Jun 9, 2011

हुसैन को श्रद्धांजलि


लखनऊ, 10 जून। हमें यह दुखद खबर मिली है कि प्रसिद्ध चित्रकार मकबूल फिदा हुसैन नहीं रहे। लन्दन में कल सुबह उनका निधन हुआ। हुसैन हमारे पिकासो थे, कला के लिए पूरी तरह समर्पित। उनके चित्रों को लेकर साम्प्रदायिक ताकतों ने उन्हें निशाना बनाया, सैकड़ों की संख्या में उनके ऊपर मुकदमें दायर किये और हमारे इस कलाकार को मजबूर कर दिया कि वे देश छोड़कर चला जाय।

उन्होंने कतर की नागरिकता ली। लेकिन कतर की नागरिकता लेने के बावजूद वे कहते रहे कि भले मैं हिन्दुस्तान के लिए प्रवासी हो गया हूँ लेकिन मेरी यही पहचान रहेगी कि मैं हिन्दुस्तान का पेन्टर हूँ, यहाँ जन्मा कलाकार हूँ। अर्थात हुसैन के कलाकार की जड़े यहीं है और अपने जड़ो से कटने का जो दर्द होता है, वह हुसैन के अन्दर काफी गहरे था। कलाकार स्वतंत्रता चाहता है। वह प्रतिबन्धों, असुरक्षा में नहीं जीना चाहता है। पर व्यवस्था ऐसी है जो कलाकार को न्यूनतम सुरक्षा की गारण्टी नहीं दे सकती।

फिदा हुसैन नहीं रहे, पर इस व्यवस्था पर सवाल छोड़ गये। हम शायद अपने को माफ न कर पायें। जब भी कलाकार की स्वतंत्रता की बात होगी, हुसैन की बात होगी - यह चीज कहीं न कही हमें टिसती रहेगी। अपने इस कलाकार के जाने का हमें गम है। जन संस्कृति मंच की ओर से अपने इस अजीज कलाकार को इस संकल्प के साथ याद करते हैं और अपनी श्रद्धांजलि अर्पित करते हैं कि फिर कोई हुसैन न बने।

बालकृष्ण योगी का झूठ और नेपाल से उजागर होता सच

जनज्वार  विशेष
बालकृष्ण मामले में अबतक का सबसे बड़ा खुलासा
करीब चार साल पहले 2007 में बालकृष्ण योगी के भारतीय नागरिकता मामले में पासपोर्ट को लेकर खुफिया रिपोर्टों के आधार पर विवाद हुआ था और संदेह उठा था कि उन्होंने तकनीकी नियमों का उल्लंघन किया है। उस समय इस रिपोर्ट के लेखक नेपाल में माओवादियों की सत्ता में हुई भागीदारी के बाद की स्थितियों का जायजा लेने के लिए रिपोर्टिंग पर गये हुए थे। उसी दौरान उन्हें बालकृष्ण मामले में खोज करने का भी मौका मिला था। इस मामले के सभी पहलुओं को टटोलती जनज्वार की विशेष  रिपोर्ट... मॉडरेटर


अजय प्रकाश 

बाबा रामदेव के दाहिने हाथ और पातंजलि योगपीठ के मुख्य कर्ताधर्ता बालकृष्ण योगी की नागरिकता को लेकर 5 मई से शुरू  हुआ तमाशा  अभी थमा नहीं है। कांग्रेस के महासचिव दिग्विजय सिंह ने बालकृष्ण को नेपाल का गुण्डा और नेपाल के कई मामलों में अपराधी बताया है। वहीं बालकृष्ण को लेकर उत्तराखण्ड खुफिया पुलिस की स्थानीय ईकाई की ओर से जारी रिपोर्ट में उन्हें नेपाली नागरिक के तौर पर चिन्हित किया गया है और उनके पासपोर्ट को संदेहास्पद। पासपोर्ट के अनुसार बालकृष्ण पुत्र रामकृष्ण , गांव-टिटोरा, थाना-कथौली का पता ही उनके पासपोर्ट के संदेहास्पद होने का आधार है। इसी खुफिया रिपोर्ट के आधार पर कुछ भारतीय चैनल और अखबार दावा कर रहे हैं कि उनके पास बालकृष्ण की असलियत है।

 बालकृष्ण के छोटे भाई और मौसी का लड़का, पहले गेट   फिर घर में                       सभी फोटो - अजय प्रकाश


मीडिया के पास बालकृष्ण  की क्या असलियत है, वह उजागर होता उससे पहले ही बालकृष्ण  ने प्रेस कांफ्रेंस आयोजित कर रोने-धोने के माहौल के साथ जो इमोशनल अत्याचार किया है, जाहिर है उसके पीछे सिर्फ भय है। भय बालकृष्ण  को नेपाली गुण्डा होने का नहीं है, कई मामलों में अपराधी होने का भी नहीं है, बल्कि उनका भय नेपाल के स्यान्जा  जिले के वालिंग कस्बे के उस स्कूल से है, जहां उन्होंने चौथी कक्षा तक पढ़ाई की थी। इसी वजह से यह सवाल महत्वपूर्ण हो जाता है कि क्या भारत का नागरिक बनने के लिए जो तकनीकी खानापूर्ति करनी होती है, उसे बालकृष्ण ने पूरा किया है या नहीं। अगर ऐसा नहीं किया गया है तो बालकृष्ण की मुश्किलें बढ़ सकती हैं।

बालकृष्ण ने मीडिया के सामने आकर कहा कि उनकी पैदाइश  और पढ़ाई भारत में ही हुई है और वे भारत के नागरिक हैं। यह बालकृष्ण का आधा सच है, क्योंकि बालकृष्ण के भारत में पैदा होने की बात तो उनको जानने वाले कहते हैं, मगर पढ़ाई का प्रमाण तो उस रजिस्टर में दर्ज है जो नेपाल के स्यांजा जिले के वालिंग कस्बे के एक प्राथमिक स्कूल में पड़ता है। बालकृष्ण जिस कस्बे के रहने वाले हैं, वहां के लोगों का कहना है कि उनके मां-बाप जब भारतीय तीर्थस्थलों के दर्शन  करने गये थे, उसी समय बालकृष्ण का जन्म भारत में हुआ था।

इस मामले से जुड़ी पहली तथ्यजनक खबर सिर्फ जनज्वार के पास है, लेकिन जनपक्षधरता की अपनी परंपरा को जारी रखते हुए हमें यह वाजिब नहीं लगा कि कालेधन और भ्रष्टाचार के खिलाफ बन रहे एक राष्ट्रव्यापी माहौल के बीच सस्ती लोकप्रियता और सनसनी फैलाने के लिए संघर्ष  में लगे लोगों की खुर्दबीन की जाये। क्योंकि अगर यही खोजी रिपोर्टिंग है तो पहली खोजी खबर अपने उन माफिया मालिकों के खिलाफ लिखनी होगी, जिनके दिये पैसों से हम मीडिया में मुनाफे का बाजार खड़ा करते हैं।

वैसे में सवाल अब यह उठता है कि जनज्वार ने बालकृष्ण  मामले में अपनी खोजी रिपोर्ट को अब जारी करने की जरूरत क्यों समझी। तो जवाब है, ‘सिर्फ इसलिए कि बालकृष्ण को लेकर जो धुंध और धंधा फैलाने की कोशिश हो रही है, उसके सच को सामने लाया जाये, जिससे बालकृष्ण सच का सामना करने को मजबूर हों न कि गुण्डा और अपराधी होने के फर्जी आरोपों की सांसत झेलने में उलझें।


बालकृष्ण के चाचा के लड़के और स्कूल  
भारत की सोनौली सीमा से नेपाल के बुटवल के रास्ते काठमांडू की ओर बढ़ने पर पोखरा जिले से पहले स्यांजा पड़ता है। बालकृष्ण योगी का घर स्यांजा जिले के भरूआ गांव में है और वह स्कूल गांव के ऊपर,जिसके रजिस्टर में बालकृष्ण के चौथी तक पढ़ने का साक्ष्य दर्ज है।

इस सिलसिले में हमारी पहली मुलाकात बालकृष्ण   के चाचा के लड़कों से होती है जो अपने नामों के पीछे सुवेदी लगाते हैं। वालिंग कस्बे में दुकान चला रहे बालकृष्ण  के चाचा के लड़कों से पता चलता है कि भरूआ गांव ब्राह्मणों का है और वहां सुवेदी ब्राह्मणों की तादाद ज्यादा है। उनमें से एक जो फोटो में सबसे किनारे है, वह बालकृष्ण   के साथ ही पढ़ा होता है, लेकिन जब मैं उससे दुबारा उसका नाम पूछता हूं तो उसको मुझ पर संदेह होता है और वह हंसते हुए नाम बताने से इंकार कर देता है।

