Jul 27, 2011

धर्म के नाम पर ‘अधर्म’ करने से परहेज़ ज़रूरी


पूरी ट्रेन के सभी डिब्बों में यहां तक कि वातानुकूलित कोच में भी कांवड़ यात्रियों द्वारा कहीं-कहीं एक-एक और कहीं 2-3 साइकिलें ट्रेन के डिब्बे के प्रवेशद्वार पर खड़ी कर दी गई थी। इतना ही नहीं खिड़कियों के बाहर भी कांवड य़ात्रियों द्वारा अपनी साइकिलें रसिस्यों और तारों से बांधकर लटका दी गई थीं...

निर्मल रानी 


विभिन्न प्रकार की संस्कृतियों, धर्मों, जातियों व विश्वासों को अपने में समाहित रखने वाला भारत दुनिया का ऐसा सबसे बड़ा लोकतांत्रिक देश है जहां हर कोइ सदियों से पूरी श्रद्धा एवं विश्वास के साथ अपने सभी धार्मित्यौहारों, रीति-रिवाजों और परंपराओं का अनुसरण करता चला आ रहा है। इनमे से शायद ही कोई परंपरा या रीति-रिवाज कम हुआ हो, परंतु तमाम नए रीति-रिवाज ज़रूर जुड़ते जा रहे हैं। 

हमारे यही धर्म और इनकी शिक्षाएं हमें सीख देती हैं कि जहां हम अपने रीति-रिवाजों व परंपराओं पर चलें, वहीं इस बात का भी खयाल रखें कि हमारे धार्मिक कार्यकलापों या कारगुज़ारियों के चलते किसी दूसरे व्यक्ति को किसी प्रकार का कोई दु:ख या तकलीफ न पहुंचने पाए। 

आज कई धार्मिक यात्राओं अथवा आयोजनों से धार्मिक समर्पण तथा गहन श्रद्धा के समाचार आने के साथ-साथ तफरीह, ख़ानापूर्ति, मनोरंजन, धनार्जन, नशाखोरी, मारपीट-हंगामा तथा दूसरों से लडऩे-झगडऩे जैसे समाचार प्राप्त हो रहे हैं। परिणामस्वरूप धार्मिक रीति-रिवाज और परंपराएं बदनाम होने लगी हैं। चंद अवांछित तत्वों की अशोभनीय हरकतों के चलते पूरा का पूरा तीर्थयात्री समाज ही बदनाम होने लगा है।

उदाहरण के तौर पर प्रत्येक वर्ष श्रावण मास की पूर्णिमा के अवसर पर शिवभक्तों द्वारा विभिन्न पवित्र नदियों का पवित्र जल लाकर शिवजी का जलाभिषेक किया जाता है। उत्तर भारत में प्रचलित इस त्यौहार के दौरान लाखों की तादाद में शिवभक्तों के जत्थे जिन्हें ‘कांवडिय़ों’ के नाम से भी जाना जाता है, पूरे उत्तर भारत में एक ओर से दूसरी ओर आते-जाते देखे जा सकते हैं। दिल्ली, हरियाणा, पंजाब, राजस्थान व पश्चिमी उत्तर प्रदेश के लोग इस दौरान जहां हरिद्वार की ओर गंगाजल लाने के लिए भारी संख्या में कूच करते हैं, वहीं पूर्वी उत्तर प्रदेश व बिहार के लाखों शिवभक्त बैजनाथ धाम की ओर प्रस्थान करते हैं। 

कांवड़ यात्रा में पैदल कांवड़ यात्रियों से लेकर मोटर साईकिल, बस, कार, ट्रक-टैंपो, ट्रैक्टर अथवा रेलगाड़ी आदि सभी साधनों के माध्यम से लोग जल लेने के लिए हरिद्वार अथवा बैजनाथ धाम जाते हैं। यहां से गंगाजल ले जाकर अपने-अपने गावों या मोहल्लों के मंदिरों में शिवजी का जलाभिषेक करते हैं। बरसात के दिनों में पडऩे वाली इस समर्पित, कष्टदायक तथा चुनौतीपूर्ण यात्रा के दौरान निश्चित रूप से कांवडिय़े अपने व्यक्तिगत् शारीरिक कष्ट से रू-बरू होते हैं। यात्रा के दौरान आने वाली कई यातायात संबंधी परेशानियां भी अक्सर कांवडिय़ों को संकट में डाल देती हैं।

हमारे देश की सड़कों की क्षमता वर्तमान समय में सड़कों पर पडऩे वाले यातायात के दबाव से कहीं कम है। यही वजह है कि सड़क निर्माण के क्षेत्र में हुई अभूतपूर्व स्तर की तरक्क़ी के बावजूद अभी भी सड़क दुर्घटनाएं होती रहती हैं। ऐसे में यदि कांवडिय़ों की लाखों की संख्या लगभग एक माह के लिए सड़कों पर उतर आए तो दैनिक यातायात पर उसका क्या प्रभाव पड़ेगा, इस बात का अंदाज़ा सहज लगाया जा सकता है। 

शिवभक्तों को 'कांवडिय़ा' इसीलिए भी कहकर संबोधित किया जाता है, क्योंकि उनके कंधों पर शिव कांवड़ सजी होती है, जिसे वे अपने साथ पैदल अथवा संबद्ध साधनों के माध्यम से लेकर हरिद्वार अथवा अन्यत्र ले जाते है और् वहां से इसी कांवड़ में जल लटकाकर वापस भी लाते हैं। बांस द्वारा आमतौर पर बनाई गई यह कावड़ भी रास्ते में अच्छी ख़ासी जगह घेरती है। चूंकि कांवड़ यात्री भी आमतौर पर मुख्य मार्गों का ही इस्तेमाल अपनी पैदल यात्रा में करते हैं इसलिए पूरे देश में कई जगहों से किसी न किसी शिवभक्त की दुर्घटना का भी दुर्भाग्यपूर्ण समाचार प्राप्त होता है। 

हालांकि दिल्ली, गुडग़ांव, हरिद्वार तथा ग़ाजि़याबाद जैसे क्षेत्रों में कांवडिय़ों के लिए कई जगह विशेष मार्ग भी इस दौरान निर्धारित कर दिए जाते हैं, मगर ऐसा कर पाना पूरे देश में संभव नहीं है। नतीजतन जब यातायात के भारी दबाव और कांवडिय़ों की बड़ी तादाद के टकराव के मध्य कोई हादसा पेश आता है, तो अक्सर यह देखा गया है कि यही कांवडि़ए अपना आपा खो बैठते हैं। उस समय शिवभक्त अपने धार्मिक होने का प्रदर्शन करने के बजाए पूरी तरह आक्रामक हो जाते हैं। कई बार तो कांवडिय़ों, आम लोगों अथवा पुलिसवालों के मध्य ऐसे भयंकर संघर्ष की खबरें तक आ चुकी हैं जिनमें कइ लोगो को अपनी जानें तक गंवानी पड़ी हैं। 

