Sep 9, 2010

फिर मोदी सरकार के खिलौना बने ?

 
भाग- 2
 

6. आपको हमें ये बताना ही होगा कि अहमदाबाद के जहांपुर राहत शिविर में जहां दंगा पीड़ित हजारों मुसलमान अमानवीय परिस्थितियों में रह रहे थे, क्या हुआ था? ऐसा क्यों हुआ कि स्वामीजी के भाषण के बाद उनमें से सैकड़ों की तादात में औरतें, बड़े-बूढ़े और जवान हमारा पीछा कर रहे थे? क्या आपने कभी ये समझने की कोशिश की थी कि स्वामीजी के अमानवीय और असंवेदनशील भाषण ने उनको दुख पहुंचाया या कोई और वजह है?क्या आपको हमारे सदस्यों द्वारा विश्व हिंदू परिषद के गुंडों की तर्ज पर भगवा गमछा और बैंड बांधना याद है?क्यों दो बूढ़ी महिलाओं ने स्वामी जी को वहां से भाग जाने के लिए कहा था?आपको ये भी बताना होगा कि भागते वक्त सारे वाहनों के ले जाने से भीड़ और उत्तेजित हो गई थी.(निर्मला दीदी वहां नहीं आई थीं क्योंकि वो सरकारी अधिकारियों के साथ बातचीत में व्यस्त थीं. ...ऐसा दीदी के दो सहायकों ने बताया था) क्या आपने भागते वक्त निशांत के दूसरे साथियों के बारे में भी सोचा था. जॉन दयाल, उतिराज और दो बौद्ध साथियों के भीड़ के बीच फंस जाने के बारे में क्या आपने सोचा था? क्या आपको मालूम है कि हमारे ग्रुप का एक साथी गुस्साई भीड़ को समझाने के मकसद से सूमो के ऊपर चढ़ गया था,ताकि लोगों को ये समझा सके कि विश्व हिंदू परिषद या हत्यारे मोदी से हमारा कोई संबंध नहीं है? क्या आपने अपनी कायरता और मूर्खता के परिणाम के बारे में सोचा था?

निर्मला देश पांडे : कई छवियाँ
7. ऐसा क्यों हुआ कि पीओसी के सदस्यों द्वारा इकट्ठा किया गया राहत चंदा प्रभावितों तक नहीं पहुंचा और उसे दानदाताओं को वापस करना पड़ा?ये तथ्य है कि गोधरा के राहत शिविर की दयनीय हालात सुनकर पीओसी की एक महिला सदस्य इस कदर व्यथित हुई कि उसने प्रस्ताव रखा था हमें तुरत-फुरत पैसा इकट्ठा करना चाहिए,ताकि इसे जल्दी से जल्दी पीड़ितों तक पहुंचाया जा सके. एक घंटे के अंदर करीब 4500 रुपए इकट्ठा किए गए थे. यह प्रस्ताव भी रखा गया था कि ये चंदा उस एजेंसी को सौप देना चाहिए जिससे केड्रिक प्रकाश और तीस्ता सीतलवाड़ जुड़े हुए थे और जो सांप्रदायिक मुद्दों पर काम कर रहे थे.यहां पर भी स्वामीजी ने सलाह दी कि इसे हिंदू और मुसलमान पीड़ितों के बीच बांट देना चाहिए.इसीलिए इसे दो हिस्सों में विभाजित कर हिंदू और मुसलमान पीड़ितों में बांट दिया गया था.लेकिन थोड़ी ही देर बाद ये साफ हो गया था कि विश्व हिंदू परिषद इस पैसे को लेकर नाराज हो गया था और उसने इसे वापस कर दिया था.इस परिस्थिति में ये पैसा उन लोगों को दिया जाना चाहिए था जिनको इसकी जरूरत थी.आपको हमें ये बताना होगा कि पैसा चंदा देने वालों को वापस क्यों कर दिया गया था?

8. हमें ये जानने का हक है कि ये पीओसी किसने आयोजित की थी? हम लोग ये मान रहे थे कि इसे दिल्ली के लोगों ने आयोजित किया था और गुजरात जाने का असली मकसद नरसंहार के पीछे की ताकतों का पर्दाफाश करना था.मगर अचानक हमने आपको अटल बिहारी बाजपेयी का हस्ताक्षरित पत्र लहराते हुए देखा,जिसमें अटल बिहारी बाजपेई ने इस यात्रा को आशीर्वाद दिया था.अटल बिहारी बाजपेई का ये खत नैनीताल के उनके बेस ऑफिस से लिखा गया था.आपको किसी नेता से ये पत्र लिखवाने या हासिल करने की इजाजात किसने दी थी?

9. ज्यादातर सदस्यों को 700 रुपए प्रति व्यक्ति के हिसाब से दिए गए, लेकिन हमें शक है कि आपने दूसरे स्रोतों से भी रुपया इकट्ठा किया था. क्या आप हमें पीओसी की बैलेंस शीट दिखा सकते हैं?

10. ऐसा क्यों हुआ कि हमारी हर दिन की मांग के बावजूद किसी सदस्य के साथ कोई बातचीत नहीं की गई? हमने दो वजहों से इस मांग पर जोर दिया.नंबर एक-अभियान की दिशा के बारे में पता लगाना और मुसलिम पीड़ितों के पास विश्व हिंदू परिषद जैसे भगवा झंडे लेकर जाने जैसे मुद्दों पर राय जानना. जुरूपुरा के राहत शिविर में इस तरह के आपराधिक दिखावे पर क्या प्रतिक्रिया हुई ये हम सबको पता है.दूसरा-पीओसी के सदस्यों को सांप्रदायिकता विरोधी अभियान के बारे में समझाना था,क्योंकि उनमें से अधिकतर उग्र सांप्रदायिक थे और फासीवादी हिंदू विचारों से ओतप्रोत थे.जैसे –मध्यप्रदेश के एक युवा स्वामीजी बस में किसी को बता रहे थे कि मुसलमानों ने सदियों से हमारी औरतों की हत्या की है और उनके साथ बलात्कार किया है.अब जबकि हिंदू कुछ सप्ताह के लिए कुछ ऐसा कर रहे हैं तो हमें विरोध क्यों करना चाहिए?हमें अभियान के दौरान क्यों कहा जा रहा था कि वीएचपी-बीजेपी-मोदी-अटल-बजरंग दल का नाम नहीं लेना है?क्यों कहा जा रहा था कि विश्व हिंदू परिषद के सदस्यों की भावनाओं को ठेस नहीं पहुंचानी है?

पहुँच हर जगह, पकड़ हर मोर्चे पर
11 . क्या आप सांप्रदायिक-फासीवादी मोदी सरकार के हाथ का खिलौना नहीं बने?क्या आपने मोदी सरकार का अनुचर बनकर हमें जान बचाने के लिए भागने पर मजबूर नहीं कर दिया?आपको भलीभांति मालूम है कि जुरूपुरा के कैंप की शर्मनाक घटना के बाद हम लोगों ने आपके छिपे हुए मंतव्य को ताड़ते हुए आपके साथ न जाने का फैसला किया था और हम अहमदाबाद के ईश्वर भवन में ही रुक गए थे, जहां हम पिछली रात से रुके हुए थे. शाम को दो बौद्ध साथी एक ऑटो रिक्शा में भागते हुए आए और हमें बताया कि आपकी मार्फत उनको जानकारी मिली है कि पीओसी के मुसलिम सदस्यों की जान खतरे में है,क्योंकि विश्व हिंदू परिषद के सदस्यों ने उन पर हमला करने की धमकी दी है.यह एक बेहद दिलचस्प वाकया था.इसके पहले विश्व हिंदू परिषद के गुंडों ने शांति के काम रहे हर संगठन पर हमला किया था, बिना किसी धार्मिक भेदभाव के. सात अप्रैल को उन्होंने साबरमती आश्रम में बिला किसी भेदभाव के इसे फिर से अंजाम दिया.वास्तव में वो हिंदू कार्यकर्ताओं पर ज्यादा गुस्सा थे.हालांकि इस बार वो पीओसी के हिंदू कार्यकर्ताओं को जाने देने के लिए तैयार थे और केवल मुसलिम कार्यकर्ताओं पर हमला करने वाले थे.

