Dec 13, 2010

एसटीएफ़ के फरेब से उठेगा पर्दा



जनज्वार ब्यूरो. मानवाधिकार संगठन पीपुल्स यूनियन फॉर सिविल लिबर्टीज (पीयूसीएल)ने उत्तर प्रदेश की मुख्यमंत्री मायावती से प्रदेश की जेलों में बंद तारिक कासमी और खालिद की गिरफ्तारी की जांच के लिए बने आरडी निमेष जांच आयोग की रिपोर्ट तत्काल  प्रभाव से सार्वजनिक करने की मांग की।

उत्तर प्रदेश के वाराणसी,फ़ैजाबाद और लखनऊ कचहरी में २७नवम्बर २००७को हुए छह  श्रृंखलाबद्ध बम धमाकों के आरोपी तरीक कासमी और खालिद अंसारी की गिरफ़्तारी के तीन साल से अधिक का समय गुजार चुका है .  संगठन के प्रदेश संगठन मंत्री मसीहुद्दीन संजरी,तारिक शफीक और विनोद यादव ने कहा कि कासमी और खालिद पर जो आतंकवादी होने का  आरोप लगा है वह झूठा है. मगर धमाकों बंद ये दोनों  बेगुनाह इसलिए जेलों से बाहर नहीं हो पा रहे हैं कि आरडी निमेश कमिटी की जाँच रिपोर्ट सार्वजानिक नहीं हुई है.

तारिक कासमी: बाराबंकी जेल में बंद

पीयुसीएल  के सदस्यों के मुताबिक यूपी एसटीएफ को जाँच के बहाने जो विशेष अधिकार दिए गए हैं वो अपने अधिकारों का उल्लंघन कर रही है. एसटीएफ़ जहां राष्ट् के आम नागरिकों को गैर कानूनी तरीके से फंसा  रही है तो वहीं गैरकानूनी तरीके से खतरनाक विस्फोटक और असलहे राष्ट् विरोधी तत्वों से प्राप्त कर रही है।

पीयूसीएल के मसीहुद्दीन संजरी, तारिक शफीक, विनोद यादव, अंशु माला सिंह, अब्दुल्ला एडवोकेट, जीतेंद्र हरि पांडे, आफताब, राजेन्द्र यादव,तबरेज अहमद ने मायावती सरकार से मांग की कि आरडी निमेष जांच आयोग की रिपोर्ट तत्काल लायी जाय।

संगठन ने जिलाधिकारी के माध्यम से मुख्यमंत्री को भेजे ज्ञापन में कहा कि हम आपको याद दिलाना चाहेंगे कि आजगढ़ के तारिक कासमी का 12 दिसंबर 2007 को रानी की सराय चेक पोस्ट पर कुछ असलहाधारियों ने अपहरण कर लिया, जिस पर स्थानीय स्तर पर तमाम राजनीतिक दलों और मानवाधिकार संगठनों ने धरने प्रदर्शन किए और जनपद की स्थानीय पुलिस ने तारिक को खोजने के लिए एक पुलिस टीम का गठन भी किया।

 वहीं खालिद को जिला जौनपुर के   बाजार मड़ियांहूं से 16 दिसंबर 2007 की शाम चाट की दुकान से कुछ असलहाधारी टाटा सूमों सवार उठा ले गए थे, जिसके मड़ियाहूं बाजार में दर्जनों गवाह हैं। जिस पर भी काफी धरने-प्रदर्शन हुए और मांग की गई कि जल्द से जल्द उसको खोजा जाय। और इसी के बाद 22 दिसंबर 2007 को यूपी एसटीएफ ने दावा किया कि उसने यूपी के लखनऊ, फैजाबाद और वाराणसी कचहरी बम धमाकों के आरोपी तारिक कासमी और खालिद को उसने सुबह बाराबंकी रेलवे स्टेशन से भारी मात्रा में विस्फोटक पदार्थों और असलहों  के साथ गिरफ्तार किया।

यूपी एसटीएफ के इस दावे के बाद मानवाधिकार संगठनों के लोगों का यह दावा पुख्ता हो गया कि इन दोनों को यूपी एसटीएफ ने गैर कानूनी तरीके से उठा कर अपने पास गैर कानूनी तरीके से पहले से रखे विस्फोटक पदार्थों को दिखा कर गिरफ्तार किया। जिस पर उत्तर प्रदेश सरकार की तरफ से इस घटना की जांच के लिए आरडी निमेष जांच आयोग का गठन किया गया. आयोग को  छह महीने के भीतर अपनी जांच प्रस्तुत करनी थी।

मगर गिरफ्तारी के  तीन साल बीत जाने के बाद भी जांच आयोग की निष्क्रियता के चलते रिपोर्ट नहीं पेश की गई जो मानवाधिकार हनन का गंभीर मसला है। जबकि जांच आयोग को मानवाधिकार संगठनों और राजनीतिक दलों तक ने अपने पास उपलब्ध जानकारियां दी। मड़ियाहूं से गिरफ्तार खालिद की गिरफ्तारी के विषय में स्थानीय मड़ियाहूं कोतवाली तक ने सूचना अधिकार के तहत यह जानकारी दी कि खालिद को 16 दिसंबर 2007 को मड़ियाहूं से गिरफ्तार किया गया था। जो यूपी एसटीएफ के उस दावे की कि उसने उसको बाराबंकी से विस्फोटक के साथ गिरफ्तार किया था, के दावे को खारिज करता है।

ऐसे में महत्वपूर्ण सवाल राष्ट् की सुरक्षा के लिए भी है  कि यूपी एसटीएफ के पास कहां से इतनी भारी मात्रा में अवैध विस्फोटक और असलहे आए। साथ ही  आरडी निमेष जाँच आयोग की रिपोर्ट आते ही असल गुनहगारों पर शिकंजा  कसेगा और बाराबंकी की जेल में बंद बेगुनाहों को न्याय मिलेगा.

