Sep 30, 2008

शाहिद बदर का साक्षात्कार


इस्लामिक स्टूडेंट मूवमेंट ऑफ इंडिया के अध्यक्ष शाहिद बदर से बातचीत

हमने नौजवानों को हौसला दिया है हथियार नहीं

अजय प्रकाश

आजमगढ़ के प'सिध्द नेशनल सिबली कॉलेज से कुछ फर्लांग की दूरी पर शाहिद बदर एक यूनानी दवाखाना चलाते हैं। यह वही बदर हैं जिन्हें दि'ी पुलिस ने सिमी को प'तिबंधित किये जाने के मात्र बारह घंटे बाद मु'य कार्यालय जाकिर नगर से गिरफ्तार किया था। इसके बाद बदर ने तिहाड़, बहराईच, गोरखपुर और आजमगढ़ जेल में तीस महीने गुजारे। जेल से छूटने के बाद जहां एक तरफ सिमी अध्यक्ष प'तिबंध हटाये जाने के लिए कानूनी लड़ाई लड़ रहे हैं, वहीं गिरफ्तारी के बाद लगभग बिखर चुके परिवार को समेटने का भी प'यास कर रहे हैं। देश उन्हें किस रूप में याद करता है यह बहस का मसला है, कानून क्या व्यवहार करता है यह अदालती जिम्मेदारी है, मगर आजमगढ़ के लोग उन्हें हकीम कहते हैं। शाहिद कहते हैं, 'अपनी मिट्टी ने मुझे जो अपनत्व दिया है उसके बलबूते हम हर दाग को धो डालेंगे।' सिबली कॉलेज के पि'ंसिपल इ्फितखार अहमद हों या फिर टौंस नदी के तट पर बसे गांव दाउदपुर के हरीशचन्द' यादव, इन जैसे तमाम आम लोगों की निगाह में उनके डॉक्टर साहब भले और सामाजिक मनई (आदमी) हैं।
बहरहाल, सिमी कार्यकर्ताओं की मध्यप'देश में हुई ताजातरीन गिरफ्तारियों के मद्देनजर उनसे तमाम सांगठनिक पहलुओं पर विस्तार से बातचीत हुई, पेश हैं मु'य अंश

हाल के दिनों में सिर्फ मध्यप'देश में ही लगभग दो दर्जन सिमी कार्यकर्ता पकड़े गये हैं, उनकी रिहाई के लिए आपकी तरफ से क्या प'यास हो रहा है?
फिलहाल वे लोग चौदह दिनों की रिमाण्ड पर हैं और अखबारों में लिखा है कि जरूरत पड़ी तो रिमाण्ड अवधि और बढ़ाई जा सकती है। इसलिए हम भी अभी देख ही रहे हैं कि और कितने बम, गोला, बारूद पुलिस रिमाण्ड पर लिए जाने के बाद पुलिस उनके पास से बरामद कराती है। बताते चलें कि नागौरी को छोड़कर और कोई भी नाम ऐसा नहीं है जिसे हम सिमी का कार्यकर्ता कह सकें। रही बात पुलिस की, तो वह किसी भी मुसलमान युवक को सिमी कार्यकर्ता बता सकती है और मीडिया आतंकवादी।

इस पूर्वाग'ह की कोई वजह ?
यह पूर्वाग'ह नहीं, भुगते हुए दिल का दर्द है। पुलिसिया फर्जीवाड़ों की चर्चा क्या की जाये। हमारे खिलाफती बहुत सारी बातें पत्रकारों ने भी ऐसी लिखीं या बोलीं जो हमने कभी कहीं थीं। लेकिन उन्हें हमारी ही जुबानी पेश किया गया और हम कुछ न कर सके। हम देखते रहे उन खबरों को, पलटते रहे अपने खिलाफ छपे पन्नों को, सबकुछ जानते हुए भी हम चुप रहे क्योंकि वो जरिया हमारे पास नहीं है जो एक खबरनवीस के पास है। आपसे गुजारिश है कि जो हम कहें उसी को प'काशित करें।

