Mar 30, 2011

ठगों का स्वर्ग बनता इंटरनेट


शादी का प्रस्ताव  देते हुए एक महिला लिखती है,'मेरा करोड़ों डॉलर बैंक में है,मैं यह धनराशि आपके खाते में स्थानान्तरित करना चाहती हूं। अत:आप मुझे अपना नाम,पता,खाता व अपने बैंक का स्विफ्ट  कोड भेजिए...

निर्मल रानी

ठगों द्वारा अत्याधुनिक वैज्ञानिक तकनीक  इंटरनेट का सहारा लिया जा रहा है. ठगी का शिकार भी उन्हीं को बनाया जा रहा है जो कंप्यूटर और इंटरनेट का प्रयोग करते हैं। अपने शिकार को ठगने के लिए वे मात्र प्रलोभन को ही अपने धंधे का मुख्य  आधार बनाते हैं। जाहिर है कि  लालच का शिकार होना या किसी प्रलोभन में आना केवल गरीबों का ही काम नहीं,किसी पैसे वाले व्यक्ति को शायद धन की कुछ ज्य़ादा ही आवश्यकता होती है। इसी सूत्र पर अमल करते हुए अंतर्राष्ट्रीय स्तर के ठगों का  यह विशाल नेटवर्क लगभग पूरी दुनिया में छा चुका है।


दान लीजिये : ठगी के अनेक रूप

पहले  यह  काला  धंधा  मुख्य रूप से दक्षिण  अफ़्रीकी  देशों से संचालित हो  रहा था,परंतु अब इन्होंने  दुनिया के लगभग सभी देशों में अपने जाल फैला दिए हैं। यह इंटरनेट ठग गूगल अथवा याहू या किन्ही  अन्य सर्च साइट्स के माध्यम से या फिर किसी अन्य तरीके  से विश्व के तमाम लोगों के ई-मेल पते इकट्ठा करते हैं।

वे बाकायदा अपने पूरे नाम,टेलीफोन नंबर व पते के साथ-साथ किसी भी ई-मेल पर अपना भारी भरकम परिचय देते हुए प्रलोभन वाले मेल भेजते हैं। उदाहरण के तौर पर आपको  उनका  यह संदेश आ सकता है, 'बधाई हो, आप जैकपॉट का पुरस्कार जीते हैं। यह लॉटरी इन्टरनेट प्रयोग करने वाले ई-मेल खाताधारको के मध्य आयोजित की गई थी। इसमें आपको 14लाख डॉलर  पुरस्कार  निकला है। कृपया इसे ग्रहण करने के लिए अमुक ई-मेल पर संपर्क करें.'

जाहिर है इस मेल को प्राप्त करने वाला व्यक्ति बड़ी खामोशी के साथ एक  कदम आग बढ़ाते हुए ठगों द्वारा भेजे गए उनके ई-मेल पते पर संपर्क साधता है। मात्र 24घंटों के भीतर ही आपको उस ठग का उत्तर भी मिल जाएगा। उसका उत्तर होता है, 'हां मैं बैरिस्टर अमुक हूं तथा आप वास्तव में लॉटरी के विजेता हैं। आपको बधाई।'

उसके बाद वह तथाकथित बैरिस्टर आपसे आपका नाम, पूरा पता, व्यवसाय, टेलीफोन नम्बर, बैंक अकाऊंट नम्बर तथा आपके  बैंक  स्विफट कोड नं आदि जानकारी मांगता है।  इसके बाद यदि आपने उनके द्वारा मांगी गई सभी सूचनाएं उपलब्ध करवा दीं, फिर न तो वे दोबारा आपसे संपर्क साधेंगे, न ही आपके  किसी अगले ई-मेल का जवाब देंगे। यह ठग इलेक्ट्रोनिक उपायों का प्रयोग कर किसी भी प्रकार से आपके खाते से पैसे निकालने का  भरसक  प्रयास करने में जुट जाते हैं। और किसी न किसी शिकार  व्यक्ति के  बैंक  खाते से पैसे निकालने में कामयाब हो जाते हैं।

लॉटरी निकलने की  सूचना देने के अतिरिक्त और भी तरीके से ई-मेल ठगों का यह नेटवर्क पूरी दुनिया में ई-मेल धारकों को भेजता रहता है। जैसे किसी ठग द्वारा यह सूचित किया जाता है कि  अमुक परिवार विमान हादसे में मारा गया है। उस परिवार का क्योंकि कोई वारिस नहीं है तथा यदि आप उसके वारिस बन जाएं तो उसकी  जमा धनराशि यथाशीघ्र आप पा सकते हैं।

कोई महिला शादी का प्रलोभन देते हुए लिखती है,'मेरा करोड़ों डॉलर बैंक में है,मैं यह धनराशि आपके खाते में स्थानान्तरित करना चाहती हूं। अत:आप मुझे अपना नाम,पता,खाता व अपने बैंक का स्विफट कोड आदि भेजिए।' कई ठग तो सीधे तौर पर यही लिख देते हैं,  मैं अमुक बैंक में गुप्त दस्तावेज डील करने वाले विभाग में अधिकारी हूं। मेरे एक जानकार व्यक्ति की  मृत्यु हो गई है। उनका करोड़ों डॉलर मेरे ही बैंक में जमा है। यदि आप इस धनराशि को लेने में रुचि रखते हैं तो अपना और अपने बैंक अकाऊंट का विस्तृत ब्यौरा यथाशीघ्र भेजें ताकि  मैं यह धनराशि आपके  खाते में स्थानान्तरित कर सकूँ.'

