Dec 28, 2010

पोस्टकार्डों से बद्धिजीवी करेंगे प्रतिरोध

मानवाधिकार नेता विनायक सेन को उम्र कैद की सजा के विरोध मे वाराणसी के बुद्धिजीवियों, सामाजिक और छात्र-युवा संगठनो ने जिला मुख्यालय पर बैठक कर विरोध जताया। वक्ताओं ने न्यायपालिका कि विश्वसनियता पर सवाल उठाते हुए कहा कि आम नागरिको की  आवाज को उठाने वाले मानवाधिकार नेताओं और सामाजिक कार्यकर्ताओ के खिलाफ राज्य के दबाव में  न्यायपालिका द्वारा लगातार इस तरह के निर्णय दिये जा रहे हैं।
बैठक को संबोधित करते हुए PUCL के प्रदेश अध्यक्ष चितरंजन सिंह ने कहा कि न्यायालय ने फैसले के माध्यम से तमाम जनतांत्रिक आवाजों को यह चेतावनी दी है कि अगर राज्य के लूट तंत्र के खिलाफ वह आवाज उठाएंगे तो उनका हश्र भी यही होगा। इस प्रतिरोध में फादर आनंद, सुनील सहस्त्रबुद्धे, बल्भाचार्य, लेनिन रघुवंशी, चित्रा सहसत्रबुद्धे, सिद्धार्थजी, बल्लभाचार्य पाण्डे, जवाहर लाल कौल, मुलचन्द सोनकर, राजेश, दिलीप कुमार, मो. मूसा, लक्ष्मण प्रसाद समेत अनेक शहर के बुद्धिजीवियों ने शिरकत की।

बैठक में निर्णय लिया गया कि राष्ट्रपति,मुख्य न्यायाधीश एवं छत्तीसगढ के मुख्यमंत्री को लाखों  की संख्या मे पोस्ट कार्ड भेज कर हम इस निर्णय पर विरोध दर्ज कराएंगे, ताकि भविष्य मे इस तरह के जनविरोधी निर्णय न हो सके।

जिलामुख्यालय पर हुई इस बैठक में CPI(ML), साझा संस्कृति मंच, पहल, प्रगतिशील जनसगंठन, भारतीय किसान यूनियन, सूचना अधिकार अभियान, आसरा, लोक विद्या आश्रम, AISA, मानवाधिकार जन निगरानी समिति, प्रगतिशील लेखक मंच, आशा, आइसा, एशियन ब्रिज इण्डिया, प्रेरणा कला मंच, डिबेट सोसाइटी समेत शहर के बुद्धिजीवियों ने शिरकत की।

द्वारा जारी- गुंजन सिंह, डिबेट सोसाइटी

तितलियों का खू़न


अंशु मालवीय

वे हमें सबक सिखाना चाहते हैं साथी !
उन्हें पता नहीं
कि वो तुलबा हैं हम
जो मक़तब में आये हैं
सबक सीखकर,
फ़र्क़ बस ये है
कि अलिफ़ के बजाय बे से शुरू  किया था हमने
और सबसे पहले लिखा था बग़ावत।

जब हथियार उठाते हैं हम
उन्हें हमसे डर लगता है
जब हथियार नहीं उठाते हम
उन्हें और डर लगता है हमसे
ख़ालिस आदमी उन्हें नंगे खड़े साल के दरख़्त की तरह डराता है
वे फौरन काटना चाहता है उसे।

हमने मान लिया है कि
असीरे इन्सां बहरसूरत
ज़मी पर बहने के लिये है
उन्हें ख़ौफ़ इससे है..... कि हम
जंगलों में बिखरी सूखी पत्तियों पर पड़े
तितलियों के खून का हिसाब मांगने आये हैं।


अंशु मालवीय ने यह कविता विनायक सेन की अन्यायपूर्ण सजा के खिलाफ 27दिसंबर 2010को इलाहाबाद के सिविल लाइन्स,सुभाष चौराहे पर तमाम सामाजिक संगठनों द्वारा आयोजित ‘असहमति दिवस’ पर सुनाई।

Dec 27, 2010

काल्पनिक सबूतों पर सजायाफ्ता


मैं बिनायक सेन के राजनीतिक विचारों से सहमत नहीं हूं,लेकिन यह केवल एक तानाशाह तंत्र में ही संभव है कि असहमत होने वालों को जेल में ठूंस दिया जाए.भारत दोहरे मापदंडों वाले लोकतंत्र के रूप में विकसित हो रहा है...

एम जे अकबर


भारत एक अजीब लोकतंत्र बनकर रह गया है,जहां बिनायक सेन को आजीवन कारावास की सजा सुनाई जाती है और डकैत खुलेआम ऐशो-आराम की जिंदगी बिताते हैं.सरकारी खजाने पर डाका डालने वालों के विरुद्ध कार्रवाई करने के लिए भी सरकार को खासी तैयारी करनी पड़ती है.जब आखिरकार उन पर ‘धावा’बोला जाता है,तब तक उन्हें पर्याप्त समय मिल चुका होता है कि वे तमाम सबूतों को मिटा दें.

आखिर वह व्यक्ति कोई मूर्ख ही होगा,जो तीन साल पहले हुए टेलीकॉम घोटाले के सबूतों को इतनी अवधि तक अपने घर में सहेजकर रखेगा.तीन साल क्या,सबूतों को मिटाने के लिए तो छह महीने भी काफी हैं.क्योंकि इस अवधि में पैसा या तो खर्च किया जा सकता है,या उसे किसी संपत्ति में परिवर्तित किया जा सकता है या विदेशी बैंकों की आरामगाह में भेज दिया जा सकता है.राजनेताओं-उद्योगपतियों का गठजोड़ कानून से भी ऊपर है.अगर भारत का सत्ता तंत्र बिनायक सेन को कारावास में भेजने के बजाय उन्हें फांसी पर लटका देना चाहे,तो वह यह भी कर सकता है.


