की है।’ जबकि ''हरिभूमि'' में छपी खबर की तफ्शीश करने पर समाचार पत्र के रायपुर संपादक से पता चला कि ‘यह खबर सभी दैनिकों में छपी है, वह अब मुकर जायें तो बात दीगर है।’
सवाल यह है कि अगर मीडिया को कोई दलाल कहता है तो क्या उसे प्रेस क्लब में आने से रोक देना उचित है? अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की मांग करने वाले मीडिया के जनतांत्रिक संस्थाओं के रहनुमा ही ऐसी ऊटपटांग बातें करेंगे तो सरकार के बाकी धड़ों से हम किस नैतिकता के बल पर पारदर्शी होने की मांग करेंगे? हाल-फिलहाल की बात करें तो बिकते मीडिया को लेकर सर्वाधिक चिंता मीडियाकर्मियों की ही रही है। हमारे बीच नहीं रहे पत्रकार प्रभाष जोशी इसके सबसे सटीक उदाहरण हैं, जिन्होंने जीवन के अंतिम समय तक मीडिया की दलाली पर तीखी टिप्पणी की। उन्हीं के द्वारा उठायी गयी आवाज का असर है कि एडिटर्स गिल्ड में इस मसले पर गंभीरता से विचार करने का सिलसिला शुरू हुआ है।
प्रेस क्लब के इस निर्णय पर अध्यक्ष अनिल पुसदकर से बातचीत-

एनजीओ, बुद्धिजीवियों और वकीलों के वह कौन से लक्षण हैं जिसके आधार पर आप प्रेस क्लब उनको मंच के तौर पर इस्तेमाल नहीं करने देंगे?

हमने ऐसा नहीं कहा। बाहर से आकर जो लोग सच्चाई जाने बगैर छत्तीसगढ़ की मीडिया को बिकाऊ और दलाल कह रहे हैं उन्हें प्रेस क्लब का मंच के तौर पर इस्तेमाल नहीं करने दिया जायेगा। कुछ ही दिन पहले संदीप पाण्डेय और मेधा पाटकर क्लब में कार्यक्रम करके गये हैं लेकिन हमने उन्हें नहीं रोका। जबकि प्रेस क्लब के बाहर लोग उनके खिलाफ धरना दे रहे थे।

लेकिन आपने ये कैसे तय किया कि मेधा पाटकर और संदीप पाण्डेय नक्सली बुद्धिजीवी हैं?

आप हमारी बात नहीं समझ रहे। मेरा कहना है कि अगर ऐसे बुद्धिजीवियों को आने से रोकने का हमारा निर्णय होता तो उन्हें हम क्यों आने देते। प्रेस क्लब सबका सम्मान करता है।

किस वकील पर कानूनी कार्यवाही की बात आपने की है?

सुप्रीम कोर्ट के वकील प्रशांत भूषण को ही लीजिए। वे पेशे से वकील हैं लेकिन जिस तरह वह यहां के बारे में बोलकर गये, क्या ठीक था।

प्रशांत भूषण ने प्रेस क्लब के बारे में कुछ कहा क्या?
छत्तीसगढ के डीजीपी विश्वरंजन के बारे में की गयी प्रशांत भूषण की टिप्पणी अपमानजनक थी। हम राज्य के लोग हैं और राज्य या यहां के किसी अधिकारी के बारे में अपमानजनक टिप्पणी कैसे सहन कर सकते हैं।

रायपुर के दैनिकों में जो आपके हवाले से इस बारे में छपा है वो क्या है?
हमने वैसा नहीं कहा, जैसा उन्होंने छापा।

प्रेस ने आपको लेकर जो गलतबयानी की है इस बारे में क्लब ने कोई शिकायत दर्ज की है?
कैसे दर्ज करायें, अभी बीमार हैं।

स्थानीय मीडिया को कोई दलाल या बिकाऊ बोलेगा तो उसे क्लब को मंच नहीं बनाने देंगे, ऐसा क्यों?
जैसे दंतेवाड़ा की घटना है तो वहां के स्थानीय मीडिया को कोई कुछ कहे तो बात समझ में आती है, लेकिन कोई पूरे छत्तीसगढ़ की मीडिया को दलाल बोले तो कोई पत्रकार कैसे सहन कर सकता है? दूसरा कि जो लोग बाहर से आये थे उन्होंने स्थानीय मीडियाकर्मियों से मारपीट की और कैमरा छीन लिया।

लेकिन पता तो यह चला है कि जब मेधा पाटकर और संदीप पाण्डेय आये थे तब उन लोगों का कैमरा पुलिस ने वापस किया?
इस बारे में मुझे कोई जानकारी नहीं है।

आपको अपने बयान पर खेद है?
हमने जब कहा ही नहीं तो खेद किस बात का। यह तो मीडिया की गलतबयानी है, जिसका मैं जवाब दे रहा हूं।


मामले की और बारीकी जानने के लिए यहां क्लिक करें.........

