Jan 26, 2011

नेताजी को अब वह चरित्रहीन लगती है !


बिहार में किसी महिला का विधायक से बदला लेने की ये पहली घटना नहीं  है। इसके पहले योगेन्द्र सरदार नाम के विधायक  ने जब एक महिला से जबरदस्ती की तो उस साहसी महिला ने महोदय का गुप्तांग  काट लिया था...

निखिल आनंद

बिहार में  पुर्णिया के बीजेपी  विधायक राजकिशोर केसरी चौथी बार विधायक बने थे। रुपम पाठक नाम की एक एमए  पास शिक्षिका ने विधायक पर यौन शोषण के इल्जाम में विधायक केसरी की छुरामार कर हत्या कर दी। पुरूष वर्चस्व वाले समाज में वाकई ये आश्चर्य की बात है कि अब तक की परंपरा के अनुसार एक निरीह अकेली महिला के साथ पुरुष ज्यादती करता था । पर इस घटना में एक महिला ने एक जनप्रतिनिधि की यौन शोषण बदला लेने के लिए हत्या कर दी है। महिला ने विधायक की हत्या की इसकी जितनी निंदा की जाय कम है और कानून उसके किये की सजा भी अवश्य देगा ।

रूपम पाठक : किये पर मलाल नहीं
 राजकिशोर केसरी पर लगाये आरोप सही थे या गलत ये भी जाँच का विषय है क्योंकि महिला के लगाये गए आरोप विधानसभा के सदस्य की गरिमा और मर्यादा के लिहाज़ से अत्यंत गंभीर हैं। लेकिन इस घटना से सहज ही समझ सकते हैं कि उक्त महिला के भीतर प्रतिशोध की ज्वाला किस कदर भड़की हुई थी।

 इस पूरी घटना ने एन.चन्द्रा की एक फिल्म - प्रतिघात-का वो अंतिम दृश्य आँखों के सामने घुमा दिया जिसमें फिल्म की हिरोइन ने अपने अत्याचार का प्रतिशोध लिया था। बिहार में किसी महिला का विधायक से बदला लेने की ये पहली घटना नही है। इसके पहले भी -योगेन्द्र सरदार-नाम के विधायक  जी ने जब एक महिला को गलत काम के लिए बाध्य करने की कोशिश की तो उस साहसी महिला ने महोदय का गुप्त अंग काट लिया था।

पुर्णिया के बी.जे.पी.विधायक राजकिशोर केसरी की हत्या से बी.जे.पी.जितनी दुखी है उससे ज्यादा कहीं सुशील कुमार मोदी को आघात पहुँचा है। यही कारण है कि केशरी की हत्या के बाद मोदीजी मिडिया के सामने अपने विधायक का चरित्र चित्रण करने में जुटे रहे। उप मुख्यमंत्री सुशील कुमार मोदी ने मिडिया से कहा कि राजकिशोर केशरी इमानदार, कर्मठ, जुझारू नेता थे । वहीँ मोदी ने ये भी कहा की महिला ब्लैकमेलर थी यानी गलत थी,इशारा साफ़ था की चरित्रहीन है ।

एक जिम्मेदार पद पर बैठे नेता का बयान कई सवाल खड़ा करता है. पहली बात तो ये की किसी के चरित्र की कोई ठेकेदारी नहीं ले सकता है l सच क्या है वो जांच के विषय हैं, कई बिन्दुयों पर जांच होनी चाहिए - रूपम और राज किशोर केसरी के बीच क्या सम्बन्ध थे ? रूपम विधायक को ब्लैकमेल कर रही थी लेकिन क्यों ? क्या ये सच है की विधायक और उनके सहयोगी विपिन राय रूपम का ब्लैकमेलिंग कर यौन शोषण कर रहे थे ? क्या ये बात सच है की रूपम के बाद उसकी बेटी पर बुरी नज़र रखी जा रही थी ? अब जहाँ तक महिला के चरित्रहीन होने की बात है तो क़ानून ये कहता है की पत्नी के साथ पति का या किसी यौन कर्मी  के साथ किसी भी व्यक्ति का जबरदस्ती शारीरिक सम्बन्ध स्थापित करना- ये सभी बलात्कार की श्रेणी में आता है .

एसोसियेशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म के आंकड़े के अनुसार जो 142विधायक इस बार की विधानसभा में दागी है और इनमें 85 पर गंभीर आरोप हैं l ए.डी.आर. की इस लिस्ट में राजकिशोर केसरी भी शामिल थे और उनपर आई.पी.सी. की धारा- 323, 353, 307, 147, 148, 149, 308, 379, 504, 452 और 426 के तहत मामले दर्ज थे । राज्य के मुखिया नीतीश कुमार के भ्रष्ट्राचार के खिलाफ अभियान और क़ानून-व्यवस्था के दावे पर भी जनप्रतिनिधियों से जुड़े मामलों से बट्टा लग रहा है.
मारे गए विधायक राजकिशोर : हत्या नहीं विकल्पहीनता   
सरकार बनने के डेढ़ महीने में ही बीमा भारती,हुलास पाण्डेय,सुनील पाण्डेय और अब राजकिशोर केसरी से जुड़े मामले सुर्खियाँ बन चुके है. नीतीश ज़ी की कोशिश भी है की सार्वजनिक जीवन में पारदर्शिता बरती जाय .  इस सन्दर्भ में जनप्रतिनिधियों और उनके नजदीकियों से जुड़े मामले का स्पीडी ट्रायल भी एक विचारणीय मुद्दा है.

अफसोस की केसरीजी जनप्रतिनिधि थे और उनकी हत्या हो गई,लेकिन सरकार के सुशासन के दावे के बीच ये घटना सुरक्षा व्यवस्था की पोल खोलता है यानि जब जनप्रतिनिधि सुरक्षित नही है तो आम जनता की कौन पूछे। फिर ये नीतीश बाबू की सरकार बनने के बाद ये विधायकों के साथ हुआ दूसरा मामला है।

इससे पहले बीमा भारती पर उनके क्रिमिनल पति अवधेश मंडल ने अपहरण कर अवैध कब्जे में लेकर जान से मारने की कोशिश की थी । फिर सवाल महिलाओं के खिलाफ राज्य में हो रहे उत्पीड़न और समय रहते न्याय न मिल पाने का का भी है। लेकिन बिहार की राजनीतिक सर्किल में सनसनीखेज और चर्चित सेक्स स्कैंडल की लिस्ट में श्वेत निशा उर्फ़ बाबी, चंपा विश्वास, शिल्पी-गौतम, रेशमा उर्फ़ काजल के बाद अब "रूपम पाठक- राजकिशोर केसरी" का भी नाम जुड़ गया है .

 इन सभी मामलों की परिणति क्या हुई ये किसी से छुपी हुई नहीं है और अभी तक केसरी हत्याकांड में जो प्रगति है उससे इस मामले के हश्र की तरफ एक इशारा मिल गया है .डी.आई.ज़ी ने कहा की हम हत्याकांड को केंद्र में रखकर पूरे मामले की जांच कर रहे है जबकि ये पूरा मामला सेक्स स्कैंडल का है जिसमें सही जांच की दिशा कुछ बड़े गिरेबान तक पहुँच सकते है .दूसरा की इस मामले का सबसे पहले खुलासा करने वाले 'Quisling' अंग्रेजी साप्ताहिक पत्रिका के संपादक नवलेश पाठक को पुलिस उनके घर से बिना नोटिस के घसीटते हुए ले गयी है.

सुशील मोदी: लीपापोती की कोशिश

 फिलहाल पत्रकार बिरादरी ने चुप्पी साधी हुई है जो वाकई आश्चर्य का विषय है .इस घटना से एक बार फिर स्पष्ट है की जनप्रतिनिधियों के चाल- चरित्र- और चेहरे दागदार है या बहस का मुद्दा है .यही कारण है की सार्वजनिक लोगो की निजी जिंदगी में लोगो की खासी दिलचस्पी हमेशा से रही है पर कई बार जब बड़ी घटना होती है तो वो मिडिया की सुर्खिया भी बन जाता है l

रूपम के साथ क्या हुआ ये जाँच का विषय है। इस पूरी घटना पर सही-गलत का फैसला मोदी या मिडिया के कहने से नही होगा। इस पूरे मामले में उच्चस्तरीय जाँच ही दूध-का-दूध और पानी-का-पानी स्पष्ट करेगा। तब तक राजकिशोर केसरी या रूपम पाठक-दोनों में से किसी का भी चरित्र चित्रण, चरित्र हनन और महिमामंडन नहीं होना चाहिए।  पूर्णिया की गलियों में खामोश घूम रही जनता सब जानती है और फैसला क़ानून के हाथ में है,जिसके लिए वाकई इंतज़ार करना होगा।


(निखिल आनंद   'इंडिया न्‍यूज बिहार' के पॉलिटिकल एडिटर हैं, उनसे  nikhil.anand20@gmail  पर  संपर्क किया जा सकता है.)


पेट की आग शहर का रास्ता सुझाती है...


बेघरों के बीच जाति-धर्म का कोई झमेला लगभग नहीं है.नाम से भले ही वे हिंदू-मुसलमान या बाभन-चमार हों, लेकिन यहां सब केवल परदेसी मज़दूर हैं—सबसे पहले और सबसे आख़ीर में बस मुसीबत के मारे हैं...


आदियोग 

शेर अर्ज़ है—‘कल इक महल देखा तो देर तक सोचा/इक मकां बनाने में कितने घर लुटे होंगे.’दिसंबर के दूसरे पखवाड़े से एक तरफ़ बहन जी की सालगिरह की योजनाएं बनने लगी थीं तो दूसरी तरफ़ बदन गलाती सर्दी से होनेवाली बेघरों की मौत का खाता भी खुलने लगा था. ऊंचे महलों में बड़ों का जश्न और फ़ुटपाथ पर मातम. दूर क्यों जायें,राजधानी लखनऊ की बात करें और उससे अंदाज़ा लगायें कि सूबे के दूसरे बड़े शहरों में फ़ुटपाथ की ज़िदगी जी रहे लोगों को सर्दी का निवाला बनने से बचाने के लिए ‘सर्व जन सुखाय,बहुजन हिताय’का नगाड़ा बजानेवाली राज्य सरकार कितना और किस तरह मुस्तैद रही.


 दिनभर लोगों को ढोता है,रात में जिंदगी इसे ढोती है

सरकार बहादुरों की मेहबानी से आलम यह है कि जन हित में जारी किये गये तमाम आदेश या तो काग़ज़ी दौड़भाग में उलझ कर ठहर जाते हैं या भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ जाते हैं. दिसंबर 2009 में देश की राजधानी में हुई बेघरों की मौत की ख़बरों के बाद दिल्ली उच्च न्यायालय ने दिल्ली सरकार को आदेश दिया था कि लोगों को मौत से बचाने के लिए फ़ौरन ज़रूरी क़दम उठाये जायें. इस आदेश पर बस कहने भर को अमल हुआ.2010शुरू हुआ कि पीयूसीएल ने देश की सबसे बड़ी अदालत में गोहार लगायी. इस पर सर्वोच्च न्यायालय ने 27 जनवरी को दिल्ली सरकार समेत सभी राज्य सरकारों को दिशा निर्देश जारी किया कि दिसंबर 2010तक स्थाई रैन बसेरे बना दिये जायें और जिसमें पीने के साफ़ पानी, स्वच्छता, स्वास्थ्य, सस्ते दरों पर राशन, सुरक्षा आदि की भी व्यवस्था हो.