बच्चों के डॉक्टर विनायक सेन
 बिनायक ने एक बुनियादी नैतिक गलती की है और वह यह कि वे गरीबों के पक्षधर हैं.हमारे आधिपत्यवादी लोकतंत्र में इस गलती के लिए कोई माफी नहीं है.सोनिया गांधी,मनमोहनसिंह,पी चिदंबरम और यकीनन रमन सिंह के लिए इस बार का क्रिसमस वास्तव में ‘मेरी क्रिसमस’होगा. कांग्रेस और भाजपा दो ऐसे राजनीतिक दल हैं,जो फूटी आंख एक-दूसरे को नहीं सुहाते.वे तकरीबन हर मुद्दे पर एक-दूसरे से असहमत हैं.लेकिन नक्सल नीति पर वे एकमत हैं.नक्सल समस्या का हल करने का एकमात्र रास्ता यही है कि नक्सलियों के संदेशवाहकों को रास्ते से हटा दो.

मीडिया इस गठजोड़ का वफादार पहरेदार है,जो उसके हितों की रक्षा इतनी मुस्तैदी से करता है कि खुद गठजोड़ के आकाओं को भी हैरानी हो. गिरफ्तारी की खबर रातोरात सुर्खियों में आ गई. प्रेस ने तथ्यों की पूरी तरह अनदेखी कर दी. हमें नहीं बताया गया कि बिनायक सेन के विरुद्ध लगभग कोई ठोस प्रमाण नहीं पाया गया था.

अभियोजन ने गैर जमानती कारावास के दौरान बिनायक के दो जेलरों को पक्षविरोधी घोषित कर दिया था. सरकारी वकीलों की तरह जेलर भी सरकार की तनख्वाह पाने वाले नुमाइंदे होते हैं.लेकिन दो पुलिसवालों ने भी मुकदमे को समर्थन देने से मना कर दिया.एक ऐसा पत्र,जिस पर दस्तखत भी नहीं हुए थे और जो जाहिर तौर पर कंप्यूटर प्रिंट आउट था,न्यायिक प्रणाली के संरक्षकों के लिए इस नतीजे पर पहुंचने के लिए पर्याप्त साबित हुआ कि बिनायक सेन उस सजा के हकदार हैं,जो केवल खूंखार कातिलों को ही दी जाती है.

यदि काल्पनिक सबूतों के आधार पर बिनायक सेन जैसों को दोषी ठहराया जाने लगे तो हिंदुस्तान में जेलें कम पड़ जाएंगी.
बिनायक सेन स्कूल में मेरे सीनियर थे.वे तब भी एक विनम्र व्यक्ति थे और हमेशा बने रहे,लेकिन वे अपनी राजनीतिक धारणाओं के प्रति भी हमेशा प्रतिबद्ध रहे.मैं उनके राजनीतिक विचारों से सहमत नहीं हूं,लेकिन यह केवल एक तानाशाह तंत्र में ही संभव है कि असहमत होने वालों को जेल में ठूंस दिया जाए.भारत धीरे-धीरे दोहरे मापदंडों वाले एक लोकतंत्र के रूप में विकसित हो रहा है.जहां विशेषाधिकार प्राप्त लोगों के लिए हमारा कानून उदार है,वहीं वंचित तबके के लोगों के लिए यही कानून पत्थर की लकीर बन जाता है.

यह विडंबनापूर्ण है कि बिनायक सेन को सुनाई गई सजा की खबर क्रिसमस की सुबह अखबारों में पहले पन्ने पर थी. हम सभी जानते हैं कि ईसा मसीह का जन्म 25 दिसंबर को नहीं हुआ था. चौथी सदी में पोप लाइबेरियस द्वारा ईसा मसीह की जन्म तिथि 25 दिसंबर घोषित की गई, क्योंकि उनके जन्म की वास्तविक तिथि स्मृतियों के दायरे से बाहर रहस्यों और चमत्कारों की धुंध में कहीं गुम गई थी.क्रिसमस एक अंतरराष्ट्रीय त्यौहार इसलिए बन गया, क्योंकि वह जीवन को अर्थवत्ता देने वाले और सामाजिक ताने-बाने को समरसतापूर्ण बनाने वाले कुछ महत्वपूर्ण मूल्यों का प्रतिनिधित्व करता है. ये मूल्य हैं शांति और सर्वकल्याण की भावना, जिसके बिना शांति का कोई अस्तित्व नहीं हो सकता.

सर्वकल्याण की भावना किसी धर्म-मत-संप्रदाय से बंधी हुई नहीं है.क्रिसमस की सच्ची भावना का सबसे अच्छा प्रदर्शन पहले विश्व युद्ध के दौरान कुछ ब्रिटिश और जर्मन सैनिकों ने किया था, जिन्होंने जंग के मैदान में युद्धविराम की घोषणा कर दी थी और एक साथ फुटबॉल खेलकर और शराब पीकर अपने इंसान होने का सबूत दिया था.अलबत्ता उनकी हुकूमतों ने उन्हें जंग पर लौटने का हुक्म देकर उन्हें फिर से उस बर्बरता की ओर धकेल दिया,जिसने यूरोप की सरजमीं को रक्तरंजित कर दिया था.

