Feb 8, 2011

फ्लेम्स ऑफ द स्नो का प्रदर्शन 18 से

इक्कीसवीं सदी के सबसे बड़े राजनीतिक बदलाव पर बनीं फिल्म ‘फ्लेम्स ऑफ  द स्नो’का इंतजार अब खत्म हुआ। यह फिल्म 18फरवरी से नेपाल के सभी सिनेमाहालों में प्रदर्शित होने जा रही। फिल्म का निर्देशन अशीष श्रीवास्तव ने किया है और संगीत ज्ञानदीप का है।

ग्रिन्सो और थर्ड वल्र्ड मीडिया के बैनर तले बनी इस फिल्म को बनाने में बड़ी भूमिका भारतीय पत्रकार और संपादक आनंद स्वरूप वर्मा की है। उन्होंने कहा कि ‘फिल्म को देख नेपाली और विश्व जनता संघर्षों की ताजगी को तहेदिल से महसूस करे, हमारा यही प्रयास है।’ भारत में प्रदर्शित किये जाने को लेकर उन्होंने कहा कि हम शीघ्र ही फ्लेम्स ऑफ  द स्नो का हिंदी डब ‘बर्फ की लपटें’ लेकर दर्शकों के बीच उपस्थित होंगे।


Feb 6, 2011

मेरी मां खाये बिना मर गयी!


दादी को भी खाना नहीं मिलता। मां खाना बनाकर पहले दादा,  भाई-बहनों को खिलाती फिर दादी, मुझे और अपने को परोसती थी। हमेशा मां और दादी के खाते-खाते खाना कम हो जाता ... 

अजय प्रकाश

उत्तर प्रदेश के देवरिया जिले के   नारायणपुर गांव में मजदूर परिवार से ताल्लुक रखने वाली 30 वर्षीय उर्मिला की भूख से मौत गयी। उर्मिला की मौत नये अनाज के आवक और किसानों की समृद्धि के लिए 14 जनवरी को मनाये जाने वाले पर्व ‘मकर सक्रांति’की रात हुई। करीब एक महीने पहले से लगातार खाने के अभाव के चलते उर्मिला का शरीर फूलता चला गया था और वह बीमार रहने लगी थी। उर्मिला की सास जो खुद भी मरने के कगार पर हैं कहती हैं, ‘अरे हमार पतोहिया खइला बिना मर गयील।’ ग्रामीणों के मुताबिक जिस रात उर्मिला की मौत हुई उस रात भी घर में खाना नहीं पका था।

परिवार के मुखिया और उर्मिला के ससुर दर्शन विश्वकर्मा जिनकी उम्र करीब 70 वर्ष है, गांव में लोहार का काम करते हैं। खेती के औजारों के लिए आधुनिकतम मशीनों के बढ़े इस्तेमाल के बाद इन दिनों उनकी दैनिक आमदनी दस रूपये भी रोजाना नहीं हो पाती है। पांच बच्चों की मां उर्मिला के पति,घर की माली हालत से निपटने के लिए गुजरात के सूरत शहर काम की तलाश में कुछ महीने पहले ही गये थे। साथ में 12 वर्षीय अपने विकलांग बेटे को भी ले गये थे जिससे गांव में खाने का खर्चा कम आये और विकलांग बेटा भी उनकी कमाई का जरिया बने।


तीन बरस के दो जुड़वा बच्चों समेत कुल चार बच्चों के साथ उर्मिला गांव में ही रह रही थी। रहने के लिए एक खपड़ैल का कमरा होने की वजह से उर्मिला के ससुर दर्शन और उनकी पत्नी मड़ई में रहते थे। मड़ई के एक हिस्से में गाय बंधती है, दूसरे तरफ औजार बनाने की भट्ठी है और वहीं पर दर्शन और उनकी पत्नी भी सोते हैं। 

खुरपी-हंसुआ बना-पीटकर जो पैसे दर्शन को मिलते थे उससे बहू का इलाज कराते थे। दवा और भूख की भरपायी के चक्रव्यूह में दर्शन विश्वकर्मा की  17 कट्ठा जमीन बंधक हो गयी है  है और वे सूदखारों के कर्जदार भी हैं।
 
 उर्मिला की सबसे बड़ी बेटी 11वर्षीय कविता मां के मरने के बाद तीन छोटे भाई बहनों को संभाल रही है। गांव के सरकारी माध्यमिक स्कूल के छठी कक्षा में पढ़ने वाली कविता को जिंदगी की जरूरतों ने कैसे एक मां के एहसास से भर दिया है, उसका एक अहसास कविता से हुई बातचीत में उभरकर आता है...

आपका क्या नाम है?
कविता.

लोग आपके घर पर क्यों जुटे हैं?
मेरी मां मर गयी है ...

आपकी मां कैसे मर गयी?
रात को सोये-सोये।

आपलोग रात में क्या खाना खाकर सोये थे?
पीसान (आटा) नहीं था इसलिए अइला (चूल्हा) नहीं जला था। बगल में जो घर है, वही लायी (मकर सक्रांति पर मुरमुरे के बनने वाले लड्डू) दे गयी थी उसी को खाकर हमलोग सो गये थे।

लायी कौन-कौन खाया था?
मैं  और मेरे छोट भाई-बहन।

मां को क्यों नहीं दिया?
दे रही थी,लेकिन वह नहीं खायी। कह रही थी मुंह चल नहीं रहा है। मां रात को बार-बार रो और कराह रही थी।

कुछ बोल भी रही थी?
रात में ये सब (छोटे भाई-बहन) रो रह थे तो कह रही थी ‘चुप हो जा, चुप हो जा।’ काली माई, शिव भगवान का नाम ले रही थी। बार-बार कह रही थी-‘भगवान हमरे लइकन के बल दीहअ (ईश्वर मेरे बच्चों को बल देना)।’

