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Aug 4, 2011

प्रयोगशाला के क्रांतिवीरों को आरक्षण लगे रोड़ा

दिल्ली के गांधी शान्ति प्रतिष्ठान में 24 जुलाई को जाति के सवाल पर आयोजित एक सेमीनार में बांटी गयी सर्वहारा प्रकाशन की एक पुस्तिका का पहला हिस्सा छापकर यहां बहस की शुरूआत की  गयी थी . उस पर पाठकों की लगातार प्रतिक्रियाएं आ रही हैं. बहस  की अगली कड़ी में  प्रस्तुत है, सामाजिक -राजनीतिक कार्यकर्ता सुधीर का लेख - मॉडरेटर  


जाति के सवाल पर खालिस मार्क्सवादी अवस्थिति के दावे के साथ लेखक दरअसल प्रकाश झा के साथ कब खड़ा हो जाता है उसे पता ही नहीं चलता। लेख आरक्षण का पुरजोर विरोध करता है। आरक्षण को भारतीय क्रांति की राह में सबसे बड़ी बाधा घोषित करता है...

सुधीर

‘मायावती मुलायम परिघटना और उसकी वैचारिक अभिव्यक्तियां’ एक दशक पहले ‘इतिहासबोध’ पत्रिका के अंक-29 में जनवरी 1998 में प्रकाशित हुआ था। यह लेख इकबाल छद्मनाम से लेख लिखा गया था। उसी लेख को कुछ मामूली सुधारों के साथ दुबारा प्रकाशित किया गया है, जिसे लेकर जनज्वार में बहस चल रही है.

दलित सवालों को संबोधित इस  पुस्तिका  की सामान्य मार्क्सवादी प्रस्थापनाओं के अलावा लेख की सभी बातें आज अप्रासंगिक हो चुकी हैं। हालांकि शीर्षक से लेख की अंतर्वस्तु तब भी बेमेल थी जब यह लेख लिखा  गया था और अब भी जब इसे पुनर्प्रकाशित किया गया है. हालाँकि आज तो मुलायम मायावती परिघटना का स्वरूप ही बदल चुका है। मुलायम परिघटना दुर्घटना के दौर में है तो  मायावती की यात्रा सर्वजन से बहुजन के मुकाम पर पहुंच चुकी है।

‘तिलक, तराजू और तलवार, इनको मारो जूते चार’ का नारा ‘ब्राह्मण शंख बजाएगा, हाथी दिल्ली जाएगा’ में संक्रमित हो चुका है। ऐसे में इस लेख को मामूली फेरबदल के साथ पुस्तिका में रूप में प्रकाशन लेखक की उस समय की आत्ममुग्धता का स्वयं को क्रांतिकारी मानने वाले संगठनों की सामान्य इच्छा में परिवर्तित हो जाना भर है।

लेख का प्रकाशन सोवियत संघ में पूंजीवाद की पुनर्स्थापना समेत मार्क्स, एंगेल्स, लेनिन, माओ की दसेक पुस्तिकाओं का प्रकाशन कर चुके सर्वहारा प्रकाशन के पतन की भी दुखद शुरुआत है। लेख से एक अकर्मण्य मार्क्सवादी के सैद्धांतिक अपच के खट्टे डकारों की बू आती है। जो राजेंद्र यादव (मूल और पुराने लेख में राजेंद्र यादव और श्योराज सिंह बेचैन को ही केन्द्रित किया गया था)  के साहित्यिक कद तक पहुंचना चाहता है और उनकी मण्डली को शास्त्रार्थ की दंभपूर्ण चुनौती देता है, क्योंकि इस चुनौती की स्वीकारोक्ति मात्र ही उसे हिंदी साहित्य जगत की मुख्यधारा तक पहुंचा देती। जय-पराजय बाद की बात है।

लेख की 90 प्रतिशत बातें सामान्य मार्क्सवादी बातें हैं, जिन्हें हर बुद्धिजीवी जानता समझता है। शेष अहमक गाली-गलौच जो हर हारा बुद्धिजीवी करता है। लेखक भारत के क्रांतिकारी आंदोलन की स्वार्णिम उपलब्धियों का तमगा खुद के सीने में लगाकर उसी पर कालिख पोतता चलता है।

