Mar 2, 2011

बलात्कार के पांच वर्ष


राबिया शादी के लिए राजी न थी.तब साहिल खत्री ने अपने सिर पर कांच का गिलास मारा और खुद को चोट पहुंचाकर वकीलों और सब इंस्पेक्टर प्रहलाद सिंह ने जान से मारने का हमला करने के झूठे केस में राबिया को बंद कराने की धमकी दी...


जागृति महिला समिति.   उत्तर प्रदेश के मुजफ्फरनगर जिले के निम्न मध्यवर्गीय परिवार की राबिया.जीवन में कुछ बनने और अपने परिवार को आर्थिक स्तर पर मजबूत बनाने के सपने लिए वह दिल्ली आई. 2002में अपने शहर से बारहवीं कक्षा पास करने के बाद उसने   कम्प्यूटर ट्रैनिंग, सिलाई-कढ़ाई, ब्यूटी पार्लर आदि की ट्रैनिंग लेती रही कि वह कुछ बेहतर कर सके. 
   
कुछ बेहतर बनने का सपना उसे   जनवरी 2005 में दिल्ली के आया. राबिया फैशन डिजाइनिंग का कोर्स करना चाहती थी. लेकिन फैशन डिजाइनिंग का सेशन जून/जुलाई से शुरू होना था। इसी बीच राबिया की नजर एक हिंदी अखबार के टेली कालर के जॉब के विज्ञापन पर पड़ी। इस जॉब के सिलसिले में उसे प्रीतमपुरा के टूईन टॉवर में साजन इंटर प्राइजेज में मिलना था। राबिया ने 21फरवरी को इंटरव्यू दिया और इंटरव्यू में पास होने के बाद काम करने लगी।

उसे प्रोपराइटर सुरेंद्र बिज उर्फ साहिल खत्री ने कोई भी नियुक्ति पत्र या करारनामा नहीं दिया। राबिया 4500रुपये पर नौकरी करने लगी। दो माह काम करने पर प्रोपराइटर उर्फ मालिक ने उसे मात्र तीन हजार रुपये वेतन दिया। तब राबिया ने अपना पूरा वेतन मांगा और दफ्तर तक आने-जाने का खर्च का ब्यौरा दिया और कहा कि इतने कम पर काम नहीं कर पायेगी.  

ऐसे में राबिया ने नौकरी छोड़ने को कहा. तो प्रोपराइटर ने राबिया को रहने के लिए जगह आफर की और कहा जबतक सैलरी  नहीं बढती इसी में रहो. राबिया  20 अप्रैल 2005 को प्रोपराइटर द्वारा दिये गये फ्लोर सी-27, ओम अपार्टमेंट 33 /77, पंजाबी बाग में अपने सामान के साथ शिफ्ट कर लिया, जहाँ उसे एक लड़की के साथ फ्लैट शेयर करना था. 


वहीं से 18-19साल की राबिया के जीवन की बर्बादी शुरू  हुई.  राबिया के वहां रहने के दूसरे ही दिन साहिल खत्री उर्फ सुरेंद्र विज, उसके लड़के अक्षय खत्री, भांजे कपिल ढल, साहिल खत्री के दोस्त रोमी ने राबिया के साथ वहां रह रही लड़की की मदद से बलात्कार किया। राबिया को आफिस जाने से रोककर उसी फ्लोर पर कैद कर लिया गया। यहां तक की टॉयलेट भी चाकू दिखाकर ले जाया जाता था। वहां रह रही लड़की से राबिया को पता चला कि वह भी उसकी शिकार थी और  किस्मत से समझौता कर चुकी थी।

राबिया को पता चला कि यह घर प्रोपराइटर के वकील दोस्त एमके अरोड़ा का है और इसे इसी काम के लिए इस्तेमाल किया जाता है। उसके बाद हर रोज नये आदमी आते रहे और राबिया के साथ बलात्कार करते रहे. आनेवालों में कई पुलिस वाले और वकील भी आते, जो  प्रोपराइटर के दोस्त थे और उसके काले धंधे में शामिल थे। प्रोपराइटर के कई काले धंधे हैं । वह कहीं मैजिक गु्रप चलाता था,कहीं प्रोपर्टी पर कब्जा करता था,कहीं लाखों का माल लेकर  चेक देता था, जिसमें पैसा ही नहीं होता था। सारे चेक बाउंस होते थे। उसके ऊपर पुलिस अफसर और वकील साथी काले धंधे को संरक्षण देकर भारी रकम कमाते थे।

राबिया को सख्त पहरे में रखा जाता था। राबिया उनके चंगुल से भागना चाहती थी,लेकिन इतने बड़े आपराधिक गैंग से निकल पाना संभव नहीं था। हालाँकि गैंग समझ चुका था कि राबिया किसी तरह भाग जाना चाहती थी. इसलिए उससे कई ब्लैंक पेपर साइन कराये गये। वकील एमके अरोड़ा, वकील नवीन सिंघला और सब इंस्पेक्टर प्रहलाद सिंह ने  साहिल खत्री के साथ साजिश रची कि इस लड़की के साथ साहिल खत्री शादी कर ले।

राबिया शादी के लिए राजी न थी.तब साहिल खत्री ने अपने सिर पर कांच का गिलास मारा और खुद को चोट पहुंचाकर वकीलों और सब इंस्पेक्टर प्रहलाद सिंह ने जान से मारने का हमला करने के झूठे केस में राबिया को बंद कराने की धमकी देकर शादी करने को मजबूर किया। कहीं भी शोर-शराबा करने पर जान से खत्म करने की धमकी देकर आर्य समाज मंदिर यमुना बाजार ले जाया गया। वहां राबिया का धर्म परिवर्तन कराकर उसके साथ तीन बच्चों के पिता लगभग 45वर्षीय साहिल खत्री ने पहली पत्नी को तलाक दिये बगैर विवाह किया।

मंदिर में दिये गये शपथपत्र में उसने खुद को अविवाहित लिखा और अपने अपने निवास स्थान और पते का कोई सबूत नहीं दिया। लिहाजा मंदिर ने कोई छानबीन किये बगैर यह गैरकानूनी विवाह करा दिया। चाकू की नोक पर वकील एमके अरोड़ा के मकान पर विवाह के बाद कैद करके हर रोज उसके बलात्कार का सिलसिला जारी रहा। राबिया के माता-पिता और भाई उसको ढूंढ़ते-ढूंढ़ते थक गये, फिर मरा जानकर खामोश हो गये। अपराधी साहिल खत्री ने तब तक रहने के कई स्थान बदल डाले थे।

अठारह जुलाई 2007को गैंग से मुक्त होने के लिए छटपटा रही राबिया ने मौका मिलते ही अपने भाई को बताया कि वह यहां कैद है, उसे मुक्त करा लें। भाई बहन के बताये पते पर मोतीनगर उसे मुक्त कराने गया, तो साहिल खत्री ने 100 नंबर पर पुलिस को फोन करके 14 लाख रुपये एवं गहनों की चोरी का आरोप लगाया और कहा कि राबिया के किसी सगे-संबंधी ने चोरी की है।