आपसे भी कुछ कहा?
कह रही थी-ठीक से रहना और पापा आयेंगे तो कहना यहीं रहें। यह भी बोली कि इन सब को देखना। फिर हमको नींद आ गयी।

मां के मरने के बारे में कैसे पता चला?
कमरे में मां और हम चार भाई-बहन ही सोये थे। छोटा वाला भाई तेज-तेज रोने लगा तो मैं जगी। मुझे लगा मां अभी सो ही रही है इसलिए मैं उसे जगाने लगी। बहुत देर जगाती रही, पर मां उठी नहीं। फिर मैं दादी को बुला के लायी। दादी भी जगायीं और फिर दादी जोर-जोर से रोने लगीं, तब हमलोग भी रोने लगे। उसके बाद सब कहने लगे कि वह (कविता की मां उर्मिला) मर गयी।

अभी जो घर में अनाज दिख रहा है, वह कहां से आया है?
मां के मरने के बाद एक आदमी दे गया है।

इससे पहले घर में अनाज नहीं था?
नहीं। सिर्फ कल जो लाई लोग दिये हैं वही था ।

सरकारी राशन की दुकान  से गल्ला नहीं मिलता?
गल्ला उसी को मिलता है जिसके पास कार्ड होता है। दादा से एक आदमी कह गया है कार्ड अब जल्दी बन जायेगा।

घर में कितने दिन से खाना नहीं था?
जबसे ज्यादा ठंडा पड़ने लगा है तबसे एक ही टाइम खाते थे। पहले आलू खत्म हुआ फिर आटा भी।


एक टाइम खाकर रह जाते थे?
मैं भाई-बहनों को लेकर स्कूल चली जाती थी तो वहां दोपहर का खाना कभी-कभी खा लेते थे। कभी दूसरे लोग गांव वाले भी खिला देते थे। इसलिए घर में एक ही टाइम खाना बनता था।

खाना क्या बनता था?
कभी भात तो कभी रोटी। अभी खेत में साग हुआ है तो रोज साग बनता था। वह भी ठण्ड ज्यादा पड़ने लगी तो स्वेटर या साल नहीं था कि खेत में जाकर साग खोटें (तोड़े)।

रात में सोते थे तो ओढ़ने के लिए क्या था?
एक कंबल।

एक ही कंबल में सभी लोग?
हां। दादी के पास तो वह भी नहीं था। वह चट्ट (बोरा) ओढ़ती हैं। अब तो दादी का शरीर भी मां की तरह ही सूज (फूल) गया है।

दादी भी बीमार हैं तो खाना कौन बनाता था?
मैं ही बनाती थी। दादी से तो कुछ होता ही नहीं। उसको भी खाना नहीं मिलता। पहले मां जब कम बीमार थी तो खाना बनाकर पहले दादा, भाई-बहनों को खिलाने के बाद दादी मुझे और अपने को परोसती थी। हमेशा मां और दादी के खाते-खाते खाना कम हो जाता था। दादी से भी कम खाना मां खाती थी। इसलिए मां का पेट नहीं भरता था और वह खाये बिना ही मर गयी। और मरने के दिन लाई भी नहीं खायी।






Feb 5, 2011

...‘डायन’ मत कहो मुझे


सरकार के सभी अर्थशास्त्रियों का अंकगणित फेल है और बदनाम बेवजह महंगाई को किया जा रहा है...

पंकज कुमार

इन दिनों महंगाई शबाब पर है। गली-गली,शहर-शहर के अलावा दिल्ली के तख्तोताज पर कुंडली मारकर बैठे खास को भी उसने कम से कम चिंता जताने पर मजबूर कर दिया है। इस सरेआम चर्चा से महंगाई रानी ही नहीं,कोई भी इतरा सकता है। लेकिन महंगाई रानी चर्चा में होने की वजह से खुश कम, दुखी ज्यादा है। वो खुद को बेवजह बदनाम किए जाने से चिंतित है।


खुद को 'डायन' कहकर संबोधित किए जाने से वह काफी आहत और नाराज भी है। इनका कहना है कि डायन कहकर उनकी बिरादरी को बदनाम किया जा रहा है और ये सरकार की सोची-समझी साजिश के तहत हो रहा है। जिसके लिए वह गुनहगार है ही नहीं, उसके लिए जनता के बीच बदनाम किया जा रहा है। सरकार ने तुरंत इस तरह का दुष्प्रचार नहीं रोका तो महंगाई बिरादरी के तरफ से वह मानहानि का मुकदमा करेंगी।

इस नाराजगी के पीछे महंगाई रानी का अपना तर्क भी है। वो उदाहरण देते हुए कहती हैं कि कुछ दिनों पहले चुनाव आयोग ने मतदान प्रतिशत बढ़ाने और बीवी-बच्चों,गर्लफ्रेंड से फुर्सत न मिलने वालों को मतदान केंद्र तक लाने के लिए एड कैंपेन चलाया। कैंपेन में कहा गया कि वोट नहीं डालने वाले पप्पू कहलाएंगे। यह तो वही हुआ वोट निठल्ले न दें और बदनाम दुनियाभर के 'पप्पूओं' को किया गया। ठीक उसी तरह जैसे देश के कई घरों में ‘मुन्नी’ इज्जत से रह रही थी, लेकिन 'दबंग' में आइटम सोंग पर डांस करने वाली मलाइका अरोड़ा ने अपने फायदे के लिए मुन्नी को बदनाम कर दिया। उधर कैटरीना ने शीला की जवानी को हिज़ाब से बाहर निकालकर सड़क का बाजारू सामान जैसा पेश कर दिया। ये तो ऐसी ही बात हुई न कि करे कोई और भरे कोई।

