Mar 8, 2011

भ्रष्टाचारियों के बीच बाबा रामदेव


अभी कांग्रेस की दुश्मन भाजपा को दोस्त मानकर, किसी भ्रष्टाचारमुक्त समाज की कल्पना की जा रही है तो ज़रा एक बार जय प्रकाश नारायण  के प्रयोग को भी याद कर लें,जिसमें उन्होंने इंदिरा गांधी को सत्ता से हटाने को ही क्रांति मान लिया था...

हिमांशु कुमार

'हेलो! हिमांशु जी बोल रहे हैं?' मेरे हाँ कहने पर उधर से आवाज़ आयी, 'हम भारत स्वाभिमान मंच से बोल रहे हैं.हमने आपकी स्पीच तहेलका की साईट पर देखी है,बाबाजी चाहते हैं आप भारत स्वाभिमान मंच से जुड़ें.'

मैं उन दिनों साईकिल यात्रा पर था और उस दिन राजस्थान के झूंझनू में था. मैंने कहा 'बाबा रामदेव जी छत्तीसगढ़ आते हैं, पर रायपुर से ही मुख्यमंत्री से पैर छुआ कर वापिस चले जाते हैं, अगर बाबा दंतेवाडा आकर आदिवासियों से मिलते हैं तो हम मानेंगे की बाबा को देश के कमज़ोर लोगों की परवाह है.इसके बाद ही बात कुछ आगे बढ़ेगी.'
अब उठाएंगे देश का भार  
इसके बाद इस तरह के फोन दो बार और आये.बातचीत में मैंने अपनी मन की शंकाएं बताई और मुझे आग्रह्कर्ता कभी भी संतुष्ट नहीं कर पाए.इसके बाद ऐसे फोन आने बंद हो गए. मुझे अभी बाबा रामदेव के साथ इस देश के बड़े-बड़े क्रांतदर्शी लोगों के चले जाने पर बड़ी बेचैनी हो रही है,क्योंकि  बाबा जिस परिवर्तन की और नई समाज रचना की बातें कर रहे हैं, उसकी एक भी ईंट उनके पास नहीं है.

पहला खतरा तो यह है कि बाबा के चारों तरफ भाजपा के लोगों का जमावड़ा है. भाजपा भ्रष्टाचार के मामले में कहीं से भी कांग्रेस से कमतर है,देश में ऐसा कोई भी नहीं मानता.यहाँ तक कि सार्वजनिक रूप से ऐसा कहने की हिम्मत तो बाबा भी नहीं कर सकते.

राजनीति में दुश्मन का दुश्मन दोस्त होता है.इस नाते अगर अभी कांग्रेस की दुश्मन भाजपा को दोस्त मानकर किसी भ्रष्टाचारमुक्त समाज बनाने की कल्पना की जा रही है तो ज़रा एक बार जेपी के प्रयोग को भी याद कर लें, जिसमें उन्होंने इंदिरा गांधी को सत्ता से हटाने को ही क्रांति मान लिया
था और आरएसएस को साथ लेकर एक वैकल्पिक राजनीति की कल्पना कर डाली थी.

सारे देश ने देखा की मात्र सरकार बदलने से कुछ भी नहीं बदला.कांग्रेस फिर सत्ता में आ गयी और जेपी के नज़दीकी लोग जानते हैं अंतिम समय में जेपी कितने निराश थे. खैर,बाबा तो राजनीतिक रूप से जेपी जितने परिपक्व भी नहीं हैं,परन्तु वे अपनी बातचीत से ऐसा खाखा खीँच रहे हैं जैसे उनके पास इस देश के भ्रष्टाचार को समाप्त करने का कोई नुस्खा आ गया है.जबकि सच्चाई कुछ और है.
भाजपा के तीन मुख्यमंत्री: कौन है बेदाग

बाबा स्विस बैंकों के पैसे को वापिस देश में लाने पर सबसे ज्यादा जोर दे रहे हैं परन्तु काले धन की खान पर बैठे हुए अरबों रुपया बना रहे भाजपा शासित प्रदेशों के मुख्यमंत्रियों के साथ बाबा की गलबहियां हैं.

 भ्रष्टाचार का सबसे घृणित रूप कर्नाटक के भाजपा राज में मंत्री बने हुए बेल्लारी बंधू की खुलेआम लूटपाट और दादागिरी,गुजरात में आदिवासियों की ज़मीने कॉर्पोरेट को देना और वन भूमि अधिनियम का पालन न करना और उस पर सर्वोच्च न्यायालय की फटकार,छत्तीसगढ़ में पैसा खाकर हजारों आदिवासियों की हत्या और उनका विस्थापन बाबा की नज़र में भ्रष्टाचार है ही नहीं.

अगर बाबा और इनके पीछे खड़े देश के समझदार लोग सचमुच ऐसा मान रहे हैं कि   पूंजीपतियों का   ये भ्रष्ट व्यवसाय ऐसे ही चलता रहे,शहरी मध्यम वर्ग के आर्थिक हितों के लिए ग्रामीण भारत का खून चूसना भी चलता रहे और कुछ वर्त्तमान नेताओं को बदल देने से क्रांति हो जायेगी, तो भाई ऐसा तो  फिल्मों में होता है सचमुच की ज़िंदगी में नहीं.





दंतेवाडा स्थित वनवासी चेतना आश्रम के प्रमुख और सामाजिक कार्यकर्त्ता हिमांशु कुमार का संघर्ष,बदलाव और सुधार की गुंजाईश चाहने वालों के लिए एक मिसाल है.उनसे vcadantewada@gmail.com पर संपर्क किया जा सकता है.



क्या मीडिया को अगली आत्महत्या का इंतजार है?



पंजाब के नवाशहर जिले के पोजेवाल कस्बे में आइआइटीटी इंजीनियरिंग कॉलेज में बीटेक प्रथम वर्ष के छात्र योगेश रंजन पांडेय की आत्महत्या का मामला गंभीर शक्ल लेता जा रहा है .योगेश की आत्महत्या के बाद छात्रों द्वारा मुआवजे की मांग की जा रही है जिससे बचने के लिए प्रबंधन ने कॉलेज को अगले पंद्रह दिनों के लिए बंद करने की घोषणा कर दी है और पुलिस ने धारा 144 लगा दिया  है.  