तैब्लो : हैकिंग  का उस्ताद   
अपने आपको चीन का बताने वाले एक ठग ने भावनात्मक रूप से ब्लैकमेल करने की  तो हद ही कर दी। उसने स्वयं को कैंसर  का मरीज बताते हुए यह लिखा, वह चीन का एक नामी-गिरामी उद्योगपति है। चूंकि वह अपने जीवन की  अन्तिम सांसें ले रहा है अत: वह चाहता है की  उसकी  नकद धनराशि  का एक बड़ा हिस्सा गरीब व बेसहारा लोगों में बांट दिया जाए। फिर उस तथाकथित उद्योगपति ने इस काम के लिए सहयोग मांगते हुए अपने तथाकथित बैरिस्टर का ई-मेल पता दे दिया। उधर उस तथाकथित बैरिस्टर ने अन्य ठगों की भांति विस्तृत पता तथा बैंक खाते का विस्तार मांगना शुरु कर दिया।

एक अफ़्रीकी ठग ने तो किसी झूठ-सच में पडऩे तथा निरर्थक कहानी सुनाने से बचते हुए अपनी बात कहने का एक अनूठा तरीका अपनाया। उसने ई-मेल द्वारा सीधे यह सूचित किया आपके नाम का फंड जो  बारह करोड़ रुपए है,मेरे बैंक में जमा है। कृपया अपना बैंक अकाऊंट नंबर तथा बैंक स्विफट कोड भेजें ताकि आपकी यह धनराशि आपके खाते में अविलम्ब स्थानान्तरित कर दी जाए।

कुछ ठग तो धार्मिक  व जातिगत भावनाओं को भी जगाने का प्रयास अपने इस ठग व्यवसाय में करते हैं। परन्तु भारतीय संस्कृति की स पूर्ण जानकारी न होने की वजह से उन्हें बारीकी से परखा जा सकता है। उदाहरण के तौर पर यदि आपका नाम संजय चौधरी है तो जाहिर है आपने अपना ई-मेल भी लगभग संजय चौधरी के नाम से या इससे मिलता जुलता ही बनाया होगा। यह अंतर्राष्ट्रीय ठग चौधरी शब्द को तो यह समझ कर चुन लेते हैं कि हो न हो, यह किसी व्यक्ति का सरनेम ही होगा।

ठगानन्द जी आपके ई-मेल पर जो संदेश भेजते हैं उसमें लगभग यह लिखा होता है कि 'कार एक्सीडेंट में अथवा विमान हादसे में अथवा किसी समुद्री जहाज के डूबने में फलां देश का एक परिवार मारा गया। उसका मुखिया राबर्ट चौधरी था। चूंकि आप संजय चौधरी हैं अत:आप राबर्ट चौधरी के भाई के रूप में स्वयं को प्रस्तुत करते हुए उसके खाते में जमा 22 करोड़ डॉलर की नक़द धनराशि प्राप्त कर सकते हैं।'

यहां यह ठग चौधरी शब्द का तो बड़ी आसानी से महज इसलिए प्रयोग कर लेता है क्योंकि वह उसे सरनेम ही समझता है, परन्तु संजय के स्थान पर दूसरे भारतीय शब्द का अभाव होने के चलते उसे राबर्ट नाम का सहारा लेना पड़ता है। इन ठगों द्वारा दिए जाने वाले इन सभी प्रलोभन में जो कहानी तथा अनुबन्ध उल्लिखित किया जाता है उसमें बाकायदा 30 अथवा 40 या 50 प्रतिशत का उनका अपना हिस्सा भी बताया जाता है ताकि कोई भी व्यक्ति अचानक यह न समझ बैठे कि अमुक व्यक्ति को मेरे ही साथ इतनी हमदर्दी आखिर क्योंकर है?

इंटरनेट के माध्यम से तरह-तरह की योजनाएं बताकर ठगी करना, गन्दे व अशलील ई-मेल भेजना, किसी का ई-मेल हैक करना,वायरस भेजना दूसरों को डराना-धमकाना तथा आतंकवाद संबंधी गतिविधियों की सूचनाओं का गैर कानूनी आदान-प्रदान व अवैध रूप से गुप्त दस्तावेजों का हस्तान्तरण करना भी इसी कंप्यूटर माध्यम से हो रहा है।

जहां हमें कंप्यूटर के  तमाम सकारात्मक व लाभप्रद पहलुओं को स्वीकार करना तथा उन्हें अपने प्रयोग में लाना है वहीं इससे होने वाले नुकसान व दुष्परिणामों से भी पूरी तरह चौकस व सचेत रहने की जरूरत है। इंटरनेट के माध्यम से प्राप्त होने वाले किसी भी अंजान व्यक्ति के किसी भी लालचपूर्ण प्रस्ताव को पढऩे में समय गंवाने के बजाए ऐसे मेल को डिलीट कर देना ही ठगी से बचने का सबसे सुरक्षित उपाय है।



लेखिका उपभोक्ता मामलों की विशेषज्ञ हैं और सामाजिक-राजनीतिक विषयों पर भी  लिखती हैं. इनसे nirmalrani@gmail.com  पर संपर्क किया जा सकता है.




Mar 29, 2011

देह दलाली का मेडिकल कॉलेज


प्रोफेसर, वार्डेन, परीक्षा नियंत्रक और सीनियर मिलकर यहाँ मेडिकल छात्राओं को नंबर दिलाने के बदले मोटी कीमत वसूलते हैं और  हमबिस्तरी के लिए मजबूर करते हैं.उच्च शिक्षा का सपना लिए आयीं इन छात्राओं को कैरियर के लिए क्या कुछ नहीं झेलना पड़ता  है...

चैतन्य भट्ट

मध्य प्रदेश। नेताजी सुभाष चंद्र बोस मेडिकल  कालेज में पास कराने के नाम पर चल रहे एक सेक्स रेकैट कांड के पर्दाफाश ने जबलपुर के शिक्षा जगत के माथे पर कलंक का एक ऐसा टीका लगा दिया है जिसको मिटाना अब नामुमकिन सा हो चला है। रैकेट में शामिल लोगों और परतों को उधरते देख ऐसा लग रहा है कि यहां डॉक्टर नहीं देह के दलाल रहते हैं।

बाएं  से गिरफ्तार राजू खान,  राणा और ककोडिया                        फोटो- सनत सिंह
अपनी जूनियर छात्रा को परीक्षा में पास कराने के नाम पर एक दलाल के साथ हम बिस्तर होने के लिये पे्ररित करने वाली उसकी सीनियर छात्रा ही इस रेकैट की मुख्य पात्र थी। हालांकि उसकी अबतक गिरफ्तारी नहीं हो सकी है। वहीं इस सेक्स रेकेट के पर्दाफाश होने के बाद कांड के मुख्य आरोपी राजू खान,रानी दुर्गावती विश्वविद्यालय के परीक्षा नियंत्रक एसएस राणा और सहायक कुलसचिव रवीन्द्र काकोड़िया सलाखों के पीछे पहुंच गये है।

