May 7, 2011

एक बार फिर मारा गया ओसामा बिन लादेन !

बुश और ओबामा के जंगी कार्यकालों ने अमेरिका का दिवाला निकाल दिया है. उसे भारी घाटे और डॉलर की पतली होती हालत का सामना करना पड़ रहा है. और फिर चुनाव भी धीरे-धीरे नजदीक आ रहे हैं...

ओसामा बिन लादेन की हत्या की खबरें अनेक सवालों पर फिर से ध्यान खींचती हैं. इनमें सबसे बड़ा सवाल तोयह है कि क्या किसी भी देश को दूसरे देश में अवैध-अनैतिक-अमानवीय फौजी कार्रवाइयों का अधिकार है. ऐस हमले के पीछे तर्क दिया जा रहा है कि लादेन, कथित तौर पर, उन हमलों के लिए जिम्मेदार था, जिनमें 3 हजार से अधिक लोगों की मौतें हुईं. इन हमलों और हमलावरों की वास्तविकताओं पर किये जानेवाले मजबूत संदेहों को छोड़ भी दें तब भी अगर बेगुनाह लोगों की हत्याओं का जिम्मेदार होना ही ऐसे हमलों के लिए वाजिब कारण है तब तो सारे हत्यारे बुशों और ओबामाओं को सैकड़ों बार गोलियों से मारना पड़ेगा.

यूनियन कार्बाइड के मुखिया और भोपाल गैस जनसंहार में मारे गये बीसियों हजार लोगों और दो दशकों में इसकी पीड़ा अब भी भुगत रहे लाखों लोगों के अपराधी वारेन एंडरसन को किसने पनाह दी है ? उसे कौन बचा रहा है? 2009 से लेकर अब तक श्रीलंका में लाखों तमिल निवासियों के कत्लेआम के दोषी राजपक्षे की मदद किसने की और अब भी उसकी पीठ पर किसका हाथ है? विदर्भ में पिछले 15 वर्षों में 2.5 लाख से अधिक किसानों की (आत्म)हत्याओं के लिए जो (निजीकरण-उदारीकरण-वैश्वीकरण की) नीतियां जिम्मेदार हैं, उन्हें किसने बनाया और उन्हें कौन लागू कर रहा है? इराक में पिछले दो दशकों में प्रतिबंधों और युद्ध में जो 14 लाख 55 हजार से अधिक लोग मारे गये हैं, उनके लिए कौन जिम्मेदार है?

पूरी दुनिया में लगातार युद्ध, प्रतिबंधों और सरकारी नीतियों के जरिए लोगों की जिंदगियों में संस्थागत हिंसा घोल रही साम्राज्यवादी नीतियां आखिर कौन लोग बनाते और थोपते हैं. अमेरिकी साम्राज्यवादी और उसके सहयोगी देश. इनके द्वारा की गयी हत्याएं 11 सितंबर को मारे गए लोगों की संख्या से सैकड़ों गुना अधिक हैं. इन्हें क्यों नहीं सजा मिलती? कब मिलेगी इन्हें सजा? फिर इन्हें क्या अधिकार है दूसरों को आतंकवादी कहने और मारने का?



इन सब सवालों के जवाब दुनिया की जनता खोज भी रही है और दे भी रही है. साम्राज्यवाद का ध्वस्त होना लाजिमी है. अपने इन हताशा में उठाये कदमों के जरिए ही वह अपने अंत के करीब भी आ रहा है. उसकी जीत का एक-एक जश्न, उसकी कामयाबी का एक-एक ऐलान उसकी कमजोरी और भावी अंत की ओर भी संकेत कर रहा है. ओसामा बिन लादेन की हत्या की खबर को भी इसी संदर्भ में देखना चाहिए. अमेरिकी अर्थशास्त्री, वाल स्ट्रीट जर्नल और बिजनेस वीक के पूर्व संपादक-स्तंभकार, अमेरिका की ट्रेजरी फॉर इकोनॉमिक पॉलिसी के सहायक सचिव पॉल क्रेग रॉबर्ट्स बता रहे हैं कि कैसे हत्या की इस खबर का सीधा संबंध विदेशी मुद्रा और व्यापार बाजार में डॉलर की पतली होती हालत और अमेरिकी अर्थव्यवस्था की डांवाडोल होती जा रही स्थिति से है. इन्फॉर्मेशन क्लियरिंग हाउस  की पोस्ट को आप खुद देखें ...रियाजुल हक़
अगर आज 2 मई के बजाय 1 अप्रैल होता तो हम ओसामा बिन लादेन के पाकिस्तान में मारे जाने और तत्काल समुद्र में बहा दिये जाने को अप्रैल फूल के दिन के मजाक के रूप में खारिज कर सकते थे. लेकिन इस घटना के निहितार्थों को समझते हुए हमे इसे इस बात के सबूत के रूप में लेना चाहिए कि अमेरिकी सरकार को अमेरिकियों की लापरवाही पर बेहद भरोसा है.

जरा सोचिए. एक आदमी जो कथित रूप से गुरदे की बीमारी से पीड़ित हो और जिसे साथ में डायबिटीज और लो ब्लड प्रेशर भी हो, और उसे डायलिसिस की जरूरत हो, उसकी एक दशक तक खुफिया पहाड़ी इलाकों में छुपे रह सकने की कितनी गुंजाईश है? अगर बिन लादेन अपने लिए जरूरी डायलिसिस के उपकरण और डाक्टरी देख-रेख जुटा लेने में कामयाब भी हो गया था तो क्या इन उपकरणों को जुटाने की कोशिशें इस बात का भंडाफोड़ नहीं कर देतीं कि वह वहां छुपा हुआ है? फिर उसे खोजने में दस साल कैसे लग गए?

बिन लादेन की मौत का जश्न मना रहे अमेरिकी मीडिया के दूसरे दावों के बारे में भी सोचें. उनका दावा है कि बिन लादेन ने अपने दसियों लाख रुपए खर्च करके सूडान, फिलीपीन्स, अफगानिस्तान में आतंकवादी प्रशिक्षण शिविर खड़े किए, ‘पवित्र लड़ाकुओं’ को उत्तरी अफ्रीका, चेचेन्या, ताजिकिस्तान और बोस्निया में कट्टरपंथी मुसलिम बलों के खिलाफ लड़ने और क्रांति भड़काने के लिए भेजा. इतने सारे कारनामे करने के लिए यह रकम तो ऊंट के मुंह में जीरे की तरह है (शायद अमेरिका को उसे पेंटागन का प्रभार सौंप देना चाहिए था), लेकिन असली सवाल है कि बिन लादेन अपनी रकम भेजने में सक्षम कैसे हुआ? कौन-सी बैंकिंग व्यवस्था उनकी मदद कर रही थी? अमेरिकी सरकार तो व्यक्तियों और पूरे के पूरे देशों की संपत्तियां जब्त करती रही है. लीबिया इसका सबसे हालिया उदाहरण है. तब बिन लादेन की संपत्ति क्यों जब्त नहीं की गयी? तो क्या वह 100 मिलियन डॉलर की अपनी रकम सोने के सिक्कों के रूप में लेकर चलता था और अपने अभियानों को पूरा करने के लिए दूतों के जरिए रकम भेजता था?

मुझे इस सुबह की सुर्खियों में एक नाटक की गंध आ रही है. यह गंध जीत के जश्न में डूबी अतिशयोक्तियों से भरी खबरों में से रिस रही है, जिनमें जश्न करते लोग झंडे लहरा रहे हैं और ‘अमेरिका-अमेरिका’ का मंत्र पढ़ रहे हैं. क्या ऐसी कोई घटना सचमुच हो रही है?

इसमें कोई संदेह नहीं है कि ओबामा को जीत की बेतहाशा जरूरत है. उन्होंने अफगानिस्तान में युद्ध को फिर से शुरू करके मूर्खतापूर्ण गलती की और अब एक दशक लंबी लड़ाई के बाद अमेरिका अगर हार नहीं रहा तो अपने आप को गतिरोध में फंसा हुआ जरूर पा रहा है. बुश और ओबामा के जंगी कार्यकालों ने अमेरिका का दिवाला निकाल दिया है. उसे भारी घाटे और डॉलर की पतली होती हालत का सामना करना पड़ रहा है. और फिर चुनाव भी धीरे-धीरे नजदीक आ रहे हैं.

पिछली अनेक सरकारों द्वारा ‘व्यापक संहार के हथियारों’ जैसे तरह-तरह के झूठों और हथकंडों का नतीजा अमेरिका और दुनिया के लिए बहुत भयानक रहा है. लेकिन सभी हथकंडे एक तरह के नहीं थे. याद रखें, अफगानिस्तान पर हमले की अकेली वजह बतायी गयी थी- बिन लादेन को पकड़ना. अब ओबामा ने ऐलान किया है कि बिन लादेन अमेरिकी विशेष बलों द्वारा एक आजाद देश में की गयी एक कार्रवाई में मारा गया है और उसे समुद्र में दफना दिया गया है, तो अब युद्ध को जारी रखने की कोई वजह नहीं रह गयी है.

शायद दुनिया के विदेश विनिमय बाजार में अमेरिकी डॉलर में भारी गिरावट ने कुछ वास्तविक बजट कटौतियों के लिए मजबूर किया है. यह सिर्फ तभी मुमकिन है जब अंतहीन युद्धों को रोका जाए. ऐसे में जानकारों की राय में बहुत पहले मर चुके ओसामा बिन लादेन को डॉलर के पूरी तरह धूल में लोट जाने से पहले एक उपयोगी हौवे के रूप में अमेरिकी फौजी और सुरक्षा गठजोड़ के मुनाफे के लिए इस्तेमाल किया गया.
(हाशिया ब्लॉग से साभार)



 

गाँव में थाना ना बनाओ !

देश के बाकि हिस्सों में जहाँ सुरक्षा के लिए पुलिस की कमी की  बात होती है, वहीँ एक ऐसा गाँव भी है जहाँ लोग थाना स्थापित होने से अपनी जमीन और इज्जत खोने की आशंका जता रहे हैं...

हिमांशु कुमार

मैं  कुछ दिनों पहले आदिवासी ग्रामीण महिलाओं से मिला था.  उन्होंने मुझे बताया कि  वह छत्तीसगढ़ के जशपुर जिले के एक आदिवासी गाँव से हैं . वे मुझे बता रही थीं  कि उनके गाँव में सरकार बिना गाँववालों से चर्चा किये जबरन एक पुलिस थाना खोल रही है. वे कह रही थीं कि हम आदिवासी लोग गाँव के झगड़े  गाँव में ही सुलझा लेते हैं. यही आदिवासियों की परम्परागत सामाजिक न्याय पद्धति है.

वे महिलाएं डरी हुई थीं कि पुलिस गाँव में रहेगी और उनके  परिवारों के मर्द पर्व-त्यौहार में पीकर आपस में लडाई-झगड़ा  कर लेंगे तो तुरंत पुलिस उन्हें पकड़कर ले जायेगी और उनको छोड़ने के लिए उनके परिवार से पैसा मांगेगी. इन महिलाओं को ये भी डर था कि ये पुलिस वाले गाँव की महिलाओं की इज्ज़त पर हमला करेंगे और इसका विरोध करने वाले गाँव के नौजवानों को नक्सली कहकर जेलों में डाल देंगे.

