Nov 13, 2009

संस्कृतिकर्मियों ने मांगा शशि भूषण की मौत का हिसाब

शशि भूषण  प्रगतिशील मुल्यों के एक सजग युवा संस्कृतिकर्मी थे जो सामंती-साम्राज्यवादी अपसंस्कृति के खिलाफ जनसंस्कृति के लिए प्रतिबद्धता के साथ रंगमंच पर आजीवन डटे रहे.......



राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय के प्रथम वर्ष के छात्र शशि भूषण  हमारे बीच नहीं रहे। उनकी मौत 4नवंबर को नोएडा के नोएडा मेडिकेयर सेंटर (एनएमसी) अस्पताल में डेंगू के कारण हो गयी थी। उनकी याद में दोस्तों-शुभचिंतकों की ओर से 12 नवंबर की शाम  चार बजे ललित कला अकादमी के कौस्तुभ सभागार में एक शोकसभा का आयोजन किया गया था। शशि आज रंगमंच और दोस्तों के बीच नहीं हैं। फिर भी उनकी जीवंतता और कम समय में रंगमंच में व्यापक शाख गदगद कर देने वाली है।

शोकसभा में शशि भूषण से जुड़े संस्कृतिकर्मियों और पत्रकारों ने बड़ी हिस्सेदारी की। हिंदी आलोचक सुधीर सुमन ने कहा कि ‘शशिभूषण नहीं रहा, इसका मुझे यकीन ही नहीं हो रहा है। बहुत समय बाद दिल्ली के श्रीराम सेंटर के पास एक दिन मुझे अचानक मिला था। एनएसडी के पूर्व छात्र विजय कुमार के साथ 1999में ‘रेणु के रंग’लेकर पूरे देश के भ्रमण पर निकला था,तबसे उससे कभी-कभार ही मुलाकात हो पाती थी। इस बीच वह उषा गांगुली की टीम में एक साल रहा, गोवा नाट्य अकादमी से डिप्लोमा कोर्स किया। संजय सहाय के रेनेसां के लिए वर्कशाप किए। बंबई में रहा और वहां भी सेंटजेवियर के छात्रों के लिए वर्कशॉप करता था। बंबई के रास्ते ही वह एनएसडी में पहुंचा था। शशि द्वारा किए गए नाटकों को उसको जानने वाले याद कर रहे हैं। किसी को हाल ही में मिर्जा हादी रुस्वा के उमरावजान अदा के उसके निर्देशन की याद आ रही है तो किसी को बाकी इतिहास और वेटिंग फॉर गोदो में उसके अभिनय की। कोई रेणु की प्रसिद्ध कहानी रसप्रिया में उसकी अविस्मरणीय भूमिका को याद कर रहा है तो कोई हजार चैरासीवें की मां और महाभोज में निभाए गए उसके चरित्रों को।’

कौस्तुभ सभागार ऐसे दर्जनों सस्कृतिकर्मी और उनके सहपाठी-सहकर्मी मौजूद थे जिनके पास षषि से जुड़ी ढेरों यादें थीं,संस्मरण थे। दोस्तों से ही पता चला कि शशि भूषण ने बचपन में ही पटना से रंगकर्म की शुरुआत की थी। अपने उम्र के तीसवें साल में दस्तक दे रहे शशि का रंगमंचीय कॅरिअर 22 साल का रहा। उन्होंने निर्देशक, अभिनेता और थियेटर म्यूजिक के क्षेत्र में जमकर काम किया और वह देशभर में इसके लिए जाने जाते हैं। राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय आने के पहले उन्होंने बंगाल में उषा गांगुली के साथ एक वर्ष तक काम किया और उन्होंने गोवा नाट्य एकेडमी से भी प्रशिक्षण प्राप्त किया था।

वामपंथी सांस्कृतिक संगठन ‘हिरावल’ के साथ रंगमंच के समाज में प्रवेश करने वाले शशि जन संस्कृति की मशाल थामे रहे। राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय के प्राध्यापक सुरेश शेट्टी ने उसकी मौत को सदमा बताते हुए कहा कि इस मामले में अस्पताल की लापरवाही साफ नजर आती है। लापरवाही की जांच के लिए राश्ट्रीय नाट्य विद्यालय (रानावि) ने एक कमिटी गठित की है। कमेटी में रानावि के छात्र, कर्मचारी, प्राध्यापक और डाक्टर शामिल हैं। शशि के साथ पिछले पंद्रह वर्षों से जुड़कर काम करने वाले रानावि स्नातक विजय कुमार ने कहा कि अगर स्कूल मामले को सही तरीके से नहीं उठाता है तो वह रानावि की डिग्री भी ठुकराने से नहीं हिचकेंगे। उन्होंने नोएडा मेडिकेयर सेंटर (एनएमसी) हास्पीटल के बारे में कहा कि जो अस्पताल किडनी रैकेट और दूसरे कई संगीन आरोपों में फंसा है उनसे राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय का संपर्क क्यूं है, यह समझ से परे है। उन्होंने कहा की सारी बातें साफ होनी चाहिए नहीं तो कल रानावि के किसी और छात्र की भी जान जा सकती है।

शोकसभा में शशि से जुड़े कई लोगों ने उनके परिवार वालों को न्याय दिलाने का भरोसा दिलाया। शोकसभा का संचालन मृत्युंजय प्रभाकर ने किया।