प्रबंधन के इस कदम से हॉस्टल में रहने वाले छात्रों की मुश्किलें बढ़ गयीं हैं क्योंकि मेस में खाने-पीने की चीजें भरपूर मात्रा में नहीं है। दूसरी तरफ बिहार के नवादा जिले के बहादुरपुर गांव में रह रहा योगेश का परिवार इस मामले को हत्या मान रहा है और दुबारा जांच की मांग की है। वहीं कॉलेज के सिनीयर छात्र और उसके साथी योगेश के मरने के लिए कॉलेज प्रबंधन को जिम्मेदार मान रहे हैं।

गौरतलब है कि 4 मार्च को प्रथम सेमेस्टर के पांच में से चार विषयों में फेल होने की सूचना पाने के तीन घंटे बाद योगेश की आत्महत्या की सूचना छात्रों में फैली थी। फेल होने वालों में अकेले योगेश ही नहीं था,बल्कि प्रथम सेमेस्टर के करीब 98फीसदी छात्र किसी न किसी विषय में फेल हैं।


ऐसे में उच्च शिक्षा के नाम पर दुकानदारी कर रहे संस्थानों की अगर देश में कभी गिनती हुई तो पंजाब के पोजेवाल शहर का आइआइटीटी कॉलेज पहले स्थान पर गिना जायेगा। जहां तानाशाही है, चुप कराने के लिए स्थानीय पुलिस है और सबसे बढ़कर मीडिया की इस मामले को लेकर बेकद्री है। छात्रों के मुताबिक,‘स्थानीय मीडिया इस मसले को क्रिकेट वल्र्ड कप खत्म होने के बाद उठाने की बात कह रही है।’

इस बार कॉलेज के भुक्तभोगी छात्र खुद ही अपनी पीड़ा बयान कर रहे हैं कि कैसे वहां की स्थितियां आत्महत्या के लिए मजबूर करने वाली हैं। लाखों रूपया संस्थान में फंसे होने के कारण उन्होंने दिल के बातें नामों से नहीं आआइटीटी स्टुडेंट और एनोनिमस के नाम से जनज्वार तक पहुंचायीं हैं, जिसे यहां हू-ब-हू प्रस्तुत किया जा रहा है...मॉडरेटर
बड़े लोग ऊँचा धंधा : कौन डाले हाथ


iitt student said...

sir,

we are the students of this college and we can't say you what is been happening with us. even the polce officials are threatening us. we have talked to the electronic media but they are not giving their response properly even some channels are saying to do it after the cricket world cup.


sir please help.


Monday, March 07, 2011

iitt student said.....

it is said that what happens is not as important as how we react to what happens unfortunately things have happened but there r no reactions from anywhere niether media nor ministry nor the government.

This issue is one of the biggest ever in an engineering college but the conditions write now in this college is worst a student can expect from an educational institution.when we peacfully want to protest against this managgment a local official mr jaswindar singh sodhi is giving an open challenge as if he is chief executive of this place and inforcing us to quit our protest.

He has earlier also spent a lot of money in heating up the pockets of the local police and even big officials like that of aicte who earlier visted this college. this man sodhi is so corrupt that he openly says that there is no one in this whole district who can change him. its an request to all the media and respected government officals through this blog that plz bring your attention towards us otherwise either we will start commiting sucide or we will end someones........

Monday, March 07, 2011

iitt student said...

I am the student of this college and the enviorment is so wrong here that i have even tried to end my life but thanks to my frinds who made me choose the right path. after after somedays its so unfortunate that our friend ranjan pandey had to choose that step. no any medis person is trying to help us even the policemen are firing their lathis on us. we have been beaten by the police so brutually and not even the girls are left out of this by them. no any media and highe authority are helping us.

so through my comment i request the media person to please have an attention to help us.

iitt student said.....

I am student of iitt and also a close friend of yogesh.it is very shocking for all of us that yogesh is no more.about this i only want to say why the college owner don't mrs rama shina not take any action about the college management mainly sodhi and k.k goel. And why rama shina is not in college when all the matter is hapining.

Monday, March 07, 2011

 
 

Mar 7, 2011

'अब देश को जनप्रतिनिधियों की जरुरत नहीं'


सर्वोच्च न्यायालय के भ्रष्ट  न्यायाधीशों की सूची उजागर करने के बाद अदालत की मानहानि का मुकदमा झेल रहे वरिष्ठ वकील और मानवाधिकारकर्मी प्रशांत  भूषण देश में प्रत्यक्ष लोकतंत्र के जरिये तंत्र में सुधार की कुछ गुंजाइश देख रहे हैं। सरकार, न्यायालय, भ्रष्टाचार , काला धन, आर्थिक सुधार और निजीकरण जैसे पहलुओं पर उनसे बातचीत के अंशः

प्रशांत भूषण से अजय प्रकाश की बातचीत


सरकार  भ्रष्टाचार और कालेधन के खिलाफ सख्त कदम की बात कर रही है?

सरकार काले धन और भ्रष्टाचार की समस्या से जिस तरह निपटना चाहती है, वह जनता को भरमाने का एक नया भ्रष्टाचार  है। जिसे सरकार काला धन कह रही है, वह दरअसल काली कमाई है जो देश के संसाधनों की लूट के जरिये हुई है और विदेशी बैंकों में जमा की गयी है। इसलिए मात्र 35 फीसद टैक्स के साथ उसकी वापसी बेमानी है। वह जनता का पैसा है और उसे पूरी तरह से देश के विकास में लगाया जाना चाहिए और साथ ही खाताधारकों पर कानूनी कार्रवाई होनी चाहिए।

आपने और प्रसिद्ध   वकील शांतिभूषण ने न्यायपालिका के भ्रष्टाचार की बात उठायी थी। उस मामले का क्या हुआ?

उसे लेकर अदालत की अवमानना का मुकदमा चल रहा है। मेरे पिता और वरिष्ठ वकील शांतिभूषण ने सर्वोच्च न्यायालय के 16जजों के नाम अदालत में पेश किये थे। हमारा दावा था कि इनमें आठ भ्रष्ट  और छह ईमानदार थे, जबकि दो के बारे में जांच की मांग की गयी थी। न्यायाधीश कृष्णा अय्यर ने लिखा है कि इसकी ग्रैंड ज्यूरी से जांच होनी चाहिए। यह तो साफ है कि जजों के बारे में कोई जांच नहीं की जाती। रिटायरमेंट के पहले तो जजों की जांच मुख्य न्यायाधीश की इजाजत के बगैर हो भी  नहीं सकती।

पूर्व मुख्य न्यायाधीश सब्बरवाल के खिलाफ सीबीआइ और सीवीसी को लिखित शिकायत की गयी थी। मगर कुछ नहीं हुआ। न्यायाधीश आनंद पुंछी के खिलाफ महाभियोग लाने की कोशिश हुई, लेकिन मामला आगे नहीं बढ़ सका। पिछले वर्ष सेवानिववृत्त  हुए मुख्य न्यायाधीश केजी बालकृष्णन के खिलाफ बहुत कुछ छप रहा है, मगर कोई कार्रवाई अब तक नहीं हुई है। बालकृष्णन का मामला तो उपराष्ट्रपति ने सीबीआइ तक को सौंपा था।

इस समस्या से निपटने का कोई ठोस विकल्प है?

भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ रहे लोगों ने एक ग्यारह सदस्यीय समिति बनाने की मांग की है जिसे हमने ‘लोकपाल विधेयक’ कहा है। सरकार ने जो लोकपाल विधेयक का प्रस्ताव रखा है उससे हम असहमत हैं, क्योंकि इसमें तीन रिटायर्ड जज होंगे जिनकी नियुक्ति सरकार करेगी। अगर सरकार की नीयत इस समस्या का समाधान करना है तो वह एक चयन समिति का गठन करे और उसके कामकाज में पारदर्शिता रखे। फिर चुने हुए लोगों को पूरा अधिकार दिया जाये,जो हर तरह के भ्रष्टाचार के खिलाफ प्रभावी कार्रवाई कर सकें।

क्या आपलोग जमीनी कार्रवाई की भी  सोच रहे हैं?

हमलोग कुछ जमीनी कार्रवाई की भी  पहल हम करने वाले हैं। इसमें भ्रष्टाचार के खिलाफ संघर्षरत लोग अपने शहर के पांच सबसे भ्रष्ट  लोगों को चुनेंगे। उनमें से हरेक भ्रष्टाचारी  के बर्खास्त होने तक जनता आंदोलन करेगी। इस संघर्ष में हमारे साथ देश की जनता होगी।

आप राजनीतिक पार्टियों भी जुड़ेंगे?

बेशक, इस काम में कुछ संगठन और पार्टियां भी  हमारे साथ आयेंगी, मगर हम किसी पार्टी से नहीं जुडेंग़े। सत्ता  में आते ही पार्टियां भ्रष्ट हो जाती हैं या फिर भ्रष्ट  होने के बाद सत्ता में आती हैं। अपवादों को छोड़ दें तो पूरी चुनावी प्रक्रिया एक भ्रष्ट प्रतिनिधि को ही संसद या विधानसभा  में पहुंचा सकती है। भविष्य में जनप्रतिनिधित्व वाला कोई नेतृत्व उभरा तो उसमें शामिल होने से हमें कोई गुरेज नहीं होगा। ऐसे में हम लोग डाइरेक्ट डेमोक्रेसी यानी प्रत्यक्ष लोकतंत्र की मांग कर रहे हैं।

प्रत्यक्ष लोकतंत्र के जरिये क्या इन समस्याओं से निपटना आसान होगा?

क्यों नहीं?हमारे देश में ‘रिप्रजेंटेटिव डेमोक्रेसी’(प्रतिनिधिक लोकतंत्र)की अब कोई जरूरत नहीं है। इलाके से सांसद या विधायक आकर जनता की बात करें,उससे बेहतर यह होगा कि सीधे गांवों, मुहल्लों और कस्बों में जनता अपनी राय मोबाइल,इंटरनेट या किसी और माध्यम से भेजे और उसके आधार पर निर्णय हो। इससे जनप्रतिनिधि के नाम पर दलालों के रखने की जरूरत खत्म हो जायेगी।

वैसे भी  ये प्रतिनिधि आर्थिक सुधारों के नाम पर निजीकरण को प्रोत्साहित कर भ्रष्टाचार की जकड़बंदी ही बढ़ा रहे हैं। प्रतिनिधिक लोकतंत्र की कल्पना उस समय की गयी थी, जब जनता सीधे अपनी बात नहीं पहुंचा सकती थी। अब तो परमाणु सौदे से लेकर गांव में पुल बनाने जैसे सार्वजनिक और राष्ट्रहित के मसलों पर जनता सीधे अपनी राय संबंधित संस्था को पहुंचा सकती है। तब करोड़ों रुपये खर्च कर बिचौलियों को क्यों सहें?

आज हालत यह है कि परमाणु समझौते जैसे संवेदनशील मसले को बहस के लिए संसद में भी नहीं ले जाया जाता है और बिल पास हो जाता है। आदिवासी क्षेत्रों में जिस तरह पेसा कानून लागू है, उसी तरह की कोई व्यवस्था होनी चाहिए। पेसा में ग्राम प्रधान के पास अधिकार केंद्रित नहीं होते, बल्कि सभी  ग्रामीणों की सहमति होती है। इसी तर्ज पर सूचना अधिकार नेता अरविंद केजरीवाल और दूसरे लोगों ने नगर राज्य बिल बनाया था ताकि शहरों में भी  लोग मिलकर तय करें कि क्या बदलाव हो या न हो।

‘आर्थिक सुधारों के नाम पर भ्रष्टाचार  को बढ़ावा मिल रहा है’-यह कहने का आपका आधार क्या है?

सरकार आर्थिक सुधारों के नाम पर चोर दरवाजों से भ्रष्टाचार  का लगातार रास्ता खोल रही है। जैसे, मॉरीशस में कंपनी खोल कर हिंदुस्तान या बाहर की कंपनियां कोई टैक्स नहीं दे रही हैं। ऐसा भारत और मॉरीशस के बीच एक संधि के चलते है जिसका फायदा उठाने के लिए ये धूर्त कंपनियां मॉरीशस में एक पोस्ट बॉक्स कंपनी खोल देती हैं और भारत में करोड़ों के टैक्स से बच जाती हैं।

सरकार के मुताबिक,यह विदेशी व्यापार को आकर्षित करने के लिए किया जा रहा है। लेकिन सवाल यह है कि सरकार वित्तीय  कानूनों में बदलाव क्यों नहीं करती। चोर दरवाजा किसलिए खुला रखा गया है?क्या सरकार इस पर जनमत संग्रह की हिम्मत कर पायेगी?अगर नहीं तो प्रतिनिधिक लोकतंत्र सिर्फ दलाली के लिए ही तो होगा। सरकार अब जनवितरण प्रणाली के तहत मिलने वाले अनाज और मिट्टी के तेल के बदले पैसा देने की तैयारी में लगी है कि इससे भ्रष्टाचार कम होगा। लेकिन यह एक नये तरह का भ्रष्टाचार होगा। पीडीएस में पैसे का वितरण देश में भुखमरी तो बढ़ायेगा ही, निजीकरण का मार्ग भी  खोलेगा।

आम राय यह है कि निजीकरण से भ्रष्टाचार  कम होता है?