महंगाई रानी का कहना है कि वह हमेशा से आसमान की ऊंचाई पर नहीं, बल्कि सभी के बीच घुल-मिलकर रहना चाहती है। वो कुंभकर्ण की नींद की तरह सोना चाहती है। चाहती है कि उसे चंद भ्रष्ट नेताओं, नौकरशाहों,मुनाफाखोरों की तुच्छ लालच की वजह से नींद से न जागना पड़े। लेकिन मतलबी लोगों ने राजनीतिक सांठगांठ और अपनी गलत नीतियों की वजह से मुझे बेवजह नींद से जगा दिया है और फिर ‘महंगाई डायन’ कहकर बदनाम भी किया जा रहा है।

खुद की नाकामी के बावजूद सरकार बदनामी से बचना चाह रही है। सरकार के सभी अर्थशास्त्रियों का अंकगणित फेल है और बदनाम बेवजह महंगाई को किया जा रहा है। भला सरकार की कॉरपोरेट नीतियों का ठीकरा मेरे बिरादरी के सिर क्यों फोड़ा जा रहा है? हमारे देश के नेताओं से अच्छा तो कम से कम पड़ोसी मुल्क के व्यापारी और किसान हैं, जो इस संकट में हिंदुस्तान की जनता के दर्द कम करने के लिए बाघा बॉर्डर से प्याज भेजने का विरोध नहीं कर रहे।

डायन कहे जाने से आहत महंगाई रानी थोड़ा भावुक हो जाती हैं और कहती हैं, ‘ऐसा नहीं है कि जब मेरी चर्चा आम लोग या सरकार करती है तो मुझे दुख होता है, लेकिन महंगाई डायन कहे जाने पर मेरी बिरादरी को सबसे ज्यादा खुशी तब होती, जब इसका सीधा फायदा किसानों को मिलता। देश के मेहनतकश किसान या फिर खेती के सहारे जीवन गुजर-बसर वाले लोग मालामाल होते। उन्हें महंगाई की वजह से बैंकों, साहूकारों से कर्ज नही लेना होता और खुदकुशी के लिए मजबूर नहीं होता। मगर अफसोस, ऐसी संवेदना हमारे नेताओं, सत्ता के दलालों और बिचैलियों में नहीं है।’

फिर खुद को संभालते हुए गुस्से में वह कहती है ‘अगर महंगाई डायन कहकर बदनाम करने का सिलसिला नहीं रुका तो वह सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा तक खटखटाने से नहीं चूकेगी। वहां भी इंसाफ नही मिला तो आम जनता के बीच जाकर देश में संगठित माफियाराज चला रहे सफेदपोशों की पोल खोलूंगी और कहूंगी मुझे कुंभकर्ण की तरह चैन से सोने दो। भविष्य में कभी भी रावण की तरह खुदगर्ज बनकर मुझे नींद से मत जगाना। मुझे चैन से सोने दो। मैं सिर्फ सोते रहना ही चाहती हूं ताकि मेरी वजह से आम आदमी को तकलीफ न हो, लेकिन यूं ‘पप्पू', ‘शीला’ और ‘मुन्नी’ की तरह ‘महंगाई डायन’ कहकर बदनाम न करो।



पिछले 6 वर्षों से पत्रकारिता. फिलहाल ‘शिल्पकार टाइम्स’ अखबार में सीनियर असिस्टेंट एडिटर के पद पर कार्यरत हैं. उनसे kumar2pankaj@gmail.comपर संपर्क किया जा सकता है. 



 

Feb 4, 2011

नहीं तो मारे जाते रामचंद्र गुहा !


आप विश्वास करेंगे कि ख्याति  प्राप्त इतिहासकार,लेखक और बुद्धिजीवी रामचंद्र गुहा को छत्तीसगढ़ के एक पुलिस थाने के भीतर नक्सली सिद्ध कर दिया गया और उनको मारने की तैयारी कर ली गयी थी...

हिमांशु  कुमार  

अभी देश में सरकारी भ्रष्टाचार के खिलाफ आवाज़ उठाने वालों को नक्सली,माओवादी और आतंकवादी कह कर डरा कर चुप कराने का जोरदार धंधा चल रहा है.और हमारे देश का मध्यवर्ग जो बिना मेहनत किये ऐश की ज़िंदगी जी रहा है वो सरकार के इस झूठे प्रचार पर विश्वास करना चाहता है ताकि कहीं ऐसी स्थिति ना आ जाए जिसमें ये हालत बदल जाए और मेहनत करना ज़रूरी हो जाए.

इसलिए बराबरी ओर गरीबों के लिए आवाज़ उठाने वाले मारा जा रहा है या झूठे मुकदमें बना कर जेलों में डाल दिया गया है.लेकिन क्या आप विश्वास करेंगे की अंतर्राष्ट्रीय ख्याती प्राप्त इतिहासकार,लेखक और बुद्धिजीवी रामचंद्र गुहा को एक पुलिस थाने के भीतर नक्सली सिद्ध कर दिया गया और उनको मारने की तैयारी कर ली गयी थी.


बाएं से इतिहासकार रामचंद्र गुहा, प्रोफ़ेसर नंदिनी सुन्दर और प्रभात खबर के संपादक हरिवंश : मारे जाने से बच गए

ये घटना सन २००७ के जून महीने की है.दंतेवाड़ा में सरकार ने सलवा जुडूम शुरू कर दिया था.सलवा जुडूम वाले और पुलिस मिल कर आदिवासियों के घरों को जला रहे थे.आदिवासी लड़कों को मार रहे थे और आदिवासी लड़कियों से बड़े पैमाने पर बलात्कार किये जा रहे थे.उसी दौरान रामचंद्र गुहा,दिल्ली विश्वविद्यालय की प्रोफ़ेसर डॉ.नंदिनी सुन्दर, इंदिरा गांधी के प्रेस सलाहकार रहे वरिष्ठ पत्रकार बीजी वर्गीस, केंद्रीय शासन में सचिव रहे ईएएस शर्मा,फरहा नक़वी,और झारखंड के प्रसिद्ध अखबार प्रभात खबर के सम्पादक हरिवंश जी आदि की एक टीम सलवा जुडूम और आदिवासियों के बारे में जानकारी लेने आयी थी.

