Aug 18, 2010

छिछोरों की मुंशीगीरी में साहित्यकार लगे हैं


जनज्वार  पर हमारे खिलाफ इतना छपने के बाद   चुप्पी को देखकर वाकई कहा जा सकता है कि भारत के बुद्धिजीवी समाज के अंतर्विवेक को लकवा मार गया है। संजीव जैसे 'नारसिसस कांप्लेक्स' से ग्रस्त लेखक को पटाकर (जिन्हें मठाधीश बनने के लिए भी राजेंद्र यादव का उतारा हुआ जूता ही मिला) 'हंस' में 'जनचेतना' और 'राहुल फाउण्डेशन' पर टिप्पणी करा लें, इससे हम पर कोई फर्क नहीं पड़ने वाला. इसी सोच के तहत राहुल फ़ाउंडेशन, अनुराग ट्रस्‍ट, परिकल्‍पना आदि खड़े किये गये हैं और डेढ़ दशक से अपने लक्ष्‍य को साकार करते हुए लगातार आगे बढ़ रहे हैं। इसे ये छिछोरे जानते हैं- मीनाक्षी, रिवोलुशनरी कोम्युनिस्ट लीग (भारत) की केन्द्रीय समिति सदस्य


शशिप्रकाश और कात्यायिनी ने तीसरा जवाब भी भेज दिया है. उसमें भी उन्होंने कमोबेश वही बातें कहीं हैं जो वह कहते आये हैं. उनका सारा संकट आकर शरीर के मध्य क्षेत्र में अटक गया है. एक  दूसरी श्रेणी उन्होंने मुंशियों, पागलों आदि की भी बना ली है, लेकिन पूछे गए किसी सवाल का जवाब नहीं भेजा है, शायद अगले जवाब में कात्यायिनी कुछ कहें. अब उन्होंने अगली रणनीति के तहत हिंदी साहित्कारों और बुद्धिजीवियों को लताड़ना शुरू कर दिया है. 


मीनाक्षी
मीनाक्षी: हिंदी में लकवा ग्रस्त बुद्धिजीवी हैं

पिछले कुछ दिनों से ब्लॉग जगत के धोबीघाट पर कम्युनिस्ट आन्दोलन को कलंकित करने के लिए एक जमात अपनी समझ से कम्युनिस्ट आन्दोलन के गन्दे कपड़े धो रही है, जबकि वास्तव में वह अपने ही गन्दे कपड़ों को कछार कर अपनी कुत्सित मानसिकता को बेनक़ाब कर रही है।

इनके व्यक्तिगत आक्षेपों-आरोपों-लांछनों का जवाब देना बहुत महत्वपूर्ण नहीं होता अगर हम एक जिम्मेदार,संजीदा समय में जी रहे होते। लेकिन आज जैसे गतिरोध,विपर्यय और ठहराव-बिखराव से उपजी निराशा के दौर में गाली-गलौज को भी लोग 'बहस' का नाम देने में सफल हो जाते हैं। आज वामपंथी आंदोलन की जो हालत है,उसमें आश्‍चर्य नहीं कि कुछ बुद्धिजीवी अपने को तटस्थ दिखाते हुए भी यहाँ-वहाँ चिमगोइयाँ लेने से बाज़ न आ रहे हों। आखिर स्तालिन ने यूँ ही नहीं कहा था कि एशियाई देशों की क्रान्तियाँ झूठ-फरेब, चुगली, साज़िशों और दुरभिसंधियों से भरी होंगी।

मैं अरविन्द की कामरेड और जीवनसाथी हूँ और मुझे फ़ख़्र है कि उनके जाने के बाद भी उसी रास्ते पर अडिग हूँ जिस पर हमने साथ-साथ चलने की कसम खायी थी। आज कुछ लोग बार-बार अरविन्द, उनके संगठन और व्यक्तिगत रूप से मुझे निशाना बनाकर निहायत शर्मनाक और गन्दे आक्षेप लगा रहे हैं। कम्युनिस्ट हर समाज में तमाम तरह की गालियाँ सुनते रहे हैं और इनसे कभी विचलित नहीं होते, लेकिन अगर किसी दिवंगत साथी को इस तरह से लांछित किया जाये तो चुप नहीं रहा जा सकता।


जो लोग अरविंद के जीवित रहते उनके ख़ि‍लाफ़ घटिया से घटिया आक्षेपों और दुष्‍प्रचारों में लगे हुए थे, वही उनकी मृत्‍यु के बाद भी अरविंद को बदनाम करने का कोई मौक़ा नहीं छोड़ रहे हैं। वे कह रहे हैं कि अरविंद को सज़ा के तौर पर गोरखपुर में अलग-थलग छोड़ दिया गया था, कि उनसे लोगों को बाहर निकलवाने का काम कराया जाता था, आदि-आदि।

पहला सवाल तो यह है कि क्रान्तिकारी आन्दोलन के अधिकांश लोग अरविन्द से परिचित हैं। क्या वे नहीं जानते कि अरविन्द ऐसे डोसाइल और कमज़ोर व्यक्ति नहीं थे कि उनसे उनकी मर्जी के बगैर कोई भी कुछ भी करवा सकता था।1986 में समाजवादी क्रान्ति की लाइन के दस्तावेज़ को लेकर देशभर के अनेक क्रान्तिकारी वाम संगठनों के नेतृत्व से अरविन्द ने मुलाकात की थी। फिर 1990 में मार्क्‍सवाद ज़िन्दाबाद मंच के पाँच दिवसीय सेमिनार के दौरान और विभिन्न क्रान्तिकारी संगठनों से मिलने के लिए दो बार की लम्बी यात्राओं के दौरान आन्दोलन के ज़िम्मेदार लोगों का उनसे नज़दीक से परिचय हुआ। नेपाल में हुए अन्तर्राष्ट्रीय सेमिनार के दौरान भी भारत और नेपाल के क्रान्तिकारी कार्यकर्ताओं और बुद्धिजीवियों से उनके रिश्ते बने। बनारस, गोरखपुर, लखनऊ और दिल्ली में काम करते हुए और देशभर में विभिन्न आयोजनों में वे जिन लोगों से मिले, वे क्या इस बात में यकीन करेंगे कि अरविन्द ऐसे व्यक्ति थे जिनसे कुछ भी करा लिया जाये?

दूसरा सवाल। एक तथ्य रेखांकित करना ज़रूरी है कि इस जमात के अधिकांश व्यक्ति वे हैं जिन्हें पिछले 5-6 वर्षों के दौरान अलग-अलग आरोपों में खुद अरविन्द द्वारा ही निष्कासित/निलम्बित किया गया था। ये स्वतः किसी मतभेद के कारण या किसी राजनीतिक मसले के कारण अलग नहीं हुए और न ही एक साथ संगठन से गये। इनमें से कुछ तो वे हैं जो 10-12 साल पहले ही यह कहते हुए घर बैठ गये थे कि इतना कठिन जीवन हमारे बस का नहीं है। कुछ को नैतिक कदाचार के आरोप में निलम्बित किया गया था। अगर इनमें दम है तो बतायें कि नोयडा की टीम से अजय प्रकाश, प्रदीप और घनश्याम को किस वजह से निलम्बित किया गया था? अगर 'जनज्वार' के संचालक में ज़रा भी कमिटमेंट है तो उन्हें यह सब छोड़कर भारत में समलैंगिक आन्दोलन को बढ़ाने में लग जाना चाहिए।

कात्यायिनी: बहन मीनाक्षी को उतारा
मुकुल,जिसके अर्थवाद और मुंशीगीरी के विरुद्ध संगठन में लम्बे समय से संघर्ष था, वह ज़रा बताये कि तराई क्षेत्र में उसके कामों की क्या आलोचना रखी गयी थी? अगर खटीमा आन्दोलन के दौरान अरविन्द डेढ़ महीने तक वहाँ न रहे होते तो पता ही न चलता कि उसके अर्थवाद ने कामों और संगठन की छवि को कितना नुकसान पहुँचाया है। अपनी हरकतों की वजह से उस आन्दोलन में साथ रहे बिरादर संगठन की नज़रों में मुकुल की छवि एक तिकड़मबाज और मुंशीगीरी करने वाले व्यक्ति की थी, न कि एक साहसी क्रान्तिकारी कार्यकर्ता की। लेनिन ने कहा है कि कम्युनिस्ट को ट्रेड यूनियन सेक्रेटरी जैसा नहीं बन जाना चाहिए, लेकिन यह तो उससे भी नीचे, अर्थवादी यूनियनों के जोड़-तोड़ करने वाले नेताओं जैसे आचरण पर उतर चुका था। इसके व्यवहार से तंग आकर एक मज़दूर संगठनकर्ता 40 पृष्ठ का शिकायती पत्र लिखकर पहले ही संगठन छोड़ गया था और लखनऊ से उसकी मदद के लिए भेजे गये एक युवा संगठनकर्ता आशीष निरन्तर मानसिक तनाव में रहा करते थे। उसकी कार्यशैली और जीवनशैली की आलोचना के बाद मुकुल जब भागा तो वह कुछ राजनीतिक सवालों का धुँआ छोड़ते हुए भागा, लेकिन बाकी तो नैतिक कदाचार, षड्यंत्र, गबन आदि के कारण अलग-अलग समयों में निकाले गये या 'हमारे बस का नहीं' कहकर घर बैठ गये।

आदेश कुमार सिंह नामक वह शख़्स जो नेपाल की तराई के एक धनी किसान का बेटा है और लम्बे समय तक डिप्रेशन का इलाज कराता रहा,रेल मज़दूर अधिकार मोर्चा तथा इंडियन रेलवे टेक्निकल एंड आर्टीज़न स्‍टाफ एसोसिएशन में अपने घनघोर अर्थवाद और व्यक्तिवाद के बावजूद बार-बार अपनी पारिवारिक पृष्ठभूमि से पैदा हुई वैयक्तिक कुंठाओं का रोना रोकर छूट लेता रहा। वह तो भोकार छोड़ते रोते हुए संगठन से यह कहकर गया था कि अपनी कमजोरियों के चलते जा रहा है, मगर 'साथी तो उसे बहुत प्रिय हैं।' वह भी आज ब्लॉग पर चुटपुटिया छोड़ रहा है और समझ रहा है कि धमाके कर रहा है।

सत्येंद्र कुमार साहू नाम का व्यक्ति तो लम्बे समय से छुट्टी लेकर 'सम्पत्ति और परिवार' को व्यवस्थित करने में लगा था, इसके साथ तो संगठन मानो एक प्रयोग कर रहा था कि क्या कई पीढ़ी के सूदखोर खानदान से आये एक वर्गशत्रु को रगड़-घिसकर कम्युनिस्ट बनाया जा सकता है? दरअसल, इसका असली मक़सद तो था अपनी तीन बेटियों को आधुनिक बनाना। संगठन के साथ लगकर इसका यह प्रोजेक्ट जब पूरा हो गया तो उसे संगठन में रहना भारी लगने लगा। इसके निखट्टूपन और हर जगह वर्ग सहयोग तथा बनियागीरी करने की आलोचनाएँ इसे बुरी लगने लगीं। पिछले दो वर्ष से अधिक समय से यह छुट्टी पर था और संगठन के साथ मज़बूती से खड़ी अपनी एक बेटी (शालिनी) को घरेलू जीवन में लौट आने के लिए कनविंस करने की कोशिश में लगा रहा। ये इन कुत्साप्रचारकों की मंडली का फाइनेंसर भी है और अपने मूर्खतापूर्ण और घटिया आरोपों की एक पुस्तिका भी छपवाकर बाँटता रहा है।

ज़रा देखिये कि ये आखिर कह क्या रहे हैं। किस व्यक्ति को किस नाम से पुकारा जाता है, कौन किसका क्या लगता है? ये कौन-सी राजनीतिक बात है? मतभेद के नाम पर जो लोग यह छापकर बाँट रहे हैं कि किसी संगठन ने फलां सरकारी गेस्टहाउस में कांफ्रेस या मीटिंग की, क्या उन्हें राज्यसत्ता का एजेंट नहीं माना जाना चाहिए? यह तो कोई राजनीतिक मसला नहीं है। वाम क्रान्तिकारी धारा के संगठन गेस्टहाउस, रेस्टहाउस या होटल में भी ज़रूरत के अनुसार मीटिंगें करते रहे हैं। प्रश्न यह भी नहीं कि ऐसी किसी जगह मींटिंग/कांफ्रेंस हुई या नहीं हुई। प्रश्न तो यह है कि अगर कोई संगठन ऐसा करता भी है और इस तथ्य को कुछ लोग छापकर बड़े पैमाने पर सर्कुलेट करते हैं तो उन्हें क्या माना जाना चाहिए? क्या ऐसे लोगों की बातों को संजीदगी से लिया जाना चाहिए?

ग्वालियर में बैठकर इस कीचड़फेंक मुहिम में अपनी गन्दगी जोड़ने में लगे अशोक कुमार पाण्डेय की भी सुन लीलिए। लखनऊ में एक अखबार के गुण्डों ने जब 1995 में उसके दफ्तर पर धरना दे रहे राहुल फाउण्डेशन के कार्यकर्ताओं पर हमला किया था,जिसमें सैकड़ों की भीड़ के सामने गुण्डों की फौज से दो दर्जन कार्यकर्ता आधे घण्टे तक भिड़ते रहे थे, आधा दर्जन से ज्यादा महिलाओं सहित दर्जन भर लोगों के सिर फटे थे, तो गोरखपुर से टोली के साथ गया एक शख्स था जिसकी डर के मारे पैंट गीली हो गयी थी और वह अपने साथियों को छोड़कर वहाँ से भाग खड़ा हुआ था। जिस वक्त जेल से बाहर रह गये साथी लखनऊ के बुद्धिजीवियों के साथ मिलकर इस घटना के खिलाफ कार्रवाई की तैयारियाँ कर रहे थे,यह व्यक्ति बहाना बनाकर गोरखपुर लौट गया और फिर किनारा कर गया। यह वही व्यक्ति है। वैसे संगठन में रहने के दौरान इसने ज्ञान की जो पंजीरी ग्रहण की थी उसे ही ब्लॉग पर बाँटते हुए यह भी छोटा-मोटा बुद्धिजीवी बन गया है। मठ बनाने की तो इसकी औकात नहीं है,पर छोटी-मोटी कुटिया बनाकर बैठने लायक ज्ञान तो यह पा ही गया था। भला हो गुण्डों के हमले का -पैंट भले ही गीली हो गयी, मगर सिर पर पाँव रखकर भागने का अवसर तो मिल ही गया। इसकी राजनीतिक बहस का स्टैंडर्ड यही है कि संगठन में किसी को भाई जी, भाई साहब, चाचा आदि-आदि क्या कहा जाता है। ये अपने आप में भला कौन-सा मुद्दा है?