यदि काल्पनिक सबूतों के आधार पर बिनायक सेन जैसों को दोषी ठहराया जाने लगे तो हिंदुस्तान में जेलें कम पड़ जाएंगी.ब्रिटिश राज में गांधीवादी आंदोलन के दौरान ऐसा ही एक नारा दिया गया था.यह संदर्भ सांयोगिक नहीं है,क्योंकि हमारी सरकार भी नक्सलवाद के प्रति साम्राज्यवादी और औपनिवेशिक रवैया अख्तियार करने लगी है.


 लेखक ‘द संडे गार्जियन’ के संपादक और इंडिया टुडे के एडिटोरियल डायरेक्टर हैं. बाईलाइन के नाम से लिखे जाने वाले इस कॉलम को रविवार डोट कॉम से साभार लिया जा रहा है.



Dec 26, 2010

न्यायपालिका ध्वस्त कर रही है ढांचा


पीपुल्स यूनियन फॉर सिविल लिबर्टीज (PUCL)के राष्ट्रीय  उपाध्यक्ष विनायक सेन पर राजद्रोह का आरोप लगाकर न्यायपालिका ने अपने गैरलोकतांत्रिक और फासीवादी चेहरे को एक बार फिर उजागर किया है। जर्नलिस्ट यूनियन फॉर सिविल सोसाइटी शर्मनाक  मानती है. विनायक सेन प्रकरण के इस फैसले ने अन्ततः लोकतांत्रिक ढ़ांचे को ध्वस्त करने का काम किया है। यह न्यायपालिक की सांस्थानिक जनविरोधी तानशाही है, जिसका हम विरोध करते हैं।

जो काम सत्ता के सहारे पूंजीवादी ताकतें कार्यपालिका और व्यवस्थापिका से कराती थीं उसे अब न्यायपालिका कर रही है। पिछले दिनों विकिलिक्स ने हमारी पूरी व्यवस्था की पोल खोल दी की वह किस तरह देश की महत्वपूर्ण जानकारियों को अमेरिका जैसे देशों से चोरी-छिपे बताती है, और उसके दबाव में जनविरोधी नीतियों को लागू करती है।नक्सलवाद उन्मूलन के नाम पर चलाया जा रहा  आपरेशन ग्रीन हंट भी इसी का हिस्सा है.

विनायक सेन को आजीवन कारावास देकर न्यायालय ने वंचित तबके के प्रतिरोध को खामोश रहने की चेतावनी दी है,जो अब तक न्याय के अंतिम विकल्प के रुप में न्यायपालिका में उम्मीद लगाया था। हिंदुस्तान में न्यायालयों द्वारा पिछले दिनों जिस तरह से संविधान प्रदत्त धर्मनिरपेक्षता और लोकतांत्रिक मूल्य जिनके तहत आदमी और आदमी के बीच धर्म,जाति और लिंग के आधार पर किसी तरह का भेदभाव न करने का आश्वासन दिया गया था को खंडित किया जा रहा है.

छत्तीसगढ़ लोक सुरक्षा कानून जिसके तहत विनायक सेन को देशद्रोही कहा गया वह खुद ही एक जनविरोधी कानून है। जो सिर्फ और सिर्फ प्रतिरोध की आवाजों को खामोश करने वाला कानून है। विनायक सेन लगातार सलवा जुडुम से लेकर तमाम जनविरोधी प्रशासनिक हस्तक्षेप के खिलाफ आवाज ही नहीं उठाते थे बल्कि वहां की आम जनता के स्वास्थ्य शिक्षा से जुड़े सवालों पर भी लड़ते थे। हम यहां इस बात को भी कहना चाहेंगे कि जिस तरह न्यायालय ने डा0 सेन को आजीवन करावास दिया, ठीक इसी तरह भारतीय न्यायालय की इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनउ बेंच ने तीस सितंबर 2010को कानून और संविधान को ताक पर रखकर आस्था और मिथकों के आधार पर अयोध्या फैसला दिया।


न्यायपालिका के चरित्र को इस बात से भी समझना चाहिए कि देश की राजधानी दिल्ली में हुए ‘बाटला हाउस फर्जी मुठभेड़ कांड’पर न्यायालय ने पुलिस का मनोबल गिरने की दुहाई देते हुए इस फर्जी मुठभेड़ कांड की जांच की मांग को खारिज कर दिया था। भंवरी देवी से लेकर ऐसे तमाम फैसले बताते हैं कि हमारी न्यायपालिका का रुख दलित, आदिवासी, अल्पसंख्यक और महिला विरोधी रहा है।

ऐसे में हम इस बात को कहना चाहेंगे कि जो न्यायालय जनता के लोकतांत्रिक अधिकारों की अवमानना कर रहे हैं और अब अदालतों की अवमानना करने का पूरा अधिकार  जनता को है। क्योंकि विनायक सेन जनता के लिए,जनता द्वारा स्थापित लोकतंत्र के सच्चे सिपाही हैं। हम मांग करते हैं कि केंद्र और राज्य सरकार विनायक सेन के खिलाफ लगाए गए जनविरोधी राजनीति से प्रेरित आरोंपों व जनविरोधी छत्तीसगढ़ लोक सुरक्षा कानून को तत्काल रद्द करे और विनायक सेन को रिहा करे।



अदालतें कर रही हैं न्याय का शिकार

न्याय के इस खेल में साक्ष्य एक फुटबाल की तरह है जिससे गोल भी हो सकता है और फाउल भी। न्याय के नए खेल में अब तो साक्ष्य की जरूरत ही खत्म होती दिख रही है...

