Aug 15, 2010

सरकार अत्याचार करै, तो रखावै कौन


जिस जमीन पर फसलें उगाते हुए किसानों की पीढ़ियां गुजर चुकी हों,जिन खेतों में उगी फसलों का नाता इन परिवारों की समृद्धि से रहा हो, उन खेतों का मालिकाना हक, कागज की एक चिट्ठी छीन ले तो किसान क्या करें?

अजय प्रकाश की रिपोर्ट

उत्तर प्रदेश  के अलीगढ़ जिले के टप्पल थाना क्षेत्र के छह गांवों में जेपी ग्रुप के मॉल और मकान बनाने के लिए सरकार ने जो जमीन निर्धारित की है,वह किसानों की खेती योग्य जमीन है। मगर उत्तर प्रदेश सरकार जेपी ग्रुप  के मकान-दूकान बनाने को देश  का विकास ठहराने पर आमादा है और हर कीमत पर जमीन कब्जाने की प्रक्रिया शुरू कर चुकी है। 510 हेक्टेयर क्षेत्र में फैले इन सभी गांवों में पुलिस,प्रशासन और जेपी ग्रुप के लठैत भूमि अधिग्रहण की प्रक्रिया शुरू कर चुके हैं,जिसके खिलाफ किसान  भूख हड़ताल पर बैठ गए हैं और हर रोज जोरदार प्रदर्शन  कर रहे हैं.
पश्चिमी  उत्तर प्रदेश में सरकार और जनता के बीच पिछले कई वर्षों  से सबसे बड़ी टकराहट मुआवजे और कब्जे को लेकर ही है। सरकार के पास बहाना विकास का है और किसान ज्यादा से ज्यादा मुआवजा पाने के संघर्ष  पर उतारू है। ग्रामीण हुकुम सिंह कहते हैं,हम पर जुल्म होता है तो न्याय की उम्मीद में प्रशासन,प्रतिनिधि या अदालत में जाते हैं। मगर हम लोगों के सामने यही संकट है कि सरकार ही अत्याचार करै, तो रखावै कौन।’

सरकारी-निजी मिलीभगत  सेइन छह गांवों में खेती के जमीनों पर कब्जेदारी की कानूनी प्रक्रिया जेपी ग्रुप ने 2001 में ताज एक्सप्रेस-वे के बनने के दौरान ही पूरी कर ली थी। मगर यह जानकारी किसानों के बीच सरकार की ओर से पिछले वर्ष सार्वजनिक की गयी। गौरतलब है कि उस समय सरकार बसपा की ही थी और मौजूदा मुख्यमंत्री मायावती ही सत्ता पर काबिज थीं। सन् 2001 में किसानों ने बड़ी आसानी से ताज एक्सप्रेस वे के लिए जमीन दे दी कि इससे राज्य का विकास होगा। उस समय किसानों ने जमीन सवा तीन लाख रूपये बीघे के हिसाब से दी थी। लेकिन पिछले वर्श जब विकास प्राधिकरण ने किसानों को नोटिस भेजा कि अलीगढ़ जिले के छह गांवों टप्पल, उदयपुर, जहानगढ़, कृपालपुर, जीकरपुर और कंसेरा गांव के जमीन मालिक कोई नया निर्माण न करें, तो किसान हतप्रभ रह गये।

इसकी शुरुआअत उस समय हो गयी थी जब कॉमनवेल्थ खेलों के लिए दिल्ली से आगरा के बीच चौड़ी,सुंदर और चकमदार सड़क बनाने की योजना की मंजूरी ताज एक्सप्रेस-वे हाइवे प्राधिकरण को सरकार ने दी थी। जिसका नाम बाद में यमुना एक्सप्रेस-वे विकास प्राधिकरण हो गया। इसके लिए नोएडा,अलीगढ़ और आगरा के किसानों की जमीन का अधिग्रहण किया गया और ठेका देने के लिए कई कंपनियां आमंत्रित की गयीं।

जेपी ग्रुप ने सरकार से कहा कि वह नोएडा से आगरा तक अपने खर्चे से सड़क बना देगा। शर्त  बस इतनी है कि सरकार कंपनी को अच्छे बाजार की संभावना वाली जगहों पर प्रदेश  में पांच जगह करीब 50 हजार हेक्टेयर जमीन उसे दे, जिसका भुगतान कंपनी कर देगी। मगर कंपनी ने दूसरी शर्त  यह रखी कि सड़कों के बनने के बाद, तीस वर्षों तक टोल टैक्स जेपी ग्रुप वसूल करेगा। जनता की सरकार मायावती ने इसे जनहित में मानते हुए जेपी ग्रुप  की सारी शर्तें स्वीकार कर लीं।

गौरतलब है कि यह सारी जानकारी किसानों से छिपायी गयी। जहानगढ़ गाँव के हुकुम सिंह इसे एक साजिश मानते हैं। हुकुम सिंह ने बताया कि ‘जिलाधिकारी ने सरकारी कर्मचारियों पर दबाव डालकर,तबादले की धमकी देकर कुछ ग्रामीणों से जमीन कब्जा वाले कागजों पर तो दस्तखत करा लिया है, मगर ज्यादातर लोगों को सरकार की यह षर्त मंजूर नहीं है।’यानी प्रशासन घोषित  कब्जेदारी के तरीकों के मुकाबले अभी तक अघोषित  ढंग ही बात मनवाने में सफल रहा है। ऐसा सरकार इसलिए कर रही है कि 2001में नोएडा एक्सप्रेस वे के लिए जिस कीमत (सवा तीन लाख रूपया बीघा) पर अधिग्रहण हुआ था, नौ साल बाद भी किसान उसी दर को स्वीकार कर लें।


किसानों के आंदोलन में शामिल राजू शर्मा  बताते हैं कि ‘सरकार की शर्त हमें मंजूर नहीं थी। इसलिए इलाहाबाद उच्च न्यायालय का दरवाजा खटखटाया। किसानों ने अदालत के समक्ष अपनी मांगों को रखा। जैसे,किसानों की जमीन को सरकार साढे़ सैंतालीस सौ वर्गमीटर के हिसाब से बेच रही है तो उन्हें इन जमीनों का भुगतानबेची जारही कीमत से बीस प्रतिशत  कम करके अदा करे। दूसरी मांग यह है कि कुल जमीन का दस प्रतिषत हिस्सा विकसित कर सरकार किसानों को दे जिससे कि वे देश  के विकास में अपनी भागीदारी कर सकें। मिले हुए मुआवजे से गर किसान प्रदेश में कहीं जमीन खरीदता है तो उसे स्टांप शुल्क न देना पड़े और हर प्रभावित परिवार के सदस्य को रोजगार मिले।

इलाहाबाद उच्च न्यायालय में इन सभी मामलों के पक्ष-विपक्ष पर साल भर सुनवाई चली। किसानों को उम्मीद थी कि अदालत उनके पक्ष में फैसला देगी। मगर अदालत ने 2जुलाई को जो फैसला दिया, उससे बीस हजार आबादी वाले इन छह गांवों के लोग सकते में आ गये। राजू शर्मा बताते हैं कि ‘सरकार और जेपीग्रुप  की तरफ से पेश हो रहे वकीलों ने उच्च न्यायालय में जो बातें रखीं वे सभी हवाई साबित हुईं। जैसे किसानों की खेती योग्य जमीनों को जेपी के वकील ने बंजर बताया तो किसान उसे उपजाउ साबित करने में सफल हुए। इतना ही नहीं किसानों अदालत में धारा -5ए का हवाला देते हुए सरकार को कठघरे में खड़ा कर दिया कि ग्रामीणों की सहमति की सरकार ने कोई जरूरत ही नहीं समझी।

सारी सुनवाइयों के बाद उच्च न्यायालय के न्यायाधीश  सुनील अंबानी और धीरेंद्र सिंह ने तीन जिलों आगरा, नोएडा और अलीगढ़ में किसानों के विरोध के औसत के आधार पर टप्पल क्षेत्र के प्रभावितों का मुकदमा खारिज कर दिया। किसानों के वकील आषीश पांडेय ने बताया कि ‘एक ही प्रोजेक्ट के उपयोग के लिए कब्जाई गयी जमीन को आधार बनाकर अदालत ने कहा कि जब अस्सी फीसदी किसानों को कोई ऐतराज नहीं है तो बीस प्रतिशत  का क्या मतलब?’दरअसल जजों ने इन तीनों जिलों में जमीन अधिग्रहण के खिलाफ हो रहे विरोध और जमीन का औसत निकाला तो पाया कि टप्पल के किसानों की भागीदारी 20 प्रतिशत  है। इसी आधार पर दोनों जजों ने संयुक्त रूप से सुनवाई के दौरान मुकदमे को खारिज कर जेपी ग्रुप के पक्ष में फैसला दे दिया।


