May 4, 2011

प्रेमी युगल को जान का खतरा


संजीव कुमार
 
सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बावजूद प्रेम विवाह करने वाले प्रेमियों को पंचायत में जारी होने वाले तालिबानी फरमानों का डर बना हुआ है. प्रेमी जोड़ों को अपनी हत्या का फरमान मिलने के बाद अब केवल पुलिस प़र ही विश्वास बना हुआ है.एसा ही एक नजारा देखने को मिला जनपद मुज़फ्फरनगर के वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक कार्यालय में. यहाँ एक प्रेमी जोड़े ने पंचायती  फरमान से अपनी जान को खतरा बताया  है. इस प्रेमी युगल ने घर और समाज की प्रवाह किये बिना शादी की है. दोनों के धर्म अलग-अलग होने के कारण लड़की पक्ष के लोगों ने लड़का और लड़की दोनों का बहिष्कार कर उन्हें मारने का फरमान भी जारी कर दिया है .

 
पुलिस अधीक्षक के कार्यालय पहुंचे सोनिया और जगमोहन
दरअसल, जनपद मुज़फ्फरनगर के थाना मीरपुर के गाँव कशामपुर निवासी जगमोहन हरिद्वार रहकर शिक्षा ग्रहण कर रहा था, उसी कालेज में पढने वाली सोनिया (परिवर्तित नाम ) भी पढ़ती थी, दोनों को कब प्यार हो गया, उन्हें मालूम ही नहीं चला. जगमोहन ब्राह्मण परिवार से है और सोनिया मुस्लिम परिवार से है. दोनों के अलग-अलग धर्म के होने के बावजूद जगमोहन और सोनिया एक दूसरे को दिलोजान से भी ज्यादा प्यार करते है.  दोनों की इस प्रेम कहानी को एक साल बीत गया तब  सोनिया और जगमोहन के परिजनों को मालूम पड़ा और  परिजनों ने इनके मिलने प़र पाबन्दी लगा दी .

लेकिन परिवार की मर्जी के खिलाफ जाकर घर से भागकर शुक्रताल में हिन्दू रीति-रिवाज से शादी कर ली. उसके बाद इलाहाबाद हाईकोर्ट से शादी का स्टे भी ले लिया. इस शादी का पता जब दोनों के परिवार वालो को लगा तो गाँव में एक पंचायत बुलाई गई. इस पंचायत में उन दोनों को सजा के तौर प़र गाँव बिरादरी से बेदखल कर दिया. इसी के साथ जगमोहन और सोनिया को  हिदायत दे दी गयी कि  अगर गलती से भी दोनों ने गाँव में पैर रखा तो जान से मार दिया जायेगा.पंचायती फरमान जारी होने के बाद दोनों प्रेमी 4 अप्रैल यानि बुधवार  को वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक कार्यालय  मुज़फ्फरनगर आये और उनसे अपनी सुरक्षा की गुहार लगायी. गौरतलब है कि सोनिया ने जगमोहन से शादी कर हिन्दू धर्म अपना लिया है और अब सोनिया जगमोहन के साथ रहकर वैवाहिक जीवन जीना चाहती है.


संक्रमण काल की जलेबी अब सड़ने लगी है कामरेड

संक्रमण काल से हमेशा गरीब जन ही क्यों परेशान हों, जबकि एक 'सर्वहारा' प्रधानमंत्री बन चुका है और एक 'गरीब का छोरा' अर्थ मंत्री. यह वही 'सर्वहारा' प्रधानमंत्री है जिसने मातृका यादव को सिर्फ इसलिए कार्रवाई करने की धमकी दी थी क्योंकि उन्होंने संक्रमणकाल में सामंती ठेकेदारों को'तकलीफ' पहुंचाई थी और गरीबों द्वारा युद्धकाल में कब्जाई जमीन को सामंतों को लौटाने के 'प्रचंड'फतवे को अनदेखा किया था...

नीलकंठ के सी

आनंद स्वरुप वर्मा का लेख 'क्या माओवादी क्रांति की उल्टी गिनती शरू हो गई है'अपनी अंतर्वस्तु में जितना प्रतिक्रियावादी था उसका बचाव 'प्रचंड मुग्धता नहीं, शीर्ष को बचाने की कोशिश' अपने सार में उतना ही खतरनाक है. यह कुछ वैसा ही है जैसा एक झूठ से बचने के लिए एक हज़ार झूठ गढ़ना.उनके लेख को छानने-खंगालने पर जो बातें स्पष्ट होती हैं, उससे पता चलता है कि वर्मा जी ने अपना लेख 'आवेग' में नहीं, बल्कि पूरी तसल्ली से लिखा है. वे पूरी तरह अपने लेख की प्रस्थापनाओं से सहमत हैं,उसके साथ खड़े हैं.मैंने अपने लेख में उनके दृष्टिकोण पर कुछ सवाल उठाये थे,जिनका जवाब उन्होंने नहीं दिया.इसका मतलब मैं यह लगा रहा हूँ कि वे उनसे सहमत हैं.अब आगे उन प्रस्थापनाओं पर अपनी बात रखने का प्रयास करूंगा जिन पर वे असहमत हैं.

'शीर्ष को बचाने की कोशिश' लेख के पहले पॉइंट में आनंद जी कहते हैं ' नेपाली क्रांति अभी जारी है, फिलहाल संघर्ष का मोर्चा बदल गया है.'क्रांतियों का इतिहास जानने वाले लोग समझते हैं कि क्रांतियाँ एक बने-बनाये सीधे रास्ते पर आगे नहीं चलती, बल्कि लगातार ऊपर-नीचे, दायें- बाएं होती हैं. नेपाल में भी जनयुद्ध से पहले माओवादी पार्टी संसद में गई और बाद में उससे बाहर आकर जनयुद्ध को संचालित किया. वर्ष 2006 में वह फिर संसद में शामिल हुई और संविधान सभा के चुनाव में प्रतिस्पर्धा की.लेकिन इस बार एक बड़ी पार्टी होने के बावजूद उसे लगातार विफलता का सामना करना पड़ रहा है (विफलताओं की चर्चा आगे),तो क्या अब एक बार फिर उसे मोर्चा नही बदलना चाहिए या फिर इसे ‘भाग्य’ मानकर क्रांति का आत्मसमर्पण कर देना चाहिए? उसी पॉइंट में वर्मा जी ने लिखा है,'नेपाली क्रांति का नेतृत्व समूह और एक एक कार्यकर्ता भी यही कहता है कि ‘क्रांति जारी छ (है).सवाल यह है कि क्या अन्य सभी संसदीय वाम पार्टियाँ भी ऐसा ही नही कहती. चीन, क्यूबा, उत्तर कोरिया में भी क्रांति जारी है, भारत में भी सीपीआई इसे जारी रखे हुए है तो फिर माओवादी ही क्यों खुद को क्रांतिकारी शब्द से अलंकृत करें.क्यों उसका नेता प्रचंड क्रांतिकारी कहलाये. जी हाँ 'क्रांति जारी छ' और यह ‘अनंत’ तक जारी रह सकती है, लेकिन मुख्या सवाल इसे पूरा करने का है.

आनंद जी दूसरा पॉइंट इस तरह शुरू करते हैं,'जनयुद्ध से संविधान सभा के जरिए सत्ता हासिल करने का शांतिपूर्ण संक्रमण किसी अर्द्धसामंती और अर्द्धऔपनिवेशिक देश में किया जाने वाला पहला प्रयोग है और इसकी वजह से कई तरह के विभ्रम का पैदा होना स्वाभाविक है। परंपरागत तौर पर अतीत में जो क्रांतियां संपन्न हुई हैं उनमें ऐसी विशिष्ट स्थिति नहीं थी...'यह 'सत्ता हासिल करने का शांतिपूर्ण संक्रमण'क्या है भाई?बहुत कोशिश के बाद भी मै इसे नहीं समझ पाया इसलिए 'मुंह में शब्द डालने'का खतरा उठाते हुए भी यह कहने का साहस करूँगा कि संविधान सभा में जाना सत्ता हासिल करने का मौलिक प्रयास था या है तो सही है, लेकिन यदि 'संक्रमण' की बात है तो फिर यह एमाले और अन्य संसदीय पार्टियों से माओवादी को अलग कैसे करता है? एमाले भी तो संसद में जाने और वहा बने रहने को 'संक्रमण' काल के रूप में ही तो देखती-दिखाती है! एक महत्वपूर्ण सवाल है कि नेपाल की क्रांति अन्य क्रांतियों से विशिष्ट कैसे है? सिर्फ इसलिए कि प्रचंड और बाबूराम ऐसा मानते हैं! इसे बार-बार विशिष्ट कहना इसके संशोधनवादी रास्ता लेने को जायज बताने का 'अतिविशिष्ट' प्रयास ही है.

पॉइंट3,4 और 5 तथ्य हैं इसलिए अविवादित हैं, लेकिन छठे पॉइंट में फिर घपला है. आनंद जी लिखते हैं कि 'पीएलए का समर्पण नहीं किया गया है'.यदि ऐसा है तो 22जनवरी को पीएलए को संसदीय समिति के मातहत करने के कार्यक्रम में प्रचंड ने ऐसा क्यों कहा, 'अब पीएलए एक नए दौर में पहुँच गई है, जहाँ से वह किसी के प्रति पूर्वाग्रह नहीं रखेगी.'एक वर्गीय सेना का किसी के प्रति पूर्वाग्रह न रखने के क्या माने हैं?उसी दिन पीएलए ने अपने कान्तोंमेंट में अपना झंडा उतारकर नेपाल 'राष्ट्र' का झंडा फहराया था! अब तो सेना द्वारा एक नया संगठन बनाकर पीएलए को उसमें शामिल करने के सुझाव को प्रचंड 'सकारात्मक' मानते हैं. यह सकारात्मक पहल उस शांति समझौते के खिलाफ है जहाँ सेना का लोकतंत्रीकरण और पीएलए का उसमें विलय का प्रस्ताव था.वर्मा जी,इसे किस भाषा में समर्पण नहीं कहा जाता?
 सातवाँ पॉइंट नेपाल के माओवादी आन्दोलन की एक महत्वपूर्ण साथ ही 'रहस्यमयी' कड़ी से जुड़ा है जहाँ से आन्दोलन एक नए और अब विवादित प्रक्रिया में प्रवेश करता है, इसलिए इस पर थोडा कहना उचित होगा.

चुनवांग बैठक में पारित दस्तावेज सिर्फ इस लिहाज़ से ही तो महत्वपूर्ण है कि इसने माओवादी पार्टी को सार्वजनिक किया और राजतन्त्र के खिलाफ अन्य संसदवादी पार्टियों से इसके सहकार्य को सहज बनाया.इसके अलावा यह दस्तावेज अन्य दस्तावेजों से अधिक महत्वपूर्ण तो बिलकुल नहीं है,फिर बार-बार इसका हवाला देने का उद्देश्य क्या है? क्या इसके बाद दूसरे दस्तावेज पारित नहीं हुए?क्यों उन दस्तावेजों की अनदेखी की जाती है?क्या खरिपति और पलुन्ग्तार में नए दस्तावेज पर सहमति नहीं बनी जिसमें जनविद्रोह की लाइन को पारित किया गया था.इस पूरे प्रकरण को देखने से पता चलता है कि वर्मा जी, बाबूराम और प्रचंड केवल उसी दस्तावेज को मान्यता देते हैं जो संशोधनवाद के लिए रास्ता तैयार करता है और पार्टी को संसदीय जाल में फंसाए रखता है.जब हम कहते हैं कि यह भारतपरस्ती है तो इसमें गलत क्या है?

क्या यह बात किसी से छुपी है कि चुनवांग में पारित दस्तावेज भारत की मान्यता प्राप्त करने का आधार निर्माण करता है. हमेशा चुनवांग के दस्तावेज से नए दस्तावेज को ख़ारिज करने का कारण क्या है? जबकि होना चाहिए कि पुराना दस्तावेज नये द्वारा निषेध होता. यह अलग चर्चा का विषय है कि चुनवांग दस्तावेज कितना प्रतिक्रियावादी था, लेकिन उसकी एक प्रस्थापना को उधृत करना ठीक होगा,'संक्रमणकालीन गणतंत्र को बुर्जुआ वर्ग बुर्जुआ संसदीय गणतंत्र में बदलने का प्रयास करेगा और सर्वहारा वर्ग की हमारी पार्टी इसे जनवादी गणतंत्र में बदलने का प्रयास करेगी. संक्रमण काल की अवधि कितनी लम्बी या छोटी होगी इस बात को अभी पूरे यकीन से नहीं कहा जा सकता.' कोई भी जागरूक पाठक यहाँ शब्दों की जादूगरी को आसानी से समझ सकता है. संक्रमणकाल को 'अनंत' बताकर संसदीय व्यवस्था में बने रहने के जबर्दस्त खेल को यहाँ आसानी से समझा जा सकता है.

अब एक सरसरी नज़र संविधान सभा में माओवादियों की उपलब्धियों पर.वर्मा जी उपलब्धियों के नाम पर जिन चीजों को गिनाते हैं वे हैं : 'जनयुद्ध का सफल' होना, 'राजतन्त्र का समाप्त' होना, 'संविधान सभा के चुनाव' होना, 'कोई माओवादी का प्रधानमंत्री बन' जाना.