इस सब के बाद भी छाई चुप्पी को देखकर वाकई कहा जा सकता है कि भारत के बुद्धिजीवी समाज के अंतर्विवेक को लकवा मार गया है।

इन सब लोगों की वर्ग-अवस्थिति तो इसी बात से स्पष्ट हो जाती है कि क्रान्तिकारी कामों के लिए जनता से स्रोत-संसाधन जुटाने को ये 'भीख माँगना' कहते हैं। हम गर्व से कहते हैं कि इतने विपरीत, ठण्डे, बेरहम समय में, पाँच स्रोतों (सरकार या सरकारी विभागों, बहुराष्ट्रीय कंपनियों और पूंजीपति घरानों तथा उनके ट्रस्टों, चुनावी पार्टियों और विदेशी फंडिंग एजेंसियों) से किसी प्रकार का अनुदान लिये बिना केवल जनसहयोग के दम पर हम अपने कामों को संचालित कर रहे हैं। हम अपनी पत्र-पत्रिकाओं के घाटे के भरपाई के लिए अभियान चलाते हैं, मज़दूर अखबार के लिए मज़दूरों के बीच नियमित रूप से कूपन काटते हैं, व्‍यवस्‍था-विरोधी आम राजनीतिक प्रचार के लिए 'क्रान्तिकारी लोकस्वराज अभियान' चलाते हैं और इसकी गतिविधियों के लिए सहयोग जुटाते हैं, वैकल्पिक जन मीडिया खड़ा करने के प्रयासों के लिए 'हमारा मीडिया अभियान' के तहत घर-घर, दफ्तर-दफ्तर जाकर एक-एक व्यक्ति से बात करके सहयोग लेते हैं। इसे कोई ''कार्यकर्ताओं से भीख मँगवाना'' कहे तो उसकी घटिया सोच का ही पता चलता है।

आज अपनी हुआँ-हुआँ का शोर मचा रहे ये सारे गीदड़ और चमगादड़ एनजीओ और प्रिंट मीडिया के भीटों और मांदों में रहते हैं, इनमें लोगों के बीच जाने का साहस कहाँ। ये ब्लॉग पर चाहे जितना विषवमन कर लें,संजीव जैसे 'नारसिसस कांप्लेक्स' से ग्रस्त किसी लेखक को पटाकर (जिन्हें मठाधीश बनने के लिए भी राजेंद्र यादव का उतारा हुआ जूता ही मिला)'हंस'में 'जनचेतना'और 'राहुल फाउण्डेशन' पर टिप्पणी करा लें, इससे हम पर कोई फर्क नहीं पड़ने वाला। इन बातों से फर्क पड़ना होता तो 1990 से अब तक बार-बार कहा जाता रहा कि हम एक पारिवारिक मंडली हैं, कुर्सीतोड़ बुद्धिजीवी हैं, घरों में भागने के लिए सुरक्षित रास्ता तलाश रहे हैं, केवल किताब बेचते हैं, वगैरह-वगैरह -- हम तो कब के मिट गये होते। पुरानी कहावत है, कुत्ते भौंकते रहते हैं, हाथी अपनी राह चलता जाता है।

हमें अपने बोल्शेविक होने पर गर्व है,और जिनके बीच रहकर हम लड़ रहे हैं उन पर भरोसा है। सोचना तो उन बुद्धिजीवियों को है जो बहस के नाम पर मचाई जा रही इस गंदगी पर चुप हैं या अन्दर-अन्दर मज़ा ले रहे हैं, या आन्दोलन को नसीहतबाज़ी की मुद्रा अपनाये हुए हैं। सोचना उन्हें है कि वे किस तरह के लोगों के साथ खड़े हैं और किस तरह की राजनीतिक संस्कृति को बढ़ावा दे रहे हैं।

जो लोग संजीदगी के साथ इस मसले पर सोचते हैं (बहुत से लोगों ने हमें फोन करके कहा कि हमें इनका जवाब देना चाहिए), उनसे हमारा कहना है कि ज़रा सोचें, अलग-अलग समयों में संगठन से निकाले या बैठ गये इन तमाम लोगों का एक ही कॉमन एजेंडा कैसे हो गया?मुकुल तो फिर भी कुछ राजनीतिक मुद्दों का स्मोकस्क्रीन खड़ा करता हुआ भागा था,बाकी ने तो न संगठन में रहते कभी कोई सवाल उठाया न बाद में उनका कोई राजनीतिक सवाल था।

हमारे लिए यह सब कोई आश्चर्य की बात नहीं है, मगर बुद्धिजीवियों और राजनीतिक संगठनों के लोगों को देखना चाहिए कि ऐसी बातें करने वाले लोग कौन हैं, क्या कर रहे हैं, और इनका अपना सकारात्मक एजेंडा क्या है, या कुछ है भी या नहीं। हम तो मार्क्‍सवाद की इस बात में विश्वास करते हैं, जिसे लेनिन ने बार-बार दोहराया है कि किसी संगठन की राजनीतिक लाइन ग़लत होने से यदि उसके लोगों के व्यक्तिगत आचरण का भी पतन होता है, या कुछ लोगों के व्यक्तिगत पतन की वजह से भी यदि राजनीतिक लाइन ग़लत होती है,तो कम्युनिस्ट पहले राजनीतिक लाइन को ही निशाना बनाता है। जो लोग राजनीतिक लाइन के बजाय इन चीजों की बात करते हैं वे स्वतः अपने चरित्र को नंगा करते हैं क्योंकि कुत्सा-प्रचार की अपनी एक विचारधारा और राजनीति होती है।

आज के दौर में विभिन्न प्रकार की सामाजिक-सांस्कृतिक संस्थाएं खड़ी करके राज्यसत्ता के सामाजिक अवलंबों के बरक्स जनक्रान्ति के सामाजिक अवलंबों का विकास करना क्रान्ति का एक ज़रूरी उद्यम है --यह हमारी सुस्पष्ट और घोषित राजनीतिक सोच है। इसी सोच के तहत राहुल फ़ाउंडेशन, अनुराग ट्रस्‍ट, परिकल्‍पना आदि खड़े किये गये हैं और डेढ़ दशक से अपने लक्ष्‍य को साकार करते हुए लगातार आगे बढ़ रहे हैं। इसे ये छिछोरे जानते हैं। फिर भी, महज़ गाली देने के लिए यह कहना कि हम लोग राहुल सांकृत्यायन, अरविंद आदि के नाम पर पैसे बटोरने के लिए यह सब कह रहे हैं, कितनी घटिया बात है। हां, हम गर्वपूर्वक घोषित करते हैं कि हमारी राजनीति में वह ताकत है कि सच्चे लेनिनवादी अर्थों में पेशेवर क्रान्तिकारी सभी संपत्ति-संबंधों से निर्णायक विच्छेद करते हैं। इसी प्रकार की सामाजिक संस्थाओं के लिए अनेक पेशेवर क्रान्तिकारियों ने अपने घर-बार भी दिये हैं। जिन्हें महज़ गाली देने का बहाना चाहिए और जिनकी औकात ही नहीं है कि अपने बूते पर कोई संस्था खड़ी करने का सपना भी देख सकें, वे अगर इन उपक्रमों को संपत्ति खड़ी करने के उपक्रम के रूप में देखते हैं तो हैरानी नहीं होनी चाहिए। इनके द्वारा प्रचारित एक सफेद झूठ के विरुद्ध हम सार्वजनिक रूप से घोषणा करते हैं कि तकनीकी-क़ानूनी कारणों से एकाध अपवाद को छोड़कर हमारे बीच किसी पूरावक़्ती कार्यकर्ता की कोई निजी संपत्ति नहीं है।

सच्चा कम्युनिस्ट पड़ोसी के बच्चों से पहले अपनी पत्‍नी, बच्चों और परिवार को क्रान्ति से जोड़ता है। हम गर्वपूर्वक कहते हैं कि अपने परिवार को क्रान्ति की आंच से सुरक्षित रखने वाले भारत के बहुतेरे कम्युनिस्टों के विपरीत हमने अपने स्वजनों, परिजनों, संबंधियों, घनिष्ठ मित्रों को क्रान्तिकारी कामों से जोड़ा है या उनसे रिश्ते तय कर लिए हैं। संगठन के बहुत से साथियों ने सामाजिक परंपराओं को तोड़कर एक-दूसरे का जीवनसाथी बनने का कदम उठाया है। अगर कोई इसे संगठन में परिवार बढ़ाना कहता है तो इस निकृष्ट सोच को क्या कहा जाए? हमारे राजनीतिक जीवन में इन रिश्तों की कोई अहमियत कभी नहीं रही है। कुनबापरस्ती का आरोप लगाने वाले ये गीदड़ यह क्यों नहीं बताते कि विचारधारा और राजनीति के मतभेदों पर हमारे बीच कितने ही परिवार टूटे भी हैं। भाई-भाई, बाप-बेटे/बेटी, घनिष्ठतम मित्र तक उसूलों के सवाल पर दो जगह खड़े हैं।

जो किसी भी कम्युनिस्ट के लिए गर्व की बात हो सकती है, उसे जो लोग कलंकित और लांछित करने का प्रयास करते हैं, उनकी नस्ल पहचानना ज़रूरी है।






संदेशा शशिप्रकाश का 'वे कम्युनिस्ट नहीं "मउगा" हैं ?'


कोई सच्‍चा कम्‍युनिस्‍ट कभी भी कठिन हालात,अकेलापन,जीवन साथी की अनुपस्थिति और दुत्‍कार से त्रस्‍त नहीं होता। जो इन चीजों से त्रस्‍त होते हैं उन्‍हें कम्‍युनिस्‍ट नहीं मउगा कहा जाता है- कात्यायिनी और सत्यम वर्मा की पार्टी रिवोलुशनरी कम्युनिस्ट लीग (भारत ) की ओर से अधिकृत प्रवक्ता जय सिंह के विचार.


कुछ महीने पहले जनज्वार ने ‘ठगी का एक सामाजिक अभियान’लेख प्रकाशित किया था कि कैसे एनजीओ वाले पीड़ितों के उत्थान के नाम पर फरेब रचते हैं। यह लेख हिंदी की प्रमुख वेबसाइट रविवार समेत कुछ अन्य भी वेब माध्यमों पर प्रमुखता से छपा था। सच पढ़ एनजीओ के कर्ताधर्ता ने जवाब में पहली ही लाइन में दर्ज किया कि ‘आप जैसे लोग दारू और सिगरेट पीकर सामाजिक बात करते है!’बहरहाल इन पंक्तियों को पढ़ हम चकित नहीं हुए क्योंकि हमारा मानना है कि इनका सेवन करने वाला भी सामाजिक परिवर्तन की बात कर सकता है। बहरहाल इत्मिनान से हम पूरा लेख इस उम्मीद से पढ़ गये कि चलो कहीं तो कोई बात कही गयी होगी जो हमारे सवालों के बरक्स होगी।



पर ऐसा नहीं हुआ। रविवार के संपादक समेत वेब माध्यमों के ज्यादातर जनपक्षधर पाठक परिचित हैं कि एनजीओ के कर्ताधर्ता महोदय ने दर्जनों लेख तो भेजे मगर किसी एक लेख में भी वह नहीं बता पाये कि जो सवाल जनज्वार ने उठाये थे वो कहां गये। तब हमने अपना पक्ष रखते हुए कहा कि ‘वह चाहता था कि हम सुचिता में फंसकर कुछ उलुल-जुलूल-जैसे कि हम नहीं पीते हैं,तुम्हारे पास क्या सबूत है,यह व्यक्तिगत आरोप है आदि कहें और बात मूल सवाल से कोसो दूर वहां अटक जाये कि लोग कहें ‘आये थे हरिभजन को, ओटन लगे कपास।’



कुछ ऐसा ही प्रपंच शशिप्रकाश का कुनबा यहाँ भी रच रहा है.सवालों को भटकाने के मकसद से यहाँ भी  क्रांति के दुकानदारों के  मेंठ  का पेट जब  हिजड़ा कहने से नहीं भरा तो उन्होंने हमें मऊगा कहा कि हम हिजड़ा और  मऊगा न होने का प्रमाण देनें में लग जाएँ. बहरहाल हम उनके दोनों आरोपों को तहेदिल से जगह देते हैं और मानते हैं कि हिजड़ा और मऊगा यानी गे लोगों को भी सवाल उठाने का बराबर का ही अधिकार है और उनके हकों के लिए जनज्वार हमेशा आगे रहेगा.रिवोलुशनरी कम्युनिस्ट लीग (भारत ) के प्रवक्ता जय सिंह इतने अधीर हो जाते हैं कि खुद के ब्लॉग अपने ही नाम से कमेन्ट कर बताते हैं कि वह तो मऊगा  है.

शशिप्रकाश के चलन के मुताबिक अब विरोधियों से निपटने के लिए मारपीट कर चुप कराने की कोशिश होगी जो हर बार इनका अंतिम रास्ता रहा है.गार्गी प्रकाशन से जुड़े दिगंबर,पत्रकार देवेन्द्र और भी ऐसे कई लोग इसके जीवित उदहारण हैं जबकि बिगुल के संपादक की बेटी उन तमाम गवाहों में से एक है और प्रमाण नोएडा के सेक्टर २४ में आज भी सुरक्षित है. बस हरबार की तरह चालाकी यह बरती गयी कि कुनबे का कोई नहीं हो.