उत्तर प्रदेश सरकार ने मई 2010को अदालत में अपना जवाब दाख़िल किया कि सूबे के पांच बड़े शहरों मेरठ, कानपुर, इलाहाबाद, आगरा और बनारस में आठ स्थाई रैन बसेरे चल रहे हैं. लेकिन यह दर्ज़ नहीं किया गया कि वे किस जगह पर हैं और किस हाल में हैं.मसलन,इलाहाबाद में संगम किनारे बाक़ायदा रैन बसेरा है लेकिन उस पर हमेशा साधुओं का डेरा रहता है.बताया गया कि तीन महानगरों में एक-एक स्थाई रैन बसेरा बनाये जाने का फ़ैसला हो चुका है.ज़मीन और धन की व्यवस्था होते ही उसे पूरा कर दिया जायेगा.यह अपनी ज़िम्मेदारी और जवाबदेही से कन्नी काटने की ज़ुबान थी. वैसे, जिन्हें स्थाई रैन बसेरों के तौर पर पेश किया गया, वे तो असल में सामुदायिक केंद्र हैं और सभी जानते हैं कि उनका उपयोग सामुदायिक गतिविधियों के लिए नहीं, भाड़े पर उठाने के लिए किया जाता है. लखनऊ में नगर निगम के कम से कम 20 स्थाई रैन बसेरे हैं, लेकिन उनका ज़िक्र अदालत को दिये गये सरकारी जवाब से नदारद है.

हो भी तो कैसे.एक को छोड़ कर बाक़ी रैन बसेरे या तो शादी और माल बेचने की प्रदर्शनियों के लिए बुक हो जाते है या फ़िर उन पर अवैध कब्ज़े हैं.हद की बानगी देखें कि निशातगंज में लखनऊ-फ़ैज़ाबाद रोड पर बना एक रैन बसेरा अब रैन बसेरा कामप्लेक्स के नाम से जाना जाता है और फ़िलहाल दूकानों-गोदामों के काम आता है.दूसरा रैन बसेरा इंदिरानगर कालोनी के सेक्टर 16में अमीरों के एक रिहायशी इलाक़े के बीच है और उसके बड़े हिस्से को सामुदायिक केंद्र का नाम दिया जा चुका है.इस बेहतरीन परिसर के बाहर लगा ‘आवश्यक सूचना’का बोर्ड ही ख़ुलासा करता है कि यह जगह बेघरों की कोई पनाहगाह नहीं है.यह सूचना रैन बसेरे के ‘सम्मानित ग्राहकों’के लिए है, उसके लाभार्थियों के लिए नहीं. वैसे, ब्याह के इस मौसम में यह रैन बसेरा अगली मार्च तक बुक है. चारबाग़ शहर का मुख्य रेलवे स्टेशन है और उसके नज़दीक बना रैन बसेरा केवल सर्दियों में खुलता है और जिसके दरवाज़े शाम ढलते ही बंद होने लगते हैं.

तारीफ़ की जानी चाहिए कि जब सरकारी अमला सो रहा था,विज्ञान फ़ाउंडेशन नाम का सामाजिक संगठन जाग रहा था.23दिसंबर से उसके कार्यकर्ता टोलियों में बंट कर कड़ाके की सर्दी में देर रात तक शहर की गश्त पर निकले. 14 जनवरी तक चले तीन हफ़्ते के इस अभियान में कोई 18हज़ार बेघरों की गिनती निकली और उनके छह सौ बड़े ठिकाने मिले जहां उनकी रात ओस बरसाते आसमान के नीचे या बंद दूकानों के बाहर खुले गलियारों में गुज़रती है. बेघरी की यह तसवीर शहर की केवल अहम सड़कों से गुज़र कर उभरी.इसमें गली-मोहल्लों में पसरी बेघरी शामिल नहीं हैं. झुग्गी-झोपड़ियों की नरक जैसी झांकियां भी इससे बाहर हैं.

ख़ैर,31 लाख की आबादीवाले इस शहर में जिला प्रशासन ने   जनवरी   में  जाकर  अलाव समेत 30 अस्थाई रैन बसेरों का इंतज़ाम किया. इनमे से आठ रैन बसेरों को चलाने की ज़िम्मेदारी विज्ञान फ़ाउंडेशन ने ली और बाकी रैन बसेरों का जायज़ा भी लिया.पता चला कि रैन बसेरों के इर्द-गिर्द बसेरा डालनेवाले मेहनतकशों को इसकी ख़बर ही नहीं और अगर ख़बर है भी तो वे उसका इस्तेमाल करने से कतराते हैं. अव्वल तो उन्हें यक़ीन नहीं होता कि यह सुविधा वाक़ई उनके लिए है. दूसरी बात यह कि चार दिन की चांदनी के चक्कर में वे मुश्किल से बनायी गयी अपनी जगह छोड़ना नहीं चाहते.

उस पर किसी दूसरे बेघर के काबिज़ हो जाने का ख़तरा बना रहता है. उन्हें अपने से ज़्यादा अपने रिक्शे या ठेलिया की हिफ़ाज़त की चिंता भी होती है और चार दिन की चांदनी भी कैसी ? पतली चादर से बनायी गयी चारदीवारी की यह सुविधा भी तो बस लिफ़ाफ़ा होती है जो बदन चीरती ठंड से मामूली बचाव भी नहीं कर पाती. रही बात अलाव की तो लकड़ियां भी कम और वह भी गीली.कुल मिला कर हालत यह रही कि रैन बसेरे अमूमन वीरान बने रहे और वहां आवारा कुत्तों और छुट्टा जानवरों ने डेरा डाल दिया.सरकारी मदद से शुरू किये गये अस्थाई रैन बसेरों की सूची में तीन फ़र्ज़ी भी निकले.

कहते हैं कि ‘अस्थाई रैन बसेरे बेघरों की समस्या का हल नहीं हो सकते. 95 फ़ीसदी बेघर मेहनतकश हैं, फ़क़ीर या निराश्रित नहीं. वे अपनी मेहनत का सौदा करते हैं, गरिमा का नहीं. सोचना चाहिए कि उन्हें सर पर छत की ज़रूरत केवल सर्दियों में ही नहीं, गर्मी और बरसात में भी होती है.संविधान ने देश के सभी नागरिकों को जीने का अधिकार दिया है. शहरी बेघर भी इस देश के नागरिक हैं और उन्हें भी जीने का अधिकार है. इसके लिए सरकारों की घेराबंदी होनी चाहिए कि कम से कम हर बड़े शहर में सालों साल चलनेवाले स्थाई रैन बसेरों की व्यवस्था हो और जहां बिजली, पानी और शौचालय से लेकर स्वास्थ्य और सस्ते राशन तक की सुविधा हो.

तीन हफ़्ता चली विज्ञान फ़ाउंडेशन की इस मुहिम में एक ह्फ़्ते के लिए मैं भी हमसफ़र रहा.इस दौरान जो देखा और समझा,उसके हवाले से यही सवाल उभरा कि भाईचारे की तहज़ीब और इनसानी रवायतों की उम्दा मिसाल रहा यह शहर क्या सचमुच इतना ज़ालिम भी हो सकता है. महसूस किया कि क़ुदरत की बेरहम ठंडी मार जिन मुफ़लिसों की आंख से नींद चुरा लेती है, उनके लिए ऐसी रात काटना किस तरह क़यामत से गुज़रना होता है, कि पूरी रात करवटें बदलते रहने और बदन सिकोड़ कर ठंड को चकमा देने की फिज़ूल क़वायद का नाम हो जाती है.गहराते कोहरे के दरमियान कैमरे में क़ैद किये गये इस मंज़र की तसवीरें जैसे पूछती हैं कि यह गठरी है या कोई लेटा है.

सात रात की इस आवारगी में मुझे इनसानियत की मिसालें भी दिखीं और अहसान जताती फ़र्ज़ अदायगी का नाटक भी.यह वाक़या भी सुनने को मिला-ठिठुरन से भरी रात में कोई छुटभय्या नेता पैरों को पेट से सटा कर फुटपाथ पर सो रहे लोगों की मदद के लिए निकला.सांता क्लाज़ की तरह वह दबे पांव उन्हें कंबल उढ़ाता गया और पीछे से उसके शागिर्द उन कंबलों को वापस समेटते गये. लेकिन हां, पहले सीन की फ़ोटू ज़रूर खिंच गयी. इस तरह उसने दो साल बाद होनेवाले पार्षदी के चुनाव के मद्देनज़र अपना चेहरा चमकाने की शुरूआत ज़रूर कर दी.

इसी चक्कर में किसी दूसरे उभरते नेता ने अपने इलाक़े में फ़ुटपाथ पर रहनेवालों के बीच एक शाम पूड़ी-सब्ज़ी बंटवा दी गोया कि बेघर कोई भिखमंगे हों, किसी मंदिर के बाहर बैठे हों. पता यह भी चला कि तीन-चार संस्थाएं हर साल अस्थाई रैन बसेरों का ढांचा खड़ा करती हैं और उस पर अपना बैनर टांग कर बाक़ी ज़िम्मेदारियों से पल्ला झाड़ लेती हैं और फिर झांकने के लिए भी नहीं लौटतीं.आराम से पुण्य लूटनेवालों की इस कतार में व्यापारिक संगठन और टेंट हाउस भी शामिल रहते हैं.

लखनऊ विधानसभा के सामने : यह गठ्हर नहीं जिन्दा इन्सान है

लेकिन ख़ैर,इस तस्दीक से सुकून मिला कि बेघरों के बीच जाति-धर्म का कोई झमेला लगभग नहीं है. नाम से भले ही वे हिंदू-मुसलमान या बाभन-चमार हों, लेकिन यहां सब केवल परदेसी मज़दूर हैं— सबसे पहले और सबसे आख़ीर में बस मुसीबत के मारे हैं जिन्हें पेट की आग शहर का रास्ता सुझाती है और उन्हें मजबूरन बेघर बनाती है.उनके बीच दिखे सहयोग,विश्वास और साझेदारी की यही बुनियाद है. और हां, यह आम लोगों की भलमनसाहत का ‘क़ुसूर’ है कि ठंड से होनेवाली बेघरों की मौत अक़्सर दर्ज़ नहीं हो पाती. इसलिए कि लाश के अंतिम संस्कार के लिए चंदा जुटने में देर नहीं लगती और उसे कांधा देनेवाले मिल जाते हैं.प्रशासन लाश फूंकने-गाड़ने की तकलीफ़ उठाने से बच जाता है.

