Feb 11, 2011

इतिहास के आउटलुक में वर्तमान का आइडिया


अखबारों की तर्ज पर  इतिहास का भी नजरीया बदल देने वाले इतिहासकार रामचंद्र गुहा जब बुर्जुआ राष्ट्र-राज्य की अवधारणा को ही विकृत कर पेश कर रहे हैं तो निश्चय ही इसके पीछे उनकी कोई मंशा है...

अंजनी कुमार

प्रसिद्ध इतिहासकार शाहिद अमीन ने प्रेमचंद पर अपने हालिया लेख में नए इतिहासकारों से अपील की है -‘पक्की’से थोड़ा हटकर लिखें। मगर शायद ही कोई इतिहासकार होगा जो कहेगा कि वह पक्की राह पर चल रहा है। कारण कि पक्की से हटकर चलने की दावेदारी और मार्क्स से आगे जाने का तमगा सभी हासिल करना चाहते हैं। भला कौन होगा जो पक्की राह पर चल कर मुंह पिटाए और मौलिक इतिहासकार होने की दावेदारी न पेश करे।

भले ही नए लेखन के नाम पर वह पुरानी लकीर ही पीटे जा रहा हो और इस पीटने में इतिहास की उन सच्चाईयों को भी पीटे जा रहा हो जिसका चेहरा इतिहास के गिरेबान से निकल ही आता है। इसलिए सच का थोबड़ा बिगाड़ देने की हद तक जाने वाले इतिहासकारों की फेहरिस्त बढ़ रही है।

इतिहास को समसामयिक खबर की तरह पेश करने वाले इतिहासकार रामचंद्र गुहा का अंग्रेजी पत्रिका आउटलुक के 31जनवरी 2011 के अंक में ‘द एनिमी ऑफ द आइडिया ऑफ इंडिया’ विषय पर ‘ए नेशन कंज्यूम्ड बाय द स्टेट-एक राष्ट्र जिसे राज्य ही नष्ट कर रहा है’ लेख छपा है। रामचंद्र गुहा ने भारतीय राष्ट्र के जिन दुश्मनों का नाम गिनाया वे हैं: हिन्दू साम्प्रदायिकता, माओवादी, उत्तर पूर्व व कश्मीर की राष्ट्रीयता मुक्ति का आंदोलन, आदिवासियों का विस्थापन, लूट, भ्रष्टाचार और राज्य की दमनकारी नीति.    

रामचंद्र गुहा को इस बात का मलाल है कि आदिवासियों को उनका ‘अंबेडकर’नहीं मिला और माओवादी ‘भारतीयता’में ढुंढ नहीं रहे हैं। उन्हें डर है कि कश्मीर अल कायदा का गढ़ न बन जाय और भ्रष्टचार-लूट में राज्य भारतीय राष्ट्र को डूबा न दे। उनके गिनाए गए दुश्मनों के खेमे से बाहर दलित, मुस्लिम, सिख और स्त्री हैं। तब क्या यह मान लिया जाय कि यही भारतीय राष्ट्र हैं?यह कहना ज्यादती होगा। वह मानते हैं कि ये समुदाय चुनावी राजनीति के जरिए भारतीय राष्ट्र के हिस्सा बन चुके हैं।

उनकी यह दावेदारी उपरोक्त समुदाय की वास्तविक स्थिति पर पर्देदारी होगी। दलित, मुस्लिम व स्त्री पर राज्य व गैर राज्य स्तरीय हिंसा के मद्देनजर यह बात सतह पर भी सच नहीं दिखती। और यदि ऐसा है तो उनके तर्क का सीधा परिणाम यही निकलता है कि यह देश सिख समुदाय से ही चल रहा है। जाहिरा तौर पर इस निष्कर्ष पर हां में जबाब नहीं बन सकता। तब यह जानना जरूरी बन जाता है कि उनकी भारतीय राष्ट्र की अवधारणा क्या है।

रामचंद्र गुहा रविन्द्रनाथ टैगोर के हवाले से बताते हैं कि भारतीय राष्ट्र 19वीं सदी के यूरोपीय राष्ट्रवाद यानी ‘एक भाषा, एक धर्म व एक निश्चित दुश्मन -जो बाद की राष्ट्रीयताओं (जिसमें पाकिस्तान, इजराइल शामिल हैं) के लिए सांचे का काम किया, से भिन्न तरीके से उभरकर आया। रामचंद्र गुहा के शब्दों में ‘भारतीय राष्ट्र के विशाल भूभाग में किसी भी अन्य राष्ट्र के मुकाबले अधिक सामाजिक वैविध्यता है’।

इतिहास का क ख ग जाने वाले छात्र  भी यूरोपीय राष्ट्र-राज्य की अवधारणा की इस नई परिभाषा से चौकेंगे। और यदि हम रामचंद्र गुहा की ही परिभाषा को मान लें तब भी इस खांचें में देर से बने राष्ट्र यानी पाकिस्तान व इजराइल फिट बैठते हैं?14अगस्त 1947को अस्तित्व में आने वाले पाकिस्तान के बारे में कौन नहीं जानता कि वह एक बहुभाषी राज्य था। भाषागत व इतिहास-क्षेत्र की वैशिष्ट्यता के आधार पर ही 1971 में बांग्लादेश का अभ्युदय हुआ।

भारतीय अखबारों की तरह इतिहास का भी नजरीया बदल देने वाले इतिहासकार रामचंद्र गुहा जब बुर्जुआ राष्ट्र-राज्य की अवधारणा को ही विकृत कर पेश कर रहे हैं तो निश्चय इसके पीछे उनकी कोई मंशा है। वे इतिहास की अवधारणाओं को नहीं जानते,यह कहना-सोचना भुलावे में डालना होगा। दरअसल वे इतिहास को समसामयिक की तरह पेश कर इतिहास के निष्कर्षों से बच निकलना चाहते हैं। वह संघर्ष,प्रतिनिधित्व व निर्माण-अभ्युदय की प्रकिया को सम्मिलन,समर्पण व अधिनायकत्व की वर्तमान राजनैतिक-आर्थिक धारा में डूबो देना चाहते हैं।

जब गुहा निषेध की प्रक्रिया में गर्व से यह दावेदारी करते हैं कि ‘भारतीय राष्ट्र के विशाल भूभाग में किसी भी अन्य राष्ट्र के मुकाबले अधिक सामाजिक वैविध्यता है’ तब वे सामाजिक वैविध्यता के ठंडे पानी में भाषा, इतिहास, क्षेत्र व लोगों को डूबो देते हैं। भारत के विशाल भूभाग में रहने वाले लोगों के बीच सामाजिक वैविध्यता नहीं बल्कि राष्ट्र-राज्यों का सामूहिकीकरण है। इस समहिकीकरण के पीछे लगातार चलने वाली रक्त रंजीत टकराहटें हैं। जिसमें दिल्ली में बैठने वाला राष्ट्र-राज्य निरंतर ताकतवर बनता गया है। रामचंद्र गुहा राजनीतिक विविधता को सामाजिक विविधता के तले दबाकर विविधता की प्रकृति को खा जाना चाहते हैं।

अन्यथा, कौन यह बात नहीं जानता कि केरल, कश्मीर, भोजपुर और नागलैंड के बीच सामाजिक नहीं इतिहासगत विविधता है। क्षेत्र, भाषा व लोगों के बीच विशिष्ट प्रकृति की विविधता है। रामचंद्र गुहा की चिंता वैविध्यता को लेकर इस कारण से है कि ये समूह अभी तक ‘अधिनायक’ का हिस्सा नहीं बन पाए हैं। वह लिखते हैं, ‘‘मुस्लिम व दलित मुद्दों को लोकतांत्रिक चुनावों में पार्टियों के माध्यम से अभिव्यक्ति तो मिली है लेकिन आदिवासियों का अंबेडकर कहां है? या आदिवासियों की मायावती कहां हैं?’