Nov 12, 2009

सरकार आदिवासियों से माफी मांगे

हिमांशु कुमार

छत्तीसगढ़ में मजदूर आंदोलन के प्रमुख नेता रहे शंकर गुहा नियोगी कहा करते थे छत्तीसगढ़ के बाद कोमा लगाकर बस्तर के बारे में सोचा करो। मैं भी मानता हूं कि छत्तीसगढ़ और बस्तर दोनों अलग-अलग हैं। यह अंतर मैं व्यक्तिगत तौर पर इसलिए भी मानता हूं कि बस्तर के लोगों ने मुझपर उस समय भरोसा किया है जब सलवा जुडूम की वजह से भाई-भाई दुश्मन बने हुए हैं। एक भाई सलवा जुडूम के कैंप में है तो दूसरा गांव में रह रहा है। सलवा जुडूम वाला यह सोचने के लिए अभिषप्त है कि गांव में रह रहा भाई माओवादियों के साथ मिलकर उसकी हत्या करा देगा तो,गांव वाला इस भय से त्रस्त है कि पता नहीं कब उसका भाई सुरक्षा बलों के साथ आकर गांव में तांडव कर जाये।

मैं बस्तर में 17 साल से रह रहा हूं और इस भूमि पर मेरा अनुभव आत्मीय रहा है। उत्तर प्रदेश के मुज़फ्फरनगर से सर्वोदयी आंदोलन की सोच को लेकर मैं बस्तर उस समय आया जब मेरी शादी के महीने दिन भी ठीक से पूरे नहीं हुए थे। तबसे मैं बस्तर के उसी पवलनार गांव में रह रहा था जिसे छत्तीसगढ़ सरकार ने हाल के महीनों में उजाड़ दिया है। मुझे अच्छी तरह याद है कि जंगलों के बीच मेरी अकेली झोपड़ी थी। कई बार ऐसा होता था कि मैं पांच-छह दिनों के लिए गावों में निकल जाया करता था और पत्नी अकेली उस बियाबान में होती थी। लेकिन हमने जंगलों के बीच जितना खुद को सुरक्षित और आत्मीयता में पाया उतना हमारे समाज ने कभी अनुभव नहीं होने दिया। आज आदिवासियों के बीच इतने साल गुजारने के बाद मैं सहज ही कह सकता हूं कि शहरी और सभ्य कहे जाने वाले नागरिक इनकी बराबरी नहीं कर सकते।
याद है कि हमने पत्नी के सजने-संवरने के डिब्बे को खाली कर थोड़ी दवा के साथ गांवों में जाने की शुरूआत की थी। डाक्टरों से साथ चलने के लिए कहने पर वह इनकार कर जाते थे। हां डॉक्टर हमसे इतना जरूर कहा करते थे कि आपलोग ही हमलोगों से कुछ ईलाज की विधियां सीख लिजिए। आज भी हालात इससे बेहतर नहीं है। छत्तीसगढ़ राज्य बनने के बाद गांवों में सरकारी मशीनरी की सुविधाएं पहुंचाने के बजाए लूट की योजनाएं बनायीं। जो चौराहे के नेता थे वे राज्य के हो गये, छोटे व्यापारी खदानों के बड़े ठेकेदार-व्यापारी बन गये और लूट के अर्थशास्त्र को विकासवाद कहने लगे। छोटा सा उदाहरण भिलाई स्टील प्लांट का है जिसके लिए हमारे देश में कोयला नहीं बचा है, सरकार आस्ट्रेलिया से कोयला आयात कर रही है। जाहिर है लूट पहले से थी लेकिन राज्य के बनने के बाद कू्रर लूट की शुरूआत हुई जिसके पहले पैरोकार राज्य के ही लोग बने जो आज सलवा जुडूम जैसे नरसंहार अभियान को जनअभियान कहते हैं।

छत्तीसगढ़ में जो लूट चल रही है उसने क्रूर रूप ले लिया है। क्रुर इसलिए कि आदिवासी अगर जमीन नहीं दे रहे हैं तो बकायदा फौजें तैनात कर उन्हें खदेडा जा रहा है, कैंपों में रहने के लिए मजबूर किया जा रहा है। सरकार अपने ही बनाये कानूनों को ठेंगे पर रख ओएमयू कर रही है। बंदरबाट के इतिहास में जायें तो भारत सरकार जापान को 400 रूपये प्रति क्विंटल  के भाव से लोहा बेचती है तो छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर के छोटे व्यापारियों को 6000 हजार रूपये प्रति क्विंटल। अब जब आदिवासी राज्य प्रायोजित लूट का सरेआम विरोध कर रहा है तो भारतीय सैनिक उसका घर, फसलें जला रहे हैं, हत्या बलात्कार कर रहे हैं। ऐसी स्थिति में अशांति नहीं होगी तो क्या होगा।
सरकार बार-बार एक शगुफा छोड़ती है कि माओवादी विकास नहीं होने दे रहे हैं, वह विकास विरोधी हैं। मैंने राज्य सरकार से सूचना के अधिकार के तहत जानकारी मांगी कि वह बताये कि पिछले वर्षों में स्वास्थ कर्मियों, आंगनबाड़ी कार्यकर्ताओं, शिक्षकों और हैंडपंप लगाने वाले कितनों लोगों की माओवादियों ने हत्याएं की हैं, सरकार का जवाब आया एक भी नहीं। वनवासी चेतना आश्रम बीजापुर और दंतेवाड़ा के जिन गांवों में काम करता है उनमें से गांवों के लोगों ने बार-बार शिकायत किया कि फौजें और एसपीओ उनकी फसलें इसलिए जला रहे हैं कि लोग भूख से तड़प कर कैंपों में आयें। जबकि इसके उलट माओवादियों की ओर से संदेश आया कि 'हिमांशु कुमार 'वनवासी चेतना आश्रम' की ओर से जो अभियान चला रहे हैं हम उसका स्वागत करते हैं।' देश जानता है कि वनवासी चेतना आश्रम सरकार और माओवादी हिंसा दोनों का विरोध करता है क्योंकि इस प्रक्रिया में जनता का सर्वाधिक नुकसान होता है। लेकिन एक सवाल तो है कि सरकार अपने ही बनाये कानूनों को ताक पर रख कर देशी-विदेशी  कंपनियों के साथ मिलकर लूट का विकासवाद कायम करना चाहेगी तो जनता, अंतिम दम तक लड़ेगी।
हमें सरकार इसलिए दुश्मन मानती है कि हमने समाज के व्यापक दायरे में बताया कि सलवा जुडूम नरसंहार है और कैंप आदिवासियों को उजाड़ने वाले यातनागृह। फिलहाल कुल 23 कैंपों में दस से बारह हजार लोग रह रहे हैं। पंद्रह हजार लोगों को हमने कैंपों से निकालकर उनको गांवों में पहुंचा दिया है। इस दौरान राज्य के एक कलेक्टर द्वारा धान के बीज देने के सिवा, सरकार ने कोई और मदद नहीं की है।


