Apr 4, 2011

पुख्ता साक्ष्य हैं अग्निवेश के माओवादी होने के



गृहमंत्री ननकीराम कंवर कहते हैं - हम भी मानते थे कि वो सामाजिक कार्यकर्ता हैं। संत के रूप में रहते हैं। भगवा वस्त्र पहनते हैं। पर संत के रूप में अग्निवेश माओवादी निकले...

सुदीप त्रिपाठी

रायपुर.सामाजिक कार्यकर्ता स्वामी अग्निवेश की एक सीडी सामने आई है,जिसमें उन्हें लाल सलाम..लाल सलाम नारे लगाते हुए दिखाया गया है। सीडी में स्वामी माओवाद के नारे भी लगा रहे हैं।

यह सीडी 11 जनवरी को जगदलपुर के करियामेटा के पास जंगलों के बीच माओवादियों की उस जन अदालत का है, जिसमें पांच अपहृत जवानों को 11 जनवरी को रिहा किया गया था।

गृहमंत्री ननकीराम कंवर ने सीडी मुख्यमंत्री डा. रमनसिंह को सौंप दी है। संकेत हैं कि अब इस सीडी में मिले तथ्यों की समीक्षा की जाएगी। आला अफसरों व विधि विशेषज्ञों को परीक्षण का जिम्मा दिया गया है। स्वामी अग्निवेश पीयूसीएल की पदाधिकारी कविता श्रीवास्तव के साथ पिछले दिनों बस्तर के नक्सल प्रभावित क्षेत्र गए थे।


उसी समय सीडी तैयार की गई है। इसमें ग्रामीणों की सभा में स्वामी अग्निवेश पीयूसीएल के नेताओं के साथ भीड़ के बीचों-बीच खड़े हैं। सभा में भारत सेना वापस जाओ के नारे लगाए जा रहे हैं और अग्निवेश उनके सुर में सुर मिलाते नजर आ रहे हैं।

स्वामी अग्निवेश की छवि सामाजिक कार्यकर्ता की है। पिछले महीने नक्सलियों ने पांच जवानों का अपहरण कर लिया था। जवानों को छ़ुड़ाने के लिए अग्निवेश ने मध्यस्थता की थी।

शासन ने जवानों की जिंदगी को ध्यान में रखकर उनका प्रस्ताव स्वीकार किया था। उसके बाद स्वामी अग्निवेश ने उन जवानों को नक्सलियों से छुड़ाकर लाया था। सीडी जारी होने के बाद पूरे मामले में नए सिरे से बात उठ रही है।


सीडी में स्वामी ने यह कहा

हमारे भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी माओवादी के जो नेता हैं,कॉमरेड नीति और तमाम हमारे जवान, उनको लाल सलाम करेंगे। ठीक है। फिर उन्होंने कहा-भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी माओवादी..लाल सलाम .लाल सलाम। इस लाइन को उन्होंने दोहराया। उनके पीछे एक महिला भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी जिंदाबाद के नारे लगाते हुए भारत सेना वापस जाओ बोली।

संत समझते थे, माओवादी निकले

स्वामी अग्निवेश को सीडी में माओवाद के नारे लगाते देखकर गृहमंत्री ननकीराम कंवर ने कहा कि हम भी मानते थे कि वो सामाजिक कार्यकर्ता हैं। संत के रूप में रहते हैं। भगवा वस्त्र पहनते हैं। पर संत के रूप में अग्निवेश माओवादी निकले। लाल सलाम जिंदाबाद.. ये उनका नारा है।

कंवर ने फिर कहा कि नक्सलियों ने रणनीति में बदलाव किया है। इसमें वो अपहरण करो और छोड़ो की नीति अपना रहे हैं। इसके लिए उन्होंने अग्निवेश को माध्यम बनाया।

अपहरण की दो घटनाएं हुई हैं। दोनों में अग्निवेश सामने आए हैं। मैं पहले से कह रहा हूं, लेकिन अब तक मेरी बातों को तवज्जो नहीं दी गई। ये सोची-समझी रणनीति है। नक्सली यह प्रचारित करना चाहते हैं कि हम लोगों को नहीं सताते।

इसी योजना के मुताबिक उन्होंने अपहरण किया। उसके बाद अपहर्ताओं को छ़ुड़ाने के लिए वहां अग्निवेश गए। ताड़मेटला में हमारी फोर्स नक्सलियों पर हावी हुई तो साजिश रचकर एसएसपी कल्लूरी के खिलाफ वातावरण तैयार किया।

हमने उनका ट्रांसफर किया है। लेकिन अब मैं गृहमंत्री होने की हैसियत से कहता हूं कि उनकी कहीं भी गलती नहीं है।

दैनिक भास्कर से साभार

खेल को खेल ही रहने दो


क्रिकेट कहीं  अन्य भारतीय खेलों को आऊट तो नहीं कर रहा है?बाजार उन्हीं खेलों को प्रोत्साहित क्यों कर रहा है जहाँ पैसे व व्यवसाय की संभावना अधिक है ?खेल का क्षेत्र हमारी संस्कृति का क्षेत्र है...

कौशल किशोर

इतिहास अपने को दोहराता है। ऐसा ही हुआ है। 1983के बाद 2011, हम फिर क्रिकेट विश्व चैम्पियन बने। यह एक बड़ी उपलब्धि है। जो हमारे गुरू थे,जिन्होंने हमें गुलाम बनाया और यह खेल सिखाया, उन्हें बहुत पीछे छोड़ दूसरी बार हमने यह जीत हासिल की है। यह ऐसी जीत है जो मन को रोमांचित कर दे। हमारे खिलाड़ी निःसन्देह बधाई के पात्र हैं। हम जोश से भरे हैं। लेकिन ऐसा जोश भी ठीक नहीं जिसमें हम होश खो दें।

हम खेल का भरपूर आनन्द उठायें, जीत पर खुशियाँ मनायें, खिलाड़ियों को प्रोत्साहित करें, एक दूसरे को बधाइयाँ दें पर यह भी जरूरी है कि खेल से जुड़े मुद्दों पर चर्चा भी हो। खेल में प्रतिभा को स्थान मिले पैसे को नहीं। हम इस पर भी विचार करें कि कारपोरेट पूँजी और बाजार कैसे हमारे खेल में घुस रहा है,खेल व खिलाड़ी को कैसे अपनी कमाई और व्यवसाय का माध्यम बना रहा है। फिर अन्य खेलों की दुर्दशा क्यों ?

हाकी जिसमें हम विश्व चैम्पियन थे,उसमें हम इतना पीछे क्यों ?क्रिकेट कही अन्य भारतीय खेलों को आऊट तो नहीं कर रहा है?बाजार उन्हीं खेलों को प्रोत्साहित क्यों कर रहा है जहाँ पैसे व व्यवसाय की संभावना अधिक है ?खेल का क्षेत्र हमारी संस्कृति का क्षेत्र है। पर हमने क्या देखा ? राजनीति व भ्रष्टाचार। मंत्री व मंत्रालय से लेकर तमाम खेल समितियाँ भ्रष्टाचार में डूबी इुईं। आई पी एल और कामनवेल्थ गेम में क्या हुआ,सबके सामने है। इससे दुनिया में हमारी क्या छवि बनी ?

एक और बात,यह खेल है युद्ध नहीं। जहाँ क्रिकेट हुआ वह मैदान है,रणक्षेत्र नहीं। पर खेल की भावना युद्ध की भावना में बदल दिया जाय और हमारे राष्ट्रवाद पर अन्धराष्ट्रवाद की मानसिकता हावी हो जाये तो फिर इस भावना व मानसिकता पर जरूर विचार किया जाना चाहिए। मीडिया के रोल पर भी बात होनी चाहिए।

‘फतह पाकिस्तान’, ‘लंका दहन’, ‘रावण दहन’ आखिरकार यह कैसी पत्रकारिता है? प्रिंट मीडिया हो या इलेक्ट्रानिक मीडिया सब जगह जैसे खेल नहीं उन्माद बोल रहा है और पूरे देश को उन्मादी बनाने पर तुला हो। कहते हैं खेल प्रेम व भाईचारा बढ़ाता है,दूरियाँ खत्म कर एक दूसरे को करीब लाता है।

पाकिस्तान के प्रधानमंत्री आये। श्रीलंका के राष्ट्रपति आये। पड़ोसी मुल्कों से तमाम लोग आये। खेल हुआ। हम जीते। पर जो उन्माद पैदा किया गया उससे कौन विजयी हुआ?खेल जीता या पूँजी व बाजार ? किसको खाद पानी मिला खेल की निर्मल भावना को या संघी मानसिकता को? ये सवाल या इस तरह की बातें जश्न के माहौल में जरूर अटपटी सी लग रही होंगी। पर यही मौका है जिस पर चर्चा की जा सकती है, गलत प्रवृतियों पर चोट की जा सकती है।




समय की बर्बादी है न्यायिक जाँच की मांग


परिस्थितिजन्य साक्ष्य की मजबूत कड़ी इतने पुख्ता ढंग से अपराधकर्मियों की ओर इशारा कर रही हो तो फिर न्यायिक जांच की जरूरत क्या है। न्यायिक जांच अगर की ही जानी है तो इस बात की होनी चाहिए कि उन ग्रामीणों का कितना नुकसान हुआ...