यह सब मोतीनगर के थानाध्यक्ष एवं सब इंस्पेक्टर प्रहलाद सिंह और वकील एमके अरोड़ा की मिलीभगत से किया गया। राबिया और उसके भाई को थाना मोतीनगर में थानाध्यक्ष एवं एमके अरोड़ा और सब इंस्पेक्टर प्रहलाद सिंह ने बुरी तरह पीटा। राबिया के भाई से यह कहलवा लिया गया कि वह फिर कभी राबिया को लेने दोबारा नहीं आयेगा। इसके बाद 14 लाख रुपये और गहनों की चोरी की कोई एफआईआर दर्ज नहीं करायी गयी।

राबिया बार-बार अपना पीछा छुड़ाने के जितने प्रयास करती,उतना ही अपराधी गैंग उसे फंसा रहा था। उसके वोटर आईडी, बैंक खाते, पैन कार्ड आदि बनवाये गये। आपराधिक मुकदमों में जमानत के लिए राबिया के आईडी प्रूफ का इस्तेमाल उसे डरा-धमकाकर कर लिया जाता था। राबिया ने अपने लिये कभी कोई आईडी इस्तेमाल नहीं की।

इतना ही नहीं राबिया ने आज तक न तो अपना ड्राइविंग लाइसेंस बनाया और न ही उसे बाइक चलानी आती है। फिर भी साहिल खत्री ने DL4SBM0947 नंबर की करिज्मा मोटर साइकिल राबिया के नाम से 26 अगस्त 2008 को खरीदी। इसकी पेमेंट बलात्कारी कपिल ढल से साहिल खत्री ने उसके एटीएम कार्ड से करायी। मोटर साइकिल राबिया के नाम से इसलिये खरीदी गयी कि वह साहिल खत्री के आपराधिक मुकदमे राबिया से जमानत करा सके। दूसरा राबिया भाग न सके। जबकि राबिया के नाम से खरीदी गयी मोटर साइकिल अक्षय खत्री इस्तेमाल करता था।

राबिया ने एक बार फिर साहिल खत्री द्वारा जबरन यौन शोषण करने-कराने की शिकायत अपने भाई के माध्यम से 5 जनवरी 2009 को थाना मोतीनगर में दर्ज करायी, मगर फिर से साहिल खत्री एवं उसके पुलिस अफसर दोस्तों ने मोटर साइकिल चोरी के दूसरे केस में उसे फंसाने की कोशिश की। उसके बाद डरा-धमकाकर कहलवा लिया कि राबिया साहिल खत्री को छोड़कर कहीं नहीं जायेगी। लेकिन इस बार राबिया एक लड़की की मदद से भागने में कामयाब हो गयी।

वह अपने घर इसलिए नहीं गयी कि घरवालों को पुलिस वाले और साहिल खत्री तंग न करे। राबिया नाम बदलकर पहले उस लड़की की मदद से मुंबई गयी,फिर उदयपुर में नारायण सेवा संस्थान गयी। साहिल खत्री ने पुलिस,वकीलों और बदमाश दोस्तों के साथ साजिश रचकर मोतीनगर थाने में दिनांक 06-01-2009 को चोरी का मुकदमा दर्ज करा दिया। कंपलेंट के आधार पर सब इंस्पेक्टर प्रहलाद सिंह ने झूठी छानबीन की रिपोर्ट तैयार करके दिनांक 18-05-2009 को एफआईआर नंबर 199 /09 राबिया एवं उसके भाइयों के खिलाफ दर्ज करा दी। उसके भाइयों को मुजफ्फरनगर जाकर गिरफ्तार कर लिया गया।

इतना ही नहीं पुलिसवाले राबिया के घर से बहुमूल्य सामान उठा लाये। सामान कहीं दर्ज नहीं किया गया, उसे पुलिसवाले हजम कर गये। राबिया से कहा गया कि ‘तेरा भाई जेल में बंद है, तू वापस आयेगी तभी छुड़वाया जायेगा।’ राबिया वापस आयी। उसने झूठे मुकदमे का विरोध किया तो उसे भी पकड़ लिया गया।

बाद में मजबूर होकर राबिया ने फिर से साहिल खत्री के साथ रहने का समझौता कर लिया। राबिया की जमानत बलात्कारी साहिल खत्री ने करा दी और कोर्ट में बाइक का पैसा जमा कराने को कहकर राबिया को साथ ले गया। फिर घर बदल लिया। दूसरे इलाके में राबिया ने साहिल खत्री द्वारा की जा रही ज्यादतियों का विरोध फिर शुरू कर दिया तो कोर्ट में मोटर साइकिल की रकम की किस्त जमा कराना बंद कर दिया गया।

राबिया को तारीख पर पेश नहीं होने दिया गया। अदालत से वारंट जारी करा दिया और साहिल खत्री उसे अपनी कैद में रखता रहा। उसे धमकी देता रहा कि जिस दिन तूने भागने की कोशिश की, तुझे गिरफ्तार करा दूंगा। कोर्ट के गैर जमानती वारंटों पर पुलिस राबिया को गिरफ्तार नहीं कर रही थी। यह जानते हुए भी कि साहिल खत्री के साथ रह रही है। साहिल खत्री राबिया को अपने हर अपराध में इस्तेमाल करता था।

राबिया को अक्टूबर 2010 में जागृति महिला समिति के बारे में पता चला। उसने 07-10-2010 को अपनी शिकायत अर्जी थाना विकासपुरी में दी। डीजीपी वेस्ट से लेकर दिल्ली पुलिस आयुक्त एवं संयुक्त आयुक्त विजिलेंस तक उसने शिकायत की,लेकिन उसकी शिकायतों पर कोई तहकीकात नहीं की गयी। राबिया ने उस पर अत्याचार और यौन शोषण कराने वाले सभी पुलिस अफसरों,वकीलों और आपराधिक तत्वों के खिलाफ शिकायत की जिसमें उसने साहिल खत्री के बेटे अक्षय खत्री, भांजे कपिल ढल, भतीजे एवं दोस्तों के दाम दिये।

पुलिस के सभी वरिष्ठ अफसरों तक ने राबिया की शिकायतों को अनदेखा कर दिया। ताज्जुब की बात है कि औरतों की सुरक्षा का दावा करने वाली दिल्ली पुलिस के क्षेत्रीय एसीपी एवं डीसीपी ने मोटर साइकिल के झूठे केस पर अपनी मोहर लगाकर कोर्ट में दाखिल कराने की मंजूरी दे दी। यही नहीं अभियोजन विभाग के वकील ने भी मिलीभगत से चालान पास कर दिया और राबिया को जेल भेजने की ठान ली।

जागृति महिला समिति के जरिये 21-10-2010को राबिया की जमानत बड़ी मुश्किल से करायी, पर वह आपराधिक गैंग के खिलाफ वह पुलिस के आला अफसरों को लगातार अर्जियां भेज रही थी इसलिए दिनांक 03-11-2010 को राबिया का सामान आपराधिक गैंग ने चोरी कर लिया। मात्र पहने हुए कपड़ों में राबिया जागृति महिला समिति की शरण में पहुंची।