वैश्विक पत्रकारिता का नया दौर


विकीलिक्स के खुलासों ने दुनिया भर में  जिस तरह से खलबली मचाई  है,वह इस बात का सबूत है कि इसके असर से मुख्यधारा और उससे इतर वैकल्पिक पत्रकारिता के स्वरुप,चरित्र और कलेवर में आ रहे परिवर्तनों का कितना जबरदस्त प्रभाव पड़ने लगा है.


आनंद प्रधान


विकीलिक्स ने मुख्यधारा की पत्रकारिता को निर्णायक रूप से बदलने की जमीन तैयार कर दी है.हम-आप आज तक पत्रकारिता को जिस रूप में जानते-समझते रहे हैं,विकीलिक्स के बाद यह तय है कि वह उसी रूप में नहीं रह जायेगी.

अभी तक हमारा परिचय और साबका मुख्यधारा की जिस कारपोरेट पत्रकारिता से रहा है,वह अपने मूल चरित्र में राष्ट्रीय,बड़ी पूंजी और विज्ञापन आधारित और वैचारिक तौर पर सत्ता प्रतिष्ठान के व्यापक हितों के भीतर काम करती रही है लेकिन विकीलिक्स ने इस सीमित दायरे को जबरदस्त झटका दिया है.यह कहना तो थोड़ी जल्दबाजी होगी कि यह प्रतिष्ठानी पत्रकारिता पूरी तरह से बदल या खत्म हो जायेगी लेकिन इतना तय है कि विकीलिक्स के खुलासों के बाद इस पत्रकारिता पर बदलने का दबाव जरूर बढ़ जायेगा.

असल में,विकीलिक्स के खुलासों ने दुनिया भर में खासकर अमेरिकी सत्ता प्रतिष्ठान में जिस तरह से खलबली मचाई हुई है,वह इस बात का सबूत है कि विकीलिक्स के असर से मुख्यधारा और उससे इतर वैकल्पिक पत्रकारिता के स्वरुप,चरित्र और कलेवर में आ रहे परिवर्तनों का कितना जबरदस्त प्रभाव पड़ने लगा है.


इसमें कोई दो राय नहीं है कि विकीलिक्स की पत्रकारिता शुरूआती और सतही तौर पर चाहे जितनी भी ‘अराजक’,‘खतरनाक’और ‘राष्ट्रहित’को दांव पर लगानेवाली दिखती हो लेकिन गहराई से देखें तो उसने पहली बार राष्ट्रीय सीमाओं और राष्ट्रीय सुरक्षा के संकीर्ण और काफी हद तक अलोकतांत्रिक दायरे को जोरदार झटका दिया है.

इस अर्थ में,यह सच्चे मायनों में २१ वीं सदी और भूमंडलीकरण के दौर की वास्तविक वैश्विक पत्रकारिता है.यह पत्रकारिता राष्ट्र और उसके संकीर्ण बंधनों से बाहर निकलने का दु:साहस करती हुई दिखाई दे रही है,भले ही उसके कारण देश और उसकी सरकार को शर्मिंदा होना पड़ रहा है.

सच पूछिए तो अभी तक विकीलिक्स ने जिस तरह के खुलासे किए हैं, उस तरह के खुलासे आमतौर पर मुख्यधारा के राष्ट्रीय समाचार मीडिया में बहुत कम लगभग अपवाद की तरह दिखते थे.लेकिन विकीलिक्स ने उस मानसिक-वैचारिक संकोच,हिचक और दबाव को तोड़ दिया है जो अक्सर संपादकों को ‘राष्ट्रीय हितों और सुरक्षा’के नाम पर इस तरह की खबरों को छापने और प्रसारित करने से रोक दिया करता था.

दरअसल,राष्ट्र के दायरे में बंधी पत्रकारिता पर यह दबाव हमेशा बना रहता है कि ऐसी कोई भी जानकारी या सूचना जो कथित तौर पर ‘राष्ट्रहित’ और ‘राष्ट्रीय सुरक्षा’ के अनुकूल नहीं है, उसे छापा या दिखाया न जाए. इस मामले में सबसे चौंकानेवाली बात यह है कि आमतौर पर ‘राष्ट्रहित’ और ‘राष्ट्रीय सुरक्षा’ की परिभाषा सत्ता प्रतिष्ठान और शासक वर्ग तय करता रहा है. वही तय करता रहा है कि क्या ‘राष्ट्रहित’ में है और किससे ‘राष्ट्रीय सुरक्षा’ को खतरा है?

सरकारें और कारपोरेट मीडिया भले ही लोकतंत्र,अभिव्यक्ति की आज़ादी,पारदर्शिता,जवाबदेही,सूचना के अधिकार,मानव अधिकारों जैसी बड़ी-बड़ी बातें करते न थकते हों लेकिन सच्चाई यही है कि शासक वर्ग और सत्ता प्रतिष्ठान आम नागरिकों से जहां तक संभव हो,कभी ‘राष्ट्रहित’और कभी ‘राष्ट्रीय सुरक्षा’ के नाम पर सूचनाएं छुपाने की कोशिश करते रहे हैं.

इसकी वजह किसी से छुपी नहीं है.कोई भी सरकार नहीं चाहती है कि नागरिकों को वे सूचनाएं मिलें जो उनके वैध-अवैध कारनामों और कार्रवाइयों की पोल खोले.सच यह है कि सरकारें ‘राष्ट्रीय हित और सुरक्षा’के नाम पर बहुत कुछ ऐसा करती हैं जो वास्तव में,शासक वर्गों यानी बड़ी कंपनियों, राजनीतिक वर्गों, ताकतवर लोगों और हितों के हित और सुरक्षा में होती हैं.

असल में,शासक वर्ग एक एक आज्ञाकारी प्रजा तैयार करने के लिए हमेशा से सूचनाओं को नियंत्रित करते रहे हैं. वे सूचनाओं को दबाने, छुपाने, तोड़ने-मरोड़ने से लेकर उनकी अनुकूल व्याख्या के जरिये ऐसा जनमत तैयार करते रहे हैं जिससे उनके फैसलों और नीतियों की जनता में स्वीकार्यता बनी रहे.मुख्यधारा का मीडिया भी शासक वर्गों के इस वैचारिक प्रोजेक्ट में शामिल रहा है.

