Jan 6, 2011

नंदीग्राम,लालगढ़ और नारायण पटना जनसंघर्षों के नये मॉडल - गणपति

माओवादी पार्टी  के महासचिव गणपति के साक्षात्कार की अंतिम किस्त और भाग-4


पार्टी मुख्यतः जनता से सहयोग लेती है और हमारे गुरिल्ला जोन में व्यापारियों से फंड लेती है। हमारे पास एक साफ जनवित्तीय नीति है। क्षेत्र में विभिन्न तरीके का काम करने वाले ठेकेदारों से हमारी पार्टी वाजिब लेवी भी लेती है। इस फंड का एक बड़ा हिस्सा जनसत्ता निकायों द्वारा जनता के कल्याण पर खर्च होता है...गणपति, इस अंतिम किस्त के आलावा भाग-१,भाग-२ और भाग-३ के क्रम में छपे गणपति के ये सभी साक्षात्कार हिंदी में पहली बार सिर्फ जनज्वार पर ही प्रकाशित हुए  हैं.गणपति के भेजे जवाबों का अनुवाद जनज्वार टीम ने किया है.बाकी साक्षात्कारों को पढ़ने के लिए कर्सर नीचे ले जाएँ...




हाल ही में गृह मंत्रालय ने  आरोप लगाया कि आप विदेशों से विशेषकर चीन,म्यांमार और बंगलादेश से हथियार और पैसे प्राप्त कर रहे हैं। वे यह भी आरोप लगा रहे हैं कि उत्तर पूर्व के अलगाववादी संगठनों से आपको सहायता मिल रही है, इस बारे में आपका क्या स्पष्टीकरण है?

हमारी पार्टी को जनता से अलग-थलग करने और उसे एक आतंकवादी और गद्दार संगठन के रूप में चित्रित करने के लिए शासक वर्ग द्वारा हमारे खिलाफ जो मनोवैज्ञानिक युद्ध चलाया जा रहा है, यह दोषारोपण उसी का हिस्सा है। हमारे हथियार मुख्यतः देशी हैं। सभी हथियार हमने मुख्यतः सरकारी सशस्त्र बलों पर हमला करके जब्त किये हैं। दुश्मन यह भलीभांति जानता है कि हथियारों का हमारा मुख्य स्रोत यही है।

हमारी पार्टी विभिन्न राष्ट्रीयता के संघर्षों का समर्थन करती है जो राष्ट्रीयता की मुक्ति के लिए और आत्मनिर्णय के अधिकार चलाये जा रहे हैं। इन संघर्षों का नेतृत्व करने वाले कुछ संगठनों के साथ हमारे राजनीतिक संबंध हैं। हमने अपनी पत्रिकाओं में भी इसके बारे में वक्तव्य जारी किये हैं। व्यापक जनता का प्रतिनिधित्व करने वाली एक क्रांतिकारी राजनीतिक पार्टी के रूप में और भविष्य में सत्ता में आने के बाद इस देश के लिए पूरी तरह जिम्मेदार सरकार का नेतृत्व करने वाली पार्टी के रूप में विश्व में विभिन्न राजनीतिक व्यवस्थाओं वाले देशों के साथ पंचशील सिद्धांत के आधार पर संबंध स्थापित करेंगे।

मौजुदा समय में और भविष्य में भी विश्व के विभिन्न संगठनों और पार्टियों के साथ हम विश्व क्रांति के हित में संबंधों को बनायेंगे। पार्टी कार्यक्रम के जरिये बहुत पहले ही इस नीति की घोषणा कर दी गयी है। जनयुद्ध की जरूरतों को पूरा करने के लिए हम घरेलू और अंतरराष्ट्रीय बाजार में हथियार भी खरीदेंगे। हथियारों का यह हमारा तीसरा और अंतिम स्रोत है। उन देशों से हथियार और पैसा प्राप्त करने के बारे में चिदम्बरम और जीके पिल्लई ने जो दोषारोपण किया है, वह निराधार बकवास है।

वस्तुतः भारत सरकार ही क्रांतिकारी आंदोलन,राष्ट्रीय मुक्ति संघर्षों और लोकतांत्रिक जनांदोलनों को कुचलने के लिए अमेरिका, रूस, फ्रांस जैसे साम्राज्यवादी देशों तथा इजरायल और दूसरे देशों से हथियार, युद्ध सामग्री और आधुनिक तकनीक खरीद रही है। इतनी बड़ी मात्रा में युद्ध सामग्री के साथ भारतीय विस्तारवाद दक्षिण एशियाई देशों के लिए खतरा बनता जा रहा है और यह पाकिस्तान के साथ हथियारों की दौड़ को भी बढ़ावा दे रहा है। क्रांतिकारी आंदोलन का नेतृत्व करने वाले कामरेडों को निशाना बनाने और उनकी हत्या करने का प्रशिक्षण लेने के लिए यहां से अफसरों को कुख्यात गुप्तचर एजेंसियों जैसे मोसाद और सीआईए के पास भेजा जा रहा है। शासक वर्ग और उनकी सेना के उच्च अधिकारी जनता के पैसों को नष्ट कर रहे हैं। विभिन्न सौदों में दलाली के बतौर अरबों रुपये अपनी झोली में भर रहे हैं और देश से गद्दारी कर रहे हैं। प्रत्येक व्यक्ति को इसकी निंदा  करनी चाहिए और इस पर सवाल उठाना चाहिए।

माओवादी नेतृत्व को भारी मात्रा में खनन उद्योगों और दूसरी कारपोरेट कंपनियों से फंड मिल रहा है, इस आरोप पर आपकी क्या सफाई देंगे?

यह भी सरकार द्वारा हमारे बारे में चलाये जा रहे गंदे प्रचार का हिस्सा है। वे यहां तक कहते हैं कि हम सालाना पांच हजार करोड़ रुपये इकट्ठा कर रहे हैं। जीके पिल्लई, पी चिदम्बरम और प्रकाश सिंह लगातार ‘वसूली’ की बात कर रहे हैं। शायद वे दलाली के रूप में हजारों करोड़ रुपये देखने के आदी हो चुके हैं और इसी आदत से मजबूर होकर वे हमारे धन संग्रह को भी इसी अर्थ में देख रहे हैं। जितनी राशि इकट्ठा करने का आरोप हम पर लगता है उसका एक प्रतिशत भी इकट्ठा कर पाते तो हम जनता के लिए बहुत कुछ कर सकते थे।

हमारी पार्टी मुख्यतः जनता से सहयोग लेती है और हमारे गुरिल्ला जोन में व्यापारियों से फंड लेती है। हमारे पास एक साफ जनवित्तीय नीति है। हमारे क्षेत्र में विभिन्न तरीके का काम करने वाले ठेकेदारों से हमारी पार्टी वाजिब लेवी भी लेती है। इस फंड का एक बड़ा हिस्सा जनसत्ता निकायों द्वारा जनता के कल्याण पर खर्च होता है।

जहां तक खनन कंपनियों का सवाल है, हमारी जनता हरसंभव तरीके से उनको हमारे मजबूत क्षेत्र में आने से रोकने के लिए लड़ रही है। हमारी पार्टी इन संघर्षों का नेतृत्व कर रही है। अतः स्पष्ट है कि इन कंपनियों से फंड इकट्ठा करने का सवाल ही नहीं पैदा होता। पुलिस अफसरों, सरकारी अधिकारियों और शासकवर्गीय पार्टियों के लोगों को जो गैरकानूनी तरीके से विभिन्न संगठनों से करोड़ों रुपये इकट्ठा करते हैं,दलाली खाते हैं और अपने पैसों को स्विस बैंक में जमा करते हैं,हमारे खिलाफ उंगली उठाने का कोई नैतिक अधिकार नहीं है।

ईराक और अफगानिस्तान से अमेरिकी सेना की वापसी के संदर्भ में,ओबामा की नीति के बारे में,भारत-अमेरिका परमाणु डील के बारे में और हाल में पास हुए न्यूक्लियर लाइबिलिटी बिल के बारे में आपका क्या मूल्यांकन है? ओबामा की भारत यात्रा को आप कैसे देखते हैं?

ईराक युद्ध को जारी रखने के लिए अमेरिका को सैकड़ों बिलियन डालर खर्च करने पड़े जिससे उसकी अर्थव्यवस्था तबाह हो गयी। इस युद्ध के दलदल में फंसने के कारण हजारों अमेरिकी सैनिक मारे गये हैं। बुश ने बहुत घमंड से कहा था कि वह कुछ महीनों में ही परिस्थितियों पर नियंत्रण पा लेगा, लेकिन वह ऐसा नहीं कर सका। उसकी काफी बेइज्जती हुई। इन कारणों से ओबामा की तो बात ही छोड़िये,बुश को भी बहुत पहले ही सेना वापसी की बात करनी पड़ी थी।
अमेरिका का ईराक पर हमला मानवता के प्रति एक जघन्य अपराध है। वस्तुतः अमेरिका ने वहां कोई बहादुराना युद्ध नहीं लड़ा। अमेरिका एक बहुत बड़ी ताकत है, लेकिन उसने वहां क्या किया? ईराकी शहरों-कस्बों पर लाखों टन बम बरसाये, लाखों इराकियों को मार डाला। वहां तबाही मचायी और दुनिया की सबसे पुरानी सभ्यता, उसकी समृद्ध विरासत, संस्कृति और समाज को नष्ट कर डाला। अतः जिस दिन से ईराक पर कब्जा किया, उसी दिन से अमेरिका को ईराक की मुक्तिकामी जनता, देशभक्तों और विद्रोहियों के प्रतिरोधों का सामना करना पड़ा।

अमेरिकी साम्राज्यवाद ने सद्दाम द्वारा बनाये राज्य सेना, न्याय व्यवस्था, वैधानिक निकाय और प्रशासनिक मशीनरी को पूरी तरह नष्ट कर डाला। अपनी कठपुतलियों को सामने रखकर वह नवऔपनिवेशिक राज्य बनाने में जुट गया। इसने कठपुतली ताकतों के सथ एक नयी शासन व्यवस्था बनायी। इसने सद्दाम और उसके अनुयायियों को तो नष्ट कर दिया,लेकिन जनता और अमेरिका की कठपुतलियों के बीच पैदा हो चुके नये अंतरविरोधों को हल नहीं कर सका। जन प्रतिरोधों को दबाने में भी वे नाकामयाब रहे। ओबामा ने जो सेना वापस बुलाई है उसकी संख्या अभी ईराक में मौजूद संख्या से कम है। हाल ही में जब ईराकी राष्ट्रीय बलों ने बड़े हमले को अंजाम दिया तब अमेरिकी सेना उसकी मदद के लिए ईराक की बैरक से तुरंत बाहर आ गयी।

ओबामा जब सत्ता में आये तो उन्होंने 30 हजार अतिरिक्त सेना को अफगानिस्तान भेजा। अफगान जनता के भीषण विरोध के बीच चुनाव का पाखंड आयोजित किया और अमेरिका की कठपुतली हामिद करजई को जिताया गया। अमेरिकी बमबारी में मरने वाले 90 प्रतिशत लोग सामान्य नागरिक हैं। अमेरिकी नेतृत्व में नाटों की सेना अंधाधुंध तरीके से अफगान जनता को मार रही है। अमेरिकी अत्याचार इतना भयानक है कि उसकी कठपुतली करजई को अपना मुंह खोलने पर बाध्य होना पड़ा। पश्चिमी पाकिस्तान में ड्रोन हमले में वे सैकड़ों आम लोगों को मार रहे हैं।

करजई की सत्ता शहरों तक सीमित है। अफगान जनता अपने पूरे इतिहास में किसी भी घुसपैठिये के शासन के आगे नहीं झुकी है। सारी मुसीबतों का सामना करते हुए जनता ने अपनी जमीन पर से साम्राज्यवादियों और कब्जा करने वालों को भगा दिया है। ठीक रूसी साम्राज्यवादियों की तरह अमेरिकी साम्राज्यवाद के लिए भी अफगान राजनयिक कब्र साबित होगी। ओबामा भी बुश की ही राजनयिक नीतियों को मध्य और दक्षिण एशिया में लागू कर रहे हैं। चीन को घेरने, अफगानिस्तान में स्थायी बेस बनाने और कैस्पियन समुद्री गैस पर नियंत्रण करके विश्व पर आधिपत्य जमाने की अमेरिकी रणनीति का असफल होना तय है।

यूपीए प्रथम काल के दौरान प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने जनता के कड़े विरोध को नजरअंदाज करते हुए अमेरिका के साथ सिविलियन न्यूक्लियर डील को पास करके यह सिद्ध कर दिया कि वह अमेरिकी साम्राज्यवादियों का एक विश्वस्त सेवक हैं। संसद द्वारा हाल में पास किया गया न्यूक्लियर लाइबिलिटी बिल और कुछ नहीं,इसी चाकरी की निरंतरता है। भोपाल गैस कांड में हजारों लोगों की भयानक तरीके से जान गयी और भोपाल के हजारों लोगों के लिए यह एक बड़ी दुर्घटना साबित हुई। भारत की जनता के दिलादिमाग में यह जख्म आज भी निरंतर टीस रहा है और अब यूपीए सरकार ने बेशर्मी के साथ इस बिल को तैयार करने की जुर्रत की है जिसमें अनेक ऐसे ‘भोपाल की संभावना बढ़ गयी है।

इस बिल ने यह सुनिश्चित कर दिया है कि यदि ऐसे जनसंहार होते हैं तो इसके लिए जिम्मेदार विदेशी पूंजीपतियों को न्यूनतम जिम्मेदारी से भी मुक्त कर दिया जाये। (जैसा कि वारेन एण्डरसन और डो केमिकल के मामले में हुआ।)जहां भारतीय जनता पार्टी ने यूपीए सरकार को इस बिल को पास कराने में मदद की वहीं अपने आपको कम्युनिस्ट कहने वाली वाम पार्टियों ने एक बार फिर अपना समझौतावादी चरित्र बेनकाब किया। उन्होंने इस विश्वासघाती बिल की दृढ़तापूर्वक मुखालफत नहीं की और इसके खिलाफ जनांदोलन शुरू नहीं किया। ओबामा के आने से पहले इस बिल को पास कराने में मनमोहन सिंह ने कड़ी मेहनत की।

अमेरिकी साम्राज्यवाद पूरे विश्व में गरीब देशों को लूट रहा है। शोषित राष्ट्रीयताओं का दमन कर रहा है और कुख्यात ठगों ओर तानाशाहों को सत्ता में बिठा रहा है। जो देश उसका सहयोग नहीं कर रहे,उन्हें धमका रहा है। किसी भी हद तक जाकर तेल-खनिज और दूसरे प्राकृतिक संसाधनों और स्रोतों को लूट रहा है। अतः यह दुनिया की जनता का दुश्मन नंबर एक है। इसके नेता बराक ओबामा से समूची मानवता को घृणा करनी चाहिए। इसके पूर्ववर्ती जॉर्ज बुश ने पूरी दुनिया से अपने लिए घृणा इकट्ठा की,तब अमेरिकी साम्राज्यवादियों ने बराक ओबामा को इस योजना के साथ पेश किया कि उनके रंग से जनता को धोखा दिया जा सकता है। हालांकि ओबामा बुश की नीतियों का विरोध करते रहे हैं,लेकिन व्हाइट हाउस में घुसने के बाद उनके द्वारा लिये गये सभी निर्णय और नीतियां बुश प्रशासन के अंतिम दिनों तक के निर्णयों और नीतियों की निरंतरता ही है।

वास्तव में जॉर्ज बुश और बराक ओबामा के बीच का अंतर उनके रंग और उनकी पार्टियों के नाम में ही है। विश्व की जनता,शोषित राष्ट्रीयताओं और देश तथा अमेरिका के मजदूर वर्ग के दमन-उत्पीड़न के मामले में इनके बीच कोई फर्क नहीं है। इस तथ्य से बिल्कुल भी इंकार नहीं किया जा सकता है कि इस काले राष्ट्रपति को कुख्यात सफेद अमेरिकी साम्राज्यवादी गिद्धों द्वारा चुना गया है।

भारत के दलाल शासक वर्ग ओबामा का स्वागत पलक-पावड़े बिछाकर कर रहे हैं। ओबामा के स्वागत का मतलब संप्रभुता, स्वतंत्रता, स्वाधीनता, आत्मनिर्भरता, शांति, न्याय और लोकतंत्र के मूल्यों से गद्दारी है। अपने प्यारे देश में ओबामा को आमंत्रित करने का मतलब इसकी युद्धपरक आक्रमणकारी शाषक और आधिपत्य वाली नीतियों की चाकरी है। अतः भाकपा (माओवादी)की केंद्रीय कमेटी की तरफ से मैं समूची जनता,क्रांतिकारी और जनवादी संगठनों तथा भारत की सभी देशभक्त ताकतों का आह्वान करता हूं कि वे विभिन्न तरीकों से अपना विरोध दर्ज करें और एक स्वर में जोरदार तरीके से ‘ओबामा वापस जाओ’ का नारा लगायें।

अंत में, 2007 में हुई एकता कांग्रेस के बाद सफलता और असफलता का मूल्यांकन आप कैसे करते हैं?