बगैर किसी काट-छांट के  रिवोलुशनरी कम्युनिस्ट लीग (भारत )के प्रवक्ता और अरविन्द सिंह न्यास के सदस्य जय सिंह के विचार और पार्टी कार्यकर्ताओं की ओर जारी एक पत्र...

जवाब भाग- २  'जनज्वार' की कुत्‍सा-प्रचार मुहिम के पीछे का सच...

हिन्दी के एक ब्लॉग पर पिछले दिनों क्रान्तिकारी वाम धारा से जुड़े एक संगठन और उससे जुड़े कुछ व्यक्तियों तथा संस्थाओं के खिलाफ घिनौने कुत्सा-प्रचार की एक मुहिम छेड़ दी गयी थी। 'जनज्वार' नाम के इस ब्लॉग पर 22 से 28 जुलाई तक प्रकाशित इन पोस्टों और उन पर डाली/डलवायी गयी टिप्पणियों को पढ़कर कोई भी संजीदा व्यक्ति यह समझ सकता है कि इनका मकसद किन्हीं राजनीतिक-सामाजिक सवालों को उठाना नहीं है, जैसाकि कुछ पोस्टों में दिखाने की कोशिश की गयी है। इनका एकमात्र मकसद है कुछ लोगों, संस्थाओं, विचारों पर कीचड़ उछालना और इसके लिए घटिया से घटिया झूठे आरोपों,फर्जी मनगढ़न्त किस्सों और अनर्गल व्यक्तिगत आक्षेपों का धुआँ छोड़ने और अपनी कुण्ठाओं का विषवमन करने में वे सारी सीमाओं को पार कर गये हैं।

सत्यम वर्मा : कुछ तो बोलो, मुंह तो खोलो
दरअसल,पिछले दो दशकों के दौरान आन्दोलन से भागे या संगठनों से निकाले गये लोगों की यह प्रतिशोधी जमात पिछले चार साल से कुत्सा-प्रचार की इस मुहिम में लगी हुई है। देशभर में तमाम व्यक्तियों-संगठनों को पत्रों के पुलिन्दे भेजने से लेकर पुस्तिका छपाकर बाँटने और छद्म नामों से सरकारी तंत्र के पास शिकायतनामे भेजकर जनसंगठनों के दफ्तरों पर छापे-तलाशी करवाने जैसी गलीज़ हरकतों के बाद अब बौखलाहट में इन्होंने अपना सारा बदबूदार कचरा ब्लॉग पर सार्वजनिक कर दिया है। हम लोगों ने कभी इस गन्दे अभियान का जवाब देने की कोशिश नहीं की क्योंकि एक तो हम ऐसी नीचता का जवाब देना किसी भी क्रान्तिकारी सामाजिक कार्यकर्ता की शान के खिलाफ समझते हैं, दूसरे,हमें बुद्धिजीवियों के विवेक पर भरोसा था। ब्लॉग पर इस मुहिम के शुरू होने पर भी हम इस पर ध्यान दिये बिना दूसरी अरविंद स्मृति संगोष्ठी के आयोजन में लगे रहे क्योंकि हमें लगा कि बुद्धिजीवी समुदाय में से कोई तो इसका प्रतिवाद करेगा। मगर अन्ततः हमें जवाब देने का फैसला करना पड़ा क्योंकि ये लोग केवल कुछ व्यक्तियों या संगठनों को ही नहीं बल्कि कम्युनिस्ट आदर्शों को, क्रान्तिकारी विचारों और तौर-तरीकों को, सामाजिक परिवर्तन के लक्ष्य के लिए समर्पण और कुर्बानी के जज़्बे को ही बदनाम करने में लगे हैं।

इसकी शुरुआत गोरखपुर से बिगुल मज़दूर दस्ता, दिशा छात्र संगठन और नौजवान भारत सभा के युवा कार्यकर्ताओं की टीम द्वारा भेजे पत्र से की जा रही है।

का. अरविंद की स्‍मृति को लांछित-कलंकित करने वालों की असलियत पहचानिए...

जुलाई के अंतिम सप्‍ताह में जिस वक्‍त हम लोग अपने प्‍यारे कामरेड अरविंद की याद में दूसरी अरविंद स्‍मृति संगोष्‍ठी के आयोजन की तैयारियों में व्‍यस्‍त थे तभी हमें पता चला कि कई साल से संगठन को गरियाते घूम रहे लोगों ने अब अपना गाली पुराण ब्‍लॉग पर फैला दिया है। स्‍पष्‍ट था कि ऐन संगोष्‍ठी के पहले शुरू की गई इस कार्रवाई का मकसद इस आयोजन में विघ्‍न डालना है। बाद में हमें पता चला कि इन लोगों ने तो बाकायदा संगोष्‍ठी के बहिष्‍कार का नारा दे रखा था। बहरहाल,इनके मुंह पर तमाचा जड़ते हुए संगोष्‍ठी शानदार तरीके से संपन्‍न हुई। तीन दिनों के पांच सत्रों में 'इक्कीसवीं सदी में भारत का मजदूर आन्दोलनः निरन्तरता और परिवर्तन, दिशा और सम्भावनाएँ,समस्याएँ और चुनौतियाँ'विषय पर चार विस्‍तृत आलेख पढ़े गए जिन पर गंभीर और विचारोत्तेजक बातचीत हुई। प्रथम सत्र में अरविंद स्‍मृति न्‍यास और अरविंद मार्क्‍सवादी अध्‍ययन संस्‍थान की स्‍थापना और इनके जरिए किए जाने वाले कामों पर विचार किया गया। बाहर से आए और स्‍थानीय लोगों को मिलाकर कुल करीब 500 लोगों ने आयोजन में शिरकत की जिनमें अच्‍छी-खासी संख्‍या गोरखपुर में विभिन्‍न उद्योगों में काम करने वाले मजदूरों की थी। पिछले एक साल के दौरान चले मजदूर आंदोलन के क्रम में राजनीतिक रूप से शिक्षित-दीक्षित इन अगुआ मजदूरों ने न सिर्फ संगोष्‍ठी में बहुत दिलचस्‍पी से हिस्‍सा लिया बल्कि कुछ ने बहस में भी हस्‍तक्षेप किया।

जो लोग न जानते हों उन्‍हें हम बताना चाहते हैं कि दशकों बाद गोरखपुर और पूर्वी उत्तर प्रदेश में हुई मजदूर आंदोलन की इस नई शुरुआत की नींव कामरेड अरविंद ने ही रखी थी और उन्‍हीं के नेतृत्‍व में काम करते हुए हम युवा कार्यकर्ताओं ने विचारधारा,संगठन और आंदोलन की बुनियादी शिक्षा-दीक्षा पायी थी। हम उन्‍हीं के शुरू किए हुए काम को आगे बढ़ा रहे हैं और हम खुद को का.अरविंद का मानसपुत्र मानते हैं। ऐसे साथी के जीवन और व्‍यक्तित्‍व पर कीचड़ उछालने और कलंकित करने की कोशिश ने हमें गहरे क्षोभ और ऐसा करने वालों के प्रति घृणा से भर दिया है। ये वे लोग हैं जो जीते जी का.अरविंद के पीठ पीछे कुत्‍साप्रचार करते रहे और फिर उनकी मृत्‍यु को भी अपनी गंदी मुहिम के लिए इस्‍तेमाल करने से बाज नहीं आ रहे हैं। का.अरविंद के हमदर्द बनने का पाखंड कर रहे इन लोगों को तो ये भी मालूम नहीं कि उनका निधन कैसे हुआ,ब्‍लॉग में लिख मारा कि उनकी मृत्‍यु अल्‍सर से हुई। ये ऐसे लोग हैं जिन्‍होंने उसी रात से अपना घिनौना प्रचार शुरू कर दिया था जिस रात उनका निधन हुआ। हम लोग जो आखिरी सांस तक उनके साथ रहे, गोरखपुर में का. अरविंद के राजनीतिक और सामाजिक मित्र और संगठन के साथी अच्‍छी तरह जानते हैं कि लंबे समय से स्‍वास्‍थ्‍य की परेशानियों के बावजूद वे लगातार कामों में लगे हुए थे और एक बार लगकर पूरा इलाज कराने के लिए साथियों के दबाव को ''कुछ ज़रूरी काम पूरे करने तक'' टालते रहते थे। फिर भी किसी को ये उम्‍मीद नहीं थी कि अचानक ऐसा कुछ अप्रत्‍याशित घट जाएगा। 24 जुलाई की उस काली रात से करीब एक महीने पहले भूमि अधिग्रहण के विरोध में कुशीनगर में हुए सम्‍मेलन में जाने के लिए हमारी टोली की करीब 55किलोमीटर की साइकिल यात्रा का उन्‍होंने नेतृत्‍व किया था। गोरखपुर में सफाई कर्मचारियों के जुझारू आंदोलन में वे अगुआ भूमिका निभा रहे थे और जब एक उद्दंड प्रशासनिक अधिकारी ने वार्ता के दौरान कह दिया कि आप लोग मजदूरों को भड़काकर अनशन करवा रहे हो, आप खुद क्‍यों नहीं अनशन पर बैठ जाते, तो का. अरविंद हम लोगों के विरोध के बावजूद तत्‍काल भूख हड़ताल पर बैठ गए। निश्चित तौर पर इसने भी उनके शरीर को और कमजोर किया लेकिन उस वक्‍त तो आंदोलन को एक नई ताकत मिल गई थी। इन कुत्‍साप्रचारकों की नीयत तो हमारे सामने शुरू से साफ रही है लेकिन हम यह नहीं समझ पाते कि पिछले दो साल के दौरान इनकी बातें सुनकर जो बुद्धिजीवी यहां-वहां जुमलेबाजियां करते रहे हैं उनमें से किसी ने भी कभी भी हमसे संपर्क करने और सच जानने की कोशिश क्‍यों नहीं की।

बजा बिगुल तू अब तो जाग
आज का.अरविंद के शुभचिंतक बन रहे इनमें से अधिकांश लोग वे हैं जिन्‍हें खुद का. अरविंद ने चारित्रिक पतन से लेकर संगठन के लक्ष्‍यों के खिलाफ आचरण करने जैसी हरकतों के कारण निष्‍कासित किया था या निलंबित किया था जिसके बाद वे लौटकर ही नहीं आए। इस तथ्‍य से सामना होते ही ये फट से कह देते हैं कि अरविंद तो संगठन के नेतृत्‍व के कहने पर लोगों को निकाल देते थे। मानो का. अरविंद एक दब्‍बू, विवेकहीन, रीढ़विहीन व्‍यक्ति थे जो नेतृत्‍व के कहने पर कुछ भी करने को तैयार रहते थे। का. अरविंद के जीते-जी भी ये छिछोरे उनके खिलाफ घटिया आरोप लगाते रहे और उनके जाने के बाद भी उन्‍हें लांछित करने में लगे हुए हैं। अपने को दिशा छात्र संगठन का पूर्व संयोजक बताने वाला अरुण कुमार यादव दरअसल गोरखपुर में दिशा की विश्‍वविद्यालय इकाई का कुछ समय के लिए संयोजक बनाया गया था और उसमें भी महीनों तक तो वह छुट्टी पर था और राजनीतिक जीवन की कठिनाइयों से थका-हारा जिंदगी की गोटी सेट करने की तिकड़मों में लगा था। इस शख्स में अगर जरा भी नैतिक साहस है तो वह बताए कि उसे का.अरविंद ने किस नैतिक घटियाई के कारण संगठन से बाहर किया था।

और 'जनज्‍वार' चलाने वाले अजय प्रकाश को यह बताना चाहिए कि उसे, घनश्‍याम और प्रदीप को नोएडा की टीम से अरविंद ने किस कारण से 3महीने के लिए सस्‍पेंड किया था जिसके बाद ये तीनों अपने को बदलने के बजाय चुपचाप किनारे हो गए।

एक शख्‍स है सतेंद्र कुमार जिसने ब्‍लॉग पर अपना परिचय परिकल्‍पना प्रकाशन और जनचेतना वैन के ''मालिक'' के रूप में दे रखा है। इसी के दिए परिचय से हमें पता चला कि यह सूदखोर का बेटा है। पूछने पर मालूम हुआ कि किसी ऐसे-वैसे सूदखोर का नहीं, ये तो नक्‍सलबाड़ी के इलाके के गरीब किसानों का कई पीढ़ी तक खून चूसने वाले सूदखोर खानदान से आता है। कई साल संगठन में रहने के बाद भी इसकी मानसिकता यही है कि ये लिखता है ''जनचेतना के मजदूर, बेगार करें भरपूर''। बेशक, हम जनचेतना के मजदूर हैं, क्रांतिकारी आंदोलन के मजदूर हैं, हम अपने को मजदूरों के प्रतिनिधि मानते हैं और इस देश के आम मजदूरों की ही तरह अपने लक्ष्‍य के लिए 12-14 घंटे काम करते हैं। और हमें इस पर गर्व है। लेकिन मालिक की मानसिकता से ग्रस्‍त इस व्‍यक्ति को क्रांतिकारी विचारों का प्रचार-प्रसार ''बेगारी'' लगता है और मजदूर शब्‍द को ये गाली की तरह इस्‍तेमाल करता है।

हिंदी कवि   कात्यायिनी  : जवाब प्रवक्ता ही देगा
हमें इस बात पर नाज है कि हम अपने तमाम कामों के लिए किसी तरह की संस्‍थागत,सशर्त मदद लिए बिना केवल और केवल जनता से जुटाए गए संसाधनों पर भरोसा करते हैं,और इसके लिए नियमित रूप से लोगों के बीच सहयोग जुटाने जाते हैं। इसे ये लोग ''भीख मांगना'' कहते हैं तो सिर्फ हमें नहीं इस देश के उन तमाम जनसंगठनों को गाली देते हैं जो एनजीओ या सरकारी अनुदानों के बजाय अपने कामों के लिए जनता से संसाधन इकट्ठा करते हैं।