निजी निकायों की सफलता का ढोल पीटने वाली सरकार को समझ लेना चाहिए कि देश में निजीकरण की वजह से भ्रष्टाचार कई गुना बढ़ गया है। तेईस फरवरी को अदालत में एक मामला आया जिसमें दिल्ली की प्राइवेट बिजली कंपनियों के अधिकारियों ने बिजली दरों की नियंत्रक कंपनी डीइआरसी के सरकारी अधिकारियों को कुछ लाख रुपये घूस देकर दो रुपये प्रति यूनिट के हिसाब से बिजली शुल्क बढ़ाने का तरीका सुझाया था। इस शुल्क वृद्धि से उन कंपनियों को 20हजार करोड़ रुपये का फायदा होता।

नोबल पुरस्कार विजेता और प्रसिद्ध अर्थशास्त्री जोसेफ स्टिगलिट्ज ने सन् 2002में लिखी अपनी किताब ‘ग्लोबलाइजेशन एंड इट्स कंटेंट’ के ‘हू लॉस्ट रशा’ शीर्षक अध्याय में इस बारे में कुछ अहम बातें कही हैं। रूसी मूल के इस अर्थशास्त्री ने साफ कहा है कि रूस सन् 2002तक भ्रष्टाचार से बजबजा गया, जिसकी शुरुआत सन् 1990 में हुई।

उन्होंने भ्रष्टाचार का बुनियादी कारण निजीकरण को माना है। सन् १९९० में रूस में निजीकरण की शुरुआत हुई थी। इसलिए सरकार अगर विदेशों में जमा काले धन और भ्रष्टाचार  को लेकर संजीदा है तो उसे शासन में जनता की सीधी भागीदारी तय करनी होगी और निजीकरण के विकल्प को हतोत्साहित करना चाहिए।

(द  पब्लिक अजेंडा से साभार)

कल होगी कामकाजी महिलाओं की गोष्ठी


लखनऊ.अंतराष्ट्रीय महिला दिवस के सौ वर्ष पूरा होने के उपलक्ष्य में कामकाजी महिलाओं की समस्याएं और उसके निदान विषय पर अखिल भारतीय महिला पंचायत के ने सिचांई विभाग आडिटोरियम में 8मार्च को संगोष्ठी का आयोजन किया है।

संगोष्ठी के संदर्भ में जानकारी देते हुए अखिल भारतीय महिला पंचायत व आईसीडीएस सुपरवाइर्जर एसोसिएशन की अध्यक्ष रेनू शुक्ला ने प्रेस को जारी अपनी विज्ञिप्ति में बताया कि देश  व प्रदेश में महिला हितों की तमाम घोषणाओं और कानूनों के बावजूद विभिन्न स्तरों पर विभिन्न रूपों में महिलाओं का शोषण व उत्पीड़न हो रहा है।

कामकाजी महिलाओं के कार्यस्थल पर उच्चतम न्यायालय द्वारा महिला शिकायत  सेल गठित करने के आदेश के बावजूद आज तक इस पर अमल नही किया गया। इतना ही नही वर्तमान केन्द्र सरकार जो  कामकाजी महिलाओं की सुरक्षा के लिए प्रस्तावित कानून में यह प्रावधान ला रही है कि उसके मुताबिक यदि शिकायत  गलत साबित होती है तो शिकायतकर्ता  महिला को ही दण्डित  किया जायेगा।

जाहिर है  यह कानून महिलाओं की सुरक्षा की जगह उनमें असुरक्षा की ही भावना को और बढ़ाने का काम करेगा। इसलिए महिला पंचायत द्वारा आयोजित गोष्ठी में कामकाजी महिलाओं की सुरक्षा के लिए केन्द्रीय कानून के निर्माण और हर विभाग में महिला सेल गठित करने के मुद्दे को पुरजोर तरीके से उठाया जायेगा। इसके अलावा इस गोष्ठी में  आंगनबाड़ी कार्यकत्री और सहायिकाएं, आशा बहू को राज्य कर्मचारी का दर्जा देने से लेकर प्रदेश में महिलाओं पर जारी हमलों,घरेलू हिंसा कानून के अनुपालन, महिलाओं के सामाजिक सुरक्षा की गारंटी, महिला छात्रावासों के निर्माण जैसे सवालों को उठाया जायेगा।

इस संगोष्ठी में बाल विकास एवं पुष्टाहार परियोजना सुपरवाइर्जर एसोसिएशन,आगंनबाड़ी कर्मचारी कल्याण समिति,आगंनबाडी कर्मचारी संघ, एएनएम संघ, आशा बहू संघ, शिक्षक संघ, नरेगा मजदूर यूनियन, बीड़ी मजदूर यूनियन, घरेलू कामगार महिला यूनियन और बुनकरों के प्रतिनिधि और महिला अधिवक्ता,डाक्टर आदि भाग लेगें। इस संगोष्ठी का उद्घाटन अखिल भारतीय राज्य कर्मचारी महासंघ की राष्ट्रीय नेता सुतापा हालदार करेंगी।





Mar 6, 2011

छात्र योगेश के परिजनों को हत्या का संदेह, जांच की मांग



जनज्वार टीम. पंजाब के नवाशहर स्थित आइआइटीटी कॉलेज से बीटेक कर रहे छात्र योगेश रंजन की लाश आज सुबह उसके पैतृक घर बिहार के नवादा जिले के बहादुरपुर गाँव  पहुंची है। आत्महत्या के तीन बाद पहुंची लाश को देख परिजन गहरे शोक  में हैं और मान रहे हैं कि यह आत्महत्या का नहीं, हत्या का मामला है।

योगेश रंजन के चाचा राम किंकर पांडेय ने कहा कि,‘अगर योगेश ने पंखे से लटककर आत्महत्या की है तो उसकी गर्दन पर निशान क्यों नहीं है। इसलिए हमलोग हत्या की जांच की मांग करते हैं और इसके लिए हमने स्थानीय सांसद डॉक्टर भोला सिंह से संपर्क भी किया है कि वे संसद में योगेश मामले के जांच की मांग करें।’ परिजनों के मुताबिक चूंकि लाश सड़ रही थी इसलिए उसका दुबारा पोस्टमार्टम कराना संभव नहीं था। गौरतलब है कि 4मार्च को योगेश की आत्महत्या का मामला उस समय सामने आया था जब रात बजे उसके दोस्त उससे मिलने गये थे।