रंजीत वर्मा

दांतेवाड़ा के तीन गांवों तीमापुरम, मोरपल्ली और ताड़मेटला में घुसकर 327 पुलिस के जवानों ने 11 से 16 मार्च के बीच जम कर तांडव मचाते हुए 300 घरों को फूंक दिया। महिलाओं के साथ बड़े पैमाने पर बदसलूकी की और कम से कम तीन लोगों को मौत के घाट उतार दिया। सरकार चुप रही कुछ इस तरह की किसी को कानों कान खबर भी नहीं लगने दी। लेकिन 23मार्च को हिंदू अखबार के माध्यम से यह खबर दुनिया को लग गयी।


सरकार में थोड़ी बेचैनी दिखी लेकिन तब भी वह चुप रही। शायद यह सोचकर कि मामला कुछ दिनों में खुद ठंडा हो जाएगा। लेकिन वहां स्वामी अग्निवेश पहुंच गए। और जब वे राहत सामग्री लेकर मोरपल्ली गांव की ओर जा रहे थे तो रास्ते में उन पर प्राणघातक हमला कर दिया गया। स्वामी अग्निवेश के कथनानुसार हमला करने वाले हठ्ठे कठ्ठे गैर आदिवासी लोग थे और वे गालियां देते कह रहे थे कि जब माओवादियों ने आदिवासियों को जिंदा जलाया था तब ये लोग कहां थे,जब चिंतलनार में 76 जवानों की हत्या माओवादियों द्वारा की गयी थी तब ये लोग कहां थे।

आश्चर्य है यही बातें स्वामी अग्निवेश को उन गांवों में निकलने से पहले छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री रमण सिंह ने भी कही थी साथ ही चेताया था कि वे वहां नहीं जाएं क्योंकि लोग गुस्से में हैं। क्या इन बातों से रमण सिंह की यह नाराजगी जाहिर नहीं होती है कि माओवादियों के जुल्म के समय तो आप लोग खामोश रहते हैं और जब पुलिस कुछ घरों को जलाती है या महिलाओं के साथ बलात्कार वगैरह कुछ करती है या कुछ लोगों की महज हत्या कर देती है तो आप लोग राहत सामग्री लिए दौड़े चले आते हैं।

यानी कि क्या वे यह नहीं कहना चाह रहे हैं कि जिस तरह माओवादियों द्वारा किये जाने वाले हमले के समय चुप रहते हैं उसी तरह पुलिस ज्यादतियों के समय भी आप चुप रहें। क्या इस तरह वे यह स्वीकार नहीं कर रहे कि इन तीन गांवों को नेस्तनाबूद करने का काम उनकी पुलिस ने ही किया है। ज्ञात हो कि हमला करने वालों ने अंडे भी फेंके थे।

जरा सोचिये कि जिन आदिवासियों को दो समय पेटभर भात भी नसीब नहीं होता है, वे अंडे कहां से लाए फेंकने के लिए। जाहिर है ये अंडे प्रशासन द्वारा गुंडों को मुहैया कराये गए होंगे। अंडे फेंकने वालों में क्या वही गुंडे नहीं थे जो बाद में घातक हमले पर उतर आए थे। वे सब क्या सलवा जुड़ूम के कैंपों में तैयार किये गए गुंडे नहीं थे?आखिर यूं ही नहीं दांतेवाड़ा के कलक्टर और एसपी को हटाया नहीं गया है।

इन सारी घटनाओं पर राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग केंद्रिय गृह सचिव, छत्तीसगढ़ के मुख्य सचिव और वहां के पुलिस महानिदेशक को नोटिस भेज पूरी घटना का ब्योरा मांग रहा है। स्वामी अग्निवेश ने सर्वोच्च न्यायालय के किसी सेवानिवृत न्यायाधीश से पूरे मामले की न्यायिक जांच कराये जाने की मांग कर रहे हैं। राष्ट्रपति तक को उन्होंने इस बाबत खत लिख डाला है। जहिर है छत्तीसगढ़ सरकार इस मामले में खुद को फंसा हुआ महसूस कर रही है।

वहां के राज्य गृह मंत्री ननकी राम कंवर सदन में बयान दे रहे हैं कि माओवादियों ने इस कांड को अंजाम दिया है। उन्होंने ही आग लगायी उन्होंने ही तीन लोगों की हत्या की। उनके बयान पर सदन में हंगामा मच जाता है। सभी लोग इस कांड के लिए मुख्यमंत्री को जवाबदेह मान रहे हैं। गृहमंत्री के बयान पर कोई यकीन नहीं कर रहा। फिर भी यह समझना किसी के लिए मुश्किल नहीं रहा कि जब गृहमंत्री ऐसा कह रहे हैं तो छत्तीसगढ़ के मुख्य सचिव और पुलिस महानिदेशक मानवाधिकार को क्या रिपोर्ट देंगे। सच पूछा जाए तो न्यायिक जांच की मांग भी समय बर्बाद करने जैसा है।

जब परिस्थितिजन्य साक्ष्य की मजबूत कड़ी इतने पुख्ता ढंग से अपराधकर्मियों की ओर इशारा कर रही हो तो फिर न्यायिक जांच की जरूरत क्या है। न्यायिक जांच अगर की ही जानी है तो इस बात की होनी चाहिए कि उन ग्रामीणों का कितना नुकसान हुआ और यह कि जब उनके अनाज जला दिये गए हों और उनके पास खाने को कुछ भी नहीं हो तो ऐसी परिस्थिति में राहत सामग्री लेकर जा रहे स्वामी अग्निवेश को रोककर उन्हें भूखे मर जाने को छोड़ देने के पीछे सरकार के जो हिंसक इरादे काम कर रहे हैं क्या उसके बाद भी इस सरकार को संवैधानिक रूप से बने रहने का हक है।

अब तो वहां से भूखों मरने की खबर भी आने लगी है। और इस खबर पर जब सर्वोच्च न्यायालय ने अपने दो आयुक्तों एनसी सक्सेना और हर्ष मंदर को कहा कि वे वहां जाएं और स्थिति का जायजा लेकर कोर्ट को रिपोर्ट सौंपें तो अदालत में उपस्थित छत्तीसगढ़ के वकील उछल पड़े, उन्होंने कहा कि वहां भूख से कोई मौत नहीं हुई है। अखबारों में जो खबरें आ रही है वे गलत हैं और उस पर कोर्ट को संज्ञान लेने की जरूरत नहीं है।


गनीमत कि कोर्ट ने उनकी नहीं सुनी लेकिन सरकार की मंशा देखिए वह सर्वोच्च न्यायालय को रोकना चाहती है वहां किसी को भेजने से, घटनास्थल पर जाने से वह पत्रकारों को रोकती है, सामाजिक कार्यकर्ताओं को पीटती है और सदन में झूठा बयान देती है,गरीब आदिवासी की जमीन हड़पने के लिए इस तरह खून खराबे पर उतर जाती है क्या ऐसी सरकार को बने रहने देना चाहिए। वे विकास दर दिखाते हैं लेकिन इसके पीछे जो हत्याएं हो रही है उसका कौन हिसाब देगा।

गृहमंत्री ननकी राम सीडी लेकर घूम रहे हैं जिसमें अग्निवेश को लाल सलाम का नारा लगाते दिखाया गया है और कहते फिर रहे हैं कि देखिये यह आदमी तो माओवादी निकला,इसे हम लोग स्वामी समझ रहे थे। वह कुछ इस तरह ये बातें कह रहे हैं मानो माओवादी होना काफी है मारे जाने के लिए। इस पर शोर क्यों। यह तो वैदिक हिंसा की तरह है जो हिंसा नहीं होती। कार्पोरेट घरानों के चाटुकारों ने सत्ता की बागडोर अपने होथों में ले ली है अगर उनसे जल्द ही बागडोर नहीं छीनी गयी तो समझिये कि आगे आने वाले दिन और भी भयानक होंगे और भी प्राण सुखाने वाले।



विधि मामलों के टिप्पणीकार और लेखक.कविता को जनता के बीच ले जाने के प्रबल समर्थक और दिल्ली में शुरू हुई कविता यात्रा के संयोजक.उनसे verma.ranjeet@gmail.comपर संपर्क किया जा सकता है






Apr 3, 2011

जेलर पिलाता था बच्चों को शराब


उत्तर प्रदेश में सुशासन की यह ताज़ी तस्वीरें हैं.बाल सुधार गृह के नाम से ख्यात इन जेलों में बिगड़ गए बच्चों को सुधारने के लिए भेजा जाता है. सुधार के इस तरीके को देख समझा जा सकता है कि पश्चिमी उत्तर प्रदेश का यह जिला अपराध में अव्वल क्यों रहता होगा...

संजीव कुमार

मुज़फ्फरनगर की बच्चा जेल ( बाल सम्प्रेक्षण गृह ) ३ अप्रैल को जंग का मैदान बन गई. बाल बंदियों ने यातनाओं से तंग आकर जेलर की जमकर पिटाई कर दी जिसमे जेलर का सर फट गया और कई गंभीर चोटे आई है. वहीँ बाल बंदियों के शारीर पर यातनाओं के नीशान मौजूद हैं  और जेलर के कार्यालय से शराब की खाली बोतले मिली हैं.