जनवरी 2007 में हमारी एकता कांग्रेस हुई। इसने मुख्य, तात्कालिक और केंद्रीय कार्यभारों को हाथ में लिया-पूरे देश में जनयुद्ध को तेज करना, गुरिल्ला युद्ध को चलायमान युद्ध में बदलना और आधार क्षेत्र की स्थापना के उद्देश्य से पीएलजीए को पीएलए (नियमित सेना) में बदलना। इसी के तहत हमारी कांग्रेस ने हमें कई कार्यभार दिये। जैसे कि जनसंघर्षों को तेज करना, आंदोलन को फैलाना, संयुक्त मोर्चा बनाना और उसे मजबूत करना। पिछले साढ़े तीन सालों में हमारी समूची पार्टी अपने आपको जनता के बीच मजबूती से जमाते हुए हरसंभव तरीके से इन कार्यभारों को पूरा करने के लिए लड़ी।
इस प्रक्रिया में हमें कुछ महत्वपूर्ण सफलतायें हासिल हुईं। हमें कुछ गंभीर असफलताओं का भी सामना करना पड़ा। हमें कई मूल्यवान अनुभव हासिल हुए। हमने कुछ मजबूत सबक सीखे। कुल मिलाकर जब हम अपनी सफलताओं की ओर देखते हैं तो हम निश्चित रूप से कह सकते हैं कि इन सफलताओं के द्वारा भारतीय क्रांति को विजयपथ पर आगे बढ़ाने के लिए जरूरी बुनियाद अधिक मजबूत हुई है।

पिछले साढ़े तीन वर्षों में हमारे देश के कई हिस्सों में हमारी पार्टी के नेतृत्व में जनसंघर्षों का विस्फोट हुआ है। विशेषकर दण्डकारण्य, बिहार, झारखण्ड, पश्चिम बंगाल, ओडीशा, महाराष्ट्र और आंध्र प्रदेश में जनता और विदेशी कंपनियों द्वारा की जा रही उनके संसाधनों की लूट के खिलाफ और विशेष तौर पर आदिवासियों के विस्थापन के खिलाफ व्यापक स्तर के संघर्षों में शामिल हुई है। भारतीय शासक वर्ग ने सलवा जुडूम,सेन्द्रा,नागरिक सुरक्षा समिति और हरमदवाहिनी जैसे गुण्डा गैंग खड़े कर लिये हैं और जनता पर भयानक हिंसा और अत्याचार बरपा रहे हैं। इसके बावजूद जनता हमारी पार्टी के नेतृत्व में और पीएलजीए के समर्थन से बहादुराना संघर्ष चला रही है।

कलिंगनगर, सिंगुर, नंदीग्राम, लालगढ़, नारायण पटना, दुमका, पुलावरम, लोहानदिगुदा, रावघाट, पलमाड़ और कई दूसरी जगहों की जनता बड़े पैमाने पर लामबंद हुई है और संघर्षों में शामिल हुई है। नंदीग्राम,लालगढ़ और नारायण पटना जनसंघर्षों के नये मॉडल के रूप में सामने आये हैं। राजनीतिक मुद्दों पर हमने जिन विभिन्न कार्यक्रमों को अपने हाथ में लिया उसमें हमने लाखों जनता को लामबंद किया। विभिन्न राज्य विधानसभाओं और संसद के चुनाव का बहिष्कार करने वाले हमारे राजनीतिक कार्यक्रमों का जनता ने बड़े उत्साह के साथ स्वागत किया। हमारे आंदोलन के इलाके में बड़ी संख्या में जनता ने चुनावों का बहिष्कार किया और जन राजनीतिक सत्ता की जरूरत को मजबूती के साथ स्थापित किया।

वर्ष 2009के मध्य से केंद्र और राज्य सरकारों के बीच समन्वय द्वारा चलाये जा रहे आपरेशन ग्रीनहंट के तहत जनता का नरसंहार किया गया है। इसके बावजूद दण्डकारण्य, बिहार, झारखण्ड, पश्चिम बंगाल, उड़ीसा और आंध्र प्रदेश में हजारों की संख्या में शोषित जनता,विशेषकर आदिवासियों और महिलाओं ने राज्य दमन के खिलाफ विभिन्न कार्यक्रमों और राजनीतिक मुद्दों पर हुए कार्यक्रमों में हिस्सेदारी की।

दूसरी महत्वपूर्ण विजय साम्राज्यवादियों के सहयोग से चलने वाले सामंती दलाल,नौकरशाह बुर्जुआ राज्य व्यवस्था के विकल्प के रूप में जनता की जनवादी राजनीतिक सत्ता का प्राथमिक स्तर पर विकास और उसकी मजबूती तथा फैलाव है। दण्डकारण्य और बिहार-झारखण्ड के हमारे मुख्य गुरिल्ला जोनों में क्रांतिकारी जन कमेटी (आरपीसी) गठित हो चुकी है और अपना काम कर रही है। वे मजबूत हो रही हैं और उनका फैलाव हो रहा है। हमारे देश के राजनीतिक परिदृश्य पर अभी-अभी आये लालगढ़ और  नारायणपटनम में दुश्मन के क्रूर हमलों के बीच में जनता के विकास को केंद्र में रखते हुए प्राथमिक स्तर पर जनसत्ता के जो निकाय गठित हुए हैं,उन्होंने हमारे देश की जनता का ध्यान अपनी तरफ खींचा है।

उन्होंने स्थानीय शोषक वर्गों के शासन को उखाड़ फेंका है और प्राथमिक स्तर पर जन शासन चला रहे हैं। ये राजनीतिक सत्ता के निकाय, जनता के वास्तविक विकास के उद्देश्य के साथ-साथ शिक्षा, स्वास्थ्य, सफाई, जनव्यवस्था और विकास के क्षेत्र में काम कर रहे हैं। देशभर की शोषित जनता,जनवादी संगठनों और बुद्धिजीवियों के लिए ये महान प्रेरणा के स्रोत हैं। ये जनता की सही वैकल्पिक व्यवस्था के रूप में सामने आ रहे हैं। शोषकों के झूठे विकास के मॉडल के उत्तर के रूप में ये नये राजनीतिक सत्ता निकाय जनता के सच्चे विकास के मॉडल के रूप में सामने आ रहे हैं।

पिछले साढ़े तीन सालों में गुरिल्ला युद्ध तेज हुआ है और उच्चतर स्तर पर जारी है। शोषक वर्गों के हितों को पूरा करने के लिए जनता पर अंतहीन अत्याचार और हिंसा करने वाली पुलिस,अर्धसैनिक बल और कमांडो बलों पर हमारे जन गुरिल्लाओं ने बहादुराना हमले किये हैं। हमारे गुरिल्लों ने भाड़े की इन सेनाओं के सैकड़ों लोगों को खत्म किया है। इनसे सैकड़ों आधुनिक हथियार जब्त करते हुए अपने आयुध भंडार को समृद्ध किया है।

हमारे नेतृत्व में चलने वाले गुरिल्ला युद्ध ने जनता को प्रेरित किया है और उसे आत्मबल प्रदान किया है। प्राथमिक स्तर पर विकसित हो रही जन राजनीतिक सत्ता की रक्षा करते हुए और जनता के जीवन एवं उसकी संपत्ति की रक्षा करते हुए हमारी जनसेना जनता के वास्तविक रक्षक के रूप में उभरकर सामने आयी है। यद्यपि दुश्मन कई दमनात्मक अभियान चला रहा है, लाखों पुलिस और अर्धसैनिक बलों को नियुक्त कर कारपेट सुरक्षा लागू कर रहा है और लगातार हमले कर रहा है,इसके बावजूद जनता के सक्रिय सहयोग से हमारी पीएलजीए और अधिक तेजी से विकसित हो रही है।

विशेष तौर से जब हम एकता कांग्रेस के बाद के समय पर नजर डालते हैं तो देश के राजनीतिक परिदृश्य पर एक बड़े वैकल्पिक राजनीतिक ताकत के रूप में हमारी पार्टी का विकास एक दूसरी महत्वपूर्ण सफलता है। जनता इस बात को ज्यादा से ज्यादा समझने लगी है कि हमारी राजनीतिक लाइन सही है। आज देश के सामने जो ढेर सारी समस्यायें हैं, उसके बारे में हमारी अवस्थिति और समाधानों के बारे में हमारे देश के नागरिक ज्यादा से ज्यादा रुचि दिखा रहे हैं। पिछले 63वर्षों से जनता विभिन्न शोषक-शासक वर्गीय पार्टियों,हिंदू धार्मिक अंधराष्ट्रवादियों और स्वयं को वाम पार्टी कहने वाले संशोधनवादियों की दीवालिया राजनीति से निराश हो चुकी है। अब यह स्पष्ट देखा सकता है कि जनता पहले की तुलना में कहीं तेजी के साथ माओवादियों की राजनीति से प्रभावित हो रही है और उसके करीब आ रही है। हमें विश्वास है कि इससे भविष्य में एक मजबूत व्यापक और देशव्यापी संयुक्त मोर्चे का मार्ग प्रशस्त हुआ है।

इन सफलताओं के साथ हमें कुछ गंभीर असफलताओं और नुकसानों का भी सामना करना पड़ा है। दुश्मन के हमले में नेतृत्वकारी ताकतों को खोने से हमें गंभीर नुकसान हुआ है। हमारी पार्टी कांग्रेस के बाद बड़ी संख्या में हमारी केंद्रीय कमेटी के सदस्य दुश्मन द्वारा पकड़े गये हैं और या तो उन्हें झूठी मुठभेड़ों में मार दिया गया है या फिर जेलों में डाल दिया गया है। अपना लक्ष्य प्राप्त करने में हमारे सामने यह एक बड़ा अवरोध है। निस्संदेह भारतीय इंकलाब पर इसका गहरा असर पड़ा है।

दुश्मन के गंभीर आक्रमण के कारण इसे अच्छी तरह से समझने में हमारी असफलता के कारण और उचित प्रतिकार्यनीति बनाकर इसे लागू करने में हमारी असफलता के कारण हम कुछ नीतियों में कमजोर पड़े और कुछ जगहों से हमें पीछे हटना पड़ा।

इसी बीच हमारे देश में मजदूर वर्ग की जीवन स्थितियां लगातार खराब होती जा रही हैं। किसान अपने ऊपर सामंती और साम्राज्यवादी शोषकों द्वारा जारी नीतियों के कारण लगातार निर्धन होता जा रहा है और लाखों की संख्या में आत्महत्यायें कर रहा है। नई नीतियों के नाम पर शिक्षा, स्वास्थ्य, उद्योग, रक्षा, यातायात, मीडिया, व्यापार आदि क्षेत्रों में विदेशी पूंजी की घुसपैठ काफी बढ़ चुकी है। साम्राज्यवादियों का शोषण, दमन और नियंत्रण 1947 के बाद से अभूतपूर्व स्तर तक बढ़ चुका है।

कश्मीर और उत्तर पूर्व की जनता,जो अलग होने के अधिकार सहित आत्मनिर्णय के अधिकार तथा अपनी राष्ट्रीय मुक्ति के लिए लड़ रही है,पर भी भीषण दमन जारी है। अमेरिकी साम्राज्यवादियों के साथ मिलकर भारतीय विस्तारवाद जिन नीतियों का अनुसरण कर रहा है उसके कारण दक्षिण एशिया की जनता उससे अत्यधिक नफरत करती है। दलित, आदिवासी, महिलाओं और धार्मिक अल्पसंख्यकों का सामाजिक रूप से सबसे दमित तबका आज विभिन्न तरह की समस्यायें झेल रहा हे।

जब हम इन सारी समस्याओं का आकलन करते हैं तो यह ज्यादा से ज्यादा साफ होता जाता है कि हमारे देश में सभी बुनियादी अंतरविरोध ज्यादा से ज्यादा तीखे होते जा रहे हैं। जैसे सामंतवाद और व्यापक जनता के बीच का अंतरविरोध, साम्राज्यवाद और भारतीय जनता के बीच का अंतरविरोध, पूंजी और श्रम के बीच का अंतरविरोध और शासक वर्गों के बीच का अंतरविरोध। हमारी पार्टी जनता की समस्याओं को उठाते हुए लगातार आगे बढ़ रही है। हमारी राजनीतिक लाइन इन समस्याओं के समाधान पर जोर देती है।

हमारा विश्वास है कि भारतीय क्रांतिकारी आंदोलन, आधार क्षेत्र की स्थापना के उद्देश्य से हमारी जनसेना को मजबूत करते हुए और सर्वहारा के नेतृत्व में इन सारी ताकतों को संयुक्त मोर्चे में गठित करते हुए, हमारी पार्टी के नेतृत्व में चलाये जा रहे जनयुद्ध के रास्ते से ही विजय पथ पर आगे बढ़ेगा। हमारा यह भी विश्वास है कि इसका भविष्य इस बात पर निर्भर करता है कि यह प्रक्रिया कैसे आगे बढ़ेगी। कुल मिलाकर हम भारतीय क्रांतिकारी आंदोलन के भविष्य के प्रति बहुत आशान्वित हैं।

हमारी पार्टी हमारे देश की शोषित जनता के लिए आशा की मशाल का काम कर रही है। इस पतनशील और भ्रष्ट व्यवस्था के बीच हमारी पार्टी एक चमकदार तारे की तरह चमक रही है। हम यह नहीं कहते कि हमारे पास विश्व क्रांति और भारतीय क्रांति में मौजूद जटिलताओं का पहले से तैयार समाधान मौजूद है,लेकिन हमारे पास एक सही राजनीतिक लाइन है। हमें विश्वास है कि हम समाजवाद और साम्यवाद की तरफ पहले कदम के रूप में नवजनवादी क्रांति को सफलतापूर्वक संपन्न करने की प्रक्रिया में इन सभी समस्याओं को हल कर सकते हैं। हमारा विश्वास है कि समाज के सामने मौजूद सभी समस्याओं को माक्र्सवाद-लेनिनवाद-माओवाद की रोशनी में हल किया जा सकता है।

(समाप्त)








Jan 4, 2011

जनता के लिए सीपीएम अभी 'शेर' है तो ममता बनर्जी 'भालू' - गणपति


भाग- 3

असंभव है दमन दबाव और वार्ता एक साथ,  नया संविधान निर्माण,जनता का लोकतान्त्रिक अधिकार, के बाद अब साक्षात्कार का यह तीसरा भाग भी माओवादी पार्टी के महासचिव गणपति के उन जवाबों की प्रस्तुति है जो पत्रकारों के एक समूह ने सवाल भेजकर उनसे पूछा था.भाग-1,भाग-2और अब भाग तीन,ये सभी साक्षात्कार हिंदी में पहली बार सिर्फ जनज्वार पर प्रकाशित हो  रहे हैं,जिसका अनुवाद जनज्वार टीम ने किया है

वर्तमान में ऐसा दिखता है कि आपका आंदोलन सुदूर जंगली और आदिवासी क्षेत्रों में सिमटा हुआ है। शहरी क्षेत्रों के युवाओं की भी भर्ती नहीं हो रही है, जैसा कि अतीत में हुआ है। कुछ लोग सोचते हैं कि आप कभी भी शहरी क्षेत्रों जैसे गुड़गांव में वैसे विस्तार नहीं कर पायेंगे जैसे गिरीडिह(झारखंड) में किया है?

विलय के बाद कुछ क्षेत्रों में हम मजबूत हुए हैं,जबकि कुछ क्षेत्रों में कमजोर। जिन क्षेत्रों में हम कमजोर हुए हैं उनमें कुछ मैदानी क्षेत्र हैं और कुछ शहरी। जिन क्षेत्रों में हम मजबूत हुए हैं उनमें कुछ सुदूरवर्ती क्षेत्र हैं और कुछ मैदानी। दीर्घकालिक युद्ध में ऐसे उतार-चढ़ाव अपरिहार्य हैं। यह सच नहीं है कि हम शहरी क्षेत्रों और मैदानी क्षेत्रों से पूरी तरह खत्म हो चुके हैं जैसा कि कुछ लोग प्रचार कर रहे हैं या कुछ दूसरे इस पर भरोसा कर रहे हैं। जैसा कि मैंने पहले कहा है विश्व में भारत उन कुछ देशों में से है जहां माओवादी आंदोलन जारी है। साम्राज्यवादी और हमारे देश के शासक वर्ग मिलकर हमारे आंदोलन का दमन करने के लिए हमला तेज कर रहे हैं। जब वे इतना केंद्रित होकर हम पर हमले करते हैं तो हमें नुकसान उठाना पड़ता है और हमने नुकसान उठाया।

यह समस्या का महज एक पहलू है। शहरी क्षेत्रों में हमें कई अनुभव हासिल हुए। शहरी कामकाज के बारे में हमने अपनी नीति को समृद्ध किया। हमने अपने देश और दुनिया में होने वाले आर्थिक-राजनीतिक बदलाओं का अध्ययन किया और उसके अनुसार कार्यक्रम सूत्रबद्ध किया। कम्युनिस्ट कभी भी अपनी आत्मगत इच्छा से काम नहीं करते। समाज में वस्तुगत परिस्थितियों का अध्ययन करते हुए वे काम करते हैं। हमें जो भी सकारात्मक और नकारात्मक सबक हासिल हुए हैं, उस पर निर्भर होकर हम क्षति से उबरने का प्रयास कर रहे हैं।

इस समस्या का दूसरा पहलू यह है कि दुश्मन के हमलों में हमें जरूर कुछ नुकसान उठाना पड़ता है, लेकिन दूसरी तरफ उनके दमन अभियानों, उनकी साम्राज्यवादपरस्त नीतियों और उनकी जनविरोधी कार्रवाइयों के कारण वे जनता से ज्यादा अलगाव में पड़ते जा रहे हैं। इसका मतलब ये है कि वे खुद ऐसी परिस्थितियां तैयार कर रहे हैं कि जनता उनके खिलाफ हो जाये। यह सही है कि वर्तमान में हम 1970-19के दशक की भांति मजदूरों,छात्रों, बुद्धिजीवियों को लामबंद करने में सफल नहीं हो पा रहे हैं। उन परिस्थितियों में कुछ महत्वपूर्ण बदलाव हो चुके हैं। उन क्षेत्रों में जहां दुश्मन मजबूत है,काम करना बेहद जटिल हो चुका है और ट्रेड यूनियन आंदोलन में जहां संशोधनवादियों ने अपनी जड़ें गहरायी से जमायी हुई हैं, में भी काम करना बेहद जटिल है।

यह सिर्फ भारत की बात नहीं है,यह परिस्थिति समूचे विश्व में है। लेकिन क्रांतिकारी इससे जरूर उबरेंगे। इस देश को मुक्त करने के लिए हमें किसानों को संगठित करने पर ध्यान देना चाहिए। वर्तमान में हम किसानों के बीच अपने आंदोलन को मजबूत करेंगे और निश्चित तौर पर शहरी क्षेत्रों में विस्तारित होंगे। दूसरी तरफ यह किसान आंदोलन शहरी जनता को प्रेरित करेगा और उन पर अत्यधिक प्रभाव डालेगा। अतः जब हम मैदानी क्षेत्र की व्यापक किसान आबादी को संगठित कर लेंगे तब कस्बे और शहर की जनता इससे अछूती नहीं रहेगी।

