Apr 19, 2011

अन्ना आन्दोलन के समर्थन में माओवादी


माओवादी पार्टी की ओर से 13 अप्रैल को जारी प्रेस विज्ञप्ति में केंद्रीय कमेटी सदस्य और प्रवक्ता अभय ने देश  में भ्रष्टाचार  के खिलाफ अन्ना के समर्थन में उठे जनउभार का पार्टी की ओर से स्वागत किया है...

लोकपाल विधेयक की मसौदा समिति बनवाने के लिए दिल्ली के जंतर मंतर पर 5 अप्रैल से 9 अप्रैल तक आमरण अनशन पर बैठे अन्ना हजारे अभियान का माओवादियों ने स्वागत किया है।माओवादी पार्टी के प्रवक्ता अभय के मुताबिक जनता में भ्रष्टाचार,भ्रष्ट राजनीतिक पार्टियों तथा उन पार्टियों के नेताओं के प्रति संचित गुस्से का नतीजा ही था कि अन्ना हजारे द्वारा की भूख हड़ताल को देशभर में जनता का समर्थन मिला।

विज्ञप्ति में आगे कहा गया है कि जहां अन्ना के अनशन का लक्ष्य जन लोकपाल विधेयक ही था, वहीं देश के चारों कोनों से व्यक्त हुई जनता की आकांक्षा  तो भ्रष्टाचार का जड़ से सफाया करने की है। लोकपाल विधेयक तैयार करने हेतु कमेटी का गठन कर उसमें आधे सदस्यों का चयन नागरिक समाज से करने का सरकार ने जो फैसला लिया है,इससे इस समस्या का हल हो गया या हो जाएगा, माओवादी पार्टी की निगाह में ऐसा मानना नादानी होगी।


केंद्रीय समिति सदस्य अभय की ओर से जारी इस विज्ञप्ति में जोर देकर कहा गया है कि आज भ्रष्टाचार के इतने गहरे तक जड़ें जमा लेने और बेहिसाब बढ़ जाने का यह कारण नहीं है कि यहां इसे रोकने का कोई कारगर कानून-कायदा ही मौजूद नहीं है। कानून चाहे जितने भी हों,चूंकि उन पर अमल करने और करवाने वाली व्यवस्था पर ही लुटेरे वर्गों का कब्जा है,इसीलिए यह बदहाली व्याप्त है। एक जमाने के जीप घोटाला और लॉकहीड विमान खरीद घोटाले से लेकर राजीव गाँधी  के समय का बोफोर्स घोटाला आदि अनगिनत घोटालों का लम्बा इतिहास रहा है हमारे देश में।

चंद करोड़ रुपयों से शुरू होकर आज लाखों करोड़ रुपए के घोटाले सामने आ गए हैं। कांग्रेस,भाजपा जैसी मुख्य संसदीय पार्टियों से लेकर आरजेडी, बीएसपी, एसपी, डीएमके, अन्ना डीएमके, तेलुगुदेशम वगैरह सभी राष्ट्रीय व क्षेत्रीय पार्टियों के नेता, मंत्री तथा उनके पिट्ठू प्रशासनिक अधिकारी सभी का दामन भ्रष्टाचार से दागदार है। देश में पहले से मौजूद कानूनों पर ठीक से अमलकर और विभिन्न भ्रष्टाचार-विरोध्ी विभागों का ठीक से संचालन कर ऐसे भ्रष्टाचार-घोटालों को रोका जा सकता है तथा उसके लिए जिम्मेदार लोगों को कड़ी सजाएं दिलवाई जा सकती हैं। लेकिन पिछले 64 सालों के ‘आजाद’ भारत के इतिहास में ऐसा एक भी उदाहरण नहीं है जिसमें भ्रष्ट राजनेताओं, मंत्रियों, कार्पोरेट घरानों के मालिकों और नौकरशाहों को कभी कोई सजा मिली हो।

जनता और विपक्ष के दबाव के कारण विरल मौकों पर किसी को गिरफ्तार कर किया भी गया तो सालोंसाल तक खिंचने वाली अदालती कार्रवाई के बाद मामलों को रफा-दफा कर दिया जाता है। बिना किसी सजा के या नाममात्र की सजा से बरी भी कर दिया जाता है। ऐसा इसलिए होता है क्योंकि मौजूदा न्याय व्यवस्था भी देश की शोषक राज्य मशीनरी का अभिन्न अंग है। यह उम्मीद रखना कि कानूनों या न्यायालयों के जरिए भ्रष्टाचार का अंत हो जाएगा, मरीचिका में पानी की उम्मीद रखने के बराबर होगा।

सबसे पहले यह समझना बहुत जरूरी है कि भ्रष्टाचार चंद बुरे लोगों या लोभियों के आचरण से उपजा हुआ मामला नहीं है। भ्रष्टाचार व घोटाले उस पूंजीवादी व्यवस्था का विकृत परिणाम है जिसका मूलमंत्र ही मुनाफे के पीछे भागना है। हालांकि पूंजीवाद ऊपर से लोकतंत्र का चोला ओढ़ा हुआ रहता है तथा आजादी,समानता आदि मूल्यों की रट लगाया करता है,लेकिन वास्तव में वह दूभर श्रम-शोषण, रिश्वतखोरी,दलालखोरी आदि अव्यवस्थाओं से भरा रहता है। इसलिए भ्रष्टाचार और अव्यवस्थाओं को जड़ से खत्म करने का मुद्दा व्यवस्था-परिवर्तन से जुड़ा हुआ सवाल है। यह मानकर चलना एक कोरा भ्रम ही होगा कि देश में मौजूद अर्धऔपनिवेशिक और अर्धसामंती व्यवस्था को बनाए रखते हुए ही चंद बेहतर कानूनों के सहारे से इस समस्या का पूरी तरह समाधान किया जा सकता है।

दरअसल, घोटालों के रूप में जो उजागर होते हैं उनसे कई गुना ज्यादा रोशनी में आए बिना ही रह जाते हैं। उदाहरण के तौर पर आंध्रप्रदेश के मृत मुख्यमंत्री राजशेखर रेड्डी, छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री रमनसिंह, ओड़िशा के मुख्यमंत्री  नवीन पटनायक, झारखण्ड के मुख्यमंत्री   मधु  कोड़ा, शिबू सोरेन, अर्जुन मुण्डा,कर्नाटक के मुख्यमंत्री येदियुरप्पा समेत और कई नेताओं ने जिस प्रकार माइनिंग माफिया से हाथ मिलाकर दलाली खाई और कई बड़ी कम्पनियों के साथ गुप्त एमओयू कर दलाली के रूप में हजारों करोड़ रुपए अवैध रूप से जो कमाए, उसके बारे में यहां तक कि अखबारों ने भी चर्चा की है।

सरकारों द्वारा लागू उदारीकरण, निजीकरण और भूमण्डलीकरण की नीतियों ने ही इस तरह के कई भ्रष्टाचार-घोटालों के लिए तथा देश की सम्पदाओं की मनमानी लूटखसोट के दरवाजे खोल रखे हैं। इस पृष्ठभूमि में इन साम्राज्यवाद-परस्त नीतियों का विरोध किए बिना तथा उनके खिलाफ संघर्ष छेड़े बिना ही भ्रष्टाचार का अंत कर पाने की आस लगाए बैठना या कर पाने का दावा करना जनता को गुमराह करना ही है। लोकपाल विधेयक के लिए सरकार द्वारा सांझी कमेटी की घोषणा की जाने के बाद अन्ना हजारे ने तो अपना अनशन तोड़ दिया, लेकिन जनता को इससे इंसाफ नहीं मिला जो देशभर में उनकी हड़ताल के साथ खड़ी हुई थी।

दरअसल, सरकार ने यह मांग अन्ना की भूख हड़ताल से डरकर पूरी नहीं की, बल्कि उनके समर्थन में उभरकर आए जनता के आक्रोश को ठण्डा करने के लिए की। उससे भी बड़ी बात यह है कि चूंकि शासक वर्ग भलीभांति जानता है कि इस तरह के कानूनों से मौजूदा व्यवस्था को कोई नुकसान नहीं होने वाला है,इसीलिए उन्होंने बेखौफ होकर लोकपाल विधेयक के लिए कमेटी की घोषणा की।

भ्रष्टाचार के खिलाफ देशभर में आगे आई जनता का भारत की कम्युनिस्ट पार्टी (माओवादी) की केन्द्रीय कमेटी स्वागत करती है। भ्रष्टाचार विरोधी संघर्ष का हमारी पार्टी तहेदिल से समर्थन करती है। पार्टी का यह विश्वास है कि जनता के सांझे,संगठित और जुझारू संघर्षों के जरिए ही भ्रष्टाचार का अंत करना संभव हो सकेगा। हमारी पार्टी देश की जनता से आग्रह करती है कि वह सरकार द्वारा घोषित सतही कानूनों और कानून तैयार करने के लिए कमेटियों के गठन की घोषणाओं से संतुष्ट होकर अपने संघर्ष को समाप्त न करे, बल्कि संघर्ष की राह पर दृढ़ संकल्प के साथ आगे बढ़े।

