Jul 27, 2010

यह विचारधारा का भटकाव ही है


परिकल्पना प्रकाशन से मेरा ताज़ा कविता संग्रह प्रकाशित हुआ है, लेकिन मैं उनकी राजनीति का  कभी समर्थक नहीं रहा. राहुल फ़ाउण्डेशन को लेकर भी मेरे मन में सवाल रहे हैं. कारण यह कि न्यास वग़ैरा बनाना राजनीतिक दलों का काम नहीं होता.पुस्तकों का प्रकाशन भी  राजनीतिक कामकाज को बढ़ाने का साधन होता है. जब साधन ही साध्य बन जाये तो समझ लेना चाहिए कि दल अब क़दमताल ही कर रहा है.

नीलाभ

जनज्वार पर कई दिनों से राहुल फ़ाउण्डेशन, परिकल्पना प्रकाशन और सीएलआई की एक शाख से जुड़े शशिप्रकाश, कात्यायनी, सत्यम और उनके कुछ और साथियों के ख़िलाफ़ उनके ही अनेक पुराने साथियों के आरोप पढ़ता आ रहा हूँ. किसी हद तक हतप्रभ हूँ और किसी क़दर उदास भी. कारण पहला यह है कि मैं सांगठनिक तौर पर तो नहीं, लेकिन लेखक  के नाते से शशि प्रकाश, कात्यायनी, सत्यम को जानता रहा हूँ. शशि प्रकाश को बहुत दूर से, लेकिन बाक़ी दोनों को नज़दीक से.

परिकल्पना प्रकाशन से मेरा ताज़ा कविता संग्रह भी प्रकाशित हुआ है. मैं उनकी राजनीति का कभी समर्थक नहीं रहा और राहुल फ़ाउण्डेशन को लेकर भी मेरे मन में  सवाल रहे हैं. कारण यह कि न्यास वग़ैरा बनाना राजनीतिक दलों का काम नहीं होता और पुस्तकों का प्रकाशन भी राजनीतिक कामकाज को बढ़ाने का साधन होता है, जब वह साध्य बन जाये या राजनीतिक कामकाज की तुलना में प्राथमिकता ग्रहण कर ले तो समझ लेना चाहिए कि दल अब क़दमताल ही कर रहा है.
मैं १९७० से ही भारतीय कम्यूनिस्ट पार्टी मा.ले. (लिबरेशन) से जुड़ा था -- बतौर सदस्य नहीं, पर उससे कम भी नहीं. अपने दिवंगत साथी गोरख पांडेय की तरह पार्टी का सदस्य न होते हुए भी मैं लगभग सात साल तक पार्टी के सांस्कृतिक संगठन जन संस्कृति मंच का राष्ट्रीय उपाध्यक्ष भी रहा और पार्टी और जसम के साथ अनेक सैद्धांतिक और व्यवहार सम्बन्धी अनसुलझे मतभेदों के चलते मैं अन्ततः जसम से और पार्टी की गतिविधियों से अलग हो गया. पर इसका ज़िक्र आगे या फिर कभी.


इस समय मैं यह कहना चाहता हुं कि इस सारे मुद्दे को सिर्फ़ एक ही संगठन की आलोचनात्मक चीड़-फाड़ के सहारे समझने-समझाने की मुहिम अन्त में व्यक्ति केन्द्रित हो कर असली विषय से भटक जायेगी और यह विषय है वामपन्थी राजनैतिक दलों में भटकाव की समस्या --उसके कारण और उपचार.ज़ाहिर है सी एल आई का यह भटकाव बहुत पुराना है और पार्टी तथा उसके तहत काम करने वाले संगठनों को टूटने,बंटने,विपथगामी होने की ओर ले गया है.

जब विचारधारा में खोट होती है तो वह राजनैतिक और सांस्कृतिक स्तर पर भी प्रकट होती है.उस दल और संगठन से जुड़े व्यक्तियों का व्यवहार भी पूर्वाग्रहों,नफ़रतों,अमानवीयता और अतार्किकता का शिकार हो जाता है.दल में कौकस बन जाते हैं,सम्विधानेतर शक्ति केन्द्र विकसित हो जाते हैं (यह परिघटना सिर्फ़ कांग्रेस तक सीमित नहीं है, वामपन्थी दल भी इस संक्रमण से अछूते नहीं रह पाये हैं).

पुराने मार्क्सवादी सिद्धांत में दो लाइनों के संघर्ष का बड़ा महत्व रहा है.जब-जब इस सिद्धांत को ताक पर रख कर काम किया गया है, विकृतियां पैदा हुई हैं. इन विकृतियों की क़िस्म अलग-अलग हो सकती है -- सी एल आई में एक क़िस्म की तो माले में दूसरे क़िस्म की --लेकिन इनका उत्स विचारधारात्मक भटकाव में ही है और इस भटकाव का सबसे पहला लक्षण पार्टियों और उनके संगठनों के सांस्कृतिक व्यवहार में लक्षित होता है.अनेक वामपन्थी राजनैतिक दलों के सांस्कृतिक संगठन तो दूर रहे, उनकी कोई स्पष्ट सांस्कृतिक नीति भी नहीं है.जिन वामपन्थी दलों के सांस्कृतिक संगठन हैं भी, ज़रा उनका मुलाहिज़ा फ़र्माइए. क्या उनमें आज के राजनैतिक, सामाजिक,सांस्कृतिक संकट का सामना करने का माद्दा है ? मत भूलिए कि राजनीति का एक अंश नीति भी है जिस से नैतिक शब्द बना है.नैतिकता के बिना न राजनीति सफल होगी, न नीति और न ही सांस्कृतिक पहलक़दमी.


अगर सचमुच साथी लोग कात्यायनी,शशिप्रकाश और सी एल आई से इतने ही नालां थे और हैं तो उन पर और भी दायित्व बनता है कि इस मुद्दे तो सिर्फ़ कुछ व्यक्तियों तक सीमित न करके व्यापक बनायें. इसका यह मतलब नहीं है कि अगर शशिप्रकाश और उनके साथी दोषी हैं तो उनासे जवाब न मांगा जाये या उन्हें कटघरे में न खड़ा किया जाये.लेकिन अन्त में सही विचारधारा,सही काम काज और सही राजनैतिक-सांस्कृतिक दिशा और पहलक़दमी ही आपका जवाब होना चाहिए.कम्यूनिस्ट जब पतित होता है तो वह उतना ही पतित होता है जितना कोई और पर चूंकि वह सब्स ज़्यादा नैतिकता का राग अलापता है इसलिये हमें आघात पहुंचता है.क्या कम्यूनिस्टों के पतन की भर्त्सना करते हुए हम औरों के पतन का औचित्य ठहरा सकते हैं ?हम बच्चन जी को तो हम भुला चुके हैं पर उनकी दो पंक्तियां मुझे अच्छी लगती हैं -- बोलना हो तो तुम्हारे हाथ की दो चोट बोले.




Jul 26, 2010

शशि प्रकाश का पूंजीवादी मंत्र 'यूज एंड थ्रो'



पाठकों,वामपंथी पार्टी कम्युनिस्ट लीग ऑफ इंडिया(रिवोल्यूशनरी)के सचिव की तानाशाह वाली कार्यशैली और संगठन में पारदर्शिता के अभाव के बारे में अब तक आपने पढ़ा,वे छुपते हैं कि चिलमन से झरता रहे उनका नूर,सांगठनिक क्रूरता ने अरविंद की जान और जनचेतना के मजदूर,बेगार करें भरपूर अब इस कड़ी को आगे बढ़ाते हुए अपने अनुभव साझा कर रहे हैं पार्टी की ओर से मज़दूरों के लिए निकाले जाने वाले अख़बार ‘बिगुल’ के प्रकाशक, संपादक और मुद्रक डॉक्टर दूधनाथ।

डॉक्टर दूधनाथ, संपादक 'बिगुल' 

 काफी समय से हम लोग विचित्र मानसिक स्थिति में थे और पार्टी नेतृत्व का अरहाया (आदेशित)गया काम भार महसूस हो रहा था। पिछले 20वर्षोंसे हम देख रहें हैं कि बड़े जोर-शोर से कोई काम शुरू होता है और अचानक बंद कर दिया जाता है। फिर कोई नया अभियान या काम शुरू होता है और फिर ठप्प हो जाता है।

दूसरी तरफ बेहद बेशकीमती साथी संगठन से समय-समय पर बाहर होते रहे। इस वजह से स्थानीय कार्यकर्ता भी निराश होकर,एकके बाद एक बैठते रहे। लेकिन शशि प्रकाश के नेतृत्व वाले इस संगठन में या कहें पार्टी में तकनीकी जवाब ही हमेशा मिला,कभी कोई राजनीतिक कारण स्पष्ट नहीं हुआ। यह स्थिति हम सबके लिए तकलीफ देह बनी रही।

इस मसले पर जब भी संगठन के नेतृत्वकारी साथी से चर्चा की जाती थी और समझने का हमलोग प्रयास करते थे,तो कभी दूसरी कमेटी का हवाला देकर या निकले या निकाले गये साथियों को भगोड़ा कह कर बात खत्म कर दी जाती थी। अन्त में परेशान होकर हमलोगों ने संगठन के सचिव शशि प्रकाश को प़त्र भेजा। मगर हम जैसे संगठन के पुराने लोगों को भी, जो कि मजदूर, भूमिहीन और सर्वहारा हैं, पार्टी सचिव ने बात करना या जवाब देना मुनासिब नहीं समझा। इसके उलट गोरखपुर से भेजे गये प्रतिनिधी और स्थानीय संगठनकर्ता तपीश ने कूतर्क करते हुए प्रश्नों को दबा दिया। हमारे सवालों के जवाब में तपीश ने अतिजनवाद की अराजकता कहकर मुंह बंद कराना चाहा।

ऐसी स्थिति में हमें मजबूरन आप सब साथियों,जनपक्षधर बुद्धिजीवियों और सहोदर संगठनों से अपने सवालों को साझा करना पड़ रहा है।

सचीव को भेजे गये पत्र में हम लोंगो ने संगठन में जनवाद की कमी,नेतृत्व की तानाशाह कार्यपद्धति,दो लाइनों का संघर्ष, संगठनिक ढांचा और कमेटी गठन समेत कुछ और सवाल उठाये थे। हमने कहा कि पिछले 20 वर्षों में इनमें से कोई सवाल हल नहीं हुआ, बल्कि चीजें और बुरी स्थिति में गईं।

हमरा दूसरा प्रश्न साथियों को निकाले जाने को लेकर था। पिछले 20 वर्षों में संगठन से एक के बाद एक साथी निकाले तो जाते रहे (जिनकी संख्या पार्टी में मौजूद तादाद से बहुत ज्यादा है),लेकिन उन्हें बाकी सदस्यों के बीच अपनी बात रखने और कतारों को निर्णय लेने का अवसर कभी क्यों नहीं दिया गया?