अब तो कांवडिय़ों द्वारा हंगामा करने, दुकानों, बाज़ारों और मार्गों में तोड़फोड़ करने व नुक़सान पहुंचाने की खबरें गोया प्रत्येक वर्ष श्रावण मास में प्राप्त होने वाले समाचार बनकर रह गए हैं। जहां पूरे देश में जगह-जगह इनके रहने-सहने, खाने-पीने, नहाने-धोने, आराम करने और दवाईयों- डाक्टरों द्वारा इलाज की सुविधा मुहैया कराने तक का प्रबंध आम नागरिकों द्वारा किया जाता है, वहीं कई जगह तो आम लोग कांवड़ यात्रा के दौरान हुड़दंग के डर से सहमे हुए तथा दहशत की अवस्था में भी दिखाई देते हैं। ऐसे में सवाल उठता है कि क्या हमारी धार्मिक परंपराएं हमें यही शिक्षा देती हैं कि हम जब और जहां चाहें अपना आपा खो बैठें और दूसरों के साथ धक्कामुक्की, ज़ोर-ज़बरदस्ती, हिंसा के साथ पेश आएं?
पिछले दिनों मुझे गंगानगर हरिद्वार एक्सप्रेस ट्रेन में एक दृश्य देखकर बड़ा आश्चर्य हुआ। इस पूरी ट्रेन के सभी डिब्बों में यहां तक कि वातानुकूलित कोच में भी कांवड़ यात्रियों द्वारा कहीं-कहीं एक-एक और कहीं 2-3 साइकिलें ट्रेन के डिब्बे के प्रवेशद्वार पर खड़ी कर दी गई थी। इतना ही नहीं खिड़कियों के बाहर भी कांवड य़ात्रियों द्वारा अपनी साइकिलें रसिस्यों और तारों से बांधकर लटका दी गई थीं। साइकिलों के अतिरिक्त उनकी कांवड़ भी पूरी ट्रेन में दोनों ओर खिड़कियों पर बंधी हुई थी। 

एक बार तो उस ट्रेन को देखकर ऐसा ही प्रतीत हो रहा था कि गोया यह कांवड़ स्पेशल ट्रेन हो। कांवड़ यात्रियों द्वारा डिब्बों में इस प्रकार साईकिल खड़ी किए जाने के कारण रेलयात्रियों को बेहद तकलीफ और परेशानी का सामना करना पड़ रहा था। बातचीत के दौरान सभी रेलयात्री कांवडिय़ों की इस ज़ोर-ज़बरदस्ती और धक्कामुक्की पर नाराज़ थे। सभी उनकी आलोचना कर रहे थे। उधर यात्रियों को कष्ट देने के बावजूद कांवड़ यात्रियों का अपना व्यवहार भी रेल यात्रियों के साथ अच्छा नहीं था। लगभग प्रत्येक यात्री इसी आश्चर्य के साथ एक-दूसरे से यहां तक कि कांवडिय़ों से भी बार-बार यह सवाल कर रहा था कि क्या इसी को धर्म कहते हैं? क्या यही है शिवभक्ति है? क्या यही है धार्मिक कारगुज़ारियों को अंजाम देने का तरीक़ा और सलीक़ा? 

दरअसल, धर्म तो यही सिखाता है कि प्रत्येक सामाजिक प्राणी में सदभाव, सदाचार और नैतिकता का होना बहुत ज़रूरी है। परंतु धर्म के नाम पर तथा धर्म की राह पर चलने वाले धर्मावलंबियों तथा भक्तजनों को तो कम से कम इस बात की न केवल कोशिश बल्कि संकल्प करना चाहिए कि वे व्यक्तिगत तौर पर अथवा सामूहिक रूप से ऐसा कोई कार्य न करें जिससे उनके धार्मिक कार्यकलापों, यात्राओं अथवा अन्य पारंपरिक आयोजनों को धर्म के बजाए अधर्मकी श्रेणी में रखा जाये।


लेखिका उपभोक्ता मामलों की विशेषज्ञ हैं और सामाजिक-राजनीतिक विषयों पर भी लिखती हैं.





Jul 26, 2011

गुलाबी गैंग पर सियासी आरोप

गुलाबी गैंग  कमांडर संपत पाल पर एक दलित युवती ने बरगलाने और बलात्कार करवाने का मुक़दमा दर्ज कराया है, लेकिन एक दूसरा पहलु भी उभर कर आ रहा है...

आशीष सागर

जो महिलाओं के लिये ही मोर्चा सभांलती रही, उनके ऊपर हो रहे जुल्म का एक भी मुद्दा  जिसे सुकून से सोने नही देता था और वह ही महिला उत्पीडन में बदनाम हो जाये तो क्या कहा जाय। जब समाज के लिये संघर्ष करने वाले लोगो पर ही मर्यादा का मर्दन करने के आरोप लगाये जाने लगे और उन्हे उत्पीड़न, धन हड़पने, बंधक बनाकर सामूहिक दुराचार के आरोपों में गिरफ्तार करने के मांगे प्रशासन से की जाने लगे तो आखिर आम आदमी, महिलायें भरोसा करे तो किस पर।

बुंदेलखंड से लेकर देश विदेश तक अपने प्रभाव का असर और गुलाबी रंग का बुखार पैदा करने वाली गुलाबी गैंग की कमांडर संपतपाल को नामी ’ द गार्जियन ’ समाचार पत्र ने भी दुनिया के 100 प्रभावशाली महिलाओं में शुमार किया है। हमेशा ही महिलाओं के लिये और खासकर दलित महिलाओं के लिये संघर्ष करने का उनका तरीका कई राजनीतिक दलों की गले की हड्डी बनता जा रहा है और सामाजिक संगठन भी इस बात को हजम नही कर पा रहे है। चित्रकूट के रौली कल्याणपुर ग्राम पंचायत से इस पंचवर्षीय चुनाव में उनके पुत्र  कामता पाल प्रधान निर्वाचित हुये है और यह गांव गैंग कमाण्डर का ससुराल भी है।

बीते दिनों  एक दलित लडकी नीलम निवासी खरौंच, नरैनी ने यह आरोप लगाकर सभी के होश उडा दिये कि महिलाओं के लिये औैर खासकर प्रेमी जोड़ो के लिये पैरोकारी करने वाली संपत पाल ने एक लाख रू0 को हड़पने की नियत से पहले तो देा पक्षो में समझौता कराया और युवती को बरगलाने के बाद कई दिनों तक अपने ही बदौसा स्थित घर में गैंग से सम्बंध रखने वाले लोगो द्वारा दुराचार करवाया गया। युवती ने इस बात की तहरीर जनपद के पुलिस अधिक्षक के समक्ष दिये गये हलफनामें की है। वहीं संपत पाल का कहना है कि उसने तो युवती को उसके कथित प्रेमी राजू से बचाकर समझौता कराया था और अपने घर मे पनाह दी थी।  बकौल संपत ने स्वीकार किया है कि युवती ने एक लाख रू0 रखने के लिये उन्हे दिये थे जिसे बाद में नीलम को सौपा जाना था। पीड़ित नीलम का कहना है कि उसके माता पिता भी संपत पाल के साथ मिल गये है और गुलाबी गैंग द्वारा ही उसके साथ यौन उत्पीड़न किया गया है।

विधान सभा चुनाव 2012 का खुमार गुलाबी गैंग पर भी सिर चढकर बोल रहा है। आये दिन महिला मुद्दों पर सरकार को घेरना, विरोध प्रदर्शन और एक खास पार्टी का पक्ष लेकर खुद भी राजनीति के मैदान में आने की चाहत ने ही संपत की मुश्किले बढ़ा दी। इधर समाजसेवी संगठनों से जुड़े लोगो के अनुसार प्रदेश में जिस तरह से संपत पाल सरकार के विरोध मे खड़ी है उससे कई राजनेताओं की नींदें उड़ गयी है।

अंदर की खबर है कि मिशन 2012 में गुलाबी गैंग गुलाबी पार्टी के नाम से चुनाव में ताल ठोकेगा। संपत ने भी मानिकपुर क्षेत्र से कांग्रेस पार्टी से टिकट देने की गुहार की है। जनपद बांदा में गैंग कमांडर पर नीलम द्वारा लगाये गये दुराचार के आरोप कितने सच है यह तो कानून की किताब ही तय करेगी लेकिन जिस तरह से गैंग की महिलायें लगातार मुकदमें के विरोध में विरोध प्रदर्शन कर रही है वह संपत की जमीन तैयार करने का ही एक हिस्सा है। उधर युवती को कोर्ट ने नाबालिग करार देते हुये नारी निकेतन भेज दिया है.