महिलाएं बता रहीं थी कि गाँव वालों ने छत्तीसगढ़ सरकार के ग्राम स्वराज्य अभियान के दौरान उनके गाँव में आये  सरकारी दल को ग्रामसभा की इन आपत्तियों के बारे में बताया और एक लिखित प्रार्थनापत्र भी मुख्यमंत्री के नाम पर इन सरकारी अफसरों को सौंपा था. वे महिलाएं मुझसे सीजी नेट स्वर का फोन नंबर पूछ रही थीं. बाद में मैंने उनका सन्देश सीजी नेट स्वर पर सुना भी था.

लेकिन इसका परिणाम क्या हुआ? आज शाम को मेरे पास उन्हीं महिलाओं का फोन आया कि गाँव में पुलिस आयी हुई है और थाना खुलने का विरोध करने वालों के नाम-पते पूछ रही है.वे इस मामले में मुझसे मदद चाहती थीं.  तभी से बैचैन हूँ, क्योंकि  मैं जानता हूँ  कि इनकी कोई मदद नहीं कर पाऊंगा. मुझे पता है कि अपने संवैधानिक अधिकार की मांग करने की जुर्रत करने की सज़ा के तौर पर इस गाँव के कुछ लोगों को फर्जी केस बनाकर जेल में डाल दिया जायेगा . बाकी गाँव वाले डर कर विरोध करना बन्द कर देंगे  और वहां एक नया थाना गाँव की छाती पर खुल जाएगा.

लेकिन सवाल है कि  सरकार ये सब कर क्यों रही है? असल में उस इलाके में बड़े पैमाने पर सरकार आदिवासियों से ज़मीन छीनकर जिंदल साहब (जिंदल स्टील ग्रुप) को देना चाहती है, ताकि वो वहां अपना कारखाना लगा लें. आदिवासी इस ज़मीन की लूट का विरोध कर रहे हैं. इस विरोध को कुचलने के लिए सरकार उस इलाके में ज्यादा से ज्यादा पुलिस भेज रही है . तो मेरा आप सबसे सवाल है कि  क्या हम इन आदिवासियों को बचा सकते हैं?
 
 
 
दंतेवाडा स्थित वनवासी चेतना आश्रम के प्रमुख और सामाजिक कार्यकर्त्ता हिमांशु कुमार का संघर्ष बदलाव और सुधार की गुंजाइश चाहने वालों के लिए एक मिसाल है.


May 6, 2011

मायावती ने अबकी हाथी पर टांगा कानून

अब माया राज में हकों के लिए होने वाले संघर्षों के दौरान जो क्षति होगी उसकी भरपाई राजनीतिक दलों के जिला, प्रदेश व राष्ट्रीय अध्यक्षों से होगी और सामाजिक संगठनों के पदाधिकारी करेंगे...

डॉ. आशीष वशिष्ठ

उत्तर प्रदेश की मालकिन (मुख्यमंत्री) मायावती ने विरोध के स्वर को दबाने के लिए कानून के बहाने तुरूप का पत्ता चल दिया है। 'सर्वजन हिताय' की माला जपने वाली मायावती ने अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के रास्ते में एक बड़ा रोड़ा इस आदेश के साथ अटका दिया है कि धरना-प्रदर्शन, रैली, जुलूस या सभा करने के लिए प्रशासन से विस्तृत अनुमति लेनी होगी।

प्रदेश में धरना-प्रदर्शन के लिये बने इस नये कानून से पहले तक एक साधारण अर्जी पर प्रशासन अनुमति दे दिया करता था। ज्यादातर मामलों में डीएम ऐसे कार्यक्रमों की अनुमति अपने स्तर से देते थे। कोई बड़ा कार्यक्रम होने की सूरत में डीएम स्थानीय अभिसूचना इकाई (एलआईयू) से रिपोर्ट लेकर फैसला करते थे, लेकिन नये नियमों के तहत धरना-प्रदर्शन या आंदोलन के लंबा-चौड़ा फार्म भरने से लेकर कई विभागों से एनओसी प्राप्त करने का प्रावधान है।

नये कानून के अनुसार उत्तर प्रदेश में धरना-प्रदर्शन, जुलूस, रैली आदि के आयोजन के लिए आयोजकों को अब कम से कम सात दिन पहले प्रशासनिक अधिकारियों को लिखित आवेदन देकर इसकी अनुमति हासिल करनी होगी। जिला प्रशासन ऐसे आयोजनों की वीडियोग्राफी भी करायेगा। ऐसे आयोजनों के दौरान सार्वजनिक अथवा निजी संपत्ति की क्षति होने पर आयोजक से क्षतिपूर्ति की वसूली करने के साथ उसके खिलाफ कानूनी कार्यवाही भी की जाएगी। राजनीतिक दलों के आयोजनों में निजी संपत्ति की क्षति होने पर उसकी वसूली दल के जिला, प्रदेश और राष्ट्रीय अध्यक्ष से होगी।

सामाजिक,धार्मिक तथा अन्य आयोजनों की जिम्मेदारी संस्था के मुख्य पदाधिकारी की होगी। भुगतान न करने की दशा में क्षतिपूर्ति की राशि भू-राजस्व के बकाये की भांति की जायेगी। सरकार का पक्ष है कि धरना-प्रदर्शन, रैली, जुलूस आदि को लेकर कई बार अराजक स्थिति उत्पन्न हो जाती है। इस संबंध में सुप्रीम कोर्ट ने सार्वजनिक एवं निजी संपत्तियों को क्षति बनाम आंध्र प्रदेश सरकार एवं अन्य रिट याचिका की सुनवाई करते हुए 16 अप्रैल 2009 को पारित अपने आदेश में व्यापक दिशा-निर्देश दिये थे। सुप्रीम कोर्ट द्वारा पारित आदेश में व्यक्त की गईं अवधारणाओं के क्रम में राज्य सरकार ने 27अप्रैल 2011को दिशा-निर्देश जारी करते हुए इनका कड़ाई से अनुपालन सुनिश्चित कराने का निर्देश दिया है। अनुपालन न कराने पर अफसरों के खिलाफ कठोर कार्यवाही होगी।

शासनादेश के मुताबिक ऐसे आयोजनों में सभी प्रकार के अस्त्र-शस्त्र प्रतिबंधित रहेंगे। जिला मजिस्ट्रेट जिले में ऐसे धरना-प्रदर्शन स्थलों को निर्धारित करके उनका व्यापक प्रचार-प्रसार करायेंगे, ताकि जनता को इसकी जानकारी हो सके। तहसील स्तरीय धरना-प्रदर्शन की अनुमति उप जिला मजिस्ट्रेट और अपर जिला मजिस्ट्रेट देंगे। जिला मुख्यालय स्तरीय धरना-प्रदर्शनों की अनुमति जिला मजिस्ट्रेट, अपर जिला मजिस्ट्रेट, सिटी मजिस्ट्रेट, उप जिला मजिस्ट्रेट द्वारा जारी की जाएगी। इन आयोजनों के बारे में संबंधित थाने, स्थानीय अभिसूचना इकाई और अन्य विभागों से रिपोर्ट हासिल कर निर्धारित प्रारूप पर अनुमति दी जाएगी।

इसके अलावा धरना-प्रदर्शन, हड़ताल या जुलूस का आयोजन करने वाले पुलिस और प्रशासन से विचार-विमर्श करने के बाद ऐसे आयोजन का स्थल, मार्ग, समय, पार्किंग और अन्य शर्तें तय करेंगे। सड़क या रेलमार्ग से आने वाली जनता के आवागमन के लिए संबंधित विभाग द्वारा समय से संपर्क कर सुचारु व्यवस्था सुनिश्चित करायी जाएगी। आयोजक यह भी अंडरटेकिंग देंगे कि उनकी हड़ताल या धरना-प्रदर्शन शांतिपूर्ण होंगे।

माया सरकार के इस तुगलकी फरमान ने इमरजेंसी के दिनों की याद ताजा कर दी है। वहीं सरकार का यह कदम देश के आम आदमी को संविधान प्रदत्त स्वतंत्रता के अधिकार का भी हनन करता है। विरोधी दलों ने सरकार के नादिरशाही फरमान की घोर निंदा की है, लेकिन हमेशा की तरह माया की कान पर जूं तक नहीं रेंगी। असल में मायावती भलीभांति ये जानती है कि उनके मंत्रियों और चमचों की कुकृत्यों के कारण उनकी सरकार की छवि को गहरी धक्का लगा है। सरकार डैमेज कंट्रोल की कार्रवाई तो कर रही है,लेकिन जो बदनामी होनी थी वो तो हो चुकी। ऐसे में आगामी निकाय चुनावों से लेकर विधानसभा चुनावों में भ्रष्टाचार विपक्षी दलों के लिए माया के विरूद्व सबसे बड़ा हथियार होगा। ऐसे में विपक्षी दल मायावती सरकार की काली तस्वीर प्रदेश की जनता के सामने रखेंगे तो चुनावों में तस्वीर बदल भी सकती है।

बसपा सरकार के विधायकों और मंत्रियों के कारनामे प्रदेश के आम आदमी से छिपे नहीं हैं। ऐसे में विरोधी दलों के लगातार तीखे तेवरों, धरने-प्रदर्शनों और आंदोलनों से घबराई माया सरकार ने चिर-परिचित अंदाज में अपने विरोधियों और आम आदमी के स्वर को दबाने के लिए कानून की आड़ ली है। सरकार और उसका  पालतू सरकारी अमला इस कानून को लागू करने के पीछे सर्वोच्च और उच्च न्यायालय के आदेशों की दुहाई दे, लेकिन मायावती सरकार और उनके चमचे न्यायालयों की आदेशों के पालन में कितने गंभीर हैं, ये बताने की जरूरत नहीं है।


कानपुर : प्रदेश पुलिस  प्रदर्शनकारियों से ऐसे निपटती है
 पिछले चार वर्षों में कई मौकों पर माया सरकार ने न्यायालय के आदेशों  की अवेहलना और अवमानना की है। जाट आरक्षण आंदोलन के तहत न्यायालय के आदेश के उपरांत भी प्रदर्शनकारियों को रेलवे  ट्रैक से न हटाने की जो हिमाकत माया सरकार ने की थी, वो सरकार की नीति और नीयत को भली-भांति दर्शाता है।

सत्ता के मद में चूर मायावती के लिए आम आदमी के दुःख-दर्द और समस्याएं शायद कोई मायने नहीं रखती हैं। अंदर ही अंदर माया सरकार के प्रति जनता के मन में गुस्सा भर चुका है और स्वयं माया भी इस बात से अंजान नहीं है। मार्च महीने में प्रदेश के समस्त जिलों के दौरे पर निकली सीएम मायावती को कई स्थानों पर जनता के गुस्से का शिकार होना पड़ा था, उस वक्त भी सरकार ने सुरक्षा का बहाना बनाकर मुख्यमंत्री के दौरे के दौरान नागरिकों को घरों में बंधक बनाकर जनता के गुस्से से बचने की कोशिश की थी। पिछले कुछ समय में माया सरकार के विरूद्व राजनीतिक, सामाजिक, व्यापारिक, शिक्षकों या फिर वकीलों का स्वर उभरा, तो उसे दबाने के लिए सरकारी मशीनरी ने मानवाधिकार के हनन में से भी कोई परहेज नहीं किया।

दरअसल,  2007में बहुमत मिलने के बाद से ही मायावती ने आम आदमी से दूरी बनाई हुई है। अगर बसपा सरकार के कामों का पिछले चार सालों का रिर्काड खंगाला  जाए तो पार्टी की दो-चार बड़ी रैलियों और जनसभाओं के अलावा सूबे के आमजन से संपर्क करने की कोई कोशिश मायावती ने नहीं की है। सत्ता के नशे में चूर मायावती को लगता है कि उनका सिंहासन हिलाने की ताकत किसी में नहीं है। शुरू से अपनी दबंग छवि और कारनामों के लिए मशहूर रही मायावती को कानून तोड़ने और उसे मनमाफिक बनाने में मजा आता है। धरना-प्रदर्शन  का कानून बनाने से पहले माया सरकार राज्य अतिथि नियमावली में भी फेरबदल कर चुकी है, ताकि केन्द्रीय मंत्रियों को उनकी औकात बताई जा सके।