तीसरे सवाल के तौर हमने रखा कि नेतृत्व यानी शशिप्रकाश और उनके परिवार को बाकी संगठन सदस्यों पर निगरानी रखने का अधिकार है लेकिन सदस्यों को नेतृत्व पर निगरानी का कोई तरीका क्यों नही है? खासकर वैसे में जबकि संगठन सदस्यों के बीच नेतृत्व भूमिगत है और व्यवस्था के लिए पूरी तरह खुला है।

अन्त में हम लोंगो ने यह मांग की थी कि निकले और निकाले गए सभी महत्वपूर्ण साथियों को बुलाकर कार्यकर्ता सम्मेलन करके प्रश्नों को हल किया जाए,नहीं तो हम लोंगो का संगठन में काम करना संभव नहीं है।

इस बीच हम लोंगो को पता चला कि दिल्ली में काम कर रहे दो साथी मानसिक पीड़ा झेल रहे हैं और उनका संगठन से ढेरों सवाल हैं। जब हमने यह सवाल भी उठाया तो शशि प्रकाश के भेजे गये प्रतिनिधि तपीश ने मउ के मर्यादपुर में हमारे साथ एक बैठक की। तपीश ने हमारे प्रश्नों पर टालू रवैया अख्तियार किया और शान्त कराने की कोशिश की। तपीश और नेतृत्व के रवैये से असंतुष्ट हो संगठन के बहुत पुराने मजदूर साथी हरिहर भाई ने तपीश के उत्तर से जब असन्तुष्टता जाहिर की और सोचने का समय मांगा, तो उन्हें संगठन से निकाल दिया गया।

हरिहर भाई का निकाले जाने की प्रक्रिया हमारे लिए आश्चर्यजनक थी। उस समय हमसे थोड़ी दूरी बनाकर तपीश ने सीधे शशि प्रकाश से मोबाइल से बाती की थी और वहां मिले आदेश के आधार पर हरिहर भाई को संगठन से निकाल दिया गया। बुर्जुआ नेताओं की कार्यशैली से दो कदम आगे बढ़कर मालिक और मजदूर की तरह हरिहर भाई के साथ किया गया यह व्यवहार हमारे कई प्रश्नों का जवाब दे रहा था।

अब बारी थी संगठन से दिल्ली में दो असंतुष्ट साथियों जनार्दन और समीक्षा की। मैं और तपीश मर्यादपुर से साथ आए और सत्यम वर्मा के यहां मीटिंग की। सचिव शशि प्रकाश यहां भी गायब रहे। सत्यम और तपीश ने यह मीटिंग ली। यह एक भयावह मीटिंग थी। मीटिंग में जनार्दन और समीक्षा ने जैसे ही अपने सवाल रखे तो यहां भी सवालों को दबाते हुए सत्यम वर्मा ने उनका ही चरित्र चित्रण शुरू कर दिया।

मीटिंग में जनार्दन और समीक्षा ने बताया कि वे काफी दिनों से अपने छोटे बच्चे के साथ आर्थिक, मानसिक व शारिरिक रूप से परेशान चल रहे हैं। कई बार हमने अपनी तरह से इत्तला भी किया मगर संगठन ने कोई खोज खबर नहीं ली। वहीं संगठन के भीतर एक ऐसा पारिवारिक रिश्ता (शशि प्रकाश, कात्यायनी, अभिनव, अभिनव की पत्नी और उसका बेटा) भी है जहां के लोंगो को छींक भी आ जाये तो पूरा संगठन लगा दिया जाता है।

जनार्दन ने दूसरे सवाल के तौर पर सीधे कहा कि आखिर क्यों है कि वामपंथी आंदोलन के ज्यादातर संगठन,हमारी पार्टी और संगठनों को अपराधी और क्रान्ति के नाम धन्धेबाज मानते हैं ?क्या यह सच नहीं है कि संगठन के कार्यकर्ताओं का ज्यादे समय लांक्षित, अपमानित होते हुए चन्दा मांगने में खर्च होता है। संगठन किताबें छापने, बेचने, मकान-दुकान खड़ा करने, ट्रªस्ट-सोसाइटी बनाने में लगा रहता है। यह कैसी माया है कि कोई वेतन भोगी (लेबी पाने वाला) कार्यकर्ता न होने और लाखों का चंदा इक्कठा होने के बावजूद संगठन की संस्थाएं हमेशा घाटे में रहती हैं?

जनार्दन ने इस मसले पर बात रखी कि संगठन में नेतृत्व यानी शशि प्रकाश और उसके कुनबे की परिवरिश तो शाही अन्दाज में होती है,लेकिन कार्यकर्ताओं को वेज तक नहीं दिया जाता और सर्वहाराकरण के नाम पर अमानवीय हालत में जीने को मजबूर कर दिया जाता है?इसे विडंबना कहकर टाल दिया जाता है और कहा जाता है कि समाज में वर्ग हैं तो पार्टी उससे अछूती तो नहीं रहेगी।

क्या कारण है कि संगठन बीस साल में दो पेज का दस्तावेज भी नहीं लिख पाया, जबकि इस बीच सचिव शशि प्रकाश पत्नी को पोथन्ना लिखवाने और पुस्तकों की भूमिका लिखने में व्यस्त रहे। संगठन गोपनीय और अदृश्य कामों में कितना व्यस्त रहता है इसके लिए एक ही उदाहरण काफी है। 2005में तराई क्षेत्र के होंडा मजदूर आन्दोलन में चार साथी सात दिन तक जेल में सामूहिक भूख हड़ताल पर रहे और संगठन का कोई जिम्मेदार साथी उनसे मिलने तक नहीं गया।

इन सवालों के साथ ही दोनों असन्तुष्ट साथियों ने ढेरों उदाहरण देकर यह बात रखी कि कैसे संगठन की जिम्मेदार साथी मीनाक्षी फुटपाथ की चोरी और साथियों की जासूसी करना सीखाती हैं। निकृष्ट हरकत करने वाली इस संगठनकर्ता साथी को महज इसलिये मान मर्यादा मिलती है क्योंकि वे संगठन के सबसे अधिक धन-कमाऊ पूत हैं(मीनाक्षी का गोरखपुर से लेकर दिल्ली तक में सबसे ज्यादा चंदा इकठ्ठा करने का रिकॉर्ड है।) कई वरिष्ठ साथी (कात्यायनी बहनों के अलावा कोई और नहीं है), नये कार्यकर्ताओं से नौकरानी जैसा व्यवहार करती हैं।

यह भी सवाल रखा कि क्यों सारी गलतियों का ठिकरा केवल संगठनकर्ताओं के सर पर ही फोड़ा जाता है और क्या 20 साल में सारे संगठनकर्ता फिसड्डी साबित हुए तो सचिव शशि प्रकाश की रत्ती भर इसमें कोई गड़बड़ी नहीं है? बीस साल में संगठन ऐसा दहन पात्र क्यों नहीं बना सका जिसमें ढलकर इस्पाती कार्यकर्ता पैदा हो सकें? क्यों बार-बार लंबे समय तक काम करने के बाद संगठन पर सवाल उठाने वाले साथी भगोड़े करार दिए जाते रहे? क्या कारण है कि पार्टी कमेटी से लेकर ट्रस्ट सोसाइटी तक रक्त संबंधियों की ही बहुलता है?

साथियों,हमारे एक वरिष्ठ कार्यकर्ता साथी अरविंद सिंह अब हमारे बीच नहीं रहे। अब हमारा संगठन उनके नाम पर एक और ट्रस्ट बनाने जा रहा है। मौत के बाद इतनी तत्परता जबकि साथी छहः महीने से बीमार था,डेढ़ महीने से बहुत तकलीफ के साथ बीमारी में समय बीता रहा था,और लड़ भी रहा था जिसके हम स्थानीय साथी गवाह हैं जबकि शीर्ष नेतृत्व को इसकी जानकारी मौत के बाद होती है, क्या यह नेतृत्व की संवेदनहीनता और कर्तव्यविहिनता नहीं है?