लेकिन विकीलिक्स ने सूचनाओं के मैनेजमेंट की इस आम सहमति को छिन्न-भिन्न कर दिया है.इसकी एक बड़ी वजह यह है कि वह किसी एक देश और उसकी राष्ट्रीयता से नहीं बंधा है.वह सही मायनों में वैश्विक या ग्लोबल है.यही कारण है कि वह राष्ट्र के दायरे से बाहर जाकर उन लाखों अमेरिकी केबल्स को सामने लाने में सफल रहा है जिसमें सिर्फ अमेरिका ही नहीं,अनेक राष्ट्रों की वास्तविकता सामने आ सकी है.

राष्ट्रों के संकीर्ण दायरे को तोड़ने में विकीलिक्स की सफलता का अंदाज़ा इस तथ्य से भी लगाया जा सकता है कि जूलियन असान्जे ने केबल्स को लीक करने से पहले उसे एक साथ अमेरिका,ब्रिटेन,फ़्रांस और जर्मनी के चार बड़े अख़बारों को मुहैया कराया और उन अख़बारों ने उसे छापा भी.

यह इन अख़बारों की मजबूरी थी क्योंकि अगर वे उसे नहीं छापते तो कोई और छापता और दूसरे, उन तथ्यों को सामने आना ही था, उस स्थिति में उन अख़बारों की साख खतरे में पड़ जाती. यह इस नए मीडिया की ताकत भी है कि वह तमाम आलोचनाओं के बावजूद मुख्यधारा के समाचार मीडिया का भी एजेंडा तय करने लगा है.


 मामूली बात नहीं है कि विकीलिक्स से नाराजगी के बावजूद मुख्यधारा के अधिकांश समाचार माध्यमों ने उसकी खबरों को जगह दी है.यह समाचार मीडिया के मौजूदा कारपोरेट माडल की जगह आम लोगों के सहयोग और समर्थन पर आधारित विकीलिक्स जैसे नए और वैकल्पिक माध्यमों की बढ़ती ताकत और स्वीकार्यता की भी स्वीकृति है.

यहां यह उल्लेख करना जरूरी है कि पिछले डेढ़-दो दशकों से मुख्यधारा की कारपोरेट पत्रकारिता के संकट की बहुत चर्चा होती रही है.लेकिन यह संकट उनके गिरते सर्कुलेशन और राजस्व से ज्यादा उनकी गिरती साख और विश्वसनीयता से पैदा हुआ है.


विकीलिक्स जैसे उपक्रमों का सामने आना इस तथ्य का सबूत है कि मुख्यधारा की पत्रकारिता ने खुद को सत्ता प्रतिष्ठान के साथ इस हद तक ‘नत्थी’(एम्बेडेड)कर लिया है कि वहां इराक और अफगानिस्तान जैसे बड़े मामलों के सच को सामने लाने की गुंजाईश लगभग खत्म हो गई है.

ऐसे में,बड़ी पूंजी की जकडबंदी से स्वतंत्र और लोगों के समर्थन पर खड़े विकीलिक्स जैसे उपक्रमों ने नई उम्मीद जगा दी है.निश्चय ही,विकीलिक्स से लोगों में सच जानने की भूख और बढ़ गई है.इसका दबाव मुख्यधारा के समाचार माध्यमों को भी महसूस हो रहा है.जाहिर है कि विकीलिक्स के बाद पत्रकारिता वही नहीं रह जायेगी/नहीं रह जानी चाहिए.


('राष्ट्रीय सहारा' से  साभार  )

हर गांव में तीन एनजीओ


पहाड़ में की बढ़ती तादात यहां के सामाजिक एवं आर्थिक बनावट को नुकसान पहुंचाने वाली है। एनजीओ विभिन्न सर्वेक्षणों के माध्यम से एनजीओ जो काल्पनिक खतरे पैदा करते हैं,उनके समाधान के लिए बड़ा बजट भी प्राप्त करते हैं।

 
राजेंद्र पंत 'रमाकांत'

उत्तराखण्ड में पर्यावरण,जल,जंगल और जमीन के संरक्षण एवं संवर्धन के नाम पर बड़ी संख्या में स्वयंसेवी संगठनों की घुसपैठ बढ़ रही है। सरकार की निर्भरता लगातार इस संगठनों पर बढ़ती जा रही है। अधिकतर काम सरकार एनजीओ से करा रही है।

इससे जहां सरकार अपनी नाकामियों को छुपाने का काम करती है,वहीं ऐसे संगठनों को फलने-फूलने का मौका भी मिल रहा है। अब स्थिति यह है कि पूरे राज्य में जितने गांव हैं,उसके तिगुने एनजीओ हैं। एक अनुमान के अनुसार राज्य के प्रत्येक गांव में औसतन तीन संगठन काम कर रहे हैं।

उल्लेखनीय है कि उत्तराखण्ड में राज्य बनने से पहले इन संगठनों की घुसपैठ शुरू हो गयी थी। पर्यावरण संरक्षण,पानी के संवर्धन से लेकर जन कल्याणकारी परियोजनाओं तक उनके जुडऩे की लंबी फेहरिस्त रही है। धीरे-धीरे वे यहां के विकास की अगुवाई के सबसे बड़े पुरोधा बन गये।


इस समय राज्य में पचास हजार के करीब स्वंयसेवी संगठन कार्य कर रहे हैं। उन्हें देश-विदेश की वित्तीय संस्थाओं के अलावा सरकार भी काम देती है। इस समय राज्य एनजीओ के लिए सबसे मुनाफा देने वाली जगह साबित हो रही है। यहां किसी उद्योग या उत्पादन का नहीं, बल्कि समाजसेवा से एनजीओ लाभ कमा रहे हैं।