इस कड़ी में राकेश नाम के रिक्शा चालक का ज़िक्र किया जा सकता है. उनकी अपनी झुग्गी है यानी कहने भर को वे बेघरों की जमात से बाहर हैं लेकिन अपने आसपास के दूसरे मेहनतकशों की बेघरी के दर्द के अहसास से जुड़ कर उन्होंने चंदा बटोर कर सड़क किनारे 10-12 लोगों के सोने लायक़ छोटा सा रैन बसेरा खड़ा करने की क़ाबिले तारीफ़ पहल की.क्या पता कि हमदर्दी और साझी पहल की यह गरमाहट शहर की दूसरी जगहों पर भी उपजी हो जहां तक हमारी नज़रें नहीं पहुंच सकीं.ज़ाहिर है इसलिए कि वहां रैन बसेरे का कोई बैनर नहीं था.

इसलिए कि वहां अपनी पीठ ठोंकने की चाहत नहीं थी,उसकी कोई ज़रूरत ही नहीं थी.कितना अच्छा होता अगर शहर के ऐसे राकेशों की पहचान होती और उन्हें अस्थाई रैन बसेरे बनाने और चलाने का ज़िम्मा सौंप दिया जाता.लेकिन यह तो तभी होता जब सरकारी महकमे में बेघरों पर आनेवाले जानलेवा संकट को लेकर कोई बेचैनी होती. बेचैनी होती तो उससे निपटने की मुकम्मल तैयारी होती.लेकिन सरकारी अमले को महारानी की सालगिरह की तैयारी से ही फ़ुर्सत कहां थी.

इसी हज़रतगंज के कोने में उन नवाब आसफ़ुद्दौला का मक़बरा है जो अपनी रियाया के लिए इतना दरियादिल थे कि यह कहावत आम फ़हम हो गयी कि—‘जिसको ना दे मौला,उसको को दे आसफुद्दौला.’लखनऊ का इमामबाड़ा अकाल में राहत देने के लिए लागू की गयी उनकी रोजगार की योजना से बना,किसी शग़ल में नहीं.उन्हीं आसफ़ुद्दौला के मक़बरे के सामने की लंबी-चौड़ी जगह कभी विक्टोरिया पार्क नाम से जानी जाती थी.आज़ादी के बाद उसे उन बेगम हज़रत महल के नाम से जाना गया जिन्होंने गोरी हुक़ूमत के सामने घुटने टेकने से इनकार कर दिया था और जिसकी क़ीमत नवाबी शानो-शौक़त से हाथ धो कर चुकाई थी.लेकिन बसपा की पहली सरकार ने इसे परिवर्तन मैदान बना दिया.

ताजमहल यक़ीनन ख़ूबसूरत है लेकिन साहिर की इस नज़्म के चश्मे से देखिये तो फ़ालतू और ग़ैर ज़रूरी दिखता है कि ‘इक शंहशाह ने बनवा के हसीं ताजमहल/हम ग़रीबों की मोहब्बत का उड़ाया है मज़ाक़.’ और जब पता चलता है कि यह बेमिसाल इमारत कोई बीस हज़ार मज़दूरों की कुर्बानी से तामीर हुई तो बदसूरत और भुतहा नज़र आती है.तो दिन में गुलज़ार रहनेवाले और अब नये रंग-रोगन से दमकते हज़रतगंज की सड़कें कड़ाके की ठंडी रात में वीरान थीं, लेकिन उसके फ़ुटपाथ और खुले गलियारे बेघरों से उतने ही आबाद दिखे.

मशहूर मर्सियागो मीर अनीस साहब ख़ालिस लखनवी थे और अपने शहर पर जान छिड़कते थे.लेकिन न जाने क्यों और किस आलम में उन्होंने यह शेर भी कहा कि ‘कूफ़े से नज़र आते हैं किसी शहर के आदाब/डरता हूं वो शहर कहीं लखनऊ न हो.’(कहा जाता है कि कूफ़े में पैग़म्बर मोहम्मद साहब के ख़िलाफ़ साज़िश रची गयी थी और जिसने कर्बला को शहादतों का मैदान बना डाला)लगा कि गोया यह गुमनाम सा शेर आम फ़हम हो गया और चीख़ने लगा. लखनवी तहज़ीब के कुर्ते फाड़ने लगा. काश कि इस शेर की टीस मायूसी और बेबसी की तंग गलियों से निकले और दूर तलक पहुंचे. आमीन.



 
उम्र 53 साल. कोई दो दशक पहले अख़बारी नौकरी से छुट्टी. तब से वैकल्पिक मीडिया के क्षेत्र में  सक्रियता और नये   प्रयोगों की आज़माइश. न्याय और अधिकार के मोर्चों पर साझेदारी.  उनसे  awazlko@hotmail.com पर  संपर्क  किया   जा  सकता  है.

 

Jan 25, 2011

आध्यात्मिक प्रेम में मन नहीं देह श्रेष्ठ


प्रेम जो कुछ भी हो,लेकिन  उसे शब्दों में कहने का कोई उपाय नहीं है.फिर  भी  यह एक ऐसा विषय है जिस पर कवि,लेखक,प्रवचन करने वाले जितना लिखते या कहते हैं उतना शायद किसी और विषय पर लिखते या कह्ते नहीं...

निशांत मिश्रा

प्रेम यह एक ऐसा शब्द है जो चिर प्राचीन, मगर चिर नवीन है. यह जादुई आकर्षण से अपनी ओर खींचता है.कहते हैं कि प्रेम दो आत्माओं का मिलन है,इसलिए जहाँ दैहिक आकर्षण होता है वहां कभी सच्चा प्रेम नहीं हो सकता. अगर यह बात सही है तो फिर 'मिलन' का अर्थ क्या है? दूसरा क्या आत्मा और शरीर के मिलन में कोई फर्क है?

वास्तव में देखा जाए तो दैहिक मिलन भी प्रेम का ही एक रूप है.जिस तरह शरीर और मन दो अलग-अलग नहीं बल्कि एक ही सिक्के के दो पहलू हैं,बिल्कुल उसी तरह प्रेम और उसमें होने वाला दैहिक स्पर्श भी एक ही सिक्के के दो पहलू हैं.धर्मशास्त्र और मनोविज्ञान के अनुसार 'काम'एक प्रकार की ऊर्जा है जिसका सीधा सम्बन्ध इन्द्रियों और शरीर से होता है और यही ऊर्जा जब प्रेम का रूप लेती है तो दैहिक आनंद का सृजन होता है.सभी की इच्छा होती है कि कोई उससे प्रेम करे. आखिर प्रेम क्या है? क्या प्रेम सिर्फ दिमाग की उपज है? वास्तव में प्रेम या भोग की भावनाएँ दिमाग से ही निकलती हैं और इन्द्रियों के माध्यम से शरीर व आत्मा को इसकी अनुभूति कराती हैं.


ओशो की माने तो प्रेम जो कुछ भी हो, उसे शब्दों में कहने का कोई उपाय नहीं है क्योंकि वह कोई विचार नहीं है. प्रेम तो अनुभूति है. उसमें डूबा जा सकता है पर उसे जाना नहीं जा सकता.प्रेम पर विचार मत करो.विचार को छोड़ो और फिर जगत को देखो. उस शांति में जो अनुभव करोगे वही प्रेम है.मनोविज्ञानियों की माने तो प्रेम कुछ और नहीं मात्र आकर्षण है जो अपोजिट जेंडर के प्रति सदैव आकर्षित करता है,लेकिन इसमें भी सभी मनोविज्ञानी एक मत नहीं हैं.

चार्ल्स रुथ का मानना है कि किशोर अवस्था में प्रवेश करते ही जिस तरह लड़के और लड़कियां एक-दूसरे के प्रति आकर्षित होते हैं उसका कारण सिर्फ अपोजिट जेंडर नहीं है,बल्कि किशोर अवस्था में आने के साथ ही सेक्स हार्मोंस का संचार उनकी इन्द्रियों और शरीर में तेजी से होने लगता है.यही कारण है कि जहाँ लड़कियां खुद को सुन्दर और आकर्षक बनाने में जुटी रहती हैं वहीं लड़के अपनी शारीरिक शक्ति का प्रदर्शन करने में लगे रहते हैं.लड़के और लड़कियां सज-धज इसीलिए करते हैं कि कोई उनकी ओर भी आकर्षित हो.सेक्स के प्रति उनकी जिज्ञासा भी इसी उम्र में जागती है. तभी तो उन्हें काल्पनिक कहानियाँ और फिल्मों के हीरो-हीरोइन अच्छे लगते हैं. उनके व्यहवार में परिवर्तन आ जाता है. वह ऐसा क्यों करते हैं? कारण सीधा सा है क्योंकि यह भी एक तरह से यौन इच्छा का संचार है.

अगर बात आकर्षण की करें तो हर किसी का प्रयास होता है कि सबका ध्यान उसकी ओर आकर्षित हो.इसी आकर्षण से उपजता है प्रेम और इसी प्रेम का परिणाम है दैहिक सुख.इसके लिए इन्सान कुछ न कुछ ऐसा करने को तत्पर रहता है जिस पर सबका ध्यान जाए.यह मनोवृत्ति है जिससे लड़के और लड़कियां भी अछूते नहीं.यही बात प्रेम करने वालों पर भी लागू होती है.जब तक दोनों के बीच आकर्षण रहेगा तब तक प्रेम भी रहेगा.आकर्षण खत्म होते ही प्रेम उड़न छू. फिर प्रेम कैसा?

आकर्षण प्रेम संबंधों को प्रगाढ़ करता है.प्रेम संबंधों के बीच पनपे यौन सम्बन्ध को वासना का नाम देना अनुचित ही होगा.जब दो जने स्वेच्छा से अपने शारीरिक और आत्मिक सुख व आनंद की प्राप्ति के लिए एकाकार होते हैं तो वह अनुचित कैसे हो सकता है,लेकिन हमारी सामाजिक धारणाएं इसे अनुचित और नाजायज़ मानती हैं.हाँ,प्रेम संबंधों के अतिरिक्त मात्र दैहिक सुख के लिए बनाये जाने वाले सम्बन्ध को जरुर वासनापूर्ति की श्रेणी में रखा जा सकता है. हम प्रेम और दैहिक आनंद की व्याख्या कुछ इस तरह से भी कर सकते हैं कि शरीर और आत्मा क्या है? दोनों को ही किसी भी प्रकार की अनुभूति इन्द्रियों के माध्यम से ही होती है.