अंजनी कुमार  

यह संयोग था कि मैं उस दिन पीयूडीआर की शनिवार बैठक में उपस्थित था। हरीश रायपुर में विनायक सेन पर चल रहे मुकदमे के बारे में बता रहे थे। सरकारी वकील विनायक सेन को माओवादी और  उनका समर्थक सिद्ध करने के लिए यह तर्क पेश कर रहा था कि उनके घर से मार्क्स की प्रसिद्ध पुस्तक ‘कैपीटल’ तथा माओ की किताबें मिलीं हैं। इन पुस्तकों में पूंजीवाद को ध्वस्त करने की खतरनाक बातें लिखी गई हैं।

सरकारी वकील ने इस केस के कुछ और भी ब्यौरे  दिए। उस समय मेरे मन में यह उधेड़बुन चलती रही कि जज ने सरकारी वकील के इतने लचर तर्कों को तरजीह देकर क्यों सुना होगा। मन में ये सवाल यह जानते हुए भी उठा कि न्याय की उम्मीद करना एक जुए के खेल जैसा है, जिसमें विनायक सेन के मामले में हम हार गए। दरअसल, न्याय के इस खेल में हम थे भी कहां! न्याय तो जज को करना था।

कुछ-कुछ ऐसा ही हर जगह चल रहा है। हम अपने पक्ष में साक्ष्य और गुनहगार न होने की दावेदारी पेश कर रहे हैं, जबकि जज की चाहत ही कुछ और बन रही है। मसलन, इसी से कुछ मिलता-जुलता एक और मुकदमा उत्तराखंड में चल रहा है। वहां जब सरकारी वकील ने देहरादून जेल में बंद प्रशान्त राही के खिलाफ यह दलील दी कि उनके पास से लैपटाप मिला है,तब जज ने पूछा कि उसमें क्या-क्या बातें हैं,इसका लिखित ब्यौरा दो। जब वकील ने लैपटाप की बातों को मौखिक और लिखित रूप से पेश कर पाने में अक्षमता दिखाई तब जज ने कोर्ट में ही सरकारी वकील पर विरोधियों से मिल जाने, पैसा खाकर साक्ष्यों को खत्म करने जैसे तमाम आरोप जड़ दिए।

प्रशांत राही मामले में जज के रवैए के कारण मुझे अभी से न्याय की कोई उम्मीद नहीं दिख रही है। ऐसे हजारों मामले हो सकते हैं,जहां पहले से ही न्याय की उम्मीद नहीं रहती और देश में ऐसे सैकड़ों मामले हैं जहां आमजन भी पहले से जानता है कि न्याय क्या होने वाला है। न्याय के इस खेल में साक्ष्य एक फुटबाल की तरह है जिससे गोल भी हो सकता है और फाउल भी। न्याय के नए खेल में अब तो साक्ष्य की जरूरत ही खत्म होती दिख रही है। मसलन,बाबरी मस्जिद का मामला। जहां न्याय में लिखा जाता है कि राम के पैदा होने का साक्ष्य पेश करना जरूरी नहीं है क्योंकि वह है...।

बाबरी मस्जिद मामले में केस जमीन पर मालिकाना दावेदारी का है,जबकि न्याय जमीन के विभाजन के रूप में मिलता है। अफजल गुरू मामले में तो सारा मामला ही ‘लोगों की इच्छा’ पर तय कर दिया गया। वह भी आजीवन सजा नहीं, बल्कि सजाए मौत। साक्ष्य की पेशी जज की चेतना में ब्रिटिशकाल के 1870, 1872 या 1876 इत्यादि से कोई रूपाकार ग्रहण करेगी या फिर आधुनिक काल की आस्था और इच्छा से इसे तय करना सचमुच कठिन होने लगा है। यह बात लिखते हुए मुझे बरबस राजस्थान में एक दलित महिला के बलात्कार तथा तमिलनाडु में एक दलित बस्ती को जलाने व लोगों को मार डालने से संबधित केस और न्याय की बातें ध्यान में आ रही हैं।

दोनों ही मामलों में जज इस बात पर जोर देता है कि सवर्ण कैसे दलित स्त्री को छू सकता है, जबकि वह अछूत है। एक अछूत की बस्ती में सवर्ण कदम क्यों रखेगा?महाराष्ट्र के खैरलांजी की घटना को जज ने दलित उत्पीड़न की घटना मानने से ही इन्कार कर दिया और मुंबई हाईकोर्ट ने तो मजदूरों के हड़ताल और बोनस के मसले पर अपने न्याय में संवैधानिक देय अधिकारों को भी समय के साथ संशोधित करने पर जोर देते हुए उनकी मांग को ही खारिज कर दिया।

विनायक सेन मामले में जज के न्याय का आधार है गवाह अनिल सिंह,जो कि पीयूष गुहा से जब्त किए गये पत्रों के समय के हालात से जुड़े साक्ष्य का प्रत्यक्षदर्शी है। अनिल सिंह कपड़े का व्यापारी है,जिसने बताया कि पीयूष गुहा को 6 मई 2007 को पुलिस ने स्टेशन रोड से पकड़ा और उसके पास के बैग से तीन पत्र मिले। यह व्यक्ति ही एकमात्र स्वतंत्र गवाह है जिसके बयान पर न्याय की तकरीर निर्णय में बदल गई।

गौरतलब है कि सुप्रीम कोर्ट में जांच अधिकारी बीबीएस राजपूत ने अपने एफीडेविट में बताया है कि पीयूष गुहा होटल महिन्द्रा से पकड़े गए। सरकारी वकील ने होटल के मैनेजर और रिसेप्शनिस्ट को इस साक्ष्य के रूप में जज के सामने पेश किया कि विनायक सेन ने तीनों पत्र पीयूष गुहा को उसी होटल में दिए थे। हालांकि कोर्ट में दोनों ने इस बात को अस्वीकार किया। यहां इस बात पर भी गौर करना चाहिए कि ये पत्र दो साल पुराने हैं,जबकि उसकी लिखावट ताजा थी और पत्र कहीं से भी फोल्ड नहीं थे।