राज्य में स्वयंसेवी संस्थाओं के आंकड़ों में देखें तो इस समय तेरह जिलों में कुल 49954संस्थाएं जनसेवा में लगी हैं। यह आंकड़ा बहुत दिलचस्प है कि राज्य में कुल गांवों की संख्या 17हजार के आसपास है। अर्थात प्रत्येक गांव में तीन एनजीओ कार्यरत हैं। सरकारी संरक्षण में फलते-फूलते एनजीओ अब पहाड़ की दशा-दिशा तय करने लगे हैं।


एक तरह से एनजीओ एक नई इंडस्ट्री के रूप में स्थापित हो गये हैं। इस समय पहाड़ में मौजूद हजारों एनजीओ उन सारे कामों में हस्तक्षेप कर रहे हैं जो सरकार ने अपने विभागों के माध्यम से कराने थे। पर्यावरण, महिला कल्याण, शिक्षा, पौधारोपण, स्वास्थ्य, एड्स, टीवी और कैंसर के प्रति जागरूकता पैदा करने से लेकर यहां की सांस्कृतिक विरासत को बचाने तक का ठेका इन्हीं संगठनों के हाथों में है।



एनजीओ की जिलेवार संख्या

देहरादून 8249
हरिद्वार 4350
टिहरी 5483
पौड़ी 5292
रुद्रप्रयाग 1357
चमोली 2885
उत्तरकाशी 3218
उधमसिंहनगर 4654
पिथौरागढ़ 3203
बागेश्वर 940
अल्मोड़ा 4166
चम्पावत 806
नैनीताल 5351


कुल योग 49954


यही कारण है कि पहाड़ की मूल समस्याओं से ध्यान हटाकर विभिन्न सर्वेक्षणों के माध्यम से नये और काल्पनिक खतरों से बचने के लिए फंडिंग एजेंसियों और सरकार से बड़े बजट पर हाथ साफ किया जाता है। असल में सरकारी तंत्र की नाकामी और कार्य संस्कृति ने इस तरह की समाजसेवा की प्रवृत्ति को आगे बढ़ाया है।

जहां सरकार के पास जन कल्याणकारी योजनाओं को लागू करने के लिए भारी-भरकम विभाग और ढांचागत व्यवस्था है,वहीं इन कामों को करने के लिए सरकार स्वयंसेवी संगठनों की मदद लेती है। दुनिया के विकसित देशों ने तीसरी दुनिया के देशों में घुसपैठ बनाने के लिए एक रास्ता निकाला।

इनमें अपना साम्राज्य स्थापित करने के लिए वह एक जनपक्षीय मुखौटा भी ओढ़ते हैं। विश्व बैंक और अन्य बड़ी फंडिंग एजेंसियों के माध्यम से आने वाले पैसे को उसी तरह खर्च किया जाता है, जैसा वह चाहते हैं। यही कारण है कि जिन कामों को सरकार ने करना था, वे अब इन संगठनों के हाथों में हैं।


पहाड़ में एनजीओ की बढ़ती तादात यहां के सामाजिक एवं आर्थिक बनावट को नुकसान पहुंचाने वाली है। इसकी सबसे बड़ी वजह यह है कि यह विभिन्न सर्वेक्षणों के माध्यम से एनजीओ जो काल्पनिक खतरे पैदा करते हैं, उनके समाधान के लिए बड़ा बजट भी प्राप्त करते हैं।

नब्बे के दशक में अल्मोड़ा में कार्यरत ‘सहयोग’संस्था ने जिस तरह पहाड़ के सामाजिक ताने-बाने को एक साजिश के तहत तोडऩे की रिपोर्ट तैयार की थी, उसका भारी विरोध हुआ था। कमोबेश आज भी यही स्थित है। अब एड्स जागरूकता के नाम पर यदा-कदा जमीनी सच्चाई से दूर रिपोर्ट तैयार कर उसके खिलाफ जागरूकता लाने के नाम पर भारी फर्जीवाड़ा हो रहा है।

सबसे महत्वपूर्ण तथ्य यह है कि पहाड़ में जिन मामलों को लेकर ये संगठन काम करते रहे हैं, उन्हें पिछले पच्चीस-तीस सालों में ज्यादा नुकसान हुआ है। यहां की आंदोलन की धार को कुंद करने का काम भी ये कर रहे है।


यदि पहाड़ में स्वयंसेवी संगठन यहां की तस्वीर बदल रहे होते तो एक गांव में औसतन तीन से ज्यादा एनजीओ इस प्रदेश को स्वावलंबी ही नहीं,बल्कि दुनिया के बेहतर देशों में शुमार कर सकते थे। सरकार और एनजीओ का यह गठजोड़ कहां जाकर समाप्त होगा, यह आने वाला समय बतायेगा, लेकिन लगातार बढ़ते इन संगठनों पर समय रहते लगाम लगाने की जरूरत है।


(पाक्षिक पत्रिका जनपक्ष आजकल से साभार)


Dec 12, 2010

विपक्ष विहीन बिहार




बेशक यह सवाल है कि जिस विपक्ष ने 15साल के शासन के दौरान राजसत्ता का सुख भोगा,जनता का उपहास उड़ाया और प्रदेश को जंगलराज बना छोड़ा,उसे जनता ने वोटतंत्र के जरिए उसकी औकात बताई तो इसमें गलत क्या है?


पंकज कुमार

बिहार विधानसभा के जनादेश पर जनता खुश है और विश्लेषक जनता के इस ऐतिहासिक फैसले पर। हर तरफ लोग नीतीश सरकार की विकास के उचित निर्णयों को शाबासी दे रहे हैं। बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार मौजूदा  समय में संभवतः एममात्र ऐसे नेता हैं जिनकी सार्वजनिक चर्चाओं के बीच विरोधी कम मिल रहे हैं।

मगर इस जीत साथ ही जो हार जुड़ी है,क्या वह ऐतिहासिक नहीं है,क्या वह जनता पक्ष नहीं है,क्या इसका विश्लेषण नहीं किया जाना चाहिए। विश्लेषण इस बात का कि विकास की आस में अति उत्साहित होकर कहीं जनता जनार्दन ने अपने पैरों पर कुल्हाड़ी तो नहीं मार ली, कहीं चूक तो नहीं हो गई!