सरकार,प्रशासन औरअंत में अदालती आदेश से हताश ग्रामीणों ने जीरकपुर गांव में किसान सभा के बैनर भूख हड़ताल शुरू कर दी है। मगर पुलिस लोकतान्त्रिक  विरोध के इस तरीके को लगातार असफल करने में लगी हुई है। कब्जेदारी से प्रभावित होने वाले सभी गांवों में धारा 144लगा दी गयी है जिससे कि किसान इकट्ठे होकर आंदोलन को मजबूत न बना सकें। किसान सभा के धरने में सक्रिय भूमिका निभा रहे किशन  बघेल ने बताया कि ‘इन सभी गांवों के सर्वाधिक सक्रिय और जुझारू लोगों का पुलिस ने पहले से ही मुचलका कर रखा है ताकि संगठित आवाज उठाने वालों पर कानूनी कार्रवाई कर,कानून-व्यवस्था बनाये रखने के बहाने जेलों में डाला जा सके।’किसान सभा नेता कल्लू बघेल को पुलिस ने 29 जुलाई को देर रात में घर से उठाकर जेल में डाल दिया था।

सरकार और जेपी के मिलीभगत में फंसे ग्रामीणों ने फिर एक बार अदालत का दरवाजा खटखटाया है। सर्वोच्च न्यायालय के वकील रामनिवास ने किसानों की ओर से उच्च न्यायालय के फैसले के खिलाफ अर्जी डाली है। मगर अब प्रष्न यह है कि देष की आर्थिकी में बड़ी भूमिका निभाने वाले किसानों के खिलाफ सरकार मुकदमा लड़ रही है,पूंजी बटोरने में लगी कंपनियों के लिए सुविधा मुहैया कराना ही जिम्मेदारी मान चुकी है।


(द पब्लिक एजेंडा में छपी रिपोर्ट का संपादित अंश)

टिप्पणी- ग्रेटर नोएडा  से छह किलोमीटर दूर  अलीगढ  जिला  के खैर रेलवे स्टेशन की ओर पड़ने वाले इन गांवों  में  तीखा आन्दोलन चल रहा है. ग्रामीणों का कहना है कि मीडिया को पुलिस ओर जेपी कंपनी  के लोग जाने नहीं दे रहे हैं. जनपक्षधर पत्रकार और मीडिया संस्थान इस मसले को जानने के लिए इन नंबरों पर संपर्क कर सकते हैं.


सिनामाई पर्दे पर नया मुहावरा है 'पीपली लाइव'


फिल्म में मीडिया की भूमिका झपट्टा मारने पर उतारू बाज़ जैसी है जो 'आत्महत्या'की जाल में फंसने जा रहे किसान नत्था के पेशाब और टट्टी करने तक को सनसनीख़ेज़ 'ख़बर'बनाता है।

वर्धा से अनिल मिश्र

पीपली लाइव लोकजीवन के मार्मिक चरित्रों की विडंबना को व्यंग्य की सुतली डोर से बांधती है। यह वोट लूटने की ज़हरीली राजनीति,जानलेवा 'विकास'और सौदागर मीडिया के भ्रष्ट लेकिन मज़बूत गठजोड़ की सिनेमाई दास्तान है। नत्था, बुधिया, होरी और अम्मानुमा पात्र, अपने देश भारत (इंडिया नहीं)की फटी तक़दीर पर चस्पा ऐतिहासिक नज़ीर हैं कि कैसे एक देश की कई पीढ़ियां निराशा,अवसाद और अपने ही लोगों की गु़लामी के जूतों तले दबकर धीमी मौत की सांस गिन रही हैं। हमारे 'इंडिया' को इसका भान बस यूं है कि वह इन पात्रों की ज़िंदगियों को हरेक क्षण किसी मस्त बौराये हाथी की तरह पल-प्रतिपल कुचलता चला जा रहा है।


लोक की सहज जीवन-शैली के धागों से बुनी फ़िल्म छिछोरी राजनीति की गंदी हरकतों को उजागर करती है। इसमें मीडिया की भूमिका झपट्टा मारने पर उतारू बाज़ जैसी है जो 'आत्महत्या'की जाल में फंसने जा रहे किसान नत्था के पेशाब और टट्टी करने तक को सनसनीख़ेज़ 'ख़बर'बनाता है। फ़िल्म में,युगीन उपलब्धियों को जीने वाले नाट्यकर्मी हबीब तनवीर के अभिनय स्कूल का भरपूर असर दिखता है जो सिनेमाई पर्दे पर अभिनय का एक नया मुहावरा गढ़ता है। मसलन, फ़िल्म के खल पात्र जब कर्कश गालियां देते हैं तो वह तंज और नफ़रत का एक तल्ख़ इज़हार होता है लेकिन अम्मा द्वारा अपनी बहू या लड़के को दी जाने वाली गालियां दर्शकों को गुदगुदा जाती हैं।

नगीन तनवीर के गीत 'चोला माटी का....' गीत सुनहरी लोकधुन की उत्कृष्ट गायकी है। नगीन तनवीर की खनकती आवाज़ इसके जादुई असर को और महीन करती है। विभिन्न भाषाओं के लोकगीतों और धुनों पर नगीन की ग़ज़ब की, आल्हादित कर देने वाली पकड़ है। फ़िल्म में ताज़ादम ताज़गी के साथ ये गीत सूफ़ी संगीत की सी सादगी से तरंगित है। अन्य गीत 'देस मेरा रंगरेज़....'और 'मंहगाई डायन.....'आज के अंतर्द्वंद की नब्ज़ टटोलने में बेतरह कामयाब हुए हैं।

पीपली लाइव,कुलीनों द्वारा देश के हृदयस्थल पर एक के बाद एक की जा रही चोटों का हालिया हिसाबनामा है। यह नव-धनाढ्य चेतना को बेधती हुई,अर्थपूर्ण मनोरंजन की ज़रूरत से पगी फ़िल्म है। यह दर्शकों को एक ज्वलंत सवाल पर समझदार सोच के साथ सिनेमाहॉल से विदा करती फ़िल्म है।




Aug 14, 2010

पंद्रह हजार विधवा जलाएंगी 'पीपली लाइव' का पोस्टर

विदर्भ की पंद्रह हजार महिलाएं 15 अगस्त को नागपुर से 150 किलोमीटर दूर यवतमाल जिले में पीपली लाइव के पोस्टर जलाकर अपना विरोध प्रदर्शन करेंगी।



किसानों की आत्महत्या के लिए चर्चित  महाराष्ट्र के विदर्भ  क्षेत्र में  आमिर खान की पीपली लाइव के रिलीज होने के साथ ही पुरे  महाराष्ट्र में प्रतिबंध लगाने की मांग होने लगी है.विदर्भ जनांदोलन समिति ने  इस संबंध में महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री और आमिर खान को भी एक पत्र लिखा है। समिति का कहना है कि फिल्म में आत्महत्या का कारण   मुआवजे के लालच को बताया गया है,जबकि यह गलत है।

इस फिल्म के कारण क्षेत्र के अस्सी लाख किसान इससे काफी दुखी हैं। कोई भी किसान पैसों को लिए मौत का रास्ता नहीं चुनता है। किसाना सरकार की गलत नीतियों के कारण आत्महत्या कर रहा है लेकिन इस पूरी फिल्म में किसानों का मजाक बना दिया है। समिति ने कहा है कि सरकार अगर इस फिल्म पर प्रतिबंध नहीं लगाती है तो  किसानों का संगठन फिल्म के खिलाफ सेंसर बोर्ड और हाईकोर्ट जायेगा.