किसी जमाने में प्रदेश में मुख्यमंत्री जनता दरबार के माध्यम से प्रदेश की जनता से रू-ब-रू होते थे, लेकिन माया सरकार में जनता दरबार की ये व्यवस्था लागू नहीं है। सरकार के अदने से अधिकारी से मिलने के लिए आपको सैंकड़ों पापड़ बेलने पड़ते हैं ऐसे में सीएम से मिलना तो बडे़-बड़ों की औकात से बाहर है। चुनावी बेला सिर पर है और ऐसे में माया हर कदम फूंक-फूंककर रख रही हैं, क्योंकि वो जानती हैंकि उनका एक भी गलत कदम उन्हें सत्ता से दूर कर सकता है और विपक्षी भी उनकी सरकार को पटकनी देने के लिए किसी भी स्तर तक जा सकते हैं।

माया को भलीभांति मालूम है कि  उनके खाते में स्मारक, पार्क, मूर्तियां लगाने के अलावा कोई और बड़ी उपलब्धि शामिल नहीं है। ऐसे में माया सरकार प्रदेश के आम आदमी की आवाज दबाने की जो गलती कर रही है उसका खामियाजा उन्हें  भुगतना ही होगा।



स्वतंत्र पत्रकार और उत्तर प्रदेश के राजनीतिक- सामाजिक मसलों के लेखक .






संशोधनवादियों को जनयुद्ध का ब्याज मत खाने दो !

संक्रमणकाल के नाम पर भ्रष्टाचार, कालाबाजारी, तस्करी, कमीशन तंत्र और हत्या-हिंसा का साम्राज्य पहले से कई गुना बढ़ा है.पिछले तीन वर्षों की अवधि में संविधान सभा लुटेरों और विदेशी दलालों की क्रीडास्थली बन चुकी है.संविधान सभा में क्रांतिकारियों की उपस्थिति के अभाव में जन संविधान बनाने की जगह संशोधनवादी,यथास्थितिवादी और प्रतिक्रियावादी संविधान बनाने का खेल जारी है... 



मात्रिका यादव, पूर्व केन्द्रीय मंत्री 

नेपाली  राजतंत्र हटाने के नाम पर एमाओवादी पार्टी की जनयुद्ध ख़त्म करने की रणनीति और  देशी-विदेशी प्रतिक्रियावादियों के समक्ष आत्मसमर्पण की संशोधनवादी यात्रा शुरू करने का जो परिणाम होना था, वह अब हो चूका  है. अब  क्रांतिकारी कार्यकर्ताओं और परिवर्तन चाहने वाली जनता को इस क्रांतिविरोधी अभियान में साथ लेकर संसदीय यात्रा करना ही नेतृत्व मंडली का प्रमुख उद्देश्य हो  गया है, इसीलिए अमूर्त विद्रोह का बहाना लिए सभी को कन्फ्यूज करते हुए धोखा देने का काम जारी है.

दरअसल एमाओवादी के नेतृत्व ने चुनबांग बैठक से ही संसदीय रास्ते को प्रमुख रास्ता बना लिया और अपने भीतर के क्रांतिकारियों को दिग्भ्रमित करते हुए सभी प्रकार के संघर्ष के रूपों को स्वीकार करने के नाम पर सर्वग्राह्य्वादी  नारा दिया. संघर्ष के सभी रूप कभी भी एक समान नहीं हो सकते. संघर्ष के प्रधान और सहायक पहलू को निश्चित करना बहुत जरुरी होता है.लेकिन एमाओवादी के अध्यक्ष प्रचंड - सरकार, सदन और सड़क के संघर्ष की बात करके सभी को दिग्भ्रमित करते रहे हैं.सरकार के लिए संघर्ष करना ही उनका रणनीतिक उद्देश्य है.वो शांति और संविधान के नारों द्वारा बाबूराम को और विद्रोह के नारे द्वारा कामरेड किरण को दिग्भ्रमित करते रहे हैं. सिर्फ इसलिए कि उनके पास आवश्यकतानुसार इन नारों का  प्रयोग करने की कलात्मक क्षमता की भरमार है.

उदाहरण के तौर पर प्रचंड एक तरफ  भारतीय विस्तारवादी शासक वर्ग का खूब बिरोध करते हैं और दूसरी तरफ  आत्मसमर्पण करने को लालायित दिख रहे हैं.एक तरफ विरोध के लिए वो कामरेड किरण को और दूसरी तरफ आत्मसमर्पण के लिए बाबूरामजी का उपयोग करते आये हैं, जिसे दोनों नेताओं ने बखूबी समझा है. दोनों अपनी-अपनी चारित्रिक विशेषता के अनुसार प्रयोग होते आये हैं.ऐसे में साफ़ है कि एमाओवादी के अन्दर अंतरसंघर्ष होने के बावजूद उसकी दिशा क्रांतिविहीन है.  पुष्पकमलजी (प्रचंड) की एकमात्र दिशा है बुर्जुआ गणतांत्रिक संसदीय दिशा,जिस दिशा में पार्टी निरंतर आगे बढ़ रही है.उसके भीतर पुष्पकमलजी और बाबूरामजी की लाइन एक होने के बावजूद भी उनके बीच व्यक्तित्व की टक्कर है. ये दोनों नेता अति महत्वाकांक्षी व्यक्तिवादी प्रकृति के हैं. वहीं   कामरेड किरण का विश्लेषण क्रांतिकारी तो है,लेकिन खतरा मोल न लेने की अरुचि के कारण वे गोलचक्करवादी हैं.

अवसरवादी पार्टियों के साथ एकता करना, लड़ाकू पार्टी को मास पार्टी में तब्दील कर देना,पार्टी को भ्रष्ट बनाना और उसका अपराधीकरण और व्यापारीकरण कर देना अर्थात पूरी पार्टी को चुनावी पार्टी में तब्दील कर देना ही पुष्पकमल दहल उर्फ़ प्रचंड  और बाबूराम का एकमात्र उद्देश्य है.जबकि कामरेड किरण गोलचक्करवादी प्रवृति के कारण पार्टी को वर्तमान अवस्था में लाने के लिए सहयोगी की भूमिका के साथ जिम्मेदार हैं या दूसरे शब्दों में कहें तो अनुशासन लागू करने के नाम पर निरीह बन गए हैं. 'देखो और प्रतीक्षा करो' के नाम पर क्रांति का रथ बर्बाद होते जाने की स्थिति पर भी मूकदर्शक बने रहना क्रांतिकारिता नहीं है.क्रांतिकारियों के लिए सभी चीज़ें क्रांति होती हैं. रिश्तेदारी और सामाजिक सम्बन्ध भी क्रांति के लिए होते हैं और आवश्यकता पड़ने पर क्रांति के हित के लिए सम्बन्ध-विच्छेद भी किये जाते हैं.भ्रम की अवस्था क्रांति के लिए कभी हितकर नहीं होती. क्रांतिकारियों द्वारा परिस्थितियों का क्रांतिकारी विश्लेषण किया जाना ही पर्याप्त नहीं होता, वरन उसका संश्लेषण भी क्रांतिकारी होना चाहिए.

कभी-कभार शक्ति संचय करने के उद्देश्य से शांतिपूर्ण संक्रमण की बात करना उचित होता है, लेकिन अनावश्यक शांतिपूर्ण संक्रमण के नाम पर जनसंघर्ष से प्राप्त शक्ति को नष्ट कर देना अनुचित है. एक बार जनता द्वारा हथियार उठा लेने के बाद उसे किसी बहाने हथियारविहीन कर देना ही तो संशोधनवाद है. इसलिए यह क्रांति की नहीं, वरन प्रतिक्रांति की सेवा करता है. शक्ति संचय के लिए किसी ख़ास अवस्था में संसदीय संघर्ष का प्रयोग किया जा सकता है और वह भी एक सूरत में, जबकि संघर्ष से प्राप्त उपलब्धि की रक्षा और विकास हो पाना संभव हो पाए. संघर्ष से प्राप्त उपलब्धि का बलिदान कर संसदीय पार्टी का निर्माण करने को क्रांति की संज्ञा देना ही तो संसदवाद है.

क्रांति का मुख्य प्रश्न सत्ता का ही होता है.पुरानी प्रतिक्रियावादी राज्यसत्ता को पूर्णरूप से ध्वस्त करके नयी राज्यसत्ता अर्थात उत्पीडित वर्ग और समुदाय की सत्ता स्थापित करना ही क्रांति का एकमात्र उद्देश्य होता है. एमाओवादी का नेतृत्व कब का प्रतिक्रियावादी राज्यसत्ता को ध्वस्त कर नयी जनवादी राज्यसत्ता स्थापित करने की लाइन को ही तिलांजलि दे चुका है और संसदीय गणतंत्र को स्थापित करने के चक्कर में लगा हुआ है. क्रांति अब उनके लिए मुख्य प्रश्न नहीं रहा, बल्कि नए रंगरोगन के साथ प्रतिक्रियावादी व्यवस्था को संविधान सभा द्वारा वैधानिकता प्रदान करते हुए देशी-विदेशी प्रतिक्रियावादी की सेवा करना ही उनका अभीष्ट बन गया है.

यह तथ्य समझने के बावजूद भी एमाओवादी में मौजूद क्रांतिकारी हिस्सा दिग्भ्रमित होकर वहीँ बैठा है. इसलिए इन भ्रमों के कारणों का भंडाफोड़ करना जरूरी हो गया है. इस सम्बन्ध में पहला कारण यह है कि एमाओवादी नेतृत्व आज भी कथनी में वर्ग संघर्ष,बल प्रयोग के सिद्धांत और सर्वहारा अधिनायकत्व के सिद्धांत को स्वीकार करता है, मगर व्यवहार में वर्ग समन्वय, शांतिपूर्ण संक्रमण तथा बुर्जुआ वर्ग के अधिनायकत्व को आत्मसात कर चुका है. दूसरा कारण यह है कि एमाओवादी नेतृत्व मात्र भाषणबाजी या लेखन के आधार पर स्थापित नेतृत्व नहीं है, बल्कि विगत में सभी तरह के अवसरवादियों के साथ संघर्ष के फलस्वरूप निर्णायक सम्बन्ध-विच्छेद करने के कारण क्रांतिकारियों में भ्रम बने रहना स्वाभाविक है.तीसरा कारण यह है कि चुनाव में भाग लेते हुए जनयुद्ध के तैयारी करते हुए और दो-दो बार शांति वार्ता में जाने के बावजूद भी पार्टी का फिर से जनयुद्ध की दिशा में फिर लौट आने की संभावना रखना भी एक बड़ी वजह है. चौथा कारण पार्टी के वरिष्ट नेताओं द्वारा आवश्यकता पड़ने पर भी साहस और क्षमता न होने के कारण पुष्पकमलजी पार्टी के निर्विकल्प नेतृत्व के रूप में स्थापित हैं. पाचंवा कारण, पुष्पकमलजी के अवसरवादी हो जाने पर भी उनके गुरु के रूप में स्थापित किरण या अन्य किसी और नेता में पुष्पकमल जी का विकल्प बनने का साहस करते हुए पार्टी से विद्रोह करके बाहर निकल न पाना भी है.और अभी तक ऐमाओवादी के भीतर मौजूद क्रांतिकारियों और हमारी पार्टी नेकपा (माओवादी)  द्वारा जिस किस्म का वैचारिक संघर्ष चलाया जाना चाहिए, वह न चलाये जाने के कारण प्रचंड  के बारे में भ्रम बने रहना स्वाभाविक रहा है.

