Jan 17, 2011

इस्लाम को बदनाम करते ये मुसलमान


पाकिस्तान में कादरी ने इस्लामी शिक्षाओं  पर अमल करते हुए सलमान तासीर की हत्या की या फिर सलमान तासीर,इस्लाम के रास्ते पर चलते हुए एक बेगुनाह इसाई महिला आसिया बीबी को जेल से रिहा करवाने की जद्दोजहद में लगे हुए थे...

तनवीर जाफरी

पिछले दिनों पाकिस्तान के पंजाब प्रांत के गवर्नर सलमान तासीर को एक ऐसे शख्स ने गोलियों से छलनी कर दिया जिस पर सलमान तासीर की सुरक्षा का जिम्मा था। हत्यारे मुमताज़ कादरी का कहना था कि उसने कई मौलवियों की तकऱीरें सुनी थीं। इन्हें सुनने के बाद ही उसने यह फैसला कर लिया था कि वह तथाकथित रूप से ईश निंदा कानून का विरोध करने वाले सलमान तासीर को जिन्दा नहीं छोड़ेगा। और आखिरकार उसने सलमान तासीर के रूप में उस शख्स की हत्या कर डाली जिसकी मुहाफिजत का जिम्मा उस पर था। अब यहां भी इस्लामी शिक्षाओं में विरोधाभास साफ नज़र आ रहा है।


मुमताज कादरी : हत्यारे को सम्मान

क्या हत्यारे कादरी ने इस्लामी शिक्षाओं पर अमल करते हुए सलमान तासीर की हत्या की या फिर सलमान तासीर इस्लाम के रास्ते पर चलते हुए एक एक बेगुनाह इसाई महिला आसिया बीबी को जेल से रिहा करवाने की जद्दोजहद में लगे हुए थे। क्या हत्यारे मुमताज़ कादरी को और उसे गुमराह करने वाले कठ्मुल्लाओं को इस्लाम यही तालीम देता है कि वे जिसकी हिफाज़त में तैनात हों उसीकी हत्या कर डालें?

उपरोक्त घटना का दर्दनाक पहलू यह भी है कि इस्लामी शिक्षाओं के हत्यारे मुमताज़ कादरी को पाकिस्तान में एक महान आदर्श पुरुष,हीरो,विजेता,फातेह तथा गाज़ी के रूप में सम्मानित किया गया। उस पर गुलाब के फूलों की पंखुडिय़ां बरसाई गईं। उसके समर्थन में विशाल जुलूस निकाला गया। उसकी पूरी हौसला अफज़ाई की। उसकी तत्काल रिहाई की मांग की गई। यहां तक कि सलमान तासीर के जनाज़े की नमाज़ पढ़ाने का कट्टरपंथी कठ्मुल्लाओं द्वारा बहिष्कार तक किया गया।

निश्चित रूप से उस समय पूरी दुनिया पाकिस्तान के सलमान तासीर की हत्या पर अफसोस ज़ाहिर कर रही थी तथा उनके सुरक्षा गार्ड द्वारा उन्हें मारने पर चिंतित व व्याकुल दिखाई दे रही थी। जबकि मुठ्ठीभर सरफिरे इस्लामी विचारधारा के दुश्मन लोग किसी बेगुनाह इंसान के हत्यारे की हौसला अफज़ाई करते हुए उसका पक्ष ले रहे थे। यहां यह सवाल उठना भी स्वाभाविक है कि वास्तविक इस्लाम किसका है। उस मकतूल सलमान तासीर का जो एक गैर मुस्लिम महिला की रिहाई के पक्ष में अपनी आवाज़ बुलंद करते हुए शहीद हो गया या फिर जिस हत्यारे ने सलमान तासीर जैसे बेगुनाह इंसान की रक्षा करने के बजाए उसकी हत्या कर डाली उसका?

इसमें कोई शक नहीं कि कट्टरपंथी तालिबानी विचारधारा रखने वाले तथाकथित मुसलमानों द्वारा पाकिस्तान सहित दुनिया भर में किए जा रहे आतंकी कृत्यों के भयवश भले ही निहत्थे,उदारवादी तथा खुदा से डरने वाले मुसलमान वक्त की नज़ाकत के मद्देनज़र खामोश क्यों न हों परंतु अभी भी मुस्लिम समाज में उदारवादी एवं सच्चे इस्लाम के पैरोकारों का बहुमत है।

यही वजह थी कि सलमान तासीर के जनाज़े की नमाज़ पढ़ाने का जहां लाहौर के कई कठ्मुल्ला,कट्टरपंथियों व आतंकवादियों के भयवश बहिष्कार कर रहे थे,वहीं दूसरी ओर पाकिस्तान की प्रसिद्ध इस्लामिक धार्मिक संस्था दारुल-इफता जामिया इस्लामिया के शेख-उल-इस्लाम मुफ्ती मोहमद इदरीस उस्मानी ने उसी समय एक फतवा जारी कर दुनिया को यह बताने का प्रयास किया कि,सलमान तासीर के हत्यारे मुमताज़ कादरी द्वारा किया गया आपराधिक कृत्य वास्तव में इस्लाम की नज़र में क्या है ?

अपने फतवे में मुफ्ती उस्मानी ने उन लोगों की भी स्थिति इस्लामी नज़रिए से स्पष्ट की जो सलमान तासीर की हत्या पर खुशी मना रहे थे तथा इस कत्ल को सही ठहरा रहे थे। शेख-उल-इस्लाम मुफ्ती मोहमद इदरीस उस्मानी से पूछा गया कि पाकिस्तान के पंजाब प्रांत के गवर्नर सलमान तासीर को उन्हीं के अंगरक्षक द्वारा मारे जाने  पर इस्लामी उलेमाओं का क्या मत है?

उस्मानी का जवाब था कि मैंने इस पूरे घटनाक्रम का गहन अघ्ययन किया है तथा घटना से संबंधित सभी आलेख व समाचार गंभीरता से पढ़े हैं।  इसके अतिरिक्त मैंने पाकिस्तान तथा भारत के तमाम वरिष्ठ एवं विशिष्ट इस्लामी धर्मगुरुओं व उलेमाओं से इस विषय पर चर्चा भी की है। अत:उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर इस्लामी शिक्षाओं के अंतर्गत मैं इस निष्कर्ष पर पहुंचा हूं कि 'मलिक मुमताज़ कादरी ने एक बेगुनाह आत्मा की हत्या कर गुनाहे अज़ीम (महापाप)अंजाम दिया है। मुमताज़ का़दरी ने पाप किया है तथा तौहीन-ए-रिसालत अर्थात् हज़रत रसूल की तौहीन की है। जो लोग कादरी की तारीफ़ कर तथा बेगुनाह व्यक्ति की हत्या जैसे उसके अपराध की तारीफ कर इस्लाम के नाम पर और अधिक फसाद फैलाना चाह रहे हैं, गुनाहगार वह भी हैं.