वे चुनावी पार्टियों के माध्यम से ही प्रतिनिधित्व देखने के लिए लालायित हैं तो उन्हें झारखंड व छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्रियों-मंत्रियों की फेहरिस्त में जरूर झांक लेना चाहिए। और उनकी चिंता भारतीय ‘राष्ट्र-राज्य’के बनने के दौरान यानी पचास के दशक की है तब उन्हें जरूर नेहरू व उस दौर की राजनीति के गिरेबान में झांकना चाहिए जहां महज 14प्रतिशत लोग देश का भविष्य तय कर रहे थे। इस गिरेबान में झांकने का अर्थ होगा इतिहास के उन अध्यायों से गुजरना जो ‘पक्की’ के किनारे बसे हुए थे। वे जीवन की एक पक्की राह पकड़ना चाह रहे थे। और उनके पक्के रास्ते पर आते ही देश की सुरक्षा को खतरा हो गया। उन्हें गोली से उड़ा दिया गया। जो बच गये उन्हें पीछे ठेल दिया गया। उनके मुद्दों को संविधान की काल कोठरी में डाल दिया गया।

रामचंद्र गुहा के ‘आइडिया ऑफ इंडिया’ को खतरा पचास के दशक में उभरे राष्ट्र-राज्य की राजनीति की प्रवृत्तियों से नहीं है। वे इस दौर को थोड़े विचलनों के साथ स्वर्णिमकाल मानते हैं। उन्हें खतरा ‘‘व्यापक व बड़े स्तर पर चल रहे राजनीतिक भ्रष्टाचार’’ से लग रहा है जो लूट के लिए सम्मिलन की प्रक्रिया को बाधित कर रहे हैं। वह मानते हैं कि आइडिया ऑफ इंडिया ‘‘संवाद,समझौता व समायोजन’’ पर आधारित है। इसके तहत किसी को भी तुरंत-फुरत हल नहीं मिलने वाला है। क्या यह इतिहास का अधिनायकवादी विमर्श नहीं है, जिसकी पक्की राह कैंब्रिज स्कूल की ओर ले जाती है और जिसके पेंदे में पड़ने का अर्थ है साम्राज्यवाद की चाकरी, अधिनायकवाद की जी हुजूरी।

रामचंद्र गुहा ‘‘संवाद, समझौता व समायोजन’’ की कोई समय सीमा तय नहीं करते। ठीक वैसे ही जैसे साम्राज्यवादी लोकतांत्रिक प्रक्रिया के बहाल होने की कोई समय सीमा तय नहीं करते। रामचंद्र गुहा को डर है कि कश्मीर की आजादी से वहां अलकायदा का गढ़ बन जाएगा। इससे आइडिया ऑफ इंडिया को खतरा पैदा हो जाएगा। वह यह नहीं बताते कि 1990 के पहले वहां कौन सा खतरा था। या कि, उत्तर-पूर्व की राष्ट्रीयताओं की मुक्ति से क्या खतरा था(है)। देश के भीतर भाषागत राज्य बनाने को लेकर क्या खतरा रहा है? आज भी तेलगांना, बुंदेलखंड या भोजपूर के राज्य बनने से कौन से खतरा उठ खड़ा हो रहा है

इस इतिहास से गुजरने का अर्थ होगा उन मुद्दों व लोगों से उलझना जिनके चलते उनका आइडिया ऑफ इंडिया बनता है। इंडिया के बनने में इतिहास के साथ की गई दगाबाजियों से होकर गुजरने का अर्थ वर्तमान की तकलीफों से होकर गुजरना है। रामचंद्र गुहा इस तकलीफदेह रास्ते से गुजरने के बजाय इन तकलीफों को ही ‘‘दुश्मन’’ करार देते हैं।

इंडिया को स्वरूप देने वाले नेहरू से वह कन्नी काट जाते हैं। उस दौर में बन रहे आइडिया ऑफ इंडिया पर चुप्पी मार जाते हैं। वह यह नहीं बताते हैं कि केरल में लोकतांत्रिक प्रक्रिया से चुनी गई कम्युनिस्ट पार्टी की सरकार की बर्खास्तगी, उत्तर-पूर्व में आफ्सपा लगाने व तेलगांना में निजामशाही के खिलाफ लड़ रहे किसानों के खिलाफ सेना-अर्धसेना लगाने का काम नेहरू ने ही किया था।

इतिहासकार रामचंद्र गुहा

कश्मीर के साथ दगाबाजी और उनके नेताओं को जेल भेजने,किसानों को बाजार व जमींदारों के भरोसे छोड़ने का काम इसी काल में हुआ। देश की पांच प्रतिशत आबादी के लिए अभिजात स्कूलों ,कॉलेजों व तकनीकी संस्थानों  को खालेने की नीति व कार्यवाई इसी दौर में हुई। यही वह समय था जब पुरूषों को मार स्त्रियों को सती होने और दलितों-आदिवासियों को सीमांत विषय बनाकर छोड़ दिया गया। जिसकी खिलाफत करते हुए डा.अंबेडकर ने सरकार से इस्तिफा देने का विकल्प चुना और यह विकल्प राष्ट्र-राज्य में उभर रही राजनीति में विकल्पहीनता का बायस बन गया।

दरअसल,रामचंद्र गुहा इंडिया की संकल्पना को बचाए रखने के लिए एक ऐसे अधिनायक की चाह पेश करते हैं जो अपनी गतिविधि में मोदी न हो,लूट व भ्रष्टाचार में डूबा न हो और जो वैविध्यता को अंगीकार कर समरस कर ले। शायद वह ‘प्रिंस’चाहते हैं। या एक ऐसी संविदा जिसमें दैवीय गुण हो। जिसके समक्ष ‘‘संवाद, समझौता, विनिमय व समायोजन’’को चाहने वाले लोग हों। उन्हीं के शब्दों में ‘‘लोकतंत्र को चलने के लिए तीन जरूरी तत्व हैं: राज्य, नीजी उपक्रम व नागरिक समाज’’।

जन व लोक तो घोड़े की पीठ है जिस पर इन्हें सवार होना है। उन्हें यह बात नहीं समझ में आती कि ‘अंग्रेजी शिक्षित मेइति व नागा लोग भारत में अच्छी नौकरी हासिल कर रहे हैं। तब यह समुदाय क्यांे एक छोटी सी जगह में सिकुड़ कर रहने के लिए बेताब है?’इसी तरह उन्हें हिंदूत्ववाद व नक्सलवाद में फर्क नहीं दिखता है। और,न ही उनके आइडिया ऑफ इंडिया में हिंदूवाद की बू आती है। मानो यह मोदी के खाते में ही पूरा का पूरा जमा कर दिया गया है।

रामचंद्र गुहा कभी दस्तावेज में घुसते हैं तो कभी किसी समसामयिक दृश्य में तो कभी किसी के साथ बातचीत का रस निचोड़ते हुए इतिहास का सामयिक आख्यान पेश करते हैं। वह न केवल एक अभिजात समूह की इच्छा व विमर्श को इतिहास के रूप में पेश करते हैं बल्कि वह इतिहास के उत्तर औपनिवेशिक विमर्श की शब्दावलियों को चुराकर उस असली मंशा को छुपा ले जाना चाहते हैं जहां पूंजी अपने अधिनायकत्व के साथ राज करना चाहता है।

रामचंद्र गुहा जन के विविध पक्षों को दुश्मन करार देकर ‘विचार’जैसी सरणी को तेलहंडा में डाल देने का आग्रह करते हैं। इतिहास के उत्तर-आधुनिक विमर्श के आवरण में इतिहास की औपनिवेशिक अवधारणा किस किस रूप में भेष धरकर आएगा,इसे रामचंद्र गुहा के इस लेख से जरूर पता लगता है। जानना हो तो लेख जरूर पढ़ें और तय करें कि साम्राज्यवाद के इस घोर पतन के दौर में संघर्ष,विचार और निर्माण की धुरी इंसान के पक्ष में चलते हुए सृजन कैसे करें।



(लेखक  राजनीतिक -सामाजिक कार्यकर्ता और पत्रकार हैं.फिलहाल मजदूर आन्दोलन पर कुछ जरुरी लेखन में व्यस्त.उनसे abc.anjani@gmail.comपर संपर्क  किया जा सकता है. )

Feb 10, 2011

भारत की 'इंगेजमेंट थ्योरी' आखिरकार ध्वस्त


प्रचंड ने साहस के साथ झलनाथ खनाल को प्रधानमंत्री पद के लिए समर्थन देने का निर्णय लिया। इस फैसले ने संविधान सभा के अन्य दलों के साथ-साथ भारत को भी सकते में डाल दिया...