बिहार के मुख्यमंत्री: जनता है तो क्या गम है
ये सवाल इसलिए कि जिस जनता ने नीतीश सरकार को सिर-माथे पर बैठाकर सत्ता की चाभी दोबारा सौंपी है, उन्हीं लोगों ने जनता की आवाज उठाने वाले विपक्ष को मरणासन्न स्थिति तक पहुंचा दिया है। वह भी ऐसे वक्त में जब देश में विपक्ष की स्थिति बहुत दयनीय और असंगठित है।

बेशक यह सवाल है कि जिस विपक्ष ने 15साल के शासन के दौरान राजसत्ता का सुख भोगा,जनता का उपहास उड़ाया और प्रदेश को जंगलराज बना छोड़ा,उसे जनता ने वोटतंत्र के जरिए उसकी औकात बताई तो इसमें गलत क्या है?लेकिन लोकतंत्र का इतिहास रहा है कि कमजोर विपक्ष सत्तासीन को निरंकुश बनाता है और मजबूत विपक्ष जनता की आवाज को शासन तक पहुंचाता है।


दरअसल,विपक्ष सत्तासीन पार्टी को अपने कर्तव्यों और जिम्मेदारियों  का अहसास कराता है। प्रजातंत्र में विपक्ष का यह दायित्व होता है कि वह सरकार के कामकाज पर नजर रखे,उस पर अंकुश लगाए,गरीबों-ग्रामीणों एवं शोषित वर्गों के लिए संघर्ष करे,जनता का पक्षधर बनकर सरकार की नीतियों और योजनाओं पर सवाल उठाए और उनके साथ मिलकर उनकी मांगों के समर्थन में आंदोलन करे। 


बिहार विधानसभा के पहले सत्र का पहला दिन सदन के अंदर विपक्ष के लगभग खोए हुए अस्तित्व का अहसास करा गया। क्योंकि 243 विधानसभा सदस्यों में 206 सीटों पर सत्ताधारी दल छाया हुआ था, जबकि मात्र 37 सीटों पर समूचा विपक्ष सिमटा नजर आया, जिनका मनोबल गिरा हुआ था।

इसकी एक बड़ी वजह विपक्ष का नेता बनने के लिए पार्टी विशेष के पास कुल सीटों का 10 प्रतिशत यानी 243 सीटों में से कम से कम 25 सीटों का नहीं होना भी रहा। इस बार प्रमुख विपक्षी राजद (राष्ट्रीय जनता दल) को महज 22 सीटें ही मिली। हालांकि विधानसभा अध्यक्ष चाहे तो चुनाव से पहले किये गये गठबंधन की कुल सीटों के आधार पर विपक्ष का नेता तय कर सकता है। अगर ऐसा होता है तो राजद के अब्दुल बारी सिद्दिकी सदन में प्रतिपक्ष के नेता की भूमिका  निभाएंगे।

आंकड़ों के लिहाज से देखा जाये तो बिहार विधानसभा के इतिहास में विपक्षी सदस्यों की इतनी कम संख्या कभी नहीं रही। आजादी के बाद के बिहार विधानसभा के इतिहास को पलटें तो किसी भी विपक्षी पार्टी को मिली अब तक की सबसे कम सीटें हैं।

पंद्रहवें विधानसभा चुनाव में सबसे बड़ी विपक्षी पार्टी आरजेडी को महज 22सीटें मिली,जो कुल सीटों का 9.05 प्रतिशत है। जबकि समूचा विपक्ष (37 सीट) 15.23 प्रतिशत है। 2010 से पहले ऐसे हालात आजादी के बाद हुए पहले बिहार विधानसभा चुनाव में ही देखने को मिले थे।


वर्ष 1951 के विधानसभा चुनाव में 330 सदस्यों वाले सदन में मुख्य विपक्षी दल झारखंड पार्टी को 32 सीटें मिली, जो कुल सीटों का 9.70 प्रतिशत था। जबकि कुल विपक्षी सदस्यों की संख्या 91 थी, जिनका प्रतिशत 27.58 रहा। ऐसे ही हालात 1957 के चुनाव में भी देखने को मिले। तब कांग्रेस को 318 में से 210 सीटें मिली। दूसरे दलों झारखंड पार्टी और प्रजा सोशलिस्ट पार्टी को 31-31 सीटें मिली, जिन्होंने कुल सीटों की 9.57 फीसदी सीटें हासिल कीं।

लेकिन तीसरी से 14वीं विधानसभा तक बिहार की जनता ने विपक्ष को मजबूत बनाए रखा और उसकी प्रासंगिकता बनी रही। यही वजह रही कि जनता ने समय-समय पर बिहार में चौंकाने वाले और भारतीय राजनीति को नई दिशा देने वाले फैसले दिये। चाहे बात 70की दशक की हो या मंडल के बाद की राजनीति की या फिर मंडल-कमंडल के मंथन से निकले लालू राज की या फिर जंगलराज बनाम सुशासन की लड़ाई के बीच विकास परख जीत की।



राजद प्रमुख लालू प्रसाद : अबकी जनता ने तफरी  ली

दरअसल बिहार के नीतीशकरण के संदर्भ में यह समझना बेहद जरूरी है कि जेडी (यू)-बीजेपी गठबंधन ने लालू की खींची लकीर के आगे विकास की बड़ी लकीर ही खींची है,जिसने राज्य और राज्य के बाहर सकारात्मक माहौल बनाने का काम किया।