जो तोहमत आप मीडिया पर लगा रहे हैं उसका कोई आधार?
दो चार वजहें हों तो बतायें। हमारे बारे में हर बार वही कहा गया जो सरकार या खुफिया एजेंसियां मीडिया से कहलवाना चाहती थीं। 2006 में हुए मुंबई सिरियल बम धमाकों को ही लीजिए। धमाकों के ठीक बाद खुफिया ने आरोप लगाया कि
उसमें सिमी का हाथ है। उस समय मैं दि'ी में मौजूद था और दो दिन बाद दि'ी के पटियाला हाउस कोर्ट परिसर में प'ेस कांफ'ेंस कर अपना पक्ष रखा। लोगों ने मना किया, शुभचिंतकों ने कहा, सिमी प'तिबंधित है और मैं गिरफ्तार कर लिया जाऊंगा। लोग इसलिए भी डर रहे थे कि मैं तीस महीने की सजा काटकर हाल ही में लौटा था। फिर भी यह सोचकर मीडिया से रू-ब-रू हुआ कि अब और फर्जी दोषारोपण सहना ठीक नहीं। मगर इस बार भी मीडिया ने खुफिया एजेंसियों की ही तीमारदारी की और हम आहत हुए। खुफिया और सरकार के दबाव के बाद जो इमानदारी बची थी वह खोजी और विशेष खबरों की तेजी में गुम हो गयी। पत्रकार ख़ुद को स्टार साबित करने के लिए और मीडिया घराने मुनाफे के लिए एक पूरे समुदाय के साथ जो नाइंसाफी करते हैं उसे मुनासिब नहीं कहा जा सकता। लगभग दो साल पहले इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के एक नुमाइन्दे ने फोन करके कहा कि वह हमसे गुप्तगू करना चाहता है। उन दिनों मैं केस के सिलसिले में दि'ी के जामिया नगर में रहा करता था। उसने मेरा साक्षात्कार जामिया नगर की सड़क पर किया। पर शाम के वक्त उस चैनल के स्टूडियो में मैं मध्यप'देश राज्य की पहाड़ियों के बीच था। टीवी एंकर ऐलान के अंदाज में कहता रहा, ''जिस खूंखार आतंकवादी शाहिद बदर को खुफिया पुलिस ढूंढने में नाकाम रही, उसे हमारे रिपोर्टर ने खोज निकाला है।'' एक हकीकत यह थी कि मैं दि'ी के जामिया नगर में अपने दोस्त के यहां बैठा उस कार्यक'म की देख रहा था, वहीं इसके उलट पूरा देश मुझे बतौर आतंकवादी पहाड़ियों के बीच देख रहा था। मीडिया का यह रवैया बदस्तूर जारी है।

एक रिपोर्ट में कहा गया है कि सिमी की आर्थिक जरूरतें वर्ल्ड एसेम्बली फॉर मुस्लिम यूथ, रियाध और आईआईएफएसओ से पूरी की जाती हैं?
जिन संगठनों के नाम आर्थिक संसाधन जुटाने के लिए बताये गये हैं उनके बारे में रिपोर्ट जारी करने वाला ही बता सकता है। हम बता दें कि सिमी आर्थिक जरूरतें व्यक्तिगत सहयोग, रमजान की जकात और बकरीद में मिलने वाली खाल (बकरी की खाल) से जुटाया करता था। इसके अलावा जो लोग हमारे कामों को ठीक मानते हैं उनसे सहयोग जुटाया जाता था और कार्यकर्ता सालाना तौर पर निश्चित राशि देता था। नीति के स्तर पर सिमी ने निर्णय लिया था कि संगठन किसी भी तरह का विदेशी अनुदान नहीं लेगा।

इस संगठन का नाम सिमी किसने रखा?
मीडिया ने। हमने तो हमेशा 'स्टूडेन्ट इस्लामिक मूवमेंट ऑफ इंडिया' या आईएसएम कहा है। सत्ताईस सितम्बर 2001 में जब संगठन पर प'तिबंध लगाया गया उस समय मीडिया के बीच 'सिमी' नाम पहली बार जोर-शोर से चर्चा में आया। हमने इस नाम की व्या'या की थी-''ए सैय्यम इज ए मूवमेंट ऑफ द स्टूडेंट, बाई द स्टूडेंट, फॉर द स्टूडेंट ऑफ वेल्फेयर ऑफ द सोसाइटी''- सैय्यम एक तंजीम है, तलबा की, तलबा के जरिये, समाज की बेहदूद (बेहतरी) के लिए।