आज हमारे देश के मजदूर फिर से उन्हीं परिस्थितियों का सामना कर रहे हैं जो उन्नीसवीं सदी के मजदूरों ने यूरोप में झेली थीं। ज्यादातर मजदूर ठेका मजदूर और अस्थायी मजदूर में तब्दील हो रहे हैं। उन्हें 12से 16घंटे तक भयानक परिस्थितियों में काम करने पर बाध्य किया जा रहा है। सरकार साम्राज्यवादी शोषण को तेज करने के लिए सभी मजदूर कानूनों को बदल रही है। मजदूरों के परिवार उनके लिए बैरकों में गुलामों की तरह रहने को बाध्य हैं। सारी चीजों का पुनर्गठन किया जा रहा है। दुश्मन इस बात से खुश है हो सकता है कि उसने हमें काफी नुकसान पहुंचाया, लेकिन तकलीफ झेल रही जनता उसके खिलाफ विभिन्न रूपों में लड़ रही है। हमारी पार्टी निश्चित ही इन संघषों का बहादुरी और दृढ़ता के साथ नेतृत्व करेगी। सर्वहारा और शहरी जनता के तूफान की तरह उठ खड़े होने और इस शोषणकारी व्यवस्था को नष्ट कर देने के लिए सभी जरूरी परिस्थितियां धीरे-धीरे परिपक्व हो रही हैं।

भारत सरकार दूसरी पीढ़ी के एलपीजी(लिबरलाइजेशन प्राइवेटाइजेशन ग्लोबलाइजेशन)सुधारों को लागू कर चुकी है और अब तीसरी पीढ़ी के सुधारों को लागू करने जा रही है। इसके तहत यह साम्राज्यवादी पूंजी की जरूरतों के अनुसार शिक्षा नीति में बहुत से परिवर्तन करने जा रही है। शिक्षा नीति में शासक वर्ग द्वारा साम्राज्यवाद निर्देशित परिवर्तनों को लागू करने की पृष्ठभूमि में, शिक्षा के अवसर मजदूर वर्ग, किसान, आदिवासी, दलित और धार्मिक अल्पसंख्यक परिवारों से आने वाले गरीब बच्चों और महिलाओं के लिए कम होते जा रहे हैं।

वर्तमान में शिक्षा का मतलब मुख्यतः कारपोरेट आधिपत्य वाली शिक्षा है। यह शिक्षा व्यवस्था मुख्यतः घरेलू और विदेशी कारपोरेशनों के हितों की सेवा करती है। इससे एक तरफ छात्र, अध्यापक,अभिभावक और दूसरी तरफ शासक वर्ग के बीच गहरी खायी बनने लगी है। बहुत जल्द यह विस्फोटक रूप ले लेगा। हमारी पार्टी इसके अध्ययन और इसका नेतृत्व करने की आवश्यकता महसूस करती है। हम इस मामले में जो भी संभव होगा करेंगे।

खुदरा बाजार में साम्राज्यवादी पूंजी को अनुमति देने के कारण और आर्थिक संकट से उबरने के लिए साम्राज्यवादियों और कारपोरेट कंपनियों की हमारे देश की अर्थव्यवस्था पर बढ़ती पकड़ के कारण शहरी क्षेत्रों में बहुत से छोटे व्यापारी और छोटे तथा मध्यम पूंजीपति दीवालिया हो चुके हैं। शहरों के सौंदर्यीकरण के नाम पर स्लम को खाली कराया जा रहा है और मध्यवर्गीय जनता को उपनगरीय क्षेत्रों में खदेड़ा जा रहा है। मजदूर वर्ग और स्लम में रहने वाली जनता की स्थिति बदहाल है। इन लोगों के बीच बहुत से ऐसे लोग हैं जो हमारे आंदोलन वाले क्षेत्रों से इन शहरों में चले गये हैं। हम इन सभी परिघटनाओं का अध्ययन कर रहे हैं और उचित कार्यनीति के साथ इनके बीच काम करने का प्रयास कर रहे हैं।

गांव और बड़े शहरों के बीच सभी तरह की धन संपदा गरीब ग्रामीण इलाके के लोग पैदा करते हैं। गरीब दलित और आदिवासी मजदूर अपना खून-पसीना जलाकर भारतीय और विदेशी कारपोरेट प्रभुओं के लिए बड़े महल और बुनियादी ढांचे का निर्माण करते हैं। शॉपिंग माल और कंपनियों में काम करने वाले मजदूरों और कर्मचारियों का बहुमत ग्रामीण क्षेत्रों से ही आता है। चाहे सामाजिक-आर्थिक-सांस्कृतिक संबंधों के अर्थ में बात करें या आंदोलन के संबंधों के अर्थ में,गांव और शहर एक दूसरे से अलग-अलग दो द्वीप नहीं हैं। दोनों परस्पर एक दूसरे को प्रभावित करते हैं। यह हमारे विस्तार के लिए एक मजबूर आधार का निर्माण कर रहा है। अतः यह कहना हास्यास्पद और अवास्तविक बात होगी कि हम शहरी क्षेत्रों तक कभी भी विस्तार नहीं कर सकेंगे। यदि पहले ग्रामीण क्षेत्र अपने आपको मुक्त कर लेते हैं तब इसकी मजबूती पर निर्भर होकर और शहरी क्षेत्रों में मजदूर वर्ग के संघर्षों द्वारा, बाद में शहर भी अपने आपको मुक्त कर लेंगे। शहरों की मुक्ति के साथ ही हमारे देश से दलाल बुर्जुआ शासन और साम्राज्यवादी नियंत्रण भी खत्म हो जायेगा।


सीपीआईएम पार्टी बार-बार यह आरोप लगाती रही है कि तृणमूल कांग्रेस और माओवादियों के बीच सांठ-गांठ हैं। ममता बनर्जी ने आजाद की हत्या पर न्यायिक जांच की भी मांग की थी?


हम इस बात से कतई आश्चर्यचकित नहीं हैं कि ममता बनर्जी ने आजाद की हत्या के बारे में न्यायिक जांच की मांग की है। बंगाल के राजनीतिक हालात से जो भी परिचित है उसे आश्चर्य नहीं होगा। जनवादी संगठन, जाने-माने लोग तथा कई जनसंगठन न्यायिक जांच की मांग कर रहे हैं और कह रहे हैं,आजाद के हत्यारों पर मुकदमा चलना चाहिए और उन्हें सजा दी जानी चाहिए। यह मांग जनता की आकांक्षा का परिचायक है। इसे ध्यान में रखते हुए ही ममता ने न्यायिक जांच की मांग की है। जाहिर है आजाद के लिए ममता के दिल में कोई सम्मान या सहानुभूति क्यों होगी?


वे कौन लोग हैं जो यह महसूस करते हैं कि आजाद को बहुत ही अन्यायपूर्ण तरीके से मार डाला गया। केवल जनता है जो यह सोचती है कि आजाद जिस राजनीतिक उद्देश्य के लिए लड़ रहे थे वे न्यायपूर्ण हैं। जो सच्चे जनवाद के लिए प्रतिबद्ध हैं तथा उसका समर्थन करते हैं सिर्फ वही उनकी हत्या की गंभीरतापूर्वक निंदा करते हैं। दूसरे लोग,इसकी निंदा विभिन्न कारणों से कर सकते हैं। ममता भी उनमें से एक है। वे अपने हित में ऐसा करते हैं। हालांकि ममता ने यह मांग सीपीएम के साथ चल रहे उनके संघर्षों और आने वाले चुनाव को ध्यान में रखकर किया है, फिर भी यह मांग स्वागत योग्य है। उनकी यह मांग कुछ हद तक जनता के संघर्षों में मददगार होगी।


इसके अलावा पिछले पंद्रह या उससे अधिक वर्षों से तृणमूल और सीपीएम के बीच गंभीर संघर्ष चल रहा है। कभी-कभी कुछ जगहों पर यह सशस्त्र संघर्ष का एक रूप भी ले लेता है। सीपीआईएम ने हरमदवाहिनी जैसे सशस्त्र सामाजिक फासीवादी गैंग का निर्माण किया है और तृणमूल, माओवादियों, जनवादियों तथा जनता को दबाने के लिए उन पर हमले कर रही है। तृणमूल ने सीपीआईएम से लड़ने के लिए हथियार उठा लिये हैं। अतः इन हमलों का मुकाबला करने के लिए और अगले चुनाव में सत्ता में आने के लिए यह स्वाभाविक है कि ममता जनता को आकर्षित करने के लिए कुछ बातें बोलें । हमारे देश में पिछले 30-35 सालों में एक चारित्रिक विशेषता है जो बंगाल की राजनीति में जारी है। वह यह है कि शासक वर्ग एक दूसरे से सशस्त्र संघर्षों में उलझते रहे हैं। ज्यादातर दूसरे राज्यों में ऐसा नहीं है।


शासक वर्गों के बीच यह अंतरविरोध दूसरे राज्यों में दूसरे रूपों में बहुत तीखा है,लेकिन यह सशस्त्र संघर्ष के स्तर पर नहीं है। यह अंतरविरोध नंदीग्राम में प्रकट हुआ और जनता के लिए उपयोगी था। बाद में हुए संसदीय और नगर निगम के चुनाव में तृणमूल ने कहीं ज्यादा सीटें जीतीं। अब आने वाले विधानसभा चुनाव में यह प्रतिस्पर्धा और कठिन होगी;यदि उसे सत्ता में आना है तो उसे इस तरह से बात करने पर बाध्य होना होगा ताकि लगे कि वह जनता की तरफ खड़ी है। जनता जो सीपीआईएम से घृणा करती है, निश्चित रूप से उसे सबक सिखायेगी।


आज बंगाल की समस्त जनता और जनवादी लोग सामने खड़े शेर से बचना चाहते हैं। आज उनके लिए सामने खड़ा वह शेर कहीं ज्यादा खतरनाक है बनिस्पत उनके पीछे खड़े भालू से। लेकिन शेर को भगाने के लिए वे भालू के खतरे से नहीं बच सकते। हमारी पार्टी इस खतरे के बारे में लगातार लोगों को सचेत कर रही है। हम उनसे कहते हैं कि भविष्य में इस भालू को भी भगाना पड़ेगा। उन्हें इस भालू के खिलाफ भी लड़ाई लड़नी होगी। जब तक जनता इन दोनों खतरों से छुटकारा नहीं पा लेती, इनमें से कोई एक जनता के पीठ पर सवारी गांठती रहेगी।


कल यदि ममता बनर्जी सत्ता में आती हैं तो वह सामंतों से जमीन जब्त करके उसे गरीबों में नहीं बांटेंगी और न ही साम्राज्यवादियों और बड़े पूंजीपतियों के उद्योगों को ही जब्त करेंगी। जनता को भी चुनाव में स्वतंत्र तरीके से भागीदारी करने का अवसर नहीं मिलेगा। इसका मतलब यह है कि यदि वह सत्ता में आती हैं तब भी कोई बुनियादी परिवर्तन नहीं होगा। हालांकि सामाजिक फासीवादियों को एक लंबे शासनकाल के बाद यदि तृणमूल सत्ता में आती है तो वह निश्चित तौर पर प्रशासन पर अपनी पकड़ बनाने का पुरजोर प्रयास करेगी। इस समयावधि में चुनाव में किये गये वादों को ध्यान में रखते हुए वह कुछ समय के लिए जनता पर हमले बंद कर सकती है। लेकिन यह अस्थायी ही होगा। बाद में जनता को उनकी सरकार के खिलाफ भी लड़ना पड़ेगा।


हमारी पार्टी का तृणमूल के साथ किसी भी तरह का कोई खुला या गुप्त संबंध नहीं है,लेकिन कुछ मौकों पर शासक वर्ग भी जनता के हित में बात कर सकता है। वे कुछ संघर्ष भी चलाते हैं। हालांकि इन संघर्षों का दायरा बहुत सीमित होता है। ऐसे लोग जब जनता के हित में बात करते हैं तो हमें ठोस तरीके से उनका विश्लेषण करना चाहिए। दुश्मन के बीच अंतरविरोध सर्वहारा के फायदे में होता है। ठोस परिस्थितियों पर निर्भर होते हुए हमारी पार्टी इन चीजों पर अपनी अवस्थिति साफ करती रहती है।


हमारी पार्टी आंख मूंदकर न तो समर्थन करती है,न ही विरोध। लेकिन जनता को उनकी वर्ग प्रकृति तथा उनकी राजनीतिक-आर्थिक नीतियों को गंभीरतापूर्वक समझने का प्रयास करना चाहिए और उनके बारे में कोई भी भ्रम नहीं पालना चाहिए। यदि ऐसा भ्रम है तो यह हमारी पार्टी का एक कार्यभार होगा कि हम उन्हें इससे बाहर निकालें। जब हमारी अवस्थिति इतनी साफ है तो यह कहना उचित नहीं है कि हमारा ममता की पार्टी से कोई संबंध है और हम उसे औचित्य प्रदान कर रहे हैं।



कश्मीर में हाल में आये जनउभार और सरकारी सशस्त्र बलों द्वारा उनसे निपटने के तरीकों पर आपकी पार्टी की क्या प्रतिक्रिया है, कश्मीर समस्या का आपके पास क्या समाधान है?


कश्मीर की जनता पिछले साठ वर्षों से अपनी स्वाधीनता और आत्मनिर्णय के अधिकार के लिए लड़ रही है। इस संघर्ष को दबाने के लिए भारत सरकार उन पर लगातार अत्याचार,नरसंहार और हिंसा चला रही है। अस्सी हजार से ज्यादा कश्मीरी मारे जा चुके हैं। हालांकि भारतीय शासक वर्ग यह दावा कर रहा है कि उसने मिलिटेन्सी को समाप्त कर दिया है, कश्मीरी जनता अनेक अवसरों पर लहरों की तरह उठ खड़ी हो रही है।


हाल ही में 11 जून से शुरू हुए विरोध प्रदर्शनों में सौ से ज्यादा कश्मीरी युवक पुलिस, अर्धसैनिक बलों और सेना की गोलियों से मारे गये हैं। सात लाख सेना और अर्धसैनिक बलों की तैनाती से कश्मीर पूरे विश्व में सबसे अधिक सैन्यीकृत क्षेत्र में तब्दील हो चुका है। हमारी पार्टी मजबूती के साथ कश्मीरी जनता के न्यायपूर्ण आंदोलन का समर्थन करती है। आजादी और आत्मनिर्णय के अधिकार की उनकी मांग पूरी तरह न्यायोचित है। कश्मीर कश्मीरियों का है। यह कभी भी भारत का अविभाज्य अंग नहीं रहा है। भारत और पाकिस्तान का इस पर कोई अधिकार नहीं है। हमारी पार्टी गंभीरतापूर्वक कश्मीरी जनता पर हो रहे भयानक दमन की भत्र्सना करती है। भारतीय जनता को कश्मीर में जारी सरकारी नरसंहार की एक स्वर से निंदा करनी चाहिए। हमारी पार्टी का यह साफ कहना है कि बिना यह किये भारत की संघर्षरत जनता पर शासक वर्गों के क्रूर हमलों का प्रभावी तरीके से मुकाबला करना या उसे परास्त करना संभव नहीं है। हमारी पार्टी कश्मीर मुद्दे को हल करने के लिए ठोस तरीके से निम्न मांगें रखती है-


  •  कश्मीर में भारत सरकार की सशस्त्र सेनाओं द्वारा किये जा रहे नरसंहार को तत्काल बंद किया जाये।
  • अर्धसैनिक बलों और सेना को कश्मीर से तुरंत वापस बुलाया जाये।
  • सशस्त्र बल विशेषाधिकार कानून को तत्काल समाप्त किया जाये जिसके कारण सेना को जनता की अंधाधुंध हत्यायें करने का अधिकार मिला है।
  • कश्मीर में जनमत संग्रह कराया जाये और कश्मीरियों को उनका भविष्य खुद चुनने दिया जाये।
  • समस्त राजनीतिक कैदियों को बिना शर्त रिहा किया जाये।
कॉमनवेल्थ खेल के प्रति पूरे देश में गुस्सा रहा है, आपकी पार्टी की इस पर क्या सोच है?

कामनवेल्थ खेल के नाम पर सत्तर हजार करोड़ रुपये शासक वर्ग खर्च कर चुका है। दूसरी ओर बहुसंख्यक जनता द्वारा झेली जा रही गरीबी, भूख, अशिक्षा, बेरोजगारी, विस्थापन, बाढ़, बीमारियों, आश्रयहीनता आदि समस्याओं के प्रति इसका कोई ध्यान नहीं है। यह एक हास्यास्पद स्थिति है कि 77 फीसदी जनता प्रतिदिन 20 रुपये से कम पर गुजारा कर रही है वहीं खेल के बहाने करोड़ों रुपये इकट्ठा किये गये। ये करोड़ों रुपये स्टेडियम,सड़क और खेलों के लिए बनने वाले भवनों पर खर्च किये गये तथा विभिन्न तरह के उपकरणों की खरीद में भ्रष्ट अधिकारियों,मंत्रियों और ठेकेदारों की झोलियों मं चले गये।

निर्माण कार्यों में काम करने वाले इन मजदूरों को मामूली वेतन देकर उनका शोषण किया गया। दूसरी तरफ इन खेलों के कारण मजदूर वर्ग और मध्यवर्गीय लोगों का जीवन बदहाल हो गया। दिल्ली के सौंदर्यीकरण के नाम पर हजारों हजार स्लम आबादी,सड़क के किनारे खोमचा लगाने वालों तथा भिखारियों को शहर से बाहर खदेड़ा गया। सुरक्षा के नाम पर जनता की रोजाना की आवाजाही पर पाबंदियां लगायी गयीं। यह सबकुछ कॉरपोरेट घरानों के मुनाफे और मंत्री-अधिकारियों के कमीशन के लिए किया गया।
विशेष तौर पर नौजवानों का उनकी बुनियादी समस्याओं से ध्यान हटाने, उनमें बढ़ रहे असंतोष को ‘शांत करने और उनके सामने एक खूबसूरत दुनिया का भ्रम गढ़ने के लिए यह खेल कराये गये। जनता इन खेलों से सिवाय करों के बोझ के और कुछ प्राप्त नहीं कर पायी। इसके अलावा कॉमनवेल्थ खेल गुलामी के प्रतीक औपनिवेशिक अतीत के अवशेष हैं। ब्रिटेन के पुराने उपनिवेश इसमें शामिल हैं। दलाल शासक जो नव उपनिवेशवादियों (साम्राज्यवादियों)की सेवा करते हैं, के अलावा कोई भी नागरिक भारत की स्वाधीनता चाहता है और कोई भी देशभक्त इस बात को पचा नहीं सकता कि हमारा देश इसका सदस्य है। आत्मसम्मान वाले किसी भी देश को ऐसे संगठन से अपने आप को हटा लेना चाहिए। हम इसमें भाग लेने वाले विभिन्न देशों के खिलाड़ियों की प्रशंसा करते हैं,लेकिन इसका समर्थन तभी किया जा सकता है जब इसका आयोजन समानता के आधार पर हो, कोई दिखावा न हो और संबंधित देशों की संप्रभुता के साथ कोई समझौता न हो।


बाबरी मस्जिद मामले में इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ बैंच ने विवादित क्षेत्र को तीन भागों में बांटने का फैसला दिया है, इस विवाद के लिए आपके पास क्या समाधान है?

