Feb 25, 2011

लेखक व पत्रकार अनिल सिन्हा नहीं रहे



जाने माने लेखक व पत्रकार अनिल सिन्हा नहीं रहे। 25 फरवरी को दिन के 12 बजे पटना के मगध अस्पताल में उनका निधन हुआ। 22 फरवरी को जब वे दिल्ली से पटना आ रहे थे, ट्रेन में ही उन्हें ब्रेन स्ट्रोक हुआ। उन्हें पटना के मगध अस्पताल में अचेतावस्था में भर्ती कराया गया। तीन दिनों तक जीवन और मौत से जूझते हुए अखिरकार आज उन्होंने अन्तिम सांस ली। उनका अन्तिम संस्कार पटना में ही होगा।


 उनके निधन की खबर से पटना, लखनऊ, दिल्ली, इलाहाबाद आदि सहित जमाम जगहों में लेखको, संस्कृतिकर्मियों के बीच दुख की लहर फैल गई। जन संस्कृति मंच ने उनके निधन पर गहरा दुख प्रकट किया है। उनके निधन को जन सांस्कृतिक आंदोलन के लिए एक बड़ी क्षति बताया है।

ज्ञात हो कि अनिल सिन्हा एक जुझारू व प्रतिबद्ध लेखक व पत्रकार रहे हैं। उनका जन्म 11 जनवरी 1942 को जहानाबाद, गया, बिहार में हुआ। उन्होंने पटना विश्वविद्दालय से 1962 में एम. ए. हिन्दी में उतीर्ण किया। विश्वविद्दालय की राजनीति और चाटुकारिता के विरोध में उन्होंने अपना पी एच डी बीच में ही छोड़ दिया। उन्होंने कई तरह के काम किये।

 प्रूफ रीडिंग, प्राध्यापिकी, विभिन्न सामाजिक विशयों पर शोध जैसे कार्य किये। 70 के दशक में उन्होंने पटना से ‘विनिमय’साहित्यिक पत्रिका का प्रकाशन शुरू किया जो उस दौर की अत्यन्त चर्चित पत्रिका थी। आर्यवर्त,आज,ज्योत्स्ना, जन,दिनमान से वे जुड़े रहे। 1980में जब लखनऊ से अमृत प्रभात निकलना शुरू हुआ उन्होंने इस अखबार में काम किया। अमृत प्रभात लखनऊ में बन्द होने के बाद में वे नवभारत टाइम्स में आ गये। दैनिक जागरण,रीवाँ के भी वे स्थानीय संपादक रहे। लेकिन वैचारिक मतभेद की वजह से उन्होंने वह अखबार छोड़ दिया।

अनिल सिन्हा बेहतर,मानवोचित दुनिया की उम्मीद के लिए निरन्तर संघर्ष  में अटूट विश्वास रखने वाले रचनाकार रहे हैं। वे मानते रहे हैं कि एक रचनाकार का काम हमेषा एक बेहतर समाज का निर्माण करना है,उसके लिए संघर्श करना है। उनका लेखन इस ध्येय को समर्पित है।

 वे जन संस्कृति मंच के संस्थापकों में थे। वे उसकी राष्ट्रीय परिषद के सदस्य थे। वे जन संस्कृति मंच उत्तर  प्रदेश के पहले सचिव थे। वे क्रान्तिकारी वामपंथ की धारा तथा भाकपा माले  से भी जुड़े थे। इंडियन पीपुल्स फ्रंट जैसे क्रान्तिकारी संगठन के गठन में भी उनकी भूमिका थी। इस राजनीति जुड़ाव ने उनकी वैचारिकी का निर्माण किया था।
कहानी, समीक्षा, अलोचना, कला समीक्षा, भेंट वार्ता, संस्मरण आदि कई क्षेत्रों में उन्होंने काम किया। ‘मठ’ नम से उनका कहानी संग्रह पिछले दिनों 2005 में भावना प्रकाषन से आया। पत्रकारिता पर उनकी महत्वपूर्ण पुस्तक ‘हिन्दी पत्रकारिता इतिहास,स्वरूप एवं संभावनाएँ’ प्रकाशित  हुई। पिछले दिनों उनके द्वारा अनुदित पुस्तक ‘सामा्राज्यवाद का विरोध और जतियों का उन्मुलन’छपकर आया थ। उनकी सैकड़ों रचनाएँ पत्र पत्रिकाओं में छपती रही है।


उनका रचना संसार बहुत बड़ा है,उससे भी बड़ी है उनको चाहने वालों की दुनिया। मृत्यु के अन्तिम दिनों तक वे अत्यन्त सक्रिय थे तथा 27फरवरी को लखनऊ में आयोजित,नागार्जुन व केदार जन्तषती आयोजन के वे मुख्य कर्मा.णर्ता थे।

उनके निधन पर शोक  प्रकट करने वालों में मैनेजर पाण्डेय, मंगलेश डबराल, वीरेन डंगवाल, आलोक धन्वा, प्रणय कृष्ण, रामजी राय, अशोक भैमिक, अजय सिंह, सुभाष चन्द्र कुशवाहा, राजेन्द्र कुमार, भगवान स्वरूप कटियार, राजेश कुमार, कौशल किशोर, गिरीश चन्द्र श्रीवास्तव, चन्द्रेश्वर, वीरेन्द्र यादव, दयाशंकर राय, वंदना मिश्र, राणा प्रताप, समकालीन लोकयुद्ध के संपादक बृजबिहारी पाण्डेय आदि रचनाकार प्रमुख हैं।

अपनी संवेदना प्रकट करते हुए जारी वक्तव्य में रचनाकारों ने कहा कि अनिल सिन्हा आत्मप्रचार से दूर ऐसे रचनाकार रहे हैं जो संघर्ष में यकीन करते थे। इनकी आलोचना में सृर्जनात्मकता और शालीनता दिखती है। ऐसे रचनाकार आज विरले मिलेंगे जिनमे इतनी वैचारिक प्रतिबद्धता और सृर्जनात्मकता हो। इनके निधन से लेखन और विचार की दुनिया ने एक अपना सच्चा व ईमानदार साथी खो दिया है।


Feb 24, 2011

विदेशों में जमा काला धन बनाम राजनीतिक हथकंडे


विदेशों में जमा काले धन के मुद्दे को लेकर भारत में मची हाय-तौबा की आड़ में तमाम नेता,राजनीतिक दल तथा राजनीति में पदार्पण करने की इच्छा पालने वाले कई नए चेहरे इस विषय पर कुछ ज्यादा ही दलीलें पेश कर रहे हैं...

