May 21, 2011

सरकार का पत्थर देख, सरल चल बसे

                     
राम बरन के पास महज 11 कट्ठा जमीन थी। जिसमें से नौ कट्ठा जमीन रेल पटरी के लिए ले ली गई। सब्जी की खेती कर गुजारा करने वाले राम बरन के सामने बाकी बची दो कट्ठा जमीन पर गुजारा करना संभव नहीं रह गया था...
                                                   
वरुण शैलेश

भूमि अधिग्रहण का संकट केवल भट्ठा-पारसौल तक सीमित नहीं है, जहाँ उग्र आन्दोलन के बाद जमीन अधिग्रहण राष्ट्रीय स्तर की सुर्खियाँ बन पाया है । आज देश में ऐसे कई अधिग्रहण क्षेत्र हैं जहाँ बिल्ली की चाल की तरह  किसानों की भूमि कब्जे में की  जा रही है, लेकिन वह खबर नहीं बन पा रहे हैं।  भूमि अधिग्रहण से जुड़ी त्रासदी की एक कहानी उत्तर प्रदेश और बिहार को जोड़ने वाले  हथुआ-भटनी प्रस्तावित रेलमार्ग के सहारे लिखी जा रही है। हथुआ से भटनी तक रेल पटरी बिछाने को लेकर 112.49 एकड़ जमीन के अधिग्रहण का नोटिस किसानों को मिल चुका है, लेकिन किसान अपनी जमीन देने को तैयार नहीं हैं।

किसानों की चिंता : कहाँ  बोयेंगे, क्या खायेंगे
भूमि अधिग्रहण के खिलाफ पूर्वांचल के किसान लामबंद होकर भटनी में  पिछले तीन महीने से क्रमिक अनशन पर बैठे हैं। हथुआ-भटनी प्रस्तावित रेलमार्ग के लिए अधिग्रहित की जाने वाली जमीन की चपेट में 14  गांव आ रहे हैं। जमीन अधिग्रहण की घोषणा होने के बाद इलाके में घटित कुछेक घटनाएं किसानों के सामने पैदा हुए संकट का आभास कराती हैं। घटना इस साल 22 फरवरी की है, जब भूमि अधिग्रहण के विरोध में क्रमिक अनशन पर बैठे देवरिया जिले में बनकटा गांव के राम बरन चौहान की हार्टअटैक से मौत हो गई। पचपन  वर्षीय राम बरन के पास महज 11 कट्ठा जमीन थी, जिसमें से नौ कट्ठा जमीन रेल पटरी के लिए ले ली गई।

सब्जी की खेती कर गुजारा करने वाले राम बरन के सामने बाकी बची 2 कट्ठा जमीन पर गुजारा करना संभव नहीं रह गया था। जमीन जाने की पीड़ा और भविष्य की आशंका ने इस कदर घेरा कि उनकी जिंदगी पर  बन आयी। वैसे राम बरन की मौत इलाके में उजागर हुई पहली घटना नहीं है। प्रस्तावित रेलमार्ग के लिए वर्ष 2006  में जमीन की पैमाइश के दौरान अपनी जमीन पर पत्थर गाड़ते देख रायबरी चौरिया गांव के सरल खेत में ही गिर पड़े। सरल भी जमीन छिनने के सदमे का शिकार हुए और दिल का दौरा मौत का कारण बना।

दिल के दौरे से दो किसानों की मौत यह बताने के लिए काफी है कि किसी किसान के लिए जमीन का मामला महज आर्थिक नहीं है। किसान का जमीन से भावनात्मक नाता भी होता है। एक किसान अपने खेतों के कई नाम रखकर पुकारता है। कहें तो जमीन के साथ रिश्तों की तमाम कड़ियां जोड़ता है। ऐसे में जमीन छिनने का मतलब चट्टान के दरकने की तरह होता है,जिससे किसान का पूरा जीवन अनिश्चितता की खाई में चला जाता है। जमीन से मानवीय संवेदनाएं इस कदर जुड़ी हुई हैं कि जमीन बेचने वालों को समाज सम्मान की निगाह से नहीं देखता है। जमीन का होना हैसियत तय करता है। यहां तक कि शादी-ब्याह  का निर्णायक पहलू बनता है, लेकिन विकास की आयातित व्याख्या में किसानों व आदिवासियों की इस मार्मिकता की कोई जगह नहीं है।

जमीन अधिग्रहण के समय छोटे किसान व भूमिहीन किसानों का संकट सबसे ज्यादा बढ़ जाता है, जिन्हें मिला मुआवजा किसी धोखे से कम नहीं होता है। वैसे भी  भारतीय कृषि  परंपरा में किसान के लिए जमीन महज जीविका ही नहींबल्कि सोचने-समझने की ताकत होती है। यानी एक किसान खेती के काम के लिए ही कुशल होता है, लेकिन जब उसकी जमीन छिनती है तो उसकी परंपरागत  कुशलता भी खारिज होती है। जिसके चलते राम बरन और सरल  जैसे तमाम किसान अकुशलता वाला पेशा करने शहर जाने या दूसरा रोजगार अपनाने के लिए मजबूर होते हैं।

विकास के मौजूदा मॉडल जनभावनाओं का ख्याल रख पाने में नाकाम हैं। यही वजह है कि सरकारों के विकास के दावे महज आर्थिक विकास दर तक केंद्रित होकर रह गये हैं। जनजीवन की गुणवत्ता में सुधार के दावे विज्ञापननुमा हैंजिसकी सच्चाई भूख से होने वाली मौतें बयान करती हैं। कुल मिलाकर लागू आर्थिक नीतियों में भारतीय जनता की भलाई न के बराबर है। लिहाजा न केवल भूमि अधिग्रहण कानून में संसोधन की मांग होनी चाहिएबल्कि इसके साथ-साथ शोषणकारी व्यवस्था को पोषित करने वाली आर्थिक नीतियों की समीक्षा की भी मांग होनी चाहिए। ताकि जनता व उसकी भावनाओं को बेदम होने से रोका जा सके।


बनारस हिंदू विश्वविद्यालय और भारतीय जनसंचार संस्थान से शिक्षा-दीक्षा. अब जनपक्षधर पत्रकारिता में रमने की तैयारी.

May 20, 2011

किसान आंदोलन के राष्ट्रीय नेता थे टिकैत

बोट क्लब के ऐतिहासिक धरने में प्रसिद्ध समाजवादी नेता किशन पटनायक और हरियाणा के घासीराम मैन समेत सैकड़ों किसान नेता शामिल हुए थे। इस धरने में टिकैत ने कहा था, 'इंडिया वालों संभल जाओ, अब दिल्ली में भारत आ गया है' ...

अजय प्रकाश 

महेंद्र सिंह टिकैत : बहुत याद आयेगी  
किसान नेता महेंद्र सिंह टिकैत की 15मई की सुबह हुई मौत देश के उन सभी लोगों और संगठनों के लिए गहरा सद्मा है जो किसानों की समस्या और आंदोलनों से जुड़े हैं। नीजिकरण-उदारीकरण के मौजूदा दौर में किसानों के बीच टिकैत की उपस्थिति एक ढाल थी,जिसके कारण केंद्र हो या राज्य सरकारें किसान हितों को रौंदने वाले कदम उठाने से पहले सौ बार सोचती थीं।

पिछली यूपीए सरकार द्वारा किसान कर्ज माफी योजना हो या कम ब्याज पर कृशि ऋण या फिर बीज विधेयक का लंबित होना,इन सबमें महेंद्र सिंह टिकैत की अध्यक्षता वाली भारतीय किसान यूनियन की केंद्रीय भूमिका रही है। टिकैत के बड़े बेटे राकेश टिकैत ने बताया कि ‘पिताजी लंबे समय से आंत के केंसर से पीड़ित थे,जो उनकी मौत का कारण बना।’

उत्तर प्रदेश के मुजफ्फरनगर जिले के सिसौली कस्बा में 1935 में जन्में टिकैत ने अपने सामाजिक जीवन की शुरूआत सर्वखाप पंचायतों के सुधारवादी पहलकदमियों से की। पश्चिमी  उत्तर प्रदेश और हरियाणा के इलाके में अदालतों के समानांतर चलने वाली खाप पंचायतों में से बालियान खाप के मुखिया बनने के बाद टिकैत ने दहेज,भ्रुण हत्या,दिखावा और मृत्यु भोज जैसी कई प्रवृत्तियों के खिलाफ जनहित में फैसले लिये, तो वहीं सर्वखाप पंचायतों में उनके लिये कई फैसलों को स्त्री विरोधी और दलित विरोधी भी करार दिया जाता रहा।