दोनों बैठकों में इनमें से किसी भी सवाल का कोई सही जवाब तो नहीं मिला। उल्टे गाली-गलौज और धमकियां देने का पुराना सिलसिला यहां भी दुहराया जाता रहा। स्थानीय इकाई के सवालों को भी दरकिनार कर दिया गया। सचिव शशि प्रकाश ने हम लोगों से बात करने की जगह स्थानीय इकाई के पास मौजूद किताबों की पैकिंग कर वापसी का फरमान जारी करवा दिया। अन्ततः हमारे पास संगठन से अलग होने के अलावा कोई रास्ता नहीं बचा।

आज हम लोग काफी सोच विचार के बाद इस निष्कर्ष पर पहुंचे है कि हमारा संगठन क्रान्तिकारी नहीं रह गया। बल्कि धन उगाही का केंद्र बन गया है। विचारधारा और संगठन महज आवरण बन कर रह गए हैं। यही कारण है कि जो भी साथी थोड़ा पुराना होता है और जब उसे ये बाते समझ में आने लगती हैं व उसके मन में सवाल उठते हैं और जैसे ही उस पर (संगठन) सवाल खड़ा करता है उसे बाहर का रास्ता दिखा दिया जाता है। जैसा कि हम लोग के साथ हुआ। लेकिन तबतक संगठन पुराने साथियों की काफी ऊर्जा निचोड़ चुका होता है और उसके लिए नए युवा साथी क्रान्ति के नाम पर जुगाड़ लिए जाते हैं।

साथियों सोचिए हमारे नेता कब तक इंकलाब से मुंह मोड़ कर नई जनता चुनते रहेंगे।


क्रान्तिकारी अभिवादन के साथ
पूर्वी उत्तर प्रदेश की इकाई और राजधानी क्षेत्र के असंतुष्ट साथियों की ओर से
डॉ दूधनाथ, जनार्दन, इन्द्रदेव, समीक्षा, हरिहर, अशोक कुमार



कार्यकर्ता हताश-परेशान, नेता का परिवार मालामाल


पाठकों, वामपंथी पार्टी कम्युनिस्ट लीग ऑफ इंडिया(रिवोल्यूशनरी) के सचिव की तानाशाह वाली कार्यशैली, संगठन में पारदर्शिता के अभाव और कार्यकर्ताओं के साथ की जाने वाली ज्यादतियों के बारे में अब तक आपने पढ़ा,वे छुपते हैं कि चिलमन से झरता रहे उनका नूर, सांगठनिक क्रूरता ने ली अरविन्द की जान,जनचेतना’ के मजदूर, बेगार करें भरपूर, शशि प्रकाश का पूंजीवादी मंत्र 'यूज एंड थ्रो' और 'जब एक कम्युनिस्ट पतित होता है...'.
इसी कड़ीमें यह आलेख भेजा है मुकुल ने,जो ‘दिशा छात्र संगठन’के संयोजक,‘जनचेतना’ के निदेशक,‘राहुल फाउण्डेशन’ के संस्थापक सचिव, ‘अनुराग ट्रस्ट’ के ट्रस्टी और ‘आह्वान कैम्पस टाइम्स’और ‘बिगुल’के सम्पादक समेत तमाम महत्वपूर्ण पदों पर रहने के साथ-साथ इन संगठनों के सक्रिय कार्यकर्ता रह चुके हैं।

मुकुल, सामाजिक कार्यकर्त्ता  

र प्रयास का कोई न कोई तात्पर्य होता है। यदि हम समाज परिवर्तन के हिमायती हैं,तो हमारा सार्थक प्रयास विजातीय प्रवित्तियों-विभ्रमों का खुलासा और छंटाई के लिए होगा, जिससे सही राह की बाधाएं हटाई जा सकें। अन्यथा यह कवायद बनकर रह जाएगा। इस रूप में ‘जनज्वार’ने एक ऐसे समय में सार्थक बहस शुरू की है, जब कॉमरेड अरविन्द के नाम पर ट्रस्ट बनाने और आयोजन के बहाने लंबी-चौड़ी कथित घोषणाओं की त्रासदी घटित हो रही है। चूँकी अरविन्द और संगठन से मेरा लंबा जुड़ाव रहा है,इसलिए चन्द बातें साझा करना समयाचीन है।

वैसे हमारे पूर्ववर्ती संगठन के बारे में ढेरों बातें छप चुकी हैं, इनमें कुछ बातें तथ्यात्मक रूप से गलत हो सकती हैं,लेकिन इनकी मूल भावना सही है। तथ्यों के साथ और भी ढ़ेरों बातें की जा सकती हैं, लेकिन यहाँ मैं महज दो मुद्दों पर बात केंद्रित कर रहा हूँ।

पहली बात कॉमरेड अरविन्द के बारे में। हमारे पूर्ववर्ती संगठन, राहुल फाउण्डेशन, बिगुल, दिशा, नौजवान भारत सभा,जनचेतना आदि के घुटन भरे माहौल में एक समय तक काम करने के बाद प्रायः तीन स्थितियां बनती हैं,साथी डिप्रेशन का शिकार बने अथवा बगावत कर संगठन छोड़े या फिर मौत को प्यारा हो जाए। हमने बगावत की राह चुनी,मानसिक यंत्रणा से मुक्त हुए और तभी आज हमलोग स्वस्थ रूप से अपने सरोकारों के प्रति बेहत योगदान कर पा रहे हैं। अरविन्द लंबे समय तक मानसिक-शारीरिक पीड़ा झेलते हुए इस दुनिया से चले गए। इस पीड़ा भरी त्रासदी को उनके साथ काम किया हुआ कोई भी साथी समझ सकता है।

तिगड़म का बोलबाला

विडंबना देखें कि 1990से पूर्व हमारी युवा टीम में जो अरविन्द सबसे अच्छे संगठनकर्ता के रूप में जाने जाते थे,लेकिन बाद के दौर में उन्हें बार-बार फिसड्डी,असफल,काम डुबोने वाला आदि-आदि साबित किया जाने लगा.इसके बावजूद कि ढ़ेरों जिम्मेदारियाँ भी उनपर ही रहती थीं। स्थिति की बानगी 2005की एक केंद्रीय बैठक में अरविन्द के ही शब्दों में ‘‘उन्हें दिल्ली से तिगड़म करके हटाया गया है’’। गौरतलब बात है कि उस वक्त दिल्ली में संगठन के साथियों ने विस्फोटक अंदाज में सवाल खड़ा किया था कि संगठन की 80 फीसदी ताक़त चन्दा जुटाने, किताबें छापने-बेचने में खर्च होती है, आदि-आदि। ऐसी स्थिति में यहाँ से अरविन्द को साजिशन तराई के एक आन्दोलन में भेज दिया गया और कामों की समीक्षा करके असफलता का ठीकरा उनके मत्थे फोड़ दिया गया। बाद में सवाल उठाने वाले भी ज्यादातर साथी किनारे लगा दिए गए। वैसे ऐसा संगठन में बार-बार होता है और संगठनकर्ताओं-कार्यकर्ताओं का गर्दन मरोड़ कर ‘सुपर संगठनकर्ता’अपनी वाकपटुता से छा जाता है और अपनी ‘श्रेष्ठता’कायम करता रहता है।

घोषणाओं का दौर

ब बात मरणोपरांत अरविन्द के नाम पर घोषणओं की जाए तो यह अतीत की ‘‘उन्नत” मंजिल है। ऐसी लंबी-चौड़ी घोषणाएँ कई बार हो चुकी हैं और परिणाम सचेतन धन उगाही और पुस्तकें छापने-बेंचने का उदृम बनकर रह जाना होता है। याद ताजा करने के लिए 1993में राहुल जन्मशती के बहाने प्रकाशन से लेकर स्कूल खोलने तक ढ़ेरों घोषणाएँ हमने कीं.राहुल फाउण्डेशन बना और काम महज एक किया गया क्रान्ति के नाम पर बिन वेतन कर्मकारों के धन संग्रह और प्रकाशन उद्योग की ओर बढ़ते जाना। अतीत का घिसटता घोड़ा अब सरपट दौड़ने लगा है। 1990की सर्वहारा पुनर्जागरणवादी-प्रबोधनवादी कथित थीसिस की आड़ में शुरू शफर 1992में हमारा मीड़िया अभियान,1993में राहुल जन्मशती आयोजन व राहुल फाउण्ड़ेशन का गठन, 1994 में लोकस्वराज अभियान से लेकर 2005-08 में तीन साला स्मृति संकल्प यात्रा आदि पड़ावों से होकर आज अरविन्द आयोजन तक पहुँचा है। इस दौरान एक के बाद एक पंजीकृत सोसायटी और ट्रस्ट तो बनते रहे लेकिन सचेतन एक भी औपचारिक जनसंगठन नहीं बना, कार्यकर्ता लुटता-पिटता और हताश होता रहा लेकिन नेतृत्व परिवार के साथ फलता-फूलता रहा।

सरोकारों से दूर

दूसरी बात, पूरे आंदोलन के संदर्भ में। हमारा मुख्य सरोकार इसी बिंदु से है, बाकी बातें तो इसी का हिस्सा है। बात की शुरुआत शशि प्रकाश के शब्दों से ‘‘एक मार्क्सवादी के पास ईश्वर का भी डर नहीं होता इसलिए जब वह नीचे गिरता है तो पतन की पराकाष्ठा पर पहुँच जाता है’’और ‘‘आंदोलन के ठहराव के दौर में भांति-भांति के पंथ पैदा होने लगते हैं।”आइना सामने है। सच्चाई यह है कि हमारा पूरा आन्दोलन अति वाम से लेकर संशोधनवाद तक के दो छोरों के बीच झूल रहा है।चौतरफा विभ्रम व्याप्त है। दुश्मन वर्ग को ठीक से न समझ पाने से स्थितियाँ और जटिल बन गई हैं। ऐसे  में क्रान्ति के नाम पर धन्धेबाजों तक के पनपने की पूरी जमीन तैयार है।

आज तमाम हलकों में मार्क्सवाद गतिशील विज्ञान की जगह जड़ बनता गया है। स्थिति यह है कि तमाम संगठनों में नेतृत्व के चकाचौंध में कार्यकर्ता तर्क और विवके को किनारे रख देता है,उसकी पहलकदमी-श्रृजनशीलता कुंद होती जाती है। एक जटिल भारतीय समाज में मौजूद प्रच्छन्न सामन्ती मूल्य-मान्यताओं की इसमें एक अहम भूमिका है। ऐसे में पूँजीवादी विचारधारा का मौजूदा वर्चस्व, सचेतन तौर पर वह माहौल पैदा करता है, वह भौतिक परिस्थिति बनाता है, ऐसी मानसिकता निर्मित करता है, जो विभ्रम का धुंध खड़ा कर देती है।

वैज्ञानिक विचारधारा की मजबूत पकड के साथ स्थितियों को समझने और तर्क की कसौटी पर उतार कर ही यथास्थिति को तोड़ा जा सकता है। यह आज के दौर का सबसे जरूरी कार्यभार है।




Jul 25, 2010

जब एक कम्युनिस्ट पतित होता है...