वहीं युवती के माता पिता प्रेमी राजू पर लड़की को बहकाने के आरोप लगा रहे है। हकीकत क्या है और  राजनीति के पचड़े में उलझी संपत कैसे   निकल पाएंगी, यह तो नीलम और गुलाबी गैंग में छिड़ा शब्द युद्ध  तय करेगा, मगर गुलाबी गैंग की सदस्या जमुना बाई ने अपनी मुखिया के खिलाफ, मूर्ती सिंह, राहत जहां, शकुन्तला, रामदुलारी सहित बयां दिया है कि सम्पत पाल ने गुलाबी गैंग की छवि खराब की है।

बुंदेलखंड  की इस समाज की पैरोकारी करने वाली महिला के ऊपर लगाये गये आरोप कहीं इस उठापटक में एक और शीलू बलात्कार  कांड की तस्दीक न कर दे। ऐसा अन्देशा प्रकरण की नजाकत को देखकर और कुछ संगठनो, ब्राहम्ण सेवादल द्वारा संपत पाल के ऊपर लगाये सभी आरोपों को सही ठहराने से प्रतीत होता है।

Jul 24, 2011

जनसांस्कृतिक मूल्यों के लिए फाउंडेशन

फाउंडेशनों की भीड़ में यह अलग किस्म का फाउंडेशन होगा,जो व्यक्ति तक सिमटा नहीं रहेगा,बल्कि उन मूल्यों,सिद्धांतों और संघर्षशील चेतना को आगे बढ़ाएगा, जो अनिल सिन्हा की जिंदगी का मकसद था...

सुधीर सुमन


 

अनिल सिन्हा : जनपक्षधर लेखक

ईमानदारी के साथ अनवरत अपने विचारों और मूल्यों के साथ सक्रिय रहने वाले शख्स कभी हमख्याल लोगों द्वारा विस्मृत नहीं किये जाते। 23जुलाई की शाम अनिल सिन्हा की याद में उनके नाम पर गठित मेमोरियल फाउंडेशन की ओर से दिल्ली के ललित कला अकादमी के कौस्तुभ सभागार में आयोजित कार्यक्रम में साहित्यिक-सांस्कृतिक लोगों ने भी यह महसूस किया।

संस्कृतिकर्मी और पत्रकार अनिल सिन्हा की बेटी रितु ने कहा कि फाउंडेशनों की भीड़ में यह अलग किस्म का फाउंडेशन होगा जो व्यक्ति तक सिमटा नहीं रहेगा,बल्कि उन मूल्यों,सिद्धांतों और संघर्षशील चेतना को आगे बढ़ाएगा, जो अनिल सिन्हा की जिंदगी का मकसद था। रितु ने बताया कि हर साल लखनऊ में फाउंडेशन की तरफ से एक आयोजन होगा,जिसमें अनिल सिन्हा स्मृति व्याख्यान होगा और एक संगोष्ठी होगी तथा उनके नाम पर एक सम्मान दिया जाएगा।

अनिल सिन्हा के दूसरे कहानी संग्रह ‘एक पीली दोपहर का किस्सा’ का लोकार्पण कवि वीरेन डंगवाल ने किया। अनिल सिन्हा के साथ दोस्ती के अपने लंबे अनुभवों को साझा करते हुए उन्होंने कहा कि वे हमेशा विनम्र और सहज रहे। जसम की स्थापना में उनकी भूमिका को याद करते हुए उन्होंने उम्मीद जाहिर की कि फाउंडेशन उन्हीं जन सांस्कृतिक मूल्यों के लिए काम करेगा,जिसके लिए जसम की स्थापना हुई थी।

कवि मंगलेश डबराल ने कहा क़ि अनिल सिन्हा जिस तरीके से अपने पारिवारिक जरूरतों और वैचारिक मकसद के लिए पूरे दमखम के साथ संघर्ष करते थे,वह उन्हें आकर्षित करता था। आर्थिक और वैचारिक संघर्ष के साथ-साथ ही एक पिता के बतौर बच्चों को सुशिक्षित और योग्य नागरिक बनाने में अनिल सिन्हा की जो भूमिका थी,उसे भी मंगलेश डबराल ने याद किया।

'समकालीन तीसरी दुनिया' के संपादक आनंदस्वरूप वर्मा ने कहा कि उनके विचारों में जबर्दस्त दृढ़ता और व्यवहार में लचीलापन था और वे मूलतः पत्रकार थे। नेता,पुलिस,ब्यरोक्रेसी और दलालपत्रकारों के नेक्सस के खिलाफ उन्होंने जनपक्षीय पत्रकारों को संगठित करने की पहल की और नवभारत टाइम्स से अलग होने के बाद उन्होंने एक फ्रीलांसर की तरह काम किया।

इस आयोजन में इरफान ने अपनी सधी हुई आवाज में अनिल सिन्हा के ‘एक पीली दोपहर का किस्सा’ संग्रह की एक कहानी ‘गली रामकली’का पाठ किया। कुछ तो इरफान की आवाज का जादू था और कुछ कहानीकार की उस निगाह का असर जिसमें एक दलित मेहनतकश महिला के प्रति निर्मित होते सामाजिक सम्मान के बोध की बारीक दास्तान रची गई है,उसने कुछ समय के लिए श्रोताओं को अपने मुहल्लों और कस्बों की दुनिया में पहुंचा दिया। चित्रकार-कथाकार अशोक भौमिक ने व्याख्यान-प्रदर्शन पेश किया। अपनी कला-समीक्षाओं में अनिल सिन्हा की गहरी निगाह चित्रकारों के सामाजिक सरोकारों पर रहती थी।

आयोजन की अध्यक्षता कर रहे प्रो. मैनेजर पांडेय ने  अनिल सिन्हा मेमोरियल फाउंडेशन के बारे में  सुझाव दिए। उन्होंने कहा कि हिंदी और अंग्रेजी में अनिल सिन्हा का जो लेखन इधर-उधर बिखरा हुआ है,उसे एक क्रम में व्यवस्थित करके ठीक से एक जगह रखा जाना चाहिए। कार्यक्रम का संचालन  युवा आलोचक आशुतोष कुमार ने किया।

आयोजन में इब्बार रब्बी, मुरली मनोहर प्रसाद, रेखा अवस्थी, मदन कश्यप, नीलाभ, विमल कुमार, योगेंद्र आहूजा, रंजीत वर्मा, कुमार मुकुल, भाषा सिंह, गोपाल प्रधान, कविता कृष्णन, संदीप,  असलम,कनिका, उमा, मनोज सिंह, अशोक चैधरी, मुकुल सरल, कौशल किशोर, भगवान स्वरूप  कटियार, सुभाषचंद्र कुशवाहा, निधि, अनुराग, कौशलेश आदि भी मौजूद थे।

 

अदालती फैसले ही आखिरी आस

किसानों से सलाह-मशविरा किये बिना सत्ता  विकास के नाम पर जब-जहां चाहती  है किसानों की भूमि कब्ज़ा  कर लेती  है.  किसान इसका विरोध करता है तो उसे मिलती हैं पुलिस की लाठियां और गोलियां...