शरीर और आत्मा हमेशा आनंद पाने को लालायित रहते हैं इसीलिए वह हमेशा अपोजिट जेंडर के प्रति आकर्षित होते हैं और इस आनंद की अनुभूति तब होती है जब प्रेम और भोग के दौरान इन्द्रियां संतुष्टि का अहसास कराती हैं.प्रेम और दैहिक आनंद सभी सुखों से बढ़कर एक ऐसा वास्तविक सुख है जिसका कोई अंत नहीं.शरीर और आत्मा दोनों ही सदैव इस सुख को भोगने के लिए तत्पर रहते हैं. यह शाश्वत और अटल सत्य है जिससे इंकार नहीं किया जा सकता. यह एक ऐसा विषय है जिस पर कवि, लेखक, प्रवचन करने वाले जितना लिखते या कहते हैं उतना शायद किसी और विषय पर लिखते या कह्ते नहीं होंगे.

दैहिक  आनंद और प्रेम को लेकर बहुत भ्रांतियां हैं,लोग दोनों को अलग अलग करके देखते हैं.जबकि वात्सायन के कामसूत्र और उसी को आधार मान कर लिखे गए अन्य ग्रंथों या किताबों का अध्ययन करेंगे तो स्पष्ट हो जाएगा कि धर्म,सांसारिक संपत्ति और आत्मा की मुक्ति की तरह ही प्रेम और दैहिक आनंद का भी इन्सान के लिए समान महत्व हैं. जीवन की इन प्रमुख गतिविधियों में से किसी एक का अभाव मानव जीवन अधूरा बना देता है.जैसे इनका होना जीवन में आवश्यक है वैसे ही दैहिक सुख का.अगर इस पर ध्यान नहीं दिया जाये तो इन्सान का अस्तित्व ही समाप्त हो जाएगा.

दैहिक सुख को हिन्दू शास्त्रों में तीन अन्य व्यवसाय की तरह पवित्र और महत्वपूर्ण माना जाता है और इसका उल्लेख वृहदरन्यका उपनिषेद में विस्तृत रूप से किया गया है.कुल मिलाकर प्रेम एक ऐसा जादूई अनुभव या अनुभूति है जिसे हम अलग अलग समय पर,बचपन,जवानी,वृद्धावस्था में अलग अलग तरीके से अनुभव करते हैं.



पत्रकार निशांत मिश्रा पिंकसिटी प्रेस क्लब जयपुर के पूर्व  उपाध्यक्ष हैं, उनसे  journalistnishant26@gmail.com संपर्क  किया  जा  सकता  है.

लोकसंस्कृति की पक्षपधरता का प्रश्न

जबकि चौतरफा अपसंस्कृति का बोलबाला बढ़ता जा रहा हो,लोकसंस्कृति ह्रासमान हो और जनसंस्कृति का एक सिपाही गिरीश तिवारी गिर्दा हमारे बीच से चला गया हो,‘लोकसंस्कृति की चुनौतियों’ पर बात करना बेहद प्रासंगिक है...

पिछले 19जनवरी को रुद्रपुर के नगरपालिका सभागार में गिर्दा स्मृति संगोष्ठी में ‘लोकसंस्कृति की चुनौतियों’पर बोलते हुए वरिष्ठ आलोचक और इलाहाबाद विश्वविद्यालय के पूर्व आचार्य डॉक्टर राजेन्द्र कुमार ने कहा कि ‘लोकसंस्कृति वही है जिसमें गतिशीलता हो और जो मुक्त करने की ओर उन्मुख। इसलिए लोकसंस्कृति के नाम पर सबकुछ को पीठ पर लादे नहीं रखा जा सकता है। सड़ांध पैदा करने वाली चीजों की निराई-गुड़ाई करते हुए आगे बढ़ना ही सच्चे लोकसंस्कृति की विशेषता हो सकती है।’


संगोष्ठी का आयोजन उत्तराखण्ड के रूद्रपुर जिले की साहित्यिक-सांस्कृतिक संस्था ‘उजास’ने किया था। वर्तमान चुनौतियों की चर्चा करते हुए उन्होंने आगे कहा कि आज बाजार की संस्कृति हावी है,जिसने इंसान को माल में तब्दील कर दिया है। साजिशन आमजन से तर्क व विवके छीनकर आस्था को मजबूत किया जा रहा है। बाजार की शक्तियां ही यह तय कर रहीं हैं कि लोक को क्या जानने दा, क्या नहीं। उन्होंने दो टूक शब्दों में कहा कि बगैर पक्षधरता तय किए वास्तव में लोकसंस्कृति की चुनौतियों से नहीं टकराया जा सकता है।

विषय प्रवर्तन करते हुए ललित जोशी ने कहा कि आज के दौर में लोकसंस्कृति के बरक्स अपसंस्कृति और अंग्रेजियत की संस्कृति हावी है। मानसिक गुलामी की यह संस्कृति समाज को भीतर से तोड़ रही है,इंसान को इंसान से कमतर, आत्मकेन्द्रित, स्वार्थी व मौकापरस्त बना रही है।
डॉ.शम्भूदत्त पाण्डे शैलेय ने लोक के लिए समर्पित गिर्दा को याद करते हुए बताया कि सहज व सरल ढ़ंग से बात रखना ही जन से जुड़ाव का प्रस्थान बिन्दु है। उन्होंने अपने वक्तव्य में इस सामाजिक त्रासदी का उल्लेख किया कि घर के पूजा कक्षों,त्योहारों एवं ब्यक्तिगत-सामाजिक कर्मकाण्डों में चाहें जैसी संस्कृति हो,सामाजिक जीवन में औपनिवेशिक संस्कृति और उससे गढ़ा गया मानस ही है।


‘नौजवान भारत सभा’ के मुकुल ने कहा कि आज हम सांस्कृतिक वर्चस्व के ऐसे दौर में जी रहे हैं जहां बाजार की शक्तियां जनता के मन-मस्तिक पर जबर्दस्त नियंत्रण कायम कर रखी हैं। स्थिति यह है कि भाषा के नाम पर साजिशन हिंगलिस परोसा जा रहा है। उन्होंने कहा कि लुटेरी शक्तियों ने एक प्रक्रिया में नियंत्रण के हथियार विकसित किए हैं। हमे भी इतिहास से सबक लेकर अपने नए हथियारों को विकसित करना होगा। तभी हम सांस्कृतिक चुनौतियों से जूझ सकते हैं।

अपने अध्यक्षीय वक्तब्य में वरिष्ठ साहित्यकार ड़ा.प्रद्युम्न कुमार जैन ने लोकसंस्कृति की चुनौतियों को समझने के लिए अपने इतिहास को जानने की जरूरत पर जोर दिया। उन्होंने नारावादी मानसिकता से मुक्त होकर समाज की बहती मुक्तधारा को आगे बढ़ाने का आह्वान किया।

संगोष्ठी में ‘इंक़लाबी मजदूर केन्द्र’ के कैलाश भट्ट, उत्तराखण्ड परिवर्तन पार्टी के प्रताप सिंह, वरिष्ठ पत्रकार विधि चंद्र सिंघल , प्रो. प्यारेलाल, पद्यलोचन विश्वास, रूपेश सिंह, ए.पी. भारती आदि ने भी विचार प्रकट किए। नाट्यकर्मी हर्षवर्धन वर्मा ने गिर्दा को समर्पित कविता प्रस्तुत की। संचालन खेमकरन सोमन व नरेश कुमार ने संयुक्त रूप से किया। इस अवसर पर पोस्टर व पुस्तक प्रदर्शनी भी आयोजित हुयी।



प्रस्तुती- एल.जोशी



'पहली मंजिल है संविधान'


दिल्ली में आयोजित एक  सेमीनार में भाग लेने आये नेपाली कम्युनिस्ट पार्टी (माओवादी)  के  उपाध्यक्ष बाबूराम  भट्टराई से  अजय प्रकाश  की  बातचीत...


नेपाली कम्युनिस्ट पार्टी (माओवादी)ने नये संविधान निर्माण का जो लक्ष्य तय किया था वह अब तक क्यों नहीं पूरा हो सका?
पार्टी के लिए भी यही सवाल इस समय केंद्रीय बना हुआ है कि आखिर सैद्धांतिक और व्यावहारिक स्तर पर वह कौन सी गलतियां हैं, जिनकी वजह से हम लोग देश की जनता की उम्मीदों को अब तक पूरा नहीं कर सके। पार्टी में बहुतायत की राय बनी है कि हम लोग सिद्धांत और व्यवहार के तालमेल में असफल रहे। पार्टी ने जनयुद्ध के जरिये क्रांति की ओर कदम बढ़ाते हुए दो महत्वपूर्ण सफलताएं दर्ज की थी। पहली पीपुल्स लिबरेशन आर्मी (पीएलए) और दूसरा आधार क्षेत्र। हमें मौजूदा समय में लग रहा है कि पार्टी आधार क्षेत्रों में अपनी ताकत बरकरार रखने में सफल नहीं रह पायी है।

पार्टी में जिस तरह के विरोध के स्वर उठ रहे हैं, वैसे में कहीं ऐसा तो नहीं कि पार्टी टूट जाये?
अभी-अभी 7हजार पार्टी कार्यकर्ताओं का प्लेनम हुआ है। इस प्लेनम के बाद हम दोटूक कह सकते हैं कि पार्टी में नेतृत्व के स्तर पर ऐसा कोई अंतरविरोध नहीं है जिससे पार्टी के टूटने की कोई बात हो। हो सकता है पहले की तरह एकाध नेता निकलें, मगर पूरी पार्टी अब नयी चुनौतियों के साथ और मजबूत हुई है। भारतीय अखबारों में जो खबरें आती हैं वह अविश्वनीय और अधकचरी दोनों हैं,जिससे यहां भ्रम फैलता है। हालांकि भारतीय शासक वर्ग की चाहत भी यही है। पार्टी में फिलहाल बहस इस बात पर है कि अभी क्या किया जाये। दूसरी बहस प्रधान अंतरविरोध को लेकर भी है। पार्टी बहुमत का मत है कि 2005 में हुए बारह सूत्रीय समझौते को बातचीत के रास्ते आगे बढ़ाया जाये और राष्ट्रीय स्तर पर अपने को मजबूत किया जाये।

कहीं समस्या बारह सूत्रीय समझौते में तो नहीं है?