उपरोक्त फतवा जोकि इस्लामी शरिया व इस्लामी शिक्षाओं तथा कुरानी आयतों की रोशनी में जारी किया गया है वह अपने आप में इस बात का प्रमाण है कि इस्लाम में न तो किसी बेगुनाह की हत्या की कोई गुंजाईश है न ही बेगुनाह व्यक्ति के किसी हत्यारे की तारीफ करने वालों की कोई जगह। लिहाज़ा अब वक्त आ गया है कि दुनिया के सभी वर्गों के उदारवादी सच्चे मुसलमान अपने सभी ऐतिहासिक भेदभावों को भुलाकर इन कट्टरपंथी आतंकी शक्तियों के विरुद्ध एकजुट हों तथा इनके विरुद्ध अहिंसक जेहाद छेडऩे के लिए तैयार हो जाएं।

इस अहिंसक जेहाद में वास्तविक इस्लाम की नुमाईंदगी करने वाले उदारवादी उलेमाओं का भी आगे आना बहुत ज़रूरी है। अन्यथा कहीं ऐसा न हो कि मुसलमान दिखाई देने वाली इस्लाम विरोधी ताकतें इस्लाम को पूरी तरह कलंकित व बदनाम कर डालें तथा कहीं वह इसे हिंसा के प्रतीक के रूप में प्रचारित करने में सफल न हो जाएं।



लेखक   हरियाणा साहित्य अकादमी के भूतपूर्व सदस्य और राष्ट्रीय-अंतर्राष्ट्रीय  मसलों के प्रखर टिप्पणीकार हैं.उनसे tanveerjafri1@gmail.comपर संपर्क किया जा सकता है.
 
 
 
 
 

Jan 16, 2011

पहले प्याज रुलाती थी, अब सब रुलाते हैं....


रसोई में काम आने वाले सभी खाद्य पदार्थो की कीमतों में दोगुनी वृद्धि  के बावजूद सरकार को सिर्फ प्याज की ही चिन्ता क्यों सता रही है...

रघुवीर शर्मा

कोटा। अकेले प्याज की कमी को लेकर देश व प्रदेश की सरकार व प्रशासनिक हल्कों में इन दिनों तगड़ी हलचल है। पूरा मंत्री समूह बैठकर चिन्तन कर रहा है लेकिन कोई उपाय नहीं सूझ रहा। मंत्री मंहगाई का ठीकरा एक दूसरे के सिर फोड़ रहे है और प्रधानमंत्री असहाय होकर सारा नजारा देख रहे है। उनके पास करने को कुछ नहीं रह गया है।

कभी प्याज की कीमतों के बढ़ने का ठीकरा एनडीए सरकार के सिर पर फोड़कर सत्ता में आई कांग्रेस सरकार अब खुद प्याज को लेकर चिन्ता में डूबी हुई है, जबकि आज हालत यह है कि आम आदमी के रोजमर्रा के उपयोग में आने वाले खाद्य पदार्थ गेहूं, चावल, दालें, मिर्च-मसाला, तेल आदि के भाव भी तो आसमान छू रहे हैं इन पर कोई चिन्ता नहीं की जा रही। जबकि प्याज की फसल खराब होने से अगर इसके दाम बढ़े है तो लोग इसका उपयोग कम कर सकते हैं। जिसकी हैसियत होगी वह खाएगा नहीं तो बिना प्याज के भी जिन्दगी चल सकती है।

वैसे भी बाजार में प्याज के उपयोग के विकल्प लोगों ने खोज  लिए है अब सलाद में प्याज कम व अन्य सामग्री की प्रयोग लोग कर रहे है। लेकिन रसोई में काम आने वाले सभी खाद्य पदार्थो की कीमतों में दोगुनी वृद्धि  के बावजूद सरकार को सिर्फ प्याज की ही चिन्ता क्यों सता रही है।जबकि बाकी तमाम खाद्य वस्तुए आम आदमी के दैनिक उपभोग से जुड़ी हुई है। सरकार अकेले प्याज का हो हल्ला कर अन्य वस्तुएं के बढे दामों से जनता का ध्यान बांटना चाहती है

देश में प्याज खाने वालों की संख्या इतनी अधिक नही जितनी चिन्ता  सरकार प्याज को लेकर कर रही है। जिन वस्तुओं के दाम बढ़े है उन सब पर चिन्ता सरकार को करनी चाहिए। क्या प्याज की तरह सभी चीजों पर प्राकृतिक आपदा का कहर टूटा है। मै कहता हूं कि सरकार को अपने पूर्व प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री से सबक लेना चाहिए जिन्होंने विदेश से मंहगा गेंहूं मंगाने के बजाय यह कहा था कि मेरे देश का आदमी एक समय उपवास कर लेगा तो इतना गेहूं बच जाएगा कि हमें बाहर से आयात करने की जरूरत नहीं पड़ेगी।

इस सरकार को भी चाहिए कि वह अगर सरकार देश की जनता को अपील जारी कर दें कि एक माह प्याज का उपयोग नहीं करें तो प्याज का स्टॉक कर रहे मुनाफाखोरों के हौसले पस्त हो सकते है। न डिमाण्ड रहेगी ना ही दाम बढ़ेगें मुनाफा खोर  कितने दिन प्याज का स्टॉक अपने पास रख सकते है।

यही इस समस्या का निदान काफी है लेकिन सरकार को रोजमर्रा की काम आने वाली गेहूं, चीनी, चावल,  तेल, दाल, मसाला, मिर्च, हल्दी आदि के भाव दोगुने होने पर भी चिन्ता करना चाहिए। जिनके दाम आसमान छूने के बावजूद भी सरकार इनके नियन्त्रण पर कोई चिन्ता व्यक्त नहीं  कर रही। पिछले दो वर्ष में शक्कर के भाव दोगुने हो गये। इसी प्रकार रसौई में काम आने वाली सभी चीजों के भाव दोगुने से कम  नहीं है इसलिए सरकार को प्याज पर से ध्यान हटाकर आम उपभोक्ता वस्तुओं की ओर अपना ध्यान जोड़ना चाहिए जिससे लोगों को दोगुने दाम पर मिल रही खाद्य सामग्री से राहत मिल सके और महंगाई पर लगाम लग सके।

सामान्य परिवार की कई गृहिणियों से जब प्याज की कीमतों के बारे में राय जानी तो उनका सटीक जवाब था प्याज-लहसुन जाए भाड़ में सभी चीजों के दाम बढ़े है आम आदमी प्याज खाना छोड़ सकता है खाने की थाली नहीं छोड़ सकता। इसलिए  सरकार को अन्य उपभोक्ता सामग्री के भावों में कमी लाने की कवायद करनी  चाहिए ताकि लोगों की रसोई में बढ़ रहे खर्चे पर अंकुश लग सके।



चम्बल तट पर बसे कोटा शहर में  जन्में रघुवीर शर्मा  एक दैनिक अखबार नवज्योति में आपरेटर के रूप में काम करते हैं और आम जनजीवन पर लिखना जरूरी समझते हैं. उनका आम लोगों के प्रति यह लगाव खुद के संघर्षमयी जीवन से भी जुदा है.  उनसे raghuveersharma71@gmail.com  पर  संपर्क किया जा सकता है.


शिकारियों के बीच फंसी एक लड़की


हिंदी विभाग के यौन उत्पीड़न के इस प्रकरण में वह करुणा ‘बड़ी और बड़े’स्त्रीवादियों में भी देखने को नहीं मिली। अलबत्ता दांव-पेच देखने को खूब मिले...