इस सन्दर्भ में पहली बात यह है कि पुष्पकमलजी ने पार्टी में नए प्रकार की संशोधनवादी लाइन की स्थापना कर दी है. वो मालेमावाद के प्रति जुबानी भक्ति तो दिखाते रहे हैं, मगर व्यवहार में संसदीय बुर्जुआ व्यवस्था को आत्मसात कर लिया है इसलिए मालेमावाद के आधार पर इस तथ्य का व्यापक स्तर पर भंडाफोड़ करना जरूरी है.दूसरी बात यह है कि क्रांतिकारी कौन है और कौन नहीं? इसके लिए व्यवहार ही एकमात्र कसौटी हो सकता है.इतिहास का ब्याज किसी को भी खाने देना उचित नहीं हो सकता.इतिहास में एक समय के महान क्रांतिकारियों के बाद में प्रतिक्रांतिकारी में परिणत हो जाने के तथ्य भी हैं, इसलिए पुष्पकमलजी का भंडाफोड़ करना जरूरी हो जाता है. तीसरी बात यह है कि माओवादी संसद में भाग लेते हुए भी जनयुद्ध की तैयारी कर रहे थे एवं जनयुद्ध की अवधि में एक तरफ शांतिवार्ता करते हुए भी शक्ति विस्तार कर शक्ति संचयित करते थे,लेकिन आज की स्थितियों में तो जनयुद्ध की उपलब्धियों को ही ध्वस्त कर दिया गया है.चौथी बात यह है कि मालेमावाद के अनुसार नेता का अर्थ सर्वहारा वर्ग के अन्दर उपस्थित उच्च चेतना से लैस एक सचेत व्यक्ति होता है और नेतृत्व का मतलब समान कमेटियों अर्थात समान समझदारी से लैस व्यक्तियों का समूह होता है.

दुनिया में किसी भी नेता का विकल्प होता है और होना भी चाहिए.अन्यथा क्रांति को निरंतरता नहीं दी जा सकती. नेता के गलत रास्ते में चले जाने पर उसका विकल्प खोजा जाना चाहिए और नेता के अच्छा होने पर भी.लेकिन भौतिक रूप से अक्षम होने पर उसके उत्तराधिकारी को आगे बढ़ाना अनिवार्य है.बिगत में हमने नेता को नेतृत्व के रूप में समझा है.यह समझदारी हमें कम्युनिस्ट आन्दोलन में विरासत के रूप में मिली है. गलत नेता का विकल्प तो होना ही चाहिए, सही नेता के उत्तराधिकारी को भी आगे आना चाहिए. नेता और नेतृत्व के सवाल पर हम अधिभूतवादी थे. ''एक'' का ''दो''में विभाजन के क्रांतिकारी द्वंदवाद के सिद्धांत को हमने लागू नहीं किया था,अतः पुष्पकमलजी के संशोधनवादी रास्ते में चले जाने पर उनका विकल्प आन्दोलन में ही खोजना अनिवार्य हो गया है. निश्चित रूप से आज नेता स्थापित न होने पर भी उसे आन्दोलन ही स्थापित करेगा.

रही बात स्थापित करने की तो एक ही बार में कोई भी स्थापित नहीं हो सकता.बिगत में पुष्पकमलजी भी स्थापित नहीं थे. उन्हें आन्दोलन ने ही स्थापित किया है. पाचंवी बात यह है कि यदि कामरेड किरण पुष्पकमलजी के गुरु हो सकते हैं तो वो क्रांति का नेतृत्व करने वाले साहसी नेता क्यों नहीं हो सकते. फिर एक नेता मात्र ही तो क्रांति संपन्न नहीं करता. पुष्पकमलजी ने बहुत सारे काम करने के बावजूद भी फ़िल्मी हीरो की तरह से सभी काम तो संपन्न नहीं किये हैं.क्रांति जनसमुदाय की सक्रिय सहभागिता में ही मात्र संभव होती है. कोई भी क्रांति सैकड़ों नेताओं, हजारों कार्यकर्ताओं और लाखों आम लोगों की सहभागिता के बगैर बिलकुल सफल नहीं हो सकती.इसी कारण से सभी का विकल्प होता है.इतिहास में व्यक्ति विशेष की भूमिका महत्वपूर्ण तो होती है, लेकिन उसमें भी समूह की भूमिका सबसे ज्यादा महत्वपूर्ण होती है.इसलिए सभी क्रांतिकारियों के पास अवसरवादी नेतृत्व के साथ निर्णायक सम्बन्ध-विच्छेद कर एकताबद्ध होते हुए मैदान में उतरने के अलावा कोई विकल्प ही नहीं है.

अंत में,बाहरी आई चर्चा के अनुसार ऐमाओवादी नेतृत्व का भारतीय शासक वर्ग के साथ मौजूदा मतभेद किसी न किसी रूप में समाप्त होने की दिशा में आगे बढ़ रहे हैं,इसीलिए तो इस बार की पोलित ब्यूरो बैठक से ही पुष्पकमलजी कामरेड किरण को संकीर्णतावादी और बाबूराम को विलक्षण प्रतिभा वाले यथार्थवादी होने की संज्ञा देने लगे हैं. वो कथित विद्रोह का शब्द स्पष्ट रूप में छोड़कर कथित शांति और संविधान की बात मूलमंत्र के रूप में जपने लगे हैं. ऐमाओवादी की इस बैठक का प्रमुख उद्देश्य राष्ट्रीयता,जनतंत्र,जन्जिविका अर्थात शहीदों के सपने,जनभावना और जनयुद्ध की प्रतिबद्धता के खिलाफ धोखा करते हुए एक बड़ी छलांग लगानी है. बाबूराम की फौज करतल द्व्हानी के साथ इसका समर्थन करेगी और कामरेड किरण के समर्थक निराश हो 'नोट ऑफ़ डीसेंट' लिखेंगे. देश के गद्दार, लुटेरे और जनजीविका विरोधी ताकतें ऐमाओवादी नेतृत्व की क्रांति विरोधी लाइन का यह कहकर स्वागत करेंगे कि अब ऐमाओवादी सही रास्ते पर आये हैं/ सही रास्ते पर हैं. ऐमाओवादी नेतृत्व में मौजूद गद्दार,लुटेरे और विदेशी दलालों का सयुंक्त मोर्चा सार्वभौम नेपाली जनता का उपहास करते हुए संविधान सभा की अवधि बढ़ाना चाहता है.

संक्रमणकाल के नाम पर भ्रष्टाचार, कालाबाजारी, तस्करी, कमीशन तंत्र और हत्या-हिंसा का साम्राज्य पहले से कई गुना बढ़ा है. इन तीन सालों की अवधि में संविधान सभा लुटेरों और विदेशी दलालों की क्रीडास्थली बन चुकी है. संविधान सभा में क्रांतिकारियों की उपस्थिति के अभाव में जन संविधान बनाने की जगह संशोधनवादी, यथास्थितिवादी और प्रतिक्रियावादी संविधान बनाने का खेल जारी है. जिसे सशक्त आन्दोलन द्वारा प्रतिक्रियावादी सत्ता को ध्वस्त कर एक सयुंक्त क्रांतिकारी सरकार के नेतृत्व में एक जनसंविधान बन सकता है. इसीलिए ऐमाओवादी के सच्चे क्रांतिकारियों को एक बैठक से दूसरी बैठकों के गोल चक्करवादी घेरे को तोड़कर अवसरवादियों से पूर्णरूप का सम्बन्ध विच्छेद कर विद्रोह का झंडा बुलंद कर आन्दोलन की दिशा में आगे बढ़ने का कोई विकल्प नहीं है.

(नेपाल के वरिष्ठ  माओवादी नेता और पूर्व केन्द्रीय मंत्री का  यह लेख एनेकपा माओवादी की 23 अप्रैल 2011की बहुचर्चित पोलित ब्यूरो बैठक के दो दिन पहले नेपाल के 'नया पत्रिका' में छपा था. मात्रिका  यादव पहले इसी पार्टी में थे पर अब वे नेकपा (माओवादी) के संयोजक हैं.नेपाली से इस लेख का  हिंदी अनुवाद पवन पटेल ने किया है.)


  • नेपाल के राजनीतिक हालात और नेपाली माओवादी पार्टी की भूमिका को लेकर आयोजित इस बहस में अबतक आपने पढ़ा -


May 5, 2011

बोये पेड़ बबूल का तो आम कहां से होए

बिन लादेन  का मारा जाना जहां वैश्विक आतंकवाद के खातमे की दिशा में एक मील का पत्थर साबित हुआ है, वहीं उसकी  पाकिस्तान में बरामदगी ने और  इसके बाद अमेरिकी सेना का पाकिस्तान को विश्वास में लिए बिना उसे मार गिराने की घटना ने कई पेचीदा सवाल खड़े कर दिए हैं...

तनवीर जाफरी

अमेरिकी सैनिकों द्वारा चलाए गए ‘आप्रेशन जेरोनियो’ नामक एक कमांडो आप्रेशन में गत् 2 मई की रात को दुनिया का सबसे बड़ा खूंखार आतंकवादी तथा अलक़ायदा संस्थापक एवं प्रमुख ओसामा बिन लाडेन पाकिस्तान की राजधानी इस्लामाबाद से सटे हुए कस्बे एबटाबाद में मारा गया। हो सकता है कि अमेरिका के विरूद्ध लाडेन द्वारा स्वघोषित जेहाद के अंतर्गत हुई इस अति आधुनिक कमांडो कार्रवाई ने लाडेन को उसकी मनचाही मंजि़ल अर्थात् ‘जन्नत ‘तक संभवत: पहुंचा ही दिया हो। हालांकि लाडेन की तलाश गत् एक दशक से अफग़ानिस्तान तथा पाक-अफगान सीमावर्ती क्षेत्रों में की जा रही थी ।
ओसामा बिन लादेन की हवेली को देखते पाकिस्तानी बच्चे

परंतु इस बात का भरपूर संदेह भी जताया जा रहा था कि अपने बिगड़ते स्वास्थय के चलते, हो न हो ओसामा बिन लाडेन किसी न किसी सुरक्षित स्थान पर छुपा हुआ है जहां उसे झाडिय़ों, गुफाओं व पहाडिय़ों की तकलीफ से दूर रखकर उसके इलाज व सुख-सुविधाओं का भी प्रबंध किया गया है। और लाडेन की मौजूदगी को लेकर चलने वाली दुनिया के संदेह की सुई बार-बार सिर्फ पकिस्तान पर ही जा टिकती थी। कुछ समय पूर्व यह खबर भी आई थी कि लाडेन का क्वेटा के सैन्य अस्पताल में इलाज कराया गया है। यह खबर तो बार-बार आ ही रही थी कि वह अस्वस्थ है उसका गुर्दा खराब है तथा वह डायलिसिस पर रखे जाने के दौर से गुज़र रहा है। ज़ाहिर है ऐसे मरीज़ के लिए अंधेरी गुफाओं में जा कर रहना, छुपना तथा वहां बैठकर अपने अंतर्राष्ट्रीय आतंकवादी मिशन को संचालित करना कतई संभव नहीं था।
और आखिरकार अमेरिकी ख़ुफ़िया  एजेंसी सीआईए को लाडेन के ठिकाने का पुख्ता पता चल ही गया। नतीजतन अमेरिका के विशेष नेवी सील कमांडो दस्ते ने पाक राजधानी इस्लामाबाद से मात्र 60 किलोमीटर दूरी पर स्थित एबटाबाद कस्बे के एक आलीशान तथा अति सुरक्षित मकान से उसे ढूंढ निकाला। लाडेन की पनाहगाह बनी यह कोठी पकिस्तान सैन्य अकादमी से मात्र एक किलोमीटर की दूरी पर स्थित है। इतने संवेदनशील तथा अति सुरक्षित क्षेत्र में लाडेन की मौजूदगी के बाद पाकिस्तान  सरकार, पाक सेना तथा पाकिस्तानी खुिफया एजेंसी आई एस.आई सभी संदेह के घेरे में आ गए हैं।