नीतीश के पांच साल का कार्यकाल राजद से बेहतर रहा,क्योंकि उनका सामना मजबूत विपक्ष से होता रहा। नीतीश पर अपना हर फैसला विवादों से दूर जनहित में लेने का दबाव था,क्योंकि उन्हें सत्ता से दूर होने का डर भी था। जेपी के छात्र आंदोलन की तपिश में जन्मे नीतीश कुमार के सामने लालू से बेहतर छवि और जनआकांक्षाओं पर खरा उतरने का दबाव संख्या बल में मजबूत विपक्ष के कारण ही रहा। यह एनडीए के सामने सड़क,बिजली,पानी,रोजगार,सुरक्षा जैसे मुद्दों पर विपक्ष के नकारात्मक प्रचार को गलत साबित करने और काम के जरिए जनता की उम्मीदों पर खरा उतरने का दबाव काम करता रहा।

सिर्फ नीतीश कुमार को सड़क,बिजली और बेहतर कानून-व्यवस्था से ही विकास पुरुष कहना उचित नहीं होगा, बल्कि असल चुनौती अभी बाकी है। इनमें कृषि की खस्ता हालत चिंता का विषय है। बिहार की 80फीसदी अर्थव्यवस्था कृषि आधारित है, लेकिन एनडीए शासनकाल में कृषि विकास दर नकारात्मक रही है।

राज्य सरकार भले ही एक लाख शिक्षकों की भर्ती कर शिक्षा में सुधार का दावा करें, लेकिन हकीकत ये है कि जिन शिक्षामित्रों की बहाली की गई उनका खुद का शैक्षणिक स्तर सवालों के घेरे में है। इसके अलावा भूमिहीन दलितों को जमीन आवंटन,सिंचाई के लिए पर्याप्त बिजली,चीनी मिलों का जीर्णोद्धार,बेहतर माहौल के बावजूद रोजगार अवसरों का सृजन, प्रशासन में घूसखोरी-लालफीताशाही रोकने, शराब के ठेकों पर अकुंश लगाने जैसे तमाम मुद्दे हैं, जिन पर विकास पुरुष नीतीश कुमार असफल ही रहे हैं।


ऐसे में जनता का प्रतिनिधित्व और उसकी आवाज विधानसभा में उठाने का काम सरकार को जनता से किए वादे को निभाने के लिए विपक्ष ही आवाज बुलंद करेगा। ताकि विशाल बहुमत वाले सरकार की मजबूत दीवारों को झकझोरा जा सके।

विकास की आस में ऐतिहासिक जनादेश देकर भारतीय राजनीति की नई कहानी गढ़ने वाले एनडीए गठबंधन की जीत बिहार की जनता को सुखद अहसास करा रही होगी,लेकिन भारतीय राजनीति इस ओर भी इंगित करती है कि इस तरह का जनादेश खतरे की घंटी भी साबित हो सकता है, क्योंकि लोकतंत्र में कमजोर विपक्ष, कमजोर लोकतंत्र की निशानी भी होता है।



लेखक 'शिल्पकार टाइम्स' हिंदी पाक्षिक अख़बार में सहायक संपादक है उनसे kumar2pankaj@gmail.comपर संपर्क किया जा सकता है.

घरेलू नौकरानियों का यौन उत्पीड़न नहीं होता?


अकेले दिल्ली में करीब साढ़े तीन लाख महिलाएं कामों से जुड़ी हैं,जो सरकार के इस तकनीकी बहाने की वजह से उत्पीड़न रोकने संबंधी अधिकारों की हकदार नहीं होंगी। दिल्ली के घरों में काम करने वाली ज्यादातर महिलाएं आदिवासी और दलित वर्ग से हैं।

जनज्वार ब्यूरो. काम की जगहों पर लगातार उजागर हो रहे यौन उत्पीड़न के मद्देनजर सरकार ने संसद में महिला सुरक्षा संबंधी बिल पेश किया है। संसद के मौजूदा सत्र में सरकार द्वारा ‘प्रोटेक्शन ऑफ  वुमेन अगेंस्ट सेक्सुअल हरासमेंट ऐट वर्क प्लेस-2010’नाम से पारित इस बिल से उम्मीद की जा रही है कि आने वाले समय में महिला उत्पीड़न के मामलों में कमी आयेगी। मगर यह उम्मीद देश की करीब 90लाख महिलाओं के लिए नहीं होगी जो घरों में सफाई कर,खाना बना और मालिकों के बच्चों को पालकर गुजारा करती हैं।

दिल्ली स्थित ‘घरेलू मजदूर फोरम’की दी गयी जानकारी के मुताबिक महिला उत्पीड़न रोकने के जिम्मेदार ‘महिला एवं बाल कल्याण मंत्रालय’और विभागों का मानना है कि घरेलू काम करने वाली महिलाओं के उत्पीड़न का गवाह मिलना मुश्किल होगा,इसलिए इन्हें बिल का हिस्सा नहीं बनाया जा सकता। मंत्रालय का यह भी तर्क है कि इस तरह के उत्पीड़न के मामले चूंकि घरों और परिवारों के बीच होते हैं जहां अन्य कोई कामगार या सहकर्मी मौजूद नहीं होता,इसलिए ऐसे मामलों की पुष्टि करना मुश्किल होता है।

फोरम के मुताबिक अकेले दिल्ली में करीब साढ़े तीन लाख महिलाएं घरेलू कामों से जुड़ी हैं,जो सरकार के इस तकनीकी बहाने की वजह से उत्पीड़न रोकने संबंधी अधिकारों की हकदार नहीं होंगी। दिल्ली के घरों में काम करने वाली ज्यादातर महिलाएं आदिवासी और दलित वर्ग से हैं।
घर में मजदूरी : कहाँ से मिले इन्हें अधिकार

गरीबी और भुखमरी से उबरने की चाहत में बिहार, बंगाल, झारखंड, छत्तीसगढ़, नेपाल और पूर्वोत्तर के राज्यों से दलालों के माध्यम से ये महिलायें महानगरों में पहुंचायी जाती हैं। नगरों-महानगरों में काम करने वाली इन महिलाओं का निरक्षरता, भाषा की दिक्कत, दलित-आदिवासी और गरीब परिवारों से ताल्लुक रखने के कारण जमकर शारीरिक,मानसिक और यौन उत्पीड़न होता है।ऐसे में समाज की सबसे कमजोर वर्ग की इन महिलाओं और लड़कियों को उत्पीड़न के खिलाफ बनाये जा रहे कानून में शामिल न किया जाना हास्यास्पद है।