हम इस बात को पक्के तौर पर मानते हैं कि मोदी सरकार और इसकी गुप्तचर एंजेसियों के साथ सांठगांठ करके आप दोनों ने इस तरह का सीन तैयार किया कि हमें ईश्वर भवन जैसे सुरक्षित जगह को खाली करना पड़े. ये सब इसलिए किया गया क्योंकि हममें से दो सदस्य मुसलमान थे.ईश्वर भवन के एक कर्मचारी ने बताया कि वो हमें भवन से इसलिए बाहर करना चाहते थे क्योंकि स्वामीजी और मैडम हमें अपने ग्रुप के साथ रखने के लिए तैयार नहीं थे. उसने ये भी बताया कि आप और गुजरात की गुप्तचर एंजेसियां इस बात के लिए परेशान थीं कि निशांत के लोग 4अप्रैल को सांप्रदायिकता विरोधी प्रदर्शन कर सकते हैं. उस दिन प्रधानमंत्री को अहमदाबाद आना था. दीदी और स्वामीजी! बताइए कि आपने हमें इस खतरे के बारे में क्यों नहीं बताया, जबकि हममें से दो मुसलमान थे? क्या आपने इस खतरे के खिलाफ कोई एफआईआर दायर की थी?

सामाजिक काम का जलवा:  बस तू ही तू
12. आपने पीओसी के दौरान महात्मा गांधी की तस्वीर ले चलने से क्यों इंकार दिया था? हम आपको याद दिलाना चाहते हैं कि हम लोगों ने आप दोनों को महात्मा गांधी की तस्वीर ले चलने की सलाह दी थी,क्योंकि गुजराती लोग महात्मा गांधी की शांति और सांप्रदायिक सदभाव के मसीहा के रूप में पूजा करते हैं.महात्मा गांधी की तस्वीर साथ लेने से ये संदेश भी साफ हो जाता कि जिन लोगों ने महात्मा गांधी की हत्या की थी वो एक बार फिर गुजरात को नष्ट करने पर आमादा हैं.आपने ये कहते हुए इस सलाह को खारिज कर दिया कि इससे समस्या बढ़ सकती है.

कृपया इन सवालों का जवाब देने में कुछ वक्त जाया कीजिए.हम इस बहस को उन मित्रों तक तक ले जाना चाहते हैं जो फासीवाद, धार्मिक असहिष्णुता और मानवता के प्रति संवेदनशील हैं.ये बहस उन (छिपे हुए)गद्दारों के बारे में हमें और जानकारी मुहैया कराएगी जो हिंदू  फासीवादियों के काम को और आसान बनाते हैं.

स्वयंभू लोकतांत्रिक और महान धर्मनिरपेक्ष स्वामी अग्निवेश से कुछ और सवाल -

1. स्वामीजी के नेतृत्व में चलने वाले 'बंधुआ मुक्ति मोर्चा' द्वारा आयोजित प्रेस कॉन्फ्रेसों को वर्ष1998-2004 के दौरान आरएसएस और बीजेपी के नेताओं ने कितनी बार संबोधित किया?
2. क्या ये सच है कि आप सन 2000 में आर्य समाजियों का एक प्रतिनिधि मंडल लेकर प्रधानमंत्री बाजपेयी के निवास स्थान पर गए थे और आपने व्यक्तिगत तौर पर उन्हे केसरिया रंग की पगड़ी पहनाई थी?
3. क्या ये सच है कि आपने सन 2000 में बीजेपी के पक्ष में प्रचार किया था?
4. वर्ष 1998-2004 के दौरान जब स्वामीजी को ऑल इंडिया रेडियो में स्लॉट दिया गया तो उस वक्त मंत्री कौन था?
 
आपके जवाब के इंतजार में,

शमशुल इस्लाम, नीलिमा शर्मा, ब्रह्म यादव, जावेद अख्तर
मार्च 2002

Sep 8, 2010

सत्ता को प्रिय है अग्निवेश की मध्यस्तता


याद कीजिये स्वामी अग्निवेश बाल मज़दूरी के सवाल पर भी काफ़ी आन्दोलन कर चुके हैं और बाल मज़दूरी के विरोध के लाभ भी उठा चुके हैं जबकि बाल मज़दूरी के आंकड़े लगातार बढ़ते गये...



नीलाभ

जनज्वार ब्लॉग पर हाल में बिहार की घटनाओं पर टिप्पणियां और साई बाबा का जवाब और फिर स्वामी अग्निवेश के स्वघोषित शान्ति दूत की भूमिका में उतरने के बारे में लिखी गयी टिप्पणी देखी.इन में कई बातें गड्ड-मड्ड हो गयी हैं.हालांकि इन टिप्पणियों पर एक मुकम्मल, सुविचारित टिप्पणी की अपेक्षा है, मैं इस वक़्त अपने को तैयार नहीं पा रहा हूं, तो भी कुछ विचारणीय बिन्दुओं का ज़िक्र कर रहा हूं.

हां,मुझे भी माओवादियों द्वारा लुकास टेटे की हत्या पर ऐतराज़ है.मेरे खयाल में यह न केवल रणनीति की दृष्टि से भूल है,बल्कि अपहृत व्यक्ति को मार डालना उन तमाम लोगों को अस्वस्ति और असुविधा की स्थिति में ला खड़ा करता है,जो नागरिक और सार्वजनिक मंचों पर माओवादियों की सही मांगों की पुरज़ोर हिमायत करते आये हैं और वह भी एक ऐसे समय जब माओवादियों के साथ-साथ उन्हें भी लानत-मलामत का निशाना बनाया जा रहा है.दूसरी तरफ़ बिहार,दिल्ली और अन्य प्रान्तों में अनेक ऐसे परिवर्तनकामी साथी जेल में ठूंस दिये गये हैं जिनके नाम कोई नहीं लेता.

सात महीनों से इलाहाबाद की नैनी जेल में "दस्तक" पत्रिका की सम्पादक और उनके पति विश्वविजय रिमांड पर क़ैद चल रहे हैं.इतना ही अर्सा दिल्ली की ट्रेड यूनियन कार्यकर्ता अनु और उन के पति को तिहार में रिमांड पर क़ैद भुगतते हो गया. क्या किसी ने इनका भी नाम लिया ? या इन्हें छुड़ाने के सिलसिले में कुछ किया? मैं ने अपनी मित्र अरुन्धती राय और अनेक लोगों को इसकी सूचना दे कर क़दम उठाने की अपील की थी,पर शायद वे कम नामी लोगों की पक्षधरता में यक़ीन नहीं रखते.

आज तक सार्वजनिक रूप से क्या किसी ने "आम लोगों की पार्टी"के आम कार्यकर्ताओं के हक़ में आवाज़ उठाई है ?क्या यह भी उसी प्रक्रिया के तहत हो रहा है जिसके तहत 1947से पहले तथाकथित आज़ादी के हिमायतियों ने अनाम लोगों को अक्सर विस्मृति के अंधेरों के हवाले किया था ?दूर नहीं,सफ़दर हाशिमी के साथ जो राम बहादुर नाम का मज़दूर 1989 में कांग्रेसियों द्वारा मारा गया था, उसका कोई स्मारक बना ? उसे कोई याद भी रखता है ?

तीसरी बात यह कि लोकस टेटे की हत्या पर हाय-तोबा मचाने वालों से,ख़ास तौर पर मीडिया वालों से यह ज़रूर पूछा जाना चाहिए कि झूठी मुठ्भेड़ में आज़ाद और हेमचन्द्र पाण्डे की हत्या पर खामोशी क्यों रही?सारे सरकारी और निजी मीडिया तन्त्र ने उस पर ऐसा सात्विक रोष क्यों प्रकट नहीं किया?मेरे कहने का यह मतलब नहीं है कि लोकस  टेटे को मार डालना उचित था. पर बात यहीं ख़त्म नहीं की जा सकती. कारण यह कि पिछले साठ बरसों से हमारे हुक्मरानों और उनके तन्त्र की हिंसा का कोई हिसाब-किताब और जवाब-तलबी नहीं की गयी है.