पाकिस्तान के पास अब अपने बचाव के लिए बग़लें झांकने के सिवा कोई चारा शेष नहीं रह गया है। अपनी झेंप मिटाने के लिए पाकिस्तान  के प्रधानमंत्री युसुफ रज़ा गिलानी अपने युरोपीय देशों के दौरे के दौरान यह कहते फिरे कि लाडेन की पकिस्तान में मौजूदगी का पता न चल पाना केवल पाकिस्तान ही नहीं बल्कि अमेरिका सहित पूरी दुनिया की ख़ुफ़िया  ऐजेंसियों की नाकामी है। ज़रा सोचिए पाक प्रधानमंत्री का यह बयान कितना तर्कपूर्ण है? उधर आई एस आई के एक अधिकारी ने अपनी खिसियाहट मिटाते हुए यह तर्क दिया कि ‘5 वर्ष पूर्व जब इस भवन का निर्माण हुआ था उस समय इस बात का संदेह हुआ था कि इसमें अबु फराज़-अल-लीबी नाम का एक अलकायदा नेता वहां रह रहा है। इस सूचना के आधार पर पाक सुरक्षा एजेंसियों ने इस भवन में छापेमारी भी की थी। परंतु वह सूचना निराधार निकली और उसी समय से यह भवन आईएसआई के रडार से हट गया। और इसी बड़ी चूक की शर्मिंदगी पाकिस्तान को चुकानी पड़ रही है।’

बहरहाल बिन लाडेन का मारा जाना जहां वैश्विक आतंकवाद के खातमे की दिशा में एक मील का पत्थर साबित हुआ है, वहीं लाडेन की पाकिस्तान में बरामदगी ने तथा इसके पश्चात अमेरिकी सेना द्वारा पाकिस्तान को विश्वास में लिए बिना उसे मार गिराने की घटना ने कई पेचीदा सवाल खड़े कर दिए हैं। कहना गलत नहीं होगा कि लाडेन के मारे जाने से जितना बड़ा झटका अलकायदा व उसके शेष नेताओं को लगा होगा उससे भी बड़ा झटका पाकिस्तान को सिर्फ इस बात की जवाबदेही के लिए लग रहा है कि लाडेन गत् पांच वर्षों से भी अधिक समय से  पाकिस्तान में कैसे संरक्षण पा रहा था?

 जब-जब पाकिस्तान में लादेन की मौजूदगी की बात की जाती उसी समय पूरी मुस्तैदी के साथ कभी पाक प्रधानमंत्री तो कभी गृहमंत्री,कभी आईएसआई तो कभी सैन्य अधिकारी यह कहकर अपना पल्ला झाडऩे की कोशिश करते कि लाडेन पाकिस्तान में नहीं है। और पाकिस्तान द्वारा बोले जाने वाले इसी झूठ की आड़ में बिन लाडेन पाकिस्तान में राजधानी इस्लामाबाद के समीप पाक सैन्य अकादमी की नाक के नीचे बैठकर पूरी दुनिया में आतंकवादी घटनाओं को अंजाम देता रहा तथा दुनिया के हज़ारों बेगुनाहों को आतंकी हमलों का निशाना बनाकर मानवता तथा मानवाधिकारों की सरेआम धज्जियां उड़ाता रहा।

परंतु मानवता के इस सबसे बड़े दुश्मन का हश्र तो  एक दिन यही होना था,जो हुआ। अमेरिका द्वारा आतंकवाद के विरुद्ध युद्ध की घोषणा में अपने ‘खास सहयोगी’ देश पाकिस्तान को विश्वास में लिए बिना तथा पाकिस्तानी सुरक्षा एजेंसियों,सेना तथा सैन्य रडारों को भनक लगे बिना चार विशेष सैन्य हैलीकॉप्टरों ने अफगानिस्तान के एक यू एस मिलट्री बेस से उड़ान भरी तथा एबटाबाद पहुंच कर 40 मिनट के कमांडो आप्रेशन में लाडेन को मार गिराया तथा उसे अपने साथ अफगानिस्तान ले आए। यहां उसका डीएनए टेस्ट कर तथा यह सुनिश्चित कर कि यह लाश लाडेन की ही है, उसे समुद्र में किसी अज्ञात स्थान पर ले जाया गया जहां उसे कथित रूप से इस्लामी रीति-रिवाजों के साथ जल समाधि दे दी गई।

पाकिस्तान को अमेरिका द्वारा इस प्रकार राजधानी इस्लामाबाद के करीब आकर इतना बड़ा आप्रेशन अकेले करना तथा उसे इसकी सूचना तक न देना बहुत नागवार गुज़रा। अब पाक सरकार यह कह रही है कि भविष्य में अमेरिका सहित किसी भी देश को इस प्रकार पाकिस्तान की सीमाओं का उल्लंघन करने की अनुमति नहीं दी जाएगी। यहां यह भी काबिलेगौर है कि अमेरिका ने बेशक इस्लामाबाद के निकट तक जाने का साहस पहली बार क्यों न दिखाया हो परंतु इसके पूर्व भी अमेरिका दर्जनों बार पाक-अफगान सीमावर्ती क्षेत्रों में पाकिस्तानी धरती पर अपना सैन्य आपे्रशन कर चुका है। खासतौर पर अमेरिकी चालक रहित विमान ड्रोन तो कई बार पाक सीमा के भीतर बमबारी कर चुके हैं।

उधर आप्रेशन जेरोनियो को लेकर अमेरिकी एटॉर्नी जनरल एरिक होल्डर का यही कहना है कि ओसामा बिन लाडेन पर निशाना साधना पूरी तरह वैध था क्योंकि यह आप्रेशन राष्ट्र की आत्मरक्षा के लिए किया गया था। उनके अनुसार लाडेन शीघ्र ही वहां से भी भागने की तैयारी में था। पाकिस्तान को विश्वास में न लेने के विषय पर अमेरिकी सूत्रों का कहना है कि इस कमांडो कार्रवाई की जानकारी पाकिस्तान से सांझा करने से लाडेन हाथ से निकल सकता था इसलिए सर्वोच्च स्तर पर गोपनीयता बरती गई। अमेरिका लादेन  को जि़दा या मुर्दा पकडऩे के लिए इस हद तक गंभीर व आमादा था कि उसने कमांडो कार्रवाई के दौरान संभावित पाकिस्तानी सैन्य हस्तक्षेप से निपटने के भी पूरे उपाय कर लिए थे।

इधर एबटाबाद में अमेरिकन नेवी सील कमांडों लादेन को खत्म करने के खेल में लगे थे तो दूसरी ओर वाशिंगटन स्थित व्हाईट हाऊस में राष्ट्रपति बराक ओबामा विदेशमंत्री हिलेरी क्लिंटन, सीआई ए प्रमुख तथा अन्य उच्चाधिकारियों के साथ इस आप्रेशन जेरेनियो का सीधा प्रसारण देख रहे थे। राष्ट्रपति भवन से इस आप्रेशन का संचालन भी किया जा रहा था। इसी कमांडों कार्रवाई की एक अहम कड़ी यह भी थी कि अमेरिका ने अपने कई लड़ाकू जेट विमान अफगानिस्तान के अपने सैन्य अड्डे पर तैयार खड़े रखे थे। उनकी तैयारी इस बात को लेकर थी कि यदि पाकिस्तानी सेना ने लादेन के विरुद्ध चलाए जाने वाले यू एस कमांडो आप्रेशन में दखलअंदाज़ी करने की कोशिश की तो अमेरिकी लड़ाकू विमान पाकिस्तान पर बमबारी करने के लिए भी तैयार हैं। परंतु पाकिस्तान ने उस स्थिति को न्यौता नहीं दिया।

बहरहाल पाकिस्तान गत् एक दशक से इसी आतंकवाद को पालने-पोसने,इसे संरक्षण देने तथा आतंकी विचारधाराओं को परवान चढ़ाने को लेकर पूरी दुनिया में बार-बार शर्मिंदा व बदनाम होता जा रहा है। पाकिस्तान से लाडेन की बरामदगी ने तो अब पाकिस्तान को कहीं का भी नहीं छोड़ा है। अब पाकिस्तान का वह तर्क दुनिया के गले से नहीं उतर पा रहा है कि ‘पाकिस्तान स्वयं दुनिया में आतंकवाद का सबसे बड़ा शिकार है’। अब तो यह तर्क पाकिस्तान के लिए रक्षात्मक नहीं बल्कि नकारात्मक सोच पैदा करता है।

चूंकि प्रधानमंत्री युसुफ रज़ा गिलानी लाडेन की हत्या के बाद एक बार फिर पेरिस में बड़ी बेबसी के साथ यह दोहरा चुके हैं कि पाकिस्तान में फैले आतंकवाद से निपटना अकेले पाकिस्तान के बस की बात नहीं है। उन्होंने इस के खातमे के लिए पूरी दुनिया से सहयोग की अपील भी की है। लिहाज़ा उनके अपने ही इसी वक्तव्य के परिपेक्ष्य में अब तो पाकिस्तान को अपनी सरहद और संप्रभुता की बात भी कम से कम तब तक किनारे रख देनी चाहिए जब तक कि भारत व अमेरिका जैसे देशों के सहयोग से वह अपनी सीमाओं के भीतर लगभग पूरे देश में फैले आतंकी ठिकानों,प्रशिक्षण शिविरों तथा इनकी पनाहगाहों को समाप्त न कर ले।


लेखक हरियाणा साहित्य अकादमी के भूतपूर्व सदस्य और राष्ट्रीय-अंतर्राष्ट्रीय मसलों के प्रखर टिप्पणीकार हैं.उनसे tanveerjafari1@gmail.कॉम पर संपर्क किया जा सकता है.





लादेन की ह्त्या और ओबामा का झूठ


पहले भी ऐसे कई मौके आए हैं जब अपनी स्वार्थ पूर्ति के लिए अमेरिका पर लादेन के फर्जी वीडिओ और ऑडियो जारी करने के आरोप लगे हैं.कहा तो यह भी जा रहा है कि बिन लादेन की मृत्यु दिसंबर 2001 में ही दोनों किडनी फेल होने के कारण हो गयी थी...