घरेलू मजदूर फोरम के संयोजक योगेश कुमार की राय में ‘सबसे छुपा हुआ शोषण घरेलू काम कर जीवन-यापन करने वाली महिलाओं का होता है, पर उन्हें बिल में शामिल नहीं किया गया। इसके मैं तीन कारण मानता हूं, पहला उनका दलित-आदिवासी होना,दूसरा कानून बनते ही उन लोगों के नाम उजागर होने का खौफ जो कानून बनाने में भी शामिल हैं और उत्पीड़न भी करते हैं और तीसरी वजह है मुख्यधारा की राजनीति में दलितों,खासकर आदिवासियों का राजनीतिक प्रतिनिधित्व न होना।

सामाजिक कार्यकर्ता एनई राजा कहती हैं,‘सरकार ने निजी,सरकारी और स्वयंसेवी संगठनों के कार्यस्थलों को इस बिल में शामिल किया है तो घरों में काम करने वाली महिलाओं को क्यों नहीं?जाहिर है सरकार की निगाह में उनका यौन उत्पीड़न होता ही नहीं या उनका इस तरह से उत्पीड़न नहीं होता कि उसके लिए कानून बनाया जाये। सरकार की इस बेतुकी सोच के खिलाफ हम लोग प्रधानमंत्री कार्यालय,राष्ट्रीय सलाहकार परिषद और महिला एवं बाल कल्याण मंत्रालय के पदाधिकारियों से हमारा प्रतिनिधि मंडल मिलेगा।’

अब देखना यह है कि सामाजिक संगठनों की पहल के बाद भी काम वाली बाईयों को यौन उत्पीड़न के खिलाफ अधिकार मिल पाता है या नहीं।

Dec 10, 2010

उसकी लाल आँखें

फरीद खान

1

उसकी आँखें लाल नहीं हैं।
न ही वह ग़ुस्से में है।
उसके सामने जो जंगल जल गये,
उसके बिम्ब अंकित हैं उनमें।


धनुष सी देह और तीर सी निगाह लिए जबकि वह चुपचाप खड़ा है।
पर लोग नज़र बचा के कन्खी से ऐसे देख रहे हैं
मानो कुछ हुआ ही न हो।
हालांकि ऐसी कोई ख़बर भी नहीं कि कुछ हुआ है।


अभी तो बस वह शहर में आया ही है,
और लोगों को हो रहा है किसी प्रलय का आभास,
जबकि वह पिंजड़े में बंद है।
और कल से शुरु हो जायेगी उसकी नुमाईश।

2

वह अकेला ऐसा है,
जो बता सकता है क, ख, ग, घ के अलग अलग माने।
और उन्हें जोड़ कर बना सकता है शब्द।
बता सकता है वाक्य विन्यास।


वह पहचान सकता है परिन्दों को रंग और रूप से।
बोल सकता है उनकी बोली,
समझता है उनकी वाणी।
उसके कंठ में अभी सूखा नहीं है कुँए का पानी।


वह अकेला ऐसा है जो,
बता सकता है बच्चों को पेड़ों के नाम।


चिड़ियाघर में एक नये प्राणी के आगमन का,
शहर में लगा है विज्ञापन।





पटना विश्वविद्यालय से उर्दू साहित्य में एम.ए.। पटना इप्टा में 12 साल सक्रिय रहे। नाट्यकला में भारतेन्दु नाट्य अकादमी, लखनऊ से दो साल का प्रशिक्षण। अभी मुम्बई में व्यवसायिक लेखन के क्षेत्र में सक्रिय हैं, उनसे kfaridbaba@gmail.com पर संपर्क किया जा सकता है.

कौन कराये बालश्रमिकों की परीक्षा


बुन्देलखंड के जिले में  चालीस  बालश्रम विद्यालय हैं, लेकिन आठ सौ  बालश्रमिकों की परीक्षा नहीं ली गयी। वहां तैनात अनुदेशक और अध्यापकों ने बालश्रमिकों की परीक्षा कराने से इनकार कर दिया...

जनज्वार ब्यूरो.  बुन्देलखण्ड के चार जनपद बांदा, चित्रकूट, महोबा, हमीरपुर में बीते ढाई दशकों से प्राकृतिक संपदाओं  की बेइतहां लूट जारी है। लूट के दुष्परिणामों   का असर किसानों, मजदूरों और अन्य श्रमजीवियों पर पड़ रहा है। घटता जलस्तर, भू-प्रदूषण,कम होती वर्षा,विस्थापित होते हुए किसान-मजदूर और साल दर साल बदहाल होती खेती इसके बड़ी सामान्य उदाहरण हैं।

इसी की एक बानगी है कि पिछले छः वर्षों से इन जनपदों में अकाल,आत्महत्या, कर्ज, सूखा एवं पलायन की समस्या सिर चढ़ कर बोल रही है। वर्ष 2005-07 सैकड़ों  किसानों-खेतीहर मजदूरों ने आत्हत्याएं की हैं। पिछले एक माह से और विगत एक वर्ष से जनसूचना अधिकार के तहत उपलब्ध आंकड़ों के आधार पर पर्यावरण बचाने की मुहिम में प्रयासरत प्रवास सोसाइटी ने 01 अक्टूबर  2010 से ही लोगों को लामबन्द करते हुए प्रकृति के अवैध खनन रोके जाने की गुहार की थी।