अगर सरकार सलवा जुडूम के अनुभवों से कुछ नहीं सिखती है तो मध्य भारत का यह भूभाग कश्मीर और नागालैंड के बाद यह भारत के मानचित्र का तीसरा हिस्सा होगा जहां कई दशकों तक खून-खराबा जारी रहेगा। सरकारी अनुमान है कि सलवा जुडूम शुरू होने के बाद माओवादियों की ताकत और संख्या में 22 गुना की बढ़ोतरी हुई है। अब ऑपरेशन ग्रीन हंट की कार्यवाही उनकी ताकत और समर्थन को और बढ़ायेगी। सरकार के मुताबिक फौजें माओवादियों का सफाया करते हुए पुलिस चौकी स्थापित करते हुए आगे बढ़ेगीं। जाहिर है लाखों की संख्या में लोग वनों में भागेंगे। उनमें से कुछ की हत्या कर तो कुछ को बंदी बनाकर फौजें पुलिस चौकियों के कवच के तौर पर इस्तेमाल करेंगी। हत्या, आगजनी, बलात्कार की अनगिनत वारदातों के बाद थोड़े समय के लिए सरकार अपना पीठ भी थपथपा लेगी। लेकिन उसके बाद अपनी जगह-जमीन और स्वाभिमान से बेदखल हुए लोग फिर एकजुट होंगें, चाहे इस बार उन्हें संगठित करने वाले माओवादी भले न हों।
मैं सिर्फ सरकार को यह बताना चाहता हूं कि अगर वह अपने नरसंहार अभियान ऑपरेशन ग्रीन हंट को लागू करने से बाज नहीं आयी तो हत्याओं-प्रतिहत्याओं का जो सिलसिला शुरू होगा मुल्क की कई पीढ़ियां झेलने के लिए अभिषप्त होंगी। यह सब कुछ रूक सकता है अगर सरकार गलतियां मानने के लिए तैयार हो। सरकार माने और आदिवासियों से माफी मांगे कि उसने बलात्कार किया है, फसलें जलायीं है, हत्याएं की हैं। आदिवासियों की जिंदगी को तहस-नहस किया है। सरकार तत्काल ओएमयू रद्द करे, बाहरी हस्तक्षेप रोके और दोषियों को सजा दे। जबकि इसके उलट सरकार पचास-सौ गुनहगारों को बचाने के लिए लोकतंत्र दाव पर लगा रही है.

(लेखक दंतेवाडा में गाँधीवादी संस्था 'वनवासी चेतना आश्रम' से जुड़े हैं )

Nov 2, 2009

शांति के लिए भूख हड़ताल के दस वर्ष

शान्ति की सुगंध


इरोम शर्मिला



जब यह जीवन समाप्त हो जायेगा

तुम मेरे मृत शरीर को

ले जाना

रख देना फादर कूब्रू की धरती पर


आग की लपटों में

अपने मृत शरीर को राख किये जाने

उसे कुल्हाडी और कुदाल से नोचे जाने का ख़याल

मुझे ज़रा भी पसंद नहीं



बाहरी त्वचा का सूख जाना तय है

उसे ज़मीन के नीचे सड़ने देना

ताकि वह अगली पीढियों के किसी काम आये

ताकि वह किसी खदान की कच्ची धातु में बदल सके


वह मेरी जन्मभूमि कांगलेई से

शान्ति की सुगंध बिखेरेगी

और आने वाले युगों में

समूची दुनिया में छा जायेगी
 
                                                                                                      (अनुवाद- मंगलेश डबराल)

Oct 30, 2009

सैनिकों ने किया तीन महिलाओं का बलात्कार, एक की मौत

अजय प्रकाश


कंधमाल जिले के हाथीमंुडा पंचायत का सरपंच प्रदीप मल्लिक जब दारिंगबाड़ी पुलिस स्टेषन पहुंचा तो थानाध्यक्ष ने तहरीर हवा में उछाल दी। सरपंच ने तहरीर में लिखा था कि सीआरपीएफ,स्पेषल आपरेशन ग्रुप और ग्रेहाउंड के गष्ती दल ने कांबिंग आपरेशन के दौरान सोनपुर पंचायत के सड़ाकिया गांव की तीन महिलाओं का 17-18 अक्टूबर को गैंग रेप किया। जिनमें से एक की मौत हो चुकी है। अन्य दो घायलावस्था में स्थानीय डाक्टरों से ईलाज करवा रहीं हैं। यह जानकर थानाध्यक्ष बजाय की कोई कार्यवाही करता उल्टे उसने प्रदीप को इनकाउंटर में मार देने की धमकी दे डाली। मिली जानकारी के मुताबिक एक महीने से अधिक का समय बीत जाने पर भी मुकदमा दर्ज नहीं हुआ है। प्रगति यह है कि पीड़ित परिवारों के जो लोग थोड़ा बोलने के लिए कुनमुना रहे थे वह प्रषासनिक असर में चुप्पी साधे हुए हैं।