प्रेम सिंह

दिल्ली विश्वविद्यालय की प्रतिष्ठा देश और दुनिया में है। राजधानी में स्थित होने के चलते आशा की जाती है कि वहां यौन उत्पीड़न का मामला होने पर समय से कार्रवाई होगी। अगर शिक्षकों द्वारा छात्रा के यौन उत्पीड़न का मामला हो तो विश्वविद्यालय प्रशासन जल्दी से जल्दी जांच और न्याय सुनिश्चित करेगा ताकि छात्रा की पढ़ाई और छवि पर असर न पड़े। आरोपियों को जांच पूरी होने तक सभी जिम्मेदारी के पदों से हटा दिया जाएगा ताकि वे अपनी हैसियत का दुरुपयोग करके जांच को प्रभावित न कर सकें। लेकिन अपफसोस की बात है कि हिंदी विभाग में दो साल पहले प्रकाश में आए तीन शिक्षकों द्वारा अपनी एक छात्रा के यौन-उत्पीड़न के मामले में छात्रा को अभी तक न्याय नहीं मिला है। विश्वविद्यालय प्रशासन से निराश होकर पीड़िता दिल्ली उच्च न्यायालय में न्याय पाने की आस में गई है।

हम पहली बार इस मामले पर अपनी बात रख रहे हैं। इससे पहले केवल एक बार ‘युवा संवाद’के अपने स्तंभ में प्रभाष जोशी के निधन पर लिखी श्रद्धांजलि में थोड़ा उल्लेख किया था। दरअसल,प्रभाष जी से हमारी अंतिम मुलाकात अगस्त के तीसरे या अंतिम सप्ताह में हिंदी अकादमी के पूर्व सचिव और मित्र नानकचंद के घर पर हुई थी। इस संस्मरण का जिक्र हम अंतिम मुलाकात के नाते उतना नहीं, प्रभाष जी के व्यक्तित्व के एक ऐसे गुण के नाते कर रहे हैं जो बुद्धिजीवियों में विरल होता जा रहा है। वे पहली बार हमारी कॉलानी में आए थे। उनकी बातचीत में दिल्ली विश्वविद्यालय के हिंदी विभाग में हुए यौन उत्पीड़न का जिक्र आ गया। प्रभाष जी ने कहा, ‘लेकिन वह महिला भी ....।’

तब हमने पहली बार अपने विभाग के उस प्रकरण में किसी सार्वजनिक चर्चा में जबान खोली और मजबूत स्वर में कहा, ‘प्रभाष जी वह महिला नहीं, विभाग की छात्रा है।’ प्रभाष जी आगे कुछ नहीं बोले। कई मिनट चुप्पी रही। उस बीच उनके चेहरे पर जो व्यंजना प्रकट हुई, वह शब्दों में बता पाना मुश्किल है। ऐसा लगा वे इस मामले में यौन उत्पीड़क के हिमायतियों के चलाए गए अभियान के फलस्वरूप बनी धारणा को ही सच मान बैठे थे और अब आहत और ठगा हुआ अनुभव कर रहे हैं। उस प्रकरण पर वहां आगे एक शब्द भी नहीं बोला गया। अलबत्ता प्रभाष जी के चेहरे से यह स्पष्ट हो गया कि उनका ह्दय पीड़िता के लिए करुणा से भर आया है। बुद्धिजीवियों में यह मानवीय करुणा अब विरल होती जा रही है।


आरोपी सुधीश पचौरी : दाग ही दाग

हिंदी विभाग के यौन उत्पीड़न के इस प्रकरण में वह करुणा ‘बड़ी और बड़े’ स्त्रीवादियों में भी देखने को नहीं मिली। अलबत्ता दांव-पेच देखने को खूब मिले। हमारी एक जुझारू साथी को जांच में पीड़िता की मदद करनी थी। उन्होंने की भी,लेकिन साथ में अपने पति का मित्र होने के नाते एक अन्य आरोपी को बरी करा लाईं। तीसरा आरोपी दूसरे आरोपी का मित्र होने के नाते बरी हो गया। इंसान अपना विवेक खोकर किस कदर अंधा हो जाता है,इसका पता हिंदी के एक अवकाश प्राप्त शिक्षक के व्यवहार से चला।

उन्हें छात्रा के यौन उत्पीड़न से कोई शिकायत थी ही नहीं। जैसा कि पहले के यौन उत्पीड़िनों से भी नहीं रही थी। गोया वह ब्राह्मणों का शास्त्र-सम्मत अधिकार है!उन्हें पीड़िता के शिकायत करने पर शिकायत थी। उन्होंने मामले को खतरनाक ढंग से पूर्व और पश्चिम का रंग देने की कोशिश की। इसके बावजूद कि पूरे विश्वविद्यालय में पीड़िता के पक्ष में डटने वाले दोनों साथी पूरब से ही आते हैं।

पीड़िता ने सितंबर 2008को हिंदी चिभाग के तीन शिक्षकों प्रोफेसर अजय तिवारी,प्रोफेसर सुधीश पचैरी और प्रोफेसर रमेश गौतम के खिलाफ यौन उत्पीड़न की शिकायत की थी। वह विश्वविद्यालय प्रशासन का होस्टाइल रुख देख कर महिला आयोग और तत्कालीन मानव संसाधन मंत्री अर्जुन सिंह के पास भी गई। विश्वविद्यालय की सर्वोच्च एपेक्स समिति से जांच कराने की लड़ाई लड़ी।

धमकियों के बीच सुरक्षित वातावरण प्रदान करने और जांच पूरी होने तक तीनों आरोपियों को जिम्मेदारी के पदों से मुक्त रखने की बार-बार लिखित अपील कुलपति से की लेकिन सुनवाई नहीं हुई। तब से करीब अढ़ाई साल बीत चुके हैं और पीड़िता कोर्ट की शरण में गई है। कोर्ट ने उसका मामला स्वीकार कर लिया है। इसके पहले वह पीएचडी के दाखिले में की गई अनियमितता के खिलाफ भी कोर्ट में जा चुकी है। वह मामला भी कोर्ट ने स्वीकार कर लिया था और उस पर सुनवाई चल रही है।

इस लंबी अवधि का पूरा ब्यौरा यहां नहीं दिया जा सकता। पीड़िता ने अनेक प्रतिवेदन और पत्र कुलपति और जांच समिति को भेजे। सारा ब्योरा देख कर पता चलता है कि यह उसका पूर्णकालिक काम हो गया था। वह ब्योरा अगर प्रकाशित हो जाए तो भविष्य में दिल्ली विश्वविद्यालय में कोई छात्रा पद और संगठन के लिहाज से ताकतवर शिक्षकों के खिलाफ यौन शोषण की शिकायत करने की हिम्मत नहीं करेगी। जिस एक आरोपी प्रोफेसर अजय तिवारी को बर्खास्त करने का निर्णय कार्यकारिणी समिति ने डेढ़ साल पहले लिया था वह भी अभी तक लागू नहीं किया गया है। उल्टे इस साल मई में एपेक्स समिति ने पीड़िता पर असहयोग करने का अरोप लगा कर मामले को बंद कर दिया।

विश्वविद्यालय प्रशासन,उत्पीड़कों और उनके समर्थकों ने आरोपियों को बचाने और पीड़िता को ध्वस्त करने के वे सभी हथकंडे अपनाए जिनका ऊपर जिक्र किया गया है। तीनों आरोपियों में पहले दो के विभाग में आने से पहले न दोस्ताना संबंध थे न विचारधारात्मक। तीनों में परिपक्व आयु में दांतकाटी रोटी होने का सबब स्वार्थ और भ्रष्टाचार था। उनमें किसका क्या स्वार्थ था और कौन यौन उत्पीड़क और कौन आर्थिक-प्रशासनिक भ्रष्टाचारी,इससे इस सच्चाई पर फर्क नहीं पड़ता कि तीनों एकजुट होकर सब कर रहे थे।