इस दौरे के दौरान एक टीम दंतेवाडा के करीब साठ किलोमीटर दूर एक गाँव में आदिवासियों से मिलने गयी. पुलिस को पता चल गया.बस फिर क्या था?कानून को बचाने सरकार का हुकुम बजाने और संविधान की रक्षा करने सरकार दल-बल के साथ पहुँच गयी. टीम के सदस्य अपनी गाड़ी नदी के इस पार खड़ी कर नदी पार करके गावों में गए हुए थे.

सरकारी सुरक्षा बलों ने ड्राईवर के गले पर चाक़ू रख दिया और उसको धमका कर टीम की अगली पिछली गतिविधियों की जानकारी ली. कुछ देर के बाद जब जब ये टीम वापिस आयी तो इन लोगों से पूछताछ करके इन्हें सीधे वापिस जाने की इजाज़त दे दी गयी,लेकिन रास्ते में आगे पड़ने वाले भैरमगढ़ थाने को ज़रूरी निर्देश दे दिए गए.

जैसे ही रामचंद्र गुहा, नंदिनी सुन्दर आदि की टीम भैरमगढ़ थाने पहूंची शाम हो चुकी थी. थाने के सामने का नाका रोक कर इन लोगों को थाने चलने का आदेश दिया गया.थाने के भीतर एसपीओ लोगों का राज था.एक एसपीओ ने राम चन्द्र गुहा की तरफ इशारा करके कहा इसे तो हम जानते हैं, ये तो नक्सली है,छत्तीसगढ़ में गवाहों की क्या कमी? आनन फानन में तीन गवाह भी आ गए. उन्होंने कहा हाँ इसे तो हमने नक्सलियों की मीटिंगों में देखा है.बस फिर क्या था.किसी ने कहा चलो साले को गोली मार दो.

एसपीओ लोगों का एक झुण्ड राम चन्द्र गुहा को एक तरफ ले गया.इस बीच कुछ एसपीओ और सलवा जुडूम वालों ने नंदिनी सुन्दर का पर्स और कैमरा छीन लिया.तब मोबाइल से नंदिनी ने कलेक्टर को फोन लगाया.कलेक्टर ने कहा मैं एसपी को कहता हूँ.एस पी का फ़ोन आया लेकिन थानेदार ने एसपी का फोन सुनने से मना कर दिया.और पूरे थाने को एसपीओ और सलवा जुडूम के ऊपर छोड़ कर खुद को एक कमरे में बंद कर लिया.

मैं उस दिन रायपुर में था.नंदिनी ने मेरी पत्नी वीणा को कवलनार आश्रम में फोन किया.वीणा ने मुझे फोन किया और कहा की नंदिनी एवं साथी बहुत बड़ी मुसीबत में हैं.आप तुरंत कुछ कीजिये. मैंने भैरमगढ़ सलवा जुडूम के नेता अजय सिंह को फोन किया. हम तब खासी मज़बूत स्थिति  में थे.

आदिवासियों की एक बड़ी सँख्या हमारी संस्था और कोपा कुंजाम जैसे कार्यकर्ताओं के साथ थी.(इसी जनशक्ति के बल पर हम वहां इतने लम्बे समय तक टिक पाए) मैंने अजय सिंह से कहा की राम चन्द्र गुहा आदि लोगों को कुछ नहीं होना चाहिए .और इसके बाद ये टीम वहां से जान बचा कर निकल पाई.

नंदिनी ने बड़े आश्चर्य से मुझे बताया की आपका फोन आते ही उन्होंने हमें छोड़ दिया.रामचंद्र गुहा भी अगले दिन वनवासी चेतना आश्रम में बैठ कर सलवा जुडूम की बदमाशियों पर गुस्सा निकाल रहे थे . नंदिनी का कैमरा छ माह के बाद कलेक्टर ने वापिस किया था...



दंतेवाडा स्थित वनवासी चेतना आश्रम के प्रमुख और सामाजिक कार्यकर्त्ता हिमांशु कुमार का संघर्ष,बदलाव और सुधार की गुंजाईश चाहने वालों के लिए एक मिसाल है. उनसे vcadantewada@gmail.com पर संपर्क किया जा सकता है.




नेहरु परिवार ने कराया धर्मान्तरण


गाँधी और नेहरु के बहुत  विरोध  के बावजूद  भी जब यह निकाह संपन्न हो गया तब समस्या 'खान'  उपनाम को लेकर आ खड़ी हुई, जिसका हल  सोलिसिटर जनरल  श्री सप्रू के द्वारा निकाला गया...


गाँधी परिवार का परिचय जब भी किसी कांग्रेसी अथवा मीडिया द्वारा देशवासियों को दिया  जाता है तब वह फिरोज गाँधी तक जाकर यकायक रुक  जाता है. फिर बड़ी सफाई के साथ अचानक उस परिचय का हैंडिल एक विपरीत रास्ते की और घुमाकर नेहरु वंश की और मोड़ दिया जाता है।

फिरोज गाँधी भी अंततः किसी के पुत्र तो होंगे ही। उनके पिता कौन थे ? यह बतलाना आवश्यक नहीं समझा जाता। फिरोज गाँधी का परिचय पितृ पक्ष से काट कर क्यों ननिहाल के परिवार से बार-बार जोड़ा जाता रहा है.  यह एक ऐसा रहस्य है जिसे नेहरु परिवार के आभा-मंडल से ढक  कर एक गहरे गड्ढे  में मानो सदैव के लिए ही दफ़न कर दिया गया है।