पाठकों,वामपंथी पार्टी कम्युनिस्ट लीगऑफ इंडिया(रिवोल्यूशनरी)के सचिव की तानाशाह वाली कार्यशैली,संगठन में पारदर्शिता के अभाव और कार्यकर्ताओं के साथ की जाने वाली ज्यादतियों के बारे में अब तक आपने पढ़ा, वे छुपते हैं कि चिलमन से झरता रहे उनका नूर, सांगठनिक क्रूरता ने ली अरविंद की जान, 'जनचेनता' के मजदूर, बेगार करें भरपूर और शशि प्रकाश का पूंजीवादी मंत्र 'यूज एंड थ्रो',अब इस कड़ी को आगे बढ़ाते हुए अपने अनुभव साझा कर रहे हैं दिशा छात्र संगठन के पूर्व कार्यकर्ता. 

अशोक कुमार पांडेय (दिशा छात्र समुदाय के पूर्व कार्यकर्ता)

‘’नामिका की कविता और इस कविता में मूल अंतर है कि जहां अनामिका ने कविता रची है कात्यायनी ने गढी है। यह स्वाभाविक गुस्से या समर्थन की उपज नही लगती। कात्यायनी की समस्या यह है कि उनकी पूरी रचना प्रक्रिया अस्वाभाविक और एक गर्वपूर्ण भर्त्सना से भरी हुई है।

हां आपने भी उन्हें एक्टिविस्ट कहा है। प्रकाशन चलाना एक्टिविज़्म नहीं होता। बाकी के बारे में न कहूं तो ही बेहतर’’।

घाव अभी तक हरे हैं

ग्रज कवि शरद कोकास के ब्लॉग पर प्रकाशित कात्यायनी की एक कविता पर लिखी इस टिप्पणी का असर यह हुआ कि पिछले पुस्तक मेले में उनके शानदार स्टाल में जैसे ही घुसा वह फट पड़ीं,“तुमने मेरी कविता को गढ़ी हुई कहा था न और बाकी के बारे में क्यूं नहीं कहा।”मैं अशालीन नहीं होना चाहता था…तो सिर्फ़ इतना कहा ‘कहूंगा…मौका आने पर वह भी कहूँगा ही।’आज जब तुम लोगों को अपने इतने दिनों से दबा कर रखे गए गुस्से का इज़हार करते देखा तो लगा अब समय आ गया है और इस मौके पर मुझे भी सामने आना ही चाहिए. जख़्म पुराना सही पर घाव अब तक हरे हैं…और शायद यह इसलिए भी ज़रूरी है कि कई और युवा मित्रों को इससे बचाया जा सके. जवानी के पहले सपने के टूटने का जो दर्द हमने झेला है वह दूसरों को न झेलना पड़े। अब तक चुप रहे कि सुदर्शन की कहानी बचपन में पढ़ रखी थी, डर था कि अंततः बदनामी समाजवाद की ही होगी…लेकिन अब लगता है कि और चुप रहे तो ये लोग समाजवाद को इतना बदनाम कर डालेंगे कि फिर किसी की सफाई का कोई मतलब नहीं रह जाएगा. सही को सही कहने से ज़्यादा ज़रूरी है ग़लत को ग़लत कहना.

तो मित्रों शुरुआत में ही साफ़ कर दूँ कि मैं शशिप्रकाश-कात्यायनी की तथाकथित पार्टी को एक भ्रष्ट, पतित और किसी ही प्रकार से धन एकत्र करने वाला गिरोह मानता हूँ. उतना ही घृणित जितना कि बच्चों को चुरा कर भीख माँगने पर मजबूर करने वालों को।

लंबी बहसों का दौर

वे1991-92के दिन थे…गोरखपुर विश्वविद्यालय का नाथ चंद्रावत छात्रावास…किसी शाम कुछ युवा मेरे कमरे पर आए.हाथ में आह्वान कैंपस टाईम्स लिए दिपदिपाते चेहरे (क्या बताऊं वर्षों वाद उन चेहरों की उदासियों ने कितना रोया हूं…तुम तो जानते हो न अरुण!).मैं खानदानी संघी, भिड़ गया…फिर कई रातों चली लंबी बहस…स्टेशन के सामने दिशा के दफ़्तर में…हास्टल में…रात की सूनी सड़कों पर…और इसी दौरान परिचय हुआ मार्क्सवाद से. एक बेहतर दुनिया के निर्माण का स्वप्न जागा और यह तय किया कि अब ज़िंदगी का कोई और लक्ष्य हो ही नहीं सकता। तब यह नहीं जानता था कि मैं जिन लोगों के जाल में फंस रहा हूं वे इस स्वप्न को ‘आने-पाई के महासमुद्र’ में डुबा चुके हैं… और हम उनकी भ्रष्ट योजनाओं की पूर्ति के साधन बने.

पैसा उगाहो अभियान

ह इस प्रक्रिया का आरंभिक काल था. तब इन सब उपक्रमों की योजनाएँ बन रही थीं…चासनी पगे शब्दों में शशिप्रकाश इन योजनाओं को बताते और हमें मुतमईन करते कि पूंजीवादी सांस्कृतिक षड़यंत्रों को ध्वस्त करके एक समाजवादी विचारधारा स्थापित करने के लिए ज़रूरी है कि हमारे पास अपना प्रकाशन हो, अपना एक ट्रस्ट हो, अपना विश्विद्यालय हो.हम इस अपने का मतलब नहीं समझ पाए थे तब और हमें यह बताया गया कि इसके लिए ज़रूरत है समर्पित कार्यकर्ताओं की एक टीम की और पैसों की. पैसे जुटाने की रोज नई तरकीब ढ़ूढ़ीं जाने लगीं. स्ट्रीट थियेटर से पेट कहाँ भरता. लेवी की सीमा होती है, तो एक एकदम नया तरीका ढ़ूंढा गया. एक अभियान ‘लोक स्वराज अभियान’ अर्थात एक आदमी किसी व्यस्त चौराहे, बस, हास्टल या किसी ऐसी जगह जहाँ लोगों की जेब ढीली की जा सके (यहाँ तक कि रेस्त्रां भी)पर चिल्ला कर व्यवस्था के ख़िलाफ़ उग्रतम संभव भाषा में भाषण दे और शेष लोग वहाँ पर उपस्थित लोगों को परचे वितरित करें और चंदा लें…जो जितनी अधिक राशि शाम को ला सके वह उतना ही दुलारा…(और यह यहीं तक नहीं रुका यह सब…कई साल बाद पत्नि के साथ गोरखपुर से ट्रेन से लौटते हुए उसी अभियान का पर्चा हाथ में लिए कुछ युवा साथियों को ट्रेन में देखा…उनसे परिहास करते डेली पैसेंजर्स को और उनके पीछे-पीछे आते भिखारियों को. पत्नि की सवालिया आँखों ने घूरा तो पता नहीं क्यूं ख़ुद पर शर्म आई)…

कात्यायनी का कायायंतरण

कुछ समझ नहीं आता था.इसी दौरान राहुल सांस्कृत्यायन की जंयती के दौरान वह कार्यक्रम हुआ जिससे राहुल फाउन्डेशन की योजना फलीभूत होनी थी…सहारा की वह टिप्पणी और फिर लखनऊ की सड़कों पर वह तमाशा, हमने शशि की मैनेजमेंट क्षमता देखी. देखा कात्यायनी का रातोरात एक्टिविस्ट में कायांतरित होना.आदेश के साथ मैं भी गोरखपुर लौटा था, शहर में समर्थन जुटाने और पैसे भी पर इन सबके बीच यह तो लगने लगा था कि कुछ गडबड़ है…जिस काम को ज़िंदगी का मक़सद तय किया था उसमें दिल नहीं लगता था. जब कात्यायनी के कल्याणपुर वाले घर के सामने रहने वाले एक मज़दूर के घर को जबरन दिशा के दफ़्तर के लिए ख़ाली कराने में साथियों का गुंडों की तरह इस्तेमाल किया गया तो मुझे नहीं पता था कि यह तमाम संपत्तियों को कब्ज़ाने की लंबी कड़ी की शुरुआत है. लेकिन मैं उसमें शामिल नहीं हुआ…अक्सर उन पैसा उगाहो कार्यक्रमों से बाहर रहने लगा.इसी दौरान एक ऐसी घटना घटी कि दिल कांप गया, मुजफ़्फ़रपुर के एक अभियान (जिसमें मै परीक्षा की वज़ह से शामिल नहीं हो पाया था) की समीक्षा मीटिंग में हमारे एक साथी सलमान पर घटिया आक्षेप लगाए गए, महिलाओं को लेकर, यहाँ तक कि जिस कात्यायनी को हम दीदी कहते थे, वह भी आरोप लगाने वालों में शामिल थीं. सलमान को सफ़ाई का मौका तक न मिला. उसने कुछ कहने की कोशिश की तो संतोष ( जिसे हम शशि का वुलडॉग कहते थे) ने सबके बीच उस पर हाथ उठाया. हम प्रतिकार में उठकर चले आए और फिर कभी वापस नहीं गए.