दिल्ली विश्वविद्यालय के पिछले कुलपति अपराधी दिमाग के शख्स हैं। बतौर कुलपति नियुक्ति से लेकर कोबाल्ट मामले तक कितने ही ऐसे प्रकरण हैं जो उनकी आपराधिक इतिहास का पता देते हैं। दिल्ली विश्वविद्यालय शिक्षक संगठन (डूटा)ने भी उनके नियम-कायदों की ध्ज्जियां उड़ाने वाले कारनामों का बार-बार खुलासा किया है। हमने भी हिंदी विभाग में पीएचडी के दाखिलों में की गई अनियमितताओं के मामले में विभागाध्यक्ष के रूप में प्रोफेसर रमेश गौतम और प्रोफेसर सुधीश पचैरी को बचाने के कुलपति के कारनामों का खुलासा प्रेस के सामने किया था।


अजय तिवारी : अपराधी या आरोपी

कहने का आशय है यह है कि कुलपति जो मनमानी विश्वविद्यालय स्तर पर कर रहे थे,तीनों आरोपी विभागीय स्तर पर कर रहे हैं। कुलपति का उन्हें बचाना स्वाभाविक था। लेकिन उन्होंने पूरी कीमत वसूली। सेमेस्टर प्रणाली के मुद्दे पर दोनों ने डूटा और शिक्षक समुदाय के खिलाफ जाकर कुलपति का समर्थन किया। इस बहती गंगा में विभाग के एक और शिक्षक ने हाथ धो लिए। पिछले विश्वविद्यालय में लगे आर्थिक भ्रष्टाचार के गंभीर आरोपों के चलते यहां उनकी प्रोबेशन अवधि खत्म करके स्थायी नियुक्ति नहीं की गई थी। मामले का फायदा उठा कर वे प्रोफेसर रमेश गौतम और प्रोफेसर सुधीश पचैरी का झोला उठा कर कुलपति तक पहुंच गए।

बुद्धिजीवी,विशेषकर हिंदी समाज,हर तरह के उत्पीड़न के विरुद्ध और प्रगति के पक्ष में बढ़-चढ़ कर बोलता है। लेकिन हमारी जानकारी में केवल ‘समयांतर’ पत्रिका में छपा लेख अपवाद है, जिसने मामले का ब्योरा छापा और पीड़िता का पक्ष लिया। उसी में हिंदी विभाग में यौन उतपीड़न के खिलाफ संघर्ष समिति के एक सदस्य अंजनी का लेख पढ़ने को मिला, जिसमें समिति के पीड़िता को न्याय दिलाने के प्रयासों के अलावा वामपंथी छात्र संगठनों की ‘तटस्थता’के बारे में जानकारी थी। यह भी सुनने में आया कि लखनऊ के कथाक्रम कार्यक्रम में राजेंद्र यादव ने अजय तिवारी की उपस्थिति पर ऐतराज उठाया।

स्त्रीवाद का सबसे ऊंचा स्वर वहीं से आता है। करीब अढ़ाई साल होने के बावजूद किसी लेखक, संपादक, शिक्षक ने सहानुभूति दिखाने की बात दूर, मामले को समझने तक की कोशिश नहीं की। सुनने में आता है कि हिंदी विभाग के कुछ शिक्षकों ने आरोपियों की ‘सच्चरित्रता’के प्रमाणस्वरूप जांच समिति को लिखित गवाही दी। शिकायत दर्ज होने, अजय तिवारी पर ईसी का निर्णय आने और पीड़िता के अदालत जाने की खबरें कई समाचार पत्रों में प्रकाशित हुईं। लेकिन ‘जनसत्ता’ने अपने ‘सम्मानित’लेखकों के खिलाफ कोई खबर नहीं छापी। यह शायद नई ‘प्रभाष परंपरा’है!अलबत्ता आरोपियों के लेख छाप कर उनकी ताकत बढ़ाने का काम बखूबी किया है।

हिंदी की कई स्त्रीवादी लेखिकाएं समाचारपत्रों और पत्रिकाओं में स्तंभ और लेख लिखती हैं। स्त्री-विमर्श में उनका बड़ा महत्व है। लेकिन उनमें किसी को पीड़िता के मामले को समझने और उस पर लिखने की प्रेरणा नहीं हुई। लेखक-आलोचक बनने की दिशा में प्रयासरत युवा शिक्षकों और शोधार्थियों में से भी किसी ने मामले पर नहीं लिखा। अलबत्ता कई ने पीड़िता के खिलाफ लिखित गवाही जरूर दी। एक वरिष्ठ स्त्रीवादी शिक्षिका ने अपने ‘अच्छे व्यवहार’ का उपयोग पीड़िता से यह जानने के लिए किया कि उसने किसके कहने पर तीन नामधन्य प्रोफेसरों के खिलाफ शिकायत करने की हिम्मत की है?

टिप्पणीकार राजकिशोर ने एकलेख पीड़िता के मामले पर लिख कर कुछ साहस का परिचय दिया,लेकिन अगले लेख में सामान्यीकरण करके,कि स्त्रियां चांद पाने के लिए पुरुषों से संबंध बनाती हैं,पिछला लिखा मिटा दिया। अंग्रेजी के बुद्धिजीवियों से हिंदी की पीड़िता में रुचि लेने की आशा नहीं की जा सकती। उन्हें शायद पता भी नहीं होगा कि एक लड़की हाथी जैसे दिल्ली विश्वविद्यालय के प्रशासन से न्याय पाने के लिए जूझ रही है। हिंदी के बड़े-छोटे ज्यादातर लेखकों-आलोचकों-शिक्षकों ने मामले पर गपशप मजा अलबत्ता खूब लूटा है। उसका ब्योरा देने लगें तो पतन की परतें और खुल कर सामने आ जाएंगी।

अजय तिवारी को फंसता देख उनके कई लेखक साथी सक्रिय हो उठे। एक्शन होने से पहले उन्हें कहीं अन्य जगह स्थापित करने की कोशिशें हुईं। पिछले दिनों स्त्री-विरोधी साक्षात्कार देने के चलते चर्चा में आए महात्मा गांधी अंतर्राष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय के कुलपति वीएन राय ने दिल्ली विश्वविद्यालय के कुलपति से अजय तिवारी को रिलीव करने को कहा ताकि वे उन्हें अपने यहां रख सकें। सुना है वे स्वयं चलकर आए थे। लेकिन तब तक सुधीश पचैरी और रमेश गौतम से कुलपति का सौदा हो चुका था। दोनों को पूरा बचाने के लिए अजय तिवारी को पूरा फंसाना जरूरी था। यहां बता दें, मामला प्रकाश में आने पर तीनों आरोपियों ने मिल कर बचाव की रणनीति बनाई थी। फिर अजय तिवारी को अकेला छोड़ दिया गया। अब रमेश गौतम की बारी है। पचैरी अपने गले में फंदा कसते देख उन्हें अकेला छोड़ देंगे। उत्तर-आधुनिक न्याय का यही तकाजा है!

यौन शोषण के आरोपी सुधीश पचैरी को डीन ऑफ कॉलेज बनाने के विरोध में हुए हिंदी विभाग में यौन उतपीड़न के खिलाफ संघर्ष समिति के प्रतिरोध मार्च के दौरान बांटे गए पर्चे में लिखा है कि एपेक्स समिति को यौन शोषण के मामले में स्त्री पक्ष के प्रति संवेदनशील होना चाहिए। लेकिन समिति समाज से बाहर नहीं है। पीड़िता ने कुछ दिन पहले हमें कहा, ‘सर मुझे तो लगता है यहां ज्यादातर शिक्षक नहीं, शिकारी हैं। एपेक्स समिति, कुलपति, महिला आयोग, मंत्री, विजीटर सब मिल जाते हैं। मैं शिकारियों के बीच फंस गई हूं।’ वाकई, इन ‘ऊंचे खेलों’ में एक अदना पीड़िता क्या खाकर टिकेगी?थोड़े-से आदर्शवादी और निडर नवयुवतियों और नवयुवकों,जिनमें ज्यादातर छोटे वामपंथी समूहों से हैं,ने हिंदी विभाग में यौन उत्पीड़न के खिलाफ संघर्ष समिति बना कर उसका साथ न दिया होता तो वह कब की हार चुकी होती!