हमारी पार्टी ने पिछले 18वर्षों में कई बार बाबरी मस्जिद ढहाने जाने के ऊपर अपनी राय स्पष्ट की है। पार्टी के केंद्रीय समिति सदस्य (सीसी)के प्रवक्ता कामरेड अभय ने एक वक्तव्य में साफ तौर से हमारी पार्टी राय रखी है। निश्चय ही यह बहुत दुखद है कि इलाहाबाद हाईकोर्ट की लनखऊ बैंच ने विवादित क्षेत्र को तीन भागों में बांट दिया है। ऐसा करने का कोई वैज्ञानिक आधार नहीं है। इसके समर्थन में कोई ऐतिहासिक साक्ष्य भी नहीं है। हमारा शुरू से ही यह कहना है कि बाबरी मस्जिद को दुबारा उसी जगह पर बनाया जाना चाहिए। इसका ढहाया जाना एक जघन्य अपराध है। हमारी पार्टी की अवस्थिति है कि पूरी जमीन मुस्लिम समुदाय का है। इस फैसले के जरिये मुस्लिम समुदाय के प्रति अन्याय हुआ है।


हिंदुवादी नेताओं का मानना है कि जहां पहले बाबरी मस्जिद खड़ी थी वहीं राम का जन्म हुआ था। इस सवाल के बरख्स फिर हम भारत के इतिहास को देखें तो एक समय ऐसा भी था जब वहां कोई मस्जिद भी नहीं थी। जैसे नेपाल और भारत से पूरे भारतीय उपमहाद्वीप और कुछ पूर्वी एशियाई देशों में हिंदू धर्म और बौद्ध धर्म का प्रसार हुआ। उसी तरह इस्लाम सहित सभी धर्म अपने जन्म स्थान से विश्व के दूसरे हिस्सों में फैले। अतः यह कारण दिखाकर और इस तरह के फैसले को मॉडल बनाकर सभी मस्जिद को विवादित क्षेत्र बताया जा सकता है और झगड़ा पैदा किया जा सकता है।


फैसले के इस आधार पर अल्पसंख्यक समुदाय के सारे प्रार्थना स्थलों को ढहाया जा सकता है। फैसले के बाद अल्पसंख्यक लोगों में असुरक्षा बढ़ने की पूरी संभावना है। जैसा कि हमारी पार्टी के प्रवक्ता अभय ने कहा कि जनता को कट्टरपंथियों,विशेषकर हिंदू कट्टरपंथियों से सावधान रहना चाहिए। भिवण्डी, मुंबई, कर्नाटक, हैदराबाद, गुजरात और उड़ीसा के धार्मिक दंगों के नाम पर हुई सभी घटनायें शासक वर्गों विशेषकर हिंदू अंध राष्ट्रवादियों द्वारा अंजाम दी गयी हैं। इस फैसले से बाबरी मस्जिद के विध्वंस को वैधानिकता प्राप्त हो गयी है। कोर्ट के इस फैसले ने वह आधार तैयार कर दिया है, जहां हिंदू अंध राष्ट्रवादी धार्मिक अल्पसंख्यकों के ऊपर विभिन्न रूपों में अधिक आक्रामक हो जायेंगे।



हमारी पार्टी का विचार है कि मुस्लिम अल्पसंख्यकों सहित सभी धार्मिक अल्पसंख्यक लोग,धर्मनिरपेक्ष ताकतें, जनवादी ताकतें और हमारे देश की शोषित जनता एकजुट होकर लड़ेंगी और कट्टरपंथी ताकतें विशेषकर हिंदू अंधराष्ट्रवादी ताकतों को अलगाव में डालेंगी तभी इस समस्या या इस जैसी अन्य समस्याओं का समाधान खोजा जा सकता है।


(जारी...)

Jan 3, 2011

नया संविधान निर्माण, जनता का लोकतान्त्रिक अधिकार- गणपति

भाग- 2

हमारे हमलों के कारण सेना की तैनाती का प्रश्न है,तो यदि जनता प्रतिरोध न करे और चुपचाप अपना सिर झुका दे तथा सदियों से जारी शोषण और दमन को चुपचाप सहती रहे तो सेना की बात छोड़िये,पुलिस और अर्धसैनिक बलों की भी जरूरत नहीं पड़ेगी। तब शासक वर्गों को हमले करने की भी जरूरत नहीं पड़ेगी। जनता की चेतना जैसे-जैसे बढ़ती है,वह शोषण और दमन के पीछे की असली कहानी,संसदीय व्यवस्था और झूठे लोकतंत्र के छलावे को समझने लगती है...गणपति


सरकार आपसे लगातार हिंसा छोड़ने को कह रही है,जबकि आपकी पार्टी सरकारी संपत्ति और पुलिस बलों पर हमला करने से बाज नहीं आ रही है? ताड़ीमेतला (दंतेवाड़ा), कोंगेरा (नारायणपुर), सिल्दा (प. बंगाल) और लखीसराय (बिहार) में हुए आपके हाल के हमलों की पृष्ठभूमि में कुछ लोग अपनी यह चिंता व्यक्त कर रहे हैं कि आप सिर्फ सैन्य तरीकों से ही प्रत्युत्तर दे रहे हैं।

पार्टी के केंद्रीय नेतृत्व ने इस मुद्दे पर कई बार अपनी स्थिति स्पष्ट की है। मैं एक बार फिर इसे साफ तौर पर रखना चाहता हूं कि सरकार द्वारा राज्य की हिंसा को बरकरार रखते हुए जनता से हिंसा छोड़ने की बात कहना एक बड़ा धोखा और छल है। सरकार अपने खुद के बनाये नियमों का उल्लंघन कर रही है और जनता का कत्लेआम कर रही है इसलिए यह जरूरी है कि राजनीतिक रूप से सजग लोग सरकार से इस बारे में मांग करें कि वह जनता के खिलाफ युद्ध बंद करे।

जब सरकार कहती है कि माओवादी हिंसा कर रहे हैं तो यह उसी तरह है जैसे एक चोर ‘चोर-चोर’ चिल्लाये। ऐसा करके वह मूल मुद्दों से ध्यान हटाने का प्रयास कर रही है। जिनकी चेतना उन्नत हो चुकी है वे कभी भी इन हमलों को चुपचाप बर्दाश्त नहीं करेंगे,खासकर तब जबकि हमलावरों का उद्देश्य उनके संसाधनों को लूटना और सशस्त्र सेनाओं के माध्यम से उन्हें स्थायी गुलाम बनाना हो। वे स्वयं को सशस्त्र करके इसका प्रतिरोध करेंगे।

हमारे गुरिल्ला सेना के सभी सदस्य आमजन ही हैं,जिन्होंने अपने आपको स्वैच्छिक तरीके से सशस्त्र किया हुआ है। सदियों से गुलामों के रूप में जिस जनता का शोषण और दमन हो रहा था उसने समाज के ऐतिहासिक विकास के नियमों को समझ लिया है और स्वयं को सशस्त्र करते हुए लड़ रही हैं। हमारी पार्टी ने बार-बार यह स्पष्ट तौर पर कहा है कि जनता सिर्फ सशस्त्र तरीके से ही अपनी मुक्ति हासिल कर सकती है। यही कारण है कि पीएलजीए के स्थापना दिवस के अवसर पर प्रत्येक वर्ष हमारी पार्टी देश के नौजवानों से खुद को सशस्त्र करने का आह्वान करती है। यह आह्वान जनता के बीच तेजी से व्यापक रूप से फैल रहा है।

हाल में पार्टी के नेतृत्व में और जनता के सक्रिय समर्थन से हमारी जनसेना से ताड़ीमेटला (मुकाराम),सिल्दा, लखीसराय और कोंगेरा जैसी जगहों पर जिन हमलों को अंजाम दिया वे सभी सैन्य हमले हैं। इन हमलों से कौन चिंतित है? शासक वर्ग और उसके भाड़े के लोग या फिर जनता? प्रत्येक हमला व्यावहारिक रूप से एक राजनीतिक संदेश है,जो उन्हें मुक्ति का रास्ता दिखाता है। जनता ठीक इसी रूप में इसको समझती है। इसके विपरीत यह सब देखकर शासकवर्ग भय से कांपने लगता है।

हालांकि वे लोग जो हमारे आंदोलन को नहीं समझते और वे जिनकी इस बारे में समझ साफ नहीं है, वे दोनों तरफ हुए नुकसानों से गुस्सा होते हैं। हम उनके गुस्से को समझ सकते हैं,लेकिन सिर्फ इसके लिए जनता इस प्रतिरोध को बंद नहीं कर सकती। उन्हें यह समझना चाहिए कि यह तीखा युद्ध क्यों चल रहा है। प्रत्येक हमले में हजारों लोग क्यों शामिल होते हैं। हम जनता का सक्रिय समर्थन कहां से पाते हैं। हमें यह समर्थन क्यों मिल रहा है। यदि वे यह समझने का प्रयास करेंगे तो उनके सामने सबकुछ स्पष्ट हो जायेगा। तब वे इस बात को समझेंगे कि लगातार ऐसे बड़े हमलों की जरूरत क्यों है?लेकिन जनता के दुश्मन हमेशा इसका विरोध करेंगे। वे मूर्खतापूर्वक और प्रतिक्रियावादी तरीके से जनता के ऊपर बड़े से बड़ा हमला करेंगे। वे मूर्खतापूर्ण तरीके से एकमात्र दमन का ही रास्ता अपनायेंगे और जनता के बीच घृणा के पात्र बन जायेंगे। परिणामस्वरूप वे फिर से जनता के बड़े हमलों का शिकार होंगे।

जहां तक हमारे हमलों के कारण सेना की तैनाती का प्रश्न है,तो यदि जनता प्रतिरोध न करे और चुपचाप अपना सिर झुका दे तथा सदियों से जारी शोषण और दमन को चुपचाप सहती रहे तो सेना की बात छोड़िये,पुलिस और अर्धसैनिक बलों की भी जरूरत नहीं पड़ेगी। तब शासक वर्गों को हमले करने की भी जरूरत नहीं पड़ेगी। जनता की चेतना जैसे-जैसे बढ़ती है, वह शोषण और दमन के पीछे की असली कहानी, संसदीय व्यवस्था और झूठे लोकतंत्र के छलावे को समझने लगती है,वह जमीन पर जोतने वाले के मालिकाने के लिए तथा जनता के असली लोकतंत्र के लिए लड़ाई शुरू करती है। तब शासक वर्ग को यह डर सताने लगता है कि उसकी बुनियाद हिल रही है और वह गंभीर दमन का सहारा लेने लगता है।

ये मूर्ख यह नहीं समझते कि बढ़ते हुए जनप्रतिरोध के लिए उनकी नीतियां ही जिम्मेदार हैं और वे सेना उतारने की पूरी तैयारी कर रहे हैं। वस्तुतः वाजपेयी के शासनकाल में जब आडवाणी गृहमंत्री थे तब सेना ने प्रतिक्रांतिकारी सलवा जुडूम सैन्य अभियान की योजना बनायी थी। गृह मंत्रालय ने इस पर मुहर लगायी थी। वाजयेपी सरकार के गिरने के बाद केंद्र में आयी कांग्रेस और छत्तीसगढ़ में आयी कांग्रेस की जगह भाजपा सरकार ने इसे लागू किया। तब से लेकर आज तक सेना अपनी सभी कमांड (उत्तरी, केंद्रीय, दक्षिणी, पश्चिमी एवं पूर्वी) का सक्रियतापूर्वक इस्तेमाल करते हुए इन सभी में विशेष ढांचा गठित करके इसके माध्यम से राज्य पुलिस विभाग को सभी तरह की सलाह दे रही है। इसने जनता के खिलाफ युद्ध के लिए एक रणनीति सूत्रबद्ध की है और यह केंद्रीय गृह मंत्रालय को सभी तरह का प्रशिक्षण, गुप्तचर सूचना, तकनीक और तैनाती योजना दे रहा है।

भारत की विशेष परिस्थिति में माओवादी आंदोलन को दबाने के लिए साम्राज्यवादियों द्वारा सूत्रबद्ध कम तीव्रता वाले युद्ध (एलआइसी)की नीति को अपनी विशिष्टताओं को शामिल करते हुए तेजी से लागू कर रहा है। वर्तमान में सेना प्रत्यक्ष रूप से हथियार लेकर हमलों में भागीदारी नहीं कर रही है,लेकिन हमारे मजबूत क्षेत्रों में सेना के अफसर कुछ विशेषज्ञ और गुप्तचर अधिकारी प्रतिगुरिल्ला अभियान को प्रत्यक्ष मार्गदर्शन दे रहे हैं। यह पिछले तीन-चार वर्षों से हो रहा है। अतः यह सच नहीं है कि हमारे कुछ हमलों के कारण वे सेना को तैनात करेंगे। सेना के अंदर इस उद्देश्य के लिए प्रति बगावत बलों का गठन किया जा चुका है। वे युद्ध स्तर पर नये कैन्टोनमेंट,हवाई बेस और हैलीपैड का निर्माण उसी तरह कर रहे हैं जैसे सीमाओं पर किया जाता है।

जाहिर है शासक वर्ग जनता पर अभूतपूर्व अत्याचार,नरसंहार और विध्वंसक कार्रवाइयां करने के लिए सभी तरह की तैयारियों कर चुका है। हमारी पार्टी यह महसूस करती है कि सभी क्रांतिकारी पार्टियों,जनवादी संगठनों, बुद्धिजीवियों,राष्ट्रीय मुक्ति संगठनों,साम्राज्यवाद विरोधी देशभक्त संगठनों और समस्त भारतीय जनता को इसका अहसास करना चाहिए और बिना देर किये इसका सक्रिय और पुरजोर प्रतिरोध करना चाहिए। हमारे आंदोलन के इलाके की जनता भी ऐसा ही सोचती है और इसके प्रति आशान्वित है।

यह सच है कि सेना की तैनाती से गरीब और आदिवासी जनता पर हिंसा बढ़ेगी और बड़े पैमाने पर जनहानि होगी। जब जनता आत्मरक्षा में लड़ती है तो जनसंख्या के महज पांच प्रतिशत का निर्माण करने वाले शोषक और उनके दलाल को ही क्षति उठानी पड़ती है। लेकिन जब राज्य हिंसा करता है तो बड़े पैमाने पर शोषित जनता को नुकसान उठाना पड़ता है। जनता ही पीएलजीए, माओवादी पार्टी, जनसंगठनों और जनताना सरकार के रूप में मारी जा रही है। अतः जब सामान्य जनता और आदिवासी इतने बड़े पैमाने पर नुकसान झेलते हैं तो किसी को भी सबसे पहले यह सोचना चाहिए कि यह सब क्यों हो रहा है।

मासूमियत से या कुटिलतापूर्वक,भ्रमित करने वाले ऐसे वक्तव्य कि निर्दोष जनता मारी जा रही है,जैसे लोकप्रिय बयानों से कुछ भी हल नहीं होगा। जनहानि की इस पृष्ठभूमि में शोषित और व्यापक जनता प्रत्येक से यह सीधा सवाल कर रही है-आप हमारी तरफ हैं या शासक वर्ग की तरफ। इसका मतलब यह हुआ कि बीच में कोई तटस्थ जमीन नहीं है। अतः हम सभी लोगों से जो जनहानि के बारे में अपना गुस्सा व्यक्त करते हैं अनुरोध करते हैं कि वे इस सवाल की पृष्ठभूमि में पुनर्विचार करें।

इस अवसर पर मैं कुछ बातों की ओर आपका ध्यान दिलाना चाहता हूं। 12 जून को झारखंड के कोरहाट जंगल में हमारी पार्टी के पूर्वी रीजनल ब्यूरो की तरफ से आयोजित एक राजनीतिक कैंप पर राज्य पुलिस और केंद्रीय अर्धसैनिक बलों के जवानों ने हमला किया। इस हमले में कोबरा बल,बीएसएफ और झारखंड एसटीएफ के जवान शामिल थे। इसमें एयरफोर्स के तीन हेलीकॉप्टरों का इस्तेमाल किया गया। हालांकि सरकार का कहना है कि इस हमले में 2000जवान शामिल थे लेकिन हमारा मानना है कि इसमें कहीं अधिक जवान शामिल थे। उस क्षेत्र में हमारी पीएलजीए की महज दो कंपनियां थीं। हमारे हथियार भी निम्नकोटि के थे। हमारी पार्टी और पीएलजीए पर हुए इस बड़े हमले में हजारों सरकारी बलों के शामिल होने का क्या कारण था?यह युद्ध है या नहीं?वे इस स्पष्ट तथ्य को क्यों छुपा रहे हैं? उन्हें यह युद्ध क्यों छेड़ना पड़ा है।

जाहिर है भाड़े के सैनिकों ने यह हमला चंद शोषकों के हितों की रक्षा के लिए किया था। हमला करने वाले लोग चाहे कमांडो हों या विशेष बल,हमारे गुरिल्लों के बहादुराना प्रतिरोध के सामने टिक नहीं सकते। हमारे कॉमरेड उच्च राजनीतिक चेतना और त्याग की भावना से लैस हैं और ऐसे हमलों का बहादुरी के साथ मुकाबला करते रहेंगे। हमारे प्रति हमले में कोबरा के कुछ लोग मारे गये और कई लोग जख्मी हुए। लेकिन इस हमले का नेतृत्व करने वाले अफसरों में इतना भी साहस नहीं रहा कि वे यह घोषणा करें कि कितने लोग मारे गये और कितने जख्मी हुए। वे इस बात से डरते हैं कि यदि तथ्य को सामने लाया गया तो उनके जवानों का नैतिक बल नीचे गिर जायेगा।