सीमा और विश्वविजय
 मैं जेसिका लाल और नितीश कटारा या शिवानी भटनागर की हत्याओं सरीखे मामलों से आगे बढ़ कर पुलिस हिरासतों और फ़र्ज़ी मुठभेड़ों में मारे गये हज़ारों लोगों का ज़िक्र कर रहा हुं.मैं ज़िक्र कर रहा हूं कश्मीर में बरसों से चल रहे दमन और उत्पीड़न का, मैं ज़िक्र कर रहा हूं छत्तीसगढ़, ऊड़ीसा, झारखण्ड, आन्ध्र, महाराष्ट्र और बंगाल में बेरहमी से मारे गये आदिवासियों और उनकी ओर से आवाज़ उठाने और लड़ने वाले लोगों की गिरफ़्तारियों और हत्याओं की.

क्या लोकस  टेटे की नावाजिब हत्या पर शोर मचाने वालों --सरकारी और विपक्षी नेताओं,चन्दन मित्रा और अर्णब गोस्वामी और बरखा दत्त जैसे पत्रकारों,सभी मीडिया चैनलों,के.पी.एस.गिल जैसे हिंसक पुलिस अफ़सरों और स्वामी अग्निवेश जैसे स्वार्थ साधकों --ने कभी इतनी ही सात्विक दु:ख और आक्रोश भरे स्वर ऊपर उल्लिखित हिंसा के अनगिनत मामलों में व्यक्त किये हैं ?

निश्चय ही अरुन्धती राय और मेधा पाटकर और गौतम नौलखा को मैं स्वामी अग्निवेश की कोटि में नहीं रखना चाहता, गो उनकी सारी बातों से मैं सहमत नहीं हूं, पर स्वामी अग्निवेश जैसे मध्यस्थ सत्ता को बहुत भाते हैं क्योंकि इनकी आड़ में सरकारी हिंसा को अंजाम देना आसान होता जिसके बाद सरकार और मध्यस्थ,दोनों की राजनीति के चमकने के रास्ते खुल जाते हैं जैसा हम सभी ममता बनर्जी के मामले में देख आये हैं और अब स्वामी अग्निवेश के मामले में देख रहे हैं.याद कीजिये स्वामी अग्निवेश बाल मज़दूरी के सवाल पर भी काफ़ी आन्दोलन कर चुके हैं और बाल मज़दूरी के विरोध के लाभ भी उठा चुके हैं जबकि बाल मज़दूरी के आंकड़े लगातार बढ़ते गये हैं.

अहिंसा का राग अलापने पर ही अपने कर्तव्य की भरपाई करने वालों को याद रखना चाहिए कि छत्तीसगढ़ में 1975 में बाबा आम्टे जैसे अहिंसावादी वहां बाक़ायदा आश्रम खोलने के बाद और अपनी सारी सद्भावना के बावजूद आदिवासियों को न्याय नहीं दिला पाये.स्वामी अग्निवेश तो अभी उन इलाकों में गये भी नहीं हैं जहां हर बाशिन्दे के दिलो-दिमाग़ पर ज़ुल्मो-सितम के गहरे और कभी न मिटने वाले निशान हैं.

यही नहीं, पानी पी-पी कर माओवादियों को कोसने वालों को यह भी याद रखना चाहिए कि इस पूरे इलाके में दमन और उत्पीड़न के प्रतिरोध का इतिहास माओ से तो बहुत पुराना है ही वह बिर्सा मुण्डा से भी बहुत पुराना है.उसके सूत्र उन जातीय संघर्षों में छिपे हुए हैं जिनकी परिणति जन्मेजय के नाग यग्य जैसे नरसंहार में हुई थी.

सत्ता जिसकी हो उसके प्रिय हैं अग्निवेश: अब प्रतिरोध के हुए
चुनांचे दोस्तो,मामला जैसा कि मैंने कहा काफ़ी पेचीदा है.अपराध और हिंसा को किसी भी युग में सामाजिक, आर्थिक और राजनैतिक स्थितियों से और सत्ताधारियों के शोषण से अलग कर के नहीं देखा जा सकता.फ़्रांस के महान लेखक विक्टर ह्यूगो ने अपनी अमर कृति "अभागे लोग"में इसी समस्या को उठाया है.

अन्त में इतना ही कि जैसे-जैसे समय आगे बढ़ा है वैसे-वैसे यह साफ़ होता चल रहा है कि 1947में इतने ख़ून-ख़राबे और इतनी मानवीय पीड़ा के बाद हमने जो हासिल की थी वह आज़ादी नहीं, बल्कि गोरे लुटेरों के बदले काले लुटेरों की सल्तनत थी जिसकी आशंका सरदार भगत सिंह ने खुले शब्दों में व्यक्त की थी.अंग्रेज़ हिन्दुस्तानी सिपाहियों से हिन्दुस्तानी लोगों पर क़हर नाज़िल करते थे, जलियांवाला बाग़ के हत्या काण्ड को अंजाम देते थे, अब पी. चिदम्बरम जैसे हुक्काम महेन्द्र करमा जैसे स्थानीय गुर्गों की मदद से छत्तीसगढ़ में सलवा जुडूम सरीखी घृणित कार्रवाई करते हैं. उद्देश्य लूट-पाट ही है चाहे मैनचेस्टर और बकिंघम पैलेस के लिये हो या फिर वेदान्त, टाटा और पोस्को  के लिए हो.

जब तक इस सारी जद्दो-जेहद को उसकी जड़ों तक जा कर नहीं देखा जायेगा और इसका समतामूलक हल नहीं निकाला जायेगा और तब तक हिंसा को रोकने के सभी ऊपरी उपाय विफल होते रहेंगे. अच्छी बात यही है कि धीरे-धीरे आम जनता इस हक़ीक़त से वाक़िफ़ हो चली है.




Sep 6, 2010

शांति दूत की जगह चुनावी एजेंट बने अग्निवेश !


छत्तीसगढ़ के चिंतलनार क्षेत्र में माओवादियों और पुलिस के बीच संघर्ष में 6अप्रैल को अर्धसैनिक बलों के 76 जवान मारे गये थे। माओवादियों के हाथों सरकार के सबसे काबिल और सुसज्जित सुरक्षा बलों का इतनी बड़ी संख्या में मारा जाना जहां राज्य मशीनरी के लिए एक नयी चुनौती बना,वहीं ऐसी स्थिति न चाहने वालों के लिए सरोकार का गंभीर प्रश्न। सरोकार की इसी चाहत से शांति चाहने वालों ने एक समूह बनाकर चिंतलनार वारदात के ठीक एक महीने बाद 5से 8मई के बीच रायपुर से दंतेवाड़ा तक एक शांतियात्रा की। यात्रा का असर रहा और सरकार एवं माओवादियों से बातचीत की एक सुगबुगाहट भी शुरू हुई,लेकिन सुगबुगाहट से उपजी उम्मीदें आंध्र पुलिस द्वारा माओवादी पार्टी के राष्ट्रीय प्रवक्ता आजाद और उनके साथ पत्रकार हेमचन्द्र पाण्डेय की हत्या किये जाने के बाद हाशिये पर चली गयीं।
आजाद की हत्या उस समय हुई थी जब शांति यात्रा करने वालों के समूह के सदस्य स्वामी अग्निवेश सरकार और माओवादियों के बीच वार्ता के मंच को अंतिम रूप देने का दावा कर रहे थे। उसी बीच हुई आजाद ही हत्या ने न सिर्फ शांति को लेकर सरकार की चाहत पर प्रश्नचिन्ह खड़े किये,बल्कि सामाजिक कार्यकर्ता स्वामी अग्निवेश का भी तमाम तीखे सवालों से साबका हुआ। स्वामी अग्निवेश की पहलकदमी पर सवाल तो बहुतेरे उठे, लेकिन शांति यात्रा के सदस्यों ने जो सवाल एक पत्र के माध्यम से खड़े किये हैं वह कुछ नये भटकावों,मौकापरस्ती और नेतृत्व करने की आतुरता को पाठकों के सामने सरेआम कर देते हैं। पत्र इस मायने में महत्वपूर्ण है कि सवाल करने वाले उनके अपने साथी हैं जिसका जवाब स्वामी अग्निवेश को अब उन्हीं सार्वजनिक मंचों पर आकर देना चाहिए जहां वह शांतिवार्ता के नायक के तौर पर अब तक स्थापित होते रहे हैं।
शांति और न्याय के लिए एक अभियान में शामिल पदयात्रियों का अग्निवेश के नाम  पत्र...