आरोप है कि है यह पत्र माओवादी नेता नारायण सान्याल ने जेल से लिखा और इसे विनायक सेन ने पीयूष गुहा तक पहुंचाया। नारायण सान्याल और विनायक सेन की जेल में मुलाकात के दौरान हमेशा जेल अधिकारी मौजूद रहे। प्रत्येक पत्र को कड़ी जांच के बाद ही जारी किया गया। कोर्ट में भी आधे दर्जन जेल अधिकारी पेश हुए और उनके बयानों का निहितार्थ षडयंत्र रचने और पत्र पार कराने के आरोप का अस्वीकार किया जाना था।

नारायण सान्याल व विनायक सेन के बीच गहरा संबंध साबित करने के लिए नारायण सान्याल के मकानमालिक को पेश किया गया। मकानमालिक ने अदालत को बताया कि विनायक सेन के कहने पर ही उसने सान्याल को मकान दिया और जनवरी 2006तक सबकुछ ठीक-ठाक चलता रहा। इस मुकदमे में नारायण सान्याल को माओवादी सिद्ध करने के लिए सरकारी वकील ने कुछ दलीलें पेश की हैं। पहला,नारायण सान्याल ने अपने पत्र में संबोधन के तौर पर ‘कामरेड विनायक सेन’ लिखा है। सरकारी वकील के अनुसार ‘कामरेड उसी को कहते हैं जो माओवादी है।’


दूसरा,माओवादियों  ने एक पुलिस अधिकारी को बंधक बनाकर यह मांग रखी कि माओवादी क्षेत्र से सीआरपीएफ को हटाया जाये। यही मांग पीयूसीएल भी कर रहा है। इससे यह दिखता है कि पीयूसीएल माओवादियों का हितैषी संगटन या सहयोगी मोर्चा है।’ तीसरा,विनायक सेन के घर से पीपूल्स मार्च व माओ की संग्रहित रचनाएं मिलीं। चौथा, कोर्ट में सरकारी वकील ने बहुत से पत्र व्यवहार को प्रस्तुत करते हुए बताया कि इनके आईएसआई से खतरनाक संबंध हैं। इस आईएसआई का खुलासा यह है : इंडियन सोशल इंस्टीट्यूट। यह संस्था दलित, आदिवासी, स्त्री, बच्चों, अल्पसंख्यकों के विभिन्न पहलुओं पर शोध व उनके विकास के लिए विभिन्न तरह से सक्रिय रहती है।

इन सारी दलीलों पर जज की दलील काफी भारी साबित हुई और जो अपनी संरचना की वजह से निर्णायक भी साबित हुई और विनायक सेन अपराधी करार दिये गये। विनायक सेन को इस केस में घसीटने के पीछे मूल कारण उनका 'सलवा जूडूम' के खिलाफ राष्ट्रीय स्तर पर विरोध का माहौल बनाने व छत्तीसगढ़ में निर्णायक प्रतिरोध के लिए लोगों को खड़ा करना था।

सलवा जूडूम के तहत 700गांवों को उजाड़ दिया गया। लगभग एक लाख लोगों को शरणार्थी बना दिया गया। हजारों लोगों को जेल में ठूंसा गया। अकेले जगदलपुर जेल में ही लगभग ढ़ाई हजार लोग नक्सली होने के आरोप में जेल में बंद हैं। हत्या, बलात्कार, आगजनी  का नंगा नाच जिस तरह सलवा जूडूम के नाम पर शुरू हुआ, उससे तो आज खुद सरकार ही मुकर जाने के लिए बेताब दिख रही है और अब आपरेशन ग्रीन हंट को आगे बढ़ाया जा रहा है।

ऑपरेशन ग्रीन हंट छत्तीसगढ़ के साथ छह राज्यों में और फैला दिया गया है। इसका अर्थशास्त्र है कॉर्पोरेटाइजेशन। कारपोरेट की खुली लूट। टाटा व एस्सार ने सलवा जूडूम को चलाने में खुलकर हिस्सेदारी की। अब पूरा कारपोरेट सेक्टर व उसका संगठन,उसकी सरकार व न्यायपालिका खुलकर भागीदारी में उतर रही हैं। यह बिडम्बना नहीं बल्कि क्रूर सच्चाई है कि कारपोरेट सेक्टर की आपसी लड़ाई में वेदांता का एक पंख कतरकर राहुल गांधी को नियामगिरी व आदिवासियों का ‘सिपाही’ घोषित कर दिया जाता है, आदिवासी महिलाओं के साथ मार्च पास्ट कराया जाता है। वहीं आदिवासी समुदाय के मूलभूत जीवन के अधिकार के पक्ष में मांग उठाने वाले एक डाक्टर को,जो उनके बीच जीवन गुजारते हुए गरीबों और बीमारों की सेवा करता है उसे ‘देशद्रोही’ घोषित कर दिया जाता है।

ऐसा लगता है अब समय आ चुका है कि न्याय के नए पाठ के साथ शब्द का अर्थ-विमर्श भी बदल दिया जाय। यहीं से यह स्वीकार किया जाय कि इस कारपोरेट राज में देश की 90करोड़ आबादी देशद्रोही है...न्याय के चौखट पर जाकर मुहर लगवाने का इंतजार क्यों करना है ....जिस गति से देशद्रोह के मुकदमे बढ़ रहे हैं उससे कल हम या आप कोई भी हो सकता है देशद्रोह का अभियुक्त ...सजा ए आजीवन ... या सजा ए मौत ...