सितंबर 26-27के बीच झारखंड में ही सारण्डा के जंगलों में हमारे पूर्वी रीजनल ब्यूरो द्वारा चलाये जा रहे राजनीतिक कैंप पर सरकारी बलों ने एक बड़ा हमला किया। पुलिस एवं अर्धसैनिक बलों के उच्चाधिकारियों ने खुद यह घोषणा किया कि इस हमले के लिए 5000 बलों (एक रेजिमेंट के बराबर) को तैनात किया गया था और उनकी सेवा के लिए हेलीकॉप्टरों को तैयार रखा गया था। जाहिर तौर पर हमेशा की तरह हमला करने वाले बलों की तादाद कहीं ज्यादा होगी। ऐसे में कोई भी यह बात समझ सकता है कि सरकार कितने बड़े पैमाने पर युद्ध चला रही है।

आप इसे युद्ध के अलावा और क्या कह सकते हैं। रेजिमेंट के स्तर पर हमला करने के बावजूद वे इस युद्ध के तथ्य को क्यों छिपा रहे हैं। शायद जब डिवीजन स्तर पर हमला करेंगे तब जाकर इस बात को स्वीकार करेंगे। वे यह युद्ध किसके लिए चला रहे हैं। यहां भी कोरहाट में कामरेड डेविड ने अपने जीवन की कुर्बानी दी थी। सारण्डा में भी एक कामरेड शहीद हुआ। दुश्मन की ताकत को कहीं ज्यादा नुकसान हुआ,लेकिन इस तथ्य को छिपाने के लिए उन्होंने झूठा प्रचार किया कि उनकी तरफ से तीन लोग मारे गये और सुरक्षा बलों ने 10-12माओवादियों को मार डाला,बड़ी मात्रा में हथियार और दूसरी सामग्री जब्त की और माओवादियों के ट्रेनिंग कैंप को ध्वस्त कर दिया गया।

विश्व की जनता का नंबर एक दुश्मन अमेरिकी साम्राज्यवाद के मार्गदर्शन में और इजरायल (विश्व की सबसे क्रूर सरकार और अमेरिकी दलाल) के सहयोग से भारत की सरकार यह युद्ध चला रही है। सरकार चाहे जो कहे, सोनिया-मनमोहन-चिदम्बरम गैंग और उनके टुकड़खोर बुद्धिजीवी चाहे जितना झूठ बोलें, कोरहाट और सारण्डा में हुए ये बड़े हमले और कुछ नहीं बल्कि युद्ध है। हम स्पष्ट तौर पर यह घोषणा करते हैं कि हमारे द्वारा किये जाने वाले सभी हमले आत्मरक्षा के युद्ध के तहत किये जाते हैं। सरकार द्वारा चलाये जा रहे इस अन्यायपूर्ण युद्ध में सामान्य जनता को बहुत नुकसान उठाना पड़ा रहा है। इसलिए हम एक बार फिर समूची जनता से अपील करते हैं कि वे इस अन्यायपूर्ण युद्ध का विरोध और प्रतिरोध करें।

सरकार के मुताबिक माओवादी जनता के मुद्दों पर गंभीर नहीं हैं और न ही उन्हें जनकल्याण से कुछ लेना देना है। उनका एकमात्र उद्देश्य सशस्त्र ताकत से लोकतांत्रिक तरीके से निर्वाचित सरकार को उखाड़ फेंककर साम्यवादी शासन की स्थापना करना है, आप इसको कैसे न्यायोचित ठहरायेंगे?

शासक वर्गों को माओवादियों पर दोषारोपण करने और जनहित,जनकल्याण और जनविकास के बारे में हमारी प्रतिबद्धता पर सवाल उठाने का कोई नैतिक अधिकार नहीं है। हमारा उद्देश्य सशस्त्र ताकत के जरिये जनसंख्या के 95 प्रतिशत लोगों के हितों के बिल्कुल खिलाफ खड़े इस लोकतंत्र और संसदीय व्यवस्था, जो सामंती-दलाल-नौकरशाह-बुर्जुआ के अधिनायकत्व के अलावा और कुछ नहीं है,को उखाड़ फेंककर नई जनसत्ता की स्थापना करना है। यह कहना चमत्कारों में भी एक चमत्कार होगा कि ये चुनाव और संसद बहुत पवित्र है और वर्तमान शासन,जनवादी शासन का सर्वोत्तम रूप है।

हम जनता से कह रहे हैं कि इसतानाशाह सरकार को उखाड़ फेंके और अपनी खुद की सरकार स्थापित करे जो चार वर्गों-मजदूर-किसान-शहरी मध्यवर्ग और राष्ट्रीय पूंजीपति वर्ग का सच्चा जनवाद होगा। जनता अपने आपको संगठित कर रही है और इसके लिए लड़ रही है। वह कोई भी व्यक्ति जो राजनीति का क ख ग जानता है, इस बात को समझ सकता है। लेकिन शासक वर्ग कह रहा है कि संविधान और संसद पवित्र हैं और वर्गहितों से ऊपर है। साम्राज्यवादियों के संश्रय से स्थापित राज्य मशीनरी और तानाशाह बुर्जुआ संसद इन वर्गों के अलावा और किसी की सेवा नहीं करती। उन वर्गों के लिए यह पवित्र हो सकता है, लेकिन जनता के लिए यह एक बड़ा खतरा है। अतः यह जनता का जन्मसिद्ध अधिकार है कि वह इसे नेस्तनाबूद कर दे। यह उनका लोकतांत्रिक अधिकार है। वह सच्ची जनवादी राजनीतिक व्यवस्था का निर्माण करेगी,जिसके तहत नये वैधानिक निकाय और नया संविधान बनाया जायेगा।

विकास कार्यों में बाधा हम नहीं पहुंचा रहे हैं, शासक वर्ग बाधा पहुंचा रहा है। दण्डकारण्य में पुलिस, अर्धसैनिक बल और सलवा जुडूम जैसे फासीवादी गैंगों के क्रूर हमलों व हिंसा का मुकाबला करते हुए जनता अपनी खेती के कामों को अंजाम दे रही है। मिलीशिया जुताई-बुआई करते हुए निरंतर खेतों की निगरानी कर रही है। पीएलजीए जनता द्वारा पैदा की गयी फसल की रक्षा कर रही है। सरकारी भाड़े के टट्टू ऐसी इकाइयों पर हमले कर रहे हैं और उन्हें मार रहे हैं। सरकारी बल आदिवासी क्षेत्रों में कहर बरपा रहे हैं। वह उनकी संपत्ति नष्ट कर रहे हैं,गांव व घरों को जला रहे हैं। गरीब लाचार जनता से उनकी मुर्गियां, सुअर, पशु छीन रहे हैं। खेतों को नष्ट कर रहे हैं और फसलों को जला दे रहे हैं। यह व्यापक विध्वंस ही शासक वर्ग की विकास नीति है। यहां यह एकदम स्पष्ट है कि जनकल्याण का दुश्मन कौन है।

निःसंदेह इस अन्यायपूर्ण राज्य को उखाड़ फेंकने के लिए हम जनता का आह्वान कर रहे हैं। हम जनता से आह्वान कर रहे हैं कि वह सबके लिए खतरा बन चुके इस राज्य को नष्ट कर दे और अपने आपको मुक्त कर ले। इस मुक्ति संघर्ष से ही जनता नई सत्ता स्थापित करने में सक्षम होगी और सभी क्षेत्रों में एक वैकल्पिक रास्ते से चैतरफा विकास करने में सक्षम होगी। हम जिस विकास की बात कर रहे हैं वह निश्चित रूप से वह नहीं है जो आईएमएफ और वल्र्ड बैंक द्वारा थोपा जाता है और न ही वह है जो अहलूवालिया-रंगराजन-मनमोहन सिंह, चिदम्बरम, पिल्लई जैसे लोगों द्वारा प्रस्तावित किया जाता है।

हम जिस विकास नीति की बात कर रहे है। वह उत्पादन के संबंधों को गुणात्मक रूप से बदल देगी,फलस्वरूप उत्पादक शक्तियों में गुणात्मक विकास होगा। यह एक वास्तविक विकास नीति है जिसके अनुसार हर एक को अपने देश की संप्रभुता को विदेशी कंपनी के चरणों में डालने का विरोध करना चाहिए। यह विकास नीति आत्मनिर्भर और स्वतंत्र होनी चाहिए। यानी देश के संसाधनों का इस्तेमाल साम्राज्यवादियों के लिए नहीं,बल्कि जनता के लिए होना चाहिए। बहुत से बुद्धिजीवी और शोधकर्ता जिन्होंने हमारे क्षेत्रों का दौरा किया है,पहले ही लिख चुके हैं कि यहां एक वैकल्पिक राजनीतिक सत्ता स्थापित हो रही है। लोग यह महसूस कर रहे हैं कि हम विचारधारा,राजनीति, सांगठनिक, सैन्य, आर्थिक, सांस्कृतिक और पर्यावरण जैसे सभी क्षेत्रों में एक वैकल्पिक दिशा पर काम कर रहे हैं। पर्यवेक्षकों ने यह साफ तौर पर लिखा है कि इन सभी क्षेत्रों में विकास आगे बढ़ रहा है, हालांकि यह अभी प्राथमिक स्तर पर है।

बहुत से जनवादी लोगों ने आपरेशन ग्रीन हंट के खिलाफ आवाज बुलंद की है,लेकिन क्या आप यह नहीं सोचते कि फ्रांसिस इंदुवार की गला काटकर हत्या,जमुई नरसंहार,दन्तेवाड़ा में बस को बम से उड़ाना और ज्ञानेश्वरी एक्सपे्रस दुर्घटना जैसी चीजों से आपकी पार्टी लोगों की सहानुभूति खो देगी?इन घटनाओं पर आप क्या स्पष्टीकरण देना चाहेंगे?

सर्वप्रथम मैं सभी जनवादी ताकतों को अपना क्रांतिकारी अभिवादन देता हूं जो सरकार द्वारा जनता के खिलाफ चलाये जा रहे क्रूर और अन्यायपूर्ण युद्ध का विरोध और प्रतिरोध कर रहे हैं। जहां तक हमारे खिलाफ कुत्सा प्रचार और दोषारोपण की बात है तो ज्ञानेश्वरी एक्सप्रेस की घटना में हमारा कोई हाथ नहीं है। हमारी पश्चिमी बंगाल पार्टी इकाई ने इस संबंध में पहले ही स्पष्ट वक्तव्य जारी कर दिया है। यह घटना सीपीआईएम और केंद्रीय जांच एजेंसियों के सम्मिलित “ाड्यंत्र के कारण घटित हुई है। यद्यपि इस मामले में न्यायिक जांच सीबीआई को सौंपी जा चुकी है, मुख्य दोषी के रूप में प्रचारित किये गये उमाकांत महतो को पकड़कर एक झूठी मुठभेड़ में मार डाला गया। यह भी पूरे “ाड्यंत्र का एक हिस्सा है। हमारी पार्टी जनता की मुक्ति के उद्देश्य के लिए लड़ रही है। अतः वह कभी भी जनता को निशाना बनाकर कोई हमला नहीं करती और न ही भविष्य में ऐसा करेगी।

हमारी पार्टी ने दंतेवाड़ा जिले के चिंगावरम नामक स्थान के नजदीक बस को बम से उड़ाये जाने की घटना के संदर्भ में पहले ही साफतौर पर वक्तव्य जारी किया है। हमारी पार्टी ने इस गलती के लिए माफी भी मांग ली है। इंदुवार की गला काटकर हत्या के बारे में कामरेड आजाद ने पहले स्पष्ट तौर पर उत्तर दे दिया है। ऐसे मुद्दों पर हमारी पार्टी की अवस्थिति बिल्कुल साफ है। जब भी अपवादस्वरूप कुछ घटनायें घटी हैं तो हमारी पार्टी ने उसका स्पष्टीकरण दिया है। लेकिन ‘ाासक वर्ग जानबूझकर क्रांतिकारी आंदोलन और जनता के प्रतिरोध को बदनाम करने के लिए कुत्सा प्रचार चला रहा है। ज्ञानेश्वरी एक्सप्रेस की घटना इसका एक ज्वलंत उदाहरण है।

इंदुवार मुद्दा,दंतेवाड़ा बस विस्फोट और ज्ञानेश्वरी दुर्घटना के बीच बहुत अंतर है। चिंगावरम (दंतेवाड़ा बस विस्फोट) के पास हमारा निशाना स्पष्ट तौर से कोया कमांडो और एसपीओ थे। ये रक्तपिपासु लोग कुतरेन गांव में तीन आदिवासियों को मारकर और महिलाओं के साथ बलात्कार करके लौट रहे थे। लेकिन हम यह नहीं जानते थे कि बस के अंदर जनता भी है। हमारे पास सूचना थी कि ये एसपीओ जनता को नीचे उतारकर बस में बैठ गये हैं। बस की छत पर भी यह सशस्त्र हत्यारे गिरोह बैठे हुए थे। अतः हमने इसे एक सैन्य लक्ष्य समझा और इस पर हमला किया। ज्ञानेश्वरी घटना में हमारा कोई हाथ नहीं है। इंदुवार के मामले में हमारी पार्टी स्पष्टीकरण दे चुकी है।

हत्यारे गैंगों और अपने ऊपर जारी अनवरत क्रूर हिंसा का मुकाबला करते हुए जनता कुछ जगहों पर अपवादस्वरूप बदले की भावना से ऐसी कार्रवाइयों का सहारा ले सकती है। जब तक हम देश में असमान सामाजिक परिस्थितियों को नहीं समझेंगे,इस समस्या को भी नहीं समझ सकते। एक अर्थ में शहरी क्षेत्रों में स्थितियां भिन्न हैं। सुदूर ग्रामीण इलाके में जहां सामंती उच्च जाति का दमन क्रूर रूप में मौजूद है और जहां जनता सलवा जुडूम,सेंद्रा, हरमदवाहिनी जैसे हत्यारे गैंगों द्वारा जारी अमानवीय हिंसा को झेल रही है तथा राज्य के व्यापक विध्वंसों का शिकार है, वहां प्रतिरोध कभी-कभी ऐसा रूप ले सकता है।

शहरी क्षेत्रों में भी उन बस्तियों में जहां जनता कुख्यात सूदखोरों,राजनीतिज्ञों,माफिया गैंगों और गैंगस्टर व राजनीतिज्ञों से सांठगांठ किये पुलिस अफसरों का शिकार है,वहां भी प्रतिरोध ऐसा रूप अख्तियार कर सकता है। नागपुर में कुख्यात बलात्कारी और गुंडे का बस्ती की महिलाओं द्वारा मारा जाना, ऐसे कई उदाहरणों में से एक है। यह महज एक स्पष्टीकरण है कि ऐसी घटनायें क्यों घटित होती हैं और यह बहुत साफ है कि हमारी पार्टी नीति के तौर पर ऐसी घटनाओं को अंजाम नहीं देती। हमारा दृष्टिकोण यह है कि हमें अपने लोगों और कैडरों को इस मामले में शिक्षित करना चाहिए। कारपोरेट घराने के दलाल बुद्धिजीवी तिल का ताड़ बनाते हुए हमारे खिलाफ कुत्सा प्रचार में लगे हुए हैं।

जमुई(बिहार)की घटना में सरकार प्रायोजित एक प्रतिक्रियावादी गैंग ने फुलवरिया कोदासी गांव में हमारे आठ कामरेडों को पकड़ लिया और उनके अंगों को काटकर जघन्य एवं क्रूर तरीके से उनकी हत्या कर दी थी। जब ऐसी घटनायें घटती हैं तब यदि हम चुपचाप बैठ जायें और कोई कार्रवाई न करें तो अपने आंदोलन और अपने लोगों की रक्षा कभी नहीं कर पायेंगे। इसीलिए हमें प्रति हमले के लिए बाध्य होना पड़ा। इस हमले में 3मुख्य गुंडा नेताओं सहित नौ लोग मारे गये। यह बहुत दुख की बात है कि एक महिला और बच्चा आग के घेरे में आ गये और दुर्घटनावश मारे गये। बाकी कुख्यात अपराधी,हत्यारे और लम्पट तत्व थे। हमारी बिहार-झारखंड स्पेशल एरिया कमेटी ने इस बारे में स्पष्ट वक्तव्य अखबारों में जारी किया था जो बिहार के अखबारों और माओवादी इंफार्मेशन बुलेटिन 17 में प्रकाशित हुआ था।

कुल मिलाकर कहें तो सरकार और उनके जरखरीद बुद्धिजीवी उन घटनाओं में जहां हमने गलतियां की हैं,वे हमारे स्पष्टीकरण को सुनने को तैयार नहीं हैं। अतः हम जनता और जनपक्षधर बुद्धिजीवियों से अनुरोध करते हैं कि सरकार द्वारा चलाये जा रहे मनोवैज्ञानिक युद्ध के जाल में न फंसें। जनता के हितों की रक्षा के लिए बनी हमारी जनसेना,जनता के लिए अपनी जान न्यौछावर करती है। वह जनता को कभी नुकसान नहीं पहुंचा सकती। अतः प्रत्येक घटना के पीछे की सच्चाई को जानने का प्रयास कीजिये। हम किसी भी उचित आलोचना को स्वीकार करने के लिए तैयार हैं और प्रत्येक गलती को दुरूस्त करने के लिए हमेशा तैयार रहते हैं।


माओवादियों की इसलिए भी आलोचना होती है कि पुलिस और अर्धसैनिक बल के जो जवान हमलों में जान गंवा रहे हैं,वे गरीब और मध्यवर्गीय परिवारों से आते हैं। एक तरफ माओवादी कहते हैं कि वे उनकी मुक्ति के लिए हथियार उठाये हैं और दूसरी तरफ पुलिस और अर्धसैनिक बलों के जवानों को आपकी पार्टी मार हैं?