 तनवीर जाफरी

भारतीय अर्थव्यवस्था,यहां व्याप्त गरीबी एवं  बेरोज़गारी,कायदे-कानून तथा अपनी ज़रूरत के लिए विदेशी बैंकों से समय-समय पर कर्ज लेते रहने जैसे हालात नि:संदेह किसी भी भारतीय को इस बात की इजाज़त नहीं देते कि वह अपने धन को देश के बजाए विदेशी बैंकों में जाकर जमा करे। वह भी केवल इसलिए कि उसने नाजायज़ और गलत तरीके से धन इकट्ठा  किया है। ऐसे लोग उस धन को दुनिया की नज़रों से सिर्फ इसलिए छुपाकर रखना चाहते हैं कि एक तो उनका धन सुरक्षित रह सके दूसरा,वह भारतीय वित्तीय कानूनों से बचे रह सकें और तीसरा,वह स्वयं को बदनामी से बचा सके।

पश्चिमी देशों के काला धन जमा करने वाले इन बैंकों में गोपनीयता बरकरार रखने के इतने ऊंचे पैमाने निर्धारित किए गए हैं कि अभी तक स्पष्ट रूप से किसी भी खातेदार का नाम और उसकी कुल जमाराशि का खुलासा नहीं हो पाया है। कल को विकीलीक्स जैसी वेबसाईट  या  खोजी पत्रकारिता के चलते कुछ नाम उजागर हो जाए तो यह अलग बात है। ऐसे बैंक 'काला धन'शब्द को भी अपने तरीके से परिभाषित करते हैं। भारत में पिछले कुछ महीनों से विदेशी बैंकों में जमा काले धन का मुद्दा बहुत गरमाया हुआ है। इससे ऐसा लगता है गोया इस विषय पर शोरगुल और हंगामा बरपाने  वालों को इस बात का पता चल चुका हो कि किस व्यक्ति का कितना धन किस देश के किस बैंक में जमा है।


इसमें कोई संदेह नहीं कि भारत के आर्थिक हालात ऐसे नहीं हैं कि इस प्रकार के नकारात्मक आर्थिक वातावरण का सामना किया जा सके। इस विषय पर पूरी गंभीरता से काम किया जाना चाहिए तथा विदेशों में जमा काला धन यथाशीघ्र देश में वापस लाने के प्रयास करने चाहिए। इतना ही नहीं, ऐसे गैरकानूनी कामों में लिप्त लोगों को चाहे वह कितनी ही ऊंची हैसियत रखने वाले क्यों न हों उन्हें कानून के अनुसार सख्त सज़ा भी दी जानी चाहिए।

इनके नाम यथाशीघ्र उजागर किए जाने चाहिए, ताकि आम जनता यह समझ सके कि नेता, अभिनेता, अधिकारी, समाजसेवी या धर्मगुरु अथवा व्यापारी का लबादा ओढ़े हुए ये लोग वास्तव में वैसे नहीं है जैसे दिखाई देते हैं। साधु के भेष में छपे ये शैतान देश के  सबसे बड़े दुश्मन हैं। अवैध धन की जमाखोरी करने वाले यही वे लोग हैं जिनके कारण भारत को गरीब देश कहा जाने लगा है।

विदेशों में जमा काले धन के मुद्दे को लेकर भारत में मची हाय-तौबा की आड़ में तमाम नेता, राजनीतिक दल तथा राजनीति में पदार्पण करने की इच्छा पालने वाले कई नए चेहरे इस विषय पर कुछ ज्यादा ही दलीलें पेश कर रहे हैं। एक-दूसरे पर आरोप-प्रत्यारोप लगाने की कोशिशें हो रही हैं। इससे विदेशों से  काला धन वापस लाने जैसा गंभीर मुद्दा मुख्य विषय से भटकता हुआ दिखाई देने लगा है। साफ ज़ाहिर होने लगा है कि इस मुद्दे को लेकर किए जाने वाले शोर-शराबे का मकसद विदेशों से काले धन की वापसी कम,राजनीतिक रूप से व्यक्ति विशेष या दल विशेष को बदनाम करना अधिक है।

अफवाह फ़ैलाने वाले लोग भलीभांति जानते हैं कि साधारण जनता अफवाहों पर जल्दी विश्वास कर लेती है। वर्ष 1986-1987 के मध्य का वह दौर राजनीतिज्ञों के लिए एक उदाहरण बन चुका है, जब स्वीडन की बोफोर्स तोप सौदे में कथित रूप से ली गई दलाली के मुद्दे पर केंद्र की तत्कालीन राजीव गांधी सरकार की चूलें हिल गई थीं। आरोप जडऩे तथा दूसरों को बदनाम करने में महारत रखने वाले तत्कालीन महारथियों ने राजीव गांधी, अमिताभ बच्चन, अजिताभ बच्चन सहित कई लोगों को अपने अनर्गल आरोपों के घेरे में ले लिया था। परिणामस्वरूप कांग्रेस को सत्ता से हाथ धोना पड़ा था। भारत में गठबंधन सरकार का दौर उसी दुर्भाग्यशाली समय से ही शुरू हुआ।

लग रहा है कि आगामी संसदीय चुनावों से पूर्व एक बार फिर परोपेगंडा महारथियों द्वारा देश में वैसे ही हालात पैदा करने की कोशिश की जा रही है। मुख्य विपक्षी भारतीय जनता पार्टी बार-बार न केवल केंद्र पर यह आरोप लगा रही है कि वह काला धन मुद्दे पर कोई कार्रवाई नहीं करना चाह रही है, बल्कि इस विषय में छानबीन के लिए उसने एक टॉस्क फोर्स का गठन भी किया है।


भाजपा की इस टॉस्क फोर्स ने दावा किया था कि पूर्व प्रधानमंत्री स्व.राजीव गांधी तथा कांग्रेस अध्यक्ष तथा यूपीए चेयरपर्सन सोनिया गाँधी स्वयं विदेशों में काला धन जमा करने जैसे गंभीर और गैरकानूनी मामलों में लिप्त हैं। उनके कई विदेशी बैंकों में खाते हैं। यह टॉस्क फोर्स इस बात का पता करने का काम कर रही है कि किन-किन लोगों का किन-किन देशों के किन-किन बैंकों में कितना-कितना धन जमा है।

इस सिलसिले में अपना तथा स्व. राजीव गांधी का नाम लिए जाने पर सोनिया गाँधी ने भाजपा नेता लालकृष्ण आडवाणी को पत्र लिखा तथा अपने और अपने परिवार के ऊपर भाजपाईयों द्वारा लगाए जाने वाले इन आरोपों पर कड़ी आपत्ति जताई। सोनिया ने आडवाणी को लिखे पत्र में स्पष्ट रूप से लिखा कि किसी भी विदेशी बैंक में उनका कोई खाता नहीं है। सोनिया के पत्र के जवाब में आडवाणी ने भी शिष्टाचार का परिचय देते हुए उन्हें जवाबी पत्र लिखकर इस बात के लिए खेद जताया कि ''इस मामले में आपके परिवार का जि़क्र किया गया, इसके लिए मुझे खेद है। गांधी परिवार की ओर से इस तरह की सफाई पहले दी गई होती तो अच्छा रहता।''

आडवाणी का सोनिया गांधी से माफी मांगना या भाजपा द्वारा उनके  विरुद्ध किए गए दुष्प्रचार के लिए खेद जताना तो निश्चित रूप से एक शिष्ट राजनीति का एक हिस्सा माना जा सकता है। शीर्ष नेताओं के बीच इस प्रकार की वार्ताओं, पत्रों और टेलीफोन पर होने वाली वार्ताओं की बातें कभी-कभी प्रकाश में आती रहती हैं। मगर बिना किसी ठोस प्रमाण, आधार या सूचना के इस प्रकार सोनिया गांधी, स्व. राजीव गांधी या किसी भी अन्य व्यक्ति को दुष्प्रचारित करना कहां की नैतिकता है। इसे किस प्रकार की राजनीति कहा जाना चहिए?



लेखक हरियाणा साहित्य अकादमी के भूतपूर्व सदस्य और राष्ट्रीय-अंतर्राष्ट्रीय मसलों के प्रखर टिप्पणीकार हैं.उनसे tanveerjafri1@gmail.comपर संपर्क किया जा सकता है.




Feb 23, 2011

डीएम के आदेश पर दीवार रंगती पुलिस



करोड़ों  रूपये खर्च कर सरकार  देश के नागरिकों को जागरूक करती है, लेकिन  उसी जागरूकता की जिम्मेदारी मुफ्त में निभाने की कोशिश की तो एक युवा  मुजरिम बन गया...