आनंद स्वरूप वर्मा

नेपाल की दो बड़ी वामपंथी पार्टियों-माओवादी और एमाले-का किसी न किसी बिंदु पर पहुंच कर मिल जाने की ऐतिहासिक आवश्यकता बहुत दिनों से जरूरी लग रही थी। ऐसा नहीं है कि पहले इसका प्रयास नहीं हुआ। संविधान सभा के निर्वाचन के समय भी इसकी कोशिश हुई थी  लेकिन सफलता नहीं मिली थी। इन दोनों पार्टियों को न मिलने देने में नेपाल के प्रतिक्रियावादी और सामंती तत्वों के अलावा भारत की बड़ी भूमिका थी।

भारत यह नहीं चाहता था कि माओवादियों के समर्थन और सहभागिता में नेपाल में कोई सरकार बने। उसमें भी माओवादियों के समर्थन में एमाले की सरकार बनने को वह कभी बर्दाश्त नहीं कर सकता था क्योंकि अभी की सरकार पूरी तरह एक कम्युनिस्ट सरकार है। नेपाल में जो परिस्थिति विकसित हुई है वह भारत के लिए ठीक नहीं है -ऐसी प्रतिक्रयाएं भारत के कुछ अखबारों में आई है।


इतिहास में झांकने पर समझ आता है कि ये प्रतिक्रियाएं नई नहीं हैं। 1994में जब एमाले के नेता मनमोहन अधिकारी की सरकार बनी थी उस समय भी भारतीय अखबारों में आई प्रतिक्रियाएं प्रचंड की सरकार बनने के बाद की प्रतिक्रियाओं जैसी ही थीं। प्रचंड की सरकार पर भारत के सत्ताधारी वर्ग ने जो जो आरोप लगाए थे वही आरोप मनमोहन की सरकार पर भी लगाये थे। मसलन नेपाल का झुकाव चीन की तरफ हो गया है,वह कम्युनिस्ट हो गया है,लाल हो गया है,अब भारत के साथ उसके संबंध खराब हो जायेंगे,दोनों देशों के बीच की संधियों का विरोध होगा आदि आदि।

भारत के सत्ताधारी वर्ग की ओर से भी वाम सरकार के लिए ऐसी ही प्रतिक्रियाएं आती रहती हैं। आज तो स्थिति यह है कि भारत अमेरिका का जूनियर पार्टनर हो चुका है। विश्व परिप्रेक्ष्य में दिखायी पड़ता है कि अमेरिका को चीन से लगातार चुनौतियां मिल रही हैं। चीन की चुनौती बढ़ रही है और भविष्य में इसमें और इजाफा होने के संकेत मिल रहे हैं। इसलिए इस भूभाग में अमेरिका की रणनीतिक दिलचस्पी लगातार बढ़ी है। उसने अपने रणनीतिक साझेदार भारत के जरिए चीन को घेरने की नीति बनायी है।

ऐसी स्थिति में अमेरिका नेपाल में किसी भी प्रकार की वाम सरकार को नहीं देखना चाहता। वह जानता है कि भले ही नेपाल की वाम सरकार का झुकाव चीन की ओर न हो लेकिन वह अमेरिका के खिलाफ तो होगी ही। अमेरिका नेपाल में ऐसी स्थिति का विकास ठीक नहीं मानता। इसलिए जो अमेरिका चाहता है भारत उसे लागू कर रहा है। नेपाल में वाम गठबंधन या वाम सरकार भारत बर्दाश्त नहीं करता।

राष्ट्रीय परिप्रेक्ष्य में देखें तो भारत की नेपाल में दिलचस्पी के और भी कारण हैं। जैसे विश्व परिप्रेक्ष्य में नेपाल चीन की वजह से महत्वपूर्ण है उसी तरह भारत के लिए नेपाल की आंतरिक राजनीति भी कम महत्वपूर्ण नहीं है। भारत में इस वक्त माओवादी आंदोलन तेजी से बढ़ रहा हैं। यदि नेपाल के माओवादी अपने देश में कुछ अच्छा काम करके दिखाते हैं और माओवादियों के सहयोग से कोई सरकार बनती है तो भारत में इसका प्रत्यक्ष प्रभाव पड़ेगा।

माओवादियों द्वारा जनहित में किये गये कामों के उदाहरण भारतीय जनता के लिए महत्वपूर्ण होंगे। माओवादी अच्छा काम करते हैं -इस तरह का संदेश जाने से भारत के माओवादियों को नैतिक बल मिलेगा। भारत के संचार माध्यम यह प्रचार करते है कि माओवादी गलत लोग हैं। नेपाल के माओवादियों के जनहितकारी कामों से इस तरह के प्रचार गलत साबित होंगे। भारत यही नहीं चाहता।

कुछ समय पहले थिम्पू में माधव नेपाल से अपनी मुलाकात में मनमोहन सिंह ने यह आश्वासन दिया था कि यदि संविधान सभा भंग भी हो जाती है तो भारत की सरकार उन्हें  समर्थन देती रहेगी। यह मेरा अनुमान नहीं है। माधव नेपाल ने खुद एमाले की केंद्रीय समिति को यह बात बतायी थी और एमाले के उपाध्यक्ष बामदेव गौतम ने बीबीसी को दिये अपने इंटरव्यू में इसका उल्लेख किया था। यह तथ्य अब सार्वजनिक हो चुका है। संविधान सभा के विफल हो जाने पर भी माधव नेपाल को टिकाये रखने की मनमोहन सिंह की इच्छा से बहुत कुछ स्पष्ट हो जाता है।

प्रचंड ने साहस के साथ झलनाथ खनाल को प्रधानमंत्री पद के लिए समर्थन देने का निर्णय लिया। इस फैसले ने संविधान सभा के अन्य दलों के साथ-साथ भारत को भी सकते में डाल दिया। ‘टाइम्स आफ इंडिया’के ऑनलाइन संस्करण में उसी दिन यह खबर आयी कि नेपाल में भारत विरोधियों की विजय हुई है। मधेशी नेता विजय गच्छेदार प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार क्यों बने? 

भारत में नेपाली राजनीति को समझने वाले  जानते हैं कि गच्छेदार इसलिए उम्मीदवार बनाए गए ताकि प्रचंड को सरकार बनाने से रोकने के मकसद से मधेशी दलों को ‘इंगेज’रखा जा सके। मधेशी उम्मीदवार को चुनाव में खड़ा कर देने से पहले की उस स्थिति से बचा जा सकता था जिसमें मधेशी नेताओं ने प्रचंड को वोट दिया था। उस वक्त श्याम शरण भागे- भागे नेपाल आए थे और मधेशी नेताओं को एक बार फिर प्रचंड को वोट देने से रोका था।

नेपाल की राजनीति में भारत का हस्तक्षेप लगातार होता रहा है। 2008के चुनाव से एक सप्ताह पहले एमके नारायण ने घोषणा की थी कि भारत कोइराला के पक्ष में खड़ा है। नेपाल के पक्ष से देखें तो ऐसे हस्तक्षेपों को तुरंत रोकना जरूरी था। प्रचंड के अभी के कदम ने न केवल झलनाथ खनाल को प्रधानमंत्री बनाया है बल्कि भारत के हस्तक्षेप को भी रोका है। प्रचंड ने अपने भाषण में भी उल्लेख किया है कि हम किसी के इशारे पर नहीं चलेंगे, नेपाली जनता खुद अपना निर्णय ले सकती है। जाहिर है राष्ट्रीय स्वाभिमान और संप्रभुता को प्रचंड ने स्थापित किया है।

जैसा कि माओवादियों ने कहा है ‘अभी सही अर्थों में नेपाली जनता की सरकार बनी है’। प्रधानमंत्री के चुनाव के बाद नेपाल के ही एक अखबार ने लिखा कि झलनाथ खनाल की सरकार रिमोट कंट्रोल से चलेगी और रिमोट प्रचंड के हाथ में होगा। यह तो अजीब बात हुई। एक पल के लिए ऐसा मान भी लें कि झलनाथ खनाल प्रचंड के रिमोट कंट्रोल से चलेंगे तो भी कम से कम यह रिमोट नेपाल का तो होगा। माधव नेपाल की सरकार तो भारत के रिमोट कंट्रोल से चलती थी। रिमोट कंट्रोल देश का ही होने में क्या गलत है?

झलनाथ खनाल के प्रधानमंत्री होने से जो वामगठबंधन अस्तित्व में आया है उससे  संविधान लिखने के काम पर निश्चित रूप से असर पड़ेगा. माओवादियों का एजेंडा नेपाल की सामाजिक संरचना में आमूल परिवर्तन लाने का है। उस पर संवाद होना जरूरी है। अपने एजेंडा के अनुसार संविधान लिखने के लिए माओवादियों के पास संविधान सभा में दो तिहाई बहुमत होना जरूरी है। माओवादी-कांग्रेस या एमाले-कांग्रेस के गठबंधन में जिस तरह की समस्याएं हो सकती थीं, वैसी समस्याएं इस गठबंधन में नहीं होंगी।

अब  नेपाल की शांति प्रक्रिया के तर्कसंगत निष्कर्ष की ओर बढ़ने की अपेक्षा की जा सकती है। शांति और संविधान लिखने के कार्य को पूरा करने का मौका आया है। यदि ऐसा हो सका तो यह नेपाल और नेपाली जनता के लिए ऐतिहासिक घटना होगी।



जनपक्षधर मासिक पत्रिका 'तीसरी दुनिया' के संपादक और नेपाल की राजनीति के महत्वपूर्ण विश्लेषक. यह लेख  काठमांडो से प्रकाशित नेपाली दैनिक ‘नया पत्रिका’से साभार लिया जा रहा है.लेख बातचीत पर आधारित है.उनसे vermada@hotmail.com  पर संपर्क किया जा सकता है.