योगेश की लाश गांव पहुंचने के बाद यह विवाद गहराने लगा है कि उसने आत्महत्या की थी,या हत्या है। प्रथम वर्ष के प्रथम सेमेस्टर के छात्र योगेश ने आत्महत्या रिजल्ट आने के तीन घंटे बाद की थी। इसलिए स्वाभाविक तौर पर यही माना जा रहा है कि आत्महत्या के पीछे खराब परीक्षा परिणाम का सदमा ही रहा हागा। लेकिन योगेश के साथी एक दूसरा सवाल उठाते हैं कि यहां की परिस्थितियां भी ऐसी हैं कि छात्र या तो भाग जाये नहीं तो आत्महत्या कर लें।

बीटेक कर रहे एक दूसरे वर्ष के छात्र ने बताया कि ‘छात्रों को फेल कराना यहां एक चलन है। इससे निजी शिक्षा संस्थानों का मुनाफा बढ़ता है। अगर ऐसा नहीं है तो इन्हें कॉलेज बंद कर देना चाहिए क्योंकि बीटेक प्रथम वर्ष के प्रथम सेमेस्टर में पढ़ने वाले 150 छात्रों में 98 फीसदी छात्र किसी न किसी विषय में फेल हैं। ऐसे में जो छात्र सच में मेधावी होगा और परिवार वाले एक-एक पैसा जोड़ उसे पढ़ा रहे होंगे तो वह मरेगा नहीं तो क्या करेगा।’

योगेश के आत्महत्या के बाद भी प्रबंधन का रवैया किसी शिक्षा संस्थान का नहीं,दुकान का रहा। कॉलेज के प्रिंसिपल, निदेशक उसे देखने तक नहीं आये।

‘न बेटा बचा, न सपना’


बिहार के पटना शहर के रहने वाले छात्र योगेश की आत्महत्या से लेकर उसकी लाश परिजनों तक सौंपने के दौरान कॉलेज प्रशासन ने जो गैरजिम्मेदाराना रुख अख्तियार किया,उससे छात्र गुस्से में हैं...

जनज्वार टीम. इंजीनियर बनने का सपना सिर्फ योगेश रंजन पाण्डेय का ही नहीं था। सपने का साझीदार उसका पूरा परिवार था। परिवार के उसी साझे सपने को पूरा करने योगेश पंजाब के नवाशहर के आइआइटीटी कॉलेज पहुंचा था। जहां छह महीने की मेहनत के बाद आये रिजल्ट ने सपने को तो आगे नहीं बढ़ाया, अलबत्ता उसकी जिंदगी जरूर लील गया।

पंजाब के पोजेवाल कस्बे में पड़ने वाले आइआइटीटी कॉलेज के प्रथम वर्ष के छात्र योगेश रंजन के 4 मार्च को आत्महत्या करने के बाद कैंपस में तनाव का माहौल है। छात्र मान रहे हैं कि बीटेक कर रहे योगेश की आत्महत्या का मुख्य कारण पंजाब टैक्निकल यूनिवर्सिटी (पीटीयू) के रिजल्ट से उपजी निराशा है, जिसमें उसे पांच विषयों में से चार में फेल कर दिया गया था। गौरतलब है कि उसी दिन पंजाब के अमृतसर में भी एक छात्र की आत्महत्या का मामला सामने आया था।


नाम न छापने की शर्त पर योगेश के साथी कहते हैं कि,‘जो छात्र एमटीएस परीक्षाओं में पचहत्तर फीसदी तक अंक प्राप्त करता रहा हो, वह एकाएक प्रथम सेमेस्टर के रिजल्ट में चार विषयों में फेल करा दिया जाये तो उसे फ्रस्टेशन तो होगा ही।’ऐसे में कॉलेज प्रबंधन अपनी गलती मानने के बजाय अब गुस्साये छात्रों को चुप कराने की जुगत में लगा हुआ है। योगेश की लाश को उसके परिजनों तक सही तरीके से न पहुंचाये जाने से आहत छात्र जब शांतिपूर्वक कॉलेज गेट पर अपना प्रतिरोध व्यक्त कर रहे थे तो अकाउंटेंट जसविंदर सिंह सोदी ने पुलिस को बुला लिया।

बिहार के पटना शहर के रहने वाले छात्र योगेश की आत्महत्या से लेकर उसकी लाश परिजनों तक सौंपने के दौरान प्रशासन ने जो गैरजिम्मेदाराना रुख अख्तियार किया, उससे छात्र गुस्से में हैं। हालत यह है कि योगेश के आत्महत्या करने के दो दिन बाद 6तारीख की देर रात तक भी उसकी लाश उसके परिजनों तक नहीं पहुंच सकी है। योगेश के चाचा राम किंकर पांडेय कहते हैं,‘पहले तो कॉलेज प्रशासन ने योगेश को मारा और अब वे उसकी लाश सड़ा रहे हैं। पैसा बचाने के चक्कर में उन्होंने लाश को हवाई जहाज से भेजने की बजाय सड़क से भेजा है। हमारे साथ यह धूर्तता कॉलेज के एकाउंट आफिसर जसविंदर सिंह सोदी ने की है।’

बीटेक कर रहे योगेश के एक साथी का कहना है कि ‘जैसे ही हम लोगों को पता चला कि योगेश पंखे से लटक रहा है तो हमने उसे उतारने के साथ ही कॉलेज प्रबंधन को सूचित किया। मगर हालत यह है कि कॉलेज में फर्स्ट एड किट तक नहीं है। अगर कैंपस में फर्स्ट एड किट होता तो योगेश को बचाया जा सकता था।’

उल्लेखनीय है कि कॉलेज हॉस्टल में पंखे से फांसी पर लटके योगेश की अस्पताल ले जाते हुए रास्ते में मौत हो गयी थी। उसका प्राथमिक ईलाज हॉस्टल में इसलिए संभव नहीं हो सका कि सैकड़ों छात्रों के इस हॉस्टल में एक भी डॉक्टर की व्यवस्था प्रबंधन ने नहीं की है। ऐसे में सवाल उठता है कि लाखों रुपये फीस वसूलने वाले इन निजी शिक्षा संस्थानों में डॉक्टरों की व्यवस्था क्यों नहीं की गयी है?