मैं हाथ में डायरी नहीं निकालता, क्योंकि अपना परिचय उनको मैंने बालकृष्ण के दोस्त के रूप में दिया होता है और रिकॉर्डर तो बिल्कुल भी नहीं। मुझे ऐसा इसलिए करना पड़ता है कि जिनके जरिये यहां मैं पहुंचा हुआ होता हूं उन्होंने हिदायत दे रखी थी कि ऐसी कोई गलती मत करना जिससे तुम गांव न जा सको, जहां वह स्कूल है। तस्वीर में दिख रहे दो लोग जिनकी उम्र ज्यादा है, वह बताते हैं कि जब बालकृष्ण चौथी कक्षा के बाद भारत चले गये थे तो भी वह बाबा रामदेव के साथ आया करते और जंगलों में जड़ी-बूटियां ढूंढ़ा करते थे। उनसे ही पता चला कि पिछले दस-बारह वर्षों से बालकृष्ण यहां नहीं दिखे, हां उनकी कमाई से वालिंग में बनवाई गयी आलीशान कोठी जरूर दिखती है, जो इसी साल तैयार हुई है.

बालकृष्ण के चाचा के उन दुकानदार लड़कों से मैं कहता हूं कि उस कोठी तक हमें ले चलो, शायद आप लोगों की वजह से हमसे उनके परिवार के लोग बात कर लेंगे, लेकिन वह नहीं जाते हैं। पते के तौर पर वे बस इतना कहते हैं कि जो कोठी दूर से दिखे और कस्बे में सबसे सुंदर हो उसी में घुस जाना।

कोठी का गेट खटखटाने पर हमारी आवभगत के लिए दो बच्चे आते हैं। उन दोनों से मैं हाथ मिलाता हूं और गेट के अंदर दाखिल होता हूं। उनमें से एक फर्राटेदार हिंदी बोलता है और बताता है कि वह बालकृष्ण का सबसे छोटा भाई नारायण सुवेदी है। फिर साथ के लड़के के बारे में पता चला है कि वह मौसी का लड़का है। अब हम उनके डायनिंग रूम में होते हैं जहां बड़े स्क्रीन की टीवी लगी होती है। हमें लड्डू खाने को दिया जाता है। उस समय मैं बच्चों को अपना परिचय बालकृष्ण के दोस्त के रूप में देता हूं और बताता हूं कि मैं तुम्हारे गांव चलना चाहता हूं। गांव जाने की बात सुन नारायण खुश होता है और आत्मीयता से कहता है ‘गांव यहां से चार किलोमीटर दूर है और पैदल ही पहाड़ियों पर चलना होता है, इसलिए इस समय चलना खतरनाक होगा, कल सुबह यहां से निकल लेंगे।’
बालकृष्ण का स्कूल और भरुआ में उनका घर

तभी अधेड़ उम्र की एक महिला दिखती है। उसको नमस्कार करने के बाद नारायण बताता है कि वह उसकी मौसी है और मां गांव में है। वह महिला थोड़ी देर तक मुझे देखती है और फिर करीब घंटे भर बाद किसी पवन सुवेदी को लेकर आती है, जो खुद को बालकृष्ण की मौसी का बेटा बताता है। वह मुझसे कुछ रुष्ट  दिखता है वह इशारे से बच्चों को अपने पास बुलाता है, जिसके बाद बच्चे वहां नहीं दिखते। थोड़ी देर बाद पवन सुवेदी एक नयी कहानी बताता है कि बालकृष्ण के माता-पिता तीर्थ करने काठमांडू गये हैं और पंद्रह दिनों बाद आयेंगे। मैं फिर भी गांव जाने की बात कहता हूं तो वह शुरू में तो इंकार करता है, फिर कहता है ‘ठीक है सुबह देखेंगे।’ लेकिन वह साफ कह देता है कि इस घर में आप रात नहीं गुजार सकते।

तब तक करीब रात के आठ बज चुके होते हैं और मैं कहीं दूसरी जगह जा पाने में खुद को असमर्थ बताता हूं तो वह मुझे कस्बे के एक होटल में ले जाता है, जहां मैं दो सौ नेपाली रुपये में एक कमरे के बीच तीन लोगों के साथ सोता हूं। होटल कैसा था इसका अंदाजा इससे लगाया जा सकता है कि मैंने सुबह उसके शौचालय  में जाने के मुकाबले खेत में जाना पसंद किया था।

अब मेरी अगली चिंता एक ऐसे आदमी की तलाश  की होती है जो मुझे भरूआ गांव ले जाये,  क्योंकि सुबह बालकृष्ण की आलीशान कोठी में बड़ा ताला जड़ा होता है। बहरहाल, मुझे एक कुरियर मिल जाता है जो मुझे गाँव तक ले जाता है। कुरियर कहता है पहले गांव चलते हैं और लौटते हुए स्कूल। मेरे दिमाग में आता है कि अगर गांव में बात बिगड़ गयी तो स्कूल से मिलने वाली जानकारी से हम लोग चूक जायेंगे।

हम पहले स्कूल के मास्टर से मिलते हैं जो हमें बताता है कि वह नया आया है। वह आगे बताता है कि बालकृष्ण ने बचपन में यहीं पढ़ाई की है। उसके बाद हम मास्टर की मदद से रजिस्टर खोजने में लग जाते हैं। कई वर्षों का रजिस्टर खंगालने के बाद हमें पता चलता है कि बालकृष्ण नाम का कोई छात्र ही नहीं है। हम बालकृष्ण के पिता जयबल्लभ सुवेदी के नाम से खोजते हैं तो एक नाम डंभर प्रसाद  सुवेदी का मिलता है, जिसमें पिता के तौर पर जयबल्लभ सुवेदी नाम दर्ज होता है। बालकृष्ण का असल नाम डंभरदास सुवेदी है, यह इसलिए भी पक्का हो जाता है क्योंकि बालकृष्ण के चाचा के लड़कों ने भी बालकृष्ण का यही नाम बताया होता है। दूसरा प्रमाण यह भी रहा कि बालकृष्ण का चौथी कक्षा के बाद नाम रजिस्टर से कट जाता है, जो अगली कक्षाओं के उपस्थिति रजिस्टरों में नहीं दिखता है। जबकि जयबल्लभ सुवेदी के दूसरे बेटों का नाम रजिस्टर में है.   

जब यह साफ हो जाता है कि बालकृष्ण सुवेदी उर्फ डंभर प्रसाद  सुवेदी ही जयबल्लभ सुवेदी के चार लड़कों में से एक हैं और उनका गांव घाटी में स्थित भरूआ है, तो हम उनके मां-बाप से मिलने भरूआ की ओर चल देते हैं। करीब दो घंटे पैदल चलने के बाद हम बालकृष्ण के घर पहुँचते हैं और हमारी मुलाकात उनकी मां से होती है। अभी हम उनकी मां से कुछ पूछते उससे पहले ही आलीशान कोठी में मिले नारायण सुवेदी और उसकी मौसी का लड़का एक साथ नेपाली में चिल्ला पड़ते हैं और वह औरत घर में घुसकर खुद को अंदर से बंद कर लेती है, लेकिन इस बीच कैमरे ने अपना काम कर लिया होता है और हम बालकृष्ण की मां का फोटो खींच लेते हैं।


 रजिस्टर में ६३ नम्बर पर डंभर प्रसाद सुवेदी है ,

और गाँव में उनकी माँ


घर में छुपी मां से बाहर आने को कहा तो कुरियर ने बताया कि वह गाली दे रही है और कैमरा छिनवाने की बात कह रही है। कुरियर ने आगे कहा कि बालकृष्ण की मां अपने छोटे बेटे नारायण सुवेदी को पिता और भाइयों को बुला लाने की बात कह रही है। दूसरे ही पल हमने देखा कि खेतों में काम कर रहे कुछ लोगों की ओर नारायण बड़ी तेजी से घाटी में उतरता जा रहा है और कुछ चिल्लाता जा रहा है।

हमने कुरियर से पूछा अब क्या करें?उसने कहा कि वह गाँव  में कई लोगों को जानता है और उसकी अच्छी साख है, इसलिए कोई मारपीट तो नहीं कर सकता, लेकिन कैमरा छीन लेंगे। मैंने पूछा ऐसा क्यों? कुरियर का कहना था कि यहां गांव की परंपरा के हिसाब से कोई औरत का फोटो नहीं खींच सकता।