इससे साफ़ है कि वर्मा जी जनयुद्ध के सफल होने को राजतन्त्र के समाप्त होने और प्रचंड का प्रधानमंत्री हो जाने में देखते हैं.लेकिन वे यह क्यों नहीं देख पाते कि नेपाल का आमजन आज भी उन्हीं परिस्थित्तियों में जीने को विवश है और कई मामलो में तो जनयुद्ध से पूर्व और उस दौरान की स्थित्तियों से भी बदतर हालात में.अब इसे संक्रमणकाल की 'विशेषता' कहकर ख़ारिज किया जा सकता है, लेकिन हम यह पूछना चाहते हैं कि संक्रमण काल से हमेशा गरीब जन ही क्यों परेशान हों? इस काल में पूंजीपति और सामंती तो बिलकुल परेशान नहीं हैं. जबकि एक 'सर्वहारा' प्रधानमंत्री बन चुका है और एक 'गरीब का छोरा'अर्थ मंत्री.यह वही 'सर्वहारा'प्रधानमंत्री है जिसने मातृका यादव को सिर्फ इसलिए कार्रवाई करने की धमकी दी थी, क्योंकि उन्होंने संक्रमणकाल में सामंती ठेकेदारों को 'तकलीफ'पहुंचाई थी और गरीबों द्वारा युद्धकाल में कब्जाई जमीन को सामंतों को लौटने के 'प्रचंड' फतवे को अनदेखा किया था! अब वे पार्टी में नहीं हैं और जमीन लौटा दी गयी है. 

जब वर्मा जी कहते हैं कि कटवाल प्रसंग के बाद भारत का हस्तक्षेप बढ़ा है तो वे क्यों इस निष्कर्ष पर नहीं पहुँचते कि जब तक पार्टी क्रान्तिकारी थी तब तक उसे कोई भी शक्ति मजबूर नहीं कर पा रही थी.उन्हें यह भी निष्कर्ष निकालना आना चाहिए था कि संविधान सभा से कुछ भी हासिल नहीं हो सकता, सिवाए अपमान के. इसी सन्दर्भ में वर्मा जी ने जिन बातों को छिपाया है वे हैं : संविधान सभा की उप समितियों में (एक या दो के अलावा) माओवादी पार्टी के सदस्य शीर्ष में नहीं हैं बाबजूद इसके कि वह सबसे बड़ी पार्टी है, लाख प्रयत्न के बाबजूद 'जनयुद्ध' शब्द को संविधान के मूल मसौदे में शामिल नहीं किया जा सका है, समझौते के विपरीत पीएलए का नेपाली सेना में समायोजन नहीं होने जा रहा है,नेपाली सेना के लोकतंत्रीकरण के समझौते को लागू नहीं किया गया है,बल्कि उसे और भी अधिक हथियारों से सशक्त किया जा रहा है,जनयुद्ध के समय कब्जे में ली गई जमीन लौटा दी जा रही है,जनसरकार का विघटन कर दिया गया है, वाईसीएल का अर्धसैनिक स्वरूप भंग कर दिया गया है, जन कम्यून भंग हो चुके हैं, आदि आदि.

इसके बाद लेख में उनके मुंह में शब्द डालने की बात जो वे कह रहे हैं एकदम गलत है. उनका लेख जनज्वार पर है, वे खुद इसे पढ़ सकते हैं.उन्होंने लिखा है,'मैंने कभी यह नहीं कहा कि माओवादियों का लक्ष्य 'शांति प्रक्रिया को पूरा करना है, संविधान बनाना है, ... मैंने अपने लेख में यह कहा था कि एक तरफ तो आप (प्रचण्ड) यह कहते हैं कि शांति प्रक्रिया को पूरा करना है, संविधान बनाना है... और दूसरी तरफ कार्यकर्ताओं की आंतरिक बैठकों में विद्रोह की बात करते हैं.’ हमारा उनसे सवाल है कि क्या लेख में उनका जोर इस बात पर नहीं है कि प्रचंड को विद्रोह की बात नहीं करनी चाहिए. प्रचंड के विद्रोह की बात करने से उन्हें क्यों इतना 'दुः' हुआ, जबकि एक समाजवादी होने के नाते वे इस बात से 'खुश' हो सकते थे कि प्रचंड विद्रोह को जायज मान रहे हैं. और किरण को लफ्फाज न मानने की उनकी दलील गले नहीं उतरती क्योंकि शब्दकोष के अनुसार 'योटोपिया' पर विश्वास करने वाले को 'लफ्फाज' ही कहा जाता है. और चुनवांग के दस्तावेज को ऐतिहासिक कहने वाले को इसके रचनाकार को 'दूरदर्शी' तो मानना ही चाहिए.

उन्होंने अपने लेख में कहा है कि 'प्रचण्ड और बाबूराम दोनों ने अपने इंटरव्यू में कहा है कि हम शांति प्रक्रिया को पूरा करने का प्रयास करेंगे और अगर इसमें रुकावट पैदा की गयी तो विद्रोह में जाएंगे.' यह एकदम गलत बयान है, जबकि बाबूराम किसी भी हाल में विद्रोह में जाने की बात नहीं करते. और करते भी हैं तो सिर्फ इसलिए कि पार्टी के दस्तावेजों में अभी भी विद्रोह एक लाइन के बतौर पास है. बाबूराम की समझ क्या है इसके लिया जनज्वार में ही प्रकाशित अजय प्रकाश द्वारा लिए उनके साक्षात्कार को पढ़ा जा सकता है.जब अजय प्रकाश ने उनसे पूछा,'क्या माओवादी पार्टी फिर से जनयुद्ध के रास्ते पर लौट सकती है?'  तो उनका जवाब था, 'बहुत ज्यादा दमन की स्थिति में थोडे़ दिनों के लिए पार्टी बचाव में ऐसा कर सकती है,मगर पहले की तरह 10-12साल के लिए जनयुद्ध के रास्ते पर अब नेपाली माओवादी नहीं लौटेंगे। हमारे पास 2003के बाद  कई ऐसे उदाहरण हैं जिनसे साफ हो गया था कि हम लोग सैन्य मामलों में नेपाली सेना को मात नहीं दे सकते।'

अब ऐसे व्यक्ति का जो 2003 से ही मान चुका है कि 'हम लोग सैन्य मामलों में नेपाली सेना को मात नहीं दे सकते' वह किस तरह किसी भी हाल में संविधान बनाने को उतारू नहीं होगा?क्या ऐसा पढने के बाद जनयुद्ध के प्रति उनके अविश्वास को नहीं समझा जा सकता? क्या हम ऐसा मानने में गलती कर रहे हैं कि माओवादी नेतृत्व (चुनवांग बैठक के वक्त बाबूराम और प्रचंड ही नेतृत्व माने जाते थे क्योंकि किरण, गौरब और अन्य कैद में थे) हालाँकि हारकर नहीं तो कम से कम जनता पर अविश्वास के कारण संसद में आया है जबकि दोनों ही संविधान सभा को जनता की जीत की तरह प्रस्तुत करते हैं. और जब किरण इसी लाइन की समीक्षा की बात करते है तो वे जड़सूत्रवादी-हार्ड लाइनर क्यों हो जाते हैं?

आगे वे लिखते हैं कि प्रचंड को यह बताना कि 'उनके वैचारिक विचलन के कारण ही आत्मगत तैयारी कम हुई है' उनका काम नहीं है क्योंकि, 'मैं आपकी पार्टी का सदस्य नहीं हूं.' तो फिर वर्मा जी यह बताइए कि प्रचंड को यह सलाह देते वक्त कि 'आपको साहस से यह कहना होगा कि किरण जी,आप एक यूटोपिया में जी रहे हैं और यथार्थ से बहुत दूर हैं. नेपाल का यथार्थ आज यही है कि किसी भी तरह संविधान निर्माण का काम पूरा किया जाए और एक दुष्चक्र में फंसी राजनीति को आगे बढ़ाया जाए' आपको पार्टी की सदस्यता की जरूरत क्यों नहीं पड़ी? ऐसा तो नहीं है कि एक बात रखने के लिए सदस्यता की जरूरत हो और दूसरी के लिए नहीं.

जब वे कहते हैं कि ऐसा वे शीर्ष को बचाने के लिए कर रहे हैं तो हमारी उस बात को पुष्ट नहीं करते, जब पिछले लेख में कहा गया था कि वे प्रचंड को नेपाली क्रांति का पर्यायवाची मानते हैं.वर्मा जी के लिए शीर्ष सिर्फ प्रचंड हैं.वे किरण और अन्य को नहीं बचाना चाहते.उनके लिए शीर्ष को बचाने का मतलब है लगातार ये साबित करना कि प्रचंड तो भारत की गुलामी करने को तैयार है लेकिन किरण रोके पड़ा है. भारत का दुश्मन प्रचंड नहीं, बल्कि किरण है. 'प्रचंड तो शांतिदूत है' (ये मेरे शब्द हैं), 'किरण ही जड़सूत्रवादी है'( यह भी मेरे शब्द हैं) और यदि आप प्रचंड को प्रधानमंत्री नहीं बनने देंगे तो किरण के पक्ष को मजबूती मिलेगी.इसे साबित करवाने के लिए वे प्रचंड से गुहार लगाते हैं कि, 'आपको साहस से यह कहना होगा कि किरण जी,आप एक यूटोपिया में जी रहे हैं और यथार्थ से बहुत दूर हैं'.अपने उस कथन के खिलाफ जाते हुआ कि वे पार्टी सदस्य नहीं हैं और गलती बताना उनका काम नहीं है वे कहते हैं कि,'मैं अपना यह भी अधिकार मानता हूं कि अगर कोई विचलन दिखायी देता है तो उसे इंगित करूं और तभी मैंने यह लेख लिखा.'मेरा सवाल है कि वर्मा जी को तभी विचलन क्यों दिखाई देता है जब पार्टी में किरण का पक्ष मजबूत होता है.और जब बाबूराम और प्रचंड एक हो जाते हैं उनकी नज़र में तो सब कुछ ठीक क्यों होने लगता है.वर्मा जी यह 'प्रचंड मुग्धता'ही है यह 'शीर्ष को बचाने की कोशिश' तो बिलकुल भी नहीं है.

अंत में मैं स्पष्ट करना चाहता हूँ कि लेख में छपी टिप्पणी के लिया यह लेखक जिम्मेदार नहीं है.और मैं यह भी नहीं मानता कि आपने यू टर्न लिया है. मेरा मानना है कि आप जिस गाड़ी की पिछली सीट में बैठे हैं, उसके ड्राइवर ने गाड़ी को गंतव्य की दिशा से भटका दिया है. और जैसे ही आप नींद से उठेंगे (यदि आप सच में सो रहे हैं तो) ड्राइवर को इसके लिए डांटेंगे जरूर. दूसरी बात मैंने आपकी टिप्पणी को 'नस्लीय' और 'उग्र राष्ट्रवादी' कहा है, न कि आपको. यदि आपको ये व्यक्तिगत लगा तो इसे भाषा की मेरी कमजोर जानकारी कह सकते हैं. इसके लिए मैं आत्मालोचित हूँ.

(लेखक नेपाली एकता मंच दिल्ली राज्य के सदस्य हैं. )


 नेपाल के राजनीतिक हालात और नेपाली माओवादी पार्टी की भूमिका को लेकर आयोजित इस बहस में अबतक  आपने पढ़ा -  

 
 

May 2, 2011

प्रचंड मुग्धता नहीं, शीर्ष को बचाने की कोशिश

 नेपाल के राजनीतिक हालात और नेपाली माओवादी पार्टी की भूमिका को लेकर आयोजित इस बहस में   1-क्या माओवादी क्रांति की उल्टी गिनती शुरू हो गयी है? ,,2-क्रांतिकारी लफ्फाजी या अवसरवादी राजनीति  , 3- दो नावों पर सवार हैं प्रचंड  और    'प्रचंड' आत्मसमर्पणवाद के बीच उभरती एक धुंधली 'किरण'  के बाद अब  आनंद स्वरुप वर्मा ने जवाब लिखा है. उम्मीद है उनका यह जवाब बहस को सुगठित करेगा और हम नेपाली माओवादी पार्टी के  रणनीतिक विकल्पों को और व्यावहारिक  हो समझ सकेंगे...मॉडरेटर


प्रचण्ड और बाबूराम दोनों ने अपने इंटरव्यू में कहा है कि हम शांति प्रक्रिया को पूरा करने का प्रयास करेंगे और अगर इसमें रुकावट पैदा की गयी तो विद्रोह में जाएंगे। मुझे इन दोनों के कथन में कोई विरोधाभास  नहीं दिखायी देता फिर मेरे ‘यू टर्न’लेने की बात कहां से पैदा हुई...