सलवा जुडूम भाग दो यानी ‘आपरेशन ग्रीन हंट’ में जुटी सरकार, नवंबर से और व्यापक स्तर पर क्या करेगी, का अंदाजा इन घटनाओं से लगाया जा सकता है।  सामाजिक संगठनों और राजनीतिक पार्टियों के उन संदेहों की भी अब पुश्ट होने लगी है कि इस बहाने सरकार बड़े स्तर पर आदिवासियों का नरसंहार कर विस्थापित करने की तैयारी में है। ओडिसा फारेस्ट मजदूर यूनियन के महासचिव दंड पाणी ने बताया कि माओवाद प्रभावित इलाकों में कांबिंग आपरेशन के दौरान पुलिस और अर्द्धसैनिक बलों के जवान हत्या, बलात्कार और आगजनी को अपनी कार्यषैली के तौर पर इस्तेमाल कर रहे हैं।

बातचीत के दौरान कंधमाल जिले के सामाजिक कार्यकर्ता नरेंद्र मोहंती ने बताया कि ओडिषा की राजधानी भुनेष्वर में 20 अक्टूबर को किसान मजदूर आदिवासी संघ, ओडिषा फारेस्ट मजदूर यूनियन, प्राकृतिक संपदा सुरक्षा समिति-काषीपुर, नीरामगीरी सुरक्षा समिति, मलकानगीरी जिला आदिवासी संघ और अन्य दस जनवादी संगठनों की तरफ से एक प्रदर्षन का आयोजन हुआ था। प्रदर्षन माओवादियों के नाम पर आदिवासियों और दलित-पिछड़ी जातियों का दमन बंद करने, भूमि सुधार अधिनियम बी-2 को लागू करने और आदिवासियों की जमीनों पर उनका कब्जा सुनिष्चित करने के लिए हुआ था। इसके अलावा देषी-विदेषी कंपनियों से किये गये ओएमयू को तत्काल रद्द करने तथा फाॅरेस्ट मजदूर खाद्य सुरक्षा सुनिष्चित करने की मांग रखी गयी थी। लेकिन सरकार मांगों पर गौर करने के मुकाबले प्रदर्षनकारियों को भुनेष्वर न पहुंचने देने में ही जोर लगायी रही।


मलकानगीरी, कोरापोट, रायगढ़ा, गजपति, गंजाम, डेंटानाल, अनगुल, संुदरगढ़, मयूरभंज, केन्दुझार जिलों से पहुंचने वाले तीन हजार लोगों को सुरक्षाबलों ने या तो उनकों गांव में ही नजरबंद कर दिया, नहीं तो वाहनों को सीज कर लिया। फिर भी लगभग दस हजार प्रदर्षनकारी भूनेष्वर पहुंच गये थे। मजदूर नेता दंड पाणी बताते हैं, हमें लगा जैसे तमाम वाहनों को सीज कर लिया गया उसी तरह सड़ाकिया गये ट्रक को भी प्रषासन ने सीज कर लिया होगा। लेकिन हम जब 21 को लौट कर क्षेत्र में पहुंचे तो पता चला कि सीआरपीएफ, ग्रेहाउंड और स्पेषल आपरेषन ग्रुप के संयुक्त खोजी दष्ते ने तांडव मचाया है। इसी जिले के गदापुर पंचायत के दादरावाड़ी गांव के पांणामणिक का सुरक्षाबलों ने हाथ-पांव तोड़ दिया तो टेक्टांगिया गांव की सात महिलाओं को उठा ले गये। इतना ही नहीं रैली में षामिल होने आ रहे 7 लोगों को रामनागुढ़ा तथा रायगढ़ा स्टेषन से उठाया और हार्डकोर माओवादी बताकर बंद कर दिया।

अपनी मांगों के साथ भुनेष्वर पहुंचने वालों में सड़ाकिया गांव की वह तीन महिलाएं भी षामिल थीं जिनका भारतीय सेना ने बलात्कार किया। राजधानी भुनेष्वर से साढे़ तीन सौ किलोमीटर दूर कंधमाल जिले का यह गांव फिलहाल दहषत में है और कोई ग्रामीण किसी तरह की बातचीत करने से कतरा रहा है। सुरक्षाबलों के तांडव से त्रस्त गांवों का दौरे पर जाने वाली जांच टीम भी इलाके में इसी वजह से नहीं जा पायी है कि ग्रामीण प्रषासनिक दबाव और सुरक्षा बलों तांडव के बाद बेहद सहमें हुए हैं।

लेकिन सुरक्षाबलों से खौफजदा ग्रामीणों का यह दर्द कहीं से भी सरकारों को समझ में नहीं आ रहा है।  आने वाले महीनों में  कांबिंग आपरेषनों से त्रस्त आदिवासियों  और विस्थापन का दंष झेल रहे स्थानीय नागरिकों का वास्ता अब दरिंदगी के लिए ख्यात राट्रीय राइफल्स के जवानों से होने वाला है जो सीधे तौर पर भारतीय सेना की देखरेख में काम करते हैं।

Oct 10, 2009

दिल्ली पुलिस का इंसाफ

                                                                                                                                           
गुस्से और बौखलाहट से भर देने वाली ये तस्वीरें आपने देख ली होंगी। ये तस्वीरें दिल्ली प्रेस की अंग्रेजी पत्रिका कारवां से जुड़े पत्रकार जोएल इलिएट की हैं। इससे मिलती-जुलती तस्वीरें हमने इराक के अबू गरेब जेल की देखी थीं। लेकिन यह जेल की नहीं, दिल्ली के सड़कों के जेल बन जाने की बाद की हैं।

