Mar 29, 2011

रमन सिंह की जानकारी में हुआ हमला - अग्निवेश


जनज्वार.छत्तीसगढ़ के दंतेवाडा  इलाके में सलवा जुडूम कार्यकर्ताओं और सुरक्षा बलों द्वारा 11 से 14 मार्च के बीच आदिवासियों के गांवों को फूंक दिये जाने के बाद राहत सामग्री ले जा रहे लोगों पर जानलेवा हमले हुए हैं। राहत सामग्री ले जाने वालों में सामाजिक कार्यकर्ता स्वामी अग्निवेश भी थे,जिन पर स्थानीय पुलिस के इशारे पर जानलेवा हमला किया गया।

आदिवासियों के जलाये गए घर : अभी सबूत चाहिए
 वहां से बाल-बाल बचकर आये स्वामी अग्निवेश ने दिल्ली में 26मार्च को आयोजित एक प्रेस वार्ता में कहा कि,‘मैं किसी तरह जान बचाकर भागा हूं,नहीं तो बलवाईयों की कोशिश हमें गाड़ी में ही जिंदा फूंकने की थी।’ हालांकि जाने से पहले अग्निवेश   ने छत्तीसगढ़ के डीजीपी विश्वरंजन से इस बावत बात की तो उन्होंने इसे माओवादी पत्रकारों का हौवा बताया था और कहा कि पत्रकारिता   में माओवादियों के एजेंट भरे हैं।

गौरतलब है कि छत्तीसगढ़ के  ताड़मेटला इलाके में 14मार्च को सलवा जुडूम के बलवाईयों ने आदिवासियों के 300सौ घरों को जलाकर खाक कर दिया था। यह वही इलाका है जहां पिछले वर्ष 6 अप्रैल को सुरक्षा बलों के 76 जवानों को माओवादियों ने एक हमले में मार डाला था। ऐसे में माना जा रहा है कि हमले के दोषी माओवादियों को पकड़ पाने में असमर्थ पुलिस ने सलवा-जुडूम कार्यकर्ताओं के साथ मिलकर उन गांवों को बदले की कार्यवाही में जला डाला है जिन गांवों की सीमा से माओवादियों ने कार्यवाई की थी।

बहरहाल, 14 मार्च के इस हमले का जिन आदिवासियों ने विरोध किया उन आदिवासियों को जान से मार दिया गया और 3महिलाओं से सामूहिक बलात्कार किया गया। घटना के तकरीबन 7 दिन बाद यह सूचना पहली बार अखबारों में तब आयी जब वनवासी चेतना आश्रम के हिमांशु कमार ने दिल्ली के पत्रकारों को मोबाइल के जरिये सूचित किया। इसी सूचना को पढ़कर 25 मार्च को राहत सामग्री लेकर पहुंची स्वामी अग्निवेश की टीम ताड़मेटला के उन जलाये गये गावों में पहुंच पाती उससे पहले सलवा जुडूम के लोगों ने वहां के एससएसपी कल्लूरी के इशारे पर हमला जानलेवा हमला किया और राहत सामग्री पहुंचाये बगैर वहां से स्वामी अग्निवेश का जान बचाकर भागना पड़ा।

सरकार कहती है : कुछ नहीं हुआ  
स्वामी अग्निवेश के मुताबिक वे अपने साथियों के साथ राहत सामग्री लेकर मोरपल्ली जाना चाहते थे। ये उन गांवों का इलाका था जहां 14 मार्च को आदिवासियों के घर जलाये गये थे, हत्याएं हुईं थीं और महिलाओं के साथ बलात्कार हुआ था। यह कृकत्य सरकारी सुरक्षा बल कोबरा फोर्स और कोया कमांडों ने किया था। अग्निवेश आगे कहते हैं कि,‘उस इलाके में हमें न सिर्फ जाने से रोका गया बल्कि सुनियोजित योजना के तहत मुझपर और साथ गये लोगों पर जानलेवा हमला किया गया।

 इन सबके पीछे दंतेवाड़ा के एसएसपी एसआरपी कल्लूरी का हाथ था। गाड़ियों के शीशे  तोड़े,अंडे और पत्थर फेंककर प्राणघातक हमले किये। वह तो ईश्वर की कृपा है कि दिल्ली वापस आ गया हूं अन्यथा वहां हमें मार दिया जाता या फिर हमें गाड़ी समेत जिंदा जला दिया जाता।’  यह पूछने पर कि, क्या यह हमला मुख्यमंत्री रमन  सिंह की  जानकारी  के बगैर हुआ होगा, तो अग्निवेश ने कहा कि, 'ऐसा नहीं है. इन सभी वारदातों से मुख्यमंत्री पूरी तरह परिचित होंगे और उनकी जानकारी में हुआ होगा.'
इस जघन्य वारदात को अंजाम देने वाले कल्लुरी को सिर्फ दंतेवाड़ा से सरगुजा जिले में तबादला कर मुख्यमंत्री रमन सिंह अपने कर्तव्य की इती श्री कर ली है। जबकि कल्लूरी पर पहले से कई आपराधिक मामले हैं। इसी के मद्देजनर 7 जंतर-मंतर रोड दिल्ली में आयोजित प्रेस वार्ता में अग्निवेश ने कहा कि, ‘कल्लूरी जैसे अपराधी को तत्काल निलंबित किया जाना चाहिए और एफआइआर दर्ज होनी चाहिए। लेकिन कल्लूरी को पिछले कई वर्षों से आखिर किन मजबूरियों में रमन सिंह की सरकार सह दे रही है। दूसरा जिसके खिलाफ एफआइआर दर्ज कर जेल में डाला जाना चाहिए उसे सरकार सरगुजा का डीआइजी बनाकर भेज दी है।’

जाहिर यह सब करके कल्लूरी अपने काले कारनामों का ही छुपाने की कोशिश कर रहे थे,जिसमें वह अबतक सफल भी हैं। क्योंकि जलाये गये आदिवासियों के गांवों से जो सूचनाएं आ रही हैं वह सच कितना प्रतिशत हैं कहना मुश्किल है। एक जानकारी के मुताबिक वहां 14 मार्च के बाद पांच से अधिक लोग भूख से मर चूके हैं और दो आदिवासी किसानों ने आत्महत्या कर ली है।