शशि प्रकाश के अनमोल वचन

बाहर आकर यह सब और ज़्यादा साफ़ दिखने लगा. एक पूरी प्लांड स्कीम. शशि का पर्दे के पीछे रहकर पूरा काम सँभालना, कात्यायनी का संगठन के चेहरे के रूप में प्रोजेक्शन, लोगों के प्रति चूसो और फेंक दो वाला एप्रोच,डरपोक और हीनतावोध से भरे साहित्य-समाज में हाई डेसीबेल की थोथी कविताओं के सहारे आतंक फैलाकर छा जाना और फिर उसका हर संभव लाभ उठाना,धीरे-धीरे अकूत धन एकत्र करते जाना, पूंजीपति प्रकाशनगृहों की चमचागिरी और उनके साथ दुरभिसंधियाँ. सब साफ़ दिखता था...

…और शशि की कही दो सूक्तियां बेहद याद आती हैं…पहली यह कि ‘जब एक कम्युनिस्ट पतित होता है तो उसकी कोई सीमा नहीं होती क्योंकि वह तो ईश्वर से भी नहीं डरता’ और दूसरा यह कि ‘अगर इंकलाब न करना हो तो छोटे शहरों में नहीं रहना चाहिए.'वह कभी कम्युनिस्ट था और पिछले तमाम सालों में वह बड़े शहरों में ही रहता है!




Jul 23, 2010

‘जनचेतना’ के मजदूर, बेगार करें भरपूर



दिल्ली के किसी भी सामाजिक,सांगठनिक कार्यक्रम से दूर रहने वाले शशिप्रकाश के संगठन की सर्वाधिक ताकत और उर्जा हर पुस्तक मेले में दिखती है। इस वर्ष हिंदी-अंग्रेजी को मिलाकर कुल सात स्टाल लगे थे और दर्जनों छात्र-युवा सिर्फ रोजाना के भोजन पर यहां खटे। संवेदनशील मानी जाने वाली किताब की दुनिया के लोग इस पर गौर करें तो अच्छा होगा क्योंकि कार्यकर्ता,सामाजिक बदलाव के सपने को साकार करने के लिए अपनी जिंदगी और जवानी वहां न्योछावर कर रहा होता है।

इस बहस को आगे बढ़ाते हुए वे छुपते हैं कि चिलमन से झरता रहे उनका नूर और सांगठनिक क्रूरता ने ली अरविन्द की जान लेख के बाद अब परिकल्पना प्रकाशन और जनचेतना बस के मालिक सत्येंद कुमार की राय पढ़ें।

सत्येन्द्र कुमार, परिकल्पना प्रकाशन और जनचेतना बस के मालिक


मजदूर संगठनकर्ता अरविन्द सिंह की हत्या के बाद जनचेतना, राहुल फाउंडेशन की ओर से गोरखपुर में होने जा रहे कार्यक्रम के बारे में जनज्वार पर डॉक्टर विवेक कुमार की टिप्पणी पढ़ी और उनकी चिन्ताओं,आशंकाओं को भी जाना।]
मैं कम्युनिस्ट लीग ऑफ इंडिया (रिवाल्यूशनरी) की तमाम शाखाओं में 12 वर्षों तक रहा हूं। इन वर्षों के बीच अपने सूदखोर खानदान का पैसा (शशिप्रकाश के शब्दों में)लगभग 40-45लाख इस पारिवारिक कुनबे को क्रान्ति जैसे महान् कार्य के नाम पर दे चुका हूँ। मैंने भी महसूस किया कि अरविन्द को कामरेड लिखते हुए कलम रुकती नहीं है और अरविन्द के नाम के आगे कामरेड लगाना सही लगता है। मेरा मानना है कि वे इस टाइटिल के हकदार थे। लेकिन जो लोग (शशिप्रकाश) उनके नाम पर न्यास बनाने की घोषणा करके तैयारी भी आरम्भ कर चुके हैं, वे उन्हें कामरेड तो दूर ,एक साधारण इन्सान भी नहीं मानते थे।


उत्तरी  बिहार के एक गाँव से बुशर्ट-पैजामा एवं हवाई चप्पल पहन के पढ़ने के लिए गोरखपुर पहुँचे शशिप्रकाश ट्रस्ट-सोसाईटी-जनसंगठन बनाकर आजकल इन सबों के एकमात्र स्वयंभू हैं। बाकी सभी पदाधिकारी रबर स्टैम्प हैं। उनका तथा उनके पारिवारिक कुनबे की जीवन शैली उच्च मध्यमवर्गीय स्तर से भी ऊपर है। उन्हीं के शब्दों में कनाट प्लेस के एक फाइव स्टार रेस्तरां में 400-500 की कॉफी पीने की इच्छा अक्सर बलवती हो जाती है।

शब्दों की बाजीगरी में तो ये ओशो के बाप हैं। आपने सही लिखा है कि 20 साल में संगठन का कोई दस्तावेज नहीं लिखा गया। दस्तावेज इसलिए नहीं लिखा क्योंकि तिकड़म से कभी फुर्सत नहीं मिली। इससे भी महत्वपूर्ण यह कि दस्तावेज लिखने का काम सधे और क्रांति के लिए समर्पित नेतृत्व का होता है, किसी दूकान के पंसारी का नहीं।

मेरा मानना है कि कामरेड अरविन्द को उनके उदारतावाद ने मारा। उनके पास दो ही विकल्प थे। या तो शशिप्रकाश से अलग होते या ज़िन्दगी से,क्योंकि पार्टी तो आवरण है। आखिरकार उन्होंने ज़िन्दगी को ही चुना।

‘‘बिगुल’’ के सम्पादक डॉ0 दूधनाथ ने अपने पत्र में सही सवाल खड़ा किया है कि क्या कारण है कि गोरखपुर में विगत छः महीने से बीमार चल रहे कामरेड अरविन्द अपनी बीमारी की गम्भीरता की सूचना नहीं दिये हों, या ऐसा भी हो सकता है कि शशिप्रकाश अपने जरखरीद गुलाम पर धन खर्च करने की आवश्यकता ही महसूस नहीं किए हों। शायद स्कॉच की बोतल कम पड़ने का डर हो।

विवेक कुमार ने अपने लेख में घुमावदार प्रश्न पूछा है, लेकिन मैं तो इस संगठन को तन-मन-धन एवं ईमानदारी से दिया हूँ इसलिए खुलकर साफ-साफ लिख रहा हूँ। जैसे सुब्रतो राय की सहारा कम्पनी में बेरोजगार नौजवान, रिक्शे वाले, ठेले वाले, छोटे दुकानदारों से साईकिल घसीट-घसीटकर धन इकट्ठा करवाती है, ठीक वैसे ही सहज-सरल कार्यकर्ताओं को क्रान्ति के नाम पर अभियान चलवाकर धन जमा कराया जाता हैं। कोई वेज नहीं।

सीधी बात कहें तो दाल-भात-चोखा खाकर इस नटवरलाल के एय्याशी का सामान इकट्ठा करते हैं। क्रान्ति के नाम पर भावनाओं को उभारकर सहज-सरल कार्यकर्ताओं के श्रम की लूट आज भी जारी है। नटवरलाल के दफ्तर में अध्ययन की बातें बहुत होती थीं। मगर फौज के नियम की तरह कार्यकर्ताओं को पांच मिनट भी खाली नहीं रहने दिया जाता। उन्हें तरंगित करने वाले क्रान्ति की बातें बताकर केवल अभियानों के लिए जोश पैदा किया जाता है ताकि सूखी दाल-रोटी खाकर धन पैदा करने वाली मशीन बन जाएं। यह सही है,कहने के लिए जिस तरह रावण-कंस-दुर्योधन-गोडसे-काउत्सकी-लू-शाई-ची के पास अपना तर्क रहा होगा, वैसा इनके पास भी है।


मेरी जानकारी में ये अरविंद के नाम पर गठित हो रहा सातवां सोसाइटी या ट्रस्ट होगा। इसमें भी बाकी ट्रस्ट और सोसाईटियों की तरह रामबाबू-सुखविन्दर के अलावा बाकी ट्रस्टी पारिवारिक कुनबे के ही सदस्य तय हो गए होंगे। तपीश लाख आन्दोलनात्मक कार्यवाही करें,कभी भी पार्टी के सचिव शशिप्रकाश के विश्वासपात्र नहीं बन सकते क्योंकि कॉमरेड अरविन्द की तरह वह भी वंशीय और राजनीतिक वारिस पर सवाल खड़ा कर सकने का खतरा बन सकते हैं। इस संगठन से निकलने वाले सभी साथियों को कायर, पतित भगोड़ा, गद्दार, मनोरोगी और पेटीकोट में सिर छुपाने वाला, मुंशी, पटवारी और अन्य विशेषणों से नवाजा जाता है।

बस कॉमरेड अरविन्द को सलाम करते हुए।


टिप्पणी- मैंने एक पुस्तिका 12 वर्षों का सफरनामा जारी किया है। चाहें तो हमारे ईमेल एड्रेस पर संपर्क कर मंगा सकतें हैं। ईमेल- satyendrabhiruchi@yahoo.com