विदर्भ जनांदोलन समिति के अध्यक्ष किशोर तिवारी ने बातचीत में कहा कि इस फिल्म की वजह से आंदोलन देश-विदेश में बदनाम हो रहा है। महाराष्ट्र के विदर्भ क्षेत्र में पिछले एक दशक में दो लाख किसानों ने आत्महत्या की है। लेकिन 1.60लाख विधवाओं को आज तक अपने पति के मौत का मुआवजा नहीं मिला है।

संगठन की विज्ञप्ति विस्तार में-


Vidarbha Janandolan Samiti (VJAS) , farmers advocacy group in vidarbha ,the epicenter of Indian ‘Agrarian crisis’ which has claimed 2,00,000 farmers suicides in last decade and Maharashtra western region which is termed as dying field of cotton farmers where more than 40,000 farmers committed suicides has objected the basic theme and script of film Peepli Live produced by a mainstream filmmaker Aamir Khan and Directed by Anusha Rizvi that the ‘farmer is committing suicide for compensation’ , released yesterday and urged Maharashtra Govt. to ban it’s screening immediately as it is hurting sentiments of 8 millions of distressed and debt trapped farmers of Maharashtra who are being forced to commit suicide due to wrong policies of Indian Government .


Vidarbha Janandolan Samiti (VJAS) president Kishor Tiwari has written letter to Maharashtra Chief Minister Ashok Chavan urging him to ban the screening of movie and appoint agrarian experts to look in to objections of the farm activist as the massage of the film is taking farm suicide in to very damaging turn and diverting from the basic issues and reasons of agrarian crisis and further filming of the movie will create law and order problem in state ,tiwari added in the letter.

‘Initially TV serial ‘Bairi Piya’ has shown that debt trapped vidrabha farmers are selling daughters for clearing the debt now Peepli Live movie has shown Natha, a poor farmer from Peepli village in the heart of rural India is about to lose his plot of land due to an unpaid government loan has got a quick fix to the problem is the very same government’s program that aids the families of indebted farmers who have committed suicide and as a means of survival Farmer Natha can choose to die and futher shown that His brother is happy to push him towards this unique ‘honour’ of suicide but Natha is reluctant ,this is totally untrue too much twisted from the ground reality and insult of poor millions of dying farmers of vidarbha who are the victims of globalization and wrong policies of the state hence we are disturbed .

VJAS respect social commitment of Amir Khan and other part of movie exposing the reality behind media houses, politicians, bureaucrats and their apathetic approach towards problems and shocking truth that India promotes itself as one of the fastest growing economies in the world, but the film shows the miserable condition of farmers who continue to end their lives after living in extreme poverty but he should have consulted rural crisis expert before finalizing script that our objection ’Tiwari said

‘Peepli Live has made big question mark to 1,60,000 farm widows who are demanding compensation after their bread earner farmer committee suicide due to debt and crop failure as this movie shows that vidarbha cotton farmers are committing suicides for getting aid where as Govt. of Maharashtra has rejected more than 90% cases of farm suicides rejecting claim of dying family member of debt trapped farmer more Peepli Live will give strong support to politicians, bureaucrats and their apathetic approach towards problems that farmers are not forced to kill themselves where as they themselves killing for compensation hence we demand the ban of the film and cancellation censorship certificate to the film’ Tiwari urged.
 
 

Aug 13, 2010

एंडे चेची अफ्रीका


जी. एस. रोशन
                                                                                                                     
एंडे चेची अफ्रीका
तुम वो बच्ची हो जिसे उन्होंने
एक खेल का मैदान बनाने के लिए
मस्ती में चीखते-चिल्लाते और ठोकरों से उछाल-उछालकर
जिंदा दफ़ना दिया।


काफी हद तक वैसा ही सब चलता है यहां भी
यहां वे थूकते हैं हमारी जमीनों और संतानों पर
और चले जाते हैं आहिस्ता-आहिस्ता दूर, बेधड़क
और जब फसल पककर तैयार होती है
पौधों के पतले तने पुष्ट और मजबूत होते हैं
जब दानों में उतरता है दूध और मेहनतकश  आंखों में रोटी के सपने
वे आते हैं और ले जाते हैं अनाज
बेच देते हैं किसी बड़ी सी बेकरी के मालिक को
बिस्किट बनाने के लिए...

और हमारा क्या, मेरी बहन अफ्रीका,
बची-खुची झूरन-झारन के इंतजार में
हम दोनों के मुंह खुले ही रह जाते हैं।

एक मोटे ब्रश  से हमें एक ही झूठे रंग से पोत दिया जाता है
जैसे कि पूरा अफ्रीका एक जैसा हो, या पूरा भारत
जबकि हम दोनों के बीच एक जैसा सिर्फ खालीपन है
जो हमारे पेट से लेकर हमारे हाथों तक फैला है,
और हमारे खाली हाथों के आसपास खाली-खाली बजते वो पुराने गीत हैं
जो सबकुछ भरपूर होने के बारे में थे।

इसलिए मेरी बहन, अफ्रीका,
हम दोनों एक दूसरे के लिए गाते हैं शोकगीत
इस उम्मीद में कि हम मौत से भी जगायेंगे एक दिन, एक-दूसरे को।
हमारे खाली पेटों को बजाकर निकाली गयी सलामी की धुन
जो सुनायी दी पृथ्वी के किनारों तक तेज बजते नगाड़ों सी
उससे भी तेज धड़कते हुए हम चलेंगे
अपने जिंदा लोगों की जीने की अदम्य इच्छा के साथ।

तुम दाल लेकर आना एंडे चेची अफ्रीका
मैं भात लेकर आऊंगा
हम सूरज की रोशनी से दूर भगायेंगे अंधेरे को
हम मेडागास्कर में खोलेंगे अपने टिफिन तोड़ेंगे अपने खाने के निवाले
तुम फिर से सिखाना मुझे अपने पैरों पर ठीक से चलना
और मैं तुम्हें सुनाऊंगा कहानियां अपने सफर के बारे में
हम करेंगे छपछप समंदरों के पानी में... बिना डरे।

उनकी मत सुनना एंडे चेची अफ्रीका
जो हमारा नाम लेकर, हमारे भाई बनकर तुम्हारे पास पहुंचे हैं
जो अपने मुनाफाखोर वादों को जिस धागे में पिरोकर लाते हैं
उसे वो तुम्हें ही बेच देते हैं अपने बालों का जूड़ा बांधने के लिए।

अगर तुम मां से पूछोगी तो वो तुम्हें बतायेंगी चेची
कि तुम्हारी जमीन पर दौड़ रहे इनके पीतल के रथ के पहिये
उन इंसानों की जिंदगी से सने हैं
जो यहां हिंदुस्तान के बीचोंबीच से लेकर हर कोने तक
खेतों, जंगलों, खदानों और कारखानों में फैले हैं
और जिनका नाम कभी उड़ीसा है, कभी दंतेवाड़ा, या
    अफ्रीका, अफ्रीका, अफ्रीका...


  • मलयालम में एंडे चेची का अर्थ होता है-मेरी बहन


अंग्रेजी से अनुवाद-विनीत तिवारी

(रोशन मलयालम और अंग्रेजी में कविता लिखते हैं. अफ्रीका सहित कई महाद्वीपों में रह चुके हैं. इन दिनों इंदौर में रिसर्चर हैं. )
दैनिक भास्कर से साभार

उसूलों की वजह से भगत सिंह को नहीं बचा सके गाँधी


करीब 87साल के कुलदीप नैयर महाभारत के संजय की तरह हैं। पिछले छह दशकों से इस भारतीय प्रायद्वीप में घटी सभी बड़ी घटनाओं को उन्होने अपनी निगाहों से देखा है,महसूस किया है। भारत-पाकिस्तान और बंग्लादेश के आसमान में कुलदीप की निगाहें हमेंशा चौकन्नी रहती हैं। देश विभाजन, पाकिस्तन से युद्ध, गांधी की हत्या, इंदिरा का आपातकाल, बंग्लादेश का निर्माण, पंजाब में आतंकवाद,इंदिरा -राजीव गांधी की हत्या,बाबरी मस्जिद का विध्वंस हर एक घटना के गवाह हैं कुलदीप नैयर। देश-विदेश करीब 80पत्र-पत्रिकाओं ने उनके लेख-रिपोर्ट छपते हैं। स्टेटस्मैनऔर द इंडियन एक्सप्रेस जैसे अखबार से लंबे समय तक जुड़े रहे।

 कुलदीप नैयर से विश्वदीपक की बातचीत


सबसे पहले शुरुआत आपके जन्म से। आपका जन्म 14अगस्त को हुआ था। बड़ा दिलचस्प इत्तफाक है। आप उस दिन पैदा हुए जब पाकिस्तान बना। पैदा हुए पाकिस्तान में और आपका देश हिंदुस्तान?