आनंद स्वरूप वर्मा

जनज्वार में मेरे लेख 'क्या माओवादी क्रांति की उलटी गिनती शुरू हो गई' को लेकर जो  प्रतिक्रियाएं आयी हैं उन पर विस्तार से जवाब देने का मेरे पास अभी समय नहीं है, क्योंकि मैं एक सप्ताह के लिए दिल्ली से बाहर जा रहा हूं। पूर्वी उत्तर प्रदेश के जिस हिस्से में मैं रहूंगा वहां बिजली संकट के कारण और अपनी पारिवारिक व्यस्तता के कारण इंटरनेट की सुविधा का इस्तेमाल भी नहीं कर पाऊंगा इसलिए जो कुछ लिखना है वह वापस दिल्ली लौटने पर ही संभव है। फिर भी कुछ तथ्यों को पाठकों की जानकारी के लिए रखना चाहता हूं:

1. मैंने शुरू से यह कहा है और अपने लेखों के जरिए बार-बार इस पर जोर दिया है कि राजतंत्र की समाप्ति के साथ नेपाली क्रांति का महज एक चरण पूरा हुआ है। नेपाली क्रांति अभी जारी है लेकिन फिलहाल संघर्ष का मोर्चा बदल गया है। यह तब तक जारी रहेगी जब तक नेपाल की सामाजिक संरचना में आमूल परिवर्तन न हो जाए जो कि माओवादियों का घोषित लक्ष्य है और यह लक्ष्य उन्हें   समाजवाद के चरण में ले जाएगा। नेपाली क्रांति का नेतृत्व समूह और एक एक कार्यकर्ता भी यही कहता है कि ‘क्रांति जारी छ (है)।’

2. जनयुद्ध से संविधान सभा के जरिए सत्ता हासिल करने का शांतिपूर्ण संक्रमण किसी अर्द्धसामंती और अर्द्धऔपनिवेशिक देश में किया जाने वाला पहला प्रयोग है और इसकी वजह से कई तरह के विभ्रम का पैदा होना स्वाभाविक है। परंपरागत तौर पर अतीत में जो क्रांतियां संपन्न हुई हैं उनमें ऐसी विशिष्ट स्थिति नहीं थी इसलिए कहा जा सकता है कि नेपाल में यह एक प्रयोग है जो सफल होगा या असफल यह इस बात पर निर्भर करता है कि क्रांतिकारी शक्तियां कितनी कुशलता से नए अंतर्विरोधों और नयी समस्याओं का समाधान कर सकती हैं। यह कोई नहीं कहता कि राजतंत्र की समाप्ति के साथ नेपाल की क्रांति का कार्यभार पूरा हो गया। जाहिर है कि मैं भी ऐसा नहीं मानता।

3. नेपाल की राजनीति में भारत का हस्तक्षेप कोई नयी बात नहीं है। निकट अतीत के इतिहास को देखें तो राजा त्रिभुवन के समय से ही यह हस्तक्षेप जारी है। 1950में संपन्न दिल्ली समझौता (जिसके बाद राणाशाही समाप्त हुई और राजा त्रिभुवन के रूप में शाह वंश को फिर से स्थापित किया गया) के खिलाफ नेपाल के अंदर वे ताकतें सक्रिय थीं जो किसानों के बीच संघर्ष चला रही थीं और जिन्होंने दिल्ली समझौता को पूरी तरह खारिज किया था। यह प्रतिरोध इतना उग्र था कि भैरहवा में डा. के.आई.सिंह और उनके साथियों के नेतृत्व में चल रहे संघर्ष का दमन करने के लिए भारतीय सेना वहां पहुंची  थी। भीम दत्त पंत के समय भी यह स्थिति देखने को मिली थी।

4. महाराजा महेन्द्र ने जब बी.पी.कोइराला की निर्वाचित सरकार को भंग किया, कोइराला को जेल में डाला और निरंकुश पंचायती व्यवस्था की स्थापना की,उस समय भी महेन्द्र को भारत का पूरा समर्थन प्राप्त था। महेन्द्र के बाद बीरेन्द्र के शासनकाल में भी पंचायती व्यवस्था जारी रही और भारत के साथ मधुर  संबंध बने रहे। कहा जा सकता है कि भारत के समर्थन से ही 30वर्षों तक निरंकुश पंचायती व्यवस्था बनी रही।

5. 1990 में बहुदलीय व्यवस्था कायम होने के बाद नेपाल में संवैधानिक राजतंत्र की स्थापना हुई और भारत ने ‘दो स्तंभों का सिद्धांत’घोषित किया। इसका कहना था कि नेपाल का विकास संवैधानिक राजतंत्र और बहुदलीय प्रजातंत्र के जरिए ही संभव है। माओवादियों ने इस सिद्धांत का हमेशा विरोध किया और कहा कि किसी भी रूप में राजतंत्र का बने रहना नेपाली जनता के हित में नहीं है।

6. 1996 में जिस जनयुद्ध की शुरुआत हुई उसका घोषित लक्ष्य नेपाल में नवजनवादी क्रांति को संपन्न करना था। यह लक्ष्य आज भी बना हुआ है-फर्क इतना है कि सशस्त्र संघर्ष को अभी विराम दे दिया गया है लेकिन पीएलए का समर्पण नहीं किया गया है जैसा कि कुछ खेमों द्वारा प्रचारित किया जाता है। पीएलए के हथियार एक कंटेनर में अभी भी रखे हुए हैं जिनकी चाबी माओवादी नेतृत्व के पास है। पहले इसकी देखरेख ‘अनमिन’(यूनाइटेड नेशंस मिशन इन नेपाल)करती थी लेकिन अनमिन के जाने के बाद अब यह काम एक संसदीय समिति कर रही है जिसमें माओवादी पार्टी के भी प्रतिनिधि हैं।

7. 2005 में चुनवांग बैठक में लिए गए फैसले के अनुसार माओवादियों ने बुर्जुआ राजनीतिक पार्टियों  के साथ 12 सूत्री समझौता किया और इसी प्रक्रिया को आगे बढ़ाते हुए 2006 का व्यापक शांति समझौता, अंतरिम सरकार का गठन, संविधन सभा का चुनाव, राजतंत्र की समाप्ति आदि संपन्न हुए। चुनवांग बैठक में यह राय बनी थी कि राजतंत्र की समाप्ति और गणराज्य की घोषणा के बाद जो नयी परिस्थिति पैदा होगी उसमें बुर्जुआ ताकतें इस गणराज्य को पूंजीवादी गणराज्य का रूप देना चाहेंगी और हम यानी माओवादी यह प्रयास करेंगे कि इसे सही अर्थों में जनता का गणराज्य बनाया जाए।

8. गणराज्य की स्थापना के बाद अंतर्विरोधों का स्वरूप बदल गया लेकिन राज्य का वर्ग चरित्र नहीं बदला और वह अर्द्ध सामंती तथा अर्द्ध औपनिवेशिक बना रहा। अब एक तरफ माओवादी और दूसरी तरफ सामंतवाद का प्रतिनिधित्व करने वाली नेपाली कांग्रेस और एमाले का एक हिस्सा सामने आ गए। लड़ाई सामंतवाद को समाप्त करने की दिशा लेने लगी। सामंतवादी ताकतों का प्रतिनिधित्व करने वाली पार्टियों को भारत के शासक वर्ग का भरपूर समर्थन मिला जो अभी भी जारी है। यही वजह है कि भारत का शासक वर्ग किसी भी हालत में यह नहीं देखना चाहता कि नेपाल में माओवादियों का अस्तित्व बना रहे। सैद्धांतिक कारणों से अमेरिका भी यह नहीं चाहता और यहां अमेरिका तथा भारतीय शासक वर्ग के हित समान हो गए हैं।

9. मेरा यह मानना है और जिसे मैंने अपने लगभग हर लेख और इंटरव्यू में कहा है कि अगर नेपाल की जनता की एकजुटता बनी रही और नेपाली क्रांति का नेतृत्व करने वाली पार्टी में किसी तरह का सैद्धांतिक विचलन नहीं आया तो भारत और अमेरिका की हर साजिश को विफल किया जा सकता है। क्या भारत और अमेरिका ने कभी चाहा था कि जनयुद्ध सफल हो?क्या कभी चाहा था कि राजतंत्र समाप्त हो?क्या कभी चाहा था कि संविधान सभा के चुनाव हों?क्या कभी चाहा था कि संविधान सभा के चुनाव में माओवादी सबसे बड़ी पार्टी के रूप में उभर कर आ जाएं? और क्या कभी चाहा था कि कोई माओवादी नेपाल का प्रधानमंत्री बन जाए? लेकिन उसके न चाहने के बावजूद यह सारा कुछ इसलिए संभव हो सका क्योंकि नेपाल की जनता एकजुट थी और उसके संघर्ष को नेतृत्व देने वाली पार्टी दृढ़ता के साथ अपने एजेंडा को लागू करने में लगी थी। भारत का पलड़ा कटवाल प्रसंग के बाद से भारी हुआ और उसके बाद लगातार इसका हस्तक्षेप बढ़ता गया जिसका अत्यंत फूहड़ स्वरूप प्रधानमंत्री पद के चुनाव के समय तब देखने को मिला जब पूर्व विदेश सचिव श्याम शरण चुनाव के दौरान नेपाल गए और मधेसी पार्टियों के नेताओं को समझाया कि वे माओवादियों के पक्ष में मतदान न करें। गलत या सही,पर मुझे बराबर यह लगता है कि पार्टी की आंतरिक कमजोरी के कारण भारत एक हद तक हाबी हो सका।

उपरोक्त बातें मैंने बराबर कहीं हैं और पिछले 3महीनों के नेपाली अखबारों/पत्र-पत्रिकाओं मसलन ‘जनादेश’, ‘मासिक कोशी’, ‘सुखानी आवाज’, ‘नया पत्रिका’ आदि में प्रकाशित हुई हैं। फरवरी 2011 में काठमांडो के ‘एबीसी चैनल’ द्वारा प्रसारित अपने इंटरव्यू में भी मैंने इन बातों को दुहराया है जिस पर काठमांडो स्थित भारतीय दूतावास ने उक्त चैनल पर परोक्ष रूप से दबाव डालने की कोशिश की कि इस इंटरव्यू का दुबारा प्रसारण न किया जाए। यह अलग बात है कि चैनल ने लगातार इसका प्रसारण किया।

इन बातों के कहने का मकसद यह है कि नीलकंठ के सी ने अपने लेख में मेरी बातों को संदर्भ से अलग कर मुझे कटघरे में खड़ा करने का प्रयास किया है। पहले तो यह मैं बता दूं  कि अपने लेख की शुरुआत में,यद्यपि प्रशंसा के भाव से उन्होंने बताया है कि मैंने खुद को ‘पत्रकार के दायरे से बाहर नहीं निकाला’,वह गलत है। मैंने कभी पत्रकारिता के बने बनाए दायरे को नहीं माना और पत्रकार की ऐक्टिविस्ट की भूमिका पर हमेशा जोर दिया। जिन दिनों दक्षिण अफ्रीका के नस्लवाद के खिलाफ मैं लिखता था उन दिनों भी ब्रिटिश दूतावास के बाहर उसकी दक्षिण अफ्रीकी नीति के खिलाफ प्रदर्शनों का आयोजन भी करता था। 1990 में पंचायती व्यवस्था के खिलाफ संघर्ष कर रही जनता के पक्ष में मैं लिखता भी रहा और नेपाली दूतावास के बाहर धरना-प्रदर्शन का आयोजन भी करता रहा। जनयुद्ध के पक्ष में लिखते समय भी मेरी यह भूमिका बरकरार रही और एक मौके पर तो अपने साथियों के साथ मैं गिरफ्तार भी हुआ। इसलिए यह कहना कि पहली बार पत्रकारिता के दायरे से बाहर निकला हूं गलत है।

लेख के तीसरे पैराग्राफ में उन्होंने खुद ही कुछ शब्द मेरे मुंह में डाल दिए हैं और फिर उन पर अपने तर्क की इमारत खड़ी की है। मैंने कभी यह नहीं कहा कि माओवादियों का लक्ष्य ‘शांति प्रक्रिया को पूरा करना है, संविधान बनाना है, ...’मैंने अपने लेख में यह कहा था कि ‘एक तरफ तो आप (प्रचण्ड) यह कहते हैं कि शांति प्रक्रिया को पूरा करना है, संविधान बनाना है... और दूसरी तरफ कार्यकर्ताओं की आंतरिक बैठकों में विद्रोह की बात करते हैं।’फिर नीलकंठ जी को यह कंफ्यूजन कैसे हो गया कि ‘आनंद स्वरूप वर्मा ने भूल से ऐसा लिख दिया।’इसी तरह मैंने किरण को ‘लफ्फाज’ और बाबूराम को ‘दूरदर्शी’ भी नहीं कहा जिसका तोहमत मुझ पर लगाया जा रहा है।

समकालीन तीसरी दुनिया’ के जनवरी 2011 अंक में प्रचण्ड, बाबूराम भट्टराई और किरण तीनों के साक्षात्कार प्रकाशित हैं और उन्हें पढ़ने से एक चीज स्पष्ट हो जाती है कि लाइन को लेकर अंतर्विरोध कहां है। किसी भी क्रांति में कुछ फौरी (इमेडिएट)कार्यभार होते हैं और कुछ दूरगामी। संविधान की रचना और शांति प्रक्रिया को एक निष्कर्ष तक पहुंचाना नेपाली क्रांति का फौरी कार्यभार है। यह तय है कि संविधान सभा में  माओवादियों का दो तिहाई बहुमत नहीं है और इस कारण वैसा संविधान नहीं बन सकता जैसा वे चाहते हैं लेकिन इसे भी बुर्जुआ ताकतें नहीं पूरा होने देना चाहती हैं। प्रचण्ड और बाबूराम दोनों ने अपने इंटरव्यू में कहा है कि हम शांति प्रक्रिया को पूरा करने का प्रयास करेंगे और अगर इसमें रुकावट पैदा की गयी तो विद्रोह में जाएंगे। मुझे इन दोनों के कथन में कोई विरोधाभाष नहीं दिखायी देता फिर मेरे ‘यू टर्न’लेने की बात कहां से पैदा हुई। किरण जी की बात भिन्न है। उन्हें डर है कि इस प्रक्रिया में कहीं पार्टी संसदवाद और संशोधनवाद के दलदल में न फंस जाए। उनकी यह चिंता जायज है। मेरा मानना है कि अगर चुनवांग बैठक के फैसले को पार्टी ने स्वीकार किया है तो उसके अनुसार आगे बढ़ना चाहिए। किरण जी का कहना है कि चुनवांग बैठक के फैसले से वह सहमत तो हैं लेकिन उन्हें डर है कि कहीं यह ‘टैक्टिक्स’की बजाय ‘स्टेटेजी’न बन जाए। इसी को ध्यान में रखकर मैंने इस समय विद्रोह की बात करना ‘यूटोपिया’ कहा था। इसके आधार पर नीलकंठ जी कैसे इस निष्कर्ष पर पहुंच गए कि मैं समाजवाद को ‘यूटोपिया’ और पूंजीवाद को ‘यथार्थ’ मान बैठा।