डीजीपी कहते हैं, माओवादी पत्रकारों का हौवा  है

दूसरा जिला प्रशासन की कल्लूरी के आगे क्या औकात है उसका अंदाजा यहां तक कि पत्रकारों को रोक रहे थे। हमारे साथ गये पत्रकारों को पीटा और उनके कैमरे तोड़ दिये। इससे जाहिर है कि रमन सिंह कल्लूरी के प्रति नरमदिल हैं और उनको बचाये रखने की लगातार जुगत में है।

मैं मांग करता हूं कि मुख्यमंत्री इस पूरे घटनाक्रम की नैतिक जिम्मेदारी लें और उच्चतम न्यायालय के सेवानिवृत न्यायधीश से जांच करायें। उससे पहले वह अपने हेलीकाप्टरों से जलाये और तबाह किये गये गांवों में राहत सामग्री पहुंचाये जाने की गारंटी भी करें। खबर आ रही है कि उन गांवों में 5लोग भूख से मर चुके हैं और दो और लोगों ने आत्महत्या कर ली है। यह सब कुछ ठीक से हो इसके लिए जरूरी है कि कल्लूरी जैसे अपराधी अधिकारी को तत्काल निलंबित कर मुख्यमंत्री दंडित करें।

फोटो- यशवंत रामटेके

बाग बगीचा दिखे हरियर



वरिष्ठ पत्रकार और रविवार डॉट कॉम के संपादक अलोक पुतुल के जरिये एक प्रसिद्ध छत्तीसगढ़ी गीत हमें सुनने को मिला. अब इसके  ऑडियो को आप भी सुनें...आलोक जी ने हिंदी पाठकों की सुविधा के लिए छत्तीसगढ़ी से अनुवाद कर हमतक कुछ इस तरह से प्रेषित किया था... 



एक थे केदार यादव. छत्तीसगढ़ी में अपनी तरह की आवाज़ वाले केदार यादव ने सैकड़ों गीत गाये. 70 के दशक में गांव-गांव में उनकी धमक थी. आज बहुत दिनों के बाद उनका एक गीत मिला. शायद आप सबको  भी अच्छा लगे.


गीत के बोल हैं-

बाग बगीचा दिखे ल हरियर

दुरूग वाला नई दिखे बदे हव नरियर

मोर झूल तरी

मोर झूल तरी गेंदा इंजन गाड़ी सेमर फूलगे

सेमर फूलगे अगास मन चिटुको घड़ी नरवा मा

नरवा मा अगोर लेबे नयानी


बाग और बगीचे हरे-भरे दिख रहे हैं। पर दुर्ग (छत्तीसगढ़ का एक शहर) वाला नहीं दिख रहा है। मैंने उसके लिए मन्नत मांगी है, नारियल चढ़ाया है। मेरे सर पर कलँगी है, गले में गेंदे का फुल है। हृदय रेल के इंजन की तरह धड़क रहा है। जिस तरह सेमल के ऊँचे ऊँचे पेड़ों में फुल आ गए हैं उसी तरह मेरे होठों पर सेमल फुल सी लाली है। मेरे प्रिय थोड़ी देर के लिए नाले पर मेरी प्रतीक्षा कर लेना।

आगे आप खुद ही सुनें...




Mar 28, 2011

नक्सली कहने की 'महाछूट'


मानवाधिकार आयोग की जांच कहती है कि गांव के दो नौजवान अपने पशुओं को खोजने घर से बाहर निकले थे, जबकि  पुलिस दल ने उन पर अंधाधुंध फ़ायरिंग की...

अनिल मिश्र

पश्चिम बंगाल के लालगढ़  इलाके के नेताई गांव में 7 जनवरी को  सत्ताधारी राजनीतिक दल के सशस्त्र कैडरों ने बारह ग्रामीणों की गोली मारकर हत्या कर दी थी. उच्चतम न्यायालय की एक खंडपीठ ने इस मामले की याचिका पर 16 मार्च को सुनवाई करते हुये जो टिप्पणी की, वह बहुत महत्त्वपूर्ण है.

पश्चिम  बंगाल सरकार के पब्लिक प्रॉस्क्यूटर ने कहा कि मारे गए सभी लोग ’नक्सली’ थे. उच्चतम न्यायालय ने इस पर पश्चिम बंगाल सरकार को कड़ी फटकार लगाते हुए कहा  ’हम इस तथ्य से वाक़िफ़ हैं कि सुविधा संपन्न लोग सुविधाविहीन लोगों की मांगों को अवैधानिक ठहराने के लिए ’नक्सली’ ब्रांड का इस्तेमाल करते हैं.’ अदालत  ने आगे कहा कि ’देश के आधे से अधिक हिस्सों में क़ानून विहीनता (लॉ लेसनेस) है. ’नक्सली’ शब्द का ऐसे इस्तेमाल कर  हत्याओं को उचित नहीं ठहराया जा सकता.’

उच्चतम न्यायालय की यह टिप्पणी और भी अहमियत इसलिए रखती है क्योंकि सरकारें लगातार कॉर्पोरेट तंत्र के दबाव में झुकती चली जा रही हैं और एक से बढ़कर एक जनविरोधी क़दम उठा रही हैं. मौलिक अधिकारों की जो गारंटी संविधान में प्रदान की गई है उसकी रक्षा कर पाने में सरकारें पूरी तरह विफल साबित हो रही हैं. उदारीकरण के वर्तमान, तीसरे चरण में ’विकास’ के नाम पर सत्ताधारी वर्ग की असहिष्णुता अब एक सनक की शक्ल अख़्तियार कर चुकी है.

इसके पहले,  उच्चतम न्यायालय ने ’विकास’ के बारे में जो टिप्पणी की थी उसका भी आशय कुछ इस तरह का था कि 'ग़रीबों की आजीविका, मकान और पर्यावरण को तहस नहस करने वाला कोई विकास अपेक्षित नहीं है. निश्चित ही, विदेशी पूंजी के खेल के आगे नतमस्तक हमारे राजनीतिक नेतृत्व के लिए यह टिप्पणी किरकिरी जैसी रही होगी. हाल ही में ओडिशा के मानवाधिकार आयोग ने अपनी एक स्वतंत्र जांच रिपोर्ट में कहा है कि 2008 में कोरापुट जिले में पुलिस ने जिन दो लोगों को ’नक्सली’ कहकर मारा था वे ग्रामीण थे, जो अपने पशुओं को घर से बाहर बाड़े में बांधने निकले थे.