जाति के सवाल पर खालिस मार्क्सवादी अवस्थिति के दावे के साथ लेखक दरअसल प्रकाश झा के साथ कब खड़ा हो जाता है उसे पता ही नहीं चलता। लेख आरक्षण का पुरजोर विरोध करता है। आरक्षण को भारतीय क्रांति की राह में सबसे बड़ी बाधा घोषित करता है। न पक्ष, न विपक्ष, हमारा तीसरा पक्ष की आरक्षण विरोधी अवस्थिति के कारण ही यह क्रांतिकारी लोक अधिकार संगठन और इंकलाबी मजदूर संगठन जैसे संगठनों  का प्रिय बन जाता है। ये संगठन आरक्षण का औपचारिक समर्थन जरूर करते हैं परन्तु व्यवहार में उसके विरोधी हैं। एक तरफ यह आरक्षण को अप्रासंगिक बताते हैं दूसरी ओर उसे भारतीय क्रांति का सबसे बड़ा रोड़ा मानते हैं।

क्रालोस, इमके और पछास जैसे संगठनों के लिए क्रांतियां समाज में नहीं इनकी प्रयोगशाला में घटित होती है। इनके शिविर, सम्मेलनों ने जाति व्यवस्था को लगभग खत्म घोषित कर दिया है। अंग्रेजों ने जाति व्यवस्था के उन्मूलन के ऐतिहासिक कार्यभार की शुरुआत की और भारतीय बुर्जुआ ने इसे लगभग खत्म कर दिया है और बचा-खुचा वह जल्द ही खत्म कर देगा। इनके रासायनिक प्रयोग इन्हीं निष्कर्षों तक पहुंचते हैं।

अपने जन्म से आज तक इन संगठनों ने जाति उत्पीड़न के सवाल पर व्यावहारिक कार्रवाई तो क्या प्रेस वक्तव्य भी नहीं दिए हैं। इन संगठनों की कर्मस्थली उत्तराखण्ड में बीते चार महीनों में तीन दलितों की हत्या सुर्खियां बनीं, ढेरों दलित उत्पीड़न के मामले सामने आए मगर इनकी कोई पहलकदमी नहीं दिखायी दीं। अलबत्ता आस्ट्रेलियाई छात्रों पर नस्ली हमले इन्हें व्यथित कर देते हैं। जिस सर्वहारा विश्व दृष्टिकोण का चश्मा यह सिर्फ अपनी ही आंखों में चढ़े होने का दावा करते हैं उसकी गर्द इन्हें समय-समय पर साफ करनी चाहिए।

तीनों ही संगठनों के नेतृत्वकारी निकायों की बैठकों से लौटने के बाद कई दफा दूसरे दर्जे के नेतृत्वकारी कार्यकर्ताओं के मुंह से मैंने सुना की उत्तराखण्ड में जातिवाद नाम-मात्र को है। ऐसा उन्हें शीर्ष नेतृत्वकारियों ने बताया था। इन अकादमिकता के चैम्पियनों को जातिगत उत्पीड़न दिखता ही नहीं। इन संगठनों के शत प्रतिशत सक्रीय कार्यकर्ता संगठन से सजातीय जीवन साथी तलाशने का अनुरोध करते हैं। यहां पर इनका जाति व्यवस्था की क्रूर सच्चाई से सामना होता है। जिसके नजरअंदाज कर दिया जाता है।

क्रांतिकारी संगठनों को वैचारिक नेतृत्व प्रदान कर रहे लेखक के सर्वहारा विश्व दृष्टिकोण पर तब तरस आता है। सवाल हे कि दलित गैरबराबरी का शिकार तो तब होगा जब उसे समाज का हिस्सा माना जाएगा। सम्पन्न या विपन्न दलित के लिए दलित होने का अर्थ है अस्पृश्य, समाज बहिष्कृत होना। सवर्णों के लिए वे कुत्ते, बिल्लियों, कबूतरों से भी ज्यादा गया गुजरा है। आज भी सवर्ण हरसंभव दलितों के साथ पराम्परागत तुलसीदासी व्यवहार करते हैं। जहां संभव नहीं होता वहां वह मन मसोसकर रह जाते हैं।

एक ब्राह्मण चपरासी दलित आईएएस को बराबर का नहीं मान लेता,  वह उसे झेलता है, बर्दाश्त करता है। एक दलित अफसर के बेटे के साथ सवर्ण, संविदा चपरासी भी अपनी बेटी नहीं ब्याहेगा, न ही आप ‘कम्युनिस्ट’ ऐसा दुस्साहस करते हैं। एक दलित अफसर सजातीय विपन्न के साथ जो व्यवहार करेगा वह गैर बराबरी है। वह उसे छूने योग्य इंसान तो मानता है। अकारण नहीं है कि ओहदेदार दलित अपने नाम-उपनाम को संक्षिप्त और जाति को गोल-मोल कर देते हैं। और आप अपनी जाति को नाम से चिपकाने का मोह नहीं त्याग पाते। एक धनाढ्य दलित के लिए नाम के आगे का पुछल्ला अंतर्वस्तु है और आपके लिए आपके नाम के आगे रूप।