सिमी के कामकाज का क्या तरीका था?
आजमगढ़ के मनचोभा गांव में जहां की मेरी पैदाइश है, मदरसे से पढ़ाई पूरी करने के बाद आगे की पढ़ाई के लिए अलीगढ़ चला गया। वर्ष 1991 में बीयूएमएस में दाखिला लिया तथा सिमी को इसी आधार पर ज्वाइन किया कि यह संगठन चारित्रिक निर्माण पर जोर देता था। संगठन की 'वाहिश थी कि सभी आला तालीम ( अच्छी शिक्षा) हासिल करें, मगर जीवन के शुरू से आखिर तक खुदा के बन्दे बनकर रहें। क्योंकि हुकूमत चाहे कितना भी पहरा बिठा दे जब तक इन्सान में खुदा के प'ति जवाबदेही पैदा नहीं होगी वह जुर्म करने से बाज नहीं आयेगा। हम पैगम्बर साहब की शिक्षाओं के प'चार-प'सार के साथ नौजवानों को देश और दुनिया के हालातों से रू-ब-रू कराते थे। गोष्ठियों, सम्मेलनों के माध्यम से इंसाफपसंद नौजवानों को हमने हौसला दिया, कभी हथियार की हिमायत नहीं की। हमने गुप्त कामकाज को कभी अपने कार्यशैली में शामिल नहीं किया। यह बात हम इसलिए नहीं कह रहे हैं कि सिमी पर भूमिगत काम करने के आरोप लग रहे हैं। बल्कि सांगठनिक संविधान में ही इसे शामिल नहीं किया गयाथा। जहां कहीं भी जुल्म होता, संगठन उसका जोरदार विरोध करता। साथ ही हम रैगिंग के खिलाफ थे । हमने राष्ट्र व्यापी स्तर पर 1996 से 'एन्टी वर्ण व्यवस्था' कैंपेन भी चलाये। मामला इससे आगे बढ़ा, तो आरएसएस ने जो गलत तारीख किताबों में पढ़ानी शुरू की थी हमने उसके खिलाफ भी छात्रों-युवाओं में जागरूकता अभियान चलाया। संगठन छात्रसंघ चुनावों में भागीदारी करता था या फिर हम चुनावों का सपोर्ट करते थे। जहां कहीं भी फसाद हुआ राहत शिविरों के माध्यम से संगठन ने लोगों की मदद की।

सिर्फ मुस्लिम जनता के लिए या फिर औरों के लिए भी?
ऐसा नहीं था। हमारा उसूल है कि जालिम का हाथ पकड़ लो यही एक मजलूम की मदद होगी। आज भी हम वही करते हैं।

संगठन का स्वरूप कैसा था?

आजादी से पहले या बाद के हिन्दुस्तान की तारीख में सिमी राष्ट्रीय स्तर पर मुस्लिम युवाओं का पहला संगठन था। सदस्यता की उम' 18 से लेकर तीस वर्ष के बीच रखी गयी थी। चार सौ अंसार ( मु'य कार्यकर्ता) के अलावा 20 हजार कार्यकर्ताओं वाले संगठन में अध्यक्ष, महासचिव, खजांची के अलावा कार्यकारिणी के सदस्य हुआ करते थे। चुनाव हर दो साल पर होता। देशभर में जो अंसार थे, उन्हीं में से पदाधिकारी चुने जाते। सिमी का किसी पार्टी या दल से ता'ुकात नहीं था। बावजूद इसके हमलोग देशभर के विश्वविद्यालयों, कॉलजों में तेजी के साथ पढे-लिखे मुस्लिम युवाओं से जुड़ रहे थे। आज भी सरकार से लेकर खुफिया एजेंसियां तक यह बखूबी जानती हैं कि हमारे कार्यकर्ताओं की एक बड़ी सं'या डॉक्टर, इंजीनियर या फिर उच्च शिक्षा प'ाप्त छात्रों की रही है।

संगठन इस्लाम की शिक्षाओं के साथ भारतीय संविधान में भी विश्वास रखता है ?