हां,क्या कहें इसे। अब इत्तफाक है तो है। मैं 14अगस्त 1923 को सियालकोट में पैदा हुआ। और इसी दिन पाकिस्तान भी बना। लेकिन एक बात ये है कि पहले मैं पैदा हुआ उसके बाद पाकिस्तान पैदा हुआ।

आपके लेखन को प्रो पाकिस्तानी माना जाता है?

मैं प्रो पाकिस्तान नहीं हूं लेकिन एंटी पाकिस्तान भी नहीं हूं। मैं चाहता हूं कि दोनों देश के बीच मित्रता हो। अमन चैन कायम हो। और लोगों में संबंध बढ़ें। ताल्लुकात बेहतर हों। लोगों के स्तर पर भी और सरकार के स्तर पर भी। हिंदुस्तान और पाकिस्तान दोनों के प्लूरलिज्म कायम रहें।

ये सच है कि पाकिस्तान का जन्म धर्म के आधार पर हुआ था लेकिन 13 अगस्त को ही जिन्ना ने साफ साफ कह दिया था कि या तो आप हिंदुस्तानी हैं या पाकिस्तानी। हर आदमी अपने अपने हिसाब के मंदिर मस्जिद गुरुद्वारा जा सकता है। पाकिस्तान के जन्म से एक दिन पहले ही जिन्ना ने राजनीति और धर्म को अलग कर दिया था।

जिन्ना हमारे देश में विलेन तौर पर याद किए जाते हैं। देश के विभाजन के लिए जिम्मेदार खलनायक के तौर पर हिंदुस्तान की मानसिकात में उनकी छवि है। आपकी जिन्ना से मुलाकात हुई थी?

जिन्ना मैटर ऑफ फैक्ट के आदमी थे। वो कोई दूसरे नेताओं की तरह आदर्श नहीं बघारते थे। और न ही कोई भाषण देते थे। उनको जो करना था वो करते थे। मुझे याद है जिस कॉलेज में मैं पढ़ता था जिन्ना उसमें एक बार भाषण देने आए थे। जिन्ना ने वो छोटा वाला चश्मा (मोनो लॉग) पहन रखा और हरे रंग का सूट पहना था। लेकिन वहां सुनने वालों की कमी थी। तो मेरा एक दोस्त हबीब जो कश्मीरी था और मुस्लिम लीग का सदस्य था। उस समय तक ऐसा हो चुका था कि हिंदू कॉग्रेसी होने लगे थे और मुसलमान मुस्लिम लीक के साथ थे। उसने हम सबको जिन्ना का भाषण सुनने के लिए बुलाया था। लेकिन अच्छा होता कि जिन्ना भारत से अलग न होते। उस इलाके में (पाकिस्तान का वर्तमान पंजाब) में जिन्ना का असर नहीं था। उनका ज्यादा असर यूपी बिहार और बंगाल में था। अब इस इलाके को मिलाकर पाकिस्तान तो बनाया नहीं जा सकता लिहाजा पश्चिमी हिस्से को मिलाकर ही पाकिस्तान बना।

कायदे आजम जिन्ना का जो स्थान पाकिस्तान में है वही स्थान भारत में महात्मा गांधी का है। महात्मां गांधी को आपने पहली बार कब और कहां देखा। और अब जबकि पूरी दूनिया को अहिंसा को सबसे ज्यादा जरूरत हैं कैसे याद करते हैं गांधी को?

देखो,गांधी जी से मेरी सीधी मुलाकात कभी नहीं हुई। मैंने गांधी जी को बिड़ला हाउस के लॉन में देखा था। मैं जब विभाजन के बाद जब पाकिस्तान से आया तो दरियागंज में अपनी मौसी के यहां रुका। 13 सितंबर को मैं पाकिस्तान से चला था और 15 या 16 को मै दिल्ली पहुंचा। और सीधे भागकर गांधी को देखने के लिए बिड़ला हाउस पहुंचा। उस वक्त गांधी जी लॉन में टहल रहे थे। और उनके साथ वही दो लड़कियां (उनका इशारा आभा और –की ओर था) थी। मैंने उनको गेट के बाहर से ही प्रणाम किया था। हां, जब उनकी हत्या हुई थी तब मैंने उसको रिपोर्टर के तौर पर जरूर कवर किया था।

आजादी के बाद राष्ट्रभाषा को लेकर काफी विवाद हुआ था। कहते हैं कि पंडित नेहरू अंग्रेजी को ‘सबिसिजडियरी’ भाषा लिख देने से नाराज हो गए थे। और फिर इस मसले में आपको भी सफाई देनी पड़ी थी?

देखो, बात उस समय की जब मैं गृहमंत्री पंडित गोविंद बलल्भ पंत के साथ काम कर रहा था। नेहरू प्रधानमंत्री थे। नेहरू संसदीय समिति की उस रिपोर्ट से नराज थे जिसमें पंत जी ने अंग्रेजी के आगे सबसिडियरी लिख दिया था। पंत जी ही उस संसदीय समिति के अध्यक्ष थे। तब पंत ने मुझसे कहा कि आप दिल्ली की हर लाइब्रेरी की खाक छान मारिए। और जितनी भी डिक्शनरी मिले देखिए। मैंने कई डिक्शनरी देखी और फिर पंत जी बताया कि सबसिडियरी औऱ एडिशनल करीब-करीब एक ही अर्ध में प्रयुक्त किए जाते हैं।

ऐसा नहीं था कि नेहरू के मन में हिंदी को लेकर हिकारत का भाव था लेकिन वो चाहते थे कि जो नॉन हिंदी के लोग हैं उन्हे भी हिंदी आनी चाहिए। और फिर,उत्तर पूर्व,दक्षिण के लोग तो बिल्कुल भी हिंदी नहीं जानते थे इसीलिए वो मानते थे कि आजादी के बाद ही कहीं भाषा के मसले पर विरोध न होने लगे। इसीलिए वो चाहते थे कि हिंदी को तब तक न लाग किया जाय जब तक नॉन हिंदी भाषी लोग इसे स्वीकार नहीं कर लेते।

नेहरू को एक राजनेता और राष्ट्रनिर्माता के रूप में कैसे याद करते हैं?आधुनिक भारत के निर्माण के लिए उनका क्या सोच था, क्या रोडमैप था?

नेहरू से मेरी 2-3दफा की मुलाकाते हैं। नेहरू की सोच आधुनिक थी। अंग्रेजी के मामले में उनकी यही सोच काम करती थी। उनका मानना था कि अंग्रेजी वर्ल्ड लैंग्वेज है। पर सियालकोट में मैंने पहली बार नेहरू को देखा था। मेरे ख्याल से 1939के आसपास की बात है। चुनाव प्रचार पर आए थे। नेहरू का ड्रेस तो वही था जो वो पहनते थे लेकिन उस दिन नेहरू ने उस दिन गुलाब नहीं लगा रखा था। मुझे याद है। उनके साथ शाह शेख अबदुल्ला भी थे।

आपने माउंटबेट को कवर किया है। लेडी माउंटबेटन से भी आप मिले थे। नेहरू और लेडी माउंटबेटन के बीच अफेयर की चर्चा आज तक होती है। कैसा प्यार था ये प्लूटोनिक या कुछ और।

देखो, मैंने बहुत कोशिश की इस बारे में तथ्य जुटाने की। तुम्हे क्या लगता है कि एक पत्रकार के रूप में मैं इस बड़े स्कूप को छोड़ता कभी। ने पूरी कोशिश की मेहनत की लेकिन कामयाब नहीं हो पाया। यहां तक कि मैंने सोनिया गांधी से भी नेहरू की पत्रावली देखने की इजाजत मांगी लेकिन उन्होने इंकार कर दिया। नेहरू के पत्र वगैरह तो अभी इन लोगों के पास हैं। दोनों के बीच प्यार रहा होगा। लेकिन बहुत व्यक्तिगत था वो। सार्वजनिक जीवन में कभी भी इसका प्रदर्शन नहीं हुआ।

कॉलेज के जमाने में आप जिन्ना से मिले। गांधी को भी देखा और नेहरू के साथ काम किया लेकिन जब किताब लिखने की बारी आई तो आपने भगत सिंह को चुना क्यों ? क्या आप उनसे प्रभावित हैं?