फिरोज 'खान' और इंदिरा : राजनीति के लिए धर्मान्तरण

यह कैसा आश्चर्य है की पंथ निरपेक्षता(मुस्लिम प्रेम) की अलअम्बरदार कांग्रेस के द्वारा भी आखिर यह गर्वपूर्वक क्यों नहीं बतलाया जाता की फिरोज गाँधी एक पारसी युवक नहीं, एक मुस्लिम पिता के बेटे  थे। दरअसल  फिरोज गाँधी का मूल नाम फिरोज गाँधी नहीं फिरोज खान था,जिसको एक सोची समझी कूटनीति के अर्न्तगत फिरोज गाँधी करा दिया गया था। फिरोज गाँधी मुसलमान थे और जीवन पर्यन्त मुसलमान ही बने रहे।

उनके पिता का नाम नवाब खान था जो इलाहबाद में मोती महल (इशरत महल)के निकट ही एक किराने की दूकान चलाते थे । इसी सिलसिले में (रसोई की सामग्री पहुंचाने के सिलसिले में)उनका मोती महल में आना जाना लगातार रहता था। फिरोज खान भी अपने पिता के साथ ही प्रायः मोती महल में जाते रहते थे। वहीँ पर अपनी समवयस्क इंदिरा  से उनका परिचय हुआ और धीरे-धीरे जब यह परिचय गूढ़ प्रेम में परिणत हुआ तब फिरोज खान ने लन्दन की एक मस्जिद में इंदिरा को मैमूदा बेगम बनाकर उनके साथ निकाह पढ़ लिया।

गाँधी और नेहरु के बहुत  विरोध किये जाने के बावजूद  भी जब यह निकाह संपन्न हो ही गया तब समस्या 'खान' उपनाम को लेकर आ खड़ी हुई। अंततः इस समस्या का हल नेहरु के जनरल सोलिसिटर श्री सप्रू के द्वारा निकाला गया। मिस्टर सप्रू ने एक याचिका और एक शपथ पत्र न्यायालय में प्रस्तुत करा कर 'खान' उपनाम को 'गाँधी' उपनाम में परिवर्तित करा दिया।इस सत्य को केवल पंडित नेहरु ने ही नहीं अपितु सत्य के उस महान उपासक तथाकथित माहत्मा कहे जाने वाले मोहन दास करम चंद  गाँधी ने भी इसे राष्ट्र से छिपा कर सत्य के साथ ही एक बड़ा विश्वासघात कर डाला ।

गांधी उपनाम ही क्यों -वास्तव में फिरोज खान के पिता नवाब खान की पत्नी जन्म से एक पारसी महिला थी जिन्हें इस्लाम में लाकर उनके पिता ने भी उनसे निकाह पढ़ लिया था। बस फिरोज खान की माँ के इसी जन्मजात पारसी शब्द का पल्ला पकड़ लिया गया। पारसी मत में एक उपनाम गैंदी भी है जो रोमन लिपि में पढ़े जाने पर गाँधी जैसा ही लगता है।

और फिर इसी गैंदी उपनाम के आधार पर फिरोज के साथ गाँधी उपनाम को जोड़ कर कांग्रेसियों ने उस मुस्लिम युवक फिरोज खान का परिचय एक पारसी युवक के रूप में बढे ही ढोल-नगाढे के साथ प्रचारित कर दिया। और जो आज भी लगातार बड़ी बेशर्मी के साथ यूँ ही प्रचारित किया जा रहा है।


( प्रस्तुत लेख बोधिसत्व कस्तूरिया के जरिये प्राप्त हुआ है, जिसे गौरव त्रिपाठी ने 'मेरे पिता श्री देवेन्द्र सिंह त्यागी द्वारा लिखित' के तौर पर मेल कर प्रस्तुत किया है. )
 
 

Feb 3, 2011

और एक आदिवासी राज्य की मांग !


मध्यप्रदेश में नौ लाख सदस्य संख्या का दावा करने वाली  पार्टी ने प्रस्तावित राज्य का एक नक्शा बना लिया है। नक्शे में राज्य के कुल चैबीस जिले 108 विधानसभा क्षेत्र और 13 लोकसभा क्षेत्र शामिल किये गये हैं...

चैतन्य भट्ट

मध्यप्रदेश को छत्तीगढ में विभाजित हुये ज्यादा वक्त नहीं बीता है लेकिन एक बार फिर मध्यप्रदेश से अलग पृथक गौंडवाना राज्य की मांग उठने लगी है...

आज से उन्नीस साल पहले गठित गौडवाना गणतंत्र पार्टी ने प्रदेश की राजनीति मे अपना एक अलग मुकाम बनाकर दूसरे प्रमुख दलों में घबराहट पैदा कर दी थी पर बीच में पार्टी में आई दरार और गौडवाना गणतंत्र पार्टी के ही एक बडे नेता द्वारा गौडवाना गणतंत्र सेना बनाने के बाद इसकी धार कुंद हो गई थी। पर बाद में इनके विलय ने एक बार फिर गौंडवाना की मांग को फुलफार्म में ला दिया है।


मध्यप्रदेश में नौ लाख सदस्य संख्या का दावा करने वाली यह पार्टी इसके लिये जनजागरण अभियान  शुरू कर दी है और अपने प्रस्तावित राज्य का एक नक्शा भी बना लिया है। नक्शे के अनुसार राज्य में कुल चैबीस जिले 108 विधानसभा क्षेत्र और 13 लोकसभा क्षेत्र शामिल किये गये हैं।