मात्र सातवीं तक पढ़े टिकैत के राजनीतिक चुनौतियों की शुरूआत 1986 में भारतीय किसान यूनियन के बनने के साथ हुई जब उन्हें यूनियन का राष्ट्रीय अध्यक्ष चुना गया। यूनियन का गठन सिसौली में 17 अक्टूबर 1986 में कई राज्यों के किसान और सर्वखाप नेताओं की उपस्थिति में हुआ। युवा महेंद्र सिंह टिकैत के नेतृत्व में किसानों ने पहला आंदोलन उनके गृह जनपद खेड़ीकरमू बिजली घर के घेराव से किया और उत्तर प्रदेश  सरकार को बिजली दरें कम करनी पड़ी थीं। उसके बाद महेंद्र सिंह टिकैत ने 22 सफल आंदोलन किये और 23 बार गिरफ्तार हुए। वर्ष 2001 से 2010 के बीच दिल्ली के जंतर-मंतर पर विश्व व्यापार संगठन, बीज विधेयक 2004, जैव परिवर्तित बीज, कर्ज माफी, उचित लाभकारी मूल्य जैसे मसलों पर वह आजीवन संघर्ष  करते रहे।

दिल्ली के इंडिया गेट के पास 1988 में पांच दिन तक चले ‘बोट क्लब’ ऐतिहासिक धरने का असर इतना व्यापक रहा कि एक साल बाद ही धरने की जगह बोट क्लब से बदलकर जंतर-मंतर करना पड़ा था। इस धरने में प्रसिद्ध किसान नेता किशन पटनायक और हरियाणा से घासीराम मैन समेत सैकड़ों किसान नेता शामिल हुए थे। इस प्रसिद्ध धरने में टिकैत ने कहा था,‘इंडिया वालों संभल जाओ, अब दिल्ली में भारत आ गया है।’ टिकैत के नेतृत्व में चले इन्हीं ऐतिहासिक धरनों की कड़ी में 3 अगस्त 1989 को नईमा काण्ड में उत्तर प्रदेश सरकार के विरूद्ध 39 दिन तक भोपा गंगनहर पर धरना भी है, जिसमें उत्तर प्रदेश सरकार को झूकना पड़ा तथा किसानों की पांच मांगे माननी पड़ी थीं।

अब टिकैत की मौत के बाद अगर कोई यह पूछे कि किसान आंदोलन का राष्ट्रीय  नेता कौन,तो शायद कोई दूसरा नाम बता पाना संभव न हो। क्योंकि दिल्ली से लेकर मुंबई और हैदराबाद से लेकर उड़ीसा तक में किसान नेता के तौर पर अगर किसी की स्वीकार्यता थी तो वह टिकैत ही थे। वैसे टिकैत के दौर में कई किसान नेता उभरे और डूबे मगर किसी का कद टिकैत के करीब संभवतया इसलिए नहीं पहुंच सका कि कभी टिकैत किसी राजनीतिक दल के प्यादे कभी नहीं बने।

टिकैत के मिलने वालों में शामिल मुतफ्फरनगर के पत्रकार संजीव वर्मा कहते हैं कि ‘टिकैत बड़े ठेठ आदमी थे। कहा करते थे- अन्न अगर हम उपजाते हैं, देश हम चलाते हैं तो हमतक चलकर वो आयें जो हमारे भरोसे पलते हैं।’ किसान नेता बलवीर सिंह उनको याद करते हुए कहते हैं, ‘टिकैत घोड़ों के बड़े शौकीन थे और मिलने वालों को बैल के कोल्हू का गन्ने का रस जरूर पिलाते थे।’अब जबकि करोड़ों किसानों के चहेते टिकैत हमारे बीच नहीं रहे,उम्मीद की जानी चाहिए कि उनका व्यक्तित्व और कृतित्व पीढ़ियों के लिए उदाहरण बनेगा।
द  पब्लिक एजेंडा से साभार

और उसका इंतज़ार भी म़र गया !

पुलिस वालों और एसपीओ ने पहले जम कर शराब पी और फिर  इनके  घरों में घुस कर इन्हें बाहर निकाला  ! इनकी पत्नियों ने जब  बचाने की कोशिश की तो उन्हें भी बन्दूक के बट से मार-मार कर लहूलुहान कर दिया गया...

हिमांशु कुमार

आज दंतेवाडा से एक फ़ोन आया कि   सोमड़ू म़र गया ! मैंने पूछा कैसे ? तो मुझे बताया गया कि  तेंदू पत्ता तोड़ते समय कल उसे सांप ने काट लिया और कुछ ही देर में वो म़र गया!  तभी  मुझे  ध्यान  आया कि अरे यह तो वही सोमड़ू है ,जिसे एक मामले में न्याय का  इंतजार  था.आइये जाने  कौन था ये सोमड़ू ?

तीन साल पहले की ये घटना है ! भैरमगढ़ से बीजापुर जाने के रास्ते में माटवाडा नाम का एक सलवा जुडूम कैंप है ! 18 मार्च 2008 को स्थानीय  अखबार में खबर छपी कि माटवाडा सलवा जुडूम कैंप में रहने वाले तीन आदिवासियों की नक्सलियों ने कैंप में घुस कर हत्या कर दी है! खबर पर विश्वास नहीं हुआ ! क्योंकि  ये एक छोटा सा कैंप है! सड़क के किनारे सारे आदिवासी अपनी झोपडी में रहते हैं !  बीच में एक पतली सी सड़क और सड़क के इस तरफ पुलिस चौकी ! आदिवासीयों की झोपड़ियों के पीछे की तरफ सीआरपीएफ़ का कैंप ! लेकिन सच्चाई कैसे पता चले ? उस क्षेत्र का जानकार  कोपा भी अचानक  गायब हो गया था ! कोपा के बिना बताये गायब होने पर मैं आश्रम  में चिंतित हो रहा था. लेकिन  दो दिन के बाद कोपा मुस्कुराते हुए  सामने आ गया !

कोपा के  साथ एक नौजवान और भी था ! मैंने प्रश्नवाचक दृष्टि से पूछा, -  ये कौन है? कोपा ने कहा, आप ही पूछ लीजिये ! उस लड़के ने दिल दहला देने वाली कहानी सुनायी ! उसने बताया कि  तीन आदिवासियों के नक्सलियों  के हाथों मारे जाने का जो समाचार छपा है, उनमें से एक  मेरा भाई है और इन तीनों को नक्सलियों ने नहीं पुलिस ने मारा है !

लेकिन हम लोग कभी भी बिना पूरी तहकीकात के किसी मामले में कार्यवाही नहीं करते थे ! इसलिए मैंने उस नौजवान से कहा की मारे गए तीनो लोगो की पत्नियाँ कहाँ हैं ? उसने कहा की सलवा जुडूम कैंप में ! मैंने कहा उन्हें लाना होगा ! कोपा बोला ये ज़िम्मेदारी मैं  लेता हूँ ! और अगले दिन सुबह मारे गए उन तीनों आदिवासियों की पत्नियां हमारे आश्रम में आ गयीं. साथ में कोपा उनके गाँव के सरपंच और पटेल को भी लेता आया था ! उन लोगों को मैंने अलग- अलग बैठा कर पूरी घटना का विवरण देने को कहा ! अन्य गवाहों से भी पूछा ! अब संदेह की कोई भी गुंजाइश नहीं बची थी ! सब का विवरण एक ही जैसा था ! अब सिद्ध हो गया था की ये सलवा जुडूम राहत  शिविर नहीं यातना शिविर हैं !

घटना इस प्रकार से  थी ! इस गाँव के लोगों को जबरन तीन साल पहले गाँव के आठ लोगों की हत्या करने के बाद, घरों को जला कर इस कैंप में लाया गया था ! ये लोग तब से इन कैम्पों में रह रहे थे ! सरकार ने शुरू में तो कैंप बसते समय  कहा था कि  कैंप में खाना पीना सब मिलेगा लेकिन वो सब तो जुडूम के नेता बीच में ही गटक जाते थे ! इस पर गांव वालों ने पेट भरने के लिए आस पास सरकारी सड़क बनाने के नरेगा के काम में जाना शुरू किया पर उसमे भी आधी मजदूरी नेता और पुलिस वाले मार देते थे ! तब लोगों ने गावों में जाकर महुआ बीनना और धान उगाना शुरू कर दिया !

लेकिन सब को रात होने से पहले कैंप में वापिस आकर पुलिस के सामने हाजिरी लगानी पड़ती थी! ज्यादा रात हो जाने वाले की पिटाई की जाती थी कि तुम लोग गाँव जाने के बहाने ज़रूर नक्सलियों की बैठक में गए होंगे ! एक रात  मारे  गए ये  तीनों  आदिवासी ज्यादा रात हो जाने पर पिटाई के डर से गांव में ही रुक गए ! इन्होंने  सोचा कि कल दिन में चुपचाप अपने घर में घुस जायेंगे और बोल देंगे की हम तो कल शाम को ही आ गए थे ! और इन्होंने ऐसा ही किया ! लेकिन इसकी जानकारी वहां के एसपीओ  को चल गयी ! उन्होंने वहां पुलिस चौकी के इंचार्ज एएसआई पटेल के साथ मिल कर इन चारों को अनुशासन तोड़ने की सजा देने का निर्णय किया ! सजा देने के लिए पुलिस वालों और एसपीओ ने पहले जम कर शराब पी और उसके बाद इन चारों को घरों में घुस कर खींच कर बाहर लाया गया ! इनकी पत्नियों ने जब इन्हें बचाने की कोशिश की तो उन्हें भी बन्दूक के बट से मार-मार कर लहूलुहान कर दिया गया दिया गया !