तनवीर जाफरी

हमारे देश के राजनैतिक हल्क़ों में ‘मसीहा’शब्द का प्रयोग अत्यधिक कसरत से होते हुए देखा जा सकता है। लगभग सभी राजनैतिक पार्टियों में तमाम नेता ऐसे मिल जाएंगे जो इस खुशफ़हमी में जीते आ रहे हैं कि वे अपने सामाजिक जीवन में किसी न किसी वर्ग विशेष के मसीहा के समान है। कोई स्वयं को किसानों का मसीहा कहने में आत्मसंतोष महसूस करता है तो कोई दलितों का स्वयंभू मसीहा बना बैठा है। कोई मज़दूरों का मसीहा तो कोई छात्रों का। इन तथाकथित मसीहाओं में सबसे अधिक ‘मसीहाई’या तो दलितों की की जाती है या फिर देश के अन्नदाता समझे जाने वाले विशाल एवं वृहद् कृषक समाज की।

लेकिन राजनैतिक दल जब किसानों की मसीहाई का दम भरते हैं तो हमें कभी सिंगूर नज़र आता है तो कभी नंदीग्राम,कभी जैतापुर तो कभी भट्टा-पारसौल। किसानों की हमदर्दी का दम भरने वाली राजनीति,सत्ता या नेता बिना किसानों से पूछे हुए व बिना किसी सलाह-मशविरे के देश के विकास के नाम पर जब और जहां चाहते हैं किसानों की भूमि अधिगृहित कर लेते हैं और यदि किसान इसका विरोध करता है तो उसे मिलती हैं पुलिस की लाठियां और गोलियां।

 नॉएडा के किसान :  नहीं छोड़ेंगे खेत                   फोटो- जनज्वार

ऐसे में किसान अदालत का दरवाजा खटखटाता है जैसा कि पिछले दिनों दिल्ली के समीप नोएडा क्षेत्र के तमाम किसानों के साथ हुआ। नोएडा-आगरा एक्सप्रेस मार्ग हेतु अधिग्रहण की गई किसानों की भूमि के संबंध में और भी सैकड़ों याचिकाएं किसानों द्वारा अदालत में डाली गई हैं। उम्मीद है कि इन सभी मामलों में अदालतें किसानों को उनकी भूमि वापस किए जाने के ही आदेश देगी। इसी से डरकर हरियाणा के मुख्यमंत्री भूपेंद्र सिंह हुड्डा ने भी राज्य में अधिगृहित की गई ज़मीनों के सिलसिले में किसानों को बड़ी राहत देते हुए गत् 6माह के दौरान अधिग्रहण की गई ज़मीनों पर अगला कानून बनने तक रोक लगा दी है।

इस घटनाक्रम से जुड़े कई प्रश्र ऐसे हैं जो केंद्र सरकार की भूमि अधिग्रहण नीति की धारा 4 को तो चुनौती देते ही हैं साथ ही साथ राज्य सरकारों की नीयत तथा उनकी भूमि का यहां तक कि भविष्य में उसकी विश्वसनीयता तक पर प्रश्रचिन्ह लगाते हैं। राज्य सरकारें बड़ी आसानी से किसानों की भूमि का अधिग्रहण इस बहाने से कर लेती हैं कि ‘भूमि अधिग्रहण कानून की धारा 4तो केंद्र सरकार की परिधि में आती है। राज्य सरकारें तो केवल उसका अनुसरण मात्र करती हैं।’ परंतु भूमि अधिग्रहण अधिनियम की धारा 4 की व्यवस्था देश की विकास संबंधी योजनाओं को मद्देनज़र रखते हुए है।

राज्य सरकारें दुहाई तो केंद्र सरकार द्वारा बनाए गए भूमि अधिग्रहण कानून की देती हैं परंतु उसकी आड़ में सरकारें अपने चेलों,चट्टेबट्टों,चम्मचों तथा शुभचिंतकों के बीच किसानों की अधिग्रहण की गई ज़मीन का बंदरबांट करने लग जाती हैं। यदि सडक़ बनाने के बहाने किसानों की ज़मीन उनसे ली गई है तो वहां सडक़ के साथ-साथ नई टाऊनशिप बनने लगती है। बिल्डर्स नई-नई कालोनियां व गगनचुंबी इमारतें बनाने लगते हैं। शॉपिंग माल, निजी स्कूल, मंहगे निजी अस्पताल आदि बनाए जाते हैं।

ऐसे में जहां किसान,नेताओं व राजनैतिक दलों द्वारा स्वयं को ठगा हुआ महसूस करते हैं तथा सरकार के प्रति उनमें अविश्वास की भावना पैदा होती है,वहीं अदालतों द्वारा किसानों के पक्ष में फैसले सुनाए जाने के बाद बिल्डर्स,निजी कंपनियां,निवेशक तथा औद्योगिक घरानों का भी विश्वास राज्य सरकारों से पूरी तरह से उठ जाता है।

ज़ाहिर है कोई भी बिल्डर या औद्योगिक घराना अपनी किसी योजना को लेकर राज्य सरकार के निमंत्रण पर या उससे हुए समझौते के तहत ही किसी क्षेत्र विशेष में अपना निवेश करता है। परंतु जब माननीय उच्च न्यायालय अथवा उच्चतम न्यायालय किसानों को उनकी ज़मीन वापस किए का आदेश दे दे जैसाकि पिछले दिनों नोएडा-आगरा यमुना एक्प्रेस हाईवे के किसानों के मामले में दिया गया है, ऐसे में राज्य सरकार की विश्वसनीयता स्वयं ही समाप्त हो जाती है।

सवाल उठता है इस पूरे घटनाक्रम में आखिर दोषी है कौन है ? क्या किसान दोषी है, जिसकी ज़मीन का अधिग्रहण बिना उसके सलाह-मशविरे तथा बिना उसकी शर्तों को सुने व स्वीकार किए कर लिया गया? फिर कोई उद्योगपति या बिल्डर भी इसके लिए क्यों दोषी है, जोकि राज्य सरकार के निमंत्रण पर अथवा उसके साथ हुए करार के तहत किसी क्षेत्र विशेष में अपनी योजना पर काम कर रहा है? इसी प्रकार वह मध्यमवर्गीय निवेशक भी क्योंकर दोषी हो सकता है जिसने अपने व अपने बच्चों के भविष्य के मद्देनज़र अपनी जमापूंजी अथवाकर्ज लेकर किसी आवासीय योजना में अथवा अन्यत्र पूंजीनिवेश किया हो?

इस पूरे प्रकरण में यदि सबसे अधिक गैरजि़म्मेदार व संदेहास्पद भूमिका नज़र आती है तो वह केवल राज्य सरकार की अथवा उनके तथाकथित सलाहकारों व शुभचिंतकों की है जोकि सत्ता का दुरुपयोग कर बड़े पैमाने पर धांधली करने की कोशिश करते हैं तथा कानून की आड़ लेकर किसानों को भूमिहीन करने तथा उद्योगपतियों,बिल्डर्स आदि की सांठगांठ से स्वयं मोटी रकम कमाने का प्रयास करते हैं।

गत् दो माह से हरियाणा के अंबाला शहर में भी 6 गांवों के किसानों ने अपनी भूमि अधिग्रहण के विरोध में धरना दे रखा है। सोचने का विषय यह है कि जो किसान परिवार अपना घर-द्वार, सुख-चैन सब कुछ पीछे छोडक़र जि़ला कार्यालय के बाहर गर्मी, लू-धूप, बारिश तथा मच्छरों की परवाह किए बिना बैठे हों क्या यह किसान सरकार को अपनी ज़मीनों का अधिग्रहण सरकार की अपनी शर्तों पर आसानी से करने देंगे?