मजदूरों, किसानों, छात्रों, बुद्धिजीवियों, कर्मचारियों, जनता की भलाई चाहने वाले गांधीवादियों समेत तमाम देशभक्त तबकों से माओवादियों ने अपील की है वे देश में कैंसर की तरह फैल चुके भ्रष्टाचार के खिलाफ एक व्यापक संयुक्त मोर्चा बनाकर सड़कों पर उतर आएं। साथ प्रेस विज्ञप्ति में यह सुझाव दिया गया है कि यह नारा बुलंद किया जाए कि उन डकैतों और महाचोरों को सत्ता में एक पल के लिए भी बने रहने का हक नहीं है, जो अंतहीन भ्रष्टाचार व घोटालों में लिप्त होकर देश की जनता का खून-पसीना चूसते हुए लाखों-करोड़ों रुपए का काला धन स्विस बैंकों में छुपा रहे हैं।


नेपाली कवि निभा शाह की कवितायें


मार्क्स की खेती

नीचे-नीचे तहखाना बनाया, वेश्यालय चलाया
ऊपर-ऊपर पार्टी बनाई देश  चलाया
क्या गजब का देश
क्या गजब है देश
वेश्यालय  के दलाल भी खुद
देश के मुखिया भी खुद
दलाल और मुखिया का फ्यूजन
क्या गजब का देश
क्या गजब है देश.

नीचे-नीचे तहखाना बनाया
इंसान की लाश बिछाई
ऊपर-ऊपर बुद्ध की मूर्ति  बनाई
ओम शांति  फैलाई
क्या गजब का देश
क्या गजब है देश
बुद्ध भी खुद
जल्लाद भी खुद
बुद्ध और जल्लाद का फ्यूजन
क्या गजब का देश
क्या गजब है देश.

नीचे-नीचे तहखाना बनाया
रामनाम चलाया
ऊपर-ऊपर हंसिया-हथौड़ा बनाया
मार्क्सवाद चलाया
क्या गजब का देश
क्या गजब है देश
राम का हनुमान भी खुद
मार्क्स का लेनिन भी खुद
लेनिन और हनुमान का फ्यूजन
क्या गजब का देश  
क्या गजब है देश

नीचे-नीचे तहखाना बनाया
देश का व्यापार चलाया
ऊपर-ऊपर मां का हृदय बनाया
राष्ट्रीयता  का नारा चलाया
क्या गजब का देश
क्या गजब है देश
लेन्डुप भी खुद
भीमसेन भी खुद
लेन्डुप और भीमसेन का फ्यूजन
क्या गजब का देश
क्या गजब है देश

गांधारी की पट्टी कब खुलेगी
जब गांधारी की पट्टी खुलेगी
एक दिन होगा
वो मेरा देश।

फुटनोट : - 1. लेन्डुप : 1971 में सिक्किम के भारत में विलय के समय सिक्किम का प्रधानमंत्री
2. भीमसेन : 1800 सदी  के आस पास नेपाल-ब्रिटिश  के बीच चले भीषण  युद्धों में नेपाली सेना का
प्रधान सेनापति, जिसके नेतृत्व में नेपाल की गोरखाली सेना ने कई युद्धों में अंग्रेजों को हराया।
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मनसरा

पसीना बहाकर ही अगर दुनिया बदलनी होती
तो फिर क्या था मनसरा
भरिया की दुनिया कब की बदल गयी होती
खून बहाकर ही अगर दुनिया बदल गयी होती
तो क्या था मनसरा
जनता की दुनिया कब की बदल गयी होती
जबकि मनसरा
खून-पसीने से ही तो दुनिया बदलती है
खून-पसीने से न बदली हुई दुनिया क्यों नहीं बदलती
कभी आग की भरभराहट सुनी है मनसरा
आग बोलती है-आग की आवाज सुनो मनसरा

खुद की चीरी हुई लकड़ी
आग कोई और जलाये
आग अपनी नहीं होती मनसरा
आग अपनी न होने से उजाला अपना नहीं होता
उजाला अपना नहीं होने से दुनिया नहीं बदलती मनसरा
कभी आग की भरभराहट सुनी है मनसरा
आग बोलती है-आग की आवाज सुनो मनसरा

खुद की खोरिया खनी गयी खेत
औरों के नाम पर नामकरण होने से
मिट्टी अपनी नहीं होती
मिट्टी अपनी नहीं होने से
पेटभर अनाज नहीं होता
पेटभर अनाज न होने से
दुनिया नहीं बदलती मनसरा
कभी आग भुरभुराते हुए सुना है मनसरा
आग बोलती है, आग की आवाज सुनो मनसरा।

खुद की चलायी हुई बंदूक
निर्देशन कोई और करे
सत्ता अपनी नहीं होती
सत्ता अपनी न होने से
दुनिया नहीं बदलती मनसरा
कभी आग भरभराते हुए सुना है मनसरा
आग बोलती है, आग की आवाज सुनो मनसरा।


(पहली बार चर्चित नेपाली प्रगतिशील मासिक पत्रिका मूल्याङ्कन में मार्च २००९ में अंतर्राष्ट्रीय  महिला दिवस के अवसर पर प्रकाशित।)फुटनोट  -1. भरिया; भूमिहीन खेतीहर मजदूर  2. खोरिया; जमीन का एक हिस्सा जिसे पहली बार जंगल काट कर खेती योग्य बनाया गया.मूलतः  थारु भाषा का शब्द. 3. मनसरा  : दमित और उत्पीडित जनता का प्रतीक.
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शहीद

क्रांति के व्यापार में
शहीद का खून प्रधानमंत्री बन जाता है
शहीद के सपने मूर्ति बन जाते हैं।
और जब क्रांति व्यापार में बदल जाती है
तो शहीद का खून
21वीं सदी का जंगबहादुर बन जाता है।
शहीद मूर्ति बन जाते हैं
जनता गांधारी बन जाती है।
(३ फरवरी 2011)

फुटनोट:1. जंगबहादुर - नेपाल में 104 साल तक चले राणा वंश  का  संस्थापक  तानाशाह प्रधानमंत्री
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लालबहादुर का छौंका

नेपाल की सार्वभौमिकता साउथ ब्लाक में गिरवी  रखने के बाद
कुर्सी फल प्राप्ति होने वाले इस देश में
कल तक जनता के रक्त से पिचकारी खेलने वाले भी यही
आज शहीद के सम्मान में मौन धारण करने वाले भी यही
यही ही क्यूं
वो भी तो,
वही लालबहादुर का छौंका

औरों की चीरी हुई लकड़ी
खुद बेचने वाले लालबहादुर
औरों की जलायी हुई आग
खुद तापने वाले लालबहादुर
औरों के बनाये हुए झण्डे खुद फहराने वाले लालबहादुर
औरों के चलाये हथियार खुद आत्मसमर्पण करने वाले लालबहादुर
औरों के सिले हुए कपड़े खुद पहनने वाले लालबहादुर

हां वही लालबहादुर
इस दौर में क्या कर रहे हैं पता है मनसरा?
इस दौर में तो लालबहादुर का छौंका
नाभि  के नीचे चोली और नाभि के ऊपर पेटीकोट पहनकर
तुंडीखेल और कैंटोनमेंट के रंगमंच में बिना नकाब के लाखे नाच नाच रहे हैं

हां इस दौर के फागुन 1 में लालबहादुर
बिना नकाब के लाखे नाच नाच रहे हैं
इसलिए तो

अब यह देश चाहिये किसको?
यह देश पराजितों को चाहिए
पराजितों का इतिहास होगा
पराजित ही लिखेंगे
थबांग और सुखानी की गाथा
अद्दाम और कालीकोट की गाथा
क्योंकि 
पराजितों को ही नया महाभारत चाहिए
पराजितों को ही नया विश्व  चाहिए
पराजित ही लिखेंगे नया महाभारत
अपने हस्ताक्षर का एक नया महाभारत।
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फुटनोट: (22 जनवरी 2011 को लिखी गयी कविता. उसी दिन शक्तिखोर  कांटोनमेंट  में शान्ति समझौते के तहत नेपाली  माओवादी पार्टी के प्रमुख प्रचण्ड और तत्कालीन प्रधानमंत्री  माधव कुमार नेपाल ने जनमुक्ति सेना (नेपाल) को विशेष समिति के अन्तर्गत रखने के लिए समझौता किया था.)
1. टूंडीखेल - काठमांडू स्थित नेपाली सेना मुख्यालय द्वारा अधिगृहित   पार्क
2. लाखे नाच- नेवारी जनजाति का एक प्रसिद्ध नृत्य जिसमें  पुरुष बुरका पहन या भड़कीले मुखड़े लगा कर नाचते हैं.
3. फागुन 1:  इस दिन को नेपाली माओवादी जनयुद्ध दिवस के रूप में मनातें हैं.
4. थावांग- नेकपा माओवादी द्वारा शुरु किये गए जनयुद्ध का अति महत्वपूर्ण केंद्र जिसे उन्होंने नेपाल के येनान की संज्ञा दी.
5. सुखानी-  सत्तर के दशक में झापा जिले के एक गाँव में नेपाली कम्युनिस्ट  द्वारा संगठित किसान  विद्रोह  जिसे तत्कालीन पंचायत तानाशाही ने निर्ममता से कुचल दिया.
6. अछाम - पशिमी नेपाल के अछाम जिला. 16 फरवरी 2002 में अछाम जिले के मुख्यालय मंगलसेन में नेपाली माओवादी जनमुक्ति सेना द्वारा शाही नेपाली सेना पर किया गया भीषण हमला.
7. कालिकोट-  पुलिस दमन के विरोध  में 10 मई 1999 को कालिकोट जिले के पवानघात में निशस्त्र ग्रामीण महिलाओं ने  पुलिसवालों से बड़ी मात्रा में हथियार  कब्जे में लिए.