मानवाधिकार आयोग ने मृतकों के परिजनों को मुआवज़ा देने की भी सिफ़ारिश की है. मानवाधिकार आयोग की जांच के मुताबिक़ जिला पुलिस के नेतृत्व में सीआरपीएफ़ के गश्ती दल ने इस फ़ायरिंग की जो कहानी गढ़ी थी वह परस्पर अंतर्विरोधी और बेबुनियाद दिखती है.पुलिस दल के प्रभारी थानाध्यक्ष के मुताबिक़ उन्हें ’विश्वस्त’ सूचना मिली थी कि इलाक़े में कुछ ’माओवादी नक्सली’ तत्व आए हैं. गश्त के दौरान रात के अंधेरे में जब उन्होंने ’नाइट विज़न’ यंत्र से देखा कि कुछ लोगों का समूह उनकी ओर बढ़ा चला आ रहा है और गोलियां चला रहा है तो पुलिस ने जवाबी कारवाई में दो ’नक्सलियों’ को मार गिराया.

मानवाधिकार आयोग की जांच कहती है कि गांव के दो नौजवान अपने पशुओं को खोजने के लिए घर से बाहर निकले थे, क्योंकि उनके बैल रस्सी तुड़ाकर भाग गए थे. पुलिस दल ने उन पर अंधाधुंध फ़ायरिंग की, जिसमें दो युवकों की मौत हो गई और कई बैलों ने घटनास्थल पर ही दम तोड़ दिया. एक ग्रामीण इस हमले मे बुरी तरह घायल हुआ था, जिसने किसी तरह परिवार वालों को घटना की ख़बर दी.

जाहिर है, देश के आधे से भी अधिक हिस्सों में क़ानून नहीं है. आगे का सच यह है कि देश के अधिकांश हिस्सों में या तो कोई क़ायदे-क़ानून नहीं हैं या फिर ऐसे नियम-क़ानून हैं जिनके आधार पर सुप्रीम कोर्ट की इस टिप्पणी को भी अगर कभी ’देशद्रोही’ क़रार दिया जाए तो कोई ख़ास हैरानी नहीं होनी चाहिए. 'छत्तीसगढ़ विशेष जन सुरक्षा अधिनियम' एक ऐसा ही अंधा क़ानून है जिसमें (नक्सली जैसे) शब्दों के झोलदार इस्तेमाल द्वारा किसी भी तरह के अपराध करने की आधिकारिक छूट हासिल की गई है.



महात्मा गाँधी हिंदी विश्वविद्यालय वर्धा से मीडिया में शोध और स्वतंत्र लेखन. इनसे   anamil.anu@gmail.com   पर संपर्क किया जा सकता है.


 
 
 
 
 

बुंदेलखंड में एक और बलात्कार कांड


दुराचार की तहकीकात करने के बाद जब बालिका का मेडिकल जांच कराया गया तो बर्थ सर्टीफिकेट में महज 13वर्ष की मीरा को बालिग करार दिया गया...

आशीष  सागर

उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ के पे्रस क्लब सभागार में 26मार्च को एक नये सामूहिक बलात्कार कांड का खुलासा हुआ है। यह खुलासा ह्यूमन राइट्स लॉ नेटवर्क व यूरोपीयन यूनियन की संयुक्त जनसुनवाई कार्यक्रम में मानवाधिकार के हनन् मामलों की बैठक में हुआ।

बांदा के शीलू बलात्कार कांड के बाद प्रदेश में दलितों और गरीबों की स्थिति का यह दूसरा नमूना है जहां उनके साथ अत्याचार होने के बाद सुनवाई नहीं होती। इस जनसुनवाई में अपने पिता पुन्ना के साथ आयी बलात्कार पीड़िता मीरा(13 वर्षीय) ने जब सबके सामने 11 दिनों तक हुए बलात्कार का उल्लेख करना शुरू किया तो रोंगटे खड़े हो गये।

मामला बुंदेलखंड के चिल्ला थाना के महेदु गांव का है। लगभग पांच महीने पहले 22 नवंबर को पीड़िता को उसके गांव महेदू से शाम 4.30 बजे उसके पड़ोसी और मुख्य आरोपी बिज्जू ने अपने 4 अन्य साथियों के साथ मिलकर मीरा को अगवा कर लिया था। अगवा कर मीरा को दरिंदे टैम्पों से मकरी गांव ले गये, जहां एक रात रुकने के बाद उसे बन्धक बनाकर भरूवां सुमेरपुर में दो रात हवस का शिकार बनाया गया।

फिर जनपद बांदा के खाईपार मुहल्ला में आरोपियों ने अपने ही परिचित के यहां पीड़िता से 8रात तक लगातार सामूहिक बलात्कार किया। मीरा के गायब होने के 9दिनांे बाद लिखी एफआईआर के बाद हरकत में आई पुलिस पीड़िता को बलात्कारियों के कब्जे से छुड़ा पायी।

दुराचार की तहकीकात करने के बाद जब बालिका का मेडिकल जांच कराया गया तो बर्थ सर्टीफिकेट में महज 13वर्ष की मीरा को बालिग करार दिया गया। शुक्र यह रहा कि मेडिकल रिपोर्ट में डॉक्टरों ने बलात्कार की पुष्टि की थी। अन्यथा कई बार प्रदेश में ऐसे मामले सामने आते रहे हैं जहां पीड़ित यहीं नही साबित कर पाती कि उसके साथ बलात्कार हुआ है।

बावजूद इसके बलात्कार की यह जघन्य वारदात बहुचर्चित शीलू काण्ड़ की तरह प्रदेश या देश में मुद्दा नहीं बन सकी है। शायद इसलिए कि इस बलात्कार से किसी नेता का कैरियर बनना या तबाह होना नहीं था। 11 दिनों  की पुलिसिया आंख मिचैली और घटना के 9 दिनो बाद लिखी गई एफआईआर रिपोर्ट के बाद भी यह मामला किसी चैनल या अखबार की सुर्खियों में नहीं आ सका।