फिर इन चारों आदिवासियों के हाथ उन्ही की लुंगियां को खोल कर पीछे बांध दिए गए ! और इन्हें सड़क पर लाया गया और डंडों से चारों की पिटाई शुरू की गयी ! थोड़ी देर में चारों बेहोश हो गए! बाल्टी भर पानी मंगाया गया और उन चारों पर डाला गया ! उन्हें थोडा होश आया ! उन चारों में सोमड़ू भी एक था ! अँधेरा हो गया था ! सोमड़ू मौके का फायदा  उठाकर सरकते हुए एक झाड़ी में चला गया और हाथों में बंधी लूंगी खोल कर गिरता पड़ता कुछ दूर पहुंचा ! वहाँ गाँव वालों ने उसे पानी पिलाया ! किसी ने उसे अपने घर में बकरियों के साथ छिपा दिया ! इधर इन तीनो की पिटाई शाम से रात के आठ बजे तक चलती रही ! अंत में लगभग सब शांत हो गए थे ! फिर उनकी सज़ा पूरी करने का वक़्त आया ! चाकू से तीनो की आँखे निकाली गयीं ! और फिर माथे पर चाकू खड़ा कर के पत्थर से उसे सर में ठोक दिया गया ! इसके बाद तीनो की लाशों को पास में नदी के किनारे रेत में दबा दिया गया !

हमने इन तीनों आदिवासियों की पत्नियों को मीडिया के सामने बैठा दिया और कहा कि आप भी सच्चाई निकालने की कोशिश करिए ! इसके बाद ये मामला छत्तीसगढ़ हाइकोर्ट में दायर किया गया ! इन तीनों महिलाओं को मैं अपने प्रदेश के सह्रदय साहित्यकार डीजीपी श्री विश्वरंजन  के पास ले गया ! वो बोले ठीक है मुझे अब कुछ नहीं पूछना है, लेकिन बाद में उन्होंने पत्रकारों से कहा की इन महिलाओं के पतियों को नक्सलियों ने ही मारा है, पर ये नक्सलियों के कहने से पुलिस पर झूठा इल्ज़ाम लगा रही हैं ! इस विषय में मेधा पाटकर ने भी डीजीपी साहब को एक पत्र लिखा जिसके जवाब में उन्होंने कहा की हिमांशु तो झूठ बोलता है! बाद में राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग की जांच में भी इस मामले में पुलिस की भूमिका पर संदेह व्यक्त किया गया !

अभी इस मामले में आरोपी एएसआइ  पटेल और दो एसपीओ जेल में हैं ! तीनो महिलाओं को अंतरिम राहत  के रूप में एक एक लाख रुपया अदालत के आदेश से मिला है ! सोमड़ू का एक हाथ और तीन पसलियाँ मार से टूट गयीं थीं ! और वह उसके और उसके साथियों के साथ हुए ज़ुल्म के खिलाफ फैसले के इंतज़ार में था ! लेकिन आज खबर आयी की सोमड़ू मर गया! और उसी के साथ उसका इंतज़ार भी म़र गया !

दंतेवाडा स्थित वनवासी चेतना आश्रम के प्रमुख और सामाजिक कार्यकर्त्ता हिमांशु कुमार का संघर्ष बदलाव और सुधार की गुंजाइश चाहने वालों के लिए एक मिसाल है.




May 19, 2011

'अभी पार्टी नहीं टूटेगी '- किरण

  
नेपाल के राजनीतिक हालात और एकीकृत नेपाली कम्युनिस्ट पार्टी (माओवादी ) की भूमिका पर  आयोजित यह बहस  ऐसे समय में चल रही है जब वहां संविधान सभा के चुनाव का कार्यकाल 28 मई को खत्म होने जा रहा है. एक दशक के जनयुद्ध के बाद शांति प्रक्रिया में शामिल होकर नया जनपक्षधर संविधान बनाने का सपना लिए सत्ता में भागीदारी की माओवादी पार्टी, अपने लक्ष्य में सफल नहीं हो सकी है.इसे लेकर पार्टी के भीतर और बाहर मत-मतान्तर हैं, नयी तैयारियां  हैं. इसके मद्देनजर जनज्वार ने  नौ लेख अब तक  प्रकाशित किये हैं.

इस कड़ी को आगे बढ़ाते हुए  एनेकपा (माओवादी) के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष  मोहन वैद्य किरण से  अजय प्रकाश  ने साक्षात्कार किया है , पेश है मुख्य  अंश ...                                



संविधान सभा का कार्यकाल 28 मई खत्म हो रहा है, पार्टी की अगली रणनीति क्या होगी ?

वैसे तो हमारी रणनीति पहले से ही निर्धारित है। फिर भी  28 मई तक की  स्थिति देख लें, तब आगे की रणनीति तय की जायेगी ।

बाबुराम, प्रचण्ड और आपकी  लाइन में असल फर्क  क्या है? आपको क्यों  लगता है कि आपकी बात मौजुदा नेपाली और विश्व राजनीतिक परिस्थिति में  सही है ?

लाइन के बीच हमारे मतभेद क्या क्या हैं, सामान्य रूप से दस्तावेज सार्वजनिक हो चुके हैं और  इस अर्थ में आप भी हमारे बीच के लाइन सम्बन्धी मतभेद से परिचित रहे होगें । विशेष रूप में बात यह है  कि हम तीनों एक ही पार्टी में  हैं, इसलिए इस बारे में मूर्त रूप से  बताना उपयुक्त नहीं  होगा । फिर भी मैं इतना कह  सकता हूँ कि जनगणतन्त्र, राष्ट्रीय स्वाधीनता और जनविद्रोह की जो बात मैंने उठायी है, वह वर्तमान राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय  परिवेश में बिलकुल  सही और वैज्ञानिक हैं । 


आपकी निगाह में  नेतृत्वका आपसी मतभेद इतना गहरा चुका है की पार्टी टुट सकती  है, अगर नहीं  तो वह कौन से बिंदु  होंगें जिन पर सहमति बनाते हुए आगे बढा जा सकता है ?

मतभेद तो बहुत गहरे हैं, लेकिन मैं यह नहीं  कह सकता हूँ कि पार्टी अभी टुटेगी । आगे हमारी  सहमति या  एकता का आधार देश और जनता के पक्ष में शान्ति व संविधान, जनगणतन्त्र और राष्ट्रीय  स्वाधीनता को लेकर संघर्ष करना ही है  । 


पिछले पांच  वर्षो में नेपाली माओवादी पार्टी जहाँ पहुंची है, उसमें आप  बराबर  के  भागीदार हैं. आपलोग यही हासिल होना है,सोचकर आगे बढे थे या कहीं चूक गए ?

इस अवधि में मेरी तरफ से भी कुछ कमजोरियां  रही हैं,  फिर भी मैं समान रूप से पार्टी को यहाँ पहुँचाने में भागीदार नहीं हूँ.  कार्यदिशा के क्षेत्र जो गलती, कमी और कमजोरियां  हुई हैं, इन सबको करेक्शन करने और उनसे मुक्त होने के लिए हम लोंगों ने पार्टी में अलग राजनीतिक प्रस्ताव पेश किया, पार्टी के अन्दर भिन्न मत दर्ज किये और स्पष्ट  रूप से जनगणतन्त्र, राष्ट्रीय  स्वाधीनता और जनविद्रोह की लाइन पर  डटे रहे । 


कार्यकर्ता निराश हैं, पीएलए अब उस रूप में बची नही , संगठन में फुट है, वैसे  में जनयुद्ध में  वापस लौट जाने या  शान्ति प्रक्रिया में बने रहने के अलावा कोई तीसरा विकल्प भी हैं ?


स्थिति निश्चय ही जटिल हैं । विकल्प बहुत से हैं, इनमें से हम क्रान्तिकारी विकल्प के पक्ष में हैं । हमलोग सुधारवाद,संसदवाद, राष्ट्रीय आत्मसपर्णवाद और दक्षिणपन्थी संशोधनवाद के दलदल नही फसेंगे । हम क्रान्ति का झण्डा हमेशा ऊंचा  उठाते रहेंगे ।

भारतीय शासक वर्ग को लेकर जो आलोचनात्मक रणनीति नेपाली माओवादी पार्टी को रखनी चाहिए थी, उसमें कहीं  चूक हुई?  

बदली  हुई परिस्थिति को ध्यान में रखकर हम लोगों  ने राष्ट्रीय  स्वाधीनता और जनगणतन्त्र दोनों मुद्दों को प्राथमिक स्थान में रखा और उसी आधार पर आज का प्रधान अन्तर्विरोध निर्धारण किया गया । परन्तु, इस कार्य दिशा को कार्यान्वन करनेमें हम लोग कमजोर पडें हैं । यहाँ  पर अवश्य चूक हुई है. 