गोरखपुर में मई दिवस 2010 को मजदूरों की रैली

इनकी बदनीयती और बेईमानी तो इसी बात से जाहिर हो जाती है कि ये अपने मनगढ़त आरोपों का पहाड़ खड़ा करने के लिए सिर्फ साहित्‍य के प्रकाशन और उसे लोगों के बीच ले जाने की बात करते हैं जो हमारे कामों का बेहद अहम मगर केवल एक हिस्‍सा है। ये कभी भी इस बात की चर्चा नहीं करते कि गोरखपुर जैसे सांप्रदायिक ताकतों के गढ़ में धमकियों-हमलों-साजिशों का मुकाबला करते हुए किस तरह हम लोग लगातार उन्‍हें चुनौती देते रहे हैं। ये भयंकर शोषण और बर्बर उत्‍पीड़न में जी रहे गोरखपुर और पूर्वी उत्तर प्रदेश के मजदूरों को संगठित करने के हमारे कामों की कभी चर्चा नहीं करते। ये गोरखपुर के जुझारू मजदूर आंदोलन की,योगी आदित्‍यनाथ के नेतृत्‍व में गोरखपुर के उद्योगपतियों द्वारा हमें ''आतंकवादी'' साबित करने की मुहिम, उनके खिलाफ महीनों चले आंदोलन, हमारे साथियों की गिरफ्तारी और फर्जी एनकांउटर में मारने की साजिश, और पहली बार गोरखपुर में योगी, उद्योगपतियों और प्रशासन के गंठजोड़ को मिली शिकस्‍त की कोई चर्चा नहीं करते। ये दिल्‍ली के करावल नगर में 25,000 असंगठित बादाम मजदूरों के बीच वर्षों से जारी हमारे काम की और बादाम मजदूरों की 16दिन चली जबर्दस्‍त हड़ताल का कभी जिक्र नहीं करते। ये दिल्‍ली मेट्रो में ठेके पर काम करने वाले हजारों सफाई कर्मचारियों, कामगारों और मेट्रो फीडर बस सेवा के कर्मचारियों को संगठित करने के हमारे प्रयासों और आंदोलनों की कभी बात नहीं करते, लुधियाना में मजदूरों के बीच हमारे कामों और संघर्षों की कभी चर्चा नहीं करते। करें भी कैसे। ऐसा करते ही झूठों की बुनियाद पर खड़ा उनका सारा प्रचार अभियान भरभराकर ध्‍वस्‍त नहीं हो जाएगा। हम तो ये जानते हैं और मार्क्‍सवाद यही सिखाता है कि अगर किसी की जीवनशैली गलत है तो उसकी राजनीति और विचार को भ्रष्‍ट होते देर नहीं लगती। सिर्फ कार्यकर्ताओं से पैसे इकट्ठा करवाने और उसपर ऐश करने वाला नेतृत्‍व एक कायर और काहिल संगठन ही खड़ा कर सकता है,साहस के साथ जनता को संगठित और आंदोलित करने वाले जमीनी कार्यकर्ताओं के जुझारू दस्‍ते नहीं। दरअसल, खुद इन भगोड़ों की सोच इनकी जीवनशैली से निकली है। ये सब के सब आज कहीं भी जमीनी कामों में नहीं लगे हैं, कई तो एनजीओ की चाकरी कर रहे हैं, कुछ ''बुद्धिजीवी'' बनने की लालसा में छुटभैये पत्रकार बने फिर रहे हैं, तो कुछ को कोई काम करने की जरूरत ही नहीं है, उड़ाने के लिए बहुत कुछ पड़ा हुआ है जिसके दम पर घूम-घूम कर वे अपना कचड़ा फैलाने और कम्‍युनिज्‍म को बदनाम करने में जुटे हैं।
गांव में कहा जाता है कि जब सांप का अंडा खराब हो जाता है तो उसमें से लरछुत नाम का घिनौना, चिपकू कीड़ा पैदा होता है। ऐसे तत्‍व दरअसल कम्‍युनिस्‍ट आंदोलन के लरछुत ही हैं।

-- प्रशांत, प्रमोद, अवधेश, अपूर्व, राजू, बबलू, बीरेश, समर

बिगुल मजदूर दस्‍ता, दिशा छात्र संगठन और नौजवान भारत सभा, गोरखपुर के कार्यकर्ता

प्रस्तुतकर्ता बेबाक-बेलौस पर जय सिंह. ६:०३ पूर्वाह्न इसे ईमेल करें इसे ब्लॉग करें! Twitter पर साझा करें Facebook पर साझा करें Google Buzz पर शेयर करें 2 टिप्पणियाँ:

JAI SINGH ने कहा…  

जनज्‍वार पर टिप्‍पणी करने वालों का स्‍टैंडर्ड क्‍या है यह उन्‍हीं के शब्‍दों में देखिए।

एक कोई डा.विवेक कुमार है जिसकी आत्‍मा की तरह लेखनी ने भी उसका साथ छोड़ दिया है। का. अरविंद के बारे में वह लिखता है कि वे 'कठिन हालात, अकेलापन, जीवन साथी की अनुपस्थिति और दुत्कार से त्रस्त'थे। अब इस छिछोरे को कौन बताए कि कोई सच्‍चा कम्‍युनिस्‍ट कभी भी कठिन हालात,अकेलापन, जीवन साथी की अनुपस्थिति और दुत्‍कार से त्रस्‍त नहीं होता। जो इन चीजों से त्रस्‍त होते हैं उन्‍हें कम्‍युनिस्‍ट नहीं मउगा कहा जाता है जैसा कि डा.विवेक कुमार पर एकदम फिट बैठता है।

August 16, 2010 12:07 PM

GP ने कहा…
I agree with the content of the text. It is important that all attempts to slander is timely and suitably replied.




Aug 17, 2010

कात्यायिनी ने भिजवाया जवाब, विरोधियों को कहा 'हिज़डा'


पाठक जानते हैं कि पिछले दिनों हिंदी की कवयित्री कात्यायिनी अपने पति शाशिप्रकाश और बेटे अभिनव सिन्हा के संग मिलकर जिस रेवोलुशनरी कम्युनिस्ट लीग (भारत )नाम की क्रांतिकारी पार्टी चलातीहैं,उसपरइस  पार्टी सेजुड़े  रहे कार्यकर्ताओं  ने सवाल  उठाये  थे.उनके सवाल इसी वेब  की पिछली पोस्टों पर जाकर पढ़े जा सकते हैं.

 कार्यकर्ताओं ने साफ कहा था कि यह पार्टी एक पारिवारिक कुनबा है,जिसकाबुनियादी काम हर कीमत पर चंदा इकठ्ठा करना और किताबें छापना है.कार्यकर्ताओं ने अपने अनुभवों को साझा करते हुए बताया कि क्रांति और सामाजिक बदलाव के नाम पर कैसे यह संस्थाएं,निजी संपत्ति और पारिवारिक कुनबा खड़े कर रहे हैं.बातें बहुत तीखे अंदाज़ में कहीं गयीं थीं क्योंकि इनमें से ज्यादातर ने अपनी जवानी के महत्वपूर्ण साल शशिप्रकाश के चंगुल में बर्बाद किये थे.जाहिरा तौर पर एक के बाद एक लेखों के छपने से क्रांति की दुकान में खलबली मचनी ही थी,सो मची.इसके बाद हमें और शशिप्रकाश के कुनबे को  जानने वालों ने इनसे और हमसे पूछा कि यह कैसी गंध है.हमने जानने वालों से कहा" आपको इतने पर मिचली आती है,और हम हैं कि आदर्शवाद के नाम पर यह सच छुपाये हुए थे."कुछ ने मुखामुखी यह भी कहा कि इससे वामपंथ का नुकसान होगा, पर वह सामने नहीं आये.हालाँकि जिन्होंने शुरू में यह आशंका जाहिर कि थी कि इससे वामपंथ का नुकसान होगा,वह लेखों को देख हमारे साथ आये, कई वामपंथी संगठनों ने शुक्रिया कहा कि चलो दुकान की गन्दगी सामने तो आयी.

अपने पहले जवाबी लेख में कात्यायिनी के कुनबे के मुखिया शशिप्रकाश ने पहले जवाब में कवि नीलाभ को जिस तरह निशाना बनाया है,उसका मकसद सिर्फ साहित्यकारों को धमकाना है कि सामने आये तो 'प्रगतिशील' बना देंगे.

अब रहा हमारा सवाल तो उन्होंने हिजड़ा और बीबियों से डरने वाला कहा है.हमें उम्मीद है कि अगले जवाबों तक वह दो कदम आगे बढकर नैतिक चारित्रिक तौर पर पतित कहें क्योंकि इसके आलावा इनके पास कोई जवाब नहीं है.हम इन आरोपों से नहीं डिगने वाले हैं क्योंकि साहस  हमें समाज से मिल रहा है,जहाँ से हमारे काम और चरित्र दोनों पर कोई सवाल नहीं है. बहरहाल यह शशिप्रकाश की चौधराहट की  खीझ  से निकले  आरोप हैं. हमें याद है कि जब संगठन में हमलोग किसी कि संगठन छोड़ने पर पूछते  तो आरोप नैतिक ही लगाया जाता.जैसे फलां लाइन मारता  था, उसके पीछे पड़ा था, लड़कियों की सेवाटहल  ज्यादा करता था, लड़कीबाज था, किसी एक लड़की पर ठहरा ही नहीं और जब यह कहना नहीं बनता था तो शशिप्रकाश हंस कर कहतेकि 'उसकी ना पूछिए उसके  चारित्रिक पतन को यहाँ सह पाना अशंभव था...आदि.'

हमारी राय तो शशिप्रकाश को यह है कि वह आरोप नाम लेकर लगायें जिससे उनकी कलम को और ताकत मिलेगी.साथ ही उन्हें लड्किबाजों, गांडबाजों,पेटीकोट के भीतर घुसे रहने वालों कि गिनती में आसानी होगी और इसके लिए किसी को रातभर उनके साथ रूकना नहीं होगा.

पाठक माफ़ करेंगे.शशिप्रकाश ज्यादातर बार इसी तरह की पदवियों से नवाजते रहते हैं....प्रमाण की जरूरत होगी तो उसे भी हम प्रकाशित करेंगे.जनज्वार की कोशिश रहेगी कि यह बहस व्यापक परिप्रेक्ष्य में हो.

हालाँकि हमें कम उम्मीद है कि शशिप्रकाश,उनकी पत्नी कात्यायिनी,बेटा अभिनव,अभिनव के मौसा सत्यम वर्मा, मौसी रूबी, दूसरी मौसी मीनाक्षी (अरविन्द सिंह की पत्नी), तीसरी मौसी कविता और एक मौसी जिनका नाम याद  नहीं आ रहा है,यह लोग जवाब में यौन सुचिता के आरोप से आगे जायेंगे सम्भावना काम है.दरअसल रेवोलुशनरी कम्युनिस्ट लीग का (भारत ) में पार्टी विरोधियों से निपटने की  यही परंपरा है.


कात्यायिनी की ओर से जवाब

 जनज्‍वार पर पिछले दिनों एक कुत्सित बहस चलाई गई थी,उसमें 'प्रगतिशील' कवि नीलाभ ने भी अपने विचार प्रकट किए थे। उनकी बातों से मेरे मन में कुछ सवाल उठे,इसलिए  जनज्‍वार के संचालक को यह पोस्‍ट भेजी जा रही है ताकि वे अन्‍य प्रायोजित पोस्‍ट्स के साथ इस अप्रायोजित पोस्‍ट को भी स्‍थान दें।



कवयित्री कात्यायिनी
प्रिय नीलाभ जी,


जनज्‍वार के माध्‍यम से पता चला कि आप राजनीतिक दलों के न्‍यास आदि बनाने को सही नहीं मानते। आपने अपनी टिप्‍पणी में अपने इस विचार के पीछे कोई तर्क नहीं पेश किया है। यह जानने की बहुत इच्‍छा हो रही है कि राजनीतिक दलों को न्‍यास आदि क्‍यों नहीं बनाना चाहिए। क्‍या न्‍यास में ऐसे कीटाणु बसते हैं जो राजनीतिक दलों को भ्रष्‍ट कर देते हैं। क्‍या इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि न्‍यास का उद्देश्‍य क्‍या है उसको कैसे संचालित किया जाता है और उसमें कौन लोग काम करते हैं। बस न्‍यास बना नहीं कि आप किसी राजनीतिक दल को विपथगामी घोषित कर देंगे। आपकी बात इतनी मजेदार है कि मेरी यह जानने की उत्‍सुकता बढ़ती ही जा रही है कि आप और किन-किन कामों को राजनीतिक दलों के करने योग्‍य नहीं समझते।

जहां तक मेरा राजनीतिक ज्ञान है मैं समझता हूं कि एक समूह उन सभी (या अधिकतर) कामों को ज़्यादा बेहतर ढंग से संचालित कर सकता है जिन्‍हें कोई व्‍यक्ति अकेला करता है। इन कामों में राजनीतिक काम भी आ सकते हैं और कला-संस्‍कृति के क्षेत्र के काम भी आ सकते हैं और अकादमिक काम भी।आज दिल्‍ली के अधिकतर प्रगतिशील कवि, लेखक, संस्‍कृतिकर्मी, बुद्धिजीवी मध्‍य वर्ग या उच्‍च मध्‍यवर्ग की जीवनशैली जी रहे हैं। आज कितने लेखक, कवि,बुद्धिजीवी हैं जो बाल्‍जाक की तरह काली काफी पीकर पेरिस के अभिजात समाज को अपनी कलम से नंगा कर देने की चुनौती देने का माद्दा रखते हैं।