पुलिसिया काम के इस नमूने को हम इसलिए देख पा रहे हैं कि यह एक अमेरिकी पत्रकार के साथ किया गया इंसाफ है। पत्रकार जोएल इलिएट पत्रिका कारवां के साथ मई महीने से जुड़े हुए थे। इससे पहले वे न्यूयार्क टाइम्स, द क्रिष्चियन सांइस मानिटर, सैन फ्रांसिस्को, क्राॅनिकल और ग्लोबल पोस्ट के स्वतंत्र पत्रकार के तौर पर काम करते रहे हैं।

दिल्ली के जंगपुरा की एक सड़क पर 6 अक्टूबर की रात  पुलिस द्वारा पीटे जा रहे एक आदमी को बचाने के चक्कर में खुद षिकार हो गये जोएल फिलहाल अपने देष अमेरिका लौट गये हैं। हमें तो खुषी है वे बेचारे भारत के नहीं हैं, उपर से हिंदी के तो बिल्कुल भी नहीं। नहीं तो पुलिस वाले धमकाकर चुप करा देते, नहीं मानने पर मीडिया घराने का मालिक नौकरी से निकाल देता और बात अगर इससे भी नहीं बनती तो लड़कीबाज, दलाल या रैकेटियर बनाकर रगड़ देते। मौका तो रात का था ही जिसमें यह सब आसान होता।

यहां राहत है कि कारवां पत्रिका के प्रबंध संपादक अनंत नाथ और अमेरिकी दुतावास वाले इस मामले को गंभीरता से उठा रहे हैं। रही बात बिरादरों की तो, सब पूछ रहे हैं कि हम क्या कर सकते हैं......


Oct 8, 2009

मत बैठना पी टी ऊषा

भारतीय खेल प्राधिकरण की ओर से मध्य प्रदेश में राष्ट्रीय सीनियर अथलेटिक्स स्पर्धा का आयोजन हुआ था. मेजबानी के लिए धावक पीटी ऊषा को भी बुलाया गया. पीटी ऊषा देश की सर्वश्रेठ एथेलेटिक्स हैं. लेकिन युवा और खेल मामलों के मंत्री के आव-भगत में लगे अधिकारियों ने उनकी उपेच्छा की. उपेच्छा से आहत पीटी ऊषा मीडिया से मुखातिब होते ही रो पड़ीं.
उसके बाद बाद बयानबाजियों और माफियों का भी एक दौर चला.........
फिलहाल  पीटी ऊषा के सम्मान में हिंदी के वरिष्ठ कवि वीरेन डंगवाल की कविता पढ़ें..............

पी टी ऊषा
वीरेन डंगवाल




काली तरुण हिरनी अपनी लम्बी चपल टांगों पर उड़ती है

मेरे ग़रीब देश की बेटी

आंखों की चमक में जीवित है अभी

भूख को पहचानने वाली

विनम्रता

इसीलिए चेहरे पर नहीं है

सुनील गावस्कर की-सी छटा

मत बैठना पी टी ऊषा

इनाम में मिली उस मारुति कार पर

मन में भी इतराते हुए

बल्कि हवाई जहाज में जाओ

तो पैर भी रख लेना गद्दी पर

खाते हुए

मुँह से चपचप की आवाज़ होती है ?

कोई ग़म नहीं

वे जो मानते हैं बेआवाज़ जबड़े को सभ्यता

दुनिया के

सबसे खतरनाक खाऊ लोग हैं.

Oct 6, 2009

मैंने बुश को जूता क्यों मारा

मुंतज़िर अल-ज़ैदी

अनुवाद : अभिषेक श्रीवास्तव
मुंतज़िर अल-ज़ैदी वही पत्रकार हैं जिन्‍होंने इराक में अमरीका के पूर्व राष्‍ट्रपति जॉर्ज बुश पर जूता फेंका था. पिछले दिनों वह जब जेल से छूट कर आए, तो उन्‍होंने सबसे पहले अपने इस लेख से दुनिया को यह बताने की कोशिश की कि उन्‍होंने बुश को जूता क्‍यों मारा. यह लेख इस लिहाज़ से बेहद अहम है कि इसमें पत्रकारिता और मुल्‍कपरस्‍ती के रिश्‍ते के बारे में जो बात कही गई है, वह विरले ही सुनने को मिलती है.
गार्डियन
में छपा यह लेख हम साभार प्रकाशित कर रहे हैं.

'मैं कोई हीरो नहीं. मैंने सिर्फ एक ऐसे इराकी का धर्म निभाया है जो तमाम बेगुनाहों के दर्द और कत्ल-ए-आम का गवाह रहा है.'

मैं आज़ाद हूं. लेकिन मेरा मुल्क अब भी जंग की जंज़ीरों में जकड़ा हुआ है. मेरे बारे में काफी बातें हुई हैं- कि वह हीरो है और उसने वैसा काम भी किया. मेरा जवाब सिर्फ इतना है: मुझे यह काम करने पर जिस चीज़ ने मजबूर किया, वह नाइंसाफी है जो मेरे लोगों के साथ हुई है, कि किस तरह कब्ज़ाई अपने फौजी बूटों तले मेरी सरज़मीं को रौंद कर उसे शर्मसार कर देना चाहते थे.

हाल के कुछ सालों में कब्ज़ाइयों की गोली खाकर करोड़ से ज्यादा इराकी शहीद हो चुके हैं. आज इराक पांच करोड़ यतीमों, करोड़ों बेवाओं और सैकड़ों हज़ारों जख़्मी लोगों की पनाहगाह में तब्दील हो चुका है. मुल्क के भीतर और बाहर कई करोड़ लोग बेघर हो चुके हैं.