फिर हमने कुरियर के बताये अनुसार निर्णय लिया कि यहां से भागना चाहिए। लेकिन हम घाटी से पहाड़ी पर उस रास्ते से नहीं जा सकते थे, जो सामान्य रास्ता था या जिस रास्ते से आये थे। पकड़ से बचने के लिए हमें जंगल के रास्ते वालिंग कस्बे का रास्ता तय करना पड़ा। हमने दिन के 11 बजे चलना शुरू किया था और दुबारा वालिंग कस्बे में पोखरा के लिए गाड़ी पकड़ने के लिए 4 बजे पहुंच पाये थे।



Jun 7, 2011

कहाँ गयी किसानों की नयी पीढ़ी

नई पीढ़ी के पास किसानी को लेकर कोई व्यवस्थित सोच और तैयारी नहीं है. वे जमीन के बदले पैसे को  सही प्रबंधन मानते हैं. कल तक जो किसान अपने परिवार के साथ-साथ बाकी समाज की भूख को संभालता था, कहीं ऐसा न हो  कि उसे  खुद का पेट भरने के लिए बाजार पर निर्भर होना पड़े ... 

   
गायत्री आर्य

दुनिया के सबसे बड़े कृषि प्रधान देश भारत में दुनिया के एक चौथाई भूखे लोग रहते हैं। निश्चित तौर पर यह तथ्य 1894 के भूमिअधिग्रहण कानून में बदलाव लाते वक्त किसी भी मंत्री के दिमाग में नहीं होगा। हाल ही में ऑॅक्सफैम ने ‘घटते संसाधनों के बीच बेहतर भविष्य के लिए खाद्यन्नों का न्यायसंगत इस्तेमाल‘ नामक एक रिपोर्ट जारी की है। इस रिपोर्ट में चेतावनी दी गई है कि अगले बीस सालों में दुनिया में खाद्य वस्तुओं की मांग 70 गुना बढने से इनकी कीमतों में दोगुना इजाफा होगा और पूरी दुनिया में भुखमरी विकराल रुप ले लेगी। खाद्यन्न पैदा करने के साथ-साथ 1990 से 2005 तक हमने फ्रांस की आबादी से ज्यादा यानी  6.5 करोड़ भूखे लोग भी पैदा किये हैं। लेकिन अफसोस की अभी भी भूमि अधिग्रहण मुद्दे को सिर्फ मुआवजे, उद्योग और विकास के जुड़ा हुआ मुद्दा ही माना जा रहा है।

नयी पीढ़ी के  खेतिहरों को खोजते खेत                          फोटो - अजय प्रकाश
किसानों की पहली चाहत है कि जमीन उनसे ना छिने और छिने भी तो बाजार भाव के हिसाब से उन्हें ज्यादा से ज्यादा मुआवजा मिले। दूसरी तरफ निवेशकों और उद्योगपतियों की पहली चाहत है कि हर हाल में जमीन उन्हें मिले और कम से कम कीमत पर मिले। सरकार बनाने में जितने जरुरी वोट हैं उससे भी ज्यादा जरुरी पैसा है इसलिए जाहिर है कि सरकारें निवेशकों और उद्योगपतियों की तरफदारी करती हैं। लेकिन बाजार और पैसे की चकाचौंध अब गांवों तक भी पहुंच गई है, इसलिए किसान सस्ते में निबटने को तैयार नहीं। यदि किसानों को जमीन के मनचाहे पैसे मिल जाते तब शायद जमीन अधिग्रहण कोई मुद्दा बनता ही नहीं। तब जमीन बचाने के लिए धरना, प्रदर्शन और विरोध करने की नौबत संभवतः नहीं आती। खेती की जमीन कम होने का सीधा असर  खाद्दान्न पैदावार पर  भी होगा । खाने वाले पेट उतने ही रहेंगे, लेकिन उगाने वले हाथ और जमीन कम से कमतर होते जा रहे हैं, क्योंकि सारी उपजाऊ जमीन पर तो विकास की नजर है।

हाल-फिलहाल में किसानों द्वारा भूमि अधिग्रहण के विरोध में हुए आंदोलनों को देखें तो एक बात साफतौर पर सामने आती है। किसानों की पहली प्राथमिकता जमीन ना देने  के बदले ज्यादा से ज्यादा मुआवजा पाना है। इसका कारण ये है कि किसानों की नई पढ़ी-लिखी पीढ़ी खेती को अपने व्यवसाय के तौर पर नहीं देखती, बल्कि बिना मेहनत के लाभ देने वाली पूंजी के तौर पर देखती है। क्योंकि सिर्फ खेती ही ऐसा काम है जो हाड़तोड़ मेहनत के बावजूद भी ज्यादा लाभ की कोई निश्चित गारंटी नहीं देता। अच्छी फसल भी रातों-रात बारिश, आंधी, तूफान, ओलावृष्टि की भेंट चढ सकती है या फिर बाजार के गिरते-चढ़ते मूल्य के बीच फंस सकती है, ऐसे में कैसी भी नौकरी उनकी पहली पसंद है क्योंकि वहां उन्हे पता है कि महीने के अंत में उन्हें कितना मिलेगा या साल भर में कितना बचा पाएंगे। गांवों में जो युवक प्रत्यक्ष रुप से खेती नहीं करते ना ही नौकरी करते हैं शादी कराने के लिए उन्हें किसान के तौर पर प्रचारित  किया जाता है। असल में वे ‘अदृश्य बेरोजगार‘ हैं जिन्हें हम किसानों में ही गिनने की गलती करते हैं।

भूमि अधिग्रहण की खबर किसान परिवारों में मोटा-मोटी दो तरह की प्रतिक्रिया लाती है। पुरानी पीढ़ी के लोग जो सही मायने में किसान हैं वे अपनी आजीविका को छिनता हुआ देखते हैं। पुश्तैनी जमीन का जाना उन्हें भावनात्मक और आर्थिक दोनों तरह से असुरक्षित करता है। दूसरी तरफ युवा (झूठ-मूठ के किसान) ना तो भावनात्मक स्तर पर ही जमीन से जुड़े होते हैं ना ही सीधे तौर पर उन्हें जमीन आर्थिक आत्मनिर्भरता देती है। उन्हें  जमीन का अधिग्रहण एकमुश्त पैसा कमाने का सुनहरा मौका लगता है। हालाँकि  जमीनी यर्थाथ यह है कि जमीन के बदले  मिलने वाली बड़ी रकम का अक्सर  सदुपयोग नहीं हो पाता।

नए-पुराने किसानों के पास पूंजी के सही निवेश के लिए ना तो कोई सोच होती है, ना ही योजना, ना ही कोई उस तरह का अनुभव और ना ही ऐसा कोई विचार । असली किसान खेती से अलग दूसरे किसी भी काम को शुरु करने की बात सोच भी नहीं सकते। दूसरी तरफ युवकों  ने ऐसी कोई तकनीकी या प्रबंध शिक्षा नहीं ली होती कि वे अपना कोई व्यवसाय करने का सोच सकें। खेती करने वाला किसान अचानक से बेरोजगार हो जाता है और नई पीढ़ी के पास कोई व्यवस्थित सोच और तैयारी नहीं होती, जिस कारण अधिकांशतः जमीन के बदले मिले पैसे का सही प्रबंधन नहीं होता। कल तक जो किसान अपने परिवार के साथ-साथ बाकी  समाज की भूख का भी इलाज करता था, आज वह खुद अपना पेट भरने के लिए दूसरे पर निर्भर होगा।

अमेरिका जैसी महाशक्ति जहां विज्ञान और तकनीक ने अविश्वसनीय चीजें, सुविधाएं और हालात पैदा किये हैं, वहां भी आज भी लोग खाना ही खाते हैं। ऐसी किसी गोली, इंजेक्शन, या टीके की खोज आज भी नहीं हुई जिसे खाने का नियमित विकल्प बनाया गया हो। ऐसी कोई कोशिश भी कहीं नजर नहीं आ रही। बड़े से बड़ा वैज्ञानिक, डॅाक्टर, इंजीनियर, प्रबंधक, उद्योगपति या फिर राष्ट्रपति भी अंततः खाना ही खाता है। यानि के विकास के चरम बिंदू पर भी हम खाने का ना तो कोई विकल्प ढ़ूंढ पाए हैं और ना ही ढूंढना चाहते  हैं। फिर हम विकास के नाम पर खाना पैदा करने वाली जमीनों और हाथों को क्यों काट रहे हैं?