नेपाल में दो बार माओवादी सरकार में रहे लेकिन आप एक बार  भी सरकार में शामिल नहीं  हुए, ऐसा क्यों ?

मैं संविधान सभा के सदस्य पद से इस्तीफा  दे चुका हूँ. इस तरह की सरकार में बने  रहने में  मेरी कोई रुचि भी नहीं  है ।

सत्ता में रहते हुए प्रचण्ड और वाद में बाबुराम दिल्ली आये, कभी आपका नहीं  हुआ, यह भी पार्टी की कोई रणनीति थी  या आपका फैसला?

यह संयोग की बात है. 

नेपाली माओवादी नेतृत्व खासकर प्रचण्ड पर आर्थिक भ्रष्टाचार के आरोप लग रहे हैं, कितनी सच्चाई  है  ?

 हमको पता नहीं ।


नेपाली माओवादी पार्टी से सहानुभूति रखने वाले भारतीय पत्रकार आनन्द स्वरुप  वर्मा ने नेपाल की क्रांति को लेकर अपने हालिया लेख में जो टिप्पणी  की है, उसपर आपकी राय ?

मैंने  कभी सोचा ही नहीं  था कि आनन्द स्वरुप वर्मा   हमारे पार्टी के दो लाइन के संघर्ष बारे में  और नेपाल की राजनीति के बारे  में इस तरह पेश आयेंगें ।  कुछ भी हो वर्मा  जी ने 'क्या माओवादी क्रांति की उलटी गिनती शुरू हो गयी ' लेख में जो लिखा  है,  उससे अपनी गरिमा को स्वयं ही बहुत धूमिल बना दिया।

आपकी पार्टी को लेकर भारतीय माओवादीयों की क्या आलोचना हैं, आप उनकी आलोचना को कितना सही मानते हैं ?

उनलोगों की हमारे ऊपर  सामान्यत: यह आलोचना है  कि हम दक्षिणपन्थी संशोधनवादी दलदल में फंस रहें हैं । हमको लगता है  कि उनकी आलोचना सकारात्मक है ।




नेपाल के राजनीतिक हालात और नेपाली माओवादी पार्टी की भूमिका को लेकर आयोजित इस बहस में अबतक आपने पढ़ा - 

1-क्या माओवादी क्रांति की उल्टी गिनती शुरू हो गयी है? 2-क्रांतिकारी लफ्फाजी या अवसरवादी राजनीति 3- दो नावों पर सवार हैं प्रचंड 4- 'प्रचंड' आत्मसमर्पणवाद के बीच उभरती एक धुंधली 'किरण'5- प्रचंड मुग्धता नहीं, शीर्ष को बचाने की कोशिश 6- संक्रमण काल की जलेबी अब सड़ने लगी है कामरेड7- संशोधनवादियों को जनयुद्ध का ब्याज मत खाने दो ! 8- संसदीय दलदल में धंसती नेपाली क्रांति 9- संविधान निर्माण ही प्राथमिक


 

May 18, 2011

प्रचंड गुट ने दी बाबुराम को जान से मारने की धमकी

नेपाल के कैसीनो जनयुद्ध की समाप्ति  के बाद से पार्टी के लिए आय का प्रमुख आधार हैं, इसलिए यहाँ लगातार टकराव की स्थिति बनी रहती है. जनयुद्ध के समय पार्टी कैसीनो संस्कृति के खिलाफ थी, मगर आज यह पार्टी का प्रमुख आर्थिक स्रोत  है...

विष्णु शर्मा

एकीकृत नेपाल कम्युनिस्ट  पार्टी (माओवादी) के उपाध्यक्ष बाबुराम भट्टाराई को नेपाल की राजधानी काठमांडू में 16 मई को उनकी ही पार्टी के एक मजदूर नेता जनक बर्तौला ने जान से मारने  की धमकी दी है. जनक बर्तौला हयात होटल के कैसीनो तारा में बाउन्सर और माओवादी होटल मजदुर इकाई समिति के सदस्य है. बताया जा रहा है की बर्तौला मजदुर संगठन के पूर्व अध्यक्ष और पार्टी के अध्यक्ष प्रचंड के करीबी सालिकराम जमकट्टेल समूह से है.

 कुछ दिन पहले  भट्टाराई के निकट मजदूर यूनियन के सदस्य जानुमान डंगोल पर जमकट्टेल के कार्यकर्ता कल्पदेवराई ने जानलेवा  हमला किया था और इसके बाद पुलिस ने उन्हें गिरफ्तार कर लिया था. अपने सहयोगी को रिहा करने के मांग को लेकर पार्टी कार्यालय पहुचे बर्तौला ने तब बाबुराम भट्टाराई  को जान से मारने की धमकी दी, जब उन्होंने कल्पदेवराई के खिलाफ रिपोर्ट वापस लेने से मना कर दिया.

बाबुराम ने धमकी मिलने की सूचना गृहमंत्री कृष्ण बहादुर महरा और पार्टीके महासचिव राम बहादुर थापा 'बादल' को दी है, जिसके बाद  भट्टाराई की सुरक्षा  बढ़ा दी गयी है. भट्टाराई के निकट के कार्यकर्ताओं  का कहना है कि मजदूर संगठन के विस्तार के नाम पर जिस प्रकार से आपराधिक तत्वों का पार्टी में प्रवेश कराया गया है यह उसी का परिणाम है. इस घटना पर बाबुराम का कहना है 'यह दुर्भाग्यपूर्ण है. आज जो लोग मुझे धमकी दे रहे है कल वे अध्यक्ष को धमकी देंगे.पार्टी की आड़ में आपराधिक काम करने वालों पर कड़ी कार्रवाही की जानी चाहिए.'

भट्टाराई के समर्थकों ने कल पार्टी मुख्यालय पेरिस डाँडा में धरना दिया. क्रान्तिकारी पत्रकार संघ के अध्यक्ष और प्रचार राज्य समिति सचिव महेश्वर दहाल ने मांग रखी   कि 'उपाध्यक्ष बाबुराम को पार्टी कार्यालय में जान से मारने की धमकी अत्यंतनिन्दनीय है और धमकी देने वाले पर कड़ी कार्रवाही की जानी चाहिए.'

नेपाल राजनीती के जानकार मानते है कि यह घटना पार्टी के आर्थिक स्रोत पर कब्ज़ा करने की प्रचंड और बाबुराम समर्थकों के बीच लम्बे समय से चल रही होड़ का नतीजा है.  नेपाल के कैसीनो  जनयुद्ध  की सामप्ति के बाद से पार्टी के लिए आय का प्रमुख आधार हैं,  इसलिए यहाँ लगातार टकराव की स्थिति बनी रहतीहै. जनयुद्ध के समय पार्टी कैसीनो संस्कृति के खिलाफ थी मगर आज यह पार्टी का प्रमुख आर्थिक स्त्रोत बनगया है. भले ही राजनीतिक स्तर प्रचंड और बाबुराम के बीच पिछले समय नजदीकी आई हो लेकिनदोनों के समर्थक आर्थिक संसाधनों में अपने कब्जे को जरा भी कम नहीं करना चाहते.

दस साल तक जन्यूद्ध का संचालनकरने के बाद संसदीय राजनीति में प्रवेश करने वाली माओवादी पार्टी नेपाल की संसद में सबसे बड़ी पार्टी है. लेकिन पार्टी के अन्दर लगातार चल रहा 'दो लाइन' और आर्थिक स्त्रोतों का संघर्ष जनता में इसके विश्वास को लागातार कम कर रहा है. आने वाले दिनों में पार्टीके प्रदर्शन पर इसका असर पड़ना तय है.



May 17, 2011

खाने और दिखाने के मुद्दों का फर्क करतीं मायावती

सर्वजन की बात करने वाली सरकार ने सर्वजन को घरों में बंधक बनाकर सीएम के दौरों को पूरा करवाया था। ऐसे में मायावती को इस गुरूर से बाहर जाना चाहिए कि उनकी जुबान इतिहास लिखती है...