Feb 9, 2011

सुकुमार माओवादियों के लिए विश्वरंजन की तड़प


अमूमन ऐसे नाजुक कोमल माओवादी आम जनता,बुद्धिजीवियों, न्यायविदों को गफलत तथा ऊहापोह की स्थिति में ला देता है- अरे यह तो अच्छा आदमी दिखता है,कोमल, नाजुक और सुकुमार ! यह कैसे माओवादी हो सकता है? पर...

विश्वरंजन,  डीजीपी छत्तीसगढ़

नक्सली माओवादियों के गुप्त शहरी संगठनों में आपको बड़े तादाद में ऐसे माओवादी मिल जाएंगे,जिन्हें हम नाजुक,कोमल माओवादी कह सकते हैं। उन्हें सुकुमार माओवादी भी कहा जा सकता है। यदि आप उनका चेहरा-मोहरा,कद-काठी देखें तो आप जल्दी मानने को तैयार नहीं होंगे कि यह नाजुक सा-कोमल सा लगने वाला व्यक्ति एक ऐसे संगठन को प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से सहायता कर रहा है,जो बुनियादी तौर पर सत्ता एक हिंसात्मक युद्ध के जरिए हासिल करना चाहता है और ऐसा करके भारत में माओवादी तानाशाही को स्थापित करने की कोशिश कर रहा है।

अमूमन ऐसे नाजुक कोमल माओवादी आम जनता, बुद्धिजीवियों, न्यायविदों को गफलत तथा ऊहापोह की स्थिति में ला देता है- अरे यह तो अच्छा आदमी दिखता है, कोमल, नाजुक और सुकुमार! यह कैसे माओवादी हो सकता है?पर माओवादी गोपनीय दस्तावेजों पर जाएं तो ऐसे ही व्यक्तियों की उन्हें अपने "अरबन" या शहरी कामों के लिए जरूरत होती है।

यह भी जाहिर है कि ज्यादातर ये कोमल-नाजुक शहरी माओवादी बीहड़ जंगलों में बंदूक उठाकर नहीं चल सकते,परंतु वे वह सब काम करेंगे जिससे गुप्त माओवादी गिरोह धीरे-धीरे जंगल क्षेत्र,ग्रामीण क्षेत्र और शहरी क्षेत्रों में अपनी पकड़ मजबूत करते जाएं और ऐसा करने के लिए उन्हें छोटे-छोटे हथकंडे अपनाने पड़ते हैं। बस।

मसलन कि माओवादी हिंसा पर अमूमन उनका मुंह बंद ही रहेगा। यदि हिंसा इतनी घिनौनी है कि मुंह बंद करना मुश्किल हो जाए तो एक पंक्ति में अपना विरोध जताने के बाद इस बात को समझाने के लिए कि आखिर माओवादी इस तरह की घिनौनी हिंसा करने पर क्यों बाध्य हुए,वे पृष्ठ रंग देंगे?माओवादियों के हिंसात्मक गतिविधियों को रोकने के लिए जो कृतसंकल्प है,उन्हें बार-बार न्यायालयों में खींच कर तब तक ले जाने का उपक्रम ये नाजुक कोमल माओवादी करते रहेंगे जब तक पुलिस के अफसर तंग आकर लड़ना न छोड़ दें और माओवादी धीरे-धीरे भारत के गणतांत्रिक व्यवस्था को ध्वस्त कर सत्ता पर काबिज न हो जाएं।

नाजुक-कोमल माओवादियों ने दूर देखती रूमानी आंखों और कोमलता से लबरेज चेहरा-मोहरा के बूते पर लोगों को तो गफलत में डाल रखा है। आम व्यक्ति सोचता है,ठीक ही बोल रहे होंगे ये लोग। इतने नाजुक,कोमल और सुकुमार दिखने वाले लोग गलत कैसे हो सकते हैं?

पर एक समस्या और भी है। यदि आपने गलती से उंगली उठा दी एक नाजुक, कोमल और सुकुमार माओवादी पर तो उनके कोमल,नाजुक और सुकुमार माओवादी दोस्त न कोमल,न नाजुक, न सुकुमार रह जाएंगे और असभ्यता की हदें पार कर गाली-गलौच पर उतर आएंगे,मिथ्या प्रचार पर उतर आएंगे और यह वे साइबर-स्पेस के जरिए करेंगे, धरना-प्रदर्शन देकर करेंगे। यदि आप गूगल में मेरे नाम पर क्लिक करेंगे तो पाएंगे कि मेरे फोटो को विकृत कर छापा गया है,मुझे गालियां दी गई हैं।

मुझे कोई खास फर्क नहीं पड़ता पर बहुतों पर असभ्य गाली-गलौच का असर होता है। खास कर यदि साइबर-स्पेस के माध्यम से वह पूरे विश्व में फैलाया जा रहा हो। चुप ही रहना अच्छा है। नाजुक,कोमल माओवादी के साथ सुर मिलाना और भी श्रेयस्कर है और माओवादियों को चाहिए ही क्या?"भूल गलती बैठी है जिरह-बख्तर पहन कर तख्त पर दिल के /चमकते हैं खड़े हथियार उसके /आँखें चिलकती हैं सुनहरी तेज पत्थर सी ..!है सब खामोश /इब्ने सिन्ना,अलबरूनी दढ़ियल सिपहसलार सब ही खामोश हैं।

बुद्धिजीवी, न्यायविद, अंग्रेजी मीडिया के लोग सभी तो हैं खामोश।" या फिर सुकुमार, कोमल, नाजुक माओवादी के साथ तो साहब जैसा मुक्तिबोध ने लिखा है हम अक्सर खुदगर्ज समझौते कर लेते हैं और माओवाद को पनपने देते हैं,अपने देश के गणतांत्रिक शरीर में विष की तरह। साथ ही आवाज में आवाज मिलाने लगते हैं।

माओवादी शहरी संगठन के साथ एक और समस्या भी है। यह एक खगोलशास्त्रीय "ब्लैक होल" की तरह होता है। खगोलशास्त्र के अनुसार आप "ब्लैक होल"को देख नहीं सकते। उसमें से रोशनी ही बाहर नहीं निकलती। हां "ब्लैक होल" के आसपास होती हुई गतिविधियों से हम भाँप जाते हैं कि अमुक जगह "ब्लैक होल" है।

मसलन कि डायरेक्ट "साक्ष्य"नहीं होता,इनडायरेक्ट या "सरकम्सटैन्शियक" साक्ष्य का ही सहारा लेना पड़ता है। वैसे भी गोपनीय माओवादी दस्तावेज इन लोगों के विषय में कहता है कि ये वो लोग होते हैं जो "दुश्मन" (राज्य) के सामने उघारे नहीं गए हों। यानी कि यह लोग कभी नहीं कहेंगे कि ये माओवादी हैं...।

जरा सोचिए कि यदि माओवादी तानाशाही भारत में स्थापित हो गया तो क्या होगा?हो सकता है आपका लड़का पूरी जन्म जेल में यातनाएँ झेलता रहे और कहीं कोई सुनवाई न हो। चीन का राष्ट्रपति लियोशाओ ची जब माओ का विरोध करने लगा तो उसके बाल नोचे गए और यातनाएँ देकर उसे मारा डाला गया। उसकी पत्नी वांग को पीटा गया,यातनाएँ दी गईं। यह आपके साथ भी हो सकता है एक माओवादी भारत में ।

जुंग चैंग के पिता माओ के दोस्त थे,परंतु जब माओ से उनका मतभेद हुआ तो न सिर्फ उन्हें यातनाएँ देकर मारा डाला गया परंतु उनके पूरे परिवार को यातनाएँ दी गई। एक अन्य चीनी लेखिका की माँ को यातनाएँ दी गई और उसके बाल नोच डाले गए जब उसने माओ से असहमति दिखाई।

मासूम और कोमल दिखने वाले माओवादी के साथ खड़े बुद्घिजीवियों, न्यायविदों तथा अन्य लोगों को यह समझना चाहिए कि एक माओवादी भारत में उनके साथ भी वैसा ही सलूक हो सकता है, जैसा चीन के लोगों के साथ माओ के जमाने में झेला।

मुश्किल यह है कि कोमल,नाजुक, सुकुमार तथा मासूम सा दिखता माओवादी भोली सूरत बना कर कहता रहेगा,वह माओवादी नहीं है और हम ऊहापोह,गफलत और बेचारगी का चश्मा लगा या तो कुछ नहीं करेंगे या उन्हें ही गाली देने लगेंगे जो भारत में गणतांत्रिक व्यवस्था को बचाये रखने के लिए जान पर खेल रहे हैं।



लेखक विश्वरंजन छत्तीसगढ़ के पुलिस महानिदेशक हैं.उनसे dgp_chhattisgarh@yahoo.co.in के जरिए संपर्क  किया जा सकता है. यह लेख www.bhadas4media.com  से  साभार  प्रकाशित   किया   जा   रहा  है.