चाहे महाराष्ट्र का जैतापूर हो चाहे बंगाल का सिंगूर या नंदीग्राम या अलीगढ़ व नोएडा के किसान या गुडग़ांव,भट्टा-पारसौल या अंबाला के किसान। सरकार को यह बात ध्यान में रखनी चाहिए कि जब किसान अपनी ताकत का एहसास कराने पर तुल जाता है तब टाटा जैसे देश के प्रमुख उद्योगपति को भी अपना उद्योग पश्चिम बंगाल से हटाना पड़ जाता है। ऐसे में राज्य सरकारों को किसानों से टकराने या उनकी भूमि का जबरन अधिग्रहण किए जाने जैसे विचार अपने ज़ेहन से निकाल देने चाहिए और राज्य सरकारों को किसानों की उन्नत कृषि तकनीक के उपाय सुझाने चाहिए।


हरियाणा साहित्य अकादमी के भूतपूर्व सदस्य और राष्ट्रीय-अंतर्राष्ट्रीय मसलों के टिप्पणीकार.



देश ब्लैकबेरी के बगैर जी सकता, शाह्बेरी के बिना नहीं

असल में शाहबेरी का निवासी बनने को देश का वो क्लास उत्सुक है जो ब्लैकबेरी मोबाइल हाथ में लेकर घूमता है, लेकिन सुप्रीम कोर्ट के निर्णय ने ‘ब्लैकबेरी क्लास’ के सपनों के महल को चकनाचूर कर डाला है...

आशीष वशिष्ठ का विश्लेषण

राष्ट्रीय राजमार्ग यानी एनएच 58पर बसा गांव शाहबेरी देश के उन तमाम गांवों में से एक है जिसकी खेती योग्य जमीन विकास के नाम पर सरकार ने अधिग्रहित की थी। लेकिन शाहबेरी गांव के किसान भाग्यशाली निकले क्योंकि पिछले दिनों सुप्रीम कोर्ट ने यूपी सरकार को किसानों को उनकी जमीन वापिस करने का आदेश दिया है।

विकास के नाम पर अधिग्रहित की गई जमीन को सरकार ने कारपोरेट घरानों और बिल्डरों को ऊंचे दामों में बेचकर कमीशन की मोटी मलाई काटी थी लेकिन शाहबेरी के किसानों ने इंसाफ की आस नहीं छोड़ी और अन्ततः सुप्रीम कोर्ट ने उनके हक में फैसला सुनाकर न्यायपालिका पर आम आदमी की आस्था को जिंदा रखा।

गौरतलब है कि पिछले एक दशक में ग्रेटर नोएडा में लगभग 85000 हजार एकड़ जमीन प्राधिकरण ने अधिग्रहित की है। वर्तमान में शाहबेरी गांव में सात बिल्डरों द्वारा तकरीबन पचास हजार फ्लैट बनाने का काम जोरों पर था। ग्रेटर नोएडा प्राधिकरण ने किसानों को बाजार भाव से काफी कम मुआवजा दिया गया लेकिन वही जमीन सरकार ने बिल्डरों को ऊंचे दामों पर बेची थी। शाहबेरी में बन रहे छोटे से छोटे फ्लैट की कीमत आधा करोड़ के करीब है।

असल में शाहबेरी का निवासी बनने को देश का वो क्लास उत्सुक है जो ब्लैकबेरी मोबाइल हाथ में लेकर घूमता है। लेकिन सुप्रीम कोर्ट के निर्णय ने ‘ब्लैकबेरी क्लास’के सपनों के महल को चकनाचूर कर डाला है। अदालत के सकारात्मक व खेती-किसानी के प्रति नरम और सहयोगी रवैये से ये उम्मीद जगी है कि शाहबेरी जैसे देश के अन्य हजारों गांव ब्लैकबेरी क्लास का ठिकाना बनने से बच जाएंगे।

किसी जमाने में मोटे तौर पर जमीन के दो ही उपयोग थे, एक घर बनाने और दूसरा खेती के लिए। लेकिन उदारीकरण की बयार में चांदी-सोने और षेयर बाजार की भांति जमीन भी निवेश का सौदा बन गयी। पिछले एक दषक मंे तेजी से उभरे नव धनाढय वर्ग ने दिल खोलकर जमीन में निवेष किया। विकास और उलूल-जलूल बहानों का सहारा लेकर लगभग हर सरकार ने कारपोरेट घरानों और बिल्डरों को थाली में सजाकर जमीनों का तोहफा देने में कोई कोर कसर नहीं छोड़ी। पिछले दो दशक में रियल एस्टेट कारपोरेट के लिए मुनाफे का सौदा साबित हुआ है, कुकरमुत्ते की तरह देषभर में उग आयी रियल एस्टेट कंपनियों  और बिल्डरों ने खेती योग्य हजारों एकड़ जमीन को कंक्रीट के जंगल में तब्दील कर डाला।

शेयर मार्केट से पिटे ओर घाटा खाए निवेशकों को जमीन में निवेश सुरक्षित और मुनाफे का सौदा लगने लगा है। परिणामस्वरूप देशभर में जमीन के रेट में जर्बदस्त उछाल तो आया ही है वहीं लगभग हर षहर के चारों ओर खेती की जमीन को खरीदने का जनून और पागलपन चरम पर है। सरकारी मशीनरी को घूस और कमीशन खाने से ही फुर्सत नहीं है। सरकार द्वारा जमीन अधिग्रहण को अगर जमीन हड़पना कहा जाए तो कोई बुराई नहीं होगी। ग्रेटर नोएडा में सरकार ने हजारों एकड़ जमीन का अधिग्रहण जिस उद्देश्य से किया था, उसे बिल्डरों के हाथों मंहगे दामों में बेचने और कमीशन की काली कमाई खाने के अलावा सरकार ने विकास के नाम पर कुछ खास नहीं किया।

देश की तेजी से बढ़ती आबादी और उसकी जरूरतों को पूरा करने के लिए अधिक से अधिक मकान और अनाज की जरूरत से इंकार नहीं किया जा सकता है। हरित क्रांतियों ने देश को अन्न के मामले में आत्मनिर्भरता बनाया है लेकिन पिछले दो दशकों से किसानों का रूझान व्यवासायिक खेती की ओर होने से पारंपरिक खेती को बहुत नुकासान पहुंचा  है। बहुराष्ट्रीय कंपनियों की दखलअंदाजी और सरकार की खेती विरोधी नीतियों और नीयत के कारण किसान आत्महत्याएं करने को विवष हुये हैं। असल में खेती किसानी का असली मुनाफा बिचौलिये और बड़ी कंपनियों द्वारा खा जाने के कारण खेती आज घाटे का सौदा साबित हो रही है। परिणामस्वरूप किसान खेती-किसानी से विमुख हो रहे हैं।