राबिया फिर से काम की तलाश में थी और  अपनी किसी सहेली के घर पर रह रही थी। दूसरी ओर समिति की मदद से अन्याय और अपराध के खिलाफ लड़ रही थी,जिसकी भनक पुलिसवालों को थी। राबिया और उसके भाई को फिर से झूठे मुकदमे में फंसाने की साजिश साहिल खत्री,अक्षय खत्री, प्रतीक खत्री, निति खत्री, साहिल खत्री के साथ पुलिस के अफसर और वकीलों जोरों से कर रहे थे।

 दिनांक 09-01-2011को गहरी साजिश के तहत साहिल खत्री ने खुद पर गोली चलाकर कातिलाना हमले के मुकदमे में राबिया और उसके भाई को फंसाने की नीयत से पुलिस एवं वकीलों की मिलीभगत से अपनी बाजू पर गोली मार ली। लेकिन गोली उसके हृदय पर लग गयी,साहिल खत्री मर गया। राबिया के निर्दोष भाई और राबिया को पुलिस ने पकड़ लिया। 10-01-2011को पुलिस ने राबिया और उसके भाई को गैरकानूनी तरीके से थर्ड डिग्री की मार लगायी। गैर कानूनी ढंग से इन्हें दिनांक 19-01-2011 को रात तक थाने में रखा।

समिति ने क्षेत्रीय डीसीपी नॉर्थवेस्ट को 14पेज का पत्र लिखा। तब कहीं साहिल खत्री के गैंग के कुछ व्यक्तियों, उसके बेटों और दोस्तों को पुलिस ने पकड़ा। इन लोगों ने अपना अपराध कबूल कर लिया। पूरी प्लानिंग के तहत साजिश रची गयी थी-राबिया और उसके भाई को झूठे केस में फंसाने की। लेकिन अपराधियों ने अपना जुर्म कबूल कर लिया तो पुलिस ने उन्हें भी छोड़ दिया।

राबिया की शिकायत पर आज तक कोई कार्रवाई तो दूर,सुनवाई तक नहीं की गयी। यह है हमारी पुलिस, पुलिस प्रशासन, प्रोसिक्यूशन और अदालतें। 18-23 वर्ष तक की उम्र में पांच सालों तक राबिया के जीवन की और उसके परिवार को बर्बाद  करने वाले अपराधी आजाद घूम रहे हैं और फाइलें  अदालतों में धूल चाट रही हैं।



जरूरी हैं क्षेत्रीय दल

भारत में दो प्रमुख पार्टियां हैं-कांग्रेस और  भाजपा। दोनों निजीकरण और उदारीकरण के प्रति प्रतिबद्ध हैं,और देश की मिट्टी, हवा और पानी तक बेच देने से गुरे़ज नहीं करती हैं...  

मदन कश्यप

आंध्र प्रदेश में फिल्म अभिनेता चिरंजीवी की पार्टी प्रजा देशम् के कांग्रेस में विलय से कांग्रेस पार्टी भले ही मजबूत हुई हो,हमारा संसदीय लोकतंत्र तो कम़जोर ही हुआ है। एक ब़डे राज्य में तीसरे दल की संभावना खत्म हो गयी है।

लोकतंत्र की म़जबूती के लिए राज्यों में तीसरे दलों का और केंद्रीय स्तर पर तीसरे मोर्चे का म़जबूत होना और रहना जरूरी है। दो दलीय प्रणाली हमेशा ही लोकतंत्र को सीमित करती है और वैसी परिस्थिति में जनतंत्र सत्ता  के दलालों के हाथों में पूरी तरह चला जाता है। अमेरिका और ब्रिटेन सहित यूरोप के कई प्रमुख देशो में ऐसा हो भी चुका है।

दो दलीय प्रणाली में सत्ता परिवर्तन का कोई मायने-मतलब नहीं रह गया है। अमेरिका में राष्ट्रपति चाहे डेमोक्रेट हो अथवा रिपब्लिकन हालात में कोई खास बदलाव नहीं आता है। वही हालत ब्रिटेन में कंजरवेटिव और लेबर पार्टी की है। ऐसी स्थिति में दोनों पार्टियां एक ही वर्ग के हित में काम करती हैं और अदल-बदल कर सत्ता में आती रहती हैं। इनमें कोई गुणात्मक अंतर नहीं होता और उनके आर्थिक हित भी समान होते हैं।

फ़र्क सि़र्फ समाज के कुछ तबकों, कुछ इलाकों और भाषाई समूहों को अपेक्षाकृत कम या ़ज्यादा तवज्जो देने का होता है और इसके अंतर के चलते ऊपरी तौर पर कुछ राजनीतिक गतिशीलता दिखलाई देती है, मगर ब़डे पूंजीपतियों, बहुराष्ट्रीय कंपनियों, निगमों और औद्योगिक  घरानों को कोई ़फ़र्क नहीं प़डता। ब़डे औद्योगिक देशों में तो स्थिति पहले से ही ऐसी थी,मगर सोवियत संघ के विघटन और भूमंडलीकरण की नयी अर्थनीति के लागू होने के बाद तो अमेरिका के इशारे पर पूरी दुनिया में प्रतिपक्ष की भूमिका समाप्त करने की कोशिश की जा रही है।


ढिंढोरा भले ही पीटा गया कि पश्चिमी शैली का उदारवादी लोकतंत्र अब दुनिया की अंतिम शासन व्यवस्था है और इतिहास का अंत हो चुका है, मगर सच तो यह है कि पूरी दुनिया में तानाशाही को ब़ढावा दिया गया और राष्ट्रवाद के आधार को कम़जोर किया गया। यह अलग से विचारणीय विषय है। फिलहाल तो सि़र्फ इस तथ्य पर ध्यान देने की जरूरत है कि उस भूमंडलीकरण के बाद ही सांप्रदायिकता का उभार हुआ और शासकवर्ग की दूसरी पार्टी के रूप में भाजपा का उदय हुआ। कांग्रेस की वास्तविक प्रतिपक्षी पार्टियां कमजोर होती हुई कुछ राज्यों तक सिमट गयीं।
अब भारत में दो प्रमुख पार्टियां हैं-कांग्रेस और  भाजपा। दोनों अमेरिकापरस्त हैं। दोनों निजीकरण और उदारीकरण के प्रति प्रतिबद्ध हैं, और देश की मिट्टी, हवा और पानी तक बेच देने से गुरे़ज नहीं करती हैं। फिर उन्हें एक-दूसरे का प्रतिपक्ष कैसे कहा जा सकता है?दरअसल यह दूसरा पक्ष है, विपक्ष नहीं सत्ता बदलने से परिवर्तन होता है,प्रगति नहीं। यही है उत्तर  आधुनिकता। कांग्रेस और भाजपा में जो अंतर दिखाई देता है,वह महज भुलावा है। भाजपा का राष्ट्रवाद और कांग्रेस की धर्मनिरपेक्षता एक जैसा ही छद्म है। खूबी यह है कि दोनों एक-दूसरे पर छद्म का आरोप लगाते हैं।