 
 

Feb 8, 2011

बोल इंडिया बोल पर नहीं बोलेगा इंडिया


आर्थिक संकट के दौर में  सर्वप्रथम युद्ध के खर्चों में कटौती की जानी चाहिए न कि पूरी दुनिया में विश्वसनीयता का झंडा गाडऩे वाले बीबीसी जैसी रेडियो सेवा पर खर्च होने वाले पैसों में। भारत में अब भी बीबीसी के लाखों श्रोता ऐसे हैं जिनका नाश्ता बीबीसी पहली सेवा से ही होता है तथा रात में अंतिम सेवा सुनकर ही उन्हें नींद आती है...

तनवीर जाफरी 

दुनिया भर में  लोकप्रिय,निष्पक्ष एवं बेबाक समझी जाने वाली बीबीसी की रेडियो  समाचार सेवा अब बंद हो रही है. ब्रिटिश ब्रॉडकास्टिंग कॉरपोरेशन उर्फ़ बीबीसी के प्रमुख पीटर हॉक्स द्वारा की गयी घोषणा के अनुसार भारत सहित मैसोडोनिया,सर्बिया,अल्बानिया,रूस,यूक्रेन तुर्की,मेड्रिन,स्पेनिश,वियतनामी तथा अजेरी भाषा के बीबीसी प्रसारण मार्च के दूसरे पखवाड़े,संभवत 20 मार्च से बंद कर दिए जाएंगे।

बीबीसी की सेवाओं में कटौती का निर्णय ब्रिटिश विदेश मंत्रालय के उस फैसले का परिणाम है जिसमें कहा गया है कि 'बीबीसी को दिए जाने वाले अनुदान में १६ प्रतिशत की कटौती की जाए।'गौरतलब है कि  बीबीसी   सेवा का मुख्यालय  लंदन स्थित बुश हाऊस में है तथा यह सेवा पब्लिक ट्रस्ट से संचालित होती है और बीबीसी के कर्मचारियों तथा पत्रकारों की तनख्वाह ब्रिटेन का विदेश मंत्रालय पैसा मुहैया कराता है। लिहाज़ा  ब्रिटिश विदेश मंत्री विलियम हेग का कहना है कि बीबीसी की भविष्य की प्राथमिकताएं नए बाज़ार होंगे। जिसमें ऑनलाईन प्रसारण,इंटरनेट तथा मोबाईल बाज़ार प्रमुख हैं।


ब्रिटिश विदेश मंत्रालय के इस फैसले से जहां बीबीसी के लगभग 650 कर्मचारी तथा योग्य पत्रकार अपनी सम्मानपूर्ण नौकरियां गंवा बैठेंगे, वहीं बीबीसी से आत्मीयता का गहरा रिश्ता रखने वाले समाचार श्रोताओं के हृदय पर यह निर्णय एक कुठाराघात भी साबित होगा। ब्रिटिश विदेश मंत्रालय के इस फैसले से पहले पिछले  वर्ष एक और प्रमुख अंतर्राष्ट्रीय हिंदी समाचार सेवा 'वॉयस ऑफ अमेरिका' को  अमेरिकी प्रशासन द्वारा बंद किया जा चुका है। यह फैसला भी वित्तीय संकटों के चलते वित्तीय खर्चों में कटौती करने की गरज़ से लिया गया था।

परंतु भारत में वॉयस ऑफ  अमेरिका का रेडियो प्रसारण बंद होने पर इतना अफ़सोस नहीं  था जितना कि बीबीसी हिंदी सेवा के रेडियो प्रसारण के बंद होने के फैसले पर दिखाई दे रहा  है। इसका सीधा एवं स्पष्ट कारण यही है कि बीबीसी विश्व समाचार हिंदी के रेडियो प्रसारण ने अपनी निष्पक्ष,बेबाक, साहित्य से परिपूर्ण तथा त्वरित पत्रकारिता के चलते भारत की करोड़ों  दिलों में  जगह बनाई थी, वह जगह वॉयस ऑफ अमेरिका तो क्या शायद भारतीय रेडियो की विविध भारती तथा आकाशवाणी सेवा भी नहीं बना सकी थी।

बीबीसी ने अपने शानदार समाचार विश्लेषण,साहित्यिक सूझबूझ रखने वाले पत्रकारों तथा शुद्ध एवं शानदार उच्चारण के चलते स्वतंत्रता के बाद से लेकर अब तक भारतीय श्रोताओं के दिलों पर राज किया। यह कहने में कोई हर्ज नहीं कि बीबीसी सुनकर ही हमारे देश में न जाने कितने युवक आईएएस अधिकारी बने,कितने लोग नेता बने तथा तमाम लोग छात्र नेता, लेखक,पत्रकार,व अन्य अधिकारी बन सके। बीबीसी परीक्षार्थियों तथा विभिन्न प्रतियोगिताओं में भाग लेने वाले युवकों को भी अत्यंत लोकप्रिय था। बीबीसी रेडियो की हिंदी सेवा ने गरीबों,रिक्शा व रेहड़ी वालों,चाय बेचने वालों,दुकानदारों से लेकर पंचायतों व चौपालों आदि तक पर लगभग 6 दशकों तक राज किया।

भारत में अब भी बीबीसी के लाखों श्रोता ऐसे हैं जिनका नाश्ता बीबीसी पहली सेवा से ही होता है तथा रात में अंतिम सेवा सुनकर ही उन्हें नींद आती है। भारत में ऐसे बहुत मिल जायेंगे जो बीबीसी हिंदी सेवा सुनने के लिए ही समाचार प्रेमी श्रोतागण रेडियो व ट्रांजिस्टर खरीदा करते थे। तमाम भारतीय समाचार पत्र-पत्रिकाएं तथा टीवी चैनल बीबीसी के माध्यम से खबरें लेकर प्रकाशित व प्रसारित केवल इसलिए किया करते थे क्योंकि बीबीसी की खबरों की विश्वसनीयता की पूरी गांरटी हुआ करती थी। परंतु अब सभवत:यह गुज़रे ज़माने की बातें बनकर इतिहास के पन्नों में समा जाएंगी।

इसमें कोई दो राय नहीं कि इस समय पूरा विश्व विशेषकर पश्चिमी देश भारी मंदी व इसके कारण पैदा हुए आर्थिक संकट के दौर से गुज़र रहे हैं। परंतु आर्थिक संकट के इस दौर में यदि कटौती करनी भी हो तो सर्वप्रथम युद्ध के खर्चों में कटौती की जानी चाहिए। इराक,अफगानिस्तान तथा अन्य उन तमाम देशों में जहां अमेरिका तथा उसके परम सहयोगी देश के रूप में ब्रिटिश फौजें तैनात हैं दरअसल वहां होने वाले भारी-भरकम एवं असीमित खर्चों में कटौती की जानी चाहिए। न कि पूरी दुनिया में विश्वसनीयता का झंडा गाडऩे वाले बीबीसी जैसी रेडियो सेवा पर खर्च होने वाले पैसों में।

एक बड़ा देश होने के नाते बीबीसी हिंदी सेवा के श्रोतागणों की नाराज़गी भारतवर्ष में काफी मुखरित होती दिखाई दे रही है। परंतु वास्तव में जिन -जिन देशों की  अपनी भाषाओं के बीबीसी प्रसारण बंद हो रहे हैं उन देशों में भी बीबीसी ने अपनी पत्रकारिता की निष्पक्ष तथा बेलाग-लपेट के अपनी बात कहने की अनूठी शैली के चलते श्रोताओं के दिलों में ऐसी ही जगह बनाई थी। परंतु बड़े ही दु:ख एवं आश्चर्य का विषय है कि ब्रिटिश विदेश मंत्रालय तथा बीबीसी प्रबंधन ने दुनिया के करोड़ों श्रोताओं की परवाह किए बिना इस प्रकार का कठोर निर्णय ले डाला।