दरअसल आपकी प्रजाति के कम्युनिस्टों ने सर्वहारा दलितों के बीच मार्क्सवादियों  की विभ्रमित छवि गढ़ी है। आप लोग इंकलाबी इतिहास की उपलब्धियों की ट्राफी हाथ में लहराकर उसी पर कीचड़ उछालते हैं। आप अपने लिए छोटी सी चुनौती तय करें, जिस तरह आप दहेज वाली शादियों का बहिष्कार करते हैं उसी तरह उन करीबियों का भी करें जो जात-पात या छुआछूत मानते हैं। ऐसा करते ही आपको आवाज सुनायी देगी, वह आवाज जाति व्यवस्था के टूटने की भी हो सकती है। मगर आप ऐसा नहीं कर पाये। इसलिए आपका लेखन बरबस उस बंदर की याद दिलाता है जिसे हल्दी की गांठ मिली और वह पंसारी बन बैठा।






Jul 29, 2011

किस दुनिया में रहते हो कॉमरेड?


वामपंथी समूह क्रांतिकारी लोकअधिकार संगठन और इंकलाबी मजदूर सभा के नेता जाति के सवाल पर दलित बुद्धिजीवियों का क्या महत्व  मानते हैं,उन्होंने अपने लेख 'दो पेज भी नहीं लिख सकते दलित बुद्धिजीवी' में बताया है.  इस पर पहली प्रतिक्रिया सामाजिक कार्यकर्त्ता जेपी नरेला की आई है. उन्होंने पूरी पुस्तिका के सन्दर्भ  में बिन्दुवार यहाँ अपनी राय रखी है...

जेपी नरेला

सर्वहारा प्रकाशन ने पिछले दिनों ‘मायावती-मुलायम परिघटना और उसकी वैचारिक अभिव्यक्ति’ के नाम से एक पुस्तिका प्रकाशित की,जिसको लेकर यहाँ बहस आमंत्रित की गयी है.इस पुस्तिका को पढने के बाद मेरे मन में कई सवाल उठे.उन सवालों के  मद्देनजर मैं यहाँ अपने मत व्यक्त कर रहा हूँ...
  • पुस्तिका में लिखा है,‘आज अपने देश में बहुत सारे लोग जो खुद को मार्क्सवाद के समर्थक या मार्क्सवाद से सहानुभूति रखने वाले कहते हैं,वे मार्क्सवाद की जड़ खोदने में लगे हुए हैं...’

यह बात तो सही है,लेकिन आपके पास सही मार्क्सवादी होने का कौन सा प्रमाण है,अभी तो इस मुल्क में पिछले कई दशकों में कोई बड़ा सामाजिक प्रयोग भी नहीं हुआ है. क्या आप भी उसी श्रेणी में तो नहीं आते जिन्होंने मार्क्सवाद को स्वीकार तो कर लिया, लेकिन उसकी (मार्क्सवादी दर्शन द्वंद्वात्मक ऐतिहासिक भौतिकवाद की) आंखें धुंधली हैं. उन्हें नहीं पता है कि भारतीय क्रांति का सम्पूर्ण कार्यक्रम का सही लेखा-जोखा क्या है?उसका रास्ता कौन सा है?

क्या आप यह काम कर पाए,यदि नहीं तो आप यह दावा कैसे कर सकते हैं कि बाकी दुनिया में नकली मार्क्सवादी हैं और आप असली हैं?यह बात केवल बातों से नहीं बल्कि भारतीय जनता के तमाम शोषित, उत्पीड़ित हिस्सों की लड़ाइयों और आप के नेतृत्व से ही स्थापित हो पाएगी.तब तक आप अपने और दूसरे मार्क्सवादियों के लिए इस डिग्री के संबंध में देखें -परखें  का रास्ता अपनाए तो ज्यादा बेहतर होगा.खुद को पाक-साफ घोषित करने से कोई पाक-साफ नहीं हो जाता है.इससे व्यक्तिवाद का खतरा बढ़ता है.आप कहां-कहां पर मार्क्सवाद को खारिज करते जा रहे हैं,इसका आपको अंदाज भी नहीं है.