सांगठनिक क्रूरता ने ली अरविन्द की जान

 
पाठकों की तरफ से राय आ रही है कि और भी वामपंथी पार्टियों में सड़ांध है और नेतृत्व ठस है। खासकर संघर्षों  के इस संकट के समय में जबकि राजसत्ता हर जुबान पर असलहा रख रही है,ऐसी भ्रष्ट  और जनविरोधी वामपंथी पार्टियों से जनता का संघर्ष  आगे बढ़ेगा,कि उम्मीद रखना राजसत्ता की तानाशाही और क्रूरता  को बढ़ावा देना है। इस मसले पर पहला लेख दिल्ली के डॉक्टर विवेक  कुमार का ‘वे छुपते हैं कि चिलमन से झरता रहे उनका नूर’ आप पढ़ चुके हैं। बहस को आगे बढ़ाते हुए वामपंथी पार्टी कम्युनिस्ट  लीग ऑफ इंडिया(रिवाल्यूशनरी)यानी जनचेतना के छात्र संगठन (दिशा )के गोरखपुर से संयोजक रहे अरूण यादव पार्टी में किये काम को साझा कर रहे हैं।


अरुण  यादव,  पूर्व  संयोजक - दिशा छात्र संगठन


वामधारा में यह जानकारी आम है कि जनचेतना जिस वामपंथी पार्टी कम्युनिस्ट  लीग ऑफ इंडिया(रिवोल्यूशनरी) की दुकान है,उसके कर्ताधर्ता शशिप्रकाश हैं। लेकिन जिन कार्यकर्ताओं की जवानी और जिंदगी झोंककर (बहुतों की बर्बाद कर)शशिप्रकाश पुस्तक मेलों में दिख जाते हैं,वे बेचारे उन्हें भाई साहब  के नाम से ही जानते हैं और पार्टी का नाम तो बहुतेरे जान ही नहीं पाते। सक्रियता का आलम यह है कि शशिप्रकाश ने जितने संगठन बना रखे हैं,उतने पूर्णकालिक कार्यकर्ता भी नहीं हैं। घर-परिवार और कॅरियर छोड़कर हम जैसे किसान और निम्न मध्यवर्गीय परिवारों से आने वाले युवाओं को जबतक यह अहसास होता है कि यहां समाज परिवर्तन का ढांचा नहीं दुकानों के मोहरे सज रहे हैं,वे दुकान के दुश्मन  हो चुके होते हैं और उन्हें जान से मारने का प्रयास होता है।


हिंदी की कवयित्री कात्यायनी: कार्यकर्ताओं को जवाब दीजिये.  
सन् 1999 से लेकर 2007 तक मैं भी इस संगठन का सदस्य रहा हूं। इस दौरान गोरखपुर,लखनऊ, इलाहाबाद की पूरी टीम का एक मात्र कार्यभार चंदा मांगना था। ट्रेनों, बसों, ऑफिसों, नुक्कड़ों, और घरों में हम लोग सिर्फ लाखों-लाख का चंदा जुटाते रहे और किताबें बेचते रहे। ट्रेनों में रोज ब रोज चंदा मांगने का आंतक मच गया था। प्रतिदिन चलने वाले यात्री गालियां तक देने लगे थे। लेकिन ये पैसे कहां जाते थे इसका कोई पता नहीं था। पता था तो सिर्फ इतना कि नेतृत्व एक बड़े प्रकाशन संस्थान में तब्दील हो चुका था और हम इस भ्रम थे कि वर्ग संघर्ष का काम आगे बढ़ रहा है। हमारे पास न तो किसी जनसंगठन का कोई औपचारिक ढांचा  था और न ही कोई दस्तावेज और न ही जनाधार। लेकिन फिर भी शशिप्रकाश ने अपने दिव्य ज्ञान से एक कार्यशाला में बताया था कि हमारे जनदुर्ग कैसे होंगे। बंकर कैसे बनेंगे और आम बगावत कैसे होगी।

कामरेड अरविन्द की मौत उनके साथ काम करने वाले सभी साथियों को हतप्रभ कर देने वाली थी। बिगुल के संपादक डॉ.दूधनाथ और सत्येन्द्र (परिकल्पना प्रकाशन के मालिक)ने अपने पत्र में अरविन्द के मौत के जिन कारणों को बताया है उसे मैं अक्षरषः सही मानता हूं। यह त्रासदी राजनीतिक घुटन और नेतृत्व की अमानवीयता का ही परिणाम है। अरविन्द लम्बे समय से बीमार चल रहे थे। उनका इलाज बहुत पहले शुरु हो जाना चाहिए था, लेकिन नहीं हुआ। ये और बात है कि शशिप्रकाश के इलाज के लिए चंदा मांगने का कार्यक्रम अब भी जारी है। सम्पति की सुरक्षा में प्रकाष काफी चौकन्ने हैं,इसके लिए वे कई मुकदमे भी लड़ रहे हैं। कार्यकर्ता दूसरे संगठनों और पार्टियों से अनुभव साझा न कर पायें,इसलिए उन्होने पूरे आन्दोलन को पतित,विघटित घोषित कर दिया है। लेकिन इधर वामपंथी आन्दोलन की सरगर्मियों ने उनकी चिंता काफी बढ़ा दी है। इसलिए ‘‘आंतकवाद विभ्रम और यथार्थ’ नामक पुस्तिका में राजसत्ता से उनका माफीनामा प्रकाशित  हो चुका है और माओवादी पार्टी को सरकार से पहले से ही वे आतंकवादी घोषित  कर चुके हैं।

संगठन का मजदूर पत्र:  मगर अनुवाद कौन करेगा
अरविन्द अपने अन्तिम समय में अपने मां,पिता, भाई,बहन किसी से नहीं मिल पाये और पत्नी की बात ही न की जाय तो अच्छा है। क्योंकि उनके लिए तो दिल्ली के किसी फ्लैट में ‘युद्ध का समय रहा होगा। भला वो कैसे मिलती।’ खैर कामरेड अरविन्द जिनके बीच भी काम करते रहे उनके दिलो में हमेशा  रहेगें। लेकिन अब अरविन्द के नाम पर गोरखपुर में होने वाले जलसे पर सवालउठाना बेहदजरुरी है। राहुल फॉउण्डेशन,परिकल्पना प्रकाशन, जनचेतना, दिशा  छात्र संगठन,बिगुल मजदूर दस्ता,नौजवान भारत सभा, देहाती मजदूर यूनियन,नारी सभा और न जाने कितने ट्रस्ट सोसाइटी,न्यास आदि (संक्षेप में कहें तो शशिप्रकाश एण्ड कात्यायनी प्रा. ली. ) के रुप में जनता और कार्यकर्ताओं से मार्क्सवादी लफ्फाजी के नाम पर खड़ी की गयी अचल संपत्ति और उद्योग धन्धे हैं। यह जलसा अपने पुत्र रत्न को उत्तराधिकार की चाभी सौंपने और नयी संपत्तियों पर कब्जा जमाने तथा चन्दा का आधार तैयार करने का उपक्रम है। इसकी निरन्तरता राहुल फाउण्डेशन,परिकल्पना प्रकाशन,और शशिप्रकाश व कात्यायनी हैं।

सन् 2000 से 2005 के बीच छात्र मोर्चे पर गोरखपुर में काम करने वाले सभी साथियों की पढ़ाई बीच में छुड़ा कर उन्हें नोएडा में मजदुर बनाया गया जिसके पीछे तर्क था कि असली वोल्शेवीकरण मजदुरों के बीच में होगा। लेकिन अपने पुत्र को गोरखपुर से लखनऊ और फिर दिल्ली भेज दिया गया पी.एच.डी. पूरा करने के लिए। वे न तो मजदुर बने और न ही नोएडा के झुग्गियों में रहे। लेकिन चमत्कारी ढ़ंग से उनका वोल्शेवीककरण भी हो चुका है और सचिव बनने की जमींन भी तैयार है।

मैं अपने सांगठनिक सक्रियता के शुरुआती और आखिरी दिनों में अरविन्द के साथ ही था। शुरु में मैंने उनसे पूछा था कि कोई संगठन सही है या गलत इसका फैसला कैसे किया जाय। उनका जवाब था कि संगठन के आय - व्यय के बारे में अगर ठीक से पता चले तो एक हद तक मूल्यांकन किया जा सकता है। आज यह सवाल इस संगठन से पूछा जाना चाहिए। अगर सही जवाब मिले तो स्थिति अपने आप बहुत साफ हो जायेंगी। लेकिन जब किसी ने यह सवाल उठाया तो उसका एक ही जवाब उसे मिला कि इससे सांगठनिक गुप्तता भंग होती है और इसका उत्तर देना वे अपने क्रान्तिकारी शान के खिलाफ समझते हैं। इसलिए इस ग्रुप का कोई भी सदस्य (पारिवारिक कुनबे के कुछ सदस्यों को छोड़ कर) इसका आय - व्यय नहीं जान सकता। जनता के लिए तो बहुत दूर की कौडी़ है ।


अरविन्द: संगठन ही  हत्यारा
इस संगठन से निकला या निकाला गया हर व्यक्ति वर्ग शत्रु बन जाता है। क्योंकि वह इसके रहस्यों से पर्दा उठाने का काम करने लगता है। ऐसे ही एक साथी मुकुल (राहुल फाउंडेशन के सचिव)के निकलने के बाद लखनऊ में मींटिग हुई थी। जिसमें तय हुआ था कि राम बाबू धोखे से मुकुल को अपने घर में बुलाएंगे और वहॉ पहले से पूरी टीम मौजूद रहेगी और फिर मुकुल को मार कर हाथ पैर तोड़ दिया जायेगा। इस मींटिग में मैं भी मौजूद था। यह सिर्फ एक उदाहरण है। षषि प्रकाष के लिए यही वर्ग युद्ध है। जो कि गोरखपुर (दिगम्बर 1990)से नोएडा (देवेन्द्र 2007) तक जारी है।