बहरहाल,बलात्कार पीड़िता मीरा जिस जन सुनवाई में अपने दुख का बयान कर आयी है उससे कुछ उम्मीद जरूर है। क्योंकि उसमें बतौर ज्यूरी सदस्य डॉ रूप रेखा वर्मा,पूर्व पुलिस महानिरिक्षक एसआर दारापुरी, रूहेलखंड विश्वविद्यालय के वीसी प्रदीप कुमार, इलाहाबाद उच्च न्यायालय के वरिष्ठ अधिवक्ता केके रॉय और पीवीसीएचआर के डॉ लेलिन रघुवंशी मौजूद थे।

छात्रा के साथ सपा नेता ने किया बलात्कार


लड़की अभी कोमा में है और पुलिस बयान के इंतज़ार  में है. उधर अपराधी खुले घूम  रहे हैं और पीड़ित परिवार से  बयान वापस लेने का दबाव बना रहे हैं...


जनज्वार. उत्तर प्रदेश के देवरिया जिले में समाजवादी पार्टी के जिला कोषाध्यक्ष ने बीए प्रथम वर्ष की छात्रा के साथ कथित रूप से बलात्कार किया है. लेकिन पुलिस ने अभीतक इस मामले में कोई कदम नहीं  उठाया है.आरोपी अप्पू मणि  त्रिपाठी  सपा विधायक ब्रह्मा शंकर तिवारी का रिश्तेदार बताया जा  रहा  है. 

समाजवादी पार्टी के जिला कोषाध्यक्ष अप्पू मणि  ने कथित तौर पर अगवा कर 19 वर्षीय लड़की के साथ दुष्कर्म किया है। मामले की शिकायत दर्ज करा दी गई है लेकिन अभी तक किसी को हिरासत में नहीं लिया गया है। इस मामले में पुलिस की निष्क्रियता को लेकर अखिल भारतीय प्रगतिशील महिला एसोसिएशन (एपवा )  जिला मुख्यालय पर सोमवार को धरना प्रदर्शन करेगी ।


सपा प्रमुख मुलायम सिंह : किसके पक्ष में

आरोपी सपा जिला कोषाध्यक्ष अप्पू मणि त्रिपाठी कसया विधानसभा क्षेत्र के विधायक ब्रह्माशंकर तिवारी का रिश्तेदार बताया जा रहा है। इसकी वजह से पुलिस महकमे पर दबाव देखा जा रहा और अभी तक इस सिलसिले में कोई कार्रवाई नहीं की गई है।

घटना 20मार्च होली के दिन की है। बाबा राघवदास स्नातकोत्तर महाविद्यालय में स्नातक प्रथम वर्ष की छात्रा बबली (बदला हुआ नाम) अपने रिश्तेदार के घर जा रही थी। उसी दौरान रास्ते में कुछ लोगों ने उसे रोका और मुंह पर कुछ लगा दिया,जिससे लड़की बेहोश हो गई। होश आने के बाद लड़की ने खुद को अस्पताल में पाया। उक्त बातें पीड़िता के मामा जेपी मिश्रा ने लड़की के हवाले से बताया।

लड़की के मामा ने बताया कि  बबली 20 मार्च से लापता थी। 21 मार्च को पुलिस के पास गुमशुदगी की रिपोर्ट दर्ज कराई गई। इसके बाद 23 मार्च को एक शख्स का फोन आया कि अपनी लड़की को लेने के लिए देवरिया खास इलाके में कौशल्या भवन आ जाइए। वहां पहुंचने के बाद अप्पू के चाचा व कांग्रेस नेता मुकुल मणि त्रिपाठी ने लड़की के अपने घर में होने से इंकार कर दिया। बबली जिले के भटनी थाना क्षेत्र में मिश्रौली दीक्षित गांव की रहने वाली है।

उसके बाद लड़की के मामा को फोन करने वाले ने  दुबारा  बताया कि आपकी लड़की बीआरडी कॉलेज के पीछे रेलवे लाइन पर बेहोश पड़ी हुई है। फोन करने वाले के बातचीत के आधार पर बबली के मामा रेलवे लाइन के किनारे पहुँचते उससे पहले फिर एक बार फोन आया और अबकी सदर अस्पताल में लड़की के होने की बात बताई गयी. 

इस मामले में कार्रवाई के बावत पूछने पर भटनी थाना के थानाध्यक्ष  ने बताया कि अक्कू मणि और बड़े मिश्र के खिलाफ  एफआइआर  दर्ज कर ली गयी है,लड़की के ठीक होने के बाद उसका बयान दर्ज किया जाएगा और कोई कार्रवाई होगी।

ऐसे में सूबे की सरकार और खासकर महिला मुख्यमंत्री मायावती के प्रशासन पर सवाल खड़े होते हैं कि अगर लड़की बयां नहीं दे पायेगी तो क्या कार्रवाई नहीं होगी.    वहीं लड़की के परिजनों पर तमाम तरह से दबाव डाले जा रहे हैं और मामले को मोड़ने के प्रयास किए जा रहे हैं।



 
इस सम्बंध में और जानकारी के लिए इनसे बात की जा सकती है।

जेपी मिश्रा-08423752550

भटनी थानाध्यक्ष देवेंद्र सिंह-09454401409

संघर्ष की संस्कृति के कमांडर कमला प्रसाद


कमलाजी की प्रतिष्ठा आलोचक के रूप में, लेखक व संपादक के रूप में भी खूब रही है। लेकिन मेरा मानना है कि उन्होंने सांगठनिक कार्य का चयन अपनी प्राथमिकता के तौर पर कर लिया था...