  • आप लिखते हैं,‘...हम सारे दलित बुद्धिजीवियों को चुनौती देते हैं कि वे आज के अपने ज्ञान के आधार पर भारत के कम्युनिस्ट आंदोलन के इतिहास पर दो पृष्ठ की रूपरेखा प्रस्तुत करके दिखाएं... हम इन्हें चुनौती देते हैं कि केवल जाति के मुद्दे पर भारत के कम्युनिस्ट आंदोलन में जो अलग-अलग सोच मौजूद रही है, वे उसकी ऐतिहासिक रूपरेखा प्रस्तुत करके दिखाएं.’
कौन दलित बुद्धिजीवी आपकी बात सुन रहा है और आपके कहने से वे भारत में कम्युनिस्ट के इतिहास की दो पृष्ठ की रूपरेखा लिखकर दिखाएगा.आपकी कूवत क्या है? पूरे भारतीय समाज में और सामाजिक आंदोलनों में और जाति के सवाल पर आप आज कहां खड़े हैं, इसका आकलन यदि आप करेंगे तो आपका सारा दंभ निकल जाएगा,जो मार्क्सवाद की चार किताबें पढ़ लेने भर से पैदा हो गया है.यह आपके लेखन में भी दिख रहा है.जाति के सवाल पर आपकी समझ भी क्या है? इसका आपको अंदाजा नहीं है,इस सच्चाई को आप छू भी नहीं पाए हैं.इसके लिए कार्यक्रम के निर्माण की तो आप बात ही छोड़ दीजिए.

मैं यह पहले ही साफ कर देना चाहता हूँ कि न तो मैं कोई दलित बुद्धिजीवी हूं और न उनका समर्थक. मैं सिर्फ समस्याओं को मार्क्सवादी द्रष्टिकोण से पढ़ने और समझने का प्रयास कर रहा हूं. मैं आपके इस घमंड और व्यक्तिवादी नजरिए का घोर विरोधी हूं. आपके लेखन से जो झलक रहा है, वह अपने आप में कोई मार्क्सवादी नजरिया नहीं है. मार्क्सवाद सर्वहारा की मुक्ति का दर्शन है और केवल आप ही उसके वाहक हैं, यह हम कैसे मान लें?

  • ‘...डीडी कोसाम्बी, रामशरण शर्मा, रोमिला थापर, इरफान हबीब और सुमित सरकार जैसे मार्क्सवादी इतिहासकार इसका जवाब देते हैं.जरा इनके जवाब की तुलना आंबेडकर की रचनाओं से करें, आपको अंतर तुरंत पचा चल जाएगा.’
मनुस्मृति का मजबूत भौतिक आधार सामाजिक उत्पादन संबंधों में मौजूद था.मनुस्मृति उसी का अधिरचना में विधान है.इससे मैं भी सहमत नहीं हूं कि महज मनुस्मृति के षड्यंत्र ने भारतीय समाज में जाति पैदा कर दी. हां, इसके बाद मनुस्मृति ने वैचारिक धरातल, उसको खाद-पानी देने का काम बखूबी किया और आज भी कर रहा है.

डीडी कोसाम्बी,रामशरण शर्मा,रोमिला थापर,इरफान हबीब और सुमित सरकार जैसे मार्क्सवादी इतिहासकार इसका यही जवाब देते हैं कि जाति व्यवस्था उत्पादन संबंधों में मौजूद रही है.भारतीय समाज में आज भी उसका ठोस भौतिक आधार है इसलिए इतनी मजबूती से यह अधिरचना में भी मौजूद है.इसको समझिए कामरेड.हां,यह बात सही है कि इन सभी इतिहासकारों और डॉक्टर भीमराव आंबडेकर के द्रष्टिकोण में मूलभूत फर्क है,इतिहास को देखने और समझने का नजरिया.

अंबेडकर पूंजीवादी व्यवस्था की सीमाओं में बचते हैं और उनका रास्ता संसदीय जनतंत्र के बाद बंद हो जाता है. यह बात भी सत्य है कि आंबेडकर मार्क्सवादी दर्शन और वैज्ञानिक समाजवाद के चैतन्य तौर पर विरोधी थे. इसलिए उन्होंने राजकीय समाजवाद की कल्पना पेश की, जो अपनी अंतर्वस्तु में पूंजीवादी राज्य है. यह निजी संपत्ति और शोषण की व्यवस्था की गारंटी देता है.