भला हो प्रशांत भूषण का। पीड़िता की गुहार उन तक पहुंची तो उन्होंने पीड़िता से बिना मिले,बिना उसकी जाति,इलाका,आर्थिक हैसियत जाने उसके द्वारा कोर्ट में दायर पीएचडी के प्रवेश में हुई अनियमितताओं का मामला देखना स्वीकार कर लिया है। अब विश्वविद्यालय प्रशासन और पूर्व विभागाध्यक्ष व वर्तमान डीन प्रोपफेसर सुधीश पचैरी के कान खड़े हैं कि कैसे बचा जाए। उन्होंने डीन का पद इसीलिए हथियाया है ताकि न्यायालय में उनके खिलाफ चलने वाले मुकद्दमों से पद की ताकत से निपट सकें। अगर प्रशांत भूषण ने छात्रा के यौन उत्पीड़न के मामले को देखना भी स्वीकार कर लिया तो संभावना है पीड़िता को लंबे संघर्ष के बाद न्याय और उत्पीड़िकों को दंड मिल जाए।



Jan 15, 2011

एक ही होता है

यह कविता नए नेपाल के निर्माण में लगे  लेखक  ने विशेष तौर पर जनज्वार के लिए भेजी  है. उन्होंने पहली बार हिंदी में कविता लिखी है जिसमें भारत से अपने रिश्ते का ऐतबार किया है...


प्रमोद धिताल

हमारा जमीन  फरक हुआ तो क्या हुआ
हमारी तमन्नाएँ तो एक ही जगह हैं
हमारा देश भिन्न हुआ तो क्या हुआ
हमारा सपना का प्रदेश तो एक ही होता है

हमारी खुशी और दुख का
हमारे पसीने और मेहनत का
हमारी लूट और लुटेरों, सभी का मकसद
और सोचने का ढंग एक ही होता है

साथियो! जब तुम्हारे सिर पे मंडराते हैं काले बादल
हमारी भी कशक व कहर तो वैसा ही होता है
जहाँ भी हो इस समय और जैसे भी हो
अगर न्याय की लड़ाई में शामिल हो तो
हमारा देश तो एक ही होता है...



(लेखक नेपाल में राजनीतिक-सामाजिक कार्यकर्ता और पत्रकार हैं. उनसे dhitalpramod@gmail.comपर संपर्क किया जा सकता है.)


खून के छींटे माकपा की जनपक्षधरता पर


चुनावी राजनीति में वामपंथी खूंटा बनी माकपा ने खिसकते जनाधार से महसूस किया कि  खुद की  लगायी आग में  घर अब धू-धू कर जल रहा है.  राज्य  में जारी हिंसा से त्राहि-त्राहि कर रही जनता बांग्ला कवि नवारूण भट्टाचार्य की पंक्ति ‘एई मृत्यु उपत्यका आमार देश ना/एई रक्तस्नातो कसाईखाना आमार देश ना'का इस बार फैसलाकून सन्देश देना चाहती है... 

 श्रीराजेश
  

बात 1977 के शुरुआती महीने की है. आम चुनाव हो रहे थे और पश्चिम बंगाल में विधानसभा चुनाव होने थे. माकपा ने तात्कालीन राज्य की कांग्रेस सरकार को तानाशाह के प्रतिनिधि का शासन बताया था.इसके पीछे माकपा का आरोप था कि सत्तारूढ़ दल के कार्यकर्ता विधानसभा चुनाव में माकपा कार्यकर्ताओं के मनोबल को तोड़ने के लिए हिंसा का सहारा ले रहे हैं.कांग्रेस राज्य में राजनीतिक हिंसा को बढ़ावा दे रही है.यह वह दौर था जब इंदिरा गांधी और कांग्रेस के खिलाफ पूरे देश में जनाक्रोश था. चुनावी माहौल था.

इंदिरा गांधी द्वारा लगाये गये आपातकाल और उसके बाद लोगों के बीच कांग्रेस के खिलाफ जनाक्रोश ने लगभग यह तय कर दिया था कि सिद्धार्थ शंकर राय के नेतृत्व वाली कांग्रेस बंगाल की सत्ता से रुख्सत होने जा रही है.कांग्रेसी कार्यकर्ता हाताश थे.इसी हाताशा के क्रम में महानगर कोलकाता के दमदम इलाके में माकपा के जुलूस पर कांग्रेसी कार्यकर्ताओं ने हमला कर दिया.इस हमले ने रही-सही कसर पूरी कर दी.हालांकि कांग्रेस ने इस हमले को स्थानीय "मस्तानों” द्वारा किया गया हमला बताया था.

मुख्यमंत्री बुद्धदेव : क्या  बचा पाएंगे हसिया-हथौड़ा  

 यह जानना जरूरी है कि ये स्थानीय "मस्तान”कांग्रेसी संरक्षण में फल-फूल रहे असमाजिक तत्व थे.इन्हीं हालातों में हुए लोकसभा चुनाव में पूरे देश से कांग्रेस का सूपड़ा साफ हो गया और मोरारजी देसाई प्रधानमंत्री बने. विधानसभा चुनाव में भी कांग्रेस की शर्मनाक हार हुई और पश्चिम बंगाल में वाम शासन का आगाज हुआ.

अब पैंतीस साल बाद इतिहास खुद को दोहरा रहा है.आज वही आरोप माकपा पर लग रहे हैं जो उसने सत्ता पर कब्जा जमाने के लिए कांग्रेस पर लगाया था.वर्तमान में पश्चिम बंगाल में कांग्रेस की स्थित लचर है.कांग्रेस की जगह उससे अलग हो कर ममता बनर्जी के नेतृत्व बनी तृणमूल कांग्रेस ने ले ली है.ममता का आरोप है कि 35 वर्षों   के शासन में वाममोर्चा ने विपक्ष को पूरी तरह खत्म करने के लिए सुव्यवस्थित ढंग से राजनीतिक हिंसा का संचालन करती रही और अबतक तृणमूल कांग्रेस के 55हजार कार्यकर्ता राजनीतिक हिंसा के शिकार हुए हैं.

वाममोर्चा के चेयरमैन विमान बोस ने बकायदा कोलकाता में प्रेस कांफ्रेस कर तृणमूल कांग्रेस पर आरोप लगाते हुए कहा कि 22हजार माकपा कार्यकर्ता राजनीतिक हिंसा के शिकार हुए हैं और बीते लोकसभा चुनाव से लेकर अब तक 357 माकपा कार्यकर्ता मारे गये हैं.खैर आरोप-प्रत्यारोपों में दोनों दल राजनीतिक हिंसा में मारे गये अपने-अपने कार्यकर्ताओं की जो संख्या बता रहे हैं,वह भले ही विश्वसनीय न हो, लेकिन एक बात तो तय है कि राज्य की शस्य – श्यामला भूमि राजनीतिक दलों के कार्यकर्ताओं के खून से लाल हो गई है और उनके खून के छींटे माकपा और तृणमूल पर पड़े हैं.