शशिप्रकाश अपनी पत्नी यानी कात्यायनी के नाम पर अपनी कविताएं छपवा कर उन्हें साहित्यकार बनाने के सफल उपक्रम की आशंका से सभी परिचित हैं। लेकिन इसके अतिरिक्त शालिनी के नाम से उनके पिता को लिखा गया पत्र शशिप्रकाश द्वारा ही रचित है। ऐसा घृणित पत्र आन्दोलन तो क्या आज तक किसी आम आदमी ने भी नहीं लिखा होगा । यह पत्र और मुकुल को लिखा गया पत्र अपने आप में शशिप्रकाश के वर्ग संघर्ष  की कहानी उन्हीं की जुबानी है।

सभी घटनाओं को नोट पैदा करने का अवसर बना देने में प्रकाश  का कोई सानी नही है। भले ही वह एक्सीडेन्ट, बीमारी या मौत ही क्यों न हो। मजदुर आन्दोलन में यह ग्रुप वैसे ही है जैसे भरी बाल्टी के दूध में एक चम्मच टट्टी। मार्क्सवाद, आलोचना, आत्मालोचना, जनवाद, दो लाइनों का संघर्ष, जन संगठन, पार्टी, मजदूर आन्दोलन के आवरण में यह एक आपराधिक नेतृत्व है। ऐसे ही ग्रुप जनता के बीच से वामपंथी आन्दोलनों कि गरिमा लगातार क्षरित करते रहते हैं।




Jul 22, 2010

वे छुपते हैं कि चिलमन से झरता रहे उनका नूर


पिछले दिनों जनज्वार में साहित्य के सरोकार को लेकर एक बहस हुई थी। हमने महसूस किया कि सत्ता के गलियारों में दुम दबाये साहित्यिक बिरादरी के ज्यादातर लोग,कोंकियाने को ही वामपंथ मानते हैं और नरेंद्र मोदी सरीखों पर दो शब्द खर्च कर वे धर्मनिरपेक्षता की ध्वजा लिये,सत्ता के प्रगतिशीलों में सूचीबद्ध कर लिये जाते हैं। उसी बीच सवाल उठा कि साहित्यकारों की इस दुर्गति में बड़ा योगदान क्या उन वामपंथी पार्टियों और संगठनों का है नहीं है जिनका चरित्र जनविरोधी और विचलन ही उनके लिए क्रांतिकारिता हो चुकी है। इस मसले पर पहली टिप्पणी दिल्ली से डाक्टर विवेक  कुमार की तरफ से आयी है। टिप्पणी पर सरोकारी सुझावों को जनज्वार आमंत्रित करता है।

डॉक्टर विवेक कुमार


अरविन्द सिंह
पिछले दिनों मेरे पास एक आमंत्रण आया. विषय था 'इक्किसवीं सदी में भारत का मजदूर आन्दोलन:निरन्तरता और परिवर्तन,दिशा और सम्भावनाएं,समस्याएं और चुनौतियां'. आमंत्रण से ही पता चला कि पूर्वी उत्तर प्रदेश के गोरखपुर में 26-28जुलाई के बीच बिगुल अखबार से जुड़े रहे मजदूर नेता अरविन्द सिंह की स्मृति में यह कार्यक्रम होगा और इस दौरान अरविन्द स्मृति न्यास व अरविन्द मार्क्सवादी अध्ययन संस्थान की स्थापना भी होगी।


कार्यक्रम के सम्पर्क सूत्र सत्यम, मीनाक्षी, कात्यायनी, अभिनव, सुखविन्दर और तपिश हैं। इस आमंत्रण को पढते हुए मेरे मन कई सवाल उठे,   मसलन-

1- सम्पर्क सूत्र के चार सदस्य (सत्यम, मीनाक्षी, कात्यायनी और अभिनव) जो कि जाहिरा तौर पर आयोजकों में भी है एक ही परिवार के सदस्य हैं। हालाँकि  इस क्रांतिकारी परिवार के मुखिया का नाम नहीं दिया गया है। यह एक रहस्य जैसा मामला है। मुखिया हर एक पुस्तक मेले में किताब बेचते और परिचय की औपचारिकता निबाहते दिख जाते हैं लेकिन इन क्रांतिकारी कार्यक्रमों से नदारद होते हैं। वे छुपते हैं कि चिलमन से झरता रहे उनका नूर। सवाल यही है कि उनका नूर उनके परिवार पर ही क्यों आमद है।


2- कामरेड अरविन्द दायित्वबोध पत्रिका से जुड़े हुए थे और मजदूरों के अखबार बिगुल के प्रकाशन में अहम भूमिका अदा करते थे। ज्ञात हो कि इन दोनों पत्रिकाओं में मार्क्सवादी रचनाएं प्रचुर मात्रा में छपा करती हैं। इन दोनों प्रकाशन के सम्पादक क्रमशः डा विश्वनाथ व डा दूधनाथ हैं। मार्क्सवाद अध्ययन संस्थान निर्माण व मजदूरों के मुददे पर इतने बड़े कार्यक्रम में इन दोनों की अनुपस्थिति का निहितार्थ क्या है। यदि ये दोनों लोग नूर की आमद से बेदखल कर दिये गये हैं तो क्या इनके साथ ये पत्रिकाएं भी बेदखल हो गयी हैं?

3- कामरेड अरविन्द मजदूर आन्दोलन से जुड़े रहे। उनका मुख्य कार्यक्षेत्र दिल्ली, उत्तराखंड, हरियाणा व पूर्वी उत्तर प्रदेश रहा। उन्होंने हरियाणा में खेत मजदूरों, दिल्ली में फैक्टरी मजदूरों व मजदूरों के रिहाइश अधिकार,उत्तराखंड में होंडा मजदूरों व पूर्वी उत्तर प्रदेश में छात्रों व मजदूरों के अधिकार की लड़ाइयां लड़ी। इन क्षेत्रों से प्रतिनिधित्व करने वाला कोई मजदूर साथी आपका आयोजक क्यों नहीं बन सका।

4- कामरेड अरविन्द मुख्यतः एक जनसंगठनकर्ता और मजदूर आन्दोलनकर्ता के रूप में याद किया जाता है। उनकी शोक सभा व पिछले साल के उनकी स्मृति में किये गये कार्यक्रम में उनके इसी रूप को याद किया गया। उनके नाम पर मार्क्सवादी अध्ययन संस्थान का निर्माण न केवल उनकी वस्तुगत जन छवि को धुंधला बनाती है साथ ही जन आन्दोलनों की परम्परा का का्रन्तिकारी बातों के तले निषेध करती है। यह मुददा इसलिए भी शक के घेरे में आता है कि इन आयोजकों के पास पहले से ही मार्क्सवाद जिन्दाबाद मंच है। कामरेड अरविन्द के नाम पर मार्क्सवादी संस्थान का निर्माण का निहितार्थ निश्चय ही कुछ और है।

5- आयोजन समिति के अनुसार अरविन्द स्मृति न्यास की स्थापना की घोषणा इसी कार्यक्रम में होगी। इन आयोजकों ने राहुल जन्मशती पर उनके नाम से एक न्यास बना रखा है। इसकी स्थापना में कार्यकर्ताओं की सम्पत्ति की बलि ली गयी और बाद में उन्हें स्वर्ग से विदाई दे दी गई। ऐसे में इस न्यास पर सवाल बनता है। यह न्यास किन मामलों में राहुल फाउंडेशन से भिन्न होगा। कामरेड अरविन्द की लोकप्रियता को न्यास में समेट देने की इस योजना के पीछे जो भी मंशा हो यह अरविन्द के उस फक्कड़पने के साथ क्रूर मजाक है जिसके तले वे जीते रहे और एक दिन चल हमारे बीच से हमेशा के लिए चले गये।

इन सवालों से रूबरू होते हुए मुझे कामरेडअरविन्द के साथ बिताये गये वे लम्हें याद आ रहे हैं जिनके दौरान उन्होंने कुछ महत्वपुर्ण बातें साझा कीं। उन बातों की पुष्टि उनके गुजर जाने के बाद उनके साथ रहे साथियों ने की। मैंने उपर बताया है कि उन्होंने व्यापक इलाकों में काम किया। काम की व्यापकता से आप को लग सकता है कि वे मुख्य नेतृत्व थे। लेकिन ऐसा नहीं था।

उन्हें हरियाणा व दिल्ली के काम में असफल घोषित कर उत्तराखंड भेजा गया और कुछ ही दिन बाद प्रकाशन का काम सम्भालनें वाले व्यक्ति ने उन्हें गोरखपुर शहर जाने का संदेश पकड़ाया। आलोचना आत्मालोचना की प्रकिया में वे बाहर फेंक दिये गये। कठिन हालात, अकेलापन, जीवन साथी की अनुपस्थिति और दुत्कार से त्र्रस्त इस साथी के मन में क्रांतिकारी के रूप में बने रहने की इच्छा ही मुख्य थी। जन संगठन व कार्यकर्ताओं के बीच जीने वाले इस साथी का अंतिम समय घोर उपेक्षा के बीच गुजरा।