एक हैं राम प्रकाश। उन्हें गांव वाले सामाजिक रूप से एक जागरूक युवा मानते हैं। ऐसा इसलिए है कि राम प्रकाश अपने गांव और समाज की जरूरतों की फिक्र करते हैं। उसी फिक्र में राम प्रकाश ने अपने साथियों संग मिलकर गांव की समस्याओं को दीवारों पर लिख डाला जिससे कभी अधिकारी -मंत्री आयें तो उनकी सामने गांव की तस्वीर साफ रहे।

लेकिन जागरूकता की जिम्मेदारी निभाना उत्तर प्रदेश सरकार हरदोई जिले के जिलाधिकारी एके सिंह की निगाह में जुर्म है । जिलाधिकारी महोदय के इशारे पर जिले के पुलिस वाले रामप्रकाश की गिरफ्तारी और कुटाई के लिए लगातार संभावित जगहों पर दबीश दे रहे हैं।

राम प्रकाश के नेतृत्व में हुआ दीवार लेखन उत्तर प्रदेश के हरदोई जिले के जिलाधिकारी एके सिंह के लिए निगाह में जुर्म इसलिए दिखा क्योंकि इसके रहते जिलाधिकारी जनता के अपराधी माने जाते।

दरअसल जिस गांव में जनससमयाओं को लेकर दीवार लेखन किया गया था उस गांव में अगले कुछ दिनों में प्रदेश की मुख्यमंत्री मायावती दौरे पर आनेवाली थीं। उससे पहले इलाके में जिलाधिकारी एके सिंह के मनमाफिक सब हो रहा है या नहीं उसे 22 फरवरी को देखने क्षेत्र में दौरे पर आये। उसमें एक गांव लाला मऊ मवई भी था। वहां पहुंच कर डीएम साहब  की निगाहें उन नारों पर पड़ी जो गांव में जारी अव्यवस्था और मांगों पर सुनवाई न होने को लेकर थीं।


इसमें मुख्य मांग प्राथमिक विद्यालय की अपूर्ण दीवार को पूरा करने की थी। इसके अलावा एक स्वास्थ्य उप-केन्द्र के स्वीकृत की भी चर्चा थी जिसे ईंट भट्ठा मालिक अमित सिंह गांव जखसरा में बनवाना चाहते हैं जबकि गांव वाले लाला मऊ बनवाना चाहते हैं। तीसरी मांग के तौर पर पास में बहने वाली नहर के पानी को गांव में लाने के लिए नहर पर एक झाल बनवाने की बात दीवारों पर लिखी गयी थी।

इन मांगों को लिखा देख जिलाधिकारी काफी नाराज हुए। अपनी नाराजगी की अभिव्यक्ति उन्होंने पुलिस को राम प्रकाश को गिरफ्तार करने के आदेश के रूप में की। अब पुलिस राम प्रकाष को खोज रही है और राम प्रकाष भागे-भागे फिर रहें हैं। 23 फरवरी की शाम तक पुलिस राम प्रकाश  के घर पर थी और दीवारों  को लिखी मांगों को मिटा रही थी।

समाज के अंतिम आदमी की मजबूती की बात करने वाली मायावती सरकार में ऐसा गैरलोकतांत्रिक व्यवहार ना जाहिर करता है कि प्रषासन लोगों मांगों को ताकत के बल पर दबाना चाहता है। हालत यह है कि जिलाधिकारी महोदय को बचाने के लिए पुलिस गांव वालों को आतंकित कर रही है।

जन आंदोलनों का राष्ट्रीय समन्वय से जुड़े और मैग्ससे पुरस्कार विजेता संदीप पाण्डेय कहते हैं कि    यदि जिला प्रशासन   ने लोगों की मांगों पर पहले ध्यान दिया होता तथा उनको सुलझाने की कोशिश की होती तो आज यह नौबत न आती कि लोगों के लोकतांत्रिक अधिकारों का दमन करने के लिए पुलिस का सहारा लेना पड़ता।




Feb 22, 2011

एक बदचलन की मौत !

एक आटो आकर रुका। उसमें से दो औरतें उतरीं। आगे वाली औरत उतरते ही छाती पीटते हुए गला फाड़ रोने लगी। आवाज लोगों के घरों तक पहुंची तो सभी घरों की बालकनी बच्चों और महिलाओं से भर गयी...

अजय प्रकाश

परसों की बात है। दिन के करीब दस बज रहे थे। दुबारा लौट आयी ठंड के बाद मेरी हिम्मत ठंडे पानी से नहाने की नहीं हुई तो सोचा क्यों न धूप में खड़े होकर थोड़ा गरम हो लिया जाये। धूप की गरमी से अगर हिम्मत बंध गयी तो नहा लूंगा,नहीं तो कंपनियों ने महकने का इंतजाम तो कर ही रखा है। यह सोचकर मैं बालकनी से लगकर सड़क की हरियाली देखने लगा।

तभी एक आटो आकर रुका। उसमें से दो औरतें उतरीं। आगे वाली औरत उतरते ही छाती पीटते हुए गला फाड़ रोने लगी। आवाज लोगों के घरों तक पहुंची तो सेकेंडो में सभी घरों की बालकनी बच्चों और महिलाओं से भर गयी। काम पर नहीं गये कुछ मेरे जैसे मर्द भी झांकने लगे। जिनके कमरे नीचे के फ्लोर में थे वो रोने वाली के आसपास मंडराने लगे। मेरी मां से नहीं रहा गया तो वह नीचे मौका-मुआयना करने के लिए चल दी। मां के नीचे जाते देख बीबी ने पूछा, कहां जा रही हैं?

मां जवाब दिये बगैर चलते बनी तो सामने से पड़ोसी की बीबी ने कहा,‘देहात से आयी हैं,इसलिए वो तो जाये बिना नहीं मानेंगी। मेरी सास भी ऐसी ही हैं।’इस बीच दहाड़ मारती औरत आटो से आगे बढ़ते हुए अपने कमरे की ओर चिल्लाते हुए चल पड़ी,‘अरे हमार बछिया कौन गति भईल तोहार (ओह,मेरी बेटी तेरा क्या हाल हुआ)।'

मेरी बीबी ने उसकी आवाज सुन मुझसे कहा जरा सुनना तो क्या कह रही है भोजपुरी में। मैं अभी कुछ कहता उससे पहले ही कोने वाली मकान मालकिन अपनी बालकनी से बोल पड़ी, ‘बिहार की हैं- छपरा की।’ फिर मैंने कहा, ‘उसकी बेटी को कुछ हुआ है।’

अब उस औरत के रोने-घिघियाने की आवाज शब्दों में बदल चुकी थी। सड़क से ग्राउंड फ्लोर और ग्राउंड फ्लोर से फर्स्ट  फ्लोर होते हुए हमतक बड़ी जानकारी ये आयी कि रोने वाली औरत की बेटी की लाश चार दिन से किसी सरकारी हॉस्पीटल में पड़ी है। बड़ी जानकारी मिलते ही क्यों...क्यों...क्यों, की आवाज तमाम बालकनियों और फ्लोरों पर गूंजने लगी।

अबकी बड़ी जानकारी का विस्तार आया। वह इस प्रकार से कि रोने वाली औरत की मरने के बाद सड़ रही बेटी चार बच्चों की मां है और वह गली की चौथी मकान में बाएं  तरफ किराये पर रहती है। इसी मकान में रहते हुए एक सप्ताह पहले बीमार हुई तो किसी ने ले जाकर सरकारी अस्पताल में भर्ती करा दिया था और मरने के बाद वहीं पड़ी है।