डॉ0 आशीष वशिष्ट

भट्ठा पारसौल की घटना ने माया सरकार की दोमुंही नीति को सारे देश के सामने उजागर कर दिया है। मार्च महीने में जाट आरक्षण की मांग कर रहे आंदोलनकारियों को खुली छूट देने वाली माया सरकार जब भट्ठा पारसौल के आंदोलनकारी किसानों पर गोली चलवाती है तो यूपी सरकार की दोमुंही और जनविरोधी नीति का कुरूप चेहरा पूरे देश  के सामने बेपर्दा हो जाता है। वैसे भी माया राज में सरकार और नौकरशाह कानून, मानवाधिकार और जनपक्ष से जुड़े मुद्दों को जूते की नोक पर ही रखते हैं।

बहन मायावती का हर कदम  वोट बैंक और राजनीतिक गुणा-भाग से प्रेरित और संचालित होता है। भट्ठा पारसौल के किसान जमीन के बदले मिलने वाले सरकारी मुआवजे को बढ़ाने की मांग के लिए आंदोलनरत थे। किसानों की जायज मांगों और आंदोलन का प्रशासन लंबे समय से अनसुना और अनदेखा कर रहा था। आखिरकर अपनी मांगे पूरी न होती देख किसानों ने प्रशासन तक अपनी आवाज पहुंचाने के लिए रोडवेज के तीन कर्मचारियों को बंधक बना लिया। जिला प्रषासन को जैसे ही रोडवेज के कर्मचारियों के बंधक बनाए जाने की खबर लगी, वैसे ही एक झटके में सारा प्रशासनिक अमला जाग उठा।

प्रशासन ने किसान नेताओं से वार्ता और समझौते की जरूरी और प्राथमिक कार्रवाई से पहले किसानों पर लाठियां और गोलियां चलाकर दादागिरी और निकम्मेपन का जो उदाहरण पेश  किया वो किसी भी लोकतांत्रिक  देश  के लिए शर्मनाक घटना है। प्रशासन के रवैये से क्षुब्ध किसानों ने भी जवाबी कार्रवाई की जिसमें दोनों पक्षों को जान-माल का नुकसान उठाना पड़ा। असल में देखा जाए तो जो भी हुआ उसकी निंदा होनी चाहिए। क्योंकि कानून को हाथ में लेने की इजाजत किसी को भी नहीं दी जा सकती है। किसानों ने अपनी बात को प्रषासन तक पहुँचाने  के लिए कर्मचारियों को बंधक बनाने का जो रास्ता चुना वो भी सरासर गलत और गैर-कानूनी था और जो नंगा नाच और तांडव पुलिस-प्रषासन ने किया वो भी घोर निंदनीय है।

लेकिन ऐसे हालात किसने बनाए और किसने किसानों को अपहरणकर्ता बनने के लिए मजबूर किया। प्रशासन को समय रहते नागरिकों की समस्या की ओर उचित ध्यान देना चाहिए। भट्ठा पारसौल की घटना  प्रशासनिक अक्षमता, अकर्मण्यता, गैर-जिम्मेदाराना रवैया और निकम्मेपन की ही उपज है। क्योंकि जनता से अधिक प्रषासन को जिम्मेदार, संयमी, अनुषासित, गंभीर और समझदारी दिखाने की अपेक्षा की जाती है। लेकिन माया सरकार में लगभग सारा सरकारी अमला कानून को रबड़ की गेंद की भांति उछालने में आनंद अुनभव करता है।

भट्ठा पारसौल से पूर्व आगरा, मथुरा, इलाहाबाद और लखनऊ में भी किसानों और प्रषासन के मध्य कई घटनाएं घट चुकी हैं। प्रदेश में जहां-जहां भी विकास के नाम पर जमीन अधिग्रहण हो रहा है वहां किसान और प्रशासन आमने-सामने खड़े हो रहे हैं। असल समस्या भूमि अधिग्रहण कानून से लेकर प्रषासानिक अनुभवहीनता की है। कारपोरेट, ठेकेदार, गुण्डों और माफियाओं के हाथों बिकी सरकार को पैसा कमाने की इतनी जल्दी है कि विकास के नाम पर धड़ाधड़ खेती वाली जमीनों का अधिग्रहण सरकारी एजेंसियां कर रही है।

माया सरकार में भ्रष्टाचार का बोलबाला है। सरकार को जिस मुद्दे पर व्यक्तिगत तौर पर नफा नजर आता है, वह सरकार की निगाह में विकास हो जाता है। जाट आरक्षण ने पूरे रेल यातायात, यात्रियों और आम आदमी के जीवन को बुरी तरह से प्रभावित किया था। यूपी से होकर निकलने वाली दर्जनों ट्रेनों को रद्द करना पड़ा। होली के त्योहार के कारण पूर्वांचल और देष के अन्य हिस्सों में रहने वाले लाखों लोगो की घर जाने की ख्वाहिष इस बार अधूरी रह गई क्योंकि आंदोलनकारी जाट रेलवे के ट्रेकों पर कब्जा जमाए थे।

जाट आंदोलकारियों को माया सरकार का खुला संदेष था कि जो मन में आए वो करो क्योंकि जाट आरक्षण की आंच कांग्रेस और रालोद का राजनीतिक समीकरण बिगाड़ सकती थी, बसपा और माया सरकार से उसे कोई नुकसान नहीं होना था। हाई कोर्ट के सख्त रवैये के बाद जाट आंदोलनकारियों को रेल ट्रेक से हटाने की सुस्त और मरियल कार्रवाई माया सरकार ने की तो थी लेकिन तब तक लाखों-करोड़ों के राजस्व का नुकसान और लाखों लोगांे का होली का त्योहार खराब हो चुका था।

कदम-कदम पर माया सरकार की दोमुंही नीतियां स्पष्ट दिखाई देती हैं। मेरठ में यांत्रिक कारखानों के खिलाफ आमरण अनषन पर बैठे जैन मुनि श्री मैत्रि सागर को जिस तरह सरकारी मषीनरी ने अनषन से जर्बदस्ती उठाया और बारह घंटे नजरबंद बनाए रखा वो सरकार की कथनी और करनी में अंतर को स्पष्ट उजागर करती है। जैन मुनि की मांग सिर्फ इतनी थी कि सरकार यांत्रिक बूचड़खानों पर रोक लगाए, लेकिन लोकहित और जन समस्या से जुड़े मुद्दे का स्थायी या ठोस हल निकालने की बजाए प्रषासन अनषन तुडवाने के कुत्सित प्रयासों में लगा रहा। अगर कोई संत या देष का आम आदमी चिल्ला-चिल्लाकर अपनी समस्या या मांग प्रषासन के सामने रखता है तो सरकारी अमला उसकी बात को गंभीरता से सुनने की बजाए फौरी कार्रवाई करने में अधिक दिलचस्पी दिखाता है।

मेरठ में बूचड़खानों की काली और अवैध कमाई के पीछे सत्ता पक्ष से जुड़े नेताओं का खुला हाथ और संरक्षण है। इसलिए सरकारी अमला जायज मांग को भी सिरे से खारिज करने में परहेज नहीं करता है। देखा जाए तो जनससमयाओं और मांगों के पीछे कहीं न कहीं राजनीतिक दखलअंदाजी से लेकर प्रषासन की अदूरदर्षिता, निकम्मापन और लेट लतीफी स्पष्ट झलकती है। मायावती सरकार में तार्किक क्षमता का अभाव है। माया अपने विरोधियों को तार्किक या ठोस जवाब देेने की जगह कानूनी डंडे और ताकत का सहारा लेने में अधिक यकीन रखती है। तभी तो सरकारी मषीनरी विरोधी दलों के नेताआंे को जूते से मसलने और अहिंसक प्रदर्षनकारियों पर डंडे और गोलियां चलाने से भी परहेज नहीं करती है।

जब बात माया सरकार के हितों और वोट बैंक की आती है वहां सरकार त्वरित कार्रवाई करने से चूकती नहीं है। लखनऊ के सीएमओ हत्याकांड से लेकर षीलू बलात्कार कांड तक माया सरकार की त्वरित कार्रवाई किसी से छिपी नहीं है। सीएमओ हत्याकांड में तो मांयावती ने अपने दो-दो चहेते मंत्रियों की बलि लेने में कोई संकोच नहीं किया। क्योंकि माया हर चीज और हालात से समझौता कर सकती हैं लेकिन उन्हें ये कतई बर्दाषत नहीं है कि कोई उनके वोट बैंक में सेंध लगाए या उनकी कुर्सी खिसकाने का प्रयास करे।

भट्ठा पारसौल और जाट आरक्षण के मुद्दों पर माया सरकार द्वारा की गई कार्रवाई सरकार की नीति और नीयत का खुला बयान करती है कि सरकार की हर कवायद वोट बैंक को बचाए रखने या फिर अपने विरोधियों को धूल चटाने से प्रेरित होती है। 2007 में पूर्ण बहुमत की सरकार बनाने के बाद से ही माया ने प्रदेष के आम आदमी से दूरी बना रखी है। माया के ष्षासन में जनता से मिलने का कोई कार्यक्रम या एजेंडा नहीं है। पूर्व सरकारों में जनता दर्षन के माध्यम से मुख्यमंत्री प्रदेष की जनता से रूबरू होते थे और उनकी समस्याआंे को सुनते और सुलझाते थे।

पिछले चार साल के कार्यकाल में मायावती ने दो-चार रैलियों के अलावा जनता से मिलने की कोई कवायद नहीं की। मार्च माह में प्रदेष के जनपदों के दौरों पर निकली माया को जगह-जगह जनता के विरोध का सामना करना पड़ा। सर्वजन की बात करने वाली सरकार ने सर्वजन को घरों में बंधक बनाकर सीएम के दौरों को पूरा करवाया था। ऐसे में मायावती को इस गुरूर से बाहर आ जाना चाहिए कि उनकी जुबान इतिहास लिखती है। जब जनता पष्चिम बंगाल में वामपंथियों का 34 साल पुराना किला ढह सकती है तो जनता बसपा का किला भी ढहाने उतनी ही सक्षम है। 


 स्वतंत्र पत्रकार और उत्तर प्रदेश के राजनीतिक- सामाजिक मसलों के लेखक-








May 16, 2011

सीपीएम के 'मर्दाना' वामपंथी

पश्चिम बंगाल में सीपीएम के नेता  बीनॉय कोनार के अपने पुरुष कैडर को निर्देश दिया था कि  जब मेधा पाटकर नंदीग्राम आये तो उनके सामने अपनी पैंट खोल दे. उस समय चुनाव नजदीक नहीं थे इसलिए सीपीएम ने ना इस बयान की निंदा की और ना ही इसके लिए माफ़ी मांगी...