विनीत तिवारी
उनसे आप लड़ सकते थे, नाराज हो सकते थे, लेकिन वो लड़ाई और नाराजगी कायम नहीं रह सकती थी। वो आलोचक थे इसलिए विश्लेषण उनका सहज स्वभाव था,और साथ ही वे संगठनकर्ता थे इसलिए अपनी आलोचना सुनने,काम करने के दौरान हुई खामियों को दुरुस्त करने और दूसरों को गलतियाँ सुधारने का भरपूर मौका देने का जबर्दस्त संयम उनके पास था।

कोई अगर एक अच्छे कार्यक्रम की अस्पष्ट सी आकांक्षा भी प्रकट कर दे तो वे उसके सामने ही संसाधनों के प्रबंध से लेकर वक्ता, विषय आदि सबका पूरा विस्तृत खाका खींच निश्चित कर देते थे कि कार्यक्रम हो। सक्रियता और गतिविधि में उनका गहरा यकीन था। वे कहते भी थे कि अगर कुछ हो रहा है तो उसमें कुछ गलत भी हो सकता है और उसे ठीक भी किया जा सकता है। पूरी तरह पवित्र और सही तो वही बने रह सकते हैं जो कुछ करते ही न हों।

मध्य प्रदेश के प्रगतिशील लेखक संघ के महासचिव होने के नाते मेरा अनेक इकाइयों में जाना हुआ और हर जगह कोने-कोने में छोटे-बड़े अनेक साहित्यकार कमलाजी के साथ अपने परिचय का जिक्र करते। ये देखने का तो मौका नहीं मुझे मिला लेकिन अंबुजजी, हरिओम, योगेश वगैरह से कितनी ही बार ये जाना कि कमलाजी ने एक संगठनकर्ता के नाते कितनी ही असुविधाजनक यात्राएँ कीं। कहीं से इकाई बनाने का संकेत मिलते ही शनिवार-रविवार की छुट्टी में चल देते थे। रिजर्वेशन तो दूर की बात, कभी-कभी सीट न मिलने पर भी घंटों खड़े रहकर संगठन के विस्तार की चाह में दूर-दूर दौड़े जाते थे।

वे अपने वैचारिक और सांगठनिक गुरू परसाईजी को कहा करते थे और कमलाजी ने अपने गुरू के नाम और काम को आगे ही बढ़ाया। नामवरजी से लेकर होशंगाबाद के गोपीकांत घोष तक उन्हें कमांडर कहते थे और कार्यक्रम व योजना वे कमांडर की ही तरह बनाते भी थे और फिर एक साधारण कार्यकर्ता की तरह काम में हिस्सा भी बँटाते थे,लेकिन कभी शायद ही किसी ने उन्हें आदेशात्मक भाषा में बात करते सुना हो।

उल्टे हम कुछ साथियों को तो कई बार कुछ अयोग्य व्यक्तियों के प्रति उनकी उतनी विनम्रता भी बर्दाश्त नहीं होती थी। लेकिन सांस्कृतिक संगठन बनाने का काम तुनकमिजाजी और अक्खड़पन से नहीं बल्कि तर्क, विनय और दृढ़ता के योग से बनता है - ये सीख हमने उनके काम को देखते-देखते हासिल की। उनको याद करते हुए राजेन्द्र शर्मा की याद न आये,ये मुमकिन ही नहीं। राजेन्द्रजी ने जैसे कमलाजी के काम के वजन में जितना हो सके उतना हिस्सा बँटाने को ही अपना मिशन बना लिया था।

कमलाजी की प्रतिष्ठा आलोचक के रूप में, लेखक व संपादक के रूप में भी खूब रही है। लेकिन मेरा मानना है कि उन्होंने सांगठनिक कार्य का चयन अपनी प्राथमिकता के तौर पर कर लिया था और इसलिए अपनी लेखकीय क्षमताओं के भरपूर दोहन के बारे में वे बहुत सजग कभी नहीं रहे। उनका अपना लेखन,किसी हद तक पठन-पाठन भी संगठन के रोज के कामों के चलते किसी न किसी तरह प्रभावित होता ही था। फिर भी उन्होंने खूब लिखा।

‘वसुधा’ में उनके संपादकीय तो अनेक रचनाकारों के लिए राजनीतिक व संस्कृतिकर्म के रिश्तों की बुनियादी शिक्षा और अनेक के लिए रचनात्मक असहमति व लेखन के लिए उकसावा भी हुआ करते थे। लेकिन वो ऐसे लोगों की बिरादरी में थे जिन्होंने संगठन के लिए,और नये रचनाकार तैयार करने के लिए अपने खुद के लेखक की महत्त्वाकांक्षा को कहीं पीछे छोड़ दिया था।

प्रगतिशील लेखक संगठन का देश भर में विस्तार। पहले हिन्दी क्षेत्र में संगठन को एक साथ सक्रिय करना, फिर उर्दू के लेखकों से संपर्क और हिन्दी-उर्दू की प्रगतिशील ताकतों को इकट्ठा करना, फिर कश्मीर में, उत्तर-पूर्व में, बंगाल में और दक्षिण भारत में संगठन का आधार तैयार करना, और फिर समान विचार वाले संगठनों से भी संवाद कायम करना, इस सबके साथ-साथ ‘वसुधा’ का संपादन - दरअसल इतना काम आदमी कर ही तब सकता है जब उसके सामने एक बड़ा लक्ष्य हो। ये एक बड़े विज़न वाले व्यक्ति की कार्यपद्धति थी।

करीब एक महीना पहले जब कालीकट, केरल में हम लोग राष्ट्रीय कार्य परिषद की बैठक में साथ में थे तभी देश भर से आये संगठन के प्रतिनिधियों ने बेहद प्यार और सम्मान के साथ उनका 75वाँ जन्मदिन वहीं सामूहिक रूप से मनाया था। कैंसर के उनके शरीर पर असर भले दिखने लगे थे लेकिन कैंसर उनके मन पर बिल्कुल बेअसर था। वहाँ बैठक में और बाद में केरल से भोपाल तक के सफर के दौरान उनके पास ढेर सारे सांगठनिक कामों की फेहरिस्त थी,ढेर सारी योजनाएँ थीं। साम्प्रदायिक और साम्राज्यवादी ताकतों से अपने सांस्कृतिक औजारों से किस तरह मुकाबला किया जाए,किस तरह हम समाजवादी दुनिया के निर्माण में एक ईंट लगाने की अपनी भूमिका ठीक से निभा सकें, ये सोचते उनका मन कभी थकता नहीं था।

उनके जाने से उस पूरी प्रक्रिया में ही एक अवरोध आएगा जो कमलाजी ने शुरू की थी लेकिन हम उम्मीद करें कि देश में उनके जोड़े इतने सारे लेखक मिलकर उसे रुकने नहीं देंगे, आगे बढ़ाएँगे, यही उनके जाने के बाद उन्हें उपने साथ बनाये रखने का तरीका है और यही उनके प्रति श्रद्धांजलि भी।



(लेखक प्रगतिशील लेखक संघ के  मध्य प्रदेश इकाई के महासचिव हैं,उनसे  comvineet@gmail.com पर संपर्क किया जा सकता है।)



Mar 27, 2011

उत्तराखंड में दबंगों ने की दलित की हत्या


लक्ष्मण राम एक जागरुक व्यक्ति थे,उन्हें यह कतई बर्दाश्त नहीं था कि उनके गांव व क्षेत्र का अनियमित विकास हो...