बीबीसी ने भारत में अपने श्रोताओं से संबंध स्थापित करने के लिए एक विशेष रेल यात्रा निकाली तथा कई राज्यों में बस यात्राएं भी कीं। अपने श्रोताओं से मिलने से सीधा संपर्क स्थापित करने के बीबीसी के इस प्रयास से ऐसा प्रतीत हो रहा था कि अब बीबीसी और भी अधिक सक्रिय होने जा रहा है। यहां तक कि बीबीसी के श्रोता यह आस भी लगाए बैठे थे कि संभवत: अब बीबीसी का हिंदी न्यूज़ चैनल भी शीघ्र ही शुरु होगा। परंतु बीबीसी प्रेमियों की सारी उम्मीदों  पर ब्रिटिश विदेश मंत्रालय एवं बीबीसी प्रबंधन ने पानी फेर दिया। बीबीसी के भारतीय श्रोतागण इस सेवा को पूर्ववत् जारी रखने के लिए बीबीसी को शुल्क देने,अपनी मासिक आय देने तथा अन्य तरीकों से उसकी आर्थिक मदद करने तक को तैयार हैं।

यदि बीबीसी के लिए  ब्रिटिश मंत्रालय  सोलह प्रतिशत खर्च कटौती की पूर्ति के लिए बाज़ार से विज्ञापन लेना शुरु कर दे तो भी उसके खर्च पूरे  हो सकते हैं। इस प्रतिष्ठित समाचार सेवा को बंद करने के बजाए इसे और अधिक मज़बूत,मुखरित तथा प्रतिष्ठापूर्ण बनाने के लिए बीबीसी प्रबंधन को तथा ब्रिटिश सरकार को और अधिक प्रयास करने चाहिए थे। ब्रिटिश सरकार को स्वयं इस बात पर गौर करना चाहिए था कि वॉयस ऑफ अमेरिका रूस,चीनी तथा जर्मनी रेडियो की समाचार सेवाओं को कहीं पीछे छोड़ते हुए बीबीसी ने अपनी लोकप्रियता का जो झंडा बुलंद किया था उसे बरकरार रखा जाए। 

आले हसन,पुरुषोत्तमलाल पाहवा,रामपाल,मार्कटुली,ओंकार नाथ श्रीवास्तव से लेकर संजीव श्रीवास्तव,सलमा ज़ैदी,राजेश जोशी,महबूब खान, तथा अविनाश दत्त तक बीबीसी के सभी योग्य एवं होनहार पत्रकारों ने निश्चित रूप से भारतीय श्रोताओं के दिलों पर दशकों तक राज किया है। भारतीय श्रोता बीबीसी के आजतक,विश्वभारती,आजकल तथा हम से पूछिए जैसे उन कार्यक्रमों को कभी नहीं भुला सकेंगे जो भारतीय चौपालों,पंचायतों,भारतीय सीमाओं तथा चायख़ानों तक में बड़ी गंभीरता से सुने जाते थे। अभी भी 20 मार्च की तिथि आने में समय बाकी है।

बीबीसी हिंदी प्रसारण के शाम को प्रसारित होने वाले इंडिया बोल कार्यक्रम में भारतीय श्रोताओं ने अपने विचार अपने दिलों की गहराईयों से व्यक्त किए हैं। इन्हें सुनने व पढऩे के बावजूद यदि ब्रिटिश सरकार तथा बीबीसी प्रबंधन ने बीबीसी की बंद होने वाली सेवाओं विशेषकर बीबीसी हिंदी सेवा को पूर्ववत् प्रसारित करते रहने का निर्णय नहीं लिया तो श्रोताओं पर बड़ा कुठाराघात होगा.साथ ही साथ इन बीबीसी प्रेमियों को ब्रिटिश सरकार तथा बीबीसी प्रबंधन की कार्यकुशलता,योग्यता व सक्षम संचालन के प्रति उत्पन्न होने  वाले संदेह एवं अविश्वास से भी कोई नहीं रोक सकेगा।



लेखक हरियाणा साहित्य अकादमी के भूतपूर्व सदस्य और राष्ट्रीय-अंतर्राष्ट्रीय मसलों के प्रखर टिप्पणीकार हैं.उनसे tanveerjafri1@gmail.comपर संपर्क किया जा सकता है.






फ्लेम्स ऑफ द स्नो का प्रदर्शन 18 से

इक्कीसवीं सदी के सबसे बड़े राजनीतिक बदलाव पर बनीं फिल्म ‘फ्लेम्स ऑफ  द स्नो’का इंतजार अब खत्म हुआ। यह फिल्म 18फरवरी से नेपाल के सभी सिनेमाहालों में प्रदर्शित होने जा रही। फिल्म का निर्देशन अशीष श्रीवास्तव ने किया है और संगीत ज्ञानदीप का है।

ग्रिन्सो और थर्ड वल्र्ड मीडिया के बैनर तले बनी इस फिल्म को बनाने में बड़ी भूमिका भारतीय पत्रकार और संपादक आनंद स्वरूप वर्मा की है। उन्होंने कहा कि ‘फिल्म को देख नेपाली और विश्व जनता संघर्षों की ताजगी को तहेदिल से महसूस करे, हमारा यही प्रयास है।’ भारत में प्रदर्शित किये जाने को लेकर उन्होंने कहा कि हम शीघ्र ही फ्लेम्स ऑफ  द स्नो का हिंदी डब ‘बर्फ की लपटें’ लेकर दर्शकों के बीच उपस्थित होंगे।


Feb 6, 2011

मेरी मां खाये बिना मर गयी!


दादी को भी खाना नहीं मिलता। मां खाना बनाकर पहले दादा,  भाई-बहनों को खिलाती फिर दादी, मुझे और अपने को परोसती थी। हमेशा मां और दादी के खाते-खाते खाना कम हो जाता ... 

अजय प्रकाश

उत्तर प्रदेश के देवरिया जिले के   नारायणपुर गांव में मजदूर परिवार से ताल्लुक रखने वाली 30 वर्षीय उर्मिला की भूख से मौत गयी। उर्मिला की मौत नये अनाज के आवक और किसानों की समृद्धि के लिए 14 जनवरी को मनाये जाने वाले पर्व ‘मकर सक्रांति’की रात हुई। करीब एक महीने पहले से लगातार खाने के अभाव के चलते उर्मिला का शरीर फूलता चला गया था और वह बीमार रहने लगी थी। उर्मिला की सास जो खुद भी मरने के कगार पर हैं कहती हैं, ‘अरे हमार पतोहिया खइला बिना मर गयील।’ ग्रामीणों के मुताबिक जिस रात उर्मिला की मौत हुई उस रात भी घर में खाना नहीं पका था।

परिवार के मुखिया और उर्मिला के ससुर दर्शन विश्वकर्मा जिनकी उम्र करीब 70 वर्ष है, गांव में लोहार का काम करते हैं। खेती के औजारों के लिए आधुनिकतम मशीनों के बढ़े इस्तेमाल के बाद इन दिनों उनकी दैनिक आमदनी दस रूपये भी रोजाना नहीं हो पाती है। पांच बच्चों की मां उर्मिला के पति,घर की माली हालत से निपटने के लिए गुजरात के सूरत शहर काम की तलाश में कुछ महीने पहले ही गये थे। साथ में 12 वर्षीय अपने विकलांग बेटे को भी ले गये थे जिससे गांव में खाने का खर्चा कम आये और विकलांग बेटा भी उनकी कमाई का जरिया बने।


तीन बरस के दो जुड़वा बच्चों समेत कुल चार बच्चों के साथ उर्मिला गांव में ही रह रही थी। रहने के लिए एक खपड़ैल का कमरा होने की वजह से उर्मिला के ससुर दर्शन और उनकी पत्नी मड़ई में रहते थे। मड़ई के एक हिस्से में गाय बंधती है, दूसरे तरफ औजार बनाने की भट्ठी है और वहीं पर दर्शन और उनकी पत्नी भी सोते हैं। 

खुरपी-हंसुआ बना-पीटकर जो पैसे दर्शन को मिलते थे उससे बहू का इलाज कराते थे। दवा और भूख की भरपायी के चक्रव्यूह में दर्शन विश्वकर्मा की  17 कट्ठा जमीन बंधक हो गयी है  है और वे सूदखारों के कर्जदार भी हैं।
 
 उर्मिला की सबसे बड़ी बेटी 11वर्षीय कविता मां के मरने के बाद तीन छोटे भाई बहनों को संभाल रही है। गांव के सरकारी माध्यमिक स्कूल के छठी कक्षा में पढ़ने वाली कविता को जिंदगी की जरूरतों ने कैसे एक मां के एहसास से भर दिया है, उसका एक अहसास कविता से हुई बातचीत में उभरकर आता है...