जी हां, नीलकंठ जी मुझसे यह आशा करना गलत होता कि मैं ‘प्रचण्ड को बताता कि उनके वैचारिक विचलन के कारण ही आत्मगत तैयारी कम हुई है।’ कारण जो भी हो, लेकिन आप भी यह तो मानते हैं कि आत्मगत तैयारी में कमी आयी है। इसी को रेखांकित करते हुए मैंने अभी विद्रोह की बात को यूटोपिया कहा था। रहा सवाल प्रचण्ड को बताने का तो मैं आपकी पार्टी का सदस्य नहीं हूं। यह काम आप बखूबी कर सकते हैं। आपने लिखा है कि ‘प्रचण्ड मुग्ध्ता में वे प्रचण्ड को क्रांति का पर्यायवाची मान लेते हैं।’ यह आपके दिमाग की उपज है। मैं नेपाल की पार्टी एनेकपा (माओवादी) को एक क्रांतिकारी पार्टी मानता हूं जिसके अध्यक्ष प्रचण्ड हैं। इस क्रांतिकारी पार्टी को ध्वस्त करने के लिए राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर जो तरह-तरह की साजिशें चल रही हैं उनमें एक प्रमुख साजिश यह है कि शीर्ष नेतृत्व यानी प्रचण्ड की छवि पर प्रहार करो और पार्टी को कमजोर करो। अपने इस कथन के पक्ष में मैं भारत के अखबारों में छपी दर्जनों ऐसी खबरें दिखा सकता हूं जिसका मकसद प्रचण्ड की छवि को ध्वस्त करना और प्रचण्ड को बदनाम करना है। नेपाली जनता का मित्र होने के नाते मैं अपना कर्तव्य समझता हूं कि इस साजिश के खिलाफ सक्रिय रहूं। इसमें ‘प्रचण्ड मुग्ध्ता’नहीं है बल्कि जो कोई भी उस शीर्ष पद पर होता उसे बचाने के लिए मैं यही करता। मैं अपना यह भी अधिकार मानता हूं कि अगर कोई विचलन दिखायी देता है तो उसे इंगित करूं ओर तभी मैंने यह लेख लिखा।

आपके लेख की प्रतिक्रिया में किन्हीं खरेल या पंत ने कहा है कि अशोक मेहता और आनंद स्वरूप वर्मा जैसे लोग ‘शांति और संविधान की लाइन’ की तारीफ में जुटे हैं। नेपाली क्रांति के पक्ष/विपक्ष में खड़े शरद यादव/डीपी त्रिपाठी/सीताराम येचुरी,अशोक मेहता/एसडी मुनि,आनंद स्वरूप वर्मा/गौतम नवलखा - इन सबको क्या आप एक ही पलडे़ पर रखेंगे? क्या आपको इन सबके दृष्टिकोणों का पता नहीं है कि वे क्यों नेपाली क्रांति के पक्ष में हैं अथवा खड़े दिखायी दे रहे हैं?

अंत में नीलकंठ जी को यह बताना चाहूंगा कि शुभचिंतकों की सकारात्मक आलोचना के प्रति सहिष्णुता का भाव रखें। आवेग में क्षेत्रीयतावाद और नस्लवाद जैसे शब्दों के इस्तेमाल से बचें। 1980 से ही मैं किसी न किसी रूप में नेपाली जनता के संघर्ष के साथ जुड़ा हूं। इसे नेपाली जनता पर ही छोड़ दें कि मैं ‘नेपाली जनता का शुभचिंतक’हूं या ‘एक भारतीय उग्र राष्ट्रवादी’। यदि उन्हें महसूस होता हो कि उत्तेजना में उन्होंने मेरे विरुद्ध कटु शब्दों का इस्तेमाल किया है, जो उन्हें नहीं करना चाहिए था, तो इसके लिए वह केवल एक पंक्ति में खेद व्यक्त कर सकते है।


 

जनपक्षधर पत्रकारिता के महत्वपूर्ण स्तंभ और मासिक पत्रिका 'समकालीन तीसरी दुनिया' के संपादक. 
 
 
 

बहुजन को मटियामेट करतीं मायावती


जैसे अन्ना हज़ारे को  साथी के रूप में अरविंद केजरीवाल दिखाई दे रहे हैं, वैसे कांशीराम को भी अपने मिशन को चलाने के शुरुआती दौर में  मायावती के रूप में दलित समाज की एक ऐसी युवती मिली जो शिक्षित और तेज़तर्रार थी...

तनवीर जाफरी

राष्ट्रीय स्तर पर दलितों, अनुसूचित जातियों, अनुसूचित जनजातियों, अल्पसंख्यकों, पिछड़े वर्ग के लोगों अर्थात् देश के बहुजन समाज का उत्थान सुनिश्चित हो, देश की लगभग 85प्रतिशत जनसंख्या की हिस्सेदारी रखने वाले इस बहुजन समाज में समता व  समानता का भाव पैदा हो, इस समाज का राजनीतिक, सामाजिक और  आर्थिक विकास सुनिश्चित हो, बहुजन समाज आत्मनिर्भर बने तथा कथित उच्चजाति के मात्र लगभग 15 प्रतिशत लोगों का सत्ता पर चला आ रहा नियंत्रण तथा वर्चस्व   समाप्त हो, यही उद्देश्य था बामसेफ तथा डीएस फ़ोर आंदोलन के सूत्रधार स्वर्गीय कांशीराम का।

अपने इसी लक्ष्य को हासिल करने के लिए ही स्वर्गीय कांशीराम ने पूरे देश की यात्रा की, तमाम पद यात्राएं की तथा बहुजन समाज आधारित राजनीतिक संगठन को खड़ा करने के लिए कम से कम समय में अधिक से अधिक लोगों से राष्ट्रीय स्तर पर संपर्क स्थापित किया। इस प्रकार एक दूरदर्शी एवं राष्ट्रव्यापी लक्ष्य को लेकर वर्ष 1984  में कांशीराम ने बहुजन समाज पार्टी नामक राजनीतिक संगठन के गठन की घोषणा कर डाली। शुरु से ही बीएसपी को राष्ट्रीय स्तर पर गठित करने की योजना बनाई गई तथा लगभग पूरे देश में ही संगठन का ढांचा खड़ा कर दिया गया। राष्ट्रीय स्तर पर बीएसपी के कार्यालय भी लगभग पूरे देश में बनाए गए।

कांशीराम   के  सपनों  पर  सवार  मायावती 
ज़ाहिर है इतने बड़े तथा असंभव से प्रतीत होने वाले दलित उत्थान और समतामूलक समाज की स्थापना जैसे राष्ट्रव्यापी मिशन को चलाना किसी भी व्यक्ति के अकेले के बूते की बात नहीं हो सकती थी। इसलिए ऐसे मिशन को कुछ तेज़-तर्रार और युवा चेहरों की भी दरकार थी। जैसे वर्तमान समय में अन्ना हज़ारे के साथी के रूप में अरविंद केजरीवाल दिखाई दे रहे हैं, इसी प्रकार कांशीराम को भी अपने मिशन को चलाने के शुरुआती दौर में ही मायावती के रूप में दलित समाज की एक ऐसी युवती मिली जो पूर्णकालिक राजनीति करने के लिए तैयार रहने के साथ-साथ शिक्षित तथा तेज़तर्रार तो थी ही,साथ-साथ देश की वर्गवादी और जातिवादी व्यवस्था पर आक्रामक प्रहार करने में भी अपना कोई सानी नहीं रखती थी।

बहुत शीघ्र ही मायावती ने बहुजन समाज पार्टी में कांशीराम के बाद अपना नंबर दो का स्थान सुरक्षित कर लिया। मायावती कांशीराम की सबसे विश्वस्त सहयोगी बन गईं। शुरुआती दौर में बहुजन समाज पार्टी के प्रत्याशी के रूप में कांशीराम और मायावती दोनों ही प्रमुख बसपा क्षत्रपों को खूब झटके भी लगे। कांशीराम पंजाब तथा इलाहाबाद से लोकसभा चुनाव में पराजित हुए, तो मायावती को बिजनौर से मीराकुमार ने धूल चटाई। परंतु अपनी धुन तथा राष्ट्रव्यापी लक्ष्य के प्रति पूरी तरह से समर्पित कांशीराम हार मानने के बजाए स्वयं को प्राप्त होने वाले मतों में ही अपनी जीत देखने लगे। आखिरकार धीरे-धीरे ही सही, वे बहुजन समाज पार्टी को उत्तर प्रदेश में कांग्रेस पार्टी के विकल्प के रूप में स्थापित करने में सफल हो गए।

परंतु कांशीराम का मकसद केवल उत्तर प्रदेश की सत्ता को हासिल करना मात्र नहीं था। उन्होंने राष्ट्रीय स्तर पर समतामूलक समाज के निर्माण का जो सपना देखा था वह उसी को साकार करने की दिशा में आगे बढऩा चाहते थे। परंतु इसके पहले कि कांशीराम का यह सपना   पूरा हो पाता उन्होंने उत्तर प्रदेश की बागडोर मायावती के हाथों में सौंप दी और वे स्वयं धीरे-धीरे समय बीतने के साथ-साथ अस्वस्थ होते गए। अपनी मृत्यु के लगभग तीन वर्ष पूर्व ही वह बड़े ही रहस्यमयी ढंग से सार्वजनिक जीवन से अदृश्य हो गए।

उनके जीवन के अंतिम समय में तरह-तरह की खबरों का बाज़ार गर्म रहा। कभी मायावती स्वयं को कांशीराम का राजनीतिक वारिस बतातीं, तो कभी कांशीराम का परिवार मायावती के इस दावे का खंडन करता। साथ ही यह भी कहता कि कांशीराम को मायावती के लोगों ने अपहृत  कर रखा है। कभी यह आरोप भी लगता कि मायावती ने उन्हें नज़रबंद कर लिया है। बहरहाल, इन्हीं आरोपों-प्रत्यारोपों तथा अटकलबाजि़यों के बीच कांशीराम जी का देहांत हो गया और मायावती स्वयंभू रूप से बहुजन समाज पार्टी की इकलौती वारिस तथा स्वामिनी बन बैठीं। बस यहीं से कांशीराम की बहुजन समाज पार्टी तथा मायावती की बहुजन समाज पार्टी के लक्ष्य अलग-अलग हो गए।

जहां स्वर्गीय कांशीराम कल तक एक राष्ट्रीय मिशन के मद्देजनऱ दलित, पिछड़े वर्ग और अल्पसंख्यकों के सर्वांगीण विकास को केंद्र में रखकर राष्ट्रीय राजनीति कर रहे थे, वहीं मायावती की नज़रें उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री पद तक ही सीमित होकर रह गईं। अपने इस लक्ष्य को हासिल करने के लिए कभी वह भारतीय जनता पार्टी से समझौता करने लगीं, तो कभी समाजवादी पार्टी के साथ मिलकर सरकार बनाने में उन्हें कोई आपत्ति नहीं हुई।

कांशीराम जहां 85 प्रतिशत बहुजन समाज के हितों को ध्यान में रखकर कथित उच्च जाति के लोगों से फासला बनाए रखने में कोई दिक्कत महसूस नहीं करते थे, वहीं केवल बहुजन समाज के बल पर स्वयं को सत्ता में न आता देखकर मायावती ने उच्च जाति के उन लोगों से भी हाथ मिलाने में कोई गुरेज़ नहीं किया जिन्हें कि दो दशकों तक सार्वजनिक रूप से मायावती और उनके नीति-निर्धारकों ने जमकर गालियां दी थीं।

आज स्थिति यह है कि बहुजन समाज पार्टी में मायावती ने राष्ट्रीय स्तर पर न तो अपना संगठन उस रूप में खड़ा किया है जिसकी स्वर्गीय कांशीराम ने कल्पना की थी, न ही उन्हें इस बात में कोई दिलचस्पी है। वह इस विषय पर कतई गंभीर नहीं हैं। देश के लोग आज बसपा में मायावती के अतिरिक्त किसी दूसरे नेता के नाम तक से वाकिफ नहीं है।

मायावती कांशीराम की तरह राष्ट्रीय स्तर पर अपने दल को संगठित और मज़बूत करने के पचड़े में पडऩा ही नहीं चाह रही हैं। इसके बजाए उनका पूरा ध्यान सिर्फ और सिर्फ इसी बात पर केंद्रित रहता है कि वे किस प्रकार उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री की अपनी कुर्सी को सुरक्षित रख सकें। यदि भाग्य उनका साथ दे तो वे 80  लोकसभा सदस्यों वाले देश के सबसे बड़े राज्य उत्तर प्रदेश में ही अपनी पार्टी के लिए अधिक से अधिक सीटें जीतकर उत्तर प्रदेश के बल पर ही किसी तरह छलांग लगाकर देश के प्रधानमंत्री की कुर्सी तक पहुंच जाएं।

लखनऊ और दिल्ली के मध्य उन्हें न तो कोई दूसरा राज्य दिखाई देता है, न ही कोई नेता। न तो स्वर्गीय कांशीराम की आकांक्षाएं और तमन्नाएं दिखती हैं, न ही दलित उत्थान जैसा कोई दूरगामी लक्ष्य। हाँ,  इतना ज़रूर है कि मायावती को अपने व्यक्तिगत एवं स्वार्थपूर्ण राजनीतिक मिशन को पूरा करने के लिए न सिर्फ स्वर्गीय कांशीराम, बल्कि संविधान निर्माता बाबा साहब भीमराव अंबेडकर तथा बसपा के चुनाव निशान हाथी की विशाल प्रतिमाओं का भी सहारा लेना पड़ रहा है। उन्हें यह गलतफहमी है कि इस प्रकार के स्मारकों के निर्माण मात्र से ही दलित, पिछड़े और अल्पसंख्यक समाज का कल्याण हो सकेगा।