इस मामले में संदिग्ध भूमिका निभाने वाली मेडीकल कालेज की वार्डन नेत्र रोग विभाग अध्यक्ष डा0 मीता श्रीवास्तव और उनके पति एनाटामी विभाग के अध्यक्ष डा० एसएस श्रीवास्तव को निलम्बन का आदेश थमा दिया गया है और मामले में उनकी संलिप्तता को देखते हुये उन्हें भी गिरफतार करने के मामले में पुलिस विचार कर रही है। एजुकेशन हब के रूप में मशहूर जबलपुर में हुई इस घटना की अगर ईमानदारी से खोजबीन की जाये तो कई प्रोफेसर, राजनेताओ, अधिकरियों के चेहरो पर पड़ा नकाब उठते देर नहीं लगेगी।

नेताजी सुभाष चंद्र मेडीकल कालेज के कुछ प्राध्यापकों,रानी दुर्गावती विश्वविद्यालय के कुछ वरिष्ठ अधिकारियों और इनके बीच दलाल के रूप में  काम कर रहे एक पूर्व छात्र नेता की इस कारगुजारी का भंडा अब भी नहीं फूट पाता,यदि एमबीबीएस प्रथम बर्ष की छात्रा संधू आर्य इसके खिलाफ आवाज न उठाती। छात्रावास में रह रही संधू आर्य ने वार्डन डॉ मीता श्रीवास्तव को बताया कि उसकी सीनियर छात्रा प्रेरणा ओटवाल अक्सर उससे झगड़ा करती है और उसके साथ मारपीट भी करती है।

संधू आर्य ने यह भी बताया कि प्रेरणा ओटवाल उससे गंदा काम करने के लिये भी कहती है और धमकी देती है कि यदि उसने उसकी बात नही मानी तो वह परीक्षा में कभी पास नहीं हो पायेगी। छात्रा की इस शिकायत पर डा0 मीता श्रीवास्तव कोई कार्यवाही करतीं, उल्टे उन्होंने संधू को डांटडपट कर चुप करवा दिया। धीरे-धीरे जब संधू आर्य को प्रेरणा अटवाल ने ज्यादा परेशान करना शुरू किया,तब संधू आर्य ने मेडीकल कालेज के डीन डा0केडी बघेल को एक लिखित शिकायत सौंपी जिसमें उसने एक अत्यंन्त सनसनीखेज आरोप लगाया।

संधू आर्य ने अपनी इस शिकायत में कहा कि उसकी सीनियर पे्ररणा ओटवाल उससे किसी राजू खान नामक व्यक्ति के साथ हमबिस्तर होने के लिये दबाव डाल रही हैं। संधू आर्य ने आगे लिखा कि ओटवाल बताती हैं कि अगर मैं राजू खान के साथ हमबिस्तर हुई तो उसे कोई फेल नहीं करा सकता। संधू ने अपनी शिकायत में यह भी कहा कि इसकी शिकायत उसने वार्डन डा0मीता श्रीवास्तव से भी की थी परतु उन्होंने उल्टा उसे ही चुप रहने की हिदायत दे दी.

कार्रवाई की मांग करते अवाभिप के छात्र
 मामला गंभीर होने के कारण कॉलेज प्रशासन ने इसे पूरी तरह गोपनीय बनाकर रखा। लेकिन अचानक मीडिया में लीक हो जाने से जबलपुर के शिक्षा जगत में भूचाल आ गया.एक छात्रा को परीक्षा में पास कराने के लिये अपना शरीर देने के इस आरोप ने मेडीकल के जूनियर डाक्टरों को उद्धेलित कर दिया। इधर अखिल विद्यार्थी परिषद भी इस मामले में कूद गया तो पता लगा कि जिस राजू खान का संधू आर्य ने अपनी शिकायत में उल्लेख किया था,वह रानी दुर्गावती विश्वविद्यालय का पूर्व छात्र नेता रह चुका है और वर्तमान में मेडीकल कालेज और रानी दुर्गावती विश्वविद्यालय में ठेकेदारी करता है।

मामला अब बेहद गरमा गया था। महिला और छात्र संगठनों के दबाव में डीन डॉ बघेल ने एक जांच समीति बना दी जिसमें उन्होंने डा0 मीता श्रीवास्तव को भी शामिल का दिया,जिसका जम कर विरोध हुआ। तब संभागीय आयुक्त प्रभात पाराशर ने एडीशनल कलेक्टर मनीषा सेतिया की अध्यक्षता में एक दूसरी जांच समीति बनाई जिसमें स्त्री रोग विभाग की अध्यक्ष डॉ शशि खरे, कैन्सर विभाग की अध्यक्ष डॉ पुष्पा किरार और अस्पतमाल की अधीक्षिका डॉ सविता वर्मा को शामिल किया गया। जिसका असर हुआ कि राजू खान ने पुलिस के समक्ष आत्मसमर्पण कर दिया, मगर प्रेरणा अटवाल फारार ही रही.

राजू खान की गिरफ्तारी पुलिस के लिये महत्वपूर्ण थी। पुलिस अधीक्षक संतोष सिंह ने राजू खान से पूछताछ की तो पता लगा कि यह पुराना रैकेट है, जिसमें वह कई वर्षों से काम कर रहा था। राजू खान ने बताया कि,‘पहले मेडीकल कालेज की छात्राओं को फेल कर दिया जाता था। फिर प्रेरणा ओटवाल के माध्यम से उन फेल छात्राओं को राजू खान से मिलवाया जाता था और ये लोग उसे पास कराने के नाम पर पचास हजार से लेकर एक लाख रूपये वसूल लेते थे। बाद में पुनर्मूल्यांकन का आवदेन लगा कर उन्हें पास कर दिया जाता था। इसमें कई छात्राओं की अस्मत का सौदा भी किया जाता था। यह सारा कुछ मेडिकल छात्राओं के भविष्य से जुड़ा होता था,इसलिये इसकी कभी कोई शिकायत नहीं होती थी।

दूसरी तरफ एमबीबीएस की कांपियां रानी दुर्गावती विश्वविद्याल के के मार्फत ही जंचने के लिये जाती थी, इसलिये परीक्षा और गोपनीय विभाग का संदेह के घेरे में आना लाजमी था। पुलिस ने राजू खान के बयानों के आधार पर रानी दुर्गावती विश्वविद्यालस के परीक्षा और गोपनीय विभाग में एक साथ छापा मारा और परीक्षा नियंत्रक एसएस राणा और सहायक कुलसचिव रवीन्द्र काकोड़िया को गिरफतार कर लिया। जबलपुर के शिक्षा जगत के इतिहास में यह पहला मौका था जब परीक्षा नियंत्रक और सहायक कुलसचिव स्तर के अधिकरियों को ऐसे मामले में गिरफतार किया गया हो।