पीयूष पन्त

अमेरिकी राष्ट्रपति ओबामा की मानें तो खूंखारआतंकवादी ओसामा बिन लादेन मारा गया. एक मई की रात 11:35 पर राष्ट्रपति भवन से जनता को संबोधित करते हुए उन्होंने कुछ ऐसा ही कहा- "आज रात मैं अमेरिकावासिओं और पूरी दुनिया से कह सकता हूँ कि अमेरिका ने एक अभियान के तहत हजारों बेगुनाह पुरुषों, महिलाओं और बच्चों के हत्यारे और अल कायदा नेता ओसामा बिन लादेन की ह्त्या कर दी है." 9/11 की चर्चा करते हुए ओबामा ने बहुत कुछ कहा, केवल सच को छोड़कर.
अमेरिका का कॉर्पोरेट मीडिया भी इस झूट को सच के रूप में पेश करने की मुहिम में लग गया. ऐसे में भला हमारा कॉर्पोरेटी मीडिया कैसे पीछे रहता.यहाँ भी होड़ मच गयी बिन लादेन के मारे जाने की खबर को बढ़ा-चढ़ाकर पेश करने की और इस अभियान को अमेरिका की एक बड़ी उपलब्धि के रूप में पेश करने की. यानी 'कव्वा कान ले उड़ा' वाली कहावत चरितार्थ हो रही थी.

विभिन्न  खबरिया चैनलों मे चर्चा में मशगूल तथाकथित जानकार ओबामा के सच को ही अंतिम सच मानकर अपनी ऊर्जा जाया कर रहे थे.किसी को भी इतनी समझ नहीं थी कि इस तथाकथित सच के पीछे छुपे झूठ को उजागर करने का प्रयास भी करे.जबकि अमेरिका द्वारा लादेन की ह्त्या के अभियान से सम्बंधित पेश किये जा रहे अनेक तथ्य विश्वसनीयता के पैमाने पर खरे नहीं उतर रहे थे. विंस्टन चर्चिल ने सही ही कहा था-'जब तक सच को खुद को उजागर करने का मौक़ा मिलता है, झूठ आधी दुनिया की सैर कर आता है.' हो सकता है ओबामा के झूठ की भी कलई जल्दी ही खुल जाये.

अगर खोजी दृष्टि के साथ हम इस पूरे अमेरिकी अभियान की पड़ताल करें तो साफ़ होने लगेगा कि दाल में कुछ काला ज़रूर है. लग तो ऐसा रहा है कि अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा को भारत के प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह से दोस्ती करने का एक फायदा तो अवश्य हुआ है. झूठ को सच के रूप में पेश करने की कृष्ण की छल आधारित उस राजनीति का गुर उनके हाथ लग गया है, जिसके चलते कौरवों की संभावित जीत हार में तब्दील हो गयी थी. यानी 'अश्वत्थामा हतो, नरो या कुंजरो' की गर्जना.
सबसे पहला सवाल यह है कि क्या मारा गया तथाकथित व्यक्ति बिन लादेन था भी या नहीं, क्योंकि अमेरिकी प्रशासन द्वारा मृत लादेन की एक भी तस्वीर अभी तक रिलीज़ नहीं की गयी है.जबकि सद्दाम को पकडे जाने से लेकर ट्रायल और फिर उसकी फांसी की सैकड़ों तस्वीरें तुरंत जारी कर दी गयी थीं. एक तस्वीर ज़रूर नेट और भारतीय चैनलों पर दिखाई जा रही थी, जो बिलकुल फर्जी लग रही थी. बाद में स्पष्टीकरण भी आया कि वो फर्जी ही थी.
पहले भी ऐसे कई मौके आए हैं जब अपनीस्वार्थ पूर्ति के लिए अमेरिका पर लादेन के फर्जी वीडिओ और ऑडियो जारी करने के आरोप लगे हैं.कहा तो यह भी जा रहा है कि बिन लादेन की मृत्यु दिसंबर 2001 में ही दोनों किडनी फेल होने के कारण हो गयी थी. जुलाई 2001 में किडनी के इलाज के लिए वो दुबई के अमेरिकी सेना के हॉस्पिटल मे भी भरती हुआ था. जहां उससे मिलने स्थानीय सीआईए एजेंट भी आया था, क्योंकि बिन लादेन अमेरिका के लिए ऐसी धरोहर था जिसका इस्तेमाल वो अपने हिसाब से कर सकता था. ऐसा कहना है 9/11 पर गहन शोध कर कई पुस्तक लिख चुके अमेरिकी लेखक डेविड रे ग्रिफिन का अपनी पुस्तक 'ओसामा बिन लादेन : मृत या जीवित' में. शायद यही कारण रहा कि सउदी अरब ने ओबामा द्वारा मृत घोषित किये गए लादेन के शरीर को लेने से मना कर दिया.

ग्रिफिन अपनी पुस्तक में लादेन के 2001 में ही मर जाने के अन्य साक्ष्य भी पेश करते हैं जैसे-

  • 13 दिसंबर 2001 के बाद अमेरिकी प्रशासन द्वारा लादेन के संदेशों को intercept करना बंद कर दिया गया.
  • पाकिस्तान के एक प्रमुख अख़बार में छपी रिपोर्ट में कहा गया था कि एक प्रमुख तालिबानी अधिकारी ने रिपोर्टर को बताया कि वह 26 दिसंबर 2001 को लादेन की शव यात्रा में शामिल हुआ था.
  • वाकई लादेन किडनी की बीमारी के चलते बहुत परेशान था. सितम्बर 2001 में सीबीएस न्यूज़ एंकर डैन राठेर ने बताया कि 10सितम्बर 2001को बिन लादेन पाकिस्तान के शहर रावलपिंडी के अस्पताल में भरती था.
  • जुलाई 2002 में सीएनएन ने खबर दी कि उसी साल फरवरी में लादेन के सुरक्षाकर्मी पकडे गए. उसने यह भी बताया किजानकारी देने वालों का मानना है कि लादेन के सुरक्षाकर्मियों के पकडे जाने का मतलब है कि लादेन मारा जा चुका है.

अगर मान भी लिया जाए कि ओसामा ज़िंदा था तो भी क्या ओबामा 1मई की रात सच बोल रहे थे?ज़रा इस पर गौर करें कि जब ओबामा अपने भाषण में कह रहे थे कि लादेन आज रात पकिस्तान में एक पहाडी में बने अपने घर में मारा गया, उसी समय अन्य मीडिया नेटवर्क से जुड़े विभिन्न रिपोर्टर अपने स्त्रोतों का हवाला देते हुए ओबामा को ग़लत साबित करते हुए बता रहे थे कि बिन लादेन हफ्ते भर पहले ही इस्लामाबाद के पास गोलीबारी में मारा गया था और तभी डीएनए परीक्षण के लिए उसके शरीर से सेम्पल ले लिया गया था.ख़बरों का ये टकराव काफी है सरकारी व्यक्तव्य पर शंका ज़ाहिर करने के लिए.

शंका इस बात को लेकर भी पैदा हो रही है कि ओबामा को बिन लादेन कि याद अचानक कैसे आ गयी? वर्ष 2008 के राष्ट्रपति चुनाव के दौरान चली बहसों में ओबामा ने पहली बार लादेन का ज़िक्र करते हुए कहा था कि लादेन को पकड़ना या मार डालना हमारी राष्ट्रीय सुरक्षा की प्राथमिकता होनी चाहिए.अपनी जीत के बाद दिए पहले टीवी साक्षाक्तार में भी यह बात दोहराते हुए कहा था कि लादेन को पकड़ना या मार डालना अल काएदा को मिटा देने के लिए ज़रूरी है.लेकिन इसके बाद उनके भाषणों मे से लादेन गायब हो गया.

यहाँ तक कि जनवरी 2009के अपने टीवी इंटरव्यू में उन्होंने कह डाला-'बिन लादेन को ज़िंदा पकड़ना या मार डालना अमेरिकी सुरक्षा के हमारे उद्देश्य को हासिल करने के लिए ज़रूरी नहीं है.' अब जबकि नवम्बर 2012 के अपने चुनाव का अभियान ओबामा ने शुरू कर दिया है तो वे 1 मई की रात टीवी पर यह घोषणा करते हुए दिखते हैं,'लादेन को पकड़ना या मार डालना मेरी सर्वोच्च प्राथमिकता थी और मैंने सीआईए प्रमुख लियोन पनेत्ता को इसे सबसे पहले करने वाला काम बनाने के आदेश जारी किये'. वाह ओबामा महोदय, आप तो बहुत बढ़िया शीर्षासन करते हैं.

दरअसल,ओबामा को ओसामा का जिन्न इसलिए बाहर निकालना पड़ा क्योंकि अमेरिका के बिगड़ते आर्थिक हालात को सुधारने में ओबामा की असफलता के चलते देश में उनकी लोकप्रियता गिरती जा रही है. उनके राजनीतिक विरोधी 2012 के चुनाव में उन्हें शिकस्त देने कि तैयारी में जुटे हैं. उधर अरब देशों में अमेरिकी उपस्थिति और दखलंदाजी तथा आतंकवाद के खिलाफ युद्ध की रणनीति कजोर पड़ी है. खासकर जनता के विद्रोह के चलते. ऐसे में ओसामा की मौत का फरेब रचकर ही ओबामा अमेरिकी जनता के पास जाने की हिम्मत जुटा सकते हैं,ताकि उनसे कह सकें कि देखो मैंने पिछले चुनाव के दौरान किये वायदे पूरे कर दिए-अफगानिस्तान से सेना वापिस बुला ली, आतंकवाद के सरगना का खात्मा कर 9/11 का बदला ले लिया और पीड़ितों को न्याय दिला दिया

लेकिन क्या वास्तव मे अमेरिकी जनता ओबामा के इसफरेब में उलझ जाएगी या फिर एक बड़े झूठ को छिपाने के लिए बोले जा रहे अनेक झूठों (जैसे मात्र चन्द घंटों में ही डीएनए की प्रक्रिया पूरी करना, समुद्र में दफनाना, लादेन द्वारा महिलाओं को ढाल बनाना, फिर बाद में इस बात से इनकार करना इत्यादि) को उजागर होते देख अचंभित हो ओबामा से सवाल करेगी- 'क्या ओबामा? हमारे साथ इतना बड़ा फरेब?'

तो ओबामा को चिर-परिचित शैली में यही कहना पड़ेगा- 'यस, वी कैन.'


 
विदेशी मामलों के महत्वपूर्ण टिप्पणीकार और सामाजिक आन्दोलन से जुडी 'लोक संवाद' पत्रिका के संपादक.
 
 
 
 

May 4, 2011

प्रेमी युगल को जान का खतरा


संजीव कुमार
 
सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बावजूद प्रेम विवाह करने वाले प्रेमियों को पंचायत में जारी होने वाले तालिबानी फरमानों का डर बना हुआ है. प्रेमी जोड़ों को अपनी हत्या का फरमान मिलने के बाद अब केवल पुलिस प़र ही विश्वास बना हुआ है.एसा ही एक नजारा देखने को मिला जनपद मुज़फ्फरनगर के वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक कार्यालय में. यहाँ एक प्रेमी जोड़े ने पंचायती  फरमान से अपनी जान को खतरा बताया  है. इस प्रेमी युगल ने घर और समाज की प्रवाह किये बिना शादी की है. दोनों के धर्म अलग-अलग होने के कारण लड़की पक्ष के लोगों ने लड़का और लड़की दोनों का बहिष्कार कर उन्हें मारने का फरमान भी जारी कर दिया है .

 
पुलिस अधीक्षक के कार्यालय पहुंचे सोनिया और जगमोहन
दरअसल, जनपद मुज़फ्फरनगर के थाना मीरपुर के गाँव कशामपुर निवासी जगमोहन हरिद्वार रहकर शिक्षा ग्रहण कर रहा था, उसी कालेज में पढने वाली सोनिया (परिवर्तित नाम ) भी पढ़ती थी, दोनों को कब प्यार हो गया, उन्हें मालूम ही नहीं चला. जगमोहन ब्राह्मण परिवार से है और सोनिया मुस्लिम परिवार से है. दोनों के अलग-अलग धर्म के होने के बावजूद जगमोहन और सोनिया एक दूसरे को दिलोजान से भी ज्यादा प्यार करते है.  दोनों की इस प्रेम कहानी को एक साल बीत गया तब  सोनिया और जगमोहन के परिजनों को मालूम पड़ा और  परिजनों ने इनके मिलने प़र पाबन्दी लगा दी .