इसके बाद यह सवाल उठा कि क्या वह औरत अकेले ही अस्पताल गयी थी। इस सवाल पर जवाब मिला,‘नहीं। बीमारी की हालत में औरत ने किसी को फोन कर बुलाया था और वही उसे अस्पताल ले गया था। मगर ईलाज के दौरान औरत मर गयी तो वह छोड़कर भाग गया। तबसे लाश अस्पताल में ही पड़ी है।

मृत औरत का कोई खोज-खबर रखने वाला नहीं आया तो अगले दिन अस्पताल प्रशासन ने पुलिस को सूचना दी। मौके पर पहुंची पुलिस ने खोजबीन में औरत के पास से मिले कागज पर लिखे मोबाइल नंबर को मिलाया। पता चला मोबाइल नंबर मृत महिला के पति का है और वह बिहार के छपरा जिला के किसी ब्लॉक का रहने वाला है।


अब बालकनी पर खड़े मुझ जैसे दुखितों का इंट्रेस्ट सस्पेंस में था कि चार बच्चों की मां,ऊपर से बीमार और चार दिन से अस्पताल में पड़ी सड़ रही और पति यहां से हजार-बारह सौ किलोमीटर दूर पड़ा। आखिर माजरा क्या है? तो अब माजरे की पुख्ता जानकारी कुछ इस प्रकार से पसरी- दरअसल जो आदमी उसे अस्पताल में भरती कराने ले गया था वह उसका तीसरा और अंतिम पति था। इससे पहले वह करीब तीन साल एक पंजाबी के साथ रही थी,जबकि शादी उसकी छपरा वाले से हुई थी जो अब उसके मरने के बाद उसकी मां को लेकर दिल्ली आया था।


यह विशेष जानकारी नीचे वाली चाची ने दिया। बकौल चाची- थोड़े दिन पहले एक पंजाबी बैग लेकर आया था और उनसे कह रहा था कि वह अपना बच्चा लेने आया है। उसने चाची को यह भी बताया कि चैथे नंबर का बच्चा उसी का है और सिर्फ वह उसी को ले जाने आया है। पंजाबी से ही चाची को पता चला था कि चार बच्चों की मां बीमार है और अस्पताल में भर्ती है।

तभी किसी महिला ने चाची से पूछ लिया,‘यानी उसे जो अस्पताल ले गया था वह न पंजाबी था न बिहारी। फिर वह कौन था।’इसका जवाब एक दूसरी महिला ने दिया जिसके होंठ खूनी आत्माओं की तरह टहटह लाल हो रहे थे, - अरे वह एक मुसलमान था जिसके साथ वह पिछले कुछ महीनों से रह रही थी।

इसके बाद बालकनी दुखितों ने हां-हूं करते हुए उस औरत के अस्पताल में सड़ने को भगवान का जायज फैसला माना और औरत की मौत को एक बदचलन की मौत करार दिया। हालांकि उसे जानने वाली एक औरत ने ऐसा कहने पर ऐतराज जताया। कहा भी अगर वह दूसरी-तीसरी शादी नहीं करती तो उसके चार बच्चों की लाश यहां भूख से पड़ी रहती। वह तो मुसलमान ही था जो इन बच्चों का पेट पाल रहा था। इससे पहले पंजाबी से भी इसीलिए शादी की क्योंकि बिहारी कुछ करता ही नहीं था, सिवाय बच्चा पैदा करने के।

बहस थोड़ी और आगे बढ़ी तो पता चला बिहारी पहले किसी रबर की फैक्ट्री में काम करता था मगर काम छूट जाने के बाद पिछले तीन वर्षों से उसे काम ही नहीं मिला। सड़ रही लाश के पक्ष में बोलने वाली महिला ने आगे कहा,‘किसी की जवानी नहीं फटती है कि वह बेवजह इस गोद से उस गोद में कूदे। बच्चों का मुंह देख लोग पता नहीं क्या-क्या करते हैं।’

तभी किसी ने फिक्र बिखेरी,‘बेचारे बच्चों को कौन देखेगा।’बच्चों की बात आयी तो पता चला दो बेटियां और दो बेटे हैं। सबसे बड़ी बेटी करीब 12साल की है और बाकी सभी बच्चे उससे छोटे हैं। सामने वाले की बीबी ने नीचे परचून की दूकान के पास इशारा कर दिखाया,‘वह  बैठी है उसकी बड़ी बेटी। बाकी तीनों भाई-बहनों को चाय मट्ठी खिला रही है।’इस दृश्य को महत्वपूर्ण मान सभी ने बालकनी से सिर झुका-झुका कर चाय-मट्ठी का लाइव देखा।

अब बारी लाश को फूंके जाने के बहस को लेकर थी। सड़ रही लाश की मां ने बेटी को एक बार देखने की इच्छा जाहिर की और कहा उसे घर लाया जाये। इस पर सभी बिपर पड़े। तमाशबीनों ने करीब आदेशात्मक ढंग से कहा, ‘सड़ी हुई लाश मुहल्ले में क्यों लानी है, पहले से क्या बिमारियां कम हैं।’ कुछ ने कहा, उस बदचलन ने ऐसा कौन सा महान काम किया है कि अंतिम दर्शन को लाया जाये। आखिरकार तय हुआ कि लाश को अस्पताल से सीधे ‘मशान ले जाया जायेगा।

इस प्रस्ताव पर अस्पताल जाने को लिए दो-चार लोग तैयार हो गये। तैयार होने वालों में मानद पति के क्षेत्र और जाति के लोग थे। इसके अलावा जो लोग मौके पर पहले से खड़े थे, उन्होनें नौकरी या अन्य जरूरी कामों का वास्ता देकर जा पाने में असमर्थथा जाहिर की। हालांकि चलन में ऐसा नहीं है। गाड़ी का इंतजाम हो जाने पर अंतिम संस्कार में जाने वालों से गाड़ी आमतौर पर भर जाती है।

खैर!अब हमारे बीच से सड़ी लाश को राख हुए दो दिन बीत चुके हैं और राख का मानद पति ‘छपरा वाला’,राख का कर्मकांड करने गांव जा चुका है। इस बीच मुहल्लेवालों ने महत्वपूर्ण जिम्मेदारी निभाते हुए मानद पति को ‘रखवाला’ का तमगा दे, राख के बाकी दो पतियों को मजावादी करार दे दिया है। मानद के जाते-जाते एक औचक सवाल मुहल्ले वालों ने उसके लिए जरूर छोड़ा था, ‘मानद, क्या कभी चारों बच्चों में से किसी एक पर भी अपनी औलाद होने का फक्र कर सकेगा।’

और इसी सवाल के साथ कहानी का इंड हो गया था। लोग बालकनी से इस सकून के साथ वापस लौटे थे कि एक बदचलन औरत के मरने, सड़ने और अंततः राख होने में मुहल्ला भागीदार नहीं हुआ और सभ्य बना रहा।





Feb 20, 2011

और आंखें पत्थर की लगा दीं



मोतियाबिंद से त्रस्त गरीबों को क्या पता था कि जिन आंखों की रोशनी पाने की उम्मीद में वे डॉक्टरों के यहां जा रहे हैं, वे डॉक्टर उनकी आंखें ही छीन लेंगे और वे अपराधी भी  नहीं माने जायेंगे...