बीटेक द्वितीय वर्ष के एक छात्र ने नाम न छापने की शर्त पर बताया कि पीटीयू और प्रबंधन दोनों उसे मारने में बराबर के दोषी हैं। छात्र के मुताबिक ‘पांच में से चार विषयों में फेल कर योगेश को जहां पीटीयू ने आत्महत्या के लिए उकसाया,वहीं कैंपस में शुरुआती इलाज के अभाव ने उसको मारने में कैटेलिस्ट का काम किया।’ छात्रों का आरोप है कि कॉलेज प्रबंधन और इसके कामकाज को देखने वाली नियामक संस्था पीटीयू दोनों की मिलीभगत से इतनी बड़ी संख्या में हर वर्ष छात्रों को बैक पेपर कराया जाता है।

सिर्फ बीटेक की बात की जाये तो पहले सेमेस्टर में आइआइटीटी के प्रथम वर्ष में प्रवेश पाये 150 में से दो को छोड़ सभी छात्र किसी न किसी विषय में फेल हैं। पीटीयू की व्यवस्था के मुताबिक यह छात्र फेल नहीं कराये जाते, बल्कि बैक पेपर देकर उन्हें पास होने की मोहलत दी जाती है। ऊपर से देखने में यह व्यवस्था छात्रों के हित में लगती है,मगर अंततः यह कुकुरमुत्तों की तरह उग आये कॉलेजों के प्रबंधन सेवा के लिए है।

एक सीनियर छात्र से हुई बातचीत में पता चला कि छात्रों का प्रथम पारी में फेल होना और फिर बैक पेपर देकर पास होना पीटीयू के कॉलेजों में एक परंपरा सी बन गयी है। दरअसल,बैक पेपर भरने पर एक छात्र को सात सौ रुपये भरने पड़ते हैं। इस तरह से ये कॉलेज हर वर्ष फेल विद्यार्थियों को पास होने का चांस देने के नाम पर लाखों रुपये पीटीयू के जरिये कमाते हैं।

छात्रों का कहना है यहां पढ़ने वाले ज्यादातर छात्र चूंकि दूसरे राज्यों से आते हैं इसलिए फेल होने से छात्र मकान मालिकों से लेकर दुकानदारों तक की कमाई का जरिया बने रहते हैं। यही जरिया बनना योगेश को स्वीकार नहीं था। शायद इसलिए कि बाकियों की तरह उसके पिता के पास आमदनी का कोई ठोस जरिया नहीं था। योगेश के चाचा राम किंकर पांडेय बताते हैं,‘योगेश के पिता गांव में यजमानी करके घर की रोटी चलाते हैं। उन्होंने जीवनभर की कमाई योगेश के सपने को पूरा करने में लगा दी थी। अब तो न बेटा बचा, न सपना।’

बहरहाल छात्रों और उनके परिजनों के इन गंभीर आरोपों को देखकर कतई इनकार नहीं किया जा सकता, क्योंकि यह बात वे अपने अनुभवों के आधार पर कह रहे हैं।





Mar 5, 2011

जामिया मिल्लिया में कुलीन मुसलमानों की साजिश


उर्दू, फारसी, अरबी, इस्लामी अध्ययन में तो यहां मुसलमान शिक्षार्थियों का अनुपात 99 प्रतिशत से भी ज्यादा रहता है, लेकिन विज्ञान,इंजीनियरिंग आदि में मुसलमान कहां से लाए जाएंगे? जाहिर  है  उनको भरने के लिए अल्पसंख्यकों के मुसलमान ठेकेदार मेरिट में रियायत दिलाना चाहेंगे...

शम्सुल इस्लाम

राष्ट्रीय अल्पसंख्यक शिक्षा संस्थान आयोग की तीन सदस्यीय पीठ ने न्यायमूर्ति एमएस सिद्दिकी की अध्यक्षता में 22 फरवरी को एक विवादास्पद निर्णय द्वारा जामिया इस्लामिया को अल्पसंख्यक विश्वविद्यालय का दर्जा दे दिया है। समर्थकों का कहना है कि इस फैसले में कुछ भी असामान्य बात नहीं है, क्योंकि व्यवहार में जामिया (1920) अपने जन्म से ही एक मुस्लिम संगठन था।

कॉरपोरेट जगत की बड़ी हस्ती रह चुके जामिया के मौजूदा उपकुलपति नजीब जंग का कहना है कि इससे जमीनी हालात में कुछ भी फर्क नहीं पड़ेगा, क्योंकि यहां पहले से ही मुसलमान शिक्षार्थियों की संख्या 52 प्रतिशत है। उन्होंने यह भी दावा किया कि आयोग की इस घोषणा से जामिया के सेकुलर स्वरूप पर कोई प्रतिकूल असर नहीं पड़ेगा।


इस मामले पर कोई भी पुख्ता राय बनाने से पहले इन दावों की पड़ताल जरूरी है। जो लोग जामिया को पैदाइशी मुसलमान अर्थात अल्पसंख्यक संस्थान मानते हैं और इस बात पर जोर देते हैं कि यह तो बुनियादी तौर पर अल्पसंख्यक संस्थान ही रहा है,तो उन्हें इस बात का जवाब देना होगा कि अगर जामिया पहले से ही मुसलिम संस्थान था,तो उसे एक बार फिर अल्पसंख्यक संस्थान घोषित करने की क्या जरूरत है।

एक और महत्वपूर्ण सवाल है, जिसका जवाब चाहिए। अगर हमारे देश के तमाम मुसलमानों के हित और उद्देश्य एक ही जैसे थे, तो गांधीजी के मशवरे पर मौलाना मोहम्मद अली जौहर, हकीम अजमल खान, जाकिर हुसैन, एमए अंसारी सरीखे मुस्लिम नेताओं ने एक और ‘मुस्लिम संस्थान’ अलीगढ़ कॉलेज (अब अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय) से संबंध विच्छेद करके, दक्षिणी दिल्ली के कीकर के जंगल में जामिया को स्थापित करने का फैसला क्यों किया था?

सच यह है कि अलीगढ़ कॉलेज मुसलमानों के बीच में शिक्षा का प्रसार करने से ज्यादा उन्हें कूप का मेंढक बनाने का काम कर रहा था। यह संस्थान मुसलमानों के बीच पनप रहे सामंती मूल्यों का गढ़ बन गया था। जो लोग और समूह मुसलमानों के बीच प्रगतिशील,जनवादी और न्याय पर आधारित शिक्षा का प्रसार चाहते थे,उन्होंने जामिया की बुनियाद रखी थी और उसको परवान चढ़ाया।