हमें ऐसा नहीं लगता। मौजूदा विश्व परिस्थिति  और नेपाल में पार्टी की स्थिति के मद्देनजर ही माओवादी नेतृत्व ने निर्णय लिया था। हमारा कतई नहीं मानना है कि बारह सूत्रीय समझौते का निर्णय किसी जल्दबाजी या दबाव में लिया गया था। पार्टी ने एक लंबे अनुभव और बहसों की प्रक्रिया को पूरी करने के बाद ही यह तय किया था कि अब हमें संविधान निर्माण की प्रक्रिया को इसी रास्ते पूरा करना है।



भारत सरकार के नुमाइन्दों  से आपकी क्या बात हुई?
भारत सरकार संभवतः समझना चाहती है कि आखिर कहां गलती हुई, जो सोलह बार सरकार बनाने के लिए हुए प्रयासों के बावजूद नेपाल में कोई स्थिर सरकार नहीं बन सकी। हालांकि यह मेरा अनुमान है। पूर्व विदेश मंत्री और मौजूदा वित्त मंत्री प्रणब मुखर्जी नेपाल की अस्थिरता को लेकर गंभीर दिखे। भारत सरकार को इसी गंभीरता से नेपाल में ऐसा माहौल बनाना चाहिए कि देश की सबसे बड़ी पार्टी होने के नाते नेकपा (माओवादी) को संविधान निर्माण का मौका मिले।

मगर अब तो नये संविधान के निर्माण के लिए पांच वर्षों में से सिर्फ चार महीने ही शेष रह गये हैं, आपको लगता है कि आप लोग इस काम को पूरा कर पायेंगे?
बेशक हमारे लिए यह एक चुनौती होगी,जिसमें पार्टी कामयाब होने में अपनी पूरी ताकत झोंक देगी। गांवों में हमारा अभी भी व्यापक जनाधार है। अगर हम लोग गांवों में अपने समर्थकों के बीच फिर एक बार व्यापक एकता कायम करते हुए बढ़ें तो शहरों में जनता स्वतः नये संविधान निर्माण की प्रक्रिया के समर्थन में संगठित हो जायेगी। पार्टी मानती है कि हमें जितनी तैयारी करनी चाहिए थी, उसमें कमी रह गयी।

कहीं ऐसा तो नहीं कि यह रास्ता ही गलत रहा हो?
मैं पहले भी कह चुका हूं और फिर एक बार कह रहा हूँ कि जनयुद्ध के रास्ते से आगे बढ़कर नेकपा (माओवादी) का संघर्ष के इस रास्ते को चुनना कोई भूल नहीं है। बेशक इन पांच वर्षों के लिए पार्टी ने जो सैद्धांतिक निर्णय लिये थे, उनको हम लोग ठीक ढंग से अमल कराने में असफल रहे, जिसे हम स्वीकार करते हैं। बीते पांच वर्षों में राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय स्तर पर क्रांति के पक्ष में जो माहौल बनाना था, उसमें भी पार्टी कुछ ज्यादा नहीं कर सकी।

मगर बीते पांच वर्षों में सरकार बनाने-बिगाड़ने को लेकर समझौते और बातचीत तो खूब हुई। आपको नहीं लगता कि माओवादी पार्टी की बड़ी ताकत इसी में उलझी रही?
यह बात भी सही है। मगर दूसरी तरफ देखें तो ऐसा स्वाभाविक तौर पर भी हुआ, क्योंकि 2005 में चुनाव जीतकर आने के बाद से पार्टी का मुख्य कार्यभार नेपाल में नया संविधान निर्माण था। जाहिर तौर पर नया संविधान निर्माण बहुमत की बदौलत ही होना है। इस कारण हम लोगों की बड़ी क्षमता इसी काम में लगी रही कि कैसे भी करके देश में एक जनतांत्रिक संविधान का निर्माण हो। चूंकि देश को एक सच्चे लोकतंत्र बनाने की चिंता और सोच बुनियादी रूप से माओवादी पार्टी की ही है, इसलिए मुश्किलें और भी गंभीर होती चली गयीं।

कुछ लोगों का मानना है कि जनयुद्ध के बाद माओवादी बुर्जुआ पार्टियों के गठबंधन के चक्रव्यूह में उलझ गये?
इससे भी इनकार नहीं किया जा सकता। क्योंकि माओवादियों को छोड़ देश की दूसरी सभी पार्टियां इस खेल में माहिर थीं। मगर एक फर्क लक्ष्य का भी था। पूर्व प्रधानमंत्री माधव नेपाल की एमाले पार्टी हो या फिर स्वर्गीय गिरिजा प्रसाद कोइराला की नेपाली कांग्रेस, सभी सिर्फ सत्ता में बने रहने के लिए गठबंधन कर रहे थे, जबकि माओवादी उन सहायक शक्तियों से एका कर रहे थे जो नये नेपाल को बना सकें, देश को नया संविधान दे सकें।

कैंपों में रह रहे माओवादी पार्टी की जनसेना पीपुल्स लिबरेशन आर्मी (पीएलए)के जवानों की मानसिक तैयारी कैसी है, क्या वे अभी भी पार्टी के आहवान पर उसी तरह संघर्ष करने को तैयार हो पायेंगे, जैसा उनका इतिहास रहा है?
उम्मीद तो पार्टी यही करती है। हालांकि कैंपों में इतने वर्ष बिताने के बाद पीएलए की संघर्ष के लिए मानसिक तैयारी को मिला-जुला कहना, सच के ज्यादा करीब होगा। मिलिट्री के स्तर पर देखें तो राज्य की सेना के मुकाबले हम कमजोर हैं और अब मुश्किलें और बढ़ गयी हैं। भारतीय सेना वहां के जवानों को प्रशिक्षित कर रही है और भारत हथियार भी नेपाल को दे रहा है। इसलिए हमें लगता है कि फिलहाल तो बातचीत से ही रास्ता निकालने की कोशिश होनी चाहिए।

अगर दूसरी पार्टियां बातचीत के जरिये नये संविधान निर्माण को लेकर सहमत नहीं होती हैं और मई तक की समयसीमा समाप्त हो जाती है, वैसे में आपकी पार्टी क्या करेगी?
फिर से हम नये सिरे से कोशिश करेंगे,क्योंकि संविधान निर्माण तक पार्टी का यही मुख्य कार्यभार है। वैसे तो देश की सबसे बड़ी पार्टी होने के नाते यह मौका माओवादी पार्टी को मिलना चाहिए। बहरहाल देखिये क्या होता है।

नेपाल में संविधान सभा के चुनाव की समयसीमा समाप्त होने के बाद क्या सेना माओवादियों का दमन करेगी ?
इस संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता। इसी वजह से हम लोग फिर से अपने आधार इलाकों को पुनर्गठित करने की जोरदार प्रक्रिया शुरू कर रहे हैं। चूंकि हम सैन्य मामलों में नेपाली सेना से बराबरी नहीं कर सकते इसलिए ऐसी किसी स्थिति से निपटने के लिए जनांदोलनों का रास्ता अपनाया जाये।

क्या माओवादी पार्टी फिर से जनयुद्ध के रास्ते पर लौट सकती है?
बहुत ज्यादा दमन की स्थिति में थोडे़ दिनों के लिए पार्टी बचाव में ऐसा कर सकती है, मगर पहले की तरह 10-12 साल के लिए जनयुद्ध के रास्ते पर अब नेपाली माओवादी नहीं लौटेंगे। हमारे पास 2003के पास कई ऐसे उदाहरण हैं जिनसे साफ हो गया था कि हम लोग सैन्य मामलों में नेपाली सेना को मात नहीं दे सकते।

भारतीय माओवादियों की नेपाली माओवादियों के बारे में जो आलोचना है कि बुर्जुआ राजनीति में भागीदारी विचलन है, इस बारे में आप क्या कहते हैं?
सैद्धांतिक तौर पर देखें तो यह आलोचना सही लगती है, लेकिन व्यावहारिक तौर पर भारत और नेपाल की राजनीतिक स्थितियां अलग हैं। हम अभी नेपाल में राजशाही का अंत कर एक गणतांत्रिक देश बनने की प्रक्रिया में हैं, जबकि भारत इस दौर से गुजर रहा है। इसलिए नेपाल की विशेष परिस्थितियों में अभी देश में बुर्जुआ संविधान निर्माण ही क्रांति की पहली मंजिल है।

भारतीय माओवादियों से आपके किस तरह के संबंध है?
एक कम्युनिस्ट पार्टी होने के नाते हमारा उनसे बिरादराना संबंध है, इससे इतर कुछ भी नहीं।

(पाक्षिक पत्रिका 'द पब्लिक एजेंडा' से साभार)



Jan 23, 2011

मजहब मजबूरी, उत्थान भी जरूरी



मुस्लिम महिलाओं के लिए जारी कानूनों की चर्चा करें तो यह पता चलेगा कि उन्हें किस दौर से गुजरना पड़ता होगा। कहा गया कि मुस्लिम महिलाएं जींस नहीं पहनेंगी,मोबाइल फोन पर बात नहीं करेंगी, इंटरनेट नहीं चलाएंगी, नौकरी नहीं करेंगी, सार्वजनिक रूप से कहीं भी नहीं जाएंगी, किसी भी राजनीतिक अथवा सामाजिक मंच से भाषण नहीं देंगी, वह जज नहीं बन सकतीं आदि...


आशा त्रिपाठी

यह सही है कि धर्म अथवा मजहब के सिद्धांतों के अनुरूप ही मनुष्य को आचरण करना चाहिए, क्योंकि मजहब कभी भी गलत सीख नहीं देता। हां, इतना जरूर है कि मजहब के नाम पर किसी को रूढ़ियों की बेड़ी से जकड़ने से बचना चाहिए,क्योंकि वह कभी-कभार विकास में बाधक भी बनने लगता है, जिसके दूरगामी परिणाम प्रतिकूल होते हैं।  देश-दुनिया में मुस्लिम महिलाओं के साथ कमोबेश यही हो रहा है। मुस्लिम महिलाएं जब भी सशक्त होने के लिए आगे बढ़ती हैं,उनके सामने मजहबी अवरोध और फतवों की दीवार खड़ी कर उन्हें रोक दिया जाता है। जिसका नुकसान संबंधित समाज को ही होता है।

महिला सशक्तिकरण और विकास मौजूदा हालात में किसी भी समाज एवं राष्ट्र के विकास का मूलाधार बन गया है। महिलाओं की बढ़ती हुई शक्ति और जागरूकता ने आज अपनी सक्रिय भागीदारी सुनिश्चित की है। भारत की महिलाएं भी रूढ़ियों को तोड़कर सचेत होने लगी हैं,पर अभी तक भारतीय समाज के प्रत्यके वर्ग, सम्प्रदाय, जाति एवं धर्म की महिलाओं को विकास की मुख्यधारा से नहीं जोड़ा जा सका है।

यहां की मुस्लिम एवं दलित वर्ग की महिलाएं अनेक रूढ़िगत कुरीतियों में जकड़ी और अपेक्षाकृत पिछड़ी हुई हैं। यदि हम वैश्वीकरण के इस युग में विकास की ओर तीव्र गति से उन्मुख होना चाहते हैं तो आवश्यकता है कि समस्त भारतीय महिलाओं की समान सहभागिता के लिए  तत्पर हों, तभी हम पूर्ण विकास के लक्ष्य को प्राप्त कर पायेंगे। हालांकि भारत में महिलाओं के लिए लगातार अनुकूल हालात बनते जा रहे हैं। इसका लाभ लेने के लिए समाज के हर वर्ग की महिलाओं को आगे आना चाहिए।