हां, मैं भगत सिंह से प्रभावित हूं। वो 23 साल की उम्र में मर गया देश के लिए शहीद हो गया। उसके विचार कम उम्र होने के बाद भी जबर्दस्त क्रांतिकारी थे। लेकिन किताब लिखने का विचार 80 के दशक में लाहौर में आया। मैं वहां गया हुआ था एक पंजाबी सम्मेलन में। वहां मैंने देखा कि पूरे हॉल में सिर्प और सिर्फ एक तस्वीर है। वो है भगत सिंह की। मैंने आयोजकों से पूछा कि यहां तुम लोगों ने भगत सिंह की तस्वीर क्यों लगा रखी है। यहां तो इकबाल की तस्वीर होनी चाहिए जिन्होने पाकिस्तान का स्वप्न देखा था। उन लोगों ने कहा कि सिर्फ एक ही पंजाबी ने देश के लिए कुर्बानी दी है और वो है भगत सिंह। तभी मैंने तय कर लिया कि भगत सिंह और उनके दर्शन को देश के सामने सपष्ट करना है। वैसे तो उनके बारे में लगभग हर बात लिखी जा चुकी है लेकिन एक क्रांतिकारी और एक आतंकवादी के बीच के फर्क को ऐतिहासिक खोजबीन और तथ्यों के जरिए स्पष्ट करना जरूरी था।

भगत सिंह की क्या प्रासंगिकता है आज के जमाने में। खासतौर से तब जब गांधी के बरक्स उनकी तुलना की जाती है। कहा जाता है कि गांधी भगत कि बढ़ती लोकप्रियता से परेशान थे। वो चाहते तो इरविन के साथ समझौते के दौरान भगत को बचा सकते थे?

भगत सिंह की प्रासंगिकता पहले भी थी। और आज भी है। बल्कि मैं तो ऐसे कहता हूं कि ज्यों-ज्यों वक्त गुजरेगा भगत की प्रासंगिकता बढ़ती जाएगी। वो जवान था और हीरो था। युवा वर्ग हमेशा भगत के विचारों के प्रभावित होगा। गांधी की भी प्रासंगिकत बढ़ेगी लेकिन दोनों के बीच अंतर तरीकों का है और वो रहेगा। भगत सिंह बंदूक (हिंसा का रास्ता) छोड़ने के लिए तैयार नहीं थे और गांधी को ये मंजूर नहीं था। गांधी को हिंसा कतई मंजूर नहीं थी। उन्होने इरविन से कहा भी था कि इसको छोड़ दीजिए। लेकिन न तो भगत अपना रास्ता छोड़ने के लिए तैयार थे और न ही अंग्रेज भगत को छोड़ना चाहते थे। गांधी जी ने भगत की लोकप्रियता से डरकर नहीं बल्कि अपने उसूलों की वजह से नहीं बचा पाए। अब कॉग्रेस का कराची सम्मेलन ही ले लीजिए। पहले गांधी की बात नहीं सुनी गई लेकिन आखिर में गांधी की ही बात माननी पड़ी।

एक गांधी और थी इंदिरा गांधी। जिन्होने देश पर आपातकाल लगाया था। आपको भी जेल में बंद कर दिया था। इंदिरा को कैसे आंकते हैं आप?

इंदिरा के साथ हमारे संबंध तो दोस्ती के थे। एक दफा वो बाल कटा के आई तो उसने मुझसे पूछा कि देखो मैं कैसी लग रही हूं। लेकिन जब उसने आपातकाल लगाया था तब उसने मुझे भी बंद कर दिया। तिहाड़ जेल में बंद था मैं। हालांकि उसने तब के दिल्ली कमिश्नर को मेरे पास हाल चाल लेने के लिए पूछा था। लेकिन मुझे मेरे गिरफ्तारी की वजह पता नहीं चल पा रही थी। बात में पता चला कि इंदिरा मेरे लिखने से नाराज थी। मैंने उसको एक चिट्ठी लिखी थी और कहा था कि तुम्हारे पिता कहा करते थे कि मुझे गैर जिम्मेदार (irresponsible press ) प्रेस मंजूर है लेकिन प्रेस पर पांबदी कतई मंजूर नहीं। और तुमने तो प्रेस को ही बैन कर दिया। इंदिरा ने कहा कि प्रेस वाले अनाप शनाप लिखने लगे हैं। और गैर जिम्मेदार चीजें छप रही हैं।

अच्छा,इंदिरा के पति फिरोज को भी देखा होगा आपने। गांधी परिवार की लिगेसी में वो कहीं फिट नहीं बैठते। कहीं भुला दिए गए हैं वो। क्या उनको जानबूझकर दरकिनार किया गया?

गांधी परिवार की लिगेसी में फिट बैठने का कोई कारण नहीं लेकिन यही गांधी परिवार के ही लोग हैं जो उनको फिट नहीं होने देते। जानबूझकर। वैसे वो बहुत जबर्दस्त आदमी थे। संसद में फिरोज के नाम का हॉरर (खौफ ) रहता था। वो जोरदार वक्ता थे। उस जमाने के घोटालों का पर्दाफाश उन्होने ही किया था। उद्योगपतियों में फिरोज के नाम का खौफ रहता था। संचार घोटाले को फिरोज ही सामने लाए थे।

एक और गांधी हैं राहुल गांधी –जिसे देश के भविष्य के रूप में पेश किया जा रहा है। आपने गुलामी के दौर की फिर आजादी और उसके बाद करीब 60साल से देश की राजनीति को देखा है। आपको राहुल के अंदर कोई जीनियस नजर आता है। या लगता है कि उनके अंदर वो उर्जा है?

अब क्या कहें यहां के लोग पागल हैं। राहुल के अंदर कोई जीनियस नहीं है। लेकिन हमारे देश में वंश की राजनीति चलती है तो चलती है। ये वंशवादी राजनीति का ही असर है। जैसे इंदिरा से मिला राजीव को उसी तरह से राजीव से मिला राहुल को। वैसे राहुल के मुकाबले उसकी बहन प्रियंका ज्याद मैच्योर है। ज्यादा समझदार है।

पत्रकारिता का आपका बड़ा लंबा कैरियर है। क्या अनुभव हैं आपके पत्रकारिता के बारे में। पिछले कई सालों में तेजी से बदलाव हुए हैं। आपने शुरुआत तो उर्दू रिपोर्टर के तौर पर की थी?

हां,सच बात है मैंने अपना कैरियर उर्दू रिपोर्टर के तौर पर शुरु किया था। जब मैं पाकिस्तान से भारत आ गया थां। चांदनी चौक में रह रहा था। मेरे आहाते में ही एक आदमी दिन भर खांसता रहता था। बड़ा डिस्टर्ब होता था। मैंने पूछा लोगों से कि भई कौन है ये। पता चला कि वो मौलाना मोहना साहब थे। मैं उनके पास गया। उन्होने मुझसे पूछा कि क्या करते हो मैंने कहा कि उर्दू रिपोर्टर हूं। तब मैं ‘वहादत’के लिए लिखा करता था। धीरे धीरे उनसे दोस्ती हो गई। उन्होने मुझे दो सलाह दी थी। पहला ये कि शेर ओ शायरी करना छोड़ दो दूसरा उर्दू में नहीं अंग्रेजी में लिखना शुरु करो-देश में उर्दू का कोई भविष्य नहीं।

हिंदी पत्रकारिता के बारे में क्या ख्याल है आपका। पिछले कुछ सालों में तो पैसा लेकर खबरें छापने की बातें सामने आई हैं। जब तक जिंदा थे प्रभाष जोशी इस मामले में लिख रहे थे और इसको जोर शोर से उठा रहे थे?

देखिए हिंसी की सबसे बड़ी समस्या ये है कि हिंदी का संपादक पढ़ता ही नहीं। कुछ लोगों को छोड़कर। अपवाद हर जगह होते हैं। अब आज हिंदी पत्रकारिता में कोई खबर के लिए नहीं होती। अब तो वही है जो पिया मन भाए। यानि मालिकों को जो पसंद हो वही छपेगा। बात ऐसी भी नहीं है कि केवल हिंदी पत्रकारिता का स्तर गिरा है।स्तर अंग्रेजी पत्रकारिता का भी गिरा है। लेकिन फिर भी यहां स्थिति थोड़ी बेहतर है।

आप राज्यसभा सांसद भी रहे हैं। क्या अनुभव हैं आपके संसदीय राजनीति के। क्या आपको लगता है कि हमारे देश की संसद जनता की आकांक्षाओं इच्छाओं का प्रतिनिधित्व करती है। बहुत से संगठन तो संसदीय राजनीति को खारिज करते हैं?