राजनीतिक रूप से सजग किसी भी व्यक्ति को यह समझना चाहिए कि राज्य मशीनरी,शोषण और दमन करने के लिए जिन उपकरणों का इस्तेमाल करती है उसके निर्णायक पहलू पुलिस,अर्धसैनिक बल और सेना ही हैं। शोषकों की संख्या हमेशा ही बहुत कम होती है। वे जनसंख्या के पांच फीसदी भी नहीं होते हैं,लेकिन उत्पादन के औजारों पर उनका नियंत्रण होता है और बहुमत बनाने वाली व्यापक जनता के दमन और शोषण के लिए वे पुलिस और सेना का निर्माण करते हैं। शासक इसके लिए जनता से ही नियुक्तियां करता है। इसलिए इन ताकतों का बहुमत गरीब और मध्यवर्ग से आता है। ये ताकतें शोषक वर्ग की तरफ से जनता के खिलाफ युद्ध चला रही हैं। चूंकि युद्ध में ये ताकतें अग्रिम पंक्ति में खड़ी होती हैं इसलिए यह अपरिहार्य है कि जनता के आत्मरक्षात्मक युद्ध में ये मारे जाते हैं। शोषण और दमन को खत्म करने,शोषित जनता की मुक्ति और इस पीड़ादायी स्थिति को खत्म करने के लिए यह आत्मरक्षात्मक युद्ध अपरिहार्य हो जाता है।

हमारे क्षेत्र में पुलिस और अर्धसैनिक बलों के कुछ लोग हमसे मिलते हैं। वे हमारी मदद करते हैं और हम भी अनेक तरह से उनकी मदद करते हैं। सरकारी बल जब बंदूक लेकर हमारे ऊपर हमला करने के लिए आते हैं, केवल तभी हम आत्मरक्षा में उन पर हमला करते हैं। हम बार-बार पुलिस और अर्धसैनिक बलों की निचली कतारों से अपील करते हैं कि अपने वर्ग से गद्दारी मत करो। शोषक वर्ग की सेवा मत करो। जनता और क्रांतिकारियों पर हमले मत करो। जनता के साथ एकजुट होकर अपनी बंदूकों को दुश्मन की ओर मोड़ दो। अपने वर्ग भाइयों और बहनों पर बंदूक मत चलाओ। आप जो कर रहे हैं इससे जनता की नहीं,शोषक वर्ग की सेवा हो रही है। अतः गुलामों की तरह शोषक वर्ग की सेवा बंद करो। सिर्फ अपनी जीविका के बारे में मत सोचो,कृपया देश और जनता के बारे में सोचो।

हम उनके परिवारों से भी अपील करते हैं कि वे यह देखें उनके परिवार के सदस्य अल्पकालिक लाभ के लिए इस शोषक व्यवस्था की सेवा न करें। वे उन्हें जनता का पक्ष लेने को उत्साहित करें। जब यह परिवार हमारे क्षेत्रों में निवास करते हैं तो हमारी जन सरकारें सुनिश्चित करती हैं कि उन्हें उचित जीविका मिले और उनकी उचित सहायता की जाये।

(जारी...)


 पहले  भाग के लिए यहाँ क्लिक  करें:    असंभव है दमन-दबाव और वार्ता एक साथ - गणपति
 
 
 
 

असंभव है दमन-दबाव और वार्ता एक साथ - गणपति

भाग- 1

भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (माओवादी) के महासचिव मुपल्ला लक्ष्मण राव उर्फ गणपति ने पत्रकारों के भेजे सवालों का लिखित जवाब दिया है। जवाब अंग्रेजी में और विस्तृत होने के नाते हमें अपने पाठकों तक पहुंचाने में विलंब हुआ, जिसके लिए हम क्षमा चाहेंगे। गणपति के पास पत्रकारों के सवाल दो क्रम में गये थे। पहली बार अंग्रेजी के ओपेन साप्ताहिक पत्रिका के राहुल पंडिता की तरफ से और दूसरी बार पत्रकारों के एक समूह की ओर से। गणपति की ओर से भेजे गये दोनों जवाबों का संपादित हिंदी अनुवाद यहां इस उम्मीद से प्रकाशित किया जा रहा है कि सही-गलत का फैसला अंततः अपनी भाषा में ही होना है। प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह माओवाद को मुल्क का सबसे बड़ा खतरा मानते हैं, जबकि प्रतिबंधित माओवादी पार्टी के महासचिव गणपति इसे भविष्य कहते हैं। जाहिरा तौर पर भारत की स्वाभिमानी जनता कत्तई नहीं चाहेगी कि उसके अच्छे-बुरे का फैसला उसकी अनुपस्थिति में हो। उपस्थिति की उसी परंपरा को कायम रखते हुए जनज्वार पर गणपति का हिंदी में आये पहले विस्तृत साक्षात्कार के पहले हिस्से को प्रस्तुत किया जा रहा है.... अनुवाद- जनज्वार टीम


बहुत लोग ऐसा सोचते हैं कि आजाद की मृत्यु के कारण आपकी पार्टी को बड़ी क्षति उठानी पड़ी है। वे कौन सी परिस्थितियां थीं जिसके कारण उनकी मृत्यु हुई?

आजाद हमारी पार्टी के वरिष्ठ सदस्यों में थे। लंबे समय से वे भारतीय इन्कलाब का नेतृत्व कर रहे थे। साम्राज्यवादियों विशेषकर अमेरिकी साम्राज्यवादियों की मदद और सहयोग से भारतीय शोषक-शासक वर्ग आंदोलन के दमन का प्रयास कर रहा है और अभूतपूर्व स्तर पर क्रूर अत्याचार कर रहा है। जनता और शासक वर्गों के बीच हो रहे इस युद्ध में दुश्मन ने क्रांति का नेतृत्व करने वाले आजाद जैसे कामरेडों पर विशेष निशाना साधा और उनकी हत्या की योजना बनायी।

इसी षड्यंत्र के हिस्से के तौर पर कामरेड आजाद को पकड़ा गया और बहुत क्रूर और कायरतापूर्वक तरीके से उनकी हत्या कर दी। सोनिया-मनमोहन-चिदम्बरम गैंग, केंद्रीय गुप्तचर एजेंसियां तथा आंध्र प्रदेश एसआईबी (विशेष खुफिया ब्यूरो) द्वारा चलाये जा रहे ‘जनता के खिलाफ युद्ध’ का नेतृत्व करने वाले गृहमंत्री चिदम्बरम पर इस वीभत्स हत्या की प्रत्यक्ष जिम्मेदारी बनती है।

कामरेड आजाद केंद्रीय कमेटी की ओर से संपूर्ण शहरी आंदोलन का नेतृत्व कर रहे थे। इसके अलावा राजनीतिक प्रचार, पार्टी पत्रिकायें, पार्टी शिक्षा तथा अन्य दूसरी महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां भी उनके पास थीं। वे बहुत ही विश्वस्त जननेता थे। उन्होंने विभिन्न स्तर के कामरेडों और क्रांतिकारी जनता के साथ निकट संबंध बनाया हुआ था। भीषण दमन के दौर में उन्होंने निडर होकर निःस्वार्थ भाव से काम किया। इन्हीं कामों को अंजाम देते हुए दुश्मन को उनके बारे में कहीं से पता चला। तब वह उन्हें घात लगाकर पकड़ सका।

जुलाई में आजाद को दण्डकारण्य जाना था। वहां उन्हें पार्टी नेतृत्व व कैडर के लिए बनी राजनीतिक शिक्षण-प्रशिक्षण योजना में शामिल होना था। उन्हें एक जुलाई को नागपुर शहर में दण्डकारण्य के एक कामरेड से मिलना था,लेकिन उन्हें और उनके साथ यात्रा कर रहे पत्रकार हेमचंद्र को इससे पहले ही पकड़ लिया गया। दोनों को आदिलाबाद जंगल ले जाया गया और उसी रात उन्हें मार डाला गया। जिन्होंने उनके मृत शरीरों को देखा है, उनका कहना है कि ऐसा लगता है पकड़ने के बाद उन्हें नींद का इंजेक्शन दिया गया था।

इसका अर्थ यह है कि दुश्मन ने उन्हें मारने के इरादे से ही योजनाबद्ध तरीके से पकड़ा था। उन्होंने हेमचंद्र पाण्डेय की हत्या इसलिए की ताकि इस हत्या के बारे में सच्चाई बाहर न आ सके। दोनों के शरीरों को आदिलाबाद जिले के वानकिडी मंडल के जोगापुर जंगल में फेंक दिया गया और हमेशा की तरह झूठी मुठभेड़ की कहानी गढ़ दी गयी। हमारी पार्टी के साथ-साथ समूची जनता ने एक स्वर से इस फर्जी मुठभेड़ और कामरेड आजाद की हत्या की निंदा की है।

कई क्रांतिकारी पार्टियों,जनवादी व नागरिक अधिकार संगठनों ने इस झूठी मुठभेड़ के बारे में न्यायिक जांच की मांग की है। बुद्धिजीवियों, पत्रकारों, लेखकों और आंध्र सहित विभिन्न राज्य के छात्रों ने आजाद की हत्या के लिए केंद्र और राज्य सरकारों को जिम्मेदार ठहराया है। बहुतों ने लेख लिखे और बयान दिये। चार जुलाई को हैदराबाद में कामरेड आजाद की अंतिम यात्रा में हजारों लोग शामिल हुए। पूरी दुनिया की कई माओवादी पार्टियों ने उनकी हत्या की निंदा की और हमारी केंद्रीय समिति को पत्र लिखते हुए भारतीय क्रांति में आजाद के योगदान को सराहा। इस अवसर पर मैं अपनी केंद्रीय समिति की तरफ से उन सभी संगठनों और व्यक्तियों को क्रांतिकारी अभिवादन और आभार व्यक्त करता हूं।

वर्ष 1972 में वारंगल रीजनल इंजीनियरिंग कॉलेज में पढ़ाई करते हुए आजाद क्रांतिकारी आंदोलन की तरफ आकर्षित हुए। आजाद पढ़ाई में बहुत विलक्षण थे। 1974में रैडिकल स्टूडेंट यूनियन(आरएसयू)के गठन में आजाद ने भूमिका निभायी। 1978में वह आरएसयू के राज्य अध्यक्ष चुने गये। वह अखिल भारतीय क्रांतिकारी छात्र आंदोलन के संस्थापक सदस्यों में थे और 1985में इसकी शुरुआत से ही उसका मार्गदर्शन करते रहे। 1981 में तब के मद्रास शहर में राष्ट्रीयता के सवाल पर हुए सेमीनार को आयोजित करने में उन्होंने निर्णायक भूमिका निभायी। उसके बाद उन्होंने कर्नाटक में क्रांतिकारी आंदोलन गठित करने की जिम्मेदारी ली और पहली बार कर्नाटक में माओवादी पार्टी का गठन किया।

उन्होंने साकेत राजन जैसे विलक्षण प्रतिभा वाले अनेक कामरेडों को पार्टी की ओर आकर्षित किया। अवसरवादी तत्वों ने 1985 और 1991 में जब पार्टी को तोड़ने का प्रयास किया तब आजाद ने सर्वहारा दृष्टिकोण के साथ पार्टी की एकता बनाये रखने,उसे मजबूत करने और अवसरवादी राजनीति को परास्त करने में निर्णायक भूमिका अदा की। कामरेड आजाद 1990से आज तक केंद्रीय कमेटी सदस्य व पोलित ब्यूरो सदस्य के रूप में पिछले बीस साल से अब तक कार्य करते रहे। हम आजाद के जीवन को पिछले चालीस साल के क्रांतिकारी आंदोलन के इतिहास से अलग नहीं कर सकते। विशेष तौर पर उन्होंने विचारधारा,राजनीति के क्षेत्र में,पार्टी शिक्षा में तथा पार्टी की पत्रिकायें निकालने जैसे कामों में महत्वपूर्ण भूमिका निभायी।

पिछले तीन साल से आजाद के नाम से पार्टी प्रवक्ता की जिम्मेदारी विलक्षण तरीके से निभायी। उन्होंने अपनी बुद्धि और कलम का बेहतरीन इस्तेमाल करते हुए चिदम्बरम गैंग द्वारा चलाये जा रहे ‘जनता के खिलाफ युद्ध’ पर पुरजोर हमला किया। वह शासकों और शोषकों के खिलाफ जनता की आवाज बनकर खड़े हुए। पार्टी की राजनीतिक लाइन के विकास,पार्टी के विकास,जनसेना और जनसंगठनों के विकास में आंदोलनों को विस्तारित करने में नवजनवादी सत्ता निकायों के विकसित होने में और सभी विषयों में आजाद के वैचारिक-राजनीतिक काम और उनके व्यवहार ने महत्वपूर्ण भूमिका अदा की।

सभी तरह की मुसीबतों के सामने और आंदोलनों के उतार-चढ़ाव के बीच उनकी अडिग प्रतिबद्धता,महान त्याग का उनका स्वभाव,निस्वार्थता, सादा जीवन, क्रांति तथा जनता के लिए अनथक काम, गहन अध्ययन,समय-समय पर समाज में घटित होने वाली परिघटनाओं का अध्ययन, हमेशा जनता के साथ रहना ये कुछ महान सर्वहारा आदर्श थे जिन्हें कामरेड आजाद ने स्थापित किया था। यद्यपि वे हमारे बीच नहीं हैं, लेकिन निश्चित रूप से सभी क्रांतिकारियों, विशेषकर नौजवानों, छात्रों और बुद्धिजीवियों के लिए क्रांतिकारी आदर्श बने रहेंगे।

यह सच है कि इस क्षति की भरपायी करना बहुत मुश्किल है। क्योंकि कामरेड आजाद की जिंदगी क्रांतिकारी आंदोलन के विकास से पूरी तरह गुंथी हुई थी। वह एक महान क्रांतिकारी थे। जो आंदोलन के उतार-चढ़ाव के साथ फौलादी बन चुके थे। क्रांतिकारी आंदोलन इसी तरह से नेतृत्व पैदा करता है और तत्पश्चात वे नेता क्रांतिकारी आंदोलन को विजय के रास्ते पर आगे ले जाते हैं। अनेक नेताओं की कुर्बानी क्रांतिकारी आंदोलन में अपरिहार्य है। जो परिस्थितियां क्रांतिकारी आंदोलन को जन्म देती हैं,और उसके आगे बढ़ाने में मदद करती है वही उसके नेतृत्व को भी पैदा करती हैं। विश्व क्रांतिकारी इतिहास में यह बात बार-बार सिद्ध हुई है।

जो भौतिक परिस्थितियां आज हमारे देश में क्रांतिकारी आंदोलन के विकास के अनुकूल हैं,वही कामरेड आजाद जैसे हजारों नेताओं को पैदा करेंगी। कामरेड आजाद द्वारा किये गये वैचारिक-राजनीतिक और व्यावहारिक काम तथा उनके द्वारा स्थापित कम्युनिस्ट आदर्श इसके लिए आधार का काम करेंगी। सुरायनेनी जनार्दन की शहादत ने आजाद जैसे बहुत से कामरेडों के सामने एक आदर्श पेश किया था,उसी तरह आजाद की शहादत का आदर्श कई और क्रांतिकारियों को पैदा करेगा। दुश्मन आजाद को भौतिक रूप से तो खत्म कर सकता है,लेकिन पार्टी और जनता के बीच फैले उनके विचारों को भौतिक ताकत बनने से नहीं रोक सकता।

पार्टी इतिहास में हमने कई महत्वपूर्ण नेताओं को खोया है और कई उतार-चढ़ावों का सामना किया है। फिर भी हमेशा संभलकर खड़े हुए हैं और आंदोलन को आगे बढ़ा सके हैं। देश के विभिन्न हिस्सों से शिक्षित कैडरों को पार्टी में भर्ती कर रहे हैं। हमें विश्वास है कि इन्हें व्यवहार में प्रशिक्षित करके आजाद की मृत्यु से पैदा होने वाले शून्य  को भर सकेंगे। शासक वर्ग खुशी से चिल्ला रहा है कि उसने आजाद की हत्या करके ज्ञान के पात्र को तोड़ दिया है,लेकिन वे मूर्ख यह नहीं समझ पा रहे हैं यहां बिखरे उसी ज्ञान से हजारों आजाद पैदा होंगे। आजाद जब जिंदा थे तो उन्होंने अपने राजनीतिक आक्रमण से शासक वर्ग को हिला रखा था। उनकी मृत्यु के बाद भी शासकवर्ग उनसे डरा हुआ है और उनके नाम से ही कांपने लगता है।

आजाद की मृत्यु के पहले भी हमने महत्वपूर्ण कामरेडों को झूठी मुठभेड़ों में खोया है और बहुत से लोग गिरफ्तार हुए हैं। ये क्षतियां भी बहुत भारी हैं,लेकिन हम निश्चय ही इन क्षतियों से उबरेंगे और दृढ़ता के साथ क्रांतिकारी आंदोलन को आगे बढ़ायेंगे।


आजाद की मौत के बाद क्या आप मानते हैं कि वार्ता अभी संभव है ?