यह कैसा कृषि प्रधान देश है जो अपने 6.5 करोड़ लोगों को खाना नहीं दे पा रहा है? यह कैसा खेतीहर देश है जो किसानों की नई पीढ़ी तैयार ना कर पाने के बावजूद भी खुद को कृषि प्रधान देश ही कहलवा रहा है? क्यों हम 6 दशकों में भी ऐसे हालात नहीं पैदा कर पाए कि नई पीढ़ी सिर्फ विज्ञान, वाणिज्य, प्रबंधन को ही नहीं खेती को भी कैरियर के तौर पर चुने? क्यों सेज से लेकर तमाम ओद्यौगिक इकाइयां उत्पादक जमीन पर खड़ी की जा रही हैं? क्या हम खेती की जमीन जरुरत से ज्यादा होने से त्रस्त है? फिर अनुत्पादक (‘बंजर‘ नहीं क्योंकि जमीन हमेशा कुछ ना कुछ देती है)जमीनों को क्यों उद्योगिकरण के लिए नहीं चुना जा रहा?

जिस उपजाऊ मिट्टी को ऊंचे दाम चुकाकर कंक्रीट में बदला जा रहा है, उससे पैदा होने वाले खाद्यान्न की भरपाई कौन करेगा? मिट्टी की एक परत बनने में एक हजार साल लगते हैं और उसे कंक्रीट बनाने में 100 दिन भी नहीं। लेकिन अभी भी जमीन अधिग्रहण का मुद्दा ज्यादा से ज्यादा दाम लेने और कम से कम दाम में खरीदने के बीच ही झूल रहा है। क्या नई जमीन अधिग्रहण नीति में सरकार जमीन से जुड़े मूल मुद्दे खाद्यान्न उत्पादन और भूख नियंत्रण को ध्यान में रखेगी या फिर वोट बैंक और नोट बैंक के वर्तमान हितों को ही पोसने की कोशिश करेगी? केन्द्र सरकार खाद्य सुरक्षा कानून बनाने जा रही है। इस कानून को लागू करने की पहली शर्त पर्याप्त खाद्यान्न उत्पादन, तत्पश्चात सही भंडारण और न्यायसंगत वितरण है। एक तरफ खाद्यान्न सुरक्षा का लोक लुभावन कानून दूसरी तरफ उपजाऊ जमीन पर गिद्ध दृष्टि!

भूख के भयानक स्तर पर पहुँचने   से पैदा होने वाले भयानक हालातों को ध्यान में रखकर भूमि अधिग्रहण का नया कानून बनाना चाहिए। यह तय है कि सरकारें, उद्योगपति, निवेशक और विकास अंततः भूखे लोगों का शिकार होंगे। आम आदमी तो हर हाल में शिकार होने का अभिशप्त है ही। क्या हमें इतनी मुश्किलों से और इतनी कीमत चुकाकर होने वाले विकास को भूखे लोगों का शिकार होने से नहीं बचाना चाहिए? भूख को दबाकर और भूख की कीमत पर विकास कभी नहीं जीत सकता। हां भूख को जीतकर, सामाजिक शान्ति, सौहार्द स्थापित करके फिर भी स्थाई विकास की प्रबल संभावनाएं पैदा होती हैं।





दिल्ली के जवाहरलाल नेहरु विश्विद्यालय से शोध और मजदूरों -किसानों  से जुड़े मामलों पर लिखती हैं .





नेता रामदेव यादव अब बूट योग की बारी है


यानी चुत्तड़ योग से समर्थन योग का रास्ता थाने और कचहरी से होकर गुजरता है. आप राजनीति में नए-नए आये हैं, इसलिए इन  योगों के बारे में जानकारी नहीं है। उम्मीद है क्रमशः आप रमते जायेंगे...
 
सुमन

भारतीय राजनीति में बगैर जाति के नेता की कोई पहचान नहीं है, इसलिए बाबा रामदेव के भविष्य को देखते हुए उन्हें रामदेव यादव कहना श्रेयस्कर होगा. योगी, बाबा, औषधि निर्माता और अब राजनेता- रामदेव यादव का राजनीति के क्षेत्र में व्यापक स्वागत है. स्वागत इसलिए है क्योंकि उन्हें  पुलिस ने अपनी लोकतान्त्रिक व्यवस्था का एक छोटा सा कारनामा दिखाया और वे आदमी से औरत की पोशाक में आ गए। हालाँकि  पुलिस ने नरमी दिखाई और अपना  सम्पूर्ण टेलर नहीं दिखाया। अगर हमारे जिले के इस्पात राज्य मंत्री श्री बेनी प्रसाद वर्मा की दिल्ली में चली होती तो वे आपके और समर्थकों के लिए चुत्तड़  योग (जो बाराबंकी जनपद में तो प्रसिद्ध  है )  का  इस्तेमाल  जरुर करवाये होते।


पिछले लोकसभा चुनाव से पहले थाना राम नगर, जिला बाराबंकी में मंत्री जी ने अपने  एक बडबोले विरोधी नेता पर तत्कालीन थाना अध्यक्ष के जरिये चुत्तड़ योग का प्रयोग कराया था। जब न्यायालय में उक्त नेता जी का चालान आया तो पेट के बल वो लेटाये हुए थे और जब माननीय मंत्री जी का चुनाव आया तो वही  नेताजी उनका चुनाव प्रचार कर रहे थे। यानी चुत्तड़ योग से समर्थन योग का रास्ता थाने और कचहरी से होकर  गुजरता है. आप राजनीति में नए-नए आये हैं, इसलिए के योगों के बारे में जानकारी नहीं है। उम्मीद है क्रमशः आप रमते जायेंगे.  

उत्तर प्रदेश में पुलिस पेट्रोल योग, करंट योग, पट्टा योग आये दिन करती रहती है और इसी कारण से प्रदेश में विपक्षी बडबोले नेता चाहे भाजपा के हों या लोकमंच के नेता अमर सिंह हों या क्षत्रिय शिरोमणि रघुराज प्रताप राजा भैया हों, सबको सरकारी योग से डर लगता है और ये सभी नेतागण निंदा करके अपना काम चला लेते हैं। उत्तर प्रदेश के मुजफ्फरनगर में प्रदेश सरकार ने आपके काफिले को रोककर वापस कर दिया। अगर आपने वहां हठ योग किया होता तो आपको उत्तर प्रदेश सरकार भट्ठा-परसोल योग का प्रशिक्षण दे देती। उत्तर प्रदेश की मुख्यमंत्री मायावती ने आपका पूरा समर्थन किया है और उन्होंने ने कहा है कि रामलीला मैदान में हुई कार्यवाई की उच्चतम न्यायालय जांच कराये क्योंकि अब केंद्र से न्याय की उम्मीद नहीं है। यह अमानवीय और निंदनीय है।

उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ में झुलेलाल पार्क में प्रदेश के सभी धरना अनशन प्रदर्शन कार्यों को इकठ्ठा होकर अपनी बात कहने के लिये स्थल नियत किया गया है। 23 मई से नवीन ओखला ओद्योगिक विकास प्राधिकरण के कर्मचारी अपनी नौकरी के नियमतिकरण लिये धरना दिए हुए थे। शुक्रवार की सुबह धरनाकारी धर्मपाल की मृत्यु हो गयी। एसपी ट्रांस गोमती नितिन तिवारी के कुशल नेतृत्व में सी.ओ महानगर, सी.ओ गुड़म्बा सहित कई थानों के थाना प्रभारी अपने-अपने नेम प्लेट उतारकर धरना स्थल पर बैठे हुए कर्मचारियों पर पुलिस, पीएससी के बल पर लाठी चार्ज कर दिया जिसमें आधा दर्जन कर्मचारियों की हालत गंभीर स्थिति में पहुँच गयी। डेढ़ सौ महिलाओं को इन अधिकारियो के नेतृत्व में पुलिस पीएससी ने जमकर पीटा। सारे कानून नियम धरे के धरे रह गए।

अब मैं आपके लिए  उत्तर प्रदेश के सरकारी योग की कुछ झलकियाँ पेश कर रहा हूँ....