पश्चिम बंगाल में राजनीतिक हिंसा का मुद्दा कोई नया नहीं है लेकिन यह मुद्दा राष्ट्रीय फलक पर 14मार्च,2007 में नंदीग्राम की घटना के बाद आया.  राज्य के तत्कालीन राज्यपाल गोपाल कृष्ण गांधी ने हालात को ‘शीत संत्रास’ करार दिया था. हिंसा में उबाल दूसरी बार 24 नवंबर, 2010 को उस समय आया, जब शुनिया चार से खेजुरी-नंदीग्राम पर नाकाम हमला हुआ.करीब दौ सौ हथियारबंद लोगों ने कामारडा गांव में घुस कर बमबारी शुरू कर दी.उनका उद्देश्य तृणमूल समथर्कों को डराना और अपनी खोई जमीन पर नियंत्रण कायम करना था. इसके बाद ममता बनर्जी ने केंद्र पर राज्य की वाममोर्चा सरकार और माकपा के खिलाफ ठोस कदम उठाने के लिए दबाव बनाना शुरू कर दिया.

बंगाल के वर्तमान राजनीतिक हालात को देखने पर यह साफ लगता है कि माकपा का लाल-दस्ता सलवा जुडूम का माकपाई संस्करण बन गया है.अगर राज्य के जंगल महल और लालगढ़ को देखें  और वहां के तथ्यों पर नजर दौड़ाये तो स्थित और भयानक नजर आती है. स्थानीय बांग्ला अखबार 'एक दिन' ने अपने 2 सितंबर 2010 के अंक में एक रिपोर्ट प्रकाशित की थी. इसके अनुसार जंगल महल के झाडग़्राम में 52 शिविर और सात ब्लॉकों में 1620 हथियारबंद माकपा कार्यकर्ता जमे हुए हैं.

लालगढ़ में कमांडो : कहा था जनता का राज लायेंगे
 एक अनुमान के मुताबिक  इस इलाके में तकरीबन 90हर्मद शिविर जिसमें 2500सशस्त्र माकपा के हथियारबंद लाल-दस्ते के सदस्यों के मौजूद होने की सूचना है.हालांकि केंद्रीय गृहमंत्री पी चिंदबरम के मुताबिक 86शिविर वहां चल रहे हैं.इसी तरह स्थानीय पत्रकारों के दावों को माने तो लालगढ़ के विद्रोह के पूर्व एक दशक से भी कम समय में 100से भी अधिक लोगों की माकपाइयों ने हत्या कर दी.फिलहाल इस इलाके पर पुलिस संत्रास विरोधी जनसाधारनेर कमेटी का नियंत्रण है.


उस क्षेत्र में  संयुक्त अर्द्धसैनिक बल वहां तैनात हैं,इसलिए केंद्रीय गृह मंत्रालय को वहां स्थिति पर नजर रखनी पड़ रही है. केंद्रीय खुफिया एजेंसियां हर रोज दिल्ली को स्थिति से बाखबर करती हैं.पूर्व खुफिया अधिकारी और राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार रह चुके राज्यपाल एमके नारायणन भी रोज की प्रगति पर नजर रखे हुए हैं.

कई स्रोतों से मिली जानकारी के बाद,चिदंबरम ने 21दिसंबर को बुद्धदेब भट्टाचार्य को पत्र लिखा:‘खोई जमीन फिर से हासिल करने की कोशिश में पश्चिमी मिदनापुर जिले में काफी संख्या में सशस्त्र कार्यकर्ताओं की भर्ती और तैनाती की गई है.उन्हें प्रशिक्षित भी किया गया है.इस बात के स्पष्ट प्रमाण हैं कि हर्मद शिविर आमतौर पर माकपा कार्यालयों एवं माकपा के स्थानीय पार्टी कार्यकर्ताओं के घरों में स्थित हैं.यह बड़ी चिंता का विषय है कि कार्यकताओं को हथियारों से लैस किया गया है...’

केंद्रीय गृहमंत्री ने यह भी उल्लेख किया,‘चुनाव में आगे निकलने के लिए,माकपा और तृणमूल कांग्रेस समर्थकों के बीच झड़पों में बढ़ोतरी हुई है.’ उपलब्ध आंकड़ों के मुताबिक, 15 दिसंबर, 2010 तक इन झड़पों में मारे गए और घायल हुए तृणमूल कांग्रेस कार्यकर्ताओं की संख्या क्रमश: 96 एवं 1,237 थी. इसी तरह माकपा के मारे गए एवं घायल कार्यकर्ताओं की संख्या क्रमश: 65 और 773 थी. इन झड़पों में मारे गए एवं घायल कांग्रेसी कार्यकर्ताओं की संख्या भी क्रमश: 15 एवं 221 थी. ये आंकड़े खतरनाक तस्वीर पेश करते हैं और पश्चिम बंगाल में कानून- व्यवस्था की बिगड़ी हालत की ओर संकेत करते हैं.’ गृहमंत्री ने यह भी कहा कि, 'जंगल महल में संयुक्त बलों की तैनाती की आखिर क्या जरूरत है जब माकपा ने कानून और व्यवस्था बनाए रखने के लिए हथियारबंद कार्यकर्ताओं को तैनात कर रखा है?'

इन हालातों को देखने के बाद यह साफ हो जाता है कि पश्चिम बंगाल देश का इकलौता ऐसा राज्य है जहां पुलिस सत्तारुढ़ दल काडर के रूप में काम  करती है.हालांकि लोकसभा चुनाव व स्थानीय निकायों के चुनाव में मिली करारी हार के बाद माकपा ने आत्ममंथन किया और इस नतीजे पर पहुंची कि उसने अपने द्वारा लगायी आग में ही अपना घर जला लिया है.

माकपा के कई दिग्गज इस बार हार की आशंका को देखते हुए पार्टी आलाकमान से चुनाव लड़ने में असमर्थता जता दी है. नया चेहरा तलाशने में भी माकपा को मशक्कत करनी पड़ रही है. यह इस बात का संकेत है कि राज्य में लालदुर्ग में दरार पड़ गई है और वह इस बार के चुनाव में ढह सकता है.पूरे हालात को देखते हुए 70के दशक में बांग्ला कवि नवारूण भट्टाचार्य द्वारा लिखी कविता कि पक्ति ‘एई मृत्यु उपत्यका आमार देश ना/एई रक्तस्नातो कसाईखाना आमार देश ना'आज और ज्यादा प्रासंगिक हो उठी है.



लेखक पत्रकार है और समाचार पत्रिका “द संडे इंडियन” से सम्बद्ध हैं, उनसे  rajesh06sri@gmail.com  पर संपर्क किया जा सकता है.

Jan 14, 2011

व्यावसायिक गिरोह 'जनचेतना' का नियोजित फैसला था 'हमला'


वे अपने केंद्रीय ‘व्यावसायिक गिरोह’द्वारा नियोजित फैसले को रद्द नहीं कर सकते थे। हमला करने के जो कारण पत्र में दिये गये हैं वह वास्तविक कारण नहीं हैं। वास्तविक कारण कुछ और हैं जिसे बयान करने  का सहस  दिशा के लोगों में नहीं है...