संगठन ने तीन दिसंबर को इलाहाबाद उच्च न्यायालय में एक जनहित याचिका दाखिल की थी जिसकी अगली सुनवाई 22दिसम्बर होनी है। इस जनहित याचिका में उत्तर प्रदेश के प्रमुख सचिव माइन्स एवं मिनिरल्स उत्तर प्रदेश, प्रमुख सचिव वन एवं सामाजिक वानकी, डिवीजनल फारेस्ट ऑफिसर महोबा एवं बांदा, केंद्रीय प्रदुषण नियत्रंण बोर्ड लखनऊ, राज्य प्रदुषण नियंत्रण बोर्ड के निदेशक और जनरल माइन्स के निदेशक को नामित किया गया है।



बांदा का एक खदान: शिक्षा और रोटी इन पत्थरों की मुहताज

गौरतलब है कि हाल ही में बांदा के जिला श्रम अधिकारी ने जो सूचनायें दी हैं,उसके मुताबिक नौ से चौदह वर्ष के 1646 लड़के और 425 लड़कियां, बाल श्रमिेक के तौर पर खतरनाक कामों में लगे हुए हैं। वहीं वर्ष 2009के पॉयलट सर्वेक्षण के तहत 179 बालश्रमिक चिन्हित किये गये थे। 


 कानून में अधिनियम 1986 (बालश्रम प्रतिषेध एवं विनियमन) के तहत चौदह वर्ष से कम आयु के बच्चों के लिए 13 व्यवसायों को और 57प्रक्रियाओं   के तहत काम कराने को खतरनाक माना जाता है और इसका उल्लंघन करने वाले को एक हजार रूपये से बीस हजार रूपये तक का जुर्माना एवं एक वर्ष की सजा का भी प्रावधान है।


दूसरी तरफ जिले में कार्यरत बालश्रमिकों के उन्मूलन की परियोजना के अन्तर्गत केन्द्र सरकार से बांदा जनपद को डेढ़ करोड़ रूपये प्राप्त हुये हैं जिसमें से 85लाख रूपये खर्च हो चुके हैं। इसमें  राज्य सरकार की कोई धनराशि सम्मिलित नहीं है। एक प्रमुख तथ्य यह है कि जनपद में  कुल चालिस बालश्रम विद्यालय कार्यरत हैं।


जिनमें पढ़ने वाले लगभग 800 बालश्रमिकों को कक्षा-5 और 8वीं की परीक्षा इसलिये नहीं दिलायी गयी क्योंकि वहां तैनात अनुदेशक और अध्यापकों को बालश्रम समिति द्वारा मानदेय ही नहीं दिया गया। जिसकी वजह से 800 बालश्रमिक एक मरतबा फिर भिन्न-2व्यवसायों को रोजी-रोटी का जरिया बनाकर बालश्रम में लगे रहने को मजबूद हुए हैं।


 हमीरपुर में  2180,महोबा में 1200 और बचपन बचाओ संघर्ष समिति के अनुसार बांदा में कुल 4000बालश्रमिक हैं। जिन्हें  बुन्देलखण्ड के खतरनाक व्यवसायों जैसे अवैध खनन, बालू खदान, होटल, भिक्षावृत्ति, मजदूरी के साथ-साथ यौन उत्पीड़न में भी प्रताड़ित किया जाता है।


इसलिए प्रवास ने आगामी सोमवार से बुन्देलखण्ड में खत्म हो रहे पहाड़, जंगल-जल एवं वन्य जीवों के पुनर्वास हेतु साझा पहल और हस्ताक्षर अभियान चलाने का संकल्प लिया है। इस अभियान में जनसहयोग,जन समर्थन की अगुवाई कर आमलोगों से बुन्देलखण्ड बचाने के लिये प्रेरित करने का भी संकल्प लिया गया है।



Dec 9, 2010

वर्दीधारी, सबसे बड़े भ्रष्टाचारी


आज अंतरराष्ट्रीय भ्रष्टाचार विरोधी दिवस पर जारी एक रिपोर्ट में भारत को दुनिया के सर्वाधिक भ्रष्ट देशों में गिनती की गयी है। भ्रष्टाचार के खिलाफ काम करने वाली अंतरराष्ट्रीय संस्था ट्रांसपेरेंसी इंटरनेशल की रिपार्ट के मुताबिक भारत के 74 फीसदी लोगों ने स्वीकार किया है कि पिछले तीन वर्षों में देश के भीतर भ्रष्टाचार के प्रतिशत में बढ़ातरी हुई है। लोगों की निगाह में पहले नंबर के भ्रष्टाचारी पुलिसकर्मी और दूसरे नंबर पर राजनीतिज्ञ हैं।



ट्रांसपेरेंसी इंटरनेशल के देखरेख में ग्लोबल कॅरप्सन बैरोमीटर के जरिये किये गये इस सर्वें में दुनिया के 86 देशों के 91,500 लोगों शामिल किया गया है। सर्वे में शामिल 60फीसदी की राय में उनके अपने मुल्कों में भ्रष्टाचार लगातार बढ़ा है और हर चार में से एक आदमी ने यह भी कहा कि उसने पिछले वर्ष ही घूस दिया है।

भ्रष्ट देशों की गिनती में भारत के साथ नाइजीरिया,इराक,अफगानिस्तान भी हैं जहां सर्वेक्षण में शामिल बहुतायत के मुताबित उन्होंने कोई ना कोई काम कराने के लिए रिश्वत दी है। जबकि चीन,रूस और मध्यपूर्व में काम कराने के लिए एक तिहाई लोगों को घूस देना पड़ा।

ग्लोबल कॅरप्सन बैरोमीटर 2010में कुल ग्यारह क्षेत्रों को सर्वे में शामिल किया गया है,जिनकी भ्रष्टाचारी स्थिति इस प्रकार से है-

सर्वाधिक भ्रष्ट
राजनीतिक पार्टियां

बड़े पैमाने भ्रष्ट
पुलिस
प्रशासक
संसद

भ्रष्टाचार प्रभावित

निजी क्षेत्र
धार्मिक संस्थाएं
न्यायपालिका
मीडिया
शिक्षा तंत्र

कम प्रभावित
मिलिटरी
स्वंय सेवी संगठन(एनजीओ)