चैतन्य भट्ट

मध्य प्रदेश के मंडला जिले के पच्चीस आदिवासी अपनी आँखें डाक्टरों की लापरवाही के कारण गंवा चुके हैं। आदिवासियों को डाक्टरों की लापरवाही का उस समय शिकार होना पड़ा जब वे ‘योगीराज चेरिटेबल ट्रस्ट’ के निःशुल्क मोतियाबिन्द आपरेशन कैंप में इलाज के लिए आये थे। डॉक्टरों ने आदिवासी मरीजों को भरमाने के लिए मोतियाबिंद ग्रस्त आखों को निकाल पत्थर की आँखे लगा दी थीं।

जबलपुर से करीब सौ किलोमीटर दूर मंडला में पिछले वर्ष 11सितंबर को योगीराज चैरिटेबल ट्रस्ट ने मोतियाबिंद कैंप लगाया था। दूर-दराज से आपरेशन के लिए आये गरीबों में वह पचीस आदिवासी भी थे जो मोतियाबिंद की वजह से जिंदगी ठीक से नहीं जी पा रहे थे। अपनी आँखों से पहले की तरह दुनिया देख सकें की उम्मीद में डाक्टरों के दर पर आये आदिवासियों को क्या पता था कि जिंदगी में बची बाकी रोशनी भी वे गवां बैठेंगे।



डॉक्टरों की देन   :  पत्थर की आंख दिखाता एक पीड़ित
दूसरी तरफ  रसूखदारों की सरपरस्तरी में चल रहे योगीराज चेरिटेबल ट्रस्ट अस्पताल का बाल बांका भी नहीं हुआ है। घटना के चार महीने बाद भी अस्पताल ने एक धेले का मुआवजा नहीं दिया है। घटना के बाद मंडला के जिला कलेक्टर ने अस्पताल को यह निर्देश दिये थे कि वे हर पीड़ित मरीज को तीस तीस हजार रूपये बतौर मुआवजा दे और पेंशन के रूप में हर महिने पांच-पाचं सौ रूपये भी अस्पताल प्रबंधन अदा करे।

आँखें गँवा चुके आदिवासी और उनके परिजन मुआवजे की आस में हर उस दरवाजे जा रहे है जहां से उन्हें न्याय की उम्मीद है। लेकिन राज्य की भाजपा सरकार, जिला प्रशासन, सीएमओ से लेकर योगीराज चेरिटेबल ट्रस्ट तक के अधिकारियों के कानों में जूं नही रेंग रही है। इतना ही नहीं  जबलपुर के विशेषज्ञ डॉक्टरों की टीम, जिन्हें घटना की जांच का जिम्मा सौंपा गया था, उन्होंने भी आपरेशन करने वाले दोषी डाक्टरों को ‘क्लीनचिट’ देकर पीड़ितों के जख्मों पर नमक छिडका है।

गौरतलब है कि गरीब और आदिवासी इलाका होने के कारण जैसे ही लोगों को पता चला कि निःशुल्क मोतियाबिन्द आपरेशन कैंप लगा है तो धनाभाव के कारण निजी चिकित्सालयों में इलाज न करा पाने वाले मरीजों का तांता लग गया। मामला गरीबों का होने के कारण अस्पताल प्रबंधन ने भी खूब लापरवाही बरती और इतने बड़े कैंप का आयोजन बगैर स्वास्थ्यअधिकारियों के इजाजत के ही कर डाला।

आसपास के गांवों झिरिया,बनिया तारा,मलवा खेहरी से तीस मरीज मुफ्त आपरेशन का प्रलोभन देकर लाये गये। मरीजों में महिलायें और पुरूष दोनों शामिल थे,जिनका आपरेशन अस्पताल के डाक्टरों ने बाहर से आये डाक्टरों के साथ किया। दो दिन बाद मरीजों के आंखों की पट्टियां  खोलकर उनकी जांच के बाद उन्हें अपने अपने घरों को जाने के लिये कह दिया गया. मुफ्त में हुए आपरेशन की खुशी में डूबे इन आदिवासियों को इसके बाद के परिणामों के बारे में कोई कल्पना ही नहीं थी। मरीजों को क्या पता था कि जिन आँखों में वे रोशनी की आस कर रहे है वे बहुत जल्दी पथरा जाने वाली हैं।

आपरेशन का एक सप्ताह ही बीता था और मरीजों की आखों में पानी और मवाद आना शुरू हो गया। पीडितों ने अस्पताल से सम्पर्क किया तो उन्हें अस्पताल बुलवाया गया। डाक्टरों ने दुबारा आपरेशन किया, लेकिन डॉक्टरी लापरवाही के कारण इन्फेक्शन इतना ज्यादा हो गया था कि उसका इलाज कर पाना डाक्टरों के बस का नहीं रह गया।

ऐसे में उन शातिर डाक्टरों ने अपना गुनाह छुपाने के लिए गरीब और अप़ढ़ आदिवासियों की संक्रमित आंखें  निकाल पत्थर की आंखें लगा दीं.अस्पताल की ओर से डाक्टर परवेज खान ने भी स्वीकार किया कि ‘संक्रमण ज्यादा था इसलिए आंख निकालने के अलावा कोई दूसर उपाय नहीं था। अगर ऐसा नहीं होता तो स्वस्थ आंख भी खराब हो सकती थी।’


एक असली आखों की जगह पत्थर की आंखे लगा देने की बात सामने आई तो जिला कलेक्टर केके खरे ने अस्पताल प्रबंधन को आदेश दिया कि वह पीड़ितों को तीस हजार रूपये मुआवजा और पांच सौ रूपये मासिक पेंशन दे। इसके साथ जिला प्रशासन ने जबलपुर मेडिकल  कालेज के एसोसिऐट प्रोफेसर डॉ. परवेज सिददीकी, डॉ. पवन अग्रवाल, नेत्र विशेषज्ञ डॉ. हितेश अग्रवाल के अलावा जिला चिकित्सालय मंडला के नेत्र विशेषज्ञ डॉ. तरूण अहिरवार की जांच के लिएक उच्चस्तरीय टीम बनाई गयी।


आंख की जगह पत्थर लगाकर भरमाया
 विशेषज्ञ टीम ने अपनी रिपोर्ट कहा कि घटना के डेढ़ महीने बाद हुई की जांच में इन्फेक्शन का कोई ठोस कारण बता पाना संभव नहीं है। जाहिर है इस रिपोर्ट के बाद दोषी डॉक्टरों को क्लीनचिट मिलनी ही थी  और वह मिल भी गयी। उसके बाद योगीराज चेरिटेबल ट्रस्ट  अस्पताल के हौसले बुलंद हो गये और उसने कलेक्टर के मुआवजे वाले आदेश को धता बताते हुये मुआवजे के आदेश को अनसुना कर दिया।

अपनी आंख गंवा चुकी ग्राम झिरिया की रहने वाली रेवती बाई मोंगरे अपनी व्यथा सुनाते कहती हैं,‘मैं अपनी आखों का आपरेशन ही नहीं करवाना चाहती थीं,पर अस्पताल के लोगों की बातों में आकर मैंने आपरेशन करवा लिया.मुझे उन्हें नहीं मालूम था कि आँखें ठीक होना तो दूर रोशनी और दोनों आँखें ही चली जायेंगी.

कहीं से न्याय मिलता न देख आदिवासियों ने न्यायालय में गुहार लगायी है। आदिवासियों की ओर से मंडला के स्थानीय अधिवक्ता हमीद खान, विजय जंघेल और उनके सहयोगियों की मदद से एक परिवाद दायर किया है, जिसमें उन्होंने पीड़ितों के लिए तीन लाख रूपये मुआवजे की मांग की है।



 राज एक्सप्रेस और पीपुल्स समाचार में संपादक रह चुके चैतन्य भट्ट फिलहाल स्वतंत्र पत्रकार के रूप में काम कर रहे हैं। वे तीस बरसों से पत्रकारिता में सक्रिय हैं।




Feb 19, 2011

भाषा - भूगोल का अधिनायक और लेखक

लेखक वस्तुतः अपनी भाषा का मूलनिवासी या आदिवासी होता है। उसकी भाषा ही उसका जल,जंगल,ज़मीन और जीवन हुआ करती  है। किसी लालच या अन्य उन्माद में सभ्यताएं हमेशा आदिवासियों को विस्थापित करती आयी हैं...