अब देखिए संसदीय राजनीति की अपनी समस्याएं हैं। लेकिन तरीका तो यही है। इसकी रफ्तार थोड़ी धीमी है। काम करने का उतना प्रभावी नहीं हैं। लेकिन पिछले 50-60 साल से हम वोट कर रहे हैं। एक प्रैक्टिस (अभ्यास)हो गई है। राजनीति अभ्यास का भी मामला है। सही है लोग इससे नाराज है। और इसे खारिज भी करते हैं लेकिन ये अच्छा ही है। जितनी तरह की बाते होंगी जितनी तरह की आवाजें होगी उतना ही अच्छा है देश के लिए। देश की जो विविधता है वो यही है।

अब जबकि भारत और पाकिस्तान दोनों अपनी आजादी की सालगिरह मना रहे हैं। 64वीं सालगिरह। पाकिस्तान के शायर फैज अहमद फैज याद आते हैं। उन्होने भारत की आजादी को दाग दाग उजाला करार दिया था। आपकी उनसे दोस्ती?

हां, फैज से हमारी अच्छी दोस्ती थी। लाहौर में दोस्तों के घर पर हमारी महफिलें जमती थीं। वो दारू पीता और था और बैठते ही बोलत निकाल लेता था। लेकिन वो टू नेशन थियरी को नहीं मानता था। वो बॉर्डर को भी नहीं मानता था। वो आजादी को मानता था लेकिन इसे अधूरा करार देता था।

(यह साक्षात्कार अहा ज़िन्दगी में प्रकाशित हो चुका है)


Aug 11, 2010

चिदंबरम की इजाजत के बगैर आजाद की हत्या नहीं !



माओवादी पार्टी के राष्ट्रीय  प्रवक्ता रहे आजाद की हत्या को लेकर कल भी संसद में सवालों का क्रम जारी रहा। वित्तमंत्री से गृहमंत्री बने पी चिदंबरम ने संसद में भाजपा नेता यशवंत सिन्हा के सवाल पर कहा कि ‘मामला प्रदेश सरकार के अधिकार क्षेत्र का है,केंद्र कैसे जांच के आदेश  दे सकता है।’आजाद की हत्या के बाद देश में जारी गहमा-गहमी के मद्देनजर देखें तो इस मामले में तीन पक्ष उभरकर सामने आते हैं। पहला माओवादियों का,दूसरा सरकार का और तीसरा इन दोनों की कड़ी बने स्वामी अग्निवेश का। माओवादी कहते हैं-आजाद की हत्या सरकार ने की है,सरकार कहती है-उसने मुठभेड़ में मारा है और अग्निवेश  साफ संदेह व्यक्त करते हैं कि जिस दिन वे माओवादियों की ओर से 72 घंटे के युद्धविराम की तारीख घोषित  करने वाले थे, उससे पहले ही खुफिया एजेंसियों ने आजाद को ट्रैप कर लिया था और सरकार ने हत्या का मन।

सामाजिक कार्यकर्ता स्वामी अग्निवेश से अजय प्रकाश  की बातचीत


माओवादी प्रवक्ता आजाद और स्वतंत्र पत्रकार हेमचद्र पांडे की हत्या के बाद जब आप केंद्रीय गृहमंत्री पी.चिदंबरम से मिले तो शांतिवार्ता की क्या संभावना जान पड़ी?

कोई संभावना नहीं दिखी और निराषा हुई। मैंने उनसे पूछा कि माओवादियों की तरफ से शांतिवार्ता की अगुवाई कर रहे आजाद की हत्या क्यों की गयी तो,चिदंबरम साहब ने कहा कि यह सवाल आंध्र पुलिस से पूछिये। मामला राज्य सरकार का है इसलिए इस बारे में मैं कोई जवाब नहीं दे सकता। उनके व्यवहार से ऐसा लगा कि वे शांतिवार्ता  के लिए अब इच्छुक नहीं हैं।

आपको लगता है कि आजाद की हत्या केंद्रीय गृहमंत्री की इजाजत के बगैर पुलिस कर सकती है?

मुझे भी संदेह है। क्योंकि जब चिदंबरम ने कहा उस वक्त भी और अभी भी मुझे विश्वास  नहीं है कि बगैर उनकी इजाजत के आजाद की हत्या पुलिस ने की होगी।

आजाद पर इनाम था इसलिए सरकार ने मार डाला, पत्रकार हेमचंद्र की हत्या क्यों की गयी?

इसी सवाल पर चिदंबरम ने मुझे माओवादियों के उत्तरी क्षेत्र के नेता अजय का बयान दिखाया जिसमें लिखा था कि हेमचंद उनकी पार्टी का सदस्य था। मगर मैंने हेमचंद्र को लेकर गुड्सा उसेंडी के बयान की चर्चा की तो वह चुप हो गये। मुझे ऐसा लगता है कि हेमचंद्र की हत्या उस अपराध के अकेले चश्मदीद  होने की वजह से कर दी गयी ताकि कोई सबूत शेष  न रह जाये।

गृहमंत्री ने जांच के बारे में कोई आश्वासन  दिया?

जांच की मांग को स्पष्ट  रूप से इनकार कर गये। यह बताने में लगे रहे कि माओवादियों ने पिछले एक साल में मुखबीर होने के शक में 142 हत्याएं कीं, आपलोग इनकी जांच की मांग क्यों नहीं करते। मैंने कहा कि आप सरकार हैं, इसकी जांच कीजिए। हम तो हमेषा ही हिंसा के विरोधी रहे हैं। लेकिन इस बहाने आजाद और हेमचंद्र की हत्या की जांच की बात टरकाते रहे। अंत में उन्होंने कह दिया कि यह मेरे अधिकार क्षेत्र में नहीं आता,आंध्र प्रदेश की गृहमंत्री से मिलिये।

हेमचंद्र को आप किस आधार पर पत्रकार मानते हैं?

जैसे ही मुझे सूचना मिली की आंध्र प्रदेश के जंगलों में पुलिस की हत्या का शिकार एक उत्तराखंड का पत्रकार भी हुआ है तो मैंने तत्काल इसकी तस्दीक उत्तराखंड के जानेमाने सामाजिक कार्यकर्ता शाशेर सिंह बिष्ट से की। उन्होंने कहा कि ‘मैं उसे और उसकी पत्नी बबीता दोनों को व्यक्तिगत रूप से जानता हूं और वह पत्रकार था।’इसी आधार पर मैंने चिदंबरम साहब से कहा कि पत्रकार हेमचंद्र माओवादी नहीं था।

माओवादियों और सरकार से वार्ता को लेकर कुछ बातें साझा करने के लिए 18जून को आपने प्रेस कांफ्रेंस रखी थी जिसे ऐन मौके पर टाल दिया गया?

हम माओवादियों से मिले पत्र के आधार पर 10,15और 20जुलाई को यानी इन तीन तारीखों में से किसी एक तारीख को 72घंटे के युद्धविराम के लिए घोशित करने वाले थे। उन्होंने मुझे इतनी छूट दी थी कि इन तीन में से जो भी तारीख मैं घोशित करूंगा,पार्टी उसे स्वीकार कर लेगी। मगर उसकी पूर्व शर्त थी कि सरकार भी कुछ कदम आगे बढ़े, जिसका बहुत साफ आश्वासन  चिदंबरम साहब ने दिया था। मगर बाद में हमें लगा कि माओवादी वार्ता के लिए इच्छुक हैं, पर सरकार कुछ चाहती ही नहीं है। ऐसे में मेरे लिए संकट हो गया कि मैं उस दिन प्रेस कांफ्रेंस में क्या कहूंगा और मुझे ऑस्ट्रेलिया जाना पड़ा।

क्या आपको लगता है कि सरकार आजाद को पकड़ने की पहले ही तैयारी कर चुकी थी और इसके लिए सरकार ने आपका उपयोग किया है?