प्रारम्भिक  शिक्षा  कालिकोट और काठमांडू  में हुई.  बाद  में भारत (लखनऊ , दिल्ली) से  पत्रकारिता  की  पढाई. 
इसी  दौरान नेपाल में चल रहे माओवादी जनयुद्ध से गहरे प्रभावित हुईं और दिल्ली पुलिस द्वारा 10  जुलाई 2002 को नेपाली माओवादी नेता पार्थ क्षेत्री  के साथ गिरफ्तार. अगले  दिन नेपाली शाही सेना को सुपुर्दगी के बाद करीब  2 साल नेपाल के विभिन्न जेलों  में सजायाफ्ता.   नेपाली साहित्य जगत में चर्चित 'पारिजात साहित्यिक  पुरस्कार' से हाल में इन्हें सम्मानित किया गया है. नेपाल की   इस कवि से जनज्वार के पाठकों का परिचय जेएनयू से समाज शास्त्र में पीएचडी कर रहे पवन पटेल के जरिये हो पाया है. मूल नेपाली से हिन्दी अनुवाद भी पवन ने ही किया है.



Apr 18, 2011

अन्ना हजारे और इरोम शर्मिला


अपनी वैधता बनाये रखने के लिए कारपोरेट जगत विरोध के सीमित और नियंत्रित स्वरूपों को तैयार करता है ताकि कोई उग्र विरोध न पैदा हो सके जो उनकी बुनियाद और पूंजीवाद की संस्थाओं को हिला दे...

आनंद स्वरूप वर्मा

मणिपुर की इरोम शर्मिला 4 नवंबर 2000 से भूख हड़ताल पर हैं। पिछले साल उनकी भूख हड़ताल के 10 वर्ष पूरे हुए। उनकी मांग है कि आर्म्ड फोर्सेज स्पेशल पॉवर्स ऐक्ट समाप्त किया जाय जिसने मणिपुर को एक सैनिक छावनी का रूप दे दिया है। इस ऐक्ट की आड़ में मानव अधिकारों का अंतहीन हनन तो हो ही रहा है इसने सेना,पुलिस और नौकरशाही के स्तर पर जबर्दस्त भ्रष्टाचार को जन्म दिया है। इस अर्थ में देखें तो इरोम शर्मिला की लड़ाई अन्ना हजारे की लड़ाई से किसी मायने में कम नहीं है।

आज अन्ना हजारे के अनशन को कवर करने में लगे अराजनीतिक राजदीप सरदेसाई से लेकर किसी जमाने के धुर वामपंथी पुण्य प्रसून वाजपेयी की कैमरा टीम जो गला फाड़-फाड़ कर ‘दूसरी आजादी’का जश्न मना रही थी और जिसे अन्ना हजारे में गांधी से लेकर भगत सिंह के दर्शन हो रहे थे, वह उस समय कहां थी जब इरोम शर्मिला अपने बेहद कमजोर शरीर लेकिन फौलादी संकल्प के साथ जंतर मंतर में लेटी हुई थीं। आर्यसमाज से नक्सलवाद और जनता पार्टी से आर्यसमाज तथा फिर आर्यसमाज से माओवाद तक के घुमावदार रास्तों से चढ़ते उतरते किसी अज्ञात मंजिल की तलाश में भटक रहे स्वामी अग्निवेश को क्या कभी महसूस हुआ कि इरोम शर्मिला जिस मकसद के लिए लड़ रही हैं उसमें भी वह अपना योगदान कर सकते   हैं  ।

अन्ना हजारे और इरोम शर्मिला
बेशक अगर 2006 में टेलीविजन कैमरों की बटालियन वहां तैनात होती तो ढेर सारे कैमरोन्मुखी आंदोलनकारी वहां नजर आते। हिंसात्मक आंदोलनों की व्यर्थता को रेखांकित करने के मकसद से जो लोग यह प्रचारित करने में सारी ताकत लगा रहे हैं कि शांतिपूर्ण तरीके से आंदोलन के जरिए सरकार को झुकाया जा सकता है,जो अन्ना हजारे ने महज चार दिन में कर दिखाया. उनकी पीलियाग्रस्त आंखों से इरोम शर्मिला का 10 वर्षों से चलाया जा रहा शांतिपूर्ण आंदोलन क्यों नहीं दिखायी दे रहा है।

प्रख्यात बुद्धिजीवी नोम चोम्स्की ने काफी पहले अपने महत्वपूर्ण लेख ‘मैन्यूफैक्चरिंग कांसेंट’में बताया था कि किस प्रकार मीडिया जनमत को अपने ढंग से हांकता और आकार देता है। किस तरह से वह अपने वर्णनों, आख्यानों, झूठों और फरेबों को सच मानने के लिए जनमत को प्रेरित करता है। पिछले कुछ वर्षों से जब से भारत में टेलीविजन चैनलों की बाढ़ आ गयी है,हम इसकी मनमानी को देख और झेल रहे हैं। नोम चोम्स्की ने जहां मीडिया के इस पहलू को उजागर किया वहीं एक दूसरे बुद्धिजीवी,ओटावा विश्वविद्यालय में अर्थशास्त्र के प्रोफेसर माइकेल चोसुदोवस्की ने ‘मैन्युफैक्चरिंग डिसेंट’ के जरिए बताया कि किस प्रकार आज के पूंजीवाद के लिए जरूरी है कि वह जनतंत्र के भ्रम को बनाये रखे।

उनका कहना है कि ‘कारपोरेट घरानों के एलीट वर्ग के हित में है कि वे विरोध और असहमति के स्वर को उस हद तक अपनी व्यवस्था का अंग बनाये रखें जब तक वे बनी बनायी सामाजिक व्यवस्था के लिए खतरा न पैदा करें। इसका मकसद विद्रोह का दमन करना नहीं बल्कि प्रतिरोध आंदोलनों को अपने सांचे में ढालना होता है। अपनी वैधता बनाये रखने के लिए कारपोरेट जगत विरोध के सीमित और नियंत्रित स्वरूपों को तैयार करता है ताकि कोई उग्र विरोध न पैदा हो सके जो उनकी बुनियाद और पूंजीवाद की संस्थाओं को हिला दे।’दूसरे शब्दों में कहें तो ‘डिसेंट’ (असहमति) को मैन्युफैक्चर (निर्माण) करने का मकसद अपनी व्यवस्था को बचाये रखने के लिए सेफ्टी वॉल्व तैयार करना है।

अन्ना हजारे ने भ्रष्टाचार के जिस मुद्दे को उठाया वह निश्चित तौर पर एक ऐसा मुद्दा था जिसके लिए आंदोलन की वस्तुगत स्थितियां पूरी तरह तैयार थीं और जिससे हर तबके के लोग घुटन महसूस कर रहे थे। फिर भी यह मुद्दा ऐसा नहीं था जो व्यवस्था की चूलें हिला देता और जिसे चैनलों ने इस तरह पेश किया गोया कोई मुक्ति आंदोलन चल रहा हो। क्रिकेट वर्ल्ड कप के दौरान अंधराष्ट्रवाद फैलाने की होड़ में लगे मीडिया बांकुरों ने अचानक एक ऐसा मुद्दा पा लिया जिस पर वे चौबीसो घंटे शोर कर सकें।

सैकड़ों की भीड़ को हजारों की भीड़ बताकर और लोकपाल विधेयक  के बरक्स जनलोकपाल विधेयक को नये संविधान निर्माण जैसा दिखा कर इन्होंने अन्ना हजारे के कद को इतना ऊंचा करना चाहा जितना कि खुद उन्होंने भी कल्पना नहीं की थी। पूरे देश में तो नहीं लेकिन दिल्ली और बंबई सहित प्रमुख शहरों में जहां इन चैनलों को देखा जा रहा था लोगों के अंदर इस ‘दूसरे स्वतंत्रता आंदोलन’में भाग लेने की होड़ पैदा की गयी और इसमें  चैनलों को सफलता भी मिली।