दुनिया माने या न माने, लेकिन भारतीयों ने वास्तविक महिला सशक्तिकरण की ओर छलांग लगा ली है। महिला सशक्तिकरण का इससे बेहतर क्या उपाय होगा कि देश की संसद और राज्य विधानसभाओं में एक तिहाई महिलाओं की भागीदारी सुनिश्चित हो जाए। यह काम एक महिला नेता सोनिया गाँधी के हाथों हुआ, यह भी अपने आप में ऐतिहासिक है। इसका कारण यह है कि इस पुरुष प्रधान समाज में महिला आरक्षण के लिए एक महिला द्वारा साहस जुटाया जाना कोई सरल बात नहीं थी।

इसमें कोई शक नहीं है कि इतिहास सोनिया गाँधी को महिला सशक्तिकरण के लिए सदा याद करेगा। यहां यह भी उल्लेखनीय है कि महात्मा गाँधी ने सबसे पहले 1930के दशक में ही (जबकि आरक्षण पद्धति पर बहुत विरोध था)समाज के सबसे दबे-कुचले दलित वर्ग के सशक्तिकरण के लिए दलित आरक्षण को स्वीकारा था। इसी प्रकार दूसरी पिछड़ी जातियों के लिए विश्वनाथ प्रताप सिंह ने 1990 में सरकारी नौकरियों में आरक्षण निधारित कर दिया।

अब सोनिया गाँधी ने महिला आरक्षण विधेयक के ज़रिए महिला सशक्तिकरण का बीड़ा उठाया है। यानी कि आरक्षण ही पिछड़े वर्ग के सशक्तिकरण का एकमात्र उपाय है। कम से कम भारतीय राजनीति में तो आरक्षण को ही पिछड़ों के सशक्तिकरण का उपाय मान लिया गया है। यह सशक्तिकरण और सामाजिक न्याय का एक सफल माध्यम भी सिद्ध हुआ है। क्योकि वह दलित हों या पिछड़े, हर आरक्षित वर्ग आरक्षरण के बाद सशक्त हुआ है। उत्तर प्रदेश की  मुख्यमंत्री मायावती आरक्षण की बदौलत ही सत्ता के शीर्ष तक पहुंची हैं, जहाँ वो दलित आरक्षण के बिना पहुँच ही नहीं सकती थीं।

खैर,मूल विषय यह है कि रू़ढ़ियों की बेड़ी में जकड़ी मुस्लिम महिलाओं को भी सशक्त बनाया जाना चाहिए। इसके लिए बीच में आने वाली मजहबी दीवार को रोकने की जरूरत है। हाल-फिलहाल में मुस्लिम महिलाओं के लिए जारी कानूनों की चर्चा करें तो यह पता चलेगा कि उन्हें किस दौर से गुजरना पड़ता होगा। कहा गया कि मुस्लिम महिलाएं जींस नहीं पहनेंगी,मोबाइल फोन पर बात नहीं करेंगी, इंटरनेट नहीं चलाएंगी, नौकरी नहीं करेंगी, सार्वजनिक रूप से कहीं भी नहीं जाएंगी, किसी भी राजनीतिक अथवा सामाजिक मंच से भाषण नहीं देगीं, वह जज नहीं बन सकतीं आदि आदि...

एक कलाकार के तौर पर दुनियाभर में अपनी पहचान कायम कर चुकी पाकिस्तानी अभिनेत्री वीना मलिक के विरुद्ध यह कहते हुए मुकदमा दर्ज करा दिया जाता है कि उसका आचरण इस्लाम विरोधी हैं। चर्चित लेखिका तस्लीमा नसरीन का ग्लोबल विरोध इसलिए किया जाता है कि वह बेबाक तरीके से अपनी सबके सामने रखतीं हैं। विभिन्न फतवों व मंचों के उलेमा और शिक्षाविद इस तरह के फरमान जारी करते रहते हैं।

यह अलग बात है उनके इन फरमानों में भी कोई न कोई सकारात्मक पहलू  जरूर होंगे,मगर  जिनकी चर्चा होती है वह मुस्लिम महिलाओं में नकारात्मक भाव पैदा करने के लिए काफी हैं। इस स्थिति में मुस्लिम महिलाएं सोच भी नहीं पातीं होंगी कि उन्हें स्वावलंबी बनना है तथा देश-समाज के उत्थान में भूमिका निभानी है। ये हालात न तो उन महिलाओं के लिए ठीक हैं और न ही उनके परिवार, राष्ट्र और समाज के लिए।

आंकड़े के अनुसार मुस्लिम महिलाओं में अशिक्षा का प्रतिशत काफी ज्यादा है। आरंभिक दौर में परिवार के लिए मुस्लिम लड़कियों को स्कूल नहीं भेजा जाता,  बाद में अशिक्षित रहते हुए उसका बाल विवाह कर दिया जाता है। समय से पहले मां बनने के बाद जब बच्चा बड़ा होता है तो वह भी शिक्षा के प्रति प्रेरित नहीं हो पाता। इसके पीछे एकमात्र कारण यही है कि उसकी मां अशिक्षित होती है।

बहरहाल, अब स्थितियां बदल रही हैं। इस स्थिति में सभी को इस बात के लिए जागरूक होने की जरूरत है कि मुस्लिम महिलाएं भी इसी समाज की हिस्सा हैं, उन्हें स्वावलंबी बनाना है। हां, धर्म का आचरण  भी जरूरी है, परन्तु उतना नहीं जितना हो रहा है।



(लेखिका सामाजिक मुद्दों पर लिखती हैं. )

Jan 21, 2011

व्यवस्था के विरुद्ध आक्रोश का दस्तावेज



हिंदुस्तान की बहुधर्मी संस्कृति के ताने-बाने को छिन्न-भिन्न कर धर्म के नाम पर सांप्रदायिक-तानाशाह शक्तियां जनता को गुलाम समझने-बनाने की कोशिश कर रही हैं ...


राम मुरारी


वर्षों पहले सुविख्यात कवि पाश ने लिखा था- ‘ हुकूमत ! तेरी तलवार का कद बहुत छोटा है/ कवि की कलम से कहीं छोटा/ तेरी जेल हो सकती है कविता के लिए हजार बार/ लेकिन यह कभी नहीं होगा/ कि कविता तेरी जेल के लिए हो...’

काफी वर्षों बाद आज कविता की इसी ताकत का एहसास कराते हुए हरे प्रकाश उपाध्याय लिखते हैं- ‘मेरे पास कुछ नहीं है/ अंजुरी भर शब्दों के अलावा कुछ नहीं/ धन न अस्त्र-शस्त्र पर लड़ूंगा/ यकीन रखना जीतूंगा भी... नहीं रहूंगा चुपचाप/ उनके आतंक से डरे लोगों को बटोरूंगा/ शब्दों से सिहरन पैदा करूंगा और ताकत....’ (अंजुरी भर शब्द)

युवा कवि हरे प्रकाश उपाध्याय की ‘खिलाड़ी दोस्त तथा अन्य कविताएं’शीर्षक से लिखे गये कविता संग्रह को पढ़ते हुए बार-बार जेहन में पाश की याद उभर आती है, तो यह बेवजह नहीं है। पाश की कविताओं का तेवर, उनका मिज़ाज और हर कीमत पर गैर मानवीय व्यवस्थाओं से लड़ने का माद्दा हरे प्रकाश की कविताओं में भी शिद्दत के साथ महसूस किया जा सकता है। उनकी कविताओं में विद्रूप होती जा रही व्यवस्था के खिलाफ तल्खी साफ तौर पर देखी जा सकती है।


‘खिलाड़ी दोस्त तथा अन्य कविताएं’ में हरे प्रकाश बार बार अपने समय के नंगे और कुरूप सच को बयान करते दिखाई पड़ते हैं- बिना डरे, बिना झिझके... बिना इसकी परवाह किए कि समय ने उन पर मुकदमा दायर कर दिया है और वे समय की अवमानना के दोषी हैं-

‘मेरे कवि मित्रो/ क्या तुम्हे वारंट नहीं मिला है अभी तक/ समय ने मुकदमा दायर कर दिया है हम सब पर/ हम समय की अवमानना के दोषी हैं/ हम सब दोषी हैं/कि रात जब अपना सबसे अंधेरतम समय बजा रही थी/ और बोलना सख्त मना किया गया था/ हम गा रहे थे प्रेमगीत/ हम लिख रहे थे दोस्तों को चिट्ठियां/ हम पोस्टर पर कसी मुट्ठी वाला हाथ बना रहे थे/ सूरज जैसा रंग उठाए कूचियों में…’ (म़ुकदमा)

संग्रह की सभी कविताएं समय और अनुभवों के ताप से तपी हुई लगती हैं। 'गाँव' शीर्षक से लिखी गयी कविता में कवि कहता भी है - ‘वह बूढा आदमी/ अपनी जिंदगी जीकर नहीं बूढा हुआ है/ उसे इस समय ने बूढा कर दिया है..'

 इस संग्रह की कोई भी कविता महज लिखने के लिए नहीं लिखी गई है, बल्कि कवि ने जो देखा-झेला है, उस अनुभूति की अभिव्यक्ति का माध्यम बनी हैं संग्रह की कविताएं। नव-उदारीकरण के कोमल शब्दों की आड़ में जिस तरह साम्राज्यवादी ताकतें आम आदमी को एक लाश में तब्दील कर अपने वैभव की बुलंद इमारत खड़ी करने में लगी हैं, उससे कवि अनजान नहीं है।

कवि को बखूबी मालूम है कि ग्लोबलाइजेशन और ग्लोबल विलेज की हकीकत दरअसल ‘हाट ही सब बिकाय’ की तर्ज पर पूरी दुनिया को बाजार में बदल देने की क्रूर साजिश है -‘जब आप दुनिया को गांव बता रहे हैं/ मेरे गांव की दुनिया उजड़ रही है/ आप कह रहे हैं समूची दुनिया को गांव/ और लोग पूछ रहे हैं/ मेरे गांव का नाम...'

यही नहीं जिस तरह से हिंदुस्तान की बहुधर्मी संस्कृति के ताने-बाने को छिन्न-भिन्न कर धर्म के नाम पर सांप्रदायिक-तानाशाह शक्तियां जनता को गुलाम समझने-बनाने की कोशिश कर रही हैं, कवि उससे भी अनजान नहीं है। और इसीलिए उसका आक्रोश बार-बार अपनी कविताओं में झलक पड़ता है। संग्रह की पहली ही कविता 'वर्तमान परिदृश्य' में इसकी बानगी भी देखने को मिलती है-‘यह जो वर्तमान है/ ताजमहल की ऐतिहासिकता को चुनौती देता हुआ/ इसके परिदृश्य में/ कुछ सड़कें हैं काली कलूटी/ एक दूसरे को रौंदकर पार जाती... इस परिदृश्य में मंदिर है मस्जिद है/ दशहरा और बकरीद है/ आमने सामने दोनों की मिट्टी पलीद है...  यहीं गलत जगह पर उठती हुई दीवार है/ एक भीड़ है उन्मादी/ इसे दंगे का विचार है/ सीड़ और दुर्गंध से त्रस्त/ साढ़े तीन हाथ जमीन पर पसरा इसी परिदृश्य में/ मैं कविता लिख रहा हूं...'