इसका कोई प्रमाण तो नहीं है,लेकिन मुझे लगता है कि खुफिया एजेंसियां कांफ्रेंस की तारीख तक आजाद को ट्रैप कर चुकी थीं। इस संदेह का सबसे पुख्ता कारण उस कांफ्रेंस का टलना है जिसमें सरकार को भी वार्ता के लिए समान दिलचस्पी दिखानी थी। पहले इसकी भनक होती तो मैं यह गलती कभी नहीं करता। सरकार ने उपयोग तो किया ही, मुझे यह भी लगता है कि तैयारी भी कम थी। अब जबकि दोबारा मैं चिदंबरम से मिलकर आ चुका हूं, कह सकता हूं कि सरकार इस समस्या को सुलझाने के प्रति गंभीर नहीं है। वह उलझाये रखने में अपनी सफलता देख रही है।

इस सिलसिले में आपका अगला कदम क्या है?

हमें लग रहा है कि देश को सरकार के भरोसे छोड़ने के नागरिक शक्ति  जगानी चाहिए। यह नागरिक शक्ति  ही शासकों  को मुल्क की जरूरत बतायेगी। इसकी शुरूआत हमलोग क्रांति दिवस के मौके पर कलकत्ता से 9अगस्त पदयात्रा से कर रहे हैं। इसमें देषभर के गांधीवादी और शांति चाहने वाले लोग शामिल होंगे और लालगढ़ पहुंचकर 15 अगस्त को तिरंगा फहरायेंगे। यहां पिछले 2 वर्षों  से धारा 144 लगी हुई है। यह एक राश्ट्रीय स्तर का आंदोलन होगा जिसे इस विश्वास से खड़ा किया जायेगा कि सरकार की शर्तों पर नागरिक समाज नहीं,बल्कि समाज की जरूरतों से सरकार चलेगी।

(द पब्लिक एजेंडा में छपे साक्षात्कार  का संपादित अंश)  


शारीरिक परिवर्तन, सामाजिक विद्वेष


उन अपवित्र हाथों के छूने से अचार खराब हो जाता है।  फूल वाले पौधों और तुलसी को महिलाएं पानी नहीं देतीं और न ही उनके पास बैठती हैं। मुझे याद है कि तुलसी का गमला रास्ते से हटाकर ऐसी जगह रख लिया जाता था, जहां अपवित्र महिलाओं की परछाईं  न पड़े। माहवारी और बच्चा जनने के दौरान पंजाब-हरियाणा की महिलाओं को किन स्थितिओं से गुजरना होता है,बता रही हैं युवा  पत्रकार...

मनीषा भल्ला

मासिक धर्म जवान हो रही किसी भी लड़की के जीवन की ऐसी घटना है जिसके बाद फिर वह सभी की 'लाडली' नहीं रह जाती। मां का ही अपनी बेटी के प्रति नजरिया बदल जाता है। मां को लगता है कि आज के बाद से बेटी के प्रति समाज की नजरें बदल जाएंगी।

 मां अपनी बेटी को तरह-तरह की हिदायतें देने लगती है। उठने- बैठने के तरीके सिखाने लगती है। कई घरों में मांओं को दूसरे रिश्तेदारों से फुसफुसाते देखा जाता है। मां अचानक चिंतित हो जाती है। वह इसे शारीरिक परिवर्तन कम सामाजिक परिवर्तन ज्यादा मानती है। अबोध बच्ची को लगता है कि पता नहीं उसके साथ क्या हो गया है और अब न जाने क्या हो जाएगा। यहां तक कि मैंने मांओं को रोते देखा है कि बेटी अब जवान हो गई है।


 पंजाब और हरियाणा में घूमते दस साल बीत गए। बचपन में गांव (पंजाब में) काफी आना-जाना रहता था। इसलिए उस परिवेश का अहसास है। पंजाब और हरियाणा दोनों खेती के लिहाज से देश के विकसित राज्य हैं। प्रतिव्यक्ति आय, तकनीक, रुपया और डॉलर दोनों बरसते हैं यहां। गुड़गांव जैसे जिलों में आसमान छूती इमारतें विकास की इबारत लिख रही हैं, मगर यह अधूरा सच है। इन्हीं राज्यों के बाशिंदों को बेटियों का पैदा होना मंजूर नहीं। कन्या भ्रूणहत्या में सबसे आगे हैं ये दोनों राज्य। यानी महिलाओं के मामले में इस समाज के एक तबके की सोच अभी भी पुरानी और दकियानूसी है।

सामाजिक दृष्टिकोण से देखें तो इन राज्यों के ज्यादातर घरों में मासिक धर्म के दौरान महिलाओं को अलग-थलग कर दिया जाता है। हरियाणा में इस दौरान महिलाएं घर, खेत और पशुओं का काम तो करती हैं, लेकिन कुछ कामों से उन्हें वंचित कर किया जाता है। हरियाणा और पंजाब दोनों राज्यों में महिलाएं मासिक धर्म के दौरान अचार को हाथ नहीं लगातीं,क्योंकि उस समयावधि में उन्हें पवित्र नहीं समझा जाता है और माना जाता है कि अपवित्र हाथों के छूने से अचार खराब हो जाता है। तब फूल वाले पौधों और तुलसी को महिलाएं पानी नहीं देतीं और न ही उनके पास बैठती हैं। मान्यता है कि ऐसा करने से फूल मुरझा जाते हैं। मुझे याद है कि हमारी एक रिश्तेदार तुलसी का गमला रास्ते से हटाकर ऐसी जगह रख लेती थी जहां माहवारी के दौरान लड़कियों और महिलाओं की उस पर परछाईं भी न पड़े।

इन महिलाओं का पूजा-पाठ या किसी भी शुभ माने जाने वाले काम में शरीक होने का तो सवाल ही पैदा नहीं होता। शादी के दौरान शगुन की रस्मों में वो शरीक तो होती हैं, लेकिन उनकी कोई भूमिका नहीं होती। मसलन, वह दूल्हे या दुल्हन को हल्दी नहीं लगा सकती, प्रसाद नहीं बना सकती। किसी ऐसी चीज को हाथ नहीं लगा सकती जो पूजा की हो। शादी के सामान को हाथ नहीं लगा सकती।


 मासिक धर्म के दौरान महिला किसी नवजात बच्चे को तक गोद में नहीं ले सकती। मुझे याद है कि जब मेरी बहन की बेटी हुई थी तो उसे देखने के लिए घर में जो भी महिला रिश्तेदार आती थी,मेरी नानी उससे बाकायदा पूछती थीं 'तुम ठीक हो न...'। नानी कहती हैं कि नवजात को ऐसी औरत गोद लेती है तो बच्चे पर भूत-प्रेत का साया आ जाता है।

परिवार के लिए मासिक धर्म न हुआ,हौवा हो गया। मां ही बेटी से इस बारे में बात नहीं करती तो पिता या भाई का तो सवाल ही पैदा नहीं होता। खासकर ग्रामीण हरियाणा में ज्यादातर मांएं इस बारे में लड़कियों से बात करना सही नहीं समझती। सबसे ज्यादा दिक्कत उन बच्चियों को होती है जिन्हें पहली बार माहवारी होती है। ग्रामीण लडकियां नैपकिन इस्तेमाल नहीं करतीं,ऐसे में घर में उनके लिए अपने गंदे कपड़े धोना,बार-बार कपड़ा बदलना या गंदे कपड़े फेंकना मुश्किल हो जाता है। वह गंदे कपड़े छुपाकर रखती हैं और नजरें बचाकर उसे फेंकती हैं। यही नहीं,ज्यादातर लड़कियों को जब पेट दर्द और उल्टियां होती हैं तो मैंने खुद देखा है कि परिवार में कोई दवा कराना तो दूर, उनका हाल भी जानना मुनासिब नहीं समझता।

हरियाणा में माहवारी के दिनों में महिलाएं खाना तो बनाती हैं,लेकिन आज भी कुछ ब्राह्मण,राजपूत और बनिया जातियों  में महिलाओं को चौका करने की इजाजत नहीं है। ग्रामीण पंजाब में कई घरों में माहवारी से गुजर रही महिलाओं की जूठन नहीं खाई जाती,उनके बर्तन अलग होते हैं। इसे छूआछूत माना जाता है। इनके हाथ से कोई खाने की चीज नहीं ली जाती।