हम एक ऐसे मुल्क हुआ करते थे जहां रहने वाला एक अरब, यहीं के तुर्कमानों, कुर्दों, असीरियाइयों, साबियाओं और याज़िदों के साथ अपनी दो जून की रोटी बांट कर खाता था. जहां शिया और सुन्नी एक ही कतार में बैठ कर सिजदा किया करते थे. और जहां के मुस्लिम अपने ईसाई भाइयों के साथ मिल कर ईसा का जन्मदिन मनाते थे. ऐसा इसके बावजूद था कि हम एक दशक से ज़्यादा वक्त से जु़ल्मतों के तले दबे अपनी भूख तक को साझा करते आ रहे थे.

हमारे सब्र और एका ने हमें अपने ऊपर हुए इस जु़ल्म को भूलने नहीं दिया. लेकिन हमले ने भाई को भाई से, पड़ोसी को पड़ोसी से जुदा कर दिया. हमारे घर कब्रगाह बना दिए गए.

मैं कोई हीरो नहीं. लेकिन मेरा एक नज़रिया है. और मेरा नज़रिया बिल्कुल साफ है. अपने मुल्क को शर्मसार देख कर मुझको शर्म आई. अपने बग़दाद को जला देख कर और अपने लोगों की हत्याएं देख कर मुझको शर्म आई. हज़ारों ऐसी दर्दनाक तस्वीरें मेरे ज़ेहन में पैबस्त हो गईं जो मुझे बग़ावत की ओर धकेल रही थीं- अबू ग़रेब की दास्तान, फलूजा, नज़फ, हदीथा, सद्र, बसरा, दियाला, मोसूल और तल अफ़र में हुआ कत्ल-ए-आम और मेरी घायल ज़मीन का एक-एक इंच. मैं अपनी जलती हुई ज़मीन पर खूब चला. और मैंने अपनी नंगी आंखों से कब्ज़े के शिकार लोगों का दर्द देखा. अपने ही कानों में मैंने यतीमों और बेबसों की चीखें भी सुनीं. और शर्म का एक गहरा अहसास मुझे भीतर तक किसी बदकार की तरह दहला गया, क्योंकि मेरे पास ताकत नहीं थी.



अपने पेशे से जुड़े कामों को रोज़ाना खत्म कर लेने के बाद जब मैं मलबे में तब्दील हो चुके तबाह इराकी घरों की मिट्टी अपने कपड़ों से झाड़ रहा होता या फिर अपने कपड़ों पर लगे खून के धब्बे साफ कर रहा होता, उस वक्त मैं दांत पीस कर रह जाता था. तब मैं अपने लोगों की कसम खाता- कसम बदले की.

आखिरकार मौका मिला, और मैंने उसे गंवाया नहीं. कब्ज़े के दौरान या उसकी वजह से बहे बेगुनाहों के खून के एक-एक कतरे, हरेक बेबस मां की एक-एक चीख, यतीमों की हरेक सिसकी, बेआबरू औरतों के दर्द और यतीमों के एक-एक कतरा आंसू के प्रति अपनी वफादारी के नाम पर मैंने यह मौका अपने हाथ में लिया.
जो लोग मुझसे सवाल पूछते हैं, उनसे मैं पलट कर पूछता हूं- क्या तुम जानते हो कि जो जूता मैंने फेंका था, वह कितने टूटे घरों से होकर गुज़रा था, कितनी बार वह बेगुनाहों के खून में लिथड़ा था. एक ऐसे वक्त में जब सारे ईमानों की एक-एक कर धज्जियां उड़ा दी गई हों, शायद वह जूता ही सबसे कारगर जवाब हो सकता था.
जब मैंने अपराधी जॉर्ज बुश के चेहरे पर वह जूता उछाला, तो मैं उसके हरेक झूठ, अपने मुल्क पर उसके कब्ज़े, मेरे लोगों के कत्ल, मेरे मुल्क के खज़ाने की लूट और यहां की सूरत बिगाड़ दिए जाने के खिलाफ सिर्फ अपनी नाराज़गी को ज़ाहिर करना चाह रहा था. और इस बात के खिलाफ भी, कि उसने इस धरती के बेटों को यहीं पर बेगाना बना डाला है.
अगर मैंने अनजाने में पत्रकारिता का कुछ भी बुरा किया है, चूंकि मेरी वजह से अखबार को शर्मसार होना पड़ा, तो मैं माफी मांगता हूं. मैं कुल जमा यह चाहता था कि एक आम नागरिक के उन ज़िंदा अहसासों को ज़ाहिर कर सकूं जो रोज़ाना अपनी सरज़मीं को रौंदे जाते देख रहा है. जो लोग कब्ज़े की आड़ में पेशेवराना ज़िम्मेदारी का रोना रो रहे हैं, उनकी आवाज़ मुल्कपरस्ती की आवाज़ों से तेज़ नहीं हो सकती. और अगर मुल्कपरस्ती को अपनी आवाज़ बुलंद करनी ही पड़े, तो पेशे को उसके साथ खड़ा होना होगा.
मैंने ऐसा इसलिए नहीं किया कि मेरा नाम तवारीख में दर्ज हो जाए या फिर मुझे कोई फायदा मिले. मैं सिर्फ अपने मुल्क को बचाना चाह रहा था.

इसे http://www.raviwar.com/ पर भी पढ़ा जा सकता है.