प्रिय अग्निवेश जी,
                                                                                                                             
हमलोग यह पत्र मई 2010में छत्तीसगढ़ शांति और न्याय यात्रा के उन सदस्यों की ओर से लिख रहे हैं जो इस अभियान में शामिल थे। हमलोग इस मसले पर अपना मत सार्वजनिक नहीं करना चाह रहे थे,लेकिन शांतिवार्ता में शामिल सदस्यों का दबाव था कि सच्चाई सामने आनी चाहिए। इसलिए हमें लगता है कि यह सही वक्त है जब बात कह दी जानी चाहिए। अब हम सीधे मुद्दे पर आते हैं और साफ-साफ कहना चाहते हैं कि आपने पूरे मामले को हथियाने की कोशिश की। विभिन्न क्षेत्रों में महारत प्राप्त वैज्ञानिक,शिक्षाविद,गांधीवादी और सामाजिक कार्यकर्ताओं द्वारा शुरू की गयी इस पहल को आपने न सिर्फ रास्ते से भटकाया (आजाद और हेमचंद्र पांडे के संदर्भ में)बल्कि अंततः ममता बनर्जी जैसे नेताओं की राजनीतिक झोली में डाल दिया।

कहीं पे निगाहें कहीं पे निशाना : राजनीति में यही उसूल  
इतना ही नहीं आपने खुद को शांति और न्याय यात्रा का स्वघोषित नेता मान लिया और गृहमंत्री पी.चिदंबरम से सांठगांठ में  लगे रहे। हम सभी जानते हैं कि शांति और न्याय यात्रा के बाद 11मई को गृहमंत्री ने आपको संबोधित एक पत्र में लिखा था  कि ‘मुझे पता चला  है रायपुर   से  दंतेवाड़ा   तक सामाजिक कार्यकर्ताओं के एक समूह का शांति यात्रा में नेतृत्व करते हुए आप रायपुर से दंतेवाड़ा गये...’

आप नेता कैसे बन सकते हैं जबकि आप शांति यात्रा के ऐसे पहले सदस्य थे जिन्होंने जगदलपुर के एक लॉन में बैठकर 6मई को बीजेपी और कांग्रेस के गुंडों के प्रदर्शन के बाद कहा था कि 'हम लोग यहां शहीद होने के लिए नहीं आए हैं. विरोध–प्रदर्शन बंद कर देना चाहिए और कल ही यहां से वापस चले जाना चाहिए.'


हमारे एक सदस्य डॉ. बनवारी लाल शर्मा के फोन करने और चेतावनी देने के बावजूद आपने गुपचुप तरीके से कदम उठाते रहे.उदाहरण के तौर पर थॉमस कोचरी ने एक सलाह दी थी कि इस अभियान से जुड़े कुछ सदस्यों को जेल में बंद माओवादी नेताओं से मुलाकात करनी चाहिए. कई दूसरे सदस्यों समेत नारायण देसाई ने इसका समर्थन किया था. डॉ शर्मा ने आपसे अनुरोध किया था कि आपको इस बाबत गृह मंत्रालय से अनुमति लेनी चाहिए क्योंकि आप वहां जा चुके थे.


अभियान के प्रमुख लोग: उभरे अग्निवेश
बजाय इसके कि आप हमारे अभियान के लिए इसकी इजाजत लेते,आपने गुपचुप तरीके से रायपुर और दिल्ली के  तिहाड़ जेल में जाकर माओवादी नेताओं से मुलाकात कर ली.इसके अलावा आपने राजगोपाल के साथ मिलकर दिल्ली में 9जुलाई को एक राउंड टेबल आयोजित करने का ऐलान कर दिया,जबकि राजगोपाल हमारे ग्रुप में पहले से नहीं शामिल थे.


जब हमें ये पता चला तब हम लोगों ने इसमें हस्तक्षेप किया.इस मीटिंग में वरिष्ठ गांधीवादी नेता राधा भट्ट और डॉ शर्मा मौजूद थे.इसी मीटिंग में आपने खुलासा किया कि आपके पास आजाद (माओवादी प्रवक्ता)का भेजा गया वो पत्र है जिसे उन्होंने चिदंबरम के पत्र के जवाब में भेजा था.हालांकि आपने ये पत्र हमें दिखाने से इंकार कर दिया था,जबकि ये पत्र पहले ही सार्वजनिक हो चुका था और हमारे पास भी मौजूद था.जब आप पर अभियान के सदस्यों ने ये जानने के लिए दबाव डाला कि 'आजाद ने बातचीत के लिए क्या शर्ते रखी हैं?'तब आपने केवल कुछ संकेत दिए.

हमने तब जोर देकर कहा कि जब तक सरकार माओवादियों की कुछ मांगों को स्वीकार करके गंभीरता का परिचय नहीं देती,तब तक माओवादियों से राउंड टेबल बातचीत का कोई मतलब नहीं.डॉ शर्मा के साथ लंबी बातचीत के दौरान आपने उन्हें विश्वास दिलाने की कोशिश की कि सबकुछ ठीक है, लेकिन ये साफ हो चुका है कि कुछ भी ठीक नहीं था.आपने खुद स्वीकार किया था कि चीजें ठीक दिशा में नहीं जा रही और आप इस प्रक्रिया से बाहर होना चाहते हैं.(हालांकि किसी ने आपसे इस प्रक्रिया में शामिल होने के लिए कहा भी नहीं था).चिदंबरम और कुछ दोस्त जिनके साथ आप माओवादियों के प्रतिनिधि के तौर पर व्यवहार कर रहे थे,से झटका खाने के बाद आपने उनसे 25 जून को फोन पर हुई बातचीत के दौरान ये बात कही थी.


इन साथियों ने आपसे आजाद के पत्र को सार्वजनिक करने का दवाब डाला.जबकि आप चिदंबरम के पत्र को पहले ही सार्वजनिक कर चुके थे. (आपने इस पत्र की स्कैन कॉपी ई-मेल से भेजी थी). आपने 19 जून को दोपहर तीन बजे दिल्ली में प्रेस कांफ्रेंस कर आजाद के खत को सार्वजनिक करने का फैसला लिया था और इसका ऐलान भी कर दिया था,लेकिन चिदंबरम के आदेश पर आपने आखिरी वक्त में प्रेस कांफ्रेंस को स्थगित कर दिया.


शांतिवार्ता की प्रक्रिया में यह लोग क्यों नहीं रहे?
बातचीत की प्रक्रिया से अलग होने के बाद भी आपने आजाद को पत्र लिखा और इसका भयानक परिणाम सबके सामने है.केवल आजाद ही नहीं, हेमचंद्र भी मारे गए. और इसी के साथ शांति प्रकिया की भी हत्या हो गई.


आप हमें ये कहने की इजाजत दें कि आप इस देश के स्वतंत्र नागरिक हैं और अपनी मनमर्जी के मुताबिक काम करने के लिए स्वतंत्र हैं.लेकिन हमें अफसोस के साथ कहना पड़ रहा है कि सचेत नागरिकों के कठिन प्रयास से निकला एक ‘शांति दूत’चुनावी एजेंट में बदल चुका है,जिसने 9अगस्त को लालगढ़ में एक जोरदार चुनावी भाषण दिया है.आपकी उस बहुप्रचारित ‘शांति यात्रा’का क्या हुआ जिसे 9से 15 अगस्त के दौरान कोलकाता से लालगढ़ जाना था और जिसमें मेधा पाटकर समेत कई सामाजिक संगठनों को शामिल होना था?जिसके नेता आप और मेधा थे और धारा144 को तोड़ते हुए लालगढ़ में आपको 15 अगस्त के दिन तिरंगा फहराना था?


आपने ‘शांति प्रक्रिया’को राजनीति की विषयवस्तु बना दिया है.हमें अफसोस के साथ कहना पड़ रहा है कि आपने निजी राजनीतिक महत्वाकाक्षांओं के लिए शांति-न्याय मार्च के 60सदस्यों के साथ धोखा किया है. हम कहना चाहते हैं कि आपकी गलतियों के लिए हम कहीं से भी जिम्मेदार नहीं हैं.

शांति  मार्च  के भागीदारों का मूल अंग्रेजी में लिखा पत्र  

आपने शांति प्रकिया का बहुत नुकसान किया है.बावजूद इसके,शांति और न्याय के लिए हमारी मुहिम जारी है.हमारा प्रयास है कि देश में हिंसा की समाप्ति और हिंसा के लिए जिम्मेदार मूलभूत कारणों को समाप्त करने के लिए जनमत बनाया जा सके.