बाल बंदियों का आरोप है की जेलर शराब पीकर यातनाएं  देता है और उनको भी जबरन शराब पिलाई जाती है. मुज़फ्फरनगर बच्चा जेल की इन तस्वीरों  को जिसमें  एक तरफ बच्चा जेल के घायल जेलर ओमपाल सिंह है ओर दूसरी ओर बाल बंदी है जो अपने शरीर पर इन यातनाओं के निशानों को दिखा रहे हैं.


इन बाल बंदियों में एक बाल बंदी तपो ऐसा है जिसके पेट पर एक गहरा घाव है जिससे मवाद  बह रहा है और जल्द ही इसका इलाज ना कराया गया तो इस बच्चे की जान जा सकती है.दरअसल आज बच्चा जेल उस समय जंग का मैदान बन गई जब जेलर बच्चा जेल में पहुंचे. बाल बंदियों ओर जेलर के बीच जमकर मार पीट हुई जिसमे जेलर का सर फट गया.

बाल बंदियों की अगर माने तो उनका कहना है की यहाँ पर इनको रोज जेलर साहब शराब पीकर यातनाये देते हैं  और इनको भी जबरन शराब पिलाई जाती है.गौरतलब है कि जेलर के कार्यालय से शराब की खाली बोतले भी मिली हैं. 

बाल बंदियों का ये भी आरोप है की बच्चा जेल में इनको ना तो समय पर खाना दिया जाता है और जो खाना दिया जाता है वो थर्ड क्वालिटी का  होता है जिसमे कई बार कीड़े भी मिले है जो इनको जबरन खाने के लिए दबाव दिया जाता है वही मारपीट के इस मामले में जेलर साहब कोई ठोस तर्क नहीं दे सके है


Apr 2, 2011

महिला संघर्ष के नाम रहा प्रतिरोध का सिनेमा



छठा गोरखपुर फिल्म फेस्टिवल अपने जन सांस्कृतिक अभियान के क्रम में इस बार 23 से 27 मार्च तक चला। जनसंस्कृति मंच और गोरखपुर फिल्म सोसाइटी के संयुक्त तत्वावधान में आयोजित प्रतिरोध का सिनेमा समारोह इस बार अंतरराष्ट्रीय   महिला दिवस की 100वी जयंती के उल्लेखनीय संयोग को सार्थक अभिव्यक्ति देने के लिए स्त्री प्रश्न और स्त्री विमर्श पर केन्द्रित था। यह सालाना जलसा जन संस्कृति मंच से जुड़े  साहित्यकार-पत्रकार अनिल सिन्हा की याद के साथ भी घनिष्ठ रूप से जुड़ा था,जो अब हमारे बीच में नहीं रहे। वहीं शहीद-ए-आजम भगत सिंह और साथियों तथा क्रांतिकारी धारा के प्रखर कवि अवतार सिंह पाश की पुण्यतिथि का संयोग भी 23 मार्च से जुड़ा हुआ है।

पहला दिन
गोरखपुर के गोकुल अतिथि भवन में आयोजित फिल्म फेस्टिवल के  मंच पर इतिहासकार उमा चक्रवर्ती, चित्रकला की दुनिया के हस्ताक्षर और जसम के संस्थापक सदस्यों में एक अशोक भौमिक तथा उत्तराखंड से आए कलाकार बी मोहन नेगी की उपस्थिति अहम् थी। इस कार्यक्रम का संचालन जसम के आशुतोष कुमार ने किया।

आयोजन समिति के अध्यक्ष प्रो रामकृष्ण मणि त्रिपाठी ने स्वागत भाषण में कहा कि भूमण्डीकरण के इस सर्वसत्तावादी दौर में विचारों और सपनों के मर जाने के दुश्चक्र के जवाब में प्रतिरोध की शक्ति और जनशक्ति कायम रखते हुए प्रतिरोध का सिनेमा जनांदोलनों के लिए जमीन तैयार कर रहा है। उद्घाटन सत्र में साहित्यकर्मी भगवान स्वरूप कटियार ने स्वर्गीय अनिल सिन्हा की पत्नी आशा का मार्मिक कवितामय संबोधन प्रस्तुत किया। इसी मौके उन्होंने स्वर्गीय अनिल सिन्हा  को समर्पित एक कविता पोस्टर अनावरण के लिए प्रस्तुत किया।

उद्घाटन सत्र का महत्वपूर्ण पक्ष रखते हुए फिल्मकार संजय जोशी ने विचार और व्यवहार के स्तर पर फिल्म फेस्टिवल की संकल्पना,आवश्यकता और अभियान के रूप में महत्व को सामने रखा और सभी कसौटियों पर देश के विभिन्न शहरों में फेस्टिवल के आयोजनों की सार्थकता को सिद्ध किया। उन्होंने इसे प्रयोग के बतौर मानते हुए जनता पर भरोसे को अपने संसाधनों का स्रोत बताते हुए कहा कि प्रतिरोध का सिनेमा पूंजी और सत्ता के प्रयोजन पर नहीं खड़ा है। आज गोरखपुर फिल्म फेस्टिवल के लिहाज से केन्द्रीय भूमिका निभा रहा है तो इसी समझ के कारण जनता के बलबूते अपनी फिल्मों के निर्माण की स्थिति में भी पहुंच चुका है।

आयोजन के केन्द्रीय विषय स्त्री विमर्श उमा चक्रवर्ती  ने उदाहरणों के साथ कहा कि स्त्री प्रश्न भी अपनी शुरूआत से ही दो धाराओं में विभाजित रहा है-पहला समाज सुधारों वाली जिसके केन्द्र में पुरूष थे और दूसरी विद्रोही धारा थी जिसके केन्द्र में स्वयं स्त्रियां थीं। उन्होंने स्त्री संघर्ष के विभिन्न रूपों को ऐतिहासिक क्रम में रखते हुए एक स्लाइड शो के माध्यम से दर्शकों के समाने अपने वक्तव्य के साथ पेश किया। इसी क्रम हिरावल की टीम को उमा जी ने सम्मानित किया।

फिल्म उत्सव सभागार के बाहरी परिसर में इस बार कला चित्रकारों के दो नए चेहरे बी मोहन नेगी और अनुपम राय थे। नेगी उत्तराखंड और देश के अन्य हिस्सों में अपनी कला, खासकर कविता पोस्टरों के चित्रांकन में विशिष्ट व्यक्तित्व के धनी हैं। ऐसी ही प्रभावित करने वाली लगभग 100 कविता पोस्टरों से उन्होंने गोरखपुर के दर्शकों और मीडिया का खूब ध्यान खींचा। उनका चयन प्रतिरोध की कविताएं हैं जिनमें सभी विर्मशों की गुंजाइश रहती है।

दूसरा दिन
मुख्य रूप से प्रतिरोध के सिनेमा बैनर तले देश के विभिन्न शहरों में फिल्म फेस्टिवल आयोजित करने वाले फिल्म समूहों के प्रतिनिधियों के सम्मेलन को समर्पित रहा। छह वर्षों से गोरखपुर और अन्य स्थानों पर विस्तारित प्रतिरोध का सिनेमा अभियान को संयोजित करने की मंशा और राष्टीय स्तर पर नए ढांचे की जरूरत सम्मेलन का मुख्य उद्देश्य था। इसी के मद्देनजर आयोजकों ने राष्ट्रीय  स्तर की कार्यकारिणी के गठन का प्रस्ताव रखा जिस पर देशभर से आए फिल्म सोसाइटियों के 22प्रतिनिधियों ने सहमती दी। एक कार्यकारिणी का गठन कर संजय जोशी को संयोजक चुना गया।

जनकवि बलि सिंह चीमा
दूसरे दिन के सम्मेलन की अध्यक्षता हिन्दी के कथाकार मदन मोहन ने की। गोरखपुर फिल्म सोसाइटी के सदस्य अशोक चौधरी और मनोज सिंह ने यहां के प्रयोग की सफलता की सीमाओं, दबावों और जरूरतों को रेखांकित करते हुए भविष्य में आगे बढ़ने की चुनौतियों के मद्देनजर राष्ट्रीय अभियान संचालित किए जाने को महत्व दिया। इसी सत्र में हिरावल पटना के संतोष झा व समता, लखनऊ के सुभाष चंद्र कुशवाह, भगवान स्वरूप कटियार, उदयपुर के शैलेन्द्र, बलिया से आशीष, दिल्ली से नितिन, वर्धा से अवंतिका, आजमगढ से संजय मुजपफरपुर से स्वाधीन दास और उत्तराखंड से मदन मोहन चमोली ने भी अपने विचार रखे। 

दूसरे दिन के सायंकालीन सत्र में  जनकवि बल्ली सिंह चीमा का काव्य पाठ और सम्मान हुआ। सत्तर के दशक से अपने जनगीतों से जन-जन तक पहुंच चुके चीमा जनांदोलनों का एक प्रमुख स्वर रहे हैं, जिन्होंने अपने गीत, कविताओं गजलों से प्रतिरोध की राजनीतिक संस्कृति गति दी है। उन्होंने भारत-अमरीकी शासक वर्ग के गठजोड़ पर व्यंग्य करते हुए कहा- 'मैं अमरीका का पिट्ठू और तू अमरीका का लाला है, आजा मिलकर राज करेंगे कौन रोकने वाला है।' इसके बाद बलिया से आई संकल्प की टीम ने भिखारी ठाकुर के नाट्य गीत 'विदेशिया' गाकर हमारे समाज के स्त्री की विडम्बना, संघर्ष और प्रतिरोध के क्षेत्र को बेहतर कलात्मक ढंग से प्रस्तुत किया।