लखनऊ में बहुजन समाज पार्टी की सरकार ने हमेशा समाज के हर तबके के ऊपर लाठी चार्ज किया है और किसी भी मामले में जिम्मेदार किसी भी पुलिस अधिकारी के खिलाफ कोई कार्यवाई नहीं की गयी है। धरना स्थल पर धरनाकारी धर्मपाल की मौत के बाद पुलिस प्रशासन ने जिस तरह से धरनाकारी के ऊपर बुरी तरह से लाठीचार्ज किया है, उससे लगता है की उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ लोकतंत्र का शमशान घाट है और विपक्षी दलों की स्थिति  मुर्दों से भी बदतर  न हिल सकते हैं न डुल सकते हैं अन्यथा सरकार की यह हिम्मत ही नहीं हो सकती थी कि वो हर सत्याग्रही के ऊपर लाठीचार्ज कर सके।

लखनऊ में डीआईजी डी.के.ठाकुर ने समाजवादी पार्टी नेता आनंद सिंह भदौरिया को हजरतगंज में लाठियों से पीटकर सड़क पर लातों से रौंदा, जिससे उत्तर प्रदेश सरकार तथा भारत सरकार के पुलिस अधिकारीयों का वास्तविक चेहरा जनता के सामने आया। कहने के लिये हम आप लोकतांत्रिक समाज का हिस्सा हैं लेकिन वास्तव में राज्य का असली स्वरूप जब सामने आता है तो वह बड़ा वीभत्स होता है। इन स्थितियों  के बाद भारत सरकार में दम है कि इस पुलिस अधिकारी के खिलाफ कोई कार्यवाई कर सके।

रही बात विदेशों से काला धन लाने की तो नेता जी मेरी एक सलाह है कि अगर आज की तारीख से देश में काला धन बनाने की प्रक्रिया रुक जाए तो भी देश काफी खुशहाल हो जायेगा। जब दो करोड़ रुपये की जमीन कोई खरीदता है तो नंबर एक रुपये में 60-70 लाख रुपये का भुगतान होता है बाकी भुगतान बेनामी होता है और इसी तरह हजारो हजार करोड़ रुपये ब्लैक मनी प्रतिदिन तैयार होती है मुख्य समस्या यह है। नेता जी आपने रामलीला मैदान 5000 लोगों को योग सिखाने के लिये लिया था। अनशन प्रदर्शन करने के लिये नहीं लिया था और वहां योग सिखने वाले लोगों को इस तरह की कार्यवाई की भी उम्मीद नहीं थी.

यदि किसी योग प्रशिक्षणार्थी की मृत्यु भी हो जाती तो उसकी भी जिम्मेदारी आपकी ही होती। आपके समर्थन में संघियों की मुखौटा पार्टी भाजपा पूरी तरीके से है। इसका अध्यक्ष बंगारू लक्षमण भी रहा है जिसका हाल आपने टीवी  पर देखा होगा। अगर आपके केंद्र में कांग्रेस की बजाये भाजपा की सरकार होती तो भाजपा आपको इससे बढ़िया नया योग सिखा चुकी होती। कांग्रेस भ्रष्टाचारियों का एक अड्डा है जिसमें शरद पवार जैसे मंत्रियों से लेकर दयानिधि मारन तक अब तक मंत्री हैं।


हम,  नेता जी आपके राजनीति में आने का स्वागत करते हैं लेकिन ये द्रष्टान्त आपके लिये लिखे हैं जिससे आप इन योगों का भी अभ्यास कर लें। जिससे भविष्य में आपको कोई कुंठा या निराशा न हो। राजनीति में सभी महा योगी होते हैं और आप अभी तक सिर्फ योगी हैं।











हिंदी के चर्चित ब्लॉग लोकसंघर्ष  के मॉडरेटर और पेशे से बाराबंकी में वकील







Jun 6, 2011

सरकार का कायराना कारनामा

दिल्ली  के रामलीला मैदान में  4/5 जून की मध्यरात्री में यु.पी.ए. सरकार द्वारा योगगुरु रामदेव के आह्वान पर भ्रष्टाचार-विरोधी मुहीम में दूर-दराज़ से आए लोगों पर रात के अँधेरे में उन्हें सोते में औचक ही सरकारी दमन का शिकार बनाना एक डरी हुई सरकार का कायराना कारनामा है. इस घटना से सरकार ने यह सन्देश भी दिया है कि वह कारपोरेट हितों के खिलाफ असली या नकली किसी भी प्रतिरोध को झेल नहीं सकती.  

भ्रष्टाचार का सवाल सीधे -सीधे निजीकरण-उदारीकरण और खगोलीकरण की अमीरपरस्त-साम्राज्यपरस्त नीतियों पर चोट  करता है. तमाम सत्ता की पार्टियां इस दलाल अर्थतंत्र का हिस्सा हैं, लिहाजा मुख्यधारा की राजनीति में मुख्य प्रतिपक्ष ने जो जगह छोडी है, उसे नागरिक समाज की शक्तियां और दूसरे जन-आन्दोलन भर सकते हैं. इन आन्दोलनों की तमाम कमियों कमजोरियों के बावजूद लोगों का इनके आह्वान पर जुटना स्वाभाविक है. ऐसे में सरकार इन पर हर कहीं दमन पर उतारू है.

रामदेव की  राजनीतिक महत्वाकांक्षा, उनके द्वारा संघ परिवार के नेटवर्क का इस्तेमाल और संघ द्वारा उनके इस्तेमाल का अवसरवाद , खुद रामदेव के ट्रस्ट की परिसंपत्तियों  के विवादित स्रोतों  के बारे में शायद ही किसी सजग व्यक्ति को भ्रम हो. दिल्ली आने से पहले से ही सरकार के साथ उनका मोल-तोल जारी था. उन्होंने लोकपाल विधेयक में प्रधानमंत्री और जजों को जांच के दायरे में शामिल न किए जाने की मांग कर नागरिक समाज द्वारा प्रस्तावित विधेयक को कमज़ोर करने और सरकार को खुश करने की भी कोशिश की थी.

हवाई अड्डे पर सरकार के कई मंत्रियों  का उनसे मिलने पहुँचना , बालकृष्ण का आन्दोलन आगे न चलाने के वचन वाला पत्र , सभी कुछ सरकार और उनके बीच बहुविध लेन-देन और सौदेबाजी की तस्दीक करता है, लेकिन इसके बावजूद पुलिसिया दमन और आतंक को कहीं से भी जायज़ नहीं ठहराया जा सकता. जंतर मंतर पर भी लोगों के जमावड़े पर प्रतिबन्ध लगाकर सरकार ने अपने इरादे ज़ाहिर कर दिए हैं. यह दमन राजधानी में सिर्फ रामदेव पर नहीं रुकेगा, बल्कि किसी भी आन्दोलन , धरने और प्रदर्शन के दमन का रास्ता साफ़ हुआ है.

 शेष भारत में, आदिवासी इलाकों में, किसानों के आन्दोलनों पर, बड़ी देशी-विदेशी पूंजी के दोहन के खिलाफ यह दमन जारी ही है. दिल्ली इसका अपवाद नहीं बनी रह सकती. लिहाजा इस घटना को अघोषित आपातकाल की एक कड़ी के रूप में ही देखना चाहिए और इसके दमनकारी अभिप्राय को नागरिक समाज को कम करके नहीं आंकना चाहिए. हम इस घटना की और इसकी ज़िम्मेदार केंद्र सरकार की घोर भर्त्सना करते हैं  और आम नागरिक और बुद्धिजीवियों से भी इसके पुरजोर विरोध की अपील करते हैं.

( सांस्कृतिक संगठन  जन संस्कृति मंच द्वारा जारी )



बाबा से नेता बन गये रामदेव


जिस सरकार ने झूठे मामलों में मुस्लिम युवकों को आतंकवादी करार देने में ऐतिहासिक रिकॉर्ड बनाया हो,वह सरकार कहे कि बाबा का आंदोलन सांप्रदायिक था,क्या यह बात बेतुकी नहीं है...