इधर बढ़ते दबाव को देखते हुए स्वास्थ मंत्री महेन्द्र हार्डिया ने सेक्स रैकेट में शामिल डॉ मीता श्रीवास्तव और उनके पति डॉ एसएस श्रीवास्तव दोनों को ही निलंबित कर दिया। डॉ एसएस श्रीवास्तव पर आरोप था कि वे छात्राओं की रात में कक्षाएं  लगाया करते थे, जिसमें कुछ छात्राओं को सारी सुविधायें मुहैया करवाते थे और कुछ छात्राओं को कोई मदद नहीं दी जाती थी। बहरहाल इस मामले की कई और परतें अभी खुलनी बाकी हैं।



राज एक्सप्रेस और पीपुल्स समाचार में संपादक रह चुके चैतन्य भट्ट फिलहाल स्वतंत्र पत्रकार के रूप में काम कर रहे हैं। वे तीस बरसों से पत्रकारिता में सक्रिय हैं।







रमन सिंह की जानकारी में हुआ हमला - अग्निवेश


जनज्वार.छत्तीसगढ़ के दंतेवाडा  इलाके में सलवा जुडूम कार्यकर्ताओं और सुरक्षा बलों द्वारा 11 से 14 मार्च के बीच आदिवासियों के गांवों को फूंक दिये जाने के बाद राहत सामग्री ले जा रहे लोगों पर जानलेवा हमले हुए हैं। राहत सामग्री ले जाने वालों में सामाजिक कार्यकर्ता स्वामी अग्निवेश भी थे,जिन पर स्थानीय पुलिस के इशारे पर जानलेवा हमला किया गया।

आदिवासियों के जलाये गए घर : अभी सबूत चाहिए
 वहां से बाल-बाल बचकर आये स्वामी अग्निवेश ने दिल्ली में 26मार्च को आयोजित एक प्रेस वार्ता में कहा कि,‘मैं किसी तरह जान बचाकर भागा हूं,नहीं तो बलवाईयों की कोशिश हमें गाड़ी में ही जिंदा फूंकने की थी।’ हालांकि जाने से पहले अग्निवेश   ने छत्तीसगढ़ के डीजीपी विश्वरंजन से इस बावत बात की तो उन्होंने इसे माओवादी पत्रकारों का हौवा बताया था और कहा कि पत्रकारिता   में माओवादियों के एजेंट भरे हैं।

गौरतलब है कि छत्तीसगढ़ के  ताड़मेटला इलाके में 14मार्च को सलवा जुडूम के बलवाईयों ने आदिवासियों के 300सौ घरों को जलाकर खाक कर दिया था। यह वही इलाका है जहां पिछले वर्ष 6 अप्रैल को सुरक्षा बलों के 76 जवानों को माओवादियों ने एक हमले में मार डाला था। ऐसे में माना जा रहा है कि हमले के दोषी माओवादियों को पकड़ पाने में असमर्थ पुलिस ने सलवा-जुडूम कार्यकर्ताओं के साथ मिलकर उन गांवों को बदले की कार्यवाही में जला डाला है जिन गांवों की सीमा से माओवादियों ने कार्यवाई की थी।

बहरहाल, 14 मार्च के इस हमले का जिन आदिवासियों ने विरोध किया उन आदिवासियों को जान से मार दिया गया और 3महिलाओं से सामूहिक बलात्कार किया गया। घटना के तकरीबन 7 दिन बाद यह सूचना पहली बार अखबारों में तब आयी जब वनवासी चेतना आश्रम के हिमांशु कमार ने दिल्ली के पत्रकारों को मोबाइल के जरिये सूचित किया। इसी सूचना को पढ़कर 25 मार्च को राहत सामग्री लेकर पहुंची स्वामी अग्निवेश की टीम ताड़मेटला के उन जलाये गये गावों में पहुंच पाती उससे पहले सलवा जुडूम के लोगों ने वहां के एससएसपी कल्लूरी के इशारे पर हमला जानलेवा हमला किया और राहत सामग्री पहुंचाये बगैर वहां से स्वामी अग्निवेश का जान बचाकर भागना पड़ा।

सरकार कहती है : कुछ नहीं हुआ  
स्वामी अग्निवेश के मुताबिक वे अपने साथियों के साथ राहत सामग्री लेकर मोरपल्ली जाना चाहते थे। ये उन गांवों का इलाका था जहां 14 मार्च को आदिवासियों के घर जलाये गये थे, हत्याएं हुईं थीं और महिलाओं के साथ बलात्कार हुआ था। यह कृकत्य सरकारी सुरक्षा बल कोबरा फोर्स और कोया कमांडों ने किया था। अग्निवेश आगे कहते हैं कि,‘उस इलाके में हमें न सिर्फ जाने से रोका गया बल्कि सुनियोजित योजना के तहत मुझपर और साथ गये लोगों पर जानलेवा हमला किया गया।

 इन सबके पीछे दंतेवाड़ा के एसएसपी एसआरपी कल्लूरी का हाथ था। गाड़ियों के शीशे  तोड़े,अंडे और पत्थर फेंककर प्राणघातक हमले किये। वह तो ईश्वर की कृपा है कि दिल्ली वापस आ गया हूं अन्यथा वहां हमें मार दिया जाता या फिर हमें गाड़ी समेत जिंदा जला दिया जाता।’  यह पूछने पर कि, क्या यह हमला मुख्यमंत्री रमन  सिंह की  जानकारी  के बगैर हुआ होगा, तो अग्निवेश ने कहा कि, 'ऐसा नहीं है. इन सभी वारदातों से मुख्यमंत्री पूरी तरह परिचित होंगे और उनकी जानकारी में हुआ होगा.'
इस जघन्य वारदात को अंजाम देने वाले कल्लुरी को सिर्फ दंतेवाड़ा से सरगुजा जिले में तबादला कर मुख्यमंत्री रमन सिंह अपने कर्तव्य की इती श्री कर ली है। जबकि कल्लूरी पर पहले से कई आपराधिक मामले हैं। इसी के मद्देजनर 7 जंतर-मंतर रोड दिल्ली में आयोजित प्रेस वार्ता में अग्निवेश ने कहा कि, ‘कल्लूरी जैसे अपराधी को तत्काल निलंबित किया जाना चाहिए और एफआइआर दर्ज होनी चाहिए। लेकिन कल्लूरी को पिछले कई वर्षों से आखिर किन मजबूरियों में रमन सिंह की सरकार सह दे रही है। दूसरा जिसके खिलाफ एफआइआर दर्ज कर जेल में डाला जाना चाहिए उसे सरकार सरगुजा का डीआइजी बनाकर भेज दी है।’