चक्रपाणि, सचिव- परिवर्तनकामी छात्र संगठन  

दिशा छात्र समुदाय द्वारा नियोजित  हमले के बाद गोरखपुर के वामपंथी,जनपक्षधर लोगों के नाम तपीश द्वारा जारी पत्र को पढ़कर और अधिक क्षोभ हुआ। कचहरी की भाषा में दिए गए  कपोल कल्पित उत्तर ने और भी आहत कर दिया। पत्र की शुरुआत बनावटी विनम्र भाषा में बनावटी विनम्रता के साथ की गयी है। उनका खोखलापन पत्र के दूसरे पैराग्राफ की पांचवीं पंक्ति में ‘हमें इस घटना पर बेहद अफसोस है,हम समझते हैं कि इस घटना को टाला जाना चाहिए था’कहकर अपनी असली मंशा और चरित्र को उजागर कर दिया है। उन्हें हमला तो करना ही था,वे सिर्फ उसे टाल ही सकते थे।

वे अपने केंद्रीय ‘व्यावसायिक गिरोह’द्वारा नियोजित फैसले को रद्द नहीं कर सकते थे। हमला करने के जो कारण पत्र में दिये गये हैं वह वास्तविक कारण नहीं हैं। वास्तविक कारण कुछ और हैं,जिन्हें साफ-साफ दिशा के लोगों में कह पाने का साहस नहीं है। जिसे छुपाने के लिए वे लगातार झूठ पर झूठ गढ़े जा रहे हैं।

 मेरी याददाश्त में कभी दिशा से जुड़े लोगों का ‘जनता को संबोधित,जनता की भाषा’में किसी विषय पर लिखा हुआ कोई पर्चा देखने में नहीं आया है जिसे हम किसी को पढ़ने के लिए प्रेरित कर सकें। फिर उस पर मुहर लगाकर बांटने का तो सवाल ही पैदा नहीं होता। एक ही विश्वविद्यालय में स्वतंत्र रूप् से अपना छात्र संगठन (पछास) संचालित करते हुए हम दूसरे छात्र संगठन का पर्चा वितरित करके अपने संगठन का विस्तार कैसे कर सकते हैं?

अगर हम वैचारिक रूप से और साहित्य के दृष्टिकोण से इतने दयनीय होते तो विश्वविद्यालय में हमारा संगठन (पछास) प्रमुख नहीं होता और दिशा छात्र समुदाय दीवार लेखन और पोस्टर चिपकाने से उबरकर  कैंपस में भी अपना वजूद कायम करने में कब का सफल हो गया होता। एक बात और यदि दिशा समुदाय के ऐसे पर्चे होते जो देश,काल, परिस्थितियों के इतने अनुरूप होते और छात्रों से संवाद करने वाले होते जिन्हें हम अपनी पसंदगी के अनुसार अपनी मुहर लगाकर वितरित करने में उत्साह का अनुभव करते तो इससे किसी क्रांतिकारी संगठन को आपत्ति कैसे हो सकती थी और फिर अगर ऐसा हुआ होता तो इसमें मेरे द्वारा ऐसी कौन सी गलती होती, जिसके लिए दिशा के लोगों से क्षमा-याचना करनी पड़ती।

इन्होंने जो तथ्य आप सब के बीच प्रस्तुत किया है उसे पढ़कर कुछ लोगों ने मुझसे यह प्रश्न किया कि दिशा के पर्चे भारी मात्रा में कहां से मिल गये,जिस पर आपने मुहर लगाकर भारी मात्रा में छात्रों के बीच में वितरित किया। और अगर वितरित किया और इतनी बड़ी सार्वजनिक कार्यवाही की तो इसे ‘कम ही’ लोग क्यों जानते हैं क्योंकि यह चोरी की कार्यवाही नहीं हो सकती। इन प्रश्नों का जवाब भी दिशा के लोग ही अपने ‘विराट कल्पना शक्ति’ के बल पर दे पायेंगे। 

जहां तक उन्होंने अपने शिकायत की जानकारी स्वदेश कुमार को देने की कही है तो यहां  स्पष्ट कर देना जरूरी है कि स्वदेश कुमार परिवर्तनकामी छात्र संगठन (पछास) के सदस्य नहीं हैं। बल्कि ‘शशि प्रकाश’ की टीम से जिंदा बच निकलने वाले कुछेक एक व्यक्तियों  में हैं  जो अपने को बचाये हुए हैं। वर्तमान में स्वदेश कुमार दिशा के स्वामी शशिप्रकाश के संगठन की जगह दूसरे संगठन ‘न्यू सोसलिस्ट एनिसिएटिव’के सक्रिय कार्यकर्ता हैं और उन्होंने  दिशा के हमले की  निंदा की है।

जहां तक पत्र में यह लिखा गया है कि उनके मात्र चार कार्यकर्ता बातचीत करने के लिए बुलाये थे और हमारा उग्र व्यवहार देखकर उनके मात्र एक कार्यकर्ता ने मारपीट की। आइये! जरा विस्तार से घटनाक्रम को जानें कि आखिर में सच क्या है? इस घटना के करीब 10-15 दिन पहले मेरे पास 7275050105 नंबर से फोन आया। फोन करने वाले ने अपना नाम मुकेश बताया तथा उसने कहा कि वह विश्वविद्यालय का छात्र है। बीए प्रथम वर्ष में पढ़ता है तथा वह भगतसिंह के बारे में जानने का इच्छुक है। उसे ‘नागरिक’, ‘परचम’ पहले परिसर में एक बार मिल चुका है। फिर चाहिए तथा वह ‘पछास’ से जुड़ना चाहता है।

वह फोन जब मेरे पास आया तो मैं उस वक्त  देवरिया में ‘क्रांतिकारी लोक अधिकार संगठन’ (क्रालोसं) के साथी वीएम तिवारी के साथ मौजूद था। लिहाजा मैंने मुकेश  से गोरखपुर से बाहर होने की बात कहकर बाद में संपर्क करने का समय ले लिया। उससे यह पूछने पर कि उसे मेरा नंबर कहां से मिला तो उसका जवाब था कि कोचिंग में पढ़ने वाले किसी लड़के ने दिया है जिसका नाम वह नहीं जानता। उसने यह बताया कि वह जिस नंबर से बात कर रहा है वह उसका नहीं है। उसके पास अपना कोई नंबर नहीं है। इस नंबर पर संपर्क न करें।

उसने यह बताया कि वह अपने घर कुशीनगर जा रहा है। दो-चार दिन बाद आने के बाद वह खुद संपर्क करेगा। पुनः उसने चार जनवरी को फोन कर बताया कि वह 5जनवरी को सायं पांच बजे गोरखपुर के चार फाटक पर मिलेगा। पांच जनवरी को पुनः उसने फोन कर ४.30बजे शाम  को याद दिलाया कि वह पांच बजे फाटक पर आ जायेगा। हमारे द्वारा यह कहने पर कि वह यूनिवर्सिटी के आसपास आ जाये, वहीं मिल लेंगे तो उसने कहा कि नहीं, वह रास्ता भूल जायेगा, शहर में अभी नया है। उसने कहा कि वह चार फाटक पर लाल रंग की रैंजर साईकिल से मिलेगा।

भीड़भाड़ वाली जगह पर बुलाकर उसने अपना वह नंबर बंद कर दिया जिससे उसने फोन किया था। अंधेरा होते देख कुछ देर इंतजार करने के बाद जब मैं वापस आने लगा तो उसने पीसीओ से फोन कर एक निर्जन स्थान पर बुलाया,जहां अंधेरा था। दो लड़के साईकिल से खड़े थे। अभी मैं उनसे यह पूछ ही रहा था कि क्या उनका नाम मुकेश है तब तक दिशा के दो कार्यकर्ता वहां अचानक प्रकट हो गये। मैं उनसे हाथ मिलाने के लिए आगे बढ़ा,तब तक  15-20 की संख्या में उस निर्जन स्थान पर खड़ी एक पुरानी ट्रक के पीछे से इनके कार्यकर्ता प्रकट हुए और बिना किसी संवाद के गाली देते हुए मुझ पर हमला कर दिया। शोर सुनकर उस सुनसान जगह पर कुछ लोगों के पहुंच जाने पर वे वहां से भाग निकले।

इसलिए तपीश का यह कहना कि यह घटना आकस्मिक है,सरासर झूठ है। इस घटना को जनचेतना  व्यावसायिक गिरोह के इशारे पर  नियोजित और योजनाबद्ध ढंग से अंजाम दिया गया है।



Jan 12, 2011

'दिशा' ने भेजी सफाई, नहीं मांगी माफ़ी


यह सफाई गोरखपुर के उन संगठनों-बुद्धिजीवियों को भेजी गयी है जो दिशा की गुंडई के खिलाफ गोरखपुर में लामबंद हुए हैं...