बेशक। हमारी संविधान प'दत्त व्यवस्था में आस्था है। अगर कहीं से उपलब्ध हो सके तो आप सिमी का संविधान जरूर देखें और लिखें, जिससे की जनता में यह साफ हो सके। आज हम संगठन के प'तिबंध के खिलाफ कानूनी लड़ाई को अंतिम विकल्प के तौर पर देखते हैं। लेकिन यह सवाल उन लोगों से क्यों नहीं पूछा जाता जो लोकतंत्र की चिंदी-चिंदी उड़ाकर हमें अपने ही मुल्क में कैद होने के लिए मजबूर करते हैं। वे उस अहसास को जब्त कर लेना चाहते हैं जो एक आजाद मुल्क का नागरिक चाहता है।

यह आरोप क्यों लगाया जाता है कि सिमी इस्लाम आधारित व्यवस्था चाहता है?

अगर इस देश में कम्युनिस्टों को साम्यवाद लाने का हक है, कुछ लोग हिन्दू राष्ट्र बनाने की बात करते हैं, यह जुर्म नहीं है तो हम जो इस्लामी इंकलाब लाना चाहते हैं वह जुर्म कैसे है।

संगठन पर प'तिबंध क्यों लगाया गया?

जाहिर है, सिमी की कार्यवाइयां हिन्दुस्तान की उस जमात को बर्दाश्त नहीं थीं जो हमें यहां का नागरिक मानने से इनकार करती है। उसका नारा है ''मुसलमानों के दो स्थान, पाकिस्तान या कबि'स्तान''। गर सिमी के इतिहास को देखा जाये तो 25 अप'ैल 1977 में अलीगढ़ में इसकी स्थापना हुई। तबसे लेकर 1998 तक हमारे खिलाफ एक भी मामला दर्ज नहीं था। वर्ष 1998 में भाजपा के नेतृत्व में केन्द' सरकार बनी और मात्र दो सालों के भीतर दर्जनों झूठे मुकदमे सिमी से जुड़े युवाओं पर मढ़ दिये गये। हमारे खिलाफ भाजपा, बजरंग दल, राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ, विश्व हिन्दू परिषद आदि ने बकायदा एक माहौल तैयार किया। उसी की अन्तिम परिणति थी 27 सितम्बर 2001 की शाम चार बजे जब इस छात्र संगठन को प'तिबंधित कर दिया गया। हां, यह जरूर रहा कि हमारे साथी इस्लाम की शिक्षाओं का मानने वाले रहे और आज हम उसी जुर्म की सजा भुगत रहे हैं।

सिमी का दुनियाभर के कई आतंकवादी संगठनों से रिश्ता बताया जाता है। अब तो अलकायदा और हूजी से भी सांठ-गांठ उजागर होने की बात कही जा रही है?

पहले प'तिबंध लगा दिया और अब सांठ-गांठ का आरोप। हमारे यहां भी लोकतंत्र का चलन अजीब है कि मुंह में जाबी (प्रतिबंध) लगा दो और जो चाहे सो कहते रहो। ओसामा बिन लादेन और अलकायदा के बारे में हमने भी मीडिया के माध्यम से ही जाना-सुना है। दुनिया जानती है कि तालिबानियों को रूस के खिलाफ अमेरिका ने सह दी और आज भी वह अपनी जरूरतों के मुताबिक आतंक की परिभाषाएं ईजाद करता रहता है। किसी ने कभी ओसामा को देखा नहीं, जबकि अमेरिका ने उसके सफाये का बहाना बनाकर कई मुल्कों की सभ्यताओं को तबाह कर दिया। ऐसा नहीं है कि भारत का जागरूक नागरिक सरकार की इन चालबाजियों को नहीं समझता, पर उसे कोई विकल्प नहीं दिख रहा कि वह क्या करे। रही बात आरोपों की, तो यह हमारी सरकार के हाथ में है कि कैसा आरोप उसे सुविधाजनक लगता है। यह कैसा लोकतंत्र है कि जिस खुले संगठन सिमी के खिलाफ लगातार खुफिया एजेंसियां दुष्प'चार कर रही हैं उस फरेब को लेकर हम बोल भी नहीं सकते। यह हमारे खिलाफ एक गहरी साजिश का हिस्सा है कि कानूनी लड़ाई को कभी हाइलाईट नहीं किया जाता। अब तक तीन बार प'तिबंध की अवधि आगे बढ़ाई गयी है। तीनों केस सुप'ीमकोर्ट में चल रहे हैं, पर यह सारे मसले कभी खबरों का हिस्सा नहीं बनते।