  • ‘...अंग्रेज भारत आए. वे अपने साथ सामंतवाद नहीं पूंजीवाद लाए. भारतीय सामंतवाद इस पूंजीवाद के सामने ठहर नहीं सकता था. वह ठहरा भी नहीं. वह ध्वस्त हो गया और उसी के साथ भारत की हजारों सालों की वर्ण-जाति व्यवस्था ध्वस्त हो गई.आज आर्थिक संबंधों के क्षेत्र में वर्ण-जाति व्यवस्था समाप्त प्राय है...’
कॉमरेड,सूत्रीकरण से आप इस गंभीर समस्या के हल तक नहीं पहुंच सकते.आपको सूत्रीकरण से बाहर आकर आंखें खोलकर देखना होगा.आप कह रहे हैं कि पूंजीवादी व्यवस्था के मुकाबले सामंतवाद टिक नहीं सकता, इसलिए अंग्रेजों ने जैसे ही भारत में पूंजी का विकास किया भारत में जाति व्यवस्था चरमरा गई और बाद में खत्म हो गई.आपको मेरी सलाह है कि शेखचिल्लियों की तरह दिन में सपने देखना छोड़ दें कॉमरेड.

क्या सन 1947में भारतीय राजसत्ता कांग्रेस के हाथ में आने के बाद यहां सामंतवाद खत्म और पूंजीवाद आ गया था.जाति प्रथा खत्म हो गई थी.यानी सामंती उत्पादन समन्वय क्या बुनियादी व प्रमुख तौर पर अस्तित्व में नहीं थे.क्या उसके बाद यहां कोई पूंजीवादी क्रांति हुई?या भारतीय राजसत्ता ने क्या जाति व्यवस्था के ढांचे और उसकी विचारधारा को जान-बूझकर नहीं बनाए रखा? इन सवालों का आपको संपूर्णता में जवाब देना होगा.

  • भारत में भी इस मामले में 1930-40 के दशक में कम्युनिस्ट पार्टी के कार्यक्रम और आंबेडकर के कार्यक्रम की तुलना कर लेना पर्याप्त होगा.इस तरह देखा जाए तो कम्युनिस्ट ही भारत में दलित मुक्ति के सबसे बड़े चैम्पियन रहे हैं.
कम्युनिस्टों ने 1930-40 के दशक में जाति के सवाल पर कौन से राष्ट्रीय आन्दोलन खड़े किए.इसका कोई लिखित इतिहास मिलता नहीं है. यदि आपके पास है तो आप दीजिए, हम देखना चाहेंगे. फिर 50 के दशक से 2011 तक के लंबे अंतराल में क्या कम्युनिस्ट आंदोलन को सांप सूंघ गया था. यहां आप चुप क्यों हैं कॉमरेड? इस अंतराल का भी इतिहास बता दीजिए और जाति के सवाल पर पूरा का पूरा वाम आंदोलन कहां खड़ा है? इसका भी लेखा-जोखा आपको देना चाहिए.

  • ‘...जमींदारों की सारी जमीन को जब्त करना और जमीन जोतने वाले उसूल पर भूमिहीन गरीब किसानों के बीच इसका पुनर्वितरण जाति व्यवस्था को खत्म करना.’
जमीन के बंटवारे का सवाल किसानों के वर्ग की लड़ाई है, न की जाति के सवाल का केंद्रीय एजंडा. दूसरी बात, जाति व्यवस्था को खत्म करना कार्यक्रम में लिखा हुआ है, लेकिन जाति की समस्या के समाधान के लिए क्या कोई कार्यक्रम पेश किया और उसको जनता के विभिन्न हिस्सों में उसे लागू किया? नहीं. यह लिखा हुआ दिखा देने से कोई बात नहीं बनती. उस समय भी दलितों के बीच जो संगठन बने वे वर्गीय संगठन थे, जिनकी आप बात कर रहे हैं. वर्ग और जाति अलग है. आपस में इनका गहरा संबंध भी है.



इसलिए पूरी जाति व्यवस्था, ब्राह्मणवादी व्यवस्था के खिलाफ जाति विरुद्ध संगठनों का निर्माण करना होगा जो टोटल सिस्टम के खिलाफ बनेंगे न कि किसी एक विशेष जाति के खिलाफ. शेष समाज में विभिन्न वर्गों की लड़ाइयों के साथ इसको जोड़ना होगा. इस रूप में यह लड़ाई वर्ग संघर्ष का हिस्सा है.इस काम को छोड़कर आप कहीं भी आगे नहीं जा सकते,न ही किसी व्यापक परिवर्तन या वर्ग संघर्ष की दिशा में आगे बढ़ सकते हैं.यह भी समाज का एक बड़ा हिस्सा है जिसे आप आज दरकिनार किए हुए हैं. इसको एजंडे में लाना होगा. कॉमरेड हमारा आपसे यही कहना है.