इस पूरे प्रकरण में कुछ बातें, जो अब तक धुंधले  रूप में सामने आती थीं बहुत खुलकर दिखायी देने लगीं। देश की 80 प्रतिशत आबादी के प्रति उपेक्षा का भाव रखने वाले इन कारपोरेटधर्मी चैनलों ने किन लोगों को सबसे ज्यादा उद्वेलित किया। अन्ना हजारे के समर्थन में जिन लोगों ने आवाजें उठायीं उनके नामों को देखें तो भ्रष्टाचार के खिलाफ अन्ना के स्वर में स्वर मिलाने वालों का पाखंड खुद ही सामने आ जाएगा। ये नाम हैं अमिताभ बच्चन, अभिषेक बच्चन, रितिक रोशन, फरहान अख्तर, प्रियंका चोपड़ा, मधुर  भंडारकर, अनुपम खेर, रितेश देशमुख, शाहिद कपूर, बिपासा बसु, जूही चावला, राहुल बोस, विवेक ओबेराय, दिया मिर्जा, प्रतीश नंदी, आदि आदि।

ये बंबई के फिल्म जगत के लोग थे जिन्हें इतना तो पता है कि बॉलीवुड में काले धन की क्या भूमिका है पर जिनमें से 90प्रतिशत लोगों को मालूम ही नहीं होगा कि लोकपाल विधेयक /जन लोकपाल विधेयक है क्या। इन लोगों पर चैनलों द्वारा पैदा किए गए हिस्टीरिया का प्रभाव था। जेल में सजा काट रहे बिहार के माफिया पप्पू यादव ने अन्ना के समर्थन में अनशन शुरू किया। गजब का समां था- नरेंद्र मोदी की बिरादरी से लेकर भाकपा-माले (लिबरेशन) सब अन्ना के समर्थन में बदहवास जंतर मंतर पहुंचे।

लेकिन अन्ना हजारे को समर्थन देने वालों में जब देश के कॉरपोरेट घरानों की सूची पर निगाह गयी तो लगा कि सारा कुछ वैसा ही नहीं है जैसा दिखायी दे रहा है। कॉरपोरेट घरानों से जो लोग अन्ना के समर्थन में खुलकर सामने आये वे थे बजाज ऑटो के चेयरमैन राहुल बजाज,गोदरेज ग्रुप के चेयरमैन आदि गोदरेज,महिंद्रा एंड महिंद्रा के ऑटोमोटिव ऐण्ड फार्म इक्विपमेंट सेक्टर के अध्यक्ष पवन गोयनका,हीरो कारपोरेट सर्विसेज के चेयरमैन सुनील मुंजाल,फिक्की के डायरेक्टर जनरल राजीव कुमार, एसोचाम के अध्यक्ष दिलीप मोदी तथा अन्य छोटे मोटे व्यापारिक घराने।

हो सकता है कि यह अनशन कुछ और दिनों तक चलता तो भ्रष्टाचार विरोधी इस महायज्ञ में आहुति डालने मुकेश अंबानी और अनिल अंबानी भी पहुंच जाते। जो लोग यह सवाल करते हैं कि अन्ना के आंदोलन के लिए पैसे कहां से आ रहे हैं या कहां से आयेंगे अथवा एनजीओ सेक्टर की क्या भूमिका है, उनकी मासूमियत पर तरस आता है। अन्ना से पूछो तो उनका यही जवाब होगा कि जनता पैसे देगी लेकिन इस विरोध का निर्माण करने वाली शक्तियां इनकी फंडिंग की भी व्यवस्था करती हैं।

एक बार फिर हम माइकेल चोसुदोवस्की के लेख की उन पंक्तियों को देखें जिसमें उन्होंने कहा है कि विरोध की ‘फंडिंग’का मतलब है ‘विरोध आंदोलन के निशाने पर जो लोग हैं उनसे वित्तीय संसाधनों को उन तक पहुंचाने की व्यवस्था करना जो विरोध आंदोलनों को संगठित कर रहे हैं। किसी व्यापक जनआंदोलन की आशंका का मुकाबला करने के लिए ‘मुद्दा आधारित’ विरोध आंदोलन को बढ़ावा दिया जाता है और इसके लिए धनराशि जुटायी जाती है।’अपने इस लेख में उन्होंने यह भी बताया है कि किस तरह सत्ता के भीतरी घेरे में ‘सिविल सोसायटी’ के नेताओं को शामिल किया जाय।

पिछले कुछ वर्षों से इस व्यवस्था को चलाने वाली ताकतें इस बात से बहुत चिंतित हैं कि भारत के मध्य वर्ग और खासतौर पर शहरी मध्य वर्ग का रुझान तेजी से रेडिकल राजनीति की तरफ हो रहा है और उसे वापस पटरी पर लाने के लिए देश के स्तर पर कोई ऐसा नेतृत्व नहीं है जिसकी स्वच्छ छवि हो और जिसे राजनीतिक निहित स्वार्थों से ऊपर उठा हुआ चित्रित किया जा सके। अन्ना हजारे के रूप में उसे एक ऐसा व्यक्ति मिल गया है जिसके नेतृत्व को अगर कायदे से प्रोजेक्ट किया जाय तो वह तेजी से रेडिकल हो रही राजनीति पर रोक लगा सकता है। इसमें सत्ताधारी वर्ग, जिसमें देश के कारपोरेट घराने तो हैं ही, मध्य वर्ग का ऊपरी तबका भी है, का हित पूरी तरह जुड़ा हुआ है।

अन्ना हजारे के मंच पर दिखने वाले प्रतीक पहली नजर में हिंदुत्ववाद का एहसास कराते हैं। एक समाचार के अनुसार आर एस एस के महासचिव सुरेश जोशी ने अन्ना हजारे को अपना समर्थन व्यक्त करते हुए एक पत्र लिखा जिसे संगठन के प्रवक्ता राम माधव ने उन तक पहुंचाया। यह अनायास ही नहीं है कि 24 मार्च को भाजपा नेता वेंकैया नायडू ने एक वक्तव्य में कहा था कि भ्रष्टाचार के खिलाफ शंखनाद के लिए आज जेपी जैसे एक नेता की जरूरत है। जंतर मंतर से उत्साहित अन्ना की योजना है पूरे देश में सभाएं करने और किसी बड़े आंदोलन की भूमिका तैयार करने की। ऐसे में चार दिनों के अनशन और उससे पैदा सवालों पर गंभीरता से विचार करना बहुत जरूरी है।



जनपक्षधर पत्रकारिता के महत्वपूर्ण स्तंभ और मासिक पत्रिका 'समकालीन तीसरी दुनिया' के संपादक. यह लेख वहीं से साभार प्रकाशित किया जा रहा है.






Apr 17, 2011

धोखे की टट्टी खड़ी करती मीडिया


ब्रेकिंग न्यूज के माध्यम से उन्मादी पागलपन भरा एक ऐसा माहौल बनाया जाता है,जिसका यर्थाथ व विवेक से कुछ भी लेना-देना नहीं है। ऊपर से कामर्शियल ब्रेक, ‘दाद में कोढ़’ का काम करती है...

मुकुल

केंद्र सरकार द्वारा उत्तराखंड को दी गयी सात वर्षीय टैक्स छूट की अवधि समाप्त हुई तो स्थानीय मीडिया ने खूब शोर मचाया। कहा कि टैक्स छूट की अवधि नहीं बढ़ी तो कारखानों को नुकसान होगा और वे कारोबार समेटने को मजबूर होंगे। लेकिन पिछले सात वर्षों से मालिकों ने कितना मुनाफा बटोरा है,मज़दूर किस दुर्दशा और बदहाली में जी रहे हैं,इस मुद्दे पर मीडिया ने मूंह पर जाबी लगाये रखना ही मुनासिब समझा।


ढाई-तीन हजार की मामुली पगार पर 12-12 घण्टे मज़दूरों के खटने से लेकर गैरकानूनी ठेकेदारी प्रथा के वर्चस्व पर कभी मीडिया का ध्यान नहीं जाता। बेहद अमानवीय परिस्थितियों में मजदूरों का खटना भी उनकी खबर का हिस्सा नहीं बनतीं। न ही घायल होने,अकाल मौत के मुहं में समा जाने और बगैर मुआवजे नौकरी से निकाल दिये जाने की घटनाएं मीडिया की सुर्खियों बनते देखी जाती हैं।