शाहिद बदर को कोई सिमी का अध्यक्ष क्यों माने?
यह तो जाहिर है कि प'तिबंध के खिलाफ हम संघर्ष कर रहे हैं। जब तक प'तिबंध नहीं हटाया जाता और चुनाव नहीं होता, तब तक तो यही सच है।

इन्दौर में गिरफ्तार किये गये सफदर नागौरी को सिमी का चीफ कैसे बताया जा रहा है? चर्चा यह भी है कि सिमी को तोड़कर सिम नाम का कोई नया संगठन बनाया गया है?

इसके जवाब में मैं ये कहूंगा कि यह जानकारी मीडिया के जरिये ंहम तक पहुंची है। इसलिए यह कहना मुमकिन नहीं कि यह घोषणा किसकी है।



द पब्लिक एजेंडा से साभार

3 comments:

  1. हर चोर चोरी करने के बाद पकडे जाने के बाद यही कहेगा की उसने चोरी नही की ..चोरी उगलवा भी ली जाये ...कहेगा ...मुझसे जबरदस्ती उगलवाया जा रहा है...मुसलमानों के कितने घरो में भगतसिंह .गाँधी की फोटो मिलेगी ......बुरका पहन के टेनिस खिलाने वालो ....कम्युनिस्टों और हिन्दुओ से अपनी तुलना कर इनकी बेइज्जती मत करो ...... कुत्तो शर्म नही आती ,अपनी बहनों (मामा और भुआ की लडकी) से निकाह करते हो ....क्या यही "इस्लामी इंकलाब" लाना चाहते हो ........बेचारे "अशफाक उल्ला" को तरस आ रहा होगा अपनी कोम पर ...Dear मुस्लिम भाइयो ... अपने मदरसों में जेहाद पर सोच विचार कर अपना सर मत खपाओ ....A.P. J. अब्दुल कलाम की तरह सोचो http://www.abdulkalam.com/kalam/index.jsp
    अंत में यही कहूंगा की वो क्या खाक भारतीय है जो "शाहिद बदर" जी को पढ़कर यहाँ .कमेन्ट न करे !!! जय भारत ...

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  2. सिमी का ये कला चेहरा भी देख लीजिये.......

    http://www.visfot.com/corporate_media/simi_rashid_tehlka.html

    note:-इस link को copy अपने address bar में pest कर ले ,इसके बाद enter key दबा दे ...

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  3. साजिद राशिद का तहलका संपादक के नाम खुला पत्र...
    प्रिय तरूण तेजपाल जी, मैं तहलका का नियमित पाठक हूं. इसलिए पिछले दिनों जब तहलका ने सिमी पर केन्द्रित अंक निकाला तो मैंने इसे बहुत उत्सुकता से पढ़ा. लेकिन पढ़कर मैं चकित रह गया. मुझे उम्मीद थी कि तीन महीनों की खोजबीन के बाद आपने सिमी के बारे में जो जानकारी दी होगी उससे निश्चित ही मेरी समझ में बढ़ोत्तरी होगी....
    यह अपेक्षा इसलिए भी थी क्योंकि तहलका पहले भी इस तरह की खोजी रपटों में हर पक्ष की गहन पड़ताल करता है और सकारात्मक और नकारात्मक दोनों पहलुओं को सामने रखता है. लेकिन विद्वान खोजी पत्रकार अजीत साही ने तीन महीने की मेहनत और खोजबीन के बाद सिमी के बारे में जो निष्कर्ष प्रस्तुत किया है वह यह है कि सिमी के पदाधिकारी जिन्हें बम विस्फोटों और देशद्रोह के आरोप में गिरफ्तार किया गया है वे बेहद मासूम हैं और उनके खिलाफ कोई सबूत नहीं है. पूरी पत्रकारिता का सार यह है, क्योंकि सिमी पर प्रतिबंध का कोई ठोस आधार नहीं बनता, इसलिए उसपर प्रतिबंध नहीं होना चाहिए.