भारत जैसे बहुभाषी, बहुधर्मी और बहुसांस्कृतिक देश में दो दलीय पद्धति लागू करना संभव नहीं है, क्योंकि औपनिवेशिक दासता से मुक्ति के लिए चले संघर्षों के दौरान जो राष्ट्रवाद पनप रहा था और जिसका शुरुआती लाभ कांग्रेस को मिला था,उसकी हवा अब निकल चुकी है। ऐसी स्थिति में इलाकाई और तबकाई आकांक्षाओं को पहचान देने वाली छोटी-छोटी पार्टियों के व़जूद को मिटाया नहीं जा सकता।
तब अमेरिकापरस्त ता़कतों ने एक नया रास्ता निकाला। उन्होंने भाजपा और कांग्रेस के नेतृत्व में दो गठबंधन यानी दो गिरोह बनवा दिये-एनडीए और यूपीए। अर्थात अमेरिकी साम्राज्यवाद और बहुराष्ट्रीय कंपनियों के विरुद्ध बनी छोटी पार्टियों के तीसरे मोर्चे के हथियार का ही अपने पक्ष में इस्तेमाल कर लिया। इन दोनों गिरोहों में अभूतपूर्व आंतरिक एकता है और ये नकली प्रतिपक्ष बनकर जनता को गुमराह करने में सक्षम हैं। धु्रवीकरण इतना म़जबूत है कि प्रांतीय स्तर पर तो किसी तीसरे विकल्प की स्थिति ही नहीं बनती है।

केवल उŸार प्रदेश में बसपा और सत्ता के अलावा कांग्रेस और भाजपा भी तीसरा-चौथा कोण बनाने में कुछ हद तक सक्षम है,बाकी सभी राज्यों में केवल दो ही पार्टियां या गठबंधन हैं। यानी मूल्यों की ल़डाई खत्म हो चुकी है,केवल जीत और हार का मसला सामने है। फिर भी अधिकांश राज्यों में पहले अथवा दूसरे नंबर पर कोई न कोई क्षेत्रीय अथवा वामपंथी पार्टी है। उत्तर  प्रदेश में तो सत्ता और मुख्य प्रतिपक्ष- दोनों की जगहों पर बसपा और सपा जैसी पार्टियां हैं।

वैसे तो ये क्षेत्रीय पार्टियां भी कभी न कभी सत्ता के किसी न किसी गठबंधन में शामिल हो चुकी हैं,लेकिन इन्होंने हमेशा ही तीसरे मोर्चे के विकल्प को खुला रखा है। आज भी वामदल,बसपा, तेलगुदेशम, अन्नाद्रमुक, बीजद आदि जैसी पार्टियां सत्ता के दोनों गिरोहों से बाहर हैं, जबकि जद यू, अकाली दल, नेका, अगप, राजद, आदि जैसी पार्टियां कभी भी गठबंधन तो़डकर तीसरे मोर्चे में आ सकती हैं। भाजपा का स्वाभाविक  मित्र तो केवल शिवसेना और कांग्रेस का राकांपा है।

ऐसे में हमारा लोकतंत्र तभी मुकम्मिल होगा जब राजग जैसा नकली प्रतिपक्ष समाप्त होगा और उसकी जगह अमेरिका और बहुराष्ट्रीय कंपनियों की लूट के दृढ विरोधी के रूप में मजबूत तीसरा मोर्चा उभरकर आएगा। दो गिरोहीय ध्रुवीकरण के इस कठिन राजनीतिक समय में चिरंजीव ने आंध्र विधानसभा में म़जबूती दिखलायी थी और किसी वैचारिक प्रतिबद्धता के न होने के बाव़जूद उनकी उपस्थिति मात्र से तीसरे विकल्प के सिद्धात को बल मिल रहा था।

अब उनके अवसरवाद ने लोकतंत्र के विस्तार और वास्तविक प्रतिपक्ष के निर्माण की प्रक्रिया को कुछ तो चोट पहुंचायी है। अगर हम लोकतंत्र को बचाना चाहते हैं तो कांग्रेस और भाजपा की नूराकुश्ती से ध्यान हटाकर तीसरे विकल्प को म़जबूत करना जरूरी है।


हिंदी के वरिष्ठ कवि. कविताओं में  जनपक्षीय झुकाव के लिए चर्चित. फिलहाल हिंदी पत्रिका  'द पब्लिक एजेंडा' के साहित्य संपादक.







Mar 1, 2011

कुछ और शादियों की इच्छा


भारत  के मिजोरम राज्य की राजधानी एजल में  दुनिया का सबसे बड़ा परिवार बसता है.  परिवार के मुखिया जियोना चाना हैं.  बाक्तवांग  गाँव  में बसे इस परिवार में  चाना  अपनी 39 बीबियों, 94  बच्चों, १४ बहुओं और 33 नाती- पोतों के साथ रहते  है. सौ कमरों के घर में ६७ वर्षीय चाना को घर के सदस्यों की संख्या ज्यादा नहीं लगती. वह कुछ और शादियाँ करने की इच्छा रखते हैं.

 


Feb 28, 2011

वित्त मंत्री साहब वर्ल्ड बैंक इससे अधिक क्या चाहता था !



वित्त मंत्री को राजकोषीय घाटे की चिंता सबसे ज्यादा थी.निश्चय ही,इससे विश्व बैंक-मुद्रा कोष   और बड़ी देशी-विदेशी पूंजी को सबसे ज्यादा खुशी होगी...



आनंद प्रधान

मौका गंवाना कोई यू.पी.ए सरकार से सीखे.इस बार का सालाना बजट एक बेहतरीन मौका था जब मनमोहन सिंह सरकार अपनी प्राथमिकताओं के बारे में देश को साफ सन्देश दे सकती थी.यह मौका था जब वह आम आदमी के प्रति अपनी प्रतिबद्धता का सबूत देते हुए अर्थव्यवस्था के हित में कुछ साहसिक फैसले कर सकती थी.

लेकिन इसके बजाय यह बजट पिछली बार की तरह ही वित्तीय कठमुल्लावाद से प्रेरित है.नतीजा यह कि वित्त मंत्री प्रणब मुखर्जी ने पिछले साल की तरह ही एक रूटीन बजट पेश किया है जिसमें दिखावे के लिए कृषि-किसान, सामाजिक क्षेत्र और आम आदमी की बात करते हुए भी सबसे अधिक जोर राजकोषीय घाटे को काबू में करने पर दिया गया है.

आश्चर्य नहीं कि अगले बजट में वित्त मंत्री ने राजकोषीय घाटे का अनुमान जी.डी.पी का 4.6 प्रतिशत रहने का अनुमान पेश किया है.इसके लिए उन्होंने सरकारी खर्चों में न सिर्फ मामूली बढोत्तरी की है बल्कि कुछ महत्वपूर्ण क्षेत्रों में बजट प्रावधानों में कटौती कर दी है.उदाहरण के लिए, ग्रामीण विकास पर केन्द्रीय योजना में चालू वित्तीय वर्ष की तुलना में अगले वित्तीय वर्ष में लगभग 150 करोड़ रूपये की कटौती करते हुए 55288 करोड़ रूपये खर्च करने का प्रावधान किया है.