मायावती अपनी प्रतिमाओं के साथ-साथ बाबा साहब भीमराव अंबेडकर, स्वर्गीय कांशीराम तथा विशालकाय हाथियों की प्रतिमाएं न केवल लखनऊ तथा नोएडा में, बल्कि पूरे राज्य में स्थापित किए जाने की योजना बना रही हैं। वे कभी-कभी अपने को जि़ंदा देवी बत कर अन्य देवी-देवताओं पर चढ़ावा चढ़ाने के बजाए स्वयं पर चढ़ावा चढ़ाने का समाज से आह्वान करती भी सुनी जाती हैं। ऐसा नहीं लगता कि स्वर्गीय कांशीराम ने भी मायावती तथा बहुजन समाज पार्टी के लिए कुछ ऐसे ही सपने पाल रखे होंगे।

ऐसे में यह कहा जा सकता है कि निश्चित रूप से मायावती की राजनीतिक दिशा व दशा स्वर्गीय कांशीराम की राजनीतिक दिशा से न केवल भिन्न है, बल्कि बिल्कुल विपरीत भी प्रतीत होती है। मूर्तियां स्थापित करने या अपने बुतों की पूजा कराने से किसी समाज विशेष का विकास और उत्थान न तो हुआ है, न ही संभव है। बहुजन समाज के सर्वांगीण विकास तथा समतामूलक समाज के निर्माण के लिए तो बसपा को स्वर्गीय कांशीराम के दूरगामी राजनीतिक एजेंडे पर चलने की ज़रूरत है, न कि मायावती के सीमित व स्वार्थपूर्ण एजेंडे पर।


लेखक हरियाणा साहित्य अकादमी के भूतपूर्व सदस्य और राष्ट्रीय-अंतर्राष्ट्रीय मसलों के प्रखर टिप्पणीकार हैं.उनसे tanveerjafari1@gmail.कॉम पर संपर्क किया जा सकता है.



 

May 1, 2011

मजदूरों का एक औपचारिक आयोजन

देशभर में करीब 36करोड़ श्रमिकों में 34करोड़ से अधिक को सरकार की निर्धारित न्यूनतम मजदूरी नहीं मिल पा रही है,ऐसे में मजदूर दिवस का नाम मजदूर शोषण दिवस होना चाहिए...

राजेन्द्र राठौर

आज  1 मई को देशभर में बड़ी-बड़ी सभाएं होगी,बड़े-बड़े सेमीनार आयोजित किए जाएंगे,जिनमें मजदूरों के हितों की बड़ी-बड़ी योजनाएं भी बनेगी और ढ़ेर सारे लुभावने वायदे किए जाएंगे,जिन्हें सुनकर एक बार तो यही लगेगा कि मजदूरों के लिए अब कोई समस्या ही बाकी नहीं रहेगी। इन खोखली घोषणाओं पर लोग तालियां पीटकर अपने घर लौट जाएंगे, किन्तु अगले ही दिन मजदूरों को पुनः उसी माहौल से रूबरू होना पड़ेगा,फिर वही शोषण, अपमान व जिल्लत भरी गुलामी जैसा जीवन जीने के लिए अभिशप्त होना पड़ेगा, जिसे दूर करने के नेताओं ने मजदूर दिवस के दिन बड़े-बड़े दावे किए थे। वास्तविकता तो यह है कि मई दिवस अब महज औपचारिकता रह गया है।

दरअसल, उन्नीसवीं शताब्दी के अंतिम चरण में श्रमिकों में अपने हक को लेकर जागरूकता पैदा हुई। मजदूरों ने शिकागो में रैलियों, आमसभाओं आदि के माध्यम से अपने अधिकारों, पारिश्रमिक के लिए आग्रह करना आरंभ किया। धीरे-धीरे इन प्रयासों का असर बढ़ा और 1886 से 1889 तक आसपास के देशों में भी मजदूर और कर्मचारियों में अपने हक के लिए जागरूकता आई। मजदूरों का शिकागो विरोध काफी प्रसिध्द हुआ और 1890 में जब 1 मई को इसकी पहली वर्षगांठ मनाई गई, तभी से मई दिवस मनाने का चलन शुरू हुआ।

कमोबेश उस समय मजदूरों का अलग-अलग वर्ग नहीं था। अपने हक के लिए सभी मजदूर एक साथ लड़ते थे, लेकिन चापलूस श्रमिक नेताओं की वजह से आज मजदूर, संगठित और असंगठित वर्ग में बंटकर रह गए हैं। संगठित क्षेत्र के मजदूर जहाँ अपने अधिकारों आदि के बारे में जागरूक है और शोषण करने वालों के खिलाफ आवाज बुलंद कर मोर्चा खोलने में सक्षम है, वहीं असंगठित क्षेत्र के मजदूरों में लगभग 90 फीसदी को विश्व मजदूर दिवस’ के बारे में भी पता भी नहीं है। बहुत से स्थानों पर तो ‘मजदूर दिवस’ पर भी मजदूरों को ‘कोल्हू के बैल’ की तरह 14 से 16 घंटे तक काम करते देखा जा सकता है। यानी जो दिन पूरी तरह से उन्हीं के नाम कर दिया गया है,उस दिन भी उन्हें दो पल का चैन नहीं।

देश का शायद ही ऐसा कोई हिस्सा हो,जहां मजदूरों का खुलेआम शोषण न होता हो। आज भी स्वतंत्र भारत में बंधुआ मजदूरों की बहुत बड़ी तादाद है। कोई ऐसे ही बधुआ मजदूरों से पूछकर देखे कि उनके लिए देश की आजादी के क्या मायने हैं,जिन्हें अपनी मर्जी से अपना जीवन जीने का ही अधिकार न हो, जो दिनभर की हाड़तोड़ मेहनत के बाद भी अपने परिवार का पेट भरने में सक्षम न हो पाते हो,उनके लिए क्या आजादी और क्या गुलामी?इससे ज्यादा बदतर स्थिति तो बाल एवं महिला श्रमिकों की है।

महिला श्रमिकों का आर्थिक रूप से तो शोषण होता ही है, उनका शारीरिक रूप से भी जमकर शोषण किया जाता है,लेकिन अपना व बच्चों का पेट भरने के लिए चुपचाप सब कुछ सहते रहना इन महिला मजदूरों की जैसे नियति ही बन गई है। ऐसे में इस 1 मई यानी विश्व मजदूर दिवस’ का क्या औचित्य रह जाता है? आज खासकर असंगठित क्षेत्र के मजदूरों का जमकर शोषण किया जा रहा है और इस काम में राजनीतिज्ञ,उद्योगपति,पूंजीपति,ठेकेदार और बाहुबली आदि सब मिले हुए है। श्रमिकों की सप्लाई कच्चे माल की तरह हो रही है। सरकार के तमाम कानूनों को ठेंगा दिखाकर ठेकेदार ही मजदूरों के माई-बाप बन गए है,जो रूपए का लालच देकर मजदूरों को कहीं भी ले जाते है,मगर यह जानते हुए भी सरकार व सरकारी तंत्र उन ठेकेदारों के खिलाफ कुछ कार्रवाई नहीं कर पाती।
विडम्बना यह भी है कि देश की स्वाधीनता के छह दशक बाद भी अनेक श्रम कानूनों को अस्तित्व में लाने के बावजूद हम आज तक ऐसी कोई व्यवस्था ही नहीं कर पाए हैं,जो मजदूरों को उनके श्रम का उचित मूल्य दिला सके। भले ही इस संबंध में कुछ कानून बने हैं पर वे सिर्फ कागजों तक ही सीमित हैं।

एक सच यह भी है कि अधिकांश मजदूर या तो अपने अधिकारों के प्रति अनभिज्ञ हैं या फिर वे अपने अधिकारों के लिए इस वजह से आवाज नहीं उठा पाते कि कहीं इससे नाराज होकर उनका मालिक उन्हें काम से ही निकाल दे और उनके परिवार के समक्ष भूखे मरने की नौबत आ जाए। जहां तक मजदूर संगठनों के नेताओं द्वारा मजदूरों के हित में आवाज उठाने की बात है तो आज के दौर में अधिकांश ट्रेड यूनियनों के नेता भी भ्रष्ट राजनीतिक तंत्र का हिस्सा बन चुके हैं, जो विभिन्न मंचों पर श्रमिकों के हितों के नाम पर बात करते तो नजर आते हैं लेकिन अपने निजी स्वार्थों की पूर्ति के लिए कारखानों के मालिकों से सांठगांठ कर अपने ही मजदूर भाईयों के हितों पर कुल्हाड़ी चलाने में संकोच नहीं करते।

देश में हर वर्ष श्रमिकों को उनके श्रम के वाजिब मूल्य,उनकी सुविधाओं आदि के संबंध में दिशा-निर्देश जारी करने की परम्परा सी बन चुकी है। समय-समय पर मजदूरों के लिए नए सिरे से मापदंड निर्धारित किए जाते हैं, लेकिन इनका क्रियान्वयन हो पाता है या नहीं, इसे देखने वाला भी कोई नहीं है। इससे भी कहीं ज्यादा अफसोस का विषय यह है कि देशभर में करीब 36करोड़ श्रमिकों में से 34 करोड़ से अधिक को सरकार द्वारा निर्धारित न्यूनतम मजदूरी भी नहीं मिल पा रही है, तो ऐसे मजदूर दिवस मनाने से आखिर फायदा ही क्या है।



छत्तीसगढ़ के जांजगीर के राजेंद्र राठौर पत्रकारिता में 1999से जुड़े हैं और स्वतंत्र लेखन का शौक रखते हैं. लोगों तक अपनी बात पहुँचाने के लिए 'जन-वाणी' ब्लॉग लिखते है.


 

Apr 30, 2011

'प्रचंड' आत्मसमर्पणवाद के बीच उभरती एक धुंधली 'किरण'


नेपाल के राजनीतिक हालात और नेपाली माओवादी पार्टी की भूमिका को लेकर आयोजित इस बहस में   1-क्या माओवादी क्रांति की उल्टी गिनती शुरू हो गयी है? ,,2-क्रांतिकारी लफ्फाजी या अवसरवादी राजनीति  और 3- दो नावों पर सवार हैं प्रचंड ,  के बाद अब  बहस अब उन प्रयोगों की ओर मुड़ रही है जिसे माओवादियों ने नये समाज के भ्रुण के तौर पर खड़ा किया था। उनमें पहला नाम थाबांग गांव का है जिसे नेपाल का येन्नान कहा जाता है। यहां बुर्जुआ शासन प्रणाली के मुकाबले जनताना सरकार ने जनकेंद्रित विकास का एक ढांचा खड़ा किया था। उसी के मद्देनजर जनयुद्ध से पहले,जनयुद्ध के साथ और अब जनयुद्ध के बाद थाबांग कैसे पूरे नेपाल में माओवादियों की बदलाव प्रक्रिया को रेखांकित करता है,बता रहे हैं थाबंग से लौटकर....

पवन पटेल

नेपाल के ग्रामीण इलाकों में 13 फरवरी 1996 से प्रतिक्रियावादी राज्यसत्ता को ध्वंश कर नई जनवादी सत्ता की  स्थापना के लिए दीर्घकालीन जनयुद्ध का रास्ता घोषित करने वाली माओवादी पार्टी आज उन्हीं प्रतिक्रियावादी राजनीतिक दलों का साथ देते हुए तथाकथित शांति प्रक्रिया को पूरा कर एक तथाकथित जनवादी संविधान बनाने को आतुर है. यह आतुरता इसलिए है कि 28 मई 2011 तक किसी भी हालत में ‘जन संविधान’जारी किया जा सके और नवंबर 2005में दिल्ली दरबार में हुई बारह  सूत्रीय सहमति की राजनीति को आगे बढाया जाए. प्रस्तुत लेख रोल्पा जिले में जनयुद्ध काल में माओवादी पार्टी द्वारा घोषित आधार इलाके  के एक गाँव थाबांग में दशकों तक चली क्रांतिकारी प्रक्रिया से उत्पन्न उपलब्धि के सन्दर्भ में आज की नेपाली राजनीतिक बहस में थाबंगी जनता के नजरिए से समझने की कोशिश है.


थाबांग गाँव : कहाँ गया  समाजवादी देश  का सपना
थाबांग एक ऐसा गाँव है,  जिसकी मिसाल नेपाल के ग्रामीण वर्ग संघर्ष के केंद्र और   नेपाल  का  येन्नान के  रूप में दी जाती है. थाबांग वर्ष 1956 में नेपाल कम्युनिस्ट पार्टी के किसान संगठन की स्थापना के बाद से लेकर निर्दलीय पंचायती व्यवस्था के बर्बर दमन का गवाह रहा है. वर्ष 1991  में हुए जनांदोलन के बाद स्थापित बहुदलीय लोकतंत्र के बर्बर दमन का प्रतीक भी थावांग है. एक ऐसा प्रतीक जो नेकपा एकता केंद्र मशाल द्वारा नब्बे के दशक के उत्तरार्ध में पेरू के जनयुद्ध के समर्थन में आयोजित राजनीतिक-सांस्कृतिक अभियानों का प्रमुख केंद्र भी रहा. यह जनयुद्ध शुरू होने के ठीक पहले तत्कालीन नेपाली कांग्रेस पार्टी की सरकार द्वारा निर्देशित भीषण राज्य दमन का भी प्रतीक रहा.