    मेरे ख्याल से आपके प्रतिनिधि अजीत साही ने तीन महीनों तक ग्यारह शहरों का कष्टदायक सफर तय करके सिमी कार्यकर्ताओं के परिजनों से मिलकर जो मालूमात हासिल की है वह तो बिल्कुल सही है क्योंकि सिमी का अपने बचाव में जो बयान है अजीत साही ने बड़ी ईमानदारी से उसे दर्ज किया है. लेकिन अफसोस सिर्फ इतना है कि उन्होंने इसे कहीं भी क्रास चेक नहीं किया है. और शहरों के बारे में तो नहीं लेकिन मुंबई में अजीत साही ने दूसरा पक्ष जानने के लिए किससे संपर्क किया? मुंबई में अंग्रेजी की वरिष्ठ पत्रकार ज्योति पुनवानी पिछले तीन सालों से मुसलमानों की समस्याओं पर इतना "सहानुभूति पूर्वक" लिखती हैं कि जमात-ए-इस्लामी और सिमी के एक पदाधिकारी ने उन्हें मुसलमान होने का न्यौता ही दे दिया था. साल भर पहले तक ज्योति पुनवानी सिमी को इस्लाम के प्रति अति उत्साही युवाओं का संगठन बताती रही हैं. जमात-ए-इस्लामी के हुकूमत-ए-इलाहिया (दुनियाभर में अल्लाह की हुकूमत) के नजरिये में उन्हें कोई आपत्ति नजर नहीं आती. विशेष न्यायाधिकरण का सिमी से प्रतिबंध हटाने का फैसला आने के बाद १७ अगस्त को टाईम्स आफ इंडिया में इन्हीं ज्योति पुनवानी ने लिखा था हाउ माई परसेप्शन आफ सिमी चेंज्ड, और विस्तार से बताया है कि कैसे सिमी के बारे में उनकी धारणा बदल गयी.