इसी तरह, कृषि क्षेत्र की केन्द्रीय योजना में भी चालू वर्ष की तुलना में अगले वर्ष के बजट में बहुत मामूली लगभग 382 करोड़ रूपये की वृद्धि के साथ 14744 करोड़ रूपये का प्रावधान किया गया है. यह चालू वर्ष की तुलना में सिर्फ 2.6 प्रतिशत की वृद्धि है.अगर मुद्रास्फीति को ध्यान में रखें तो यह वृद्धि वास्तव में नकारात्मक है.

हैरानी की बात यह है कि यह उस सरकार का बजट है जो पिछले कई वर्षों कृषि क्षेत्र में दूसरी हरित क्रांति की बातें कर रही है. लेकिन अगर यह कृषि क्षेत्र को ‘नई डील’ है तो अनुमान लगाना मुश्किल नहीं है कि इस डील से क्या निकलनेवाला है? इसी तरह, यू.पी.ए सरकार समावेशी विकास के बहुत दावे करती रहती है. लेकिन समावेशी विकास के लिए सामाजिक क्षेत्र पर खर्च करना बहुत जरूरी है.

इस बजट में भी वित्त मंत्री ने बहुत उत्साह के साथ बताया कि सामाजिक क्षेत्र पर 1,60.887 करोड़ रूपये का प्रावधान किया गया है. लेकिन सच यह है कि यह जी.डी.पी का सिर्फ 2.1 प्रतिशत है. कहने की जरूरत नहीं है कि सामाजिक क्षेत्र पर जी.डी.पी का सिर्फ 2फीसदी खर्च करके किस तरह का समावेशी विकास होगा.

साफ है कि वित्त मंत्री को राजकोषीय घाटे की चिंता सबसे ज्यादा थी.निश्चय ही,इससे विश्व बैंक-मुद्रा कोष और बड़ी देशी-विदेशी पूंजी को सबसे ज्यादा खुशी होगी.उनकी तरफ से यू.पी.ए सरकार पर सबसे अधिक दबाव भी यही था कि सरकार राजकोषीय घाटे को काबू में करने पर सबसे अधिक जोर दे.

यह एक तरह का वित्तीय कठमुल्लावाद है जो मानता है कि अर्थव्यवस्था में सरकार की भूमिका सीमित होनी चाहिए. इसके लिए वह सरकारी खर्चों में कटौती पर जोर देता है. उसका मानना है कि अगर सरकार का राजकोषीय घाटा अधिक होगा तो वह बाजार से कर्ज उगाहने उतारेगी और प्रतिस्पर्द्धा में निजी क्षेत्र को बाहर कर देगी. इससे ब्याज दरों पर भी दबाव बढ़ेगा.

लेकिन यह नव उदारवादी आर्थिक सैद्धांतिकी है जिसकी असलियत हालिया वैश्विक मंदी के दौरान खुलकर सामने आ चुकी है. इसके बावजूद भारत में अर्थव्यवस्था के मैनेजर अभी भी इस सैद्धांतिकी से चिपके हुए हैं. कहते हैं कि आदतें बहुत मुश्किल से छूटती हैं. नव उदारवादी आर्थिक सैद्धांतिकी के पैरोकारों पर भी यह बात लागू होती है.

दोहराने की जरूरत नहीं है कि राजकोषीय घाटे को काबू में करने के आब्शेसन के कारण वित्त मंत्री ने राजनीतिक और आर्थिक रूप से अर्थव्यवस्था को एक नई दिशा देने और प्राथमिकताओं में बदलाव का एक बड़ा मौका गंवा दिया है. अगर वह चाहते तो अर्थव्यवस्था की मौजूदा बेहतर स्थिति का लाभ उठाकर अधिक से अधिक संसाधन जुटाते और उसे कृषि और सामाजिक क्षेत्र पर खर्च करके एक नई शुरुआत कर सकते थे.

असल में,मुद्दा यह है कि अर्थव्यवस्था की तेज विकास दर का फायदा आम आदमी को नहीं मिल रहा है. तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्था से रोजगार, शिक्षा, स्वास्थ्य और कृषि क्षेत्र में कोई बड़ा बदलाव नहीं आ रहा है.

किसी भी विकासशील अर्थव्यवस्था में राजकोषीय घाटा आम बात है. राजकोषीय घाटा अपने आप में कोई बुराई नहीं है.अगर सरकार संसाधनों को सही जगह पर और सही तरीके से खर्च करे तो राजकोषीय घाटा अर्थव्यवस्था को ज्यादा गति देता है और लोगों को उसका लाभ भी पहुंचा पाता है. ऐसा नहीं है कि वित्त मंत्री यह नहीं जानते हैं. उन्हें राजकोषीय घाटे के लाभों का पता है.

लेकिन उनकी मुश्किल यह है कि उन्हें बड़ी देशी-विदेशी पूंजी को खुश करना है क्योंकि अर्थव्यवस्था की ड्राइविंग सीट उनके हाथों में चली गई है.पिछले दो दशकों में हर वित्त मंत्री की यह एक आर्थिक मजबूरी बन गई है. जाहिर है कि प्रणब मुखर्जी भी इसके अपवाद नहीं हैं.


'राष्ट्रीय सहारा'  से  साभार  

धमाकों की नए सिरे से जांच हो



संजरपुर/ आज़मगढ़. आज़मगढ़ के निर्दोष मुस्लिम नौजवान ही नहीं सरकारी मशीनरी  के निशाने पर छत्तीसगढ़ के ग़रीब आदिवासी भी हैं। वहां पर 650गांवों जलाकर आदिवासियों को बेघर कर दिया गया। सैकड़ों की संख्या में लोग लापता हैं। मानवाधिकार आयोग जैसी संस्थाएं कहां हैं?नए हिन्दुस्तान की लड़ाई छत्तीसगढ़ के आदिवासियों और संजरपूर के निर्दोष नौजवानों को मिलकर लड़नी है।”ये बातें वरिष्ठ मानवाधिकार नेता हिमांशु कुमार ने संजरपूर में आयोजित विशाल राष्ट्रीय मानवाधिकार जनसम्मेलन में कही।

दिल्ली से आई मानवाधिकार नेता शबनम हाशमी ने जांच एजेंसियों की भूमिका पर सवाल उठाते हुए कहा कि मालेगांव, समझौता एक्सप्रेस, मक्का मस्जिद में विस्फोट करने वाले असीमानंद और सुनील जोशी का योगी आदित्यनाथ के साथ गहरा संबंध उजागर हुआ है,बावजूद इसके आजतक योगी को गिरफ्तार करना तो दूर पूछताछ तक भी नहीं की गई।