‘खिलाड़ी दोस्त तथा अन्य कविताएं’ की इस पहली ही कविता का तेवर ये बताने के लिए काफी है कि  संग्रह की बाकी कविताएं कैसी होंगी। आज के वर्तमान हालात से कवि केवल व्यथित ही नहीं, आक्रोशित भी है। ये आक्रोश ही उसे चुप नहीं बैठने देता, आवाज उठाने के लिए उकसाता रहता है। इसीलिए कवि कविताओं के माध्यम से इस विवादी समय में न सिर्फ प्रतिरोध के स्वर को बुलंद करते दिखाई देता है , बल्कि लोगों को भी सवाल पूछने के लिए उकसाता नजर आता है कि - ‘कब तक मौन रहोगे/ विवादी समय में पूछना बहुत जरूरी  है/ पूछो तो अब/ यह पूछो कि पानी में अब कितना पानी है/ आग में कितनी आग/ आकाश अब भी कितना आकाश है … पूछो कि नदियों का सारा मीठा पानी/ आखिर क्यों जा डूबता है/ सागर के खारे पानी में/ पूछो...' (पूछो तो...)

सवाल उठाने की बेचैनी इतनी कि कवि आगे बोल पड़ता है -‘देर मत करो पूछो/ आग दिल की बुझ रही है/ धुआं-धुआं हो जाए छाती इससे पहले/ मित्रों ठंड से जमते इस बर्फ़ीले समय में/ आग पर सवाल पूछो/ माचिस तीली की टकराहट की भाषा में... मित्रों उससे इतना जजरूर पूछो कि/ हमारे हिस्से की धूप/ हमारे हिस्से की बिजली/ हमारे हिस्से का पानी/ हमारे हिस्से की चांदनी का/ जो मार लेते हो रोज़ थोड़ा-थोड़ा हिस्सा/ उसे कब वापस करोगे/ मित्रों यह जिंदगी है/ आग पानी आकाश/ बार-बार पूछो इससे/ हमेशा बचाकर रखो एक सवाल/ पूछने की हिम्मत और विश्वास...’

इन कविताओं में जीवन के तमाम रंग हैं, लेकिन विद्रूप समय की मार से धूसर हुए। कविताओं के माध्यम से जिंदगी के रंग चटख करने की बेचैनी दिखती है। कवि सबके लिए समय को एक करना चाहता है, ये जानते हुए भी कि ‘दुनिया की सभी घड़ियां एक सा समय नहीं देती...  हुक्मरान की कलाई पर कुछ बजता है/ मजदूर की कलाई पर कुछ/ अफसरान की कलाई पर कुछ...  और सबसे अलग समय देती है संसद की घड़ी...’

संग्रह की कविताओं को पढ़ते हुए बार-बार लगता है कि ये महज कवि की व्यक्तिगत पीड़ा नहीं, बल्कि आमजन के वे सवाल हैं, जो आज के संवेदनहीन समय में सबके मन में उठ रहे हैं। इस संग्रह में कुल 53 कविताएं हैं, और सारी कविताएं अपने आप में सवाल हैं। व्यवस्था के खिलाफ जनता का सवाल। उस ‘राजा’ पर सवाल जो अपनी मूंछ खोजता रहता है तब, जब अंधेरे में भूख से, दर्द और दुख से बिलबिलाते हम दवा और रोटी खोजते रहते हैं। ‘ घर, सोचो एक दिन, इस बरस फिर, मास्टर साहब, गांधी जी, डरना मत भाई, औरतें, जब डूबने लगती है उजियारी किरन, हमारे गांव की लड़कियां, खिलाड़ी दोस्त...'

संग्रह की तमाम कविताएं व्यवस्था के विरुद्ध आम आदमी के आक्रोश का दस्तावेज बन गई हैं। और दस्तावेज न सिर्फ पढ़ा जाता है, बल्कि संभालकर सुरक्षित भी रखा जाता है, ताकि आगे की लड़ाइयों के लिए हौसला बरकरार रहे। ये संग्रह इसी की मांग भी करता है।


(लेखक पत्रकार हैं उनसे ram_murari@yahoo.co.in  पर सम्पर्क किया जा सकता है.)



Jan 20, 2011

क्या मेरी भी आभा है इसमें...



हमारे चारों तरफ ऐसी लड़कियों की रौनक है जो पीरियड्स और प्रेगनेंसी के मुश्किल दिनों में भी पैड व अन्य चिकित्सीय सुविधाओं के चलते हर मौसम में साल के 365दिन देश-दुनिया नापती फिर रही हैं। लेकिन हममें से कितने लोग जानते हैं कि गणतंत्र के केन्द्र दिल्ली से कुछ सौ किलोमीटर पर एक अलग ही दुनिया है लड़कियों की। उनके पास पीरियड्स के लिए सिर्फ एक-दो कपड़े हैं जिन्हें वे तब तक इस्तेमाल करती हैं जब तक या तो वे धुल-धुलकर फट नहीं जाते या फिर कोई दूसरा उसे उठा नहीं लेता...


गायत्री आर्य

बासठवें गणतंत्र दिवस के जश्न का माहौल चारों तरफ है। स्कूल के बच्चों के नृत्य, झांकियां, एनसीसी के कैडेट और सेनाओं के जवानों की परेड के रिहर्सल...यहां तक कि अत्याधुनिक शस्त्र भी साज-सज्जा में मशगूल हैं। भारत के इतिहास की सबसे महत्वपूर्ण घटनाओं में से एक भारतीय संविधान का बनना और लागू होना।

बासठ साल किसी व्यक्ति, समाज, देश और सभ्यता के जीवन में काफी लंबा और महत्वपूर्ण समय है। संविधान लागू होने की खुशी के जश्न पर साल दर साल करोड़ों रुपया खर्च करना चाहिए या नहीं, यह सवाल बहुत सारे दिलों में है,लेकिन उससे भी अहम सवाल यह है कि हमारा संविधान पूरी तरह से लागू कब होगा? स्त्रियां, बच्चे, दलित, आदिवासी, जाति-जनजाति समूह आज भी संविधान के पूरी तरह से लागू होने के इंतजार में हैं।

असल स्थिति तो यह है कि इन तमाम वंचित और आर्थिक रूप से कमजोर वर्गों के लिए संविधान जैसी कोई चीज है ही नहीं। इस देश की आधी आबादी (जिसे कि आधी भी नहीं रहने दिया जा रहा) के नजरिये से गणतंत्र को देखने की कोशिश कर रही हूं। गणतंत्र की 62वीं वर्षगांठ के उत्सव भरे माहौल में स्त्रियों की स्थिति और उपस्थिति को खोजने की कोशिश कर रही हूं तो त्रिलोचन की पंक्तियां जेहन में आ रही हैं :-

''नए गगन में नया सूर्य जो चमक रहा है/यह विशाल भूखंड आज जो दमक रहा है/ मेरी भी आभा है इसमें!''

लेकिन सवाल यह उठता है कि इस विशाल गणतंत्र की चमक में स्त्रियों की आभा को किसने और कितना स्वीकार किया है? आज भी जिन परिवारों में स्त्रियां सिर्फ घर का काम संभालती हैं उन घरों के बच्चे पारिवारिक परिचय के वक्त यही कहते हैं ''पापा फलां-फलां हैं और मां कुछ नहीं करती!'' यदि ''कुछ नहीं करती?'' सवाल सामने से आए तभी एक खिसियायी सी हंसी के साथ जवाब आता है ''मतलब घर का काम करती हैं।'' अन्यथा जवाब पर्याप्त है ही।

मसलन उम्र के अंतिम पड़ाव में मेरी मां बिना किसी अफसोस के मानती हैं कि उन्होंने जिंदगी भर सिवाय रोटियां थापने के और कुछ नहीं किया है। बावजूद इसके कि उनके पति सिर्फ उनके कारण अपनी प्रोफेसरी बिना किसी बाधा के निभाते रहे। बावजूद इसके कि तीन में से दो बच्चे बिना उनके सबकुछ सहने की प्रवृत्ति, सेवा, स्नेह और अथक परिश्रम के बहुत ऊंचे पदों पर नहीं पहुँच पाते। वे अपने जीवन की उपलब्धि शून्य मानती हैं।

आखिर यह जवान होता गणतंत्र उन असंख्य महिलाओं को यह भरोसा क्यों नहीं दिला पाया कि इस सबसे बड़े लोकतंत्र के स्थायित्व की नींव में उनकी ही सहनशक्ति है...कि दुनिया की दूसरी बड़ी अर्थव्यवस्था के लिए उनका यह अदृश्य श्रम और भी न जाने क्या-क्या बराबर का जिम्मेदार है। इस विशाल गणतंत्र में घरेलू कामकाजी महिलाओं का एक विशाल तबका भला कहां अपनी आभा ढूंढ पाता है? लेकिन सवाल यह है कि क्यों नहीं?

कामकाजी मजदूर  औरतें : नहीं जानती गणतंत्र का मतलब

झुग्गी-झोपडियों, कच्ची बस्तियों, मैली बस्तियों में पापड़ से लेकर खिलौने, छोटे-मोटे पुर्जे, कालीन, कांच के सामान, बीड़ी, माचिस आदि बनाने वाली करोड़ों औरतों के लिए संविधान और गणतंत्र दूसरे ग्रह के शब्द हैं। 24 में से 10-12 घंटे आंखफोडू काम करके भी सिर्फ हजार-दो हजार प्रतिमाह कमाने वाली ये औरतें नहीं जानतीं कि बराबर काम के लिए बराबर मजदूरी जैसा भी कोई कानून है।

वे यह भी नहीं जानती कि विकास दर का क्या मतलब है?....और अर्थव्यवस्था की इस वृद्धि दर का उनके काम से भी कोई संबंध है या नहीं? वे नहीं जानती कि हर रोज होने वाले अरबों-खरबों रुपयों के व्यापार की रीढ़ वे ही हैं। इस देश की समृद्धि, लोकतंत्र के स्थायित्व और गणतंत्र के विकास में उनकी भूमिका के बारे में उन महिलाओं को कभी नहीं बताया गया। आखिर क्यों? क्या इसलिए कि वे कहीं लिंगभेद और गैरबराबरी पर सवाल न उठा दें!...कहीं अपने बराबरी के हक के लिए हड़ताल न कर दें!