फटाफट खबरो के शो,ब्रेकिंग न्यूज के धमाल और देर रात की सनसनी के बीच जनपक्षधर खबरें गायब होती जा रही हैं। वहीं दुनिया के अरबपतियों की सूची में शामिल धनाढ्यों और विश्वसुंदरियों के तमाशे और क्रिकेट का जुनून टीवी-अखबार की सुर्खियों में छाये रहते हैं। वैश्विक मंचों पर भारत के कथित विरोध को मीडिया खूब उछालेगा,लेकिन देश की जनता के हितों को तिलांजलि देकर शाषकों के समर्पण पर मौन साध लेगा। संयोग से कहीं कुछ जनपक्षधर खबर छप गयी तो भीतरी सम्मोहक विज्ञापनों के धुंधलके  में खो जायेगी। यही नहीं चैनलों में विज्ञापन की भरमार किसी घटना, प्रसंग, मुद्दे या विषय की सम्पूर्णता का भाव समझने के दर्शकों-पाठकों के न्यूनतम सामर्थ्य को और कम कर देती है।

आज ज्यादातर समाचार के नाम से जो परोसा जा रहा है, उसे सुनना-देखना-पढ़ना बेहद जोखिम भरा है। सच के नाम पर ये सूचनाओं का अम्बार ‘धोखे की टट्टी’खड़ा करते हैं। जाहिर है ये दिलो-दिमाग पर बहुत गहराई से प्रभाव डालते हैं और एक खास किस्म के (बाजारू) विचारों की छाप छोड़ते चले जाते हैं। ‘ब्रेकिंग न्यूज’के माध्यम से उन्मादी पागलपन भरा एक ऐसा माहौल बनाया जाता है, जिसका यर्थाथ व विवेक से कुछ भी लेना-देना नहीं है। ऊपर से ‘कामर्शियल ब्रेक’ ‘दाद में कोढ़’ का काम करती हैं। मीडिया की पूरी प्रस्तुति इतनी शातिराना और तयशुदा होती हैं कि तमाम प्रगतिशील बुद्धिजीवी तक विभ्रम के शिकार बन जाते हैं।

दरअसल, भारी आबादी आज ‘विचार नियंत्रण’ की एक बेहद असरदार प्रणाली के फंदे में बुरी तरीके से फंसी हुई है। उसके सामने ‘चुनने’की आज़ादी है,चुन ले -सास-बहू के झगड़े या स्वयंबर का तड़का, जासुसी मारधाड़, पुनर्जन्म या काल-कपाल, सानिया-शोएब की शादी, आई.पी.एल/क्रिकेट का धमाल या फिर सांस लेने वाला जूता, अनलिमिटेड टॉक टाइमवाले सिम का लफड़ा, ईर्श्यालू बनाता साबुन, सुपरमैन बनाता कोल्डड्रिंक। ऊपर से तुर्रा यह कि ‘जनता की यही पसंद है।’भ्रम ऐसा कि हेराफेरी की शिकार जनता को यह विश्वास हो जाये कि यही स्वाभाविक और अपरिहार्य है।

लगभग दो दशक पूर्व,जब देश में इलेक्ट्रानिक मीडिया-विशेषतया निजी चैनलों की पैठ बन ही रही थी, तब दूरदर्शन पर अपवाद स्वरूप प्रदर्शित ‘कबीर’सीरियल बहुत लोकप्रिय होने लगा था। बमुश्किल तेरह कड़ियां पूरी होते-होते इसे बन्द कर दिया गया। तबसे सैकड़ों चैनल खुल गये,परंतु ‘साधो ये मुर्दों का गांव’ जैसा दूसरा सीरियल देखने को नहीं मिला। ‘हमलोग’, ‘बुनियाद’ या ‘तमस’ जैसे मध्यवर्ग को केन्द्र में रखकर बनने वाले सीरियल भी गायब हाते गये। समाचार चैनलों की बाढ़ सी आ गयी लेकिन समाचारों का टोटा बढ़ता ही गया। क्या यह सुनियोजित साजिश नहीं है?

अगर हम गौर करें तो पाएंगे कि पूरी मीडिया लोगों को निष्क्रिय बनाती है। निश्क्रियता के दो आयाम होते हैं -भौतिक व बौद्धिक। ‘मानस प्रबंधन’की तकनीकें और संदेश इन दोनों का कुशलतापूर्वक इस्तेमाल करते हैं। गौर करें,लोग ज्यादा समय टेलीवीजन पर बिताते हैं और कमरे से बाहर निकलने में उनमें जरा भी उत्साह नहीं होता। दूसरी तरफ,मोबाइल आज हर आदमी की पहुंच में है। बहुतेरे लोग इसका इस्तेमाल गेम खेलने, एस.एम.एस. भेजने, विज्ञापन सुनने-पढ़ने, स्कीमें देखने और बेवजह के गपशप में खर्च करते हैं। युवा पीढ़ी अपना समय ‘नेटवर्क’सर्चिंग में जाया करती है। बच्चे कम्प्यूटर के झूठे कल्पना लोक में विचरण करते हैं।


यह पूंजी की सत्ता द्वारा लम्बे समय में विकसित ‘विचारों के प्रबन्धन’की एक ऐसी तकनीक है,जो मानव मन को अपने अनुरूप ढालने का काम करती है। ‘जाहिल जनता’ को ‘अनिवार्य भ्रमों’ के माध्यम से धोखे में रखना और उसकी आत्मा पर कब्जा करना ही जिसका उद्देश्य है। पूरी मीडिया जोड़-तोड़ वाले ऐसे संदेशों-कार्यक्रमों को परोसती है,जो इरादतन यथार्थ का मिथ्याबोध रचता है,जिससे ऐसी चेतना का निर्माण होता है, जो वास्तविक जीवन की सच्चाई को नहीं समझ सकता। वे विचारों से परिपूर्ण आमोद-प्रमोद व मनोरंजन की पूरी झड़ी लगा देते हैं। मन रूपी छन्नी पर लगातार हमला होता रहता है, हर घण्टे दर्जनों घोषणाएं बहायी जाती हैं, जो संवेदनहीन स्वीकार्य को जन्म देती है। लोगों को पता ही नहीं चलता कि वे जोड़-तोड़ के शिकार हो रहे हैं। लोग,विशेष रूप से नौजवान आत्ममुग्धता के -सिर्फ अपने लिए जीने की संस्कृति के शिकार होते हैं और दुर्दशा-असफलता का कारण खुद के भीतर ढ़ूढ़ रहे होते हैं।

दरअसल,आज संचार माध्यम दैत्याकार उद्योग का रूप ले चुके हैं। और इस काम में लगे हुए हैं लोकप्रिय संस्कृति के सभी नए-पुराने रूप-टीवी, और रेडियो शो, एनिमेटेड कार्टून, फिल्में, कॉमिक पुस्तकें, बड़े पैमाने पर होने वाले खेल, समाचार पत्र और पत्रिकाएं, मोबाइल, नेटवर्क सर्चिंग आदि। जहां सुनियोजित तरीके से सामाजिक यथार्थ और अतंरविरोध गायब रहते हैं। कम्प्यूटर-मोबाइल-इंटरनेट के इस युग में - जहां बेब सर्चिंग से लेकर ईमेल, फेसबुक, ट्यूटर तक उपलब्ध हैं - हक़ीक़त यह है कि जनता असलियत से लगातार कटती जा रही है। यह यूँ  ही नहीं है कि सूचना-समाचार पर दुनिया की पॉच बड़ी एजेंसियों का कब्जा है। वैश्विक लूट की शक्तियों ने एक ऐसा तंत्र बना रखा है, जो जनता के दिमाग को एक मिनट भी सोचने नहीं देतीं। इन शक्तियों का फण्डा है कि दिमाग में घुसकर बैठ जाओ,हाथ व दिल उनके अनुरूप काम करने लगेंगे।

‘जनता के मन-मस्तिष्क को नियंत्रण में रखने’ की लम्बे समय से विकसित यह तकनीक आज एक विशालकाय जनसम्पर्क उद्योग ;पब्लिक रिलेशन इण्डस्ट्रीद्ध का रूप ले चुकी है। उद्योग जगत के शहंशाहों ने एक लम्बी प्रक्रिया में इसे विकसित किया और व्यवहार में उतारा। समाज को नियंत्रित करने के लिए पूंजीवाद के पास जितने भी औजार हैं,उनमें संचार माध्यमों की उपयोगिता और अपरिहार्यता सर्वाधिक तेज गति से बढ़ी है। उन्होंने प्रचार माध्यमों का जबर्दश्त इस्तेमाल करते हुए इसको एक पूरी प्रणाली के रूप में विकसित किया है।

सर्वाधिक महत्वपूर्ण विकास 1990के दशक का ग्लोबल बिजनेस मीडिया सिस्टम का उदय है। पर्सनल कम्प्यूटर, मोबाइल फोन और इन्टरनेट के विकास ने इसमें अहम भूमिका निभाई। यही वह समय है जब पूरी दुनिया अमेरिका के नेतृत्व में एक ध्रुवीय एक नये बाजार तंत्र में बंध गयी। यह दैत्याकार बहुराष्ट्रीय निगमों की बढ़ती जकड़बन्दी के साथ मुट्ठीभर हाथों में दुनिया की सम्पदा केन्द्रित होते जाने और भारी आबादी की तबाही व कंगालीकरण के बढ़ते जाने का दौर था। यह यू ही नहीं है। दरअसल,आज वैश्विक लूट का सबसे कारगर हथियार है,सांस्कृतिक वर्चस्व कायम करना। और समाज को नियंत्रित करने के जितने भी औजार बाजार की शक्तियों ने विकसित किये हैं, उनमें सबसे कारगर संचार माध्यम ही हैं।



 मजदूर आन्दोलन में सक्रिय. पिछले तीन दशक से सामाजिक-राजनितिक आंदोलनों में सक्रिय. उनसे   mukul40@gmail.com  पर संपर्क किया जा सकता है.