संजरपुर में मानवाधिकार : संबोधित करती शबनम हाशमी
पीयूसीएल के राष्ट्रीय सचिव चितरंजन सिंह ने कहा कि देश में हुए तमाम धमाकों की नए सिरे से जांच की जाए। उन्होंने संघ परिवार और उसकी फासिस्ट विचारधारा की न्यायपालिका तक में घुसपैठ पर चिंता जताते हुए न्यायपालिका में धर्मनिरपेक्ष मुल्यों की पुनर्बहाली की मांग की। लखनउ के वरिष्ठ वकील मो.शोएब ने भाजपा के बजाए कांग्रेस, सपा और बसपा को ज़्यादा खतरनाक बताते हुए कहा कि ये पार्टियां भाजपा की दूसरे नंबर की टीम हैं,जो सेकुलर चेहरे के साथ संघ परिवार के एजेन्डे को बढ़ा रही हैं।

मुंबई से आए मानवाधिकार नेता फिरोज़ मिठीबोलवाला ने भारत सरकार के अमेरिका और इजराईल के साथ बढ़ते नापाक रिश्ते को भारत में बढ़ती आतंकी घटनाओं और निर्दोष मुस्लिम नौजवानों की गिरफ्तारी की वजह बताया। वहीं अयोध्या से आए महंत युगल किशोर शरण शास्त्री ने कचहरियों पर हुए कथित हमलों पर सवाल उठाते हुए कहा कि फैजाबाद कचहरी में हुआ विस्फोट भाजपा नेता विश्वनाथ सिंह और महेश पाण्डे की चौकियों पर हुए थे और वो दोनों हादसे के वक़्त गायब थे। उन्होंने कचहरी विस्फोटों में सुनवाही कर रहे न्यायाधिशों के साम्प्रदायिक रवैये का भी ज़िक्र किया।

आर.टी.आई.कार्यकर्ता अफ़रोज़ आलम साहिल जिन्होंने बाटला हाउस फर्जी मुठभेड़ में मारे गए युवकों के पोस्टमार्टम रिपोर्ट को निकलवाया था,ने सूचना के अधिकार कानून पर सवाल उठाते हुए कहा कि इसमें भी साम्प्रदायिक कारणों से रिपोर्टों को लटकाया जाता है। कार्यक्रम की अध्यक्षता हरमन्दिर पाण्डे ने किया। संचालन पीयूसीएल प्रदेश उपमंत्री मसीहुद्दीन संजरी ने किया।

कार्यक्रम में 12सूत्रीय प्रस्ताव भी पारित किया गया। कार्यक्रम में तारिक़ शफ़िक़,महासागर गौतम,बलवंत यादव, अब्दुल्लाह, आफताब अहमद, सालीम दाउदी, जितेन्द्र हरि पाण्डेय, सुनील, गुलाम अम्बिया, फहीम अहमद प्रधान, वसीउद्दीन, रवि शेखर, विजय प्रताप, शाहनवाज आलम, राजीव यादव, गुंजन, बबली, अंशुमाला आदि मौजूद रहे। इस सम्मेलन में शमीम अख्तर संजरी की पुस्तक ‘लहू-लहू’ और तीन पुस्तकों सहित डॉक्यूमेंट्री फिल्म भगवा युद्ध का विमोचन किया गया।








काली कमाई के सरगनाओं में अहमद पटेल और देशमुख भी



विदेशों में काला धन जमा करने वालों में बड़े उद्योगपति ही नहीं,कई शीर्ष नेता भी हैं। केंद्रीय ग्रामीण विकास मंत्री विलासराव देशमुख और वरिष्ठ कांग्रेसी नेता अहमद पटेल उन नेताओं में शामिल हैं...



विदेशों में जमा काले धन को स्वदेश वापस लाने और भ्रष्टाचार के खिलाफ रामलीला मैदान में आयोजित रैली में पूर्व आयकर आयुक्त विश्वबंधु गुप्ता ने कहा कि   ‘गृह मंत्री पी.चिदंबरम विदेशी बैंक में ‘दाऊद’ कंपनी के करीबी हसन अली द्वारा एक लाख करोड़ रुपए जमा कराने के मुद्दे पर कार्रवाई करने वाले थे। लेकिन वे इसलिए चुप हो गए क्योंकि उनकी पार्टी के दो लोगों के नाम काला धन जमा करने वालों की सूची में उजागर हो गए।’


भ्रष्टाचार और कालेधन के खिलाफ राष्ट्रव्यापी अभियान के मुखिया बाबा रामदेव ने भ्रष्टाचार की  पांच वजहें बतायीं.  पहला  90फीसदी बड़े नोट छापे जा रहे हैं, दूसरा  एक लाख से ज्यादा लोग अवैध खनन कर रहे हैं, तीसरा  विकास योजनाओं के धन में बड़े पैमाने पर हो रही है चोरी, चौथा  संवैधानिक पदों पर बैठे लोग रिश्वतखोरी को बढ़ावा दे रहे हैं और टैक्स की चोरी के लिए लोग विदेशों में धन जमा कर रहे हैं।

स्वामी दयानंद सरस्वती के जन्मदिवस और शहीद चंद्रशेखर आजाद के बलिदान दिवस के अवसर पर योग गुरू स्वामी रामदेव के भारत स्वाभिमान ट्रस्ट द्वारा यह रैली आयोजित की गई थी। भ्रष्टाचार के खिलाफ अभियान चलाएंगे रामदेव रैली में बाबा रामदेव ने घोषणा की कि वह लोगों को योग सिखाने के अलावा देश से भ्रष्टाचार को खत्म करने का भी अभियान चलाएंगे। उन्होंने कहा कि नेताओं को भ्रष्टाचार से मुक्त करने के लिए अनुलोम-विलोम जैसे योग सिखाना
होगा।


भ्रष्टाचार रोकने के पांच उपाय


कठोर कानून बनाया जाए व बड़े नोटों को वापस लिया जाए।
यूनाइटेड नेशंस कन्वेंशन अगेंस्ट करप्शन संधि (2006 से लंबित) का अनुमोदन हो।मॉरिशस रूट को बंद किया जाए।
काला धन जमा करने वाले विदेशी बैंकों पर प्रतिबंध लगे।
फॉरेन एकाउंट पॉलिसी की तुरंत घोषणा की जाए।


रैली में समाज सुधारक अन्ना हजारे, वरिष्ठ वकील राम जेठमलानी, राजनेतासुब्रमण्यम स्वामी, चिंतक गोविंदाचार्य, पूर्व आईपीएस किरन बेदी, आरटीआई कार्यकर्ता अरविंद केजरीवाल, ऑल इंडिया उलेमा काउंसिल के अध्यक्ष मौलाना मकसूद हसन कासमी,स्वामी अग्निवेश जैसी हस्तियां उपस्थित थीं। वक्ताओं ने भ्रष्टाचार और कालेधन की समस्या के पांच कारण और इन्हें दूर करने के पांच सुझाव भी बताए।

रैली के बाद एक ज्ञापन राष्ट्रपति प्रतिभा पाटील को सौंपा गया। इसमें भ्रष्टाचार से मुकाबले के लिए कठोर कानून बनाने की मांग की गई। ट्रस्ट के एक सदस्य के मुताबिक ज्ञापन में 30 लाख लोगों ने हस्ताक्षर किए हैं।




मध्य-पूर्व एशियाई देशों में मचा कोहराम तथा भारत



लीबिया के गृहमंत्री ने गद्दाफी का साथ छोड़ दिया है। सेना का एक बड़ा भाग गद्दाफी के विरुद्ध हो चुका है। शासकीय असहयोग,व्यापक जनविद्रोह तथा सत्ता से चिपके रहने की गद्दाफी की जि़द ने लीबिया में गृहयुद्ध छिडऩे जैसे हालात पैदा कर दिए हैं...