आज के प्रगतिशील लेखकों में से किसको आप भारत का टामस पेन और लू शुन कहेंगे। मां उपन्‍यास लिखने के बाद गोर्की ने जब लेनिन से मुलाकात की तो लेनिन ने कहा कि यह मजदूरों के लिए एक जरूरी किताब है और इसे बड़ी मात्रा में छपवाकर मजदूरों के बीच वितरित करवाओ। क्‍या आपको लगता है कि अगर 'मां' जैसी कोई किताब आज लिखी जाती है तो आज के बुर्जुआ प्रकाशक उसे बड़ी मात्रा में छपवाकर मजदूरों के बीच वितरित करवाएंगे। निश्‍चय ही नहीं करवाएंगे। बुर्जुआ प्रकाशक तो क्‍या खुद को प्रगतिशील कहने वाले कवि, लेखक और बुद्धिजीवी भी यह काम नहीं करेंगे। सही बात तो यह है कि प्रतिष्‍ठा, पुरस्‍कार, रॉयल्‍टी अगर मिलती रहे तो हमारे लेखकों को इससे कोई मतलब नहीं कि उनकी किताबें वास्‍तव में पढ़ी भी जा रही हैं या नहीं। आज कितने ऐसे लेखक हैं जो 20 रुपये से कम पर जीने वाले भारत के 77 प्रतिशत लोगों की जिंदगी से करीबी से जुड़े हों या करीबी जुड़ाव महसूस करते हों। आज प्रगतिशील लेखकों/बुद्धिजीवियों और सर्वहारा जनता के बीच की खाई गणेशशंकर विद्यार्थी और प्रेमचंद के जमाने से कई गुना चौड़ी हो गई है।

 यह कहने में कोई अतिश्‍योक्ति नहीं होगी कि आज के हमारे प्रगतिशील लेखक,कवि और बुद्धिजीवी भारत की गरीब जनता के साथ ऐतिहासिक विश्‍वासघात कर चुके हैं। वास्‍तव में समाजवाद से उनका कुछ लेना-देना ही नहीं रह गया है,उनका समाजवाद तो कब का आ चुका है।और इसीलिए जो काम प्रगतिशील लेखकों, बुद्धिजीवियों, संस्‍कृतिकर्मियों को करना चाहिए था, यानी कि समाज में गंभीर राजनीतिक और गैर राजनीतिक साहित्‍य का एक सचेत पाठकवर्ग तैयार करने और ऐसे साहित्‍य के फलने-फूलने का माहौल तैयार करने का काम,उसे मजबूरी में क्रान्तिकारी दल (दलों) को करना पड़ रहा है। आप शायद समझ नहीं पा रहे हैं कि यह राजनीतिक दलों की इच्‍छा नहीं बल्कि उनकी मजबूरी है। हालांकि अगर वे अपनी चाहत से भी ऐसा करते हैं तो इसमें गलत क्‍या है यह मैं नहीं समझ पा रहा हूं। शायद आप समझने में मेरी मदद करेंगे।आपने सीधे तौर पर तो नहीं लेकिन घुमा फिराकर कुछ प्रकाशनों पर आरोप लगाया है कि उन्‍होंने साधन को साध्‍य बना लिया है। तो उपरोक्‍त बातों के मद्देनजर सबसे पहले तो यह आरोप प्रगतिशील लेखकों पर लगाया जाना चाहिए जिनमें आप स्‍वयं भी शामिल हैं। अपनी किताबें छपवाने में बहुतेरे लोग आगे रहते हैं लेकिन लू शुन की तरह किसी ने यह क्‍यों नहीं सोचा कि अपने देश के लोगों का परिचय विश्‍व की तमाम मूल्‍यवान साहित्यिक धरोहरों से कराया जाए। आज मार्क्‍सवाद की कितनी किताबें हैं जो सही और सटीक अनुवाद के साथ हिन्‍दी में उपलब्‍ध हैं। और यदि नहीं है तो यह काम कौन करेगा। क्‍या यह काम राजकमल और वाणी जैसे बुर्जुआ प्रकाशनों के भरोसे छोड़ दिया जाए या भारत सरकार के प्रकाशन विभाग के भरोसे या नीलाभ प्रकाशन के भरोसे। मार्क्‍सवाद की जिन किताबों के हिंदी अनुवाद हैं भी उन्‍हें संतोषप्रद नहीं कहा जा सकता है। और रामविलास शर्मा जी ने यूं तो किताबें लिखकर रैक भर दिये हैं लेकिन उनके माध्‍यम से मार्क्‍सवाद समझने वालों का खुदा ही मालिक हो सकता है।


ऐसे में अगर कोई राजनीतिक संगठन प्रकाशन तंत्र और न्‍यास संगठित करके हिंदी भाषी लोगों को अपनी भाषा में विश्‍वस्‍तरीय साहित्‍य और मार्क्‍सवाद की पुस्‍तकें उपलब्‍ध कराने के इन बेहद ज़रूरी कामों को करता है तो इसके लिए उसे साधुवाद दिया जाना चाहिए या गालियां?हालांकि आज भी बहुत बड़ी संख्‍या ऐसे लोगों की है जिनके लिए दुनिया माओ के बाद से आगे ही नहीं बढ़ी है और निश्चित ही उन्‍हें किताबों की और बहस-मुबाहिसे की उतनी जरूरत भी नहीं है। वैसे मजेदार बात तो यह भी है कि हथियार खरीदने के लिए चंदा मांगने को बुद्धिजीवी लोग जायज समझते हैं लेकिन पुस्‍तकें छापने के लिए चंदा मांगने को वे गलत समझते हैं और कोई तर्क पेश किए बिना साधन और साध्‍य जैसे बौधिक जुमलों के द्वारा अपना काम चला लेते हैं। वैसे 21वीं सदी की प्रौद्योगिकी और नव जनवादी क्रांति (एनडीआर) की लाइन ने भी तमाम बौद्धिकों की पौ बारह कर दी है। आज कोई भी व्‍यक्ति ब्‍लॉग पर गरमागरम बातें लिखकर और पैसिव रैडिकलिज्‍म की लीद फैलाकर क्रान्तिकारी बुद्धिजीवी होने का तमगा हासिल कर सकता है। इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि उसे कम्‍युनिज्‍म की समझदारी है भी या नहीं या कम्‍युनिज्‍म के प्रति उसका समर्पण है भी या नहीं। मध्‍यवर्गीय रूमानी फिलिस्‍टाइन को इससे कोई मतलब भी नहीं है। वह स्‍वयं को एक नायक की तरह देखना पसंद करता है और निजी जीवन में क्रान्ति से भले ही उसका कभी साबका न पड़ा हो और सामाजिक कामों के लिए चंदा देते समय भी बीवी से डरता हो लेकिन बौद्धिक जगत में हल्‍ला मचाने का साधन उसकी पहुंच में आ गया है और वह शहीदाना अंदाज में पोस्‍ट पर पोस्‍ट लिखे जाता है। हो सकता है कि उसने वह चौराहा भी देख रहा हो जहां ''मुक्‍त क्षेत्र'' बनने के बाद उसकी मूर्ति लगाई जाएगी। स्‍तालिन ने यों ही नहीं कहा था कि एशियाई देशों की क्रान्तियां झूठ-फरेब,मक्‍कारी,चुगली और षडयंत्रों से भरी होंगी।

जनज्‍वार पर आकर आपने और आपके सहयोगियों ने न सिर्फ स्‍तालिन की बात को पुष्‍ट कर दिया बल्कि अपने ही कृत्‍यों से न्‍यास और प्रकाशन संगठित करने की जरूरत को बल प्रदान कर दिया है। आपने भी बस यही साबित किया है कि आज के पके पकाये बुद्धिजीवियों से रैडिकल चिंतन और व्‍यवहार की उम्‍मीद करना वैसा ही है जैसे जरसी गाय से युद्धाश्‍व के कारनामों की उम्‍मीद पालना। इसीलिए नये साहसी, रैडिकल, युवा, कर्मठ बौद्धिक तत्‍वों की तैयारी का काम और भी ज़रूरी है। जनज्‍वार के अपने जिन साथियों की बातों का आपने समर्थन किया है (हालांकि यह समर्थन आपने नसीहतों की आड़ में किया है) उनके साथ मैं पिछले 10-12 सालों से जमीनी स्‍तर पर काम कर चुका हूं। अपने राजनीतिक और निजी जीवन में इन लोगों की पतनशीलता का मुझे प्रत्‍यक्ष अनुभव है और ये सारे के सारे जमीनी कार्यों में एकदम फिसड्डी साबित हो चुके हैं। जो इस बात से भी साबित होता है कि संगठन से निकाले जाने के बाद इनमें से किसी भी शख्‍स की जमीनी कार्रवाइयों में किसी प्रकार की कोई भागीदारी नहीं रही है। अपनी हर असफलता को दूसरों के मत्‍थे मढ़ने की इनकी आदत और नीयत जनज्‍वार पर लिखे इनके ही पोस्‍टों से जाहिर हो जाती है। आज आपको इन हिजड़ों की संगत पसंद आ रही है तो आपको सोचना चाहिए कि आप कहां पहुंच गये हैं। जनज्‍वार ने अपनी नंगई के द्वारा साबित कर दिया है कि भारत के कम्‍युनिस्‍ट आन्‍दोलन की पश्‍चगति अभी अपने मुकाम तक नहीं पहुंची है और इसमें तमाम तथाकथित प्रगतिशील बुद्धिजीवी और (आश्‍चर्य नहीं होना चाहिए)विरोधी लाइन वाले कतिपय संगठनों के कुछ लोग अपनी तरफ से पूरा सहयोग दे रहे हैं। चलिये देखते हैं कि यह पश्‍चगति कहां जाकर थमती है।

आपने साधन के साध्‍य बन जाने की बात अपनी पोस्‍ट में उठाई है। मेरे ख्‍याल से साधन के साध्‍य बना जाने की बात तब लागू होती है अगर किसी के सिद्धांत और व्‍यवहार में अंतर हो। जहां तक परिकल्‍पना और राहुल फाउण्‍डेशन की बात है,तो अगर आप कविताएं लिखने से फुरसत लेकर इनके प्रकाशनों को पढ़ेंगे तो आपको स्‍पष्‍ट पता चल जाएगा कि ये किन अर्थों में नये सर्वहारा नवजागरण और प्रबोधन की बात करते हैं और इनका व्‍यवहार इनके सिद्धांत की पूर्णत: संगति में है। यदि इन्‍होंने अपने वास्‍तविक विचारों को स्‍पष्‍ट रूप से जाहिर किए बिना लोगों से सहयोग लिया हो और केवल यही करते रहे हों तो आप यह कह सकते हैं कि साधन ही हमारा साध्‍य बन गया है। अगर साधन ही हमारा साध्‍य है तो करावलनगर, गोरखपुर और लुधियाना के मजदूरों के आन्‍दोलनों में हमारी भूमिका के बारे में आपके क्‍या विचार हैं।

कवि महोदय आप शायद जानते होंगे कि न्‍यास बनाना और किताबें छापना ऐसे काम हैं जो शुरू से ही नजर आते हैं। वहीं लोगों को संगठित करना एक ऐसा काम है जिसका आउटपुट तत्‍काल नजर नहीं आता। वर्तमान परिस्थितियों का हमारा मूल्‍यांकन और इसलिए हमारे काम का तरीका भी थोड़ा अलग है जो महानगरों के बुद्धिजीवियों को समझ में नहीं आता है। चूंकि हम समय-समय पर ''ऐक्‍शन'' नहीं करते रहते और थोड़ा काम करके बहुत गाते नहीं, इसलिए जमीन से कटे बुद्धिजीवियों को लगता है कि हम बस किताबें ही छाप रहे हैं। वैसे क्‍या ये सरासर बेईमानी और बदनीयती नहीं है कि जानबूझकर किसी संगठन के कामों के एक हिस्से को अपने झूठे आरोपों का निशाना बनाया जाए और उसके कामों के बड़े और मुख्‍य पहलू की चर्चा ही न की जाए! तो कविवर ऐसी स्थिति में अत्‍यावश्‍यक है कि आंखें फाड़कर घूरती सच्‍चाईयों को समझने और उनके अनुरूप अपने सिद्धान्‍त और व्‍यवहार में परिवर्तन करने के लिए कम्‍युनिस्‍टों को प्रेरित करने हेतु ज़रूरी कामों के लिए मार्क्‍सवादी अध्‍ययन संस्‍थान और प्रकाशन जैसी संस्‍थाएं स्‍थापित की जाएं। आज जबकि ''भूतपूर्व'' और स्‍वनामधन्‍य कम्‍युनिस्‍टों की जमात बढ़ती जा रही है जिसने कम्‍युनिज्‍म के बुनियादी उसूलों, मर्यादाओं और गुणों का परित्‍याग कर दिया है तो ऐसी संस्‍थाएं बेहद ज़रूरी हैं जो कम्‍युनिज्‍म के आदर्शों को बचाए रखने और नई पीढ़ियों को इस विरासत से शिक्षित-दीक्षित करने का काम करें। बेशक जिन्‍हें लगता है कि परिस्थितियां बदली ही नहीं हैं और जो कुछ लिखना पढ़ना था सब लिखा पढ़ा और कहा जा चुका है और बस आंख मूंदकर लकीर पर लाठी पीटते रहना है उन्‍हें न्‍यास और प्रकाशन की जरूरत न तो है और न समझ में आयेगी।

नीलाभ जी आप भोलेपन की मिसाल कायम करते हुए लिखते हैं कि कात्‍यायनी,सत्‍यम और शशिप्रकाश के खिलाफ उनके ही कुछ पुराने साथियों ने आरोप लगाए हैं। इससे आप हतप्रभ भी हैं और उदास भी। जाहिर है आप हतप्रभ और उदास इसलिए हैं क्‍योंकि आप इन आरोपों को जायज और ईमानदारी की जमीन से उठाया गया समझते हैं। पर आप ऐसा क्यों समझते हैं। क्‍या आपने जानना चाहा कि इन लोगों के खिलाफ दूसरे पक्ष के क्‍या आरोप हैं। क्‍या आपने कभी जानना चाहा कि ये लोग जिन कार्यकर्ताओं के साथ काम करते थे उनके इनके बारे में क्‍या विचार हैं। आपने तो भोलेपन की इंतहा ही कर दी और आपने मान लिया कि जनज्‍वार के टिप्‍पणीकार ही सही हैं और दूसरा पक्ष गलत है। इस एकांगीपन की वजह क्‍या है नीलाभ जी। क्‍यों आपको लगता है कि संगठन/समूह ही हमेशा गलत होता है और आरोप लगाने वाला कार्यकर्ता हमेशा सही होता है। और क्‍या आपको लगता है कि इन सब बातों का फैसला करने का सबसे उपयुक्‍त मंच ब्‍लॉग ही है। क्‍या ब्‍लॉग जैसे सशक्‍त टूल ने नीलाभ को गैरजिम्‍मेदार बना दिया है या यह पुरानी खुन्‍नस निकालने का एक जरिया है। --

एक नौजवान राजनीतिक कार्यकर्ता, दिल्‍ली




बाघों के लिए इंसानों का शिकार


आदिवासिओं के लिए आधुनिकता छुछुन्दर हो गयी है और जनजातीय पंरपराओं का ताना-बाना छिन्न-भिन्न हो रहा है.