Jan 19, 2010

शरद दत्त और मदन कश्यप को शमशेर सम्मान

लौट आ, ओ धार

लौट आ, ओ धार!
टूट मत ओ साँझ के पत्थर
हृदय पर।
(मैं समय की एक लंबी आह!
मौन लंबी आह!)
लौट आ, ओ फूल की पंखडी!
फिर
फूल में लग जा।
चूमता है धूल का फूल
कोई, हाय!!
- शमशेर बहादुर सिंह

इस वर्ष हिंदी साहित्य का प्रतिष्ठित ‘शमशेर सम्मान’ सृजनात्मक गद्य के लिए शरद दत्त को और कविता के लिए मदन कश्यप को दिया जायेगा। कवियों के कवि कहे जाने वाले शमशेर बहादुर सिंह की जयंती 13 जनवरी की पूर्व संध्या पर ‘अनवरत’ के संयोजक प्रतापराव कदम ने इस सम्मान की घोषणा की थी। खंडवा की संस्था ‘अनवरत’ द्वारा हर वर्ष ‘शमशेर सम्मान’ हिंदी साहित्यकारों को दिया जाता है।

शमशेर बहादुर सिंह की पुण्यतिथि के अवसर पर नई दिल्ली में यह सम्मान 12 मई 2010 को वरिष्ठ एवं महत्वपूर्ण रचनाकार के हाथों प्रदान किया जायेगा। इस अवसर पर सम्मानित रचनाकार के अवदान पर भी चर्चा होगी। सम्मानित रचनाकार को प्रशस्ति पत्र,सम्मान निधि,स्मृति चिन्ह,पोट्रेट दिया जायेगा है। इससे पहले यह सम्मान मंगलेश डबराल,विरेन डंगवाल, राजेशजोशी, विष्णु नागर , पंकज सिंह , उदय प्रकाश, विजय कुमार, लीलाधर मंडलोई आदि हिंदी के महत्वपूर्ण कवियों को मिल चुका है.

दिल्ली दूरदर्शन केंद्र के निदेशक और प्रोड्यूसर रहे शरद दत्त को वरिष्ठ साहित्यकारों व फिल्मी हस्तियों पर सारगर्भित और चर्चित वृत्त चित्र बनाने का श्रेय जाता है.उन्होंने पहली बार दूरदर्शन पर दिलीप कुमार और अमिताभ बच्चन के साक्षात्कार प्रस्तुत किये. कुन्दनलाल सहगल, रामविलास शर्मा , नागार्जुन, टी शिवशंकर पिल्लै, फैज अहमद फैज, शिवराम कारंत, न्यू थियेटर्स आदि पर बनाये गए उनके वृत्त चित्र खूब सराहे गए. सआदत हसन मन्टो की सम्पूर्ण रचनाओं का सम्पादन भी किया है. हिन्दी अकादमी पुरस्कार,मीडिया अवार्ड नेशनल मीडिया अवार्ड,दो बार सिनेमा पर अपनी पुस्तकों के लिए राष्ट्रीय पुरस्कार नावाने गए शरद दत्त ने भारतीय सेना पर भी ५० से अधिक वृत्त चित्रों का निर्माण किया है ।

जन-आंदोलनों,राजनीति,पत्रकारिता व संस्कृति कर्म में सक्रिय कवि मदन कश्यप कई प्रतिष्ठित समाचार पत्र व पत्रिकाओं के संपादन से जुड़े रहे हैं। उनके चार कविता संग्रह प्रकाशित हो चुके हैं- लेकिन उदास है पृथ्वी, नीम रोशनी में, कुरुज और कवि ने कहा। उनके वैचारिक लेखों के दो संग्रह भी प्रकाशित हैं-मतभेद और लहूलुहान लोकतंत्र।उन्हें कविता के लिए बनारसी प्रसाद भोजपुरी सम्मान और किरण मंडल सम्मान मिल चुका है।

इस सम्मान का चयन वरिष्ठ रचनाकारों की एक समिति करती है। इस बार के की शमशेर सम्मान निर्णायक समिति के सदस्य विष्णु नागर, लीलाधर मंडलोई और कर्मेंदु शिशिर थे।

Jan 17, 2010

ज्योति बसु नहीं रहे

ज्योति बसु को श्रद्धांजलि

वरिष्ठ वयोवृद्ध मार्क्सवादी नेता ज्याति बसु की आज मौत हो गयी। ज्योति बसु भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्सवादी) के अग्रणी नेताओं में से एक थे, जिन्होंने पश्चिम  बंगाल में 23 वर्ष  तक लगातार मुख्यमंत्री रहकर संसदीय राजनीति में विशेष ख्याति पायी। पिछले एक हफ्ते से गंभीर रूप से बीमार चल रहे बसु की आज हुई मौत के बाद माकपा कार्यालयों में पार्टी का झंडा उनके सम्मान में झुका दिया गया है। बसु 96 वर्ष  के थे और कलकत्ता में रह रहे थे।

बसु के विरोधी हों या समर्थक उन्हें भारत के पूर्व प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू के बाद सबसे बड़ा नेता मानते हैं। भारत में कम्युनिस्ट राजनीति को स्थापित करने वालों में से बसु एक रहे हैं। भारतीय राजनीतिक समाज नक्सलबाड़ी विद्रोह में उनकी भूमिका को और संसदीय राजनीति में माक्र्सवाद के अंगद के रूप में हमेशा  याद रखेगा। क्योंकि उनके कामों और व्यक्तित्व की तारीफ करें या आलोचना इन दोनों भूमिकाओं का जिक्र किये बगैर बात पूरी नहीं हो पायेगी।

जनज्वार अपने पाठकों, शुभचिंतकों  और चाहने वालों की ओर से

ज्याति बसु को श्रद्धांजलि अर्पित करता है.........

‘जब कभी भी लौटकर उन राहों से गुजरेंगे हम
जीत के ये गीत कई-कई बार फिर हम गायेंगे
भूल कैसे पायेंगे मिट्टी तुम्हारी साथियों
जर्रे-जर्रे में तुम्हारी ही समाधि पायेंगे।’

http://www.livehindustan.com/news/desh/national/39-39-91496.html