लेकिन परिवार की मर्जी के खिलाफ जाकर घर से भागकर शुक्रताल में हिन्दू रीति-रिवाज से शादी कर ली. उसके बाद इलाहाबाद हाईकोर्ट से शादी का स्टे भी ले लिया. इस शादी का पता जब दोनों के परिवार वालो को लगा तो गाँव में एक पंचायत बुलाई गई. इस पंचायत में उन दोनों को सजा के तौर प़र गाँव बिरादरी से बेदखल कर दिया. इसी के साथ जगमोहन और सोनिया को  हिदायत दे दी गयी कि  अगर गलती से भी दोनों ने गाँव में पैर रखा तो जान से मार दिया जायेगा.पंचायती फरमान जारी होने के बाद दोनों प्रेमी 4 अप्रैल यानि बुधवार  को वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक कार्यालय  मुज़फ्फरनगर आये और उनसे अपनी सुरक्षा की गुहार लगायी. गौरतलब है कि सोनिया ने जगमोहन से शादी कर हिन्दू धर्म अपना लिया है और अब सोनिया जगमोहन के साथ रहकर वैवाहिक जीवन जीना चाहती है.


संक्रमण काल की जलेबी अब सड़ने लगी है कामरेड

संक्रमण काल से हमेशा गरीब जन ही क्यों परेशान हों, जबकि एक 'सर्वहारा' प्रधानमंत्री बन चुका है और एक 'गरीब का छोरा' अर्थ मंत्री. यह वही 'सर्वहारा' प्रधानमंत्री है जिसने मातृका यादव को सिर्फ इसलिए कार्रवाई करने की धमकी दी थी क्योंकि उन्होंने संक्रमणकाल में सामंती ठेकेदारों को'तकलीफ' पहुंचाई थी और गरीबों द्वारा युद्धकाल में कब्जाई जमीन को सामंतों को लौटाने के 'प्रचंड'फतवे को अनदेखा किया था...

नीलकंठ के सी

आनंद स्वरुप वर्मा का लेख 'क्या माओवादी क्रांति की उल्टी गिनती शरू हो गई है'अपनी अंतर्वस्तु में जितना प्रतिक्रियावादी था उसका बचाव 'प्रचंड मुग्धता नहीं, शीर्ष को बचाने की कोशिश' अपने सार में उतना ही खतरनाक है. यह कुछ वैसा ही है जैसा एक झूठ से बचने के लिए एक हज़ार झूठ गढ़ना.उनके लेख को छानने-खंगालने पर जो बातें स्पष्ट होती हैं, उससे पता चलता है कि वर्मा जी ने अपना लेख 'आवेग' में नहीं, बल्कि पूरी तसल्ली से लिखा है. वे पूरी तरह अपने लेख की प्रस्थापनाओं से सहमत हैं,उसके साथ खड़े हैं.मैंने अपने लेख में उनके दृष्टिकोण पर कुछ सवाल उठाये थे,जिनका जवाब उन्होंने नहीं दिया.इसका मतलब मैं यह लगा रहा हूँ कि वे उनसे सहमत हैं.अब आगे उन प्रस्थापनाओं पर अपनी बात रखने का प्रयास करूंगा जिन पर वे असहमत हैं.

'शीर्ष को बचाने की कोशिश' लेख के पहले पॉइंट में आनंद जी कहते हैं ' नेपाली क्रांति अभी जारी है, फिलहाल संघर्ष का मोर्चा बदल गया है.'क्रांतियों का इतिहास जानने वाले लोग समझते हैं कि क्रांतियाँ एक बने-बनाये सीधे रास्ते पर आगे नहीं चलती, बल्कि लगातार ऊपर-नीचे, दायें- बाएं होती हैं. नेपाल में भी जनयुद्ध से पहले माओवादी पार्टी संसद में गई और बाद में उससे बाहर आकर जनयुद्ध को संचालित किया. वर्ष 2006 में वह फिर संसद में शामिल हुई और संविधान सभा के चुनाव में प्रतिस्पर्धा की.लेकिन इस बार एक बड़ी पार्टी होने के बावजूद उसे लगातार विफलता का सामना करना पड़ रहा है (विफलताओं की चर्चा आगे),तो क्या अब एक बार फिर उसे मोर्चा नही बदलना चाहिए या फिर इसे ‘भाग्य’ मानकर क्रांति का आत्मसमर्पण कर देना चाहिए? उसी पॉइंट में वर्मा जी ने लिखा है,'नेपाली क्रांति का नेतृत्व समूह और एक एक कार्यकर्ता भी यही कहता है कि ‘क्रांति जारी छ (है).सवाल यह है कि क्या अन्य सभी संसदीय वाम पार्टियाँ भी ऐसा ही नही कहती. चीन, क्यूबा, उत्तर कोरिया में भी क्रांति जारी है, भारत में भी सीपीआई इसे जारी रखे हुए है तो फिर माओवादी ही क्यों खुद को क्रांतिकारी शब्द से अलंकृत करें.क्यों उसका नेता प्रचंड क्रांतिकारी कहलाये. जी हाँ 'क्रांति जारी छ' और यह ‘अनंत’ तक जारी रह सकती है, लेकिन मुख्या सवाल इसे पूरा करने का है.

आनंद जी दूसरा पॉइंट इस तरह शुरू करते हैं,'जनयुद्ध से संविधान सभा के जरिए सत्ता हासिल करने का शांतिपूर्ण संक्रमण किसी अर्द्धसामंती और अर्द्धऔपनिवेशिक देश में किया जाने वाला पहला प्रयोग है और इसकी वजह से कई तरह के विभ्रम का पैदा होना स्वाभाविक है। परंपरागत तौर पर अतीत में जो क्रांतियां संपन्न हुई हैं उनमें ऐसी विशिष्ट स्थिति नहीं थी...'यह 'सत्ता हासिल करने का शांतिपूर्ण संक्रमण'क्या है भाई?बहुत कोशिश के बाद भी मै इसे नहीं समझ पाया इसलिए 'मुंह में शब्द डालने'का खतरा उठाते हुए भी यह कहने का साहस करूँगा कि संविधान सभा में जाना सत्ता हासिल करने का मौलिक प्रयास था या है तो सही है, लेकिन यदि 'संक्रमण' की बात है तो फिर यह एमाले और अन्य संसदीय पार्टियों से माओवादी को अलग कैसे करता है? एमाले भी तो संसद में जाने और वहा बने रहने को 'संक्रमण' काल के रूप में ही तो देखती-दिखाती है! एक महत्वपूर्ण सवाल है कि नेपाल की क्रांति अन्य क्रांतियों से विशिष्ट कैसे है? सिर्फ इसलिए कि प्रचंड और बाबूराम ऐसा मानते हैं! इसे बार-बार विशिष्ट कहना इसके संशोधनवादी रास्ता लेने को जायज बताने का 'अतिविशिष्ट' प्रयास ही है.

पॉइंट3,4 और 5 तथ्य हैं इसलिए अविवादित हैं, लेकिन छठे पॉइंट में फिर घपला है. आनंद जी लिखते हैं कि 'पीएलए का समर्पण नहीं किया गया है'.यदि ऐसा है तो 22जनवरी को पीएलए को संसदीय समिति के मातहत करने के कार्यक्रम में प्रचंड ने ऐसा क्यों कहा, 'अब पीएलए एक नए दौर में पहुँच गई है, जहाँ से वह किसी के प्रति पूर्वाग्रह नहीं रखेगी.'एक वर्गीय सेना का किसी के प्रति पूर्वाग्रह न रखने के क्या माने हैं?उसी दिन पीएलए ने अपने कान्तोंमेंट में अपना झंडा उतारकर नेपाल 'राष्ट्र' का झंडा फहराया था! अब तो सेना द्वारा एक नया संगठन बनाकर पीएलए को उसमें शामिल करने के सुझाव को प्रचंड 'सकारात्मक' मानते हैं. यह सकारात्मक पहल उस शांति समझौते के खिलाफ है जहाँ सेना का लोकतंत्रीकरण और पीएलए का उसमें विलय का प्रस्ताव था.वर्मा जी,इसे किस भाषा में समर्पण नहीं कहा जाता?
 सातवाँ पॉइंट नेपाल के माओवादी आन्दोलन की एक महत्वपूर्ण साथ ही 'रहस्यमयी' कड़ी से जुड़ा है जहाँ से आन्दोलन एक नए और अब विवादित प्रक्रिया में प्रवेश करता है, इसलिए इस पर थोडा कहना उचित होगा.

चुनवांग बैठक में पारित दस्तावेज सिर्फ इस लिहाज़ से ही तो महत्वपूर्ण है कि इसने माओवादी पार्टी को सार्वजनिक किया और राजतन्त्र के खिलाफ अन्य संसदवादी पार्टियों से इसके सहकार्य को सहज बनाया.इसके अलावा यह दस्तावेज अन्य दस्तावेजों से अधिक महत्वपूर्ण तो बिलकुल नहीं है,फिर बार-बार इसका हवाला देने का उद्देश्य क्या है? क्या इसके बाद दूसरे दस्तावेज पारित नहीं हुए?क्यों उन दस्तावेजों की अनदेखी की जाती है?क्या खरिपति और पलुन्ग्तार में नए दस्तावेज पर सहमति नहीं बनी जिसमें जनविद्रोह की लाइन को पारित किया गया था.इस पूरे प्रकरण को देखने से पता चलता है कि वर्मा जी, बाबूराम और प्रचंड केवल उसी दस्तावेज को मान्यता देते हैं जो संशोधनवाद के लिए रास्ता तैयार करता है और पार्टी को संसदीय जाल में फंसाए रखता है.जब हम कहते हैं कि यह भारतपरस्ती है तो इसमें गलत क्या है?

क्या यह बात किसी से छुपी है कि चुनवांग में पारित दस्तावेज भारत की मान्यता प्राप्त करने का आधार निर्माण करता है. हमेशा चुनवांग के दस्तावेज से नए दस्तावेज को ख़ारिज करने का कारण क्या है? जबकि होना चाहिए कि पुराना दस्तावेज नये द्वारा निषेध होता. यह अलग चर्चा का विषय है कि चुनवांग दस्तावेज कितना प्रतिक्रियावादी था, लेकिन उसकी एक प्रस्थापना को उधृत करना ठीक होगा,'संक्रमणकालीन गणतंत्र को बुर्जुआ वर्ग बुर्जुआ संसदीय गणतंत्र में बदलने का प्रयास करेगा और सर्वहारा वर्ग की हमारी पार्टी इसे जनवादी गणतंत्र में बदलने का प्रयास करेगी. संक्रमण काल की अवधि कितनी लम्बी या छोटी होगी इस बात को अभी पूरे यकीन से नहीं कहा जा सकता.' कोई भी जागरूक पाठक यहाँ शब्दों की जादूगरी को आसानी से समझ सकता है. संक्रमणकाल को 'अनंत' बताकर संसदीय व्यवस्था में बने रहने के जबर्दस्त खेल को यहाँ आसानी से समझा जा सकता है.

अब एक सरसरी नज़र संविधान सभा में माओवादियों की उपलब्धियों पर.वर्मा जी उपलब्धियों के नाम पर जिन चीजों को गिनाते हैं वे हैं : 'जनयुद्ध का सफल' होना, 'राजतन्त्र का समाप्त' होना, 'संविधान सभा के चुनाव' होना, 'कोई माओवादी का प्रधानमंत्री बन' जाना.