उदय प्रकाश

‘मोहन दास’ को दिये गये साहित्य अकादमी पुरस्कार को स्वीकार करते हुए, इस संदर्भ में अपनी ओर से कुछ कहना है। यह एक परंपरा रही है। मेरे असमंजस और दुविधा की शुरूआत ही यहीं से होती है, मैं क्या कहूं ?

मुझे लिखते-पढ़ते हुए कई दशक हो चुके हैं। लिखने की शुरूआत बचपन से ही कर दी  थी, जब खड़ी हिंदी बोली ठीक से आती भी नहीं थी। तब कभी यह सोचा नहीं था कि इसी भाषा  में एक दिन लेखक बनना है। ऐसा लेखक,जिसकी सामाजिक अस्मिता और जीवन का आधार किसी एक भाषा में लिखने तक ही सीमित होकर रहता है।

रोलां बाथ जिसे ‘पेपर बीइंग’कहते थे। तरह-तरह के कागजों पर स्याही में लिखे या छपे अक्षरों-शब्दों में किसी तरह अपना अस्तित्व बनाता हुआ प्राणी। आज के समय में वे होते तो कहते आधिभौतिक  आभासी व्योम में द्युतिमान अक्षर या शब्द के द्वारा अपने होने को प्रमाणित करता कोई अस्तित्व। यानी कहीं नहीं में, कहीं होता कोई प्राणी। ‘ए वर्चुअल नॉनबीइंग।’यानी ‘ए सोशल नथिंग।’  किसी अप्रकाशित को महाशून्य में प्रकाशित करने की माया रचता भासमान अनागरिक। आकाशचारी ‘नेटजन’।

बचपन जैसा असुरक्षित और भटकावों से भरा रहा, उसे देखते हुए, आकांक्षा यही थी कि आगे चलकर एक सुरक्षित और अपेक्षाकृत स्थिर वास्तविक जीवन मिले। इसके लिए वास्तविक कोशिश भी की। परिश्रम किया। परीक्षाओं में अंक अच्छे लाए। यह सारा प्रयत्न उसी भाषा में किया, जिसमें लेखक के रूप में उपस्थित और जीवित रहता था।

सोचा कोई नौकरी  मिल जाएगी तो वास्तविक जीवन गुज़र जाएगा। समाज-परिवार की जिम्मेदारी निभ जाएगी। किसी मध्यवर्गीय नागरिक की तरह। फिर एक समय, जब युवा होने की दहलीज़ पर ही था, यह लगा कि अपने लिए तो सभी जीते हैं। इतना आत्मकेंद्रित क्या होना। जो किताबें पढ़ता था, उनसे भी यही प्रेरणा मिलती थी कि अपने समय को अधिक न्यायपूर्ण,सुंदर,मानवीय और उत्तरदायी बनाना चाहिए।

इतिहास ऐसे प्रयत्नों के बारे में, उन प्रयत्नों की सफलताओं-असफलताओं के बारे में बताता था। उपन्यास, कविताएं, दर्शन, विज्ञान और मानविकी की तमाम पुस्तकों में ऐसे संकेत और विवरण थे। कलाएं भी इसका उदाहरण बनती थीं। नितांत अकेलेपन और एकांतिक पलों में उपजने वाली भाषिक क-वाचिक अभिव्यक्तियों या अन्य कलाओं में भी यह प्रयत्न दिखाई देता था।

लेकिन इन सबमें सबसे प्रगट और शायद अधिक ठोस,साफ और आसान-सा उपक्रम जहां दिखता था, उसे राजनीति या सामाजिक कर्म कहते हैं। तो मैं उधर भी गया। इस सबके पीछे ऐसा लगता है कि कोई महान मानवीय-सामाजिक कार्य करने,बड़ा परिवर्तन लाने का कोई आत्मबलिदानी आदर्श या क्रांतिकारी लक्ष्य किसी समय रहा होगा। जिस पीढ़ी का मैं था, वह पीढ़ी ही कुछ-कुछ ऐसी थी।

आज इस उम्र में,इतनी दूर आकर कह सकता हूं कि शायद वह सारा प्रयत्न भी मेरी अपनी ही सुरक्षा और अस्तित्व की चिंता से जुड़ा हुआ था। एक स्तर पर वह कहीं गहराई से व्यक्तिगत भी था। शायद हम किसी भी परिवर्तन की कोशिश में तभी सम्मिलित होते हैं,जब हम उसमें स्वयं अपनी मुक्ति और अपनी स्थितियों में बदलाव देखते-पाते हैं।

मेरे पास भाषा और अपने शरीर के अलावा कोई दूसरा साधन और ऐसा माध्यम नहीं था, जिससे मैं दूसरों,और इस तरह अपने भविष्य को सुरक्षित बनाने के लिए ऐसा सामाजिक प्रयत्न कर सकता। तो एक दीर्घ समय तक,बल्कि अपने जीवन के सबसे बड़े हिस्से को,मैंने वहीं खर्च किया। यही सोचते हुए कि एक ऐसे समाज और समय में,जिसमें मेरे जैसे अन्य सभी सुरक्षित और स्वतंत्र होंगे, उसमें मैं भी स्वतंत्रता और नागरिक वैयक्तिक गरिमा के साथ रह सकूंगा।

आज इतने वर्षो के बाद भी मुझे लगता है कि मैं इस भाषा, जो कि हिंदी है, के भीतर, रहते-लिखते हुए,वही काम अब भी निरंतर कर रहा हूं,जबकि जिन्हें इस काम को भाषेत्तर  या व्यावहारिक सामाजिक धरातल पर संगठित और सामूहिक तरीके से करना था,उसे उन्होंने तज दिया है। इसके लिए दोषी किसी को ठहराना सही नहीं होगा। वह समूची सभ्यता का बदलाव था। मनुष्यता के प्रति प्रतिज्ञाओं से विचलन की यह परिघटना संभवतः पूंजी और तकनीक की ताकत से अनुचर बना डाली गई सभ्यता का छल था।

मुझे ऐसा लगता है कि इतिहास में कई-कई बार ऐसा हुआ है कि सबसे आखिर  में,जब सारा शोर, नाट्य और प्रपंच अपना अर्थ और अपनी विश्वसनीयता खो देता है,तब हमेशा इस सबसे दूर खड़ा, अपने निर्वासन, दंड, अवमानना और असुरक्षा में घिरा वह अकेला कोई लेखक ही होता है, जो करुणा, नैतिकता और न्याय के पक्ष में किसी एकालाप या स्वागत  में बोलता रहता है। या कागज़ पर लिखता रहता है। किसी परित्यक्त अनागरिक होते जाते बूढ़े की अनंत बुदबुदाहट,कभी किसी पुरानी स्मृतियों के कोहरे और अंधंरे से निकलती और कभी किसी स्वप्न के बारे में संभाव्य-सा कुछ इशारा करती। इसे ‘सॉलीलाक्वीस’ कहते हैं।

मैं ज़रा-सा भाग्यशाली इसलिए हूं कि इस स्वगत को सुनने वाले बहुत से लोग मुझे अपनी ही नहीं, दूसरी अन्य भाषाओं में भी मिल गये हैं। इसमें हमारे अपने देश की भी भाषाएं हैं और दूसरे कुछ देशों  की भी।

एक प्रश्न हमेशा हमारे सामने आ खड़ा होता है। वह यह कि जिस धरती पर मैं भौतिकरूप से रहता हूं, जिस शहर, समाज या राज्य में, उसका मालिक कौन है? किसका आधिपत्य उस पर है? किसी नागरिक, प्रजा या मनुष्य रूप में उस मालिक ने मुझे कितनी स्वतंत्रता दे रखी है? उसकी हदबंदियां और ज़ंजीरें कहां-कहां हैं?