भूमि अधिग्रहण के वर्तमन अपंग कानून के कारण सबसे अधिक अधिग्रहण खेती योग्य भूमि का ही हुआ है। जिस जमीन पर कभी हरे भरे-पूरे खेत और फसले लहलहाती थी आज वहीं मल्टीस्टोरी बिल्डिंग खड़ी हैं। देश में खेती योग्य भूमि का क्षेत्रफल काफी तेजी से कम हो रहा है और दूसरी और दुगनी तेजी से कांक्रीट का जंगल फैल रहा है। देश की राजधानी दिल्ली में बेतहाशा बढ़ती आबादी को बसाने के लिए सबसे अधिक खेती योग्य जमीन का अधिग्रहण पिछले दो दशकों में हुआ है।

राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र अर्थात एनसीआर की सीमा से सटे यूपी, हरियाणा के कई जिले एनसीआर का हिस्सा बन चुके हैं। बढ़ती आबादी को आशियाने और तमाम अन्य उत्तम सुविधाएं उपलब्ध कराने के लिए ही खेती वाली जमीन का अधिग्रहण धडल्ले से किया गया। असल में लाखों करोड़ों कमाने वाली जमात दिल्ली की भागदौड़ और भागमभाग भरी जिंदगी से उबकर दिल्ली के आस-पास के इलाकों में रिहाइश  के ठिकाने   में लगी। नोटों से भरी जेब,ऊंचे सपनो और पावर से लबरेज ब्लैकबेरी जमात ने जब भी दिल्ली से थोड़ा बाहर देखा किसी गरीब किसान को अपनी जमीन से हाथ धोना पड़ा, शाहबेरी और तमाम दूसरे गांव इस जमात के ठिकाने बनने लगे और बेचारे किसान अपने हक के लिए लाठी और गोली खाते रहे।

उदारवाद ने देश में एक नयी जमात को जन्म दिया है। इस नव धनाढय जमात की महत्वकांक्षाओं और इच्छाओं की पूर्ति के वास्ते हर शहर में खेती योग्य जमीन की बलि दी जा रही है। संपूर्ण एनसीआर क्षेत्र में उद्योगपति, मल्टीनेशनल कंपनियों के एक्जिक्यूटिव और आफिस, तथाकथित नेता और बड़े ओहदे पर आसीन और सेवानिवृत्त महानुभावों का आधिपात्य और साम्राज्य है। भोले-भाले और अनपढ़ किसानों को मुआवजे और नेतागिरी के फेर में  उलझाकर चालाक और भ्रष्ट नेता खेती वाली जमीन को मोटी कमीशन के खातिर हड़प रहे हैं।

Jul 22, 2011

सर्वत्र अपराध की सर्वजन सरकार


उत्तर प्रदेश को अपराध, भ्रष्टाचार और माफियाराज के आधार पर बांटें तो मोटे तौर पर प्रदेश के तीन हिस्से होते हैं,जिसके मुख्य खिलाड़ी इस वक्त शराब माफिया पोंटी चड्ढा हैं। पोंटी चड्ढा वह शख्सियत हैं जो सीधे मायावती तक पहुंच रखते हैं और शराब की हर बोतल पर बीस रूपया अधिक वसूलते हैं और प्यार से दुकानदार इस वसूली को मायावती टैक्स नाम देते हैं...

अजय प्रकाश 

अलीगढ़ में आयोजित किसान महापंचायत से एक दिन पहले कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने उत्तर प्रदेश  के बारे में कहा कि राज्य को दलाल चला रहे हैं। उनके इस तल्ख बयान पर लाजिमी प्रतिक्रिया राज्य की सत्ताधारी पार्टी बसपा की ओर से हुई और बाकी राजनीतिक दायरे में सन्नाटा रहा। सन्नाटा कुछ यूं रहा मानो इस स्थापित सच का विकल्प जनता को किसी राजनीतिक दल में नहीं दिखता हो और सियासी जरूरतों के लिए पार्टियां दोहराव भर करती हों।

विपक्षी  पार्टियों के बेअसर दोहराव की ही वजह से प्रदेश  में लगातार आपराधिक वारदातें हो रहीं हैं, सत्ताधारी पार्टी के मंत्री से लेकर विधायक तक आकंठ भ्रष्टाचार  में डुबे हैं और मुख्य विपक्षी पार्टी सपा बलात्कार प्रदेश का तमगा थमा कर जनता में अपने जिम्मेदारी की इतीश्री कर ले रही है। वहीं कांग्रेसी नेता मीडिया में बयानों से अधिक अपने कार्यभार ही नहीं मान रहे हैं। और बची भाजपा तो वह अभी अपने नेता उमा भारती को महान बनाने में जुटी है।
नसीमुद्दीन और बाबू सिंह : कौन किससे बड़ा माफिया 
अगर बीते जून महीने की बात की जाये तो प्रदेश में करीब दर्जन भर मामले महिलाओं के खिलाफ जघन्य अपराधों के सामने आ चुके हैं,जिनमें सर्वाधिक मामले दलित और पिछड़ी जातियों के परिवारों से हैं। लखनउ में डिप्टी सीएमओ की जेल में संदिग्ध हत्या में प्रदेश सरकार के दो मंत्रियों अनंत मिश्र और बाबूसिंह कुषवाहा पर गहरी साजिश की बात सामने आयी है तो मुख्यमंत्री के चहेते और सर्वाधिक मंत्रालय संभालने वाले नसीमुद्दीन सिद्दकी के संरक्षण में बुंदेलखंड  की खानों और बालू ठेकों से करायी जा रही अवैध वसूली किसी से छीपी नहीं है। इन खानों में बड़ी हिस्सेदारी बाबूसिंह कुशवाहा की भी है। तथ्यगत तौर पर यह बात साबित न हो जाये इसके लिए ठेके-पट्टों का जिम्मा इनके रिश्तेदारों और चहेतों के पास सुरक्षित है।

हालत यह है कि अवैध कमाई के लिए सरकार ने परिवार कल्याण मंत्रालय को तोड़कर दो मंत्रालय बनाये और उसमें से कमाई वाले मंत्रालय का जिम्मा बाबूसिंह कुशवाहा को सौंपा,जो अब दो सीएमओ बीपी सिंह व बीपी आर्य और एक डिप्टी सीएमओ की हत्या के बाद उनसे छिन चुका है। लखनउ के पुलिस विभाग में तैनात विजिलेंस के एक अधिकारी नाम न छापने की शर्त पर कहते हैं,‘जिस सरकार में भ्रष्टाचार  को बनाये रखने के लिए मंत्रालय बनाये जाते हों,उस सरकार के पुलिस अधिकारियों की क्या औकात जो सरकार में शामिल अपराधियों का गिरेबान धर दबोचें।’जानकार बताते हैं कि नसीमुद्दीन सिद्दीकी ने अपनी काली करतूतों को छुपाने के लिए बांदा से यूपी टाइम्स जदीद नाम के दैनिक अखबार का प्रकाशन शुरू कर दिया है तो उनके साले मुमताज अली बुंदेलखंड  उजाला निकाल रहे हैं। इतना ही नहीं चर्चा तो यह भी है कि हाल ही में लखनउ से शुरू हुए एक हिंदी दैनिक अखबार पर बरदहस्त सीधे मुख्यमंत्री का है।

