Jun 1, 2011

चीन की उलझाऊ कूटनीति और भारत

चीन, भारत के खिलाफ एक राजनीतिक युद्ध में सीधा न उलझ कर, किसी न किसी बहाने भारत को उलझाकर रखना चाहता है . नेपाल, पाकिस्तान, श्रीलंका, बांग्लादेश और म्यांमार में उसके हस्तक्षेप इसी योजना का एक अंग है...

घनश्याम वत्स

आज कल सभी न्यूज़ चैनल और पत्र-पत्रिकाएं जब चीन के विषय में बाते करतें हैं तो उनका निष्कर्ष यही होता है कि चीन भारत के हितों के खिलाफ कार्य कर रहा है और भारत के खिलाफ युद्ध की तैयारी में लगा हुआ है.लेकिन लाख टके का सवाल है कि क्या कभी चीन भारत पर आक्रमण करेगा ?

चीन इस दुनिया का सबसे ज्यादा आबादी वाला एक जिम्मेदार   देश है . उस पर अपने नागरिकों के भरण पोषण और उनके हितों की रक्षा की जिम्मेदारी है .जिस प्रकार हर देश को अपने नागरिकों के सुखद ओर स्वर्णिम भविष्य की कामना होती है उसी प्रकार चीन को भी अपने देश के नागरिकों के लिए सम्पन्नता और दुनिया में सम्मानजनक स्थान चाहिए . उसे अपने 140 करोड़ लोगों के लिए यूरोपीय देशों और अमेरिका  के नागरिकों के समान सुविधाएँ और संसाधन चाहिये. वह वैश्विक महाशक्ति बनना चाहता है . जिसके लिए वह प्रयासरत भी है . पिछले कुछ वर्षों में चीन एक आर्थिक महाशक्ति के रूप में उभरा है किन्तु उसे पता है कि केवल आर्थिक महाशक्ति बन कर वह यह सब हासिल नहीं कर सकता,उसे आर्थिक के साथ-साथ राजनीतिक महाशक्ति भी बनना होगा .

उसे वर्तमान महाशक्ति अमेरिका  से यह ताज हासिल करने के लिए सबसे पहले दक्षिण एशिया में अपने प्रभाव को बढ़ाना पड़ेगा क्योंकि जिस देश का अपने पड़ोसियों में ही दबदबा न हो उसे दुनिया का सिरमौर कौन मानेगा .दक्षिण एशिया में भारत सबसे बड़ा देश है .सबसे पहले उसे दक्षिण एशिया में भारत के बढ़ते क़दमों को रोकना होगा . उसे विश्व में एक महाशक्ति बनना है तो उसे हर अड़ोसी-पडोसी देश ख़ास तौर पर भारत से बीस रहना ही पड़ेगा . भारत अन्य दक्षिण एशियाई देशों के साथ जितना घुलमिल कर रहेगा भारत का प्रभाव उतना ही बढेगा जो कि चीन के लिए एक राजनीतिक चुनौती पेश करेगा और चीन के महाशक्ति बनने के सपने में एक बड़ी अड़चन साबित होगा .
इसलिए अन्य दक्षिण एशियाई देशों से भारत को दूर करने के लिए एवं भारत के बढ़ते प्रभाव को रोकने के लिए चीन ने नेपाल में माओवादिओं को बढ़ावा दिया और नेपाल को आर्थिक सहायता बढ़ाकर वहां कि राजनीति में अपना हस्तक्षेप बढाकर भारत के प्रभाव को कम कर दिया . इसी कड़ी में चीन ने परोक्ष रूप से पकिस्तान को दोस्ती के बहाने आर्थिक, सैन्य और राजनीतिक मदद देना आरम्भ किया जिसका दुरूपयोग भारत के खिलाफ हो रहा है और अब एक कदम आगे बढ़कर एक तीर से दो निशाने साधते हुए चीन ने बिखरते हुए पाकिस्तान का खुलकर साथ देना प्रारंभ कर दिया है और पाकिस्तान में अमरीकी प्रभाव को भी कमज़ोर करना प्रारंभ कर दिया है . भारत के खिलाफ अपने इस अभियान में चीन ने श्रीलंका में भी अपने पैर जमाकर भारत को चारों ओर से घेरने की कोशिश की है .

लेकिन चीन दुविधा में भी है .वर्तमान महाशक्ति अमरीका के साथ G-8,नाटो देश एवं अन्य कई देश हैं,  जो समय-समय पर संयुक्त राष्ट्र संघ जैसे विश्व मंचों पर अमेरिका  के निर्णयों को सही ठहराने में और उन्हें लागू करवाने में अमेरिका कि सहायता करते है . चीन के साथ ऐसा कोई गुट नहीं है . महाशक्ति बनने के लिए उसे भी कुछ देशों का साथ चाहिए ताकि जब वह महाशक्ति बने तो उसके भी कुछ सहयोगी हों और वह भी अमरीका कि तरह अपने सभी फैसले दुनिया पर लागू करवा कर राज कर सके . इसलिए उसे G-5 और ब्रिक्स जैसे संगठनों में भारत कि भागीदारी भी चाहिए क्योंकि भारत को नज़रंदाज़ करके विश्व के विषय में कोई नीति बनाना किसी बेवकूफी से कम नहीं है . दूसरा भारत चीनी सामान का एक बहुत बड़ा खरीदार है चीन इतने बड़े बाज़ार को भी खोना नहीं चाहेगा.

इतना ही नहीं चीन को भारत की सैन्य  क्षमता का ज्ञान है.उसे पता है कि भारत के लिए अब 1962 वाला समय नहीं है, इसलिए वह भारत के खिलाफ प्रत्यक्ष युद्ध नहीं करना चाहेगा. चीन, भारत के खिलाफ एक राजनीतिक युद्ध में सीधा न उलझ कर,किसी न किसी बहाने भारत को उलझाकर रखना चाहता है  नेपाल, पाकिस्तान, श्रीलंका, बांग्लादेश और म्यांमार में उसके हस्तक्षेप इसी योजना का एक अंग है,ताकि भारत इन्ही मुद्दों में उलझकर रह जाए और चीन निश्चिन्त होकर दक्षिण एशिया में अपना प्रभाव बढ़ाते हुए अपने लक्ष्य कि और बढ़ सके है.  


पेशे से डॉक्टर और सामाजिक-राजनितिक विषयों पर लिखने में दिलचस्पी.



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