इसी सत्र में नयी मीडिया अर्थात ग्लोबल दौर के सूचना संचार माध्यमों  पर परिचर्चा भी हुई जिसमें प्रो. रामकृष्ण मणि त्रिपाठी, कुमार हर्ष, कपिलदेव और आशुतोष कुमार ने भागीदारी की। प्रो. त्रिपाठी ने कहा कि हर दौर अपना जवाब ढूंढता है क्योंकि उसमें प्रतिरोध जारी रहता है।

तीसरा दिन
फेस्टिवल के तीसरे दिन का आगाज 'द अदर सांग' फिल्म से हुई। यह फिल्म बीते दिनों की प्रसिद्ध भैरवी ठुमरी गायिका रसूलन बाई की कला और जीवन को सामने लाती है। अपनी श्रेष्ठ गायकी के बावजूद रसूलन बाई स्वतंत्रता आन्दोलन के दौर में राजनीति और समाज के सामंतों के लिए अछूत बन जाती हैं, यह फिल्म में बखूबी उकेरा गया है।

फेस्टिवल का आनंद लेते दर्शक
फिल्म निर्मात्री सबा दीवान ने रसूलनबाई की प्रसिद्ध ठुमरी गीत 'फूलगेन्दवा न मारो लागत जोबनवा में चोट' की टेक पर अपने अस्तित्व की खोज करती गायिका के उपेक्षित जीवन के चोटों के निशान दिखाए हैं। इसी सत्य की वसुधा जोशी की फिल्म फार माया पहाड़ी जीवन के परिप्रेक्ष्य में चार पीढ़ी की महिलाओं के संघर्ष के स्तरों के साथ सामने रखती है।

वहीं रीना मोहन इस सत्य को दूसरे ढंग से उठाती हैं अपनी फिल्म 'कमलाबाई' में। कमलाबाई पहली महिला थीं जिन्होंने मूक फिल्मों के दौर में मराठी रंगमंच से उभर कर अपनी जगह और पहचान बनाई। आज 88साल की उम्र में जब वह अपने अतीत को देखती हैं तो उन्हें स्वयं को एक अभिनेत्री के रूप में देखना सुखद लगता है, क्योंकि उन्होंने उस दौर में काम किया था जब स्त्रियों को रंगमंच और सेल्यूलाइड में कोई जगह नहीं थी।

प्रसिद्ध मानावाधिकार कार्यकर्ता केजी कन्नारिन के व्यक्तित्व और कृतित्व को उभारती फिल्म 'द एडवोके'ट उनको सच्ची श्रद्धाजंलि थी। अभी हाल ही में कन्नाविरन का निधन हुआ है। सत्तर के दशक से अर्थात आपातकाल के दौर में पीयूसीएल जैसे मानवाधिकार संगठन के अस्तित्व में आने की भूमिका कन्नाविरन जी ने ही बनाई थी। वह कन्ना ही थे जिन्होंने पीयूसीएल का अध्यक्ष रहते हुए आंध्र प्रदेश सरकार और माओवादियों के बीच मध्यस्थता भी की थी। इस फिल्म की निर्माता दीपा धनराज ने फिल्म में मानवाधिकारों के पक्ष की राजनीति को भी स्थापित किया है। 


कवि रमाशंकर : मैं तुम्हारा कवि हूँ  

'मै तुम्हारा कवि हूं' नितिन पमनानी की इस फिल्म में रमाशंकर यादव विद्रोही की क्रांतिचेतस भावभूमि और उबड़खाबड़ जीवन के बीच पलती-रचती कविता अपनी चमक के साथ प्रकट होती झलक के साथ विद्रोही की कविताएं अपना मोर्चा स्वयं  बनाती है-एक कार्यभार के रूप में यह भी फिल्म स्थापित करने में सफल रहती है। फेस्टिवल में कवि विद्रोही की उपस्थिति ने उनको रूबरू होकर सुनने को सुलभ बना दिया। उनके कविता कहने के निराले अंदाज और कविताओं में भरी आग को श्रोताओं ने महसूस किया और अपना कवि मान लिया, उनके इस विश्वास के जवाब में कि मै तुम्हारा कवि हूं।

चौथा दिन
फेस्टिवल के चौथे दिन की पहली फिल्म 'मीरा दीवान की ससुराल थी' फिल्म ससुराल की चौहद्दी से शुरू होकर पागलखाने और शरणालय तक पहुंची स्त्रियों के सत्य को उद्घाटित करने की कोशिश है। दो छोरों से बंधी, पितृसत्ता के अनुकूलन को ढोती स्त्रियां पागल होने की नियति में स्वयं को मुक्त पाती हैं जहां वे पूरी तरह अप्रासगिंक होती हैं। घर से, समाज से और स्वंय स्त्री होने से भी।

इसके बाद दिखायी गयी निष्ठा जैन की 'सिटी आफ फोटोज'फिल्म एक नए परिदृश्य को विषय बनाती है। उनकी फिल्म फोटो स्टूडियो की दुनिया में छवि के आकर्षण में बंधे मनोविज्ञान को पकड़ते हुए इच्छाओं, स्मृतियों का अक्स पा लेने की मानवीय गतिविधियों को दर्ज करने की कोशिश है। इनकी पृष्ठिभूमि पथरीली सच्चाइयों से भी निर्मित होती है और खुशी की काल्पनिक यर्थाथ से भी।

फेस्टिवल  में  दिखाई  गयी  फिल्म  :  व्हाइट बैलून का एक दृश्य  

तमिलनाडू के समाज में निम् वर्गीय तबके की तीन महिलाओं के जीवन संघर्ष पर बनी लीना मणिमेक्कलई की फिल्म 'गाडेसज'जिन्दा रहने की लड़ाई की मिसाल प्रस्तुत करती हैं। तीनों महिलाएं लक्ष्मी,कृष्णावेली और सेतुराक अनपढ,गरीब और सौन्दर्यहीन  हैं,लेकिन जीवन को कीमती और खूबसूरत मानते हुए जिन्दा रहने के ऐसे पेशे का चुनाव करती हैं जिनको स्त्रियोचित नहीं माना जाता। लक्ष्मी रूदाली का काम करती है जिसे दूसरों की मौत पर रोने का आडम्बर करना होता है, कृष्णावेणी मुर्दाफरोशी का काम करती है जिसे लावारिस लाशों को ठिकाने लगाना है और सतुराकु समुद्र में मछली पकड़ने का काम करती है। तीनों की जिजीविषाएं तीनों को न्यूनतम संसाधनों में भरपूर जी लेने का उल्लास और मानवीय सभ्यताओं का सृजन करती हैं।

चूंकि छठा गोरखपुर फिल्म फेस्टिवल स्त्री विषय, स्त्री विमर्श, स्त्री फिल्मकारों और स्त्रीवादी नजरिए पर मुख्य रूप से केन्द्रित था, अतः स्त्रियों की अगुवाई में हुए आन्दोलन के बिना फेस्टिवल का समाहार नहीं हो सकता था। इसकी भरपाई शबनम विरमानी और नाता दुब्बरी की फिल्म 'व्हेन वीमन यूनाईट' यानी स्त्रियां जब एकजुट होती हैं। यह फिल्म 80 और 90 के आधे दशक तक चले शराब विरोधी आन्दोलन को आरम्भ से लेकर अन्त तक समेटती है। नैल्लोर जिले से उठी चिंगारी अन्य कई जिलो के सैकड़ों गांवों तक शराब विरोधी आग का कारण बनती है और आंध्र की तेलगू देशम सत्ता हिल जाती है।

फैजा अहमद खान की 'सुपरपैन आफ मालेगांव' एक पैरोडी फिल्म है जिसमें मालेगांव, महाराष्ट्र  के फिल्मों के शौकीन एक ग्रुप द्वारा सुपरमैन की फैंटेसी को अपने ढंग से सेल्यूलाइड पर उतारने के हैरतअंगेज हौसले को सामने लाती है।

कश्मीर के सवाल से जोड़ती इफत फातिमा की फिल्म 'व्हेयर हैव ये माई क्रिसेन्ट मून' उन वाशिन्दों के संघर्ष, पीड़ा और प्रतिरोध को सामने लाती है जिनके परिवारजन भारतीय सेना के द्वारा लापता किए जा चुके हैं। लगभग एक दशक के दौरान हजारों की तादाद में गायब हुए लोगों को उनकी माएं, परिवारजन ढूंढ  रहे हैं। भारतीय सेना अपने असीमित कानूनों की ताकत से लापता लोगों का तो पता नहीं बताती,उल्ठे पता पूछने वालों को ही अपराधी बना देती है। फिल्म 'काश्मीरी कवियत्री' मुगलमासी के इकलौते बेटे के खो जाने के सवाल को समूची काश्मीरी जमात से जोड़ती है।

राजुला शाह की 'सबद निरंतर' फिल्म भक्ति आंदोलन की प्रतिरोधी अन्तर्वस्तु को पकड़ते हुए कबीर, गोरखनाथ, मीरा, सहजोबाई की परम्परा को मुक्ति के अर्थ में उतराना चाहती है। आज भी उनकी परम्परा के अनुयाई जीवन की दारूणता के बीच शब्द को बीज की तरह बचाए हुए हैं।