आपको यह सवाल चिदम्बरम और मनमोहन सिंह से पूछना चाहिए। पिछले डेढ़ वर्षों के दौरान मैंने, कामरेड आजाद और किशन जी ने कई बार वार्ता के संदर्भ में पार्टी की राय रखी है। जबकि सरकार अपनी अंतहीन हिंसा को छिपाते हुए हर बार यह कहती है कि वार्ता तभी होगी जब माओवादी हिंसा छोड़ेंगे। चिदम्बरम हर बार यह बात चिल्ला-चिल्लाकर कहते हैं। जनता के खिलाफ चलाये जा रहे इस युद्ध और इस कारण जनता द्वारा झेली जा रही कठिनाइयों को ध्यान में रखते हुए कामरेड आजाद ने अंतिम समय तक यह बार-बार घोषित किया था कि यदि सरकार तैयार हो तो हम एक साथ युद्धविराम करने को तैयार हैं।

उनका इरादा था कि जनता द्वारा झेली जा रही कठिनाइयों को यथासंभव कम किया जाये। उन्होंने इसी मांग का जिक्र स्वामी अग्निवेश को लिखे पत्र में भी किया था। चिदम्बरम और मनमोहन सिंह ने न सिर्फ उन्हें षड्यंत्रकारी तरीके से मार दिया,बल्कि एक बार फिर बेशर्मी के साथ धोखेबाजी का खेल शुरू कर दिया। वस्तुतः सरकार वार्ता की जरूरत ही नहीं महसूस करती। यदि बुद्धिजीवियों, जनवादियों और जनता की इच्छित शांति  को स्थापित करना है तो यह बहुत ही अनर्थकारी बात होगी कि जनता द्वारा चलायी जा रही प्रतिहिंसा को रोकने की मांग की जाये, जबकि उसी समय सरकार अपनी हत्या की मशीन चालू रखे।

जब चिदम्बरम ने यह ऐलान किया था कि माओवादी 72 घंटे के लिए हिंसा बंद करें तब किशन जी ने 72 दिन की बात करके उन्हें इसका उत्तर दिया। जवाब में चिदम्बरम ने किशन जी को लक्ष्य करके उन्हें मारने के उद्देश्य से अपना हमला और तेज कर दिया। अग्निवेश को पत्र लिखने वाले आजाद को लक्ष्य किया गया और उनकी हत्या कर दी गयी। आपरेशन ग्रीन हंट  के बतौर 1 लाख अर्धसैनिक बल और 3 लाख राज्य बलों को तैनात किया गया है। इनमें से विशेष बल मुख्य ताकत है।

प्रत्येक दिन, प्रत्येक घंटे और प्रत्येक मिनट ये सशस्त्र बल जनता पर अनगिनत अत्याचार कर रहे हैं। इसका विरोध करने वाले जनवादियों और जनता को निशाना बनाया जा रहा है और उन्हें यूएपीए और दूसरे राज्य-काले कानूनों के तहत जेलों में डाला जा रहा है। प्रतिक्रियावादियों और मीडिया में उनके दलालों के अलावा इस देश में कोई भी जनता के खिलाफ इस युद्ध का समर्थन नहीं कर रहा है। यदि कुछ लोग  व्यक्तिगत इसका समर्थन कर रहे हैं तो इसका कारण यह नहीं है कि उन्हें तथ्य पता हैं, बल्कि वे मासूमियत के साथ सरकार के झूठे प्रचार पर विश्वास कर रहे हैं। हम समझते हैं कि अभी वार्ता के लिए अनुकूल माहौल नहीं है।

अग्निवेश जैसे लोग हमसे कह रहे हैं कि आजाद की हत्या के बावजूद हम वार्ता की प्रक्रिया से पीछे न हटें और वार्ता के लिए आगे आयें। हम उनसे कहना चाहते हैं कि क्या वे सरकार द्वारा हमारे पार्टी नेताओं को मारने के उनके षड्यंत्रों को रोक सकते हैं? निःसंदेह कामरेड आजाद की हत्या एक षड्यंत्र के तहत सरकार द्वारा की गयी है। पोस्टमार्टम रिपोर्ट और फोरेंसिक रिपोर्ट में भी इसकी पुष्टि हुई है। अतः हम सभी जनवादी लोगों,शांतिप्रिय बुद्धिजीवियों और मानवाधिकार संगठनों से अनुरोध करते है कि वे आगे आयें और दृढ़तापूर्वक आजाद की हत्या के लिए न्यायिक जांच की मांग करें। बहुत साफ है कि वार्ता के लिए अनुकूल माहौल नहीं है। इसके बावजूद हम जनता और जनवादी लोगों से अनुरोध करते हैं कि वे सरकार से मांग करें कि सरकार निम्न बिंदुओं को लागू करते हुए वार्ता की प्रक्रिया के बारे में अपनी प्रतिबद्धता को सिद्ध करें-

1. आपरेशन ग्रीनहंट बंद करो। अर्धसैनिक बलों को वापस बुलाओ। यदि सरकार जनता पर अपना आक्रमण बंद करती है तो जनता का प्रति आक्रमण भी बंद हो जायेगा।

2. हम उसी तरह एक राजनीतिक पार्टी हैं जैसे विश्व और अपने देश की कई राजनीतिक पार्टियां हैं। हमारी पार्टी की एक विचारधारा है, एक सैन्य नीति है और स्पष्ट उद्देश्य है। संस्कृति, जाति, लिंग, राष्ट्रीयता, पर्यावरण आदि के बारे में एक साफ और सही नीति है। शासक वर्ग की इन पार्टियों द्वारा सूत्रित कानून के अनुसार भी हमारी पार्टी पर जनवादी कानून लागू होते हैं। अतः हमारी पार्टी से प्रतिबंध हटना चाहिए। हमारे जनसंगठनों पर से प्रतिबंध हटना चाहिए। जनलामबंदी के लिए लोकतांत्रिक अवसरों का निर्माण किया जाना चाहिए। ऐसी परिस्थितियों में ही, जहां हम लोकतांत्रिक तरीके से काम कर सकेंगे हम वार्ता के लिए आगे आ सकते हैं।

3. आंध्र प्रदेश में 2004 में सरकार के साथ हुई वार्ता में भाग लेने वाले कामरेड रियाज को पकड़ लिया गया और उन्हें बुरी तरह यातना देने के बाद मार डाला गया। वार्ता में भाग लेने वाले अन्य लोगों को भी निशाना बनाया गया है और उनकी हत्या के प्रयास हुए हैं। अब वार्ता की प्रक्रिया को आगे बढ़ाने में लगे कामरेड आजाद की हत्या कर दी गयी। अतः सरकार पर विश्वास नहीं किया जा सकता और भूमिगत कामरेडों को वार्ता के लिए नहीं भेजा जा सकता। अतः यदि सरकार जेल से हमारे नेतृत्वकारी कामरेडों को छोड़ती है तब वे हमारी पार्टी की ओर से प्रत्यक्षतः वार्ता में भाग ले सकते हैं।

अतः आप सभी को इन तीनों मांगों पर विचार करना चाहिए और इन्हें सरकार के सामने रखना चाहिए। हम एक बार फिर यह साफ करना चाहते हैं कि वार्ता से संबंधित कोई भी सवाल सबसे पहले सरकार के सामने रखना चाहिए, हमारे सामने नहीं।

जीके पिल्लई, प्रकाश सिंह और चिदम्बरम जैसे लोग यह कह रहे हैं कि हमारी पार्टी पर फासीवादी सैन्य हमलों को तेज करके और जनता का नरसंहार करके जब तक दबाव नहीं बनाया जाता, तब तक हम उनकी बात नहीं मानेंगे। वे कल्पनालोक में जी रहे हैं। दबाव बनाना,वार्ता के नाम पर विभ्रम खड़ा करना,छल करना और पार्टी को नष्ट करना-यह सरकार की रणनीति का हिस्सा हैं। वे सिर्फ दमन में विश्वास करते हैं और विचारधारा और राजनीति के क्षेत्र में हमारा सामना करने में वे असमर्थ हैं।

अपने देश और संपूर्ण मानव समाज से शोषण,दमन तथा हिंसा को खत्म करके स्थायी शांति  की स्थापना के बड़े उद्देश्य के लिए जनता हमारी पार्टी के नेतृत्व में लड़ाई लड़ रही है। हम वार्ता और शांति  के मुद्दे को वर्ग संघर्ष के हिस्से के तौर पर भी देखते हैं। जब वर्ग संघर्ष तीखा होता है तब यह सशस्त्र होता है। दूसरी परिस्थितियों में इसे शांतिपूर्ण  तरीके से भी चलाया जाता है। अतः यह पूरी तरह से झूठ है कि हमारी पार्टी वार्ता के लिए तभी तैयार होगी जब उस पर दबाव बनाया जायेगा। मीडिया के द्वारा भी एक झूठा प्रचार यह चलाया जा रहा है कि हमारी पार्टी में वार्ता को लेकर मतभेद हैं और यह मतभेद भूतपूर्व एमसीसीआई और भूतपूर्व पीडब्ल्यू की लाइन के आधार पर हैं। यह सौ प्रतिशत झूठ है।

दुश्मन द्वारा प्रचारित किया जा रहा यह झूठा प्रचार और कुछ नहीं,बल्कि हमारी पार्टी और उसके उद्देश्यों के बारे में जनता के दिमाग में संदेह पैदा करने का प्रयास है। हमारी एकता कांग्रेस ने वार्ता के विषय में एक साफ अवस्थिति ली है। पार्टी में सही और गलत विचारों के बीच संघर्ष एक निरंतर चलने वाली प्रक्रिया है। हम अपने मतभेदों को मार्क्सवाद -लेनिनवाद-माओवाद की रोशनी में जनवादी केंद्रीयता के सिद्धांत के आधार पर हल करते हैं। इससे पार्टी का विकास होता है।

दोनों पार्टियों के विलय से हमने महान एकता हासिल की है। अब हमारी पार्टी में कोई भी बहस या मतभेद एकीकृत पार्टी के बीच वैचारिक राजनीतिक बहस के रूप में है,न कि भूतपूर्व एमसीसीआई और सीपीआईएमएल पीडब्ल्यू के बीच के मतभेद के रूप में। हम स्पष्ट कहते हैं कि हमारे बीच के मतभेद कभी भी विलय के पहले मतभेदों का रूप नहीं लेंगे।


आप कहते हैं कि सरकार ने जनता के खिलाफ युद्ध घोषित कर रखा है,लेकिन सरकार कहती है कि कहीं कोई युद्ध नहीं है और आपरेशन ग्रीन हंट मीडिया की कल्पना मात्र है।

सिर्फ हम ही यह नहीं कह रहे हैं कि सरकार ने जनता के खिलाफ युद्ध का ऐलान किया हुआ है। सभी लोग एक स्वर से यह बात कह रहे हैं। यह युद्ध जिन क्षेत्रों में चलाया जा रहा है,वहां के सारे लोग यह कह रहे हैं। सभी जनवादी संगठन,प्रगतिशील ताकतें और हमारे देश के जनवादी लोग बहुत साफ तरीके से कह रहे हैं कि सरकार जनता के खिलाफ युद्ध चला रही है और वे इसकी भत्र्सना कर रहे हैं।

लांग कुमार,कल्लूरी और विश्वरंजन यह घोषणा कर रहे हैं कि आपरेशन ग्रीन हंट चल रहा है। वहीं दूसरी ओर चिदम्बरम बेशर्मी से ऐलान कर रहे हैं कि ऐसा कुछ नहीं है। धीरे-धीरे यह साफ हो चुका है कि ग्रीन हंट कितनी क्रूर-भयानक और फासीवादी कार्रवाई है और कितने भयानक तरीके से इसे चलाया जा रहा है। वस्तुतः उन सभी राज्यों में जहां माओवादी आंदोलन मौजूद है,करीब एक लाख अर्धसैनिक बल तैनात हैं। यदि नौ-दस राज्यों में हमारे आंदोलन के खिलाफ तैनात पुलिस बलों की गणना करें तो वह संख्या तीन से चार लाख होती है।

इतनी बड़ी संख्या में बलों की तैनाती का क्या कारण है,ये बल रोजाना क्या करते हैं,वे कारपेट सुरक्षा को क्यों बढ़ा रहे हैं? बेस कैंपों का निर्माण,विशेष प्रशिक्षण स्कूलों का निर्माण तथा जंगल युद्ध कौशल स्कूलों का निर्माण क्यों किया जा रहा है?इन राज्यों इतनी तेजी के साथ बजट क्यों बढ़ाया जा रहा है?सरकार ने एक बार में ही 13500करोड़ रुपये का पैकेज क्यों जारी किया है?आंतरिक सुरक्षा पर एक ट्रिलियन रुपये की बड़ी राशि क्यों आवंटित की गयी है। हमारे आंदोलन को खत्म करने की योजना के लिए प्रत्येक वर्ष हजारों करोड़ रुपये केंद्र और राज्य सरकारें क्यों खर्च कर रही हैं? छत्तीसगढ़, झारखण्ड, बिहार, उड़ीसा, महाराष्ट्र, उत्तरी आंध्र प्रदेश और उत्तरी तेलंगाना जैसे हमारे मजबूत क्षेत्रों में सरकार सफाया अभियान क्यों चला रही है?

सफाया अभियान का मतलब है- सबकुछ नष्ट कर देना। किसी को भी मारा जा सकता है, गिरफ्तार किया जा सकता है, गायब किया जा सकता है और बलात्कार किया जा सकता है। संपत्ति, घर, फसल आदि को नष्ट किया जा सकता है। यह और कुछ नहीं बल्कि फासीवादी शासन है। सरकार इस युद्ध में सशस्त्र दमन को मुख्य हथियार बनाये हुए है। इसके अलावा वह विचारधारात्मक,मनोवैज्ञानिक और सांस्कृतिक क्षेत्रों में भी आक्रामक अभियान चलाये हुए है।

जनता हमारी पार्टी के नेतृत्व में स्वयं को संगठित कर रही है,जिसके पास जनयुद्ध को तेज करते हुए,वर्तमान शोषक वर्गों के शासन के विकल्प के रूप में नवराजनीतिक सत्ता,नई अर्थव्यवस्था और नई संस्कृति को स्थापित करने की एक स्पष्ट रणनीति है। हमारी पार्टी के नेतृत्व में पीएलजीए,हमारे नये सत्ता निकाय और जनता कई राज्यों जैसे उड़ीसा, बंगाल, झारखंड, छत्तीसगढ़, महाराष्ट्र, आंध्र प्रदेश में केंद्र और राज्य सरकारो और बहुराष्ट्रीय कंपनियों तथा बड़े दलाल कारपोरेट घरानों के बीच हुए अरबों रुपये मूल्य के एमओयू के खिलाफ जीवन-मरण का संघर्ष चला रही है। जनता और क्रांतिकारी ताकतें एकताबद्ध होकर और मजबूती से सरकार द्वारा दिन-प्रतिदिन तेज किये जा रहे जनता के खिलाफ युद्ध का विरोध कर रही हैं और इसके खिलाफ लड़ रही हैं। पूरे विश्व की साम्राज्यवाद विरोधी ताकतें और क्रांतिकारी सर्वहारा भी अपने देश के शासक वर्गों द्वारा जनता के खिलाफ चलाये जा रहे युद्ध का मजबूती से विरोध कर रही हैं।

मैं स्पष्ट तौर पर कहना चाहता हूं कि सरकार का यह युद्ध राजनीतिक तौर पर एक अन्यायपूर्ण युद्ध है। शासक वर्गों द्वारा चलाये जा रहे इस युद्ध का एक साफ राजनीतिक उद्देश्य है। आत्मरक्षा में जनता द्वारा चलाये जा रहे इस युद्ध का भी एक स्पष्ट राजनीतिक उद्देश्य है। हम शोषण और दमनकारी व्यवस्था को नष्ट करके एक नये समाज की स्थापना के उद्देश्य के लिए लड़ रहे है।

सर्वप्रथम हम इस युद्ध का मुकाबला राजनीतिक तरीके से करना चाहते हैं। हमारा मानना है कि व्यापक जनता जितनी गहरायी से इस बात को समझेगी,जितने व्यापक स्तर पर वह स्वयं को संगठित करेगी और जितने व्यापक स्तर पर वह अपने आपको सशस्त्र करेगी,उसी हिसाब से हम इस युद्ध को जल्दी से जल्दी समाप्त करने में सक्षम होंगे। इसके लिए हम मजबूती से कदम बढ़ा रहे हैं। इसीलिए हम दुश्मन से सभी क्षेत्रों में चौतरफा लड़ाई लड़ रहे हैं।

(जारी....)
 
 
 

Jan 2, 2011

जहाँ मैं साँस ले रहा हूँ अभी

नीलाभ 


जहाँ मैं साँस ले रहा हूँ अभी
 वहाँ से बहुत कुछ ओझल है
ओझल है हत्यारों की माँद
 ओझल है संसद के नीचे जमा होते
किसानों के ख़ून के तालाब
ओझल है देश के सबसे बड़े व्यापारी
की टकसाल
ओझल हैं ख़बरें और तस्वीरें और शब्द


जहाँ मैं साँस ले रहा हूँ अभी
वहाँ से ओझल हैं
सम्राट के आगे हाथ बाँधे खड़े फ़नकार
ओझल हैं उनके झुके हुए सिर,
सिले हुए होंट, मुँह पर ताले, दिमाग़ के जाले
जहाँ मैं साँस ले रहा हूँ अभी
वहाँ एक आदमी लटक रहा है
छत की धन्नी से बँधी रस्सी के फन्दे को गले में डाले
बिलख रहे हैं कुछ औरतें और बच्चे
भावहीन आँखों से ताक रहे हैं पड़ोसी
अब भी बाक़ी है
लेनदार बैंकों और सरकारी एजेन्सियों की धमकियों की धमक


जहाँ मैं साँस ले रहा हूँ अभी
वहाँ दूर से सुनायी रही हैं
हाँका लगाने वालों की आवाज़
धीरे-धीरे नज़दीक आती हुईं
पिट रही है डुगडुगी, भौंक रहे हैं कुत्ते,


जहाँ मैं साँस ले रहा हूँ अभी
भगदड़ मची हुई है आदिवासियों में,
कौंध रही हैं संगीनें वर्दियों में सजे हुए जल्लादों की
शिकार पर निकला है राजा चिदम्बरम
वेदान्त के रथ पर
जहाँ मैं साँस ले रहा हूँ
वहाँ एक सुगबुगाहट है
आग का राग गुनगुना रहा है कोई
बन्दूक को साफ़ करते हुए,
जूते के तस्मे कसते हुए,
पीठ पर बाँधने से पहले
पिट्ठू में चीज़ें हिफ़ाज़त से रखते हुए
लम्बे सफ़र पर जाने से पहले
उस सब को देखते हुए
जो नहीं रह जाने वाला है ज्यों-का-त्यों
उसके लौटने तक या न लौटने तक
इसी के लिए तो वह जा रहा है
अनिश्चित भविष्य को भरे अपनी मैगज़ीन में
पूरे निश्चय के साथ

Jan 1, 2011

नया साल मुबारक हो !



जनज्वार के पाठकों,सहयोगियों,आलोचकों के साथ उन सभी को नए साल की हार्दिक बधाई जो इस मीडिया माध्यम को जनमाध्यम बनाने में लगातार साथ-साथ सोचने की प्रक्रिया में भागीदार हैं.आप सबकी यही भागीदारी जनज्वार की मजबूती है.इस मजबूती को सामयिकता की दृढ़ता कैसे दी जाये,यह भी आपकी भागीदारी ही सुनिश्चित करेगी. तो आईये एक बेहतर कल की तैयारी के साथ, आज से ही कुछ शुरू करें...


शुभकामनाओं के साथ  
जनज्वार टीम
संपर्क: janjwarmail@gmail.com




Dec 31, 2010

दगा दे गयी माओवादी दाग छुड़ाने की तरकीब

बिनायक सेन की जेल से रिहाई के लिए चलाए गए आंदोलन में इसी बात पर जोर दिया गया कि वह माओवादी नहीं है,अहिंसावादी हैं। जज शायद इन तर्कों में छिपे फांफड़ को देख लिया था और बिना साक्ष्य के भी यह सिद्ध कर दिया कि बिनायक सेन माओवादी हैं...