तनवीर जाफरी

मध्य-पूर्व एशिया के कई प्रमुख देश इस समय शासन व्यवस्था के परिर्वतन के लिए चल रहे जनआंदोलन के दौर से गुज़र रहे हैं। जागरूक हो चुकी आम जनता तानाशाहों, बादशाहों तथा सत्ता पर जबरन क़ाबिज़ हुक्मरानों को अब सिंहासन खाली करने की सलाह दे रही है। मिस्र और टयूनिशिया के हुक्मरानों ने जान बचाने की कीमत पर आखिरकार गद्दी छोड़ ही दी। दूसरी तरफ  लीबिया के विचित्र प्रवृति के तानाशाह कर्नल मोअ मार गद्दाफी ने अपनी अंतिम सांस तक सत्ता से चिपके रहने का संकल्प लिया है।

इस जनविरोधी आकांक्षा को अमल में लाने के लिए यदि लीबिया को बरबादी के मुहाने तक भी ले जाना पड़ा तो शायद उन्हें कोई आपत्ति नहीं होगी। यही वजह है कि हुक्मरानी के आखिरी क्षण गिन रहे गद्दाफी ने अपने समर्थकों से यह अपील की है कि वे ''विद्रोहियों को कुचल डालें,काकरोच की तरह उन्हें मसल डालें,उनपर हमले किए जाएं तथा उनकी पहचान कर उन्हें घरों से बाहर निकाल उनका दमन किया जाए।''

 कल्पना कीजिए कि जिस तानाशाह के सिंहासन के नीचे की ज़मीन खिसक रही हो और ऐसे संकटकालीन समय में वह इस प्रकार के आक्रामक तेवर दिखा सकता है तो समझा जा सकता है कि सत्ता पर अपनी मज़बूत पकड़ रखते हुए गद्दाफी जैसा शासक अपने विरोधियों तथा आलोचकों का क्या हश्र करता रहा होगा। बड़े आश्चर्य की बात है कि ऐसे तानाशाह शासक चंद दिनों पहले हुआ इराकी तानाशाह सद्दाम हुसैन का हश्र इतनी जल्दी भूल जाते हैं।

बहरहाल,गद्दाफी के इस आक्रामक आह्वान का लीबिया की जनता पर थोड़ा बहुत असर तो ज़रूर पड़ रहा है। वह गद्दाफी समर्थक सेना और पुलिस द्वारा बरती जा रही हिंसा का शिकार भी हो रही है। चूंकि अब गद्दाफी के ज़ुल्मो-सितम ने अपनी सभी हदें पार कर दी हैं लिहाज़ा धीरे-धीरे वह सभी लोग उसका साथ छोड़कर विद्रोहियों के पक्ष में खड़े हो रहे हैं जिनके समक्ष गद्दाफी बेनकाब हो चुके हैं।

लीबिया के गृहमंत्री ने गद्दाफी का साथ छोड़ दिया है। कई मंत्री साथ छोडऩे वाले हैं। सेना का एक बड़ा भाग गद्दाफी के विरुद्ध हो चुका है। आधा दर्जन से अधिक लीबियाई राजदूतों व तमाम राजनयिकों ने भी उसका साथ छोड़ दिया है। शासकीय असहयोग,व्यापक जनविद्रोह तथा सत्ता से चिपके रहने की गद्दाफी की जि़द ने लीबिया में गृहयुद्ध छिडऩे जैसे हालात पैदा कर दिए हैं।

इसमें कोई दो राय नहीं कि यदि गद्दाफी आसानी से गद्दी नहीं छोड़ते तथा गद्दी से चिपके रहने की अपनी जि़द पर अड़े रहते हैं तो देश में भारी नरसंहार भी हो सकता है। अमेरिका सहित कई पश्चिमी देशों की नज़रें लीबिया में हो रही उथल-पुथल पर लगी हुई हैं। मध्य-पूर्व एशियाई देशों में चल रही व्यवस्था परिवर्तन की इस बयार के चलते कच्चे तेल की कीमतों में भी भारी इज़ाफा होने की संभावना है।

व्यवस्था परिवर्तन किए जाने के पक्ष में फैला यह जनाक्रोश मुस्लिम बाहुल्य देशों तक ही सीमित है। विद्रोह की इस लहर को अलग-अलग नज़रिए से देखा जा रहा है। कहीं अल्पसंख्यक सुन्नी समुदाय के तानाशाह के विरुद्ध बहुसंख्यक शिया समुदाय विद्रोह पर आमादा हो गया है तो कहीं अमेरिकी पिट्ठू शासक के विरुद्ध जनता का गुस्सा फूट पड़ा है। कई देशों के लोग अपने निरंकुश, निष्क्रिय,भ्रष्ट तथा विकास की अनदेखी करने वाले तानाशाह से रुष्ट हैं तो कहीं राजशाही को ठेंगा दिखाकर जनता-जनार्दन प्रजातंत्र लागू करना चाह रही है।

 मध्य-पूर्व एशियाई देशों के जनता की अलग-अलग प्रकार की समस्याएं हैं। कई सदियों से यह धारणा बनी हुई थी या इस्लाम विरोधी ताकतों ने इस बात को आम धारणा का रूप दे डाला था कि इस्लाम धर्म के मानने वाले बादशाहत या तानाशाही को ही पसंद करते हैं। इस प्रकार का दुष्प्रचार करने वालों को भी मध्य-पूर्व एशियाई देशों में फैली इस ताज़ातरीन जनक्रांति की लहर ने माकूल जवाब दे दिया है। इस क्रांति ने साबित कर दिया है कि मुस्लिम समाज का मिज़ाज न केवल लोकतांत्रिक है, बल्कि अहिंसक भी है।

 इस भारी जनाक्रोश के बीच भारत जैसे विशाल देश के तमाम राजनीतिक विश्लेषक इस विषय पर चिंतन-मंथन करने लगे हैं कि क्या यहाँ भी उसी प्रकार के हालात पैदा हो सकते हैं? ये कयास लगाए जाने का कारण केवल यही है कि देश के आमजन आज़ादी के 64 वर्षों बाद भी भयंकर गरीबी, बेरोज़गारी, अशिक्षा, भ्रष्टाचार, घपलों व घोटालों के शिकार हैं।

माओवाद तथा नक्सलवाद जैसी समस्या बहुत तेज़ी से भारत में अपनी जड़ें गहरी करती जा रही है। इसका कारण भी बढ़ती गरीबी, भूख, बेरोज़गारी तथा शासन व्यवस्था का इन ज़मीनी हकीकतों की तरफ से मुंह मोड़े रखना है। देश की आम जनता भारतीय शासन व्यवस्था की उदासीनता तथा निष्क्रियता के चलते त्राहि-त्राहि कर रही है।