आपका क्या नाम है?
कविता.

लोग आपके घर पर क्यों जुटे हैं?
मेरी मां मर गयी है ...

आपकी मां कैसे मर गयी?
रात को सोये-सोये।

आपलोग रात में क्या खाना खाकर सोये थे?
पीसान (आटा) नहीं था इसलिए अइला (चूल्हा) नहीं जला था। बगल में जो घर है, वही लायी (मकर सक्रांति पर मुरमुरे के बनने वाले लड्डू) दे गयी थी उसी को खाकर हमलोग सो गये थे।

लायी कौन-कौन खाया था?
मैं  और मेरे छोट भाई-बहन।

मां को क्यों नहीं दिया?
दे रही थी,लेकिन वह नहीं खायी। कह रही थी मुंह चल नहीं रहा है। मां रात को बार-बार रो और कराह रही थी।

कुछ बोल भी रही थी?
रात में ये सब (छोटे भाई-बहन) रो रह थे तो कह रही थी ‘चुप हो जा, चुप हो जा।’ काली माई, शिव भगवान का नाम ले रही थी। बार-बार कह रही थी-‘भगवान हमरे लइकन के बल दीहअ (ईश्वर मेरे बच्चों को बल देना)।’

आपसे भी कुछ कहा?
कह रही थी-ठीक से रहना और पापा आयेंगे तो कहना यहीं रहें। यह भी बोली कि इन सब को देखना। फिर हमको नींद आ गयी।

मां के मरने के बारे में कैसे पता चला?
कमरे में मां और हम चार भाई-बहन ही सोये थे। छोटा वाला भाई तेज-तेज रोने लगा तो मैं जगी। मुझे लगा मां अभी सो ही रही है इसलिए मैं उसे जगाने लगी। बहुत देर जगाती रही, पर मां उठी नहीं। फिर मैं दादी को बुला के लायी। दादी भी जगायीं और फिर दादी जोर-जोर से रोने लगीं, तब हमलोग भी रोने लगे। उसके बाद सब कहने लगे कि वह (कविता की मां उर्मिला) मर गयी।

अभी जो घर में अनाज दिख रहा है, वह कहां से आया है?
मां के मरने के बाद एक आदमी दे गया है।

इससे पहले घर में अनाज नहीं था?
नहीं। सिर्फ कल जो लाई लोग दिये हैं वही था ।

सरकारी राशन की दुकान  से गल्ला नहीं मिलता?
गल्ला उसी को मिलता है जिसके पास कार्ड होता है। दादा से एक आदमी कह गया है कार्ड अब जल्दी बन जायेगा।

घर में कितने दिन से खाना नहीं था?
जबसे ज्यादा ठंडा पड़ने लगा है तबसे एक ही टाइम खाते थे। पहले आलू खत्म हुआ फिर आटा भी।


एक टाइम खाकर रह जाते थे?
मैं भाई-बहनों को लेकर स्कूल चली जाती थी तो वहां दोपहर का खाना कभी-कभी खा लेते थे। कभी दूसरे लोग गांव वाले भी खिला देते थे। इसलिए घर में एक ही टाइम खाना बनता था।

खाना क्या बनता था?
कभी भात तो कभी रोटी। अभी खेत में साग हुआ है तो रोज साग बनता था। वह भी ठण्ड ज्यादा पड़ने लगी तो स्वेटर या साल नहीं था कि खेत में जाकर साग खोटें (तोड़े)।

रात में सोते थे तो ओढ़ने के लिए क्या था?
एक कंबल।

एक ही कंबल में सभी लोग?
हां। दादी के पास तो वह भी नहीं था। वह चट्ट (बोरा) ओढ़ती हैं। अब तो दादी का शरीर भी मां की तरह ही सूज (फूल) गया है।

दादी भी बीमार हैं तो खाना कौन बनाता था?
मैं ही बनाती थी। दादी से तो कुछ होता ही नहीं। उसको भी खाना नहीं मिलता। पहले मां जब कम बीमार थी तो खाना बनाकर पहले दादा, भाई-बहनों को खिलाने के बाद दादी मुझे और अपने को परोसती थी। हमेशा मां और दादी के खाते-खाते खाना कम हो जाता था। दादी से भी कम खाना मां खाती थी। इसलिए मां का पेट नहीं भरता था और वह खाये बिना ही मर गयी। और मरने के दिन लाई भी नहीं खायी।






Feb 5, 2011

...‘डायन’ मत कहो मुझे


सरकार के सभी अर्थशास्त्रियों का अंकगणित फेल है और बदनाम बेवजह महंगाई को किया जा रहा है...

पंकज कुमार

इन दिनों महंगाई शबाब पर है। गली-गली,शहर-शहर के अलावा दिल्ली के तख्तोताज पर कुंडली मारकर बैठे खास को भी उसने कम से कम चिंता जताने पर मजबूर कर दिया है। इस सरेआम चर्चा से महंगाई रानी ही नहीं,कोई भी इतरा सकता है। लेकिन महंगाई रानी चर्चा में होने की वजह से खुश कम, दुखी ज्यादा है। वो खुद को बेवजह बदनाम किए जाने से चिंतित है।


खुद को 'डायन' कहकर संबोधित किए जाने से वह काफी आहत और नाराज भी है। इनका कहना है कि डायन कहकर उनकी बिरादरी को बदनाम किया जा रहा है और ये सरकार की सोची-समझी साजिश के तहत हो रहा है। जिसके लिए वह गुनहगार है ही नहीं, उसके लिए जनता के बीच बदनाम किया जा रहा है। सरकार ने तुरंत इस तरह का दुष्प्रचार नहीं रोका तो महंगाई बिरादरी के तरफ से वह मानहानि का मुकदमा करेंगी।

इस नाराजगी के पीछे महंगाई रानी का अपना तर्क भी है। वो उदाहरण देते हुए कहती हैं कि कुछ दिनों पहले चुनाव आयोग ने मतदान प्रतिशत बढ़ाने और बीवी-बच्चों,गर्लफ्रेंड से फुर्सत न मिलने वालों को मतदान केंद्र तक लाने के लिए एड कैंपेन चलाया। कैंपेन में कहा गया कि वोट नहीं डालने वाले पप्पू कहलाएंगे। यह तो वही हुआ वोट निठल्ले न दें और बदनाम दुनियाभर के 'पप्पूओं' को किया गया। ठीक उसी तरह जैसे देश के कई घरों में ‘मुन्नी’ इज्जत से रह रही थी, लेकिन 'दबंग' में आइटम सोंग पर डांस करने वाली मलाइका अरोड़ा ने अपने फायदे के लिए मुन्नी को बदनाम कर दिया। उधर कैटरीना ने शीला की जवानी को हिज़ाब से बाहर निकालकर सड़क का बाजारू सामान जैसा पेश कर दिया। ये तो ऐसी ही बात हुई न कि करे कोई और भरे कोई।

महंगाई रानी का कहना है कि वह हमेशा से आसमान की ऊंचाई पर नहीं, बल्कि सभी के बीच घुल-मिलकर रहना चाहती है। वो कुंभकर्ण की नींद की तरह सोना चाहती है। चाहती है कि उसे चंद भ्रष्ट नेताओं, नौकरशाहों,मुनाफाखोरों की तुच्छ लालच की वजह से नींद से न जागना पड़े। लेकिन मतलबी लोगों ने राजनीतिक सांठगांठ और अपनी गलत नीतियों की वजह से मुझे बेवजह नींद से जगा दिया है और फिर ‘महंगाई डायन’ कहकर बदनाम भी किया जा रहा है।

खुद की नाकामी के बावजूद सरकार बदनामी से बचना चाह रही है। सरकार के सभी अर्थशास्त्रियों का अंकगणित फेल है और बदनाम बेवजह महंगाई को किया जा रहा है। भला सरकार की कॉरपोरेट नीतियों का ठीकरा मेरे बिरादरी के सिर क्यों फोड़ा जा रहा है? हमारे देश के नेताओं से अच्छा तो कम से कम पड़ोसी मुल्क के व्यापारी और किसान हैं, जो इस संकट में हिंदुस्तान की जनता के दर्द कम करने के लिए बाघा बॉर्डर से प्याज भेजने का विरोध नहीं कर रहे।