गौरतलब है कि आदिवासी बाहुल्य मध्यप्रदेश में आदिवासियों के उत्थान के लिए सन् 1991में हीरासिंह मरकाम ने गौंडवाना गणतंत्र पार्टी का गठन किया था। आदिवासियों के विकास का नारा बुलंद किया था इसलिये इसे उन इलाकों में अच्छी लोकप्रियता मिली जो आदवासी बाहुल्य जिले कहे जाते थे धीरे-धीरे ‘गौडवाना गणतंत्र पार्टी’ ने आदिवासियों के बीच अपनी ताकत बढानी शुरू की और इतनी ताकत पैदा कर ली कि उसके संस्थापक हीरासिंह मरकाम कोरबा के तानापार जो अब मध्यप्रदेश के विभाजन के बाद छत्तीसगढ में है से मध्यावधि चुनाव जीत कर विधायक बन गये।

इस जीत से पार्टी को नया उत्साह मिला और 2003 के आम चुनाव में पार्टी के तीन विधायक प्रदेश की विधानसभा में पहुंचे  गये। पार्टी की ताकत बढने लगी तो उसके नेताओं के बीच महात्वाकांक्षायें भी उतनी ही तेजी  से पनपीं और पार्टी के राष्ट्रीय  उपाध्यक्ष गुलजार सिंह मरकाम ने अलग होकर गौंडवाना गणतंत्र सेना का गठन कर लिया। इसके कारण पिछले 2008 के विधानसभा चुनावों में पार्टी अपने अंदरूनी विवादों में इस कदर उलझ रही कि उसने चुनाव लड़ने का साहस ही नहीं कर सकी।
इसी साहस को जुटाने की कवायद में करीब डेढ साल पहले गौंडवाना गणतंत्र सेना का गौंडवाना गणतंत्र पार्टी में विलय हो गया। विलय के बाद फिर एक बार पार्टी ने पृथक गौंडवाना राज्य की मांग को पार्टी की केंद्रीय मांग के तौर पर स्थापित करना शुरू  कर दिया है।

पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष केएस कुमरे का तर्क है कि ‘जब देश आजाद हुआ था तब विभिन्न राज्यों के पुर्नगठन के वक्त देश में बसने वाले लोगों की विभिन्न भाषा,बोलियों और उनकी संस्कृति को ध्यान में रखते हुये राज्यों का गठन किया गया। पंजाब, गोवा, बंगाल, गुजराती, महाराष्ट्र, हरियाणा, छत्तीसगढ़ से लेकर पूर्वोत्तर तक का गठन इसी आधार पर हुआ है।’कुमरे उदाहरण देते हैं कि ‘क्षेत्रफल की दृष्टि से केरल,छत्तीसगढ के बस्तर संभाग के बराबर है। फिर भी मलयाली भाषा और संस्कृति के मददेनजर इसे राज्य का दर्जा दिया गया.’

पृथक गौंडवाना राज्य के मद्देनजर प्रस्तावित राज्य का जो नक्शा तैयार किया है उसमें टीकमगढ, छतरपुर, सतना, रीवा, सीधी, पन्ना, सिंगरौली, सागर, दमोह, कटनी, उमरिया, शहडोल, जबलपुर रायसेन, नरसिंहपुर, अनूपपुर, डिंडोरी, मंडला, होशंगाबाद, छिंदवाडा, सिवनी, बालाघाट, बैतूल, और हरदा जिले शामिल किये हैं। अब देखना यह है गौंडवाना राज्य की मांग करने वाली यह पार्टी जनता को लामबंद कर पाती है या फिर बस चुनावी हथियार के तौर पर ही राज्य के मांग का उठाती रहती है।


राज एक्सप्रेस और पीपुल्स समाचार में संपादक रह चुके चैतन्य भट्ट फिलहाल स्वतंत्र पत्रकार के रूप में काम कर रहे हैं। वे तीस बरसों से पत्रकारिता में सक्रिय हैं।

बोगियों से टपकते खून के बीच बेरोजगार


देश के 2.50 लाख युवा  मात्र  416 पदों के मांगे गए आवेदन जमा करने 11 राज्यों से उत्तर प्रदेश के आइटीबीपी भर्ती केंद्र पहुंचे थे,जहाँ से लौटने के दौरान बीस छात्रों  की मौत हो गयी.छात्रों की इस मौत के लिए क्या कोई जिम्मेदार नहीं ....  

प्रतिभा कटियार

शाहजहांपुर के पास हिमगिरी एक्सप्रेस धधक रही थी.वही हिमगिरी एक्सप्रेस जिसकी छत से गिरकर खबरों की मानें तो अब तक 19छात्रों की मौत हुई है.खौफ, खतरे की आशंका, आधी-अधूरी जानकारियों के साथ घटनास्थल से बस जरा सी दूरी पर बिताये वो पांच घंटे कभी नहीं भूलूंगी.

खबरें मिल रही थीं. बरेली सुलग रहा था. इस शहर से जब-तब धुआं उठता रहता है इसलिए मानो सबको आदत सी थी. इस बार धुआं इतना गाढ़ा होगा किसी को अंदाजा नहीं था

रोजगार का सपना आंखों में लेकर आये छात्रों में से कइयों को नौकरी के बदले मौत मिली.ट्रेन की छत पर से लाशें बरस रही थीं. पूरी बोगी खून से लाल थी. मदद करने वाला कोई नहीं. अपने साथियों को यूं मरते देख बाकियों का खून खौल उठा.एसी बोगी से यात्रियों को उतारकर आग लगा दी गई. मातम, गुस्सा, निराशा, हताशा का वो खौफनाक मंजर. उफ!

भर्ती के लिए गए छात्रों के लौटने की  व्यवस्था

क्या कुसूर था उनका,जो मारे गये.क्या कुसूर था उनका,जिन्हें रोजगार के लिए बुलाकर लाठियों से पीटा गया. ये सब अभ्यर्थी भारत तिब्बत सीमा पुलिस (आईटीबीपी)की भर्ती के लिए आये थे.क्या कुसूर था उनका कि उन्हें नौकरी के बदले मौत मिली.