नरेन्द्र देव सिंह

पिथौरागढ़ जिले के गंगोलीहाट विकास खण्ड क्षेत्र में पिछले 19 मार्च को दो दबंगो ने एक दलित की पीट-पीट कर हत्या कर दी। बीच-बचाव करने आई मृतक की पत्नी को भी दबंग सवर्णों ने लात-घूसों से मारा।

मृतक लक्ष्मण राम अपने भाई का बेरीनाग में दाह संस्कार करके शुक्रवार की शाम करीब साढ़े सात बजे चैली गांव में वाहन से उतरे तो वहां पर नशे में धुत चैली गांव के ही निवासी विक्की और नरेन्द्र ने उनके साथ मारपीट शुरू कर दी। दोनों युवकों ने लक्ष्मण राम को लाठी-डंडों से बुरी तरह पीटने के बाद 500 मीटर नीचे खेतों में फेंक  दिया, जिससे लक्ष्मण राम की मौत हो गयी।

इस घटना से गांव में दहशत का माहौल बन गया है। राजस्व पुलिस ने दोनों हत्यारोपी युवकों को गिरफ्तार करके जेल भेज दिया है। जांच-पडताल करने के बाद पता चला है कि हत्या का कारण पुरानी रंजिश थी,जिस कारण दोनों  युवकों ने लक्ष्मण राम की हत्या कर दी। लेचुराल जोशी गांव में अनुसूचित जाति की संख्या कम है और सामान्य जाति की संख्या ज्यादा है।
लक्ष्मण की पत्नी हरूली  देवी : कहाँ है न्याय  

लक्ष्मण राम एक जागरुक व्यक्ति थे,उन्हें यह कतई बर्दाश्त नहीं था कि उनके गांव व क्षेत्र का अनियमित विकास हो। हत्यारोपी विक्की चैली गांव का उपप्रधान है। नाम न छापने की शर्त पर एक ग्रामीण ने बताया कि विक्की शुरु से ही आपराधिक किस्म का व्यक्ति है। विक्की और इसके साथी मिलकर गांव में अवैध खनन भी करते हैं,इसके साथ ही यह लोग विकास के पैसों की भी बंटरबांट करते हैं। लक्ष्मण राम पूर्व में भी इन सब के खिलाफ आवाज उठाते रहे हैं। कुछ दिन पूर्व ही लक्ष्मण राम ने ग्राम विकास अधिकार व अन्य सरकारी कर्मचारियों के सामने इन लोगों की करतूतों का खुलासा किया था।

अधिकारियों के सामने निडर होकर लक्ष्मण राम ने कहा कि यह लोग अवैध खनन करते हैं। यह बात विक्की और उसके साथियों का नागवार गुजरी,इसलिए विक्की और नरेंद्र ने शराब के नशे में धुत होकर 19 मार्च को लक्ष्मण राम को लाठी-डंडो से पीट-पीट कर मार डाला। बदमाशों ने मृतक की पत्नी हरूली देवी को भी नहीं छोड़ा, उन्हें भी लात-घूसों से मारा और जाति सूचक गालियां दीं। हरूली देवी ने जब मदद के लिए गांव वालों को पुकारा तो उनकी मदद को कोई नहीं आया। हरूली देवी अपनी पति के लाश के पास पूरी रात अकेली बैठे रही।

हरूली देवी कहती हैं, ‘पति को पिटते देख जब मैं बीच-बचाव के लिए गयी तो उन लोगों ने मुझे भी मारा-पीटा। उन लोगों ने मुझसे कहा ‘तुझे भी जान से मार देंगे, तु यहां से चली जा, हम किसी से भी नहीं डरते‘। मैंने गांव वालों को मदद के लिए आवाज लगाई लेकिन गांव में इन लोगों का इतना आतंक है कि डर के मारे कोई भी मदद को आगे नहीं आया। मैं शाम साढ़े सात बजे से लेकर सुबह तक अपने पति की लाश के पास बैठी लेकिन कोई नहीं आया। इन लोगों को कड़ी से कड़ी सजा मिलनी चाहिए।

इस मामले में जिला पुलिस और जनप्रतिनिधि मौन साधे हुए हैं। पहले भी इस प्रकार की घटनायें घट चुकी हैं। ऐसे में साफ है कि राज्य में होने वाले दलित उत्पीड़न के मामलों में पुलिस कैसे अपने राजनीतिक आकाओं के का मूंह ताक रही है।



लेखक युवा पत्रकार है, उनसे  narendravagish@gmail.com पर सम्पर्क किया जा सकता है।

 
 
 
 
 

मेरी मम्मी को न छीनो !


दो माएं और बीच में अदालत. मामला एक बेटी का. दोनों माँ  का दावा,  बेटी उनकी है. जाहिर है  होगी तो किसी एक की ही.इस जिरह में बीत गए सात साल और अंत में अदालत ने  जो फैसला दिया, उसने  एक माँ  से बेटी को अलग  कर दिया. फ़िल्मी लगने वाली इस कहानी के पीछे का सच, समाज और अदालत दोनों के लिए सवाल छोड़ जाता है....  

चैतन्य भट्ट

‘मुझे बचा लो मम्मी, मुझे अपने से दूर मत करो, मैं कहीं जाना नही चाहती, मैं आपके साथ ही रहूंगी'- जबलपुर के जिला अदालत परिसर में मासूम वंशिका की आवाज हर उस इंसान को द्रवित कर रही थी जो उस वक्त वहां मौजूद था.सात साल की वंशिका बार-बार वकीलों और पुलिस के हाथों से छूटकर उसे पालने वाली मां आशा पिल्ले की गोद में आ गिरती थी,पर देश की सबसे बड़ी अदालत का आदेश उसे जन्म देने वाली मां के पक्ष में था इसलिये पुलिसकर्मी और अधिवक्ता भी मजबूर थे.उन्हें आदेश मिला था कि वे वंशिका को उसको जन्म देने वाली मां के हाथों में सौप दें.