अजय प्रकाश

दिल्ली के रामलीला मैदान में कालेधन  के खिलाफ जारी आंदोलन के साथ कांग्रेसी सरकार ने जो लीला खेली है, उसे पूरा देश देख चुका है। कालेधन और भ्रष्टाचार   के खिलाफ एक मुकम्मिल चोट करने को तैयार बाबा रामदेव और उनके समर्थकों के साथ कैसा सुलूक किया गया,उसे भी देश लगातार देख रहा है। देश,देख उन कांग्रेसी मसखरों को भी रहा है जो केंद्र सरकार के इशारे पर 5 मई की मध्यरात्रि  में दिल्ली के रामलीला मैदान में अनशनकारियों पर किये गये नृशंश  हमले को उचित ठहराने की नापाक कोशिश  में बेताब हैं और रामदेव को देश  का ठग बताने के तिकड़म में जुटे हैं। बाबा रामदेव को लेकर कांग्रेसी नेताओं की मसखरी और निराशा  में की गयी पुलिसिया कार्रवाई ने अब रामदेव को बाबा से नेता बना दिया है, जिसका ऐतिहासिक श्रेय कांग्रेस की तानाशाहीपूर्ण रवैये को ही जायेगा।

वरिष्ठ  गांधीवाधी नेता अन्ना हजारे के दिल्ली के जंतर-मंतर पर चले अनशन के बाद 4जून से रामलीला मैदान में कालेधन समेत आठ सूत्री मांगों के पक्ष में भारत स्वाभिमान ट्रस्ट के बैनर तले, बाबा रामदेव के नेतृत्व में आमरण अनशन होना तय था। यह घोषणा बाबा ने महीने पहले कर रखी थी। बाबा की इस घोषणा  के पीछे माना जा रहा था कि भ्रष्टाचार के मसले पर अन्ना के मुकाबले उनका पिछड़ना है। साथ ही लोकपाल विधेयक के लिए बनी लोकपाल मसौदा समिति में बाबा रामदेव को किनारे किये जाने की खुन्नस को भी कारण के तौर देखा जा रहा था। इतना ही नहीं ‘परवल को सीताफल समझने’की आम समझ रखने वाले कुछ बुद्धिजीवियों ने इसे सरकार प्रायोजित आंदोलन कहा और माना कि डील तो पहले ही हो चुकी है, बस घोषणा  होनी बाकी है।

बहरहाल, सच 5मई की मध्यरात्रि में रामलीला मैदान में दिखा। इस नृशंश सच को देख पूरा देश एक स्वर में अब कह रहा है कि कांग्रेस सरकार पगला गयी है। हालांकि कांग्रेस का यह पागलपन मिर्गी के दौरे की तरह झटके में आया है या फिर भगंदर की तरह एक सिलसिले में,इसका मुकम्मिल जवाब किसी के पास नहीं है,आशंकाएं और संभावनाएं जरूर हैं। खासकर लोगों को यह बात नहीं समझ आ रही कि जिस केंद्र सरकार के चार मंत्री बाबा को दिल्ली हवाई अड्डे पर स्वागत करने पहुंचते हैं,उन्हीं की सरकार 72घंटे के भीतर एकदम उलट जाती है और रात डेढ़ बजे ऑपरेशन खदेड़ो शुरू कर देती है। आखिर पेंच क्या है?बात यह भी समझ से परे है कि कालेधन के खिलाफ चले रहे इस अनशन में सरकार अनशनकारियों के लिए पानी,दवा,बिजली समेत वह तमाम व्यवस्थाएं सुचारू रूप से करती है जो सरकारी रिवाज के हिसाब से अन्य आंदोलनों में (अन्ना आंदोलन को छोड़कर)नहीं होता। यानी सब कुछ गुडी-गुडी चल रहा था, इसी बीच सरकार की हिस्टिरियानुमा कार्रवाई भारतीय जनमानस के लिए अब अपचनीय हो रही  है।

बाबा के आंदोलन पर किये गये अत्याचार के खिलाफ इस वक्त पूरा देश एकजुट है। इसी एकजुटता के बीच आंदोलन की रूख और तैयारियों को लेकर आलोचनाएं भी की जा रही हैं। अनशन के पहले दिन 4जून को रामलीला मैदान में जनता को संबोधित करने पहुंची सांप्रदायिक पहुंच की नेता साध्वी रितंभरा के बाद बहुतों ने मान लिया कि बाबा का आंदोलन हिंदूवादियों और राष्ट्रीय  स्वंय सेवक संघ की गिरफ्त में है। माना गया कि लोकपाल मसौदा समिति के लिए दिल्ली के जंतर-मंतर पर चला अन्ना हजारे के आंदोलन में जो सांप्रदायिक भावना पर्दे के पीछे थी,वह यहां खुलकर सामने आ गयी। हालांकि इसी के साथ यह भी रहा कि सांप्रदायिक राजनीति को ही राष्ट्र  निर्माण की बुनियाद  मानने वाले नेताओं में चाहे वह हिंदू रहे हों या मुस्लिम किसी की हिम्मत नहीं हुई कि वे खुले तौर हिंदूवाद या अल्पसंख्यक अतिवाद की पैरवी करें । बेशक आतंकवादियों को फांसी दिये जाने या आजीवन कारावास दिये जाने की बातें, सांप्रदायिक पहुंच के नेताओं ने जरूर कहीं, लेकिन किसी ने रूपक में भी मुसलमानों या हिंदुओं का नाम लिया। जाहिर है यह अनुशासन बाबा रामदेव का मंच होने की वजह से ही बरता गया होगा।

बाबा के आंदोलन को सांप्रदायिक कहने वालों में कुछ को इस बात से भी ऐतराज है कि आंदोलन के समर्थन में हिंदू महासभा,विश्वहिंदू परिषद्  और हिंदूवादी राजनीति के समर्थन वाले आर्यसमाजियों की बहुतायत थी और अल्पसंख्यक नहीं के बराबर   थे। इसमें ठोस बात अल्पसंख्कों के नाममात्र  होने की है। वैसे में सवाल यह है कि क्या अन्ना आंदोलन में अल्पसंख्यकों की बड़ी भागीदारी थी। या फिर राष्ट्रीय  फलक पर उभरी पार्टियों में कोई ऐसी है जिसमें अल्पसंख्यकों की तादाद ज्यादा है और भागीदारी बड़े स्तर पर होती है। अन्यथा इस सवाल का इस मौके पर क्या मतलब।

गौरतलब है कि बाबा रामदेव एक हिंदू संत हैं और वह हिंदू धर्म के तमाम मानदंडों को खुद जीते हैं और दूसरों को जीने के लिए प्रेरित करते हैं। संभव है उनके योग को सीखने कुछ अल्पसंख्यक आते हों,इसके अलावा उनके बीच अल्पसंख्यकों की भागीदारी का कोई दूसरा दायरा नहीं बनता। बावजूद इसके बाबा के मंच पर अल्पसंख्यक नेता जिसमें मुस्लिम,क्रिश्चियन,सिख और जैन चारों हैं, उपस्थित थे। सवाल है कि दूसरी सभी पार्टियां जिसमें कांग्रेस प्रमुख है,उसके यहां अल्पसंख्कों की भागीदारी का प्रतिशत क्या शर्मशार करने वाला नहीं है?किसी को सफेद और भगवा कपड़ों में देख हिंदूवादी करार दिया जाना,क्या सांप्रदायिकता और अल्पसंख्यक हित के नाम पर कांग्रेसी जिलेबी  चांपने की वही पूरानी परंपरा नहीं है, जो आजादी के बाद से चली आ रही है।

सवाल यह भी है कि जिस सरकार ने झूठे मामलों में मुस्लिम युवकों को आतंकवादी करार देने में ऐतिहासिक रिकॉर्ड बनाया हो,वह कांग्रेसी सरकार कहती है कि बाबा का आंदोलन सांप्रदायिक था, क्या यह बात बेतुकी नहीं लगती? क्या इससे भी ज्यादा हतप्रभ कर देने वाला उन कम्युनिस्ट  बुद्धिजीवियों का तर्क नहीं है जो यह कह रहे हैं कि भाजपा जब हिंदू आतंकवाद मामले में घिरती गयी तो उसने भ्रष्टाचार  का दामन थाम लिया। क्या वाद में वाम और दामन में कांग्रेसी होने का यह क्लासिकल उदाहरण नहीं है जो सांप्रदायिकता की आड़ में कांग्रेस की हर कार्यवाही को जायज ठहराने को तैयार रहते हैं?