लोगों के हिस्सा हैं विनायक सेन

अंजनी कुमार


सब कुछ वैसे ही था
जैसा दिसंबर महीने के अंतिम हफ्तों में होता है
बर्फीली हवा, कोहरे का धुंध, थोड़ी सी धूप...


आज की सुबह भी ऐसी ही थी,
बाहर पार्क में योगासन के कई झुंड
प्राणायाम और सूर्यासन में मगन थे,
कुछ हंसी योग में होड़ लगा हंस रहे थे...


सबकुछ वैसे ही था
जैसा रोज ही रहता है मुहल्ला, शहर, देश...
जैसे रोज ही रहता है बालकनी  में अखबार
सुबह सुबह की चाय
और उसके बाद नाश्ता व टिफिन में बंद लंच।।


सब कुछ वैसे ही था
सब कुछ वैसे ही चल रहा था
लोग भुगत रहे थे कीमतें
लोग पढ़ रहे थे भ्रष्टाचार की खबरें
लोग चिंतित थे, अचंभित थे, और कद्रदान थे नीरा राडिया के
लोग बेखबर थे बनानादेश के जुमलों से
यहां सबकुछ चलता है- लोग यही जानते थे
और दिनचर्या में व्यस्त थे, अभ्यस्त थे।।


सब कुछ वैसे ही था
प्रधानमंत्री का भाषण, विपक्ष का बयान, तीसरे मोर्चे का चिंतन
सबकुछ वैसे ही चल रहा था, बढ़ रहा था-
मुद्रास्फीत की दर, जेल, मुकद्मा, सजा...
करोड़ों अनाम बेनाम लोगों का जीवन ऐसे ही चल रहा था
ऐसे ही लोगों के हिस्सा हैं विनायक सेन
आजीवन सजायाफ्ता...


और मैं हूँ  कि भागा जा रहा था बड़े नाम के पीछे,
देश के एक नागरिक के पीछे
देश के संप्रभु-लोकतंत्र के पीछे....यह जानते हुए भी
कि यह देश ऐसे ही चल रहा है
सबकुछ वैसे ही चल रहा है....।।



  • लेखक राजनितिक-सामाजिक कार्यकर्त्ता और स्वतंत्र पत्रकार  हैं.उनसे anjani.dost@yahoo.co.in पर संपर्क किया जा सकता है.

Dec 25, 2010

विनायक सेन को समर्पित


आज हम भारी मन से आप सभी से मुखातिब हैं.जैसा कि मौजूदा सत्ता-समीकरण से अन्देशा था छत्तीसगढ़ की एक अदालत ने डाक्टर विनायक सेन और दो अन्य लोगों को देश-द्रोह के आरोप में उमर क़ैद की सज़ा सुनायी है.

 

ज़ाहिर है कि मौजूदा सत्ताधारी -उनका रंग चाहे जो भी हो,भगवे से ले कर हरा और सफ़ेद -विनायक सेन को सलाख़ों के पीछे ही रखना चाहते हैं.इसलिए उन पर झूठे आरोप लगा कर उन्हें क़ैद में रखे रहने की साज़िश की जा रही है.असलियत यह है कि डाक्टर विनायक सेन छत्तीसगढ़ में अत्यन्त लोकप्रिय हैं.उन्होंने न केवल वहां आदिवासियों और आम जनता को ऐसे समय चिकित्सा उपलब्ध करायी है जब सरकारी तन्त्र नाकारा साबित हुआ है,बल्कि आदिवासियों की हत्या करने वाले सरकार समर्थित गिरोह सल्वा जुडुम का कड़ा विरोध भी किया है.

ध्यान रहे कि जहां विनायक सेन जैसी मेधा और गुणों वाले डाक्टर समृद्धि की सीढ़ियों का सन्धान करते हैं वहां विनायक सेन ने स्वेच्छा से तकलीफ़ों वाला मार्ग चुना है.लेकिन सच्चे देशभक्तों को अक्सर देशद्रोही क़रार देकर सज़ाएं दी जाती रही हैं. इसलिए आज  हम तुर्की के महान कवि नाज़िम हिकमत की वह मशहूर कविता पेश कर रहे हैं जो उन्होंने तुर्की की तानाशाही द्वारा क़ैद किये जाने की दसवीं सालगिरह पर लिखी थी. यह कविता विनायक  को समर्पित करते हैं - नीलाभ  



जब से मुझे इस गड्ढे में फेंका गया

नाज़िम हिकमत

जब से मुझे इस गड्ढे में फेंका गया
पृथ्वी सूरज के गिर्द दस चक्कर काट चुकी है

अगर तुम पृथ्वी से पूछो, वह कहेगी -
‘यह ज़रा-सा वक़्त भी कोई चीज़ है भला!’
अगर तुम मुझसे पूछो, मैं कहूँगा -
‘मेरी ज़िन्दगी के दस साल साफ़!’

जिस रोज़ मुझे कैद किया गया
एक छोटी-सी पेंसिल थी मेरे पास
जिसे मैंने हफ़्ते भर में घिस डाला।
अगर तुम पेंसिल से पूछो, वह कह कहेगी -
‘मेरी पूरी ज़िन्दगी!’
अगर तुम मुझसे पूछो, मैं कहूँगा -
‘लो भला, एक हफ़्ता ही तो चली!’