जाहिर यह सब करके कल्लूरी अपने काले कारनामों का ही छुपाने की कोशिश कर रहे थे,जिसमें वह अबतक सफल भी हैं। क्योंकि जलाये गये आदिवासियों के गांवों से जो सूचनाएं आ रही हैं वह सच कितना प्रतिशत हैं कहना मुश्किल है। एक जानकारी के मुताबिक वहां 14 मार्च के बाद पांच से अधिक लोग भूख से मर चूके हैं और दो आदिवासी किसानों ने आत्महत्या कर ली है।


डीजीपी कहते हैं, माओवादी पत्रकारों का हौवा  है

दूसरा जिला प्रशासन की कल्लूरी के आगे क्या औकात है उसका अंदाजा यहां तक कि पत्रकारों को रोक रहे थे। हमारे साथ गये पत्रकारों को पीटा और उनके कैमरे तोड़ दिये। इससे जाहिर है कि रमन सिंह कल्लूरी के प्रति नरमदिल हैं और उनको बचाये रखने की लगातार जुगत में है।

मैं मांग करता हूं कि मुख्यमंत्री इस पूरे घटनाक्रम की नैतिक जिम्मेदारी लें और उच्चतम न्यायालय के सेवानिवृत न्यायधीश से जांच करायें। उससे पहले वह अपने हेलीकाप्टरों से जलाये और तबाह किये गये गांवों में राहत सामग्री पहुंचाये जाने की गारंटी भी करें। खबर आ रही है कि उन गांवों में 5लोग भूख से मर चुके हैं और दो और लोगों ने आत्महत्या कर ली है। यह सब कुछ ठीक से हो इसके लिए जरूरी है कि कल्लूरी जैसे अपराधी अधिकारी को तत्काल निलंबित कर मुख्यमंत्री दंडित करें।

फोटो- यशवंत रामटेके

बाग बगीचा दिखे हरियर



वरिष्ठ पत्रकार और रविवार डॉट कॉम के संपादक अलोक पुतुल के जरिये एक प्रसिद्ध छत्तीसगढ़ी गीत हमें सुनने को मिला. अब इसके  ऑडियो को आप भी सुनें...आलोक जी ने हिंदी पाठकों की सुविधा के लिए छत्तीसगढ़ी से अनुवाद कर हमतक कुछ इस तरह से प्रेषित किया था... 



एक थे केदार यादव. छत्तीसगढ़ी में अपनी तरह की आवाज़ वाले केदार यादव ने सैकड़ों गीत गाये. 70 के दशक में गांव-गांव में उनकी धमक थी. आज बहुत दिनों के बाद उनका एक गीत मिला. शायद आप सबको  भी अच्छा लगे.


गीत के बोल हैं-

बाग बगीचा दिखे ल हरियर

दुरूग वाला नई दिखे बदे हव नरियर

मोर झूल तरी

मोर झूल तरी गेंदा इंजन गाड़ी सेमर फूलगे

सेमर फूलगे अगास मन चिटुको घड़ी नरवा मा

नरवा मा अगोर लेबे नयानी


बाग और बगीचे हरे-भरे दिख रहे हैं। पर दुर्ग (छत्तीसगढ़ का एक शहर) वाला नहीं दिख रहा है। मैंने उसके लिए मन्नत मांगी है, नारियल चढ़ाया है। मेरे सर पर कलँगी है, गले में गेंदे का फुल है। हृदय रेल के इंजन की तरह धड़क रहा है। जिस तरह सेमल के ऊँचे ऊँचे पेड़ों में फुल आ गए हैं उसी तरह मेरे होठों पर सेमल फुल सी लाली है। मेरे प्रिय थोड़ी देर के लिए नाले पर मेरी प्रतीक्षा कर लेना।

आगे आप खुद ही सुनें...




Mar 28, 2011

नक्सली कहने की 'महाछूट'


मानवाधिकार आयोग की जांच कहती है कि गांव के दो नौजवान अपने पशुओं को खोजने घर से बाहर निकले थे, जबकि  पुलिस दल ने उन पर अंधाधुंध फ़ायरिंग की...

अनिल मिश्र

पश्चिम बंगाल के लालगढ़  इलाके के नेताई गांव में 7 जनवरी को  सत्ताधारी राजनीतिक दल के सशस्त्र कैडरों ने बारह ग्रामीणों की गोली मारकर हत्या कर दी थी. उच्चतम न्यायालय की एक खंडपीठ ने इस मामले की याचिका पर 16 मार्च को सुनवाई करते हुये जो टिप्पणी की, वह बहुत महत्त्वपूर्ण है.

पश्चिम  बंगाल सरकार के पब्लिक प्रॉस्क्यूटर ने कहा कि मारे गए सभी लोग ’नक्सली’ थे. उच्चतम न्यायालय ने इस पर पश्चिम बंगाल सरकार को कड़ी फटकार लगाते हुए कहा  ’हम इस तथ्य से वाक़िफ़ हैं कि सुविधा संपन्न लोग सुविधाविहीन लोगों की मांगों को अवैधानिक ठहराने के लिए ’नक्सली’ ब्रांड का इस्तेमाल करते हैं.’ अदालत  ने आगे कहा कि ’देश के आधे से अधिक हिस्सों में क़ानून विहीनता (लॉ लेसनेस) है. ’नक्सली’ शब्द का ऐसे इस्तेमाल कर  हत्याओं को उचित नहीं ठहराया जा सकता.’

उच्चतम न्यायालय की यह टिप्पणी और भी अहमियत इसलिए रखती है क्योंकि सरकारें लगातार कॉर्पोरेट तंत्र के दबाव में झुकती चली जा रही हैं और एक से बढ़कर एक जनविरोधी क़दम उठा रही हैं. मौलिक अधिकारों की जो गारंटी संविधान में प्रदान की गई है उसकी रक्षा कर पाने में सरकारें पूरी तरह विफल साबित हो रही हैं. उदारीकरण के वर्तमान, तीसरे चरण में ’विकास’ के नाम पर सत्ताधारी वर्ग की असहिष्णुता अब एक सनक की शक्ल अख़्तियार कर चुकी है.