Apr 16, 2011

बिनायक सेन की रिहाई का मतलब

सुप्रीम कोर्ट ने अपनी टिप्पणी  से न केवल छत्तीसगढ़ सरकार की लचर दलील की बखिया उधेड़  दी है, बल्कि रमन सिंह सरीखी सरकारों की असली नीयत से पर्दा भी उठा दिया है...
पीयूष पंत

डॉक्टर सेन की रिहाई के लिए देश-विदेश
में लोग सड़कों पर उतर आए थे.
मानवाधिकार कार्यकर्ता और जन चिकित्सक डाक्टर बिनायक सेन को सुप्रीम कोर्ट से मिली जमानत बिनायक सेन, इलिना सेन और उनके परिवार की निजी जीत के साथ- साथ भारतीय लोकतंत्र, जन सरोकार पर गहरी आस्था और नागरिक समाज की अदम्य ऊर्जा की भी जीत है.यह जीत हमारे उस लोकतांत्रिक अधिकार की भी है जिसके तहत हम विचारधारा विशेष का साहित्य पढ़ने या किसी भी तरह की जानकारी हासिल करने के लिए पूरी तरह आज़ाद हैं,यानी कि ज्ञान प्राप्त करने की हमारी जिज्ञासा न केवल हमारा नैसर्गिक बल्कि संवैधानिक अधिकार भी है.

सुप्रीम कोर्ट ने अपनी टिप्पणी से यह साफ कर दिया है कि विचारधारा विशेष का साहित्य रखने या पढ़ने से ही यह साबित नहीं हो जाता है कि आप उस विचारधारा के अनुयायी भी हैं. वैसे भी ज्ञान कि धारा और सूचना की बयार अविरल बहनी ही चाहिए. किसी भी समाज के सभ्य, प्रगतिशील और विकसित होने की यह पहली शर्त है.इसलिए छत्तीसगढ़ सरकार का यह बचकाना तर्क कि डाक्टर बिनायक सेन के पास माओवादी साहित्य पाया गया इसलिए वे राज्य के खिलाफ साज़िश में शामिल थे. इसे सुप्रीम कोर्ट ने खारिज कर दिया.उसने इस ओर भी इशारा किया कि माओवादी विचारधारा का अध्ययन करना राज्यविरोधी गतिविधि नहीं है.न ही यह हिंसक विचारधारा है,यह उतनी ही हिंसक हो सकती है जितनी महत्मा गाँधी कि आत्मकथा.

छत्तीसगढ़ की रमन सिंह की भाजपा सरकार ने केवल माओवादी साहित्य रखने और पढने को संगीन अपराध मानते हुए डाक्टर बिनायक सेन को नक्सली करार दे दिया था. वहां की एक निचली अदालत ने उन्हें देशद्रोही बताते हुए आजीवन कारावास की सजा भी सुना दी थी.

सालों से मानवाधिकारों की रक्षा के लिए मुस्तैद और घने जंगलों में बसे उपेक्षित आदिवासियों को ज़रूरी चिकित्सा सुविधा मुहैया करवाने में निस्वार्थ भाव से लगे डाक्टर बिनायक सेन के लिए इससे ज्यादा क्रूर मज़ाक और क्या हो सकता था?

सुप्रीम कोर्ट ने अपनी टिपणी से न केवल छत्तीसगढ़ सरकार की लचर दलील की बधिया उखेड दी है बल्कि रमन सिंह सरीखी सरकारों की असली नीयत से पर्दा भी उठा दिया है.

 आम जानकारी यह है कि डाक्टर बिनायक सेन द्वारा राज्य की ओर से प्रायोजित कार्यक्रम सलवा जुडूम की लगातार आलोचना रमन सिंह सरकार को नहीं सुहा रही थी,इसलिए उनकी आवाज को बंद करने के लिए उसे एक हथियार चाहिए था. उसे लगा कि बिनायक सेन को माओवादी घोषित कर आसानी से उन्हें काल कोठरी में डाला जा सकता है. इस तरह सरकारी नीतियों और कार्यक्रमों की आलोचना करने वाले लोकतंत्र के हिमायती लोगों को संदेश भी दिया जा सकता है.वैसे भी मेरे महान देश क़ी सरकारों के लिए जनता के नैसर्गिक और संवैधानिक अधिकारों को कुचलने और उसकी आवाज को दबाने के लिए माओवाद और आतंकवाद रेडिमेड हथियार बन गए हैं.

भूमंडलीकरण को कॉरपोरेटी लूट का चारागाह बनाने वाली विकसित देशों और कुछ विकासशील देशों की सरकारों के लिए आतंकवाद और माओवाद उम्दा हथियार साबित हुए हैं, न केवल कॉरपोरेटी लूट और सरकारी दलाली के खिलाफ उठती जागरूक जनता की आवाज को कुचलने में बल्कि इन दोनों "वाद" के नाम पर आने वाली राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय सहायता से नेता-अधिकारियों की जेबें भरने में भी.

माओवाद को राज्य के खिलाफ हिंसा भड़काने वाले दर्शन और माओवादियों को आतंकवादी के रूप में प्रचारित करने वाली सरकारें क्या बताएंगी की सलवा जुडूम जैसे कार्यक्रम चला कर जनता के एक वर्ग को दूसरे के खिलाफ हिंसक व्यवहार अपनाने के लिए प्रेरित कर या फिर कश्मीर और पूर्वोत्तर के राज्यों में सेना द्वारा लोकतांत्रिक अधिकारों के लिए लड़ रही जनता पर गोली चलवा कर कौन सी रामधुन सुनवाई जा रही है. शायद ‘वैदिक हिंसा हिंसा न भवती’ की तर्ज़ पर हमारे देश की विभिन्न सरकारें मानने लगी हैं कि सरकारी हिंसा को हिंसा नहीं कहा जा सकता है.

हमें तो इंतज़ार है उस दिन का जब एक और बिनायक सेन लंबी यंत्रणा झेलते हुए सुप्रीम कोर्ट को यह टिप्पणी करने के लिए मजबूर कर देगा कि लोकतंत्र में अपने अधिकारों के लिए संघर्ष कर रही जनता पर सरकारों द्वारा किया गया किसी भी प्रकार का हमला 'हिंसक' ही माना जाएगा. उस कुकृत्य के लिए जिम्मेदार अधिकारी, मंत्री या फिर मुख्यमंत्री आजीवन कारावास की सजा भुगतेगा.

फिलहाल तो सुप्रीम कोर्ट न्याय का मान रखने और उन तमाम प्रबुद्ध नागरिकों की संभावित रिहाई का मार्ग प्रशस्त करने के लिए बधाई का पात्र है, जिन्होंने पूंजीवादी विकास की कलई उजागर करने का खामियाजा सीखचों के पीछे जीवन बिता कर भरना पड़ रहा है.


लेखक वरिष्ठ पत्रकार और पत्रिका 'लोक संवाद'के संपादक हैं.उनसे panditpant@gmail.com    पर संपर्क किया जा सकता है.





भ्रष्ट व्यवस्था का सेफ्टी वाल्व बनेगा अन्ना आन्दोलन

अण्णा हजारे की पांचों मांगें मान ली गयीं हैं. शासकवर्ग भी किसी ऐसे ही आन्दोलन  के जरिए भ्रष्टाचार की समस्या को अस्थायी तौर पर हल करना चाहता था. इस आंदोलन ने सरकार के लिए एक तरह से सेफ्टीवाल्व का ही काम किया...

जयप्रकाश नरेला

गांधीवादी    नेता अण्णा हजारे लोकपाल बिल को संसद में पास कराकर वर्तमान व्यवस्था में फैले भ्रष्टाचार को खत्म करना चाहते  हैं. वे  मानते हैं कि लोकपाल भ्रष्टाचार पर अंकुश लगाएगा और प्रधानमंत्री तक पर कार्रवाई  करने का अधिकार रखेगा.अन्ना के इस सपने को पूरा करने की नूराकुश्ती आज से मसौदा समिति ने शुरू कर दी  है और देश भ्रष्टाचार ख़त्म करने वाली  उस जादुई छड़ी का इंतज़ार कर रहा है.  