जिस समय वे अपने इन हालात के बारे में बता रहे थे ठीक उसी समय संगठन के भाई साहब अपने बेटे को लेनिन का दर्जा नवाज रहे थे। ठीक इसी समय संगठन की कार्यशैली व विचार के मुददे पर वरिष्ठ साथियों को पतित लम्पट बताकर बाहर किया जा रहा था। इस पूरे प्रकरण में विचार व संगठन का मानक भाईसाहब बने रहे। बीस सालों से घोषणापत्र, संविधान, कार्यक्रम इत्यादि के अभाव को बनाये रखने के पीछे जो भी मंशा हो लेकिन कांशीराम की तरह वाचिक परम्परा को निबाहते हुए भाईसाहब ने सबको अपनी कुर्सी के पाये के नीचे ही रखा और अपनी सम्पति व उत्तराधिकार को सुरक्षित रखा।

इनके अनुसार क्रांतिकारी कैंप विघटित हो चुके है,सीपीआई माओवादी आतंकवादी पार्टी है व शेष संशोधनवादी हैं, पार्टी बनाने के लिए सांस्कृतिक पुनर्जागरण जरूरी है,आदि आदि। इस ढांचे के भीतर दो ही सत्य थे। एक भाईसाहब और दूसरी  किताबें। शेष निमित मात्र थे और  संगठन कार्यकर्ताओं की औकात इन दोनों   के बरक्स थी। यह बताना जरूरी है कि यहां लोगों से अधिक संगठन बनाये गये। यहां न्यास,संगठन,और प्रकाशन की तिकड़ी बनाई गई जिसमें पार्टी के पूर्णकालिक और अवैतनिक कार्यकर्ता न केवल 16 से 18 घंटे काम करते हैं अपितु उपरोक्त तिकड़ी के लिए आम जन से पैसा मांगने का भी काम करते हैं। इसकी बदौलत आज इनके पास करोड़ों रूपये की परिसम्पत्ति खड़ी हो चुकी है।

वहीं कार्यकर्ताओं की समय समय पर स्वर्ग से विदाई का कार्यक्रम भी चलता रहता है। महाराजगंज के कामरेड रघुवंश मणि की हत्या की तो इस संगठन ने सार्वजनिक चर्चा तक नहीं की और उनका परिवार इस समय तबाही के कगार पर है.यह अलग बात है कि ये कार्यकर्ता गोरख पांडे की कविता के वर्णित मजदूर की तरह अड़ कर यह नहीं कह सके कि अब बस,अधिशेष निचोड़ने का यह नया तरीका अब नहीं चलेगा।

दरअसल कामरेड अरविन्द की स्मृति में किया जा रहा यह कार्यक्रम उपर से देखने पर मजदूर,आन्दोलन,जन संगठन व पहलकदमी से जुड़ा हुआ दिखता है जबकि इसके अर्न्तवस्तु में न्यास व संस्थान बनाना है। जिसका निहितार्थ है आर्थिक लाभ। यह कामरेड अरविन्द की स्मृति के साथ क्रूर  मजाक है। ये आयोजक उनकी स्मृति को एक ऐसे ढोल में बदल देना चाहते हैं जिसे पीट पीट कर पैसा बनाया जा सके। आप सभी से गुजारिश है कि न केवल इस कार्यक्रम का बहिष्कार करें साथ ही आयोजकों के बुरे मंशा का भी पर्दाफाश करें।

Jul 21, 2010

साहस की पत्रकारिता और दमन की राजनीति


सरकार जब अपनी ही जनता को हर कीमत पर हराने की ठान ले,हत्याओं और दमन को विकास के लिए जरूरी बोले,तो सवाल समाज की तरफ से उठता है कि देश नागरिकों का है,या दुश्मनों का। पूर्वोत्तर के सभी राज्य,जम्मू कश्मीर समेत मध्य भारत का एक बड़ा हिस्सा इस समय सेना और अर्धसैनिक बलों के कब्जे में है जहां सरकार सिर्फ सुविधा मुहैया कराने की भूमिका तक सीमित रह गयी है। सबसे त्रासद यह है कि केंद्र हो या राज्य सरकारें देश की इस स्थिति पर जनता के प्रतिनिधि के रूप नहीं,बल्कि कमान के मेजर के तौर पर सामने आ रही हैं,जिसके लिए मुल्क का मतलब पूंजीपति घरानों को चलाना है।

सरकार विद्रोहियों से निपटने के लिए जिन तरीकों को अमल में ला रही है,उसे देख संदेह होने लगा है कि,खुद सरकार कहीं मुल्क के लोकतांत्रिक मुल्यों को बोझ तो नहीं मान चुकी है। हमारे समय के इन्ही जरूरी सवालों से जनपक्षधर पत्रकार कैसे निपटें,को लेकर दिल्ली के गांधी शांति प्रतिष्ठान में ‘जर्नलिस्ट फॉर पीपुल’की ओर से 20जुलाई को ‘अघोषित आपातकाल में पत्रकारों की भूमिका’ विषय पर एक संगोष्ठी का आयोजन किया गया.  

आर्यसमाज  नेता और समाजिक कार्यकर्ता स्वामी अग्निवेष ने कहा कि आज देश में आपातकाल जैसी स्थितियां हैं। स्वतंत्र पत्रकार हेमचंद्र पांडेय और भाकपा (माओवादी) के प्रवक्ता कॉमरेड आजाद की कथित मुठभेड़ पर सवाल उठाते हुए स्वामी अग्निवेष ने उनकी शहादत को सलाम पेश किया। और कहा कि इस इस दौर में पत्रकारों को साहस के साथ खबरें लिखने की कीमत चुकानी पड़ रही है। ‘इकोनॉमिक एंड पॉलिटिकल वीकली’ के  सलाहकार संपादक और सामाजिक कार्यकर्ता गौतम नवलखा ने हेमचंद्र पांडेय और आजाद की हत्या को शांति प्रयासों के लिए धक्का बताया। गौतम ने कहा कि आज राजसत्ता का दमन अपने चरम पर है। देश के हर हिस्से में सरकार अलग-अलग तरीके से पत्रकारों का दमन कर रही है।

संगोष्ठी को संबोधित करते हुए ‘समकालीन तीसरी दुनिया’के संपादक आनंद स्वरूप वर्मा ने कहा कि अब सरकारें अपने बताए हुए सच को ही प्रतिबंधित कर रही हैं। और जो भी पत्रकार इसे उजागर करने की कोशिश करता है उसे दमन झेलना पड़ता है.सही सूचनाएं पहुंचाने वाले संगीनों के साए में जी रहे हैं. उन्होने इस स्थिति के विरोध के लिए संगठन बनाने की जरूरत पर बल दिया.

इस मौके पर ‘हार्ड न्यूज’के संपादक अमित सेन गुप्ता भी मौजूद थे। उन्होने कहा कि आज के दौर में पत्रकारिता कारपोरेट घरानों के इशारे पर संचालित हो रही है। खासकर इलेक्ट्रॉनिक मीडिया की स्थिति और भी बुरी है। न्यूज चैनल के संपादक बॉलीवुड सितारों के गलबहियां करते नजर आते हैं। और अभिनेताओं से खबर पढ़वाई जाती है। नेता-कारपोरेट घरानों और मीडिया के गठजोड़ पर बोलते हुए अमित ने कहा कि देश के अलग अलग हिस्से में हुई घटनाओं को अलग अलग तरीके से पेश किया जाता है। खासकर एक संप्रदाय विशेष के लिए मुख्यधारा की मीडिया पूर्वाग्रह से ग्रस्त है।

कवि नीलाभ ने कहा कि आज के दौर में पत्रकारिता के मूल्यों को बचाने के लिए बड़े पैमाने पर ‘सांस्कृतिक आंदोलन’की जरूरत है। सरकारी दमन के मसले पर हिंदी के लेखकों की चुप्पी पर सवाल उठातेहुए उन्होने संस्कृति-कर्मियों, कलाकारों,चित्रकारों की एकता और आंदोलन की जरूरत और उनकी पक्षधरता पर  बल दिया।

गोष्ठी को पत्रकार पूनम पांडेय ने भी संबोधित किया और कहा कि आपातकाल केवल बाहर ही नहीं है बल्कि समाचार पत्रों के दफ्तरों में भी पत्रकारों को एक किस्म के अघोषित आपातकाल का सामना करना पड़ता है। इस मौके पर हिंदी के तीन अखबारों (नई दुनिया, राष्ट्रीय सहारा, दैनिक जागरण) के खिलाफ निंदा प्रस्ताव पास किया गया। इन अखबारों ने पत्रकार हेमचंद्र पांडेय की मुठभेड़ में हुई हत्या के बाद तत्काल नोटिस जारी करते हुए हेमचंद्र को पत्रकार मानने से ही इंकार कर दिया था।

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इस गोष्ठी को समायकि वार्ता से जुड़ी पत्रकार मेधा, उत्तराखंड पत्रकार परिषद के सुरेश नौटियाल, जर्नलिस्ट यूनियन फॉर सिविल सोसायटी के शाह आलम और ‘समयांतर’के संपादक पंकज बिष्ट,पीयूसीएल के संयोजक चितरंजन सिंह ने भी संबोधित किया। गोष्ठी में पत्रकार आनंद प्रधान, दिलीप मंडल, मुकुल सरल, नवीन कुमार, अरविन्द शेष, पियूष पन्त,कवि रंजीत वर्मा, सुधीर सुमन, रामजी यादव और फ़िल्मकार झरना झवेरी भी मौजूद थीं.

गोष्ठी के आखिर में पत्रकार हेमचंद्र की याद में हर साल दो जुलाई को एक व्याख्यान माला शुरु करने की घोषणा की गई। गोष्ठी का संचालन पत्रकार भूपेन ने किया और विषय प्रवर्तन राजेश आर्य ने किया. कार्यक्रम में बड़ी तादात में पत्रकार, साहित्यकार, छात्र, सामाजिक कार्यकर्ता मौजूद थे.

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