मेलघाट से लौटकर शिरीष खरे

मेलघाट सतपुड़ा पर्वतमाला की पश्चिमी पहाड़ी है जो महाराष्ट्र के जिला अमरावती की दो तहसील से जुड़कर बनी है. दो लाख 19 हजार हेक्टेयर यानी मुंबई से 4 गुना बड़ी जगह पर यहाँ कुल 319 गांव मिलते हैं. यहां करीब 3 लाख आबादी में से 80फीसदी कोरकू जनजाति है.

समुद्र तल से 1118मीटर की ऊंचाई पर बसा यह हरा-भरा भाग `मेलघाट टाइगर रिजर्व´ कहलाता है. वर्ष  1974 में `एम टी आर´ के नाम से शुरू हुए  इस प्रोजेक्ट से तब 62 गांव प्रभावित हुए थे, दुबारा  27 गांव के करीब 16 हजार लोगों को फिर विस्थापित किया जा रहा है, फिर उनकी सभ्यताएं नष्ट की जा रही हैं. 1947 से पूरे देश में विभिन्न परियोजनाओं से अब तक 2करोड़ से अधिक आदिवासियों को विस्थापित किया जा चुका है.

सरकार के मुताबिक बाघों को बचाने के लिए यहां विस्थापन जरूरी है लेकिन `राष्ट्रीय बाघ संरक्षण प्राधिकरण´की रिपोर्ट स्वीकार करती है कि सत्तर के दशक में शुरू हुआ `प्रोजेक्ट टाइगर´अपने लक्ष्य से काफी दूर रहा. देश में बाघों की संख्या अब तक के सबसे निचले स्तर तक पहुंच चुकी है. 2002 को देश में जहां 3642 बाघ थे वहीं अब 1411 बाघ बचे हैं.

कोकरू जनजाति के लिए उजड़ना नियति बन चुका है.
राज्यसभा के सांसद ज्ञानप्रकाश पिलानियामानते कहते हैं कि -``बाघों की संख्या को बढ़ाने के लिए बने रिजर्व एरिया अब उन्हें मारने की मुनासिब जगह बन गए हैं.इसके लिए अवैध शिकार  करके उनके अंगों की तश्करी करने वाले व्यापारी जिम्मेदार हैं.बाहरी ताकतों की मिलीभगत से ही इतने बड़े गिरोह पनप सकते हैं.

´दूसरी तरफ विकास की तेज आंधी ने जंगलों का भविष्य खत्म कर दिया है. `भारतीय वन सर्वेक्षण´ की रिपोर्ट बताती है कि 2003 से 2005 के बीच 728 किलोमीटर जंगल कम हुआ. फिलहाल सघन जंगल का हिस्सा महज 1.6 फीसदी ही बचा है. इसी प्रकार 11 रिजर्व एरिया में जंगल घटा है. जाहिर है कि जनजाति को लगातार विस्थापित किए जाने के बावजूद न तो बाघ बच पाए हैं और न जंगल.

मेलघाट में कोरकू जनजाति का अतीत देखा जाए तो 1860-1900के बीच प्लेग और हैजा से पहाड़ियां खाली हो गई थी. तब ये लोग मध्यप्रदेश के मोवारगढ़, बेतूल, शाहपुरा भवरा और चिंचोली में जाकर बस गए. उसके एक दशक बाद अंग्रेजों की नजर यहां के जंगल पर पड़ी. उन्हें फर्नीचर की खातिर पेड़ काटवाना और उसके लिए पहुंच मार्ग बनवाना था. इसलिए कोरकू जनजाति को वापिस बुलाया गया. आजादी के 25 सालों तक उनका जीवन जंगल से जुड़ा रहा. उन्होंने जंगल से जीवन जीना सीखा था. लेकिन जैसे-जैसे जंगल से जीवन को अलग-थलग किया जाने लगा वैसे-वैसे उनका जीना दूभर होता चला गया.

अनिल जेम्स कहते हैं कि-`बीते 34 सालों से `मेलघाट टाइगर रिजर्व´ में जनजातियों का शिकार जारी है.जैसे जैसे टाईगर रिजर्व सुरक्षित हो रहा है यहां रोटी का संकट गहराता जा रहा है.जनजातीय पंरपराओं का ताना-बाना छिन्न-भिन्न हो चुका है.यहां सामाजिक ऊथल-पुथल अपने विकराल रुप में हाजिर है.राहत के तौर पर तैयार सरकारी योजनाओं का असर,बेअसर ही रहा.हर योजना ने लोगों को कागजों में उलझाए रखा और अब लोग भी उलझकर जंगल की मांग ही भूल गए हैं.

परम्पराओं पर बाज़ार का रोगन चढ़ रहा है.
बांगलिंगा गांव में 85साल के झोलेमुक्का धाण्डेकर ने जंगल की बातों के बारे में बताया कि-`पहले हम समूह में रहने के आदी थे.अपनी बस्ती को पंचायत मानते और हर परेशानी को यही सुलझाते. `भवई´ त्यौहार पर साल भर का कामकाज और कायदा बनाते. इन मामलों में औरत भी साथ होती. वह अपना हर फैसला खुद ही लेती.चाहे जिसे दूल्हा चुने और पति से अनबन या उसके मरने पर दूसरी शादी करे.शादी में लेन-देन और बच्ची को मारने जैसी बातें नहीं सुनी थी. संख्या के हिसाब से भी मर्द और औरत बराबर ही बैठते.

हमारी बस्ती सागौन, हलदू, साजड़, बेहड़ा, तेंदू, कोसिम, सबय, मोहिम, धावड़ा, तीवस और कोहा के पेड़ों से घिरी थी. जंगल में आग लगती तो हम अपनी बस्तियां बचाने के लिए उसे बुझा देते.तभी तो हमें अंग्रेजों ने जंगलों में ही रहने दिया.वहां से सालगिटी, गालंगा और आरा की भाजियां मिलती.बेचंदी को चावल की तरह उबालकर खाते.कच्चा खाने की चीजों में काला गदालू, बैलकंद, गोगदू और बबरा मिल जाते.ज्वस नाम की बूटी को उबलती सब्जी में मिला दो तो वह तेल का काम करती.

 इसके अलावा तेंदू, आंवला, महुआ, हिरडा, बेहड़ा, लाख और गोद भी खूब थी. फल, छाल और बीजों की कई किस्मों से दवा-दारू बनाते. खेती के लिए कोदो, कुटकी, जगनी, भल्ली, राठी, बडा़ आमतरी,गड़मल और सुकड़ी के बीज थे.ऐसे बीज बंजर जमीन में भी लहलहाते और साल में दो बार फसल देते. इसलिए अनाज का एक हिस्सा खाने और एक हिस्सा खेती के लिए बचा पाते थे.

यह  सरल, खुली और समृद्ध जीवनशैली की झलक भर है. बीते 3 दशकों से भांति-भांति की दखलअंदाजियों ने यहां की दुनिया को बुरी तरह प्रभावित किया. 1974 में सबसे पहले वन-विभाग ने बाघ के पंजों के निशान खोजने और उनकी लंबाई-चौड़ाई तलाशने के लिए सर्वे किया.फिर जमीनों को हदों में बांटा जाने लगा.इस तरह जंगल की जमीन राजस्व की जमीन में बदलने लगी और लोग यहां से बेदखल हुए. 1980 के बाद सरकार ने इन्हें पानी की मछली, जमीन के कंदमूल और पेड़ की पित्तयों के इस्तेमाल से रोका.

मगर पूरा जंगल बाजार के लिए खोल दिया गया. जंगल के उत्पाद जब बाजार में बिकने लगे तो यहां की जनजाति भी जंगल की बजाय बाजारों पर निर्भर हो गई.इससे चीजों का लेन-देन बढ़ा और उन्हें रूपए-पैसों में तौला जाने लगा.अनाज के बदले नकद की महिमा बढ़ी.नकदी फसल के रुप में सोयाबीन और कपास पैदा किया जाने लगा. बाजार से खरीदे संकर बीज अधिक से अधिक पानी और रसायन मांगने लगे. समय के साथ खेती मंहगी होती गई. इस बीच नई जरूरतों में इजाफा हुआ और उनके खाने-पीने, रहने और पहनने में अंतर आया. आज कोरकू लोग कई जडियां और उनके उपयोग नहीं जानते.´´

यह तब की सरल, खुली और समृद्ध जीवनशैली की झलक भर है. बीते 3 दशकों से भांति-भांति की दखलअंदाजियों ने यहां की दुनिया को बुरी तरह प्रभावित किया.1974 में सबसे पहले वन-विभाग ने बाघ के पंजों के निशान खोजने और उनकी लंबाई-चौड़ाई तलाशने के लिए सर्वे किया.फिर जमीनों को हदों में बांटा जाने लगा. इस तरह जंगल की जमीन राजस्व की जमीन में बदलने लगी और लोग यहां से बेदखल हुए.

इन्हें तो बचा नहीं सके, अब इंसानों की बारी
 वर्ष 1980के बाद सरकार ने इन्हें पानी की मछली,जमीन के कंदमूल और पेड़ की पित्तयों के इस्तेमाल से रोका मगर पूरा जंगल बाजार के लिए खोल दिया गया.जंगल के उत्पाद जब बाजार में बिकने लगे तो यहां की जनजाति भी जंगल की बजाय बाजारों पर निर्भर हो गई.इससे चीजों का लेन-देन बढ़ा और उन्हें रूपए-पैसों में तौला जाने लगा.अनाज के बदले नकद की महिमा बढ़ी. नकदी फसल के रुप में सोयाबीन और कपास पैदा किया जाने लगा.

बाजार से खरीदे संकर बीज अधिक से अधिक पानी और रसायन मांगने लगे. समय के साथ खेती मंहगी होती गई. इस बीच नई जरूरतों में इजाफा हुआ और उनके खाने-पीने, रहने और पहनने में अंतर आया.आज कोरकू लोग कई जडियां और उनके उपयोग नहीं जानते.´´

पसतलई गांव के एक युवक ने नाम छिपाने की शर्त पर बताया कि-`जंगली जानवरों का शिकार करने वाली कई टोलियां यहां घूम रही हैं.कमला पारधन नाम की औरत इसी धंधे में लिप्त थी.बाद में पुलिस ने उसे धारणी में गिरफ्तार कर लिया.´ यहां जानवरों के हमलों की घटनाएं भी बढ़ रही हैं.

कुंड गांव की बूढ़ी औरत मानु डाण्डेकर ने जानवरों से बचने के लिए तब की झोपड़ी को याद किया-`वह लकड़ियों और पत्तों की बनी होती,ऊंचाई हमसे 2-3हाथ ज्यादा रहती.छत आधी गोल होती जो पूरी झोपड़ी को ढ़क लेती.उसमें घुसने के लिए दरवाजा उठाकर जाते.दरवाजे की हद इतनी छोटी रखते कि रेंगकर घुसा जाए. झोपड़ी के चारों तरफ 2-3 फीट लंबी पत्थरों की दीवार बनाते. रात को झोपड़ी के बाहर आग सुलगाते.

पूरी बस्ती प्यार, तकरार, शादी, शिकार, जुदाई और पूजन से जुड़े किस्सों पर गाती-थिरकती रकती. जैसे प्यार के गीत में लड़की से मिलने के लिए रास्ता पूछने,शादी के गीत में दूल्हा-दुल्हन बनकर आपस में बतियाने और जुदाई के गीत में शिकार पर गए पति के न लौटने की चर्चा होती.´´

यह बस्तियां अपनी पंरपरा और आधुनिक मापदण्डों के बीच फसी हैं.घरों की दीवारों पर रोमन केलेण्डर और रात में जलती लालटन लटकती हैं. बाहरियों के आने से इनके भीतर हीनता बस गई.यह खुद को बदलने में जुटे हैं. यहां के मोहल्लों ने कस्बों की नकल करके अपनी शक्लों को बिगाड़ रखा है.अब कोरकू बोली की जगह विदर्भ की हिन्दी का असर बढ़ रहा है. जबकि कार्यालय की भाषा मराठी है. इसलिए कोरकू जुबान फिसलती रहती है. खासकर स्कूल में पढ़ने वाले बच्चों को जानने और बोलने में मुश्किल आती है.

कोरकू लोग कहते हैं कि सबकुछ खोने के बाद हमें कुछ नहीं मिला.स्कूल के टीचर और अस्पताल के डॉक्टर मैदानी इलाकों में बने हुए हैं. लेकिन हमारे हिस्से में न मैदान आया, न पहाड़. हम कहां जाए?


Aug 16, 2010

सांसदों ने कहा, नहीं चलता परिवार


देश कि कुल आबादी में छह साल से कम   के करीब ५० प्रतिशत बच्चे कुपोषित  हैं,४० करोड़ आबादी  गरीबी रेखा के नीचे है और  और सांसद हैं कि जनता की मेहनत  की कमाई डकारने के बाद भी दरिद्रता का रोना रो रहे हैं.  