गौरतलब है कि बांदा क्षेत्र में सरकारी निर्माण ठेकों पर कब्जा नसीमुद्दीन के साले की कंपनी मुमताज एंड कंस्ट्रक्सन  कंपनी का है,जो एक ही सड़क को साल में तीन बार उखाड़ती-बीछाती है। इसके अलावा मुमताज बुंदेलखंड  हथकरघा उद्योग नाम का एनजीओ भी चलाते हैं। बुंदेलखंड में एक प्रमुख हिंदी दैनिक के पत्रकार बताते हैं कि बालू और पत्थर ले जाने वाले ट्राली-ट्रक से हर बैरियर पर 2हजार रूपये वसूले जाते हैं,जिसे लोग बाबूसिंह टैक्स कहते हैं। कहा जाता है कि शीलू  बलात्कार कांड में नरैनी के विधायक पुरूशोत्तम नरेश द्विवेदी भी खनन के झगड़े में ही नपे। गौरतलब है कि पुरुषोत्तम   भी खनन में दखल रखते हैं और उन्होंने बाबूसिंह को पटखनी देने के लिए अपने किसी चहेते के जरिये उच्च न्यायालय में एक जनहित याचिका दायर करवा दी थी।

उत्तर प्रदेश को अपराध, भ्रष्टाचार और माफियाराज के आधार पर बांटें तो मोटे तौर पर प्रदेश के तीन हिस्से होते हैं,जिसके मुख्य खिलाड़ी इस वक्त शराब माफिया पोंटी चड्ढा हैं। पोंटी चड्ढा वह शख्सियत हैं जो सीधे मायावती तक पहुंच रखते हैं और शराब की हर बोतल पर बीस रूपया अधिक वसूलते हैं और प्यार से दुकानदार इस वसूली को मायावती टैक्स नाम देते हैं। लूट के क्षेत्र का पहला संगठित हिस्सा बुंदेलखंड है, जहां बाबूसिंह कुशवाहा, नसीमुद्दीन का बालू और खनन पर राज है,दूसरा हिस्सा सोनभद्र और मिर्जापुर का है,जहां बनारस जेल में बंद माफिया बृजेष सिंह का दबदबा है और तीसरा हिस्सा पूर्वांचल का है जहां हरिशंकर  तिवारी के समानांतर गोरख जायसवाल और रामप्रकाश जायसवाल की भागीदारी है। इसके बाद छुटभैये माफिया हर क्षेत्र में हैं जिनकी गिनती नहीं है।

गोरख, रामप्रकाश के पिता हैं और वे देवरिया से बसपा सांसद हैं, जबकि रामप्रकाश सत्ताधारी पार्टी के बरहज से विधायक हैं। लखनउ जेल में मृत पाये गये डिप्टी सीएमओ सचान के परिजनों ने रामप्रकाश जायसवाल पर भी हत्याकांड में संदेह जाहिर किया है। संदेह इस आधार पर जाहिर किया है कि परिवार कल्याण मंत्रालय के सामानों की आपूर्ति रामप्रकाश की कंपनी ही करती थी और इन तीहरी हत्याओं का कारण कमीषनखोरी को लेकर उपजा विवाद है। गोरखपुर के प्रमुख पत्रकार मनोज सिंह कहते हैं,‘माफियाओं ने बसपा का नीजिकरण कर दिया है और नौकरशाही इनका चम्मच बनने को बेताब है।’

अब अपराधों पर अंकुश लगाने वाले पुलिसकर्मियों की बात करें तो हाल ही में थानों में बलात्कार के जो मामले सामने आये हैं, उससे साफ है कि सब धान बाइस पसेरी हो गया है। ऐसा इसलिए है कि जो पुलिस और प्रशासनिक अधिकारी साफ सुथरी छवि वाले थे,उन्हें मुख्यमंत्री ने पहले ही किनारे कर दिया है, जहां वे फाइलों से धूल उड़ा रहे हैं। मायावती के आय से अधिक संपत्ति मामले की जांच में सीबीआई टीम के हिस्सा रहे डीएसपी धीरेंद्र राय को तो मायावती ने आते ही बर्खास्त कर दिया था। ईमानदारी के लिए ख्यात धीरेंद्र राय को बर्खास्त करने की संस्तुति सीधे मायावती ने अपने कलम से की थी,जो किसी निचले अधिकारी के मामले में अपवाद है। वैसे में यह सर्वजन सरकार सर्वत्र भ्रष्टाचार   के सिवा गरीबी, भुखमरी, अपराध और माफियाराज पर अंकुश लगाने में कैसे सक्षम हो सकती है।


अनिल सिन्हा स्मृति कार्यक्रम

अनिल सिन्हा मेमोरियल फाउंडेशन आपको अपने पहले कार्यक्रम के लिए सादर आमंत्रित करता है
कार्यक्रम
  • वीरेन डंगवाल द्वारा अनिल सिन्हा के ताजा कहानी संग्रह  ‘एक पीली दोपहर का किस्सा’  का लोकार्पण
  • आलोक धन्वा, मंगलेश डबराल और  आनंद स्वरूप वर्मा द्वारा अनिल सिन्हा की याद 
  •  इरफान द्वारा अनिल सिन्हा की एक कहानी का पाठ    
  • चित्त प्रसाद की कला और  इतिहास दृष्टि पर अशोक भौमिक की खास पेशकश
कार्यक्रम की अध्यक्षता मैनेजर पाण्डेय करेंगे
इस शाम के आयोजन  में शरीक होकर फाउंडेशन को मजबूत बनाएँ
समय:  शाम 5 बजे शनिवार 23 जुलाई , 2011जगह:   कौस्तुभ सभागार, ललित कला अकादमी, रवीन्द्र भवन, कोपरनिकस मार्ग, मंडी हाउस ,  नई दिल्ली - 110001

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अनिल सिन्हा(11 जनवरी 1942 - 25 फरवरी 2011)

अनिल सिन्हा, एक दोस्ताना शख्सियत, जिसे हम सब अच्छी  तरह जानते थे फिर भी जिस के कुछ पहलू हम से छूट जाया करते थे। जनवादी  पत्रकार,  प्रतिबद्ध  साहित्यिक-सांस्कृतिक-राजनीतिक कार्यकर्ता। दृष्टिनिर्माता कला-आलोचक। संवेदनशील कथाकार । हर  एक मोर्चे पर  उत्पीडि़त अवाम की तरफदारी में तैनात। जमीन की जंग में, दलित-दमित वर्गों, समुदायों और राष्ट्रीयताओं के संघर्ष में, उर्दू-हिंदी इलाके के क्रांतिकारी वाम- आन्दोलन के समर्पित सिपाही के बतौर. मंच की तीखी रौशनी से बच कर, जमीनी कार्यकर्ता की अपनी चुनी हुयी  भूमिका से  नायकत्व की अवधारणा को पुनर्परिभाषित करते हुए।
  अनिल सिन्हा ने पत्रकारिता की शुरुआत दिनमान से की फिर वे अमृत प्रभात, नवभारत टाइम्स, राष्ट्रीय सहारा और दैनिक जागरण से भी जुड़े। वे हिंदी अखबारों की बदलती कार्यशैली से तालमेल न बिठा सके और अपने सरोकारों के लिए उन्होंने फ्रीलांस पत्रकारिता, शोध कार्य और स्वतंत्र लेखन का रास्ता चुना। अनिल सिन्हा जन संस्कृति मंच के संस्थापक सदस्य थे और आजीवन वाम राजनीति में संस्कृति कर्म की सही भूमिका तलाशते रहे।

अनिल सिन्हा मेमोरियल फाउंडेशन

     अनिल सिन्हा मेमोरियल फाउंडेशन का मकसद है अनिल सिन्हा की विरासत को आगे बढ़ाना। उन जीवन-मूल्यों और सिद्धांतों के लिए काम करना, जिन के लिए उन्होंने अपनी जिन्दगी की लड़ाई लड़ी। खास तौर पर-
  
 - लेखकों, कलाकारों, पत्रकारों, कार्यकर्ताओं और अन्य समानधर्माओं के लिए संवाद और सहयोग की एक ऐसी जगह निकालने की कोशिश, जहां वाम-जनवादी विचारों को पनपने का अवसर मिले।
   
- संभावनाशील लेखकों, कलाकारों, पत्रकारों, कार्यकर्ताओं की दुखती हुई पीठ थपथपाने की कोशिश, एक सालाना सम्मान की शक्ल में।
   
- अनिल सिन्हा के जहां-तहां बिखरे हुए कामकाज को इकट्ठा करना, संग्रहित करना, प्रकाशित करना और निकट भविष्य में एक लाइब्रेरी की स्थापना करना।



राहुल की ‘नौटंकी’ माया को भारी न पड़ जाए

राहुल की पदयात्रा,किसान महापंचायत  और समय-समय पर दलितों के घर जाने, खाना खाने और रात बिताने को मायावती ‘नौटंकी’बताती हैं, जबकि अंदरूनी बात यह है कि माया इस समय राहुल फैक्टर से परेशान हैं...