भवदीय
अगस्त 19, 2010
थॉमस कोचरी अमरनाथ भाई,राधा भट्ट, डॉ वी एन शर्मा, गौतम बंदोपाध्याय, जनक लाल ठाकुर, राजीव लोचन शाह, नीरच जैन, विवेकानंद माथने, डॉ बनवारी लाल शर्मा, मनोज त्यागी, डॉ मिथिलेश डांगी की ओर से जारी पत्र...


अनुवाद : विडी




माओवादी कहलाना पसंद करूँगा !


जनज्वार  में छपे  लेख ‘लखीसराय फिल्म की सफलता और टीवी शो के बुद्धिजीवी' के कुछ अंशों  पर जीएन साईबाबा ने ऐतराज करते हुए एक टिप्पणी लिखी है,जो इस प्रकार से है...
जनज्वार के प्रिय साथियों,

जनज्वार ने मुझ पर आरोप लगाया गया है कि बिहार में माओवादियों द्वारा बंधक बनाए गए पुलिसकर्मियों में से एक  लोकस टेटे की हत्या पर मैंने अरुंधती  राय,स्वामी अग्निवेश और मेधा पाटेकर के खेद जताने के बाद खेद जताया.मेरे ऊपर लगाया गया यह आरोप आधारहीन है.मैंने दो सितंबर को लोकस टेटे की हत्या से पहले ही बीबीसी (हिंदी)और कुछ टीवी चैनलों से हुई बातचीत में माओवादियों से बंधक बनाए गए चारों पुलिसकर्मियों की हत्या न करने की अपील की थी.

मैंने इस बात पर अपनी राय जाहिर की थी कि माओवादियों को उनकी हत्या क्यों नहीं करनी चाहिए.

लोकस टेटे की हत्या की खबर मिलने के दो घंटे बाद ही मैंने बयान जारी करना शुरू कर दिया था,मुझे जो भी मिला मैंने उसे अपना बयान दिया.

‘जनज्वार’ ने मुझे माओवादियों का एक समर्थक बताने की कोशिश की है, लेकिन मुझे समर्थक शब्द से नफरत है. पत्रकार अर्नव  गोस्वामी को भी मुझे और बहुत से अन्य लोगों को माओवादियों को समर्थक बताना  अच्छा लगता है. लेकिन मैं एक ‘समर्थक’ होने की जगह ‘माओवादी’ होना ज्यादा पसंद करुंगा है.  समर्थक कहने से ऐसा लगता है कि कोई मुझे दलाल, टहलुआ या बिचौलिया कहकर बुला रहा है.

मुझे उदारवादी बुद्धिजीवियों से  जो कि आज के समाज के बारे में अच्छी समझ रखते हैं,उनकी अपील से भाकपा (माओवादी) अगर सबक लेती है तो  इसमें कोई समस्या नजर नहीं आती है. खासकर उन बुद्धिजिवियों की तुलना में जो कि महान मार्क्सवादी होने का दंभ तो भरते हैं लेकिन आज के समय की समस्याओं के प्रति कोई जिम्मेदारी नहीं निभाते हैं.

शुभकामनाओं के साथ

जीएन साईबाबा

Sep 5, 2010

‘लखीसराय’ फिल्म की सफलता और टीवी शो के बुद्धिजीवी


पिछले छह दिनों से बंधक बनाये तीन पुलिसकर्मियों को सही-सलामत उनके परिजनों को सौंपने का फैसला कर  माओवादियों ने इतिहास नहीं रचा है बल्कि  पार्टी परंपरा को ही जारी रखा है.

अजय प्रकाश

एक सप्ताह पहले कजरा के जंगलों से रिलीज हुई सस्पेंस,रोमांस और मारधाड़ से भरपूर दिल को छू देने वाली फिल्म ‘लखीसराय’इस हफ्ते टीवी चैनलों के बक्से पर सबसे ज्यादा हिट रही। हिट कराने का सारा श्रेय माओवादियों को जाता है, जिन्होंने खबरहीन हो चुके चैनलों की टीआरपी बरकरार रखने में महती भूमिका अदा की।

पुलिसकर्मी अभय प्रसाद यादव की पत्नी से खगड़िया जिले में राखी बंधवाकर किशन नाम के एक माओवादी ने भाई-बहन के प्रेम को अमर करने का इतिहास रचा है और इस प्रकार यह प्रहसन अंत की ओर है।किशन से  बदले में बहन के पति के महकमे को नौ ग्रामीणों की माओवादी होने के आरोप में गिरफ्तारी का उपहार भी मिला है। हालांकि प्रवक्ता अविनाश इन गिरफ्तारियों के बारे में बॉक्स ऑफिस पर लगातार फोन कर बता रहे हैं कि वह निर्दोष ग्रामीण हैं,लेकिन थोड़ी देर पहले तक काकचेष्टा लगाये मीडिया उनकी बात सुन संवैधानिक कानूनों की याद दिला रहा है।

माओवादी   पार्टी गठन से पहले जारी पर्चे का एक अंश
इधर बिहार से आ रही खबरों के मुताबिक बंगाल वाले किशन जी और बिहार वाले में बस इतना ही फर्क दिखा कि वह चेहरे पर हरा लपेटते हैं इसने भगवा लपेटा था। वह चेहरा नहीं एके 47 दिखाते हैं, यह झलक दिखा गया। उनके सामने से मीडियाकर्मी जाते हैं,यहां वह खुद गया। यानी अपना बिहार वाला किशन जी बंगाल वाले से साहसी निकला कि चिलमन से बाहर तो झांका।

इन जानकारियों को साझा करने के बाद अब पाठकों से विनम्र आग्रह है कि कृपया यह न पूछें कि चौथे स्तंभ पर जांनिसार माओवादियों को टीवी के बक्से पर इतना ऐतबार क्यों है?अगर इसका जवाब पाठकों को मिल भी गया तो वह फिर भी बाज न आयेंगे और पूछ बैठेंगे कि झारखण्ड निवासी आदिवासी हवलदार लुकास टेटे की हत्या माओवादियों ने की या फिर टीवी चैनलों ने 'इमोशनल अत्याचार' करके करवायी।

फिर भी आप एक बेसब्र पाठक हैं तो कृपया बॉक्स ऑफिस पर संपर्क कर प्रवक्ता का नंबर लें। समय हो तो मेरी तरफ से भी सवाल पूछ लें कि माओवादियों ने चुनकर एक आदिवासी पुलिसकर्मी की हत्या क्यों की? यादव, सिन्हा और खान साहब संयोग से नहीं मारे गये कि बिहारी होने का आरक्षण मिला। या फिर इससे भी दो कदम आगे बढ़कर यह कोई नयी ‘टैकटिक्स’थी कि इससे बिहार में काम करने में दिक्कत आयेगी।

बंधक पुलिस कर्मियों के परिजन: नौकरी ही गुनाह
उन्हें न सूझे तो माओवादी पार्टी के केंद्रीय समिति सदस्यों से पूछना,जो एक आदिवासी की हत्या करने के बाद बाकियों के साथ क्या किया जाये,के विचार-विमर्श के लिए जुटे थे। साथ में यह भी पूछना कि   नामचीन बुद्धिजीवियों की राय अगर नहीं आयी होती तो क्या आप बाकी पुलिसकर्मियों को मार डालते?