जयप्रताप


चौंकिये नहीं,यह सच्चाई है। आज हमारे देश के सांसद कितने गरीब हैं इसका अनुमान आप इस बात से लगा सकते हैं कि दिन रात जनता के दुख दर्द में शामिल होने के बावजूद इनकी सेलरी मात्र 16,000रुपये ही है। यह अलग बात है कि वह जनता के बीच जाते हैं या नहीं?

वे आम जनता के प्रतिनिधि हैं. इनके करोड़ों के फ्लैट और दो चार महंगी गाडिय़ां, ड्राइवर का वेतन, नौकर-चाकर आदि का खर्चा,क्या 16हजार रुपये में पूरा हो सकता है। यह तो रहा सामान्य खर्चा,बाकी फाइवस्टार होटलों का खर्चा आखिर कहां से आयेगा?कमीशन और अन्य बैक फुट से हुई कमाई करोड़ों अरबों में होती है। लेकिन फिर भी वेतन तो वेतन होता है।हमारे सांसदों का दर्द है   है कि एक सेक्रेटरी का वेतन 80हजार रुपये है और सांसद का मात्र सोलह।

आखिर सेक्रेटरी का काम ही क्या होता है। वह दिन रात किताबें ही तो पढ़ कर आया है। और बैठे-बैठे लेखा-जोखा करता है। कुल मिला कर थोड़ा बहुत देश के हित में काम कर जाता है। जबकि हमारे सांसद तो करोड़ों रुपये खर्च करके चुनाव जीतते हैं और जनता के प्रतिनिधि  माने जाते हैं।  आखिर इस पाप के प्रायश्चित के लिए  पैसों की भी जरूरत तो होती है। इसलिए अब इनकी तनख्वाह पचास हजार रुपये  होने का प्रस्ताव है,लेकिन उतने में भी इन बेचारों का पेट भरने वाला नहीं है। अब इन्हें पांच गुना और चाहिए।

सेलरी के अलावा सांसदों को संसद सत्र के दौरान या हाऊस की कमेटियों की मीटिंग के दौरान हर रोज के हिसाब से 1000रुपये भत्ता मिलता है जिसे दोगुना किया जाने कि मांग है. इसके अलावा संसदीय क्षेत्र का मासिक भत्ता भी 20 हजार से बढ़ाकर 40 हजार करने की मांग कर रहे हैं। ऑफिस भत्ता  के तौर पर भी सांसदों को 20 हजार रुपये मिल रहे हैं लेकिन  इसे भी बढ़ाने का प्रस्ताव है।

अन्य सुविधाओं के तहत सांसद अपनी पत्नी या किसी दूसरे रिश्तेदार के साथ साल में 34 हवाई यात्रा कर सकते हैं। उन्हें किसी भी ट्रेन में किसी भी समय एसी फस्र्ट क्लास में पत्नी समेत यात्रा करने का पास भी मिलता है। इसके अलावा उन्हें अपने कार्यकाल के दौरान मुफ्त में आवास सुविधा भी मिलती है।

रहा सवाल उनका जिनके ये नेताहैं तो, उन मेहनतकशों का तो  फर्ज ही है कि वे अपने और अपने बीबी बच्चों के पेट पर पट्टी बांध कर देश को आगे बढ़ाने में मदद करें। उन्हें वेतन मजदूरी बढ़ाने की चिंता करने की जरूरत ही क्या हैलेकिन यह सब बातें हमारे सांसदों पर लागू नहीं होतीं। क्योंकि वे बेचारे तो हमारे प्रतिनिधि हैं और हमारा यह फर्ज बनता है कि हम अपना खून पसीना बहाकर उनका ख्याल रखें। इसके लिए अगर हमें भूखे भी रहना पड़े तो गलत नहीं। एक बार हमारे एक भूतपूर्व प्रधानमंत्री ने कहा था कि देश को आगे बढ़ाने के लिए यदि जनता को अपनी पेट पर पट्टी भी बांधनी पड़े तो उसमें जनता को पीछे नहीं हटना चाहिए। लेकिन यह बात सिर्फ गरीब जनता पर लागू होती है, जनप्रतिनिधि पर नहीं।
वाह मेरे प्यारे गरीब सांसदों,हम आपके दुख दर्द को समझते हैं. आप हमारे भले के लिए  अमेरिका, रूस, चीन, जापान आदि पूरे विश्व में कुछ घंटों में भ्रमण कर आते हैं और लोग हैं कि गांव से 20 किलोमीटर की दूरी पर बसे शहर में जाने के लिए हजार बार सोचते हैं।  उनके पास  किराये के लिए 20 रुपये बस का किराया नहीं होता, इस बारे में सोचते हैं सांसद साहब. 

आपके पर्यावरणविद हो सकता है कहें कि किराया नहीं है,साइकिल तो है। लेकिन साइकिल चलाने के लिए भी तो शरीर में ताकत होनी चाहिए। ताकत आयेगी कहां से?तो आपके डॉक्टर कहेंगे कि हरी सब्जी खाओ,दूध पियो और ताकतवर फल खाओ।

जनाब जरा सोचिए! इस महंगाई में फल खाना तो दूर देश की 70 प्रतिशत जनता नमक और मिर्च के साथ भी रोटी नहीं खा सकती। मिर्च भी अब 50 से 60 रुपये किलो है। रहा सवाल आटे का तो वह भी पांच किलो का पैकेट का दाम अब 105रुपये हो गया है। उसके शरीर में ताकत कहां से आयेगी। वह साइकिल कैसे चला सकता है। 

बेचारे सांसद अपनी सेलरी तो बढ़वाना चाहते हैं, लेकिन फैक्ट्री कारखानों में 14 से 18 सौ रुपये में दिन रात खटने वाले मेहनतकशों के बारे में सोचने का इनके पास फुर्सत नहीं है। और सोचें भी क्यों? इन्हें जनता से क्या लेना देना है। वे तो इनकी नजर में बस नाली के कीड़े हैं। जिसे जब चाहो कीटनाशक दवाओं की तरह कानूनी डंडे का छिड़काव करके बाहर कर दें। कहे कि जनता तो हर पांच साल पर याद आती है।


Aug 15, 2010

जेपी की हुईं मायावती, किसानों पर दागी गोलियां


अलीगढ़ में जारी किसानों के आंदोलन को लेकर जनज्वार ने करीब दो सप्ताह पहले ‘सरकार ही अत्याचार करै,तो कौन रखावै’रिपोर्ट प्रकाशित  की थी। रिपोर्ट के साथ जनपक्षधर पत्रकारों और मीडिया समूहों से अपील भी की गयी थी कि वह इस खबर को तवज्जो दें मगर ऐसा देखने को नहीं मिला। हमारा मानना है कि अगर समय रहते हस्तक्षेप हुआ होता तो किसान पहले सरकार को,फिर अदालत को और अंत में मीडिया को   बिका हुआ नहीं मानते और न ही किसानों और सुरक्षाबलों के घरों में मातमी माहौल होता जो आज है। अलीगढ़ के टप्पल थाना क्षेत्र से उचित मुआवजे की मांग के साथ शुरू हुआ किसानों का शांतिपूर्ण  धरना अब उग्र आंदोलन में तब्दील हो चुका है और धीरे-धीरे पूरे पश्चिमी  उत्तर प्रदेश में फैल रहा है।


उत्तर प्रदेश के अलीगढ़ में जमीन अधिग्रहण के बदले उचित मुआवजे के लिए संघर्षरत  किसानों पर कल शाम पुलिस ने गोलियां दागीं और आंसू गैस के गोल छोड़े। पुलिस की इस गोलीबारी में दो आंदोलनकारी किसानों और एक पीएसी के सब इंस्पेक्टर की मौत हो गयी। मरने वालों में जीरकपुर गांव के चंद्रपाल  का 12 वर्षीय  बेटा भोला और श्यारोल गांव का 24वर्षीय  युवक धर्मेंद्र मारा गया। खबर लिखे जाने तक ग्रामीणों  से पता चला कि आज भी पुलिस और सुरक्षा बलों के बीच जगह-जगह खूनी झड़प हुई है, जिसमें तीन  किसान   और सुरक्षा बल का एक जवान  मारा गया है. आन्दोलनरत  किसानों की मांग है कि उनके जमीनों का अधिग्रहण कर रही  सरकार वही दर दे जो ग्रेटर नोएडा में अधिग्रहण के दौरान किसानों को दिया जा रहा है.
जमीन अधिग्रहण की सरकारी चालबाजी और जेपी ग्रुप की ज्यादती के खिलाफ पिछले 15दिनों से धरने पर बैठे टप्पल थाना क्षेत्र के छह गांवों के किसान 14 अगस्त को उस समय उग्र हो गये, जब स्थानीय थानाध्यक्ष मल्लिक ने आंदोलन के प्रमुख नेता बाबूराम कठेरिया को शाम  करीब पांच बजे गाली-गलौज कर गिरफ्तार कर लिया। टप्पल, उदयपुर,जहानगढ़, कृपालपुर, जीरकपुर और कंसेरा गांव से शुरू  हुआ यह आंदोलन सरकारी असंवेदनषीलता की वजह से तीन जिलों मथुरा,अलीगढ़ और आगरा के पूरे क्षेत्र में फैल गया है। हर जगह किसान घेराबंदी,पथराव और आगजनी कर रहे हैं।


किसानों का आक्रोश : कैसे समझेगी सरकार
                                                                                                                                  

ग्रामीणों ने बताया कि थानाध्यक्ष मल्लिक ने धरने पर बैठे लोगों के साथ जबर्दस्ती की और लोगों ने जब नेता बाबूराम गठेरिया की गिरफ्तारी का विरोध किया तो थानाध्यक्ष ने गोलियां चला दीं जिसमें जीरकपुर गांव के दो लोग घायल हो गये। इसके बाद किसानों और पुलिस बल के बीच हुई झड़प में जीरकपुर गांव के चंद्रपाल का 12 वर्षीय बेटा भोला और ष्यारोल गांव का 24 वर्षीय  युवक धर्मेंद्र मारा गया। पुलिस की तरफ से धड़ाधड़ चली गोलियों से एक पीएसी सब इंस्पेक्टर भी मारा गया। इस गोलीबारी में कई आंदोलनकारियों को गोलियां लगी हैं जिनका अलीगढ़,मुथरा और फरीदाबाद के अस्पतालों में इलाज चल रहा है। ग्रामीणों के अनुसार 14अगस्त को हुई झड़प में पचीस किसान गंभीर रूप से घायल हैं।

पुलिस की इस ज्यादती की जानकारी गांवों में फैलने में घंटे भर भी नहीं लगी। मात्र चालीस-पचास की संख्या में धरना दे रहे किसानों की संख्या बढ़ते ही आक्रोशित  भीड़े ने दो पुलिस पोस्ट समेत कई गाड़ियां और जेपी ग्रुम का निर्माण को स्वाहा कर डाला। मौके पर मौजूद पूर्व मंत्री ठाकुर दलबीर सिंह की भी गाड़ी को आंदोलनकारियों ने आग के हवाले कर दिया। संयोग से उस वक्त क्षेत्र के विधायक सतपाल चौधरी और पूर्व मंत्री ठाकुर दलबीर सिंह भी मौजूद थे।

संयोग इतना ही नहीं था,बल्कि संयोग यह भी था कि आजादी के तिरसठ साल पूरे होने की पूर्व संध्या पर जब प्रधानमंत्री एक विकसित राष्ट्र  के गुनगुनाते सपनों के साथ सोये होंगे तो राजधानी से मात्र 90किलोमीटर दूर अलीगढ़ जिला में में मारे गये किसानों के परिजन शमसान घाट पर जिंदगी की सबसे कड़वी हकीकत से रू-ब-रू हो रहे होंगे। मशहूर शायर फैज अहमद फैज के ‘दाग-दाग उजाला’की हकीकत से पीछा छुड़ाते हुए प्रधानमंत्री जब लाल किला की प्राचीर से किताब में झांककर देष की हकीकत ढुंढ रहे होंगे तो यकीनन पुलिस के हाथों मारे गये किसानों के लाश की गंध लिये धुआं उन तक जरूर पहुंचा होगा। कारण कि कश्मीर  हो या, अलीगढ़, या फिर हो लालगढ़ हर जगह सरकार अमन और शांति की चाहत में धुआं उठाने में ही सफलता देख रही है और विरोध में उठी आवाजों का लाश बनाने में विकास।

बताया जाता है कि ग्रामीणों के उग्र होने का कारण रैपिड एक्शन  फोर्स,पीएसी और स्थानीय पुलिस का जीरकपुर गांव के पास संघर्श के चिन्ह के तौर पर लगाये गये झंडे का पुल से उखाड़ना रहा। आंदोलनकारी राजू शर्मा ने बताया कि जीरकपुर गांव के नीचे बन रहे पुल पर ग्रामीणों ने हरे रंग का झंडा लगा रहा था जिसे सुरक्षा बलों ने उखाड़ दिया। सुरक्षा बलों के नेता बाबूराम कठेरिया की गिरफ्तारी के बाद सुरक्षा बलों का झंडा उखाड़ना आक्रोशित  ग्रामीणों के लिए आग में घी का काम किया।

किसानों के जारी आंदोलन और पुलिस की दग रही गोलियों के बीच अब देखना यह है कि किसानों की मांग के आगे सरकार झुकती है या मायावती सरकार अपने  प्रिय रियल स्टेट समूह जेपी ग्रुप की जय बोलती है।



सरकार अत्याचार करै, तो रखावै कौन


जिस जमीन पर फसलें उगाते हुए किसानों की पीढ़ियां गुजर चुकी हों,जिन खेतों में उगी फसलों का नाता इन परिवारों की समृद्धि से रहा हो, उन खेतों का मालिकाना हक, कागज की एक चिट्ठी छीन ले तो किसान क्या करें?