अंजनी कुमार


विनायक  सेन  के समर्थन में चंडीगढ़ में प्रदर्शन
‘यह न्याय नहीं है बल्कि द्वेष से भरी एक अन्यायपूर्ण सजा है। यह सजा एक ऐसे अहिंसावादी मानवाधिकार कार्यकर्ता को दी गयी है जिसने जनता के अधिकारों के हनन को चुनौती दी....फैसला देश की लोकतांत्रिक बुनावट पर एक क्रूर हमला है।’ मेधा पाटकर के इस बयान से क्या यह निष्कर्ष निकाला जाय कि अहिंसावादी सरकार के लिए अपराधी नहीं होते हैं? क्या इससे यह निष्कर्ष निकाला जाय कि माओवादी अपराधी इसलिए हैं कि वे हिंसावादी हैं?

तब क्या अपराध का प्रश्न हिंसा-अहिंसा से जुड़ा हुआ है?तब यह इस बात को याद कर लेना जरूरी है कि ब्रिटिश हुकुमत वाले भारत में गांधी जी व शहीद भगत सिंह दोनों ही बहुत से मामलों में अपराधी ठहराए गए। आज हम दोनों को ही महात्मा व शहीद ए आजम के रूप में याद करते हैं। ठीक ऐसा 1857 के गदर को याद करते हुए करते हैं। तब क्या यह माना जाय कि अपराध का प्रश्न व्यवस्था से जुड़ा हुआ है? निजाम ए कोहना से जुड़ा हुआ है? न्याय की पीठ पर बैठे सैययादों से जुड़ा है?

अनुभव तों यही बता रहे हैं,विश्लेषण हमें वहीं पहुंचा रहे हैं,विमर्श का निष्कर्ष यहीं पहुंच रहा है। लेकिन कॉमन सेंस अभी भी कुछ और बना है। जिसके चलते बिनायक सेन को रायपुर की स्पेशल कोर्ट द्वारा दिये गए आजीवन कारावास की सजा के खिलाफत में इस तरह के हजारों बयान,लेख लगातार छपते ही जा रहे हैं।

बिनायक सेन के साथ नारायण सान्याल व पीयूष गुहा को भी आजीवन कारावास की सजा दी गई। बल्कि इस बात को यूं कहना ठीक होगा कि बिनायक सेन को सजा ही इस बात से हुई कि वह नारायण सान्याल व पीयूष गुहा के साथ उनके संबंध एक गवाह के बयान के आधार पर सिद्ध हुए और जज के अनुसार यह स्वयंभू साक्ष्य था कि वे दोनों सीपीआई-माओवादी पार्टी के सदस्य थे। इस कारण से स्वभावतः गुनहगार थे।

ऐसा लगता है कि इन दोनों की गुनहगारी को अपने देश की बुद्धिजीवियों की सोसायटी की बहुसंख्या पहले से ही स्वीकार कर चुकी थी। शायद यही कारण था जिसके चलते बिनायक सेन की जेल से रिहाई के लिए चलाए गए आंदोलन में इसी बात पर जोर दिया गया कि वह माओवादी नहीं है,अहिंसावादी हैं,आदि आदि। जज शायद इन तर्कों में छिपे फांफड़ को देख लिया था और बिना साक्ष्य के भी यह सिद्ध कर दिया कि बिनायक सेन माओवादी हैं। उसने दो ‘हार्डकोर नक्सलाइटों’शंकर सिंह व अमिता श्रीवास्तव का जिक्रकर बिना मुकदमा ही उनका अपराध घोषित कर दिया। जाहिर है एक संकरे रास्ते को जज ने हाइवे बना दिया जिस पर से देशद्रोही,अपराधियों को सरपट दौड़ाया जा सकता है।

प्रतिरोध के हर स्वर को आंतकवादी,नक्सलाइट, माओवादी घोषित कर लैंड ऑफ रूल पर अब लाखों लोगों का मार्च पास्ट करा देने के लिए शासक वर्ग के पास एक नायाब रास्ता हासिल हो चुका है। जबकि सिविल सोसायटी की बहुसंख्या अभी भी साक्ष्य की लकीर पीटने में मशगूल है। सच्चाई यह है कि न्यायपालिका में साक्ष्य के संवैधानिक व दंड संहिता के प्रावधान को अनगिनत बार धज्जी उड़ाते हुए बाहर फेंक दिया गया और जज ने ‘संप्रभु साक्ष्य’गढ़े और न्याय वही सुनाया जिसे प्रभुत्वशाली वर्ग सुनना चाहता था। मसलन, राम का जन्म व जन्म स्थान संप्रभु साक्ष्य है, सवर्ण दलित स्त्री को नहीं छू सकता यह संप्रभु साक्ष्य है, बारा हत्याकांड में रात के अंधेरे में 16 दलित लोगों को पुलिस कांस्टेबल द्वारा पहचान लेना स्वभाविक साक्ष्य है और व्यापारी अनिल कुमार सिंह द्वारा दिया गया बयान 1872 अधिनियम के तहत साक्ष्य है।

दरअसल न्याय ने अपने पाठ का अर्थ बदल दिया है। उसने शब्दों के निहितार्थ बदल दिए हैं। इसने अपने क्षेत्र को इतना विस्तारित किया है कि उसका चौखटा हमारे घरों के भीतर घुस आया है और उसका हथौड़ा सीधा हमारे सिर के उपर गिर रहा है ---सजा की तरह और धमकी की तरह भी। 1947 से आज तक देश की सुरक्षा के नाम केन्द्रिय स्तर पर 16 वैधानिक प्रावधान पारित हो चुके हैं। इसमें राज्य स्तरीय विधानों को जोड़ दिया जाय तो गिनती सैकड़ा पार कर जाएगी। मीसा,टाडा, पोटा, यूएपीए व राज्य स्तरीय छत्तीसगढ़ विशेष जन सुरक्षा अधिनियम, मोकोका जैसों से हम ज्यादा रूबरू हुए।

यही वे कानून हैं जिसके तहत कम्युनिस्टों,मुसलमानों,दलित-आदिवासीयों,कश्मीर व उत्तर-पूर्व की राष्ट्रीयताओं और यहां तक कि समय समय पर अपने राज्य व भाषा की पहचान की मांग करने वालो के खिलाफ राज्य की सुरक्षा की बंदूक से बच रहे लोगों के खिलाफ न्याय के विशेष अभियान के तहत प्रयोग किया गया।पत्रकारों,मानवाधिकार-सामाजिक कार्यकर्ताओं,असहमत राजनीतिक व बौद्धिक लोगों के खिलाफ इन्हीं के तहत बूट की नकेल का प्रयोग किया गया। आज बहुत से सयाने बन गए लोग इन्हीं क्रूरताओं से होकर-भोगकर निकले हैं। इसी के तहत ही अंतराष्ट्रीय स्तर की वामपंथी पत्रिका ‘ए वर्ल्ड टू विन’के हिन्दी संस्करण के संपादक असित सेन गुप्ता को गुनहगार ठहराकर आठ साल की सजा सुनाई गई। उन्हें भी बिनायक सेन की तरह के साक्ष्यों के आधार पर जज ने सजा मुकर्रर कर दी।

जिन साक्ष्यों के आधार पर असिल सेन गुप्ता को सजा दी गई उससे इस देश की हजारों पत्रकार, लेखक, बुद्धिजीवी, अकादमिशियन आदि सैकड़ों बार जेल की हवा खाने और जजों के न्याय के हथौड़े की मार सहने के लिए तैयार रहना होगा। यही वे कानून हैं जिनके अस्तित्व में आने के साथ ही इस देश की संघीय समाजवादी लोतांत्रिक जनवादी संवैधानिक व कानून आधारित न्यायपूर्ण जीवन के पाठ का अर्थ बदल गया। राजनीति में ‘जन’ एक ऐसी वैधानिक शब्दावली में बदल गया जिसका वास्तविक अर्थ ‘अभिजन’ ही निकलता है। ‘देश’ पाश के शब्दों में जांघिए का नाड़े का पर्यायवाची में बदल गया जिसके प्रयोग प्रतिरोध व अभिव्यक्ति का गला घोंट देने किया जाने लगा। और ‘भारत’ फासिस्ट हिन्दुत्ववादियों के लिए ढाल व तलवार और आग में बदल गया। ‘धर्म निरपेक्षता’से चिरायंध गंध आने लगी और कानून-व्यवस्था का अर्थ लोमड़ों का आशियाना बन गया जहां से गैरबिरादरों को साबूत नहीं लौटना है।

मेधा  पाटेकर बिनायक सेन के पक्ष में सोलहो आने ठीक दलील देती हैं कि बिनायक सेन अहिंसावादी हैं। लेकिन बिनायक सेन हिंसक हैं यह कहकर उन्हें सजा नहीं दी गई। उन्हें तो इस देश की वर्तमान व्यवस्था को पलट देने व इसके खिलाफ षडयंत्र करने के लिए सजा ए आजीवन कारावास दिया गया। इसी के तहत पीयूष गुहा,असित सेनगुप्ता व नारायण सान्याल को सजा दी गई। अब तक हजारों लोग इसी के तहत सजा भुगतते जा रहे हैं। तब क्या यहां मसला हिंसक-अहिंसक होने का है? क्या हिंसक हो जाने से ही अपराध तय हो जाता है और अहिंसक अपराधी ही नहीं होते?अपने देश में राजनीतिक हिंसा में मरने वालों की संख्या प्रतिवर्ष सैकड़ा के उपर है और इसके लिए संसदीय राजनीतिक पार्टियां जिम्मेदार होती हैं। तब क्या इसके लिए इन पार्टियों के नेतृत्व प्रकाश करात,बुद्धदेव भट्टाचार्य, ममता बनर्जी, जय ललिता, सोनिया गांधी, लालकृष्ण आडवाडी, मुलायम सिंह, चंद्रबाबू नायडू, आदि आदि जिम्मेदार ठहराए जाते हैं? यह दिगर बात है कि बुद्धिजीवी  सोसायटी का एक बड़ा हिस्सा मोदी को छोड़ किसी को भी इस दायरे में घसीटने से बचता हैं।

इसी तरह किसी भी संसदीय पार्टी का कार्यक्रम वर्तमान व्यवस्था के संविधान व कानून के अनुरूप नहीं है। इनके बीच एका सिर्फ इस विदेशी पूंजी व देश के पूंजीपतियों, जमींदारों, बड़ी जमीन के मालिकों, व्यापारियों आदि के पक्ष में खड़ा होने को लेकर है। कई इससे भी सहमत नहीं हैं। एक बार फिर यह सवाल बनता है कि चल रही व्यवस्था की खिलाफत भी अपराध नहीं है तब अपराध क्या है!अपने देश में बहुत पहले से ही सीविल सोसायटी ने न्याय व्यवस्था को अस्वीकार करते हुए सामांनांतर जन सुनवाई व न्याय की प्रक्रिया को अपना लिया था और अब तो यह एक रोजमर्रा की बात है। यह भी माओवादियों की इजाद व्यवस्था नहीं। ठेठ दिल्ली में कांस्टीट्यूशनल क्लब के भवन में न्याय की जन व्यवस्था यानी जनसुनवाई की जाती है।

यदि सामानांतर व्यवस्था की बात करना ही नहीं बल्कि व्यवहार में एक हद तक उसे उतारना भी अपराध नहीं है तब प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के आंतरिक सुरक्षा के राग का वास्तविक अर्थ क्या है?भगवा फासिस्टों की देश की अखंडता का निहितार्थ क्या है? और सीपीएम के हिंसक अराजकतावादियों के खिलाफ अभियान के पीछे की सोच क्या है? क्या इसलिए कि ‘आतंकवादियों’ व नक्सलाइटों के पास सेना या गुरिल्ला है?यह बात भी सच् नहीं लगती क्योंकि यह सब कुछ तो संसदीय राजनीतिक पार्टियों के पास है और और तो और इन धर्म के पुजारियों, निरंकारियों के पास भी यह सब कुछ खुलेआम है। रही बात इस व्यवस्था से असहमत होने व इसे बदल देने की तो यह मांग आम हो चुकी है और संसद के भीतर व बाहर,अकादमी से भीतर व बाहर, हर जगह चल रही है।ऐसे में बुद्धिजीवी सोसायटी की बहुसंख्या जब बिनायक सेन माओवादी नहीं है, के आधार पर संघर्ष शुरू करती है तो इससे स्वभावतः यह साबित हो जाता है कि जेलों में बंद माओवादी-नक्सलवादी अपराधी ही हैं।

न्याय के विमर्श में यह एक अद्भुत परिघटना है जो कोर्ट के भीतर ही नहीं हमारे बीच भी तय किया जा रहा है कि माओवादी अपराधी हैं और यही बात तो अदालत भी कह रही है। विनायक की सजा का आधार भी यही है। यह बहस कि एक नागरिक समाज में यूएपीए जैसा कानून वैध है या नहीं,राजनीतिक सामाजिक परिघटनाओं का कोई ऐतिहासिक, तात्कालिक कारण व उसकी प्रासंगिकता है या नहीं, आदि आदि सवालों से टकराए बिना ही कॉमन सेंस के आधार पर बुद्धिजीवी सोसायटी के विमर्श का नतीजा एक खतरनाक निष्कर्ष तक जा रहा है कि दरअसल, विनायक सेन माओवादी नहीं है।

हिंसा सामानांतर व्यवस्था की बात करना, सामानांतर कोर्ट खड़ा करना,सेना बना लेना, अपराध नहीं है तब इस व्यवस्था में अपराध क्या है?या यूं कहें कि बिनायक सेन व माओवादियों का और यहां तक कि गांधीवादियों का अपराध क्या है?बिनायक सेन एक ऐसी अस्पताल व्यवस्था से जुड़े जो आदिवासियों व मजदूरों के लिए बनाई गई थी। जिसकी स्थापना मजदूर नेता शंकर गुहा नियोगी ने की थी। एक डाक्टर के पेशे के तहत वे आदिवासियों की रिहाइशों की तरफ बढ़े और उनके जीवन के भौतिक उत्पादन व रहन सहन की बदहालियों को समझते हुए रोग व जीवन को दुरूस्त करने के प्रयास में लग गए।

विनायक सेन ने आदिवासियों की संपदा की लूटपाट और उन्हें उजाड़ने के षडयंत्रों को समाज के सामने रखना शुरू किया। खनिज, जमीन, बीज, जल और उनके श्रम की लूट की खिलाफत का अर्थ बहुराष्ट्रीय-राष्ट्रीय पूंजीपतियों की लूट को रोकना था। बिनायक सेन मानवीय जीवन के मौलिक अधिकारों के सवालों को एक संदर्भ देकर उसे न केवल हमारे बीच, सरकारी-गैरसरकारी संस्थानों के बीच बल्कि आदिवासियों के बीच एक बहस को केन्द्र में ला रहे थे कि इस कथित विकास की नीति में मनुष्य कहां है।

इसलिए यहां सवाल बिनायक सेन या वनवासी चेतना आश्रम के प्रमुख हिमांशु के हिंसक होने या न होने का नहीं है बल्कि उस प्रक्रिया का है जिसकी वजह से छत्तीसगढ़ में केंद्र और राज्य सरकार की जनविरोधी नीतियों का विश्वस्तर पर पर्दाफाश हो रहा है। इस प्रक्रिया में हजारों बुद्धिजीवी शामिल थे जिनके प्रभाव से सूदूरवर्ती क्षेत्रों के साथ-साथ शहरों में भी प्रतिरोध की चेतना तेजी से एक रूप ले रही थी। गांव व आदिवासी जीवन,शहरों में मजदूरों के प्रति युवा वर्ग का बढ़ता आकर्षण ही वह पक्ष था जिसके चलते चिदम्बरम को घबड़हाहट है।

अदालत में सरकारी वकील ने बिनायक सेन को और पीयूसीएल को सीपीआई-माओवादी का घटक सिद्ध करने की इस आधार पर कोशिश की गयी कि दोनों ही छत्तीसगढ़ के माओवाद वाले क्षेत्रों से सीआरपीएफ के वापसी की मांग करते हैं।

कुछ साल पहले राजस्थान के किसानों के हिंसक आंदोलन,गुर्जरों के आरक्षण की मांग में उठा हिंसक संघर्ष, हाल ही में अलीगढ़ के किसानों के आंदोलन में माओवादियों के हाथ होने की शंका जाहिर की गई। किसी भी जगह जनता द्वारा रेडिकल बात करने का अर्थ माओवादी होना हो गया। हजारों लोगों को इसी आरोप के तहत यूएपीए,विशेष सुरक्षा अधिनियमों के तहत जेलों में बंद करने की प्रक्रिया अभी भी जारी है। इसलिए यहां मूल सवाल एक ऐसी परिघटना से है जिससे वर्तमान साम्राज्यवादी-पूंजीवादी व्यवस्था वैधानिकता खोने लगती है,साम्राज्यवादी-पूंजीवादी व्यवस्था के चल रहे सामाजिक ढ़ांचे को अंदर से तोड़ने लगती है।

ऐसे में यह बात उठाना बहुत जरूरी है कि क्या साम्राज्यवादी-पूंजीवादी व्यवस्था की वैधानिकता पर सवाल ही अपराध है? क्या साम्राज्यवादी-पूंजीवादी विकास की नीति व कारपोरेट प्रबंधन की राजनीति के सामने समर्पण ही एक मात्र विकल्प है?क्या यह देश चंद दस करोड़ लोगों का है जिसमें शामिल होने के लिए भेड़ियाधसान किया जाय? जाहिरा तौर पर देश का संविधान भी यह बात नहीं कहता है। न्याय की व्याख्या भी इसकी अनुमति नहीं देती। इसलिए जरूरी है कि न्याय की तराजू में तय किए गए अपराध के पाठ का पुनर्पाठ किया जाय,उसके विमर्शों को बदला जाय और सवाल उठाया जाय कि नक्सलाइट, माओवादी का पर्याय अपराध कैसे है?


(लेखक  स्वतंत्र पत्रकार और सामाजिक-राजनितिक कार्यकर्त्ता हैं. उनसे anjani.dost@yahoo.co.in   पर संपर्क किया जा सकता है.)