थाबांग गाँव का नाम आते ही एक ऐसी क्रांतिकारी की स्मृति मानस पटल पर उभरती है जिसने 1996 में शुरू हुए माओवादी जनयुद्ध को नए आयाम दिए. थाबांग में शायद  ही कोई ऐसा परिवार होगा जो कभी न कभी कम्युनिस्ट आन्दोलन के साथ जुड़ा न रहा हो.जनयुद्ध शुरू होने के बाद थाबांग से हजारों की संख्या में माओवादी क्रांतिकारी पूरे  नेपाल में पार्टी का काम करने के उद्देश्य से फैले. वर्तमान माओवादी नेतृत्व में (एकीकृत होने के बाद आए नेतृत्व पंक्ति को छोड़कर) कोई भी ऐसा नेता नहीं होगा जिसने महीनों प्रतिक्रियावादी राज्यसत्ता के दमन से बचने के लिए थाबांग गाँव में पनाह न पाई हो और जलजला पहाड़ की तलहटी में निश्चिन्त होकर आलू और धिड़ो का आनंद उठाते हुए हिमाल से आच्छादित सिस्ने और जलजला पहाड़ के मनोरम दृश्यों को न निहारा हो.

थाबांगी जनता के लिए प्रतिक्रियावादी राज सत्ता का मतलब हमेशा से ही पुलिसिया  दमन रहा है. उनकी मूलभूत जरूरतों (गास-बॉस-कपास यानी रोटी-कपडा-मकान) के प्रति शायद ही कभी राज्यसत्ता ने ध्यान दिया हो.उनके लिए राज्य का मतलब है पुलिस का आतंक.  गाँव में पुलिस पोस्ट की स्थापना 1960 के दशक में ही हो गई थी और  हेल्थ पोस्ट की स्थापना भी 80 के दशक के अंत में हुई.

जनयुद्ध के बाद थाबांग एक ऐसे गाँव के रूप में उभरा,  जिसे नेपाली माओवादियों ने नेपाल के 'येनान्न' की संज्ञा दी. भरुवा बंदूक और कुछ लाठी डंडों से शुरू हुए जनयुद्ध ने दस साल में एक ऐसी क्रांतिकारी प्रक्रिया की आधारशिला रखी जिसने थाबांग को जनयुद्ध का समानार्थी बना दिया.जिस पुलिस के भय से जनता त्रस्त थी,वह पुलिस आम थाबांगी जनता के नाम से ही डरने लगी. वर्ष 1999 के उत्तरार्ध में पुलिस पोस्ट को बम से उड़ाने के बाद 2007 तक पुलिस फिर से गाँव में थाने को खोलने का साहस नहीं दिखा सकी. दूसरी बार पुलिस चौकी संविधान सभा के चुनाव के ठीक पहले माओवादी पार्टी के शांति प्रक्रिया में शामिल होने के बाद बनी.

माओवादी पार्टी ने वर्ष 1999के बाद से आधार इलाका स्थापित करने की शुरुआत इसी गाँव से की और आम जनता ने जनसत्ता की आधारशिला रखी. वर्ष  1997 में नेपाल में पहली बार 'गाँव जन सरकार' के गठन की घोषणा की गई. शुरू में जनसत्ता का मूल काम जनता को सुरक्षा देते हुए जनयुद्ध के लिए जनता को संगठित करना और स्थानीय स्तर पर होने वाले अपराधों पर न्याय देना था. बाद में विकास निर्माण के काम से लेकर गाँव में जनवादी बैंक, अजम्बरी जन कम्यून, सहकारी हेल्थ पोस्ट, शहीद स्मृति स्कूल और स्थानीय उद्योग चलाने तक जा पहुंचा. थाबांग में जहाँ बिजली की कल्पना करना भी असंभव था, उसे माओवादी जनयुद्ध द्वारा संचालित नई सत्ता ने साकार किया.

वर्ष 2004 में तीन किलोवाट की पहली लघु जलविद्युत परियोजना की शुरुआत  रचिबंग गाँव से गयी, जिसका उद्देश्य अजम्बरी कम्यून के लिए बिजली आपूर्ति करना था. बाद में इस परियोजना की क्षमता बढ़ाकर पांच किलोवाट कर दी गई और नजदीक के एक अन्य छोटे गाँव फुन्तिबंग में बिजली आपूर्ति की जाने लगी. आर्थिक विकास के साथ जनता सांस्कृतिक बदलाव की ओर बढ़ी और हिंदूवादी वर्णव्यवस्था की चूलें हिल गयीं. थाबांग में  'मगर' जनजाति के घरों की रसोई में दलित प्रवेश नहीं पाते थे, जो जनयुद्ध की प्रक्रिया में टूट गया. वर्ष 2004 में गाँव जनसत्ता ने थाबंग गाँव को पूर्ण छुआछूत उन्मूलन क्षेत्र घोषित कर दिया.समाज में पुरुषों में बहु विवाह का प्रचलन है, यह भी जनयुद्ध के दौरान टूटने लगा. शराबखोरी, जुआ और वेश्यावृत्ति की रोकथाम हुई. जिस समाज में दलित और 'मगर' के बीच प्रेम विवाह असंभव था,वह भी जनसत्ता काल में संभव हुआ.

शांति प्रक्रिया शुरू होने के बाद और खासकर संविधान सभा के 2008 में निर्वाचन के बाद माओवादी आंदोलन में लगे नौजवान बड़ी संख्या में रोजगार के तलाश में  खाड़ी देशों का रुख करने लगे हैं. गाँव के लोग पहले भी कमाने के लिए विदेश जाते थे, पर इतनी बड़ी संख्या में नहीं. मेरे अध्ययन के मुताबिक  जनयुद्ध काल में जहाँ हर साल 5 से 12 लोग जाते थे, अब यह औसत  प्रतिवर्ष 50 से 75 तक पहुँच गया है. मुख्य गाँव थाबांग के 315 नौजवान विदेश में काम कर रहे हैं. इनमें से अधिकांश माओवादी सेना में शामिल रहे और करीब नौ माओवादी सेना के प्रशिक्षित लड़ाकू हैं.

दूसरी तरफ गाँव की जनता के लाख विरोध के बाद भी वहां पुलिस थाना स्थापित हो गया है. पुलिस का मूल चरित्र वही है जो जनयुद्ध शुरू होने से पहले था. अध्ययन के दौरान पाया कि गाँव में जुआ,वेश्यावृत्ति और चोरी की घटनाएं अब आम बात हैं.महिलाओं के साथ बदसलूकी की घटनाएँ शुरू होने लगी हैं.जहाँ एक दौर में यह कहा जाता था की पूरे नेपाल में यदि महिलाएं कहीं सुरक्षित हैं तो वह केवल आधार इलाके में ही हैं.जहाँ महिलाएं रात में भी बिना किसी भय के यात्रा कर सकती हैं.और तो और दिन में ही थाबांग गाँव से दूसरे गाँव जाने या शहर जाने के रास्ते में डरा-धमका कर छिनौती की घटनाएँ आम परिघटना होने लगी है.

इन सब घटनाओं के पीछे पुलिस का चिर-परिचित रवैया फिर से आने लगा है.  अब गाँव में शराब खुलेआम बिकनी शुरू हो गई है. इधर गाँव में एक्का-दुक्का जनयुद्ध काल में हुए  अंतरजातीय प्रेम विवाह टूटने की घटनाएँ प्रकाश में आई हैं. आम जनमानस की मनःस्थिति फिर से पुराने दिनों, जैसे की जनयुद्ध से भी काफी पहले के दिनों में चली गई प्रतीत होती है. स्थानीय पार्टी की बैठक अब नियमित  न होकर अनियमित हो गई है. अभी हाल ही में गाँव में स्थानीय पार्टी कार्यकर्ताओं ने एक प्राइवेट अंग्रेजी माध्यम जलजला बोर्डिंग स्कूल की शुरुआत की है, जो तीसरी तक अपनी क्लासेज चलाता है.

यह स्कूल काठमांडू में कुकुरमुत्ते की तरह उगे अंग्रेजी माध्यम के नाम पर मोटी फीस उगाहने का थाबांगी संस्करण बन रहा है.गाँव के माओवादी नेता के बच्चे इस स्कूल में फ्री पढ़ते हैं या कुछ नाममात्र की फीस देकर. अजम्बरी कम्यून के परिवार एक-एक कर कम्यून छोड़कर जा रहे हैं. उद्योग, जनवादी बैंक, शहीद स्कूल तो कब से बंद हो चुके हैं. 

जनयुद्ध की क्या उपलब्धियां हैं जिसे आज मोओवादी नेतृत्व संस्थागत करना चाहता है. जनयुद्ध की जितनी उपलब्धियां रही हैं,वह सभी जनसत्ता की देन हैं. आज जब जनयुद्ध खत्म हो चुका है तो जनसत्ता की उपलब्धियां भी धीरे-धीरे विसर्जन की ओर जा रही हैं. ऐसे  समय में किस मुंह से बाबूराम और प्रचंड जैसे पात्र किस चीज को संस्थागत करने की बात कर रहे हैं. क्या थाबांगी जनता की  उपलब्धि मात्र राजतंत्र का खात्मा है और प्रतिक्रियावादी के साथ मिलकर एक तथाकथित ‘जन संविधान’  का निर्माण अथवा उन दलाल सामंती राजनीतिक-आर्थिक और सामाजिक-सांस्कृतिक संरचनाओं के स्थान पर एक समुन्नत व्यवस्था का निर्माण.

आज माओवादी नेतृत्व थाबांगी जनता के खून-पसीने के ब्याज पर भारत की मित्रता हासिल करने और अमेरिका द्वारा नेपाली माओवादी को आतंकवादी  सूची से हटाकर एक दलाल बुर्जुआ सत्ता को संस्थागत करने के लिए प्रतिबद्ध दिखता   है.

मैंने उस क्षेत्र में करीब एक साल पहले (थाबांग) अध्ययन की शुरुआत की थी तो कार्यकर्ता नेपाली नव जनवादी क्रांति के आगे बढ़ने पर आशावान थे. लेकिन एक सवाल उनके मन में था कि   उनकी पार्टी आगे बढ़ रही भारतीय माओवादी पार्टी के खिलाफ भारत सरकार द्वारा चलाए जा रहे ऑपरेशन ग्रीनहंट का नेपाल में विरोध-प्रदर्शन आयोजित क्यों नहीं करती, जबकि पार्टी तो नेपाल में जनयुद्ध की शुरुआत से पहले पेरू की क्रांति के समर्थन में गाँव-गाँव में कार्यक्रम आयोजित करती थी.

साथ ही वह यह भी कहते थे कि  यदि नेपाली  क्रांति ने जोखिम लेकर क्रांति को आगे नहीं बढाया तो भी प्रतितिक्रियावादी राज्य सत्ता उन्हें नहीं छोड़ेगी. या तो मुक्ति या तो मौत, क्योंकि थाबांगी जनता का संघर्ष केवल राजतंत्र उन्मूलन तक ही नहीं था, बल्कि नेपाल में नव जनवादी क्रांति को पूरा करना उनका लक्ष्य था. यह भी हो सकता है कि   या तो माओवादी विश्व क्रांति का दरवाजा खोल देंगे या तो आने वाली पीढ़ियों के लिए इक्कसवीं सदी के पेरिस कम्यून सरीखा सबक बन जायंगे. आज की स्थिति में यह सवाल कि  क्या पार्टी फिर से क्रांति का रास्ता चुनेगी? तब केवल मौन ही गूंजता है...या !  



जवाहरलाल नेहरु विश्वविद्यालय के समाजशास्त्र विभाग से नेपाली जनयुद्ध के समाजशास्त्रीय पहलू पर शोध. उसी सिलसिले में थाबांग गाँव में उनका दो महीने रहना हुआ. पवन भारत नेपाल जन एकता मंच के पूर्व सचिव रह चुके हैं.



Apr 29, 2011

दो नावों पर सवार हैं प्रचंड


नेपाल के राजनीतिक हालात और नेपाली माओवादी आन्दोलन की भूमिका को लेकर जारी बहस व्यापक होती जा रही है. यह बहस ऐसे समय में चल रही है जब वहां 2005 में हुए संविधान सभा के चुनाव का कार्यकाल 28 मई को खत्म होने जा रहा है. एक दशक के जनयुद्ध के बाद शांति प्रक्रिया में शामिल होकर नया संविधान बनाने का सपना लिए सत्ता में भागीदारी की माओवादी पार्टी, अपने लक्ष्य में सफल नहीं हो सकी है.इसे लेकर पार्टी के भीतर और बाहर तमाम मत-मतान्तर हैं.जनज्वार की कोशिश होगी कि सभी पक्षों को बगैर पूर्वाग्रह के आने दिया जाये, जिससे हम अपने समय और समाज को और नजदीक से समझ सकें. इस कड़ी में  1-क्या माओवादी क्रांति की उल्टी गिनती शुरू हो गयी है? ,2-क्रांतिकारी लफ्फाजी या अवसरवादी राजनीति के बाद   तीसरा लेख आपके बीच है...

नीलकंठ के सी

आनंद स्वरुप वर्मा का लेख 'क्या माओवादी क्रांति की उल्टी गिनती शुरू हो गयी है' कई मायनों  में महत्वपूर्ण है.अव्वल तो इसलिए कि यह किसी जज्बाती क्रन्तिकारी का क्रंदन  नही है बल्कि एक परिपक्व लेखक का सोचा समझा नजरिया है और इसलिए इसे सहज ही अनदेखा नहीं  किया जा सकता.दूसरी बात यह कि आनंद स्वरुप वर्मा नेपाल के मामले में भारत के पाठको के बीच सन्दर्भ बिंदु के रूप में देखे जाते है और पुरानी परम्परा के अनुसार नेपाल के उनके नजरिये को बिना विवाद के स्वीकार किया जाता रहा है.उसकी वजह यह थी कि उन्होंने कभी खुद को एक पत्रकार के दायरे से बाहर नहीं  निकाला   और वस्तुगत स्थितियों   पर तथ्यपरक टिप्पणी   दी.