इसके पहले,  उच्चतम न्यायालय ने ’विकास’ के बारे में जो टिप्पणी की थी उसका भी आशय कुछ इस तरह का था कि 'ग़रीबों की आजीविका, मकान और पर्यावरण को तहस नहस करने वाला कोई विकास अपेक्षित नहीं है. निश्चित ही, विदेशी पूंजी के खेल के आगे नतमस्तक हमारे राजनीतिक नेतृत्व के लिए यह टिप्पणी किरकिरी जैसी रही होगी. हाल ही में ओडिशा के मानवाधिकार आयोग ने अपनी एक स्वतंत्र जांच रिपोर्ट में कहा है कि 2008 में कोरापुट जिले में पुलिस ने जिन दो लोगों को ’नक्सली’ कहकर मारा था वे ग्रामीण थे, जो अपने पशुओं को घर से बाहर बाड़े में बांधने निकले थे.

मानवाधिकार आयोग ने मृतकों के परिजनों को मुआवज़ा देने की भी सिफ़ारिश की है. मानवाधिकार आयोग की जांच के मुताबिक़ जिला पुलिस के नेतृत्व में सीआरपीएफ़ के गश्ती दल ने इस फ़ायरिंग की जो कहानी गढ़ी थी वह परस्पर अंतर्विरोधी और बेबुनियाद दिखती है.पुलिस दल के प्रभारी थानाध्यक्ष के मुताबिक़ उन्हें ’विश्वस्त’ सूचना मिली थी कि इलाक़े में कुछ ’माओवादी नक्सली’ तत्व आए हैं. गश्त के दौरान रात के अंधेरे में जब उन्होंने ’नाइट विज़न’ यंत्र से देखा कि कुछ लोगों का समूह उनकी ओर बढ़ा चला आ रहा है और गोलियां चला रहा है तो पुलिस ने जवाबी कारवाई में दो ’नक्सलियों’ को मार गिराया.

मानवाधिकार आयोग की जांच कहती है कि गांव के दो नौजवान अपने पशुओं को खोजने के लिए घर से बाहर निकले थे, क्योंकि उनके बैल रस्सी तुड़ाकर भाग गए थे. पुलिस दल ने उन पर अंधाधुंध फ़ायरिंग की, जिसमें दो युवकों की मौत हो गई और कई बैलों ने घटनास्थल पर ही दम तोड़ दिया. एक ग्रामीण इस हमले मे बुरी तरह घायल हुआ था, जिसने किसी तरह परिवार वालों को घटना की ख़बर दी.

जाहिर है, देश के आधे से भी अधिक हिस्सों में क़ानून नहीं है. आगे का सच यह है कि देश के अधिकांश हिस्सों में या तो कोई क़ायदे-क़ानून नहीं हैं या फिर ऐसे नियम-क़ानून हैं जिनके आधार पर सुप्रीम कोर्ट की इस टिप्पणी को भी अगर कभी ’देशद्रोही’ क़रार दिया जाए तो कोई ख़ास हैरानी नहीं होनी चाहिए. 'छत्तीसगढ़ विशेष जन सुरक्षा अधिनियम' एक ऐसा ही अंधा क़ानून है जिसमें (नक्सली जैसे) शब्दों के झोलदार इस्तेमाल द्वारा किसी भी तरह के अपराध करने की आधिकारिक छूट हासिल की गई है.



महात्मा गाँधी हिंदी विश्वविद्यालय वर्धा से मीडिया में शोध और स्वतंत्र लेखन. इनसे   anamil.anu@gmail.com   पर संपर्क किया जा सकता है.


 
 
 
 
 

बुंदेलखंड में एक और बलात्कार कांड


दुराचार की तहकीकात करने के बाद जब बालिका का मेडिकल जांच कराया गया तो बर्थ सर्टीफिकेट में महज 13वर्ष की मीरा को बालिग करार दिया गया...

आशीष  सागर

उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ के पे्रस क्लब सभागार में 26मार्च को एक नये सामूहिक बलात्कार कांड का खुलासा हुआ है। यह खुलासा ह्यूमन राइट्स लॉ नेटवर्क व यूरोपीयन यूनियन की संयुक्त जनसुनवाई कार्यक्रम में मानवाधिकार के हनन् मामलों की बैठक में हुआ।

बांदा के शीलू बलात्कार कांड के बाद प्रदेश में दलितों और गरीबों की स्थिति का यह दूसरा नमूना है जहां उनके साथ अत्याचार होने के बाद सुनवाई नहीं होती। इस जनसुनवाई में अपने पिता पुन्ना के साथ आयी बलात्कार पीड़िता मीरा(13 वर्षीय) ने जब सबके सामने 11 दिनों तक हुए बलात्कार का उल्लेख करना शुरू किया तो रोंगटे खड़े हो गये।

मामला बुंदेलखंड के चिल्ला थाना के महेदु गांव का है। लगभग पांच महीने पहले 22 नवंबर को पीड़िता को उसके गांव महेदू से शाम 4.30 बजे उसके पड़ोसी और मुख्य आरोपी बिज्जू ने अपने 4 अन्य साथियों के साथ मिलकर मीरा को अगवा कर लिया था। अगवा कर मीरा को दरिंदे टैम्पों से मकरी गांव ले गये, जहां एक रात रुकने के बाद उसे बन्धक बनाकर भरूवां सुमेरपुर में दो रात हवस का शिकार बनाया गया।

फिर जनपद बांदा के खाईपार मुहल्ला में आरोपियों ने अपने ही परिचित के यहां पीड़िता से 8रात तक लगातार सामूहिक बलात्कार किया। मीरा के गायब होने के 9दिनांे बाद लिखी एफआईआर के बाद हरकत में आई पुलिस पीड़िता को बलात्कारियों के कब्जे से छुड़ा पायी।

दुराचार की तहकीकात करने के बाद जब बालिका का मेडिकल जांच कराया गया तो बर्थ सर्टीफिकेट में महज 13वर्ष की मीरा को बालिग करार दिया गया। शुक्र यह रहा कि मेडिकल रिपोर्ट में डॉक्टरों ने बलात्कार की पुष्टि की थी। अन्यथा कई बार प्रदेश में ऐसे मामले सामने आते रहे हैं जहां पीड़ित यहीं नही साबित कर पाती कि उसके साथ बलात्कार हुआ है।

बावजूद इसके बलात्कार की यह जघन्य वारदात बहुचर्चित शीलू काण्ड़ की तरह प्रदेश या देश में मुद्दा नहीं बन सकी है। शायद इसलिए कि इस बलात्कार से किसी नेता का कैरियर बनना या तबाह होना नहीं था। 11 दिनों  की पुलिसिया आंख मिचैली और घटना के 9 दिनो बाद लिखी गई एफआईआर रिपोर्ट के बाद भी यह मामला किसी चैनल या अखबार की सुर्खियों में नहीं आ सका।