बहरहाल,बिहार की राजधानी पटना में कल शाम  हुई सर्वदलीय बैठक के बाद मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने माओवादियों से बातचीत की चाहत को मीडिया में सार्वजनिक किया है। मुख्यमंत्री की चाहत का कारण कजरा के जंगलों में 29अगस्त को माओवादियों और पुलिस की मुठभेड़ में चार पुलिसकर्मियों का अगवा कर लिया जाना है,जिसमें से एक की हत्या कर माओवादियों ने तीन को अभी इस लालच में बचा रखा था कि इसके बदले वह पूर्वी बिहार की जेलों में बंद आठ माओवादियों को छुड़वायेंगे। 29अगस्त की मुठभेड़ में सात पुलिसकर्मी मारे गये थे,लेकिन उसकी चर्चा बॉक्स ऑफिस पर नहीं है क्योंकि उसमें सस्पेंस, रोमांस, ट्रेजेडी का पुट नहीं है।

पुलिस ही हत्यारी: कौन करेगा जाँच
बदले में छुड़वाने की योजना संभव न हो सकी है और माओवादियों ने बिना  शर्त  कजरा के जंगलों से पुलिसकर्मी रूपेश कुमार सिन्हा,अभय प्रसाद यादव और एहसान खान को अपने कब्जे से मुक्त करने की जानकारी दी है .‘लखीसराय’फिल्म के माओवादी प्रवक्ता अविनाश ने कब्जे से मुक्त किये जाने के कारण के तौर पर ‘इन्टलेक्चुअल प्रेशर’और मानवीय आधार को जिम्मेदार बताया है। हालाँकि यह प्रेशर वामपंथ की नर्सरी कहे जाने वाले बिहार से नहीं,मेट्रो शहर दिल्ली से अग्रसारित हुआ है।

प्रवक्ता को यह प्रेशर उस समय महसूस हुआ जब लेखिका अरुंधती  राय,सामाजिक कार्यकर्ता स्वामी अग्निवेश और मेधा पाटकर ने माओवादियों की इस कार्यवाही की भर्त्सना की। गौरतलब है कि इन तीनों बुद्धिजीवियों में कोई मार्क्सवादी  नहीं है और न ही किसी का वर्ग संघर्ष की राजनीति में कोई भरोसा है। फिर भी माओवादियों ने इनके सुझावों की कद्र की। यह
 माओवादियों का बड़प्पन है या छुटपन यह तो वही जानें,लेकिन दिल्ली में माओवादियों के पक्ष में मीडिया के सामने अक्सर बयान देने वाले जीएन साईंबाबा का भी बयान इन गैर मार्क्सवादियों  की राय के बाद ही प्रकाश में आया कि 'माओवादियों की इस कार्यवाही को उचित नहीं कहा जा सकता।’
तो फिर फोन करने वाले पाठको!प्रवक्ता से यह भी पूछना कि पार्टी से लेकर माओवादी बुद्धिजीवी तक बयान देने के लिए क्या उन्हीं सुधारवादी और मानवतावादियों का मुंह ताकते रहते हैं जो माओवादी राजनीति का लोहा मानते हुए भारतीय समाज में संघर्ष और प्रतिरोध को सबसे मुकम्मिल धारा मान चुके हैं। ऐसे में सवाल उठता है कि यह माओवादियों की असफलता है या चंद लखीसराय टाइप प्रवक्ताओं की,जिनको कि माओवादियों ने जिम्मेदारी सौंप रखी है।

सबसे महत्वपूर्ण सवाल है कि माओवादी पार्टी का सुरक्षाबलों के प्रति क्या नजरिया है,यह इस पूरे घटनाक्रम के बीच क्यों नदारद रहा?ऐसा क्यों हुआ कि सुरक्षाबलों के प्रति तय रणनीति के खिलाफ माओवादियों ने हवलदार लुकास टेटे की हत्या की?यह बात जीएन साईंबाबा जैसे बुद्धिजीवियों को क्यों नहीं समझ में आयी और अरुंधती की जुबान खुलने पर बयान देने की दरकार महसूस हुई कि 'अगवा कर  मारना उतना ही बड़ा अपराध है जितना बड़ा हाल ही मारे गये आजाद और हेमचंद पाण्डेय की हत्या।'

अरुंधती : बुद्धि का साहस
क्या यह सही वक्त नहीं था जब बॉक्स ऑफिस को मुक्ति के रास्ते के तौर पर इस्तेमाल किये जाने पर आमादा बुद्धिजीवी यह पूछते कि अदिलाबाद के जंगलों में मारे गये माओवादी पार्टी के राष्ट्रीय प्रवक्ता आजाद की मां चेरूकुरी करुणा की आंखों में जो आंसू थे वे किस मायने में वे किसी पुलिसकर्मी के परिजनों से कमतर थे। आंसुओं और दुखों को राजसत्ता के नजरिये से देखने वाले मीडिया पर क्यों नहीं बरसा जाना चाहिए कि पत्रकार हेमचंद्र की बीबी बबीता के मन में सरकार के प्रति नफरत का भाव झारखण्ड में माओवादियों के हाथों मारे गये पुलिसकर्मी इंदुवार के नाबालिग बेटे से कमतर कैसे है?

अगर नहीं है तो फिर यह कैसे हुआ कि ग्यारह आदिवासियों की हत्या के बाद छत्तीसगढ़ सरकार लगातार कहती रही कि वे माओवादी थे और मुठभेड़ में मारे गये। सबको झुठलाने पर टिकी सरकार के होश ठिकाने तब आये जब सर्वोच्च न्यायालय ने सभी मृतकों के परिजनों को एक-एक लाख मुआवजा देने का आदेश दिया और मुठभेड़ को फर्जी करार दिया। अगर कमतर नहीं है तो अलीगढ़ किसान आंदोलन में मारे गये पांच किसानों की हत्या की आज तक एफआईआर दर्ज क्यों नहीं की गयी है?अगर कमतर नहीं है तो पिछले नवंबर से इस वर्ष अप्रैल के बीच छत्तीसगढ़ के बस्तर में 112आदिवासी फर्जी मुठभेड़ों में मारे गये,लेकिन बस्तर में माओवादियों के नाम पर हुई हत्याओं को लेकर कभी किसी पुलिसकर्मी के खिलाफ मुकदमा क्यों दर्ज नहीं किया गया है?

तो फिर सवाल उठता है कि बुद्धिजीवियों को सबसे ज्यादा पसरने का मौका देने वाला टीवी का बॉक्स ऑफिस कभी इन सरकारी हत्याओं को सवाल क्यों नहीं बना सका?आजाद और हेमचंद पांडे की पोस्टमार्टम रिपोर्ट आ चुकी है। प्रबुद्धजनों की फैक्ट फाइंडिंग टीम लौटकर रिपोर्ट जारी कर चुकी है कि यह मुठभेड़ नहीं हत्या है। फिर भी केंद्रीय गृह सचिव कहते हैं-‘आजाद मुठभेड़ मामले में कोई अलग से जांच नहीं होगी।’क्या कोई बुद्धिजीवी या बॉक्स ऑफिस का एंकर है जो सरकार पर दबाव बनाकर कहे कि वह माओवादियों से संघर्ष में संयुक्त राष्ट्र संघ के तय मानकों का ख्याल करे।

Sep 4, 2010

कहते हैं पाकिस्तान गए होंगे


अफगानिस्तान में 1000 लोगों पर 25 अमेरिकन आर्मी है, जबकि कश्मीर में 1000 पर 70 आर्मी है। बावजूद इसके भारत-पाक दोनों देशों की इस समस्या को सुलझाने में कोई दिलचस्पी नहीं दिखती  और हम कश्मीरियों को  सिर्फ मोहरे की तरह इस्तेमाल किया जाता है...

सुनील गौतम

‘मैं हिंसा और विरोधाभास के बीच पैदा हुई हूं। मैंने जितनी सांसें नहीं ली हैं, उससे भी कहीं ज्यादा गालियों की आवाजें सुनी हैं।’इन्शाह मलिक द्वारा कही गयी उपरोक्त बातें अपनी पहचान की जद्दोजहद में जूझते जम्मू और कश्मीर की हालत खुद-ब-खुद बयां करते हैं।

कश्मीर से ताल्लुकात रखने वाली और टाटा इनस्टीट्यूट ऑफ  सोशल साइंस मुंबई की छात्रा इन्शाह आगे कहती हैं -‘यह संघर्ष सिर्फ ‘कश्मीर बचाओ आंदोलन’के सदस्यों का नहीं,बल्कि उन तमाम कश्मीरी युवाओं का है जो अपनी अस्मिता और पहचान की लड़ाई लड़ रहे हैं। हम भारतीय सेना के एके-47का मुकाबला पत्थरों से कर रहे हैं। इस लड़ाई में मुझ जैसे लाखों  कश्मीरी शामिल हैं,जो डर और विरोधाभास के साये में पैदा हुए हैं। यह लड़ाई दिन-प्रतिदिन बढ़ती जा रही है। हमारे साथ आतंकवादियों जैसा व्यवहार किया जाता है। हम अपने ही देश में दूसरे ग्रह के जीव के रूप में जीवन-यापन कर रहे हैं और यही हमारी लड़ाई का मूल कारण है। हमारी यह लड़ाई नेता विहीन है और इसका कोई राजनीतिक मकसद भी नहीं है।’