और ठीक इसी से जुड़ा हुआ,इसी प्रश्न के साथ, इसी प्रश्न का दूसरा हिस्सा भी सामने आ जाता है कि जिस भाषा में मैं लिखता हूं, उस भाषा का मालिक कौन है? वह कौन सी सत्ता है, जिसके अधीन यह भाषा है? जैसा मैंने अभी कहा, लेखक और कुछ नहीं, भाषा में ही अपना अस्तित्व हासिल करता कोई प्राणी होता है।

भाषा ही उसका कार्यक्षेत्र,उसका देश,उसका घर और उसका अंतरिक्ष होता है। उसकी संपूर्ण सत्ता भाषा में ही अंतर्निहित होती हैं। लेकिन मैंने अक्सर पाया है कि भाषा और भूगोल,या शब्द और राज्य,दोनों को अपने अधीन बनाने वाली सत्ता एक ही होती है। कई तरह के प्रतिपक्षी और प्रतिभिन्न पाठों में प्रकट होते शब्दाडंबरों या डेमॉगागी के आर-पार वर्चस्व की वही संरचनाएं रहती हैं, जो किसी धरती के नागरिक या किसी भाषा के लेखक की स्वतंत्रता को नियंत्रित, अनुकूलित या अधीन करती हैं।

हर तरह की ऐसी सत्ता,मुझे अनिवार्य रूप से लगता है कि अपने मूल चरित्र में सर्वसत्तावादी होती है। इतिहास ने और मेरे अपने ही जीवन की स्मृतियों और अनुभवों ने इस धारणा को पुष्ट ही किया है। यह सत्ता राज्य-व्यवस्था ही नहीं, किसी भी भाषा में विनिर्मित उन विचार-सरणियों को भी अधिगृहीत कर लेती हैं,जिनमें सबकी मुक्ति की कोई संभावना होती है। पिछले दो-ढाई दशकों के मेरे अनुभवों और संज्ञान ने यह बोध मुझे दिया है।

इसीलिए,जिस भाषा में मैं लिखता और रहता हूं, वह मेरे लिए, सिर्फ ‘हिंदी’ नहीं रह जाती। वह जीवन और यथार्थ का एक ऐसा जटिल प्रश्न बन कर उपस्थित होती है,जिसे किसी कथा या कविता या अपने किसी बयान में कहता हुआ मैं सत्ताओं के संदेह के घेरे में अक्सर आता रहता हूं। इसके बाद इस जगह मैं चुप रहूंगा।

मैं स्मरण दिलाना चाहूंगा कि पिछली सदी के ठीक बीतते ही, जब सब नयी सहस्राब्दी के स्वागत की मुद्रा में थे, मैंने एक लंबी प्रेमकथा लिखी थी -‘पीली छतरी वाली लड़की’। आप अगर ध्यान दें, तो लोकरंजक सरलता के उस सहज पाठ में भाषा और महुष्य का गहरा अनुचिंतन और विखंडन एक साथ विन्यस्त था। अपने नये कविता संग्रह-‘एक भाषा हुआ करती है’का भी ध्यान मैं दिलाना चाहूंगा।

मुझे लगता है कि लेखक हो जाने की अस्मिता हासिल होने के बाद उसकी स्वतंत्रता किसी भी जातीय, सांप्रदायिक, धार्मिक, लैंगिक या राजनीतिक या डेमॉगागिक वर्चस्व से नियंत्रित होती ही है। हर लेखक को,अगर उसने अन्य अस्मिताओं के सारे आवरण और कवच उतार दिये हैं और उसके पास अपने जीवन और अपने आत्म की रक्षा के लिए भाषा के अतिरिक्त कोई दूसरा उपकरण नहीं बचा है, तो उसे हमेशा अपनी इस पराधीनता या औपनिवेशीकरण से मुक्ति का प्रयत्न करना ही पड़ता है।

मेरा यह भी मानना है और इसे मैं पिछले लंबे अर्से से कहता आ रहा हूं कि लेखक वस्तुतः अपनी भाषा का मूलनिवासी या आदिवासी होता है। उसकी भाषा ही उसका जल, जंगल, ज़मीन और जीवन हुआ करता है। किसी लालच या अन्य उन्माद में सभ्यताएं हमेशा किसी आदिवासियों को उसके स्थान से विस्थापित करती आयी हैं।

यह सिर्फ किसी कोलंबस का ऐतिहासिक वृत्तांत भर नहीं है,बल्कि एक ऐसा सर्वव्यापी सच है,जो आज तक देखी-जानी गई हर तरह की सत्ता-संरचना को शर्मसार कर सकती है।

आज जब मैं यहां आपके सामने अपना यह वक्तव्य पढ़ रहा हूं, उस समय आप सब देख रहे हैं कि पूंजी और तकनीक की ताकतों के साथ जुड़ी लोभ की सत्ता ने किस व्यापक पैमाने पर हिंसा और संवेदनहीनता के साथ निरस्त्र मूलनिवासियों को उनकी जड़ों से उखाड़ना शुरू किया है। यह एक तरह का सभ्यता का उन्माद है।

एक ऐसा मनोरोग जो किसी खास जगह नहीं, बल्कि संसार के सभी वंचित, वध्य, सत्ताहीन और शांत मूलनिवासियों के जीवन में ‘होलोकास्ट’पैदा कर रहा है। कई साल पहले मिशेल फूको की किताब ‘सभ्यता और उन्माद’ पढ़ी थी, उसे इस डरावने ढंग से प्रमाणित होते अपने सामने देख रहे हैं

भाषा भी पूंजी और तकनीक के साथ जुड़ी लोभी सत्ता-संरचनाओं की चपेट में है। इसके विस्तार में मैं नहीं जाना चाहूंगा। उतना समय भी नहीं है। लेकिन इतना ज़रूर कहना चाहूंगा कि भाषा भी अब एक जिंस और एक उत्पाद भर मान ली गई है और इससे जुड़े जितने भी अकादेमिक,व्यापारिक और राजकीय उद्यम हैं,उस लेखक की उसमें कहीं कोई जगह नहीं है। वह विस्थापन के ठीक उसी बिंदु पर है, जिसमें हमारे समय की वंचित मूलनिवासी मनुश्यता है।

मैं साहित्य अकादेमी को धन्यवाद देता हूं और उस निर्णायक मंडल के लिए कृतज्ञता ज्ञापित करता हूं,जिसने मेरी लंबी कहानी या आख्यान ‘मोहन दास’को यह सम्मान दिया। जाहिर है,कोई भी पुरस्कार किसी भाषा और भूमि में किसी मनुष्य का पुनर्वास तो नहीं कर सकता,लेकिन व्यक्तिगत रूप से मैं अपनी खुशी यहां प्रकट करता हूं।

यह खुशी इसलिए अर्थ रखती है कि इस राज्य के एक नागरिक के रूप में मैं कुछ अपेक्षाकृत सुरक्षित-सा अनुभव कर रहा हूं। आप सबका हृदय से आभार।

(लेखक उदय प्रकाश ने यह वक्तव्य 16 फरवरी को अपनी कृति 'मोहन दास' को साहित्य अकादमी पुरस्कार मिलने के अवसर पर दिया था. )


बजट में न्याय के लिए कितना पैसा


सरकार बार-बार देश में न्यायायिक सुधार को लेकर अपनी प्रतिबद्धता की बात दोहरा चुकी है, लेकिन सारा का सारा मामला बजट में आकर अटक जाता है...