 कविता कृष्णन

पश्चिम बंगाल की सत्ता में 34 वर्षों तक रही पार्टी सीपीएम के नेता अनिल बासु ने हाल ही में बीते विधानसभा चुनाव की एक  रैली को संबोधित करते हुए, कोलकाता के  रेड-लाइट एरिया- सोनागाछी का जिक्र किया और कहा-  'ममता के पास पैसा कहाँ से आ रहा है? किस भतार  (बंगाली भाषा का शब्द जो उस पुरुष के लिए इस्तेमाल किया जाता है,जिसका किसी औरत के साथ नाजायज सम्बन्ध हो) ने उसे चुनाव खर्च के लिए 24 करोड़ दिए?'

ममता बनर्जी : गलियां रहीं बेअसर

उन्होंने आगे कहा कि सोनागाछी  की वेश्या 'छोटे ग्राहकों की तरफ तब देखती भी नहीं जब  उन्हें कोई बड़ा ग्राहक मिल जाता है'.बासु ने कहा कि तृणमूल को अमेरिका जैसे बड़े ग्राहक चुनाव के लिए धन दे रहे हैं, इसलिए अब उसे चेन्नई, आंध्र प्रदेश  और दूसरी जगह के अपने छोटे ग्राहकों में कोई दिलचस्पी नहीं है.इससे पहले  सिंगुर प्रतिरोध के समय बासु ने , कहा था कि "यदि उनका बस चलता तो वे ममता के बाल पकड़ कर उसे कालीघाट के उसके मकान में पटक देते ना कि उसे टाटा फैक्ट्री के सामने प्रदर्शन करने देते".गौरतलब है कि घोर स्त्री विरोधी  राजनीति में डूबे सीपीएम नेता  अनिल बासु  आरामबाग से सात बार सांसद रह चुके है.इसी तरह पश्चिमी मिदनापुर के गरबेटा विधानसभा से सीपीएम प्रत्याशी और पूर्व मंत्री सुशांत घोष ने ममता बनर्जी के शादीशुदा न होने पर कहा कि  'जिस औरत की मांग में लाल सिंदूर नहीं हैं,वह स्वाभाविक तौर पर  लाल  रंग देखकर क्रोधित होगी .'  

जरूरी नहीं कि हम ममता बनर्जी या सीपीएम की राजनीति के समर्थक हों तभी इस बात को समझें कि सीपीएम के  अनिल बासु की स्त्री विरोधी गाली उस पितृसत्तात्मक अपमान का सबूत है जिसे सार्वजानिक जीवन में एक महिला को बार-बार झेलना पड़ता है. भले ही बासु ने  प्रकाश करात के नेतृत्व वाली कम्युनिस्ट पार्टी से सात बार चुनाव जीता हो, लेकिन उन्होंने यह साबित कर दिया कि जब महिलाएं राजनीति में प्रवेश करती हैं तो वे राजनीति को राजनीति की तरह नहीं ले पाते. जब भी उन्हें महिला प्रतिद्वंदी का सामना करना पड़ता है तो वे तुरत राजनीतिक मुद्दों को एक और पटक देते है और आसान पितृसतात्मक गालियों का सहारा लेने लगते है -उनकी स्त्रीत्व पर हमला करते है,उन्हें वेश्या कहते हैं. साफ़ पता चलता है सीपीएम के यह नेता एक महिला प्रतिद्वंदी के प्रतिरोध का सामना मिथकीय दुशासन के तरीके से जो पितृसत्तात्मकता का प्रतीक भी है,के अलावा किसी अन्य तरीके से नहीं कर सकते.

हालांकि पश्चिम बंगाल के मुख्यमंत्री रहे बुद्धदेव भट्टाचार्य  ने कहा था  कि जिस भाषा का प्रयोग बासु ने किया है वह 'अक्षम्य'है और उन्होंने सीपीएम को बासु के खिलाफ चेतावनी जारी करने कोभी कहा था. संभवतः बासु ने भी अपनी 'लापरवाह' टिप्पणी के लिए पछतावे का बयान जारी भी कर दिया था. लेकिन सवाल यह है कि यदि इस तरह की मौखिक हिंसा,जो महिला को सार्वजानिक जीवन में अपमानित करती है, सीपीएम के लिए 'अक्षम्य' है तो कैसे चेतावनी या माफ़ी इसके लिए पर्याप्त है. उन्हें सीपीएम से अभी तक निष्कासित क्यों नहीं किया गया? क्या अनिल बासु को स्त्री-विरोधी द्वेष पूर्ण टिपण्णी  के लिए सजा नहीं मिलनी  चाहिए ?

पहले भी कई अवसरों पर  सीपीएम नेताओं ने इस तरह की पितृसत्तात्मक तानों  और गलियों का इस्तेमाल किया है.दिवंगत सुहास चक्रबर्ती ने तृणमूल  कांग्रेस  की नेता ममता बनर्जी  के नारे माँ-माटी-मानुष का यह कह कर मजाक बनाया था और कहा था कि 'जो औरत खुद बांझ  है वह माँ का मतलब क्या समझेगी?'सीपीआइएम के ही बीनॉय कोनार के अपने पुरुष कैडर को निर्देश दिया था की जब मेधा पाटकर नंदीग्राम आये तो उनके सामने अपनी पैंट खोल दें.उस समय चुनाव नजदीक नहीं थे इसलिए सी पीआई एम ने ना इस बयान की निंदा की और ना ही इसके लिए माफ़ी मांगी.

सीपीएम को सोनागाछी  की उन गरीब स्त्रियों से भी माफ़ी मांगनी चाहिए जिन्हें  इस व्यवस्था ने मरने के लिए हाशिए पर धकेल दिया है और जिनका कुसूर सिर्फ इतना है की वे जीना चाहतीहै. क्यों उन्हें एक गाली समझा जाये? इसमें उनका क्या कुसूर है? बासु को इसका कोई हक़ नहीं है के वह उनके आत्म-सम्मान को ठेस पहुचाये जबकि वे और उनकी पार्टी को इस बात का जवाब देने चाहिए कि क्यों सीपीएम के तीन दशको के शासन के बाद भी सोनागाछी  की औरतें बेबस जिन्दगी जीने को मजबूर है.
अनुवाद-  विष्णु शर्मा


जेएनयु छात्र संघ की पूर्व संयुक्त सचिव और सीपीआइएमएल (लिबरेशन) की केंद्रीय समिति सदस्य. फिलहाल लिबरेशन के महिला संगठन एपवा की  राष्ट्रीय  सचिव .


चंद सवाल रह गए थे बादल दा !

बादल दा, मुझे दुख के साथ कहना पड़ रहा है कि आप अपने नाटकों में आम लोगों के लिए वही कुछ गिने-चुने ही समाधान छोड़ते थेः वह जहर खा ले, फांसी लगा ले, पागल हो जाए, या कम से कम क्रांतिकारी रास्ते से भटक ही जाए. और आदमी यह सब इसीलिए करे कि उससे आम आदमी की समस्याओं को मान्यता मिलेगी...

ब्रह्म प्रकाश
बादल दा, जब अनायास ही एक साइट पर आपकी मृत्यु का समाचार पढ़ा तो थोड़ी देर के लिए भरोसा ही नहीं हुआ. भरोसा इसलिए भी नहीं हो पा रहा था क्योंकि आपसे करने के लिए चंद सवाल जो रह गये थे. हां, बादल दा एक इच्छा थी कि आपसे एक दिन जरूर मिलूंगा और मिल कर कुछ अटपटे और अनसुलझे सवाल करूंगा.वे सवाल जो असल में अनसुलझे नहीं थे,बल्कि आपने उन्हें उलझा कर रख दिया था.

आपके वो उलझे सवाल हम जैसे बहुतों के मन में होंगे. खास कर जब भी आपका कोई नाटक देखा, सवाल करने की इच्छा उतनी ही तीव्र हुई. परंतु जब भी आपको लिखने के लिए सोचा, थोड़ी झिझक ने मुझे रोक लिया. यह जानते हुए भी कि आप नहीं रहे आज वे सवाल पूछ रहा हूं. सवाल इसलिए भी जरूरी हैं कि आपकी विरासत तीसरा रंगमंच (Third Theatre) के रूप में जिंदा है. आपके लिखे गये उन अनगिनत नाटकों में के रूप में. सवाल आप से भी हैं और आपके उन शागिर्दों से भी जो आपके नाटकों के गुणगान करते नहीं थकते. वैसे कुछ मामलों में, खास कर तीसरा रंगमंच को लेकर तो मैं खुद ही आपका गुणगान करता हूं.