कोर्ट परिसर में बिलखती आशा पिल्लै
 पुलिस की मदद से जब वंशिका को तबस्सुम की गोद में डाला गया, तब उसे सात साल तक अपने सीने से लगाकर रखने वाली और उसका लालन पोषण करने वाली आशा पिल्ले और उसके पति रवि पिल्र्ले की आँखों से आसुंओं की अविरल धारा बह निकली. आशा पिल्ले तो अदालत परिसर में ही बेहोश हो गई.

सात साल की वंशिका की यह कहानी किसी फिल्मी कथानक से कम नहीं है.मानवीय भावनाओं से लबरेज दो माँओं के बीच फंसी वंशिका को तो इस बात का इल्म ही नहीं था कि उसे जन्म देने वाली कोई और है और उसे पालने वाली कोई और.उसने तो जबसे होश संभाला था, खुद को आशा पिल्ले की गोद में ही पाया था. वह उसकी मां थी. जो उस पर रात-दिन अपनी ममता लुटाती रहती थी.पर वक्त ने सात साल बाद ऐसा पलटा खाया कि वंशिका को अपनी उस मां के पास जाना पड़ा जो उसे जन्म देने के बाद लावारिस हालात में उत्तर प्रदेश के जालौन के एक अस्पताल में छोडकर न जाने कहां चली गई थी.

उरई की रहने वाली तबस्सुम का विवाह उस्मान मंसूरी के साथ हुआ था. विवाह के चार महीने बाद ही उस्मान मंसूरी की एक सड़क दुर्घटना में मौत हो गई. उस वक्त तबस्सुम के पेट में अपने पति की निशानी पल रही थी.चूंकि विवाह के चार महीने बाद ही उसका पति उसे इस दुनिया में अकेला छोडकर चला गया था. इसलिये उसकी मानसिक दशा गड़बड़ा गई. इस बीच तबस्सुम के  दिन पूर हो गये और उसे उरई के डॉ. गुप्ता के अस्पताल में उसके किसी परिचित ने भरती करवा दिया,जहां तबस्सुम ने एक बच्ची को जन्म दिया.


ऐसी थी वंशिका                फोटो - सतन  सिंह
 बच्ची को जन्म देने के दो-चार दिन बाद ही वह अचानक अस्पताल से न जाने कहां चली गई.एक नवजात शिशु को अस्पताल में कैसे रखा जाये, इस बात की चिन्ता डा. गुप्ता को थी. तभी उन्हें याद आया कि उनके एक परिचित मनोज गुप्ता ने उनसे कहा था कि उनके जबलपुर में रहने वाले मित्र रवि पिल्ले और उनकी पत्नी आशा पिल्ले विवाह के सत्रह साल बाद भी संतान का मुंह नहीं  देख पाये हैं. यदि उनकी निगाह में कोई बच्चा हो जिसे वे गोद ले सकें, तो उन्हें सूचना दे देना.

डॉ.गुप्ता ने इस बात की सूचना मनोज गुप्ता को दी कि एक नवजात बच्ची उनके अस्पताल में है जिसकी मां उसे छोडकर चली गई है. यदि उनके मित्र उसे गोद लेना  चाहें तो जालौन आकर ले जायें. मनोज गुप्ता ने यह खबर जब जबलपुर के यादगार चौक में रहने वाले रवि पिल्ले को दी तो वे और उनकी पत्नी आशा पिल्ले खुशी से झूम उठे.उसी रात वे दोनों जालौन के लिये रवाना हो गये और उस बच्ची को लेकर जबलपुर आ गये. उस वक्त यह बच्ची मात्र एक महीने की थी.

पिल्ले दम्पति को संतान की बेहद लालसा थी, अतः उन्होंने उस पर अपना पूरा प्यार लुटा दिया. वे उसे अपने कलेजे से लगाकर रखते. इसका नाम भी उन्होंने रखा ‘वंशिका.’आशा रात रातभर जागकर उसकी सेवा करती, रूई के फोहे  से उसे दूध पिलाती.अपनी पत्नी के चेहरे पर खुशी देखकर रवि पिल्ले को भी संतोष होता.

समय के साथ बच्ची बढ़ती गई, उसे उन्होंने स्कूल में भरती करवा दिया.वंशिका सुबह स्कूल  जाती और जब तक वापस नही लौट आती आशा दरवाजे पर बैठी उसकी राह तकती रहती.पर उसे पता नहीं था कि उसकी इस खुशी पर ग्रहण लगने वाला है.वंशिका को गोद लेने के चार साल बाद 28 जून 2008 को एक महिला पुलिसकर्मी के साथ पिल्ले दम्पति के  घर आई और उसने कहा ‘‘मेरा नाम तबस्सुम है. मैं उरई की रहने वाली हूं, आप लोग जिस बच्ची को लेकर आये हैं वह मेरी बच्ची है. मैं उसे वापस लेने आई हूं.’’

इतना सुनते ही पिल्ले दम्पति के पैरों तले की जमीन खिसक गई. उन्हें सपने में भी इस बात कर अंदाजा नही था कि चार साल बाद ऐसी कोई परिस्थिति पैदा हो जायेगी.पुलिसकर्मी ने उन्हें बताया कि तबस्सुम ने जबलपुर एसडीएम की अदालत में धारा 97 के तहत एक आवेदन लगाया है, जिसमें उसने कहा है कि पिल्ले दम्पति उसकी बच्ची को चुराकर ले आये हैं. एसडीएम ने तबस्सुम के आवदेन पर कार्यवाही करते हुये आदेश पारित किया है कि वंशिका को उसकी मां तबस्सुम की अभिरक्षा में सौप दिया जाये.

 इस आदेश के खिलाफ पिल्ले दम्पति ने जिला न्यायालय में एक अरजी लगाई. जिला न्यायालय ने एसडीएम कोर्ट के आदेश पर रोक लगाते हुये निर्देश दिये कि वंशिका को पिल्ले दम्पति की अभिरक्षा में ही रहने दिया जाये.