आशीष वशिष्ठ

ये तो लगभग तय हो ही चुका है कि यूपी में विधानसभा चुनाव समय से पूर्व होंगे। राजनीतिक गलियारों और आफिसों में गहमागहमी और चहल-पहल का माहौल बनने लगा है। सभी दलों ने अपने सिपाहसिलारों और सिपाहियों को चुनावी रण की तैयारी के अंतरिम आर्डर जारी कर दिये हैं। जहां बाकी दल चुनाव की तैयारियों में दिन रात एक कर रहे हैं वहीं सूबे की सीएम मायावती अपनी सरकार के दामन लगे दागों को छुड़ाने और डैमेज कंट्रोल की कार्यवाही में लगी हैं।

डा0सचान हत्याकांड की जांच सीबीआई को सौंपकर सरकार पहले ही बैकफुट पर थी,अब राष्ट्रीय ग्रामीण स्वास्थ्य मिशन घोटाले की जांच कैग से कराने की सिफारिश कर एक बार फिर सरकार कटघरे में खड़ी दिखाई दे रही है। दिनों-दिन बिगड़ती कानून व्यवस्था,सिर उठाते किसान आंदोलन, जमीन अधिग्रहण से जुड़े मामलों पर कोर्ट की सख्ती और जमीन वापिसी के आदेश,भ्रष्टाचार और घोटालों में डूबी, दागी मंत्रियों और विधायकों का बोझ ढोती माया सरकार को निर्धारित समय से पूर्व चुनाव करवाने में ही जीत और दुबारा सरकार बनाने की उम्मीद दिखाई दे रही है। लेकिन जिस तरह कांग्रेस के युवराज लगभग हर मोर्च पर माया सरकार को खुली चुनौती दे रहे हैं उससे ये उम्मीद लगाई जा रही है कि कही राहुल की ‘नौटंकी’मायावती पर भारी न पड़ जाए।

गौरतलब है कि बसपा ने राहुल की पदयात्रा, किसान महापंचायत,और समय-समय पर दलितों के घर जाने, खाना खाने और रात बिताने को ‘नौटंकी’ बताती है। जबकि अंदरूनी बात यह है कि माया इस समय सूबे में दिनों-दिन बढ़ते और लोकप्रिया होते राहुल फैक्टर से परेशन और डरी हुई है। राहुल मिशन 2012 की कड़ी में इन दिनों पूर्वी यूपी के दौरे पर हैं। सिर से पैर तक भ्रष्टाचार में सनी हुई माया सरकार पर राहुल रूक-रूककर घातक और कठोर प्रहार कर रहे हैं उससे सरकार की बड़ी फजीहत हो रही है।

राष्ट्रीय ग्रामीण स्वास्थ्य मिशन में घोटाले के मुद्दों को राहुल ने ही उठाया था और आरटीआई के तहत सरकार से जानकारी मांगी थी। खुद के दामन पर कीचड़ उछलते देख माया ने एनआरएचएम की जांच और आडिट कैग से करवाने का आदेश आनन-फानन जारी कर दिया। असल में माया और लगभग सभी दूसरों दलों ने राहुल को कभी सीरियस तरीके से लिया ही नही। राहुल को बच्चा, मुन्ना और चाकलेट बेबी कहकर सभी उन्हें पालिटिक्स का ट्रैनी समझते रहे। लेकिन मिशन 2012की सफलता के लिए माया सरकार को हर मौके पर घेरने और सरकार को कटघरे में खड़ा करने से चूके नहीं।

भट्ठा पारसौल की घटना ने राहुल के हाथ में एक बड़ा मुद्दा थमा दिया। पुलिस चैकसी और पहरे को धता बताकर जिस तरह राहुल भट्ठा पारसौल किसानों के बीच जा पहुंचे  उसने पूरे देश को चैंका दिया। पदयात्रा और अलीगढ़ के नुमाइश मैदान में किसान महापंचायत कर राहुल ने बसपा, रालोद के साथ लगभग सभी विपक्षी दलों को हिला दिया। 2009 के आम चुनावों में राहुल फैक्टर ने ही कांगे्रस को 21 सीटे दिलाई थी बताते चले कि 2004 के चुनावों में कांग्रेस ने 4 सीटें जीती थीं। वहीं राहुल के मिशन 2012की टीम जिसमें दिग्विजय सिंह,रीता बहुगुणा जोशी,प्रमोद तिवारी, जगदंबिका पाल, बेनी प्रसाद वर्मा,जतिन प्रसाद,आरपीएन सिंह,पीएल पुनिया और श्रीप्रकाश जायसवाल शमिल हैं,माया सरकार को सत्ता से बेदखल करने में दिन रात एक किये हुए हैं। हो सकता है कल तक सियासी गलियारों में राहुल यूपी में बिग फैक्टर न रहे हो लेकिन आज राहुल फैक्टर माया और अन्य दलों की टेंशन की वजह है।

किसी जमाने में ब्राहाण, दलित और मुस्लिम कांगे्रस का वोट बैंक समझा जाता था, लेकिन प्रदेश में सपा,बसपा और अन्य दलों के उभरने से कांग्रेस का परंपरागत वोट बैंक उसकी बपौती न रहा। ब्राहाण, दलित और मुस्लिम वोट बैंक को टारगेट करके राहुल मिश 2012 को सफल बनाने में जुटे हैं और माया राहुल के हर कदम और चाल को नौटंकी करार देकर अपना भय,चिंता और घबराहट छुपाने का असफल प्रयास कर रही है।आम चुनावों में कांग्रेस को बढ़त दिलाकर राहुल ने जहां वाहवाही बटोरी तो वहीं बिहार विधानसभा चुनावों में उनका कोई असर दिखाई नहीं दिया।

समूचे विपक्ष और खासकर बसपा खुद को फ्रंटफुट रखने की चाहे जितनी कोशिश  करे लेकिन सच्चाई से मुंह नहीं फेरा जा सकता है। विपक्ष के हमलों,बयानबाजी और आलोचना से बेपरवाह राहुल मिशन 2012की पगडंडी पर सधे कदमों से चले जा रहे हैं। माया को यह भूलना नहीं चाहिए कि पिछले विधानसभा चुनावों में उनकी पार्टी को भी  पूर्ण बहुमत मिलना किसी चमत्कार से कम नहीं था। आज माया सरकार के खिलाफ जो माहौल बन रहा है,उसमें राहुल की नौटंकी माया पर भारी भी पड़ सकती है।


स्वतंत्र पत्रकार और राजनीतिक- सामाजिक मसलों के टिप्पणीकार.