फेस्टिवल के अंतिम दिन की शुरूआत इरानी फिल्मकार जफर पनाही को फिल्म 'द व्वहाईट बलून' से हुई। फिल्म छोटी सी बच्ची के नजरिए से दुनिया देखने को सहाबरा बनाकर रखी गई गई, परन्तु फिल्म वस्तुतः ईरानी के रोजमर्रा के दिनों  में से एक दिन को औसत के बतौर दिखा पाने में बेहद सफल होते हैं, बल्कि अच्छाई के प्रति बच्ची की मंशा दरअसल निर्देशक की अपनी मंशा भी है क्योंकि पृष्ठिभूमि में ईरानी सत्ता की अच्छाई को कुचलने की ही महीन कारीगरी भी मौजूद है।


फिल्म फेस्टिवल में गीत पेश करती बलिया की  सांस्कृतिक  टीम संकल्प
 बच्चों के लिए समर्पित अन्तिम दिन का खास आकर्षण उषा श्रीनिवासन द्वारा बच्चों के लिए बेहतर ढंग से परिष्कार किया। पारोमिता वोहरा की 'मोरलिटी टीवी' और लविंग जेहाद मेरठ शहर की अस घटना के सत्य को सामने लाती है,जब वहां की पुलिस द्वारा गांधी पार्क में प्रेमी जोड़ों को पीटे जाने, अपमानित करने और इस बहाने नैतिकता के ठेकेदार बाजार के धंधेबाज सियासत के स्वार्थी सब अपनी असलियत में साथ दिखाई देते हैं।

ठीक इसी विषय को आधुनिक दिल्ली के संदर्भ में निर्देशिका समीरा जैन दूसर फलक से जोड़ते हुए 'मेरा अपना शहर'  में प्रस्तुत करती हैं जहां स्त्रियों पर बर्बरता आधुनिकता का आईना दिखाती है। कानपुर से निकलने वाले उर्दू अखबार 'सियासत' को केन्द्र में रखकर बनी शाजिया इल्मी की फिल्म उर्दू भाषा के संकट को समाज और सत्ता के अन्तर्विरोधों से जोड़कर दिखाती है जो बोली तो जाती है लेकिन लिखे-पढे जाने के संकट से गुजर रही है। उर्दू हिन्दुस्तानी जबान है, लेकिन मुसलमानों से जोड़कर देखे जाने के तंग नजरिए ने उसे काफी हतोत्साहित किया है।

फेस्टिवल की अंतिम फिल्म 'दाए या बाएं'उत्तराखंड के पहाड़ी परिवेश पर बनी है। निर्देशिका बेला नेगी की 'अस' फिल्म ने समीक्षकों का काफी ध्यान खींचा है। उत्तराखंड को यह फिल्म बेहद संजीदा ढंग से छूती है। कल्पना और यथार्थ के टकराव पर बुनी गई यह फिल्म फिल्म परिस्थितियों के चौराहे पर खड़े उत्तराखंड के नौजवानों को नई उम्मीद का लाल सवेरा दिखाने में सफल है।



हत्या, बलात्कार और आगजनी की सरकारी पहल


जनज्वार. आदिवासियों की तबाही के सरकारी अभियान ‘सलवा जुडूम’ को फिर से एक बार नये क्षेत्र में आजमाने का मामला उजागर हुआ है। छत्तीसगढ़ के दंतेवाड़ा जिले के चिंतलनार क्षेत्र में 11 से 16 मार्च के बीच हत्या-बलात्कार, लूट- आगजनी का नेतृत्व अबकी कांग्रेसी नेता महेंद्र कर्मा ने नहीं, बल्कि दंतेवाड़ा के एसपी, एसआरपी कल्लूरी ने किया है।

दंतेवाड़ा के चिंतलनार में माओवादियों और सुरक्षा बलों के बीच हुई मुठभेड़ में 36  माओवादियों को मार देने की झूठी खबर से गदगद हो रही छत्तीसगढ़ की सरकार की पोल खुल गयी है। 25 और 26 मार्च को प्रभावित गांवों का दौरा कर लौटी 13 सदस्यीय फैक्ट फाइंडिंग टीम ने दिल्ली में 1 अप्रैल को प्रेस वार्ता कर खुलासा किया कि सरकारी अत्याचार के इस अभियान में  सिर्फ एक माओवादी भीमा उर्फ सुदर्शन  मारा गया है।

इस घटना को सीआरपीएफ और माओवादियों के बीच मुठभेड़ के रूप में प्रचारित किया गया था. पुलिस के मुताबिक इस मुठभेड़ में तीन एसपीओ और 36 माओवादी मारे गए थे. पुलिस ने मीडिया में इस घटना को माओवादियों के    वर्चस्व  वाले इलाके चिंतलनार में अपना प्रभुत्व स्थापित करने के रूप में पेश कर जश्न मनाया था. गौरतलब है कि यह वही इलाका है जहाँ पिछलेवर्ष ६ अप्रैल को माओवादियों ने 76 जवानों  को मार दिया था.

इस नए अभियान की 21 मार्च को जानकारी होने के बाद जब पत्रकारों और तथ्यान्वेषी दलों ने प्रभावित इलाकों में जाने की कोशिश की तो उन्हें हर तरीके से रोका गया. 25मार्च को करीब 300 घरों को जला दिए जाने के बाद तबाह हुए लोगों के लिए राहत सामग्री ले जा रहे सामाजिक कार्यकर्ता स्वामी अग्निवेश पर जानलेवा हमला किया गया. वहीं इस बहाने भी इलाके के अंदर जाने से रोका गया कि यह इलाका युद्धक्षेत्र है और राज्य तथा माओवादियों के बीच तथाकथित युद्ध अभी भी जारी है, ऐसे में किसी बाहरी व्यक्ति का इलाके के अंदर जाना खतरनाक हो सकता है.

बहरहाल तेरह सदस्यीय  तथ्यान्वेषी दल दूसरे रास्ते वहां पहुँचने में सफल रहा. इस दल में नागरिक और लोकतांत्रिक अधिकारों के लिए काम करने वालों के अलावा कई स्वतंत्र लोग भी शामिल थे. यह दल 26और 27  मार्च को इलाके के अंदर तक गया और घटना के पीड़ितों और अन्य ग्रामीणों से घटना के संबंध में विस्तार से बातचीत की.इस दौरान दल के सदस्य यह जानकर अवाक रह गए कि राज्य की ओर से प्रचारित किया गया पुलिस का बयान पूरी तरह से मनगढ़ंत और सच्चाई से कोसों दूर था.

दल में शामिल मानवाधिकार संगठन पीयूडीआर के सदस्य और पत्रकार आशीष गुप्ता ने कहा कि मार्च 11 को अर्धसैनिक बलों और सलवा जुडूम के करीब तीन सौ लोगों के एक समूह ने चिंतलनार इलाके के मोरपल्ली गांव पर हमला कर दिया. उनका कहना था कि उन्हें सूचना मिली है कि यहां आदिवासी एक बड़ी बैठक करने जा रहे हैं.

जाँच दल की मुख्य मांगे :
  • सीआरपीएफ और सलवा जुडूम के खिलाफ बलात्कार, हत्या, दमन और अपहरण का मामला दर्ज किया जाए.
  • इसके दोषियों को सख्त से सख्त सजा दी जाए.
  • घायलों को तत्काल चिकित्सा सहायता उपलब्ध कराई जाए और बलात्कार पीड़ितों का मेडिकल कराया जाए.
  • लोगों को उनके नुकसान के मुताबिक मुआवजा दिया जाए. प्रभावित इलाकों में और पत्रकारों व नागरिक अधिकारों के लिए संघर्ष करने वाले संगठनों को जाने की इजाजत दी जाए.
  • सुप्रीम कोर्ट के निर्देशानुसार सलवा जुडूम पर तत्काल प्रभाव से प्रतिबंध लगाया जाए और ‘कोया कमांडो’ के नाम पर सलवा जुडूम की गतिविधियों पर रोक लगाई जाए.
  • ऑपरेशन ग्रीनहंट को तत्काल प्रभाव से रोका जाए.

मोरपल्ली गांव में इन लोगों ने 33घरों को जला दिया और सुनीता और अनीता नाम की दो महिलाओं के साथ बलात्कार किया (बदला हुआ नाम). लाक्के और उनके पिता मारावी भीमा को बेरहमी से पीटा और मारवी सुला नामक एक वृद्ध आदिवासी को मार डाला. मोरुपल्ली गांव को बरबाद करने के बाद ये लोग 13 मार्च को तिम्मापुरम गांव की ओर बढ़ गए. अगले दिन रास्ते में माओवादियों ने उन्हें रोकने का प्रयास किया. यह सशस्त्र संघर्ष करीब दो घंटे तक चला. इसमें भीमा उर्फ सुदर्शन की मौत हो गई और दो अन्य लोग घायल हो गए.