कुल खेतिहर काम का लगभग 45.57 प्रतिशत काम करने वाली इस देश की करोड़ों महिलाओं के घरों में आज भी न तो भरपेट खाना है, न ही बेटी के दहेज के पैसे और न ही चेहरे पर पूरे देश का पेट भरने का फख्र। हर साल डॉक्टर  बनकर निकलने वाले लगभग पांच लाख युवाओं, इंजीनियर बनने वाले लगभग आठ लाख युवाओं के चेहरों पर जो अभिमान और फख्र होता है उसका सौंवा हिस्सा भी इन मजदूरिनों, महिला किसानों और गृहणियों के चेहरों पर नहीं होता। क्यों? ये बात अलग है कि ये युवा अपने देश की बजाए पराए मुल्क की तरक्की में काम आते हैं और ये सारी औरतें इस मुल्क की रोटी-रोजी और तरक्की में दिन-रात खपती हैं।

निःसंदेह बहुत सी वजहें हैं जिनके चलते स्त्रियों को भी गणतंत्र दिवस के समारोह में दिल से शामिल होना चाहिए। मसलन, लड़कियों को पढ़ने और बढ़ने के जितने मौके आज मिले हैं पहले नहीं थे। पचास के दशक में जहां महिलाओं की साक्षरता दर 8.86 प्रतिशत तक सिमटी थी, आज उसका ग्राफ 52.67 प्रतिशत तक पहुँच गया है। जिन महिलाओं ने व्यक्तिगत आजादी हासिल की है, वे पहले इसकी कल्पना भी नहीं कर सकती थी।

संपत्ति में बराबरी का हक, दहेज विरोधी कानून, घरेलू हिंसा निरोधक कानून, बाल विवाह पर रोक, सती प्रथा की समाप्ति, लगभग हर क्षेत्र में रोजगार का हक, बराबर काम के लिए बराबर वेतन, हर तरह के शोषणों से निपटने के लिए हमारे हक में बने तमाम तरह के सख्त और नरम कानून। तमाम तरह के धार्मिक फतवों के बावजूद कुछ भी कहने, लिखने, घूमने-फिरने, कहीं भी आने-जाने, कुछ भी पहनने की आजादी और भी बहुत कुछ....

लगभग हर वर्ग की औरतें नौकरी करने और कमाने में लगी हैं। उनकी कमाई पर उनका कितना हक है यह अलग बहस का मुद्दा है, लेकिन मोटामोटी अपने पैसे पर हक न होने के बावजूद भी घर से निकलने और तरह-तरह के काम करने से जो आत्मविश्वास उन्हें मिला है वह किसी भी बाप, भाई या पति की बपौती नहीं है। पितृसत्ता या कोई भी सत्ता औरतों/लड़कियों से उनके हुनर और मेहनत से कमाया हौंसला नहीं छीन सकती।

लेकिन महिलाओं के लिए इतने सारे कानून होने के बावजूद भी हम जीवन के बहुत से क्षेत्रों में खुद को अभी भी बहुत कंगाल पाती हैं। हमारे गणतंत्र ने न सिर्फ लिंगगत, भाषागत, मजहबी, जातिगत, श्रेत्रगत आधार पर भेदभाव बरता है, बल्कि स्त्री-स्त्री के बीच भी भेद किया है। मोबाइल पर बात करती, लाखों का सालाना पैकेज पाती, महंगी गाड़ियों में महंगे लिबासों में आती-जाती, कॉलेज में मनचाही डिग्री लेती, मनचाहा जीवनसाथी और जीवन चुनती लड़कियों का प्रतिशत निःसंदेह काफी बढ़ा है।

हमारे चारों तरफ ऐसी लड़कियों की रौनक है जो पीरियड्स और प्रेगनेंसी के मुश्किल दिनों में भी पैड व अन्य चिकित्सीय सुविधाओं के चलते हर मौसम में साल के 365 दिन देश-दुनिया नापती फिर रही हैं। लेकिन हममें से कितने लोग जानते हैं कि गणतंत्र के केन्द्र दिल्ली से कुछ सौ किलोमीटर पर एक अलग ही दुनिया है लड़कियों की। उनके पास पीरियड्स के लिए सिर्फ एक-दो कपड़े हैं जिन्हें वे तब तक इस्तेमाल करती हैं जब तक या तो वे धुल-धुलकर फट नहीं जाते या फिर कोई दूसरा उसे उठा नहीं लेता।

उनके पास सेनिट्री नैपकिन पहुंचना तो दूर, स्कूल में लड़कियों के लिए टायलेट तक नहीं हैं। पूरे दिन स्कूल में पेशाब रोकने से हुई बीमारियों के लिए क्या यह गणतंत्र खुद को जिम्मेदार (दोषी तो दूर की बात) समझता है? बाल-विवाह पर रोक के तमाम 'कड़े' कानून बने हैं, बावजूद इसके अक्षय तृतीया पर लाखों बाल-विवाह हर साल होते हैं। इसी की बदौलत बचपन में ही मां बनने की अकल्पनीय पीड़ा झेलने वाली बच्चियों के लिए क्या इस समाज और देश में से कोई खुद को दोषी ठहाराता है?

और बच्चियां...जो इस गणतंत्र की आर्थिक रीढ़ को मजबूत करने में अपनी भूमिका निभाती आई हैं, निभाती जा रही हैं, उनके योगदान को खुलकर स्वीकार नहीं किया जाता है। विदेशी पर्यटन को बढ़ाने के लिए निहायत जरुरी मुफ्त और सस्ती सेक्स सेवाओं के लिए इस मुल्क की 14 साल से छोटी लगभग 20-25 प्रतिशत बच्चियां हलाल होती हैं। उनकी गिनती....? खेतों में महिला किसानों द्वारा किये जाने वाले 45.57 प्रतिशत काम का लगभग 20 प्रतिशत काम 14 साल से कम उम्र की बच्चियां ही करती हैं।

कालीन, फुटबाल, माचिस, बीड़ी, अगरबत्ती, जरी, चूड़ियां, आभूषण बनाने वाले कारखानों में काम करने वाली बच्चियों की गिनती इस इकसठ साला गणतंत्र में कहां है? जीवन के दूसरे क्षेत्रों की तरह बाल श्रम में भी बालकों की अपेक्षा बच्चियों ने काम का ज्यादा बोझ उठाया हुआ है। पुरुषों द्वारा किये गए श्रम का 24.74 प्रतिशत हिस्सा जहां बालकों के कंधे ढोते हैं, वहीं बच्चियों ने 46.83 प्रतिशत काम को अपने कच्चे (लेकिन समय से पहले पक गए) कंधों पर उठाया हुआ है। लेकिन जिस देश में करोड़ों मांओं के दृश्य और अदृश्य श्रम की गिनती नहीं, वहां इन छोटी बच्चियों के काम की गिनती भला कैसे होगी?

संयुक्त परिवार में जैसे-जैसे बुजुर्ग की उम्र बढ़ती जाती है, वैसे-वैसे परिवार और समाज में उनका सम्मान और रुतबा बढ़ता जाता है। तमाम तरह के बैर और कलेश होने के बावजूद भारत एक अनोखा संयुक्त परिवार है, उसके जैसा दुनिया में कोई दूसरा देश नहीं है। लेकिन आश्चर्य कि उस परिवार को चलाने वाला 61 साल का बुजुर्ग हमारा संविधान, समय के साथ उतना सम्मान नहीं पा सका है जितने का वह हकदार था। संविधान में दर्ज कानूनों की हेकड़ी से कोई नहीं डरता। देश का लगभग हरेक आदमी संविधान और उसकी सभी धाराओं का वैसे ही मखौल उड़ाता है, जैसे सवर्ण तबका दलितों का, संपन्न वर्ग गरीबों का और पुरुषसत्ता स्त्रियों का!

जैसे इकसठ सालों बाद भी जंगल में रहने के बावजूद जंगल और वहां की जमीन आदिवासियों की नहीं हुई, वैसे ही स्त्रियां भी अपने घरों में अपनी जमीन पर लिंगभेद के कारण बहुत से अधिकारों और सम्मान से अभी भी वंचित हैं। सबसे ताकतवर भारतीय महिलाओं, सबसे अमीर महिलाओं, सबसे ऊंचे ओहदों पर पहुंचने वाली महिलाओं पर लगभग हर रोज किसी न किसी अखबार या पत्रिका में आंकडे छपते हैं। जिसकी मैं आलोचना नहीं कर रही, लेकिन सबसे कम मजदूरी, सबसे ज्यादा उपेक्षा के बावजूद सबसे ज्यादा श्रम करने वाले, सबसे बड़े स्त्री वर्ग के लिए कभी कहीं खबर नहीं आती। कोई सर्वे नहीं होता...आखिर क्यों? क्यों उन्हें कभी भी इन इकसठ सालों में यह अहसास नहीं दिलाया गया कि इस देश के आर्थिक ढांचे की रीढ़ वे ही हैं?

असल में 62वां गणतंत्र हम स्त्रियों/ लड़कियों/ बच्चियों के लिए एक पेंचीदा सी स्थिति बनाए हुए है। स्त्रियों के हक में ढेर सारे कानूनों का अंबार लगाया गया है। पढाई और नौकरी के बहुत सारे विकल्प हमारे सामने खुले हैं। महिलाओं के हित में ढेर सारी लाभकारी योजनाएं बन रही हैं। अपने जीवन के बारे में निर्णय लेने की थोडी़-थोड़ी आजादी हमें मिलने लगी है, लेकिन दूसरी तरफ हमारे व्यक्तित्व के लिए ढेर सारी नकारात्मक चीजों को खतरनाक तरीके से प्रोत्साहन नहीं तो सहयोग तो दिया ही जा रहा है।

भ्रूण  हत्या, दहेज हत्या, बलात्कार, जबरन वैश्यावृत्ति, छेड़खानी, यौन शोषण का तेजी से बढ़ता ग्राफ हमारा जीना नरक बना रहा है। कब, कौन, कहां, कैसे, कोई हमें अपना निवाला बना लेगा, लड़कियां/औरतें इसी डर में जीते हुए आगे बढ़ रही हैं। हमारी दिमागी ताकत का बड़ा हिस्सा इस ‘बचने‘ की जुगत सोचते जाने में ही खर्च हो जाता है। जो दिमाग हम तकनीक, विज्ञान और रचनात्मकता में लगाकर इस देश को और आगे पहुंचा सकते थे वो सिर्फ 'शिकार होने से बचने' में ही खर्च हो जाता है।

यह इस देश और गणतंत्र की बहुत बड़ी 'क्षति' है जिसकी पूर्ति संभव नहीं। भविष्य में इस 'क्षति' से खुद को बचाना और स्त्रियों को उनकी अस्मिता और वजूद का अहसास दिलाना इस 62वें गणतंत्र के लिए बड़ी चुनौती है। ऐसे में निर्मला पुतुल याद आ रही हैं...''धरती के इस छोर से उस छोर तक/ मुठ्ठी भर सवाल लिए मैं/ दौड़ती-हांफती-भागती/ तलाश रही हूं सदियों से/ निरंतर.../अपनी जमीन, अपना घर, अपने होने का अर्थ...''






लेखिका जेएनयू  में  शोधार्थी और स्वतंत्र पत्रकार हैं. उनसे gayatreearya@gmail.com पर संपर्क किया जा सकता है.