जामिया का अल्पसंख्यकीकरण दरअसल इस ऐतिहासिक विश्वविद्यालय को उसके असली उद्देश्य से भटकाकर शिक्षार्थियों को कूप का मेंढक बनाने का ही काम करेगा। इस सच्चाई को दरकिनार करना मुश्किल है कि उर्दू, फारसी, अरबी, इस्लामी अध्ययन में तो यहां मुसलमान शिक्षार्थियों का अनुपात 99 प्रतिशत से भी ज्यादा रहता है, लेकिन विज्ञान, इंजीनियरिंग आदि में मुसलमान कहां से लाए जाएंगे?उनको भरने के लिए अल्पसंख्यकों के मुसलमान ठेकेदार मेरिट में रियायत दिलाना चाहेंगे, जिसके नतीजे में कम पढ़े-लिखों का ही लश्कर तैयार होगा।

जो तत्व जामिया के अल्पसंख्यकीकरण का झंडा बुलंद किए हुए हैं,उन्हें जामिया की स्थापना के कारणों और उद्देश्यों को समझना होगा। यह याद रखना जरूरी है कि मुसलमानों के बीच भी पुरातनपंथी और प्रगतिशील विचारों के दरम्यान संघर्ष होता रहा है। न ही सब मुसलमान एक तरह सोचते हैं और न ही उनके समान हित हैं। अलीगढ़ कॉलेज मुसलमानों के कुलीन वर्ग की, जो अपने आपको अशरफ कहते हैं,जागीर था। दबे-कुचले मुसलमानों को शिक्षित करने के लिए जामिया की स्थापना हुई थी।
मुसलमान उच्चजातीय तत्वों को जामिया को अल्पसंख्यक संस्थान बनाने की बात उस समय याद आई,जब सरकार ने शिक्षा संस्थानों में ओबीसी के लिए 27प्रतिशत आरक्षण की घोषणा की। इसीलिए 2006में जामिया को अल्पसंख्यक संस्थान घोषित करने की अपील दाखिल की गई। यह याद रखना जरूरी है कि ओबीसी को मिलने वाले आरक्षण का बड़े पैमाने पर फायदा मुसलमानों के दबे-कुचले समूहों को ही मिलना था। यह ओबीसी आरक्षण ही था,जिससे मुसलमानों की अनेक बिरादरियां आरक्षण हासिल कर पाई थीं।

मुसलमानों का दम भरने वाले नेता जातिवादी हिंदू तत्वों से किसी भी मायने में अलग नहीं हैं। वे भी जातिगत कारणों से आरक्षण के विरोधी हैं। ये तत्व समस्त मुसलमानों के लिए आरक्षण की मांग तो करते रहते हैं, लेकिन जहां पर इनका दबदबा होता है, वहां एसी/एसटी की बात तो दूर रही, मुसलमानों की पिछड़ी जातियों को भी उनके संवैधानिक हक देने को तैयार नहीं हैं।

दुख की बात यह है कि ऐसा करने के लिए वे संविधान की आड़ लेते हें। मुसलमानों के कुलीन वर्ग का यह रवैया कोई नई बात नहीं है। डॉ.अंबेडकर ने इसी रवैये पर कहा था कि मुसलमानों में हैसियत रखने वाले तत्व उतने ही जातिवादी हैं,जितने हिंदुओं में होते हैं। जामिया के अल्पसंख्यकीकरण पर जो जश्न मना रहे हैं, वे इस सच्चाई को ही एक बार फिर जी रहे हैं।

(हिंदुस्तान  से  साभार ) 



Mar 4, 2011

उत्तराखंड के जननायक पड़े हाशिये पर



गढ़वाल विश्वविद्यालय, जिसे लोगों ने बड़े संघर्षों के बाद बनाया, वह आज अपने अस्तित्व के लिए जूझ रहा है। राजनीतिज्ञों की नासमझी से पहले एक प्रतिष्ठित विश्वविद्यालय को अब अपनी मान्यता के लिए दर-दर भटकना पड़ रहा है...


चारु तिवारी

 
करीब  दस वर्ष पहले जब देश में तीन राज्य अस्तित्व में आये तो उनकी अपनी-अपनी प्राथमिकतायें थीं। भाजपा के नेतृत्व में उस समय केंद्र में राजग की सरकार थी। संसद में जब भाजपा ने वनांचल और उत्तरांचल पर बहस करायी तो झारखण्ड के लोगों ने कहा कि झारखण्ड हमारी अस्मिता का सवाल है। उन्होंने वनांचल को एक सिरे से खारिज किया। उन्होंने कहा कि वनांचल से बेहतर है कि हमें राज्य ही न मिले। इसके उलट उत्तराखण्ड नाम को उत्तर प्रदेश से लेकर केंद्र तक संशोधन करने की सिफारिश की गयी। जिस तरह के तर्क इसके समर्थन में दिये गये उससे कोई सहमत नहीं हो सकता।

खैर, राज्य बन गया। देहरादून की सड़कों पर ‘अटल बिहारी वाजपेयी जिन्दाबाद’ के नारे गूंजने लगे। इस बदलाव में इतिहास भी बदल गया। पहाड़ के गांधी कहे जाने वाले इन्द्रमणि बडोनी को याद करने को किसी को फुर्सत नहीं हुयी। कामरेड पीसी जोशी, ऋषिवल्लभ सुन्दरियाल, त्रेपन सिंह नेगी, कामरेड नारायण दत्त सुन्दरियाल, डॉ. डीडी पंत, आंदोलन में शहीद हुए 42 आंदोलनकारी और राज्य आंदोलन में मर-खप गयी एक पीढ़ी को भुला दिया गया। नित्यानंद स्वामी को मुख्यमंत्री और सुरजीत सिंह बरनाला को राज्यपाल बनाया गया। यह उत्तराखण्ड नहीं उत्तरांचल का नया अवतार था। यह तीस वर्ष के राज्य संघर्ष को हाइजैक करने की बड़ी राजनीतिक घटना थी।

यह सिलसिला अभी जारी है। अब उत्तराखण्ड को नये इतिहास पुरुषों से परिचित कराया जा रहा है। उसी तरह जैसे उसके पौराणिक नाम उत्तराखण्ड को उत्तरांचल कर। क्षेत्रीय भाषाओं को हतोत्साहित कर संस्कृत भाषा को दूसरी राजभाषा का दर्जा देकर। गंगा प्रहरियों को विस्मृत कर हेमामालिनी को ब्रांड एम्बेसडर बनाकर।

राज्य में कई संस्थानों और योजनाओं को महापुरुषों के नाम पर रखा गया है। कई जगह इस तरह के नाम रखे जा रहे हैं या उन्हीं नामों से नये संस्थान खोले जा रहे हैं। दुर्भाग्य से किसी भी संस्थान या योजना का नाम रखते समय हमारे नीति-नियंताओं को न तो उसकी प्रासंगिकता का पता है और न प्रभाव का। वे इस बात पर ज्यादा दिमाग नहीं लगाना चाहते कि किस क्षेत्र में किन लोगों ने क्या योगदान किया है।