बहरहाल,बलात्कार पीड़िता मीरा जिस जन सुनवाई में अपने दुख का बयान कर आयी है उससे कुछ उम्मीद जरूर है। क्योंकि उसमें बतौर ज्यूरी सदस्य डॉ रूप रेखा वर्मा,पूर्व पुलिस महानिरिक्षक एसआर दारापुरी, रूहेलखंड विश्वविद्यालय के वीसी प्रदीप कुमार, इलाहाबाद उच्च न्यायालय के वरिष्ठ अधिवक्ता केके रॉय और पीवीसीएचआर के डॉ लेलिन रघुवंशी मौजूद थे।

छात्रा के साथ सपा नेता ने किया बलात्कार


लड़की अभी कोमा में है और पुलिस बयान के इंतज़ार  में है. उधर अपराधी खुले घूम  रहे हैं और पीड़ित परिवार से  बयान वापस लेने का दबाव बना रहे हैं...


जनज्वार. उत्तर प्रदेश के देवरिया जिले में समाजवादी पार्टी के जिला कोषाध्यक्ष ने बीए प्रथम वर्ष की छात्रा के साथ कथित रूप से बलात्कार किया है. लेकिन पुलिस ने अभीतक इस मामले में कोई कदम नहीं  उठाया है.आरोपी अप्पू मणि  त्रिपाठी  सपा विधायक ब्रह्मा शंकर तिवारी का रिश्तेदार बताया जा  रहा  है. 

समाजवादी पार्टी के जिला कोषाध्यक्ष अप्पू मणि  ने कथित तौर पर अगवा कर 19 वर्षीय लड़की के साथ दुष्कर्म किया है। मामले की शिकायत दर्ज करा दी गई है लेकिन अभी तक किसी को हिरासत में नहीं लिया गया है। इस मामले में पुलिस की निष्क्रियता को लेकर अखिल भारतीय प्रगतिशील महिला एसोसिएशन (एपवा )  जिला मुख्यालय पर सोमवार को धरना प्रदर्शन करेगी ।


सपा प्रमुख मुलायम सिंह : किसके पक्ष में

आरोपी सपा जिला कोषाध्यक्ष अप्पू मणि त्रिपाठी कसया विधानसभा क्षेत्र के विधायक ब्रह्माशंकर तिवारी का रिश्तेदार बताया जा रहा है। इसकी वजह से पुलिस महकमे पर दबाव देखा जा रहा और अभी तक इस सिलसिले में कोई कार्रवाई नहीं की गई है।

घटना 20मार्च होली के दिन की है। बाबा राघवदास स्नातकोत्तर महाविद्यालय में स्नातक प्रथम वर्ष की छात्रा बबली (बदला हुआ नाम) अपने रिश्तेदार के घर जा रही थी। उसी दौरान रास्ते में कुछ लोगों ने उसे रोका और मुंह पर कुछ लगा दिया,जिससे लड़की बेहोश हो गई। होश आने के बाद लड़की ने खुद को अस्पताल में पाया। उक्त बातें पीड़िता के मामा जेपी मिश्रा ने लड़की के हवाले से बताया।

लड़की के मामा ने बताया कि  बबली 20 मार्च से लापता थी। 21 मार्च को पुलिस के पास गुमशुदगी की रिपोर्ट दर्ज कराई गई। इसके बाद 23 मार्च को एक शख्स का फोन आया कि अपनी लड़की को लेने के लिए देवरिया खास इलाके में कौशल्या भवन आ जाइए। वहां पहुंचने के बाद अप्पू के चाचा व कांग्रेस नेता मुकुल मणि त्रिपाठी ने लड़की के अपने घर में होने से इंकार कर दिया। बबली जिले के भटनी थाना क्षेत्र में मिश्रौली दीक्षित गांव की रहने वाली है।

उसके बाद लड़की के मामा को फोन करने वाले ने  दुबारा  बताया कि आपकी लड़की बीआरडी कॉलेज के पीछे रेलवे लाइन पर बेहोश पड़ी हुई है। फोन करने वाले के बातचीत के आधार पर बबली के मामा रेलवे लाइन के किनारे पहुँचते उससे पहले फिर एक बार फोन आया और अबकी सदर अस्पताल में लड़की के होने की बात बताई गयी. 

इस मामले में कार्रवाई के बावत पूछने पर भटनी थाना के थानाध्यक्ष  ने बताया कि अक्कू मणि और बड़े मिश्र के खिलाफ  एफआइआर  दर्ज कर ली गयी है,लड़की के ठीक होने के बाद उसका बयान दर्ज किया जाएगा और कोई कार्रवाई होगी।

ऐसे में सूबे की सरकार और खासकर महिला मुख्यमंत्री मायावती के प्रशासन पर सवाल खड़े होते हैं कि अगर लड़की बयां नहीं दे पायेगी तो क्या कार्रवाई नहीं होगी.    वहीं लड़की के परिजनों पर तमाम तरह से दबाव डाले जा रहे हैं और मामले को मोड़ने के प्रयास किए जा रहे हैं।



 
इस सम्बंध में और जानकारी के लिए इनसे बात की जा सकती है।

जेपी मिश्रा-08423752550

भटनी थानाध्यक्ष देवेंद्र सिंह-09454401409

संघर्ष की संस्कृति के कमांडर कमला प्रसाद


कमलाजी की प्रतिष्ठा आलोचक के रूप में, लेखक व संपादक के रूप में भी खूब रही है। लेकिन मेरा मानना है कि उन्होंने सांगठनिक कार्य का चयन अपनी प्राथमिकता के तौर पर कर लिया था...