‘कश्मीर बचाओ आंदोलन’ द्वारा 23 अगस्त 2010 को जारी की गयी प्रेस रिलीज में साफ तौर पर कहा गया है कि जून 2010 से अब तक 63 युवक भारतीय फौज की गोलियों के शिकार हो चुके हैं। पिछले तीस सालों में एक लाख से अधिक लोग मारे जा चुके हैं। आखिर कब तक हम इस तरह की फौजी कार्रवाई को मूकदर्शक बनकर देखते रहेंगे।

दिल्ली के जामिया इस्लामिया में पढ़ने वाली फरीदा खान ने कहा कि ‘कश्मीर के हर युवक में गुस्सा काफी ज्यादा है। साथ ही वो असमंजस के शिकार भी हैं। उनकी समझ में नहीं आ रहा है कि वे हिन्दुस्तान में हैं या पाकिस्तान में। 15 से 17 साल के छोटे-छोटे बच्चों को आतंकवादी का नाम देकर आर्मी द्वारा उठा लिया जाता है। उन्हें बुरी तरह पीटा जाता है। कई कश्मीरी युवक तो घर से ही गायब हैं। पूछने के वास्ते पुलिस के पास जाओ तो पुलिस द्वारा बुरा व्यवहार किया जाता है और ‘पाकिस्तान गये होंगे’जैसे वाक्यों का प्रयोग किया जाता है। इस संबंध में भारत सरकार द्वारा कोई हस्तक्षेप नहीं किया जाता। हम संगीनों के साये में जिंदगी जीते हैं। हमारे चारों तरफ पुलिस और आर्मी तैनात रहती है। रात को 12 बजे जब कोई दरवाजे पर दस्तक देता है तो यह भेद करना मुश्किल हो जाता है कि पुलिस है या आतंकवादी।’

मीडिया को भी लताड़ते हुए डॉ.फरीदा खान ने कहा-‘मीडिया भी अब अपनी जिम्मेदारी सही तरीके से नहीं निभा रहा है। मीडिया हमें गलत तरीके से पेश करता है। आखिर हमारे साथ इस तरह का जुल्म क्यों किया जा रहा है। हमारे यहां भी जनता द्वारा चुनी गयी सरकार है। लोकतंत्र भी मौजूद है,फिर क्यों हमारे विरोध करने पर गोलियां चलायी जाती हैं। भारत सरकार हमारे वोट लेकर हमें भूल जाती है।’

कश्मीर में होने वाली फौजी कार्रवाई का यह रूप काफी दर्दनाक है। इस कार्रवाई में अब बच्चों को भी शिकार बनाया जा रहा है। इसकी शुरुआत 8 जनवरी 2010 से हुई जिसमें इनायत खान नामक एक 16 साल के लड़के को गोली मार दी गयी। इस संबंध में बात करते हुए इन्शाह मलिक ने हमें बताया कि ‘अफगानिस्तान में 1000 लोगों पर 25 अमेरिकन आर्मी है, जबकि कश्मीर में 1000 पर 70 आर्मी है। लेकिन हम इन्हें याद दिलाना चाहते हैं कि ये लोग जितना हमें दबाने की कोशिश करें हमारी यह लड़ाई तब तक चलती रहेगी जब तक हमें हमारी पहचान नहीं मिल जाती।’

निःसंदेह जितनी भी बातें कही गयीं वो सभी सत्य थीं,लेकिन सवाल यह उठता है कि यह आंदोलन आखिर उन अलगाववादियों से जो कि कश्मीर के नाम पर भारत में जेहाद फैला रहे हैं,से कैसे अलग है। इस सवाल के जवाब में इन्शाह ने कहा-‘देखिये,ये एक अंतरराष्ट्रीय राजनीतिक मुद्दा है। भारत-पाक दोनों देशों की यह समस्या सुलझाने में कोई दिलचस्पी नहीं है। हमें सिर्फ मोहरे की तरह इस्तेमाल किया जाता है। और रही बात अलगाववादियों की तो हम आपको बता दें कि हम उनसे काफी अलग हैं। हम सिर्फ पत्थर फेंककर ही विरोध का प्रदर्शन करते हैं। नई पीढ़ी के कश्मीरी युवक किसी भी अलगाववादी नेता या कट्टरपंथी की नहीं सुनते। हमारा विरोध हमारा है।’

कश्मीर के मुद्दे पर जारी की गयी प्रेस रिलीज में सरकार से निम्न कदम उठाने के लिए कहा गया-

1. कश्मीर से तुरंत आर्मी हटा ली जाये।
2. एएफएसपीए (आम्र्ड फोर्स स्पेशल पावर्स एक्ट) को निरस्त किया जाये।
3. विरोध प्रदर्शन के दौरान गिरफ्तार हुए बेकसूर युवाओं को तुरंत रिहा किया जाये।
4. निष्पक्ष न्याय प्रणाली को लागू किया जाये ताकि वहां के लोगों को न्याय मिल सके।


(जनता का आइना से साभार)

Sep 1, 2010

सूखे पर सवार नीतीश सरकार


बिहार सरकार ने  चुनाव के मद्देनजर सभी जिलों को सूखाग्रस्त घोषित कर दिया है, लेकिन  मुख्यमंत्री की घोषणा भर से क्या किसानों का दर्द कम हो जायेगा.

पंकज कुमार

उत्तरी बिहार के कुछ इलाकों में आयी  बाढ़ के बारे में टीवी चैनल पर खबर देखने या फिर किसी सामाचार पत्र में खबर पढ़कर यह अंदाजा लगाना तथ्यगत रूप से ठीक नहीं कि  बिहार में बारिश हो रही है। नेपाल की नदियों से बहकर आये  पानी से बिहार के कुछ इलाकों में बाढ़ जैसी स्थिति  हो गई है, जिस कारण कुछ क्षेत्र जलमग्न हो गए हैं। लेकिन सवाल है कि क्या इस पानी से सूखाग्रस्त  किसानों का भला होने वाला है?

नीतीश सरकार ने बिहार के 28 जिलों को पहले सूखाग्रस्त घोषित किया। बाद में 64वें स्वतंत्रता दिवस के मौके पर पटना के गांधी मैदान से राज्य के सभी 38 जिलों को सूखाग्रस्त घोषित कर दिया। लेकिन सिर्फ सूखा घोषित करने भर से ही सरकार का काम पूरा हो जाता है या जरूरत इस बात की है जो घोषणाएं की जा रही हैं  वह किसानों या जरूरतमंदों तक पहुंच रही है या नहीं।

मौसम विभाग के एक अनुमान के मुताबिक अगस्त के दूसरे सप्ताह तक राज्य में 32 फीसदी कम बारिश हुई है। ऐसे में सूखे से निपटना सरकार के लिए चुनौती है, वह भी ऐसे समय में जब राज्य में विधानसभा चुनाव होने वाले हैं। पहले से ही कई मोर्चों पर चुनौतियां झेल रही एनडीए सरकार किसी भी कीमत पर किसानों को नाराज करने का जोखिम उठाना नहीं चाह रही होगी। बिहार सरकार ने चुनाव को देखते हुए सभी जिलों को सूखाग्रस्त घोषित भले ही कर दिया हो, लेकिन पटना से मुख्यमंत्री की घोषणा भर से क्या किसानों का दर्द कम हो गया है? नीतीश कुमार भले ही खुद को सुशासन कुमार का तगमा दिए जाने से खुश हो रहे हों, लेकिन उनके प्रशासनिक तंत्र में कई झोल हैं। वह भी ऐसे झोल जिनकी वजह से पहले से ही कमर के बल झुक चुके किसानों के माथे पर बल पड़ रहे हैं।

चुनावी साल है तो मुख्यमंत्री ने स्वतंत्रता दिवस के दिन सूखाग्रस्त बिहार के लिए ग्रामीण बिहार के लिए घोषणाओं की झड़ी लगा दी। उन्होंने पंचायतों में अतिरिक्त अनाज रखने का निर्देश दिया है ताकि कोई अन्न की कमी से भूखा न मर सके। पेयजल आपूर्ति के बारे में लगातार समीक्षा की जा रही है। किसानों को तीन लाख रुपए तक का ऋण चार प्रतिशत ब्याज पर मुहैया कराने की घोषणा की गई। उन्होंने कहा कि पंचायतों में मजदूरों के हित में मनरेगा योजना चल रही है, लेकिन कोशिश है कि प्रत्येक पंचायत में रोजगार मुहैया कराने वाली दो योजनाएं और चलाई जाएं।