    तरूण तेजपाल जी, क्या साही से आपको यह नहीं पूछना चाहिए था कि उन्होंने सिमी के चरित्र का दूसरा पक्ष जानने की कोशिश क्यों नहीं की? उन्होंने अपनी पूरी रिपोर्टिंग सिमी के बचाव पक्ष के वकील के तौर पर क्यों किया? आपने सिमी का जो प्रोफाईल दिया है उसमें उसके संस्थापक मोहम्मद अहमदुल्ला सिद्दीकी के बारे में लिखा है कि उन्होंने १९७७ में उन्होंने सिमी की स्थापना की, लेकिन पाठकों को यह बताने की जहमत क्यों नहीं उठायी कि कुछ ही सालों बाद सिद्दीकी ने सिमी से अपना नाता तोड़ लिया था. पिछले साल इंडियन एक्सप्रेस को दिये एक साक्षात्कार में उन्होंने कहा था उन्हें सिमी की स्थापना पर अफसोस है, क्योंकि वह इस्लाम के रास्ते से हटकर जेहाद के रास्ते पर चला गया है. इसी तरह आपने सिमी और जमात-ए-इस्लामी के संबंध पर सिर्फ इतना लिखा गया है कि वह जमात-ए-इस्लामी का एक उपसंगठन था और वह जमात से अलग अपनी पहचान कायम करना चाहता था जबकि हकीकत यह है कि सिमी के जेहादी तेवरों को देखने के बाद जमात ने खुद सिमी से अपना रिश्ता तोड़ लिया था. लेकिन यह भी सच है कि यह संबंध विच्छेद एक दिखावा मात्र था.
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    अब मैं कुछ ऐसे तथ्य रखना चाहूंगा जो अजीत शाही द्वारा ११ शहरों में खोजबीन करने के बाद भी सिमी के बारे में जुटाये नहीं जा सके. १९९६ में अफगानिस्तान में तालिबान की हुकूमत कायम होने के बाद सिमी ने उसे अपना आदर्श मानते हुए भारत में नारों और पोस्टरों के जरिए जेहाद का ऐलान कर दिया. २९ अक्टूबर १९९९ को सिमी ने कानपुर में सिमी ने अखिल भारतीय सम्मेलन आयोजित किया था जिसमें देशभर के २० हजार से अधिक प्रतिनिधियों ने हिस्सा लिया था. इस सम्मेलन को फिलीस्तीनी जिहादी संगठन हमास के नेता शेख यासीन अहमद ने संबोधित किया था. आप जानते ही होंगे कि शेख यासीन ने ही इजरायल और अमेरिका में आत्मघाती हमले करवाये थे. इसी सम्मेलन को फोन द्वारा जमात-ए-इस्लामी (पाक) के अध्यक्ष काजी हुसैन ने भी संबोधित किया था. यह सिमी ही था जिसने कानपुर के तमाम सिनेमघरों को बंद कराने का आदेश दिया था और वहां की लड़कियों को बुर्का पहनने की चेतावनी दी थी.
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    चलिए मान लेते हैं कि आपका संवावदताता कानपुर नहीं गया था इसलिए इन जानकारियों से मरहूम रह गया हो लेकिन आपको यह पता ही होगा कि सिमी के पांच उद्येश्य हैं- अल्लाह मकसद हमारा, रसूल रहबल हमारा, कुरान कानून हमारा, जिहाद रास्ता हमारा, शहादत मंजिल हमारी. सिमी के लेटरहेड पर बने निशान में धरती पर कुरान रखा हुआ है और कुरान पर एके-४७ रायफल. इसलिए सिमी खुद अपने इरादों को छुपाकर नहीं रख रहा है. पृथ्वी पर कुरान और उस पवित्र किताब पर एके-४७ का अर्थ किसी को समझाने की जरूरत नहीं है. सिमी किसके खिलाफ जेहाद करना चाहता है और क्यों शहीद हो जाना चाहता है, क्या इसके पीछे छिपे मकसद को बताना होगा? एक मिनट में डेढ़ सौ बुलेट दागनेवाली एके-४७ का इस्तेमाल आखिर किस लक्ष्य के लिए होता है? हमें तो यह पता है कि इससे निकलेवाली गोलियां जान बचाती नहीं, जान लेती हैं. तरूण जी जितना आपको खाकी पैण्ट और लाठीधारियों से परहेज है उतना ही हमें भी है. छह इंच का चाकूनुमा त्रिशूल बांटनेवाले बजरंगदलियों से घृणा होती है, फिर एक-४७ लेकर देहाद का इरादा रखनेवाले हमारी नजर में मासूम कैसे हो सकते हैं? "काफिर भारत" को नेस्तनाबूत कर देने की प्रतिज्ञा लेनेवाले लादेन और तालिबान जिनके आदर्श हों उन्हें किन मानदंडों पर आप राष्ट्रवादी साबित करेंगे? आपकी यह रिपोर्ट बहुत सारे उर्दू अखबारों ने अपने यहां छापी है. निश्चित रूप से जो सिमी को इस्लाम का सच्चा खिदमतगार मानते हैं उन्हें आपकी रिपोर्ट से बहुत बल मिला है. लेकिन आपकी इस रिपोर्ट से उन मुट्ठीभर मुस्लिम बुद्धिजीवियों को जरूर धक्का लगेगा जो सिमी की देशविरोधी गतिविधियों से अपने संप्रदाय को सचेत करते रहे हैं. काश तहलका सिमी के मुखौटे के पीछे की असली सच्चाई सामने लाने की कोशिश की होती....
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    आभार,
    साजिद राशिद
    (साजिद राशिद संजीदा पत्रकार हैं और जनसत्ता में नियमित कालम लिखते हैं.)

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