दूसरा सवाल बाबा के आंदोलन में भागीदारों को लेकर रहा। कई बुद्धिजीवियों ने अन्ना हजारे के अनशन और रामदेव के कालेधन के खिलाफ जारी मुहिम को आंदोलन नहीं मानने के बावत बातें कहीं। अन्ना को लेकर कहा कि इसमें सुविधाभोगी भ्रष्ट  वर्ग भागीदार रहा तो दूसरी तरफ रामदेव का माहौल धार्मिक रहा। अब उन्हें कौन बताये कि रामदेव के आंदोलन में भागीदारों की सबसे बड़ी संख्या गांव के किसानों,छात्रों और घरेलू महिलाओं की थी। ऐसे में इन बुद्धिजीवियों से पूछना चाहिए कि सुविधाभोगियों ने सरकार को लोकपाल बिल मसौदा समिति बनाने को मजबूर किया,बाबा रामदेव के धार्मिक समूह ने सरकार के लिए मुश्किल  खड़ी की, लेकिन आप भले मानुसों ने कौन सी राजनीतिक डोर थाम रखी है जो सिवाय बतकूचन के कुछ और करती ही नहीं।

बाबा पर उठ रहे इन तमाम सवालों के बीच देश का बहुतायत बाबा के नेतृत्व में खड़े हुए कालेधन के खिलाफ आंदोलन में उनके साथ है और अत्याचार के विरोध में तरह-तरह से भागीदार है। संभव है कि इस वर्ष  शुरू हुए ये दोनों आंदोलन आने वालों वर्षों  में कोई नयी उम्मीद ले आयें और भ्रष्टाचार  की सड़ांध में लिपटी पार्टियों के मुकाबले कोई नया राजनीतिक विकल्प उभरे।

Jun 5, 2011

'रौंगटे खड़े करने वाली थी काली रात, कांप उठी मेरी आत्मा'

 
रामलीला मैदान में लोगों पर हुए पुलिस के अत्याचार ने  बर्बरता की सारी हदें पार कर दीं । अनशन में परिवार बच्चों को लेकर भी आए  थे। पुलिस ने उन बच्चों को भी नहीं बख्शा। बच्चों को घसीट-घसीट कर मारा। यह सब देख मेरी आत्मा कांप उठी...रामदेव  
 
 
नई दिल्ली. बाबा रामदेव ने हरिद्वार में आज यूपीए अध्यक्ष सोनिया गांधी पर सीधा निशाना साधा और कहा कि पूरी कार्रवाई उन्हीं के निर्देश पर हुई है। उन्होंने कहा कि आज का दिन वे काला दिवस के रूप में मना रहे हैं। उन्होंने कहा कि रामलीला मैदान पर शुरु हुआ, उनका अनशन जारी रहेगा। उन्होंने यह भी कहा कि यह मेरे एनकाउंटर की साजिश थी।  दिल्ली से विशेष विमान से देहरादून  और वहां से वे हरिद्वार स्थित अपने पतंजलि आश्रम पहुंचे, बाबा  पूरी तरह सफेद कपड़ों में थे ।  उन्होंने वहां जमा पत्रकारों से संक्षिप्त चर्चा में कहा कि इस घटना से साफ हो गया है कि सोनिया गांधी को इस देश और देश वासियों से प्यार ही नहीं है।  


बाद में रामदेव ने हरिद्वार में अपनी पत्रकार वार्ता में कहा कि उस काली रात की याद रौंगटे खड़े करने वाली है। - अब तक मैंने लोगों पर हुए पुलिसिया अत्याचार को सिर्फ सुना था। लेकिन जो रामलीला मैदान में लोगों पर पुलिस का अत्याचार हुआ उसने बर्बरता की सारी हदें पार कर दी। और जिस तरह से मैंने वहां पर दृश्य देखा और मैंने बार-बार पुलिस को मना किया कि आप मां, बहन बेटियों के साथ इस तरह क्यों व्यवहार कर रहे हैं। महिला पुलिस पांच-दस की संख्या में होगी और सशस्त्र पुलिस करीब पांच से दस हजार के बीच। मेरी आंखों के सामने जो उन्होंने जुल्म किए छोटे-छोटे बच्चों पर क्योंकि इस अनशन में परिवार बच्चों को लेकर भी आए हुए थे। पुलिस ने उन बच्चों को भी नहीं बख्शा। बच्चों को घसीट-घसीट कर मारा। यह सब देख मेरी आत्मा कांप उठी.

पहले तो मैं जो षडयंत्र रचे जा रहे थे उनके बारे में ध्यान आकर्षण करना चाहता हूं। पहले हमसे कहा गया कि आप जो चाहते हैं हम वो कर देंगे। हम काले धन को राष्ट्रीय संपत्ति भी घोषित कर देंगे और उसके लिए बिल भी ले आएंगे। हम काले धन का पता लगाने के लिए उच्च स्तरीय जांच करेंगे।  दूसरी तरफ सरकार हम पर दवाब डाल रही थी कि हम अनशन खत्म कर दें  और वो हमारी मांगे मान लेंगे। तीन तारीख को हमसे मुलाकात भी कि और कहा कि सरकार के चार मंत्रियों ने एयरपोर्ट जाकर काफी आलोचना करवा दी है। हमें होटल में बुलाया जाता है। आयार्य जी पर दवाब डाला जाता है। करीब पांच घंटे तक बैठक चली और अंत में हमे कहा गया कि या तो समझौता देने के लिए तैयार रहो और या फिर सरकार का कोप झेलने के लिए।

कपिल सिब्बल जैसे व्यक्ति ने इतने शातिर दिमाग से और कूटनीतिक चालों से हमारे सामने दो प्रश्न रखे। उसकी योजना तो मुझे गिरफ्तार करके या तो मेरा एनकाउंटर करवाने या गायब करवाने की थी। सारा मीडिया इस बात को जानता है कि जैसे चार तारीख की रात को भारी पुलिस आई थी उसी तरह तीन तारीख को भी होटल के बाहर भारी पुलिस थी। सरकार तो सभी लोगों की जान लेने पर तुली थी।

प्रेस वार्ता में बाबा ने आगे कहा की  मैं महिला के कपड़े पहनकर बैठा हूं। सरकार की पूरी योजना थी कि या तो रामदेव को इस दमन के दौरान मरवा दिया जाए या फिर उसे गायब करवा दिया जाए। मैंने महिला के वस्त्र पहनकर वहां से निकलने की कोशिश की। मैं करीब दो घंटे वहां पर बैठा रहा। जब आंसू गैस के गोलो का प्रभाव थोड़ा कम हुआ तो मैंने निकालने की कोशिश की. मैंन बार-बार कहा है कि मैं मरने से डरता तो यह आंदोलन नहीं करता। लेकिन कायरता से मरना बहादुरी नहीं है।  पुलिस ने मेरे साथ दुर्व्यवाहर किया। मेरे गले में दुपट्टा था और उन्होंने उससे मेरे गले में फंदा लगा दिया। मैंने कहा कि मैं अपराधी नहीं हूं। क्या अन्याय के खिलाफ आवाज उठाकर मैं अपराधी हो गया।

इधर दिल्ली पुलिस ने बाबा के दिल्ली घुसने पर पाबंदी लगा दी है. इसके पहले बाबा रामदेव, अनशन जबरन समाप्त कराए जाने के बाद से रातभर पुलिस की हिरासत में रहे और उन्हें सुबह विशेष विमान से देहरादून भेजा गया। देहरादून से वे सड़क मार्ग से पतंजलि आश्रम पहुंच गए हैं। पुलिस ने उनके दिल्ली में अगले आदेश तक घुसने पर भी पाबंदी लगा दी है। जानकारी के अनुसार कम से कम १५ दिन वे दिल्ली की सीमा में नहीं घुस पाएंगे। 

रामदेव बाबा ने शनिवार 4 जून की सुबह भ्रष्‍टाचार और काले धन के खिलाफ अनशन शुरू किया था। आधी रात के बाद पुलिस रामलीला ग्राउंड के पंडाल में पहुंची और बाबा को उठा कर ले गई। इससे पहले पंडाल में जबरदस्‍त हंगामा हुआ। पंडाल में हजारों लोगों की मौजूदगी के बावजूद आंसू गैस के गोले छोड़े गए, लाठियां चलाई गईं। महिलाओं से धक्‍कामुक्‍की की गई। करीब पांच हजार पुलिसकर्मियों ने शनिवार-रविवार की दरमियानी रात करीब डेढ़ बजे पूरे रामलीला ग्राउंड को घेर लिया था। पुलिस ने पंडाल उखाड़ दिए और मंच पर रखे माइक व अन्य सामान तोड़ने की कोशिश की। बाबा मंच से गिर गए। महिलाओं सहित भारी संख्या में उनके समर्थक सुरक्षा ढाल बनकर खड़े हो गए। पर पुलिस ने सभी को जबरन काबू किया और देर रात 2.30 बजे बाबा को ले गई। प्रशासन ने पंडाल में योग शिविर आयोजित करने की दी गई इजाजत भी रद कर दी।