नेपाल के माओवादी आन्दोलन पर उनकी पहली पुस्तक ‘रोल्पा से डोल्पा तक’और इसके बाद के तमाम लेख और हाल में उनके द्वारा निर्मित फिल्म 'फलेम्स ऑफ़ दी स्नो'इसके उदाहरण है.लेकिन इस लेख में वे पत्रकारिता के दाएरे से बाहर आकर एक वैचारिक विश्लेषण करने का प्रयास करते है और बहुत सी दिलचस्प सुझाव देकर नेपाल की माओवादी राजनीति  में हो रहे वैचारिक संघर्ष के एक हिस्से के साथ खुद को खड़ा कर लेते है. अभी यह तय होना बाकि है की कौन सी लाइन नेपाल की जनता के हित में है लेकिन यह जरूर तय हो चुका है कि कौन सी लाइन उस लाइन का सही विस्तार है,जिसे जनयुद्ध शरू होने के समय नेपाल की पार्टी माओवादी ने अपना लक्ष्य बनाया था.

अपने लेख की शुरुआत  वे बहुत ही भावनात्मक टिप्पणी से करते है और बिलकुल सही तथ्य सामने रखते हैं कि,'जिन लक्ष्यों को प्राप्त करने के मकसद से इसे शुरू किया गया था उन लक्ष्यों की दूरी लगातार बढ़ती गयी और उस लक्ष्य की दिशा में चलने वाले अपने आंतरिक कारणों से कमजोर और असहाय होते गए.' लेकिन जब वे यह साफ़ करते है कि वे लक्ष्य क्या थे तो घपला कर देते है.वे कहते है, “शांति प्रक्रिया को पूरा करना है, संविधान बनाना है, संविधान बनाने के लिए ही जनता ने इतनी बड़ी कुर्बानी दी,संविधान बनाने का नारा हमारा नारा था आदि आदि.' क्या हमें  मान लेना चाहिए कि आनंद स्वरुप वर्मा ने भूल से ऐसा लिख दिया जबकि खुद प्रचंड, बाबुराम और किरण ने आजतक ऐसा नहीं कहा है. कमसे कम दस्तावेजो में बाबुराम और प्रचंड शांति, संविधान को क्रांति का अंतिम लक्ष्य कहने से आज भी बचते है. क्या हमें यह मान लेना चाहिए कि  वे गलती से भूल गये कि यहाँ वे जिसे 'आदि आदि'कहते है वे ही क्रांति के घोषित लक्ष्य है. जनयुद्ध के शुरुआत में जो नारा पार्टी ने दिया था वह था,'सत्ता के सिवा सब कुछ भ्रम है'.और सत्ता का अर्थ था समाजवादी सत्ता- श्रमजीवी वर्ग की तानाशाही.

आगे एक ही साँस में वे कहते है,  'जनयुद्ध ने अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर अत्यंत विपरीत परिस्थितियों के बावजूद साम्राज्यवाद और सामंतवाद को चुनौती देते हुए राजतंत्र को समाप्त किया था' और यह भी कि,“मान्यवर,आपको भी पता है कि आज विद्रोह की परिस्थितियां नहीं हैं”. एक जनयुद्ध जिसने 'अत्यंत विपरीत परिस्थितियों के बावजूद साम्राज्यवाद और सामंतवाद को चुनौती देते हुए राजतंत्र को समाप्त किया था', क्या आज उसे सिर्फ इसलिए आत्मसमर्पण कर देना चाहिए कि कुछ लोग मानते है कि, 'आज विद्रोह की परिस्थितियां नहीं हैं'. फिर वे ही क्यों सही हो जो मानते है कि, 'आज विद्रोह की परिस्थितियां नहीं हैं', वे लोग क्यों नही सही हो सकते जो विद्रोह को वस्तुपरक मानते है!

इसके बाद वे लिखते हैं,“आज स्थिति यह है कि हर मोर्चे पर पार्टी की विफलता उजागर हो रही है. संविधान बनाने का इसका लक्ष्य कोसों दूर चला गया है.मजदूर मोर्चे पर लम्बे समय तक अलग-अलग गुटों में अपना वर्चस्व कायम करने के लिए मार-काट मची रही.वाईसीएल टूट के कगार पर है. सांस्कृतिक मोर्चे पर विभ्रम की स्थिति है। शीर्ष नेतृत्व पर आर्थिक भ्रष्टाचार के आरोप लगाए जा रहे हैं.ध्यान देने की बात है कि ये आरोप शत्रुपक्ष की ओर से नहीं बल्कि खुद पार्टी के अंदर से सामने आ रहे हैं इसलिए इसे इतनी आसानी से खारिज नहीं किया जा सकता.” वे यहाँ ये बताने की कोशिश करते है कि संविधान का न बनना,जनमुक्ति सेना का नेपाल सेना में विलय न होना पार्टी की विफलता है और उसे जल्द से जल्द इसे पूरा करना चाहिए. जबकि दुसरे नजरिये से ये विफलता एक महत्वपूर्ण सफलता का आधार बन सकती है.क्योंकि यही तो तय था और दस्तावेज में शामिल किया गया था की, ' प्रतिक्रियावादी ताकते संविधान नही बनने देंगी और इसी आधार पर विद्रोह किया जायेगा'.

रही बात 'मजदूर मोर्चे पर लम्बे समय तक अलग-अलग गुटों में अपना वर्चस्व कायम करने के लिए मार-काट' की तो वर्मा जी को यह कैसे नहीं पता कि मजदूर गुटों में वर्चस्व के सवाल पर विवाद नही है बल्कि लाइन के सवाल पर विवाद है और इसी तरह वाईसीएल भी लाइन के आधार पर ही टूट के कगार पर है. जहाँ तक सांस्कृतिक मोर्चे का सवाल है तो उसने तो बहुत पहले ही, 'प्रचंड पथ' की संस्कृति को त्याग दिया है.जहाँ भी सांस्कृतिक प्रदर्शन हुआ है एक ही बात बार बार कही गई है कि 'यहाँ रुक जाना गलत है'. नेपाल के आन्दोलन की जरा सी समझ रखने वाला व्यक्ति जानता  है कि, 'शीर्ष नेतृत्व पर आर्थिक भ्रष्टाचार के आरोप'नहीं लगाए जा रहे हैं बल्कि पार्टी के प्रचंड समूह पर आर्थिक भ्रष्टाचार के आरोप लगाए जा रहे हैं! और ये आरोप 'लफ्फाज' किरण ने नही बल्कि 'दूरदर्शी' बाबुराम ने लगाये है.

इसके बाद तो वे आवेग में आकर बिना सन्दर्भ के 'नस्लीय' टिप्पणी  कर देते है.वे कहते है “लेकिन भारत के विपरीत नेपाल में एक बार अगर किसी के विरुद्ध लहर चल पड़ी तो उसे रोकना मुश्किल होता है.मुझे लगता है कि यह स्थिति पर्वतीय क्षेत्र के लोगों के मनोविज्ञान में कहीं समायी हुई है.क्योंकि भारत के भी उत्तराखंड में हमें इस तरह की स्थिति का आभास होता है.माओवादी नेताओं को भी इसका आभास जरूर होगा क्योंकि अपनी जनता की मानसिकता को उनसे बेहतर कोई नहीं समझ सकता.” याने जो कोई प्रचंड पर आर्थिक भ्रष्टाचार का आरोप लगाएगा या 'नेतृत्व' को चुनौती देगा वह ऐसा किसी खास 'पर्वतीय मानसिकता' के तहत करेगा!

वर्मा जी ने आगे लिखा है,“पार्टी का कैडर पूरी तरह कंफ्यूज्ड है.नेताओं के वक्तव्यों में एक चालाकी है जिसे अब धीरे-धीरे पार्टी कार्यकर्ता समझने लगा है” यह कथन उस हद तक ठीक है जब तक कि, 'पार्टी का कैडर पूरी तरह कंफ्यूज्ड है और अब धीरे-धीरे पार्टी कार्यकर्ता समझने लगा है'पर सवाल है कि इसके लिए कौन जिम्मेदार है?वर्माजी कैसे इस तथ्य को नज़रअंदाज़ कर देते है कि नेताओं के वक्तव्यों में चालाकी नहीं है बल्कि एक खास नेता याने प्रचंड के वक्तव्यों में एक चालाकी है.प्रचंड को अच्छी तरह पता है कि विद्रोह की लाइन के साथ बने रह कर ही खुद की साख बचाई जा सकती है और शांति की बात करके भारत का विश्वास जीता जा सकता है.वे इसी निति के तहत काम कर रहे है और इसलिए कन्फ्यूजन  बना हुआ है.प्रचंड दोनों नावो में सवारी करना चाहते है. वे एक ही साथ  क्रन्तिकारी भी कहलाना चाहते है और 'राजनेता' भी.

इसके बाद वे पूरी आक्रमकता के साथ किरण पर हमला करते है, “किरण जी को न जाने कैसे अभी भी ऐसा महसूस होता है कि इतने सारे विचलनों के बावजूद पार्टी कार्यकर्ता और आम जनता उनके आह्वान पर विद्रोह के लिए उठ खड़ी होगी.उनके पास इन सवालों का भी कोई जवाब नहीं है कि अगर ऐसा ही था तो पार्टी ने 2006में शांति समझौता क्यों किया,संविधान सभा के चुनाव में क्यों हिस्सा लिया और फिर देश का नेतृत्व संभालने की जिम्मेदारी क्यों ली.क्यों नहीं अप्रैल 2006 में जन आंदोलन-2 के बाद ही नारायणहिती पर कब्जा कर,ज्ञानेन्द्र को महल से खदेड़ कर या उनका सफाया कर अपना झंडा लहरा दिया. किसने आपको रोका था एक और पेरिस कम्यून बनने से..........?”

यहाँ वे यह बताना जरूरी नहीं समझते कि किरण तुरंत विद्रोह की बात नहीं करते बल्कि उसकी प्रक्रिया में जाने की बात कर रहे है.उनका मानना है कि विद्रोह की तैयारी  के लिए गावों  में आधार बनाना चाहिए और चुनाव में जाने का अर्थ माओवादी क्रांति के सन्दर्भ में इस व्यवस्था को स्वीकार करना तो कभी नही था.आनंद जी घोषणा करते है कि यदि विद्रोह होगा तो वह पेरिस कम्यून के निष्कर्ष में पहुचेगा.क्या विद्रोह का दूसरा निष्कर्ष 'सोवियत क्रांति' नहीं हो सकता?और क्या क्रांति करने के लिए  जंगल जाना ही लाजमी है? जब वे यह कह रहे होते है कि, “क्रांतिकारी नारे देना और व्यावहारिक राजनीति से रू-ब-रू होना बहुत टेढ़ा काम है”तो क्या वे भी उसी निराशावादी सोच  के शिकार नहीं लगते जहाँ बदलाव एक मजाक है.एक पुराने समाजवादी को क्रांतिकारी नारे इतने अव्यावहारिक क्यों लग रहे है? और यदि लग भी रहे  हैं  तो दूसरों  को इस तरह की सलाह देने के पीछे उनकी पॉलिटिक्स   क्या है?

आगे वे एक सच्चे मित्र की तरह प्रचंड को बताना नही भूलते कि क्रांति की बातें करना 'लफ्फाजी'है और उन्हें अब अपने कार्यकर्ताओं को धोखे में नहीं रखना चाहिए.वे उन्हें यह भी याद दिलाते है कि, “आप से बेहतर कौन इस सच्चाई को जानता होगा कि 2006 और 2011 में आपके पीएलए,वाईसीएल और सामान्य कार्यकर्ताओं की जो आत्मगत तैयारी थी वह आज 60प्रतिशत से भी ज्यादा कम हो चुकी है.”क्या आनंद जी से यह आशा करना गलत होता कि वे प्रचंड को बताते कि उनके वैचारिक विचलन के कारण ही आत्मगत तैयारी कम हुई है.

प्रचंड  'मुग्धता' में वे प्रचंड को क्रांति का पर्यायवाची  मान लेते हैं और तय कर लेते है की यदि प्रचंड की आत्मगत तैयारी कम है तो जाहिर तौर पर पीएलए,वाईसीएल और सामान्य कार्यकर्ताओं की भी आत्मगत तैयारी कम ही होगी!क्या मार्क्सवाद के जानकार मार्क्सवाद की इस प्रस्थापना को भूल गये कि नेता और क्रांति का जन्म आवश्यकता  के तहत होता है और क्रांति के सामाजिक  कारण होते हैं और यह भी की क्रांति किसी नेता विशेष की इच्छा,उसकी आत्मगत स्थिति के अनुसार आगे नहीं  बढती बल्कि नेता का निर्माण ही क्रांति के विकास के साथ होता है.

आनंद जी को कैसे ये लग गया की नेपाल की क्रांति का यही निर्णायक अंत है.क्या 2006 और आज के बीच उन सभी सामाजिक कारको में आमूल परिवर्तन आ गया है जिस के आधार पर नेपाल में क्रांति अनिवार्य बन गई थी?जब वे बताते है कि,“विद्रोह की बात महज एक लोक-लुभावना नारा पॉपुलिस्ट स्लोगन”है तो वे ऐसा कैसे भूल जाते है कि जनयुद्ध भी एक समय,'लोक-लुभावना नारा पॉपुलिस्ट स्लोगन' ही था.