किसी भी देश की अर्थव्यस्था और उसके ऊपरी ढांचे (राजनीति,सामाजिक संस्थान, संस्कृति, कला और साहित्य) को चलाने के लिए उत्पादन उसका आधार होता है,जैसे कृषि और उद्योग. भारत में उत्पादन के दोनों साधनों पर चंद उद्योगपतियों का कब्जा है.ये सभी उद्योग मुनाफे पर आधारित हैं. मुनाफा श्रम का शोषण है.यह मुनाफा, शोषण की इस व्यवस्था में लगातार बढ़ता गया. भारत का संविधान निजि उद्योगों पर व्यक्तिगत अधिकार की गारंटी देता है.इनकी सुरक्षा के लिए उसमें पर्याप्त प्रावधान भी है.पूंजी के तंत्र पर आधारित उसकी संस्कृति सामाजिक व्यवस्था में फल-फूल रही है.
समर्थन में हिरोइन उर्मिला मांतोडकर

यहां हर चीज बिकाऊ है.हर चीज एक उत्पाद है.सामाज का नैतिक मूल्य पैसा बनता जा रहा है, क्योंकि पूंजीवादी समाज व्यक्ति प्रधान,व्यक्तिपूजक, निजि संपत्ति और पद की प्रतिष्ठा पर आधारित है. पूंजीवादी व्यवस्था विशिष्ट व्यक्ति को ही सम्मान देने की संस्कृति विकसित करती है, न की मेहनत और ईमानदारी जैसे नैतिक मूल्यों और मान्यताओं को. हमारी शिक्षा व्यवस्था भी इसी को बढ़ावा देती है.उसका उद्देश्य पढ़-लिखकर समाज पर रोब गांठना और किसी भी तरह बेतहाशा पैसा कमाना बन गया है. समाज में अमीर को ही इज्जत मलती है, गरीब को नहीं. भले ही वह कितना भी ईमानदार क्यों न हो.

अण्णा हजारे अपने आंदोलन में आर्थिक ढांचे की बात नहीं उठा रहे हैं.वे आर्थिक ढांचे पर खड़े राजनीतिक और सामाजिक ढांचे की बात कर रहे हैं. वे राजनीतिक ढांचे में सुधार की बात कर रहे हैं. वे पेड़ के जड़ की नहीं, उसकी कोपलों और टहनियों की बात कर रहे हैं. वे कोपलों में सुधार चाहते हैं.पेड़ की जड़ से अण्णा को कोई गुरेज नहीं है. कहा जाता है कि जैसा बीज होगा वैसा ही पौधा और उसकी कोपलें होंगी. यहां बीज तो पूंजीवाद है. लेकिन वे ऊपरी ढांचा समाजवाद का बनाना चाहते हैं. अण्णा हजारे ने साफ भी कर दिया है कि वर्तमान व्यवस्था में भ्रष्टाचार कभी पूरी तरह से खत्म नहीं होगा.

अण्णा जिस जन लोकपाल बिल की बात कर रहे हैं उससे भ्रष्टाचार कितना खत्म होगा यह तो आने वाला समय बताएगा.लेकिन सवाल यह है कि भ्रष्टाचार को पूरी तरह खत्म करने की मुहिम न चलाने के पीछे इस आंदोलन की मजबूरी क्या है?भ्रष्टाचार कुछ कम हो जाए लेकिन ज्यादा नहीं, यह भी कोई बात हुई.  जाहिर तौर पर भ्रष्टाचार पूरी व्यवस्था से समूल नष्ट होना चाहिए. इसके लिए आंदोलन और उपाय होने चाहिए.

अगर हम इस आंदोलन के चारित्र को देखें तो इसका उद्देश्य वर्तमान पूंजीवादी व्यवस्था में सुधार कर इसे और मजबूत बनाना है. इसलिए यह आंदोलन इसी व्यवस्था के भीतर की लड़ाई है. इस का नेतृत्व चाहता है कि पूंजीवाद और निजी  पूंजी पर आधारित इस व्यवस्था में कुछ लुटेरे उद्योगपतियों की व्यवस्था बनी रहे. इसके लिए भ्रष्टाचार थोड़ कम कर दिया जाए. इसलिए मध्यवर्ग का ऊपरी हिस्सा इस आंदोलन का हिस्सा बन गया.पूरे आंदोलन में किसी ने भी आर्थिक ढांचे पर सवाल नहीं उठाए और उसको भ्रष्टाचार के लिए जिम्मेदार नहीं ठहराया.

अण्णा के पांच दिन के इस आंदोलन में मजदूर, किसान और गरीब जनता का कहीं नजर नहीं आई. जो नजर आए उनमें 50हजार से तीन लाख रुपए प्रतिमाह की तनख्वाह पाने वाले या छोटे-मोटे व्यापारी थे.यहां यह कहना अतिश्योक्ति नहीं होगा कि इस आंदोलन को भारत की मीडिया ने चलाया. मीडिया की वजह से इस अभियान को प्रोत्साहन मिला. इसे फोर्ड फाउंडेशन का पूरा समर्थन था. लेकिन आंदोलन के चार दिन बाद का घटनाक्रम चौंका देने वाला था.

शासकवर्ग ने अण्णा हजारे की पांचों मांगें मान लीं.शासकवर्ग भी किसी ऐसे केंद्र के जरिए इस समस्या को अस्थायी तौर पर हल करना चाहता था. इस आंदोलन ने सरकार के लिए एक तरह से सेफ्टीवाल्व का ही काम किया. एक समय तो केंद्रीय मंत्री कपिल सिब्बल ने अपरिक्वता के कारण यह भी कह दिया कि बिल बेरोजगारी, गरीबी, महंगाई, बिजली-पानी और तमाम समस्याओं का समाधान कैसे करेगा? लेकिन आकाओं की फटकार पड़ते ही वे चुप्पी साध गए. लेकिन वे सही बात कह गए.

भारत में दो तरह के वर्ग हैं, एक वह जो मेहनत-मजदूरी कर कमाता है, दूसरा वह जो उनकी कमाई को हर तरह से लूटता है.अण्णा हजारे और उनके साथियों से पूछा जाए कि भारत के उद्योगपति और कारपोरेट घराने किस वर्ग में हैं?उनसे यह भी पूछा जाए कि भ्रष्टाचार का जनक इनमें से कौन है?क्या वे भ्रष्टाचार के जनक को खत्म करने के लिए कभी आंदोलन करेंगे?मुझे तो ऐसा नहीं लगता है कि वे कभी ऐसा करेंगे,क्योंकि वैचारिक और दर्शन के धरातल पर अण्णा शासक वर्ग के ही हिस्से नजर आते हैं.

अण्णा का अभियान पांचवे दिन ही क्यों खत्म हो गया?शासकवर्ग और आंदोलनकारियों को यह बखूबी पता था कि जितना काम करना है, उतना करो, लंबा खिंचने से व्यवस्था के विरोध में यदि स्वत: स्फूर्त आंदोलन चल गया होता तो अण्णा हजारे और शासकवर्ग के लिए एक नई मुश्किल पैदा हो जाएगी. ऐसे में अण्णा पीछे रह जाते और आंदोलन आगे निकल जाता. इसलिए अभियान को पांच दिन में ही निपटा दिया गया. 

मध्यवर्ग का निचला हिस्सा वास्तव में भ्रष्टाचार से दिन-प्रतिदिन जूझ  रहा है. उसकी चेतना को आगे छंलाग लगानी थी.लेकिन इस चेतना का विकास अण्णा हजारे और उनकी टीम या शासकवर्ग के पहुंच के बाहर की चीज है. तब यह आंदोलन शायद सामाजिक, राजनीतिक, आर्थिक व्यवस्था विरोधी आंदोलन की शक्ल अख्तियार कर लेता.शासकवर्ग चाहता था कि इस मसले पर अन्य वर्गों की लामबंदी न हो जाए. इसलिए आंदोलन को जल्द से जल्द निपटा दिया गया.

अन्ना की मांग के लिए जंतर मंतर पर उतरे युवा

यहां हमारा कहना यह है कि पूंजी पर खड़े तंत्र का पूंजी द्वारा निर्मित संस्कृति में भ्रष्टाचार भी उसी का हिस्सा है. इसे संपूर्णता में समझना होगा.केवल एक कानून उसका समाधान नहीं हो सकता है.आमूलचूल परिवर्तन ही भ्रष्टाचार और समाज के सभी दोषों से समाज को मुक्ति दिला सकता है. अण्णा हजारे की सोंच और उनके आंदोलन की यही सीमाएं हैं.

हम भ्रष्टाचार को थोडा-बहुत  समाप्त नहीं करना चाहते हैं, जैसा अण्णा हजारे कह रहे हैं. हम भ्रष्टाचार को समूल खत्म करना चाहते हैं.इसका रास्ता क्या होगा और इसकी मंजिल क्या होगी?यह किसी आंदोलन और उसके नेतृत्व के सामने शीशे की तरह साफ होना चाहिए.इसके बाद ही आंदोलन को उसके अंजाम तक पहुंचाया जा सकता है.