इससे साफ़ है कि वर्मा जी जनयुद्ध के सफल होने को राजतन्त्र के समाप्त होने और प्रचंड का प्रधानमंत्री हो जाने में देखते हैं.लेकिन वे यह क्यों नहीं देख पाते कि नेपाल का आमजन आज भी उन्हीं परिस्थित्तियों में जीने को विवश है और कई मामलो में तो जनयुद्ध से पूर्व और उस दौरान की स्थित्तियों से भी बदतर हालात में.अब इसे संक्रमणकाल की 'विशेषता' कहकर ख़ारिज किया जा सकता है, लेकिन हम यह पूछना चाहते हैं कि संक्रमण काल से हमेशा गरीब जन ही क्यों परेशान हों? इस काल में पूंजीपति और सामंती तो बिलकुल परेशान नहीं हैं. जबकि एक 'सर्वहारा' प्रधानमंत्री बन चुका है और एक 'गरीब का छोरा'अर्थ मंत्री.यह वही 'सर्वहारा'प्रधानमंत्री है जिसने मातृका यादव को सिर्फ इसलिए कार्रवाई करने की धमकी दी थी, क्योंकि उन्होंने संक्रमणकाल में सामंती ठेकेदारों को 'तकलीफ'पहुंचाई थी और गरीबों द्वारा युद्धकाल में कब्जाई जमीन को सामंतों को लौटने के 'प्रचंड' फतवे को अनदेखा किया था! अब वे पार्टी में नहीं हैं और जमीन लौटा दी गयी है. 

जब वर्मा जी कहते हैं कि कटवाल प्रसंग के बाद भारत का हस्तक्षेप बढ़ा है तो वे क्यों इस निष्कर्ष पर नहीं पहुँचते कि जब तक पार्टी क्रान्तिकारी थी तब तक उसे कोई भी शक्ति मजबूर नहीं कर पा रही थी.उन्हें यह भी निष्कर्ष निकालना आना चाहिए था कि संविधान सभा से कुछ भी हासिल नहीं हो सकता, सिवाए अपमान के. इसी सन्दर्भ में वर्मा जी ने जिन बातों को छिपाया है वे हैं : संविधान सभा की उप समितियों में (एक या दो के अलावा) माओवादी पार्टी के सदस्य शीर्ष में नहीं हैं बाबजूद इसके कि वह सबसे बड़ी पार्टी है, लाख प्रयत्न के बाबजूद 'जनयुद्ध' शब्द को संविधान के मूल मसौदे में शामिल नहीं किया जा सका है, समझौते के विपरीत पीएलए का नेपाली सेना में समायोजन नहीं होने जा रहा है,नेपाली सेना के लोकतंत्रीकरण के समझौते को लागू नहीं किया गया है,बल्कि उसे और भी अधिक हथियारों से सशक्त किया जा रहा है,जनयुद्ध के समय कब्जे में ली गई जमीन लौटा दी जा रही है,जनसरकार का विघटन कर दिया गया है, वाईसीएल का अर्धसैनिक स्वरूप भंग कर दिया गया है, जन कम्यून भंग हो चुके हैं, आदि आदि.

इसके बाद लेख में उनके मुंह में शब्द डालने की बात जो वे कह रहे हैं एकदम गलत है. उनका लेख जनज्वार पर है, वे खुद इसे पढ़ सकते हैं.उन्होंने लिखा है,'मैंने कभी यह नहीं कहा कि माओवादियों का लक्ष्य 'शांति प्रक्रिया को पूरा करना है, संविधान बनाना है, ... मैंने अपने लेख में यह कहा था कि एक तरफ तो आप (प्रचण्ड) यह कहते हैं कि शांति प्रक्रिया को पूरा करना है, संविधान बनाना है... और दूसरी तरफ कार्यकर्ताओं की आंतरिक बैठकों में विद्रोह की बात करते हैं.’ हमारा उनसे सवाल है कि क्या लेख में उनका जोर इस बात पर नहीं है कि प्रचंड को विद्रोह की बात नहीं करनी चाहिए. प्रचंड के विद्रोह की बात करने से उन्हें क्यों इतना 'दुः' हुआ, जबकि एक समाजवादी होने के नाते वे इस बात से 'खुश' हो सकते थे कि प्रचंड विद्रोह को जायज मान रहे हैं. और किरण को लफ्फाज न मानने की उनकी दलील गले नहीं उतरती क्योंकि शब्दकोष के अनुसार 'योटोपिया' पर विश्वास करने वाले को 'लफ्फाज' ही कहा जाता है. और चुनवांग के दस्तावेज को ऐतिहासिक कहने वाले को इसके रचनाकार को 'दूरदर्शी' तो मानना ही चाहिए.

उन्होंने अपने लेख में कहा है कि 'प्रचण्ड और बाबूराम दोनों ने अपने इंटरव्यू में कहा है कि हम शांति प्रक्रिया को पूरा करने का प्रयास करेंगे और अगर इसमें रुकावट पैदा की गयी तो विद्रोह में जाएंगे.' यह एकदम गलत बयान है, जबकि बाबूराम किसी भी हाल में विद्रोह में जाने की बात नहीं करते. और करते भी हैं तो सिर्फ इसलिए कि पार्टी के दस्तावेजों में अभी भी विद्रोह एक लाइन के बतौर पास है. बाबूराम की समझ क्या है इसके लिया जनज्वार में ही प्रकाशित अजय प्रकाश द्वारा लिए उनके साक्षात्कार को पढ़ा जा सकता है.जब अजय प्रकाश ने उनसे पूछा,'क्या माओवादी पार्टी फिर से जनयुद्ध के रास्ते पर लौट सकती है?'  तो उनका जवाब था, 'बहुत ज्यादा दमन की स्थिति में थोडे़ दिनों के लिए पार्टी बचाव में ऐसा कर सकती है,मगर पहले की तरह 10-12साल के लिए जनयुद्ध के रास्ते पर अब नेपाली माओवादी नहीं लौटेंगे। हमारे पास 2003के बाद  कई ऐसे उदाहरण हैं जिनसे साफ हो गया था कि हम लोग सैन्य मामलों में नेपाली सेना को मात नहीं दे सकते।'

अब ऐसे व्यक्ति का जो 2003 से ही मान चुका है कि 'हम लोग सैन्य मामलों में नेपाली सेना को मात नहीं दे सकते' वह किस तरह किसी भी हाल में संविधान बनाने को उतारू नहीं होगा?क्या ऐसा पढने के बाद जनयुद्ध के प्रति उनके अविश्वास को नहीं समझा जा सकता? क्या हम ऐसा मानने में गलती कर रहे हैं कि माओवादी नेतृत्व (चुनवांग बैठक के वक्त बाबूराम और प्रचंड ही नेतृत्व माने जाते थे क्योंकि किरण, गौरब और अन्य कैद में थे) हालाँकि हारकर नहीं तो कम से कम जनता पर अविश्वास के कारण संसद में आया है जबकि दोनों ही संविधान सभा को जनता की जीत की तरह प्रस्तुत करते हैं. और जब किरण इसी लाइन की समीक्षा की बात करते है तो वे जड़सूत्रवादी-हार्ड लाइनर क्यों हो जाते हैं?

आगे वे लिखते हैं कि प्रचंड को यह बताना कि 'उनके वैचारिक विचलन के कारण ही आत्मगत तैयारी कम हुई है' उनका काम नहीं है क्योंकि, 'मैं आपकी पार्टी का सदस्य नहीं हूं.' तो फिर वर्मा जी यह बताइए कि प्रचंड को यह सलाह देते वक्त कि 'आपको साहस से यह कहना होगा कि किरण जी,आप एक यूटोपिया में जी रहे हैं और यथार्थ से बहुत दूर हैं. नेपाल का यथार्थ आज यही है कि किसी भी तरह संविधान निर्माण का काम पूरा किया जाए और एक दुष्चक्र में फंसी राजनीति को आगे बढ़ाया जाए' आपको पार्टी की सदस्यता की जरूरत क्यों नहीं पड़ी? ऐसा तो नहीं है कि एक बात रखने के लिए सदस्यता की जरूरत हो और दूसरी के लिए नहीं.

जब वे कहते हैं कि ऐसा वे शीर्ष को बचाने के लिए कर रहे हैं तो हमारी उस बात को पुष्ट नहीं करते, जब पिछले लेख में कहा गया था कि वे प्रचंड को नेपाली क्रांति का पर्यायवाची मानते हैं.वर्मा जी के लिए शीर्ष सिर्फ प्रचंड हैं.वे किरण और अन्य को नहीं बचाना चाहते.उनके लिए शीर्ष को बचाने का मतलब है लगातार ये साबित करना कि प्रचंड तो भारत की गुलामी करने को तैयार है लेकिन किरण रोके पड़ा है. भारत का दुश्मन प्रचंड नहीं, बल्कि किरण है. 'प्रचंड तो शांतिदूत है' (ये मेरे शब्द हैं), 'किरण ही जड़सूत्रवादी है'( यह भी मेरे शब्द हैं) और यदि आप प्रचंड को प्रधानमंत्री नहीं बनने देंगे तो किरण के पक्ष को मजबूती मिलेगी.इसे साबित करवाने के लिए वे प्रचंड से गुहार लगाते हैं कि, 'आपको साहस से यह कहना होगा कि किरण जी,आप एक यूटोपिया में जी रहे हैं और यथार्थ से बहुत दूर हैं'.अपने उस कथन के खिलाफ जाते हुआ कि वे पार्टी सदस्य नहीं हैं और गलती बताना उनका काम नहीं है वे कहते हैं कि,'मैं अपना यह भी अधिकार मानता हूं कि अगर कोई विचलन दिखायी देता है तो उसे इंगित करूं और तभी मैंने यह लेख लिखा.'मेरा सवाल है कि वर्मा जी को तभी विचलन क्यों दिखाई देता है जब पार्टी में किरण का पक्ष मजबूत होता है.और जब बाबूराम और प्रचंड एक हो जाते हैं उनकी नज़र में तो सब कुछ ठीक क्यों होने लगता है.वर्मा जी यह 'प्रचंड मुग्धता'ही है यह 'शीर्ष को बचाने की कोशिश' तो बिलकुल भी नहीं है.

अंत में मैं स्पष्ट करना चाहता हूँ कि लेख में छपी टिप्पणी के लिया यह लेखक जिम्मेदार नहीं है.और मैं यह भी नहीं मानता कि आपने यू टर्न लिया है. मेरा मानना है कि आप जिस गाड़ी की पिछली सीट में बैठे हैं, उसके ड्राइवर ने गाड़ी को गंतव्य की दिशा से भटका दिया है. और जैसे ही आप नींद से उठेंगे (यदि आप सच में सो रहे हैं तो) ड्राइवर को इसके लिए डांटेंगे जरूर. दूसरी बात मैंने आपकी टिप्पणी को 'नस्लीय' और 'उग्र राष्ट्रवादी' कहा है, न कि आपको. यदि आपको ये व्यक्तिगत लगा तो इसे भाषा की मेरी कमजोर जानकारी कह सकते हैं. इसके लिए मैं आत्मालोचित हूँ.

(लेखक नेपाली एकता मंच दिल्ली राज्य के सदस्य हैं. )


 नेपाल के राजनीतिक हालात और नेपाली माओवादी पार्टी की भूमिका को लेकर आयोजित इस बहस में अबतक  आपने पढ़ा -