संजय स्वदेश

केंद्रीय बजट आने वाला है। मीडिया अपेक्षित बजट पर चर्चा करा रही है। पर इन चर्चाओं में अन्य कई मुद्दों की तरह न्यायापालिका पर खर्च की जाने वाली राशि पर कोई हो-हल्ला नहीं है।

एक अकेले न्यायापालिका ही है जिसने कई मौके पर सरकार की जन अनदेखी कदम पर अंकुश लगाने की दिशा में पहल की। न्यायपालिका के दामन पर कई बार भ्रष्टाचार के दाग लगे। इसके बाद भी आम आदमी उच्च और उच्चतम न्यायालय के प्रति विश्वसनीयता बनी हुई है। पर किसी सरकार ने न्यायपालिका को मजबूत करने के लिए कभी अच्छी खासी बजट की व्यवस्था नहीं की। इसका दर्द भी पिछले दिनों उच्चतम न्यायालय के एक खंडपीठ के बयान में उभरा।

खंडपीठ    ने साफ कहा कि कोई भी सरकार नहीं चाहती कि न्यायपालिका मजबूत हो। यह सही भी है। देश महंगाई और भ्रष्टाचार की आग में जल रहा है। भ्रष्टारियों के मामले में अदालत में लंबित पड़ रहे हैं। हाल ही में केंद्रीय कानून मंत्री वीरप्पा माइली ने भी बयान दिया था कि केंद्र ने न्यायिक सुधार की दिशा में पहल कर दिया है, जिससे मामलों का जल्द निपटारा होगा। कोई भी केस कोर्ट में तीन साल से ज्यादा नहीं चलेगा और  भ्रष्टाचार के मामले में एक साल के अंदर न्याय मिलेगा।

कानून मंत्री के कहे मुताबिक  ऐसा हो जाए तो  निश्चय ही भ्रष्टाचारियों में खौफ बढ़ेगा। वर्तमान कानून में भ्रष्टाचारियों को कठोर सजा का प्रावधान नहीं है। त्वरित न्याय की दिशा में फास्ट ट्रैक्क अदालतों के गठन हुए थे। इन पर भी धीरे-धीरे मामलों का बोझ बढ़ता गया। न्याय में देरी की स्थिति ज्यों की त्यों बनी हुई है। मामलों के लंबे खिंचने से उनके हौसले बुलंद है।

सरकार बार-बार देश में न्यायायिक सुधार को लेकर अपनी प्रतिबद्धता की बात दोहरा चुकी है। लेकिन सारा का सारा मामला बजट में आकर अटक जाता है। जिसको लेकर कभी देश में गंभीर बहस नहीं हुई। स्वतंत्र कृषि बजट,दलित बजट आदि की तो खूब मांग उठती है,पर अदालत की मजबूती के लिए गंभीर चर्चा नहीं होती है। इस ओर ध्यान उच्चतम न्यायालय के खंडपीठ के दर्द भरे बयान के बाद ही गया।

भारी भरकम बजट देकर यदि सरकार न्यायपालिका को मजबूत कर दे तो देश में कई समस्याओं का समाधान सहज ही हो जाएगा। देशभर के अदालतों के लाखों मामलों में तारिख पर तारिख  मिलती जाती है। जनसंख्या और मामलों के अनुपात में देश में अदालतों की संख्या ऊंट के मुंह में जीरा साबित होती रही है। दरअसल मामलों की बढ़ती संख्या और सरकार की उदासिनता के कारण ही न्यायपालिका का आधारभूत ढांचा ही चरमराने लगा है।


अदालतों की कम संख्या न्यायापालिका की वर्तमान व्यवस्था में निर्धारित अविध में सरकार त्वरित न्याय की गारंटी नहीं दे सकती है। जिन प्रकरणों से मीडिया ने जोरशोर से उठाया वे भी वर्षों तक सुनवाई में झूलती रही है। दूर-दराज में होने वाले अनेक सनसनीखेज प्रकरणों में पीड़ित दशकों से न्याय की आशा लगाये हैं। प्रकरणों के लंबित होने से तो लोगों के जेहन से यह बात ही निकल जाती है कि कभी कोई वैसा प्रकरण भी हुआ था। अनेक लोग तो न्याय की आश लगाये दुनिया से चल बसे। मामला बंद हो गया। कई लोगों को जवानी में लगाई गई गुहार का न्याय बुढ़ापे तक नहीं मिला। लिहाजा, त्वरित न्याय की मांग हमेशा होती रही है।

पिछले दिनों सरकार ने भी त्वरित न्याय आश्वासन तब दिया जब जब देशभर में भ्रष्टाचार के खिलाफ एक आंदोलन की सुगबुगाहट हुई। प्रमुख शहरों में भ्रष्टाचार के खिलाफ रैली निकली, सीबीसी थॉमस को लेकर सरकार कटघरे में आई। आदर्श सोसायटी घोटाले को लेकर हो हल्ला हुआ। काले धन को स्वदेश वापसी को लेकर सरकार की फजीहत हुई। फिलहाल देश की नजरे वर्ल्ड कप क्रिकेट और आने वाले बजट पर टिकी है।
 
बहुत कम लोगों के जेहन में बजट में न्यायपालिका की उपेक्षा को लेकर टिस उभर रही होगी। यदि सरकार ने बजट में न्यायपालिका के लिए खजाना खोला तो निश्चय ही न्यायपालिका को मजबूती मिलेगी। लेकिन पिछली सरकार की परंपरा को देखते हुए ऐसा लगता नहीं कि सरकार न्यायापालिका पर मेहरबान होगी। जाहिर है  न्यायपालिका की मजबूती सरकार की मनमानी का अंकुश साबित होगा।
 
 

 दैनिक नवज्योति के कोटा संस्करण से जुड़े संजय स्वदेश देश के विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं व पोटर्ल से लिए स्वतंत्र लेखन करते हैं . उनसे sanjayinmedia@rediffmail.com पर संपर्क किया जा सकता है.
 
 
 
 
 
 

Feb 18, 2011

मैं गंवार हूं...



अशोक विश्वास

चम्मच से मुझे खाने की आदत नहीं

छूरी की मुझे जरूरत नहीं

मैं खाता हूं ज़मीन काटकर

मैं खाता हूं सबको बांटकर

इसलिए कि मैं गंवार हूं



मेरे बच्चे स्कूल में पढ नहीं पाते

बेरहम दुनिया से लड नहीं पाते

तभी तो वो सफलता की सीढी चढ नहीं पाते

इसलिए कि मैं गंवार हूं



जीवन भर मैं औरों के लिए बनाता हूं महल

हर काम की मुझसे ही होती है पहल

फिर भी मैं रहता हूं झोपडी में

दुख और गरीबी ही है मेरी टोकरी में

इसलिए कि मैं गंवार हूं



गरीबी ही है मेरी हमजोली

बीमारी मेरी दीवाली

और मौत ही मेरी होली

ये सब इसलिए क्योंकि मैं गंवार हूं



(अशोक, सरगुजा में सामाजिक कार्यकर्ता हैं. उनकी यह कविता सीजीनेट स्वर  से साभार ली जा रही है.)