दिल्‍ली में डटे बाबा के हजारों समर्थक दिल्‍ली छोड़ने के लिए तैयार नहीं हैं। आशंका है कि वे जंतर मंतर पर जुट कर पुलिस की कार्रवाई के खिलाफ प्रदर्शन करेंगे। इस आशंका के मद्देनजर जंतर मंतर इलाके में सुरक्षा कड़ी कर दी गई है। हरिद्वार, रुड़की सहित उत्‍तराखंड के कुछ जगहों पर भी अलर्ट घोषित कर दिया गया है। रामलीला ग्राउंड को खाली करा कर पुलिस ने अपने कब्‍जे में ले लिया है। इस इलाके के आसपास धारा 144 लगा दी गई है।

दैनिक भास्कर से साभार व संपादित  


पर्यावरण दिवस की आज पूरी हुई खानापूर्ति

बढ़ते पर्यावरण प्रदूषण से चिंतित सुप्रीम कोर्ट ने एक जनहित याचिका पर सुनवाई करते हुए स्कूल और कालेजों में पर्यावरण शिक्षा को पाठ्यक्रम में अनिवार्य रूप से जोड़ने का निर्देश दिए थे। कोर्ट के आदेश पर पर्यावरण को पाठ्यक्रम में शामिल तो कर लिया गया, लेकिन इससे लोगों में जागरूकता नहीं आई...

राजेंद्र राठौर  

जंगलों में पेड़ों की अंधाधुंध कटाई और लगातार बढ़ती जनसंख्या के अलावा बड़े पैमाने पर लग रहे उद्योगों से छत्तीसगढ़ का पर्यावरण असंतुलित होने लगा है। उद्योगों के कारण उपजाऊ भूमि सिमट रही है, वहीं फैक्ट्रियों से निकलने वाले धुएं और अपशिष्ट पदार्थो से पर्यावरण प्रदूषित हो रहा है। बढते प्रदूषण के कारण धान का कटोरा कहलाने वाले छत्तीसगढ़ के आगामी वर्षों  में राख के कटोरे में तब्दील हो जाये तो  संदेह नहीं ।

छत्तीसगढ़ राज्य में तेजी से पांव पसारते औद्योगिक इकाईयों से यहां प्रदूषण का खतरा दिनों-दिन बढ़ने लगा है। पर्यावरण प्रदूषण से मनुष्य सहित पेड़-पौधे व जीव-जन्तु भी बुरी तरह प्रभावित हो रहे हैं। औद्योगिकीकरण व जनसंख्या में वृद्धि के कारण पिछले एक दशक में छत्तीसगढ़ के कई जिलों के भूजल स्तर में काफी गिरावट आई है। वहीं रासायनिक उर्वरकों के प्रयोग से भी भूमि प्रदूषित हो रही है। छत्तीसगढ़ के जांजगीर-चांपा जिले की बात करें तो इस जिले में वर्तमान में 10 से अधिक छोटे-बड़े उद्योग लग चुके है, जिससे आम जनजीवन प्रदूषण की मार झेल रहा है। बावजूद इसके राज्य सरकार ने यहां पावर प्लांट लगाने उद्योगपतियों द्वार खोल दिए हैं।

पिछले तीन वर्षो में अकेले जांजगीर-चांपा जिले में मुख्यमंत्री ने 40 से अधिक उद्योगपतियों से पावर प्लांट लगाने एमओयू किए है, जिनके चालू होने के बाद इस जिले की क्या दशा होगी, इसका अंदाजा सहज ही लगाया जा सकता है। इधर व्यापक पैमाने पर औद्योगिक इकाईयों की स्थापना से नदियों का अस्तित्व भी संकट में है। औद्योगिक इकाईयां सिंचाई विभाग व सरकार से किए गए अनुबंध से ज्यादा नदी के पानी का उपयोग करती है, जिसके कारण गर्मी शुरू होने से पहले ही कई नदियां सूख जाती है। वहीं कई उद्योगों द्वारा तो नदियों में कैमिकलयुक्त पानी भी छोड़ा जाता है, जिससे नदी किनारे गांव में रहने वालों को बड़ी मुसीबत झेलनी पड़ती है।

आज 5 जून को देश भर में पर्यावरण दिवस के मौके पर एक बार फिर औपचारिकता निभाई जाएगी। एयरकंडीशनर कमरों में बड़े-बड़े नेता, अधिकारी और सामाजिक संगठन के लोग जुटेंगे, घंटों चर्चा करेंगे तथा फोटो खिंचवाकर सभी समाचार पत्रों में प्रकाशित कराएंगे। दूसरे दिन लोगों को समाचार पत्रों व टीवी चैनलों से पता चलेगा कि कुछ लोगों को देश व जनजीवन की चिंता है, जिन्होंने पर्यावरण को सुरक्षित रखने घंटों सिर खपाया है। क्या वास्तव में इस तरह की औपचारिकता निभाना सही है? हमारे पास शुध्द पेयजल का अभाव है, सांस लेने के लिए शुध्द हवा कम पड़ने लगी है। जंगल कटते जा रहे हैं, जल के स्रोत नष्ट हो रहे हैं, वनों के लिए आवश्यक वन्य प्राणी भी लुप्त होते जा रहे हैं।

आज छत्तीसगढ़ में पर्यावरण सबसे ज्यादा चर्चित मुद्दा है। हम जब पर्यावरण की बात करते हैं तो धरती, पानी, नदियाँ, वृक्ष, जंगल आदि सभी की चिन्ता उसमें शामिल होती है। पर्यावरण की यह चिन्ता पर्यावरण से लगाव से नहीं, मनुष्य के अपने अस्तित्व के खत्म हो जाने के भय से उपजी है। आजकल पर्यावरण की इसी चिन्ता से कुछ नए नए दिवस निकल आए हैं। किसी दिन पृथ्वी दिवस है तो कभी जल दिवस और कोई पर्यावरण दिवस। पिछले दो-तीन दशकों मे हमनें तरह-तरह के दिवस मनाने शुरू किए हैं। पर्यावरण, जल, पृथ्वी, वन, बीज, स्वास्थ्य, भोजन आदि न जाने कितने नए-नए दिवस सरकारी, गैर-सरकारी तौर पर मनाए जाते हैं। मगर विडम्बना यह है कि जिन विषयों पर हमने दिवस मनाने शुरू किए, वे ही संसाधन या चीजें नष्ट होती जा रही हैं।

पर्यावरण के इतिहास पर नजर डाले तो संयुक्त राष्ट्र द्वारा घोषित यह दिवस पर्यावरण के प्रति वैश्विक स्तर पर राजनितिक और सामाजिक जागृति लाने के लिए मनाया जाता है। पर्यावरण दिवस का आयोजन 1972 के बाद शुरू हुआ। सबसे पहली बार 5 से 15 जून 1972 को स्वीडन की राजधानी स्टाकहोम मे मानवी पर्यावरण पर संयुक्त राष्ट्र का सम्मेलन हुआ, जिस में 113 देश शामिल हुए थे। इसी सम्मेलन की स्मृति बनाए रखने कि लिए 5 जून को विश्व पर्यावरण दिवस घोषित कर दिया गया। सवाल तो यह है कि पर्यावरण दिवस के इस दिन का हमसे क्या रिश्ता? क्या 1972 के बाद लगातार पर्यावरण दिवस मना लेने से हमारा पर्यावरण ठीक हो रहा है? यह सोचने वाली बात है।

एक अहम बात यह भी है कि बढ़ते पर्यावरण प्रदूषण से चिंतित सुप्रीम कोर्ट ने एक जनहित याचिका पर सुनवाई करते हुए स्कूल और कालेजों में पर्यावरण शिक्षा को पाठ्यक्रम में अनिवार्य रूप से जोड़ने का निर्देश दिए थे। कोर्ट के आदेश पर पर्यावरण को पाठ्यक्रम में शामिल तो कर लिया गया, लेकिन इससे भी लोगों में कोई जागरूकता नहीं आई। स्कूल-कालेजों में इस विषय पर वर्ष भर किसी तरह की पढ़ाई नहीं होती, जबकि परीक्षा में सभी को मनचाहे नंबर जरूर मिल जाते हैं। बहरहाल, आज पर्यावरण संतुलन की उपेक्षा जिस तरह से हो रही है, उससे कहीं ऐसा न हो कि एक दिन इस भयंकर भूल का खामियाजा हमें और हमारी भावी पीढ़ी को भुगतना पड़े।



छत्तीसगढ़ के स्वतंत्र पत्रकार और समसामयिक मसलों पर लगातार लेखन.