डायन कहे जाने से आहत महंगाई रानी थोड़ा भावुक हो जाती हैं और कहती हैं, ‘ऐसा नहीं है कि जब मेरी चर्चा आम लोग या सरकार करती है तो मुझे दुख होता है, लेकिन महंगाई डायन कहे जाने पर मेरी बिरादरी को सबसे ज्यादा खुशी तब होती, जब इसका सीधा फायदा किसानों को मिलता। देश के मेहनतकश किसान या फिर खेती के सहारे जीवन गुजर-बसर वाले लोग मालामाल होते। उन्हें महंगाई की वजह से बैंकों, साहूकारों से कर्ज नही लेना होता और खुदकुशी के लिए मजबूर नहीं होता। मगर अफसोस, ऐसी संवेदना हमारे नेताओं, सत्ता के दलालों और बिचैलियों में नहीं है।’

फिर खुद को संभालते हुए गुस्से में वह कहती है ‘अगर महंगाई डायन कहकर बदनाम करने का सिलसिला नहीं रुका तो वह सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा तक खटखटाने से नहीं चूकेगी। वहां भी इंसाफ नही मिला तो आम जनता के बीच जाकर देश में संगठित माफियाराज चला रहे सफेदपोशों की पोल खोलूंगी और कहूंगी मुझे कुंभकर्ण की तरह चैन से सोने दो। भविष्य में कभी भी रावण की तरह खुदगर्ज बनकर मुझे नींद से मत जगाना। मुझे चैन से सोने दो। मैं सिर्फ सोते रहना ही चाहती हूं ताकि मेरी वजह से आम आदमी को तकलीफ न हो, लेकिन यूं ‘पप्पू', ‘शीला’ और ‘मुन्नी’ की तरह ‘महंगाई डायन’ कहकर बदनाम न करो।



पिछले 6 वर्षों से पत्रकारिता. फिलहाल ‘शिल्पकार टाइम्स’ अखबार में सीनियर असिस्टेंट एडिटर के पद पर कार्यरत हैं. उनसे kumar2pankaj@gmail.comपर संपर्क किया जा सकता है. 



 

Feb 4, 2011

नहीं तो मारे जाते रामचंद्र गुहा !


आप विश्वास करेंगे कि ख्याति  प्राप्त इतिहासकार,लेखक और बुद्धिजीवी रामचंद्र गुहा को छत्तीसगढ़ के एक पुलिस थाने के भीतर नक्सली सिद्ध कर दिया गया और उनको मारने की तैयारी कर ली गयी थी...

हिमांशु  कुमार  

अभी देश में सरकारी भ्रष्टाचार के खिलाफ आवाज़ उठाने वालों को नक्सली,माओवादी और आतंकवादी कह कर डरा कर चुप कराने का जोरदार धंधा चल रहा है.और हमारे देश का मध्यवर्ग जो बिना मेहनत किये ऐश की ज़िंदगी जी रहा है वो सरकार के इस झूठे प्रचार पर विश्वास करना चाहता है ताकि कहीं ऐसी स्थिति ना आ जाए जिसमें ये हालत बदल जाए और मेहनत करना ज़रूरी हो जाए.

इसलिए बराबरी ओर गरीबों के लिए आवाज़ उठाने वाले मारा जा रहा है या झूठे मुकदमें बना कर जेलों में डाल दिया गया है.लेकिन क्या आप विश्वास करेंगे की अंतर्राष्ट्रीय ख्याती प्राप्त इतिहासकार,लेखक और बुद्धिजीवी रामचंद्र गुहा को एक पुलिस थाने के भीतर नक्सली सिद्ध कर दिया गया और उनको मारने की तैयारी कर ली गयी थी.


बाएं से इतिहासकार रामचंद्र गुहा, प्रोफ़ेसर नंदिनी सुन्दर और प्रभात खबर के संपादक हरिवंश : मारे जाने से बच गए

ये घटना सन २००७ के जून महीने की है.दंतेवाड़ा में सरकार ने सलवा जुडूम शुरू कर दिया था.सलवा जुडूम वाले और पुलिस मिल कर आदिवासियों के घरों को जला रहे थे.आदिवासी लड़कों को मार रहे थे और आदिवासी लड़कियों से बड़े पैमाने पर बलात्कार किये जा रहे थे.उसी दौरान रामचंद्र गुहा,दिल्ली विश्वविद्यालय की प्रोफ़ेसर डॉ.नंदिनी सुन्दर, इंदिरा गांधी के प्रेस सलाहकार रहे वरिष्ठ पत्रकार बीजी वर्गीस, केंद्रीय शासन में सचिव रहे ईएएस शर्मा,फरहा नक़वी,और झारखंड के प्रसिद्ध अखबार प्रभात खबर के सम्पादक हरिवंश जी आदि की एक टीम सलवा जुडूम और आदिवासियों के बारे में जानकारी लेने आयी थी.

इस दौरे के दौरान एक टीम दंतेवाडा के करीब साठ किलोमीटर दूर एक गाँव में आदिवासियों से मिलने गयी. पुलिस को पता चल गया.बस फिर क्या था?कानून को बचाने सरकार का हुकुम बजाने और संविधान की रक्षा करने सरकार दल-बल के साथ पहुँच गयी. टीम के सदस्य अपनी गाड़ी नदी के इस पार खड़ी कर नदी पार करके गावों में गए हुए थे.

सरकारी सुरक्षा बलों ने ड्राईवर के गले पर चाक़ू रख दिया और उसको धमका कर टीम की अगली पिछली गतिविधियों की जानकारी ली. कुछ देर के बाद जब जब ये टीम वापिस आयी तो इन लोगों से पूछताछ करके इन्हें सीधे वापिस जाने की इजाज़त दे दी गयी,लेकिन रास्ते में आगे पड़ने वाले भैरमगढ़ थाने को ज़रूरी निर्देश दे दिए गए.

जैसे ही रामचंद्र गुहा, नंदिनी सुन्दर आदि की टीम भैरमगढ़ थाने पहूंची शाम हो चुकी थी. थाने के सामने का नाका रोक कर इन लोगों को थाने चलने का आदेश दिया गया.थाने के भीतर एसपीओ लोगों का राज था.एक एसपीओ ने राम चन्द्र गुहा की तरफ इशारा करके कहा इसे तो हम जानते हैं, ये तो नक्सली है,छत्तीसगढ़ में गवाहों की क्या कमी? आनन फानन में तीन गवाह भी आ गए. उन्होंने कहा हाँ इसे तो हमने नक्सलियों की मीटिंगों में देखा है.बस फिर क्या था.किसी ने कहा चलो साले को गोली मार दो.

एसपीओ लोगों का एक झुण्ड राम चन्द्र गुहा को एक तरफ ले गया.इस बीच कुछ एसपीओ और सलवा जुडूम वालों ने नंदिनी सुन्दर का पर्स और कैमरा छीन लिया.तब मोबाइल से नंदिनी ने कलेक्टर को फोन लगाया.कलेक्टर ने कहा मैं एसपी को कहता हूँ.एस पी का फ़ोन आया लेकिन थानेदार ने एसपी का फोन सुनने से मना कर दिया.और पूरे थाने को एसपीओ और सलवा जुडूम के ऊपर छोड़ कर खुद को एक कमरे में बंद कर लिया.

मैं उस दिन रायपुर में था.नंदिनी ने मेरी पत्नी वीणा को कवलनार आश्रम में फोन किया.वीणा ने मुझे फोन किया और कहा की नंदिनी एवं साथी बहुत बड़ी मुसीबत में हैं.आप तुरंत कुछ कीजिये. मैंने भैरमगढ़ सलवा जुडूम के नेता अजय सिंह को फोन किया. हम तब खासी मज़बूत स्थिति  में थे.

आदिवासियों की एक बड़ी सँख्या हमारी संस्था और कोपा कुंजाम जैसे कार्यकर्ताओं के साथ थी.(इसी जनशक्ति के बल पर हम वहां इतने लम्बे समय तक टिक पाए) मैंने अजय सिंह से कहा की राम चन्द्र गुहा आदि लोगों को कुछ नहीं होना चाहिए .और इसके बाद ये टीम वहां से जान बचा कर निकल पाई.

नंदिनी ने बड़े आश्चर्य से मुझे बताया की आपका फोन आते ही उन्होंने हमें छोड़ दिया.रामचंद्र गुहा भी अगले दिन वनवासी चेतना आश्रम में बैठ कर सलवा जुडूम की बदमाशियों पर गुस्सा निकाल रहे थे . नंदिनी का कैमरा छ माह के बाद कलेक्टर ने वापिस किया था...



दंतेवाडा स्थित वनवासी चेतना आश्रम के प्रमुख और सामाजिक कार्यकर्त्ता हिमांशु कुमार का संघर्ष,बदलाव और सुधार की गुंजाईश चाहने वालों के लिए एक मिसाल है. उनसे vcadantewada@gmail.com पर संपर्क किया जा सकता है.