प्रशासन कहता है कि उसे अंदाजा नहीं था कि इतने लोग आ जायेंगे.यानी वाकई प्रशासन को अंदाजा नहीं था कि इस देश में बेरोजगारों की कितनी बड़ी तादाद है. 416 पदों के लिए 11 राज्यों से ढाई लाख अभ्यर्थी. उन्हें वाकई अंदाजा नहीं था कि इस देश में कितने सारे युवाओं के लिए नौकरी एक ख्वाब है, जिसके लिए वे कुछ भी कर सकते हैं. प्रशासन सचमुच कितना मासूम है.

लोगों का क्या है, वे तो मरते रहते हैं. इस देश की इतनी बड़ी आबादी में से कुछ लोग न सही. हमें ऐसे हादसों की आदत है.हम हादसों से जल्दी से उबर जाने का हुनर सीख चुके हैं.देखिये ना सब सामान्य हो रहा है.हादसे के बाद की सुबह यानी आज शाहजहांपुर रेलवे स्टेशन इतना सामान्य था कि मानो कुछ हुआ ही न हो. 

इस हादसे के बाद रेल मंत्रालय, गृह मंत्रालय और यूपी सरकार  के बयानों के बाद  सोचती हूं दोष उन युवाओं का ही था शायद जिन्होंने अपनी आंखों में एक अदद नौकरी का ख्वाब बुना.जो ख्वाब जिसने जिंदगी ही छीन ली.ऐसा हादसा पहली बार नहीं हुआ है. जाहिर है आखिरी बार भी नहीं. हम अपनी गलतियों से कभी सबक नहीं लेते. हादसों को बहुत जल्दी भूल जाते हैं.

....ओह मानव कौल का इलहाम तो छूट ही गया, जिसे देखने के लिए मैं जा रही थी. सॉरी मानव, आपके इलहाम पर अव्यवस्था का यह नाटक भारी पड़ा इस बार.


लेखिका और पत्रकार प्रतिभा  कटियार ने यह प्रतिक्रिया घटनास्थल से लौटकरअपने  ब्लॉग  प्रतिभा  की  दुनिया  पर  लिखा है. 





Feb 2, 2011

भाजपा को दलाल चाहिए और ससुर को स्टाम्प


राजनीति का अनुभव नहीं होने से जिला पंचायत अध्यक्ष रहीं रंजना देवी के ससुर चंदन राम और भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष को लगा कि वे दलित  महिला को रबर स्टाम्प बनाने में सफल रहेंगे. लेकिन रंजना ने उनके दबाव में काम करने से मना कर दिया तो  तिकड़ी  बिगड़ गयी...

नरेन्द्र देव सिंह

उत्तराखण्ड में दलितों की बढ़ते राजनीतिक प्रतिनिधित्व को वहां की राजनीति के सनातनी कब्जेदार रहे राजपूत और ब्राह्मण  पचा नहीं पा रहे हैं। अपनी राजनीतिक अपच मिटाने के लिए उन्हें जब दलित वर्ग से आये जन प्रतिनिधियों को हटाने का काई उपाय नहीं सूझ रहा तो सवर्णी एकता का मुकम्मिल सहारा ले रहे हैं,जिसमें सत्ताधारी भाजपा और विपक्षी कांग्रेस दोनों में लंगोटिया यारी निभ रही है। उसी यारी को बरकरार रखते हुए कांग्रेस और भापजा ने पिथौरागढ़ जिला पंचायत अध्यक्ष रंजना कुमारी को 19जनवरी को अविश्वास प्रस्ताव के जरिये हटाया है,जिसकी साजिश रंजना के ससुर ने रची है.

रंजना देवी :    नहीं बनी मोहरा

पूर्व जिला पंचायत अध्यक्ष रंजना देवी राजनीति में आने से पहले ग्रामीण परिवेश की घरेलू महिला थीं। उनको राजनीति का कोई अनुभव नहीं था। रंजना देवी के ससुर चन्दन राम भाजपा के कार्यकर्ता हैं व उनके पूर्व पंचायती राज्य मंत्री और भाजपा नेता बिशन सिंह चुफाल से अच्छे सम्बन्ध हैं। बिशन सिंह चुफाल वर्तमान में भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष है। चंदन राम ने अक्टूबर 2008में बिशन सिंह चुफाल के कहने पर रंजना देवी को जिला पंचायत अध्यक्ष बनने के लिए राजी कर लिया। इससे पहले रंजना देवी को आरक्षित सीट से जिला पंचायत सदस्य बनवा दिया था।

काफी ना-नुकर के बाद रंजना देवी जिला पंचायत अध्यक्ष बन गयी। आरम्भ में उन्हें न तो राजनीति का अनुभव था और ना ही सरकारी कामों का। चंदन राम रंजना देवी को रबर स्टाम्प बनाना चाहते थे। इसमें चंदन राम को भाजपा के वरिष्ठ नेताओं का भी आशीर्वाद था। शुरू में तो रंजना देवी ने अपने ससुर व भाजपा नेताओं के दबाव में काम किया। परन्तु धीरे-धीरे जब उन्हें अनुभव होने लगा तो उन्होंने उनके दबाव में काम करने से मना कर दिया। बस यहीं से कहानी बिगड़ गयी.