ताजा उदाहरण अटल खाद्यान्न योजना का है। यह ठीक है कि अटलजी भाजपा के शिखर पुरुष हैं, उनकी वंदना से राजनीति आसान हो जाती है। जिस जनता के वोट से सरकारें बनती है। उनके भी इतिहास पुरुष होते हैं, यह सत्ता में बैठे लोगों को समझना चाहिए। असल में इस योजना का नाम उत्तराखण्ड के दो ऐसे इतिहास पुरुषों के नाम पर रखा जा सकता था जिन्होंने आम लोगों तक अनाज पहुंचाने के लिए बड़ा योगदान दिया।

इनमें से एक हैं रुद्रपुर के रहने वाले इन्द्रासन सिंह। वे स्वतंत्रता संग्राम सेनानी रहे। मूल रूप से लखीमपुर के रहने वाले इन्द्रासन को स्वतंत्रता संग्राम सेनानी कोटे से नैनीताल की तराई (उधमसिंहनगर) में जमीन मिली। उन्होंने यहां ऐसे धान का आविष्कार किया जो बासमती जैसा था। इसकी कीमत बहुत कम थी। उन्होंने इसे इस उद्देश्य से विकसित किया था कि आम लोगों को पौष्टिक और सस्ता चावल प्राप्त हो सके। बाद में इसे इन्द्रासन चावल के नाम से जाना गया। इसे गरीबों की बासमती भी कहा जाता है।

दूसरे हैं माधो सिंह भण्डारी। भण्डारी उत्तराखण्ड के उन महान सपूतों में हैं जिन्होंने मलेथा की गूल से इतिहास ही नहीं रचा,बल्कि पहाड़ों में खेती और अनाज उगाने के लिए नई प्रेरणा दी। वे इस विचार के प्रेरणा पुरुष भी थे कि पहाड़ों में स्थानीय संसाधनों को विकसित कर उन्नत खेती की जा सकती है। उन्होंने मलेथा नहर को लाने के लिए अपने बेटे की बलि दे दी। सरकार अगर जरा सा भी आम लोगों के सरोकारों को समझती तो यह दो नाम इस योजना की सार्थकता और सरकार की मंशा के साथ न्याय कर पाते।

गढ़वाल विश्वविद्यालय, जिसे लोगों ने बड़े संघर्षों के बाद बनाया, वह आज अपने अस्तित्व के लिए जूझ रहा है। राजनीतिज्ञों की नासमझी से पहले एक प्रतिष्ठित विश्वविद्यालय को अब अपनी मान्यता के लिए दर-दर भटकना पड़ रहा है। टिहरी परिसर को अब दीनदयाल उपाध्याय के नाम से जाना जायेगा। वैसे भी पार्कों से लेकर संस्थानों और योजनाओं के इतने नाम दीनदयाल के नाम पर रखे गये हैं कि राज्य में औरों के लिए एक इंच जगह नहीं है।

टिहरी परिसर का नाम रखने से पहले सरकार सरकार कुछ इन नामों पर भी विचार कर लेती तो उसका कुछ नहीं बिगड़ता। हो सकता है उन्हें उपाध्याय के सामने श्रीदेव सुमन, नागेंद्र सकलानी जैसे नाम बहुत छोटे लगते हों। जयानंद भारती, गढ़केसरी अनुसूया प्रसाद बहुगुणा, मौलाराम तोमर, त्रेपन सिंह नेगी, चंद्रकुंवर बर्थवाल, ऋषिवल्लभ सुन्दरियाल, भक्तदर्शन आदि कई हस्तियां इसी जमीन और इन्हीं सरोकारों के लिए संघर्ष करती रहीं, उनके बारे में सरकारों के उपेक्षापूर्ण रवैये के बारे में सबको सोचना पड़ेगा।

पिछले दिनों से देहरादून के तकनीकी विश्वविद्यालय का नाम संघ के सरचालक रहे रज्जू भैया के नाम पर रखने पर विचार किया जा रहा है। प्रचारित किया जा रहा है कि वे भौतिक शास्त्र के प्रोफेसर थे। पहाड़ में उनके जैसे कई प्रोफेसर पहले भी थे और आज भी हैं। डॉ.डीडी पंत जैसे भौतिकशास्त्री उत्तराखण्ड में हुए हैं जिन्होंने पंत रेज के नाम से दुनिया में बड़ी खोज की। द्वितीय विश्वयुद्ध के कचरे से एशिया की सबसे अच्छी भौतिक प्रयोगशाला बनाने वाले पंत का शिक्षा के अलावा राज्य आंदोलन में भी योगदान रहा।

डॉ.पंत के नाम की संस्तुति अगर इस तकनीकी विश्वविद्यालय के लिए होती तो पहाड़ को गर्व होता। एक थे चंद्रशेखर लोहनी। हाईस्कूल पास शिक्षक। राष्ट्रपति पुरस्कार से सम्मानित। पंतनगर विश्वविद्यालय ने उन्हें इसलिए सम्मानित किया कि उन्होंने लेंनटाना (कुरी)घास को फैलने   से रोकने की खोज की, जो वनस्पति शास्त्र में मशहूर हुई।

यह एक बहुत संक्षिप्त सा आकलन है नामों को लेकर। कालूसिंह महर पहले पहाड़ी थे जिन्हें अंग्रेजों ने फांसी दी थी। डॉ. खजान पांडे का चिकित्सा शोध में महत्वपूर्ण काम है। एक थी जसूली दत्याल, जिन्होंने कुमाऊं कमिश्नर रामजे को अपनी सारी संपत्ति मानसरोवर यात्रा मार्ग पर धर्मशालायें बनाने को दे दी। कैप्टन राम सिंह ने राष्ट्रगान की धुन बनायी। इसके अलावा एक बड़ी सूची है ऐसे नायकों की,जिनके सामने आज के इन राजनीतिक इतिहास पुरुषों का काम कहीं नहीं ठहरता। सरकार जब भी संस्थानों का नाम रखे, उसमें पहाड़ के गौरव रहे मनीषियों की उपेक्षा न करे।



 पत्रकारिता में जनपक्षधर रुझान के प्रबल समर्थक और  जनसंघर्षों से गहरा लगाव रखने वाले चारु  तिवारी उत्तराखंड के राजनितिक-सामाजिक मामलों के अच्छे जानकार हैं. फिलहाल जनपक्ष आजकल पत्रिका के संपादक. उनसे tiwari11964@gmail.com पर संपर्क किया जा सकता है.