विनीत तिवारी
उनसे आप लड़ सकते थे, नाराज हो सकते थे, लेकिन वो लड़ाई और नाराजगी कायम नहीं रह सकती थी। वो आलोचक थे इसलिए विश्लेषण उनका सहज स्वभाव था,और साथ ही वे संगठनकर्ता थे इसलिए अपनी आलोचना सुनने,काम करने के दौरान हुई खामियों को दुरुस्त करने और दूसरों को गलतियाँ सुधारने का भरपूर मौका देने का जबर्दस्त संयम उनके पास था।

कोई अगर एक अच्छे कार्यक्रम की अस्पष्ट सी आकांक्षा भी प्रकट कर दे तो वे उसके सामने ही संसाधनों के प्रबंध से लेकर वक्ता, विषय आदि सबका पूरा विस्तृत खाका खींच निश्चित कर देते थे कि कार्यक्रम हो। सक्रियता और गतिविधि में उनका गहरा यकीन था। वे कहते भी थे कि अगर कुछ हो रहा है तो उसमें कुछ गलत भी हो सकता है और उसे ठीक भी किया जा सकता है। पूरी तरह पवित्र और सही तो वही बने रह सकते हैं जो कुछ करते ही न हों।

मध्य प्रदेश के प्रगतिशील लेखक संघ के महासचिव होने के नाते मेरा अनेक इकाइयों में जाना हुआ और हर जगह कोने-कोने में छोटे-बड़े अनेक साहित्यकार कमलाजी के साथ अपने परिचय का जिक्र करते। ये देखने का तो मौका नहीं मुझे मिला लेकिन अंबुजजी, हरिओम, योगेश वगैरह से कितनी ही बार ये जाना कि कमलाजी ने एक संगठनकर्ता के नाते कितनी ही असुविधाजनक यात्राएँ कीं। कहीं से इकाई बनाने का संकेत मिलते ही शनिवार-रविवार की छुट्टी में चल देते थे। रिजर्वेशन तो दूर की बात, कभी-कभी सीट न मिलने पर भी घंटों खड़े रहकर संगठन के विस्तार की चाह में दूर-दूर दौड़े जाते थे।

वे अपने वैचारिक और सांगठनिक गुरू परसाईजी को कहा करते थे और कमलाजी ने अपने गुरू के नाम और काम को आगे ही बढ़ाया। नामवरजी से लेकर होशंगाबाद के गोपीकांत घोष तक उन्हें कमांडर कहते थे और कार्यक्रम व योजना वे कमांडर की ही तरह बनाते भी थे और फिर एक साधारण कार्यकर्ता की तरह काम में हिस्सा भी बँटाते थे,लेकिन कभी शायद ही किसी ने उन्हें आदेशात्मक भाषा में बात करते सुना हो।

उल्टे हम कुछ साथियों को तो कई बार कुछ अयोग्य व्यक्तियों के प्रति उनकी उतनी विनम्रता भी बर्दाश्त नहीं होती थी। लेकिन सांस्कृतिक संगठन बनाने का काम तुनकमिजाजी और अक्खड़पन से नहीं बल्कि तर्क, विनय और दृढ़ता के योग से बनता है - ये सीख हमने उनके काम को देखते-देखते हासिल की। उनको याद करते हुए राजेन्द्र शर्मा की याद न आये,ये मुमकिन ही नहीं। राजेन्द्रजी ने जैसे कमलाजी के काम के वजन में जितना हो सके उतना हिस्सा बँटाने को ही अपना मिशन बना लिया था।

कमलाजी की प्रतिष्ठा आलोचक के रूप में, लेखक व संपादक के रूप में भी खूब रही है। लेकिन मेरा मानना है कि उन्होंने सांगठनिक कार्य का चयन अपनी प्राथमिकता के तौर पर कर लिया था और इसलिए अपनी लेखकीय क्षमताओं के भरपूर दोहन के बारे में वे बहुत सजग कभी नहीं रहे। उनका अपना लेखन,किसी हद तक पठन-पाठन भी संगठन के रोज के कामों के चलते किसी न किसी तरह प्रभावित होता ही था। फिर भी उन्होंने खूब लिखा।

‘वसुधा’ में उनके संपादकीय तो अनेक रचनाकारों के लिए राजनीतिक व संस्कृतिकर्म के रिश्तों की बुनियादी शिक्षा और अनेक के लिए रचनात्मक असहमति व लेखन के लिए उकसावा भी हुआ करते थे। लेकिन वो ऐसे लोगों की बिरादरी में थे जिन्होंने संगठन के लिए,और नये रचनाकार तैयार करने के लिए अपने खुद के लेखक की महत्त्वाकांक्षा को कहीं पीछे छोड़ दिया था।

प्रगतिशील लेखक संगठन का देश भर में विस्तार। पहले हिन्दी क्षेत्र में संगठन को एक साथ सक्रिय करना, फिर उर्दू के लेखकों से संपर्क और हिन्दी-उर्दू की प्रगतिशील ताकतों को इकट्ठा करना, फिर कश्मीर में, उत्तर-पूर्व में, बंगाल में और दक्षिण भारत में संगठन का आधार तैयार करना, और फिर समान विचार वाले संगठनों से भी संवाद कायम करना, इस सबके साथ-साथ ‘वसुधा’ का संपादन - दरअसल इतना काम आदमी कर ही तब सकता है जब उसके सामने एक बड़ा लक्ष्य हो। ये एक बड़े विज़न वाले व्यक्ति की कार्यपद्धति थी।

करीब एक महीना पहले जब कालीकट, केरल में हम लोग राष्ट्रीय कार्य परिषद की बैठक में साथ में थे तभी देश भर से आये संगठन के प्रतिनिधियों ने बेहद प्यार और सम्मान के साथ उनका 75वाँ जन्मदिन वहीं सामूहिक रूप से मनाया था। कैंसर के उनके शरीर पर असर भले दिखने लगे थे लेकिन कैंसर उनके मन पर बिल्कुल बेअसर था। वहाँ बैठक में और बाद में केरल से भोपाल तक के सफर के दौरान उनके पास ढेर सारे सांगठनिक कामों की फेहरिस्त थी,ढेर सारी योजनाएँ थीं। साम्प्रदायिक और साम्राज्यवादी ताकतों से अपने सांस्कृतिक औजारों से किस तरह मुकाबला किया जाए,किस तरह हम समाजवादी दुनिया के निर्माण में एक ईंट लगाने की अपनी भूमिका ठीक से निभा सकें, ये सोचते उनका मन कभी थकता नहीं था।

उनके जाने से उस पूरी प्रक्रिया में ही एक अवरोध आएगा जो कमलाजी ने शुरू की थी लेकिन हम उम्मीद करें कि देश में उनके जोड़े इतने सारे लेखक मिलकर उसे रुकने नहीं देंगे, आगे बढ़ाएँगे, यही उनके जाने के बाद उन्हें उपने साथ बनाये रखने का तरीका है और यही उनके प्रति श्रद्धांजलि भी।



(लेखक प्रगतिशील लेखक संघ के  मध्य प्रदेश इकाई के महासचिव हैं,उनसे  comvineet@gmail.com पर संपर्क किया जा सकता है।)