जेएनयू  विश्विद्यालय  की छात्र बानोज्योत्सना लाहड़ी आगे बताती हैं कि इस संघर्ष में तीन एसपीओ की भी मौत हुई और नौ अन्य घायल हो गए,जिनमें से एक की बाद में मौत हो गई.मुठभेड़ के बाद सीआरपीएफ और सलवा जुडूम के एसपीओ पीछे हटने पर मजबूर हुए. उन्होंने तिम्मापुरम गांव लौटकर वहां शरण ली.

माओवादियों के संभावित हमले से बचने के लिए इन लोगों ने गांव में बंकर बनाए. गाँव छोड़ने से पहले इन लोगों ने 55 घरों में आग लगा दी. तिम्मापुरम गांव लौटते समय सुरक्षा बलों ने पुलामपड गाँव से बुर्सी भीमा को उठा लिया था. तिम्मापुरम गांव में आग लगाने के बाद इन लोगों ने भीमा को कुल्हाड़ी से काटकर मार डाला. उन्होंने शायद ऐसा इसलिए किया था क्योंकि वह इस पूरे नरसंहार का चश्मदीद गवाह था. तिम्मापुरम गाँव से यह दल ताड़मेटला गांव पहुंचा,  जो उनका नया लक्ष्य बन गया.

जांच दल की रिपोर्ट के मुताबिक ताड़मेटला गाँव में इन लोगों ने 207 घरों में आग लगाई. इससे वे राख में बदल गए. उन लोगों ने रीता (बदला हुआ नाम) से बलात्कार किया और उसे तबतक पीटा जबतक वह बेहोश नहीं हो गई.उसे जब होश आया तो पता चला कि उसके कुछ नगद रुपए और करीब 12हजार रुपए मूल्य के आभूषण गायब हैं.

ताड़मेटला गांव की बलात्कार पीड़ित आदिवासी महिला   
ताड़मेटला गाँव में 20-25अन्य लोगों को भी बेरहमी से पीटा गया था, इनमें 12 साल का एक बच्चा भी शामिल था. सुरक्षा बलों ने इस गाँव से मारावी अंडा और मारावी आइता को उठा लिया, जिनका अब तक कोई पता नहीं चला है. किसी पुलिस थाने में उनकी गिरफ्तारी भी नहीं दिखाई गई है.

 इस वारदात का नेतृत्व करने वाले सलवा जुडूम के कई सदस्यों की तिम्मापुरम गांव के लोगों ने पहचान की है. इसमें मंतम भीमा उर्फ रमेश (जानागुडा गांव निवासी),तेलम अंडा (लीकपुर गांव नवासी), वांजन पेवा (चारपान गांव निवासी), दासरु (विल्लामपल्ली गांव निवासी), मारा (मोनीपल्ली गांव निवासी),रामलाल (बोदीकली गांव निवासी), केचा नंदा (कोरापद गांव निवासी), करताम दुला उर्फ सूर्या (मिसमान गांव निवासी)और तिम्मापुरम गांव का एक एसपीओ और एक महिला एसपीओ शामिल थी.इससे यह साफ है कि यहाँ सलवा जुडूम सक्रिय और पहले की ही तरह काम कर रहा है. सरकार उन्हें ‘कोया कमांडो’ बताती है, जो कि पूरी तरह फर्जी है.
सलवा जुडूम पर सुप्रीम कोर्ट की ओर से पूरी तरह प्रतिबंध लगा देने के निर्देश के बाद भी यह सक्रिय रूप से काम कर रहा है और उसे सरकार को पूरा सहयोग और समर्थन हासिल है.यह पूरी तरह से निहत्थे और निर्दोष आदिवासियों पर सुरक्षा बलों और सलवा जुडूम की ओर से किया गया एकतरफा हमला था.लेकिन मीडिया में इसे माओवादियों के साथ चल रही मुठभेड़ के रूप में प्रचारित किया गया.

वारदात के बाद माओवादियों का पर्चा
जाँच दल की रिपोर्ट में कहा गया कि ताड़मेटला गांव की बलात्कार पीड़ित रीता (बदला हुआ नाम) की ओर से अभी तक किसी के भी खिलाफ कोई मामला दर्ज नहीं कराया गया है और न ही चिकित्सा परीक्षण कराया गया है.ताड़मेटला गांव के मारावी अंडा और मारावी आइता अभी भी गायब है और उनका कोई पता नहीं चला है, ग्रामीणों का दावा है कि उन्हें सुरक्षा बल उठा ले गए, लेकिन अभी तक उन्हें कहीं पेश नहीं किया गया है.यह तांडव पूरी तरह सरकार के सहयोग और सक्रिय समर्थन से मचाया गया.

मोरपल्ली और तिम्मापुरम गांव के निवासी अभी भी बहुत बुरे हालात में रह रहे हैं. इन गांवों के लोगों को अभी तक सरकार की ओर से कोई सहायता नहीं मिली है.उन्होंने बताया कि माओवादियों की ओर से उन्हें कुछ अंतरिम राहत मिली है. इनमें से बहुत से लोग अभी भी पेड़ों के नीचे रह रहे हैं.

इलाके से लौटे तथ्यान्वेषी दल की राय में ग्रामीणों पर केवल इसलिए हमला किया जा रहा है कि इन लोगों ने तालाबों की खुदाई, भूमिहीनों में जमीन बांटने, सिंचाई की सुविधाओं का विकास करने जैसे वैकल्पिक विकास के काम किए हैं जिसे सरकार पिछले कई दशकों में कर पाने में नाकाम रही है. आदिवासियों को उनके जीवन की बुनियादी सुविधाओं और आजीविका के साधनों से बेदखल किया जा रहा है और अब उन्हें सुरक्षा बलों और सलवा जुडूम के अत्याचार का सामना करना पड़ रहा है.

तथ्यान्वेषी दल के सदस्य में सीएच चंद्रशेखर, वी चित्ति बाबू, आर राजानंदम, वी रघुनाथ, जी रवि, के विप्लव कुमार,के श्रीसा,आर मुरुगेसन,आशीष गुप्त, यू संभाशिवराव ,बानोज्योत्सना लाहड़ी और चंद्रिका शामिल थे.

सभी फोटो- चन्द्रिका

Apr 1, 2011

जैतापुर में जमीन दखल की राजनीति


जैतापुर परमाणु ऊर्जा संयत्र को लेकर कोंकण क्षेत्र में राजनीति तेज हो गई है। परमाणु ऊर्जा संयंत्र के पक्षकार इसे विकास से जोड़कर देख रहें हैं तो  स्थानीय लोग इसे  विनाश की कहानी की  अंतहीन शुरुआत मान रहे हैं...


आशीष कुमार 'अंशु'

अभी अधिक दिन नहीं हुए जब जैतापुर में रैली कर रहे कांग्रेस के बड़े-बड़े नेताओं के बीच एक कांग्रेसी कार्यकर्ता  मंच पर पहुँच गया और जैतापुर परियोजना के खिलाफ बोलने लगा। इस स्थिति को देख मंचासीन नेता और आयोजक सन्न थे, वहीं कार्यक्रम में शामिल हुई आम जनता की तरफ से उस कार्यकर्ता के लिए जिन्दाबाद, जिन्दाबाद के नारे लगने लगे. मंच पर चढ़े उस   कांग्रेसी कार्यकर्ता को किसी पुराने मामले में  आरोपित कर  जेल में डाल दिया गया है।

एनपीसीआईएल (न्यूक्लियर पावर कॉरपोरेशन ऑफ इंडिया लिमिटेड) और फ्रांस की कंपनी अरेवा के बीच हुए समझौते से भारत के प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह और फ्रांसिसी  राष्ट्रपति निकोलस सरकोजी के चेहरे पर जो खुशी आई, भारत के नागरिकों और भारतीय अर्थव्यवस्था जैतापुर के लोगों को उसकी कीमत चुकाने के लिए मजबूर किया जा है। डॉ. सिंह इस समय फ्रेंच न्यूक्लियर उद्योग को उबारने वाले तारणहार की भूमिका में हैं।

जैतापुर में प्रस्तावित 9900मेगावाट परमाणु ऊर्जा संयंत्र के लिए कुल 938हेक्टेयर जमीन ली जानी है,जिसमें 669 हेक्टेयर जमीन माड़वन की है। मुख्यमंत्री पृथ्वीराज च्वहाण कहते हैं कि स्थानीय लोग जमीन देने के लिए राजी हैं। लेकिन  जब वे मुम्बई में  इस मुद्दे पर बातचीत के लिए माड़वन के लोगों को बुलाते हैं तो गांव वाले जाने से साफ इंकार कर देते हैं।

अब इसका क्या अर्थ निकाल जाए? गांव वालों का पक्ष साफ है कि बातचीत तो उस समय की जाए जब हमें भी अपनी बात कहने का मौका मिले और उम्मीद हो कि हमने अपनी बात से मुख्यमंत्री को विश्वास में ले लिया तो परियोजना रुक जाएगी। ऐसी जगह बात करने का क्या फायदा, जिसमें माड़वन में परमाणु ऊर्जा संयत्र लगाने  का फैसला पहले से सुरक्षित है।

जैतापुर परमाणु ऊर्जा संयत्र  को लेकर कोंकण क्षेत्र में राजनीति तेज हो गई है। परमाणु ऊर्जा संयंत्र के पक्षकार जहां इसे विकास से जोड़कर देख रहें हैं। वहीं इस परियोजना के खिलाफ खड़े लोगों का स्पष्ट मानना है कि यह परियोजना कोंकण के विनाश की कहानी का पहला अध्याय होगी।