देश के कई हिस्सों में कर्जदार किसानों द्वारा आत्महत्या किए जाने के समाचार प्राप्त हो रहे हैं। गरीब आज भी भूख के चलते दम तोड़ देता है। देश में सर्वोच्च समझी जाने वाली भारतीय प्रशासनिक सेवा के अधिकारी  की कहीं भ्रष्टाचारियों द्वारा गोली मारकर तो कहीं जिन्दा   जलाकर हत्या की जा रही है तो कहीं माओवादियों द्वारा उनका अपहरण किए जाने के समाचार प्राप्त हो रहे हैं। भ्रष्टाचार को मुद्दा बनाकर विपक्षी दल संसद की कार्रवाई को बाधित करते हैं। मंहगाई इस समय अपने चरम पर है। राजनेता जनता के मध्य अपनी विश्वसनीयता खोते जा रहे हैं।

भारत में चारों ओर ऐसा वातावरण बनता जा रहा है कि आम लोगों का वर्तमान राजनैतिक दलों, राजनेताओं तथा  राजनीतिक व्यवस्था से विश्वास ही उठ रहा  है। आम आदमी को यह कहते सुना जा सकता है कि इस देश में कानून और न्याय का डंडा केवल गरीबों पर ही चलता है,जबकि संपन्न लोग इन सबसे ऊपर या इनसे निपटने में सक्षम नज़र आते हैं।  प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह स्वयं इस आशय की स्वीकारोक्ति कर भी चुके हैं।

पूर्व राष्ट्रपति एपीजे अब्दुल कलाम भी यह महसूस कर चुके हैं कि भारतीय जनमानस के चेहरों पर मुस्कुराहट नहीं, बल्कि मायूसी के भाव नज़र आते हैं। ऐसे में यदि कुछ विश्लेषक इस बात की चिंता ज़ाहिर करें कि कहीं मध्य-पूर्व एशियाई देशों अर्थात् मिस्र, टयूनिशिया, लीबिया, यमन जैसे हालात कहीं यहाँ भी पैदा न हो जाएँ तो इसमें बिलकुल भी आश्चर्य नहीं होना चाहिए। नि:संदेह यहाँ की जनता के भीतर भी व्यवस्था को लेकर तथा अपने और अपने परिवार के भविष्य को लेकर उतना ही गुस्सा व चिंता व्याप्त है जितनी कि कई मध्य-पूर्व एशियाई देशों में देखी जा रही है। बावजूद इसके कि हमारा देश विश्व का सबसे बड़ा एवं सफल लोकतांत्रिक देश माना जाता है।

भला हो हमारे संविधान निर्माताओं का जिन्होंने देश की राजनैतिक प्रणाली तथा भारतीय संविधान के साथ राजनैतिक व्यवस्था के समन्वय का ऐसा ताना-बाना रचा है जिसके परिणामस्वरूप राजनैतिक तौर पर पूरे देश की जनता एक-दो नहीं बल्कि सैकड़ों राजनैतिक दलों,विचारधाराओं, वर्गों, क्षेत्रों आदि में विभाजित हो गई है। भारतीय सेना के गठन का ढांचा भी कुछ ऐसा ही पेंचीदा  है कि हमारे शासक सेना के अनुशासन और इसके वर्गीकरण का पूरा लाभ उठाते हुए सेना की ओर से पूरी तरह बेफ़िक्र रहकर अपना राजपाट चला सकते हैं।

दूसरी तरफ लोकतंत्र की ज़मीनी हकीकतों पर पर्दा डालते हुए हमारे शासक दुनिया को बार-बार यह बता कर अपनी पीठ स्वयं भी थपथपाते रहते हैं कि हमारा देश दुनिया का सबसे बड़ा और सबसे आदर्श लोकतंत्र है। इन शासकों तथा वर्तमान शासन व्यवस्था के जिम्मेदार लोगों को इस वास्तविकता की अनदेखी हरगिज़ नहीं करनी चाहिए कि मनुष्य सबकुछ एक सीमा तक सहन कर सकता है। भय, भूख, गरीबी तथा अपने बच्चों के भविष्य के प्रति अनिश्चितता का वातावरण जागरुक समाज अधिक दिनों तक सहन नहीं कर सकता।

यदि भारत के विश्व के सबसे बड़े लोकतंत्र होने का भ्रम दुनिया में बनाए रखना है तो आम लोगों की आम ज़रूरतों तथा उनकी आम परेशानियों से यथाशीघ्र रूबरू होना तथा उनका समाधान करना ही होगा। अन्यथा परिवर्तन की यह बयार कब किस देश की व्यवस्था की चूलें हिला बैठे,कुछ नहीं कहा जा सकता।




लेखक हरियाणा साहित्य अकादमी के भूतपूर्व सदस्य और राष्ट्रीय-अंतर्राष्ट्रीय मसलों के प्रखर टिप्पणीकार हैं.उनसे tanveerjafri1@gmail.comपर संपर्क किया जा सकता है.



 
 
 
 

Feb 27, 2011

दर्द की सांद्रता गाढ़ी है



 अंजनी कुमार

कहते हैं समय की मार बड़ी होती है
इस समय तो सरकार की मार बड़ी भारी है
दोनों के मिलने से दर्द की सांद्रता गाढ़ी है
अपना होना ही अब भारी है।।

लोग जानते हैं सरकार को खूब
मार करती सरकार को इंकार बर्दास्त  नहीं है
वह रोज ही भेज रहा हैं निर्णय
रोज ही पहुंचा देता है डाकिया
हमारे हिस्से का परवाना
और हिदायतें
और उस घूरती आंख का खतरनाक इशारा
और, और भी बहुत कुछ
समय धरता रहता है गिरेबान जब तब
कई कई रात नींद आंख में उतरती नहीं है।।

यह अपने समय की सरकार है
और यह सरकार का समय है
इतिहास की सूरत में यह एक दौर है
जहां हां पर चमकता हुआ सिर है
और ना पर उधड़ी हुई लावारिस लाश  है
जहां रोजमर्रा जिंदगी
बूट की नोक पर उछलते हुए चल रही है
जम्हूरियत जन की पीठ पर लदी हुई है
और राज चंद लोगों की जगीर है
इस निश्कर्श पर जन की हामी है
जनतंत्र कभी हंसी है, कभी गाली है।।

सच है कि सच की चमक से चिलकती है आंख
सवाल की नोक से उमड़ता है दर्द का लावा
जैसे अड़ियल दरख्त के खोखड़ में सुलग रहा हो आग
ऐसे ही सुलग रही है जमाने की छाती
सच है कि यह गुलामी का दौर नहीं है
जमाना बदला है बहुत कुछ
उसकी सलवटें अभी बाकी हैं
जम्हूरियत शब्द अभी बाकी है
पाठ कुपाठ, अर्थ अनर्थ जारी है
कुछ कहते हैं कि अब बंदूक की बारी है।।




राजनीतिक-सामाजिक कार्यकर्ता और पत्रकार .फिलहाल मजदूर आन्दोलन पर कुछ जरुरी लेखन में व्यस्त.उनसे abc.anjani@gmail.com पर संपर्क किया जा सकता है.