कमोबेश यही हालात तब होते हैं जब महिलाएं बच्चे को जन्म देती हैं। दोनों ही राज्यों में जच्चा-बच्चा को घर का सबसे पीछे का अंधियारा कमरा दिया जाता है। जो न तो हवादार होता है और न वहां कोई आ सकता है। हवादार इसलिए नहीं क्योंकि माना जाता है कि जच्चा को हवा नहीं लगनी चाहिए। इससे जच्चा का शरीर फूल सकता है या फिर उस पर कोई बाहरी हवा (भूत-प्रेत)लग सकती है। पंजाब में कहा जाता है कि छिले (बच्चा पैदा होने के बाद सवा महीने का समय)की एक अलग महक होती है, जो भूतों को आकर्षित करती है। इसलिए जच्चा के सिरहाने लहसुन बांधा जाता है, तो कभी कोई तावीज।

पंजाब में माना जाता है कि अंधेरे कमरे में जच्चा-बच्चा को इसलिए भी रखा जाता है क्योंकि बच्चे की लैटरीन और बच्चे के दूध को किसी की नजर न लग जाए। औरत के कच्चे शरीर में हवा न घुस जाए। हरियाणा में दस दिन तक जच्चा को रोटी नहीं दी जाती। कहते हैं कि महिला के रोटी खाने से जो दूध बच्चा पिएगा उससे बच्चा अंगड़ाईयां लेगा। ऐसे में महिला को छिओणी दी जाती है। जो गर्म पानी में देसी घी मिलाने से बनती है। पंजाब में भी महिला को कुछ दिनों तक खाने के लिए नहीं दिया जाता है। उसे सिर्फ पंजीरी और दूध दिया जाता है।


Aug 9, 2010

बड़ी होती लड़कियां


मासिक चक्र के दौरान महिलाओं के प्रति समाज कैसा रवैया रखता है, इस बारे में सरसरी तौर पर जायजा ले रहीं हैं, हरियाणा से विपिन चौधरी


छोटी बच्चियों को माँ की तरह बड़ा होना अच्छा लगता है, तभी मौका मिलते ही वह अपनी माँ की साड़ी अपने शरीर पर लपेट लेती है.शीशे के सामने खड़ी होकर अपने नन्हे से माथे पर बिंदी लगाकर खुश होती हैं.वहीं पास में ही खड़ी हुई उसकी माँ बेटी को चुपचाप देखती हुई मन ही मन उसके  बड़े होने के चाव से डरने लगती है, क्योंकि  माँ जानती है बड़ी होती लड़की को इंसान से ज्यादा एक शरीर की तरह देखा जाता है. यही शरीर हज़ार लानत- मलानतों का कारण बनता रहा है.

दूसरी तरफ एक लड़के का बड़ा होना अनेक खुशियों को जन्म देने का कारण बनता है. बड़ा होना वैसे तो कई नियामतों को साथ लाता है, पर हमारे समाज में लड़कियाँ डर को अपने बगल में लेकर बड़ी होती हैं. कारण अनेक  हैं. हम सब जानते हैं कि कारण होने से कहीं ज्यादा बना दिए जाते हैं.

 एक भारतीय लड़की को उसका परिवार और समाज़ अनेकों हिदायते देता है.ज्यादा ज़ोर से न बोलने की मनाही, लड़कों के साथ ज्यादा घुलने-मिलने की मनाही.खिलखिला कर हँसने तक की मनाही है. और जैसे ही लड़कियाँ 13-14 की उम्र पार करती हैं, तब हर महीने होने वाली माहवारी के कारण बड़ों द्वारा घर में कई चीज़ें न छूने  की सख्त हिदायत दे दी जाती है.खासकर,रसोईघर में न जाने और खाने-पीने की चीज़ें न छूने की मनाही.माहवारी, दरअसल, प्राकृतिक प्रक्रिया है, जो यह संकेत देती है कि एक बच्ची अब माँ बनने काबिल हो गयी है. मासिक धर्म शरीर में हो रहा एक शारीरिक परिवर्तन होता है, जिसमे योनि के माध्यम से गर्भाशय से रक्त का प्रवाह होता है. यह चक्र लगभग पचास साल तक चलता है. मगर इस सहज स्वाभाविक शारीरिक चक्र को समाज ने हव्वा बना दिया है.

ये हिदायतें हमारे शास्त्रों-पुराणों से शुरू हुई और आज तक बनी हुई हैं. पहले माहवारी की शुरुआत लड़की के लिये हैरानी-परेशानी का सबब बन जाती थी.यदि इसके बारे में पहले से ही घर में माँ, भाभी या बड़ी बहन ने न बताया हो तो लड़की अचानक परेशान हो जाती और फिर उस समस्या को अपनी सहेली को बताती थी.सहेली चूंकि उसी की हमउम्र होती,इसलिए अपनी सीमित जानकारी से जो कुछ बताती उससे मामला और उलझ जाता था.मगर आज सूचनातंत्र के व्यापक प्रचार से सब जागरूक हो चुके हैं। आजकल की लड़कियों से कुछ भी ढका-छुपा नहीं है यह तो हमारे समय की बातें हैं. साईंस की क्लास मे टीचर जब reprodective system पढ़ाती थी तो  लड़कियों के कान लाल हो जाते थे.

वर्ष 1900 के प्रारंभ में लड़कियों को आमतौर पर पहली माहवारी 14 या 15 की उम्र में शुरू होती थी, मगर अब बेहतर पोषण और आधुनिक खानपान की वजह से 8 -16 की उम्र के बीच लड़कियां रजस्वला होने की अवस्था में पहुँच जाती हैं. हर महीने माहवारी से पहले लड़कियों में  शारीरिक और भावनात्मक परिवर्तन के कारण चिड़चिड़ापन, तनाव, सूजन इत्यादि लक्षण दिखते हैं,लेकिन वह अपनी तरफ बिलकुल भी ध्यान नहीं देती. महिलाएं खासतौर पर भारतीय समाज खुद से ज्यादा दूसरों का  ख्याल रखती है.

ज्यादातर घरों में शुचिता का आतंक इतना गहरा होता है कि लड़की का रसोईघर में जाना निषेध हो जाता है, इसी सन्दर्भ में मुझे याद आता है जब मेरी एक सहेली के माँ-पिता दोनों गाँव गये थे तो वह "उन दिनों" में अपने नन्हे से भाई से खाना बनवा रही थी और खुद रसोईघर से बाहर खड़ी होकर निर्देश देती जा रही थी, यानि वह भी उसी साफ़-सफाई वाले आतंक से पीडित थी. आज भी मेरी प्रोग्रसिव सहेलियाँ अचार खराब होने का कारण माहवारी के दौरान उनका हाथ लगना बताती हैं तो मुझे आश्चर्य होता है। जरूरत इस बात की है कि माहवारी से अचार खराब होने वाला मिथक भी खतम होना चाहिये, क्योंकि इसके पीछे कोई वैज्ञानिक कारण नहीं हैं।

हरियाणा और पंजाब के ग्रामीण इलाकों में माहवारी के दौरान युवतियाँ कुँए से पानी लाती है. ढोर-डंगरों के लिए चारा तैयार करती हैं, उपले पातथी हैं। लड़कियाँ काम न करें तो घर कैसे चलेगा. महीने के चार-पाँच दिन वे आराम करें, यह संभव नहीं है। खेतों का काम मेहनत का काम है जो शरीर की मजबूती की माँग करता है। इसीलिए यहाँ किसी तरह का छूआछूत देखने को नहीं मिलता। हाँ, पुराने समय में दादी, नानी ने गाँव में अपने घर परिवारों में ऐसा होता देखा है,जबकि शहर में आज भी कहीं-कहीं इस तरह की प्रपंच जरूर देखने को मिलते हैं.

आज सैनिटरी नेपकिन का करोड़ों का बाज़ार है,जबकि अमेरिका जैसे विकसित देश में औरतें इस दौरान सूती कपडे का इस्तेमाल करती है। आज बाजार निर्धारित करता है कि हमें क्या इस्तेमाल करना है और हम आँख मूदकर विश्वास कर लेते हैं. साफ़-सफाई की लिहाज से सैनिटरी नेपकिन साफ़ और सुविधाजनक है, पर गरीब की जेब की मुताबिक नहीं है. इसका मतलब बाजार सिर्फ अमीरों और उच्च मध्यम वर्ग की जरुरत को ध्यान में रखता है. गरीब की उसे परवाह नहीं है.

किसी भी तरह से सहज जीवन में माहवारी की इस सहज शारीरिक प्रक्रिया का हव्वा नहीं बनाया जाना चाहिये. आखिर इसी प्रक्रिया से गुज़रकर एक लड़की जननी बनती है.