हमे पहले भ्रष्टाचार के असली कारण को समझना होगा.यह पनपा कैसे?इसे खाद-पानी कहा से मिला? यह नीचे के आदमी तक कैसे पहुंचा? व्यवस्था और समाज कैसे भ्रष्ट हो गया?

इसका दोष भारत के अर्थतंत्र में नजर आता है.यह अर्थशास्त्र पूरे भात में ऐसी मूल्य-मान्यताओं और संस्कृति को बढ़ावा दे रहा है और सामाजिक स्पर्धा को जन्म दे रहा है, जो एक-दूसरे को लूटें. एक दूसरे का शोषण करें.ज्यादा से ज्यादा धनवान बने.ऐसी बाजारू संस्कृति में मानवीय गरिमा में लगातार गिरावट आना एक स्वाभाविक प्रक्रिया है.

 इस प्रक्रिया में लोग रीढ़विहीन केंचुए जैसे बनने लगते हैं. वे पूंजी के दास बन जाते हैं. आज संस्कृति,मानवीय मूल्यों और गरिमा पर पैसे और पूंजी तंत्र का शासन है.यही हमारे समाज का अर्थशास्त्र है. अण्णा की पांच दिनी आंदोलन इसका इलाज तो कतई नहीं है. यह एक लंबी और सतत चलने वाली लड़ाई है. राजनीतिक सुधार न होकर व्यवस्था परिवर्तन ही इसका एकमात्र उपाय है.



Apr 15, 2011

बिनायक सेन को मिली ज़मानत


सुप्रीम कोर्ट ने मानवधिकार कार्यकर्ता और चिकित्सक बिनायक सेन की ज़मानत याचिका को मंज़ूरी दे दी है. काग़ज़ी कार्रवाई पूरी होने के बाद उन्हें आज  शाम तक या शनिवार को रिहा होने की उम्मीद जताई जा रही है.

कोर्ट ने अपने निर्देश में कहा है,"बिनायक सेन के ख़िलाफ़ राजद्रोह का आरोप नहीं बनता.हम एक लोकतांत्रिक देश हैं, बिनायक नक्सलियों  से सहानुभूति रखने वालों में से हो सकते हैं लेकिन इस बिनाह पर उनके ख़िलाफ़ राजद्रोह का मामला नहीं लगाया जा सकता."

बिनायक सेन के ख़िलाफ़ राजद्रोह का आरोप नहीं बनता. हम एक लोकतांत्रिक देश हैं, बिनायक नकस्लियों से सहानुभूति रखने वालों में से हो सकते हैं लेकिन इस बिनाह पर उनके ख़िलाफ़ राजद्रोह का मामला नहीं लगाया जा सकता.

कोर्ट का निर्देश

इससे पहले सरकारी वकील ने तर्क देते हुए कहा था कि बिनायक सेन को ज़मानत न दी जाए. वकील के मुताबिक अगर बिनायक सेन को ज़मानत मिली तो वे छत्तीसगढ़ में प्रत्यक्षदर्शियों को प्रभावित कर सकते हैं जैसा कि अमित शाह ने गुजरात में किया था. इस पर जज ने कहा कि दोनों व्यक्तियों की तुलना नहीं हो सकती और फिर ज़मानत याचिका को मंज़ूरी दे दी.

मामला

बिनायक सेन को पिछले साल रायपुर की एक अदालत ने माओवादियों से सांठ गांठ रखने, उन्हें सर्मथन देने और राजद्रोह के लिए उम्र क़ैद की सज़ा सुनाई थी.

इस आदेश के ख़िलाफ़ उन्होंने बिलासपुर उच्च न्यायालय का दरवाज़ा भी खटखटाया था लेकिन वहाँ उनकी अर्ज़ी ख़ारिज हो गई थी जिसके बाद सुप्रीम कोर्ट में अपील की गई थी. हाई कोर्ट में दाखिल की गई अपील में बिनायक सेन ने कहा था कि अभियोजन पक्ष के कोई ठोस सबूत पेश नहीं कर पाने के बावजूद निचली अदालत ने उन्हें दोषी क़रार देकर सज़ा सुनाई है.

बिलासपुर उच्च न्यायलय में उनके मामले की पैरवी मशहूर वकील राम जेठमलानी ने की थी.जेठमलानी भारतीय जनता पार्टी के सांसद भी हैं और छत्तीसगढ़ में उन्हीं की पार्टी की सरकार है.अदालत मे दाख़िल किए गए अपने हलफ़नामे में छत्तीसगढ़ सरकार ने दावा किया था कि बिनायक सेन ने देश में नक्सलवाद के विस्तार में समर्थन दिया है और इस काम में हर तरह की मदद मुहैया करवाई है.

बिनायक सेन की गिरफ़्तारी और सज़ा का राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कड़ा विरोध हुआ है और विश्व की जानी मानी हस्तियों ने भारतीय प्रधानमंत्री से उनकी रिहाई की अपील की थी.
बीबीसी से साभार

ठेकेदारों के कब्जे में अस्पताल


जनज्वार.कैसी विडंबना है कि आज जब पूरा देश भ्रष्टाचार पर बात कर रहा है तब उत्तर प्रदेश के डॉक्टर आंदोलन की चेतावनी दे रहे हैं.यह खबर विशेष रूप से इसलिए ध्यान आकर्षित करती है और महत्वपूर्ण भी लगती है कि घोर भ्रष्टाचार के युग में नेता,नौकरशाह और माफ़िया का जो गठबंधन बना है, यह खबर उसी की पुष्टि करती है.

लखनऊ में 2 अप्रैल  को सी.एम.ओ (मुख्य चिकित्साधिकारी-परिवार कल्याण) डॉ. बी.पी. सिंह की बदमाशों ने गोली मार कर हत्या कर दी. अभी 5 माह पूर्व ही इसी पद पर कार्यरत डॉ. विनोद आर्या की इसी तरह गोली मार कर हत्या की थी और अब दूसरे सी.एम.ओ की भी उसी तरह गोली मार कर हत्या कर दी गयी.

चूँकि  इस वक़्त भ्रष्टाचार पर विस्तृत बहस छिड़ी हुई है इसलिए यह मामला अधिक विचारणीय हो जाता है और यह नेता,नौकरशाह और माफ़िया के अंतर्संबंधों को समझने में मदद कर सकता है.पहले यह समझें, सी.एम.ओ(परिवार कल्याण ) क्या है ? इस पद का सृजन पिछले साल ही किया गया है.

पिछले साल तक सी.एम.ओ ही स्वास्थ्य विभाग के सभी काम (परिवार कल्याण सहित)देखता था. पिछले वर्ष डी.पी.ओ (ज़िला कार्यक्रम अधिकारी) नाम से एक नए पद का सृजन किया गया. ऐसा माना जाता है कि इस पद का सृजन परिवार कल्याण मंत्री बाबू लाल कुशवाहा और स्वास्थ्य मंत्री अनंत कुमार मिश्रा के आपसी तालमेल न हो पाने के कारण हुई.

ऐसी खबरें भी उड़ीं कि डी.पी.ओ के पद सृजन से सी.एम.ओ नाराज़ थे क्योंकि अधिकांश   बजट  परिवार कल्याण की कमान थामे डी.पी.ओ के हाथ में चला गया था. बाद में जब इस पद पर और विवाद हुआ तो इस पद का नाम बदल कर डी.पी.ओ से सी. एम.ओ (परिवार कल्याण) कर दिया और पहले से मौजूद सी.एम.ओ के पद को को सी.एम.ओ (प्रशासन) कर दिया.

पिछले वर्ष डी.पी.ओ के पद सृजन के बाद अगस्त में क़रीब 2000 BAMS, BHMS,BUMS Doctors की एक साल के कॉंट्रेक्ट पर भर्ती की गईं. हालाँकि इस बात का कोई सबूत नहीं है लेकिन  चयनित डॉक्टरों से संपर्क करने  या विभाग में ही जानकारी जुटाने पर पता चलता है कि इन कॉंट्रेक्ट भर्तियों में एक से सवा लाख रुपया घूस के रूप में अभ्यर्थियों को देना पड़ा है.

गौरतलब है कि परिवार कल्याण में स्वास्थ्य का अधिकांश बजट आता है.भारी मात्रा में दवाएं, गाड़ियां,यंत्र वगैहरा के ठेके उठाए गए हैं. इसी को लेकर  पहले सी.एम.ओ बीपी सिंह  ( परिवार कल्याण) की एक ठेकेदार से झड़प हुई थी, जिसके बाद उनकी हत्या कर दी गयी. जाहिर तौर पर चाहे सीएमओ    विनोद    आर्य   की  हत्या का मामला हो या बीपी सिंह का,दोनो ही  हत्याओं में ठेकेदार माफ़ियाओं का हाथ है.

सी.एम.ओ विनोद आर्य की हत्या को 5 महीने से अधिक हो गए हैं,लेकिन पुलिस हत्यारों को गिरफ्तार नहीं कर सकी है.  ऐसा इसलिए कि  माफ़ियाओं पर नेताओं का हाथ है.