अजय प्रकाश की रिपोर्ट

उत्तर प्रदेश  के अलीगढ़ जिले के टप्पल थाना क्षेत्र के छह गांवों में जेपी ग्रुप के मॉल और मकान बनाने के लिए सरकार ने जो जमीन निर्धारित की है,वह किसानों की खेती योग्य जमीन है। मगर उत्तर प्रदेश सरकार जेपी ग्रुप  के मकान-दूकान बनाने को देश  का विकास ठहराने पर आमादा है और हर कीमत पर जमीन कब्जाने की प्रक्रिया शुरू कर चुकी है। 510 हेक्टेयर क्षेत्र में फैले इन सभी गांवों में पुलिस,प्रशासन और जेपी ग्रुप के लठैत भूमि अधिग्रहण की प्रक्रिया शुरू कर चुके हैं,जिसके खिलाफ किसान  भूख हड़ताल पर बैठ गए हैं और हर रोज जोरदार प्रदर्शन  कर रहे हैं.
पश्चिमी  उत्तर प्रदेश में सरकार और जनता के बीच पिछले कई वर्षों  से सबसे बड़ी टकराहट मुआवजे और कब्जे को लेकर ही है। सरकार के पास बहाना विकास का है और किसान ज्यादा से ज्यादा मुआवजा पाने के संघर्ष  पर उतारू है। ग्रामीण हुकुम सिंह कहते हैं,हम पर जुल्म होता है तो न्याय की उम्मीद में प्रशासन,प्रतिनिधि या अदालत में जाते हैं। मगर हम लोगों के सामने यही संकट है कि सरकार ही अत्याचार करै, तो रखावै कौन।’

सरकारी-निजी मिलीभगत  सेइन छह गांवों में खेती के जमीनों पर कब्जेदारी की कानूनी प्रक्रिया जेपी ग्रुप ने 2001 में ताज एक्सप्रेस-वे के बनने के दौरान ही पूरी कर ली थी। मगर यह जानकारी किसानों के बीच सरकार की ओर से पिछले वर्ष सार्वजनिक की गयी। गौरतलब है कि उस समय सरकार बसपा की ही थी और मौजूदा मुख्यमंत्री मायावती ही सत्ता पर काबिज थीं। सन् 2001 में किसानों ने बड़ी आसानी से ताज एक्सप्रेस वे के लिए जमीन दे दी कि इससे राज्य का विकास होगा। उस समय किसानों ने जमीन सवा तीन लाख रूपये बीघे के हिसाब से दी थी। लेकिन पिछले वर्श जब विकास प्राधिकरण ने किसानों को नोटिस भेजा कि अलीगढ़ जिले के छह गांवों टप्पल, उदयपुर, जहानगढ़, कृपालपुर, जीकरपुर और कंसेरा गांव के जमीन मालिक कोई नया निर्माण न करें, तो किसान हतप्रभ रह गये।

इसकी शुरुआअत उस समय हो गयी थी जब कॉमनवेल्थ खेलों के लिए दिल्ली से आगरा के बीच चौड़ी,सुंदर और चकमदार सड़क बनाने की योजना की मंजूरी ताज एक्सप्रेस-वे हाइवे प्राधिकरण को सरकार ने दी थी। जिसका नाम बाद में यमुना एक्सप्रेस-वे विकास प्राधिकरण हो गया। इसके लिए नोएडा,अलीगढ़ और आगरा के किसानों की जमीन का अधिग्रहण किया गया और ठेका देने के लिए कई कंपनियां आमंत्रित की गयीं।

जेपी ग्रुप ने सरकार से कहा कि वह नोएडा से आगरा तक अपने खर्चे से सड़क बना देगा। शर्त  बस इतनी है कि सरकार कंपनी को अच्छे बाजार की संभावना वाली जगहों पर प्रदेश  में पांच जगह करीब 50 हजार हेक्टेयर जमीन उसे दे, जिसका भुगतान कंपनी कर देगी। मगर कंपनी ने दूसरी शर्त  यह रखी कि सड़कों के बनने के बाद, तीस वर्षों तक टोल टैक्स जेपी ग्रुप वसूल करेगा। जनता की सरकार मायावती ने इसे जनहित में मानते हुए जेपी ग्रुप  की सारी शर्तें स्वीकार कर लीं।

गौरतलब है कि यह सारी जानकारी किसानों से छिपायी गयी। जहानगढ़ गाँव के हुकुम सिंह इसे एक साजिश मानते हैं। हुकुम सिंह ने बताया कि ‘जिलाधिकारी ने सरकारी कर्मचारियों पर दबाव डालकर,तबादले की धमकी देकर कुछ ग्रामीणों से जमीन कब्जा वाले कागजों पर तो दस्तखत करा लिया है, मगर ज्यादातर लोगों को सरकार की यह षर्त मंजूर नहीं है।’यानी प्रशासन घोषित  कब्जेदारी के तरीकों के मुकाबले अभी तक अघोषित  ढंग ही बात मनवाने में सफल रहा है। ऐसा सरकार इसलिए कर रही है कि 2001में नोएडा एक्सप्रेस वे के लिए जिस कीमत (सवा तीन लाख रूपया बीघा) पर अधिग्रहण हुआ था, नौ साल बाद भी किसान उसी दर को स्वीकार कर लें।


किसानों के आंदोलन में शामिल राजू शर्मा  बताते हैं कि ‘सरकार की शर्त हमें मंजूर नहीं थी। इसलिए इलाहाबाद उच्च न्यायालय का दरवाजा खटखटाया। किसानों ने अदालत के समक्ष अपनी मांगों को रखा। जैसे,किसानों की जमीन को सरकार साढे़ सैंतालीस सौ वर्गमीटर के हिसाब से बेच रही है तो उन्हें इन जमीनों का भुगतानबेची जारही कीमत से बीस प्रतिशत  कम करके अदा करे। दूसरी मांग यह है कि कुल जमीन का दस प्रतिषत हिस्सा विकसित कर सरकार किसानों को दे जिससे कि वे देश  के विकास में अपनी भागीदारी कर सकें। मिले हुए मुआवजे से गर किसान प्रदेश में कहीं जमीन खरीदता है तो उसे स्टांप शुल्क न देना पड़े और हर प्रभावित परिवार के सदस्य को रोजगार मिले।

इलाहाबाद उच्च न्यायालय में इन सभी मामलों के पक्ष-विपक्ष पर साल भर सुनवाई चली। किसानों को उम्मीद थी कि अदालत उनके पक्ष में फैसला देगी। मगर अदालत ने 2जुलाई को जो फैसला दिया, उससे बीस हजार आबादी वाले इन छह गांवों के लोग सकते में आ गये। राजू शर्मा बताते हैं कि ‘सरकार और जेपीग्रुप  की तरफ से पेश हो रहे वकीलों ने उच्च न्यायालय में जो बातें रखीं वे सभी हवाई साबित हुईं। जैसे किसानों की खेती योग्य जमीनों को जेपी के वकील ने बंजर बताया तो किसान उसे उपजाउ साबित करने में सफल हुए। इतना ही नहीं किसानों अदालत में धारा -5ए का हवाला देते हुए सरकार को कठघरे में खड़ा कर दिया कि ग्रामीणों की सहमति की सरकार ने कोई जरूरत ही नहीं समझी।

सारी सुनवाइयों के बाद उच्च न्यायालय के न्यायाधीश  सुनील अंबानी और धीरेंद्र सिंह ने तीन जिलों आगरा, नोएडा और अलीगढ़ में किसानों के विरोध के औसत के आधार पर टप्पल क्षेत्र के प्रभावितों का मुकदमा खारिज कर दिया। किसानों के वकील आषीश पांडेय ने बताया कि ‘एक ही प्रोजेक्ट के उपयोग के लिए कब्जाई गयी जमीन को आधार बनाकर अदालत ने कहा कि जब अस्सी फीसदी किसानों को कोई ऐतराज नहीं है तो बीस प्रतिशत  का क्या मतलब?’दरअसल जजों ने इन तीनों जिलों में जमीन अधिग्रहण के खिलाफ हो रहे विरोध और जमीन का औसत निकाला तो पाया कि टप्पल के किसानों की भागीदारी 20 प्रतिशत  है। इसी आधार पर दोनों जजों ने संयुक्त रूप से सुनवाई के दौरान मुकदमे को खारिज कर जेपी ग्रुप के पक्ष में फैसला दे दिया।


सरकार,प्रशासन औरअंत में अदालती आदेश से हताश ग्रामीणों ने जीरकपुर गांव में किसान सभा के बैनर भूख हड़ताल शुरू कर दी है। मगर पुलिस लोकतान्त्रिक  विरोध के इस तरीके को लगातार असफल करने में लगी हुई है। कब्जेदारी से प्रभावित होने वाले सभी गांवों में धारा 144लगा दी गयी है जिससे कि किसान इकट्ठे होकर आंदोलन को मजबूत न बना सकें। किसान सभा के धरने में सक्रिय भूमिका निभा रहे किशन  बघेल ने बताया कि ‘इन सभी गांवों के सर्वाधिक सक्रिय और जुझारू लोगों का पुलिस ने पहले से ही मुचलका कर रखा है ताकि संगठित आवाज उठाने वालों पर कानूनी कार्रवाई कर,कानून-व्यवस्था बनाये रखने के बहाने जेलों में डाला जा सके।’किसान सभा नेता कल्लू बघेल को पुलिस ने 29 जुलाई को देर रात में घर से उठाकर जेल में डाल दिया था।

सरकार और जेपी के मिलीभगत में फंसे ग्रामीणों ने फिर एक बार अदालत का दरवाजा खटखटाया है। सर्वोच्च न्यायालय के वकील रामनिवास ने किसानों की ओर से उच्च न्यायालय के फैसले के खिलाफ अर्जी डाली है। मगर अब प्रष्न यह है कि देष की आर्थिकी में बड़ी भूमिका निभाने वाले किसानों के खिलाफ सरकार मुकदमा लड़ रही है,पूंजी बटोरने में लगी कंपनियों के लिए सुविधा मुहैया कराना ही जिम्मेदारी मान चुकी है।


(द पब्लिक एजेंडा में छपी रिपोर्ट का संपादित अंश)

टिप्पणी- ग्रेटर नोएडा  से छह किलोमीटर दूर  अलीगढ  जिला  के खैर रेलवे स्टेशन की ओर पड़ने वाले इन गांवों  में  तीखा आन्दोलन चल रहा है. ग्रामीणों का कहना है कि मीडिया को पुलिस ओर जेपी कंपनी  के लोग जाने नहीं दे रहे हैं. जनपक्षधर पत्रकार और मीडिया संस्थान इस मसले को जानने के लिए इन नंबरों पर संपर्क कर सकते हैं.


सिनामाई पर्दे पर नया मुहावरा है 'पीपली लाइव'


फिल्म में मीडिया की भूमिका झपट्टा मारने पर उतारू बाज़ जैसी है जो 'आत्महत्या'की जाल में फंसने जा रहे किसान नत्था के पेशाब और टट्टी करने तक को सनसनीख़ेज़ 'ख़बर'बनाता है।

वर्धा से अनिल मिश्र

पीपली लाइव लोकजीवन के मार्मिक चरित्रों की विडंबना को व्यंग्य की सुतली डोर से बांधती है। यह वोट लूटने की ज़हरीली राजनीति,जानलेवा 'विकास'और सौदागर मीडिया के भ्रष्ट लेकिन मज़बूत गठजोड़ की सिनेमाई दास्तान है। नत्था, बुधिया, होरी और अम्मानुमा पात्र, अपने देश भारत (इंडिया नहीं)की फटी तक़दीर पर चस्पा ऐतिहासिक नज़ीर हैं कि कैसे एक देश की कई पीढ़ियां निराशा,अवसाद और अपने ही लोगों की गु़लामी के जूतों तले दबकर धीमी मौत की सांस गिन रही हैं। हमारे 'इंडिया' को इसका भान बस यूं है कि वह इन पात्रों की ज़िंदगियों को हरेक क्षण किसी मस्त बौराये हाथी की तरह पल-प्रतिपल कुचलता चला जा रहा है।


लोक की सहज जीवन-शैली के धागों से बुनी फ़िल्म छिछोरी राजनीति की गंदी हरकतों को उजागर करती है। इसमें मीडिया की भूमिका झपट्टा मारने पर उतारू बाज़ जैसी है जो 'आत्महत्या'की जाल में फंसने जा रहे किसान नत्था के पेशाब और टट्टी करने तक को सनसनीख़ेज़ 'ख़बर'बनाता है। फ़िल्म में,युगीन उपलब्धियों को जीने वाले नाट्यकर्मी हबीब तनवीर के अभिनय स्कूल का भरपूर असर दिखता है जो सिनेमाई पर्दे पर अभिनय का एक नया मुहावरा गढ़ता है। मसलन, फ़िल्म के खल पात्र जब कर्कश गालियां देते हैं तो वह तंज और नफ़रत का एक तल्ख़ इज़हार होता है लेकिन अम्मा द्वारा अपनी बहू या लड़के को दी जाने वाली गालियां दर्शकों को गुदगुदा जाती हैं।

नगीन तनवीर के गीत 'चोला माटी का....' गीत सुनहरी लोकधुन की उत्कृष्ट गायकी है। नगीन तनवीर की खनकती आवाज़ इसके जादुई असर को और महीन करती है। विभिन्न भाषाओं के लोकगीतों और धुनों पर नगीन की ग़ज़ब की, आल्हादित कर देने वाली पकड़ है। फ़िल्म में ताज़ादम ताज़गी के साथ ये गीत सूफ़ी संगीत की सी सादगी से तरंगित है। अन्य गीत 'देस मेरा रंगरेज़....'और 'मंहगाई डायन.....'आज के अंतर्द्वंद की नब्ज़ टटोलने में बेतरह कामयाब हुए हैं।

पीपली लाइव,कुलीनों द्वारा देश के हृदयस्थल पर एक के बाद एक की जा रही चोटों का हालिया हिसाबनामा है। यह नव-धनाढ्य चेतना को बेधती हुई,अर्थपूर्ण मनोरंजन की ज़रूरत से पगी फ़िल्म है। यह दर्शकों को एक ज्वलंत सवाल पर समझदार सोच के साथ सिनेमाहॉल से विदा करती फ़िल्म है।