पर्यावरणविद और सामाजिक कार्यकर्ता विवेके भिड़े से जब बातचीत हुई तो उनका कहना था कि ‘कोंकण की जमीन पर्यावरण के लिहाज से अति संवेदनशील है। यहां दो सौ पचहत्तर किलोमीटर के क्षेत्रफल में जिस तरह 17 परियोजनाओं पर एक साथ काम हो रहा है, इससे यह बात साफ हो गई है कि कोंकण पर किसी की बुरी नजर लग गई। बेशक,माड़वन हम सभी के लिए गंभीर मुद्दा है।’भिडे़ आगे कहते हैं, 'प्रत्यक्ष तौर पर प्रभावित होने वालों की संख्या भले ही दस हजार के आसपास नजर आ रही हो, लेकिन इससे वास्तव में प्रभावित होने वालों की संख्या लाखों में होगी।' 

जैतापुर परमाणु ऊर्जा संयत्र  के काम को छह हिस्सों में फ्रांसिसी कंपनी अरेवा के हाथों पूरा होना है। योजना के अनुसार पहले चरण में प्रस्तावित छह ईकाइयों में 1650-1650 मेगावाट वाली दो इकाइयों का काम पूरा होगा। यह दोनों ईकाइयां रत्नागिरी जिले के माड़वन में होंगी। योजना के अनुसार इस परियोजना के पहले चरण को 2013-14 तक पूरा होना है और बची चार ईकाइयों का काम भी 2018 तक पूरा कर लिया जाना है।

वर्तमान में हमारे  कुल बिजली उत्पादन में परमाणु ऊर्जा की भागीदारी 2.90प्रतिशत की है। देश में इसे 2020 तक बढ़ाकर छह प्रतिशत तक ले जाने की योजना है और 2030 तक इसे तेरह प्रतिशत की भागीदारी में बदल दिया जाएगा। इसके लिए माड़वन (जैतापुर)  की तरह कई परियोजनाओं की देश को जरुरत होगी। बहरहाल बात माड़वन (जैतापुर) की करते हैं जिसमें पांच गांवों माड़वन, मीठागवाने, करेल, वारिलवाडा और नीवेली की 938 हेक्टेयर जमीन जानी है।

 इन पांच गांवों में से चर्चा में माड़वन (जैतापुर) गांव का नाम ही बार-बार आ रहा है। इसकी पहली वजह यह है कि छह ईकाइयों में पूरे हो रहे इस परियोजना की पहली दो ईकाइयों का काम माड़वन में ही पूरा होना है। दूसरी वजह जनहित सेवा समिति के प्रवीण परशुराम गवाणकर बताते हैं,‘परियोजना में जाने वाली कुल 938 हेक्टेयर जमीन में से 669 हेक्टेयर जमीन माड़वन की है।

यह वही   माड़वन है जो रत्नागिरी जिले में स्वतंत्रता सेनानियों के गांव के रूप रुप में जाना जाता है। इस गांव में आधे दर्जन से अधिक स्वतंत्रता सेनानियों के परिवार रहते हैं। अंग्रेजों से लड़ने वालों के परिवारों को अब अपनी सरकार से लड़ना पड़ रहा है। वैसे उनके लिए अपनी सरकार अंग्रेज से भी अधिक क्रूर साबित हो रही है, क्योंकि अंग्रेजों ने इन्हें अपने घर से तो बेदखल नहीं किया था।

परमाणु ऊर्जा  के लिए चुनी गई यह जमीन पर्यावरण के लिहाज  से अति संवेदनशील है। समुद्र  का किनारा, 150 किस्म के पक्षी, 300 किस्म की वनस्पतियां। खास बात यह है कि इनमें कई वनस्पतियों और पक्षियों की किस्म दुर्लभ है। समुद्र के इस मनोरम तटीय  क्षेत्र में एक दर्जन से अधिक परमाणु ऊर्जा संबंधित प्रकल्प प्रस्तावित हैं। जबकि रत्नागिरी को राज्य सरकार ने ओद्यानिकी (हॉर्टिकल्चर)जिला घोषित किया है और इसका पड़ोसी जिला सिंधदुर्ग गोवा से भी लगा हुआ होने के कारण पर्यटकों की खास पसंद रहा है।

बड़ी संख्या में गोवा देखने के लिए आने वाले पर्यटक सिंधदुर्ग का रुख करते हैं। पर्यावरणविद इस बात से अचंभित हैं कि जिस रत्नागिरी को दुनियाभर मे जैव विविधता के हॉट स्पॉट के तौर पर देखा जाता है,उस जिले के लिए परमाणु ऊर्जा संबंधित परियोजना के करार पर उस साल हस्ताक्षर होता है,जब पूरी दुनिया ‘अंतरराष्ट्रीय जैव विविधता वर्ष’ का उत्सव मना रही है।

साखरी नाटे मछुआरों की बस्ती है। वहां मिले मच्छीमार कृति समिति के उपाध्यक्ष, अमजद बोरकर। वे और उनके साथी समुद्र  को लेकर अपने रागात्मक रिश्तों की बात करते-करते भावुक हो गए। बकौल बोरकर ‘समुद्र  के साथ हमारा रिश्ता पीढ़ियों का है। हमारे पूर्वजों के समय से यह समुद्र  हमें रोटी दे रहा है। सरकार परमाणु ऊर्जा प्रकल्प को कोंकण और महाराष्ट्र का विकास कहकर प्रचारित कर रही है, लेकिन यह विकास का नहीं कोंकण की बर्बादी का समझौता है।’ बोरकर के अनुसार महाराष्ट्र की सरकार प्रकल्प के नाम पर गंदी राजनीति कर रही है।

टाटा इन्स्टीट्यूट ऑफ सोशल साईंस (टिस) की एक रिपोर्ट के अनुसार परमाणु ऊर्जा प्रकल्प के लिए सरकार ने जो स्थान तय किया है वह बिल्कुल उपयुक्त नहीं है। टिस की यह रिपोर्ट महेश कांबले ने इस इलाके के 120 गांवों में जाकर लोगों से मिलकर तैयार की है।

कांबले के अनुसार इस परियोजना का स्थानीय और पर्यावरणीय परिवेश पर बहुत बुरा प्रभाव पड़ेगा। रिपोर्ट यह भी कहती है कि सरकार तथ्य को तोड़-मरोड़ रही है और माड़वन के उपजाऊ जमीन को बंजर बनाकर कर पेश कर रही है। जैतापुर के जिस 626.52 हेक्टेयर जमीन अनुपजाऊ  दिखाया जा रहा है वहां के किसान उस जमीन पर धान, फल, सब्जी लगा रहे हैं।

वर्ष 2007में बाढ़ में सरकार ने राजापुर के किसानों को आम की फसल खराब होने पर एक करोड़ सैंतीस लाख सात हजार रुपए का मुआवजा दिया था। अर्थक्वेक हजार्ड जोनिंग ऑफ इंडिया के अनुसार जैतापुर जोन तीन में आता है। जो भूकम्प के लिहाज से रिस्क जोन माना जाएगा। ऐसे इलाके में परमाणु से जुड़े किसी प्रकल्प को शुरु करना कम खतरे की बात नहीं है।

स्थानीय लोगों के लिए रेडिएशन का मामला भी एक बड़ा मुद्दा है। परमाणु ऊर्जा प्रकल्प के आसपास जो लोग होंगे, उनके स्वास्थ पर इसका दुष्प्रभाव एक बड़ी चिन्ता बना हुआ है। गांववाले पूछते हैं,यदि यह प्रकल्प इतना सुरक्षित है तो यहां काम करने वाले अधिकारियों के लिए आवास की व्यवस्था प्रकल्प से पांच-सात किलोमीटर दूर क्यों प्रस्तावित है? उनके रहने के लिए आवास परमाणु ऊर्जा प्रकल्प के परिसर में क्यों नहीं किया जा रहा?

माड़वन (जैतापुर)के लोग कहते हैं,यदि फ्रांसिसी कंपनी अरेवा उनके गांव आ रही तो यहां वह कोई समाजसेवा करने तो नहीं आ रही है। वह एक निजी कंपनी है, जो यहां कमाई के इरादे से आएगी और कोंकण की जमीन पर पहली बार वह अपने ईपीआर (यूरोपियन प्रेसराइज्ड रिएक्टर)तकनीक की जांच भी कर पाएगी। जिसे पहले कहीं जांचा-परखा नहीं गया है। क्या अरेवा भारत को परमाणु ऊर्जा प्रकल्प के नाम पर अपनी प्रयोगशाला के तौर पर इस्तेमाल करना चाहती है?





Mar 30, 2011

मुस्लिम देशों में तानाशाही के बीच साम्राज्यवादी दखल


अमेरिका की पहचान दुनिया में एक साम्राज्यवादी देश के रूप में स्थापित हो चुकी है, मगर सवाल तो यह है कि  युद्ध छिडऩे या किसी संघर्षपूर्ण स्थिति के उत्पन्न होने से पहले  मुस्लिम देश के तानाशाहों को इस्लाम व दुनिया के मुसलमानों की याद क्यों नहीं आती...