जब मैं पहले-पहल इस गड्ढे में आया -
हत्या के जुर्म में सज़ा काटता हुआ उस्मान
साढ़े सात बरस बाद छूट गया।
बाहर कुछ अर्सा मौज-मस्ती में गुज़ार
फिर तस्करी में धर लिया गया
और छै महीने बाद रिहा भी हो गया।
कल किसी ने सुना - उसकी शादी हो गयी है
आते वसन्त में वह बाप बनने वाला है ।

अपनी दसवीं सालगिरह मना रहे हैं वे बच्चे
जो उस दिन कोख में आये
जिस दिन मुझे इस गड्ढे में फेंका गया।
ठीक उसी दिन जनमे
अपनी लम्बी छरहरी टाँगों पर काँपते बछेड़े अब तक
चौड़े कूल्हे हिलाती आलसी घोड़ियों में
तबदील हो चुके होंगे।
लेकिन ज़ैतून की युवा शाख़ें
अब भी कमसिन हैं
अब भी बढ़ रही हैं।

वे मुझे बताते हैं
नयी-नयी इमारतें और चौक बन गये हैं
मेरे शहर में जब से मैं यहाँ आया
और उस छोटे-से घर मेरा परिवार
अब ऐसी गली में रहता है,
जिसे मैं जानता नहीं,
किसी दूसरे घर में
जिसे मैं देख नहीं सकता।

अछूती कपास की तरह सफ़ेद थी रोटी
जिस साल मुझे इस गड्ढे में फेंका गया
फिर उस पर राशन लग गया
यहाँ, इन कोठरियों में
काली रोटी के मुट्ठी भर चूर के लिए
लोगों ने एक-दूसरे की हत्याएँ कीं।
अब हालात कुछ बेहतर हैं
लेकिन जो रोटी हमें मिलती है,
उसमें कोई स्वाद नहीं।

जिस साल मुझे इस गड्ढे में फेंका गया
दूसरा विश्वयुद्ध नहीं शुरू हुआ था,
दचाऊ के यातना शिविरों में
गैस-भट्ठियाँ नहीं बनी थीं,
हीरोशिमा में अणु-विस्फोट नहीं हुआ था।

आह, समय कैसे बहता चला गया है
क़त्ल किये गये बच्चे के रक्त की तरह।

वह सब अब बीती हुई बात है।
लेकिन अमरीकी डालर
अभी से तीसरे विश्वयुद्ध की बात कर रहा है।

तिस पर भी, दिन उस दिन से ज़्यादा उजले हैं
जबसे मुझे इस गड्ढे में फेंका गया।
उस दिन से अब तक मेरे लोगों ने ख़ुद को
कुहनियों के बल आधा उठा लिया है
पृथ्वी दस बार सूरज के गिर्द
चक्कर काट चुकी है...

लेकिन मैं दोहराता हूँ
उसी उत्कट अभिलाषा के साथ
जो मैंने लिखा था अपने लोगों के लिए
दस बरस पहले आज ही के दिन :

‘तुम असंख्य हो
धरती में चींटियों की तरह
सागर में मछलियों की तरह
आकाश में चिड़ियों की तरह
कायर हो या साहसी, साक्षर हो या निरक्षर,
लेकिन चूँकि सारे कर्मों को
तुम्हीं बनाते या बरबाद करते हो,
इसलिए सिर्फ़ तुम्हारी गाथाएँ
गीतों में गायी जायेंगी।’

बाक़ी सब कुछ
जैसे मेरी दस वर्षों की यातना
फ़ालतू की बात है।

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कवि परिचय - नाज़िम हिकमत (1902-63) की कविता तुर्की ही नहीं, दुनिया की सारी शोषित मानवता के दुख-सुख, कशमकश और संघर्ष को जुबां देती है.सभी सच्चे कवियों की तरह नाज़िम ने अपने देश की सतायी गयी जनता के हक़ में आवाज़ बुलन्द की थी और उन लोगों की गाथाओं को अपनी कविता में अंकित किया था जो उन्हीं के शब्दों में "धरती में चींटियों की तरह, सागर में मछलियों की तरह और आकाश में चिड़ियों की तरह" असंख्य हैं, जो वास्तव में सारे कर्मों के निर्माता हैं।

फैसला खून की रफ़्तार बढ़ा गया 'माइलॉर्ड'


देश में पूरी तरह से जीर्ण शीर्ण हो चुकी बुनियादी स्वास्थ्य सेवाओं को पुनर्स्थापित करने में लगे विनायक सेन ने कभी नक्सली हिंसा का समर्थन  नहीं किया, पर वो राज्य समर्थित हिंसा के भी हमेशा खिलाफ रहे,चाहे वो सलवा जुडूम हो या फिर छतीसगढ़ के जंगलों में चलाया जा रहा अघोषित युद्ध...

आवेश तिवारी

 
घोटालों,भ्रष्ठाचार,आतंक और राजनैतिक वितंडावाद से जूझ रहे इस देश में अदालतों का चेहरा भी बदल गया है. ये अदालतें अब आम आदमी की अदालत नहीं रही गयी हैं.  न्याय की देवी की आँखों में बन्दे काले पट्टे ने समूची न्यायिक प्रणाली को काला कर दिया है.जज राजा है,वकील दरबारी और हम आप वो फरियादी हैं जिन्हें फैसलों के लिए आसमान की ओर  देखने की आदत पड़ चुकी है.

बिनायक सेन को उम्र कैद की सजा हिंदुस्तान की न्याय प्रक्रिया का वो काला पन्ना है जो ये बताता है कि अब भी देश में न्याय का चरित्र अंग्रेजियत भरा है जो अन्याय,असमानता और राज्य उत्प्रेरित जनविरोधी और मानवताविरोधी परिस्थितियों के साए में लोकतंत्र को जिन्दा रखने की दलीलें दे रहा है. सिर्फ बिनायक सेन ही क्यूँ देश के उन लाखों आदिवासियों को भी इस न्याय प्रक्रिया से सिर्फ निराशा हाँथ लगी हैं जिन्होंने अपने जंगल अपनी जमीन के लिए इन अदालतों में अपनी दुहाई लगाई. खुलेआम देश को गरियाने वाले देश- विदेश घूम घूम कर हिंदुस्तान के खिलाफ विषवमन करते हैं,और संवेदनशील एवं न्याय आधारित व्यवस्था का समर्थन करने वालों को सलाखों में ठूंस दिया जाता है.