अंशिका को पैदा करने वाली मां तबस्सुम : जीत की ख़ुशी!  फोटो-  सतन सिंह
 मगर तबस्सुम ने हार नहीं मानी और मध्यप्रदेश उच्च न्यायालय में एक बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका दायर कर आरोप लगाया कि पिल्ले दम्पति में उसकी बेटी को अवैध रूप से अपने पास रखा हुआ है. जबकि वह उसकी मां है और उसने वंशिका को जन्म दिया है.

मध्यप्रदेश उच्च न्यायालय ने इस याचिका को स्वीकार करते हुये मामले की सुनवाई शुरू की.तबस्सुम की ओर से उनके अधिवक्ता संजय अग्रवाल ने न्यायालय को बताया कि बच्ची पर सबसे बडा और पहला हक उसे जन्म देने वाली मां का है. अब वह मानसिक रूप से स्वस्थ है तथा अपनी बच्ची का भरण पोषण कर सकती है,जबकि पिल्ले दम्पति की ओर से उनके अधिवक्ता जयंत नीखरा ने तर्क देते हुये कहा कि पिल्ले दम्पति बच्ची का लालन पोषण बेहतर तरीके से कर रहे हैं.उन्होंने कहा कि तबस्सुम के पास रोजगार को कोई साधन नहीं है और वह बच्ची की देखरेख  नहीं कर पायेगी.

चूंकि मामला बेहद संवदेनशील था, इसलिए न्यायमूर्ति द्वय दीपक मिश्रा और आरके गुप्ता ने कैमरा प्रोसीडिंग का सहारा लिया. इस प्रक्रिया के तहत उन्होंने पहले वंशिका और तबस्सुम को अपने चेम्बर में बुलाकर वंशिका से कहा, ‘ये तुम्हारी मां है तुम्हे  इसके साथ जाना होगा.’यह सुनते ही वंशिका रोने लगी.तब न्यायमूर्तियों ने आशा को अपने चेम्बर में बुलाया और वंशिका से पूछा,‘क्या तुम इसके साथ रहना चाहती हो.’यह सुनते ही वंशिका दौड़कर आशा पिल्ले की  गोद में जाकर  छिप  गई.

एक मासूम बच्ची की इच्छा जानते हुये न्यायमूर्ति गण ने अपने आदेश में कहा कि यह प्रमाणित नहीं होता कि रवि पिल्ले और आशा पिल्ले ने वंशिका को अवैध रूप से अपने पास रखा हुआ है इसलिये बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका का कोई आधार नहीं बनता.बालिका जन्म के बाद से पिल्ले दम्पति के पास है. उसका लालन पोषण अच्छी तरह से हो रहा है. वह स्कूल जा रही है.

पर न्यायालय केवल यह स्थापित कर रहा है कि बच्ची अवैधानिक रूप से नहीं रखी गई है, लेकिन बच्ची के पालन पोषण का अधिकार और दायित्व का प्रश्न किसी सक्षम न्यायालय में ही निर्णित होगा. उच्च न्यायालय के इस निर्णय से तबस्सुम की बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिकर स्वतः ही खारिज हो गई तथा वंशिका रवि पिल्ले की ही अभिरक्षा में बनी रही.


पिल्लै दंपति और अंशिका : बिछड़ने से पहले                            फोटो- सतन सिंह
 उच्च न्यायालय के इस आदेश के खिलाफ तबस्सुम ने उच्चतम न्यायालय में विशेष अवकाश याचिका दायर की और नवंबर 2009 में उच्चतम न्यायालय ने पिल्ले दम्पति को नोटिस जारी किये.मामले की सुनवाई 17 फरवरी को जस्टिस जीएस सिंघवी और जस्टिस अशोक गांगुली की खंडपीठ ने की.

सुनवाई के दौरान तबस्सुम ने बताया कि उसे आशंका है कि उसे उसकी बच्ची नही दी जायेगी. दोनों पक्षों के तर्कों को सुनने के बाद अदालत ने उसकी अंतरिम राहत की अर्जी स्वीकार करते हुये वंशिका को तबस्सुम की अभिरक्षा में सुपुर्द करने के आदेश जारी कर अपना फैसला सुरक्षित रख लिया है. यह आदेश शाम को फैक्स के जरिये मध्यप्रदेश उच्च न्यायालय पहुंचा. इसके तारतम्य में दोनों ही प़क्षों को 18 फरवरी को जिला न्यायालय में बुलाया गया,जहां वंशिका को तबस्सुम के हवाले कर दिया गया.अदालती आदेश में यह भी कहा गया  कि पुलिस तबस्सुम और वंशिका को पूरी सुरक्षा दे. जालोन एसपी को भी ये निर्देश दिये गये हैं कि वे तबस्सुम और वंशिका की पूरी हिफाजत करें.


अदालती आदेश के बाद अपनी बेटी को उरई ले जाने वाली तबस्सुम ने इस संवाददाता से कहा कि 'मुझे न्याय पर पूरा भरोसा था. अपनी कोख से जन्मी बच्ची को पाने के लिये मुझे इतनी लम्बी लडाई लड़नी पड़ी. खुदा करे ऐसा किसी और मां के साथ न हो.'

दूसरी तरफ वंशिका से बिछड़ने के बाद आशा पिल्ले कहती है,'मैंने तबस्सुम से उसकी बच्ची छीनी नहीं थी, वह उसे छोडकर चली गई थी. सात साल मैंने उसे अपने कलेजे से लगाकर रखा. मैंने उसे किन नाजों से पाला है यह मेरा दिल ही जानता है. मुझे हर पल वंशिका की याद सतायेगी. मैं क्या करूं मुझे कुछ समझ में नही आता. मैंने भले ही उसे जन्म नहीं दिया, पर मैं भी एक औरत  हूं और वंशिका पर  मैंने अपनी पूरी ममता लुटाई है.




राज एक्सप्रेस और पीपुल्स समाचार में संपादक रह चुके चैतन्य भट्ट फिलहाल स्वतंत्र पत्रकार के रूप में काम कर रहे हैं। वे तीस बरसों से पत्रकारिता में सक्रिय हैं।