मुंतदिर अल जैदी को सलाम


तानाशाह और जूते

मदन कश्यप

उसके जूते की चमक इतनी तेज थी
कि सूरज उसमें अपनी झाइयां देख सकता था
वह दो कदम में नाप लेता था दुनिया
और मानता था कि पूरी पृथ्वी उसके जूतों के नीचे है
चलते वक्त वह चलता नहीं था
जूतों से रौंदता था धरती को

उसे अपने जूतों पर बहुत गुमान था
वह सोच भी नहीं सकता था
कि एक बार रौंदे जाने के बाद
कोई फिर से उठा सकता है अपना सिर
कि अचानक ही हुआ यह सब


एक जोड़े साधारण पांव से निकला एक जोड़ा जूता
और उछल पड़ा उसकी ओर
उसने एक को हाथ में थामना चाहा
और दूसरे से बचने के लिए सिर मेज पर झुका लिया
ताकत का खेल खेलने वाले तमाम मदारी
हतप्रभ होकर देखते रहे


और जूते चल पड़े
दुनिया के सबसे चमकदार सिर की तरफ
नौवों दिशाओं में तनी रह गयीं मिसाइलें
अपनी आखिरी गणना में गड़बड़ा गया
मंगलग्रह पर जीवन के आंकड़े ढूंढने वाला कम्प्यूटर
सेनाएं देखती रह गयीं


कमांडों लपक कर रोक भी न पाये
और उछल पड़े जूते


वह खुश हुआ कि आखिरकार उसके सिर पर नहीं पड़े जूते
शर्म होती तब तो पानी पानी होता
मगर यह क्या कि एक जोड़े जूते के उछलते ही
खिसक गयी उसके पांव के नीचे दबी दुनिया
चारो तरफ से फेंके जाने लगे जूते
और देखते देखते


फटे पुराने, गंदे गंधाये जूतों के ढेर के नीचे
दब गया दुनिया का सबसे ताकतवर तानाशाह


(वरिष्ठ कवि मदन कश्यप ने यह कविता मुंतजिर के समर्थन में दिसंबर में लिखी थी.)






Oct 3, 2009

मिसाल हैं कोबाड गांधी



कोबाड गाँधी की गिरफ्तारी से मध्यम वर्ग को नक्सल आन्दोलन और आतंकवाद के बीच का अंतर नज़र आने लगा है.कोबाड और उनके जैसे लोगों की एक लम्बी फेहरिस्त है जिन्होंने कारपोरेट जगत के किसी मालदार ओहदे से बेहतर गरीब आदिवासियों और हाशिये पे जीने वाले लाखों लोगों की बेहतर ज़िन्दगी के लिए जीना मुनासिब समझा. बता रहे हैं राहुल पंडिता


शीर्ष नक्सल नेता कोबाड गाँधी की गिरफ्तारी से नक्सल आन्दोलन को तगड़ा झटका लगा है.लेकिन साथ ही इस गिरफ्तारी ने कुछ हद तक वो काम किया जिसके लिए कोबाड दिल्ली और अन्य महानगरों का गुप्त दौरा करते रहते थे.शहरों तक नक्सल आन्दोलन को ले जाना और उसके प्रति मध्यम वर्ग में जागरूकता पैदा करना. लोग इस बात से खासे हैरान है कि मुंबई में आलीशान घर में रहने वाले एक बड़े परिवार का बेटा, जिसने दून स्कूल में संजय गाँधी के साथ पढाई कि, वो लन्दन से उच्च शिक्षा अधूरी छोड़कर गढ़चिरोली और बस्तर के जंगलों की ख़ाक भला क्यूँ छान रहा था? कोबाड की गिरफ्तारी ने वो काम किया जो शायद उनके द्वारा लिखे गए सेकडों लेख भी कर नहीं पाते. उनकी गिरफ्तारी से वो लोग जिनके लिए सीमा पार मारे गए आतंकवादी और बस्तर में मारे गए नक्सल के बीच कोई अंतर नहीं था, वो भी नक्सल आन्दोलन की चर्चा करने लगे है.

आज नक्सल आन्दोलन नक्सलबाडी से कोसों आगे निकल गया है.आज १८० जिले -यानी करीब एक-तिहाई भारत लाल झंडे की छाया के नीचे जी रहा है.इस ताकत के पीछे कोबाड और उनके जैसे कई पड़े-लिखे लोगों का हाथ है जिन्होंने कारपोरेट जगत के किसी मालदार ओहदे से बेहतर गरीब आदिवासियों और हाशिये पे जीने वाले लाखों लोगों की बेहतर ज़िन्दगी के लिए अपना जीवन दांव पार लगा दिया.उन्होंने इसके लिए जो मार्ग चुना इस पर बहस हो सकती है,लेकिन उनके समर्पण और बलिदान पर कोई ऊँगली नहीं उठा सकता.
दिल्ली की तीस हजारी अदालत में "भगत सिंह जिंदाबाद" के नारे लगाने वाला ये शख्स आखिर कौन है? इसके लिए आपको नागपुर की इन्दोरा नाम की दलित बस्ती जाना होगा. लन्दन से अपनी पढाई अधूरी छोड़ने के बाद कोबाड अनुराधा शानबाग नाम की एक लड़की के संपर्क में आये.अनुराधा मुंबई के एक नामी-गिरामी कॉलेज की छात्रा थी और उसके पिता मुंबई के बड़े वकील थे.समाजशास्त्र में एम्.फिल करते हुए अनुराधा झुग्गी-झोंपडियों में काम करने लगी थी. कोबाड की मुलाकात उनसे वहीँ हुई और १९७७ में शादी के बाद उन्होंने नागपुर में काम करना शुरू किया.
दरअसल वो वक़्त ही कुछ ऐसा था.७० के दशक में पूरी दुनिया में क्रांति का बिगुल बज रहा था.चीन में माओ सांस्कृतिक क्रांति  लेकर आये थे. वियतनाम अमेरीकी सेना को करारी टक्कर दे रहा था. भारत में नक्सलबाडी का बीज फूट चूका था. सैकडों नौजवान अपना घर-बार छोड़कर क्रांति की आग में खुद को झोंक रहे थे.१९८० में नक्सल गुट पीपुल्स वार ने अपने कुछ दल dandakaranya भेजे.ये आंध्र प्रदेश,महाराष्ट्र,छत्तीसगढ़ और उडीसा में फैला वो जंगली इलाका है जो इंडिया की तरक्की के बीच बहुत पीछे छूट गया.यहाँ के आदिवासियों तक नेहरु की कोई भी पंच-वर्षीया योजना नहीं पहुंची.इसमें एक बड़ा इलाका ऐसा है जिसकी आखिरी बार सुध लेने वाले शख्स का नाम जलालुदीन मोहम्मद अकबर था.यहाँ के लोग इतने पिछडे थे कि उन्हें हल के इस्तेमाल के बारे में भी पता नहीं था. ऐसे में नक्सल आन्दोलन से जुड़े मुट्ठी भर लोगों ने वहां काम शुरू किया. काम बहुत मुश्किल था. लेकिन यहाँ प्रशसान के पूर्ण अभाव में लोग भुखमरी और शोषण का शिकार हो रहे थे.नक्सलियों ने लोगों की ज़िन्दगी को बेहतर करने के प्रयास शुरू किये. धीरे-धीरे dandakaranya की सरकार वही चलाने लगे.