बिनायक सेन की सजा के आधार बनने वाले जो सबूत छत्तीसगढ़ पुलिस ने प्रस्तुत किये,वो अपने आप में कम हास्यास्पद नहीं है.पुलिस द्वारा मदन लाल बनर्जी का लिखा एक पत्र प्रस्तुत किया गया जिसमे बिनायक सेन को कामरेड बिनायक सेन कह कर संबोधित किया गया है.एक और पत्र है जिसका शीर्षक है कि "कैसे अमेरिकी साम्राज्यवाद के विरोध में फ्रंट बनाये",इनके अलवा कुछ लेख कुछ पत्र जिन पर बकायदे जेल प्रशासन की मुहर है सबूत के तौर पर प्रस्तुत की गयी.


भगत सिंह और सुभाष चद्र बोस जिंदाबाद के नारे लिखे कुछ पर्चे भी इनमे शामिल हैं.अदालत ने अपने फैसले में सजा का आधार जिन चीजों को माना है वो देश  के किसी भी पत्रकार समाजसेवी के झोले की चीजें हो सकती हैं. बिनायक सेन चिकित्सक हैं अन्यथा  पुलिस एक कट्टा ,कारतूस या फिर एके -४७ दिखाकर और कुछ एक हत्याओं में वांछित दिखाकर उन्हें फांसी पर चढवा देती.देश में माओवाद के नाम पर जिनती भी गिरफ्तारियां या हत्याएं हो रही हैं चाहे वो सीमा आजाद की गिरफ्तारी हो या हेमचंद की हत्या सबमे छल ,कपट और सत्ता की साजिशें मौजूद थी.

साजिशों के बदौलत सत्ता हासिल करने और फिर साजिश करके उस सत्ता को कायम रखने का ये शगल अब नंगा हो चुका है.माओवादियों के द्वारा की जाने वाली हत्याएं जितनी निंदनीय हैं उनसे ज्यादा निंदनीय फर्जी मुठभेड़ें और बेकसूरों की गिरफ्तारियां हैं क्यूंकि इनमे साजिशें और घात भी शामिल हैं.बिनायक सेन एक चिकित्सक हैं वो भी बच्चों के चिकित्सक ,देश में पूरी तरह से जीर्ण शीर्ण हो चुकी बुनियादी स्वास्थ्य सेवाओं को पुनर्स्थापित करने को लेकर उनके जो उन्होंने कभी नक्सली हिंसा का सर्थन नहीं किया पर हाँ,वो राज्य समर्थित हिंसा के भी हमेशा खिलाफ रहे ,चाहे वो सलवा जुडूम हो या फिर छतीसगढ़ के जंगलों में चलाया जा रहा अघोषित युद्ध.

बिनायक खुद कहते हैं "माओवादियों और राज्य ने खुद को अलग अलग कोनों पर खड़ा कर दिया है,बीच में वो लाखों जनता हैं जिसकी जिंदगी दोजख बन चुकी है.ऐसे में एक चिक्तिसक होने के नाते मुझे गुस्सा आता है जब इन दो चक्कियों के बीच फंसा कोई बच्चा कुपोषित होता है या किसी माँ का बेटा उसके गर्भ में ही दम तोड़ देता है ,क्या ऐसे में जरुरी नहीं है कि हिंसा चाहे इधर की हो या उधर की रोक दी जाए,और एक सुन्दर और सबकी दुनिया ,सबका गाँव सबका समाज बनाया जाए".

कम से कम एक मुद्दा ऐसा है जिस पर देश के सभी राजनैतिक दल एकमत हैं वो है नक्सली उन्मूलन के नाम पर वन,वनवासियों और आम आदमी के विरुद्ध छेड़ा गया युद्ध.भाजपा और कांग्रेस जो अब किसी राजनैतिक दल से ज्यादा कार्पोरेट फर्म नजर आती हैं,निस्संदेह इसकी आड़ में बड़े औद्योगिक घरानों के लिए लाबिंग कर रही हैं. वहीँ वामपंथी दलों के लिए उनके हाशिये पर चले जाने का एक दशक पुराना खतरा अब नहीं तब उनके अंतिम संस्कार का रूप लेता नजर आ रहा है.  ये पार्टियाँ भूल जा रही है कि देश में बड़े पैमाने पर एक गृह युद्ध की शुरुआत हो चुकी है, भले ही वो वैचारिक स्तर पर क्यूँ न लड़ा जा रहा हो.


विश्वविद्यालों की कक्षाओं से लेकर ,कपडा लत्ता बेचकर चलाये जाने वाले अख़बारों,पत्रिकाओं और इंटरनेट पर ही नहीं निपढ निरीह आदिवासी गरीब,शोषित जनता के जागते सोते देखे जाने वाले सपनों में भी ये युद्ध लड़ा जा रहा है.हम बार बार गिरते हैं और फिर उठ खड़े होते हैं. हाँ ,ये सच है, विनायक सेन जैसों के साथ लोकतंत्र की अदालतों का इस किस्म का गैर लोकतान्त्रिक फैसला रगों में दौड़ते खून की रफ़्तार को बढ़ा देता हैं,ये युद्ध आजादी के पहले भी जारी थी और आज भी है



 
पत्रकार  आवेश तिवारी  network6.com  वेबसाइट  के  संचालक हैं ,उनसे  awesh29@gmail.com  पर संपर्क किया जा सकता है।