तपीश, दिशा छात्र संगठन

पांच जनवरी की दुखद एवं क्षोभपूर्ण घटना के संबंध में आप द्वारा हस्ताक्षरित पत्र 7जनवरी को दोपहर बाद साथी विकास के हाथों प्राप्त हुआ। सबसे पहले हम यह स्पष्ट करना चाहते हैं कि दिशा छात्र संगठन किसी भी रूप में साथी चक्रपाणि के साथ घटी घटना को समर्थन नहीं करता है।

पांच जनवरी को दिशा के चार कार्यकर्ता साथी चक्रपाणि से अपनी आपत्ति दर्ज कराने गये थे। बातचीत के दौरान चक्रपाणि का रवैया उकसावे भरा था जिससे तल्खी पैदा हुई और दिशा के एक नये कार्यकर्ता से उनकी झड़प हो गयी। हमें इस घटना का बेहद अफसोस है। हम समझते हैं कि गोरखपुर के बौद्धिक, सामाजिक, राजनीतिक हल्कों से संबंधित व्यक्तियों तथा संगठनों को घटना का केवल एक पक्ष ही बताया गया है। अतः हम आपकी सेवा में कुछ तथ्य प्रस्तुत करना चाहते हैं।

भेजी सफाई की फोटो प्रति


1. चक्रपाणि   ने जिस कार्यवाही की शुरूआत दिशा के पर्चे पर मुहर लगा पछास का बताकर वितरित करने से किया वह आगे बढ़ते हुए दिशा की दीवार पत्रिकाकाओं के उपर पछास के पोस्टर चिपका देने से होते हुए दिशा द्वारा किये गये दीवार लेखन के इर्द-गिर्द पछास का नाम लिखने और फिर दिशा का नाम मिटाकर अपने संगठन का नाम लिखने तक जाती है।

2. कम ही लोग जानते हैं कि साथी चक्रपाणि पर्चे पर मुहर लगाने की अपनी गलती को पूर्व में स्वीकार कर चुके हैं।

3. दीवार लेखन को लीपने-पोतने संबंधी जानकारी उनके  एक करीबी मित्र और सामाजिक-राजनीतिक कार्यकर्ता श्री स्वदेश कुमार को भी थी, हालांकि हमलोग पछास को आधिकारिक तौर पर भी इन घटनाओं की शिकायत करने की तैयारी भी कर रहे थे लेकिन इससे पहले कि यह हो पाता 5जनवरी को दुर्भाग्यपूर्ण घटना घट गयी।

हमें इतना ही कहना है कि इस पूरे घटनाक्रम में दिशा का पक्ष सुने बिना कुछ ऐसे फैसले लिये गये जो हम सभी के व्यापक लक्ष्य को नुकसान पहुंचाने वाले हैं। बुर्जुआ न्यायालय तक दूसरा पक्ष सुने बिना फैसला नहीं लेते लेकिन गोरखपुर के वाम दायरे में 5जनवरी की घटना पर जिस तरह इकतरफा सुनवाई हुई वह क्षोभ पैदा करने वाली है। उक्त तथ्यों को फोटो सहित आपके समक्ष प्रस्तुत करने का यह अर्थ कदापि नहीं है कि दिशा छात्र संगठन कार्यवाही का समर्थन करती है। आगे का फैसला हम आपके विवेक पर छोड़ते हैं।

नोट- इसके साथ चार तस्वीरें भेजी गयीं थीं जिसमें यह दिखाने की कोशिश है कि पछास कार्यकर्त्ता दिशा के प्रचार-प्रसार के साथ अतिक्रमण करते थे.  


‘दिशा’ के खिलाफ दिल्ली में भी बैठक


दिल्ली विश्वविद्यालय में 11दिसंबर को सामाजिक कार्यकर्ताओं,शिक्षकों और वकीलों ने बैठक कर दिशा छात्र संगठन कार्यकर्ताओं द्वारा परिवर्तकामी छात्र संगठन के नेता चक्रपाणि पर किये कायराना हमले की भर्त्सना  की है। उत्तर प्रदेश के गोरखपुर में 5दिसंबर की रात चार फाटक के नजदीक  चक्रपाणि पर यह हमला बातचीत के बहाने बुलाकर दिशा के करीब 15-20 कार्यकर्ताओं ने किया था। इस हमले में चक्रपाणि को अंदरूनी चोटें आयी हैं।

दिशा छात्र संगठन प्रमुख: ये तो बाजा 
बजाते हैं, गुंडई कौन कराता है.   
क्रांतिकारी लोक अधिकार संगठन द्वारा आयोजित इस बैठक को लेकर जारी प्रेस विज्ञप्ती में कहा गया है कि वजह चाहे जो हो,मगर घात लगातर किये गये इस हमले को कहीं से भी न्यायोचित नहीं ठहराया जा सकता। इसलिए राजनीतिक चेतना के मशालधारियों को अब सावधान हो जाना चाहिए। बैठक में शामिल हुए दिल्ली विश्विद्यालय  के शिक्षक कुमार संजय सिंह ने कहा कि ‘दिशा के लोगों ने जो मारपीट की है उसकी अब सिर्फ भर्त्सना  ही नहीं ठोस कार्यवाही भी होनी चाहिए, जिससे इस तरह की घटनाओं का दोहराव बंद हो।’

सामाजिक कार्यकर्ता जेपी नरेला की राय में ‘दिशा द्वारा छात्र नेता पर किया गया हमला कोई नायाब नहीं है। यह संगठन पहले भी नेतृत्व की सहमति से ऐसे हमले करते रहा है। दूसरी बात यह कि माफी मांगने की होशियारी भी नेतृत्व की चालबाजी का हिस्सा रहा है। इसलिए अब जरूरत उस कार्यवाही की जिससे ये लोग अगली गुंडई से बाज आयें।’ दिल्ली विश्विद्यालय  के शिक्षक राकेश रंजन ने भी इस घटना की भर्त्सना  की।

क्रांतिकारी लोक अधिकार संगठन के कमलेश ने चक्रपाणि पर किये गये इस हमले की पुरजोर भत्र्सना की और मांग रखी कि जिम्मेदार नेतृत्व इस दिशा के इस कायराना करतब पर तत्काल लिखित माफी मांगे। आगे के कार्रवाई के तौर पर बैठक में शामिल लोगों ने पूरे मामले की जानकारी के लिए एक जांच टीम गोरखपुर भी भेजने का निर्णय लिया है। इस मामले में अगली बैठक 18दिसंबर को होनी है। बैठक में राजनीतिक कार्यकर्त्ता  अंजनी कुमार, दिल्ली स्टुडेंट यूनियन के कुंदन, क्रांतिकारी युवा संगठन के सुनील समेत करीब दो दर्जन लोग मौजूद थे।