कोबाड को पीपुल्स वार ने महाराष्ट्र में काम करने के लिए चुना.इस बीच अनुराधा ने नागपुर विश्विद्यालय में पढाना शुरू किया.इन्दोरा बस्ती दलित आन्दोलन का प्रमुख केंद्र है. यहाँ अनुराधा ने २ कमरे किराये पर लेकर रहना शुरू किया. उसके मकान मालिक बताते है कि दोनों के पास किताबों के २ बक्सों और एक मटके के अलावा कुछ भी नहीं था.अनुराधा एक टूटी-फूटी साइकिल चलाती. इन्दोरा बदनाम बस्ती थी. वहां कोई भी ऑटो या टैक्सी चालक अन्दर आने से कतराता था. लेकिन इस माहौल में अनुराधा आधी रात को काम खत्म करने के बाद सुनसान रास्तों पर साइकिल चलते हुए घर आती. बस्ती में रहकर अनुराधा ने वहां के कई लड़कों की जिंदगियां बदल दी. एक दलित लड़के ने मुझसे कहा कि उसकी ज़िन्दगी में अनुराधा ने पूरी दुनिया की एक खिड़की खोल दी. सुरेन्द्र gadling नाम के एक लड़के को अनुराधा ने वकालत की पढाई करने के लिए प्रेरित किया. आज वो नक्सल आन्दोलन से जुड़े होने के आरोपियों के केस लड़ता है.
 नब्बे के दशक में अनुराधा पर भूमिगत होने का काफी दबाव बढ़ गया था.कोबाड पहले ही भूमिगत हो चुके थे.१९९० के मध्य में अनुराधा बस्तर चली गयी.केंद्र सरकार जो भी कहे लेकिन ये सच है की नक्सल कई जगहों पर सरकार की कमी को पूरा करते है.छत्तीसगढ़ के बासागुडा गाँव में पानी के एक जोहड़ की घेराबंदी सरकार कई साल तक आदिवासियों द्वारा हाथ-पाँव जोड़ने के बावजूद नहीं कर पायी.अनुराधा की अगुवाई में कई गाँव के लोगों ने मिलकर ये काम अंजाम दिया.इसके लिए हर काम करने वाले को प्रति दिन एक किलो चावल दिया गए.घेराबंदी के बाद घबराई सरकार ने २० लाख रुपये देने की पेशकश की लेकिन उसे ठुकरा दिया गया.१९९८ तक नक्सालियों ने ऐसे करीब २०० जोहडों का निर्माण किया.
 लेकिन जंगल की ज़िन्दगी काफी कठिन होती है.अनुराधा कई बार मलेरिया का शिकार बनी. इसके चलते पिछले साल अप्रैल में उन्होने दम तोड़ दिया.तब तक कोबाड माओवादियों के बड़े नेता बना दिए गए थे. वो खुद भी कैंसर और दिल की बीमारी से ग्रस्त है. अब वो जेल की सलाखों के पीछे है लेकिन उन्होने एक पूरी पीढी को प्रेरित किया. आज अरुण फरेरा जैसे कई पढ़े-लिखे नौजवान कोबाड और अनुराधा से प्रेरित होकर आन्दोलन से जुड़े हैं. (अरुण भी अब जेल में है).
अब से कुछ महीने बाद केंद्र सरकार दंडकारन्य में नक्सलियों का खात्मा करने के लिए एक बहुत बड़ी फोर्स भेज रही है. गृह मंत्री प. चिदंबरम का कहना है की नक्सली डाकू है और कुछ नहीं. लेकिन गरीब आदिवासियों के लिए वो किसी नायक से कम नहीं. ये वो लोग है जो उनके लिए स्कूल चलते है, स्वस्थ्य सेवा मुहेया कराते है, और उन्हें इज्ज़त से जीने का साहस देते है.नक्सली आन्दोलन से जुड़े गरीब आदिवासियों के लिए इस से बढकर कुछ नहीं.भरपेट खाना और सरकारी शोषण को दूर रखने के लिए एक बन्दूक.सरकार नाक्सालवाद का खात्मा करना चाहती है, लेकिन क्या वो इन इलाकों में विकास ला पाएगी? भूख और गरीबी को समूल नष्ट कर पाएगी? ये ऐसे कुछ सवाल है जिनका जवाब सरकार जितनी जल्दी खोजे उतना बेहतर होगा.

--------------------------------------------------------------------------------

लेखक अंग्रेजी पत्रिका ओपन के वरिष्ट विशेष संवाददाता हैं.नक्सल इलाकों से रिपोर्टिंग पर आधारित उनकी पुस्तक इस साल के अंत में हार्पर कॉलिन्स पब्लिशर्स द्वारा प्रकाशित हो रही है.