आगे वे सोच समझकर प्रचंड को सलाह देते है कि वे जल्दी से अपनी निष्ठा बाबुराम के पक्ष में लगा दें  और 'साहस' के साथ कह दें कि, “किरण जी, आप एक यूटोपिया में जी रहे हैं और यथार्थ से बहुत दूर हैं.नेपाल का यथार्थ आज यही है कि किसी भी तरह संविधान  निर्माण का काम पूरा किया जाए और एक दुष्चक्र में फंसी राजनीति को आगे बढ़ाया जाए”.बाप रे बाप एक समाजवादी के लिए समाजवाद 'यूटोपिया' और पूंजीवाद 'यथार्थ'. ऐसा कहने के उनके साहस को 'लाल सलाम'.

इसके बाद वे बहुत ही घातक निष्कर्ष पर पहुचते हैं,जो उनकी पुरानी जनपक्षधरता को देखते हुए हैरान करता है  कि प्रचंड के ऐसा करने से भारत उनका साथी हो जायेगा और “शरद यादव जैसे नेताओं ने लगातार मनमोहन सिंह और शिवशंकर मेनन से संवाद स्थापित कर उन्हें इस बात के लिए राजी किया है कि नेपाल की राजनीति में सबसे बड़ी पार्टी और सबसे ज्यादा समर्थन वाली पार्टी होने के नाते माओवादियों की उपेक्षा नहीं की जा सकती”.आनंद जी गुलामी की पुरानी परंपरा को बचाए रखने का सुझाव प्रचंड को देते वक्त आप किस प्रकार की जनवादी मानसिकता का प्रदर्शन कर रहे है जरा हमें भी समझाइए.नेपाल की जनता का हित क्रांतिकारी  प्रतिरोध में है कि अवसरवादी आत्मसमर्पण में? यह नेपाली जनता के शुभचिंतक का कथन है कि एक भारतीय उग्र राष्ट्रवादी का सुझाव?

बहरहाल आनंद जी के लेख ने यह तो स्पष्ट किया है कि आज के दौर में वैचारिक विचलन न सिर्फ नेपाल की माओवादी पार्टी के एक तबके के भीतर बल्कि उसके पुराने समर्थको के अन्दर भी जड़ जमा चुका है.

(लेखक  नेपाली एकता मंच दिल्ली राज्य के सदस्य हैं. )


परमाणु ऊर्जा घुटनाटेकू राजनीति की मजबूरी है !


संदर्भ केन्द्र की 12वीं सालगिरह के मौके पर इन्दौर प्रेस क्लब में 20अप्रैल को आयोजित कार्यक्रम में  परमाणु मामलों के जानकार  डॉ. विवेक मोंटेरो का दिया गया भाषण...

डॉ. विवेक मोंटेरो

भारत में परमाणु ऊर्जा के पक्ष में तीन बातें कही जाती हैं कि ये सस्ती है,सुरक्षित है और स्वच्छ यानि पर्यावरण हितैषी है। जबकि सच्चाई ये है कि इनमें से कोई एक भी बात सच नहीं है बल्कि तीनों झूठ हैं। देश की जनता को धोखे में रखकर भारत में परमाणु कार्यक्रम बरास्ता जैतापुर जिस दिशा में आगे बढ़ रहा है,वहाँ अगर कोई दुर्घटना नहीं भी होती है तो भी आर्थिक रूप से देश की जनता को एनरॉन जैसे,और उससे भी बड़े आर्थिक धोखे का शिकार बनाया जा रहा है। और अगर कोई दुर्घटना हो जाती है तो आबादी के घनत्व को देखते हुए ये सोचना ही भयावह है लेकिन निराधार नहीं, कि भारत में किसी भी परमाणु दुर्घटना से हो सकने वाली जनहानि का परिमाण कहीं बहुत ज्यादा होगा।

फुकुशिमा में परमाणु रिएक्टरों के भीतर हुए विस्फोटों को ये कहकर संदर्भ से अलगाने की कोशिश की जा रही है कि वहाँ तो सुनामी की वजह से ये तबाही मची। और भारत में तो सुनामी कभी आ नहीं सकती। उन्होंने कहा कि ये सच है कि फुकुशिमा में एक प्राकृतिक आपदा के नतीजे के तौर पर परमाणु रिसाव हुआ लेकिन जादूगुड़ा या तारापुर या रावतभाटा या कलपक्कम आदि जो भारत के मौजूदा परमाणु ऊर्जा संयंत्र हैं, जहाँ कोई बड़ी दुर्घटना नहीं हुई है, ऐसा नहीं है। वहाँ के नजदीकी गाँवों और बस्तियों में रहने वाले लोगों में अनेक रेडियोधर्मिता से जुड़ी बीमारियों का फैलना साबित करता है कि परमाणु विकिरण के असर उससे कहीं ज्यादा हैं जितने सरकार या सरकारी वैज्ञानिक स्वीकार करते हैं।

व्याख्यान देते डॉक्टर विवेक
 लोग आमतौर पर सोचते हैं कि परमाणु ऊर्जा सिर्फ बम के रूप में ही हानिकारक होती है,लेकिन सच ये है कि परमाणु बम में रेडियोएक्टिव पदार्थ कुछ किलो ही होता है और विस्फोट की वजह से उसका नुकसान एकबार में ही काफी ज्यादा होता है,जबकि एक रिएक्टर में रेडियाधर्मी परमाणु ईंधन टनों की मात्रा में होता है। अगर वह किसी भी कारण से बाहरी वातावरण के संपर्क में आ जाता है तो उससे रेडियोधर्मिता का खतरा बम से भी कई गुना ज्यादा बढ़ जाता है। परमाणु ईंधन को ठंडा रखने के लिए बहुत ज्यादा मात्रा में पानी उस पर लगातार छोड़ा जाता है। ये पानी परमाणु प्रदूषित हो जाता है और इसके असर जानलेवा भी होते हैं। फुकुशिमा में ऐसा ही साठ हजार टन पानी रोक कर के रखा हुआ था जिसमें से 11हजार टन पानी समंदर में छोड़ा गया और बाकी अभी भी वहीं रोक कर के रखे हैं। जो पानी छोड़ा गया है,वो भी काफी रेडियोएक्टिव है और उसके खतरे भी मौजूद हैं।

जहाँ तक परमाणु ऊर्जा की लागत का सवाल है तो इसके लिए आवश्यक रिएक्टर तो बहुत महँगे हैं ही और भारत-अमेरिकी परमाणु करार की वजह से हम पूरी तरह तकनीकी मामले में विदेशों पर आश्रित हैं। साथ ही किसी भी परमाणु संयंत्र की लागत का अनुमान करते समय न तो उससे निकलने वाले परमाणु कचरे के निपटान की लागत को शामिल किया जाता है और न ही परमाणु संयंत्र की डीकमीशनिंग (ध्वंस)को। कोई दुर्घटना न भी हो तो भी एक अवस्था के बाद परमाणु संयंत्रों को बंद करना होता है और वैसी स्थिति में परमाणु संयंत्र का ध्वंस तथा उसके रेडिएशन कचरे को दफन करना बहुत बड़े खर्च का मामला होता है। और अगर परमाणु दुर्घटना हो जाए तो उसके खर्च का तो अनुमान ही मुमकिन नहीं। चेर्नोबिल की दुर्घटना से 1986 में 4000 वर्ग किमी का क्षेत्रफल हजारों वर्षों के लिए रहने योग्य नहीं रह गया। परमाणु ईंधन के रिसाव से करीब सवा लाख वर्ग किमी जमीन परमाणु विकिरण के भीषण असर से ग्रस्त है। कोई कहता है कि वहाँ सिर्फ 6 लोगों की मौत हुई जबकि कुछ के आँकड़े 9लाख भी बताये जाते हैं। क्या इसकी कीमत का आकलन किया जा सकता है? विकिरण के असर को खत्म होने में 24500 वर्ष लगने का अनुमान है, तब तक ये जमीन किसी भी तरह के उपयोग के लिए न केवल बेकार रहेगी बल्कि इसे लोगों की पहुँच से दूर रखने के लिए इसकी सुरक्षा पर भी हजारों वर्षों तक खर्च करते रहना पड़ेगा।

फुकुशिमा के हादसे के बाद से दुनिया के तमाम देशों ने अपने परमाणु कार्यक्रमों को स्थ्गित कर उन पर पुनर्विचार करना शुरू किया है। जर्मनी में तो वहाँ की सरकार ने परमाणु ऊर्जा को शून्य पर लाने की योजना बनाने की कार्रवाई भी शुरू कर दी है। खुद अमेरिका में 1976 के बाद से कोई भी नया परमाणु संयंत्र नहीं लगाया गया है। वे सिर्फ दूसरे कमजोर देशों को बेचने के लिए रिएक्टर बना रहे हैं। इसके बावजूद भारत सरकार ऊर्जा की जरूरत का बहाना लेकर जैतापुर में परमाणु संयंत्र लगाने के लिए आमादा है। कारण कि  प्रधानमंत्री डॉ.मनमोहन सिंह ने फ्रांस, ऑस्ट्रेलिया, स्वीडन और रूस के साथ ये करार किया है कि भारत इन चारों देशों से 10-10हजार मेगावाट क्षमता के रिएक्टर खरीद कर अपने देश में स्थापित करेगा। ये हमारे देश की नयी विदेश नीति का नतीजा है जो हमारे सत्ताधीशों ने साम्राज्यवादी ताकतों के सामने गिरवी रख दी है।

महाराष्ट्र के रत्नागिरि जिले में जैतापुर में लगाये जाने वाले परमाणु संयंत्र के बारे में उन्होंने बताया कि वहाँ फ्रांस की अरीवा कंपनी द्वारा लगाया जाने वाला परमाणु संयंत्र खुद फ्रांस में ही अभी सवालों के घेरे में है और हम भारत में उसे लगाने के लिए तैयार हैं। फ्रांस के राष्ट्रपति सरकोजी की पिछले दिनों हुई भारत यात्रा के पीछे भी ये व्यापारिक समझौता ही प्रमुख था। उन्होने विभिन्न स्त्रातों का हवाला देकर बताया कि परमाणु संसाधनों से बनने वाली ऊर्जा न केवल अन्य स्त्रोतों से प्राप्त हो सकने वाली ऊर्जा से महँगी होगी बल्कि वो देश की ऊर्जा की जरूरत को कहीं से भी पूरी कर सकने में सक्षम नहीं होगी। खुद सरकार मानती है कि परमाणु ऊर्जा हमारे मौजूदा कुल ऊर्जा उत्पादन का मात्र 3 से साढ़े तीन प्रतिशत है जो अगले 40 वर्षों के बाद अधिका अधिक 10 प्रतिशत तक पहुँच सकेगी,वो भी तब जब कोई विरोध या दुर्घटना न हो। उन्होंने कहा कि एक मीटिंग में मौजूदा पर्यावरण मंत्री जयराम रमेश ने उनसे बिलकुल साफ कहा था कि महाराष्ट्र के जैतापुर में बनने वाला परमाणु संयंत्र किसी भी कीमत पर बनकर रहेगा और इसकी वजह ऊर्जा की कमी नहीं बल्कि हमारी विदेश नीति और अन्य देशों के साथ हमारे रणनीतिक संबंध हैं।


परमाणु ऊर्जा के नफा -नुकसान को समझते श्रोता
जहाँ तक ऊर्जा की कमी का सवाल है,ये ऊर्जा की उपलब्धता से कम और उसके असमान वितरण से अधिक जुड़ा हुआ है। बहुत दिलचस्प तरह से इसका खुलासा करते हुए उन्होंने मुंबई के एक 27 मंजिला घर की स्लाइड दिखाते हुए कहा कि इस बंगले में एक परिवार रहता है और इसमें हैलीपैड, स्वीमिंग पूल आदि तरह-तरह की सुविधाएँ मौजूद हैं। इस बंगले में प्रति माह 6 लाख यूनिट बिजली की खपत होती है। ये बंगला अंबानी परिवार का है। दूसरी स्लाइड दिखाते हुए उन्होंने कहा कि शोलापुर में रहने वाले दस हजार परिवारों की कुल मासिक खपत भी 6लाख यूनिट की है। अगर देश में बिजली की कमी है तो दस हजार परिवारों जितनी बिजली खर्च करने वाले अंबानी परिवार को तो सजा मिलनी चाहिए लेकिन उल्टे अंबानी को इतनी ज्यादा बिजली खर्च करने पर सरकार की ओर से कुल बिल पर 10 प्रतिशत की छूट भी मिलती है।

पवन,सौर तथा बायोमास जैसे विकल्पों का संक्षेप में ब्यौरा देकर अपनी बात समाप्त करते हुए उन्होंने कहा कि अगर परमाणु ऊर्जा इतनी महँगी, खतरनाक और नाकाफी है तो फिर उसे किस लिए देश की जनता पर थोपा जा रहा है-ये देश के लोगों को देश की सत्ता संभाले लोगों से पूछना चाहिए। अंतरराष्ट्रीय ताकतों के सामने और उनके मुनाफे की खातिर देश की राजनीति और देश के लोगों की सुरक्षा को दाँव पर लगाया जा रहा है। ये मसला ऊर्जा की जरूरत का नहीं बल्कि राजनीति के पतन का है और पतित राजनीति का मुकाबला राजनीति से अलग रहकर नहीं बल्कि सही राजनीति के जरिये ही किया जा सकता है।



अमेरिका से भौतिकी में पीएच.डी.कर लेने के बाद कुछ समय टाटा इंस्टीट्यूट ऑफ फंडामेंटल रिसर्च में पोस्ट डॉक्टोरल रिसर्च फेलो। फिलहाल वे मजदूर संगठन सीटू के महाराष्ट्र के राज्य सचिव हैं और जैतापुर में चल रहे परमाणु संयंत्र विरोधी आंदोलन ‘कोंकण बचाओ समिति’में शामिल हैं।