रंगकर्मी बादल सरकार
आपसे और आपके तीसरे रंगमंच के बारे में मेरा पहला परिचय जेएनयू में तब हुआ जब मैं कैंपस आधारित नुक्कड़ नाटक समूह जुगनू से जुड़ा था. परिचय क्या था, प्रेरणा थी. तब आपके तीसरा रंगमंच का प्रशंसक हो गया था मैं. आप जिस खूबी से स्पेस का इस्तेमाल किया करते थे, अपने नाटकों में आपने जिस बारीकी से अभिनेताओं की देह (body) का इस्तेमाल किया था और उसमें एक नयी जान फूंक दी थी, वह पहली नजर में बहुत प्रभावशाली लगता था. जब चाहा आपने उसे पेड़ बना दिया, जब चाहा एक लैंप पोस्ट. खास कर जिस तरह से आपके एक चरित्र दूसरे चरित्र में बदल जाते थे और दूसरे चरित्र को आत्मसात कर लेते थे, वह काबिले तारीफ था. स्पेस और बॉडी का ऐसा मेल आधुनिक भारतीय रंगमंच में शायद ही किसी ने किया हो. आप सिर्फ रंगमंच को सभागार (auditorium) से बाहर ही नहीं लाये, आपने नुक्कड़ों और सड़कों को ही मंच (स्टेज) बना दिया. बुर्जुआ रंगमंच के सभागार को तो आपने ध्वस्त कर दिया. आपने यह साबित कर दिया कि पैसे और सभागारों से रंगमंच नहीं चलता, रंगमंच के लिए अभिनेता की देह, न्यूनतम स्पेस और दर्शक की कल्पनाशक्ति काफी है.

आपका वह सवाल कि ‘थिएटर करने के लिए कम से कम क्या चाहिए’, नाट्यकर्मियों के लिए आज भी प्रेरणास्रोत है. एक चुनौती है. आपने जिस तरह से वस्त्र सज्जा (कॉस्ट्यूम) और साज सज्जा (मेक अप) को गैरजरूरी बना दिया और इस तरह कुल मिला कर नाटक के अर्थशास्त्र को बदल कर रख दिया वह हमारे समाज के संदर्भ में रेडिकल ही नहीं क्रांतिकारी भी था. आपने बुर्जुआ रंगमंच और रंगकर्मियों को उनकी सही औकात बता दी थी. इसके लिए देश के नाट्यकर्मी आपके कायल हैं. खास कर हमारे जैसे देश में आपके प्रयोग और भी अहम हो जाते हैं, क्योंकि यूरोप और अमेरिका की तरह रंगमंच अब भी यहां उद्योग नहीं है. कुछ गिने-चुने लोगों को छोड़ कर रंगमंच की कमान अब भी आम लोगों के हाथों में है. वही आम लोग जो बड़े बड़े थिएटर हॉलों में किए गए नाटकों पर घास भी नहीं डालते. आज भी उनके लिए थिएटर गांव के मेलों में शहर की गलियों और चौराहों पर है. उन्हें आनेवाले दिनों में भी मुफ्त का थिएटर ही चाहिए होगा, जो उनका वाजिब हक है.

ऐसे रंगमंच के लिए आपका योगदान बहुत बड़ा है. उसे जितना भी सराहा जाए वह कम है. आपके रूप में हमें एक आगस्टो बोअल मिल गया था. असल में आपके कामों से ही हमने ऑगस्टो बोअल को जाना.तब तक आपका नाटक देखने भी लगा था और पढ़ने भी लगा था. जैसे-जैसे आपके नाटकों से परिचय होता गया आपके नाटकों को लेकर बेचैनी बढ़ने लगी. चंद सवाल उठने लगे थे. पहले तो कुछ समझ में नहीं आया लेकिन जबसे कुछ समझने लगा तो आप पर गुस्सा भी आने लगा था. आपने अपने नाटकों में कथ्य (कंटेंट) पर ज्यादा महत्व देने की बात कही थी, क्या कथ्य को महत्व देने भर से हर नाटक क्रांतिकारी हो जाता है? बल्कि वह तो इस बात पर निर्भर करता है कि आपके नाटक का कथ्य क्या है. और वैसे भी आपके नाटकों का कंटेंट क्या था बादल दा?

उलझा हुआ आम आदमी जो अपनी उलझनों में फंस कर रह जाता है, उनसे बाहर नहीं निकल पाता और निकल भी नहीं पायेगा. आपका वह आम आदमी मध्यवर्ग से लेकर दलित और आदिवासी भी था. वह कोलकाता की सड़कों से लेकर झारखंड के जंगलों तक फैला हुआ था. एक ऐसा आम आदमी जिसकी कहानी मौत, हताशा और खुदकुशी के ईर्द-गिर्द घूमती रहती है और वहीं खत्म हो जाती है (याद कीजिए कि एवम इंद्रजीत, बाकी इतिहास और पगला घोड़ा नाटक खुदकुशी के आसपास ही घूमते हैं, वहीं मिछिल, भूमा और बासी खबर पर मौत के ईर्द-गिर्द घूमते हैं). आम लोगों को लेकर आपकी इतनी निराशावादी सोच क्यों थी बादल दा? आपको लोग हमेशा अंधेरे में ही क्यों दिखते थे. आमलोगों के बारे में यह एकतरफा सोच कोई बुर्जुआ ही रख सकता है. और यह बात भी सही है कि आपने आमलोगों पर बुर्जुआ समस्याओं और उसकी मानसिकता (साइकोलॉजी) को थोप दिया था.

जो लोग आपके नाटकों को क्रांतिकारी साबित करने पर तुले हुए हैं उन्हें क्या समझ में नहीं आता कि आपके नाटक असंगति (एब्सर्डिटी), घिनौनेपन (सॉरडिडनेस) और भ्रम (कन्फ्यूजन) की बेतरतीब जोड़-तोड़ पर टिके हुए हैं (जो आप भी कुछ हद तक स्वीकार करते थे). ऐसा भ्रम जिसमें सार्थक जीवन की कल्पना तक नहीं की जा सकती. बिना सार्थक और सुंदर जीवन की कल्पना किए हुए कोई क्रांति के बारे में कैसे सोच सकता है? बेतरतीब जोड़-तोड़ भ्रम पैदा करती है, क्रांति नहीं लाती बादल दा.

हां, आपके नाटक जुलूस (मिछिल) में कुछ क्रांतिकारी-सा दिखा था, जब आम आदमी जुलूस से जुड़ता है. लेकिन उस जुलूस की विडंबना तो यह है कि आपका आम आदमी जुलूस में क्रांति के लिए नहीं जुड़ता, बल्कि उसकी खोज एक सच्चे आत्म तक सीमित कर दी जाती है. आपका जुलूस एक मरी हुई प्रतिमा जैसा है, जो न तो हमला करती है और न ही उसे किसी वर्ग शत्रु से कोई लेना देना है.

आखिर आपका जुलूस किसके खिलाफ था? उससे भी बड़ी विडंबना है- जुलूस के लिए इंतजार करना. आपका आम आदमी जुलूस के लिए इंतजार करता है, सैमुअल बेकेट के वेटिंग फॉर गोदो की तरह. मिछिल ने मुझे यह भी आभास करा दिया था कि आप एक ही साथ में बोअल और बेकेट थे. जब मैंने देखा कि आपका चरित्र खोका, राज्य की एजेंसियों द्वारा बार-बार मारे जाने के बाद उठ कर लड़ने के बजाय जीने की आशा ही छोड़ देता है तो आम लोगों को लेकर आपकी अंधेरी और गहरी निराशा साफ दिखी. उसमें एक बूढ़े का प्रकट होना और खोका से कहना कि वह सच्चे आत्म की तलाश करे- यह क्रांतिकारी कम और किसी पुरोहित का उपदेश ज्यादा लगता है. वैसे भी आपके नाटक ईसाइयों के पाप प्रायश्चित करनेवाले नाटकीय कर्मकांडों से ज्यादा प्रभावित लगते हैं. अन्याय का भुक्तभोगी उत्पीड़ित कोई पापी नहीं होता, जिसके लिए उसे अपने ऊपर प्रायश्चित करना पड़े.

आपका आम आदमी हमेशा अपने आपको कोसता हुआ मर जाता है, या पागल हो जाता है. एक हद तक जबरन मान भी लूं कि कुछ चीजों के लिए आम आदमी जिम्मेवार है, लेकिन सब कुछ उसी पर डाल देना कहां तक उचित था? कब तक आम आदमी आपके बेहूदे सवाल ‘मैं कौन हूं’ और ‘मैं क्यों हूं’ की जद्दोजहद में जीता रहेगा? जबकि उसे पता है कि वह कौन है, उसका वर्ग क्या है और उसका (वर्ग) दुश्मन कौन है. शासक वर्ग कौन है. क्या मैं जान सकता हूं आपके आम आदमी का वर्ग क्या था बादल दा? क्या आपने भोमा पर अपने खुद के वर्ग की मानसिकता (साइकोलॉजी) और विचारधारा नहीं थोप दिया था? यह कौन-सी नीतिपरकता थी?