तनवीर जाफरी

कल तक अपनी सैन्य शक्ति तथा समर्थकों के बल पर मज़बूत स्थिति में दिखाई देने वाले गद्दाफी अब किसी भी क्षण सत्ता से बेदखल किए जा सकते हैं। पश्चिमी देशों द्वारा अमेरिका के नेतृत्व में लीबिया के तानाशाह कर्नल मोअमार गद्दाफी को सत्ता से बेदखल किए जाने की स्क्रिप्ट लिखी जा चुकी है। नाटो भी लीबिया में लागू उड़ान निषिध क्षेत्र की कमान संभालने को तैयार हो गया है। गठबंधन सेनाओं द्वारा लीबिया की वायुसेना तथा थलसेना की कमर तोड़ी जा चुकी है।

गद्दाफी के एक पुत्र के मारे जाने का समाचार है। स्वयं गद्दाफी के भविष्य को लेकर अटकलें लगाई जा रही हैं। गद्दाफी के ही कथन को माना जाए तो वे स्वयं लीबिया में ही शहीद होने को प्राथमिकता देंगे। अब देखना यह होगा कि सत्ता के अंतिम क्षणों में गद्दाफी का अंत किस प्रकार होता है? क्या वे लीबिया छोड़कर अन्यत्र पनाह लेने के इच्छुक होंगे? यदि हां तो क्या नाटो सेनाएं तथा विद्रोही उन्हें वर्तमान स्थिति में देश छोड़कर जाने की अनुमति देंगे? या फिर वे भी अपने पुत्र की तरह विदेशी सेनाओं का निशाना बन जाएंगे? या उनका हश्र सद्दाम हुसैन जैसा होगा? या फिर वे आत्महत्या करने जैसा अंतिम रास्ता अख्तियार   करेंगे?

बहरहाल, कल तक जिस कर्नल गद्दाफी की लीबिया की सत्ता से बिदाई आसान प्रतीत नहीं हो रही थी, आज वही तानाशाह न केवल अपनी सत्ता के लिए बल्कि अपनी व अपने परिवार की जान व माल की सुरक्षा के विषय में भी अनिश्चित नज़र आ रहा है । इन परिस्थितियों में गद्दाफी ने भी एक बार फिर उसी 'धर्मास्त्र' का प्रयोग किया है, जिसका प्रयोग ओसामा बिन लादेन,  मुल्ला उमर तथा  एमन-अल जवाहिरी जैसे आतंकी से लेकर सद्दाम हुसैन तक  करते रहे हैं.


ऐसे में सवाल यह उठता है कि  युद्ध छिड़ने या किसी संघर्षपूर्ण स्थिति के उत्पन्न होने से पहले  आखिर  इन तानाशाहों को इस्लाम और दुनिया के मुसलमानों की याद क्यों नहीं आती? इसमें कोई दोराय नहीं कि अमेरिका की पहचान दुनिया में एक साम्राज्यवादी देश के रूप में स्थापित हो चुकी है। अमेरिका दुनिया में अपना वर्चस्व कायम रखने की लड़ाई लड़ रहा है। दुनिया में चौधराहट बनाए रखना अमेरिकी विदेश नीति का एक प्रमुख हिस्सा है। विश्व का सबसे बड़ा तेल उपभोक्ता होने के नाते निश्चित रूप से उसे तेल की भी सबसे अधिक ज़रूरत है। यही वजह है कि तेल उत्पादन करने वाले देशों में अमेरिकी दखलअंदाज़ी को प्राय: इसी नज़रिए से देखा भी जाता है।

दुनिया समझती है कि यह लड़ाई किसी तानाशाह को सत्ता से बेदखल करने या विद्रोही जनता का समर्थन करने की नहीं, बल्कि अमुक देश की तेल संपदा पर अमेरिकी नियंत्रण करने की है। परंतु दुनिया के लाख शोर-शराबा करने या वावैला करने के बावजूद अमेरिकी नीतियों में न तो कोई परिवर्तन आता है, न ही अमेरिका की ओर से इन आरोपों के जवाब में कोई ठोस खंडन किया जाता है। गोया अमेरिका ऐसे आरोपों की अनसुनी कर अपनी नीतियों पर आगे बढ़ते रहने में ही भलाई समझता है। ऐसे में उन चंद मुस्लिम नेताओं की इस्लाम पर 'अमेरिकी खतरे' जैसी ललकार स्वयं ही निरर्थक साबित हो जाती है।

ताज़ा उदाहरण लीबिया का ही देखा जाए तो यहां भी उड़ान निषिध क्षेत्र बनाने की हिमायत अरब लीग के सदस्य देशों द्वारा सर्वसम्मति से की गई। विदेशी सेनाओं द्वारा लीबिया पर बमबारी किए जाने का मार्ग अरब लीग के देशों ने ही प्रशस्त किया। और अब संयुक्त अरब अमीरात जैसा अरब देश गठबंधन सेनाओं के साथ मिलकर लीबिया पर बम बरसा रहा है। ऐसे में इस्लाम और ईसाईयत  की बात क्या बेमानी नहीं हो जाती? और इन सबके अलावा सबसे बड़ी बात यह है कि गद्दाफी व सद्दाम हुसैन जैसे तानाशाह उस समय इस्लामपरस्ती को कतई भूल जाते हैं, जब यह लोग सत्ता के नशे में चूर होकर अपने-अपने देशों में मनमानी करने की सभी हदों को पार कर जाते हैं।

जब ये तानाशाह अपनी बेगुनाह और निहत्थे अवाम पर ज़ुल्म ढा रहे होते हैं, उस वक्त उन्हें यह नहीं सूझता कि हम जिन पर ज़ुल्म ढा रहे हैं, वे भी मुसलमान हैं तथा हमारे यह कारनामे इस्लाम विरोधी हैं। यह क्रूर तानाशाह उस समय तो इस्लामी इतिहास के राक्षस प्रवृति के सबसे बदनाम शासक यज़ीद की नुमाईंदगी करते नज़र आते हैं। परंतु जब इन्हें मौत के रूप में अमेरिका, संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद्, संयुक्त राष्ट्र संघ तथा नाटो जैसे संगठनों के फैसलों का सामना करना होता है तब इन्हें इस्लाम याद आता है। मुस्लिम इत्तेहाद भी, जेहाद भी और  संघर्ष भी।

प्रश्र यह है कि मुस्लिम राष्ट्रों को इन परिस्थितियों से उबरने के लिए आखिर  क्या करना चाहिए? सर्वप्रथम तो तमाम मुस्लिम राष्ट्रों में इस समय मची खलबली का ही पूरी पारदर्शिता तथा वास्तविकता के साथ अध्ययन कर अवाम द्वारा विद्रोह के रूप में लिखी जा रही इबारत को पूरी ईमानदारी से पढऩे की कोशिश की जानी चाहिए। अफगानिस्तान, इराक और लीबिया जैसे देश मुल्ला उमर, सद्दाम और गद्दाफी जैसे सिरफिरे शासकों की गलत व विध्वंसकारी नीतियों के चलते बरबाद हुए हैं। इस वास्तविकता को सभी देशों विशेषकर मुस्लिम जगत को समझना चाहिए। गोया किसी देश में विदेशी सेनाओं अथवा पश्चिमी सेनाओं के नाजायज़ हस्तक्षेप का कारण वहां की अवाम नहीं, बल्कि वहां का सिरफिरा शासक ही देखा गया है।

अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा ने संघर्ष की अफवाहों पर पूर्ण विराम लगाने की गरज़ से ही शर्म-अल-शेख में मुस्लिम राष्ट्रों के प्रमुखों को अस्लाम-अलैकुम कहा था तथा मुस्लिम देशों को साथ लेकर चलने का आह्वान किया था। परंतु तब से लेकर अब तक मुस्लिम राष्ट्रों में सुधारवाद की कोई बयार चलती तो हरगिज़ नहीं दिखाई दी। हां विद्रोह, क्रांति तथा बगा़वत के बिगुल कई देशों में बजते ज़रूर दिखाई दे रहे हैं।

कारण कि सत्ताधीश मुस्लिम तानाशाह कहीं ज़ालिम हैं तो कहीं निष्क्रिय। कहीं अकर्मण्यता का प्रतीक हैं तो किसी के राज में भुखमरी, बेरोज़गारी और गरीबी ने अपने पांव पसार लिए हैं। कोई अपने व्यक्तिगत धन या संपत्ति के संग्रह में जुटा है तो किसी को अपनी खाऩदानी विरासत के रूप में अपनी सत्ता को सुरक्षित रखने या हस्तांतरित करने की फिक्र है। कोई शासक जनता की आवाज़ को चुप कराने के लिए ज़ुल्म व अत्याचार के किसी भी उपाय को अपनाने से नहीं कतराता तो कई ऐसे हैं जिन्हें अपने देश के विकास, प्रगति या अर्थव्यवस्था में कोई दिलचस्पी नहीं।

ऐसे में जनविद्रोह का उठना भी स्वाभाविक है तथा विदेशी सेनाओं द्वारा उस जनविद्रोह का लाभ उठाना भी स्वाभाविक है।




लेखक हरियाणा साहित्य अकादमी के भूतपूर्व सदस्य और राष्ट्रीय-अंतर्राष्ट्रीय मसलों के प्रखर टिप्पणीकार हैं.उनसे tanveerjafari1@gmail.कॉम पर संपर्क किया जा सकता है.