नियम के मुताबिक किसी जिला पंचायत अध्यक्ष के खिलाफ दो साल से पहले अविश्वास प्रस्ताव नहीं लाया जा सकता है। इसलिए जैसे ही दो साल बीते रंजना देवी के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव पारित कर दिया गया। असल में, चन्दन राम,किशन सिंह भंडारी (पूर्व जिला पंचायत अध्यक्ष) व बिशन सिंह चुफाल मिलकर जिला पंचायत को आवंटित पैसों की बंदरबांट करना चाहते थे। और इसके लिए रंजना देवी को मोहरा बनाना चाहते थे।

रंजना देवी ने बताया कि एक बार जब उनके ससुर से उनका झगड़ा हुआ तो उन्होंने यह बात बिशन सिंह चुफाल तक पहुंचायी। इस पर बिशन सिंह चुफाल ने उनसे कहा कि तुम अपने ससुर को प्रत्येक माह दस हजार रुपये दिया करो। तब रंजना देवी ने कहा कि मैं प्रत्येक माह दस हजार रुपया कहां से लाऊं जब कि मुझे साढ़े चार हजार माहवार ही मानदेय मिलता है। इस पर बिशन सिंह चुफाल ने कहा ‘यह तुम्हारा काम है‘  रंजना देवी पर उनके ससुर, किशन सिंह भंडारी आदि लोगों का दबाव बढ़ता जा रहा था। आरम्भ में अकुशल राजनीतिज्ञ होने के कारण तो सब ठीक था परन्तु जब वह काम सीख गयी तो उन्हें प्रताड़ित किया जाने लगा।

चुफाल की चाल: हो गयी कामयाब

पिथौरागढ़ जिला पंचायत अध्यक्ष रहीं रंजना कुमारी दलित हैं और उत्तराखंड में 2008 में संपन्न हुए जिला पंचायत चुनाव में भाजपा समर्थित प्रत्याशी के तौर पर पहली बार चुनाव लड़ीं और जीतीं.उत्तराखंड के इतिहास में ऐसा पहली बार है कि किसी जिला पंचायत अध्यक्ष को अविश्वास प्रस्ताव के जरिये हटाया गया है। इससे पहले पिछले महीने रामनगर जिला के क्यारी ग्राम पंचायत में एक दलित ग्राम प्रधान को अविश्वास प्रस्ताव के जरिये हटाने के साजिश रची गयी थी,पर वह असफल रही। दलित ग्राम प्रधान को अविश्वास प्रस्ताव के जरिये हटाने की कोशिश भी उत्तराखंड में पहली बार हुई थी। इस खबर को जनज्वार के लिए सलीम मल्लिक ने लिखा था,जिसे सवर्णों को मंजूर नहीं एक दलित शीर्षक से प्रकाशित  किया गया था। 

पूर्व जिला पंचायत अध्यक्ष किशन सिंह भंडारी ने एक बार रंजना देवी को जातिसूचक शब्दों के साथ उल्टा-सीधा कहा। रंजना देवी ने इसकी शिकायत भी बिशन सिंह चुफाल से की तब उन्होंने कहा कि ‘‘इसका सबूत लाओ।‘‘ रंजना देवी कहती हैं कि ‘‘प्रदेश में किसी महिला का शोषण होगा और यह लोग बस सबूत मांगेंगे।‘‘ रंजना देवी के ससुर ने एक बार उन्हें अपनी लाइसेंसी बंदूक का डर दिखाते हुए जान से मारने तक की धमकी दे दी थी। इस पर भी चुफाल ने सबूत मांगा।

रंजना के ससुर स्वयं सरकारी पैसों के गबन में लिप्त रहे। चंदन राम ठेकेदारी का काम करते हैं और उन्हें भाजपा नेताओं से पैसा मिलता है। रंजना देवी ने बताया ‘‘एक बार मेरे ससुर को मंदिर बनवाने के लिए नेताओं से पैसा मिला तो उसका गबन करके उन्होंने अपना मकान बना लिया।‘‘जब चंदन राम ने देखा कि बहू कठपुतली बनने से इंकार कर रही है तो उन्होंने रंजना देवी पर आरोप-प्रत्यारोप लगाने शुरू कर दिए। यह आरोप इतने गिरे हुए थे जिन्हें लिखा भी नहीं जा सकता।

इस पूरी कहानी में भाजपा नेता बिशन सिंह चुफाल व पूर्व जिला पंचायत अध्यक्ष किशन सिंह भंडारी ने जब देखा कि उनके स्वार्थ रंजना देवी के सहारे पूरे नहीं हो रहे हैं तो रंजना देवी को निशाना बनाना शुरू कर दिया। इस काम में किशन सिंह भंडारी ने बिशन सिंह चुफाल की मंशा को पूरा करने का जिम्मा लिया। किशन सिंह भंडारी ने रंजना देवी के ससुर के साथ मिलकर जिला पंचायत सदस्यों को अपने साथ मिलाना शुरू किया।

इसके बाद रंजना देवी पर तमाम आरोप लगाये। जैसे कि रंजना देवी सरकारी गाड़ी का दुरुपयोग करती हैं,जिला पंचायत की आवश्यक बैठकों को नहीं करतीं,धनराशि का दुरुपयोग करती हैं व जिला पंचायत अध्यक्ष भाई-भतीजावाद को बढ़ावा दे रही है। रंजना देवी सोचती रही कि बिशन सिंह चुफाल बड़े नेता हैं और उनके साथ इंसाफ करेंगे लेकिन बिशन सिंह चुफाल ने अविश्वास प्रस्ताव से कुछ दिनों पूर्व रंजना देवी को झूठा आश्वासन दिया कि वह पद पर बने रहेंगी। 16 जनवरी को संदेश भिजवा दिया कि इस्तीफा दे दो। रंजना देवी प्रदेश अध्यक्ष के इस रवैये से सकते में आ गयी।

आज रंजना देवी के साथ भाजपा का कोई भी नेता नहीं है। उनका साथ देने कोई भी जिला पंचायत सदस्य नहीं आया। सबको सत्ता का डर सता रहा है। रंजना देवी के दो बच्चे हैं। आज उनके पति व अन्य ससुराल वालों ने उनका साथ छोड़ दिया है। ऐसे में रंजना देवी अपने अकेले दम पर इन सब लोगों से मोर्चा ले रही हैं  और अपने साथ हो रहे अन्याय के खिलाफ लड़ रही हैं.


  लेखक पत्रकार हैं, उनसे  narendravagish@gmail.com  पर संपर्क किया जा सकता है.