सूखे के हालात से निपटने के लिए प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह  और केंद्रीय टीम को व्यापक रूप से जानकारी दी गई है और पांच हजार करोड़ रुपए की मांग की गई है। राज्य सरकार की ओर से सूखा पीड़ित किसानों के हित में उठाए गए कदमों की जानकारी देते हुए उन्होंने कहा कि धान के बिचड़ें और फसल को बचाने के लिए डीजल अनुदान देने हेतु 570 करोड़ रूपये दिए गए हैं। इसके बाद भी सूखे से निबटने के लिए बिहार को 330 मेगावाट अतिरिक्त बिजली और बेरोजगार श्रमिकों हेतु रोजगार के लिए मनरेगा के तहत 13 हजार 456 करोड़ रुपए की सहायता राशि की मांग की गई है। 

भीषण सुखाड़ की स्थिति में पहले से ही इंद्रदेव की बेरुखी से परेशान किसान नीतीश सरकार की लालफीताशाही और अफसरशाही से परेशान हैं। नीतीश सरकार पर पहले से ही आरोप लगते रहे हैं कि इस सरकार में अफसरशाही हावी है, घूसखोरी बढ़ी है। जिला स्तर हो या ब्लॉक स्तर सभी जगह पर कमोबेश यही रामकहानी है। यही वजह है कि राज्य सरकार द्वारा जारी की गई राशि जरुरतमंद किसानों तक नही पहुंच रही हैं। सरकार की ओर से सूखाग्रस्त घोषित होने के बाद यह घोषणा की गई थी कि आपदा राहत राशि, राज्य आपदा रिस्पांस कोष, राष्ट्रीय आपदा आकस्मिकता निधि और राष्ट्रीय आपदा रिस्पांस कोष से दिए जाने वाले सहायता प्रावधान तत्काल प्रभाव से लागू होंगे, लेकिन यह राशि किसानों तक पहुंच ही नहीं रही है।

जिन किसानों को कुछ सहायता राशि मिली भी है उन्हें कई दिक्कतों को सामना करना पड़ा है। इतना ही नहीं, किसानों को ठीक से पता भी नहीं है कि उनके लिए पटना से जो सहायता राशि या अनुदान की घोषणा की गई है, वह कब और कैसे मिलेगी? मधुबनी जिले के लक्ष्मीपुर गांव के रहने वाले किसान मदन गुप्ता का कहना है कि अखबारों में मैने भी काफी कुछ पढ़ रखा है, लेकिन हाथ कुछ भी नहीं आया है। उनका कहना है कि कुछ दिनों में हल्की-फुलकी बारिश तो हुई है, लेकिन इससे खेती  नहीं हो सकती है। खेती पर निर्भर रहने वाले किसान मदन गुप्ता सरकारी योजनाओं को लेकर काफी नाउम्मीद नजर आये। गरीब किसान जानकारी के अभाव में सरकारी मदद की टकटकी लगाए बैठा है, लेकिन स्थानीय प्रशासन  इन चुनौतियों को निपटाने में नकारा साबित हो रहा है।

बिहार एक कृषि प्रधान राज्य है। यहां की 90 फीसदी आबादी गांवों में और 77 फीसदी जनसंख्या कृषि एवं उससे संबंधित कार्यों से जुड़े हुई है। ग्रामीण क्षेत्रों में औद्योगिकीकरण का आधार भी कृषि है, लेकिन पूर्वी भारत में मानसून के दगा देने से हालात खराब होने लगे हैं। बिहार धान की रोपाई में काफी पिछड़ गया है, इसके अलावा दूसरी  फसलें भी सूख रही हैं। इससे खरीफ की कुल पैदावार के घटने का अंदेशा है। एक अनुमान के मुताबिक बिहार में धान की  रोपाई का रकबा 28.44 लाख हेक्टेयर है, मगर खेती  सिर्फ 15.80 लाख हेक्टेयर हो सकी है। यह राज्य लगातार दूसरे साल सूखे की चपेट में है। लगातार दूसरे साल सूखे की वजह से पशुओं के लिए चारे और पेयजल की किल्लत शुरू हो गई है, जो नीतीश सरकार के लिए बड़ी चुनौती है और प्रशासन का इस ओर ध्यान ही नहीं जा रहा।

15 अगस्त को नीतीश सरकार ने घोषणा करते हुए कहा कि सूखे से उत्पन्न हुए हालात के बाद भी राज्य में किसी को भूख से मरने नहीं दिया जाएगा, लेकिन नीतीश कुमार को ग्रामीण इलाके की स्थिति का अहसास नहीं है। किसान इस चिंता में डूबा है कि आखिर महंगाई की इस दौर में और कुदरत के बेरुखी के बाद उनका सालभर का खर्चा-पानी कैसे चलेगा। नीतीश कुमार सिर्फ घोषणाएं कर रहे हैं, लेकिन सूखे से उत्पन्न दूसरे संकटों पर ध्यान नहीं जा रहा। बिहार से दिल्ली, पंजाब, मुंबई जैसे दूसरे राज्यों में पलायन कम नहीं था, लेकिन अब पेट की आग और परिवार को दो वक्त की रोटी की जुगाड़ में लोग पलायन कर रहे हैं। सहायता राशि पीड़ितों तक कैसे पहुंचे ताकि पलायन को रोका जाए। इस बात पर राज्य के मुखिया का ध्यान नहीं जा रहा। दिल्ली के इंडिया इस्लामिक सेंटर में आयोजित कार्यक्रम में नीतीश कुमार ने कहा कि बिहार से लोगों का पलायन करना कोई नहीं बात नहीं है। यह पहले से होता आ रहा है।

सुशासन कुमार इतिहास की दुहाई देकर वर्तमान में अपनी सरकार की कमियों को छिपाते नजर आए। वह इस बात को भूल गए कि कोई भी घर से दूर-परदेस जाने को तभी मजबूर होता है जब उसके सामने रोजी-रोटी का संकट पैदा हो जाए। हालांकि केंद्र सरकार की ओर से सूखे की स्थिति का जायजा लेने के लिए आई केंद्रीय टीम ने राज्य सरकार के सूखे से संबंधित रिपोर्ट पर अपनी मुहर लगा दी है। लेकिन सूखे की मार झेल रहे लोगों का कहना है कि जब खरीफ फसल के बुआई का समय सीमा खत्म हो जाएगी, खेतों की हरियाली सूख चुकी होगी और जीने का संकट हो जाएगा- क्या सरकार उस वक्त तक का इंतजार कर रही है?

Aug 29, 2010

भारत का फिलीस्तीन

अंजनी


यह जगह क्या युद्ध स्थल है
या वध स्थल है


सिर पर निशाना साधे सेना के इतने जवान
इस स्थल पर क्यों हैं
क्या यह हमारा ही देश है
या दुश्मन देश पर कब्जा है



खून से लथपथ बच्चे महिलाएं युवा बूढ़े
सब उठाये हुए हैं पत्थर


इतना गुस्सा
मौत के खिलाफ इतनी बदसलूकी
इस कदर की बेफिक्री
क्या यह फिलीस्तीन है
या लौट आया है 1942 का मंजर


समय समाज के साथ पकता है
और समाज बड़ा होता है
इंसानी जज्बों के साथ
उस मृत बच्चे की  आंख की चमक देखो
धरती की शक्ल बदल रही है


वस्तुनिष्ठ प्रश्नोत्तर का समय बीत चुका है
और तुम्हारे निपटा देने के तरीके से
बन रहे हैं दलदल
बन रही हैं गुप्त कब्रें
और श्मशान घाट


आग और मिट्टी के इस खेल में
क्या दफ्न हो पायेगा एक पूरा देश
उस देश का पूरा जन
या गुप्त फाइलों में छुपा ली जाएगी
जन के देश होने की हकीकत
देश के आजाद होने की ललक
व धरती के लहूलुहान होने की सूरत


मैं किसी मक्के के खेत
या ताल की मछलियों के बारे में नहीं
कश्मीर की बात कर रहा हूं
जी हां, आजादी के आइने में देखते हुए
इस समय कश्मीर की बात कर रहा हूं