मुझे आपके नाटक की बुनावट बहुत अच्छी लगती थी. वह काफी निजी और अपने में दर्शक को रमा लेने वाली होती थी. लेकिन मुझे निराशा तब होती है जब आपकी सारी राजनीति इस रमा लेने के आकर्षण में ही खत्म हो जाती है. क्रांति खिलवाड़ में खत्म हो जाती है. आपके यहां आकर्षण एक विमर्श बन कर रह जाता है. मुझे आज भी लगता है कि आप चाहते तो इसे एक शानदार और क्रांतिकारी दिशा में मोड़ सकते थे. लेकिन आपको जटिलता की सनक थी. आपको किसी भी क्रांतिकारी समाधान से परहेज था. आपने अपने नाटकों को इस तरह बुना कि उनसे क्रांति की हर एक गुंजाइश खत्म हो जाए. यहां पर कुछ लोग कहेंगे कि समाधान देना रंगमंच का मकसद नहीं होना चाहिए, लेकिन लोगों को भारी भ्रम और हताशा में डालना, लोगों को निराश बना कर छोड़ देना और हर क्रांतिकारी समाधान की संभानवाओं को नाटकों में से खत्म कर देना कैसी क्रांतिकारिता और नीतिपरकता है? और फिर, क्या एक क्रांतिकारी समाधान नहीं देना भी अपने आप में समाधान देना नहीं है? दुख की बात तो यह है कि आपके द्वारा दिये गये समाधान लोगों को अपने विनाश और पीड़ा की एक अनंत और अंधेरी कोठरी में बंद कर देते हैं.

बादल दा, मुझे दुख के साथ कहना पड़ रहा है कि आप अपने नाटकों में आम लोगों के लिए वही कुछ गिने-चुने ही समाधान छोड़ते थेः वह जहर खा ले, फांसी लगा ले, पागल हो जाए, या कम से कम क्रांतिकारी रास्ते से भटक ही जाए. और आदमी यह सब इसीलिए करे कि उससे आम आदमी की समस्याओं को मान्यता मिलेगी. बचपन में एक कहानी पढ़ा करता था कि कैसे अपने बारे में अखबार में छपवाने के लिए आदमी कार के नीचे आ गया था. आपके नाटक हर बार उस कहानी की याद दिला देते हैं. फांसी लगा लेना या खुदकुशी करने से राज्य आम लोगों की समस्याओं को मान्यता नहीं दे देता. और मान्यता मिल जाने से समस्या का हल नहीं हो जाता. ऐसा ही होता तो हमारे देश के किसानों की समस्याएं कब की हल हो गयी रहतीं. हो सकता है कि आप मध्यवर्ग से उन समस्याओं की मान्यता दिलवाना चाहते थे, यह जानते हुए भी कि आपका भद्रलोक मध्यवर्ग नाटक के चरित्र को मान्यता तो दे सकता है कि लेकिन वह ‘अभद्र’ आम आदमी के अस्तित्व को ही नहीं स्वीकारता. और वैसे भी आप कमोबेश 40 साल में किस वर्ग की किस समस्या को मान्यता दिलवा पाए? विषय को मान्यता दिलवाने का आपका यह तरीका हास्यास्पद ही नहीं, अनैतिहासिक भी था.

आपके नाटक के बारे में कहा जाता है कि आपके नाटक क्रांतिकारी थे, राज्य विरोधी और सत्ता विरोधी थे. जब राज्य और सत्ता विरोधी ही थे तो उनके खिलाफ आम लोगों के खड़े होने की आपने हिमायत क्यों नहीं की. कौन-सा क्रांतिकारी रंगमंच या सौंदर्यशास्त्र इसकी इजाजत नहीं देता? और फिर जो लोग सत्ता विरोधी थे, राज्य विरोधी थे, उनसे आपने अपने नाटकों में लगातार पश्चाताप क्यों करवाया है? नक्सलबाड़ी आंदोलन के दौरान या उसके पहले के इतिहास में लोगों ने ऐसी कौन-सी गलती की थी, ऐसा कौन-सा पाप किया था, जिसका पश्चाताप उनको पूरे नाटक के दौरान करना पड़ता था. अपने आपको छोटी-छोटी गलतियों के लिए कोसते रहना पड़ता था. और अगर वह पश्चाताप आत्मालोचना थी तो उसका उत्तर लोगों का संघर्ष और क्रांति क्यों नहीं थी बादल दा?

अगर आपके नाटकों का दार्शनिक विश्लेषण किया जाए जो वह दो तरह के दर्शन का नेतृत्व करता है. पहला तो अस्तित्ववाद है, जिसका कुछ लोगों ने उल्लेख किया है. लेकिन आपका अस्तित्ववाद सार्त्र और सिमोन द बोउवार का अस्तित्ववाद नहीं बल्कि सैमुएल बेकेट और नीत्शे का अस्तित्ववाद है. आपके नाटकों का दूसरा दर्शन उत्तर आधुनिकता है, जो उसी अस्तित्ववाद का विस्तार है और रिचर्ड शेसनर (Richard Schechner) से प्रभावित है. बाद में इसकी अधिक पुष्टि तब हो गयी जब पता लगा कि आपका काम उसी उत्तर आधुनिक परफॉर्मेंस स्टडीज के विद्वान रिचर्ड शेसनर से प्रभावित था.

आपने एक इंटरव्यू में कहा था कि ‘बहुत लोगों को लगता है कि मेरा नाटक ब्रेख्त से प्रभावित है, लेकिन मेरा नाटक ब्रेख्त से प्रभावित नहीं है.’ बता नहीं लोगों को आपके नाटक के बारे में ऐसा भ्रम क्यों था. शायद ऐसा उन्हीं को लगता होगा जो आपको क्रांतिकारी मानते हैं. आपका काम ब्रेख्त से दूर दूर तक प्रभावित नहीं लगता. आपका मिछिल हमेशा वेटिंग फॉर गोदो की याद दिलाता रहा और भोमा रिचर्ड शेसनर के एब्सर्ड थिएटर की. आप भारत के बेकेट थे और भारतीय रंगमंच के सभी उत्तर आधुनिकतावादियों के पितामह थे. दूर-दूर तक आप ब्रेख्त नहीं थे.

बादल दा, आपकी कुछ-कुछ निजी प्रतिबद्धताएं बहुत अच्छी लगी थीं. आपने जिस तरह पद्म विभूषण लेने से इनकार कर दिया था, आप ऐसे समय कोलकाता में रंगमंच करते रहे जब इप्टा मुंबइया सिनेमा का भर्ती दफ्तर बन गया था और बहुत सारे प्रगतिशील कलाकार व्यावसायिक उद्योग की ओर रुख कर रहे थे. कलाकार कारपोरेट के पैसे के लिए हाथ फैलाये खड़े थे, तब आपने जमीन से जुड़ाव और सादगी का परिचय देते हुए भारतीय रंगमंच का सिर ऊंचा किया. आपका सरोकार तब और भी अच्छा लगा जब बहुत सारे भद्रलोकी कलाकार ऐतिहासिक रूप से बेशर्म, पथभ्रष्ट और फासीवादी वामपंथ के साथ खड़े थे और पूरी बेशर्मी से भारतीय राज्य द्वारा शुरू किए गए ऑपरेशन ग्रीन हंट का समर्थन कर रहे थे, तब आप क्रांतिकारी गदर के साथ जुलूस में खड़े थे. आपका ऐसे कई जुलूसों में शामिल होना ही साबित करता है कि लोग जुलूस का इंतजार नहीं करते, लोग जुलूसों का नेतृत्व करते हैं. आपके जीते जी इतिहास ने आपके नाटकों को बार-बार गलत साबित कर दिया था बादल दा. क्या अपनी वह ऐतिहासिक भूल आप समझ पा रहे थे बादल दा?

इस बार फरवरी में जब मैं लंदन लौटने की तैयारियां कर रहा था, तो दिल्ली में आपका एक नाटक अंत नहीं देखा. कुछ लोग कह रहे हैं कि आपका जाना एक युग का अंत है. मैं इसे क्या समझूं बादल दा, ‘अंत नहीं’ या ‘एक युग का अंत’? देखो, इस बार कन्फ्यूज करने की कोशिश नहीं करना बादल दा. वैसे भी मैं आपके कन्फ्यूजन से बाहर आ गया हूं.

क्या अब मैं आपके जवाब का इंतजार करूं?

जेएनयू में आरसीएफ से जुड़े एक सक्रिय रंगकर्मी .लंदन विश्वविद्यालय से जन कलाओं पर शोध कर रहे हैं और इसे पूरा करने की व्यस्तता के बावजूद उन्होंने हाशिया ब्लॉग के अनुरोध पर यह लेख भेजा है. इसे वहीं से साभार प्रकाशित किया जा रहा है.